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मैं अशर्फी बेगम के बाला खाने की तरफ बढ़ रहा था। लोगों की भीड़ से गुजरता हुआ मैं अशर्फी बेगम के बाला खाने तक पहुँच गया। ऊपर से किसी के गाने की आवाज आ रही थी। मैंने सीढ़ियों की तरफ कदम बढ़ा दिए। ऊपर पहुँचा तो महफ़िल गर्म थी। अशर्फी बेगम साजिन्दों के करीब बड़े ठसके से बैठी थी और उस नई बिजली को देख रही थी जिसके गले में सोज था। निःसंदेह वह एक खूबसूरत लड़की थी। कमरे में आठ-दस अमीरजादे गावतकियों से लगे बैठे थे और सुन्दरी को वासना भरी नजरों से देख रहे थे। मैं चूंकि दरवाजे की ओट में था इसलिए अशर्फी बेगम और साजिन्दों की नज़रें मुझ पर नहीं पड़ीं। चंद एक तमाशबीनों ने देखा, परन्तु वह सुन्दरी के लबरेज हुस्न की चांदनी में इतने गुम थे कि मुझ पर उचटती नज़र डालकर फिर उधर ही आकर्षित हो गए।
मोहिनी ने मुझे इस नई सुन्दरी के बारे में बताना शुरू किया ।
“राज! अशर्फी बेगम ने अपनी दुकान सजाने के लिये बड़े अनमोल मोती का चयन किया है। यही दिलनशीं है। तीन-चार दिन पहले इस कूचे में जयपुर से आयी है। कश्मीरी है। जयपुर में नृत्य और संगीत की शिक्षा प्राप्त कर रही थी। अशर्फी बेगम ने एक मोटी रकम देकर खरीदा है। यह सौदा फिर भी सस्ता था। अब इसका नीलाम होगा और लखनऊ के अमीरों में खलबली मच जाएगी। लखनऊ के अमीरों में अभी दिलनशीं के चर्चे नहीं पहुँचे हैं। अशर्फी बेगम ने इसके हुस्न के चर्चे आम करने के लिये चन्द दलाल छोड़ रखे है। लेकिन यह काम अब मेरे और तुम्हारे जिम्मे होगा। हम इसकी कीमत बढ़ायेंगे। यहाँ अगले चन्द दिनों में तिल धरने की जगह नहीं होगी। लाखों रुपये अशर्फी बेगम इसकी नथ के वसूल कर सकती है।”
मैंने दिलनशीं को गौर से देखा। उसमें लोगों को दीवाना बनाने की तमाम अदायें मौजूद थी। दिलनशीं तो कोई कयामत थी। मैं दरवाजे की ओट से निकलकर सामने आया। फिर अंदर जाकर बेधड़क एक गावतकिए से टिक गया। अशर्फी बेगम की दृष्टि मुझ पर पड़ी तो उसकी हालत पतली हो गयी। गुस्से से उसका चेहरा लाल हो गया। साजिन्दों ने मुझे देखा तो उनके चेहरों के रंग फीके पड़ गए। मैंने जेबों को खोलना शुरू कर दिया। रुपये न्यौछावर कर दिए। जब मैंने पहला नोट निकाला तो महफिल के अदब के अनुसार दिलनशीं उठकर मेरे पास आ गयी और मेरे सामने बैठकर मिसरा दोहराने लगी। मैंने नोट उसके कदमों पर न्यौछावर कर दिया। फिर दूसरा नोट उठाकर उसकी तरफ बढ़ाया। दिलनशीं ने दिल नवाज मुस्कराहट के साथ मेरा शुक्रिया अदा किया। उसकी यह अदा दिल को बहुत भाई।
नोट थामकर वह जाने के इरादे से उठी तो मैंने दूसरा नोट निकाल लिया। फिर सिलसिला जारी रखा ताकि दिलनशीं मेरे सामने बैठी रहे और किसी के सामने न जा सके। अशर्फी बेगम काँटों पर लोट रही थी। मैं दिलनशीं से फरमाइश करता रहा और रुपये निकालता रहा। महफिल में मौजूद लोगों के चेहरे लटके हुए थे। उन्होंने यह रंग देखा तो बुरा मानकर उठने लगे। मैं एक घंटे में हजारों रुपये लुटा चुका था और अब वहाँ मेरे सिवाय कोई तमाशबीन नहीं रह गया था।
मैं अशर्फी बेगम को कनखियों से देख रहा था। वह उस समय टक-टक दीम दम न कशीदम का मुहावरा बनी हुई थी। लेकिन कब तक ? जब दिलनशीं ने गजल खत्म की और दूसरी गजल शुरू करने से पहले मेरी आँखों में आँख डालकर गुनगुनाना शुरू किया तो अशर्फी बेगम चुप न रह सकी।
जहाँ बैठी थी वहीं से बोली– “बस करो, दिलनशीं! तुम्हारी तबीयत पहले ही नासाज है। अब ख्वाबगाह में जाकर आराम करो। खुर्शीद तुम्हारी कमी पूरी करने की कोशिश करेगी। दिलनशीं ने आश्चर्य से अशर्फी बेगम की ओर देखा। आँखों ही आँखों में इशारे हुए। फिर वह बड़े अदब से अपना हिनाई हाथ माथे तक ले जाकर मुझे ‘तस्लीम’ कहती हुई उठने लगी।
मैंने उसका हाथ थाम लिया।
“अगर आपके मिजाज नासाज हैं तो मैं नगमासराई की जहमत नहीं दूँगा। आपसे गुफ्तगू भी तो सुरों से कम नहीं। आप तो खुद एक गजल हैं।”
“आपकी जर्रानवाजी है। कनीज हुक्म की तामील करेगी।” दिलनशीं तीखे अन्दाज में कह कर फिर मेरे करीब होकर बैठ गयी।
अशर्फी बेगम हाथ मल रही थी। साजिन्दे खामोश बैठे भयभीत नजरों से मुझे घूर रहे थे। उनके लिये मैं नया नहीं था। मेरे खेल तरन्नुम के मामले में उन्होंने देखे थे। मैंने उन सबको नज़रअन्दाज कर दिया और दिलनशीं का हाथ थाम कर बोला-
“आप शायद इस कूचा ए इशरत में नई आयी हैं ?”
“जी हाँ, कनीज का यह तीसरा दिन है!” दिलनशीं ने शरमाते हुए कहा।
“जहे नसीब! हम भी उन खुशनसीबों में शामिल हो गये जिन्होंने आगाज शबाब में आपका दीदार कर लिया।”
दिलनशीं का चेहरा शर्म से गुलनार हो गया।
मैंने कहा- “यकीन कीजिए जो अर्ज किया गया है, वह दिल की आवाज है।”
दिलनशीं ने एक नज़र मुझे फिर देखा, फिर लजाकर बोली- “कदर अफजाई का शुक्रिया।”
अशर्फी बेगम जो अब तक दूर ही बैठी थी तेजी से अपना भारी गरारा संभालती हुई मेरे करीब आ गयी और दिलनशीं से बोली- “दिलनशीं जानेमन! तुम्हें आराम की जरूरत है, ख्वाबगाह तुम्हारी मुंतजर है।”
दिलनशीं ने सहम कर अशर्फी बेगम के चेहरे पर निगाह डाली। फिर कनखियों से मेरी तरफ देखकर माफी माँगी। तस्लीम करती हुई उठी और अन्दर चली गयी। अशर्फी बेगम खड़ी-खड़ी ताव खा रही थी। मैंने मुस्काते हुए कहा- “तशरीफ रखिए, अशर्फी बेगम! आपका पुराना नियाजगद बारगाह हुस्न में हाजिर है। क्या आपने मुझे पहचाना नहीं ?”
“कुँवर साहब।” अशर्फी बेगम शब्द चबाकर बोली। “मैं एक बार पहले भी आपसे अर्ज कर चुकी हूँ कि खुदा के लिये मुझसे कोई वास्ता न रखिए। अजराह करम, आप यहाँ आने से गुरेज किया करें। मेरा कारोबार यही है। आप क्यों हम लोगों को परेशान करने आ जाते हैं ?”
“बहुत खूब!” मैंने अशर्फी बेगम की झल्लाहट का आनंद उठाते हुए कहा। “गोया आपको अब मेरा यहाँ आना भी गँवारा नहीं है। मैं यहाँ आता हूँ तो खाली हाथ नहीं आता। यह दरवाजा तो सबके लिये खुला होता है। वैसे अर्ज करूँ कि मैं पहले भी आपको परेशान करने नहीं आया था। मेरे ख्याल से आपको अपने मेहमानों के साथ ऐसा सलूक नहीं करना चाहिए कि वह गुस्ताखी पर उतर आएँ।”
“देखिये कुँवर साहब! अब बहुत हो चुका। तरन्नुम का अब तक पता नहीं है। कैदखाना, गोलियाँ, क़त्ल हम इन झगड़ों में नहीं। आप जब भी आते है तो कोई न कोई कयामत आती है। खुदा के लिये हमें माफ कीजिए।”
“अर... र... रे! आप तो बहुत खौफजदा हैं। मैं तो हुस्न का पुजारी हूँ। सुना था आपके यहाँ एक नायाब चीज मौजूद है। सौदा करने चला आया।”
“अगर आपका इरादा दिलनशीं की तरफ है तो मैं माजरत चाहूँगी। तरन्नुम के बाद लखनऊ के उमरा के लिये बड़ी मुश्किल से यह लड़की तलाश की है।”
“सच, आप हुस्न की जौहरी हैं! आपके कयामत का मैं दिल से कायल हूँ। सारा शहर आपकी मुठ्ठी में है। बहरहाल मैं दिलनशीं की तारीफ सुनकर चला आया था। इस कली की सुपुर्दगी के लिये आपने क्या नजराना तय किया है ?”
“नजराना आदमी देखकर तय किया जाता है।”
“आप फिर मेरी तौहीन कर रही है।” मैंने व्यंग्य किया।
“नहीं, ऐसी बात नहीं है!” अशर्फी बेगम संभलकर बोली। “कुँवर साहब! आप इसकी नीलामी में बोली लगा सकते हैं। लेकिन मेरा ख्याल है आपको मायूसी होगी। आपसे डर लगता है।” अशर्फी बेगम ने अचानक कहा।
“मैं इतना बदसूरत तो नहीं हूँ।”
“आप कोई जिन्न, देव हैं कुँवर साहब। आपके बारे में बहुत कुछ सुना है। आपने पूरे शहर में हंगामा खड़ा कर दिया। मेहता ने हैरतअंगेज तौर पर खुदकुशी कर ली। तरन्नुम पुर असरार तरीके से गायब हो गयी। यह सब काम आदमी के बस का नहीं है।” अशर्फी बेगम का स्वर भयपूर्ण था।
“मैं एक सीधा-सादा आदमी हूँ लेकिन हुस्न का पुजारी हूँ। आपने शुरू से ही मुझे गलत समझा और तकलीफ उठायी। लेकिन मैं पुरानी बातें याद दिलाने नहीं आया हूँ। अब आप मुझे हुक्म दीजिए, कितना नजराना पेश किया जाए ?”
“कुँवर साहब! मैं फिलहाल इसका सौदा करने के लिये तैयार नहीं हूँ। मुझे इसकी कीमत का अन्दाजा नहीं है।”
मोहिनी ने मुझे इस नई सुन्दरी के बारे में बताना शुरू किया ।
“राज! अशर्फी बेगम ने अपनी दुकान सजाने के लिये बड़े अनमोल मोती का चयन किया है। यही दिलनशीं है। तीन-चार दिन पहले इस कूचे में जयपुर से आयी है। कश्मीरी है। जयपुर में नृत्य और संगीत की शिक्षा प्राप्त कर रही थी। अशर्फी बेगम ने एक मोटी रकम देकर खरीदा है। यह सौदा फिर भी सस्ता था। अब इसका नीलाम होगा और लखनऊ के अमीरों में खलबली मच जाएगी। लखनऊ के अमीरों में अभी दिलनशीं के चर्चे नहीं पहुँचे हैं। अशर्फी बेगम ने इसके हुस्न के चर्चे आम करने के लिये चन्द दलाल छोड़ रखे है। लेकिन यह काम अब मेरे और तुम्हारे जिम्मे होगा। हम इसकी कीमत बढ़ायेंगे। यहाँ अगले चन्द दिनों में तिल धरने की जगह नहीं होगी। लाखों रुपये अशर्फी बेगम इसकी नथ के वसूल कर सकती है।”
मैंने दिलनशीं को गौर से देखा। उसमें लोगों को दीवाना बनाने की तमाम अदायें मौजूद थी। दिलनशीं तो कोई कयामत थी। मैं दरवाजे की ओट से निकलकर सामने आया। फिर अंदर जाकर बेधड़क एक गावतकिए से टिक गया। अशर्फी बेगम की दृष्टि मुझ पर पड़ी तो उसकी हालत पतली हो गयी। गुस्से से उसका चेहरा लाल हो गया। साजिन्दों ने मुझे देखा तो उनके चेहरों के रंग फीके पड़ गए। मैंने जेबों को खोलना शुरू कर दिया। रुपये न्यौछावर कर दिए। जब मैंने पहला नोट निकाला तो महफिल के अदब के अनुसार दिलनशीं उठकर मेरे पास आ गयी और मेरे सामने बैठकर मिसरा दोहराने लगी। मैंने नोट उसके कदमों पर न्यौछावर कर दिया। फिर दूसरा नोट उठाकर उसकी तरफ बढ़ाया। दिलनशीं ने दिल नवाज मुस्कराहट के साथ मेरा शुक्रिया अदा किया। उसकी यह अदा दिल को बहुत भाई।
नोट थामकर वह जाने के इरादे से उठी तो मैंने दूसरा नोट निकाल लिया। फिर सिलसिला जारी रखा ताकि दिलनशीं मेरे सामने बैठी रहे और किसी के सामने न जा सके। अशर्फी बेगम काँटों पर लोट रही थी। मैं दिलनशीं से फरमाइश करता रहा और रुपये निकालता रहा। महफिल में मौजूद लोगों के चेहरे लटके हुए थे। उन्होंने यह रंग देखा तो बुरा मानकर उठने लगे। मैं एक घंटे में हजारों रुपये लुटा चुका था और अब वहाँ मेरे सिवाय कोई तमाशबीन नहीं रह गया था।
मैं अशर्फी बेगम को कनखियों से देख रहा था। वह उस समय टक-टक दीम दम न कशीदम का मुहावरा बनी हुई थी। लेकिन कब तक ? जब दिलनशीं ने गजल खत्म की और दूसरी गजल शुरू करने से पहले मेरी आँखों में आँख डालकर गुनगुनाना शुरू किया तो अशर्फी बेगम चुप न रह सकी।
जहाँ बैठी थी वहीं से बोली– “बस करो, दिलनशीं! तुम्हारी तबीयत पहले ही नासाज है। अब ख्वाबगाह में जाकर आराम करो। खुर्शीद तुम्हारी कमी पूरी करने की कोशिश करेगी। दिलनशीं ने आश्चर्य से अशर्फी बेगम की ओर देखा। आँखों ही आँखों में इशारे हुए। फिर वह बड़े अदब से अपना हिनाई हाथ माथे तक ले जाकर मुझे ‘तस्लीम’ कहती हुई उठने लगी।
मैंने उसका हाथ थाम लिया।
“अगर आपके मिजाज नासाज हैं तो मैं नगमासराई की जहमत नहीं दूँगा। आपसे गुफ्तगू भी तो सुरों से कम नहीं। आप तो खुद एक गजल हैं।”
“आपकी जर्रानवाजी है। कनीज हुक्म की तामील करेगी।” दिलनशीं तीखे अन्दाज में कह कर फिर मेरे करीब होकर बैठ गयी।
अशर्फी बेगम हाथ मल रही थी। साजिन्दे खामोश बैठे भयभीत नजरों से मुझे घूर रहे थे। उनके लिये मैं नया नहीं था। मेरे खेल तरन्नुम के मामले में उन्होंने देखे थे। मैंने उन सबको नज़रअन्दाज कर दिया और दिलनशीं का हाथ थाम कर बोला-
“आप शायद इस कूचा ए इशरत में नई आयी हैं ?”
“जी हाँ, कनीज का यह तीसरा दिन है!” दिलनशीं ने शरमाते हुए कहा।
“जहे नसीब! हम भी उन खुशनसीबों में शामिल हो गये जिन्होंने आगाज शबाब में आपका दीदार कर लिया।”
दिलनशीं का चेहरा शर्म से गुलनार हो गया।
मैंने कहा- “यकीन कीजिए जो अर्ज किया गया है, वह दिल की आवाज है।”
दिलनशीं ने एक नज़र मुझे फिर देखा, फिर लजाकर बोली- “कदर अफजाई का शुक्रिया।”
अशर्फी बेगम जो अब तक दूर ही बैठी थी तेजी से अपना भारी गरारा संभालती हुई मेरे करीब आ गयी और दिलनशीं से बोली- “दिलनशीं जानेमन! तुम्हें आराम की जरूरत है, ख्वाबगाह तुम्हारी मुंतजर है।”
दिलनशीं ने सहम कर अशर्फी बेगम के चेहरे पर निगाह डाली। फिर कनखियों से मेरी तरफ देखकर माफी माँगी। तस्लीम करती हुई उठी और अन्दर चली गयी। अशर्फी बेगम खड़ी-खड़ी ताव खा रही थी। मैंने मुस्काते हुए कहा- “तशरीफ रखिए, अशर्फी बेगम! आपका पुराना नियाजगद बारगाह हुस्न में हाजिर है। क्या आपने मुझे पहचाना नहीं ?”
“कुँवर साहब।” अशर्फी बेगम शब्द चबाकर बोली। “मैं एक बार पहले भी आपसे अर्ज कर चुकी हूँ कि खुदा के लिये मुझसे कोई वास्ता न रखिए। अजराह करम, आप यहाँ आने से गुरेज किया करें। मेरा कारोबार यही है। आप क्यों हम लोगों को परेशान करने आ जाते हैं ?”
“बहुत खूब!” मैंने अशर्फी बेगम की झल्लाहट का आनंद उठाते हुए कहा। “गोया आपको अब मेरा यहाँ आना भी गँवारा नहीं है। मैं यहाँ आता हूँ तो खाली हाथ नहीं आता। यह दरवाजा तो सबके लिये खुला होता है। वैसे अर्ज करूँ कि मैं पहले भी आपको परेशान करने नहीं आया था। मेरे ख्याल से आपको अपने मेहमानों के साथ ऐसा सलूक नहीं करना चाहिए कि वह गुस्ताखी पर उतर आएँ।”
“देखिये कुँवर साहब! अब बहुत हो चुका। तरन्नुम का अब तक पता नहीं है। कैदखाना, गोलियाँ, क़त्ल हम इन झगड़ों में नहीं। आप जब भी आते है तो कोई न कोई कयामत आती है। खुदा के लिये हमें माफ कीजिए।”
“अर... र... रे! आप तो बहुत खौफजदा हैं। मैं तो हुस्न का पुजारी हूँ। सुना था आपके यहाँ एक नायाब चीज मौजूद है। सौदा करने चला आया।”
“अगर आपका इरादा दिलनशीं की तरफ है तो मैं माजरत चाहूँगी। तरन्नुम के बाद लखनऊ के उमरा के लिये बड़ी मुश्किल से यह लड़की तलाश की है।”
“सच, आप हुस्न की जौहरी हैं! आपके कयामत का मैं दिल से कायल हूँ। सारा शहर आपकी मुठ्ठी में है। बहरहाल मैं दिलनशीं की तारीफ सुनकर चला आया था। इस कली की सुपुर्दगी के लिये आपने क्या नजराना तय किया है ?”
“नजराना आदमी देखकर तय किया जाता है।”
“आप फिर मेरी तौहीन कर रही है।” मैंने व्यंग्य किया।
“नहीं, ऐसी बात नहीं है!” अशर्फी बेगम संभलकर बोली। “कुँवर साहब! आप इसकी नीलामी में बोली लगा सकते हैं। लेकिन मेरा ख्याल है आपको मायूसी होगी। आपसे डर लगता है।” अशर्फी बेगम ने अचानक कहा।
“मैं इतना बदसूरत तो नहीं हूँ।”
“आप कोई जिन्न, देव हैं कुँवर साहब। आपके बारे में बहुत कुछ सुना है। आपने पूरे शहर में हंगामा खड़ा कर दिया। मेहता ने हैरतअंगेज तौर पर खुदकुशी कर ली। तरन्नुम पुर असरार तरीके से गायब हो गयी। यह सब काम आदमी के बस का नहीं है।” अशर्फी बेगम का स्वर भयपूर्ण था।
“मैं एक सीधा-सादा आदमी हूँ लेकिन हुस्न का पुजारी हूँ। आपने शुरू से ही मुझे गलत समझा और तकलीफ उठायी। लेकिन मैं पुरानी बातें याद दिलाने नहीं आया हूँ। अब आप मुझे हुक्म दीजिए, कितना नजराना पेश किया जाए ?”
“कुँवर साहब! मैं फिलहाल इसका सौदा करने के लिये तैयार नहीं हूँ। मुझे इसकी कीमत का अन्दाजा नहीं है।”