• Hello Friends You can Register on the Forum and by posting you can earn money too.

Fantasy मोहिनी

चार रोज तक हम इस नए रास्ते पर चलते रहे। यह रास्ता पहले वाले से भी बीहड़ था, परन्तु खतरे जैसी कोई बात हमारे साथ पेश नहीं आयी। इस रास्ते पर चलते हुए हम उन्नीस-बीस हजार फीट बर्फीली पहाड़ियों तक जा पहुँचे। और फिर हमने दूर वह पठार भी देखा जहाँ पहले हम भटक गये थे। इस बुलन्द चोटी पर पहुँचने के बाद कुछ काम रंग लंग को यूँ मिला कि वह दूर-दराज़ की पहाड़ियों तक दृष्टि दौड़ा सकता था। अब निरन्तर सफर करते रहने के कारण पहाड़ी रास्ते मेरे लिए इतने कष्टप्रद साबित नहीं हो रहे थे। मेरी तबियत सम्भल चुकी थी। बुलन्द चोटी पर आफताब की चमक के साथ रंग लंग का मायूस चेहरा भी चमक उठा। कदाचित उसे रास्ता मिल गया था।

रास्ता तो उसने पा लिया था पर एक मुश्किल यह आ खड़ी हुई कि हमारे पास खाने-पीने की सामग्री समाप्त हो गयी। शाम को रंग लंग ने रात बिताने के लिए एक गार तलाश किया और दोनों बचा-खुचा खाने के बाद लम्बी तानकर सो गये।4

सुबह रंग लंग ने मुझे वहीं छोड़ा और खच्चर पर सवार होकर एक तरफ निकल गया। शायद रास्ते की निशानदेही करने या खाने-पीने का प्रबन्ध करने। और वह पूरे डेढ़ दिन बाद वापस आया। उसकी अनुपस्थिति में मेरी जान सूली पर टंगी रही। मैं सोचता रहा कि कहीं वह फिर रास्ता तो नहीं भटक गया और मैं अकेला यहाँ फँसकर तो नहीं रह गया।

बहरहाल रंग लंग अपने साथ खाने-पीने की बहुत सी चीजों के अलावा एक अच्छी खबर भी लाया था। नीचे शोनयांग नामी एक छोटा सा गाँव था और वहाँ से याम दरंग चार रोज के सफर की दूरी पर था। शोनयांग के बाद रास्ता इतना जटिल न था। गार से बाहर तेज बर्फीली हवाएँ चल रही थीं। रंग लंग ने चाय बनायी और खच्चर के सामने चारा डालते हुए बोला–

“श्रीमान! हमें यहाँ से फौरन निकल जाना चाहिए वरना यह हवाएँ मार डालेंगी। तूफान का अँदेशा भी है।”

जो आदमी बर्फीले इलाके में रहा हो और उसने तूफान देखे हों, वह तूफान की मात्र कल्पना से ही काँप उठा था। ऐसी ही हालत मेरी भी थी। रंग लंग का सुझाव बिल्कुल उपयुक्त था। बर्फीली हवाओं का शोर बढ़ता जा रहा था। हवाएँ चिंघाड़ने को तत्पर थीं और कहीं से चुपके-चुपके दम साधकर आ रही थीं। बर्फ का विप्लव कभी भी फट सकता था। एक मील चलने के बाद ही हवाओं का जोर बढ़ गया और आगे चलना दूभर हो गया। बर्फ के थपेड़े जबरदस्त थे। एक बार ऐसा थपेड़ा पड़ा कि मैं मुँह के बल जमीन पर गिर पड़ा।

“साहब! उठिए....यहाँ नहीं....यहाँ बर्फीले थपेड़े हमारी जान खींच लेंगे। जरा हिम्मत से काम लीजिये। बस नीचे पहुँच जाएँ तो सब ठीक हो जाएगा।”

उसने एक बार फिर मुझे सहारा देकर उठाया। मौत हवा के साथ लरज रही थी। बल्कि चिंघाड़ने लगी थी। रंग लंग ने खच्चर से कुछ सामान उतारकर उस पर डाल दिया और फिर हम गिरते-पड़ते नीचे उतरने लगे। शोनयांग के करीब से गुजरते हुए रंग लंग ने एक बार फिर पड़ाव डाला और फिर वह रात कुछ चैन से कटी। शोनयांग कोई बीस-पच्चीस घरों का एक छोटा सा गाँव था और उन लोगों ने हमारी खूब सेवा की।

अगले दिन हम याम दरंग जाने वाले रास्ते पर चल पड़े। तीसरे रोज दर्रा कोचनलाको पार करके हम जंगल में दाखिल हो गये। जंगल में पहुँचते ही शाम हो गयी, अतः वहीं उपयुक्त जगह देखकर हमने पड़ाव डाल दिया। रंग लंग अब पूरी तरह प्रफुल्लित था। याम दरंग अब करीब ही था और एकाध रोज का रास्ता शेष रह गया था।

अब तक मैं रंग लंग से याम दरंग के बारे में बहुत कुछ जान चुका था। उसने मुझे शैतान के मकबरे के बारे में भी बताया था जो खानकाह के ही आस-पास कहीं था; परन्तु पहाड़ों में दब गया था। वह बार-बार मुझे साहब और श्रीमान कहकर सम्बोधित करता था। एक बार मैंने उसे रोककर कहा–“आज से मुझे साहब कहकर सम्बोधित न करना।”

“तो फिर क्या कहूँ ?” रंग लंग ने पूछा।

“राज।”

वह मुस्कुरा दिया। वह जानता था मेरा तात्पर्य क्या है। मैं उसका दोस्त बनकर रहना चाहता था। कभी-कभार मेरे नाम का उच्चारण वह गलत भी करता था और चीनियों की तरह मानोस कह देता। लेकिन मुझे इस पर भी कोई ऐतराज नहीं था।

हम दोनों गहरे दोस्त बन गये थे। और अब मैं अपने को कुछ तरोताजा महसूस कर रहा था। ऐसा मालूम पड़ता था जैसे जहन से एक बोझ हटता जा रहा है और मैं फिर से आदमी की जून में लौटकर आया था। कभी-कभार मोहिनी की भी याद आ जाया करती थी। यह दिन उन दिनों से बहुत अच्छे थे। बेचारा रंग लंग क्या जानता था कि मैं क्या बला हूँ और मैंने जिंदगी का एक खास हिस्सा किस तरह जिया है।

दो रोज बाद हम एक ऊँची चट्टान को पार करके आगे बढ़े तो हमने देखा कि नीचे एक झील है जिसके ऊपर सफेद रंग के परिंदे परवाज कर रहे हैं और फिर कुछ ही देर बाद हमें याम दरंग की वह घाटी नजर आयी जो हमारी मंजिल थी।

❑❑❑
 
यह खानकाह वादी के किनारे सात दर्रों के भीतर बनी थी और सातों दर्रे इसके कपाट कहलाते थे। ऊपर से देखने में खानकाह की छतें नजर आती थीं जो सुनहरे रंग की थीं। झील के बीचों-बीच एक छोटा सा टापू था और यहाँ बौद्ध भिक्षुओं की बस्ती आबाद थी। इस जगह आवागमन किश्तियों द्वारा होता था। यह झील घूमकर एक दरिया से बनी थी जो खानकाह की दिशा से बहता आया था। कहा जाता था कि खानकाह के सातवें कपाट से इस दरिया का स्रोत फूटा और सातों कपाटों ने एक दरिया इसमें अर्पित किया है।

झील का जल स्वच्छ एवं निर्मल था। जो लोग देवी माता के दर्शनार्थ आते थे, वे झील के पवित्र जल में स्नान किया करते थे। सालाना मेला भी इस टापू में भरा करता था। उस समय खानकाह के कपाट खुलते थे और देवी माता टापू के मन्दिर में आती थी। जन साधारण को दर्शन देने के बाद वापस खानकाह में चली जाती थी। मैं रंग लंग के साथ एक ऊँची चट्टान पर बैठा दूर-दूर का दृश्य देख रहा था। खानकाह की चमकीली सुनहरी छतें यहाँ से नजर आ रही थीं। दूर कहीं से घंटों के बजने की आवाज वादी में गूँज रही थी। शायद खानकाह के मन्दिरों के घंटे थे और उसके साथ ही एक संगीत भी झँकार पैदा कर रहा था। ऐसा लगता था जैसे देवताओं की धरती पर आ गया था। कस्बे में लोग इधर-उधर आ जा रहे थे। खास चहल-पहल नजर आ रही थी। नीचे पहुँचने में हमें दो घंटे लग गये।

रंग लंग चाहता था कि हम झुटपुटे के वक़्त कस्बे में दाखिल हों ताकि कम से कम लोग हमें देख सकें और हमें ठहरने के लिए कोई उपयुक्त स्थान मिल सके।अतः नीचे उतरने के बाद हम घास पर लेट कर एक जगह विश्राम करने लगे।

“मानोस साहब...!” रंग लंग ने मेरे नाम का उच्चारण बिगाड़ते हुए कहा। “हम ठीक वक़्त पर पहुँच गये हैं। मेरा ख्याल है मौसम बहार का त्यौहार शुरू होने वाला है। इसलिए यहाँ चहल-पहल नजर आ रही है। वह अब बन्दर की पूजा का त्यौहार मनायेंगे।

“बन्दर की पूजा ?” मेरे लिए यह नयी जानकारी थी। मैंने आश्चर्य से रंग लंग की तरफ देखा जिसने पहले मुझे यह बात नहीं बतायी थी।

फिर रंग लंग ने मुझे बताया कि पौराणिक कथाओं के अनुसार यह रिवाज चला आ रहा है। हिन्दुस्तान के पहाड़ों से एक बन्दर यहाँ आया था। यहाँ उसे एक देवी मिल गयी और दोनों साथ रहने लगे। तिब्बत के तमाम वाशिंदे उन्हीं दोनों की सँतानें हैं...बन्दर की सँतानें!

“अच्छा!” मैंने मुस्कुराते हुए कहा। “तो तिब्बती लोग इस तरह वजूद में आये ?”

“जी हाँ।” रंग लंग ने जवाब दिया। “बन्दर मेरा और हम सबका बाप है।”

“मेरा भी है।” मैंने पुरसुकून अन्दाज में कहा। “इँसान का अस्तित्व ही बन्दरों से विकसित होकर प्रकाश में आया है। हमारे देवी-देवताओं में इसीलिए हनुमान जी की पूजा होती है।”

“वह बन्दर अब तक यहाँ मौजूद है।” रंग लंग ने बताया। मेरे लिए यह चौंका देने वाली बात थी।

“क्या हनुमान जी भी आपके किसी मन्दिर में मौजूद हैं ?” उसका सवाल था।

“नहीं! उनकी सिर्फ मूर्तियाँ हैं। पर तुम्हारा यह पौराणिक बन्दर तो बहुत बूढ़ा होगा ? इतनी शताब्दियाँ उसने किस तरह गुजारीं ?”

“नहीं श्रीमान, असली बन्दर तो मर चुका है! सिर्फ उसका शरीर वहाँ मौज़ूद है।”

“और देवी का क्या बना ?”

“वह रोती रही।” रंग लंग ने ठंडी आह भरते हुए कहा। “और उसके आँसुओं से दरिया फूटा और यह झील बन गयी। तभी से वह खानकाह में अपने प्रेमी के वियोग में रोती रही है।” उसने खानकाह की तरफ संकेत करते हुए कहा। “नौ सौ साल तक वह अपने प्रेमी के वियोग में वहाँ रही और फिर एक रोज चली गयी। खानकाह वास्तव में उस देवी का वियोग स्थल माना जाता है।”

“तो क्या देवी मरी नहीं ?”

“नहीं...देवी कभी नहीं मरती!” रंग लंग ने उत्तर दिया। “वह यहाँ आती है और चली जाती है। इन दिनों वह त्यौहार के अवसर पर यहाँ आएगी। हो सकता है मन्दिर में आ भी चुकी हो।”

“मन्दिर का रास्ता खानकाह से मिलता होगा ?”

“मालूम नहीं! देवी कब और कहाँ से प्रकट होती है कोई नहीं जानता। और यह भी नहीं मालूम कि दर्रे के कपाट कब खुलते हैं और कब बन्द हो जाते हैं। यह भी नहीं कहा जा सकता कि देवी माता हमेशा खानकाह में ही रहती है या कहीं और। लेकिन त्यौहार के दिन वह अपने पति बन्दर से मिलने ज़रूर आती है जिसका शरीर एक मकबरे में रखा है।”

“और वह शैतान का मकबरा किस तरफ है ?”

“शैतान के मकबरे का हाल तो शायद देवी ही बता सकती है। परन्तु वह इन्हीं पहाड़ों में कहीं है जहाँ खानकाह है। देवी महान भिक्षुणी है। महान भिक्षुणी और देवी। वह अट्ठारह बार जन्म ले चुकी है। इस समय वह अपने अट्ठारहवें जन्म में अवतरित है।”

“और बन्दर ? क्या वह अवतरित नहीं होता ?”

“नहीं...!लेकिन अगर बन्दर वापस आ जाए तो महान भिक्षुणी कितनी खुश होगी! उसके मोतियों जैसे आँसू थम जायेंगे।” रंग लंग ने चहक कर कहा।

सूरज डूब रहा था, अतः हम उठे और खामोशी के साथ झील की तरफ बढ़ने लगे। रास्ते में रंग लंग बराबर श्लोक पढ़ता जा रहा था– ‘ॐ ऊंसनी परमहंस।’ कदाचित वह दुआ थी।

झील किश्ती से पार करने के बाद हम आबादी की ओर बढ़ने लगे। रास्ते में एक जगह कुछ औरतें खेत में काम कर रही थीं। वह सबकी सब गंजी थीं। रंग लंग ने बताया–“वह सब पवित्र भिक्षुणियाँ हैं।”44

जब हम कस्बे के अन्दर पहुँचे तो बाजार में अच्छी खासी चहल-पहल नजर आयी। चारों ओर घी के दिए जल रहे थे। जगह-जगह लोग छोटी टोलियों में बँटे हुए खरीदारी कर रहे थे। वीरान पहाड़ों में इतना लम्बा समय गुजारने के बाद यह दृश्य मुझे बहुत ही मनोरम लग रहा था। अब हम एक बार फिर इँसानों के बीच थे जहाँ चारों तरफ घी की सुगंध महक रही थी। दीयों द्वारा अग्नि की लौ में परिवर्तित किया गया घी आत्माओं की शुद्धि के लिए पर्याप्त था। घी के चिराग जलने वाली कहावत मैंने सुनी थी। यहाँ तो एक-एक घर में कई-कई घी के चिराग जल रहे थे। त्योहारों के दिनों की पहचान साफ लग रही थी।

दीपावली जैसा समाँ था। बाजार में रंग लंग ने अस्सी रुपये में खच्चर बेच डाला। यह खच्चर उसने इतने का ही खरीदा था। बाजार के पीछे पत्थर के बने हुए बहुत से मकान थे। रंग लंग ने मुझे बताया कि यह बात बहुत गुप्त रखी गयी है कि देवी को उनके खजाने सहित कहीं दूर पहुँचाने का प्रयोजन चल रहा है। बात खुलने पर खुद वहाँ के वासी विरोध कर सकते थे। महान बड़ा लामा ही इस भेद को जानता था। इसलिए हमें हरचंद सावधानी से काम लेना था।

रंग लंग एक घंटे तक इधर-उधर घूमता रहातब कहीं जाकर उसे एक मकान में रहने के लिए कमरा मिला। उसने महान लामा को अपने आगमन का समाचार अभी तक नहीं दिया था। हम साधारण यात्रियों की तरह वहाँ ठहरे थे। कमरा अधिक छोटा नहीं था। वहाँ भी घी का दीया जल रहा था। हर जगह घी के चिरागों से वातावरण शुद्ध किया जा रहा था। कमरे में हमारे अलावा तीन और लोग भी थे–दो मर्द और एक औरत। तीनों बहुत मिलनसार और खुशदिल थे। इसलिए वहाँ मुझे अजनबियत का एहसास नहीं हुआ। यूँ लगता था जैसे मैं अपने ही देश में अपने ही कस्बे में आ गया हूँ।

वहाँ की भाषा तिब्बती भाषा से कुछ अलग थी। हालाँकि रास्ते में रंग लंग इस भाषा का ज्ञान कराता रहा। तिब्बत में बहुत सी मिली-जुली भाषायें बोली जाती थीं व उनके शब्द एक-दूसरे से मिलते थे। उच्चारण में थोड़ा फर्क आ जाता था। इसलिए रंग लंग ने तब तक के लिए मुझे गूँगा बना रहने का नाटक करवाया जब तक मैं उनकी भाषा न बोलने लगूँ।

कमरे में ठहरे हुए लोगों के लिए मैं गूँगा था जो देवी माता से अपनी गूँगी जुबान खुलवाने की मन्नत माँगने आया था। उन लोगों को जब यह मालूम हुआ तो पूरी सहानुभूति मुझे मिली। मुझे भूख लग रही थी। अतः कमरे में अपना सामान रखने के उपरान्त मैं रंग लंग के साथ बाहर निकल आया। हम दोनों ने एक छोटे से होटल में बैठकर मीठी रोटी और पनीर खाया। वहाँ दूध और घी की गंगा बह रही थी और भूख बहुत लगती। मैंने खाना खाया। एक मुद्दत बाद ऐसा खाना नसीब हुआ था जो घर की याद ताजा कर दे।

शराब और आलीशान होटलों का खाना खाकर तो मेरा मेदा ही खराब हो चला था। भूख भी कम लगा करती थी, परन्तु लम्बा अरसा बीत चुका था जबसे मुझे इन चीजों से निजात मिल चुकी थी और अब भूख खुलकर लगती थी।

हम बहुत खुशगवार थे। खाना खाकर मैं फिर से अपने आपको तंदुरुस्त महसूस करने लगा। सारी थकान मिट गयी थी। वहाँ का सबसे विशेष दर्शनीय स्थान वह जगह थी जहाँ बन्दर की सुनहरी प्रतिमा खड़ी रहती थी जो बन्दर का मकबरा कहलाता था। मेरे अनुरोध पर रंग लंग ने वह जगह मुझे दिखायी। चारों दीवारों पर तरह-तरह की तस्वीरें बनी हुई थीं। मैं करीब से उनका जायजा लेना चाहता था परन्तु वहाँ इतनी भीड़ थी कि मुझे अवसर न मिल सका।

इस पवित्र स्थल के बाहर एक लामा एक छोटी संदूकची उठाये खड़ा था जिसमें यात्री कुछ न कुछ दान-दक्षिणा डाल देते थे। जब हम बाहर निकले तो कस्बे की रोशनियाँ गुल होती जा रही थीं।

रात को मुझे अच्छी तरह नींद नहीं आयी। तरह-तरह के ख्यालात ने मुझे जकड़ रखा था। अगर कहीं उन लोगों को मालूम हो गया कि मैं उन आदमियों में से नहीं हूँ जिन्हें यहाँ बुलाया गया था तो मेरा क्या होगा ? यह सोच-सोचकर मैं बेचैन हो जाता था। मैं उन्हें धोखा दे रहा था परन्तु इसके सिवा चारा भी क्या था ? असलियत बताने पर हो सकता था रंग लंग मुझे वहाँ तक लाता ही नहीं। परन्तु मेरा ईमान, मेरा धर्म, मेरी सच्चाई मेरे साथ थी जो मेरा हौसला बढ़ाये रही थी। मैं किसी गलत इरादे से यहाँ नहीं आया था।

न जाने अब मोहिनी कहाँ थी, परन्तु अब मैं मोहिनी से दूर ही रहना चाहता था। उसी की वजह से मेरा जीवन जहन्नुम बना था। और यह सब प्रायश्चित था। अगर मैं सफल हो गया, एक धर्म की रक्षा चीनियों से कर सका तो जीवन सफल हो जायेगा। देशभक्तों की आत्मायें मुझे दुआएँ देंगी और फिर चाहे मेरा जो अँजाम होता, मुझे परवाह न थी। हो सकता था कि हिन्दुस्तान पहुँचते ही पुलिस मुझे गिरफ्तार करके फाँसी पर चढ़ा देती क्योंकि मैंने वहाँ बहुत जुल्म किये थे। कई खून मेरे सिर पर थे, परन्तु हर पापी को उसके अपराध की सजा मिलनी ही चाहिए और मैं हर सजा कबूल करने के लिए तैयार था।

❑❑❑
 
सुबह नाश्ता करने के बाद हमने मन्दिर के लिए पलायन किया। यह खानकाह का कपाट भी कहा जाता था। दर्रे का पहला कपाट यही था और बड़ा लामा इसी जगह रहता था। यह कपाट एक मन्दिर के रूप में था जो कस्बे के सबसे अंतिम छोर पर बना था। एक पहाड़ी पर स्थापित था और चट्टानों का सिलसिला उसके पीछे फैलता चला गया था। झील वहाँ सिमटकर एक नदी का रूप धारण कर लेती थी। बड़े लामा से मुलाकात होने के बाद ही कोई मिशन शुरू होना था। उसकी रूपरेखा अभी तक मुझे मालूम नहीं थी।

कपाट मन्दिर के बाहर भिक्षुओं के पहरेदार चौकस रहते थे और उस जगह भी एक लामा रक्षक खड़ा था जहाँ से सीढ़ियाँ शुरू होती थीं। यह लामा सीढ़ियाँ चढ़ने वाले प्रत्येक व्यक्ति को गौर से देख रहा था। हम सीढ़ियाँ चढ़ते हुए मन्दिर में पहुँच गये। बहुत से लोग आ-जा रहे थे। अन्दर बहुत से कमरे थे और हर तरफ यात्रियों की भीड़ नजर आ रही थी। हर तरफ देवी-देवताओं की छोटी-बड़ी मूर्तियाँ नजर आ रही थीं।

एक बहुत बड़े कमरे में बहुत सी भिक्षुणियाँ कतार में बैठी श्लोक पढ़ रही थीं। रंग लंग बहुत खुश था कि हम ठीक त्यौहार के समय यहाँ पहुँचे थे, परन्तु उस दिन बड़े लामा से हमारी भेंट न हो पायी। लामा त्यौहार के पूजा-पाठ में व्यस्त था। फिर भी रंग लंग उस तक संदेश पहुँचाने में सफल हो गया था। अब बड़े लामा की जब इच्छा होती हमें बुलाता। मेरा अनुमान था कि वह तपाक से हमें बुलाकर हमारा स्वागत करेगा, परन्तु उसका रूखा व्यवहार देखकर मुझे हैरत हुई कि उसने अगले सात रोज तक हमारी खैर-खबर नहीं ली। कोई हमें पूछने नहीं आया।

रंग लंग तो त्यौहार में सातों दिन सैर-सपाटे में व्यस्त रहा। इस सिलसिले में उसे कुछ चिंता नहीं थी। उसका कर्त्तव्य तो शायद पूरा हो गया था। आगे बड़ा लामा जाने और उसका काम जाने। फिक्र तो मुझे थी कि वह क्यों मुझे नजरन्दाज किये हुए है ? अब तक उसने मुझसे सम्पर्क क्यों नहीं किया ? कहीं ऐसा तो नहीं कि वह मेरी असलियत जान गया हो और इसीलिए मुझसे मिलना ही न चाहता हो ?

यात्रियों को चाय मुफ्त बाँटी जाती थी और मैं उन यात्रियों में घूमता-घामता रहता था। रंग लंग मुझे तिब्बती यात्रियों में छोड़कर इधर-उधर निकल जाता और देर तक वापस न लौटता। चूँकि मैं गूँगा बना हुआ था इसलिए बहुत सी मुश्किलों से बचा हुआ था। मैं अब तक अपना वक्त जाया नहीं करना चाहता था। मुझे मालूम था कि बड़े त्यौहार के दिन कपाट खुलेंगे और उसी दिन बन्द भी हो जायेंगे। फिर देवी माता की खानकाह में अगले त्यौहार तक कोई नहीं जा सकता। वही दिन मेरे लिए सबसे महत्वपूर्ण था और उसी दिन मैं हर सूरत, हर कीमत पर खानकाह में प्रविष्ट होना चाहता था।

कहीं ऐसा न हो लामा उस दिन तक मुझे नजरन्दाज कर रहे और कपाट बन्द होते ही वह मेरी खबर लेना चाहता हो। उसकी पूरी-पूरी सम्भावना अब मुझे नजर आ रही थी। शायद उसकी नजरें धोखा नहीं खा सकती थीं। मुझे यूँ लग रहा था कि बड़े लामा से मेरी असलियत छुपी नहीं थी।

याम दरंग के वातावरण की मैं काफी हद तक जानकारी पा रहा था। यह मेरे लिए आवश्यक था। मुझे उसका भौगोलिक ज्ञान भी होना चाहिए था। अब मैं बड़ी सावधानी के साथ तमाम हालात का जायजा ले रहा था। मुझे मालूम हो चुका था कि साल भर में वह एक ही दिन होता है जब सारे कपाट खुल जाते हैं और कोई भी यात्री वहाँ प्रविष्ट हो सकता था। और मैं यह अवसर नहीं खोना चाहता था।

❑❑❑
 
त्यौहार का वह बड़ा दिन भी आ गया। वह अन्तिम दिन था। महान भिक्षुण देवी माता के दर्शन होने वाले थे। उसके बाद वह अपने पति बन्दर के पास जाती थी जिसका शरीर खानकाह में कहीं है। वहाँ से अपने मानने वालों के लिए आशीर्वाद लेकर आती थी। उसी दिन मैं रंग लंग के साथ सुबह सवेरे खानकाह के कपाट मन्दिर के पास पहुँच गया। लोग वहाँ जमा होते जा रहे थे और धीरे-धीरे सैकड़ों लोग वहाँ एकत्रित हो गये थे।

मैं रंग लंग के साथ सबसे ऊपर वाली सीढ़ी पर था और खानकाह में प्रविष्ट होने के लिए तैयार था। यह दिन मेरे लिए आखिरी दिन था। अब मुझे पूरा शक हो गया था कि बड़ा लामा मुझे खानकाह में नहीं जाने देना चाहता था। शायद वह त्यौहार को शांतिपूर्वक निपटाकर ही मुझसे निपटना चाहता था। सब लोग खामोशी के साथ कपाट खुलने की प्रतीक्षा कर रहे थे। वे सभी देवी माता को मानने वाले भक्त थे।

कुछ देर बाद एक बड़ा कपाट खुलता दिखायी दिया और साथ ही मन्दिर के सारे कपाट खुलते चले गये। एक कपाट से जो बीच में था एक लम्बा-तड़ंगा बूढ़ा लामा बाहर आया। मुझे रंग लंग ने संकेत से बताया कि यही बड़ा लामा है। बड़े लामा ने एक दूसरे कपाट के पास पहुँचकर श्लोक पढ़ने शुरू कर दिए। वह बड़ा कपाट खानकाह का पहला कपाट था। नीचे खड़े लोग उसकी आवाज में आवाज मिला रहे थे। फिर वह धीरे-धीरे नीचे उतरने लगा। उसके पीछे भिक्षुओं की कतारें थीं जो मन्दिर के विभिन्न दरवाजों से बाहर आयी थीं। आगे वाले बीस भिक्षुओं ने गेरुए की बजाय हरे रंग का लिबास पहन रखा था और उनके सिरों पर सुनहरे रंग की टोपियाँ रखी थीं।

उनके बाद तो कतारों की सँख्या बढ़ती ही चली गयी। यह दिखायी देना बन्द हो गया कि भिक्षुणियाँ किस कपाट से बाहर आ रही हैं। जब वे हुजूम के सामने से गुजरने लगीं तो सब लोग उनके सामने नतमस्तक होने लगे। उनके बाद केवल चालीस भिक्षुणियाँ कपाट से बाहर आईं और धीरे-धीरे सीढ़ियों से नीचे उतरने लगीं।

फिर एक बहुत मोटी औरत प्रकट हुई जो हरे रंग का एक खूबसूरत लिबास पहने हुई थी। उसके पीछे-पीछे आठ भिक्षु एक खुली पालकी उठाये कपाट से बाहर आये। पालकी में महान भिक्षुण आलथी-पालथी मारे बैठी थी। हर तरफ गहरी खामोशी छा गयी। लोगों ने दम साध लिए।

महान भिक्षुण के चेहरे पर एक नकली चेहरा चढ़ा हुआ था। यह खौफनाक चेहरा सुनहरे रंग का था। कान लम्बे और पीछे की तरफ मुड़े हुए थे। मुँह सुर्ख था और आँखों के ऊपर हरे रंग के जवाहरात चमक रहे थे। पालकी जब सीढ़ियों से नीचे उतरने लगी तो लोग नतमस्तक हो गये। जब पालकी हुजूम में से गुजरती हुई आगे निकल गयी तो वातावरण लोगों के कहकहों से गूँज उठा। लोग बहुत खुश थे। त्यौहार समाप्त हो गया था और महान भिक्षुण अपने पति बन्दर के पास जा चुकी थी।

और फिर भिक्षुओं ने खानकाह के प्रथम कपाट के भीतर देवी माता की प्रथम चरण पादुका स्थल तक जाने की अनुमति दे दी। आम आदमी वहाँ तक जा सकता था। इससे आगे देवी माता ही जा सकती थी।

कपाट के सामने एक भिक्षु बैठा था। वह प्रत्येक व्यक्ति से उसका नाम पूछता और रजिस्टर में लिखने के बाद उसे अन्दर जाने देता। अन्दर भी भिक्षु मौजूद थे जो शायद लोगों की निगरानी के लिए रखे गये थे।

जब रंग लंग ने मेरा नाम भी बताया तो भिक्षु पलकें झपकाने लगा। उसकी तेज नजर मुझ पर ठहर गयीं।

“क्या नाम बताया तुमने ?” उसने आश्चर्यचकित स्वर में पूछा।

“मानोस।” रंग लंग ने वही उच्चारण किया।

“मानोस!” भिक्षु ने आँखें मुझ पर स्थिर कर दीं। “मानोसंग!” उसके मुँह से निकला। उसके होंठ बड़बड़ाने के अन्दाज में हिल रहे थे। वह रजिस्टर में नाम लिखना भूल गया था। और फिर वह एक झटके से उठ खड़ा हुआ। रजिस्टर उसके हाथ से छूटकर नीचे गिर गया और उसकी आँखों से शोले बरसने लगे।

“कहाँ से आया है ये शैतान ?” वह चिल्लाया।

लोग एकदम ठिठककर मुझे देखने लगे। भिक्षु की उँगली मेरी तरफ उठी थी।

“मानोसंग! मानोसंग!” वह पागलों की तरह चिल्लाया।

दूसरे भिक्षु उसके करीब लपकते चले आये। मैं समझ गया कि मैं फिर मुसीबत में फँस गया हूँ। सब मानोसंग से नफरत करते थे। अब तक मैं सिरे से गूँगा बना हुआ था।

अब मैं तिब्बती जुबान में चीखा–“मेरा नाम मानोसंग नहीं है। राज ठाकुर है। तुम्हें गलतफहमी हुई है।”

लेकिन तब तक मानोसंग का नाम हर व्यक्ति की जुबान पर गूँजने लगा। बेचारा रंग लंग हक्का-बक्का रह गया। उसकी समझ में ही नहीं आया कि यह हुआ क्या। वह तो बस तमाशबीन बनकर रह गया था। अब हर व्यक्ति मुट्ठियाँ भींचे हुए दाँत पीसते हुए मेरी तरफ बढ़ रहा था। इतने बड़े हुजूम से बचकर निकल जाना असम्भव बात थी।

देखते-देखते मैं बहुत बड़े हुजूम के गोल में घिर गया। मैं उन लोगों को कुछ समझाना चाहता था। अपनी बात कहना चाहता था, परन्तु मेरी आवाज

नक्कारखाने में तूती की तरह थी।

मैंने वहाँ से भागना चाहा। कहीं वे लोग आनन-फानन में मेरी पसलियाँ ही बराबर न कर दें और उनका सुरमा बनाकर अपनी आँखों में न डाल लें। उन्होंने मेरा इरादा भाँप लिया।और फिर सबके सब वहशी भेड़ियों की तरह मुझ पर पिल पड़े।

❑❑❑

जब मुझे होश आया तो मैंने देखा कि मैं एक पत्थर के बने कमरे में कैद हूँ। कमरे की दीवारें तंग थीं। कोई सुराख भी खुला हुआ नजर नहीं आता था।

मैंने उठना चाहा परन्तु मेरी चीख निकल गयी। मेरा पूरा शरीर फोड़े की मानिंद दुख रहा था। न जाने बेहोशी के बाद भी उन्होंने मुझे कितना मारा था। जोड़-जोड़ दुख रहा था। बदन पर बेशुमार खराशें और नील पड़ गये थे। यही गनीमत थी कि मैं जिंदा था। वरना जिस वहशियाना अन्दाज में मेरी पिटाई हुई थी, उससे बचकर जिंदा रहना मेरा भाग्य ही था। यह भाग्य जो कई बार ऐसे अवसरों पर मेरा साथ देता रहा था।

कदाचित मेरी देह इतनी सख्तजान थी कि कभी-कभी यूँ लगता कि इस दुनियाँ में कुँवर राज ठाकुर को जान से मार देने वाला कभी पैदा ही नहीं हुआ। मैं चुपचाप पड़ा कराहता रहा।

फिर दरवाजे के करीब किसी के कदमों की आहट सुनायी दी और एक खिड़की सी खुली। किसी ने अन्दर झाँककर देखा। उसने अपनी जुबान में मुझसे कुछ कहा जो मेरे पल्ले नहीं पड़ा। थक-हार कर वह व्यक्ति वापस चला गया।

रंग लंग भी निश्चय ही उन लोगों के हत्थे चढ़ गया था। भले ही वह यहाँ का गाइड था और एक बड़ी जिम्मेदारी का काम उसे सौंपा गया था, परन्तु उससे गलती हुई थी। वह सही आदमी को अपने साथ न लाकर मानोसंग को ले आया था। वे लोग इस गलती की सजा उसे जरूर देते।

मेरी समझ में एक बात नहीं आती। अगर मैं गलत आदमी था भी तो बिना पूछताछ किये या बड़े लामा के हुक्म के बिना ही उन्होंने मुझ पर हाथ क्यों उठाया था ? इसका उनके पास प्रमाण ही क्या था कि मैं सही आदमी नहीं हूँ ? उन्होंने मेरी एक भी नहीं सुनी थी। आखिर क्यों ? यह सोचते-सोचते मेरा सिर चकराने लगा और मैं एक बार फिर बेहोश हो गया।

दोबारा मेरी आँख खुली तो मैंने देखा कि मैं एक बिस्तर पर हूँ और मेरे सामने वह बूढ़ा लामा बैठा है जो बड़ा लामा कहा जाता था। उसे अपने सामने देखकर मैंने कुछ राहत की साँस ली। शायद उन्हें अपनी गलती का आभास हो गया है।

“मैं बड़ा लामा रामन हूँ। इस खानकाह का महान भिक्षु।” उसने मुस्कुराते हुए मुझे अपना परिचय दिया। “तुम्हारा नाम क्या है ?”

वह साफ तिब्बती भाषा में बोल रहा था। मैंने तुरन्त कोई उत्तर नहीं दिया।
 
“तुम्हें गूँगा बने रहने की अब कोई जरूरत नहीं मानोस। हम जानते हैं कि तुम हमारी जुबान बोल सकते हो।” महान भिक्षु का स्वर कुछ सख्त हो गया।

“अब तुम जानते ही हो तो मेरा नाम क्यों पूछते हो ?” मैंने धड़कते दिल से कहा। “क्या रंग लंग ने तुम्हें सब कुछ नहीं बताया ? तुमने उसका भी यही हाल बनाया होगा ?”

“नहीं...वह ठीक है! हाँ, थोड़ी बहुत चोटें आयी हैं। वह भी तुम्हें बचाने के चक्कर में पिटा है। लेकिन अगर तुम अपनी जुबान खोलने को तैयार हो जाओ तो हम बाद में तुम्हारी उससे मुलाकात करा सकते हैं।”

“किस तरह का मुँह खुलवाना चाहते हो ?”

“यह कि तुम कौन हो, कहाँ से आये हो ?”

“खुद...रंग लंग ने बताया।”

“रंग लंग पर भी संदेह किया जा रहा है। वह हमारे दुश्मनों से भी मिल सकता है।”

“तो मैं तुम्हें अपना दुश्मन लगता हूँ ?”

“यही तो हमें जानना है।”

“तुम्हें धोखा हुआ है। मैं उन पाँच आदमियों में से एक हूँ जो रंग लंग के साथ यहाँ आने वाले थे। क्या ऐसा नहीं था ?”

“अवश्य था...परन्तु तुम उन पाँचों में से नहीं हो।” बूढ़े लामा ने कहा।

“इस तरह बिना किसी प्रमाण के तुम किस तरह कहते हो ? रंग लंग को बुलाओ। अब मैं उसके सामने ही बातचीत करूँगा। उसने तो कहा था कि बड़ा लामा हमारा स्वागत करेगा और फिर हम कोई महत्वपूर्ण काम अँजाम देंगे।”

“यह अपनी जगह सच था और मैं अब भी उन पाँच आदमियों की प्रतीक्षा कर रहा हूँ। सिर्फ मुझे ही उसकी जानकारी है। लेकिन यह भी अपनी जगह अटल सत्य है कि तुम उनमें से नहीं हो।”

“तो फिर ठीक है, जब तुम मेरी बात पर विश्वास ही नहीं करते तो मैं क्या कर सकता हूँ। मुझे छोड़ दो और मैं वापस चला जाऊँगा।”

“हम प्रमाणित करेंगे कि तुम वह नहीं हो जो बताते हो। और अगर एक बार यह साबित हो गया तो फिर तुम अपनी आजादी का सपना देखने योग्य भी नहीं रहोगे। हाँ, साफ-साफ खुद ही बता दो तो कुछ सोचा जा सकता है।”

मैंने अब रंग लंग की रट लगानी शुरू कर दी। उसकी किसी बात का उत्तर नहीं दिया और वह उठकर चला गया।

बाद में एक औरत मेरे लिए खाना लेकर आयी परन्तु मैंने खाने को हाथ तक नहीं लगाया। थोड़ी देर बाद एक और लामा मेरे पास आया। वह कुछ परेशान सा दिखायी दे रहा था।

“तुमने खाना नहीं खाया ?” उसने आते ही मुझसे पूछा।

“रंग लंग...!” मैंने फिर रंग लंग के नाम की माला जपनी शुरू कर दी और लामा मायूस होकर वापस चला गया।

उसके जाने के कुछ देर बाद फिर महान भिक्षु मेरे पास आया।

“अपनी यह हरकत बन्द करो।” उसने कहा। “अगर तुम खुद अपनी जुबान नहीं खोलोगे तो हम तुम्हारी कोई मदद नहीं करेंगे। यह तो सच्चाई है कि तुम उन पाँचों में नहीं हो। खाना खाओ और मुझे बताओ कि तुम क्या चाहते हो ?”

“रंग लंग।” मैंने जवाब दिया।

रामन पाँव पटकता हुआ वापस चला गया। थोड़ी देर बाद वह दूसरे भिक्षुओं के साथ वापस आया जो एक स्ट्रेचर उठाये हुए थे।

स्ट्रेचर पर रंग लंग पड़ा हुआ था। उसका चेहरा बुरी तरह सूजा हुआ था। उसकी यह हालत देखकर मेरा खून खौल गया। पता चला था अपने भिक्षुओं के नाम पर ऊपर पताका फहराने पर कितने कष्ट इसने झेले थे जिसका सिला उसे यह मिला।

“साहब!” वह रोते हुए बोला। “इन्होने मुझे बहुत मारा।”

“क्यों मारा तुमने इसे ?” मैं चीख पड़ा। “ऐसा ही सलूक करते हो तुम अपने वफादार आदमियों के साथ ?”

“साहब, मैंने बहुत कहा कि आप कोई दुश्मन नहीं हैं! मेहमानों में से हैं, लेकिन मेरी कोई सुनने वाला नहीं। बताइए साहब क्या आप वह नहीं हैं जिस रूप में मैं आपको जानता हूँ ?”

“नहीं रंग लंग, मेरा अब एक ही रूप है। और तुम वह पहले शख्स हो जिसने मुझे सही रूप में जाना है। मैं बहरूपिया नहीं हूँ।” रंग लंग की यह हालत देखकर मेरा गला भर आया। मेरी वजह से उस पर यह जुल्म तोड़े गये।

“अगर तुम ही हमें सारी बातें उगल देते तो इसकी जरूरत न पड़ती। लेकिन इस मूर्ख ने हमारे साथ या तो जानबूझकर गद्दारी की है; या यह तुम्हारे फरेब से धोखा खा गया। और दोनों की सजा हमारे यहाँ एक ही है।”

मेरा दिल चाहा कि उठकर उस लामा के चेहरे पर पूरी शक्ति से एक मुक्का जड़ दूँ, लेकिन मैं हरकत तक न कर सकता था। बस तिलमिला कर रह गया।और फिर मेरी आँखों के सामने स्याह धब्बे नाचने लगे और मेरी आँखें ख़ुद-ब-ख़ुद बन्द होती चली गयीं।

जब मेरी आँखें खुलीं तो वह जा चुके थे। कुछ देर बाद एक लड़की मेरे लिए चाय लेकर आयी और उलटे पाँव वापस चली गयी। कुछ देर बाद ही महान भिक्षु मेरे सामने मौजूद था।

“तुम क्या समझते हो कि हम इतने मूर्ख है कि हर आदमी पर यकीन कर लें ? क्या हमें आने वाले पाँचों मेहमानों की पहचान का कोई तरीका न आता होगा ? आज शाम को तुम्हें एक ऐसे आदमी से मिलाऊँगा जो पाँचों में से एक था। वह किस तरह रास्ता भटकता हुआ हमारे हाथ लगा वह कहानी बड़ी दर्दनाक है। बहुत जख्मी हालत में वह यहाँ आया था और वह अब तक बीमार है।”

लामा की इस नयी खबर से मैं चौंक पड़ा।

“और इसके अलावा हमारे पास उन पाँचों आदमियों की तस्वीरें पहले ही पहुँचा दी गयी थीं जो यहाँ पहुँचने वाले थे। उनका एक कमांडर नियुक्त किया गया था और वह दुर्भाग्य से रास्ते ही में मर खप गया। परन्तु उसका साथी हम तक पहुँचने में सफल हो गया। वे लोग गाप सोंग की तरफ इसलिए नहीं गये थे कि वहाँ उन्हें खबर मिल चुकी थी कि उनके तीन साथी पकड़े जा चुके हैं और गाप सोंग में खतरा हो सकता है। अगर उन तीनों में से किसी का भी मुँह खुल जाता तो रंग लंग की साथ-साथ वे दोनों भी पकड़े जाते। परन्तु उन दोनों ने बड़ी सूझ-बूझ से काम लिया और रंग लंग की सहायता के बगैर ही याम दरंग के लिए चल पड़े। जब शाम को वह आदमी तुम्हारे सामने लाया जाएगा तो तुम्हारा क्या जवाब होगा ?”

लामा झूठ नहीं बोलते। यह मैं जानता था। और उसकी सच्चाई में कोई खोट नहीं था। अब मेरा अपने आपको छिपाकर रखना खतरे से खाली न था। मैं किसी बुरे इरादे से तो यहाँ आया ही न था। मैं सच्चाई और धर्म के रास्ते पर चल रहा था। फिर मुझे डर काहे का ?

“तुम तीन दिन से इस कमरे में हो।” उसका स्वर नरम हो गया। “हमारे लोगों ने तुमसे जो व्यवहार किया उसके लिए मैं शर्मिंदा हूँ। उन्हें ऐसा नहीं करना चाहिए था। बहरहाल अब यह जानना चाहते हैं कि तुम कौन हो ? जब तक तुम नहीं बताओगे वह अपने घरों को वापस नहीं जायेंगे। उन्हें बस इतना मालूम है कि तुम्हारा नाम मानोस है और वे मानोस और मानोसंग को एक ही नाम समझते हैं। यहाँ बहुत पहले ही यह भविष्यवाणी हो चुकी थी कि मानोसंग इसी शताब्दी में यहाँ आएगा। वह इस नाम से ही नफरत करते हैं। अब वे जानना चाहते हैं कि क्या तुम वही शख्स हो जिसके लिए भविष्यवाणी की गयी थी ?”

“अगर मैं वही शख्स हूँ तो मुझे इसका ज्ञान किस तरह हो सकता है ?” मैंने कहा। “और सदियों पहले मर चुका मानोसंग किस तरह दोबारा यहाँ आ सकता है ?”
 
“हम पुनर्जन्म को मानते हैं। लेकिन अगर तुम वह नहीं हो तो फिर यह भी तो जानना हमारे लिए आवश्यक है कि तुम कौन हो ? यहाँ क्यों आये हो ? क्यों रंग लंग ने तुम्हारी वजह से हमारे साथ गद्दारी की ? यह बिच्छू के डंक की तरह चुभने वाले सवाल हैं।”

“रंग लंग गद्दार नहीं है और उस जैसा वफादार आदमी इस दुनियाँ में मिलना भी मुश्किल है।”

“तो फिर तुमने उसे किस तरह अपने फरेब में लिया ?”

अब लामा से कुछ भी छिपाना बेकार था। मैंने दास्तान वहाँ से शुरू की जहाँ से मैं चीनी कैम्प में कैद हो गया था और तीन बन्दी पहले से वहाँ मौजूद थे।

लामा ध्यानपूर्वक मेरी दास्तान सुनता रहा। शायद वह मेरे दिल की गहराइयों में झाँककर मेरी बातों की सच्चाई का पता लगाना चाहता था। और जब मैंने बात समाप्त की तो वह कुछ संतुष्ट नजर आने लगा।

“तो तुमने रंग लंग से झूठ क्यों बोला ?”

“क्योंकि अगर सच बोलता तो वह हरगिज मुझे यहाँ तक न लाता।”

“और हम यह किस तरह विश्वास करें कि उन लोगों ने जिस काम को अधूरा छोड़कर तुम्हारे सामने दम तोड़ा था तुम उसे पूरा करने का इरादा रखते हो ?”

“न करो विश्वास। जो मेरे साथ बीती मैंने सुना डाली। विश्वास नहीं करते तो मुझे वापस जाने दो। मैं फिर कभी इस तरफ आने का नाम न लूँगा और लोगों को बताऊँगा कि धर्म और सच्चाई मर चुकी है। लामा भी इसके पालनकर्ता नहीं रहे। मैंने तो सुना था कि महान लामाओं के सामने कोई मनुष्य झूठ नहीं बोल सकता। उसका झूठ छिप भी नहीं सकता।”

लामा कुछ देर तक चुप रहा। शायद वह मन ही मन मुझे टटोल रहा था।

“अच्छा एक बात और...।” अंत में उसने खामोशी तोड़ी।

“वह भी पूछ डालो।”

“तुम्हें चीनियों ने क्यों कैद कर रखा था ? देखो, अगर तुमने सच्चाई की बात की है तो सच ही बताना।”

“वे समझते थे कि मैं याम दरंग की खानकाह का रास्ता जानता हूँ।”

लामा मुस्कुराने लगा।

“इसकी वजह ?”

“वजह...।” मैंने गहरी साँस खींची। “वजह बताने के लिए तो मुझे बहुत लम्बी कहानी सुनानी पड़ेगी और शायद तुम्हें मेरी उस कहानी पर विश्वास भी न होगा।”

“हम सच्ची बात पर हमेशा विश्वास कर लेते हैं। और अगर तुम न भी बताओ तो हम तुम्हारे बारे में जन्म से अब तक की हर बात जान लेंगे। लेकिन मैं तुम्हारे मुँह से ही सुनना चाहता हूँ।”

“अच्छा तो यह बताओ क्या तुमने कभी ऐसी धरती का नाम सुना है जो तिब्बत के किसी भू-भाग में है और जहाँ मोहिनी देवी की पूजा होती है ?”

वह चौंका। मुझे गौर से देखने लगा, फिर पहलू बदलकर कहा–“तुम्हारा उस धरती से क्या वास्ता ?”

“मेरा वास्ता उसी से है।”

“लेकिन वह धरती तो तबाह हो चुकी है। उसका समय सम्पूर्ण हो चुका था।”

“हाँ! वह धरती तबाह हो चुकी है और मेरी आँखों के सामने ही तबाह हुई है।”

“ओह! तुम कोई साधारण व्यक्ति नहीं हो सकते। शाकिया मनी उन लोगों को क्षमा करें जिन्होंने तुम पर हाथ उठाया था। मैं अब तुम्हारी सारी कहानी सुनने के लिए आतुर हूँ। मुझे विश्वास है कि तुम सच ही कह रहे हो।”

मैंने अपनी आपबीती लामा को सुनानी शुरू कर दी जो कि मैं उसे संक्षेप में सुनाता जा रहा था। क्योंकि अगर मैं एक-एक घटना का जिक्र सुनाता तो कई दिन लग जाते और मेरी दास्तान समाप्त होने को न आती।

जब मेरी दास्तान समाप्त हुई तो वृद्ध लामा थका-थका सा उठा और मुझसे कुछ कहे बिना बाहर चला गया।

❑❑❑
 
अगले दिन वृद्ध लामा फिर उपस्थित हुआ। उसके हाथों में एक संदूक था। उसने संदूक मेरे सामने रखकर खोल दिया। उसने संदूक में से तीन कोट, तीन चाकू, तीन अंगूठियाँ और तीन टोपियाँ निकालीं। यह सब उसने बिस्तर पर रख दिया। मैं मूक बना आश्चर्य से उसकी कार्रवाई देखता रहा। फिर लामा ने मेरी तरफ देखते हुए कहा–“तुम इन चीजों को पहचानते हो ?”

“नहीं!” मैंने उत्तर दिया। “यह चीजें उन तीनों की नहीं हैं जो मेरे सामने थे।”

“क्या तुमने यह चीजें पहले कभी नहीं देखीं ?” रामन ने एक-एक शब्द पर जोर देते हुए पूछा।

“कभी नहीं।”

“अच्छा यह बताओ कि तुम्हें इनमें से कौन सा कोट अधिक पसन्द आया ?” रामन का प्रश्न बड़ा अजीब था।

अब मैंने उस सामान को गौर से देखा। उनमें से एक कोट तिब्बती था, एक हिन्दुस्तानी और सबसे खूबसूरत कोट चीनी कोट था। सवाल पसन्द का था, सो मैंने चीनी कोट की ओर संकेत किया–“यह...।”

“क्यों ?” उसने प्रश्नवाचक दृष्टि से मुझे घूरा।

“इसलिए कि यह सबसे खूबसूरत है। लेकिन इसका मतलब यह हरगिज नहीं कि मैं इसे पहचानता हूँ।”

रामन ने मेरी बात को नजरन्दाज करते हुए कहा–“अच्छा, मैं चाहता हूँ कि तुम बाकी सामान में से एक चाकू, एक टोपी और एक अंगूठी भी पसन्द कर लो।”

मैं मूर्खों की तरह उसकी तरफ देखता रहा। मेरी समझ में नहीं आया कि वह मेरी पसंद-नापसंद का इम्तिहान क्यों ले रहा है ? चूँकि उनमें एक कोट चीनी था, इसलिए अचानक ही एक विचार मेरे मष्तिष्क में कौंध गया और मैं मामले की तह तक पहुँच गया। क्योंकि इस बीच मुझे यहाँ के बारे में अधिकांश जानकारियाँ प्राप्त हो चुकी थीं।

“क्या तुम इन तरकीब द्वारा यह मालूम करना चाहते हो कि मैं मानोसंग का दूसरा जन्म हूँ या नहीं ?”

महान भिक्षु टकटकी लगाकर मेरी तरफ देखता रहा। फिर उसने गहरी साँस लेते हुए पूछा–“क्या तुमने खुद को कभी ऐसा महसूस किया है ?”

“नहीं...कभी नहीं!” मैंने इनकार में सिर हिलाया। “और सच्चाई तो यह है कि मैं ऐसी बातों पर विश्वास भी नहीं करता।”

“परन्तु तुमने यह किस तरह यकीन कर लिया था कि तुम्हारा एक जन्म मिस्र में भी हुआ था ?”

“मैंने उस पर भी विश्वास नहीं किया था। वह तो मोहिनी का जादू था जो मेरे सिर पर चढ़कर बोलता था।”

“अच्छा! अब इनमें से एक-एक चीज का चयन कर लो।”

“अगर तुम्हारी यही इच्छा है तो अवश्य करूँगा।”

मैंने बिस्तर पर पड़ी चीजों को देखा। अब वह मेरी परीक्षा ले ही रहा था तो मैं भी उसे चकरा देने वाली हरकत करना चाहता था। मैंने पसंद-नापसंद को ताक पर रखकर बेदिली से एक हिन्दुस्तानी चाकू, एक चीनी अंगूठी और एक तिब्बती टोपी उठा ली। उसका ख्याल रहा होगा कि मैं तीनों ही चीनी चीजें उठाऊँगा।

फिर मैंने मुस्कुराकर कहा–“क्या मैंने गलत चीजों का चयन किया है ?”

रामन मुझे देखकर मुस्कुराया, जैसे मेरी यह हरकत उसे बचकाना लगी हो। फिर वह गंभीर स्वर में बोला–“नहीं...!” उसने एक गहरी साँस ली।“मुश्किल तो यह है कि तुमने सही चीजों का चयन किया है।”

यह कहते हुए वह उठा और मुझे आश्चर्य के सागर में गोता लगाता तेजी से बाहर निकल गया। अब अगर उसने यह फैसला कर लिया था कि मैं चीनी लुटेरे मानोसंग का दूसरा जन्म हूँ तो तय बात थी कि मुझे शैतान मान लिया जाएगा। इसी वजह से तो उन लोगों ने पूरी गर्मजोशी से मेरा स्वागत किया था।

भविष्यवाणी यह थी कि पहले जन्म में तो मैं खाली हाथ मलता यही मकबरा बनाकर स्वर्ग सिधार गया था और शैतान के मकबरे में मेरा पार्थिव शरीर सो रहा था। परन्तु इस जन्म में मैं यहाँ की काया पलटकर जाता और वह सारा खजाना मेरे साथ ही जाता। परेशानी इसी बात की थी अगर उन्होंने भविष्यवाणी को सच मान कर मुझे मानोसंग मान लिया तो मेरी क्या गत बनती। यूँ भी मैं खजाना ले जाने के उद्देश्य से ही आया था। भले ही यह काम मैं उन्हीं लोगों के हित के लिए कर रहा था।

रात को मैं अच्छी तरह सो न सका। सुबह उठा तो मेरा सिर भारी था। उनका व्यवहार अभी तक तो मेरे प्रति रूखा ही था, परन्तु मैंने भूख हड़ताल त्याग दी थी। सुबह होते ही नाश्ता आ गया।

नाश्ते के बाद एक नौजवान व्यक्ति मेरे कमरे प्रविष्ट हुआ।

“मेरा नाम गान जंग है।” उसने अपना परिचय अंग्रेजी में दिया। “और मुझे तुमसे मिलकर बड़ी प्रसन्नता हुई।”

उसने अपना हाथ मेरी तरफ दोस्ती के अन्दाज में बढ़ाया। मैंने हाथ मिलाया और प्रश्नवाचक दृष्टि से उसे देखने लगा। वह पहला ऐसा व्यक्ति था जो बड़ी अच्छी अंग्रेजी बोल लेता था। इसी से पता चलता था कि वह काफी शिक्षित है।

“मैंने हिन्दुस्तान में शिक्षा प्राप्त की है।” उसने अंग्रेजी में ही कहा। “महान भिक्षु ने मुझे भेजा है कि मैं तुमसे चंद प्रश्न करूँ।”

“अभी मेरी बारी नहीं आयी है। जब आएगी तो एक से हजार-हजार सवाल पूछूँगा।” मैंने कुछ चिड़चिड़े स्वर में झुंझलाते हुए कहा।

वह कुछ चकरा सा गया, फिर हँस पड़ा।

“हो सकता है...लेकिन पहले तुम्हें मेरे सवालों का जवाब देना होगा।” गान जंग ने लापरवाही से कहा। “राज ठाकुर! तुम्हारा सम्बंध किस शहर से है और हिन्दुस्तान में तुम किस वंश या जाति से पैदा हुए हो ?”

“मुझे याद नहीं रहा।” मैंने भी लापरवाही से कहा। “मेरा सम्बंध किसी खास शहर से नहीं है और न मैं किसी जाति विशेष से ताल्लुक रखता हूँ। इँसानियत को अपनी जाति और धर्म समझता हूँ।”

“बहुत अच्छा जवाब है।”

“तुम अपने बारे में बताओ। तुम्हारा सम्बंध आदमियों के किस खेड़ से है ?”

“मैं ड्यूक ऑफ होजोगा हूँ और याम दरंग होजो का एक छोटा सा कस्बा है...समझे ? दरअसल लोगों का ख्याल है कि तुम मानोसंग हो, जिसे वे बिल्कुल पसन्द नहीं करते, परन्तु यहाँ सारा कानून होजो का चलता है...क्या ख्याल है ?”

“ख्याल बुरा नहीं...अपनी जिन्दगी में मैंने बहुत से ड्यूक और लार्डों से रसूख हासिल किया है, जो मेरा दम भरते रहे हैं। वक्त-वक्त की बात है, वरना तो मुझ पर किसी ड्यूक का कानून नहीं चला करता।”

“तुम बड़े दिलेर आदमी मालूम पड़ते हो।”

“अब मैं किसी को अपनी बात कैसे समझाऊँ ? अगर तुम पढ़े-लिखे हो तो समझ सकते हो। इस बीसवीं शताब्दी में कौन ऐसी बेवकूफी भरी बातों को पसन्द करेगा ? मैं हजार बार लानत भेजता हूँ मानोसंग पर। अगर वह शैतान था, तो रहा होगा। इसमें मेरा क्या दोष है ? मैं तो आदमी की जात से वास्ता रखता हूँ। तुम अंग्रेजी जानते हो तो हिन्दी भी जानते होगे ? हिन्दुस्तान में रहे हो। अब भला बताओ कि अगर कोई मेरे नाम का उच्चारण ‘मानोस’ बनाते-बनाते मानोसंग बना दे, तो मैं किसका सिर फोडूंगा ? अपना या इन लोगों का ? हिन्दुस्तान में तुम्हें हजारों राज मिल जायेंगे। फिर क्या सभी मानोसंग हैं ?”

ड्यूक कुछ नरम पड़ गया। वह तो मेरी मजबूरी समझ रहा था।

“बात सिर्फ इतनी सी नहीं...।” वह नर्म लहजे में बोला। “माना कि हिन्दुस्तान में हजारों राज होंगे, पर तुम अकेले और पहले राज हो जो यहाँ आए हो। इसके अलावा सबसे महत्वपूर्ण बात तो यह कि तुम्हारा आगमन ठीक बताये गये समय पर हुआ है। पुरोहितों की भविष्यवाणी के ठीक वक्त पर।”

“लेकिन जहाँ तक मुझे जानकारी है, मानोसंग तो चीनी था और मैं चीन से तो नहीं आया हूँ। न ही मेरा उस कौम से सम्बंध है।” मैंने झल्लाते हुए कहा।

“हाँ, दो सौ साल पहले उसने याम दरंग की खानकाह पर हमला किया था और महान भिक्षुणी उसके प्रेम मोह में गिरफ्तार हो गयी थी। इसलिए लोग अधिक शंकित हैं। पुरोहित ने बताया था कि अगली बार हिमालय के उस पार की धरती पर मानोसंग जन्म लेगा और उसकी पहचान भी बतायी गयी थी। तुम्हारे सामने तरह-तरह की अंगूठियाँ, चाकू, टोपी और कोट रखे गये थे और तुमने उन्हीं चीजों का चयन किया जिसकी भविष्यवाणी की गयी थी।”

मैं किसी तरह भी उस पढ़े-लिखे अहमक ड्यूक को संतुष्ट न कर सका। उसके पास अपने हक में ठोस तर्क मौजूद थे। उसने मेरी कोई सुनवाई न सुनी। जाते समय गान जंग ने मुझे सिर्फ इतना बताया कि मेरी किस्मत का आखिरी फैसला होजो का गवर्नर करेगा।

❑❑❑❑❑❑❑❑❑❑❑❑❑❑❑❑❑❑❑❑❑❑❑❑❑❑❑❑❑❑❑❑❑❑❑❑❑❑❑❑❑❑❑❑❑❑❑❑❑❑❑❑❑❑
 
अगले रोज दो भिक्षु मेरे कमरे में दाख़िल हुए और मुझे स्ट्रेचर पर डालकर बाहर ले गये। उन्होंने मुझे एक खूबसूरत मकान के अंदर पहुँचा दिया और वहाँ से चले गये।

फिर मुझे एक कमरे के अंदर ले जाया गया जहाँ होजो का गवर्नर, महान भिक्षु, उसका असिस्टेंट, मोटी भिक्षुणी, छोटी माता और ड्यूक ऑफ़ होजो मौजूद थे। मुझे पहली ही नज़र में होजो के गवर्नर की सूरत कुछ जानी-पहचानी लगी। परंतु याद नहीं आ रहा था कि उसे मैंने पहले कहाँ देखा था। अलबत्ता वह मुझे देखकर पहले तो चौंका फिर मंद-मंद मुस्कुराने लगा।

मैं अपनी याददाश्त पर जोर डाल रहा था कि उसे कहाँ देखा है ? वह लामाओं की तरह ही चोगा धारण किए था और उसका सिर घुटा हुआ था। अन्य लामाओं की तरह ही उसकी दाढ़ी-मूँछ न थी।

और फिर मैं एकदम उछल पड़ा, जब मैंने उसकी आवाज़ सुनी।

“यह मानोसंग नहीं है, बल्कि मानोसंग का वह सिपहसलार तरोलोको है जिसने खानकाह को मानोसंग के अत्याचारों से बचाया था। तरोलोको के कारण ही देवी माता की रक्षा हो पायी थी और नेक दिल तरोलोको ने खजाने को बाहर जाने से रोका था।”

मैं नहीं जानता था कि तरोलोको कौन था ? मैं तो जगदेव महाराज के तीनों लोगों में दर्शन कर रहा था। पहले इसलिए नहीं पहचान पाया था क्योंकि जगदेव महाराज जटाधारी साधू थे। यह रूप उनका बिल्कुल ही भिन्न था। या फिर यह मेरी नज़रों का धोखा था।

मैंने अपनी जिंदगी में बड़े-बड़े चमत्कार देखे थे। उनमें से एक चमत्कार यह था। लेकिन मेरे मुँह से कुछ न फूटा और मैं चुपचाप एक मुजरिम की तरह खड़ा रहा। वे लोग आपस में सिर जोड़े बातें कर रहे थे और शायद इस नतीज़े पर पहुँच रहे थे कि मैं तरोलोको हूँ या मानोसंग।

कुछ देर बाद ही मुझे बाहर ले जाया गया।

❑❑❑
 
मेरे बारे में क्या फैसला हुआ, यह मुझे अगले रोज ही मालूम हो गया। मुझे यह शुभ सूचना दी गयी कि मैं तरोलोको हूँ और इस बार भी चीनियों से देवी माता की रक्षा के लिए आया हूँ।

तरोलोको की कहानी भी मुझे पता चली। उसने मानोसंग का साथी होते हुए भी खानकाह की हिफ़ाज़त की थी। मानोसंग का मकबरा उसी ने बनाया था। मानोसंग एक अरसे तक वहाँ क़ैदी बनकर रहा। फिर देवी माता के प्रेम के कारण उसे नयी जिंदगी मिली। पर यह जिंदगी कुछ ही दिन की थी। वह बीमार हो गया और उसकी मृत्यु से पहले ही उसके जीवन काल में उसका मकबरा बनकर तैयार हो गया। मानोसंग की यही इच्छा थी कि उसे वहीं दफनाया जाए। यह कर्तव्य भी तरोलोको ने अंजाम दिया था।

पुरोहितों की भविष्यवाणी के अनुसार तरोलोको इस बार भी देवी माता की रक्षा के लिए यहाँ आया है। खानकाह पर चीनी हमले का अंदेशा दिन-प्रतिदिन बढ़ता जा रहा था और केवल तरोलोको ही देवी माता को चीनी विपत्ति से बचा सकता था।मैं तो इसे साधू जगदेव महाराज का करिश्मा ही समझूँगा जो मुझे मानोसंग से तरोलोको बना दिया। जगदेव महाराज को होजो के गवर्नर के रूप में देखकर तो मेरी हैरत की इन्तहा न रही थी।

तो क्या जगदेव महाराज ने मुझे किसी विकट परीक्षा से गुज़ारा था ? और जगदेव महाराज जैसे धर्मात्मा ने मेरे बारे में यह झूठ क्यों बोला था ? क्या इसलिए की मेरी जान बख्श दी जाती ? या सचमुच मैं तरोलोको का दूसरा जन्म हूँ ?

इसे संयोग समझा गया कि मैंने उन्हीं चीज़ों को स्पर्श किया था जिसकी भविष्यवाणी पुरोहितों ने की थी। परंतु एक बात समझ में नहीं आती थी कि जब जगदेव जैसे चमत्कारी साधू संत याम दरंग की खानकाह में थे तो उन्हें हिंदुस्तान के पाँच आदमियों की ज़रूरत क्यों आन पड़ी थी ? जगदेव महाराज तो अकेले ही यह काम कर सकते थे।

ज्यों-ज्यों मैं इस बारे में सोचता, दिमाग उलझता ही जाता था।उधर जो आदमी हमसे पहले यहाँ पहुँचने में सफल हुआ था, अभी तक बीमार था और उससे मेरी भेंट नहीं हो पायी थी।वे दूसरे दिन सबके सब मेरे कमरे में उपस्थित थे। परंतु जगदेव महाराज उनमें नहीं थे। मुझे बताया गया कि होजो के गवर्नर माऊ एक दिन के लिए यहाँ आये थे और अब वे होजो चले गये हैं।उन लोगों के साथ याम दरंग का महान पुरोहित भी था।पुरोहित ने मेरी तरफ देखा और कहा–

“इसकी आत्मा शुद्ध है।”

उसके यह शब्द सुनते ही हर शख्स का चेहरा खिल उठा और फिर तुरंत ही मुनादी कर दी गयी कि मैं वास्तव में तरोलोको हूँ और तिब्बत वालों की सहायता के लिए आया हूँ।चारों तरफ ख़ुशी की एक लहर सी दौड़ गयी और पूरा क़स्बा ढोल ताशों की आवाज़ से गूँज उठा।महान भिक्षुक ने मुझे विश्वास दिलाया कि मुझे अब कैदी की हैसियत से नहीं बल्किसम्मानजनक मेहमान की हैसियत से वहाँ रखा जाएगा और मुझे वहाँ आज़ादी से हर जगह घूमने फिरने की अनुमति दे दी गयी।इस बारे में उन्हें अभी यह करना था कि खानकाह का खज़ाना और देवी माता को सुरक्षित सिक्किम पहुँचाने के लिए क्या योजना बनायी जाएगी। उसने मुझे समझाया कि मैं जल्दबाज़ी और बेसब्री से काम न लूँ। हर चीज़ और हर काम का एक उपयुक्त समय होता है।

“हर काम ठीक समय पर होगा। तुम इंतज़ार करो और आराम करते रहो।”

अब परिस्थितियाँ बदल चुकी थीं।रोज सुबह एक नौजवान भिक्षुणी मेरे कमरे में आती, मेरे पाँव चूमती और मेरा हाथ-मुँह धुलाती।जब मैं बाहर निकलता तो लोग मुझे घेर लेते। हर शख्स मेरे हाथ चूमने के लिए बेक़रार होता। मैं हर तरह से आज़ाद था, बल्कि अब तो मुझे सम्मानजनक हैसियत प्राप्त थी।खानकाह के कपाट तो उसी रोज बंद हो चुके थे। अब वहाँ जाने की संभावनाएँ समाप्त हो चुकी थीं। अब यह बात समझ से परे थी कि जिस मिशन के तहत मैं आया था, वह किस तरह पूरा होगा ?

दिन बीतने लगे और मेरी बेचैनी बढ़ती गयी। फिर एक दिन मेरी मुलाक़ात उस व्यक्ति से हुई जो हिंदुस्तान से उसी मिशन के तहत आया था। वह अब स्वस्थ हो गया था और मुझसे मिलने के लिए बेक़रार था।बड़ा लामा उसे मेरे पास ले आया।वह एक लम्बा तंदुरुस्त जवान था जो कि बीमारी से उठने के कारण कमज़ोर नज़र आता था। परंतु उसके चेहरे पर कर्तव्य परायणता की चमक थी।उसे मेरे बारे में पहले ही सब कुछ मालूम हो चुका था। फिर बूढ़ा लामा हमें तनहा छोड़कर चला गया।

“मुझे अपने हमवतन साथी से मिलकर बड़ी खुशी हुई।” वह बोला। “यह और भी ख़ुशी की बात है कि आपको यहाँ बहुत बड़ा सम्मान प्राप्त है।”

“लेकिन मित्र, तुम यहाँ कब तक रहोगे ? मेरी तो खैर दूसरी बात है, पर तुम्हें एक मिशन के तहत यहाँ भेजा गया था।”

“हाँ...!” वह हताश स्वर में गहरी साँस खींचकर बोला। “लेकिन अब उसकी कोई सूरत नज़र नहीं आती। एक तो पहले ही मैं अपने चार साथी खो चुका हूँ। ऊपर से जब यहाँ लाया गया तो बुरी तरह जख्मी था। मुझे एक रीछ से लड़ना पड़ा था। जिस हालत में मैं यहाँ पड़ा था उसमें वापसी की संभावना नहीं की जा सकती थी। इन लोगों के उपचार ने मेरी जिंदगी बचा ली, यही क्या मेरे लिए कम थी।”

उसका नाम प्रताप था और वह मिलिट्री इंटेलीजेंस से संबंध रखता था। उसका रैंक कैप्टन का था।

“लेकिन अब तो तुम स्वस्थ हो गये हो। अब क्या सोचा है ?” मैंने पूछा।

“काश कि मैं कुछ दिन पहले स्वस्थ हो जाता! त्यौहार के बड़े दिन से पहले। अब तो खानकाह में दाख़िल होने के लिए एक मुद्दत तक इंतज़ार करना पड़ेगा।”

“तुम्हारा मतलब अगले त्यौहार तक ?”

“हाँ, यही मजबूरी है!”

“लेकिन तब तक क्या तुम यहाँ हाथ पर हाथ धरे बैठे रहोगे ?”

“क्या किया जा सकता है ? अधिक से अधिक यह हो सकता है कि मैं किसी तरह अपनी सरकार से संपर्क स्थापित करूँ। फिर वे जैसा निर्देश देंगे उसी अनुरूप काम करूँगा।”

मैं किसी सोच में डूब गया।इतना लम्बा समय किस तरह बिताया जा सकता था ? इस दौरान यदि चीनी वहाँ तक पहुँच गये तो पासा ही पलट जाएगा। कुंग तो मुझे जीता छोड़ेगा ही नहीं।

“क्या सोचने लगे ?” उसने पूछा।

“क्या खानकाह के कपाट उससे पहले नहीं खुल सकते ?”

“इस बारे में मैंने लामा से पूछा था।” वह नकारात्मक रूप में सिर हिलाता हुआ बोला। “परंतु वह कहता है कि कपाट नहीं खुल सकता। कपाट सिर्फ देवी माता की इच्छा से खुल सकता है। वह भी तब जब देवी माता खानकाह में हो और अपने पति बंदर से मिलना चाहती हो। इसमें उनका कोई बस नहीं चल सकता।”

“अजीब रिवाज़ हैं यहाँ के! क्या देवी माता खानकाह के अलावा भी कहीं दूसरी जगह रहती है ?”

“वह खानकाह से कहीं दूसरी जगह भी जा सकती है। ऐसा उन लोगों का विचार है। त्यौहार के दिन से पहले वह कभी नहीं लौटती। त्यौहार के समय वह प्रथम चरण या दुआ वाले कपाट में आ जाती है और फिर अंतिम दिन भक्तों को दर्शन देती हैं।”

“क्या देवी माता को इन लोगों के मिशन का ज्ञान नहीं है ?” मैंने पूछा।

“वे लोग उपयुक्त समय आने पर ही बताना चाहते थे। परंतु उपयुक्त समय आया ही नहीं।”

“तब तो ये लोग सचमुच बड़े मूर्ख हैं।” मैंने झल्लाए स्वर में कहा। “उनकी मान्यताओं से ही मेरा भेजा फिर जाता है। अब जबकि देवी माता को यह ज्ञान ही नहीं है कि उन्हें खजाने सहित दूसरी जगह पहुँचाया जाना थातो भला वह त्यौहार के दिन से पहले कैसे प्रकट होगी ? और इसका सीधा सा अर्थ यह हुआ कि उससे पहले न तो खानकाह में घुसा जा सकता है, न ही देवी माता को इसकी ख़बर दी जा सकती है।”

“मैं भी इसीलिए चिंतित हूँ। लेकिन मेरा ख्याल है कि आप इस समस्या को सुलझा सकते हैं।”

“मैं ?” मैंने उसे चौंककर देखा। “मैं किस तरह ?”

“ये लोग आपको भी किसी लामा से कम नहीं मानते। और इनका कहना है कि आप देवी माता की रक्षा के लिए आये हैं। अगर आप कोई चक्कर चलायें तो यहाँ की रिवायतें टूट सकती हैं और खानकाह में पहुँचा जा सकता है।”

“साफ-साफ बताओ कि क्या योजना है तुम्हारे दिमाग में ?”

“मान लिया आप यह मशहूर कर दें कि देवी माता संकट में हैं। चीनी फौजें इस तरफ बढ़ रही हैं। तो इस सूरत में यह लाजमी हो जायेगा कि वे आपसे देवी की रक्षा के लिए अनुरोध करें। तब आप उनसे कहेंगे कि आपको खानकाह में दाख़िल होने की अनुमति दी जाए। वे आप पर विश्वास करते हैं। इसलिए जहाँ कोई नहीं जा सकता, वहाँ आप जा सकते हैं।”

कुछ देर तक मैं उसकी शक्ल देखता रहा। योजना तो ठीक थी, परंतु एक समस्या थी; और इसका हल ढूँढ़े बिना योजना बेकार थी।

“लेकिन कप्तान साहब, जरा यह तो सोचिये कि जब वे लोग खानकाह में प्रविष्ट होने का मार्ग ही नहीं जानते, न ही कपाट खोल सकते हैंतो फिर हम वहाँ किस तरह दाख़िल हो सकेंगे ?”

“यह कोई इतना मुश्किल काम नहीं मालूम होता।” वह बोला।

“क्या मतलब ? मुश्किल किस तरह नहीं ?”

“देवी माता भी एक औरत है, कोई दैवीय शक्ति तो है नहीं। इन कपाटों को खोलने का कोई न कोई मैकेनिज्म ज़रूर होगा।”

यह बात मेरे दिमाग में भी थी।

“परंतु मैकेनिज्म अगर खानकाह के भीतर से हुआ तो ?”

“मेरा ख्याल है कि ऐसा नहीं है। मैं यहाँ इतने दिन रहकर ऐसी ही जानकारियाँ बिस्तर पर पड़े-पड़े प्राप्त करता रहा हूँ। कुछेक जगह मैंने अपनी जासूसी दृष्टि भी दौड़ाई है। मेरा ख्याल है कि बंदर के मकबरे से अवश्य कपाटों का कोई संबंध है।”

“यह तुम किस आधार पर कह रहे हो ?”

“देवी माता त्यौहार के आख़िरी दिन मंदिर से दर्शन देती हुई इस मकबरे तक जाती है। सभी जानते हैं। फिर जब वह अपने पति से मिलने चली जाती है तो मकबरे का रास्ता बंद कर दिया जाता है। क्या आपने इस बात पर गौर किया कि देवी माता मकबरे के भीतर से ही कहाँ गायब हो जाती है ?”

“कहाँ गायब हो जाती है ? अपने पति से मिलकर वापस मंदिर में ही पहुँचती होगी और फिर खानकाह में चली जाती होगी।”

“नहीं श्रीमान! यही तो एक स्रोत है जिससे आशा की किरण बँधती है। शाम तक कपाट ख़ुद-ब-ख़ुद बंद हो जाते हैं। जबकि देवी माता को मकबरे से बाहर आते आज तक किसी ने नहीं देखा।”

उसकी बात समाप्त होते ही हम दोनों ही खामोश हो गये। मेरे लिए यह ख़बर नयी थी–आशानुकूल। मैं अपने ही हालात में फँसे रहने के कारण इतनी जानकारियाँ प्राप्त नहीं कर सका थाजितनी कि प्रताप ने की थी।

“अगर इस पर भी बात न बनी तब मैं अंतिम रास्ता अख्तियार करूँगा।”

मैंने काफी क्षण बीत जाने के बाद मौन तोड़ा–“होजो के गवर्नर से मेरी अंतिम मुलाक़ात होगी। बस और फिर खेल समाप्त।”

“होजो का गवर्नर! मैं समझा नहीं।” प्रताप ने आश्चर्य से मेरी ओर देखा।

“तुम समझ भी नहीं सकते। यह मेरा व्यक्तिगत मामला है।”

प्रताप से मुलाक़ात के बाद कई गुत्थियाँ सुलझ रही थीं। अब हम नियमित रूप से रोज मिला करते थे। कभी-कभार रंग लंग भी मिलने आ जाया करता था। उसकी अब खूब खातिर हो रही थी और वह खुश था।प्रताप ने मुझे जो योजना बतायी थी मैंने उस पर अमल करना शुरू कर दिया।चंद रोज बाद मैंने बड़े लामा को अपने चक्कर में लेना शुरू कर दिया और वह आसानी से मेरी बातें मानता चला गया। देवी माता की रक्षा अब मैं ही कर सकता था। उसने मुझे हर तरफ से छूट दे दी और मैंने उससे अनुमति माँगकर मकबरे की छानबीन शुरू कर दी। बड़े लामा ने इस बात को गुप्त ही रखा था। उसका अनुमान था कि इस तरह की अफवाहें फैलते ही वहाँ के हालात बदतर हो जायेंगे। लोग निराशा में डूब जायेंगे और संभव था कि वे वहाँ से पलायन शुरू कर दें।

उसके कहने पर मैं मकबरे और मंदिर में चित्रकारी कर रहा था। बचपन में चित्रकारी का शौक था, जो अब काम आ रहा था। दूसरे लोग यही समझते थे कि मैं वहाँ चित्रकारी कर रहा हूँ।मकबरे के भीतर अब सिर्फ मैं जा सकता था। हालाँकि मैं चाहता था कि प्रताप भी मेरे साथ रहे, परंतु प्रताप के लिए अनुमति नहीं मिल सकती थी। मेरी बात दूसरी थी।दिखावे के लिए मैं चित्रकारी के काम में व्यस्त रहता। शाम को मैं प्रताप से मिलकर सलाह-मशवरा करता और सुबह होते ही फिर वहाँ सिर खपाने लगता। मैंने मंदिर और मकबरा दोनों ही जगह चित्रकारी की। एक-दो स्थानीय भिक्षु मेरी मदद को वहाँ रहते थे। ज्यों ही वे लोग इधर-उधर होते, मैं वहाँ एक-एक पत्थर को टटोलने लगता।

प्रताप का अनुमान था कि मकबरे में सुरंग है। परंतु सुरंग का रास्ता नहीं मिला।फिर एक रोज जबकि मैं बड़े गौर से बंदर की सुनहरी मूर्ति का जायज़ा ले रहा था, मुझे बंदर की पुश्त पर एक असाधारण सी चीज़ नज़र आयी। एक जगह सुनहरा रंग हल्का नज़र आ रहा था।मैंने अपने दोनों साथी भिक्षु चित्रकारों को किसी काम से बाहर भेज दिया।वह दोनों बाहर चले गये तो मैंने उस जगह हाथ से दबाव डाला।मूर्ति की पुश्त धीरे-धीरे अंदर को दबने लगी, परंतु कोई रास्ता प्रकट न हुआ। पर मेरे शरीर में बिजली सी दौड़ने लगीं। निश्चय ही मैं सफलता के दरवाज़े पर था। मैं दीवानों की तरह बंदर की प्रतिमा को घूम-घूमकर जगह-जगह से टटोलने लग। आख़िरकार मुझे सुरंग का राज मालूम हो गया।

मैंने बंदर की दुम को पकड़कर बाहर की तरफ खींचा तो प्रतिमा की पूरी पुश्त पीछे की तरफ खुलती चली गयी।मैंने अंदर झाँककर नहीं देखा। क्योंकि उसका समय नहीं रहा था। दुम को अंदर की तरफ दबाकर मैंने पुश्त का वह तिलिस्मी द्वार बंद कर दिया और अपने काम में लग गया।

दोनों भिक्षु जब वापस आये तो मैं अपने काम में व्यस्त था।

❑❑❑
 
याम दरंग में मुझे एक तरह से कुछ अधिक समय बीत चुका था और इस बीच यह मेरी सबसे पहली और सबसे बड़ी सफलता थी। मैंने सुरंग का रास्ता तलाश कर लिया था।कप्तान प्रताप मेरी इस सफलता से बहुत आशावान हो उठा था। अभी मैं उस सुरंग में प्रविष्ट न हुआ था। परंतु मेरा अनुमान था कि अब खानकाह तक पहुँचने में कोई विलम्ब नहीं होगा।

और एक रात मैंने उसमें दाख़िल होने का फैसला किया।मैंने प्रताप को यह राज बता दिया था। प्रताप के अलावा सिर्फ मैं जानता था। मैंने उसे साथ ले जाना आवश्यक नहीं समझा। प्रताप का बाहर रहना जरूरी भी था। इस तरह उसे बाहरी गतिविधियों का पता चलता रहता और यदि मैं वहाँ फँस जाता तो वह मेरी मदद कर सकता था।मैंने प्रताप से कहा कि मैं चौबीस घटों तक हर सूरत में लौट आऊँगा। मुझे देर भी लग सकती थी; परंतु चौबीस घंटे बाद प्रताप अपनी कार्रवाई करने के लिए स्वतंत्र था।

चूँकि मैं अगले रोज गायब रहने वाला था इसलिए मैंने पहले ही बड़े लामा से कह दिया था कि मैं एक दिन के लिए होजो घूमने जा रहा हूँ। बड़े लामा ने मेरे साथ गाइड करना चाहा; परंतु मैंने इनकार कर दिया। मैंने उसे तसल्ली दी कि मैं वहाँ के सभी रास्ते जानता हूँ।

रात के समय जब मैं मकबरे के पास पहुँचा तो वहाँ कोई पहरेदार नहीं था।अंदर पहुँचकर मैंने अपना कार्य करना शुरू कर दिया। बंदर की दुम खींचकर सुरंग का रास्ता खोल दिया।नीचे सीढ़ियाँ जाती थी और जब मैंने आख़िरी सीढ़ी पर पाँव रखा तो हल्की सी सरसराहट की आवाज़ उत्पन्न हुई। मैंने चौंककर ऊपर देखा।रास्ता बंद हो चुका था। मैंने इसकी परवाह नहीं की।मैं अपने साथ एक टॉर्च लेकर आया था।

सुरंग चट्टानों को खोदकर बनायीगयी थी। सुरंग खासी लम्बी थी और हवा भी बहुत कम थी। इस सुरंग में मुझे निरंतर इतना चलना पड़ा कि मैं चलते-चलते थक कर चूर हो गया। निश्चय ही यह रास्ता खानकाह की तरफ जा रहा था।फिर मुझे सीढ़ियाँ दिखायी दीं और मैं ऊपर चढ़ गया। जैसे ही मैं ऊपर की सीढ़ी पर पहुँचा तो सामने बंद दीवार को टटोलने लगा। काफी देर तक मैं उस दीवार से जूझता रहा फिर अचानक मेरा हाथ एक आले में पहुँच गया जो पहले नज़र न आया था।

आले में एक दीपक रखा था। मेरी समझ में नहीं आया कि वहाँ दीपक का क्या तात्पर्य है!दीपक के पास एक चकमक पत्थर रखा था।कुछ सोचकर मैंने चकमक पत्थर से दीपक की लौ को रोशन कर दिया। उसकी लौ पहले तो लहरायी फिर सीधी होकर आले के ऊपर अपनी लकीर खींचती चली गयी। परंतु कुछ हासिल नहीं हुआ। दीपक की रोशनी हो जाने के बाद मेरी छाया वहाँ इधर से उधर हिलती दिखायी देने लगी।मैं सीढ़ी पर बैठ गया।

कोई पाँच मिनट बीते होंगे कि अचानक घरघराहट सुनायी दी और मैं उछलकर खड़ा हो गया। उसके साथ ही दीपक की रोशनी थरथराकर गुल हो गयी। मैंने फ़ौरन टॉर्च जलायी।

सामने एक दरवाज़ा खुला था। यह चमत्कार किस तरह हुआ था, मैं समझ नहीं सका।परंतु सोचने-समझने के लिए मैं वहाँ न रुका। मैं दरवाज़े की दूसरी तरफ बढ़ता चला गया। यह एक बड़ा हॉल था जहाँ असंख्य मूर्तियाँ रखी थीं और कई घंटे छतों से टंगे थे।

हाल की दीवारें चारों तरफ से बंद थीं। मेरी समझ में नहीं आता था कि कहाँ पहुँच गया हूँ ? परंतु यह खानकाह का ही कोई हिस्सा होना चाहिए था। मैं उन दीवारों को टटोलता घूमता रहा। कभी मूर्तियों को छूकर देखता। मैं कोई मार्ग तलाश कर रहा था।

अचानक मुझे वहाँ भी एक कोने में वैसी ही बंदर की मूर्ति दिखायी दी और झल्लाहट से मैंने उसकी दुम खींच दी।

चमत्कार!

एक रास्ता और प्रकट हुआ–वैसा ही रास्ता;और फिर मैं सुरंग में पहुँच गया।एक सुरंग के बाद दूसरी। दूसरी के बाद तीसरी। तीसरी के बाद चौथी।मारे थकान के मेरा बुरा हाल हुआ जा रहा था। हर सुरंग के बाद वैसी ही सीढ़ियाँ आतीं। बंद दीवार...आला...दीपक...फिर हॉल। हॉल में विभिन्न मूर्तियों में बंदर की प्रतिमा और एक नयी सुरंग।

अब मैं यह समझ चुका था कि आले में दीपक के प्रकाश के कारण ऊपर किसी तरह लौ टकराती है। तापक्रम बढ़ता है। उष्मा पाकर एक सुराख खुल जाता है और उसके किसी छिद्र से लौ टकराते ही मार्ग खुल जाता है। जैसे ही मार्ग खुलता है, छिद्र से हवा ख़ारिज होती है जो लौ को बुझा देती है।

जिसने यह तिलिस्म बनाया था वह कोई फनकार ही होगा। ऐसा फनकार सदियों में एकाध ही पैदा होता है।

और फिर जब मैंने सातवीं सुरंग पार की तो मैं हाल से बेहाल हो रहा था। मैं घुटन भरी सुरंगों से चलता आया था इसलिए प्यास भी लग रही थी।मैंने चलते समय प्रताप से घड़ी ले ली थी। समय देखा तो तीन बजकर दस मिनट हो रहे थे और नौ बजे मैं मकबरे से चला था। इस बीच मैं बीच-बीच में थकान मिटाता रहा था।यदि बीच में यह हॉल न बने होते तो सुरंग में निरंतर चलने से ऑक्सीजन समाप्त हो जाती। अतः यह व्यवस्था की गयी थी कि बीच में हवा का मार्ग बनाये रखा जाए। शायद इसी उद्देश्य से वे हॉल बनाये गये थे।

वहाँ मूर्तियों का विपुल भंडार था। वही खज़ाना क्या कम बड़ा था! अगर मूर्ति चोरों के किसी गिरोह को पता चल जाता तो वह जान की बाज़ी लगा देते।

अंतिम सुरंग पार करने के बाद मैंने सीढ़ियाँ चढ़ीं तो वैसा दरवाज़ा न मिला, बल्कि मुझे यूँ लगा जैसे मैं किसी बड़े खोखले संदूक में पहुँच गया हूँ। लेकिन बाद में पता चला कि मैं वास्तव में किसी बहुत बड़ी प्रतिमा के पेट में चला गया हूँ। जब मैं उसके पेट से बाहर निकला तो अपने आपको खासे बड़े कमरे में खड़ा पाया जिसकी छत काफी ऊँची और मेहराबी शक्ल की थी।वहाँ छोटी-बड़ी सत्तरह प्रतिमाएँ रखी थीं और चारों तरफ घी के दिए जल रहे थे। सत्तरह मूर्तियाँ सुन्दर नारियों के रूप में थीं। मुझे यह समझते देर नहीं लगी कि वह देवी माता के सत्तरह जन्मों की सूचक हैं। प्रत्येक प्रतिमा पर कुछ न कुछ खुदा था।कमरे में बाईं तरफ एक बहुत बड़ा चोबी दरवाज़ा नज़र आ रहा था। लेकिन वह दूसरी तरफ से बंद था।और अभी मैं अपनी साँस भी काबू नहीं कर पाया था कि मुझे किसी के क़दमों की चाप सुनायी दी। मैंने हड़बड़ाकर चारों तरफ देखा। परंतु कोई नज़र नहीं आया। अलबत्ता चाप निरंतर निकट आती जा रही थी और इसका पता ही न चल पा रहा था कि चाप किस दिशा से उभर रही है।फिर यह चाप चारों तरफ से गूँजने लगी और यूँ लगा जैसे वहाँ सैकड़ों अदृश्य आत्मायें चल-फिर रही हों। एक बार के लिए तो मेरे शरीर से ठंडा पसीना छूटने लगा। फिर मैं जल्दी से वापस मुड़कर उस बड़ी प्रतिमा के पेट की तरफ बढ़ने लगा जहाँ से आया था। मुझे बस यही सूझा था कि वहाँ जाकर छिप जाऊँ।

अभी मैंने चार क़दम ही उठाये थे कि एक आवाज़ वातावरण में झंकृत होकर गूँज उठी।

“रुक जाओ मानोसंग!”

मेरे क़दम जड़ हो गये।

“तुम समझते हो कि मैं तुम्हें भूल गयी हूँ, मानोसंग ? पलटकर मेरी तरफ देखो।”

मैंने पलटकर देखा तो मेरे बदन में झुरझुरी सी दौड़ गयी।

वह देवी माता थी! महान भिक्षुणी। जिसे मैंने पालकी में देखा था और न जाने कहाँ से प्रकट हो गयी थी। चाप की आवाजें अब समाप्त हो गयी थीं। वह धीरे-धीरे एक शाही अंदाज़ में बढ़ रही थी। उसका खौफनाक मास्क अब भी उसके चेहरे को बदनुमा बना रहा था जो किसी को भी भयभीत करने के लिए पर्याप्त था।यूँ भी मैं थककर चूर हो गया था। उसे देखकर जाने क्या हुआ कि टाँगें काँप गयीं और मैं खड़े-खड़े फर्श पर जा गिरा।

❑❑❑
 
Back
Top