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Guest
चार रोज तक हम इस नए रास्ते पर चलते रहे। यह रास्ता पहले वाले से भी बीहड़ था, परन्तु खतरे जैसी कोई बात हमारे साथ पेश नहीं आयी। इस रास्ते पर चलते हुए हम उन्नीस-बीस हजार फीट बर्फीली पहाड़ियों तक जा पहुँचे। और फिर हमने दूर वह पठार भी देखा जहाँ पहले हम भटक गये थे। इस बुलन्द चोटी पर पहुँचने के बाद कुछ काम रंग लंग को यूँ मिला कि वह दूर-दराज़ की पहाड़ियों तक दृष्टि दौड़ा सकता था। अब निरन्तर सफर करते रहने के कारण पहाड़ी रास्ते मेरे लिए इतने कष्टप्रद साबित नहीं हो रहे थे। मेरी तबियत सम्भल चुकी थी। बुलन्द चोटी पर आफताब की चमक के साथ रंग लंग का मायूस चेहरा भी चमक उठा। कदाचित उसे रास्ता मिल गया था।
रास्ता तो उसने पा लिया था पर एक मुश्किल यह आ खड़ी हुई कि हमारे पास खाने-पीने की सामग्री समाप्त हो गयी। शाम को रंग लंग ने रात बिताने के लिए एक गार तलाश किया और दोनों बचा-खुचा खाने के बाद लम्बी तानकर सो गये।4
सुबह रंग लंग ने मुझे वहीं छोड़ा और खच्चर पर सवार होकर एक तरफ निकल गया। शायद रास्ते की निशानदेही करने या खाने-पीने का प्रबन्ध करने। और वह पूरे डेढ़ दिन बाद वापस आया। उसकी अनुपस्थिति में मेरी जान सूली पर टंगी रही। मैं सोचता रहा कि कहीं वह फिर रास्ता तो नहीं भटक गया और मैं अकेला यहाँ फँसकर तो नहीं रह गया।
बहरहाल रंग लंग अपने साथ खाने-पीने की बहुत सी चीजों के अलावा एक अच्छी खबर भी लाया था। नीचे शोनयांग नामी एक छोटा सा गाँव था और वहाँ से याम दरंग चार रोज के सफर की दूरी पर था। शोनयांग के बाद रास्ता इतना जटिल न था। गार से बाहर तेज बर्फीली हवाएँ चल रही थीं। रंग लंग ने चाय बनायी और खच्चर के सामने चारा डालते हुए बोला–
“श्रीमान! हमें यहाँ से फौरन निकल जाना चाहिए वरना यह हवाएँ मार डालेंगी। तूफान का अँदेशा भी है।”
जो आदमी बर्फीले इलाके में रहा हो और उसने तूफान देखे हों, वह तूफान की मात्र कल्पना से ही काँप उठा था। ऐसी ही हालत मेरी भी थी। रंग लंग का सुझाव बिल्कुल उपयुक्त था। बर्फीली हवाओं का शोर बढ़ता जा रहा था। हवाएँ चिंघाड़ने को तत्पर थीं और कहीं से चुपके-चुपके दम साधकर आ रही थीं। बर्फ का विप्लव कभी भी फट सकता था। एक मील चलने के बाद ही हवाओं का जोर बढ़ गया और आगे चलना दूभर हो गया। बर्फ के थपेड़े जबरदस्त थे। एक बार ऐसा थपेड़ा पड़ा कि मैं मुँह के बल जमीन पर गिर पड़ा।
“साहब! उठिए....यहाँ नहीं....यहाँ बर्फीले थपेड़े हमारी जान खींच लेंगे। जरा हिम्मत से काम लीजिये। बस नीचे पहुँच जाएँ तो सब ठीक हो जाएगा।”
उसने एक बार फिर मुझे सहारा देकर उठाया। मौत हवा के साथ लरज रही थी। बल्कि चिंघाड़ने लगी थी। रंग लंग ने खच्चर से कुछ सामान उतारकर उस पर डाल दिया और फिर हम गिरते-पड़ते नीचे उतरने लगे। शोनयांग के करीब से गुजरते हुए रंग लंग ने एक बार फिर पड़ाव डाला और फिर वह रात कुछ चैन से कटी। शोनयांग कोई बीस-पच्चीस घरों का एक छोटा सा गाँव था और उन लोगों ने हमारी खूब सेवा की।
अगले दिन हम याम दरंग जाने वाले रास्ते पर चल पड़े। तीसरे रोज दर्रा कोचनलाको पार करके हम जंगल में दाखिल हो गये। जंगल में पहुँचते ही शाम हो गयी, अतः वहीं उपयुक्त जगह देखकर हमने पड़ाव डाल दिया। रंग लंग अब पूरी तरह प्रफुल्लित था। याम दरंग अब करीब ही था और एकाध रोज का रास्ता शेष रह गया था।
अब तक मैं रंग लंग से याम दरंग के बारे में बहुत कुछ जान चुका था। उसने मुझे शैतान के मकबरे के बारे में भी बताया था जो खानकाह के ही आस-पास कहीं था; परन्तु पहाड़ों में दब गया था। वह बार-बार मुझे साहब और श्रीमान कहकर सम्बोधित करता था। एक बार मैंने उसे रोककर कहा–“आज से मुझे साहब कहकर सम्बोधित न करना।”
“तो फिर क्या कहूँ ?” रंग लंग ने पूछा।
“राज।”
वह मुस्कुरा दिया। वह जानता था मेरा तात्पर्य क्या है। मैं उसका दोस्त बनकर रहना चाहता था। कभी-कभार मेरे नाम का उच्चारण वह गलत भी करता था और चीनियों की तरह मानोस कह देता। लेकिन मुझे इस पर भी कोई ऐतराज नहीं था।
हम दोनों गहरे दोस्त बन गये थे। और अब मैं अपने को कुछ तरोताजा महसूस कर रहा था। ऐसा मालूम पड़ता था जैसे जहन से एक बोझ हटता जा रहा है और मैं फिर से आदमी की जून में लौटकर आया था। कभी-कभार मोहिनी की भी याद आ जाया करती थी। यह दिन उन दिनों से बहुत अच्छे थे। बेचारा रंग लंग क्या जानता था कि मैं क्या बला हूँ और मैंने जिंदगी का एक खास हिस्सा किस तरह जिया है।
दो रोज बाद हम एक ऊँची चट्टान को पार करके आगे बढ़े तो हमने देखा कि नीचे एक झील है जिसके ऊपर सफेद रंग के परिंदे परवाज कर रहे हैं और फिर कुछ ही देर बाद हमें याम दरंग की वह घाटी नजर आयी जो हमारी मंजिल थी।
❑❑❑
रास्ता तो उसने पा लिया था पर एक मुश्किल यह आ खड़ी हुई कि हमारे पास खाने-पीने की सामग्री समाप्त हो गयी। शाम को रंग लंग ने रात बिताने के लिए एक गार तलाश किया और दोनों बचा-खुचा खाने के बाद लम्बी तानकर सो गये।4
सुबह रंग लंग ने मुझे वहीं छोड़ा और खच्चर पर सवार होकर एक तरफ निकल गया। शायद रास्ते की निशानदेही करने या खाने-पीने का प्रबन्ध करने। और वह पूरे डेढ़ दिन बाद वापस आया। उसकी अनुपस्थिति में मेरी जान सूली पर टंगी रही। मैं सोचता रहा कि कहीं वह फिर रास्ता तो नहीं भटक गया और मैं अकेला यहाँ फँसकर तो नहीं रह गया।
बहरहाल रंग लंग अपने साथ खाने-पीने की बहुत सी चीजों के अलावा एक अच्छी खबर भी लाया था। नीचे शोनयांग नामी एक छोटा सा गाँव था और वहाँ से याम दरंग चार रोज के सफर की दूरी पर था। शोनयांग के बाद रास्ता इतना जटिल न था। गार से बाहर तेज बर्फीली हवाएँ चल रही थीं। रंग लंग ने चाय बनायी और खच्चर के सामने चारा डालते हुए बोला–
“श्रीमान! हमें यहाँ से फौरन निकल जाना चाहिए वरना यह हवाएँ मार डालेंगी। तूफान का अँदेशा भी है।”
जो आदमी बर्फीले इलाके में रहा हो और उसने तूफान देखे हों, वह तूफान की मात्र कल्पना से ही काँप उठा था। ऐसी ही हालत मेरी भी थी। रंग लंग का सुझाव बिल्कुल उपयुक्त था। बर्फीली हवाओं का शोर बढ़ता जा रहा था। हवाएँ चिंघाड़ने को तत्पर थीं और कहीं से चुपके-चुपके दम साधकर आ रही थीं। बर्फ का विप्लव कभी भी फट सकता था। एक मील चलने के बाद ही हवाओं का जोर बढ़ गया और आगे चलना दूभर हो गया। बर्फ के थपेड़े जबरदस्त थे। एक बार ऐसा थपेड़ा पड़ा कि मैं मुँह के बल जमीन पर गिर पड़ा।
“साहब! उठिए....यहाँ नहीं....यहाँ बर्फीले थपेड़े हमारी जान खींच लेंगे। जरा हिम्मत से काम लीजिये। बस नीचे पहुँच जाएँ तो सब ठीक हो जाएगा।”
उसने एक बार फिर मुझे सहारा देकर उठाया। मौत हवा के साथ लरज रही थी। बल्कि चिंघाड़ने लगी थी। रंग लंग ने खच्चर से कुछ सामान उतारकर उस पर डाल दिया और फिर हम गिरते-पड़ते नीचे उतरने लगे। शोनयांग के करीब से गुजरते हुए रंग लंग ने एक बार फिर पड़ाव डाला और फिर वह रात कुछ चैन से कटी। शोनयांग कोई बीस-पच्चीस घरों का एक छोटा सा गाँव था और उन लोगों ने हमारी खूब सेवा की।
अगले दिन हम याम दरंग जाने वाले रास्ते पर चल पड़े। तीसरे रोज दर्रा कोचनलाको पार करके हम जंगल में दाखिल हो गये। जंगल में पहुँचते ही शाम हो गयी, अतः वहीं उपयुक्त जगह देखकर हमने पड़ाव डाल दिया। रंग लंग अब पूरी तरह प्रफुल्लित था। याम दरंग अब करीब ही था और एकाध रोज का रास्ता शेष रह गया था।
अब तक मैं रंग लंग से याम दरंग के बारे में बहुत कुछ जान चुका था। उसने मुझे शैतान के मकबरे के बारे में भी बताया था जो खानकाह के ही आस-पास कहीं था; परन्तु पहाड़ों में दब गया था। वह बार-बार मुझे साहब और श्रीमान कहकर सम्बोधित करता था। एक बार मैंने उसे रोककर कहा–“आज से मुझे साहब कहकर सम्बोधित न करना।”
“तो फिर क्या कहूँ ?” रंग लंग ने पूछा।
“राज।”
वह मुस्कुरा दिया। वह जानता था मेरा तात्पर्य क्या है। मैं उसका दोस्त बनकर रहना चाहता था। कभी-कभार मेरे नाम का उच्चारण वह गलत भी करता था और चीनियों की तरह मानोस कह देता। लेकिन मुझे इस पर भी कोई ऐतराज नहीं था।
हम दोनों गहरे दोस्त बन गये थे। और अब मैं अपने को कुछ तरोताजा महसूस कर रहा था। ऐसा मालूम पड़ता था जैसे जहन से एक बोझ हटता जा रहा है और मैं फिर से आदमी की जून में लौटकर आया था। कभी-कभार मोहिनी की भी याद आ जाया करती थी। यह दिन उन दिनों से बहुत अच्छे थे। बेचारा रंग लंग क्या जानता था कि मैं क्या बला हूँ और मैंने जिंदगी का एक खास हिस्सा किस तरह जिया है।
दो रोज बाद हम एक ऊँची चट्टान को पार करके आगे बढ़े तो हमने देखा कि नीचे एक झील है जिसके ऊपर सफेद रंग के परिंदे परवाज कर रहे हैं और फिर कुछ ही देर बाद हमें याम दरंग की वह घाटी नजर आयी जो हमारी मंजिल थी।
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