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त्रिवेणी की नजरें मुझसे चार हुई तो वह स्तब्ध रह गया। शायद उसे अपनी नज़रों पर संदेह हो रहा था। वह आश्चर्य से मुझे ताकता रहा। फिर एक लड़की को अपने पहलू से हटाकर तेजी से उठा और मेरे निकट आकर हाथ बाँध कर बोला-
“मेरे बड़े भाग कुँवर साहब जो आपने मुझे याद रखा।”
लड़कियाँ अपना अस्त-व्यस्त लिबास संभालती हुई दूसरी कमरे में जा चुकी थीं। मैंने त्रिवेणी की आँखों में आँखें डालकर नफरत से जवाब दिया।
“त्रिवेणी! तुमने यह कैसे सोच लिया कि मैं तुम्हें भूल जाऊँगा। तुमने तो मुझ पर बड़े अहसान किए हैं। आज तक मुझे तुम्हारा व्यवहार अच्छी तरह याद है। मुझे हैरत है कि तुम अभी तक ज़िन्दा हो। तुम्हें तो मर जाना चाहिए था। या अपने ढीठपन की वजह से ज़िन्दा ही हो तो तुम्हें फुटपाथ पर भीख माँगते नज़र आना चाहिये था।”
“पधारिये कुँवर साहब!” त्रिवेणी ने चापलूसी से कहा। “गुजरी हुई बातें भूल जाइए।”
“चापलूसी बन्द करो त्रिवेणी ? तुम खूब समझ रहे हो कि मैं किस इरादे से आया हूँ।” मैंने संयत स्वर में कहा। “पिछली बार मैं जरा जल्दी में था इसलिए तुम्हारे अहसानों का बदला नहीं चुका सका था। लेकिन आज मैं अगले पिछले सभी हिसाब करने के इरादे से आया हूँ।”
त्रिवेणी ने मेरे बिगड़े हुए तेवर को देखा तो हाथ जोड़कर खड़ा हो गया। “कुँवर साहब। मुझे क्षमा कर दीजिये। मैं हाथ जोड़कर विनती करता हूँ।”
“क्षमा कर दूँ और तुम्हें... ?” पहली बार मेरे होंठों पर व्यंग्य भरी मुस्कराहट उभरी। “पिछली बातें याद करो त्रिवेणी दास। तुमने भी कभी मुझे क्षमा करने की कोशिश की थी।”
जवाब में त्रिवेणी ने झुककर मेरे पैर पकड़ लिये और गिड़गिड़ा कर बोला- “कुँवर साहब ? मैं जानता हूँ कि मैंने आपके साथ अच्छा बर्ताव नहीं किया। परन्तु पहले मेरी आँखों पर पर्दा पड़ा हुआ था। मैं अँधा हो गया था। मुझे क्षमा कर दीजिये कुँवर साहब।”
मैंने क्रोध से त्रिवेणी के सिर के बाल पकड़ लिये और उसे उठाकर खड़ा करते हुए नफरत से कहा।
“त्रिवेणी दास! तुमने मुझसे मोहिनी छीनकर मेरी ज़िन्दगी बर्बाद कर दी थी। तुम अंदाजा भी नहीं लगा सकते कि तुम्हारी इस हरकत से मुझे कितनी भारी हानि उठानी पड़ी। सुनो त्रिवेणी। मैं यहाँ वक्त ज़ाया करने नहीं आया हूँ। तुमने बहुत दिन आराम से गुजारे। आज से तुम्हारे बुरे दिनों का प्रारम्भ होता है। मैं तुम्हें अपाहिज करके सड़क पर भीख माँगने के लिये मजबूर कर दूँगा। आवारा कुत्तों की तरह गंदी नालियों में पड़े रहोगे और कोई व्यक्ति तुम पर तरस न खाएगा। मैं तुम्हें सिसक-सिसककर, तड़पा-तड़पा कर बड़ा घिनौना जीवन बिताने पर मजबूर कर दूँगा। इत्मीनान रखो, मैं तुम्हें जान से नहीं मारूँगा।”
त्रिवेणी सिर से पाँव तक इस तरह लरज रहा था। जैसे उसने कड़कड़ाती सर्दी में ठण्डे पानी से स्नान कर लिया हो। उसकी आँखों में मौत के साए काँप रहे थे। चेहरे की रंगत जर्द पड़ चुकी थी। वह मुझे रहम भरी दृष्टि से देखकर हकलाता हुआ बोला–
“कुँवर साहब! आपकी धर्म पत्नी पर जो कुछ बीती है उसने आपको व्याकुल कर दिया है, परन्तु अब आप मुझे अपना मित्र समझिए। शायद मैं आपके किसी काम आ जाऊँ। अगर आप मेरी सुने तो मैं आपको ऐसा उपाय बता सकता हूँ। जो पंडित हरि आनन्द को मठ से बाहर निकलने पर मजबूर कर देगा।”
“त्रिवेणी ?” हरि आनन्द का नाम सुनकर मैंने त्रिवेणी के बाल छोड़ दिए। और फिर उसे जहरीली नजरों से घूरता हुआ बोला।
“जल्दी बताओ। क्या तुम उस कमीने पंडित को मठ के बाहर निकालने में मेरी मदद कर सकते हो ?”
“मेरे बड़े भाग कुँवर साहब जो आपने मुझे याद रखा।”
लड़कियाँ अपना अस्त-व्यस्त लिबास संभालती हुई दूसरी कमरे में जा चुकी थीं। मैंने त्रिवेणी की आँखों में आँखें डालकर नफरत से जवाब दिया।
“त्रिवेणी! तुमने यह कैसे सोच लिया कि मैं तुम्हें भूल जाऊँगा। तुमने तो मुझ पर बड़े अहसान किए हैं। आज तक मुझे तुम्हारा व्यवहार अच्छी तरह याद है। मुझे हैरत है कि तुम अभी तक ज़िन्दा हो। तुम्हें तो मर जाना चाहिए था। या अपने ढीठपन की वजह से ज़िन्दा ही हो तो तुम्हें फुटपाथ पर भीख माँगते नज़र आना चाहिये था।”
“पधारिये कुँवर साहब!” त्रिवेणी ने चापलूसी से कहा। “गुजरी हुई बातें भूल जाइए।”
“चापलूसी बन्द करो त्रिवेणी ? तुम खूब समझ रहे हो कि मैं किस इरादे से आया हूँ।” मैंने संयत स्वर में कहा। “पिछली बार मैं जरा जल्दी में था इसलिए तुम्हारे अहसानों का बदला नहीं चुका सका था। लेकिन आज मैं अगले पिछले सभी हिसाब करने के इरादे से आया हूँ।”
त्रिवेणी ने मेरे बिगड़े हुए तेवर को देखा तो हाथ जोड़कर खड़ा हो गया। “कुँवर साहब। मुझे क्षमा कर दीजिये। मैं हाथ जोड़कर विनती करता हूँ।”
“क्षमा कर दूँ और तुम्हें... ?” पहली बार मेरे होंठों पर व्यंग्य भरी मुस्कराहट उभरी। “पिछली बातें याद करो त्रिवेणी दास। तुमने भी कभी मुझे क्षमा करने की कोशिश की थी।”
जवाब में त्रिवेणी ने झुककर मेरे पैर पकड़ लिये और गिड़गिड़ा कर बोला- “कुँवर साहब ? मैं जानता हूँ कि मैंने आपके साथ अच्छा बर्ताव नहीं किया। परन्तु पहले मेरी आँखों पर पर्दा पड़ा हुआ था। मैं अँधा हो गया था। मुझे क्षमा कर दीजिये कुँवर साहब।”
मैंने क्रोध से त्रिवेणी के सिर के बाल पकड़ लिये और उसे उठाकर खड़ा करते हुए नफरत से कहा।
“त्रिवेणी दास! तुमने मुझसे मोहिनी छीनकर मेरी ज़िन्दगी बर्बाद कर दी थी। तुम अंदाजा भी नहीं लगा सकते कि तुम्हारी इस हरकत से मुझे कितनी भारी हानि उठानी पड़ी। सुनो त्रिवेणी। मैं यहाँ वक्त ज़ाया करने नहीं आया हूँ। तुमने बहुत दिन आराम से गुजारे। आज से तुम्हारे बुरे दिनों का प्रारम्भ होता है। मैं तुम्हें अपाहिज करके सड़क पर भीख माँगने के लिये मजबूर कर दूँगा। आवारा कुत्तों की तरह गंदी नालियों में पड़े रहोगे और कोई व्यक्ति तुम पर तरस न खाएगा। मैं तुम्हें सिसक-सिसककर, तड़पा-तड़पा कर बड़ा घिनौना जीवन बिताने पर मजबूर कर दूँगा। इत्मीनान रखो, मैं तुम्हें जान से नहीं मारूँगा।”
त्रिवेणी सिर से पाँव तक इस तरह लरज रहा था। जैसे उसने कड़कड़ाती सर्दी में ठण्डे पानी से स्नान कर लिया हो। उसकी आँखों में मौत के साए काँप रहे थे। चेहरे की रंगत जर्द पड़ चुकी थी। वह मुझे रहम भरी दृष्टि से देखकर हकलाता हुआ बोला–
“कुँवर साहब! आपकी धर्म पत्नी पर जो कुछ बीती है उसने आपको व्याकुल कर दिया है, परन्तु अब आप मुझे अपना मित्र समझिए। शायद मैं आपके किसी काम आ जाऊँ। अगर आप मेरी सुने तो मैं आपको ऐसा उपाय बता सकता हूँ। जो पंडित हरि आनन्द को मठ से बाहर निकलने पर मजबूर कर देगा।”
“त्रिवेणी ?” हरि आनन्द का नाम सुनकर मैंने त्रिवेणी के बाल छोड़ दिए। और फिर उसे जहरीली नजरों से घूरता हुआ बोला।
“जल्दी बताओ। क्या तुम उस कमीने पंडित को मठ के बाहर निकालने में मेरी मदद कर सकते हो ?”