अध्याय - 109
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"हां हम समझते हैं।" पिता जी ने कहने के साथ ही मेरी तरफ देखा___"अब तुम जाओ और आराम करो। तुम्हें फिलहाल इस सबके बारे में कुछ भी नहीं सोचना है। इस समय जो सबसे ज़्यादा ज़रूरी है हमें सिर्फ उसी पर ध्यान देना है।"
मैंने सहमति में सिर हिलाया और फिर बैठक से निकल कर हवेली के अंदर चला आया। मेरे दिलो दिमाग़ में बहुत सारी बातें थी जिन्हें सोचते हुए मैं सीधा ऊपर अपने कमरे की तरफ ही बढ़ता चला गया।
अब आगे....
अपने कमरे में पलंग पर मैं आंखें बंद किए लेटा हुआ था। ज़हन में कई सारी बातें चल रहीं थी जिनमें मैं उलझा हुआ था। तभी दरवाज़े पर दस्तक हुई जिससे मैं ख़यालों से बाहर आया। नज़र दरवाज़े पर पड़ी। वो अंदर से बंद नहीं था इस लिए मैंने लेटे लेटे ही आवाज़ दी कि आ जाओ। शाम हो चुकी थी अतः मैंने अनुमान लगाया कि कुसुम मेरे लिए चाय ले कर आई होगी। तभी दरवाज़ा खुला और मेरी उम्मीद के विपरीत कजरी अंदर दाखिल हुई। उसे देखते ही मेरा दिमाग़ ख़राब होने लगा। एक वक्त था जब लड़कियों को देखते ही मेरे अंदर हवस जाग उठती थी किंतु अब ऐसा नहीं था।
कजरी ने हमेशा की तरह घाघरा चोली वाला लिबास पहन रखा था जिसमें से उसके सीने के सुडौल उभार किसी पर्वत शिखर की तरह तने हुए प्रतीत होते थे। मुझ पर नज़र पड़ते ही वो मुस्कुराई और फिर मदमस्त तरीके से अपनी कमर लचकाते हुए मेरे पलंग की तरफ आने लगी। मेरी धड़कनें ना चाहते हुए भी असामान्य होने लगीं।
"हम आपके लिए चाय लाए हैं कुंवर जी।" मेरे पास आते ही उसने झुक कर हाथ में लिए हुए ट्रे को बढ़ाते हुए कहा____"आज की चाय हमने अपने हाथों से बनाई है और खास बात ये है कि इसमें हमने खास किस्म का दूध मिलाया है।"
आख़िरी वाक्य कहते हुए उसने अपनी आंखों को अजीब ढंग से अपने सीने की तरफ इशारा किया था। अनायास ही मेरी नज़र उसके सीने की तरफ घूम गई। झुके होने की वजह से उसकी चोली एकदम से नीचे की तरफ फैल गई थी जिसके अंदर उसकी छातियां लगभग पूरी ही नुमाया हो गईं थी। मेरा हलक ये देख कर सूख सा गया कि मुझे उसकी छातियों की घुंडियां तक स्पष्ट दिखाई दे रहीं थी।
"अगर चाय में दूध की मात्रा कम लगे तो बता दीजिए हमें।" उसने झुके हुए ही होठों पर मुस्कान बिखेरते हुए मादक अंदाज़ में कहा____"हम आपके लिए खास किस्म का दूध और ज़्यादा मात्रा में मिला देंगे।"
उसकी बात सुनते ही मैं चौंका और हड़बड़ा कर उसकी छातियों से नज़रें हटा लीं। मैंने नज़र उठा कर एक बार उसकी तरफ देखा और फिर ख़ामोशी से ट्रे में रखा कप उठा लिया। मेरे कप उठाते ही वो सीधा खड़ी हो गई।
"क्या अपने गांव में भी तुम लड़कों को ऐसे ही घटिया तरीके से अपने रूप जाल में फांसती थी?" मैंने उसकी तरफ देखते हुए सपाट लहजे से कहा____"वैसे कितनों के साथ तुमने अपनी ये हवस मिटाई है?"
"छ...छोटे कुंवर?" मेरी बात सुनते ही पहले तो वो बुरी तरह हड़बड़ा गई लेकिन जल्दी ही अपने तेवर बदल कर बोली____"ये किस तरीके से बात कर रहे हैं आप हमसे? आप हमारे बारे में ऐसा कैसे बोल सकते हैं? हम आपकी शिकायत दादा ठाकुर से कर देंगे।"
"तुम्हारी जानकारी के लिए बता दूं कि किसी की गीदड़ भभकियों से ठाकुर वैभव सिंह बाल बराबर भी नहीं डरता।" मैंने सर्द लहजे में कहा____"मैं कई दिनों से तुम्हारी ये घटिया हरकतें देख रहा हूं। क्या समझती हो तुम कि अपनी इन घटिया हरकतों से और अपनी ये छातियां दिखा कर तुम मुझे अपने रूप जाल में फांस लोगी? अरे! मूर्ख लड़की, तुझे पता ही नहीं है कि तेरे जैसी ना जाने कितनी ही लड़कियों को रौंद चुका हूं मैं। अभी तक मैं इस लिए चुप था क्योंकि मैं नहीं चाहता था कि तेरी वजह से तेरे माता पिता को शर्मिंदा होना पड़े और उनका बोरिया बिस्तर उठा कर इस हवेली से बाहर फेंक दिया जाए।"
"अ...आप ये क्या अनाप शनाप बोले जा रहे हैं हमें?" कजरी बुरी तरह भौचक्की अवस्था में बड़ी मुश्किल से बोली____"हम ऐसी वैसी नहीं हैं। आप हमसे इस लहजे में बात नहीं कर सकते।"
"तुम्हें अभी मेरे लहजे का अंदाज़ा ही नहीं है लड़की।" मैंने सख़्त भाव से कहा____"मैं चाहूं तो इसी वक्त तुम्हें तुम्हारे बालों से खींचते हुए नीचे पिता जी के पास ले जाऊं और तुम्हारी करतूतों का बखान सबके सामने कर दूं।"
मेरी आवाज़ गुस्सा होने के चलते थोड़ा तेज़ हो गई थी जो कदाचित कमरे से बाहर तक पहुंच गई थी। जल्दी ही भागते हुए कुसुम आई और दरवाज़े पर ठिठक गई।
"क...क्या हुआ भैया?" फिर उसने हांफते हुए किंतु घबरा कर पूछा____"आप इतना ज़ोर से किससे बात कर रहे हैं?"
"अपनी इस सहेली को यहां से ले जा।" मैंने गुस्से से कहा____"और समझा दे इसे कि इस हवेली में रहना है तो क़ायदे से रहे वरना मुझे एक मिनट भी नहीं लगेगा इसे इस हवेली से बाहर फेंकने में।"
मेरी बात सुनते ही कुसुम आश्चर्य से मेरी तरफ देखने लगी। शायद उसे समझ नहीं आया था कि आख़िर ऐसा क्या हो गया है जिसके चलते मैं इतने गुस्से में कजरी के बारे में ऐसा बोल रहा हूं। वो हड़बड़ा कर जल्दी से अन्दर आई। इधर कजरी इस तरह खड़ी रह गई थी जैसे पत्थर की मूर्ति में बदल गई हो। कुसुम ने आते ही उसे झिंझोड़ा तो उसे होश आया। अगले ही पल वो कुसुम को देख कर चमत्कारिक ढंग से रोने लगी। ये देख कर कुसुम उसे हैरानी से देखने लगी। अभी वो उससे कुछ कहने ही वाली थी कि तभी दरवाज़े के अंदर भाभी दाखिल हुईं। उनके चेहरे पर अजीब सख़्ती के भाव थे।
"ब...बात क्या है कजरी?" उधर कुसुम ने कजरी को रोते देखा तो उससे पूछा____"आख़िर तुम रो क्यों रही हो?"
"हमने कुछ नहीं किया है कुसुम।" कजरी ने रोते हुए कहा____"फिर भी छोटे कुंवर हमें जाने क्या क्या बोलने लगे। हमारे बारे में गंदा गंदा बोलने लगे।"
"ख़ामोश।" इससे पहले कि मैं कुछ कहता कमरे में भाभी की तेज़ आवाज़ गूंज उठी। कुसुम तो नहीं चौंकी लेकिन कजरी बुरी तरह उछल पड़ी। भाभी को यहां देख कर और उनके चेहरे पर मौजूद गुस्से को देख कर घबरा गई वह।
"मेरे देवर पर झूठा इल्ज़ाम लगाओगी तो हलक से ज़ुबान खींच लूंगी तुम्हारी।" भाभी ने उसके क़रीब आ कर तथा गुस्से से उसे खा जाने वाली नज़रों से देखते हुए कहा____"तुम्हारे पीछे पीछे ही आई थी मैं और दरवाज़े के पास ही खड़ी हो गई थी। तुम यहां वैभव से खास किस्म का दूध चाय में मिलाने की बातें कर रही थी ना, वो सब सुन चुकी हूं मैं। तुम्हारा चाल चलन मुझे दूसरे दिन से ही खटकने लगा था और तभी से मैं तुम पर नज़र रखने लगी थी। मैं देखना चाहती थी कि तुम्हारी हद कहां तक है? तुम्हें शर्म नहीं आती खुले आम ऐसी घटिया हरकतें करते हुए?"
भाभी की बातें सुनते ही कजरी झपट कर भाभी के पैरों में गिर पड़ी और फिर उनके पैरों को पकड़ रोते हुए माफ़ियां मांगने लगी। वो समझ गई थी कि उसकी पोल खुल चुकी है। कुसुम तो भोली थी जिसे वो अपनी बातों से समझा देती कि उसकी कोई ग़लती नहीं है लेकिन भाभी के बारे में शायद उसने नहीं सोचा था।
कजरी बुरी तरह भाभी के पैर पकड़े रोए जा रही थी और उनसे माफ़ियां मांग रही थी। कुसुम भौचक्की सी उसका रोना धोना देखे जा रही थी। इधर मैं ये सोच रहा था कि अच्छा हुआ जो भाभी ने भी उसकी करतूतों को सुन लिया था और साथ ही मैंने ये भी सोचा कि अच्छा हुआ जो मैंने हवस में अंधा हो कर कजरी के साथ कुछ ग़लत करने का नहीं सोचा वरना भाभी को पता चल जाता और फिर मैं उन्हें कोई जवाब न दे पाता।
"चुप हो जाओ अब।" भाभी ने इस बार थोड़ा सामान्य हो कर कजरी से कहा____"इस बार तो माफ़ कर रही हूं तुम्हें लेकिन अगर तुमने दुबारा ऐसी ओछी हरकत की तो समझ लेना मैं खुद तुम्हें धक्के मार कर इस हवेली से बाहर फेंक दूंगी।"
कजरी, जान बची लाखों पाए वाली बात सोच कर जल्दी से उठी और आइंदा ऐसा न करने का वचन दे कर कमरे से भाग गई। कुसुम अभी भी चकित अवस्था में खड़ी थी।
"और तुम।" भाभी ने कुसुम को पुकारते हुए कहा____"आज के बाद उससे दूर रहना। मैं नहीं चाहती कि मेरी भोली भाली ननद पर ज़रा सा भी उस घटिया लड़की का साया पड़े।"
"ज...जी भाभी।" कुसुम ने धीमें से सिर हिलाते हुए कहा____"अब से मैं उससे बिल्कुल भी बात नहीं करूंगी। मैंने उसे कई बार मना किया था कि वो भैया के कमरे में न जाया करे लेकिन वो ही नहीं मानती थी। मुझे नहीं पता था कि उसके मन में क्या है।"
"ठीक है लेकिन अब से ख़याल रखना।" भाभी ने प्यार से उसका चेहरा सहलाया और फिर कहा____"अब तुम जाओ और हां, इस बारे में फिलहाल किसी को कुछ मत बताना।"
कुसुम सिर हिला कर कमरे से चली गई। कुसुम के जाने के बाद कमरे में कुछ देर तक सन्नाटा छाया रहा। मैं भी ख़ामोशी से चाय पीने में व्यस्त हो गया। ये अलग बात है कि मेरे दिलो दिमाग़ में कई सारी बातें उछल कूद मचाए हुए थीं।
"उसको अनाप शनाप बोलने की क्या ज़रूरत थी तुम्हें?" सहसा सन्नाटे को भेदते हुए भाभी ने मेरे क़रीब आ कर कहा____"उसको सभ्य तरीके से तथा साफ शब्दों में भी समझा सकते थे तुम?"
"मैं क्या करता भाभी?" मैंने जैसे अपनी सफाई पेश की____"उसकी वैसी बातें सुन कर और वैसी हरकत देख कर गुस्सा ही इस क़दर आ गया था कि फिर मुझे अपने लहजे का ख़याल ही नहीं रह गया था। मैं काफी दिनों से उसकी हरकतों को और उसकी बातों को नज़रअंदाज़ कर रहा था। यही सोचता था कि अगर मेरी वजह से उसकी करतूतों के बारे में उसके माता पिता को पता चला तो वो बेचारे कितना शर्मिंदा होंगे। इधर ये थी कि अपनी हरकतों से बाज ही नहीं आ रही थी। मैंने भी सोच लिया था कि इसको अब अपने तरीके से ही समझाना पड़ेगा। तभी शायद इसको अकल आएगी।"
"हां देखा मैंने तुम्हारा तरीका।" भाभी ने मुझे घूरते हुए कहा____"इसी लिए वो कुसुम के आते ही रोते हुए सारा दोष तुम पर ही लगाने लगी थी। वो तो अच्छा हुआ कि मैं बाहर ही छुपी खड़ी उसकी बातें सुन रही थी और फिर यहां आ कर उसे लताड़ लगा दी वरना मुझे यकीन है कि वो अभी हिम्मत हारने वाली नहीं थी।"
"अगर हिम्मत न हारती तो फिर उसका इलाज़ वही होता जो मैं उसे बता चुका था।" मैंने कहा____"फिर मैं किसी की भी परवाह नहीं करता और उसको बालों से घसीट कर हवेली से बाहर फेंक देता।"
"ऐसा करना बिल्कुल भी उचित नहीं होता वैभव।" भाभी ने कहा____"क्योंकि इससे बात बढ़ जाती और यकीनन हवेली से बाहर भी पहुंच जाती। लोगों को जब पता चलता तो वो यही सोचते कि इस सब में लड़की की नहीं बल्कि तुम्हारी ही ग़लती रही होगी। आख़िर तुम्हारे चरित्र के बारे में तो सारी दुनिया को पता ही है।"
भाभी की ये बात सुन कर मैं फ़ौरन कुछ कह न सका। उन्होंने बिल्कुल सच कहा था। वाकई में लोग मुझे ही ग़लत कहते और एक बार फिर से मेरे कारण मेरे पिता जी को सबके सामने शर्मिंदा होना पड़ता।
"ख़ैर छोड़ो अब इस बात को। मेरा ख़याल है अब वो दुबारा ऐसा कुछ करने का सोचेगी भी नहीं।" भाभी ने कहा____"अच्छा ये तो बताओ अपनी अनुराधा से मिले कि नहीं?"
भाभी के मुख से अनुराधा का नाम सुनते ही मेरे दिल में एकदम से मीठी मीठी गुदगुदी होने लगी। कजरी के आने से और उसकी हरकतों से जो कड़वाहट तथा गुस्सा मेरे अंदर पैदा हुआ था वो पलक झपकते ही दूर हो गया। मैंने देखा, भाभी मुस्कुराते हुए मुझे ही देखे जा रहीं थी। आंखों में जवाब सुनने की उत्सुकता थी उनके। उन्हें मुस्कुराता देख मेरे होठों पर भी मुस्कान उभर आई।
"हम्म्म्म समझ गई।" भाभी ने कहा____"यानि अपनी अनुराधा से मिल चुके हो तुम।"
"अरे! लेकिन आप ये कैसे कह सकती हैं?" मैं उनकी बात सुनते ही चकित हो कर बोल पड़ा।
"तुम्हारे होठों पर उभर आई मुस्कान ने मुझे बता दिया है कि तुम मिल चुके हो उससे।" भाभी ने कहा____"मैं तुम्हारा चेहरा देख कर बता सकती हूं कि तुम कब झूठ बोलते हो और कब सच। इस लिए इस बारे में झूठ बोलने का कोई फ़ायदा नहीं है। तो बताओ, कैसी रही मुलाक़ात?"
भाभी मुस्कुराते हुए मुझे देखने लगीं। मैं हैरान था कि आख़िर क्या चीज़ हैं ये? ख़ैर अब झूठ बोलने का सच में ही कोई फ़ायदा नहीं था इस लिए मैंने उन्हें सब कुछ सच सच बता दिया।
"तुम तो बड़े शैतान निकले।" भाभी ने मुझे घूरते हुए कहा____"उस मासूम से इस तरीके से अपना स्वागत करवाना चाहते थे तुम?"
भाभी की इस बात से मैं बुरी तरह झेंप गया और साथ ही शर्म से सिर झुका लिया मैंने। भाभी मेरी हालत पर मंद मंद मुस्कुराने लगीं।
"सरोज काकी के आ जाने से काम ख़राब हो गया भाभी।" फिर मैंने कहा____"जी तो यही चाहता था कि उसके पास ही रहूं और पहरों उससे प्रेम की बातें करता रहूं मगर....।"
"कोई बात नहीं।" भाभी ने कहा____"फिर किसी दिन उससे मिलने चले जाना। वैसे भी ये छोटी छोटी मुलाक़ातें ही इंसान के अंदर प्रेम के गहरे एहसास पैदा करती हैं और अपने चाहने वाले से मिलने के लिए बेक़रार करती हैं।"
"वाह! भाभी आपको तो प्रेम के बारे में बहुत कुछ पता है।" मैंने एकदम से मुस्कुरा कर कहा____"क्या आपने भी कभी किसी से प्रेम किया है?"
"सबका नसीब एक जैसा कहां होता है वैभव?" भाभी ने सहसा गंभीर हो कर कहा____"शादी से पहले किसी से प्रेम होने का सवाल ही नहीं था क्योंकि पाबंदियां बहुत थीं। शादी के बाद यहां आई तो तुम्हारे भैया को ही देखा। धीरे धीरे उन्हीं से प्रेम होने लगा।"
भैया का ज़िक्र आते ही मेरे अंदर हूक सी उठी। मैं एकदम से संजीदा हो गया। आंखों के सामने बड़े भैया का चेहरा चमक उठा। उनके साथ गुज़रे हुए लम्हें बिजली की तरह चमकने लगे। अचानक ही मेरी आंखें भर आईं। मैंने जल्दी से अपने दिलो दिमाग़ को झटका दिया और भाभी की तरफ देखा। उनकी भी आंखों में आंसू तैर रहे थे। मुझे लगा मैंने बेकार में ही प्रेम का ज़िक्र कर दिया।
कुछ देर और भाभी मेरे पास रुकीं फिर चाय का खाली कप ले कर कमरे से चली गईं। उनके जाने के बाद मैं फिर से जाने कैसे कैसे ख़यालों में गुम होता चला गया।
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अगली सुबह पिता जी के साथ मैं फिर से चंद्रकांत के यहां गया। वहां महेंद्र सिंह भी अपने छोटे भाई के साथ आए हुए थे। चंद्रकांत से पूछताछ में पता चला कि पिछली रात भी सफ़ेदपोश उससे मिलने नहीं आया और वो उसके इंतज़ार में सारी रात बाहर ही बैठा रहा था। पहले दिन की तरह ही हम किसी नतीजे पर न पहुंच सके थे।
ऐसे ही दो चार दिन और गुज़र गए लेकिन सफ़ेदपोश नहीं आया। अब लगभग सबको समझ आ गया था कि सफ़ेदपोश के न आने की वजह क्या थी। स्पष्ट था कि उसने चंद्रकांत को जो कुछ बताया था वो सरासर झूठ था और उसने अपने किसी ख़ास मकसद के चलते ही चंद्रकांत के हाथों उसकी ही बहू को मरवा डाला था।
बड़े गंभीर हालात बन गए थे। चंद्रकांत की हालत अब ऐसी हो गई थी जैसे वो ज़िंदा लाश में तब्दील हो गया हो। वो अब किसी से कोई बात नहीं करता था। बस गुमसुम सा बैठा रहता था और लगभग यही हाल उसकी बीवी का भी था। उसकी बेटी कोमल भी दुखी थी लेकिन अपने माता पिता की तरह पत्थर की मूरत नहीं बन गई थी वो। किसी तरह खुद को सम्हाले हुए थी वो।
ठाकुर महेंद्र सिंह ने फ़ैसले के रूप में चंद्रकांत को यही सज़ा सुनाई कि वो अपनी ही बहू की हत्या करने का बोझ लिए जीवन भर जिए। तब तक वो इस बात का पता लगाएंगे कि रघुवीर की हत्या वास्तव में किसने की और सफ़ेदपोश ने उसके साथ ऐसा क्यों किया?
कुछ दिन ऐसे ही गुज़र गए। इस बीच हमने गुप्त रूप से ऐसे आदमियों को लगा दिया था जो सफ़ेदपोश को देखते ही पकड़ लें। कहने का मतलब ये कि हमारी तरफ से सफ़ेदपोश को पकड़ने की कोई कसर बाकी नहीं थी लेकिन आश्चर्य की बात थी कि उस दिन के बाद से अभी तक सफ़ेदपोश किसी को भी नज़र नहीं आया था। इधर मैं और पिता जी उसके बारे में हर तरीके से सोच विचार कर रहे थे। अपने कुछ ख़ास आदमियों को हमने आस पास के कई गावों में भेज दिया था। मकसद यही था कि वो लोग ये पता कर सकें कि आस पास के गांव का कोई व्यक्ति हमारे प्रति क्या वैसी मानसिकता रखता है जिसकी हमें आशंका थी और जो सफ़ेदपोश के रूप में ये सब कर रहा है? अभी तक हमारे आदमियों को ऐसा कोई संदिग्ध व्यक्ति नज़र नहीं आया था।
इस वक्त बैठक में कई लोग बैठे हुए थे। जिनमें पिता जी के साथ साथ मैं, भुवन, किशोरी लाल और हमारे कुछ ऐसे ख़ास आदमी जो पिछले कुछ समय से हर जगह मौजूद थे और अब वो हर तरफ की ख़बर देने पिता जी के पास आए थे। उनमें शेरा भी था।
"बड़े आश्चर्य की बात है कि इतना समय गुज़र जाने के बाद भी और इतना कुछ करने के बाद भी हमारे हाथ कुछ नहीं लगा।" पिता जी ने निराशा पूर्ण भाव से कहा____"इसका मतलब तो यही हुआ कि हम घूम फिर कर पुनः वहीं पहुंच गए जहां आज से एक हफ़्ता पहले थे। यानि ना तो सफ़ेदपोश के बारे में कुछ पता चल सका और ना ही ये समझ आया कि आस पास के गांव का कोई व्यक्ति हमारे जैसी शख्सियत पाने के लिए बुरी मानसिकता के साथ हमारे खिलाफ़ ऐसा खेल खेल रहा है।"
"शातिर से शातिर व्यक्ति भी कभी न कभी कोई न कोई ऐसी भूल अथवा ग़लती ज़रूर करता है जिसके चलते इंसान उसके मंसूबों को ताड़ जाता है।" किशोरी लाल ने कहा____"इतना ही नहीं उस तक पहुंच भी जाता है लेकिन हैरत की बात है कि इन दस दिनों में हमारे किसी भी आदमी को ऐसा कोई व्यक्ति खोजने पर भी नहीं मिला। बल्कि ये कहें तो ग़लत न होगा कि ऐसे किसी व्यक्ति पर संदेह तक नहीं हुआ किसी को। इसका तो यही मतलब हो सकता है ठाकुर साहब कि या तो ऐसा करने वाला वो व्यक्ति हमारी सोच से भी कहीं ज़्यादा चतुर और चालाक है या फिर ऐसा कोई व्यक्ति है ही नहीं जिसके बारे में हम इस तरह की आशंका किए हुए हैं।"
"हां, अब तो यही कहा जा सकता है किशोरी लाल जी।" पिता जी ने कहा____"वरना हमारे आदमियों को इतने दिनों में किसी न किसी व्यक्ति पर संदेह तो ज़रूर हुआ होता।"
"तो क्या अब हम पूरी तरह ये मान लें कि हमारी आशंका बेवजह थी?" मैंने पिता जी की तरफ देखा____"अगर ऐसा है तो फिर वो कौन है जो सफ़ेदपोश के रूप में ये सब कर रहा है और हमारे लिए ख़तरा बना हुआ है? चंद्रकांत के हाथों उसकी ही बहू को मरवा कर उसने अपना कौन सा मकसद पूरा किया? ऐसे कई सवाल हैं पिता जी जिनका जवाब मिलना बेहद ज़रूरी है।"
"ज़रूरी तो है।" पिता जी ने गहरी सांस लेते हुए कहा____"लेकिन सारे सवालों के जवाब तो वो सफ़ेदपोश ही दे सकता है और जब तक वो हमारी पकड़ में नहीं आता तब तक उससे किसी सवाल का जवाब मिलने से रहा।"
"सबसे बड़ी समस्या तो यही है कि वो इन दस दिनों में कहीं नज़र ही नहीं आया है।" मैंने मुट्ठियां भींच कर कहा____"मैंने तो इस बार उसको पकड़ने के लिए तगड़ा जाल बिछा के रखा हुआ है। अगर वो हमारे बाग़ की तरफ आता तो इस बार वो ग़ायब नहीं हो सकता था लेकिन कमबख़्त आया ही नहीं वो।"
"अगर वो कोई बड़ा खेल खेलने का इरादा बनाए हुए है।" पिता जी ने कहा____"तो वो दुबारा ज़रूर नज़र आएगा। उसके नज़र ना आने के पीछे एक कारण ये हो सकता है कि उसे भी अपने लिए ख़तरे का एहसास हो गया होगा। वो भी समझ गया होगा कि हमने उसे पकड़ने के लिए तगड़ा जाल बिछा रखा है। ज़ाहिर है ऐसे में वो खुद को सुरक्षित रखना सबसे ज़्यादा ज़रूरी बात समझेगा। हमें लगता है कि वो हमारे आस पास ही मौजूद रहता है और हमारी हर गतिविधि पर नज़र रखता है। अब क्योंकि हम उसे शकल से पहचानते नहीं हैं इस लिए वो हमारी पहुंच से दूर ही है।"
"माना कि वो ख़तरा महसूस करने के चलते फिलहाल अपनी गतिविधियों को रोके हुए है।" किशोरी लाल ने कहा____"लेकिन कब तक? किसी दिन तो वो फिर से अपने काम को शुरू करेगा। ख़तरे से भयभीत हो कर वो अपने मकसद को तो नहीं छोड़ देगा?"
"सही कह रहे हैं आप?" पिता जी ने कहा____"यकीनन वो फिर से कुछ न कुछ करेगा। इस लिए हमें अपनी तरफ से पूरी तरह सतर्क रहना है और साथ ही ये ज़ाहिर करना है कि हम उसकी तरफ से पूरी तरह लापरवाह हैं। हमारा ख़याल है कि ऐसा देख कर ही वो कुछ करने के लिए अपने बिल से बाहर निकलेगा।"
"वो अपना हर काम रात के अंधेरे में ही करता है। क्योंकि अंधेरे में उसे किसी के द्वारा पकड़े जाने का ख़तरा नहीं रहता।" मैंने कहा____"इस लिए हमें अपने आदमियों को रात के समय ऐसी ऐसी जगहों पर स्थापित कर देना है जहां पर उसके आने और जाने की पूरी संभावना हो। मुझे पूरा यकीन है कि वो अब जब भी आएगा तो हमारे आदमियों के द्वारा ज़रूर पकड़ा जाएगा।"
"हम तो चाहते ही यही हैं कि वो जल्द से जल्द पकड़ा जाए।" पिता जी ने कहा____"ताकि उससे पता चल सके कि उसने ये सब क्यों किया है? ख़ैर, इसके अलावा और कोई ख़बर?"
"इसके अलावा एक अच्छी ख़बर ये है कि हमारे कुछ आदमियों ने इस गांव में ही नहीं बल्कि आस पास के सभी गांवों में भी जा कर ये पता किया है कि लोग हमारे बारे में कैसी सोच और राय रखते हैं।" मैंने पास ही खड़े हमारे कुछ आदमियों की तरफ देखने के बाद कहा____"इन लोगों के अनुसार लगभग हर जगह के लोग यही चाहते हैं कि आप ही उनके मुखिया और प्रजा पालक बनें।"
"ऐसा क्यों?" पिता जी ने उल्टा सवाल करते हुए पूछा____"क्या वो लोग अपने वर्तमान के मुखिया से खुश नहीं हैं?"
"लगता तो ऐसा ही है।" मैंने कहा____"क्योंकि अगर ऐसा न होता तो वो अपने ही गांव के इतने संपन्न व्यक्ति के बारे में ऐसे ख़याल नहीं रखते। मेरा मतलब है कि वो यही चाहते कि महेंद्र सिंह जी ही उनके मुखिया रहें। आख़िर युगों के बाद उनके गांव का कोई संपन्न व्यक्ति मुखिया के पद को पाया है।"
"तुम्हारे कहने का मतलब ये है कि वो लोग महेंद्र सिंह के आचार व्यवहार से खुश नहीं हैं?" पिता जी ने अपलक मेरी तरफ देखते हुए कहा____"और इस वजह से वो हमें ही मुखिया के रूप में देखना चाहते हैं?"
"यकीनन।" मैंने स्पष्ट भाव से कहा____"इससे ये भी ज़ाहिर होता है कि आपके मित्र महेंद्र सिंह जी बाहर से जो नज़र आते हैं वो अंदर से वैसे नहीं हैं। वैसे वो आपके गहरे मित्र हैं तो आपको भी उनके बारे में अच्छे से पता होगा।"
"हां पता तो है।" पिता जी ने कहा____"लेकिन हम ये भी मानते हैं कि हर इंसान की अपनी एक अलग सोच और विचारधारा होती है जिसके तहत वो अपने कर्म करता है और साथ ही लोगों से पेश आता है। महेंद्र सिंह के पुरखे जमींदारी करते थे किंतु गुज़रते वक्त के साथ हालात बदल गए और अब जमींदारी जैसी बात नहीं रही। हां, वो पहले से ही संपन्न थे जिसके चलते अभी भी वो अपना ठाठ बाट बनाए हुए हैं।"
"और शायद अपना रौब भी।" मैंने कहा____"वो भी ऐसा जो बाकी आम लोगों पर उनके मर्ज़ी के हिसाब से ज़बरदस्ती थोपा जाता होगा, है ना?"
"हां, लेकिन ऐसा तो लगभग हर उस इंसान के साथ होता है जो बाकियों से कहीं ज़्यादा साधन संपन्न होते हैं।" पिता जी ने कहा____"हमारे अपने पिता जी का रौब तो उनसे लाखों गुना ज़्यादा था तो उनके बारे में क्या कहोगे? हालाकि किसी के कहने की आवश्यकता ही नहीं है क्योंकि उनके बारे में सारी बातें लगभग जग ज़ाहिर ही थीं। तो कहने का मतलब ये है कि अपनी क्षमता के अनुसार ऐसा हर व्यक्ति इतना रौब रखता है। ये कोई बड़ी बात नहीं है।"
"बड़ी बात भले ही नहीं है।" मैंने तर्क़ दिया____"लेकिन ऐसी तो है ही कि उनके इस रौब अथवा आचरण की वजह से उनके ही गांव के लोग उन्हें मुखिया के रूप में देखना नहीं चाहते। अगर इस नज़रिए से सोचा जाए तो उनका किरदार लोगों की नज़र में निम्न दर्जे का हो जाता है।"
मेरी इस बात से पिता जी कुछ न बोले। चेहरे पर सोचो के भाव उभर आए थे उनके। कुछ देर की ख़ामोशी के बाद उन्होंने कहा____"ख़ैर इस मामले को फिलहाल बाद में देखा जाएगा, अभी सिर्फ ये ज़रूरी है कि वो सफ़ेदपोश हमारी पकड़ में आ जाए। उसका पकड़े जाना बेहद ज़रूरी है। जब तक वो यूं खुले आम घूम रहा है तब तक किसी न किसी अनिष्ट के होने की आशंका बनी ही रहेगी।"
कुछ देर और इसी संबंध में बातें हुईं उसके बाद पिता जी के कहने पर हम सब बैठक से बाहर निकल गए। हालाकि किशोरी लाल उनके पास ही बैठे रहे। इधर मैं अपनी मोटर साइकिल ले कर भुवन के साथ खेतों की तरफ निकल गया।
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"हां हम समझते हैं।" पिता जी ने कहने के साथ ही मेरी तरफ देखा___"अब तुम जाओ और आराम करो। तुम्हें फिलहाल इस सबके बारे में कुछ भी नहीं सोचना है। इस समय जो सबसे ज़्यादा ज़रूरी है हमें सिर्फ उसी पर ध्यान देना है।"
मैंने सहमति में सिर हिलाया और फिर बैठक से निकल कर हवेली के अंदर चला आया। मेरे दिलो दिमाग़ में बहुत सारी बातें थी जिन्हें सोचते हुए मैं सीधा ऊपर अपने कमरे की तरफ ही बढ़ता चला गया।
अब आगे....
अपने कमरे में पलंग पर मैं आंखें बंद किए लेटा हुआ था। ज़हन में कई सारी बातें चल रहीं थी जिनमें मैं उलझा हुआ था। तभी दरवाज़े पर दस्तक हुई जिससे मैं ख़यालों से बाहर आया। नज़र दरवाज़े पर पड़ी। वो अंदर से बंद नहीं था इस लिए मैंने लेटे लेटे ही आवाज़ दी कि आ जाओ। शाम हो चुकी थी अतः मैंने अनुमान लगाया कि कुसुम मेरे लिए चाय ले कर आई होगी। तभी दरवाज़ा खुला और मेरी उम्मीद के विपरीत कजरी अंदर दाखिल हुई। उसे देखते ही मेरा दिमाग़ ख़राब होने लगा। एक वक्त था जब लड़कियों को देखते ही मेरे अंदर हवस जाग उठती थी किंतु अब ऐसा नहीं था।
कजरी ने हमेशा की तरह घाघरा चोली वाला लिबास पहन रखा था जिसमें से उसके सीने के सुडौल उभार किसी पर्वत शिखर की तरह तने हुए प्रतीत होते थे। मुझ पर नज़र पड़ते ही वो मुस्कुराई और फिर मदमस्त तरीके से अपनी कमर लचकाते हुए मेरे पलंग की तरफ आने लगी। मेरी धड़कनें ना चाहते हुए भी असामान्य होने लगीं।
"हम आपके लिए चाय लाए हैं कुंवर जी।" मेरे पास आते ही उसने झुक कर हाथ में लिए हुए ट्रे को बढ़ाते हुए कहा____"आज की चाय हमने अपने हाथों से बनाई है और खास बात ये है कि इसमें हमने खास किस्म का दूध मिलाया है।"
आख़िरी वाक्य कहते हुए उसने अपनी आंखों को अजीब ढंग से अपने सीने की तरफ इशारा किया था। अनायास ही मेरी नज़र उसके सीने की तरफ घूम गई। झुके होने की वजह से उसकी चोली एकदम से नीचे की तरफ फैल गई थी जिसके अंदर उसकी छातियां लगभग पूरी ही नुमाया हो गईं थी। मेरा हलक ये देख कर सूख सा गया कि मुझे उसकी छातियों की घुंडियां तक स्पष्ट दिखाई दे रहीं थी।
"अगर चाय में दूध की मात्रा कम लगे तो बता दीजिए हमें।" उसने झुके हुए ही होठों पर मुस्कान बिखेरते हुए मादक अंदाज़ में कहा____"हम आपके लिए खास किस्म का दूध और ज़्यादा मात्रा में मिला देंगे।"
उसकी बात सुनते ही मैं चौंका और हड़बड़ा कर उसकी छातियों से नज़रें हटा लीं। मैंने नज़र उठा कर एक बार उसकी तरफ देखा और फिर ख़ामोशी से ट्रे में रखा कप उठा लिया। मेरे कप उठाते ही वो सीधा खड़ी हो गई।
"क्या अपने गांव में भी तुम लड़कों को ऐसे ही घटिया तरीके से अपने रूप जाल में फांसती थी?" मैंने उसकी तरफ देखते हुए सपाट लहजे से कहा____"वैसे कितनों के साथ तुमने अपनी ये हवस मिटाई है?"
"छ...छोटे कुंवर?" मेरी बात सुनते ही पहले तो वो बुरी तरह हड़बड़ा गई लेकिन जल्दी ही अपने तेवर बदल कर बोली____"ये किस तरीके से बात कर रहे हैं आप हमसे? आप हमारे बारे में ऐसा कैसे बोल सकते हैं? हम आपकी शिकायत दादा ठाकुर से कर देंगे।"
"तुम्हारी जानकारी के लिए बता दूं कि किसी की गीदड़ भभकियों से ठाकुर वैभव सिंह बाल बराबर भी नहीं डरता।" मैंने सर्द लहजे में कहा____"मैं कई दिनों से तुम्हारी ये घटिया हरकतें देख रहा हूं। क्या समझती हो तुम कि अपनी इन घटिया हरकतों से और अपनी ये छातियां दिखा कर तुम मुझे अपने रूप जाल में फांस लोगी? अरे! मूर्ख लड़की, तुझे पता ही नहीं है कि तेरे जैसी ना जाने कितनी ही लड़कियों को रौंद चुका हूं मैं। अभी तक मैं इस लिए चुप था क्योंकि मैं नहीं चाहता था कि तेरी वजह से तेरे माता पिता को शर्मिंदा होना पड़े और उनका बोरिया बिस्तर उठा कर इस हवेली से बाहर फेंक दिया जाए।"
"अ...आप ये क्या अनाप शनाप बोले जा रहे हैं हमें?" कजरी बुरी तरह भौचक्की अवस्था में बड़ी मुश्किल से बोली____"हम ऐसी वैसी नहीं हैं। आप हमसे इस लहजे में बात नहीं कर सकते।"
"तुम्हें अभी मेरे लहजे का अंदाज़ा ही नहीं है लड़की।" मैंने सख़्त भाव से कहा____"मैं चाहूं तो इसी वक्त तुम्हें तुम्हारे बालों से खींचते हुए नीचे पिता जी के पास ले जाऊं और तुम्हारी करतूतों का बखान सबके सामने कर दूं।"
मेरी आवाज़ गुस्सा होने के चलते थोड़ा तेज़ हो गई थी जो कदाचित कमरे से बाहर तक पहुंच गई थी। जल्दी ही भागते हुए कुसुम आई और दरवाज़े पर ठिठक गई।
"क...क्या हुआ भैया?" फिर उसने हांफते हुए किंतु घबरा कर पूछा____"आप इतना ज़ोर से किससे बात कर रहे हैं?"
"अपनी इस सहेली को यहां से ले जा।" मैंने गुस्से से कहा____"और समझा दे इसे कि इस हवेली में रहना है तो क़ायदे से रहे वरना मुझे एक मिनट भी नहीं लगेगा इसे इस हवेली से बाहर फेंकने में।"
मेरी बात सुनते ही कुसुम आश्चर्य से मेरी तरफ देखने लगी। शायद उसे समझ नहीं आया था कि आख़िर ऐसा क्या हो गया है जिसके चलते मैं इतने गुस्से में कजरी के बारे में ऐसा बोल रहा हूं। वो हड़बड़ा कर जल्दी से अन्दर आई। इधर कजरी इस तरह खड़ी रह गई थी जैसे पत्थर की मूर्ति में बदल गई हो। कुसुम ने आते ही उसे झिंझोड़ा तो उसे होश आया। अगले ही पल वो कुसुम को देख कर चमत्कारिक ढंग से रोने लगी। ये देख कर कुसुम उसे हैरानी से देखने लगी। अभी वो उससे कुछ कहने ही वाली थी कि तभी दरवाज़े के अंदर भाभी दाखिल हुईं। उनके चेहरे पर अजीब सख़्ती के भाव थे।
"ब...बात क्या है कजरी?" उधर कुसुम ने कजरी को रोते देखा तो उससे पूछा____"आख़िर तुम रो क्यों रही हो?"
"हमने कुछ नहीं किया है कुसुम।" कजरी ने रोते हुए कहा____"फिर भी छोटे कुंवर हमें जाने क्या क्या बोलने लगे। हमारे बारे में गंदा गंदा बोलने लगे।"
"ख़ामोश।" इससे पहले कि मैं कुछ कहता कमरे में भाभी की तेज़ आवाज़ गूंज उठी। कुसुम तो नहीं चौंकी लेकिन कजरी बुरी तरह उछल पड़ी। भाभी को यहां देख कर और उनके चेहरे पर मौजूद गुस्से को देख कर घबरा गई वह।
"मेरे देवर पर झूठा इल्ज़ाम लगाओगी तो हलक से ज़ुबान खींच लूंगी तुम्हारी।" भाभी ने उसके क़रीब आ कर तथा गुस्से से उसे खा जाने वाली नज़रों से देखते हुए कहा____"तुम्हारे पीछे पीछे ही आई थी मैं और दरवाज़े के पास ही खड़ी हो गई थी। तुम यहां वैभव से खास किस्म का दूध चाय में मिलाने की बातें कर रही थी ना, वो सब सुन चुकी हूं मैं। तुम्हारा चाल चलन मुझे दूसरे दिन से ही खटकने लगा था और तभी से मैं तुम पर नज़र रखने लगी थी। मैं देखना चाहती थी कि तुम्हारी हद कहां तक है? तुम्हें शर्म नहीं आती खुले आम ऐसी घटिया हरकतें करते हुए?"
भाभी की बातें सुनते ही कजरी झपट कर भाभी के पैरों में गिर पड़ी और फिर उनके पैरों को पकड़ रोते हुए माफ़ियां मांगने लगी। वो समझ गई थी कि उसकी पोल खुल चुकी है। कुसुम तो भोली थी जिसे वो अपनी बातों से समझा देती कि उसकी कोई ग़लती नहीं है लेकिन भाभी के बारे में शायद उसने नहीं सोचा था।
कजरी बुरी तरह भाभी के पैर पकड़े रोए जा रही थी और उनसे माफ़ियां मांग रही थी। कुसुम भौचक्की सी उसका रोना धोना देखे जा रही थी। इधर मैं ये सोच रहा था कि अच्छा हुआ जो भाभी ने भी उसकी करतूतों को सुन लिया था और साथ ही मैंने ये भी सोचा कि अच्छा हुआ जो मैंने हवस में अंधा हो कर कजरी के साथ कुछ ग़लत करने का नहीं सोचा वरना भाभी को पता चल जाता और फिर मैं उन्हें कोई जवाब न दे पाता।
"चुप हो जाओ अब।" भाभी ने इस बार थोड़ा सामान्य हो कर कजरी से कहा____"इस बार तो माफ़ कर रही हूं तुम्हें लेकिन अगर तुमने दुबारा ऐसी ओछी हरकत की तो समझ लेना मैं खुद तुम्हें धक्के मार कर इस हवेली से बाहर फेंक दूंगी।"
कजरी, जान बची लाखों पाए वाली बात सोच कर जल्दी से उठी और आइंदा ऐसा न करने का वचन दे कर कमरे से भाग गई। कुसुम अभी भी चकित अवस्था में खड़ी थी।
"और तुम।" भाभी ने कुसुम को पुकारते हुए कहा____"आज के बाद उससे दूर रहना। मैं नहीं चाहती कि मेरी भोली भाली ननद पर ज़रा सा भी उस घटिया लड़की का साया पड़े।"
"ज...जी भाभी।" कुसुम ने धीमें से सिर हिलाते हुए कहा____"अब से मैं उससे बिल्कुल भी बात नहीं करूंगी। मैंने उसे कई बार मना किया था कि वो भैया के कमरे में न जाया करे लेकिन वो ही नहीं मानती थी। मुझे नहीं पता था कि उसके मन में क्या है।"
"ठीक है लेकिन अब से ख़याल रखना।" भाभी ने प्यार से उसका चेहरा सहलाया और फिर कहा____"अब तुम जाओ और हां, इस बारे में फिलहाल किसी को कुछ मत बताना।"
कुसुम सिर हिला कर कमरे से चली गई। कुसुम के जाने के बाद कमरे में कुछ देर तक सन्नाटा छाया रहा। मैं भी ख़ामोशी से चाय पीने में व्यस्त हो गया। ये अलग बात है कि मेरे दिलो दिमाग़ में कई सारी बातें उछल कूद मचाए हुए थीं।
"उसको अनाप शनाप बोलने की क्या ज़रूरत थी तुम्हें?" सहसा सन्नाटे को भेदते हुए भाभी ने मेरे क़रीब आ कर कहा____"उसको सभ्य तरीके से तथा साफ शब्दों में भी समझा सकते थे तुम?"
"मैं क्या करता भाभी?" मैंने जैसे अपनी सफाई पेश की____"उसकी वैसी बातें सुन कर और वैसी हरकत देख कर गुस्सा ही इस क़दर आ गया था कि फिर मुझे अपने लहजे का ख़याल ही नहीं रह गया था। मैं काफी दिनों से उसकी हरकतों को और उसकी बातों को नज़रअंदाज़ कर रहा था। यही सोचता था कि अगर मेरी वजह से उसकी करतूतों के बारे में उसके माता पिता को पता चला तो वो बेचारे कितना शर्मिंदा होंगे। इधर ये थी कि अपनी हरकतों से बाज ही नहीं आ रही थी। मैंने भी सोच लिया था कि इसको अब अपने तरीके से ही समझाना पड़ेगा। तभी शायद इसको अकल आएगी।"
"हां देखा मैंने तुम्हारा तरीका।" भाभी ने मुझे घूरते हुए कहा____"इसी लिए वो कुसुम के आते ही रोते हुए सारा दोष तुम पर ही लगाने लगी थी। वो तो अच्छा हुआ कि मैं बाहर ही छुपी खड़ी उसकी बातें सुन रही थी और फिर यहां आ कर उसे लताड़ लगा दी वरना मुझे यकीन है कि वो अभी हिम्मत हारने वाली नहीं थी।"
"अगर हिम्मत न हारती तो फिर उसका इलाज़ वही होता जो मैं उसे बता चुका था।" मैंने कहा____"फिर मैं किसी की भी परवाह नहीं करता और उसको बालों से घसीट कर हवेली से बाहर फेंक देता।"
"ऐसा करना बिल्कुल भी उचित नहीं होता वैभव।" भाभी ने कहा____"क्योंकि इससे बात बढ़ जाती और यकीनन हवेली से बाहर भी पहुंच जाती। लोगों को जब पता चलता तो वो यही सोचते कि इस सब में लड़की की नहीं बल्कि तुम्हारी ही ग़लती रही होगी। आख़िर तुम्हारे चरित्र के बारे में तो सारी दुनिया को पता ही है।"
भाभी की ये बात सुन कर मैं फ़ौरन कुछ कह न सका। उन्होंने बिल्कुल सच कहा था। वाकई में लोग मुझे ही ग़लत कहते और एक बार फिर से मेरे कारण मेरे पिता जी को सबके सामने शर्मिंदा होना पड़ता।
"ख़ैर छोड़ो अब इस बात को। मेरा ख़याल है अब वो दुबारा ऐसा कुछ करने का सोचेगी भी नहीं।" भाभी ने कहा____"अच्छा ये तो बताओ अपनी अनुराधा से मिले कि नहीं?"
भाभी के मुख से अनुराधा का नाम सुनते ही मेरे दिल में एकदम से मीठी मीठी गुदगुदी होने लगी। कजरी के आने से और उसकी हरकतों से जो कड़वाहट तथा गुस्सा मेरे अंदर पैदा हुआ था वो पलक झपकते ही दूर हो गया। मैंने देखा, भाभी मुस्कुराते हुए मुझे ही देखे जा रहीं थी। आंखों में जवाब सुनने की उत्सुकता थी उनके। उन्हें मुस्कुराता देख मेरे होठों पर भी मुस्कान उभर आई।
"हम्म्म्म समझ गई।" भाभी ने कहा____"यानि अपनी अनुराधा से मिल चुके हो तुम।"
"अरे! लेकिन आप ये कैसे कह सकती हैं?" मैं उनकी बात सुनते ही चकित हो कर बोल पड़ा।
"तुम्हारे होठों पर उभर आई मुस्कान ने मुझे बता दिया है कि तुम मिल चुके हो उससे।" भाभी ने कहा____"मैं तुम्हारा चेहरा देख कर बता सकती हूं कि तुम कब झूठ बोलते हो और कब सच। इस लिए इस बारे में झूठ बोलने का कोई फ़ायदा नहीं है। तो बताओ, कैसी रही मुलाक़ात?"
भाभी मुस्कुराते हुए मुझे देखने लगीं। मैं हैरान था कि आख़िर क्या चीज़ हैं ये? ख़ैर अब झूठ बोलने का सच में ही कोई फ़ायदा नहीं था इस लिए मैंने उन्हें सब कुछ सच सच बता दिया।
"तुम तो बड़े शैतान निकले।" भाभी ने मुझे घूरते हुए कहा____"उस मासूम से इस तरीके से अपना स्वागत करवाना चाहते थे तुम?"
भाभी की इस बात से मैं बुरी तरह झेंप गया और साथ ही शर्म से सिर झुका लिया मैंने। भाभी मेरी हालत पर मंद मंद मुस्कुराने लगीं।
"सरोज काकी के आ जाने से काम ख़राब हो गया भाभी।" फिर मैंने कहा____"जी तो यही चाहता था कि उसके पास ही रहूं और पहरों उससे प्रेम की बातें करता रहूं मगर....।"
"कोई बात नहीं।" भाभी ने कहा____"फिर किसी दिन उससे मिलने चले जाना। वैसे भी ये छोटी छोटी मुलाक़ातें ही इंसान के अंदर प्रेम के गहरे एहसास पैदा करती हैं और अपने चाहने वाले से मिलने के लिए बेक़रार करती हैं।"
"वाह! भाभी आपको तो प्रेम के बारे में बहुत कुछ पता है।" मैंने एकदम से मुस्कुरा कर कहा____"क्या आपने भी कभी किसी से प्रेम किया है?"
"सबका नसीब एक जैसा कहां होता है वैभव?" भाभी ने सहसा गंभीर हो कर कहा____"शादी से पहले किसी से प्रेम होने का सवाल ही नहीं था क्योंकि पाबंदियां बहुत थीं। शादी के बाद यहां आई तो तुम्हारे भैया को ही देखा। धीरे धीरे उन्हीं से प्रेम होने लगा।"
भैया का ज़िक्र आते ही मेरे अंदर हूक सी उठी। मैं एकदम से संजीदा हो गया। आंखों के सामने बड़े भैया का चेहरा चमक उठा। उनके साथ गुज़रे हुए लम्हें बिजली की तरह चमकने लगे। अचानक ही मेरी आंखें भर आईं। मैंने जल्दी से अपने दिलो दिमाग़ को झटका दिया और भाभी की तरफ देखा। उनकी भी आंखों में आंसू तैर रहे थे। मुझे लगा मैंने बेकार में ही प्रेम का ज़िक्र कर दिया।
कुछ देर और भाभी मेरे पास रुकीं फिर चाय का खाली कप ले कर कमरे से चली गईं। उनके जाने के बाद मैं फिर से जाने कैसे कैसे ख़यालों में गुम होता चला गया।
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अगली सुबह पिता जी के साथ मैं फिर से चंद्रकांत के यहां गया। वहां महेंद्र सिंह भी अपने छोटे भाई के साथ आए हुए थे। चंद्रकांत से पूछताछ में पता चला कि पिछली रात भी सफ़ेदपोश उससे मिलने नहीं आया और वो उसके इंतज़ार में सारी रात बाहर ही बैठा रहा था। पहले दिन की तरह ही हम किसी नतीजे पर न पहुंच सके थे।
ऐसे ही दो चार दिन और गुज़र गए लेकिन सफ़ेदपोश नहीं आया। अब लगभग सबको समझ आ गया था कि सफ़ेदपोश के न आने की वजह क्या थी। स्पष्ट था कि उसने चंद्रकांत को जो कुछ बताया था वो सरासर झूठ था और उसने अपने किसी ख़ास मकसद के चलते ही चंद्रकांत के हाथों उसकी ही बहू को मरवा डाला था।
बड़े गंभीर हालात बन गए थे। चंद्रकांत की हालत अब ऐसी हो गई थी जैसे वो ज़िंदा लाश में तब्दील हो गया हो। वो अब किसी से कोई बात नहीं करता था। बस गुमसुम सा बैठा रहता था और लगभग यही हाल उसकी बीवी का भी था। उसकी बेटी कोमल भी दुखी थी लेकिन अपने माता पिता की तरह पत्थर की मूरत नहीं बन गई थी वो। किसी तरह खुद को सम्हाले हुए थी वो।
ठाकुर महेंद्र सिंह ने फ़ैसले के रूप में चंद्रकांत को यही सज़ा सुनाई कि वो अपनी ही बहू की हत्या करने का बोझ लिए जीवन भर जिए। तब तक वो इस बात का पता लगाएंगे कि रघुवीर की हत्या वास्तव में किसने की और सफ़ेदपोश ने उसके साथ ऐसा क्यों किया?
कुछ दिन ऐसे ही गुज़र गए। इस बीच हमने गुप्त रूप से ऐसे आदमियों को लगा दिया था जो सफ़ेदपोश को देखते ही पकड़ लें। कहने का मतलब ये कि हमारी तरफ से सफ़ेदपोश को पकड़ने की कोई कसर बाकी नहीं थी लेकिन आश्चर्य की बात थी कि उस दिन के बाद से अभी तक सफ़ेदपोश किसी को भी नज़र नहीं आया था। इधर मैं और पिता जी उसके बारे में हर तरीके से सोच विचार कर रहे थे। अपने कुछ ख़ास आदमियों को हमने आस पास के कई गावों में भेज दिया था। मकसद यही था कि वो लोग ये पता कर सकें कि आस पास के गांव का कोई व्यक्ति हमारे प्रति क्या वैसी मानसिकता रखता है जिसकी हमें आशंका थी और जो सफ़ेदपोश के रूप में ये सब कर रहा है? अभी तक हमारे आदमियों को ऐसा कोई संदिग्ध व्यक्ति नज़र नहीं आया था।
इस वक्त बैठक में कई लोग बैठे हुए थे। जिनमें पिता जी के साथ साथ मैं, भुवन, किशोरी लाल और हमारे कुछ ऐसे ख़ास आदमी जो पिछले कुछ समय से हर जगह मौजूद थे और अब वो हर तरफ की ख़बर देने पिता जी के पास आए थे। उनमें शेरा भी था।
"बड़े आश्चर्य की बात है कि इतना समय गुज़र जाने के बाद भी और इतना कुछ करने के बाद भी हमारे हाथ कुछ नहीं लगा।" पिता जी ने निराशा पूर्ण भाव से कहा____"इसका मतलब तो यही हुआ कि हम घूम फिर कर पुनः वहीं पहुंच गए जहां आज से एक हफ़्ता पहले थे। यानि ना तो सफ़ेदपोश के बारे में कुछ पता चल सका और ना ही ये समझ आया कि आस पास के गांव का कोई व्यक्ति हमारे जैसी शख्सियत पाने के लिए बुरी मानसिकता के साथ हमारे खिलाफ़ ऐसा खेल खेल रहा है।"
"शातिर से शातिर व्यक्ति भी कभी न कभी कोई न कोई ऐसी भूल अथवा ग़लती ज़रूर करता है जिसके चलते इंसान उसके मंसूबों को ताड़ जाता है।" किशोरी लाल ने कहा____"इतना ही नहीं उस तक पहुंच भी जाता है लेकिन हैरत की बात है कि इन दस दिनों में हमारे किसी भी आदमी को ऐसा कोई व्यक्ति खोजने पर भी नहीं मिला। बल्कि ये कहें तो ग़लत न होगा कि ऐसे किसी व्यक्ति पर संदेह तक नहीं हुआ किसी को। इसका तो यही मतलब हो सकता है ठाकुर साहब कि या तो ऐसा करने वाला वो व्यक्ति हमारी सोच से भी कहीं ज़्यादा चतुर और चालाक है या फिर ऐसा कोई व्यक्ति है ही नहीं जिसके बारे में हम इस तरह की आशंका किए हुए हैं।"
"हां, अब तो यही कहा जा सकता है किशोरी लाल जी।" पिता जी ने कहा____"वरना हमारे आदमियों को इतने दिनों में किसी न किसी व्यक्ति पर संदेह तो ज़रूर हुआ होता।"
"तो क्या अब हम पूरी तरह ये मान लें कि हमारी आशंका बेवजह थी?" मैंने पिता जी की तरफ देखा____"अगर ऐसा है तो फिर वो कौन है जो सफ़ेदपोश के रूप में ये सब कर रहा है और हमारे लिए ख़तरा बना हुआ है? चंद्रकांत के हाथों उसकी ही बहू को मरवा कर उसने अपना कौन सा मकसद पूरा किया? ऐसे कई सवाल हैं पिता जी जिनका जवाब मिलना बेहद ज़रूरी है।"
"ज़रूरी तो है।" पिता जी ने गहरी सांस लेते हुए कहा____"लेकिन सारे सवालों के जवाब तो वो सफ़ेदपोश ही दे सकता है और जब तक वो हमारी पकड़ में नहीं आता तब तक उससे किसी सवाल का जवाब मिलने से रहा।"
"सबसे बड़ी समस्या तो यही है कि वो इन दस दिनों में कहीं नज़र ही नहीं आया है।" मैंने मुट्ठियां भींच कर कहा____"मैंने तो इस बार उसको पकड़ने के लिए तगड़ा जाल बिछा के रखा हुआ है। अगर वो हमारे बाग़ की तरफ आता तो इस बार वो ग़ायब नहीं हो सकता था लेकिन कमबख़्त आया ही नहीं वो।"
"अगर वो कोई बड़ा खेल खेलने का इरादा बनाए हुए है।" पिता जी ने कहा____"तो वो दुबारा ज़रूर नज़र आएगा। उसके नज़र ना आने के पीछे एक कारण ये हो सकता है कि उसे भी अपने लिए ख़तरे का एहसास हो गया होगा। वो भी समझ गया होगा कि हमने उसे पकड़ने के लिए तगड़ा जाल बिछा रखा है। ज़ाहिर है ऐसे में वो खुद को सुरक्षित रखना सबसे ज़्यादा ज़रूरी बात समझेगा। हमें लगता है कि वो हमारे आस पास ही मौजूद रहता है और हमारी हर गतिविधि पर नज़र रखता है। अब क्योंकि हम उसे शकल से पहचानते नहीं हैं इस लिए वो हमारी पहुंच से दूर ही है।"
"माना कि वो ख़तरा महसूस करने के चलते फिलहाल अपनी गतिविधियों को रोके हुए है।" किशोरी लाल ने कहा____"लेकिन कब तक? किसी दिन तो वो फिर से अपने काम को शुरू करेगा। ख़तरे से भयभीत हो कर वो अपने मकसद को तो नहीं छोड़ देगा?"
"सही कह रहे हैं आप?" पिता जी ने कहा____"यकीनन वो फिर से कुछ न कुछ करेगा। इस लिए हमें अपनी तरफ से पूरी तरह सतर्क रहना है और साथ ही ये ज़ाहिर करना है कि हम उसकी तरफ से पूरी तरह लापरवाह हैं। हमारा ख़याल है कि ऐसा देख कर ही वो कुछ करने के लिए अपने बिल से बाहर निकलेगा।"
"वो अपना हर काम रात के अंधेरे में ही करता है। क्योंकि अंधेरे में उसे किसी के द्वारा पकड़े जाने का ख़तरा नहीं रहता।" मैंने कहा____"इस लिए हमें अपने आदमियों को रात के समय ऐसी ऐसी जगहों पर स्थापित कर देना है जहां पर उसके आने और जाने की पूरी संभावना हो। मुझे पूरा यकीन है कि वो अब जब भी आएगा तो हमारे आदमियों के द्वारा ज़रूर पकड़ा जाएगा।"
"हम तो चाहते ही यही हैं कि वो जल्द से जल्द पकड़ा जाए।" पिता जी ने कहा____"ताकि उससे पता चल सके कि उसने ये सब क्यों किया है? ख़ैर, इसके अलावा और कोई ख़बर?"
"इसके अलावा एक अच्छी ख़बर ये है कि हमारे कुछ आदमियों ने इस गांव में ही नहीं बल्कि आस पास के सभी गांवों में भी जा कर ये पता किया है कि लोग हमारे बारे में कैसी सोच और राय रखते हैं।" मैंने पास ही खड़े हमारे कुछ आदमियों की तरफ देखने के बाद कहा____"इन लोगों के अनुसार लगभग हर जगह के लोग यही चाहते हैं कि आप ही उनके मुखिया और प्रजा पालक बनें।"
"ऐसा क्यों?" पिता जी ने उल्टा सवाल करते हुए पूछा____"क्या वो लोग अपने वर्तमान के मुखिया से खुश नहीं हैं?"
"लगता तो ऐसा ही है।" मैंने कहा____"क्योंकि अगर ऐसा न होता तो वो अपने ही गांव के इतने संपन्न व्यक्ति के बारे में ऐसे ख़याल नहीं रखते। मेरा मतलब है कि वो यही चाहते कि महेंद्र सिंह जी ही उनके मुखिया रहें। आख़िर युगों के बाद उनके गांव का कोई संपन्न व्यक्ति मुखिया के पद को पाया है।"
"तुम्हारे कहने का मतलब ये है कि वो लोग महेंद्र सिंह के आचार व्यवहार से खुश नहीं हैं?" पिता जी ने अपलक मेरी तरफ देखते हुए कहा____"और इस वजह से वो हमें ही मुखिया के रूप में देखना चाहते हैं?"
"यकीनन।" मैंने स्पष्ट भाव से कहा____"इससे ये भी ज़ाहिर होता है कि आपके मित्र महेंद्र सिंह जी बाहर से जो नज़र आते हैं वो अंदर से वैसे नहीं हैं। वैसे वो आपके गहरे मित्र हैं तो आपको भी उनके बारे में अच्छे से पता होगा।"
"हां पता तो है।" पिता जी ने कहा____"लेकिन हम ये भी मानते हैं कि हर इंसान की अपनी एक अलग सोच और विचारधारा होती है जिसके तहत वो अपने कर्म करता है और साथ ही लोगों से पेश आता है। महेंद्र सिंह के पुरखे जमींदारी करते थे किंतु गुज़रते वक्त के साथ हालात बदल गए और अब जमींदारी जैसी बात नहीं रही। हां, वो पहले से ही संपन्न थे जिसके चलते अभी भी वो अपना ठाठ बाट बनाए हुए हैं।"
"और शायद अपना रौब भी।" मैंने कहा____"वो भी ऐसा जो बाकी आम लोगों पर उनके मर्ज़ी के हिसाब से ज़बरदस्ती थोपा जाता होगा, है ना?"
"हां, लेकिन ऐसा तो लगभग हर उस इंसान के साथ होता है जो बाकियों से कहीं ज़्यादा साधन संपन्न होते हैं।" पिता जी ने कहा____"हमारे अपने पिता जी का रौब तो उनसे लाखों गुना ज़्यादा था तो उनके बारे में क्या कहोगे? हालाकि किसी के कहने की आवश्यकता ही नहीं है क्योंकि उनके बारे में सारी बातें लगभग जग ज़ाहिर ही थीं। तो कहने का मतलब ये है कि अपनी क्षमता के अनुसार ऐसा हर व्यक्ति इतना रौब रखता है। ये कोई बड़ी बात नहीं है।"
"बड़ी बात भले ही नहीं है।" मैंने तर्क़ दिया____"लेकिन ऐसी तो है ही कि उनके इस रौब अथवा आचरण की वजह से उनके ही गांव के लोग उन्हें मुखिया के रूप में देखना नहीं चाहते। अगर इस नज़रिए से सोचा जाए तो उनका किरदार लोगों की नज़र में निम्न दर्जे का हो जाता है।"
मेरी इस बात से पिता जी कुछ न बोले। चेहरे पर सोचो के भाव उभर आए थे उनके। कुछ देर की ख़ामोशी के बाद उन्होंने कहा____"ख़ैर इस मामले को फिलहाल बाद में देखा जाएगा, अभी सिर्फ ये ज़रूरी है कि वो सफ़ेदपोश हमारी पकड़ में आ जाए। उसका पकड़े जाना बेहद ज़रूरी है। जब तक वो यूं खुले आम घूम रहा है तब तक किसी न किसी अनिष्ट के होने की आशंका बनी ही रहेगी।"
कुछ देर और इसी संबंध में बातें हुईं उसके बाद पिता जी के कहने पर हम सब बैठक से बाहर निकल गए। हालाकि किशोरी लाल उनके पास ही बैठे रहे। इधर मैं अपनी मोटर साइकिल ले कर भुवन के साथ खेतों की तरफ निकल गया।