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अख़बार में सारा विवरण लिखा हुआ था और यकीनन यह कारनामा मोहिनी का था। मोहिनी के जागने पर मैंने उससे इस बारे में पूछा।
“हाँ राज! मैंने सोचा क्यों न उसे कंगाल कर दूँ इसलिए मैंने ऐसा ही किया। साथ ही उसे इतना बदसूरत बना दिया कि वह अपनी सूरत दर्पण में देखते हुए भी डरा करेगा।”
“लेकिन वह मर गया तो...”
“नहीं मरेगा नहीं, बड़ी सख्त जान है। अब वह अस्पताल में है ठीक होने में काफी दिन लगेंगे। अब चाहो तो एक-दो रोज बाद अस्पताल में उससे मिलकर आ सकते हो। उससे कोठी में मिलना ठीक न था। अस्पताल में तो कोई भी उससे मिल सकता है।”
“ठीक है मोहिनी, तुमने शुरुआत बहुत अच्छी की।”
तीन-चार रोज में ही मैंने रेस के मैदान से खासी दौलत समेट ली। मेरी आर्थिक स्थिति तेजी के साथ सुधरती जा रही थी। मेरे ठाट-बाठ फिर पुराने ढर्रे पर लौटने लगे थे। वेटर को तगड़ी टिप देना, भिखारियों को सौ-सौ रुपये तक दे देना। इस बार मोहिनी आई थी तो मैं बुराइयों से दूर रहना चाहता था। इसलिए मैंने कलवन्त को सिर्फ अपनी दोस्ती तक ही सिमित रखा। मैं त्रिवेणी की तरह जालिम नहीं बनना चाहता था। एक सप्ताह बाद मैं त्रिवेणी से अस्पताल में मिला। बड़ी मुश्किल से उसने मुझे पहचाना। उसका पूरा जिस्म पट्टियों में लिपटा था और पूरी तरह अपने होश में नहीं था। वह गूँगा सा होकर रह गया था या मुझसे बात करने के लिये उसके कंठ से शब्द ही नहीं फूट पा रहे थे।
“क्यों, अब कैसे मिजाज हैं ?” मैंने उससे पूछा, “यह आग कैसे लग गयी महाराज ?”
वह चुप रहा। बस याचना भरी दृष्टि से मुझे देखता रहा।
“तुम्हें अपनी दौलत से तो बड़ी लगावट थी त्रिवेणी और यह कोठी तुम्हें बड़ी प्यारी थी। फिर आग क्यों लगा दी।”
“कुँवर साहब!” त्रिवेणी कराहा, “मुझे क्षमा कर दो!”
“क्षमा किस बात की ?” मैंने आश्चर्य प्रकट किया।
“मैं जानता हूँ यह कैसे हुआ। आप मुझसे बदला लेना चाहते हैं। आप मेरे दोस्त हैं, मुझे क्षमा कर दो।”
“त्रिवेणी, तुमने तो मुझे कभी क्षमा नहीं किया। मैंने तुम्हारे जुल्म सहे और तुम भी मर्द बनकर मेरा मुकाबला करो। यह शुरुआत है त्रिवेणी, उस मुलाकात के बाद यह हमारी दूसरी मुलाकात है और तीसरी मुलाकात तब होगी जब तुम अस्पताल से निकल चुके होंगे।” मैंने अपने को संतुष्ट कर दिया और फिर उसके स्वास्थ्य के सम्बन्ध में बातें करता रहा– “मैं तुम्हें अपने ऊपर तोड़े गए हर जुल्म की याद दिलाऊँगा त्रिवेणी दास।”
फिर मैं उसे दयनीय हालत में कराहता छोड़कर अस्पताल से बाहर आ गया।
पूना में दस-बारह दिन रहने के बाद मैंने बम्बई प्रस्थान की तैयारी शुरू कर दी। जाते समय मैं इंस्पेक्टर से मिलता आया और उसे बताया कि मैं पूना छोड़ रहा हूँ। जरूरत पड़े तो बम्बई के ताज होटल में मुझसे संपर्क किया जा सकता है। मैंने उसे ताज होटल का पता दे दिया।
कलवन्त मुझसे अलग नहीं होना चाहती थी। जब मैं उससे विदा हुआ तो उसने मेरे गले में बाहें डाल दी।
“हम फिर कब मिलेंगे ?” उसने पूछा।
“जल्दी ही...”
“क्या आप अपनी रियासत में हमें बुलाएँगे।”
“सुनो कलवन्त, हम किसी रियासत के राजकुमार नहीं! यह सुनकर धक्का पहुँचेगा पर तुम्हें विदाई के समय किसी तरह के धोखे में नहीं रखना चाहता।”
मेरा ख्याल था कि यह सुनकर कलवन्त को मुझसे किसी प्रकार की लगावट नहीं रहेगी परन्तु ऐसा न था। इस बात का उस पर कोई प्रभाव नहीं पड़ा। वह किसी रियासत के प्रिंस को नहीं बल्कि राज को चाहती थी।
बम्बई पहुँचकर मैंने अपना कारोबार जल्दी ही खड़ा कर लिया। एक शानदार कोठी भी खरीद ली और जल्दी ही मैं फिर उसी समाज में साँस लेने लगा जहाँ पहले जीता था। जब मेरे अच्छे दिन थे तो यह लोग मेरे इर्द-गिर्द रहते थे। मेरे सबसे बड़े शुभचिंतक थे। परन्तु बुरे दिनों में कोई साथ नहीं रहा। किसी ने मेरे फैले हुए हाथ में भीख तक न डाली। हर कोई मुझसे नफरत करने लगा था। मैंने बहुत अच्छे दिन देखे थे और बहुत बुरे भी। और मैं भगवान से प्रार्थना करूँगा किसी इंसान को अच्छे दिन न दे तो फिर उसे बुरे दिन न देखने पड़े। यदि किसी को बुरे दीन देखने पड़े तो उसे अच्छे दिन भी दिखाए। इंसान भी एक अजीब फितरती चीज है। उसके बनाये हुए समाज में उन लोगों के लिये कोई जगह नहीं होती जो बुरे दिनों को देखते हैं। हर कोई उससे मुँह मोड़ लेता है और सिर्फ अँधेरा उसका साथ देता है। उजाले उससे रूठ जाते हैं। लोग भी ऐसे ही समाज के प्राणी थे।
अब मैं फिर बड़ी-बड़ी पार्टियों में घिरा रहता। सुंदर औरतें मेरे पहलू में आने के लिये तरसती लेकिन मैं कड़वा घूँट पीकर आया था इसलिए उनसे दूर ही रहता...
बस अब मुझे डॉली की जरुरत थी ताकि मेरी घरेलू जिंदगी के दोपजल उठे और फिर मैंने एक निश्चित तारीख में बम्बई से डॉली के शहर की यात्रा शुरू कर दी।
उस नगरी में पहुँचकर मुझे फिर कई चेहरे याद आये। डॉली के बाप का चेहरा उनमें सबसे ऊपर था। लेकिन मैं डॉली के बाप को सबक पढ़ाना चाहता था। मैं जानता था मोहिनी मेरे पास है और अब डॉली को प्राप्त करने में कोई बाधा मेरे सामने न आएगी। डॉली का बाप अगर मेरा ससुर न होता तो मैं न जाने उसके बारे में क्या फैसला कर डालता।
इस सिलसिले में मैंने मोहिनी की सावधानी से निर्देश दिए और मोहिनी ने अपना काम शुरू कर दिया। जिस तरह मोहिनी के चले जाने से डॉली भी मुझसे रूठ गयी थी और मेरा घर उजड़ गया था। उसी तरह मोहिनी की वापसी से मेरा जहाँ आबाद होने लगा। मोहिनी के लिये डॉली के बाप को सबक पढ़ाना कोई मुश्किल काम न था। चार दिन में ही डॉली का बाप सीधे रास्ते पर आ गया और डॉली की कोठी पर पहुँचकर उसने एक दामाद की तरह ही मेरा स्वागत किया। डॉली एक बार फिर मेरे जीवन में वापिस आ गयी थी।
डॉली को मैं होटल में ले आया। वह बहुत कमजोर हो चुकी थी और उसके चेहरे पर रौनक भी न रही थी।
“हाँ राज! मैंने सोचा क्यों न उसे कंगाल कर दूँ इसलिए मैंने ऐसा ही किया। साथ ही उसे इतना बदसूरत बना दिया कि वह अपनी सूरत दर्पण में देखते हुए भी डरा करेगा।”
“लेकिन वह मर गया तो...”
“नहीं मरेगा नहीं, बड़ी सख्त जान है। अब वह अस्पताल में है ठीक होने में काफी दिन लगेंगे। अब चाहो तो एक-दो रोज बाद अस्पताल में उससे मिलकर आ सकते हो। उससे कोठी में मिलना ठीक न था। अस्पताल में तो कोई भी उससे मिल सकता है।”
“ठीक है मोहिनी, तुमने शुरुआत बहुत अच्छी की।”
तीन-चार रोज में ही मैंने रेस के मैदान से खासी दौलत समेट ली। मेरी आर्थिक स्थिति तेजी के साथ सुधरती जा रही थी। मेरे ठाट-बाठ फिर पुराने ढर्रे पर लौटने लगे थे। वेटर को तगड़ी टिप देना, भिखारियों को सौ-सौ रुपये तक दे देना। इस बार मोहिनी आई थी तो मैं बुराइयों से दूर रहना चाहता था। इसलिए मैंने कलवन्त को सिर्फ अपनी दोस्ती तक ही सिमित रखा। मैं त्रिवेणी की तरह जालिम नहीं बनना चाहता था। एक सप्ताह बाद मैं त्रिवेणी से अस्पताल में मिला। बड़ी मुश्किल से उसने मुझे पहचाना। उसका पूरा जिस्म पट्टियों में लिपटा था और पूरी तरह अपने होश में नहीं था। वह गूँगा सा होकर रह गया था या मुझसे बात करने के लिये उसके कंठ से शब्द ही नहीं फूट पा रहे थे।
“क्यों, अब कैसे मिजाज हैं ?” मैंने उससे पूछा, “यह आग कैसे लग गयी महाराज ?”
वह चुप रहा। बस याचना भरी दृष्टि से मुझे देखता रहा।
“तुम्हें अपनी दौलत से तो बड़ी लगावट थी त्रिवेणी और यह कोठी तुम्हें बड़ी प्यारी थी। फिर आग क्यों लगा दी।”
“कुँवर साहब!” त्रिवेणी कराहा, “मुझे क्षमा कर दो!”
“क्षमा किस बात की ?” मैंने आश्चर्य प्रकट किया।
“मैं जानता हूँ यह कैसे हुआ। आप मुझसे बदला लेना चाहते हैं। आप मेरे दोस्त हैं, मुझे क्षमा कर दो।”
“त्रिवेणी, तुमने तो मुझे कभी क्षमा नहीं किया। मैंने तुम्हारे जुल्म सहे और तुम भी मर्द बनकर मेरा मुकाबला करो। यह शुरुआत है त्रिवेणी, उस मुलाकात के बाद यह हमारी दूसरी मुलाकात है और तीसरी मुलाकात तब होगी जब तुम अस्पताल से निकल चुके होंगे।” मैंने अपने को संतुष्ट कर दिया और फिर उसके स्वास्थ्य के सम्बन्ध में बातें करता रहा– “मैं तुम्हें अपने ऊपर तोड़े गए हर जुल्म की याद दिलाऊँगा त्रिवेणी दास।”
फिर मैं उसे दयनीय हालत में कराहता छोड़कर अस्पताल से बाहर आ गया।
पूना में दस-बारह दिन रहने के बाद मैंने बम्बई प्रस्थान की तैयारी शुरू कर दी। जाते समय मैं इंस्पेक्टर से मिलता आया और उसे बताया कि मैं पूना छोड़ रहा हूँ। जरूरत पड़े तो बम्बई के ताज होटल में मुझसे संपर्क किया जा सकता है। मैंने उसे ताज होटल का पता दे दिया।
कलवन्त मुझसे अलग नहीं होना चाहती थी। जब मैं उससे विदा हुआ तो उसने मेरे गले में बाहें डाल दी।
“हम फिर कब मिलेंगे ?” उसने पूछा।
“जल्दी ही...”
“क्या आप अपनी रियासत में हमें बुलाएँगे।”
“सुनो कलवन्त, हम किसी रियासत के राजकुमार नहीं! यह सुनकर धक्का पहुँचेगा पर तुम्हें विदाई के समय किसी तरह के धोखे में नहीं रखना चाहता।”
मेरा ख्याल था कि यह सुनकर कलवन्त को मुझसे किसी प्रकार की लगावट नहीं रहेगी परन्तु ऐसा न था। इस बात का उस पर कोई प्रभाव नहीं पड़ा। वह किसी रियासत के प्रिंस को नहीं बल्कि राज को चाहती थी।
बम्बई पहुँचकर मैंने अपना कारोबार जल्दी ही खड़ा कर लिया। एक शानदार कोठी भी खरीद ली और जल्दी ही मैं फिर उसी समाज में साँस लेने लगा जहाँ पहले जीता था। जब मेरे अच्छे दिन थे तो यह लोग मेरे इर्द-गिर्द रहते थे। मेरे सबसे बड़े शुभचिंतक थे। परन्तु बुरे दिनों में कोई साथ नहीं रहा। किसी ने मेरे फैले हुए हाथ में भीख तक न डाली। हर कोई मुझसे नफरत करने लगा था। मैंने बहुत अच्छे दिन देखे थे और बहुत बुरे भी। और मैं भगवान से प्रार्थना करूँगा किसी इंसान को अच्छे दिन न दे तो फिर उसे बुरे दिन न देखने पड़े। यदि किसी को बुरे दीन देखने पड़े तो उसे अच्छे दिन भी दिखाए। इंसान भी एक अजीब फितरती चीज है। उसके बनाये हुए समाज में उन लोगों के लिये कोई जगह नहीं होती जो बुरे दिनों को देखते हैं। हर कोई उससे मुँह मोड़ लेता है और सिर्फ अँधेरा उसका साथ देता है। उजाले उससे रूठ जाते हैं। लोग भी ऐसे ही समाज के प्राणी थे।
अब मैं फिर बड़ी-बड़ी पार्टियों में घिरा रहता। सुंदर औरतें मेरे पहलू में आने के लिये तरसती लेकिन मैं कड़वा घूँट पीकर आया था इसलिए उनसे दूर ही रहता...
बस अब मुझे डॉली की जरुरत थी ताकि मेरी घरेलू जिंदगी के दोपजल उठे और फिर मैंने एक निश्चित तारीख में बम्बई से डॉली के शहर की यात्रा शुरू कर दी।
उस नगरी में पहुँचकर मुझे फिर कई चेहरे याद आये। डॉली के बाप का चेहरा उनमें सबसे ऊपर था। लेकिन मैं डॉली के बाप को सबक पढ़ाना चाहता था। मैं जानता था मोहिनी मेरे पास है और अब डॉली को प्राप्त करने में कोई बाधा मेरे सामने न आएगी। डॉली का बाप अगर मेरा ससुर न होता तो मैं न जाने उसके बारे में क्या फैसला कर डालता।
इस सिलसिले में मैंने मोहिनी की सावधानी से निर्देश दिए और मोहिनी ने अपना काम शुरू कर दिया। जिस तरह मोहिनी के चले जाने से डॉली भी मुझसे रूठ गयी थी और मेरा घर उजड़ गया था। उसी तरह मोहिनी की वापसी से मेरा जहाँ आबाद होने लगा। मोहिनी के लिये डॉली के बाप को सबक पढ़ाना कोई मुश्किल काम न था। चार दिन में ही डॉली का बाप सीधे रास्ते पर आ गया और डॉली की कोठी पर पहुँचकर उसने एक दामाद की तरह ही मेरा स्वागत किया। डॉली एक बार फिर मेरे जीवन में वापिस आ गयी थी।
डॉली को मैं होटल में ले आया। वह बहुत कमजोर हो चुकी थी और उसके चेहरे पर रौनक भी न रही थी।