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“राज, हरि आनन्द एक कमीना और जालिम इंसान है। उसके पास जो शक्तियाँ हैं उससे निपटना आसान काम नहीं। परंतु तुम हिम्मत मत हारो। इंसान पर मुसीबतें तो आती ही रहती हैं।”
“फिर भी मुझे कुछ तो करना होगा।”
“मैं तुम्हें एक उपाय बताती हूँ। तुम्हें कुलवन्त याद है ?”
“कुलवन्त!”
कुलवन्त का नाम सुनते ही मुझे एक झटका सा लगा। आख़िर मैं किस तरह उसे भूला बैठा। पूना के क्लबों की शान। अमीरों की महफ़िल की शमां कुलवन्त। जिसने मुझे बेपनाह मोहब्बत की थी। जिसने मेरे लिये घर-बार छोड़ा और फिर वही कुलवन्त...।
आह! कुलवन्त का चेहरा मेरी आँखों के सामने घूमने लगा। कुलवन्त ने संसार की मोह-माया से छुटकारा प्राप्त पर लिया था। वह जोगन बन गयी थी। उसने बाबा प्रेमलाल का स्थान प्राप्त कर लिया था और माला जैसी सुन्दर लड़की को मेरी झोली में डाल दिया था।
“ओह माला! मैं इस पूरे समय में उसे भूल ही गया था।”
“यह इंसान की एक फितरत है। इसमें तुम्हारा कोई दोष नहीं।”
“लेकिन तुम कुलवन्त के बारे में क्या कहना चाहती हो ?”
“कुलवन्त मैसूर की पहाड़ियों में तप कर रही है और उसे बाबा का स्थान प्राप्त है। देवी-देवताओं का आशीर्वाद उसके साथ है। कुलवन्त इन शैतानी शक्तियों से आपको छुटकारा दिला सकती है। आप एक बार उससे मिलिए।”
माला का बताया उपाय मेरे मस्तिष्क में जम कर रह गया और मैंने तय किया कि मैं कुलवन्त की तलाश में एक बार फिर मैसूर की उन्हीं पहाड़ियों तक जाऊँगा।
आठ रोज़ तक मैंने साधु जगदेव का मण्डल से निकलने का इन्तजार किया। परंतु जगदेव मण्डल से न निकला तो आवश्यक तैयारियाँ करके मैं मैसूर के लिये रवाना हो गया। एक बार फिर आँसुओं से माला के साथ मेरी जुदाई के लिये अलविदा कहा। फिर मैं मैसूर की पहाड़ियों के लिये चल पड़ा। मेरे लिये वह रास्ते जाने-पहचाने थे। मैं आठ रोज़ तक उन पहाड़ियों में भटकता, अनगिनत मुसीबतें सहन करता आख़िर बाबा प्रेमलाल के स्थान तक पहुँच ही गया।
झरने के पास मुझे किसी के गुनगुनाने की आवाज़ सुनाई दी। मेरी आशा बँधी और मैं झरने की तरफ़ बढ़ता चला गया। परंतु जब मैं उस लड़की के निकट पहुँचा तो मुझे देखकर हैरत हुई । वह लड़की तरन्नुम थी। अपनी आप बीती सुनाते वक्त मुझे बहुत सी बात छोड़नी पड़ी। क्योंकि मेरी आप बीती संघर्ष और मुसीबतों का एक लम्बा सिलसिला है। जब तरन्नुम को देखा तो बीती बातों का ख़्याल आया। लखनऊ में यह लड़की मुझे मिली थी। मुसीबतों में घिरी, भोली-भाली मासूम लड़की। अशर्फी बेगम याद आयी। जिसके बाला खाने पर तरन्नुम के हुस्न की चकाचौंध थी और लखनऊ के उमरा नवाबेन उसकी नथ उतराई के लिये बोलियाँ लगा रहे थे। मोहिनी ने मुझे बताया की तरन्नुम कौन थी। मेरे स्वर्गीय पिता के एक जिगरी दोस्त थे दौलत अली ख़ान। मुझे उनकी धुँधली सी याद आती थी और अहसास होता था कि तरन्नुम के साथ मैं बचपन में खेला करता था। तरन्नुम दौलत अली ख़ान की इकलौती लड़की थी। बचपन में वह मुझे राखी बाँधा करती थी। यह वही तरन्नुम थी जिसकी बोलियाँ एक कोठे पर लग रही थी।
तरन्नुम अशर्फी बेगम के कोठे तक कैसे पहुँची, यह एक लम्बी कहानी थी। सारांश यह था कि दौलत अली ख़ान अपनी ढलती उम्र में अशर्फी बेगम के इश्क़ में गिरफ़्तार हो गए थे। उनकी पत्नी का इंतकाल हो गया था। फिर अशर्फी बेगम ने दौलत अली ख़ान को ज़हर देकर मार डाला और तरन्नुम को हथिया लिया। हालाँकि तरन्नुम को अशर्फी बेगम ने अपनी लड़की की तरह पाला था। परंतु यह सब उसने तरन्नुम की जवानी से लाखों रुपया लूटने के लिये किया था। मोहिनी ने इतनी बातें मुझे बताई थी और फिर मेरे जमीर ने अपनी इस धर्म बहन को शैतानों के चंगुल से निकालने के लिये ललकारा। मैंने तरन्नुम को नहीं बताया कि मैं कौन हूँ। उस समय जब मैंने यह फ़ैसला किया तो नवाब बब्बन अली तरन्नुम की नथ उतराई की क़ीमत देकर अपनी हवेली में ले जा चुका था। बस मैंने नवाब को छाप डाला। मेरे लिये यह कोई मुश्किल काम नहीं था। मोहिनी मेरे साथ थी। तरन्नुम को मैंने हवेली से निकाल लिया। इस पर नवाब बब्बन अली मेरा जानी दुश्मन बन बैठा। अशर्फी बेगम भी मेरी दुश्मन बन गयी और उन्होंने तरन्नुम को फिर से पाने के लिये जेहाद छेड़ दिया। मुझ पर कातिलाना हमले हुए। परंतु जिसके पास मोहिनी हो भला उसका कौन क्या बिगाड़ सकता है। और फिर एक दिन तरन्नुम अचानक लखनऊ से ग़ायब हो गयी।
वही तरन्नुम अब मेरे सामने थी। वह ठगी-ठगी सी मुझे देख रही थी।
“आप, कुँवर साहब यहाँ ?”
“यह पहाड़ियाँ मेरे लिये नई नहीं है तरन्नुम। मगर तुम यहाँ क्या कर रही हो ? लखनऊ से अचानक तुम कहाँ ग़ायब हो गयी थी ?”
“फिर भी मुझे कुछ तो करना होगा।”
“मैं तुम्हें एक उपाय बताती हूँ। तुम्हें कुलवन्त याद है ?”
“कुलवन्त!”
कुलवन्त का नाम सुनते ही मुझे एक झटका सा लगा। आख़िर मैं किस तरह उसे भूला बैठा। पूना के क्लबों की शान। अमीरों की महफ़िल की शमां कुलवन्त। जिसने मुझे बेपनाह मोहब्बत की थी। जिसने मेरे लिये घर-बार छोड़ा और फिर वही कुलवन्त...।
आह! कुलवन्त का चेहरा मेरी आँखों के सामने घूमने लगा। कुलवन्त ने संसार की मोह-माया से छुटकारा प्राप्त पर लिया था। वह जोगन बन गयी थी। उसने बाबा प्रेमलाल का स्थान प्राप्त कर लिया था और माला जैसी सुन्दर लड़की को मेरी झोली में डाल दिया था।
“ओह माला! मैं इस पूरे समय में उसे भूल ही गया था।”
“यह इंसान की एक फितरत है। इसमें तुम्हारा कोई दोष नहीं।”
“लेकिन तुम कुलवन्त के बारे में क्या कहना चाहती हो ?”
“कुलवन्त मैसूर की पहाड़ियों में तप कर रही है और उसे बाबा का स्थान प्राप्त है। देवी-देवताओं का आशीर्वाद उसके साथ है। कुलवन्त इन शैतानी शक्तियों से आपको छुटकारा दिला सकती है। आप एक बार उससे मिलिए।”
माला का बताया उपाय मेरे मस्तिष्क में जम कर रह गया और मैंने तय किया कि मैं कुलवन्त की तलाश में एक बार फिर मैसूर की उन्हीं पहाड़ियों तक जाऊँगा।
आठ रोज़ तक मैंने साधु जगदेव का मण्डल से निकलने का इन्तजार किया। परंतु जगदेव मण्डल से न निकला तो आवश्यक तैयारियाँ करके मैं मैसूर के लिये रवाना हो गया। एक बार फिर आँसुओं से माला के साथ मेरी जुदाई के लिये अलविदा कहा। फिर मैं मैसूर की पहाड़ियों के लिये चल पड़ा। मेरे लिये वह रास्ते जाने-पहचाने थे। मैं आठ रोज़ तक उन पहाड़ियों में भटकता, अनगिनत मुसीबतें सहन करता आख़िर बाबा प्रेमलाल के स्थान तक पहुँच ही गया।
झरने के पास मुझे किसी के गुनगुनाने की आवाज़ सुनाई दी। मेरी आशा बँधी और मैं झरने की तरफ़ बढ़ता चला गया। परंतु जब मैं उस लड़की के निकट पहुँचा तो मुझे देखकर हैरत हुई । वह लड़की तरन्नुम थी। अपनी आप बीती सुनाते वक्त मुझे बहुत सी बात छोड़नी पड़ी। क्योंकि मेरी आप बीती संघर्ष और मुसीबतों का एक लम्बा सिलसिला है। जब तरन्नुम को देखा तो बीती बातों का ख़्याल आया। लखनऊ में यह लड़की मुझे मिली थी। मुसीबतों में घिरी, भोली-भाली मासूम लड़की। अशर्फी बेगम याद आयी। जिसके बाला खाने पर तरन्नुम के हुस्न की चकाचौंध थी और लखनऊ के उमरा नवाबेन उसकी नथ उतराई के लिये बोलियाँ लगा रहे थे। मोहिनी ने मुझे बताया की तरन्नुम कौन थी। मेरे स्वर्गीय पिता के एक जिगरी दोस्त थे दौलत अली ख़ान। मुझे उनकी धुँधली सी याद आती थी और अहसास होता था कि तरन्नुम के साथ मैं बचपन में खेला करता था। तरन्नुम दौलत अली ख़ान की इकलौती लड़की थी। बचपन में वह मुझे राखी बाँधा करती थी। यह वही तरन्नुम थी जिसकी बोलियाँ एक कोठे पर लग रही थी।
तरन्नुम अशर्फी बेगम के कोठे तक कैसे पहुँची, यह एक लम्बी कहानी थी। सारांश यह था कि दौलत अली ख़ान अपनी ढलती उम्र में अशर्फी बेगम के इश्क़ में गिरफ़्तार हो गए थे। उनकी पत्नी का इंतकाल हो गया था। फिर अशर्फी बेगम ने दौलत अली ख़ान को ज़हर देकर मार डाला और तरन्नुम को हथिया लिया। हालाँकि तरन्नुम को अशर्फी बेगम ने अपनी लड़की की तरह पाला था। परंतु यह सब उसने तरन्नुम की जवानी से लाखों रुपया लूटने के लिये किया था। मोहिनी ने इतनी बातें मुझे बताई थी और फिर मेरे जमीर ने अपनी इस धर्म बहन को शैतानों के चंगुल से निकालने के लिये ललकारा। मैंने तरन्नुम को नहीं बताया कि मैं कौन हूँ। उस समय जब मैंने यह फ़ैसला किया तो नवाब बब्बन अली तरन्नुम की नथ उतराई की क़ीमत देकर अपनी हवेली में ले जा चुका था। बस मैंने नवाब को छाप डाला। मेरे लिये यह कोई मुश्किल काम नहीं था। मोहिनी मेरे साथ थी। तरन्नुम को मैंने हवेली से निकाल लिया। इस पर नवाब बब्बन अली मेरा जानी दुश्मन बन बैठा। अशर्फी बेगम भी मेरी दुश्मन बन गयी और उन्होंने तरन्नुम को फिर से पाने के लिये जेहाद छेड़ दिया। मुझ पर कातिलाना हमले हुए। परंतु जिसके पास मोहिनी हो भला उसका कौन क्या बिगाड़ सकता है। और फिर एक दिन तरन्नुम अचानक लखनऊ से ग़ायब हो गयी।
वही तरन्नुम अब मेरे सामने थी। वह ठगी-ठगी सी मुझे देख रही थी।
“आप, कुँवर साहब यहाँ ?”
“यह पहाड़ियाँ मेरे लिये नई नहीं है तरन्नुम। मगर तुम यहाँ क्या कर रही हो ? लखनऊ से अचानक तुम कहाँ ग़ायब हो गयी थी ?”