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पंद्रह दिन की निरंतर यात्रा के बाद एक सुबह मैंने अपने आपको उस झरने के पास पाया जहाँ पहली बार मुझे माया मिली थी। मैं अपनी मंज़िल पर आ गया था। ऊपर वह कुटी थी जहाँ कुलवन्त को होना चाहिए था। मैंने मोहिनी से कहा कि देखकर आओ कुलवन्त क्या कर रही है।
मोहिनी मेरे सिर से उतर गयी और कुछ सेकेंड बाद लौट आयी।
“मुझे कुलवन्त नज़र नहीं आयी।” मोहिनी ने सूचना दी। “कुटी मण्डल के घेरे में है और भीतर कुछ नज़र नहीं आता और मैं वहाँ नहीं जा सकती।”
“और तरन्नुम ?”
“तरन्नुम पहाड़ी से उतरते हुए आ रही है।”
“ओह, इसका मतलब कुलवन्त यहाँ किसी जाप में लीन होगी! पहले भी तो तुम वहाँ बेबस हो गयी थी मोहिनी।”
“हाँ आका! वह प्रेम लाल का पवित्र स्थान है और मोहिनी को वहाँ अपनी इच्छा से जाने का अधिकार नहीं।”
मैं चुप हो गया। मोहिनी की विवशता को मैं अच्छी तरह समझता था।
अधिक देर नहीं हुई जब तरन्नुम झरने के क़रीब आती दिखायी दी। उसने दूर से ही मुझे पहचान लिया। उसकी चाल तेज हो गयी और जब वह क़रीब आयी तो दौड़कर मुझसे लिपट गयी।
“भाईजान!”
“हाँ तरन्नुम, मैं ही हूँ! कैसी हो ?”
“बहुत मज़े में हूँ।”
“और तुम्हारी दीदी ?”
“बाज़ी भी ठीक है ?”
“लेकिन तुम्हें कैसे पता चला कि मैं यहाँ हूँ ?”
“रात ही सपने में बाज़ी ने मुझसे कहा था कि आप सुबह-सुबह तशरीफ ला रहे हैं; और मैं आपका ही इंतज़ार कर रही थी।”
“कुलवन्त इस समय क्या कर रही है ?”
“छः दिन हो गए, वह मण्डल में बैठी है। ग्यारह दिन बाद वह मण्डल से बाहर आएगी।”
“ओह! अभी कितने दिन बाकी हैं ?”
“ग्यारहवें दिन बाहर आएगी।” तरन्नुम ने कहा।
इसका मतलब यह था कि मुझे ग्यारह दिन उसकी प्रतीक्षा करनी थी। तरन्नुम के साथ और बहुत सी बातें करते हुए हम ऊपर की तरफ़ चल पड़े।
ग्यारह दिन कैसे बीते इसके बारे अधिक कुछ कहना निरर्थक है क्योंकि इस बीच सिवाय मोहिनी के चुहलबाजियों के अलावा कोई विशेष बात उल्लेखनीय नहीं है।
मोहिनी के लिए अब मुझे खुद उसकी गिजा का प्रबंध नहीं करना पड़ता था। जब उसे खून की ज़रूरत होती मेरे सिर से उतर जाती और इंसानी लहू से अपनी प्यास बुझाकर लौट आती।
जब मैं कुटी में आराम कर रहा था तो मोहिनी बीच में तीन दिन ग़ायब रही। बाद में अपने सैर-सपाटों का हाल सुनाती रही।
इस बार उसने किसी शराबी का खून पी लिया था। मोहिनी ने हँस-हँसकर बताया कि उस कमबख्त के खून में सिवाय अल्कोहल के कुछ था ही नहीं और उसे भी तीन रोज़ तक नशा रहा। नशे की हालत में वह तीन दिन तक एक सिर से दूसरे सिर पर जाती रही और उधम मचाती रही। मोहिनी को हंगामे पसंद थे और वह क्या कुछ कर सकती थी इसका तजुर्बा मुझे बहुत था।
ग्यारहवें दिन कुलवन्त का जाप खत्म हुआ। वह अपने मण्डल से बाहर आ गयी। उसके हाथ में एक माला थी जिस पर वह जाप कर रही थी। कुलवन्त अब पहले से हसीन और जवान दिखायी पड़ती थी; और उसके जवान जिस्म की सुगंध जंगली फूलों की तरह भीनी-भीनी थी। उसके चेहरे पर प्रखर तेज था और आँखों में सम्मोहन।
उसने मुस्कराकर मेरा स्वागत किया।
“ग्यारह दिन से यहाँ डटा हूँ कुलवन्त और तुम हो कि तुम्हें इसका ख़्याल ही नहीं कि कौन यहाँ आया है। देखो, मैं हूँ तुम्हारा राज। पहचाना मुझे ?”
“राज, तुम क्या सोचते हो कि मुझे तुम्हारा ख़्याल ही नहीं! कहो तो तुम्हारी रोजमर्रा की बातें सुना डालूँ ? अगर मुझे ख़्याल न होता तो किस तरह तरन्नुम ने तुम्हारी खातिरदारी में कोई कसर छोड़ी है।”
“लेकिन कुलवन्त, तुम्हारी यह ज़िंदगी देखकर मुझे भी मायूसी होती है। सोचता हूँ तुम्हें यहाँ अपने साथ लाकर मैंने बहुत बड़ा पाप किया था। तुम्हारी सुंदरता का यह पुजारी जाने कहाँ-कहाँ भटक रहा है अपने मनहूस साये को लेकर; और तुम यहाँ जंगल में तनहा ज़िंदगी गुज़ार रही हो।”
“मैं इस ज़िंदगी में भी बहुत ख़ुश हूँ राज; और यहाँ भी मैं तुम्हारे लिए ही जी रही हूँ। जब तुमने हिन्दुस्तान की ज़मीन पर कदम रखा तो मैंने तुम्हारी सुरक्षा का कवच बनाना शुरू कर दिया था। तुम्हारे दुश्मनों की तादाद बहुत बढ़ गयी है राज।”
“कुछ दिन के लिए ही सही तुम मेरे साथ तो चलो; और देखो तो दुनिया कितनी आगे बढ़ गयी है। मैं तुम्हारे साथ सारी दुनिया घूमना चाहता हूँ। मेरा जीवन बहुत वीरान हो चुका है कुलवन्त। मुझे अपने साये से भी डर लगता है। मुझे किसी पर भी ऐतबार नहीं रहा। बहुत से लोग मेरी ज़िंदगी में आना चाहते हैं तो मैं उनसे दूर भागना चाहता हूँ। ऐसा इसलिए कुलवन्त क्योंकि मेरी ज़िंदगी में आनी वाली हर प्रिय वस्तु मुझसे छीन गयी। मैं कितना अकेला हो गया हूँ।”
मेरा गला भर्राने लगा, आँखें नम होने लगीं। कुलवन्त के सामने मैं अपने आपको एक बच्चा समझ रहा था। फिर कुलवन्त मुझे दिलासा देती रही, मेरा हौसला बढ़ाती रही और मैं उसके घुटनों में सिर रखे सुबकता रहा।
मैं कुलवन्त से ज़िद करता रहा कि वह मेरे साथ चले। अपने फूल मेरे आँखों में खिला दे और मैं सबकुछ भूलकर अपनी जिंदगी चैन व सुकून से बिता लूँगा। हम दोनों के पास अंधेरों में टिमटिमाता एक दीपक था- कुलवन्त।
“मेरे पागल प्रेमी, तुम अकेले कभी नहीं रहे। हर वक्त तो मैं तुम्हारे साथ होती हूँ। तुम जहाँ जाओगे मैं तुम्हारे साथ रहूँगी। दुनिया के इस छोर से उस छोर तक। इस सदी से आख़िरी सदी तक। इस जन्म से आख़िरी जन्म तक। यह इंसानी देह का साथ तो चंद दिनों का होता है। देह मिट जाती है तो सबकुछ मिट जाता है, सभी कुछ यहाँ छूट जाता है और आत्मा बस भटकती रहती है। फासले इतने बढ़ जाते हैं कि कोई फिर कभी नहीं मिलता।
“मैं इन फासलों को मिटा देना चाहती हूँ। मेरी देह तुम्हारे साथ नहीं तो क्या हुआ, आत्मा तो साथ है; और जब आत्मा आत्मा से मिल जाती है तो फासले नहीं रहते। देखो राज, दिल छोटा न करो!
मोहिनी मेरे सिर से उतर गयी और कुछ सेकेंड बाद लौट आयी।
“मुझे कुलवन्त नज़र नहीं आयी।” मोहिनी ने सूचना दी। “कुटी मण्डल के घेरे में है और भीतर कुछ नज़र नहीं आता और मैं वहाँ नहीं जा सकती।”
“और तरन्नुम ?”
“तरन्नुम पहाड़ी से उतरते हुए आ रही है।”
“ओह, इसका मतलब कुलवन्त यहाँ किसी जाप में लीन होगी! पहले भी तो तुम वहाँ बेबस हो गयी थी मोहिनी।”
“हाँ आका! वह प्रेम लाल का पवित्र स्थान है और मोहिनी को वहाँ अपनी इच्छा से जाने का अधिकार नहीं।”
मैं चुप हो गया। मोहिनी की विवशता को मैं अच्छी तरह समझता था।
अधिक देर नहीं हुई जब तरन्नुम झरने के क़रीब आती दिखायी दी। उसने दूर से ही मुझे पहचान लिया। उसकी चाल तेज हो गयी और जब वह क़रीब आयी तो दौड़कर मुझसे लिपट गयी।
“भाईजान!”
“हाँ तरन्नुम, मैं ही हूँ! कैसी हो ?”
“बहुत मज़े में हूँ।”
“और तुम्हारी दीदी ?”
“बाज़ी भी ठीक है ?”
“लेकिन तुम्हें कैसे पता चला कि मैं यहाँ हूँ ?”
“रात ही सपने में बाज़ी ने मुझसे कहा था कि आप सुबह-सुबह तशरीफ ला रहे हैं; और मैं आपका ही इंतज़ार कर रही थी।”
“कुलवन्त इस समय क्या कर रही है ?”
“छः दिन हो गए, वह मण्डल में बैठी है। ग्यारह दिन बाद वह मण्डल से बाहर आएगी।”
“ओह! अभी कितने दिन बाकी हैं ?”
“ग्यारहवें दिन बाहर आएगी।” तरन्नुम ने कहा।
इसका मतलब यह था कि मुझे ग्यारह दिन उसकी प्रतीक्षा करनी थी। तरन्नुम के साथ और बहुत सी बातें करते हुए हम ऊपर की तरफ़ चल पड़े।
ग्यारह दिन कैसे बीते इसके बारे अधिक कुछ कहना निरर्थक है क्योंकि इस बीच सिवाय मोहिनी के चुहलबाजियों के अलावा कोई विशेष बात उल्लेखनीय नहीं है।
मोहिनी के लिए अब मुझे खुद उसकी गिजा का प्रबंध नहीं करना पड़ता था। जब उसे खून की ज़रूरत होती मेरे सिर से उतर जाती और इंसानी लहू से अपनी प्यास बुझाकर लौट आती।
जब मैं कुटी में आराम कर रहा था तो मोहिनी बीच में तीन दिन ग़ायब रही। बाद में अपने सैर-सपाटों का हाल सुनाती रही।
इस बार उसने किसी शराबी का खून पी लिया था। मोहिनी ने हँस-हँसकर बताया कि उस कमबख्त के खून में सिवाय अल्कोहल के कुछ था ही नहीं और उसे भी तीन रोज़ तक नशा रहा। नशे की हालत में वह तीन दिन तक एक सिर से दूसरे सिर पर जाती रही और उधम मचाती रही। मोहिनी को हंगामे पसंद थे और वह क्या कुछ कर सकती थी इसका तजुर्बा मुझे बहुत था।
ग्यारहवें दिन कुलवन्त का जाप खत्म हुआ। वह अपने मण्डल से बाहर आ गयी। उसके हाथ में एक माला थी जिस पर वह जाप कर रही थी। कुलवन्त अब पहले से हसीन और जवान दिखायी पड़ती थी; और उसके जवान जिस्म की सुगंध जंगली फूलों की तरह भीनी-भीनी थी। उसके चेहरे पर प्रखर तेज था और आँखों में सम्मोहन।
उसने मुस्कराकर मेरा स्वागत किया।
“ग्यारह दिन से यहाँ डटा हूँ कुलवन्त और तुम हो कि तुम्हें इसका ख़्याल ही नहीं कि कौन यहाँ आया है। देखो, मैं हूँ तुम्हारा राज। पहचाना मुझे ?”
“राज, तुम क्या सोचते हो कि मुझे तुम्हारा ख़्याल ही नहीं! कहो तो तुम्हारी रोजमर्रा की बातें सुना डालूँ ? अगर मुझे ख़्याल न होता तो किस तरह तरन्नुम ने तुम्हारी खातिरदारी में कोई कसर छोड़ी है।”
“लेकिन कुलवन्त, तुम्हारी यह ज़िंदगी देखकर मुझे भी मायूसी होती है। सोचता हूँ तुम्हें यहाँ अपने साथ लाकर मैंने बहुत बड़ा पाप किया था। तुम्हारी सुंदरता का यह पुजारी जाने कहाँ-कहाँ भटक रहा है अपने मनहूस साये को लेकर; और तुम यहाँ जंगल में तनहा ज़िंदगी गुज़ार रही हो।”
“मैं इस ज़िंदगी में भी बहुत ख़ुश हूँ राज; और यहाँ भी मैं तुम्हारे लिए ही जी रही हूँ। जब तुमने हिन्दुस्तान की ज़मीन पर कदम रखा तो मैंने तुम्हारी सुरक्षा का कवच बनाना शुरू कर दिया था। तुम्हारे दुश्मनों की तादाद बहुत बढ़ गयी है राज।”
“कुछ दिन के लिए ही सही तुम मेरे साथ तो चलो; और देखो तो दुनिया कितनी आगे बढ़ गयी है। मैं तुम्हारे साथ सारी दुनिया घूमना चाहता हूँ। मेरा जीवन बहुत वीरान हो चुका है कुलवन्त। मुझे अपने साये से भी डर लगता है। मुझे किसी पर भी ऐतबार नहीं रहा। बहुत से लोग मेरी ज़िंदगी में आना चाहते हैं तो मैं उनसे दूर भागना चाहता हूँ। ऐसा इसलिए कुलवन्त क्योंकि मेरी ज़िंदगी में आनी वाली हर प्रिय वस्तु मुझसे छीन गयी। मैं कितना अकेला हो गया हूँ।”
मेरा गला भर्राने लगा, आँखें नम होने लगीं। कुलवन्त के सामने मैं अपने आपको एक बच्चा समझ रहा था। फिर कुलवन्त मुझे दिलासा देती रही, मेरा हौसला बढ़ाती रही और मैं उसके घुटनों में सिर रखे सुबकता रहा।
मैं कुलवन्त से ज़िद करता रहा कि वह मेरे साथ चले। अपने फूल मेरे आँखों में खिला दे और मैं सबकुछ भूलकर अपनी जिंदगी चैन व सुकून से बिता लूँगा। हम दोनों के पास अंधेरों में टिमटिमाता एक दीपक था- कुलवन्त।
“मेरे पागल प्रेमी, तुम अकेले कभी नहीं रहे। हर वक्त तो मैं तुम्हारे साथ होती हूँ। तुम जहाँ जाओगे मैं तुम्हारे साथ रहूँगी। दुनिया के इस छोर से उस छोर तक। इस सदी से आख़िरी सदी तक। इस जन्म से आख़िरी जन्म तक। यह इंसानी देह का साथ तो चंद दिनों का होता है। देह मिट जाती है तो सबकुछ मिट जाता है, सभी कुछ यहाँ छूट जाता है और आत्मा बस भटकती रहती है। फासले इतने बढ़ जाते हैं कि कोई फिर कभी नहीं मिलता।
“मैं इन फासलों को मिटा देना चाहती हूँ। मेरी देह तुम्हारे साथ नहीं तो क्या हुआ, आत्मा तो साथ है; और जब आत्मा आत्मा से मिल जाती है तो फासले नहीं रहते। देखो राज, दिल छोटा न करो!