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Fantasy मोहिनी

“तुम बब्बन अली के सिर पर क्यों नहीं गयी ?”

“उससे कोई लाभ नहीं था। मुझे यहाँ आना था। मैं कब तक सिर पर रहती ?”

“लेकिन वह मेरे संबंध में पुलिस को हैरतअंगेज बातें बता रहा होगा।”

“मगर अब तुम वहाँ क्यों जाओगे ? लखनऊ तुमसे छूट गया।”

“और चचा भी छूट गए ? घर भी छूट गया ? वह क्या सोचते होंगे ?”

“तुम उन्हें कहीं भी बुला सकते हो। तुम्हारे पास कमी किस बात की है। यह बताओ कि तुम यहाँ कैसी ज़िंदगी व्यतीत कर रहे हो ?”

“बस वक्त काट रहा हूँ। वक्त काटते नहीं कटता था। तुम बहुत याद आती थी। तुमसे बात करने की आदत जो पड़ गयी थी।”

“मोहिनी के आने से मन बहुत बहल गया था। शाम तक उससे बातें करता रहा फिर जब कुलवंत की कुटिया में दाख़िल हुआ तो मोहिनी मेरे सिर से उतर गयी और भोजन के प्रबंध में रात भर के लिए चली गयी।

दूसरी सुबह मैंने इरादा कर लिया कि मैं कुलवंत की हिदायत पर लंदन रवाना हो जाऊँगा।

मोहिनी पौ फटते ही वापस आ गयी थी और सुर्ख नज़र आ रही थी। निश्चय ही उसने रात भर छक कर इंसानी खून पिया था। यही मोहिनी का भोजन था।

तरन्नुम ने बहुत ज़िद की कि वह मेरे साथ चलेगी लेकिन कुलवंत ने उसे रोक दिया।

तीसरे दिन मैं तरन्नुम को रोता हुआ और कुलवंत को सोगबार छोड़कर मैं बम्बई के लिए रवाना हो गया।

मैंने रात को सफ़र करना उचित समझा। मोहिनी मेरे सिर पर थी इसलिए मुझे कोई विशेष चिंता नहीं थी। मेरे पास कोई सामान नहीं था।

एक अर्से बाद मैं बम्बई आया था। यहाँ आकर मैं एक फाइव स्टार होटल में ठहरा।

मोहिनी की उपस्थिति में रुपये की कोई चिंता नहीं थी। बम्बई पहुँचकर चंद घंटों में ख़ासी रक़म प्राप्त हो गयी। पासपोर्ट और वीजा जरा कठिन था। किंतु मोहिनी ने यह काम भी आसान कर दिया। उसने होटल में ही एक पासपोर्ट एजेंट को मेरे पास भेज दिया।

मैं बम्बई में केवल रात के समय होटल से निकलता था। वह भी होटल की गाड़ी में।

होटल में मेरा नाम अमित दर्ज था। पासपोर्ट एजेंट ने भारी रक़म लेकर केवल दो दिन में मेरा काम कर दिया। मुझे भला रुपये की क्या चिंता थी। अब मोहिनी मेरे पास थी तो दौलत भी थी।

मुझे ख़्याल था कि बम्बई की पुलिस भी निश्चित ही मेरे संबंध में सतर्क होगी इसलिए मैंने हर संभव सावधानी बरती। मैंने दाढ़ी बढ़ा ली और अपने फोटो के लिए खासा हुलिया बदला।

बम्बई से मेरी हंगामाखेज ज़िंदगी का पुराना संबंध जुड़ा था। बाज़ पुलिस ऑफ़िसरों के लिए मेरा चेहरा और नाम क्या नहीं था। वहाँ एक जमाने में मेरा कारोबार, मेरा घर और बहुत कुछ मौजूद था।

मैं उन सड़कों से दूर रहा जहाँ किसी से मिलने की संभावना थी। मुझे हर ज़रूरत की चीज़ होटल में ही मिल जाती।

तीसरे दिन मैं रात की फ्लाइट से होटल रवाना हो गया। मैंने वह देश छोड़ दिया। वहाँ के लोगों ने मेरे साथ और वहाँ के लोगों के साथ मैंने बहुत कुछ अच्छा व्यवहार नहीं किया था।

जहाज़ में बैठकर मुझे कुछ चैन मिली। हिन्दुस्तानी यात्रियों की संख्या बहुत कम थी। जब मैंने अपनी सीट संभाली तो मोहिनी मेरे सिर पर मौजूद थी और बहुत अच्छे मूड में थी।

यह मेरा पहला हवाई सफ़र था। थोड़ी देर बाद जहाज़ अंधेरे में गुम हो गया और मेरी यादें मुझसे दूर होती गयीं। जब वक्त गुज़र जाता है और वातावरण बदल जाता है तो यादें भी दूर होने लगती हैं।

मोहिनी खामोशी से पायलट के सिर पर बैठ गयी। वह इधर-उधर फुदकती रही। कभी एयर होस्टेज के सिर पर तो कभी किसी यात्री के सिर पर बैठ जाती।

रात ख़ासी गुज़र गयी थी लेकिन सफ़र की यह रात लम्बी थी इसलिए कि लंदन और हिन्दुस्तान के समय में साढ़े पाँच घंटे का अंतर था।

जहाज़ बढ़ता रहा और रात लम्बी होती गयी।

जहाज के लगभग सभी यात्री ऊंघ रहे थे। अलबत्ता कुछ लोग बातों में मग्न थे। वहाँ केवल दो हसीनाएँ थीं। मैंने बाथरूम के बहाने जाकर-जाकर उन्हें अच्छी तरह देखा था। उनसे बात करने को जी चाहता था। उनके निकट एक नौजवान बैठा था। इस जहाज़ में तीन-तीन सीटें एक साथ थीं।

नौजवान को उठाने के लिए मुझे मोहिनी की सहायता लेनी पड़ी। वह उसके सिर पर गयी और नौजवान अपनी सीट से उठकर मेरे पास आया और मुझसे मेरे सीट पर बैठने की अनुमति माँगी। मैंने ख़ुशी से अनुमति दे दी और स्वयं आकर उसकी सीट पर बैठ आ गया।

थोड़ी देर बाद मोहिनी उसे बेतहाशा शराब के नशे में धुत्त छोड़कर मेरे पास आ गयी। इस अरसे से में मैंने अपने निकट बैठी हसीन लड़की से संबंध बना लिया था।

उसका नाम सारा था।

चुस्ट स्कर्ट में कसा हुआ उसका बदन अपने तमाम उभारों के साथ चमक रहा था। किंतु वह कुछ गंभीर प्रकृति की लड़की थी। अतः बात आगे बढ़ाने के लिए ख़ासी मुश्किल पेश आई।

बाद में मोहिनी ने मुझे बताया कि वह किसी अंग्रेज़ लार्ड की घमंडी बेटी है जो हिन्दुस्तान और पूर्वी देशों की सैर करके वापस अपने वतन जा रही है।

उसे प्रभावित करने के लिए मैंने मोहिनी से पूछकर उसके बाप का नाम बताया तो वह आश्चर्य में पड़ गयी।

मैंने अपना प्रभाव जमाने के लिए कहा- “मैं एक बहुत अच्छा पामिस्ट हूँ और दिल की बात बता देता हूँ। लंदन में सुना है बहुत माने हुए प्रोफ़ेसर हैं। उनसे मुलाक़ात करने और कुछ सीखने जा रहा हूँ।

यह चर्चा कुछ ऐसी होती है कि किसी भी व्यक्ति को प्रभावित कर सकती है।
 
उसने तुरंत अपना हाथ मेरे सामने कर दिया और मैंने सीट के ऊपर लगा बटन दबाकर पूरे ध्यान से रोशनी में उसके हाथ की रेखाएँ देखनी शुरू कर दी।

उसका नर्म मुलायम सफ़ेद सुर्ख हाथ मेरे हाथ में आया तो खून की गर्दिश बढ़ गयी। इस अर्शे में मोहिनी अपना काम करती रही और मुझे उस लड़की के अतीत, उसकी दिलचस्पियों उसके प्रोग्राम और उसके मित्रों के संबंध में बताती रही।

मैंने एक सर्द आह भरी- “आह! मिस सारा। मुझे खेद है कि आपको यात्रा अधूरी छोड़कर अपने वतन वापस जाना पड़ रहा है। आपकी प्यारी माँ का स्वर्गवास हो गया है।”

“हाँ, यह सही है!” वह आश्चर्य से बोली। “आप तो बहुत पहुँचे हुए मालूम होते हैं।”

मैंने उसकी बात पर कोई टिप्पणी नहीं की बल्कि गंभीरता धारण कर ली।

“और बताइए!” उसने बेचैनी से कहा।

मेरे लिए बताना क्या मुश्किल था। मेरे पास एक फितना मौजूद था जिसके पास सारी दुनिया की खबरें थीं।

मैंने उसे सारी जानकारियाँ सही-सही दे दी। वह हक्की-बक्की मेरा मुँह देखने लगी।

“आप महान हैं। मैंने हिन्दुस्तानी ज्योतिषियों से भी इतनी सही जानकारी नहीं प्राप्त की। आपने मेरे बारे में जो बातें बतायी हैं वह शत-प्रतिशत सही है।”

मैंने हल्की सी मुस्कराहट के साथ उठने की इजाज़त चाही उसने मुझे रोक लिया और पूछने लगी- “लंदन में आप कहाँ ठहरेंगे ?”

“मुझे मालूम नहीं! कोई अच्छा सा होटल देख लूँगा।”

“आप हमारे घर ठहरिए! हम लंदन से चौदह-पंद्रह मील दूर रहते हैं। वह आधा शहरी और आधा देहाती क्षेत्र है।” उसने दावत दी।

“मुझे खेद है। मैं होटल में ठहरना अधिक पसंद करता हूँ। आपकी इनायत का बहुत-बहुत शुक्रिया।”

“क्या मैं आपके पास आ सकती हूँ ? यदि आपका समय नष्ट न हो ?”

“शौक से। लंदन में मुझे किसी साथी की आवश्यकता पड़ेगी। आप आ जाएँगी तो वह अजनबी शहर मैं अच्छी तरह देख लूँगा।”

“मेरी ख़ुशक़िस्मती होगी।” फिर उसने एक कार्ड दिया। “यह मेरा फ़ोन नम्बर है। आप होटल में ठहरने के बाद मुझे फ़ोन कर लीजिएगा।”

यात्रा की शुरुआत दिलचस्प हुई। मैं अपनी सीट पर आ गया और दूसरे यात्री की तरह ऊंघने लगा। फिर मुझे नींद आ गयी और मैं सुबह सवा नौ बजे लंदन एयरपोर्ट पर उतर गया।

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लंदन!

यूरोप का शाही शहर!

इंसानों का जंगल! वहाँ कोहरा छाया हुआ था। यह दुनिया अजीब थी। हवाई अड्डे पर उतरते ही अंदाज़ा होता था कि मैं किसी दुनिया में आ गया हूँ। चहल-पहल, भागते हुए लोग, जागते हुई गाड़ियाँ, रेल-पेल।

मोहिनी भी दिलचस्प नजरों से लंदन का नजारा देख रही थी।

“यह इंग्लैंड है मोहिनी। अंग्रेज़ों का देश। हमारे पुरानों आकाओं का...।”

“मेरे आका तो तुम हो।”

“क्या कुछ अच्छा लग रहा है ? सुर्ख-सुर्ख चेहरे देखकर तो तुम्हारे मुँह में पानी आ गया होगा।” मैंने उसे छेड़ा।

“और तुम इन गोरी-गोरी हसीनाओं को कैसे वासना भरी नज़रों से देख रहे हो। यहाँ तुम्हारी दिल्लगी के लिए भी पूरा सामान मौजूद है।”

हमने एयरपोर्ट से एक टैक्सी पकड़ ली और लंदन के एक शानदार होटल में जा ठहरे।

इस होटल का किराया बहुत अधिक था। मेरे पास गिनती के चंद पाउंड थे जो मैंने पेशगी के तौर पर जमा करा दिए। यह होटल पुराने ढंग के एक इमारत में था। नृत्य-घर, नाइट क्लब और स्वीमिंग पूल।

स्नान करने के बाद मैंने मोहिनी को अपने सिर से जुदा कर दिया कि वह मेरे लिए रक़म का प्रबंध करे। मोहिनी के संकेत से मुझे नीचे जाने की जहमत उठानी पड़ी।

मेरी आपबीती सुनने वाले निश्चय ही बड़ी आसानी से अनुमान लगा चुके होंगे कि मुझे क्या करना पड़ा होगा और मोहिनी कहाँ गयी होगी। बहरहाल मैं जानता था कि कैशियर मुझसे रक़म माँगने नहीं आएगा।

उस दिन तो मैं शाम तक बिस्तर पर आराम करता रहा। शाम को मैंने सारा को फ़ोन किया और उसे अपने होटल का नाम और कमरे का नम्बर बता दिया।

लंदन के बड़े-बड़े समाचार पत्र मेरे कमरे में मौजूद थे और मैं दिन भर उस शहर और मुल्क की रोज़ मर्रा ज़िंदगी का अध्ययन करता रहा।

शाम को मैं होटल से निकल पड़ा और यूँ ही निरुद्देश्य घूमता-घामता एक जुए खाने में प्रविष्ट हो गया।

मोहिनी की उपस्थिति में यह रक़म बढ़ाने का सबसे बेहतरीन तरीक़ा था।

वहाँ रात जाग रही थी। खूबसूरत लड़कियाँ साकी बनी हुई थी। सबसे पहले मैंने जुए के उस नए तरीक़े का मुआयना किया। वहाँ सिर्फ़ मैं काला था। उन लोगों ने मुझे खुले दिल से पेशकश की। मैंने झिझकते-झिझकते बाज़ी लगाई।

निश्चय ही मुझे हारना था फिर दूसरी बाज़ी में भी ऐसा ही हुआ, तीसरी बाज़ी भी...।

लेकिन चौथी बार बाज़ी पलट गयी। मैंने जीतना शुरू किया। उठते-उठते मेरी ज़ेब में पाँच पौंड आ गए थें।

मैं अधिक जीतना भी नहीं चाहता था। वरना मेरे लिए समस्याएँ खड़ी हो जातीं। मोहिनी ने मुझे रोक लिया।

रक़म को ज़ेब में ठूँस कर मैं उस हंगामे और शोर की जगह से बाहर निकल आया।

बाहर तेज सर्दी थी और दूर-दूर तक टैक्सी दिखायी न देती थी। मैं रास्तों से अनजान था लेकिन मोहिनी की सहायता होटल से के रास्ते की तरफ़ जा रहा था।

फिर मुझे यूँ महसूस हुआ जैसे कोई मेरा पीछा कर रहा हो। वह एक छोटी सी स्याह रंग की कार थी। मेरे निकट आकर रुक गयी।

मैं समझा कि शायद वह मुझे लिफ़्ट दे रहे हैं।

अंग्रेज़ों की सभ्यता की बड़ी प्रशंसा सुनी थी। कार में से दो जवान बड़ी शालीनता से उतरें। उन्होंने गुड इवनिंग कहा और जब निकट आए तो उनमें से एक के हाथ में पिस्तौल था। दूसरे ने तेजी से मेरा इकलौता हाथ पकड़ लिया।

उन्होंने बड़ी शांतिपूर्वक रक़म माँगी तो मैंने उसी शांति से इनकार कर दिया। इस सड़क पर गोली चलाने की संभावना नहीं थी।

मेरे इनकार करने पर उन्होंने ज़बरदस्ती कार में बिठाने की धमकी दी। लाचार मैंने मोहिनी की तरफ़ देखा। जो बड़े गौर से तमाशा देख रही थी। वह कसमसाकर उठी और उसने मुझे साथ चलने को कह दिया।

मैं उनके साथ गाड़ी में बैठ गया। स्पष्ट है मोहिनी मेरे साथ नहीं थी। दूसरा जवान मेरे निकट बैठा था और मेरा हाथ थामे हुए था। मैंने उससे साधारण ढंग से बातचीत शुरू कर दी। लंदन के बारे में, अंग्रेज़ों की सभ्यता के बारे में। वह मुझे शटअप-शटअप करता रहा।
 
जब उसने गाड़ी अपने अनुमान के विरुद्ध दूसरे रास्ते पर चलती देखी तो गजबनाक आवाज़ में अपने साथी को पुकारा लेकिन उसके साथी ने कोई उत्तर नहीं दिया।

यूं भी मुझे कनवेंस की ज़रूरत थी। मेरे होटल के सामने गाड़ी रुक गयी। ड्राइविंग करने वाले नौजवान ने बड़े आदर के साथ दरवाज़ा खोला और मुझे बाहर निकलने का संकेत किया। इस घटना ने मेरे पड़ोसी को सतर्क कर दिया। वह पूरी तरह चौंका हुआ था।

यह बात उसकी समझ से बाहर थी कि उसका साथी वीरान सड़कों की बजाय इस होटल तक कैसे आ गया।

उसने मेरे साथ नाराज़गी प्रकट करनी चाही लेकिन मैं अकेला ही उसके लिए काफ़ी था।

मैंने अपना हाथ छुड़ाकर उसकी गर्दन की गिर्द ज़ोर से लपेटा। उसकी चीख निकल गयी। यह हाथ पहले भी न जाने कितनों की गर्दन तोड़ चुका था। अब भी इसमें यही ताक़त थी।

उस छोकरे को मैं रास्ते से हटाकर बाहर आ गया। फिर मैंने उन्हें यहाँ तक छोड़ने के लिए धन्यवाद कहे और दूसरे नौजवान ने गाड़ी स्टार्ट कर दी। मोहिनी उन्हें दूर तक छोड़ने गयी और जब मैं वापस कमरे में पहुँचा तो मोहिनी भी क्षणों में अपने बिस्तर पर आ गयी। यानी कि मेरे बालों के बिछौने पर।

दूसरे दिन आशानुरूप सारा मुझसे मिलने होटल पहुँच गयी।

उसका कद लम्बा था। गाल चमकते हुए, होंठ गुलाबी। वह एक क़ीमती लिबास में सजी-धजी थी।

फिर तैयार होकर मैं सारा के साथ होटल से बाहर निकला।

उसकी स्याह लम्बी गाड़ी मुझे लंदन की सैर कराती रही। दोपहर को हमने एक चीनी रेस्टोरेंट में खाना खाया और शाम को मैं उसके शानदार कोठी पर था।

उसका बाप राल्फ स्मिथ एक बहुत बड़ा आदमी था। शिक्षित और सभ्य। उसने मेरा स्वागत एक अतिथि की तरह किया।

पामिस्ट्री के बारे में मुझे कुछ भी आता-जाता नहीं था लेकिन इस विषय पर बातचीत करते समय मैं प्रैक्टिकल लकीरों की बातें ऊल-जलूल बताता रहा। लार्ड इस विषय में भी खासी जानकारी रखता था। उसने हिन्दुस्तान के न जाने कितने ज्योतिषियों, पंडितों के नाम सुना दिए।

फिर उसने अपनी हाथ दिखाने की इच्छा प्रकट की।

मैंने एकांत चाहा। सारा वहाँ से चली गयी।

फिर मैंने शुरू से अंत तक लार्ड के अतीत की घटनाएँ बतानी शुरू की। उनकी आँखें फटने लगी और वह गंभीर बुजुर्ग आदमी एक घंटे के अंदर मेरे सामने बच्चा बन गया।

थोड़ी देर बाद सारा को आवाज़ दी गयी तो मेरी तारीफ़ में जमीन-आसमान के पुल बाँध दिए।

उसने निवेदन किया कि मैं उसके साथ, उसके महल में निवास करूँ लेकिन मैंने इनकार कर दिया।

नौकरों की एक फ़ौज़ ने रात का खाना लगाया। तमाम वक्त लार्ड बोलता रहा। रात को सारा मुझे होटल छोड़ने आई। मैंने कमरे तक पहुँचते-पहुँचते उसका नाज़ुक हाथ अपने हाथ में ले लिया। मैं उसे रात भर रोकना चाहता था। सिर्फ़ एक पेग हलक में उड़ेलने के बाद उसने जाने की अनुमति चाही। चलते वक्त उसने कल आने का वादा किया। उसकी नज़रों में मेरे प्रति सम्मान था।

मेरी वह रात एकांत में गुजरी।

लार्ड स्मिथ के साथ इतनी माथापच्ची निरुद्देश्य नहीं थी। उस अजनबी मुल्क में मुझे असरदार लोगों में अपना सिक्का जमाकर अपने इलाज का उचित प्रबंध करना था और वक्त पूरी तफरीह से गुजारना था।

सारा दूसरे दिन भी मुझे लंदन घुमाती रही।

उसने मुझे कई डॉक्टरों को दिखाया। फिर राल्फ स्मिथ के सुझाव पर यह तय हुआ कि उनका फैमली डॉक्टर ब्राउन मेरे हाथ का निरीक्षण करेगा।

एक अरसा गुज़र गया था लिहाजा यह असंभव था कि मेरा हाथ बदल दिया जाता। अब केवल यही सूरत थी कि मेरा टूटा हुआ हाथ इस तरह बनाया जाए कि नक़ल असल लगे।

मैं उस हाथ को उठा सकता था लेकिन उसकी उँगली में कोई चीज़ पकड़ने की शक्ति न होती। यह महत्वपूर्ण काम कराने से पहले मैं खानदान को और भरोसे में लेना चाहता था।
 
मैंने सारा से गैररस्मी बातें शुरू कर दी। उसके साथ सिनेमा, क्लब, थिएटर वगैरा जाने की इच्छा प्रकट किया। सारा बहुत मज़बूत इरादे की लड़की थी। मोहिनी के जरिए मैं उसका खूबसूरत जवान जिस्म किसी भी समय प्राप्त कर सकता था। लेकिन इस बढ़ते समय और धीरे-धीरे क़रीब आने में जो आनंद प्राप्त हो रहा था वह खत्म हो जाता।

यह अवश्य था कि मोहिनी के जरिए मैं सारा को कुछ हैरतअंगेज करिश्मे दिखाने पड़े। कुलवंत भी पूना क्लब में मुझसे इसी तरह प्रभावित हुई थी।

एक थिएटर में जब हम साथ बैठे हुए थे तो मैंने कहा- “लो तुम्हें एक करिश्मा दिखाते हैं, यह अभिनेत्री स्टेज पर अभिनय करते हुए तुम्हारे पास आ जाएगी।”

“यह किस तरह हो सकता है ? असंभव।”

“और अगर संभव हो तो ?”

“शर्त रख लीजिए।”

“जो माँगूँगा, तुम दोगी ? निश्चय ही मैं ऐसी चीज़ माँगूँगा जो तुम्हारे लिए कठिन न होगी। “

“अगर यह बात है तो मुझे मंज़ूर है।”

“तो फिर कान इधर लाइए।” मैंने उसके कान में एक ऐसी इच्छा प्रकट की जिससे उसका चेहरा सुर्ख हो गया। मेरी इच्छा बहुत साधारण थी किंतु यह उसे निकट लाने और बेतकल्लुफ करने की शुरुआत रखती थी। उसने शर्माकर अपने लबों को छूने की अनुमति दे दी।

फिर वह उस समय बुहत भयभीत हो गयी जब सारे दर्शकों के सामने अभिनेत्री अभिनय करते हुए स्टेज से उतरकर सारा के पास आ गयी और उसने सारा से हाथ मिलाया। कुशलता पूछी। सारा की जुबान गूँगी होकर रह गयी।

यह एक विचित्र घटना थी। सब लोग स्तब्ध रह गए। सारा मेरी सूरत देख रही थी और मैं लापरवाही से अपनी सीट पर बैठा मुस्कुरा रहा था।

उसने अटक-अटक कर कहा- “क्या यह सपना था ?”

“नहीं! तुम मेरे साथ बैठी हो और मैं खुद पर नाज कर रहा हूँ।”

“तुम कोई जादूगर हो। माय गॉड! यह सब कुछ बहुत हैरतअंगेज है।”

“यह तो कुछ भी नहीं। कुछ और शर्त रखोगी ? क्या ख़्याल है ?”

“तुमसे डर लगता है।” उसने कानों पर हाथ रखकर पूर्वी अंदाज़ में कहा।

“नहीं, यह तो मज़ाक था! तुम कोई इच्छा प्रकट करो। उसे पूरा करने में मुझे ख़ुशी होगी।”

उस रात का ज़िक्र कर दिया जाए जब उस शर्त के अनुरूप मेरे क़रीब आना था। वह शर्त पूरी करने के लिए तैयार थी। रुखसत होते समय मैंने उसे क्षमा कर दिया। मेरे इस फराख दिली का उस पर अच्छा प्रभाव पड़ा।

और फिर हुआ यह कि मैं और सारा लंदन में एक साथ देखे जाने लगे।

वह मुझसे हाथ के इलाज के लिए निवेदन करती रही और मैं उसे टालता रहा कि चलते वक्त करा लूँगा।

यूँ तो मैं होटल में ही ठहरा था परंतु दूसरे रूप में मैं लार्ड स्मिथ का मेहमान था। उसकी चरागाहों में मेरी कार दौड़ती रहती थी। मैं उसके साथ शिकार खेलता और इस तरह मैं सारा के और निकट आता रहा।

लंदन के नाइट क्लब जहाँ औरतें लिबास की ज़रूरत महसूस नहीं करती। उन धीमी रोशनियों में उनके बदन हमेशा चमकते रहते हैं। औरत वहाँ आम थीं। हर एक का तेवर अलग ही था।

यह लोग शायद बहुत थक गए थे और शांति की तलाश में न जाने कहाँ से कहाँ तक चले गए थे। सारे इंग्लैंड में दुनिया की दौलत जमा होकर आती थी।

सारा जैसी लड़की मेरे साथ थी। बहुत से लोगों को यही बात अखरने लगती थी।

लंदन में पुराने ढंग की मैली-कुचैली इमारतें, कुहरा-धुंध, चंद यादगार चीज़ें, ब्रिटिश म्यूजियम, हाईडिंग पार्क, डाईनिंग स्ट्रीट, बाकिंघम पैलेस, पिकैडली नाइट क्लब- इनके अलावा क्या था। मगर तबियत वहाँ बहुत लगी। इसकी वजह यह थी कि मैंने पिछले चंद बरसों में बड़ी दर्दनाक ज़िंदगी गुजारी थी। यहाँ न कोई हरि आनन्द था, न कोई पुराना सिलसिला।

मैं एक नया आदमी था। एक आज़ाद आदमी। जहाँ चाहता घूमता। दौलत जब चाहता प्राप्त कर लेता, लूटा देता।

मैंने सब कुछ भूला देना चाहा। मोहिनी भी मग्न थी। वह मेरे सिर पर बैठी नई-नई चीज़ें, नए-नए चेहरे देखते रहती।

लार्ड स्मिथ के निकट संबंधी तो मुझसे परिचित हो गए थे लेकिन मैंने महसूस किया कि मुझसे प्रभावित होने के बावजूद भी वह मुझे उतना सम्मान नहीं देते। उन्हें सारा का मेरे साथ घूमना पसंद नहीं था। यह बात सारा ने भी मुझे बताई और मैंने भी महसूस की।

उनमें लार्ड जार्ज फेदर का बेटा रॉबर्ट फेदर सबसे अलग था।

मोहिनी ने मुझे बताया कि वह अक्सर सारा के साथ घूमा-फिरा करता था और उसका प्रेमी था। लंदन में इस उम्र तक पहुँचते-पहुँचते लड़कियाँ कई प्रेमी बदल देती हैं। परंतु सारा के लिए मैं दूसरा ही था।

मेरे आने के बाद रॉबर्ट की शामें अक्सर तन्हाई में गुजरने लगी। जब पहली बार राल्फ स्मिथ के यहाँ मेरा उससे परिचय हुआ तो उसने मुझे व्यंग्य बाणों का निशाना बनाया। मैं खूबसूरती से निभा गया। इसलिए कि लंदन में कोई झगड़ा मोल लेना नहीं चाहता था।

एक शाम रॉबर्ट ने मुझे और सारा को डिनर की दावत दी। मुझे मालूम था रॉबर्ट मुझे सारा के सामने अपमानित करना चाहता है। उसके बावजूद भी मैंने इनकार नहीं किया।
 
रात का खाना हमने एक आलीशान होटल में खाया जहाँ सिर्फ़ मेम्बर ही जा सकते थे। वहाँ नृत्य का प्रोग्राम था। मैं अपने टूटे हुए हाथ के कारण नृत्य में कठिनाई महसूस कर रहा था।

सारा रॉबर्ट के साथ चली गयी और मैं तन्हा मोहिनी से उलझने लगा।

जब संगीत का शोर खत्म हुआ तो वह दोनों मुस्कराते हुए मेज़ पर आ गए। रॉबर्ट ने कुछ चुभी बातें शुरू कर दी। उसने हिन्दुस्तानी लोगों की मूर्खताओं के लतीफे सुनाए और उन्हें गंदे-जाहिल और न जाने क्या-क्या कहने लगा। मैं चुप रहा।

सारा इस शाम को बेरौनक महसूस करने लगी। वह हम दोनों के बीच बैठी थी। सारा ने थिएटर वाली घटना रॉबर्ट को बताई तो रॉबर्ट कहकहे लगाने लगा।

फिर रॉबर्ट हमें एक जादूगर के शो में ले गया और बोला- “मिस्टर अमित ठाकुर, इस जादूगर के बारे में आपका क्या ख़्याल है ?”

मैंने कहा- “खूब है! मुझे आनंद आ रहा है।”

“क्या आप ऐसा कोई प्रदर्शन कर सकते हैं ?” उसने अचानक कहा।

“मैंने ऐसा कोई दावा नहीं किया।” मैंने कहा। “लेकिन यह सब क्या है ?”

“यह महारत है सारा। यह कला है। कोई भी चालाकी नहीं।”

“संभव है।” मैं किसी तरह बहस को बदलना चाहता था।

इस अरसे में जादूगर ने हॉल से किसी व्यक्ति को स्टेज पर आने का निमंत्रण दिया।

उसी क्षण रॉबर्ट बोला- “मिस्टर अमित ठाकुर, आप चले जाइए! मेरे ख़्याल में यह दिलचस्प रहेगा।”

मोहिनी ने मुझे टहोका दिया- “यह आगे बढ़ रहा है। इसे क़ाबू करो।”

मैंने हाथ उठा दिया। हम अगली कतार में थे। मैं उठा स्टेज पर पहुँच गया। तुर्की के जादूगर ने मुझे एक नज़र गौर से देखा और फिर मुझे नमस्कार कहा।

“आपका नाम ?” उसने पूछा।

“कुँवर अमित ठाकुर!”

“आप कमज़ोर दिल के आदमी तो नहीं हैं। मैं आपको जमूरा बनाऊँगा।”

“मैं अपने कमज़ोर दिल पर क़ाबू पाने की चेष्टा करूँगा।” मैंने सही उत्तर दिया।

“खूब!” उसने कहा और मेरी आँखों में देखना शुरू किया।

वह एक फन था और हिप्नोटिस्म का माहिर था। मुझे यह देखकर आश्चर्य हुआ कि उसकी विशेषताएँ साधारण जादूगरों से कहीं अधिक हैं। उसने पाँच मिनट का समय माँगा था।

वह मेरी आँखों में आँखें गाड़े पाँच मिनट तक कोशिश करता रहा। मैं बहुत सादगी और बेपरवाही से खड़ा रहा। वह मुझे माध्यम नहीं बना सका।

हाल में सरगोशियाँ उभरने लगीं।

मोहिनी मुझे क़ाबू किए होती थी। उसने दर्शकों से क्षमा माँगी और पाँच मिनट और माँगे। दर्शकों में हलचल थी।

वह झुंझला रहा था और उसके माथे पर शिकनें उभरने लगी थीं। परिणाम, उसने एक और वार किया। उसने जादू की सहायता से ऐसा अमल किया कि मैं पागलों की सी हरकतें करने लगा। वह इसमें भी असफल हो गया।

फिर वह मेरे निकट आया और मेरे कंधे पर हाथ रख कर कहा- “यह मेरी ज़िंदगी का पहला अवसर है। मैं आपसे प्रार्थना करता हूँ कि मेरी इज़्ज़त रख लीजिए।

“मैं आपसे मुलाक़ात करना चाहता हूँ। लेकिन इस वक्त आप मुझ पर रहम कीजिए।”

दूसरी कोई सूरत होती तो मैं उसकी प्रार्थना स्वीकार कर लेता लेकिन यहाँ मामला ही दूसरा था।

मैंने उसका हाथ थामा और बाज़ू बुलंद किया।

“उपस्थित सज्जनों, मेरा जमूरा न बनने में इस जादूगर का कोई कसूर नहीं है। दरअसल मैं स्वयं फन का माहिर हूँ। मुझे अफ़सोस है कि आपका खासा क़ीमती वक्त जाया हुआ।” यह कहकर मैं चलने लगा।

तुर्की जादूगर ने मुझे लपक लिया। मैं अपने अजनबी मित्र से प्रार्थना करूँगा कि वह अपनी कला का कोई प्रदर्शन करें।

हॉल में तालियाँ बजने लगी। लोगों की ज़ोरदार पेशकश के कारण आख़िर मुझे हामी भरनी पड़ी। और फिर मैंने उसी जादूगर को अपना जमूरा बनाया

मैंने पूछा- “कितने मिनट बाकी हैं ?”

आवाजें आईं- “पाँच मिनट।”

“यह अधिक है।” मैंने कहा और मुस्कराकर जादूगर की तरफ़ देखा। फिर मोहिनी को संकेत कर दिया।

मोहिनी के लिए भला ऐसे जादूगरों को कब्जाना क्या महत्व रखता है।
 
तुर्की जादूगर ने मुझे लपक लिया। मैं अपने अजनबी मित्र से प्रार्थना करूँगा कि वह अपनी कला का कोई प्रदर्शन करें।

हॉल में तालियाँ बजने लगी। लोगों की ज़ोरदार पेशकश के कारण आख़िर मुझे हामी भरनी पड़ी। और फिर मैंने उसी जादूगर को अपना जमूरा बनाया

मैंने पूछा- “कितने मिनट बाकी हैं ?”

आवाजें आईं- “पाँच मिनट।”

“यह अधिक है।” मैंने कहा और मुस्कराकर जादूगर की तरफ़ देखा। फिर मोहिनी को संकेत कर दिया।

मोहिनी के लिए भला ऐसे जादूगरों को कब्जाना क्या महत्व रखता है।

दो मिनट के अंदर ही जादूगर लम्बा हो चुका था। फिर मेरी आज्ञा पर वह किसी मशीन की तरह काम करने लगा। वह पूरी तरह मेरे आदेशों का ग़ुलाम था।

मैं कभी उसे नाचने का हुक्म देता, कभी किसी दर्शक का बेंत और चश्मा लाने का, कभी कुछ, कभी कुछ...। यह दिलचस्प प्रदर्शन चंद मिनट में समाप्त हो गया और फिर सारा हॉल तालियों से गूँज उठा।

मोहिनी जादूगर को छोड़कर मेरे पास आ गयी तो वह जैसे किसी ख्वाब से जागा और बौखलाए अंदाज़ में मुझे सीट पर जाते देखता रहा।

अपने सीट पर आने के बाद मेरे लिए मुश्किल हो गयी। भीड़ ने मुझे घेर लिया। बड़ी मुश्किल से रास्ता बनाते मैं वहाँ से आया।

शो का समय समाप्त हो चुका था और हॉल में अफरा-तफरी मची हुई थी।

सारा प्रसन्नता भरी दृष्टि से मेरा चेहरा तक रही थी। उस दिन से बेचारा तुर्की जादूगर लंदन में कोई शो नहीं कर सका। उसने कई बार मुझसे मिलने की कोशिश की लेकिन मैंने उससे मिलना उचित नहीं समझा। मैं हमेशा उसे बड़ी खूबसूरती से टाल देता था।

लंदन में यह एक अकेली घटना नहीं थी। इस प्रकार की कई छोटी-बड़ी घटनाएँ हैं।

यह एक दिलचस्प ज़िंदगी थी जिसकी कल्पना मैंने कभी नहीं की थी। यहाँ न कोई हरि आनन्द था, न पुलिस। मैं केवल अपनी मोहिनी को साथ लिए वहाँ के लोगों को आश्चर्यचकित कर रहा था। वह मुझे कोई जिन्न या भूत समझ रहे थे। उन्हें नहीं मालूम था कि अभी मेरी मोहिनी ने उनके सामने दो-चार हाथ दिखाए हैं। अभी क्या है।

सारा के सामने मैं अधिकतर कोशिश करता कि मोहिनी कोई हंगामा बरपा न करे और मैं उससे एक साधारण इंसान की तरह मिलता रहूँ। वरना वह मुझसे भयभीत हो जाती और सारा मज़ा किरकिरा हो जाता।

फिर भी कुछ घटनाएँ कुदरती घट जातीं। बाज़ चैलेंज कबूल करने ही पड़ते।

किंतु एक रात...।

मैं उस रात राल्फ स्मिथ के यहाँ मेहमान था। वह मुझे लम्बी-चौड़ी पुरानी बातें सुनाने में व्यस्त था। लार्ड को शैंपेन प्रिय लगती थी। जब मैं उससे बातें करता रहता तो सारा इस लम्बी बातचीत से उकताकर बाहर चली जाती। और जाते-जाते मुझसे खिसकने का इशारा करती।

उस रात भी वही हुआ। लार्ड की बातें खत्म होने को नहीं आ रही थी। सारा झुंझला कर चली गयी।

आख़िर किसी तरह बहुत देर बाद लार्ड से मेरा पीछा छूटा और मैं नीचे से ही सारा को लिए हुए अपने होटल की तरफ़ चल पड़ा। सारा कुछ देर मेरे होटल में मेरे साथ रही, फिर चली गयी।

उसके जाने के बाद मैं बिस्तर पर लेटा और मोहिनी से नोंक-झोंक करने लगा। फिर मुझे जल्दी नींद आ गयी लेकिन अभी मुझे सोए हुए आधा घंटा हुआ था कि टेलिफ़ोन की घंटी ने मुझे चौंका दिया।

सारा भयभीत स्वर में कह रही थी- “अमित, पापा अपने कमरे में मुर्दा हालत में पाए गए।”

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सारा की यह सूचना एक धमाके की तरह थी। मैं कुछ ही देर पहले तो उनके पास बैठा था। मुझे क्या मालूम था कि मेरी और उनकी आख़िरी मुलाक़ात है।

इस हैरतअंगेज समाचार को सुनकर मैं स्तब्ध रह गया।

मैं उससे शोक के शब्द भी न कह सका और न आश्चर्य प्रकट कर सका।

उसने फोन बंद कर दिया। लार्ड स्मिथ बहुत शानदार और दिलचस्प व्यक्तित्व का मालिक था। इतने समय में ही वह मुझसे बहुत निकट आ चुका था। उसकी अचानक मृत्यु से मुझे बड़ा सदमा पहुँचा।

मेरी नींद उड़ गयी।

और तब मैंने फ़ोन पर सारा द्वारा कहे वाक्य पर गौर किया तो एक सनसनी सी मेरे शरीर में दौड़ गयी।

क्या लार्ड की मौत में किसी का हाथ है ? क्या इतनी दूर आ जाने के बाद भी मुसीबतों ने राज ठाकुर का पीछा नहीं छोड़ा ?

अगर यह कत्ल का मामला था तो क़ातिल ने बड़ा सूझ-बूझ से काम लिया और उसी वक्त कत्ल किया जब सारा अपराध मेरे सिर मढ़ा जा सकता था। मगर लार्ड को कत्ल क्यों किया गया ?

वह तो एक निखरे हुए व्यक्तित्व का स्वामी था। तो क्या कोई खानदानी दुश्मनी ? दौलत का चक्कर ? कोई पुरानी रकावत ? या फिर सारा ?

मैंने मोहिनी की तरफ़ देखा। उसके धीमे-धीमे खर्राटे मेरे कानों में पड़ रहे थे। वह हमेशा की तरह मेरे बालों को मखमली बिछौना बनाए, हाथ का तकिया बनाए, बायीं करवट ली सो रही थी। आराम की नींद।

लंदन में यूं भी वह कुछ बेफिक्र सी हो गयी थी। घंटों पाँव पसार कर सोती रहती या टक-टक अंग्रेज़ों का शहर देखती रहती। उसे सारा के फ़ोन की भी खबर न हो सकी।

हिन्दुस्तान में तो वह सतर्क और हर समय चौकस रहती थी। वहाँ उसके चाहने वाले जो बहुत थे। लेकिन यहाँ आकर वह सभी खतरों से दूर थी।

मुझे अब अपनी सुरक्षा का प्रबंध करना था। अन्यथा वही पुलिस, वही जासूस, वही कानून। ज़िंदगी लंदन में भी दुभर हो जाती। यहाँ से भागकर कहाँ जाता।

मैंने झल्लाहट में आकर अपने वस्त्र बदले और मोहिनी को जगाने की कोशिश की। मोहिनी की उपस्थिति में मौत के असली कारण का पता लगाना कोई कठिन नहीं था।

मैंने उसे दो-चार आवाजें दीं तो उसने एक तौबा शिकन अंगड़ाई ली और आँखें खोलते हुए बोली-

“क्या मुसीबत है राज ? मैं इस समय बड़े मज़े में सो रही थी।”

“सोने के दिन गए मेरी जान, अब जाग जाओ।”

“क्यों ? यहाँ भी कोई मनहूस हरि आनन्द आ गया ?”

“हरि आनन्द से तुम बहुत भयभीत हो।” मैंने व्यंग्य किया फिर उदासी से बोला- “मोहिनी रानी, हरि आनन्द तो हर जगह मौजूद है।”

“क्योंकि कुँवर राज ठाकुर भी हर जगह मौजूद है।” मोहिनी ने तेजी से कहा।

“यह छेड़खानियाँ फिर करना। मैं तुम्हें एक महत्वपूर्ण खबर सुनाना चाहता हूँ।”

मोहिनी मेरी बात सुनकल अचानक खड़ी हो गयी। चंद क्षणों तक वह शून्य में निहारती रही। उसकी आँखों में चमक पैदा हो गयी और उसने कहना शुरू किया-

“लार्ड की मौत में रॉबर्ट का हाथ है। उस खूबसूरत नौजवान ने पूरी महारत से तुम्हारे गिर्द खूबसूरत जाल फैला दिया। तमाम सबूत तुम्हारे ख़िलाफ़ हैं। रॉबर्ट ने तुम्हें फाँसी के फंदे तक ले जाने के लिए सारे प्रबंध कर दिए हैं।”

“मेरी ज़िंदगी के दिन बहुत हैं, यह अंग्रेज़ का बच्चा मुझे क्या मारेगा। मुझे पूरा विवरण चाहिए।” मैंने नाराज़गी से कहा- “रॉबर्ट के फैलाए जाल की फ़िक्र उस वक्त होती जब तुम साथ न होती और जब तुम साथ न होती तो सारा कैसे मिलती ?”

लार्ड के घर में मेरी इतनी निकट ही कौन होती ? मैं लंदन कैसे आता ? मैं तो किसी दफ़्तर की सीट पर बैठी वहीं क्लर्की कर रहा होता और मेरे बच्चे चीथड़े सजाए गली में खेल रहे होते।”

“क्या तुम इस समय बहुत उदास हो। सारा के बाप की मौत का सदमा कुछ अधिक ही मालूम होता है। हाँ, सारा तुमसे क़रीब भी तो आ गयी।”

मोहिनी उस घटना को अधिक महत्व नहीं दे रही थी।

“मैं उदास इसलिए हूँ मोहिनी कि मैं यहाँ आराम के कुछ दिन गुजारना चाहता हूँ। मैं किसी मामले में पड़ना नहीं चाहता।”

“इसकी चिंता बेकार है लेकिन तुम्हें इसी समय सारा के घर जाना होगा, राज! तुम बहुत निठल्ले हो गए। अब आएगा मज़ा। मैं भी उदास थी। न कुछ हंगामा, न शोर मेरे राजा। अब जरा कसरत करो। तुम्हारी टक्कर अंग्रेज़ पुलिस से है। और दूसरी तरफ़ तुम्हारी रानी मोहिनी है। मैं चली।”

“लेकिन मोहिनी मुझे विवरण चाहिए।”

“विवरण बाद में। जरा मैं रॉबर्ट के घर तक तफरीह कर आऊँ जिसने तुम्हें रास्ते से हटाने के लिए और सारा को प्राप्त करने के लिए यह जाल बुना है। लार्ड की दौलत और दौलत से भी बढ़कर सारा क्या इतनी आसानी से उसे दे दोगे राज। समय कम है। इस समय एक-एक क्षण क़ीमती है। मैं वापस आकर तुम्हें सबकुछ बताऊँगी।”

फिर मुझे यूँ लगा जैसे सोयी हुई मोहिनी जाग गयी। छिपकली अपने असली रूप में आ गयी।

न जाने अब लंदन में क्या हंगामे होने वाले थे।

हंगामा मोहिनी की फितरत थी। कभी-कभी मुझे उससे खौफ होने लगता। वह मुझे प्यार करती थी। मैं उसे दिलो-जान से चाहता था। उस जहरीली को ही अपनी दुनिया समझता था पर वह मोहिनी थी।

इंसानों का खून पीने वाली एक छिपकली। एक खून की प्यासी। एक आफत की पुतली। एक जहरीली और उसे हंगामे पसंद थे।

कुँवर राज ठाकुर की यही ज़िंदगी थी। वह बढ़ा जा रहा था लार्ड स्मिथ की हवेली की ओर।

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राल्फ स्मिथ के महलनुमा मकान के बाहर पुलिस की कारों की कतार देखकर मेरा माथा ठनका। लंदन के प्रसिद्ध जासूसों और पुलिस वालों ने पहले ही वहाँ कार्यवाही शुरू कर दी थी।

मैं टैक्सी वाले का किराया अदा करके इमारत का निरीक्षण लेने लगा। अंदर पहुँचा तो मेरा संदेह सही साबित हुआ।

लार्ड स्मिथ की लाश उसके शयनकक्ष में मसहरी के क़रीब फर्श पर पड़ी थी। बिस्तर की बेदाग चादर आधी मसहरी पर थी और आधी नीचे झूल रही थी।

मुझे कत्ल का अंदाज़ा हुआ जिससे दो-चार होने के बाद ही उस ज़िंदा दिल बूढ़े ने मौत से शिकस्त खाई होगी।

पुलिस के फोटोग्राफर और फिंगर विशेषज्ञ बड़ी सरगर्मी से अपना काम कर रहे थे। एक पुलिस ऑफ़िसर कमरे में एक तरफ खड़ा हुआ संकेत से बातें कर रहा था।

मैंने सारा के चेहरे का जायजा लिया। उसकी हालत शोकाकुल थी। उसके चेहरे की सारी रौनक जर्द पड़ गयी थी। उसकी खूबसूरत आँखों में विरानी तैर रही थी। मैं उससे निगाहें न मिला सका।

न जाने क्यों मेरा मन कुदरत के अन्याय पर मुस्कराने को चाहता था। जब मैं किसी से सांत्वना के शब्द कहता हूँ तो मुझे खुद पर संतुलन बनाना पड़ता है। शब्द मुँह से नहीं निकलते और दुःख प्रकट करना बनावटी सा लगता है। मौत का ग़म जिसे होता है उसे सांत्वना देने वाले हमेशा अपने बयान में कमी महसूस करते हैं।

मैं सारा को क्या सांत्वना देता।

पुलिस के दूसरे विशेषज्ञ और जासूस विभिन्न कोणों से लाश का निरीक्षण कर रहे थे। यहाँ की पुलिस और हिन्दुस्तान की पुलिस में ज़मीन आसमान का फ़र्क़ था।

यह लोग बहुत ही चतुराई से बिना गाली दिए गंभीरता से अपना काम कर रहे थे।

मैंने उस मेज़ की तरफ़ नज़र उठाई जो लार्ड के मसहरी के सिरहाने मौजूद थी। मेज़ पर रखे हुए गिलास में कुछ दूध अब भी मौजूद था। मोहिनी ने मुझे बताया था कि लार्ड की मौत यह दूध पीने से हुई है। इसमें ज़हर का मिश्रण था।
 
मैं अभी दूध का गिलास ध्यानपूर्वक देख रहा था कि मोहिनी मेरे सिर पर वापस आ गयी। मैंने उसकी तरफ़ देखा। वह गंभीरता से बोली-

“राज, अब तुम्हें चिंतित होने की आवश्यकता नहीं है। मैंने ऐसी परिस्थितियाँ पैदा कर दी हैं कि पुलिस सरलता से वास्तविक मुजरिम तक पहुँच जाएगी।”

फिर मोहिनी ने जो विवरण बताया उसे सुनकर मेरा दिल चाहा कि उसे गोद में उठाकर सीने से लगा लूँ। उसने मुझे बचाने की ख़ातिर जो जाल बुना था वह बेहद दिलचस्प था।

अचानक सारा की नज़र मुझ पर पड़ी। वह किसी भयभीत हिरणी की तरह दौड़ती हुई मेरे निकट आई और मेरे सीने से लिपट कर बोली-

“अमित, यह क्या हो गया। मेरे पापा मुझसे क्यों नाराज़ हो गए। क्या मैं इतनी बुरी थी ?”

“हिम्मत से काम लो सारा।” मैंने उसे तसल्ली देते हुए कहा।

“सभी इंसानों का अंत यही है। सिर्फ़ पहले और बाद की बात है। कुदरत के फ़ैसले अटल होते हैं। इंसान सब्र के सिवा और क्या कर सकता है।”

सारा मेरे सीने से लगी हुई बच्चे की तरह बिलख-बिलख कर रो रही थी। मुझे बर्दाश्त न हो सका। मेरी आँखों में भी आँसू आ गए।

कमरे में उपस्थित अधिकारियों में से कुछ ने कुछ क्षण के लिए मेरी तरफ़ देखा फिर अपने काम में व्यस्त हो गए।

वह पुलिस ऑफ़िसर आगे बढ़ा जो सारा से बात कर रहा था। फिर उसने मुझे संकेत से सुझाव दिया कि मैं सारा को घटनास्थल से अलग ले जाऊँ। मैंने स्वीकृति में सिर हिलाया और सारा को दूसरे कमरे में ले गया। वह बुरी तरह विलाप कर रही थी। मेरे लिए यह क्षण भावुक और दर्दनाक थे। उसका गम देखकर मुझे मेरे अजीजों की मौत याद आ गयी।

डॉली और माला के ज़ख़्म भी हरे हो गए। मैं उसे दिलासा दे रहा था। हालाँकि मैं स्वयं भी निढाल हो गया था।

उसी समय रॉबर्ट तेज-तेज कदम बढ़ाता हुआ कमरे में दाख़िल हुआ। हम दोनों की दृष्टि चार हुई। एक बार दिल में आया कि इस कमबख्त को अभी मिटा दूँ।

रॉबर्ट ने मुझे देखकर नफ़रत से मुँह फेर लिया। और फिर लपक कर क़रीब आया और सारा से संबोधित हुआ- “यह सब अचानक कैसे हो गया सारा ? अंकल शाम तक तो ठीक थे। उनसे फ़ोन पर बातें हुई थीं। तुम्हारा फ़ोन आया तो मुझे विश्वास नहीं हुआ। मेरा ख़्याल था कि तुमने परेशान करने के लिए ख़तरनाक मज़ाक किया है। लेकिन यहाँ आकर मालूम हुआ कि बिसात सचमुच उलट चुकी है। मुझे बहुत दुःख है। मैं तुम्हारा ग़म महसूस कर रहा हूँ।”

सारा ने रॉबर्ट की बात का उत्तर नहीं दिया। उसे दयनीय दृष्टि से देखकर सारा दोबारा मेरे सीने में मुँह छुपाकर रोने लगी। उसकी हिचकियाँ बँध गयी। मुझे अहसास था कि सारा को मेरे सीने से लगा देखकर रॉबर्ट पर क्या गुजरी होगी।

उसी क्षण मोहिनी ने मेरे कान में सरगोशी की- “राज! देख रहे हो इस खूबसूरत नौजवान की दिलेरी ? इजाज़त हो तो कुछ क्षणों में मैं इसका भरम खाक में मिला दूँ ? मेरी मानो तो इसे अधिक ढील देना उचित नहीं।”

“जल्दबाज़ी से काम मत लो मोहिनी।” मैंने भी दिल में उसे संबोधित किया। “इसे इस तरह नहीं छोड़ा जा सकता। इसकी कार्यवाही का तमाशा सबको देखना चाहिए। यह बचकर कहाँ जाएगा। लेकिन इसे हैरतअंगेज अंजाम से दो-चार करना ज़रूरी है।”

कुछ देर बाद पुलिस के दो ऑफ़िसर कमरे में आ गए। रॉबर्ट ने परेशानी का प्रदर्शन करते हुए कहा-

“क्यों ऑफ़िसर, अंकल स्मिथ की मौत का कारण मालूम हुआ ?”

“हाँ, डॉक्टर का ख़्याल है कि लार्ड ने कोई ज़हर लिया था। लेकिन पोस्टमार्टम की रिपोर्ट आने से पहले कोई निश्चित बात नहीं की जा सकती।”

“जहर ? नहीं, नहीं ऑफ़िसर! मैं नहीं मान सकता।” रॉबर्ट ने भर्राए स्वर में कहा। “अंकल बड़े दृढ़ आत्म संयम के स्वामी थे।

“उनकी गिनती ऐसे लोगों में नहीं की जा सकती जो किसी नाज़ुक क्षण से परेशान होकर आत्महत्या का फ़ैसला कर बैठे। मेरा ख़्याल है अंकल निश्चित ही किसी साज़िश का शिकार हो गए हैं। मगर उनका दुश्मन कौन हो सकता है ?” रॉबर्ट ने सोचते हुए कहा।

“आपकी तारीफ़ ?” पुलिस ऑफ़िसर ने रॉबर्ट से प्रश्न किया।

“मेरा नाम रॉबर्ट है। अंकल स्मिथ से हमारा घरेलू संबंध है। कुछ और भी संबंध होने वाले थे मगर...आह...!”

रॉबर्ट ने सारा की तरफ़ देखते हुए कहा- “मुझे इस दर्दनाक घटना की सूचना सारा ने दी थी।”

“हो सकता है आपका संदेह सही हो।” पुलिस ऑफ़िसर ने जवाब दिया। “पोस्टमार्टम की रिपोर्ट और फिंगर विशेषज्ञों की रिपोर्ट मिलने के बाद ही फ़ैसला किया जाएगा।”

सारा ने तय कर लिया था कि उसे सिर्फ़ मेरे सीने में सकून मिलेगा। वह सिसक रही थी और मैं रॉबर्ट और पुलिस ऑफ़िसर के बीच होने वाले वार्तालाप को सुन रहा था।

रॉबर्ट बार-बार इस संदेह को प्रकट कर रहा था कि लार्ड स्मिथ की मृत्यु में गहरी साज़िश है।

उसके वार्तालाप का अंदाज़ बहुत भावुक था। वह बार-बार तैश में हाथ मलने लगता। स्मिथ खानदान से अपने संबंधों और रिश्तों का ज़िक्र वह ऐसे स्वर में कर रहा था जैसे लार्ड स्मिथ की मौत का दुःख लम्बे अर्से तक करता रहेगा।

रॉबर्ट के बाद पुलिस ऑफ़िसर ने सारा से प्रश्न करने शुरू किए।

मैं इन तमाम समय में ख़ामोश, शांत, तमाशाई की तरह खड़ा रहा। सारा ने किसी षड्यंत्र की संभावना पर अज्ञानता प्रकट की। एक और प्रश्न के उत्तर में उसने पुलिस को मेरा और रॉबर्ट का नाम बताया।

सारा के बयानानुसार उस रोज़ मेरे और रॉबर्ट के सिवा किसी ने मृतक से मुलाक़ात नहीं की थी। पुलिस ऑफ़िसर ने अपने एक सहयोगी को आदेश किया कि घर के तमाम नौकरों के उँगलियों के निशान ले लिये जाए।

सहयोगी के जाने के बाद रॉबर्ट ने अपनी उँगलियाँ भी पुलिस के सामने पेश कर दी। पुलिस ऑफ़िसर भी यही चाहता था।

उसने पहले रॉबर्ट के उँगलियों के फिंगर प्रिंट लिए और फिर मेरी तरफ़ देखा। मोहिनी तमाम कार्यवाही देख रही थी। वह दख़ल देती हुई बोली-

“राज, अब बर्दाश्त नहीं हो सकता। यह वक्त खामोशी का नहीं है। अगर अब भी तुमने बिसात न पलटी तो हालात बिगड़ जाएँगे।”

मेरे लिए अब ख़ामोश रहना उचित नहीं था। पुलिस ने मेरी उँगलियों के निशान लेने की इच्छा प्रकट की तो मैंने खामोशी से उनकी बात मान ली।

जिस समय मैं उँगलियों के चिह्न कागज़ पर उतार रहा था, रॉबर्ट की आँखें ख़ुशी से चमक रही थी। पुलिस ऑफ़िसर जब मेरे फिंगर प्रिंट ले चुका तो रॉबर्ट ने कहा-

“मिस्टर अमित ठाकुर! आप ज्योतिष विशेषज्ञ हैं और हिप्नोटिस्म में आपको महारत हासिल है। मैं स्वयं अपनी आँखों से देख चुका हूँ। सुना है आप परामनोविज्ञान के भी सिद्धहस्त हैं। आप क्या अंकल स्मिथ की मौत के बारे में नहीं बता सकते ?

“राज! मोहिनी गुर्राकर बोली। “बस करो, यह व्यक्ति अपने आपे में नहीं है। इसे बड़ी खुशफहमी है कि यह पूरी तरह सुरक्षित है।”

“मिस्टर अमित!” पुलिस ऑफ़िसर ने मेरा परिचय सुनने के बाद उपहासजनक स्वर में कहा। “हिन्दुस्तानियों के बारे में ऐसी बातें किताबों में आम हैं। क्या आप हमसे सहयोग नहीं करेंगे ?”

मेरे सब्र का पैमाना लबरेज हो चुका था। पुलिस ऑफ़िसर जिसका नाम हार्डी था। वह रॉबर्ट का शह पाकर मेरा और हिन्दुस्तानियों का यूँ अपमान करता था जैसे हम नीच नस्ल के लोग हैं।

यहाँ आकर मेरे जेहन में इस पूरी ऊँची नस्ल से प्रतिशोध लेने की भावना भड़क उठी थी। मैं उसकी निगाह पहचानता था जिनमें घमंड हमेशा मौजूद रहता था।

मैंने एक नज़र सारा पर डाली। वह सिर झुकाए सिसक रही थी।

रॉबर्ट पुलिस ऑफ़िसर के निकट गर्व से गर्दन अकड़ाए खड़ा था। मैंने हार्डी को संबोधित करते हुए गंभीरता से कहा-

“ऑफ़िसर, मैं पुलिस से सहयोग करना अपना फ़र्ज़ समझता हूँ। लेकिन यह अवसर मेरी परामनोवैज्ञानिक शक्तियों की परीक्षा लेने का नहीं है। क्या लंदन के विशेषज्ञ पुलिस आख़िर मेरी बातों पर ध्यान देंगे ?”

“निश्चय ही।” हार्डी ने शब्द चबाते हुए कंधे उचकाकर उत्तर दिया



“अगर आपका ज्ञान कानून को कोई ठोस सबूत उपलब्ध करा सके तो उसे नज़रअंदाज़ नहीं किया जा सकेगा। वैसे यह तजुर्बा हम सबके लिए दिलचस्प होगा।”

“लेकिन एक शर्त है। मैं घटनाक्रम का विवरण नहीं दूँगा। अगर लंदन की पुलिस यह वचन दे कि वह मेरी शहादतों की असाधारण छानबीन नहीं करेगी तो मैं किसी कदर संतुष्ट हो सकता हूँ। मैं यहाँ तफरीह करने के लिए आया हूँ।”

“हमें आपके व्यक्तित्व से दिलचस्पी हो रही है।” हार्डी ने व्यंग्यात्मक स्वर में कहा।

“आपकी शर्त हमें स्वीकार है। यह वार्तालाप 'ऑफ़ द रिकार्ड' रहेगा। आप विश्वास रखिए।”

मैंने हार्डी को घूरकर आँखें बंद कर ली।
 
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