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Hindi Xkahani - प्यार का सबूत

अध्याय - 109
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"हां हम समझते हैं।" पिता जी ने कहने के साथ ही मेरी तरफ देखा___"अब तुम जाओ और आराम करो। तुम्हें फिलहाल इस सबके बारे में कुछ भी नहीं सोचना है। इस समय जो सबसे ज़्यादा ज़रूरी है हमें सिर्फ उसी पर ध्यान देना है।"

मैंने सहमति में सिर हिलाया और फिर बैठक से निकल कर हवेली के अंदर चला आया। मेरे दिलो दिमाग़ में बहुत सारी बातें थी जिन्हें सोचते हुए मैं सीधा ऊपर अपने कमरे की तरफ ही बढ़ता चला गया।

अब आगे....


अपने कमरे में पलंग पर मैं आंखें बंद किए लेटा हुआ था। ज़हन में कई सारी बातें चल रहीं थी जिनमें मैं उलझा हुआ था। तभी दरवाज़े पर दस्तक हुई जिससे मैं ख़यालों से बाहर आया। नज़र दरवाज़े पर पड़ी। वो अंदर से बंद नहीं था इस लिए मैंने लेटे लेटे ही आवाज़ दी कि आ जाओ। शाम हो चुकी थी अतः मैंने अनुमान लगाया कि कुसुम मेरे लिए चाय ले कर आई होगी। तभी दरवाज़ा खुला और मेरी उम्मीद के विपरीत कजरी अंदर दाखिल हुई। उसे देखते ही मेरा दिमाग़ ख़राब होने लगा। एक वक्त था जब लड़कियों को देखते ही मेरे अंदर हवस जाग उठती थी किंतु अब ऐसा नहीं था।

कजरी ने हमेशा की तरह घाघरा चोली वाला लिबास पहन रखा था जिसमें से उसके सीने के सुडौल उभार किसी पर्वत शिखर की तरह तने हुए प्रतीत होते थे। मुझ पर नज़र पड़ते ही वो मुस्कुराई और फिर मदमस्त तरीके से अपनी कमर लचकाते हुए मेरे पलंग की तरफ आने लगी। मेरी धड़कनें ना चाहते हुए भी असामान्य होने लगीं।

"हम आपके लिए चाय लाए हैं कुंवर जी।" मेरे पास आते ही उसने झुक कर हाथ में लिए हुए ट्रे को बढ़ाते हुए कहा____"आज की चाय हमने अपने हाथों से बनाई है और खास बात ये है कि इसमें हमने खास किस्म का दूध मिलाया है।"

आख़िरी वाक्य कहते हुए उसने अपनी आंखों को अजीब ढंग से अपने सीने की तरफ इशारा किया था। अनायास ही मेरी नज़र उसके सीने की तरफ घूम गई। झुके होने की वजह से उसकी चोली एकदम से नीचे की तरफ फैल गई थी जिसके अंदर उसकी छातियां लगभग पूरी ही नुमाया हो गईं थी। मेरा हलक ये देख कर सूख सा गया कि मुझे उसकी छातियों की घुंडियां तक स्पष्ट दिखाई दे रहीं थी।

"अगर चाय में दूध की मात्रा कम लगे तो बता दीजिए हमें।" उसने झुके हुए ही होठों पर मुस्कान बिखेरते हुए मादक अंदाज़ में कहा____"हम आपके लिए खास किस्म का दूध और ज़्यादा मात्रा में मिला देंगे।"

उसकी बात सुनते ही मैं चौंका और हड़बड़ा कर उसकी छातियों से नज़रें हटा लीं। मैंने नज़र उठा कर एक बार उसकी तरफ देखा और फिर ख़ामोशी से ट्रे में रखा कप उठा लिया। मेरे कप उठाते ही वो सीधा खड़ी हो गई।

"क्या अपने गांव में भी तुम लड़कों को ऐसे ही घटिया तरीके से अपने रूप जाल में फांसती थी?" मैंने उसकी तरफ देखते हुए सपाट लहजे से कहा____"वैसे कितनों के साथ तुमने अपनी ये हवस मिटाई है?"

"छ...छोटे कुंवर?" मेरी बात सुनते ही पहले तो वो बुरी तरह हड़बड़ा गई लेकिन जल्दी ही अपने तेवर बदल कर बोली____"ये किस तरीके से बात कर रहे हैं आप हमसे? आप हमारे बारे में ऐसा कैसे बोल सकते हैं? हम आपकी शिकायत दादा ठाकुर से कर देंगे।"

"तुम्हारी जानकारी के लिए बता दूं कि किसी की गीदड़ भभकियों से ठाकुर वैभव सिंह बाल बराबर भी नहीं डरता।" मैंने सर्द लहजे में कहा____"मैं कई दिनों से तुम्हारी ये घटिया हरकतें देख रहा हूं। क्या समझती हो तुम कि अपनी इन घटिया हरकतों से और अपनी ये छातियां दिखा कर तुम मुझे अपने रूप जाल में फांस लोगी? अरे! मूर्ख लड़की, तुझे पता ही नहीं है कि तेरे जैसी ना जाने कितनी ही लड़कियों को रौंद चुका हूं मैं। अभी तक मैं इस लिए चुप था क्योंकि मैं नहीं चाहता था कि तेरी वजह से तेरे माता पिता को शर्मिंदा होना पड़े और उनका बोरिया बिस्तर उठा कर इस हवेली से बाहर फेंक दिया जाए।"

"अ...आप ये क्या अनाप शनाप बोले जा रहे हैं हमें?" कजरी बुरी तरह भौचक्की अवस्था में बड़ी मुश्किल से बोली____"हम ऐसी वैसी नहीं हैं। आप हमसे इस लहजे में बात नहीं कर सकते।"

"तुम्हें अभी मेरे लहजे का अंदाज़ा ही नहीं है लड़की।" मैंने सख़्त भाव से कहा____"मैं चाहूं तो इसी वक्त तुम्हें तुम्हारे बालों से खींचते हुए नीचे पिता जी के पास ले जाऊं और तुम्हारी करतूतों का बखान सबके सामने कर दूं।"

मेरी आवाज़ गुस्सा होने के चलते थोड़ा तेज़ हो गई थी जो कदाचित कमरे से बाहर तक पहुंच गई थी। जल्दी ही भागते हुए कुसुम आई और दरवाज़े पर ठिठक गई।

"क...क्या हुआ भैया?" फिर उसने हांफते हुए किंतु घबरा कर पूछा____"आप इतना ज़ोर से किससे बात कर रहे हैं?"

"अपनी इस सहेली को यहां से ले जा।" मैंने गुस्से से कहा____"और समझा दे इसे कि इस हवेली में रहना है तो क़ायदे से रहे वरना मुझे एक मिनट भी नहीं लगेगा इसे इस हवेली से बाहर फेंकने में।"

मेरी बात सुनते ही कुसुम आश्चर्य से मेरी तरफ देखने लगी। शायद उसे समझ नहीं आया था कि आख़िर ऐसा क्या हो गया है जिसके चलते मैं इतने गुस्से में कजरी के बारे में ऐसा बोल रहा हूं। वो हड़बड़ा कर जल्दी से अन्दर आई। इधर कजरी इस तरह खड़ी रह गई थी जैसे पत्थर की मूर्ति में बदल गई हो। कुसुम ने आते ही उसे झिंझोड़ा तो उसे होश आया। अगले ही पल वो कुसुम को देख कर चमत्कारिक ढंग से रोने लगी। ये देख कर कुसुम उसे हैरानी से देखने लगी। अभी वो उससे कुछ कहने ही वाली थी कि तभी दरवाज़े के अंदर भाभी दाखिल हुईं। उनके चेहरे पर अजीब सख़्ती के भाव थे।

"ब...बात क्या है कजरी?" उधर कुसुम ने कजरी को रोते देखा तो उससे पूछा____"आख़िर तुम रो क्यों रही हो?"

"हमने कुछ नहीं किया है कुसुम।" कजरी ने रोते हुए कहा____"फिर भी छोटे कुंवर हमें जाने क्या क्या बोलने लगे। हमारे बारे में गंदा गंदा बोलने लगे।"

"ख़ामोश।" इससे पहले कि मैं कुछ कहता कमरे में भाभी की तेज़ आवाज़ गूंज उठी। कुसुम तो नहीं चौंकी लेकिन कजरी बुरी तरह उछल पड़ी। भाभी को यहां देख कर और उनके चेहरे पर मौजूद गुस्से को देख कर घबरा गई वह।

"मेरे देवर पर झूठा इल्ज़ाम लगाओगी तो हलक से ज़ुबान खींच लूंगी तुम्हारी।" भाभी ने उसके क़रीब आ कर तथा गुस्से से उसे खा जाने वाली नज़रों से देखते हुए कहा____"तुम्हारे पीछे पीछे ही आई थी मैं और दरवाज़े के पास ही खड़ी हो गई थी। तुम यहां वैभव से खास किस्म का दूध चाय में मिलाने की बातें कर रही थी ना, वो सब सुन चुकी हूं मैं। तुम्हारा चाल चलन मुझे दूसरे दिन से ही खटकने लगा था और तभी से मैं तुम पर नज़र रखने लगी थी। मैं देखना चाहती थी कि तुम्हारी हद कहां तक है? तुम्हें शर्म नहीं आती खुले आम ऐसी घटिया हरकतें करते हुए?"

भाभी की बातें सुनते ही कजरी झपट कर भाभी के पैरों में गिर पड़ी और फिर उनके पैरों को पकड़ रोते हुए माफ़ियां मांगने लगी। वो समझ गई थी कि उसकी पोल खुल चुकी है। कुसुम तो भोली थी जिसे वो अपनी बातों से समझा देती कि उसकी कोई ग़लती नहीं है लेकिन भाभी के बारे में शायद उसने नहीं सोचा था।

कजरी बुरी तरह भाभी के पैर पकड़े रोए जा रही थी और उनसे माफ़ियां मांग रही थी। कुसुम भौचक्की सी उसका रोना धोना देखे जा रही थी। इधर मैं ये सोच रहा था कि अच्छा हुआ जो भाभी ने भी उसकी करतूतों को सुन लिया था और साथ ही मैंने ये भी सोचा कि अच्छा हुआ जो मैंने हवस में अंधा हो कर कजरी के साथ कुछ ग़लत करने का नहीं सोचा वरना भाभी को पता चल जाता और फिर मैं उन्हें कोई जवाब न दे पाता।

"चुप हो जाओ अब।" भाभी ने इस बार थोड़ा सामान्य हो कर कजरी से कहा____"इस बार तो माफ़ कर रही हूं तुम्हें लेकिन अगर तुमने दुबारा ऐसी ओछी हरकत की तो समझ लेना मैं खुद तुम्हें धक्के मार कर इस हवेली से बाहर फेंक दूंगी।"

कजरी, जान बची लाखों पाए वाली बात सोच कर जल्दी से उठी और आइंदा ऐसा न करने का वचन दे कर कमरे से भाग गई। कुसुम अभी भी चकित अवस्था में खड़ी थी।

"और तुम।" भाभी ने कुसुम को पुकारते हुए कहा____"आज के बाद उससे दूर रहना। मैं नहीं चाहती कि मेरी भोली भाली ननद पर ज़रा सा भी उस घटिया लड़की का साया पड़े।"

"ज...जी भाभी।" कुसुम ने धीमें से सिर हिलाते हुए कहा____"अब से मैं उससे बिल्कुल भी बात नहीं करूंगी। मैंने उसे कई बार मना किया था कि वो भैया के कमरे में न जाया करे लेकिन वो ही नहीं मानती थी। मुझे नहीं पता था कि उसके मन में क्या है।"

"ठीक है लेकिन अब से ख़याल रखना।" भाभी ने प्यार से उसका चेहरा सहलाया और फिर कहा____"अब तुम जाओ और हां, इस बारे में फिलहाल किसी को कुछ मत बताना।"

कुसुम सिर हिला कर कमरे से चली गई। कुसुम के जाने के बाद कमरे में कुछ देर तक सन्नाटा छाया रहा। मैं भी ख़ामोशी से चाय पीने में व्यस्त हो गया। ये अलग बात है कि मेरे दिलो दिमाग़ में कई सारी बातें उछल कूद मचाए हुए थीं।

"उसको अनाप शनाप बोलने की क्या ज़रूरत थी तुम्हें?" सहसा सन्नाटे को भेदते हुए भाभी ने मेरे क़रीब आ कर कहा____"उसको सभ्य तरीके से तथा साफ शब्दों में भी समझा सकते थे तुम?"

"मैं क्या करता भाभी?" मैंने जैसे अपनी सफाई पेश की____"उसकी वैसी बातें सुन कर और वैसी हरकत देख कर गुस्सा ही इस क़दर आ गया था कि फिर मुझे अपने लहजे का ख़याल ही नहीं रह गया था। मैं काफी दिनों से उसकी हरकतों को और उसकी बातों को नज़रअंदाज़ कर रहा था। यही सोचता था कि अगर मेरी वजह से उसकी करतूतों के बारे में उसके माता पिता को पता चला तो वो बेचारे कितना शर्मिंदा होंगे। इधर ये थी कि अपनी हरकतों से बाज ही नहीं आ रही थी। मैंने भी सोच लिया था कि इसको अब अपने तरीके से ही समझाना पड़ेगा। तभी शायद इसको अकल आएगी।"

"हां देखा मैंने तुम्हारा तरीका।" भाभी ने मुझे घूरते हुए कहा____"इसी लिए वो कुसुम के आते ही रोते हुए सारा दोष तुम पर ही लगाने लगी थी। वो तो अच्छा हुआ कि मैं बाहर ही छुपी खड़ी उसकी बातें सुन रही थी और फिर यहां आ कर उसे लताड़ लगा दी वरना मुझे यकीन है कि वो अभी हिम्मत हारने वाली नहीं थी।"

"अगर हिम्मत न हारती तो फिर उसका इलाज़ वही होता जो मैं उसे बता चुका था।" मैंने कहा____"फिर मैं किसी की भी परवाह नहीं करता और उसको बालों से घसीट कर हवेली से बाहर फेंक देता।"

"ऐसा करना बिल्कुल भी उचित नहीं होता वैभव।" भाभी ने कहा____"क्योंकि इससे बात बढ़ जाती और यकीनन हवेली से बाहर भी पहुंच जाती। लोगों को जब पता चलता तो वो यही सोचते कि इस सब में लड़की की नहीं बल्कि तुम्हारी ही ग़लती रही होगी। आख़िर तुम्हारे चरित्र के बारे में तो सारी दुनिया को पता ही है।"

भाभी की ये बात सुन कर मैं फ़ौरन कुछ कह न सका। उन्होंने बिल्कुल सच कहा था। वाकई में लोग मुझे ही ग़लत कहते और एक बार फिर से मेरे कारण मेरे पिता जी को सबके सामने शर्मिंदा होना पड़ता।

"ख़ैर छोड़ो अब इस बात को। मेरा ख़याल है अब वो दुबारा ऐसा कुछ करने का सोचेगी भी नहीं।" भाभी ने कहा____"अच्छा ये तो बताओ अपनी अनुराधा से मिले कि नहीं?"

भाभी के मुख से अनुराधा का नाम सुनते ही मेरे दिल में एकदम से मीठी मीठी गुदगुदी होने लगी। कजरी के आने से और उसकी हरकतों से जो कड़वाहट तथा गुस्सा मेरे अंदर पैदा हुआ था वो पलक झपकते ही दूर हो गया। मैंने देखा, भाभी मुस्कुराते हुए मुझे ही देखे जा रहीं थी। आंखों में जवाब सुनने की उत्सुकता थी उनके। उन्हें मुस्कुराता देख मेरे होठों पर भी मुस्कान उभर आई।

"हम्म्म्म समझ गई।" भाभी ने कहा____"यानि अपनी अनुराधा से मिल चुके हो तुम।"
"अरे! लेकिन आप ये कैसे कह सकती हैं?" मैं उनकी बात सुनते ही चकित हो कर बोल पड़ा।

"तुम्हारे होठों पर उभर आई मुस्कान ने मुझे बता दिया है कि तुम मिल चुके हो उससे।" भाभी ने कहा____"मैं तुम्हारा चेहरा देख कर बता सकती हूं कि तुम कब झूठ बोलते हो और कब सच। इस लिए इस बारे में झूठ बोलने का कोई फ़ायदा नहीं है। तो बताओ, कैसी रही मुलाक़ात?"

भाभी मुस्कुराते हुए मुझे देखने लगीं। मैं हैरान था कि आख़िर क्या चीज़ हैं ये? ख़ैर अब झूठ बोलने का सच में ही कोई फ़ायदा नहीं था इस लिए मैंने उन्हें सब कुछ सच सच बता दिया।

"तुम तो बड़े शैतान निकले।" भाभी ने मुझे घूरते हुए कहा____"उस मासूम से इस तरीके से अपना स्वागत करवाना चाहते थे तुम?"

भाभी की इस बात से मैं बुरी तरह झेंप गया और साथ ही शर्म से सिर झुका लिया मैंने। भाभी मेरी हालत पर मंद मंद मुस्कुराने लगीं।

"सरोज काकी के आ जाने से काम ख़राब हो गया भाभी।" फिर मैंने कहा____"जी तो यही चाहता था कि उसके पास ही रहूं और पहरों उससे प्रेम की बातें करता रहूं मगर....।"

"कोई बात नहीं।" भाभी ने कहा____"फिर किसी दिन उससे मिलने चले जाना। वैसे भी ये छोटी छोटी मुलाक़ातें ही इंसान के अंदर प्रेम के गहरे एहसास पैदा करती हैं और अपने चाहने वाले से मिलने के लिए बेक़रार करती हैं।"

"वाह! भाभी आपको तो प्रेम के बारे में बहुत कुछ पता है।" मैंने एकदम से मुस्कुरा कर कहा____"क्या आपने भी कभी किसी से प्रेम किया है?"

"सबका नसीब एक जैसा कहां होता है वैभव?" भाभी ने सहसा गंभीर हो कर कहा____"शादी से पहले किसी से प्रेम होने का सवाल ही नहीं था क्योंकि पाबंदियां बहुत थीं। शादी के बाद यहां आई तो तुम्हारे भैया को ही देखा। धीरे धीरे उन्हीं से प्रेम होने लगा।"

भैया का ज़िक्र आते ही मेरे अंदर हूक सी उठी। मैं एकदम से संजीदा हो गया। आंखों के सामने बड़े भैया का चेहरा चमक उठा। उनके साथ गुज़रे हुए लम्हें बिजली की तरह चमकने लगे। अचानक ही मेरी आंखें भर आईं। मैंने जल्दी से अपने दिलो दिमाग़ को झटका दिया और भाभी की तरफ देखा। उनकी भी आंखों में आंसू तैर रहे थे। मुझे लगा मैंने बेकार में ही प्रेम का ज़िक्र कर दिया।

कुछ देर और भाभी मेरे पास रुकीं फिर चाय का खाली कप ले कर कमरे से चली गईं। उनके जाने के बाद मैं फिर से जाने कैसे कैसे ख़यालों में गुम होता चला गया।

✮✮✮✮

अगली सुबह पिता जी के साथ मैं फिर से चंद्रकांत के यहां गया। वहां महेंद्र सिंह भी अपने छोटे भाई के साथ आए हुए थे। चंद्रकांत से पूछताछ में पता चला कि पिछली रात भी सफ़ेदपोश उससे मिलने नहीं आया और वो उसके इंतज़ार में सारी रात बाहर ही बैठा रहा था। पहले दिन की तरह ही हम किसी नतीजे पर न पहुंच सके थे।

ऐसे ही दो चार दिन और गुज़र गए लेकिन सफ़ेदपोश नहीं आया। अब लगभग सबको समझ आ गया था कि सफ़ेदपोश के न आने की वजह क्या थी। स्पष्ट था कि उसने चंद्रकांत को जो कुछ बताया था वो सरासर झूठ था और उसने अपने किसी ख़ास मकसद के चलते ही चंद्रकांत के हाथों उसकी ही बहू को मरवा डाला था।

बड़े गंभीर हालात बन गए थे। चंद्रकांत की हालत अब ऐसी हो गई थी जैसे वो ज़िंदा लाश में तब्दील हो गया हो। वो अब किसी से कोई बात नहीं करता था। बस गुमसुम सा बैठा रहता था और लगभग यही हाल उसकी बीवी का भी था। उसकी बेटी कोमल भी दुखी थी लेकिन अपने माता पिता की तरह पत्थर की मूरत नहीं बन गई थी वो। किसी तरह खुद को सम्हाले हुए थी वो।

ठाकुर महेंद्र सिंह ने फ़ैसले के रूप में चंद्रकांत को यही सज़ा सुनाई कि वो अपनी ही बहू की हत्या करने का बोझ लिए जीवन भर जिए। तब तक वो इस बात का पता लगाएंगे कि रघुवीर की हत्या वास्तव में किसने की और सफ़ेदपोश ने उसके साथ ऐसा क्यों किया?

कुछ दिन ऐसे ही गुज़र गए। इस बीच हमने गुप्त रूप से ऐसे आदमियों को लगा दिया था जो सफ़ेदपोश को देखते ही पकड़ लें। कहने का मतलब ये कि हमारी तरफ से सफ़ेदपोश को पकड़ने की कोई कसर बाकी नहीं थी लेकिन आश्चर्य की बात थी कि उस दिन के बाद से अभी तक सफ़ेदपोश किसी को भी नज़र नहीं आया था। इधर मैं और पिता जी उसके बारे में हर तरीके से सोच विचार कर रहे थे। अपने कुछ ख़ास आदमियों को हमने आस पास के कई गावों में भेज दिया था। मकसद यही था कि वो लोग ये पता कर सकें कि आस पास के गांव का कोई व्यक्ति हमारे प्रति क्या वैसी मानसिकता रखता है जिसकी हमें आशंका थी और जो सफ़ेदपोश के रूप में ये सब कर रहा है? अभी तक हमारे आदमियों को ऐसा कोई संदिग्ध व्यक्ति नज़र नहीं आया था।

इस वक्त बैठक में कई लोग बैठे हुए थे। जिनमें पिता जी के साथ साथ मैं, भुवन, किशोरी लाल और हमारे कुछ ऐसे ख़ास आदमी जो पिछले कुछ समय से हर जगह मौजूद थे और अब वो हर तरफ की ख़बर देने पिता जी के पास आए थे। उनमें शेरा भी था।

"बड़े आश्चर्य की बात है कि इतना समय गुज़र जाने के बाद भी और इतना कुछ करने के बाद भी हमारे हाथ कुछ नहीं लगा।" पिता जी ने निराशा पूर्ण भाव से कहा____"इसका मतलब तो यही हुआ कि हम घूम फिर कर पुनः वहीं पहुंच गए जहां आज से एक हफ़्ता पहले थे। यानि ना तो सफ़ेदपोश के बारे में कुछ पता चल सका और ना ही ये समझ आया कि आस पास के गांव का कोई व्यक्ति हमारे जैसी शख्सियत पाने के लिए बुरी मानसिकता के साथ हमारे खिलाफ़ ऐसा खेल खेल रहा है।"

"शातिर से शातिर व्यक्ति भी कभी न कभी कोई न कोई ऐसी भूल अथवा ग़लती ज़रूर करता है जिसके चलते इंसान उसके मंसूबों को ताड़ जाता है।" किशोरी लाल ने कहा____"इतना ही नहीं उस तक पहुंच भी जाता है लेकिन हैरत की बात है कि इन दस दिनों में हमारे किसी भी आदमी को ऐसा कोई व्यक्ति खोजने पर भी नहीं मिला। बल्कि ये कहें तो ग़लत न होगा कि ऐसे किसी व्यक्ति पर संदेह तक नहीं हुआ किसी को। इसका तो यही मतलब हो सकता है ठाकुर साहब कि या तो ऐसा करने वाला वो व्यक्ति हमारी सोच से भी कहीं ज़्यादा चतुर और चालाक है या फिर ऐसा कोई व्यक्ति है ही नहीं जिसके बारे में हम इस तरह की आशंका किए हुए हैं।"

"हां, अब तो यही कहा जा सकता है किशोरी लाल जी।" पिता जी ने कहा____"वरना हमारे आदमियों को इतने दिनों में किसी न किसी व्यक्ति पर संदेह तो ज़रूर हुआ होता।"

"तो क्या अब हम पूरी तरह ये मान लें कि हमारी आशंका बेवजह थी?" मैंने पिता जी की तरफ देखा____"अगर ऐसा है तो फिर वो कौन है जो सफ़ेदपोश के रूप में ये सब कर रहा है और हमारे लिए ख़तरा बना हुआ है? चंद्रकांत के हाथों उसकी ही बहू को मरवा कर उसने अपना कौन सा मकसद पूरा किया? ऐसे कई सवाल हैं पिता जी जिनका जवाब मिलना बेहद ज़रूरी है।"

"ज़रूरी तो है।" पिता जी ने गहरी सांस लेते हुए कहा____"लेकिन सारे सवालों के जवाब तो वो सफ़ेदपोश ही दे सकता है और जब तक वो हमारी पकड़ में नहीं आता तब तक उससे किसी सवाल का जवाब मिलने से रहा।"

"सबसे बड़ी समस्या तो यही है कि वो इन दस दिनों में कहीं नज़र ही नहीं आया है।" मैंने मुट्ठियां भींच कर कहा____"मैंने तो इस बार उसको पकड़ने के लिए तगड़ा जाल बिछा के रखा हुआ है। अगर वो हमारे बाग़ की तरफ आता तो इस बार वो ग़ायब नहीं हो सकता था लेकिन कमबख़्त आया ही नहीं वो।"

"अगर वो कोई बड़ा खेल खेलने का इरादा बनाए हुए है।" पिता जी ने कहा____"तो वो दुबारा ज़रूर नज़र आएगा। उसके नज़र ना आने के पीछे एक कारण ये हो सकता है कि उसे भी अपने लिए ख़तरे का एहसास हो गया होगा। वो भी समझ गया होगा कि हमने उसे पकड़ने के लिए तगड़ा जाल बिछा रखा है। ज़ाहिर है ऐसे में वो खुद को सुरक्षित रखना सबसे ज़्यादा ज़रूरी बात समझेगा। हमें लगता है कि वो हमारे आस पास ही मौजूद रहता है और हमारी हर गतिविधि पर नज़र रखता है। अब क्योंकि हम उसे शकल से पहचानते नहीं हैं इस लिए वो हमारी पहुंच से दूर ही है।"

"माना कि वो ख़तरा महसूस करने के चलते फिलहाल अपनी गतिविधियों को रोके हुए है।" किशोरी लाल ने कहा____"लेकिन कब तक? किसी दिन तो वो फिर से अपने काम को शुरू करेगा। ख़तरे से भयभीत हो कर वो अपने मकसद को तो नहीं छोड़ देगा?"

"सही कह रहे हैं आप?" पिता जी ने कहा____"यकीनन वो फिर से कुछ न कुछ करेगा। इस लिए हमें अपनी तरफ से पूरी तरह सतर्क रहना है और साथ ही ये ज़ाहिर करना है कि हम उसकी तरफ से पूरी तरह लापरवाह हैं। हमारा ख़याल है कि ऐसा देख कर ही वो कुछ करने के लिए अपने बिल से बाहर निकलेगा।"

"वो अपना हर काम रात के अंधेरे में ही करता है। क्योंकि अंधेरे में उसे किसी के द्वारा पकड़े जाने का ख़तरा नहीं रहता।" मैंने कहा____"इस लिए हमें अपने आदमियों को रात के समय ऐसी ऐसी जगहों पर स्थापित कर देना है जहां पर उसके आने और जाने की पूरी संभावना हो। मुझे पूरा यकीन है कि वो अब जब भी आएगा तो हमारे आदमियों के द्वारा ज़रूर पकड़ा जाएगा।"

"हम तो चाहते ही यही हैं कि वो जल्द से जल्द पकड़ा जाए।" पिता जी ने कहा____"ताकि उससे पता चल सके कि उसने ये सब क्यों किया है? ख़ैर, इसके अलावा और कोई ख़बर?"

"इसके अलावा एक अच्छी ख़बर ये है कि हमारे कुछ आदमियों ने इस गांव में ही नहीं बल्कि आस पास के सभी गांवों में भी जा कर ये पता किया है कि लोग हमारे बारे में कैसी सोच और राय रखते हैं।" मैंने पास ही खड़े हमारे कुछ आदमियों की तरफ देखने के बाद कहा____"इन लोगों के अनुसार लगभग हर जगह के लोग यही चाहते हैं कि आप ही उनके मुखिया और प्रजा पालक बनें।"

"ऐसा क्यों?" पिता जी ने उल्टा सवाल करते हुए पूछा____"क्या वो लोग अपने वर्तमान के मुखिया से खुश नहीं हैं?"

"लगता तो ऐसा ही है।" मैंने कहा____"क्योंकि अगर ऐसा न होता तो वो अपने ही गांव के इतने संपन्न व्यक्ति के बारे में ऐसे ख़याल नहीं रखते। मेरा मतलब है कि वो यही चाहते कि महेंद्र सिंह जी ही उनके मुखिया रहें। आख़िर युगों के बाद उनके गांव का कोई संपन्न व्यक्ति मुखिया के पद को पाया है।"

"तुम्हारे कहने का मतलब ये है कि वो लोग महेंद्र सिंह के आचार व्यवहार से खुश नहीं हैं?" पिता जी ने अपलक मेरी तरफ देखते हुए कहा____"और इस वजह से वो हमें ही मुखिया के रूप में देखना चाहते हैं?"

"यकीनन।" मैंने स्पष्ट भाव से कहा____"इससे ये भी ज़ाहिर होता है कि आपके मित्र महेंद्र सिंह जी बाहर से जो नज़र आते हैं वो अंदर से वैसे नहीं हैं। वैसे वो आपके गहरे मित्र हैं तो आपको भी उनके बारे में अच्छे से पता होगा।"

"हां पता तो है।" पिता जी ने कहा____"लेकिन हम ये भी मानते हैं कि हर इंसान की अपनी एक अलग सोच और विचारधारा होती है जिसके तहत वो अपने कर्म करता है और साथ ही लोगों से पेश आता है। महेंद्र सिंह के पुरखे जमींदारी करते थे किंतु गुज़रते वक्त के साथ हालात बदल गए और अब जमींदारी जैसी बात नहीं रही। हां, वो पहले से ही संपन्न थे जिसके चलते अभी भी वो अपना ठाठ बाट बनाए हुए हैं।"

"और शायद अपना रौब भी।" मैंने कहा____"वो भी ऐसा जो बाकी आम लोगों पर उनके मर्ज़ी के हिसाब से ज़बरदस्ती थोपा जाता होगा, है ना?"

"हां, लेकिन ऐसा तो लगभग हर उस इंसान के साथ होता है जो बाकियों से कहीं ज़्यादा साधन संपन्न होते हैं।" पिता जी ने कहा____"हमारे अपने पिता जी का रौब तो उनसे लाखों गुना ज़्यादा था तो उनके बारे में क्या कहोगे? हालाकि किसी के कहने की आवश्यकता ही नहीं है क्योंकि उनके बारे में सारी बातें लगभग जग ज़ाहिर ही थीं। तो कहने का मतलब ये है कि अपनी क्षमता के अनुसार ऐसा हर व्यक्ति इतना रौब रखता है। ये कोई बड़ी बात नहीं है।"

"बड़ी बात भले ही नहीं है।" मैंने तर्क़ दिया____"लेकिन ऐसी तो है ही कि उनके इस रौब अथवा आचरण की वजह से उनके ही गांव के लोग उन्हें मुखिया के रूप में देखना नहीं चाहते। अगर इस नज़रिए से सोचा जाए तो उनका किरदार लोगों की नज़र में निम्न दर्जे का हो जाता है।"

मेरी इस बात से पिता जी कुछ न बोले। चेहरे पर सोचो के भाव उभर आए थे उनके। कुछ देर की ख़ामोशी के बाद उन्होंने कहा____"ख़ैर इस मामले को फिलहाल बाद में देखा जाएगा, अभी सिर्फ ये ज़रूरी है कि वो सफ़ेदपोश हमारी पकड़ में आ जाए। उसका पकड़े जाना बेहद ज़रूरी है। जब तक वो यूं खुले आम घूम रहा है तब तक किसी न किसी अनिष्ट के होने की आशंका बनी ही रहेगी।"

कुछ देर और इसी संबंध में बातें हुईं उसके बाद पिता जी के कहने पर हम सब बैठक से बाहर निकल गए। हालाकि किशोरी लाल उनके पास ही बैठे रहे। इधर मैं अपनी मोटर साइकिल ले कर भुवन के साथ खेतों की तरफ निकल गया।​
 
अध्याय - 110
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"अरे! रूप भैया आप??" रूपचंद्र को अपने कमरे में आया देख रूपा पहले तो चौंकी फिर एकदम से मुस्कुराते हुए बोली____"आइए।"

"इस वक्त मेरे यहां आने से तुझे कोई परेशानी तो नहीं हुई ना?" रूपा जो अपना बिस्तर लगा रही थी उसे देखते हुए रूपचंद्र ने पूछा।

"बिल्कुल नहीं भैया।" बिस्तर की चादर को अच्छे से बिछाने के बाद रूपा ने सीधा खड़े होते हुए कहा____"बल्कि मुझे तो खुशी हुई कि मेरे सबसे अच्छे वाले भैया इस वक्त मेरे कमरे में आए हैं। ज़रूर अपनी इस बहन का हाल चाल ही पूछने आए हैं न आप?"

"हां सही कहा तूने।" रूपचंद्र ने मुस्कुराते हुए कहा और फिर पलंग के किनारे पर बैठ गया। उसने रूपा को भी अपने पास ही बैठ जाने का इशारा किया और फिर जब वो बैठ गई तो बोला____"तेरा हाल चाल पूछने तो आया ही था लेकिन साथ ही तुझे कुछ बताने भी आया था।"

रूपचंद्र की बात सुन कर रूपा के चेहरे पर ये सोच कर शर्म की हल्की लाली उभर आई कि शायद उसके भाई ने वैभव से उसकी मुलाक़ात करवाने का रास्ता बना दिया है और अब वो यही बताने उसके पास आया है। रूपा के चेहरे पर उभर आई इस हल्की शर्म को देख रूपचंद्र उसका मंतव्य समझ कर मन ही मन मुस्कुरा उठा।

"जो सोच कर तू अचानक ही इस तरह शर्माने लगी है ना उसमें अभी थोड़ा समय लगेगा मेरी बहना।" रूपचंद्र ने उसके सिर पर हल्के मगर प्यारी सी चपत लगाते हुए कहा____"लेकिन तू फ़िक्र मत कर। वैभव से जल्दी ही तेरी मुलाक़ात करवाऊंगा। मैं भी नहीं चाहता कि मेरी पागल बहन को किसी का ज़्यादा इंतज़ार करना पड़े।"

रूपचंद्र की बात सुन कर रूपा को थोड़ा धक्का तो लगा लेकिन वो बोली कुछ नहीं। हां चेहरे पर छाई शर्म की लाली अभी भी बरक़रार थी। उसके चेहरे के भावों को रूपचंद्र कुछ देर तक देखता रहा, फिर सहसा उसके चेहरे पर थोड़ी गंभीरता उभर आई।

"अब तक तो शायद तुझे भी पता चल ही गया होगा कि वैभव किसी दूसरी लड़की से प्रेम करता है।" फिर उसने उसी गंभीरता से रूपा की तरफ देखते हुए कहा____"और इस बात का पता उसके पिता यानि दादा ठाकुर को भी चल चुका है। असल में गौरी काका और मैं इसी सिलसिले में बात करने के लिए एक दिन उनके पास गए थे।"

रूपचंद्र इतना कहने के बाद थोड़ा रुका। उसने रूपा के चेहरे की तरफ ये सोच कर गौर से देखा कि इस बारे में जान कर रूपा के चेहरे पर किस तरह के भावों का आगमन होता है किंतु उसे ये जान कर थोड़ी हैरानी हुई कि रूपा के चेहरे पर इस बात को सुन कर कोई विशेष भाव नहीं उभरे थे।

"असल में हमें जब इस बारे में पता चला था तो हम ये सोच कर चिंतित हो उठे थे कि अगर वैभव किसी दूसरी लड़की से प्रेम करता है तो जब उसके साथ तेरा ब्याह हो जाएगा तो क्या वो तुझे सच्चे दिल से अपनी पत्नी मान कर प्यार और सम्मान देगा?" रूपचंद्र ने कहा____"कुछ भी हो लेकिन हम में से कोई भी भला ये कैसे चाह सकता है कि हमारी बेटी अथवा बहन ब्याह के बाद अपने पति के घर में खुश न रहे? यही सोच कर मैं और गौरी शंकर काका दादा ठाकुर से बात करने हवेली गए थे। वहां पर जब हमने दादा ठाकुर को ये सब बताया और अपनी चिंता ज़ाहिर की तो उन्होंने हमें यकीन दिलाया कि हमें इस बारे में किसी भी तरह की चिंता करने की ज़रूरत नहीं है।"

रूपा चुपचाप अपने भाई की बातें सुन रही थी। शर्म और झिझक की वजह से उसने रूपचंद्र की इन बातों पर अपनी कोई प्रतिक्रिया नहीं दी। उधर रूपचंद्र कुछ पलों तक रूपा को देखता रहा फिर एक गहरी सांस ली।

"गौरी शंकर काका ने उनसे ये भी कहा कि जब वैभव उस लड़की से प्रेम करता है तो ज़ाहिर है कि वो उस लड़की से ब्याह भी करना चाहेगा।" रूपचंद्र ने पुनः कहना शुरू किया____"और अगर उसने ऐसा किया, मेरा मतलब है कि अगर उसने उस लड़की से ब्याह कर लिया तो क्या वो उसके रहते तुझे भी उसके जैसा ही प्यार और मान सम्मान देगा? काका की इन बातों पर दादा ठाकुर ने हमें भरोसा दिया कि वो इस बारे में वैभव से बात करेंगे।"

रूपा अब भी चुप ही रही। उधर रूपचंद्र ने फिर से कहा____"काका ने दादा ठाकुर से ये तक कहा कि अगर वो वैभव को उस लड़की से अलग करने की कोशिश करेंगे तो बहुत हद तक ये संभव है कि वैभव इससे नाराज़ हो जाए अथवा भड़क कर बगावत ही कर बैठे। आख़िर ये तो उन्हें भी पता है कि वैभव का चरित्र कैसा रहा है? उसने पहले भी कभी अपने पिता की अथवा किसी की भी परवाह नहीं की थी तो ऐसे में यकीनन ऐसा हो सकता है। ख़ैर अभी तो फिलहाल इतनी ही बातें हुई हैं उनसे और उन्होंने इस बारे में वैभव से बात करने को कहा है। अब देखते हैं कि जब वो इस बारे में वैभव से बात करेंगे तो वो क्या जवाब देता है अथवा क्या रुख अपनाता है?"

"आप मुझसे बड़े हैं भैया और बाकी सब भी मुझसे बड़े ही हैं।" रूपा ने सहसा अपनी चुप्पी तोड़ते हुए धीमें स्वर में कहा____"मैं अच्छी तरह इस बात को समझती हूं कि आप सब मेरी खुशियां ही चाहते हैं। इसी लिए आप और गौरी शंकर काका उनके पास गए थे किंतु इस मामले में आपको या किसी को भी इतनी चिंता करने की ज़रूरत नहीं है।"

"चिंता क्यों न करें रूपा?" रूपचंद्र ने अधीरता से कहा____"तू मेरी बहन है, इस घर की बेटी है। मैं ही नहीं बल्कि सबको तेरे हितों की और तेरी खुशियों की फ़िक्र है और हमेशा रहेगी भी।"

"हां ये मैं समझती हूं भैया।" रूपा ने झिझकते हुए कहा____"लेकिन बात सिर्फ इतनी ही नहीं है बल्कि ये भी है कि मैं क्या सोचती हूं और क्या चाहती हूं।"

"क्या कहना चाहती है तू?" रूपचंद्र के चेहरे पर उलझन के भाव उभरे।

"आप सब मेरा हित और खुशी चाहते हैं ये अच्छी बात है भैया।" रूपा ने कहा____"लेकिन आप सब ये भी समझने की कोशिश कीजिए कि क्या आप ज़ोर ज़बरदस्ती कर के किसी के द्वारा मुझे खुशियां दिला सकते हैं और क्या ये उचित होगा?"

"मैं अब भी नहीं समझा तेरी बात?" रूपचंद्र उलझ सा गया।

"आप लोगों को इस बारे में इतना चिंतित होने की ज़रूरत नहीं है भैया।" रूपा ने जैसे स्पष्ट रूप से कहा____"ये संबंध कोई मामूली संबंध नहीं हैं बल्कि प्रेम के संबंध हैं और प्रेम के संबंध तो प्रेम जैसे ही होते हैं ना? जैसे मैं उनसे प्रेम करती हूं और चाहती हूं कि वही मेरे जीवन साथी बनें उसी तरह वो भी तो उस लड़की से प्रेम करते हैं। ज़ाहिर है मेरी तरह वो भी तो यही चाहेंगे कि जिससे वो प्रेम करते हैं वही उनकी जीवन संगिनी बने। अब आप ही बताइए कि इसमें ग़लत क्या है अथवा वो कहां ग़लत हैं? अगर मैं उनकी जीवन संगिनी न बनने से दुख दर्द में डूब जाऊंगी तो वो भी तो उस लड़की से ब्याह न कर पाने की सूरत में दुखी हो जाएंगे।"

रूपचंद्र देखता रह गया रूपा को। उस रूपा को जो सिर झुकाए उसके सामने ही पलंग पर बैठी थी। उसकी बातों ने रूपचंद्र को अवाक सा कर दिया था।

"मुझे तो बहुत पहले ही पता चल गया था भैया कि वो किसी और प्रेम करते हैं।" रूपा ने लरजते स्वर में कहा____"तकलीफ़ तो बहुत हुई थी लेकिन ये सोच कर खुद को समझा लिया था कि प्रेम ऐसी चीज़ नहीं है जो किसी के करने से या किसी के चाहने से हो जाए। मैंने भी तो उनसे प्रेम नहीं किया था बल्कि वो तो अपने आप ही हो गया था। शायद उन्हें भी उस लड़की से ऐसे ही प्रेम हो गया है। प्रेम ऐसा ही तो होता है भैया। थोड़ी सी खुशियां दे कर बाद में दर्द देना शुरू कर देता है और उसका दर्द भी ऐसा होता है जो भले ही असहनीय होता है लेकिन उसी दर्द में जीने की चाहत होती है। मुझे उनसे कोई शिकायत नहीं है भैया। मैं इस प्रेम के मर्म को अच्छी तरह समझ गई हूं। मेरे लिए तो यही बहुत बड़ी बात है कि इतना सब कुछ हो जाने के बाद भी उन्होंने मुझे ठुकराया नहीं बल्कि मुझसे ब्याह करने को राज़ी हो गए। अब अगर वो उस लड़की से भी ब्याह करना चाहते हैं तो मेरा भी ये फर्ज़ बनता है कि उनकी खुशी के लिए सौतन के रूप में उस लड़की को खुशी से क़बूल कर लूं।"

दंग रह गया रूपचंद्र। आश्चर्य से फट पड़ी आंखों से अपनी बहन को देखता रह गया वो। दिलो दिमाग़ में एकदम से ज्वारभाटा सा उठा जिसके चलते उसका समूचा वजूद हिल कर रह गया। उसे पहली बार एहसास हुआ कि उसकी बहन का हृदय कितना विशाल है। बिजली की तरह उसके मस्तिष्क में ख़याल उभरा कि क्या सच में प्रेम ऐसा होता है कि इंसान अपनी खुशियों को परे हटा कर अपने महबूब की खुशियों के बारे में सोचता है? अगर ऐसा है तो गज़ब ही होता है ये प्रेम। उसने देखा रूपा अभी भी सिर झुकाए बैठी हुई थी। ज़ाहिर है अपने बड़े भाई से इस संबंध में बातें करने के बाद वो उससे नज़रें मिलाने की हिम्मत नहीं जुटा पा रही थी। ये एक क़ायदा भी था और उसकी शर्म भी। रूपचंद्र को अपनी बहन पर बेहद प्यार आया और उसे गर्व भी महसूस हुआ। उसने हाथ बढ़ा कर हौले से उसके सिर पर बड़े स्नेह से हाथ फेरा।

"तू सच में महान है रूपा।" फिर उसने कहा____"उमर में तुझसे बड़ा होने के बाद भी मुझे इस प्रेम संबंध का कोई ज्ञान नहीं था। तेरी बातें सुनने के बाद मुझे ये भी महसूस हो रहा है कि सिर्फ ज्ञान होना ही काफी नहीं होता है बल्कि ज्ञान के साथ साथ इंसान का हृदय भी सच्चा और विशाल होना चाहिए। तभी तो इंसान तेरी तरह सब कुछ क़बूल कर सकता है। मुझे तुझ पर नाज़ है मेरी बहन।"

रूपचंद्र ने ये कहा तो रूपा ने झट से सिर उठा कर उसकी तरफ देखा। चेहरे पर दर्द के निशां और आंखों में तैरते आंसू नज़र आए। रूपचंद्र उसे इस हालत में देख कर बेहद भावुक हो उठा। उसने झपट कर रूपा को अपने हृदय से लगा लिया। उसका ऐसा करना था कि रूपा खुद भी अपने भाई से लिपट कर सिसक उठी। रूपचंद्र उसके सिर पर प्यार से हाथ फेरता रहा।

"दुनिया जान चुकी है कि हम सब कितने बुरे लोग थे।" फिर उसने जाने क्या सोच कर अधीरता से कहा____"और अब तो हम सब भी ये मान चुके हैं कि वाकई में हम बहुत बुरे हैं। इस बात के चलते किसी के सामने सिर उठा कर चलने की हिम्मत ही नहीं रह गई थी। अपने कुकर्मों के एहसास से दुखी हो उठे थे हम लेकिन आज तेरी बातें सुन कर जाने क्यों एक सुखद एहसास होने लगा है। ऐसा महसूस हो रहा है जैसे हम इतने भी बुरे नहीं हैं जितना कि अब हम खुद भी समझने लगे थे। जिसके घर में इतना विशाल हृदय रखने वाली बहन और बेटी हो वो लोग इतने बुरे कैसे हो सकते हैं भला? मेरी बहन, मेरी प्यारी बहन....आज तेरी वजह से पहली बार एक सच्चा और सुखद एहसास हो रहा है मुझे। मुझे यकीन है कि तेरी वजह से हम सबके माथे पर लगे कलंक धुल जाएंगे।"

रूपा कुछ न बोली, बस सिसकती रही। रूपचंद्र ने उसे खुद से अलग किया और फिर बड़े ही स्नेह से उसके आंसू पोंछते हुए बोला____"ऐसे मत रो पागल। तेरा ये भाई तेरी आंखों में आंसू नहीं देख सकता।"

रूपा ने झट से अपनी आंखों की बाक़ी नमी को पोछा और फिर जबरन मुस्कुराने का प्रयास करने लगी। बड़ी बड़ी आंखें उसके चेहरे की ही तरह हल्का सुर्ख पड़ गईं थी।

"एक बात कहूं?" रूपचंद्र ने उसकी आंखों में झांकते हुए किंतु उसे बहलाते हुए कहा____"वो साला वैभव वाकई में बहुत खुशनसीब है लेकिन तब और भी ज़्यादा नसीब वाला बन जाएगा जब मेरी ये बहन शादी के बाद उसकी पत्नी बन कर उसकी हवेली में पहुंच जाएगी।"

रूपचंद्र की ये बात सुन कर रूपा एकदम से लजा गई और झट से उसने सिर झुका लिया। रूपचंद्र ने मुस्कुराते हुए उसके सिर पर प्यार से हाथ फेरा और फिर ये कहते हुए पलंग से उठ खड़ा हुआ कि वो जल्द ही वैभव से उसकी मुलाक़ात करवाएगा।

रूपचंद्र के जाने के बाद रूपा ने कमरे का दरवाज़ा बंद किया और फिर वापस पलंग पर आ कर लेट गई। आंखें बंद कर के एक तरफ जहां वो अपने भाई से हुई बातों के बारे में सोचने लगी थी वहीं दूसरी तरफ बार बार बंद पलकों में वैभव का मनमोहक चेहरा उभर आता। रूपा कभी हौले से मुस्कुरा उठती तो कभी उसके चेहरे पर एक अजीब सी उदासी के भाव उभर आते। जाने कितनी ही देर तक वो यूं ही ख़यालों में खोई रही और फिर जाने कब नींद ने उसे अपनी आगोश में ले लिया। शबे ख़ामोशी सहर रूपी अपनी मंज़िल की तरफ रफ़्ता रफ़्ता बढ़ती रही।

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दो तीन दिन यूं ही गुज़र गए किंतु ना तो सफ़ेदपोश का कहीं पता लग सका और ना ही ये पता चल सका कि रघुवीर के बेटे की हत्या किसने की थी? चंद्रकांत यूं तो अब बेहद गुमसुम रहने लगा था लेकिन शाम होते ही वो सफ़ेदपोश के आने की प्रतिक्षा करने लगता था। वो सारी रात घर के बाहर चबूतरेनुमा बनी पट्टी पर बैठा रहता था। उसके बाकी रिश्तेदार तो चले गए थे लेकिन उसकी अपनी ससुराल के दो लोग रुके हुए थे जिनमें से एक उसका साला गिरधारी था और उसकी सलहज यानि गिरधारी की पत्नी पुष्पा थी।

चंद्रकांत की बीवी प्रभा का हाल भी कुछ ठीक नहीं था। पहले बेटे रघुवीर की हत्या और अब बहू की हत्या अपने ही पति के द्वारा हो जाने से वो अंदर से बुरी तरह टूट गई थी। वो रात दिन बस यही कहते हुए रोती थी कि उसके पाप कर्मों ने उसके बेटे को उससे छीन लिया। उसे अपनी बहू के मरने का इतना दुख नहीं था क्योंकि वो जानती थी कि उसकी बहू भी उसी के जैसी चरित्रहीन थी लेकिन उसका बेटा तो ऐसा नहीं था। उसकी बेटी कोमल ही सारे घर का काम धाम सम्हाले हुए थी। दुखी तो वो भी थी लेकिन इतना तो वो भी समझती थी कि अगर वो भी अपने मां बापू की तरह दुखी हो कर हर चीज़ को त्याग देगी तो कैसे चलेगा काम?

पूरे रुद्रपुर में इस हादसे के चलते अजीब सा सन्नाटा छाया रहता था। लोगों की ज़ुबान में इसी की चर्चा थी। लोग अपनी अपनी सोच के अनुसार इस बारे में तरह तरह की बातें करते थे।

इधर हवेली में भी थोड़ा तनाव जैसा माहौल था। तनाव का असल कारण यही था कि इतनी कोशिशों के बाद भी सफ़ेदपोश हाथ में नहीं आ रहा था। आज क़रीब दस दिन हो गए थे लेकिन उस रात के बाद से वो सफ़ेदपोश कहीं किसी को नज़र नहीं आया था। सफ़ेदपोश का पकड़े जाना बेहद ज़रूरी था क्योंकि उसके पकड़े जाने से कई सारे सवालों के जवाब तो मिलने ही थे लेकिन साथ ही उसका ख़ौफ भी दूर हो जाना था।

अगले दिन चंद्रकांत की बहू रजनी की तेरहवीं थी। अतः इंसानियत और सहानुभूति के नाते पिता जी भी उसके घर तेरहवीं में शामिल होने गए। चंद्रकांत के रिश्तेदारों ने ही सारा कार्यभार सम्हाला हुआ था क्योंकि चंद्रकांत और उसकी बीवी प्रभा तो इस हालत में ही नहीं थे कि वो ये सब कर पाएं। दूसरे गांव से महेंद्र सिंह भी आए हुए थे। हमारे गांव वाले तो थे ही वहां। बहरहाल, तेरहवीं का कार्यक्रम शाम होने से पहले पहले निपट गया।

इधर मेरा सारा ध्यान अपने उस काम की तरफ था जो मौजूदा समय में हमारे लिए बेहद ज़रूरी था। यानि सफ़ेदपोश की तलाश और उसे पकड़ना। ये अलग बात है कि वो अब भी हमारी पहुंच से दूर था। समझ में नहीं आ रहा था कि सफेद रंग के लिबास से खुद को पूरी तरह छुपा के रखने वाला वो व्यक्ति आख़िर कौन हो सकता है? सच तो ये था कि उसे पकड़ ना पाने के चलते अब खीझ सी होने लगी थी। दिलो दिमाग़ में गुस्सा भरने लगा था।

हमारे नए मुंशी की बेटी कजरी उस दिन के बाद से क़ायदे में रहने लगी थी। उस दिन जो कुछ हुआ था उसका ज़िक्र किसी ने भी उसके माता पिता से नहीं किया था और ज़ाहिर है कजरी ने भी उन्हें नहीं बताया था। अब ना तो वो मेरे कमरे में आती थी और ना ही मुझसे नज़रें चार होने पर कोई प्रतिक्रिया देती थी। मैंने महसूस किया था कि कुसुम भी अब उससे दूर ही रहने की कोशिश करती थी।

"मुझे मत ले जाओ वैभव।" रागिनी भाभी अपने कमरे का दरवाज़ा बंद करने के बाद मुझसे परेशान लहजे में बोलीं____"बाहर बैठक में पिता जी होंगे और मुझे तुम्हारे साथ यूं बाहर जाते देखेंगे तो पक्का गुस्सा करेंगे।"

"आप बेकार में ही इतना चिंतित हो रही हैं भाभी।" मैंने मजबूत लहजे से कहा____"यकीन कीजिए वो बिल्कुल भी गुस्सा नहीं करेंगे। मां ने उन्हें भी समझाया होगा कि आप अगर मेरे साथ कुछ समय खेतों की तरफ घूम लिया करेंगी तो इससे आपका मन बहल जाया करेगा।"

"बहुत ज़िद्दी हो तुम।" भाभी ने सीढ़ियों की तरफ बढ़ते हुए कहा____"अभी कुछ समय पहले ही तो तुम्हारे साथ बाहर गई थी मैं।"

"हां तो क्या हो गया?" मैंने लापरवाही से कहा____"आज फिर चलिए और आप इतना डर क्यों रही हैं? अरे! इस हवेली की बहू हैं आप। हमारी शान हैं आप और उससे भी बढ़ कर ठाकुर वैभव सिंह की भाभी हैं आप। मेरे रहते आपको किसी बात की फ़िक्र करने की ज़रूरत ही नहीं है। किसी की मजाल नहीं है जो मेरे सामने आपकी तरफ नज़र उठा कर देखने की भी हिम्मत कर सके। सालों की आंखें निकाल कर उनके हाथ में पकड़ा दूंगा।"

"बस बस, ज़्यादा डींगें मारने की ज़रूरत नहीं है तुम्हें।" भाभी ने एकदम से पलट कर मेरी तरफ घूर कर कहा____"और हां, क्या आज भी तुम मुझे खेतों पर ले जाने का बोल कर कहीं और ले जाने का सोच रखे हो?"

"अभी तो कुछ नहीं सोचा है भाभी।" मैंने हौले से मुस्कराते हुए कहा____"लेकिन अगर आप कहेंगी तो ले चलूंगा। भला मैं कैसे अपनी प्यारी सी भाभी के हुकुम की अवहेलना कर सकता हूं?"

"इतने सुंदर शब्दों से चापलूसी कर रहे हो तो मतलब आज भी मुझे कहीं और ले जाने का इरादा है तुम्हारा।" भाभी ने कहा____"अगर ऐसा ही है तो जान लो आज मैं मां जी से बिल्कुल भी झूठ नहीं बोलूंगी। वापसी में उन्हें साफ साफ बता दूंगी कि तुम मुझे कहां घुमाने ले गए थे।"

"मतलब आप अपने इस मासूम से देवर को मां के हाथों पिटवाना चाहती हैं?" मैंने बड़ी ही मासूम सी शक्ल बना कर उन्हें देखा तो अनायास ही उनके होठों पर मुस्कान उभर आई।

"उसके लिए मां जी की ज़रूरत ही नहीं है।" भाभी ने कहा____"मैं खुद ही पीट सकती हूं तुम्हें। ये मत भूलो कि छेड़ने की, डांटने की और पीटने की अनुमति तुमने खुद ही दे रखी है मुझे।"

"मैं भूला नहीं हूं भाभी।" मैं मुस्कुरा उठा____"मुझे सब याद है। अगर आप मुझे पीटना ही चाहती हैं तो जब दिल करे पीट लीजिएगा। मैं भी देखना चाहूंगा कि मेरी इतनी सुंदर और प्यारी भाभी मुझे किस तरीके से पीटती हैं?"

मेरी बात सुन कर भाभी मुस्कुराते हुए मेरी तरफ कुछ पलों तक देखती रहीं फिर ये कहते हुए वापस सीढियां उतरने लगीं कि____"तुम्हारी ये ख़्वाईश जल्दी ही पूरी करनी पड़ेगी।"

मैं और भाभी ऐसी ही बातें करते हुए नीचे आए और फिर मां से इजाज़त ले कर बाहर निकल गए। भाभी जब बैठक के सामने से हो कर निकलीं तो उनके चेहरे पर घबराहट के भाव थे। उन्हें डर था कि कहीं पिता जी मुझे आवाज़ दे कर बुला ना लें और फिर ये न पूछने लगें कि मैं उन्हें ले कर कहां जा रहा हूं? हालाकि ऐसा हुआ नहीं बल्कि मैं और भाभी बड़ी आसानी से हवेली के बाहर आ गए।

जल्दी ही मैंने भाभी को जीप में बैठा कर जीप को सड़क पर दौड़ा दिया। मेरे दिलो दिमाग़ में इस समय कई सारे ख़याल उभर रहे थे। दो दिन पहले रूपचंद्र ने मुझे रोक लिया था और फिर उसने बड़ी ही विनम्रता से मुझसे अपनी बहन के संबंध में बातें की थीं। मैं हैरान था कि रूपचंद्र कितनी विनम्रता से मुझसे बातें कर रहा था, जबकि हमारे बीच कभी भी मैत्री भाव जैसी बात नहीं रही थी।

ख़ैर रूपचंद्र ने आख़िर में मुझसे यही कहा था कि उसने अपनी बहन को वचन दिया है कि वो उसे मुझसे मिलवाएगा। अतः मैं उसके निवेदन पर एक बार रूपा से मिल लूं। मैंने भी सोचा कि उसकी बहन से मिल लेने में कोई बुराई नहीं है। वैसे भी अगले साल उससे मेरा विवाह होना था। मैं भी अब उसे खुल कर सब कुछ बता देना चाहता था।

"तो मेरा कहना सही था।" जैसे ही मैंने रूपचंद्र के घर के सामने सड़क पर जीप रोकी तो भाभी ने मेरी तरफ देखते हुए कहा____"यानि आज तुम मुझे अपनी दूसरी माशूका से मिलवाने के लिए लाए हो।"

"मेरा ऐसा इरादा तो नहीं था भाभी।" मैंने थोड़ा गंभीर हो कर कहा____"बस यूं समझिए कि उसके भाई की बात नहीं टालना चाहता मैं।"

"अब इसका क्या मतलब हुआ?" भाभी मेरी बात से चौंकी तो मैंने उन्हें दो दिन पहले की वो बातें बता दीं जो रूपचंद्र ने मुझसे कही थीं।

सारी बातें सुन कर भाभी कुछ पलों तक कुछ सोचती रहीं फिर गहरी सांस लेने के बाद बोलीं____"बहुत अच्छी बात है ये। रूपचंद्र की बातों से साफ ज़ाहिर होता है कि अब उसे अपनी बहन के प्रेम और उसके जज़्बातों का बखूबी एहसास हो गया है। अब वो एक अच्छा भाई होने का फर्ज़ निभाना चाहता है और इसी लिए अपनी बहन की खुशी के लिए वो उसे तुमसे मिलवाना चाहता है। मैं भी तुमसे यही कहूंगी कि तुम्हें रूपा से मिलना चाहिए और उससे वैसा ही बर्ताव करना चाहिए जैसा तुम अनुराधा से करते हो।"

भाभी की ये बातें सुन कर मैं फ़ौरन कुछ ना बोल सका। तभी मेरी नज़र रूपचंद्र पर पड़ी। वो हमारी तरफ ही चला आ रहा था। उसके पीछे रूपा भी थी जो इस वक्त सिर झुकाए उसके पीछे पीछे चली आ रही थी। सुर्ख रंग के सलवार और कुर्ते में वो बेहद ही सुंदर नज़र आ रही थी। सीने पर पड़े दुपट्टे को वो कुछ पलों के अंतराल में व्यवस्थित करने लगती थी। जल्दी ही वो दोनों हमारे क़रीब पहुंच गए।

"प्रणाम भाभी।" रूपचंद्र ने आगे बढ़ कर भाभी के पैरों को छू कर कहा।

"हमेशा खुश रहो।" भाभी ने स्नेह के साथ कहा____"लेकिन अब मैं तुम्हारी भाभी नहीं हूं बल्कि दीदी हूं तुम्हारी। अगले साल रूपा की शादी वैभव से हो जाएगी तो ये मेरी देवरानी बन जाएगी। उस रिश्ते के चलते ये मेरी छोटी बहन भी बन जाएगी और क्योंकि तुम इसके भाई हो और उमर में मुझसे छोटे हो तो मैं तुम्हारी बड़ी बहन बन जाऊंगी।"

"ओह! हां ये तो मैंने सोचा ही नहीं था।" रूपचंद्र हल्के से हंस पड़ा____"आप बिल्कुल सही कह रही हैं। अब से मैं आपको दीदी ही कहूंगा। वैसे मुझे बिल्कुल भी उम्मीद नहीं थी कि वैभव के साथ इस वक्त आप भी होंगी।"

"ये सब इन्हीं महानुभाव की वजह से हुआ है छोटे भाई।" भाभी ने मेरी तरफ इशारा करते हुए कहा____"ये जनाब मुझे ये कह कर हवेली से ले आए थे कि ये मुझे खेतों पर घुमाने ले जा रहे हैं। मुझे तो पता ही नहीं था कि ये महाराज अपने मन में कौन सी खिचड़ी पकाए हुए थे। अगर मुझे पता होता कि इनके मन में रूपा से मिलने की योजना है तो मैं इनके साथ आती ही नहीं। दो लोगों के बीच कबाब में हड्डी बनने वाली बिल्कुल नहीं थी मैं।"

"हा हा हा।" रूपचंद्र ठहाका लगा कर हंसा, फिर बोला____"चलिए कोई बात नहीं। जो हुआ अच्छा ही हुआ। आप साथ हैं तो रूपा भी सहज रहेगी आप लोगों के बीच।"

मैंने देखा, रूपा सिर झुकाए खड़ी थी। दुपट्टे के एक छोर को पकड़े वो उसे दोनों हाथों में उमेठ रही थी। चेहरे पर लाज की सुर्खी विद्यमान थी।

"क्या सच में तुम्हें ऐसा लगता है?" उधर भाभी ने रूपचंद्र की बात का जवाब दिया____"अरे! भाई ये बेचारी तो मेरे रहते ही असहज रहेगी। मेरी वजह से ये दोनों ही एक दूसरे से खुल कर कोई बात नहीं कर पाएंगे।" कहने के साथ ही वो एकदम मुझसे मुखातिब हुईं____"वैभव, तुम मुझे इसी वक्त हवेली ले चलो और मुझे वहां छोड़ दो। उसके बाद तुम वापस आ कर रूपा के साथ खेतों पर चले जाना।"

"य...ये आप क्या कह रही हैं भाभी?" मैंने एकदम से चौंकते हुए कहा।

"मैं बिल्कुल ठीक कह रही हूं वैभव।" भाभी ने कहा_____"तुम दोनों के बीच मेरा मौजूद रहना उचित नहीं है। इस लिए तुम मुझे हवेली छोड़ आओ।"

"ऐसी कोई बात नहीं है भाभी।" मैंने बेचैन से लहजे में कहा____"आपके रहते मुझे कोई समस्या नहीं है, सच में। मेरा ख़याल है कि रूपा को भी आपके रहने से कोई समस्या नहीं होगी। आप खुद पूछ लीजिए उससे।"

"बेकार की बातें मत करो वैभव।" भाभी ने ज़ोर देते हुए कहा____"मुझे अच्छी तरह पता है कि मेरे रहते तुम दोनों सहज नहीं रहोगे और उस बेचारी से क्यों पूछूं मैं, जबकि मैं खुद समझती हूं कि मेरा साथ में रहना उचित नहीं है।"

अजीब मुसीबत हो गई थी। हालाकि भाभी की बातों से मैं खुद भी सहमत था लेकिन मैं ये भी नहीं चाहता था कि मैं उन्हें वापस हवेली छोड़ आऊं। उनका हवेली वापस लौट जाने का मतलब था इससे घर वालों के मन में कई सारे सवाल पैदा हो जाना। मुझे खुद भी अच्छा नहीं लगेगा कि मैं अपनी भाभी को सिर्फ इतनी सी बात के चलते वापस हवेली भेज कर आऊं। मैंने बेबस भाव से रूपा की तरफ देखा। इत्तेफ़ाक से उसने भी सिर उठा कर मेरी तरफ देखा। हम दोनों की नज़रें चार हुईं। कुछ देर के लिए ऐसा लगा जैसे सन्नाटा छा गया हो।

"भ...भैया आप जाएं।" फिर उसने रूपचंद्र से कांपते स्वर में कहा____"म...मुझे दीदी के साथ जाने में कोई समस्या नहीं है।"

रूपचंद्र ने मुस्कुराते हुए सिर हिलाया और फिर प्यार से उसके सिर पर हाथ फेरा। उसके बाद मुझे एवं भाभी को देखने के बाद पलट कर चला गया। मुझे ये सोच कर थोड़ा अच्छा महसूस हुआ कि रूपा मेरे मन के भाव समझ गई थी और उसने वही किया जो मैं चाहता था।

"अरे! तुम ये क्या कह रही हो?" रूपचंद्र के जाते ही भाभी ने हैरत से आंखें फाड़ कर रूपा से कहा____"ये ठीक नहीं है रूपा। तुम दोनों के बीच मेरा मौजूद रहना बिल्कुल भी ठीक नहीं है। समझने की कोशिश करो पागल।"

"भाभी, आप दोनों कृपया पीछे वाली सीट पर बैठ जाएं।" मैंने धड़कते दिल से कहा।

"तुम समझते क्यों नहीं वैभव?" भाभी ने इस बार थोड़ा नाराज़गी दिखाते हुए कहा____"मुझे अपने साथ मत ले जाओ। मैं तुम्हारे साथ किसी दूसरे दिन चल कर खेत घूम आऊंगी लेकिन इस वक्त मेरा तुम दोनों के बीच रहना बिल्कुल ही उचित नहीं है।"

"ऐसा कुछ नहीं है भाभी।" मैंने कहा____"आप बेकार में ही इतना ज़्यादा सोच रही हैं। आप बैठिए तो सही, आगे सब समझ आ जाएगा आपको।"

भाभी ने मुझे बेबस भाव से देखा। उनकी आंखों में शिकायत के भाव भी थे। फिर वो मेरे बगल वाली सीट से नीचे उतर गईं और रूपा को ले कर पीछे वाली सीट पर बैठ गईं। उन दोनों के बैठते ही मैंने जीप को आगे बढ़ा दिया। सारे रास्ते हम तीनों के बीच ख़ामोशी छाई रही। रूपा के कुछ बोलने का तो सवाल ही नहीं था किंतु भाभी ने भी नाराज़गी के चलते कोई बात नहीं की और मैंने इस डर से कि कहीं भाभी गुस्से में मुझे डांटने न लग जाएं। ऐसी ही ख़ामोशी के साथ रास्ता गुज़रा और जीप खेतों पर बने मकान के पास पहुंच गई।​
 
अध्याय - 111
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"अरे! तुम अकेले आ गए?" रूपचंद्र जैसे ही घर के अंदर पहुंचा तो उसे देखते हुए फूलवती ने हैरानी से पूछा____"रूपा कहां गई? उसे अपने साथ क्यों नहीं लाए तुम?"

"फ़िक्र मत कीजिए बड़ी मां।" रूपचंद्र ने सामान्य भाव से कहा____"रूपा इस समय अपने होने वाले पति के साथ है।"

"क...क्या????" फूलवती के साथ साथ बाकी सब भी उछल पड़े, हैरत से आंखें फाड़े फूलवती ने कहा____"ये क्या कह रहे हो तुम? वो उसके साथ कैसे है?"

"आप भी कमाल करती हैं बड़ी मां।" रूपचंद्र ने कहा____"इसमें इतना हैरान होने वाली कौन सी बात है और वैसे भी वैभव के साथ उसकी भाभी भी हैं। इस लिए आपको ना तो फ़िक्र करने की ज़रूरत है और ना ही कुछ और सोचने की।"

सबका मुख भाड़ की तरह खुला रह गया था। बेयकीनी से रूपचंद्र को इस तरह देखने लगीं थी जैसे उसने कोई बहुत ही अजीब काम कर दिया हो।

"ल...लेकिन मुझे ये समझ में नहीं आ रहा कि जब तू रूपा को ले कर यहां से गया था तो वो वैभव के साथ कैसे चली गई?" ललिता ने अविश्वास भरे भाव से कहा____"तूने जाने कैसे दिया उसे? आख़िर इस तरह की हिमाकत कैसे कर सकता है तू?"

"अरे! तो कौन सा पहाड़ टूट पड़ा है मां?" रूपचंद्र एकाएक आवेशयुक्त अंदाज़ में बोल पड़ा____"अगर रूपा वैभव के साथ है भी तो क्या ग़लत हो गया है? अगले साल दोनों का ब्याह हो जाएगा। दादा ठाकुर ने दोनों का रिश्ता तय कर दिया है। अब अगर वो दोनों एक दूसरे से कुछ पल के लिए मिल भी ले रहे हैं तो इसमें बुराई क्या है?"

"बुराई नहीं है मैं मानती हूं।" ललिता ने कहा____"लेकिन ब्याह से पहले इस तरह एक दूसरे से मिलना उचित भी नहीं है। समाज और बिरादरी के लोग देखेंगे तो तरह तरह की बातें करेंगे। कल को कुछ ऊंच नीच हो गई तो उसका ज़िम्मेदार कौन होगा? ऐसे में अगर दादा ठाकुर ने भी ये रिश्ता तोड़ दिया तो क्या करेंगे हम?"

"आप बेकार में ही इतना कुछ सोच कर हलकान हो रही हैं मां।" रूपचंद्र ने कहा____"आप जो कुछ सोच कर चिंता कर रही हैं वैसा कुछ नहीं होगा। ये मत भूलिए की वैभव की भाभी भी साथ में है। दूसरी बात, अगर उसकी भाभी न भी होती तब भी मैं रूपा को वैभव से मिलवाने ले जाता।"

"ये क्या बक रहा है तू?" ललिता देवी हैरत से चीख ही पड़ीं____"तेरा दिमाग़ तो ठीक है ना?"

"मेरा दिमाग़ बिल्कुल दुरुस्त है मां।" रूपचंद्र ने स्पष्ट लहजे में कहा____"सच कहूं तो अब जा कर मेरा दिमाग़ ठीक हुआ है लेकिन ये देख कर दुख हो रहा है कि आप लोगों का दिमाग़ अभी भी ठीक नहीं हुआ है। अभी भी आप लोग वैभव और उसके पिता पर संदेह कर रही हैं और उनसे ज़्यादा खुद अपनी ही बेटी पर। हां मां, आप लोगों को अपनी ही बेटी पर भरोसा नहीं है। माना कि उसने वैभव से रिश्ता बना कर हमारी मान मर्यादा को ठोकर मार दी थी लेकिन क्या आप लोगों ने कभी सोचा कि ऐसा उसने क्यों किया था? क्या आपने कभी सोचा कि वो क्या इतनी नादान थी कि उसे अपने परिवार की इज्ज़त और मान मर्यादा का ज़रा भी ख़याल नहीं रहा होगा? सच तो ये है मां कि इस दुनिया में रहने वाले लोग सिर्फ अपने बारे में और सिर्फ अपने हितों के बारे में ही सोचते हैं। उन्हें दूसरों के हितों का अथवा खुशियों का कोई ख़याल ही नहीं रहता।"

"आख़िर कहना क्या चाहता है तू?" ललिता ने घूरते हुए कहा____"आज अपनी बहन का इस तरह से क्यों पक्ष ले रहा है तू?"

"वो इस लिए मां क्योंकि मैं अपनी बहन की पवित्र भावनाओं को दिल से महसूस कर चुका हूं।" रूपचंद्र ने अधीरता से कहा____"सुना है माता पिता दूर से ही अपने बच्चे की गंध सूंघ लेते हैं और आंख बंद कर के बता सकते हैं कि फला बच्चा उनकी संतान है लेकिन यहां....यहां तो शायद ऐसे माता पिता पाए जाते हैं जो सत्य को झुठला देते हैं। मेरी बहन ने वैभव से प्रेम किया था। एक ऐसा पवित्र प्रेम जिसमें उसने अपना सब कुछ अपने प्रेमी को समर्पित कर दिया। इस विश्वास के साथ कि अगर उसका प्रेम सच्चा होगा तो ईश्वर उसकी किस्मत में वैभव का साथ ज़रूर लिखेगा। हम सब इस बात के गवाह हैं मां कि दादा ठाकुर से हमारा कितना बड़ा संग्राम हुआ लेकिन इसके बावजूद अंततः फिर से वैसे ही हम एक हो गए। क्या आप में से किसी ने कल्पना की थी कि इतना कुछ हो जाने के बाद भी इस जीवन में दादा ठाकुर के साथ हमारे संबंध इस तरह से जुड़ जाएंगे? लेकिन ये संबंध जुड़े मां और सबकी उम्मीदों से परे हो कर जुड़े। इन संबंधों के जुड़ने की क्या वजह हो सकती है? क्या आप में से कोई बता सकता है? आप सब यही कहेंगे न कि ऐसा सिर्फ दादा ठाकुर के विशाल हृदय की वजह से हुआ है। नहीं हर्गिज़ नहीं, ऐसा हुआ है तो सिर्फ और सिर्फ मेरी बहन और उसके सच्चे प्रेम की वजह से। दादा ठाकुर ने हमसे रूपा का रिश्ता क्यों मांगा? क्योंकि उन्हें पता है कि उनके बेटे वैभव की जान बचाने का कार्य मेरी बहन रूपा ने किया था और ऐसा उसने इस लिए किया था क्योंकि वो वैभव से प्रेम करती है। ये सब प्रेम की ही वजह से हुआ है मां वरना क्या आपको लगता है कि जो कुछ हमने दादा ठाकुर के साथ किया था उसके बाद वो हमसे कोई संबंध रखते?"

रूपचंद्र चुप हुआ तो एकदम से सन्नाटा छा गया बरामदे में। ऐसा लगा जैसे किसी के पास उसकी बातों का जवाब देने के लिए कोई शब्द ही नहीं थे। रूपचंद्र बड़ी गंभीरता से बारी बारी सबको देखता रहा। फिर उसने एक लंबी सांस ली।

"उसी प्रेम के बारे में और उसी रूपा के बारे में आज आप सबके ऐसे ख़याल हैं, यही देख कर मुझे दुख हो रहा है मां।" रूपचंद्र ने पुनः सन्नाटे को चीरते हुए कहा____"कहने की ज़रूरत नहीं है कि अब तक मैं भी अपनी बहन के इस प्रेम संबंध पर उससे बहुत नाराज़ था लेकिन ईश्वर का शुक्र है कि उसने मेरे कुंद पड़े ज़हन को खोल दिया और ये एहसास दिलाया कि अपनी बहन के बारे में अब तक मैं कितना ग़लत सोचता था। अरे! वो तो मेरी लाडली थी। हम दोनों एक साथ खेल कूद कर बड़े हुए थे। उसने किसी से प्रेम क्या कर लिया मैं अपनी बहन के चरित्र के बारे में जाने क्या क्या सोचने लग गया? जिस समय उसे अपने भाई की सबसे ज़्यादा ज़रूरत थी उस समय मैंने उसे ऐसे मझधार पर छोड़ दिया जहां पर वो पल पल डूबते हुए घुट घुट कर मरती रही। ये ऐसी बातें हैं मां जिन्हें आप सबको सोचना चाहिए था लेकिन आप में से किसी ने नहीं सोचा। ख़ैर कोई बात नहीं, किसी ने नहीं सोचा तो क्या हुआ? मैं सोचूंगा, अपनी बहन को घुट घुट कर मरते नहीं देख सकूंगा मैं। उसकी खुशी के लिए मैं सब कुछ करूंगा। आप लोगों को जो सोचना है सोचते रहिए।"

कहने के साथ ही रूपचंद्र पलटा और फिर बिना किसी की कोई बात सुने बिना बाहर निकल गया। बरामदे में बैठी औरतें, बहुएं और बेटियां भौचक्की सी किन्हीं गहरे ख़यालों खोई नज़र आने लगी थीं।

✮✮✮✮

रागिनी भाभी के सामने रूपा सच में काफी असहज नज़र आ रही थी और साथ ही शर्मा भी रही थी। भाभी अब भी ख़ामोश थीं। उनके चेहरे पर नाराज़गी के भाव अब भी विद्यमान थे। इधर मुझे समझ नहीं आ रहा था कि अब क्या करूं? हम तीनों ही जीप से उतर कर मकान के पास आ गए थे। मकान के अंदर से कुछ कुर्सियां निकाल दी थी मैंने जिस पर भाभी तो बैठ गईं थी लेकिन रूपा सिर झुकाए खड़ी थी। अभी मैं कुछ कहने के बारे में सोच ही रहा था कि तभी भुवन आ गया। उसे देख मैंने राहत की सांस ली।

"बहू रानी आप यहां?" उसने भाभी को देखते ही आश्चर्य से कहा। इससे ज़्यादा वो बोल ना सका था। उसकी नज़र रूपा पर भी पड़ चुकी थी जिसे देखने के बाद वो मेरी तरफ हैरानी के साथ साथ सवालिया नज़रों से देखने लगा था।

"हम हवेली से वैभव के साथ यहां घूमने के लिए निकले थे।" उधर भाभी ने भुवन के सवाल का जवाब देते हुए कहा____"हमारे साथ हमारी होने वाली देवरानी भी आ गई है। वैसे अच्छा हुआ कि यहां तुम भी हो। एक काम करो, तुम हमें अपने साथ ले चलो। हम देखना चाहते हैं कि हमारे देवर ने यहां कौन कौन सी फसल उगा रखी है और साथ ही ये भी कि यहां पर उसका काम कैसा चल रहा है?"

"अगर आप ऐसा ही चाहती हैं तो ठीक है बहू रानी।" भुवन ने बड़े विनम्र भाव से कहा____"मैं आपको यहां की सारी ज़मीन का भ्रमण करवा दूंगा।"

भुवन के ऐसा कहते ही भाभी एक झटके से कुर्सी पर से उठ कर खड़ी हो गईं। फिर मेरी तरफ देखते हुए बोलीं____"हम भुवन के साथ खेतों की निगरानी करने जा रहे हैं वैभव। तुम यहीं पर रूपा के साथ बातें करो।"

मैंने जवाब में ज़्यादा कुछ कहना मुनासिब नहीं समझा। बस हां में सिर हिला दिया। उसके बाद भाभी ने एक बार रूपा की तरफ स्नेह भरी दृष्टि से देखा और फिर उसके चेहरे को प्यार से सहला कर चली गईं। भुवन उनके आगे आगे चला जा रहा था।

"तुम्हारा बहुत बहुत धन्यवाद रूपा।" मैंने रूपा से बात शुरू करने के उद्देश्य से ख़ामोशी तोड़ते हुए कहा____"जो तुमने उस वक्त मेरे मन की बात समझ कर भाभी के साथ चलने की बात कही।"

"वो तो कहनी ही थी।" रूपा ने मेरी तरफ देखते हुए कहा____"आख़िर मेरा महबूब भी तो यही चाहता था। फिर भला मैं कैसे अपने दिल के सरताज के मन का न करती?"

रूपा की बात सुन कर मैंने उसकी तरफ गौर से देखा। वो सच में मोहब्बत भरी नज़रों से मुझे देखे जा रही थी। उसे अपनी तरफ यूं देखता देख मेरे जिस्म में झुरझुरी सी होने लगी। मुझे एकदम से महसूस हुआ कि सच में वो मुझसे बहुत प्रेम करती है। ये सोच कर बुरा भी लगा कि इसके पहले मैं कभी उसकी चाहत के साथ न्याय नहीं कर सका था।

"क्या हुआ?" मुझे कहीं खोया देख उसने कहा____"क्या सोचने लगे? क्या मेरा यहां आना अच्छा नहीं लगा तुम्हें?"

"नहीं, ऐसी बात नहीं है।" मैंने एकदम से अधीर हो कर कहा____"बस एक अपराध सा महसूस हो रहा है मुझे। समझ में नहीं आ रहा कि अपने अंदर की हालत तुम्हें किन शब्दों में बताऊं ताकि तुम समझ सको।"

"किस बात का अपराध महसूस हो रहा है तुम्हें?" रूपा ने हैरानी से मेरी तरफ देखा____"और ऐसा क्या है जिसे मुझे समझाना चाहते हो?"

"यही कि मैंने कभी तुम्हारी चाहत को महसूस करने की कोशिश नहीं की।" मैंने गंभीरता से कहा____"और ना ही ये समझने की कोशिश की थी कि प्रेम क्या होता है? अगर कभी समझने की कोशिश करता तो शायद मुझे तुम्हारी चाहत का भी एहसास हो गया होता। यही अपराध है मेरा जिसे नहीं करना चाहिए था मुझे।"

"पर मैं तो ऐसा कुछ भी नहीं सोचती।" रूपा ने सहजता से कहा____"मेरी नज़र में तुमने कोई अपराध नहीं किया है। ऐसा मैं इस लिए कह रही हूं क्योंकि दुनिया वालों की तरह मैं भी तुम्हारी फितरत से अच्छी तरह वाक़िफ रही हूं। मुझे शुरू से ही पता था कि तुम ऐसे बिल्कुल भी नहीं हो जिसे किसी की भावनाओं की परवाह हो अथवा जो किसी लड़की के प्रति वैसी भावना रखता हो जिसे प्रेम कहा जाता है। मैं तो इसी बात से खुश थी कि तुमने कभी मुझे बाकी लड़कियों की तरह नहीं समझा बल्कि मेरा स्थान उन सबसे ऊंचा और ख़ास बनाए रखा।"

मैं चकित सा देखता रह गया रूपा को। मुझे उससे ऐसी उम्मीद बिल्कुल भी नहीं थी। मुझे लगा था शायद वो अभी भी मुझसे शिकायतें करेगी।

"जब तुम वैसे थे ही नहीं तो फिर मैं कैसे तुम्हें किसी बात के लिए दोष दूं?" उधर रूपा कहती जा रही थी____"और तुम्हें भी किसी बात के लिए खुद को अपराधी महसूस कराने की कोई ज़रूरत नहीं है। मैं ये बिल्कुल भी सहन नहीं कर सकती कि जिसे मैं टूट कर चाहती हूं वो किसी बात के चलते हीन भावना से ग्रसित हो जाए।"

"ये क्या कह रही हो तुम?" मैं चकित सा बोल पड़ा।

"हां वैभव, मेरी तुमसे प्रार्थना है कि ऐसा कभी मत सोचना।" रूपा दीवानावार सी हो कर बोली____"खुद को कभी भी किसी बात के लिए दोष मत देना। तुम जैसे भी हो मेरी मोहब्बत हो। तुम मुझे कबूल ना भी करते तो अब तुमसे कोई गिला न करती।"

एक तीव्र झटका लगा मुझे। मुझे यकीन न हुआ कि मेरे कान ये क्या सुन रहे थे? आख़िर किस मिट्टी की बनी थी ये लड़की? मेरे जैसे बदनाम लड़के से ऐसी मोहब्बत....ऐसी दीवानगी?

"जिस दिन मुझे ये पता चला था कि तुम किसी और लड़की से प्रेम करने लगे हो तो सच कहूं तो मैं टूट गई थी उस दिन।" रूपा की आंखें नम हो गईं, बोली____"मंदिर में जा कर देवी मां के सामने घंटों बैठी रोती रही थी मैं। उनसे शिकायतें कर रही थी। उनसे चीख चीख कर पूछ रही थी कि आख़िर मेरे प्रेम में क्या कमी रह गई थी जिसके चलते उन्होंने तुम्हें किसी और का बना दिया? दूसरे दिन तुमसे मिली तो अपने दिल का सारा गुबार तुम पर भी उतारा मगर चैन नहीं मिला। रात भर सोचती रही और रोती रही। दूसरे दिन तुमसे फिर मिली और जब तुमने कोई जवाब नहीं दिया और जब मैंने तुम्हें बेबस सा होते देखा तो एकदम धक्का सा लगा मुझे। पहली बार महसूस हुआ कि मैंने अपने प्रेम को बेबस कर दिया है। मैं जिसे चाहती हूं उसे मजबूर कर रही हूं। ये ऐसा एहसास था वैभव जिसने मुझे अंदर तक झकझोर कर रख दिया। वापस घर पहुंचने पर मैंने बहुत सोचा इस बारे में। तब जा कर मुझे एहसास हुआ कि मुझे ऐसा नहीं करना चाहिए था। मुझे अपनी मोहब्बत को दोष नहीं देना चाहिए था। अरे! प्रेम तो वो है जिसमें सिर्फ फ़ना हुआ जाता है, ना कि उसे हासिल करने के लिए कोई ज़ोर आजमाईश की जाती है। प्रेम तो वो है जिसमें सिर्फ अपने प्रेमी की खुशियों का ख़याल रखा जाता है। ज़रूरत पड़ने पर अपनी भी खुशियों का बलिदान कर दिया जाता है, ना कि अपने कर्म से अपने प्रेमी को दुखी कर दो। बस, दिलो दिमाग़ से एक झटके में सारा संताप मिट गया। मुझे समझ आ गया कि अब मुझे क्या करना है। हां वैभव, मैंने सोच लिया था कि मीरा की तरह मैं भी तुम्हारे प्रेम में जोगन बन जाऊंगी। जीवन भर तुमसे ही प्रेम करूंगी और दुनिया की हर रुसवाई को झेलते हुए एक दिन मर जाऊंगी।"

"बस करो।" मैं एक झटके में उसके दोनों कंधे पकड़ कर बोल पड़ा। उसकी बातें सुन कर मेरा समूचा वजूद हिल गया था, बोला____"ऐसी बातें मत करो। मैं कोई देवता नहीं हूं जिसे तुम इस हद तक प्रेम करो और मेरी पूजा करो। अरे! मैं तो हद दर्जे का चरित्र हीन लड़का हूं जिसने अब से पहले न जाने कितनी ही बहू बेटियों की इज्ज़त के साथ खिलवाड़ किया है। तुम्हें मुझ जैसे लड़के से इस तरह का प्रेम नहीं करना चाहिए। मैं तुम्हारे प्रेम के लायक नहीं हूं रूपा।"

"तुम किस लायक हो ये निर्णय तुम खुद नहीं कर सकते मेरे साजन।" रूपा ने कहा____"मेरे सामने तो बिल्कुल भी नहीं क्योंकि बता ही चुकी हूं बहुत प्रेम करती हूं तुम्हें। कोई मेरे सामने मेरे दिलबर को ऐसा कहे ये मैं सहन नहीं कर सकती।"

एक बार फिर से अवाक रह गया मैं। रूपा की बातें मुझे प्रतिपल आश्चर्य चकित कर रहीं थी। मैं ख़्वाब में भी नहीं सोच सकता था कि वो मेरे बारे में ऐसा सोचती है। उसकी बातों में, उसकी आंखों में प्रेम और सिर्फ प्रेम की सच्चाई के सिवा कुछ नहीं दिख रहा था मुझे। एक बार फिर मेरे जिस्म में झुरझुरी सी हुई। ज़हन में ख़याल उभरा कि ये तो सच में मुझे किसी देवता की तरह मानती है और प्रेम करती है। एकाएक मुझे भारी आत्मग्लानि सी महसूस हुई। मुझे समझ न आया कि मैं उससे क्या कहूं?

"वैसे मैं ये सोच कर हैरान हूं कि तुम्हारे भाई रूपचंद्र ने खुद आ कर मुझसे कहा कि मैं तुमसे मिल लूं।" मैंने विषय बदलने की गरज से हिचकिचाते हुए पूछा____"आख़िर इतना बड़ा चमत्कार कैसे हो गया? जो रूपचंद्र मुझे बैरी की तरह देखता था और मुझे मिट्टी में मिला देने पर आमादा था उसने मुझसे ऐसा क्यों कहा? कहा तो कहा ऊपर से आज उसने सचमुच तुम्हें मेरे साथ भेज भी दिया। ये मेरे लिए बहुत बड़े आश्चर्य की बात है।"

"असल में रूप भैया अब पहले जैसे नहीं रहे।" रूपा ने गहरी सांस लेते हुए कहा____"इतना कुछ होने के बाद उनके मन से भी बैर भाव निकल गया है और शायद यही वजह थी कि जब उनका दिमाग़ शांत हुआ तो उन्हें अपनी इस बहन की भी याद आई।"

"क्या मतलब?" मैं उलझ सा गया।

"कुछ दिन पहले वो मेरे कमरे में मुझसे मिलने आए थे।" रूपा ने कहा____"पहले तो मुझे उनके आने पर हैरानी हुई क्योंकि जब से उन्हें मेरे और तुम्हारे बीच के संबंधों के बारे में पता चला था तब से वो मुझसे नाराज़ थे और मुझसे बात नहीं करते थे। ख़ैर जब वो आए तो मैंने भी सोच लिया था कि अगर वो मुझ पर अपनी भड़ास निकालेंगे तो मैं अपनी ज़ुबान से उन्हें कुछ नहीं कहूंगी। आख़िर वो मेरे बड़े भैया हैं और मैंने उनका दिल दुखाया है। इतना ही नहीं मेरी वजह से उनके पूरे परिवार की मान मर्यादा का हनन भी हुआ है। इस लिए सोच लिया था कि उनकी हर डांट चुपचाप सह लूंगी लेकिन ऐसा हुआ नहीं बल्कि वो हुआ जिसकी मुझे बिल्कुल भी उम्मीद नहीं थी।"

कहने के साथ ही रूपा ने मुझे अपने भाई की मुलाक़ात का सारा किस्सा संक्षेप में बता दिया जिसे सुन कर मैं भी हैरान रह गया। यकीनन रूपचंद्र बहुत बदल गया था। मैं ख़ास कर उसकी इस बात से प्रभावित हुआ कि उसे अपनी बहन की खुशियों की परवाह थी और इसी लिए उसने इतना बड़ा क़दम उठाया। दूसरी तरफ मैं ये जान कर भी मन ही मन हैरान था कि रूपा ने अपने भाई से मेरे और अनुराधा से संबंधित क्या कुछ कहा था। उसे अनुराधा से मेरे प्रेम का एहसास था। मैंने सोचा वाकई में रूपा एक अद्भुत लड़की है जो इतनी गहराई से किसी के बारे में सोच सकती है। एकाएक ही मुझे रूपा की इस सोच पर गर्व सा महसूस हुआ और साथ ही उसके लिए एक ख़ास तरह का जुड़ाव सा भी महसूस हुआ।

"मेरे घर वालों को लगता है कि जब तुम किसी और लड़की से प्रेम करते हो तो मुझसे ब्याह करने के बाद मुझे उसके जैसा प्रेम और मान सम्मान नहीं दोगे।" मुझे ख़ामोश देख रूपा ने कहा____"हालाकि उनका ऐसा सोचना कहीं न कहीं जायज़ भी है क्योंकि उन्हें अपनी बेटी की खुशियों का ख़याल है मगर इसके लिए मैं ये भी नहीं चाहती कि जिसे मैं दिलो जान से प्रेम करती हूं उसे किसी बात के लिए कोई मजबूर करे। जब मेरा महबूब ही खुश नहीं रहेगा तो मैं भला कैसे उसे देख के खुश रहूंगी?"

"तुम सच में अद्भुत हो रूपा।" मैं भावावेश में बोल उठा____"ये मेरी बदकिस्मती ही थी कि इसके पहले मैं ना तो तुम्हें कभी समझ सका और ना ही मेरे दिल में तुम्हारे लिए प्रेम जागृत हुआ। ऐसा शायद इसी लिए हुआ क्योंकि मैं सिर्फ अय्याशियों में ही खोया रहता था और प्रेम जैसे पवित्र एहसास को बकवास समझता था। तुमने अपने प्रेम के चलते क्या कुछ नहीं किया और मैं इतना स्वार्थी था कि कभी तुम्हें शुक्रिया तक नहीं कहा। मैं सच में बहुत बुरा हूं रूपा। तुम्हें मेरे जैसे इंसान से ना तो प्रेम करना चाहिए और ना ही ब्याह करना चाहिए।"

"अब तो बहुत देर हो चुकी है मेरे दिलबर।" रूपा की आंखों में आंसू तैरते नज़र आए____"अब तो ईश्वर भी चाहेगा तो वो मेरे दिल से तुम्हें निकाल नहीं पाएगा। पहले ही कह चुकी हूं कि तुम जैसे भी हो मैं तुम्हें जीवन भर इसी शिद्दत के साथ प्रेम करती रहूंगी। हां, अगर तुम मुझसे ब्याह नहीं करना चाहते तो तुम्हें मजबूर भी नहीं करूंगी। मुझे अपना महबूब उस सूरत में तो बिल्कुल भी नहीं चाहिए जिसमें किसी तरह की मजबूरी और बेबसी शामिल हो। मुझे जीवन भर तुम्हारे प्रेम में तड़पना मंज़ूर है लेकिन तुम्हें मजबूर कर के और तुम्हारी खुशियां छीन कर मैं तुम्हें अपना नहीं बनाना चाहती।"

"बस, कुछ मत बोलो अब।" मुझसे जब बर्दास्त न हुआ तो मैंने एक झटके में रूपा को खींच कर अपने सीने से लगा लिया।

उसका नाज़ुक जिस्म मेरी आगोश में आते ही थरथरा उठा। उधर मेरे सीने से लगते ही रूपा ने मुझे जोरों से जकड़ लिया और ज़ार ज़ार रो पड़ी। मेरी अपनी आंखें भी नम हो गईं। काफी देर तक वो मुझसे लिपटी रोती सिसकती रही। फिर मैंने उसे खुद से अलग किया। उसका चेहरा आंसुओं से तर बतर हो गया था। आंखें सुर्ख हो गईं थी।

"मैं बहुत खुशनसीब हूं रूपा कि मेरे जीवन में दो ऐसी लड़कियां मेरी पत्नी के रूप में मुझे मिलेंगी जो मुझे हद से ज़्यादा प्रेम करती हैं।" मैंने भाव विभोर हो कर कहा____"हां रूपा, मैं सच में बहुत नसीब वाला हूं। अब तो ईश्वर भी चाहेगा तो मैं तुम्हें खुद से जुदा नहीं करूंगा और....और हां तुम बिल्कुल फ़िक्र मत करो। मैं अनुराधा की ही तरह तुम्हें प्रेम करूंगा और तुम्हें मान सम्मान दूंगा। मैं चाहता हूं कि अब से मेरी रूपा की आंखों से आंसू का एक कतरा भी बाहर न निकले। मेरी रूपा ने अब तक बहुत दुख सहे हैं लेकिन अब नहीं। अब से मैं हर पल उसे खुशी से मुस्कुराता हुआ देखना चाहता हूं।"

रूपा मेरी बात सुन कर एक बार फिर से मुझसे लिपट गई और सिसक सिसक कर रोने लगी। जाने कितने समय की तड़प थी जो आंसुओं के रूप में आज निकल रही थी। ख़ैर मैंने जल्दी ही उसे सम्हाला और कहा कि वो रोए नहीं। आख़िर कुछ देर में रूपा शांत हो गई। मैंने अपने हाथों से उसके आंसू पोंछे। ये देख कर उसके होठों पर मुस्कान उभर आई। पहली बार मैंने उसके चेहरे पर खुशी की असली चमक देखी। उसका चेहरा एकदम से ताज़े गुलाब की तरह खिल उठा था।

उसके बाद हम दोनों इधर उधर की बातें करने लगे। उसने मुझसे अनुराधा के बारे में पूछा तो मैंने उसे अनुराधा से अपने प्रेम का सारा किस्सा बता दिया। अनुराधा और मेरी प्रेम कहानी सुन कर रूपा मुस्कुराते हुए जाने क्या सोचने लगी थी।

"तो इसी तरह दीदी को अनुराधा से भी मिलवा आए हो तुम?" फिर उसने मुस्कुराते हुए मेरी तरफ देखा____"वैसे सच कहूं तो अब मेरा भी मन करने लगा है कि मैं उससे मिलूं। मैं भी देखना चाहती हूं कि मेरी होने वाली सौतन कैसी है?"

"क्या सच में?" मैंने धड़कते दिल से उसकी तरफ देखा।

"हां जी सच में।" रूपा ने कहा____"पर मैं उसे अपनी सौतन नहीं मानूंगी बल्कि अपनी छोटी बहन मानूंगी। वो मेरी गुड़िया की तरह रहेगी जिसका मैं ख़याल भी रखूंगी और बहुत सारा प्यार भी करूंगी।"

"वाह! बहुत खूब।" मैं मुस्कुरा उठा____"तुम दोनों अगर आपस में ही प्यार करोगी तो फिर मुझसे प्यार कौन करेगा?"

"फ़िक्र मत कीजिए जनाब।" रूपा ने हल्के से हंसते हुए कहा____"हम दोनों मिल कर थोड़ा सा आपको भी प्यार कर लिया करेंगी।"

"क...क्या??" मैं चौंका____"बस थोड़ा सा???"

"हां...क्यों?" रूपा गहरी मुस्कान के साथ बोली____"ज़्यादा चाहिए क्या?"

"तुम ज़्यादा की बात करती हो।" मैंने कहा____"मुझे तो हद से ज़्यादा चाहिए।"

"अब ये तो आने वाला वक्त बताएगा।" रूपा एकाएक जाने क्या सोच कर शर्मा गई, फिर बोली____"अभी तो फिलहाल प्रतीक्षा ही करनी पड़ेगी आपको।"

"आपको???" मैंने उसे छेड़ा____"अभी तक तो तुम मुझे "तुम" कह रही थी और अब अचानक से "आप" कहने लगी? ये अचानक से इतना बदलाव कैसे हो गया?"

"ऐसा इस लिए जनाब क्योंकि वो अभी से खुद को तुम्हारी पत्नी मान चुकी है।" एकाएक भाभी की आवाज़ सुन कर हम दोनों ही उछल पड़े। उधर भाभी ने पास आ कर मुस्कुराते हुए कहा____"और क्योंकि पति को इज्ज़त बक्शी जाती है इस लिए हर पत्नी अपने पति को "आप" ही कहती है।"

रूपा बेचारी बुरी तरह शर्मा गई। भाभी के आते ही वो झट से उठी और दूर जा कर खड़ी हो गई। ये देख भाभी की मुस्कान और भी ज़्यादा गहरी हो गई। इधर मैं भी थोड़ा हड़बड़ा सा गया था। दिल की धड़कनें थम सी गईं थी।

"लगता है मैं जल्दी वापस आ गई।" भाभी ने बारी बारी से हम दोनों की तरफ देखते हुए कहा____"शायद तुम दोनों की बातें अभी पूरी नहीं हुईं हैं। अगर ऐसा है तो मैं वापस चली जाती हूं। खेतों का एक चक्कर और लगा लेती हूं।"

"न...नहीं दीदी।" रूपा झट से बोल पड़ी____"आप कहीं मत जाइए।"

"सच कह रही हो न?" भाभी ने मुस्कुराते हुए रूपा की तरफ देखा____"देखो, अगर अभी मन न भरा हो तो बिना संकोच के बता दो मुझे। मैं नहीं चाहती कि मेरी होने वाली देवरानी यहां से नाखुश हो कर जाए।"

"ऐसी बात नहीं है दीदी।" रूपा ने शर्म से सिर झुकाए हुए कहा____"कृपया आप ऐसा मत सोचिए।"

"ठीक है फिर।" भाभी ने एकाएक मेरी तरफ देखा और कहा____"और तुम्हारा क्या ख़याल है जनाब? घर चलें या अभी और अपनी रूपा से बातें करनी है?"

"नहीं भाभी।" मैं शरमा तो रहा था किंतु फिर मुस्कुराते हुए बोला____"आज के लिए इतना काफी है। मन होगा तो फिर किसी दिन मिल लेंगे।"

"आय हाय! ऐसी बात है क्या?" भाभी ने मुझे छेड़ते हुए कहा____"चलो अच्छा है। एक दूसरे से मिलना भी चाहिए। सबसे छुप छुप कर प्रेम का चक्कर चलाने का आनंद ही अलग होता है।"

भाभी की बात सुन कर रूपा फिर से बुरी तरह शर्मा गई और इधर मैं मुस्कुरा उठा। ख़ैर ऐसी ही बातों के बाद मैं भुवन को बता कर और रूपा तथा भाभी को जीप में बैठा कर वहां से चल पड़ा। रास्ते में भाभी ने मुझसे तो कोई बात नहीं की लेकिन पूरे रास्ते वो रूपा से धीमी आवाज़ में जाने क्या क्या बातें करती रहीं। कुछ ही समय में रूपा का घर आ गया तो मैंने जीप रोक दी। रूपा जीप से उतर गई। मैंने हार्न दे दिया था इस लिए जल्दी ही घर के अंदर से मुझे रूपचंद्र निकल कर बाहर आता नज़र आया।

रूपचंद्र हमारे पास आया, फिर अपनी बहन रूपा को देखा। उसके चेहरे पर मौजूद खुशी को देख कर वो हल्के से मुस्कुराया। फिर वो भाभी को प्रणाम करने के बाद रूपा को ले कर चला गया। उसके जाने के बाद मैंने भी जीप को हवेली की तरफ बढ़ा दिया।​
 
अध्याय - 112
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उस वक्त शाम का अंधेरा फैलने लगा था।
आसमान में हल्का चांद तो था किंतु काले घने बादलों में छुपा हुआ था जिसके चलते उसका मध्यम प्रकाश ज़मीन पर नहीं पहुंच पा रहा था। हर तरफ नीम अंधेरा छाया हुआ था।

उसी अंधेरे में एक इंसानी साया एक पेड़ के पीछे छुपा हुआ था। चेहरे पर पत्थर जैसी सख़्ती विद्यमान थी और आंखों में शोला सा दहकता प्रतीत हो रहा था। पेड़ के पीछे छुपा वो उस दरवाज़े पर अपनी निगाहें जमाए हुए था जो इस वक्त बंद नज़र आ रहा था। थोड़ी थोड़ी देर के अंतराल में वो आस पास भी नज़रें घुमा लेता था किंतु फिर जल्दी ही उसकी निगाह पुनः उसी बंद दरवाज़े पर जा कर जम जाती थी। उसके हाव भाव से ऐसा प्रतीत हो रहा था जैसे उसे किसी की बड़ी शिद्दत से प्रतीक्षा थी।

लगभग बीस मिनट बाद उसका इंतज़ार ख़त्म हुआ। जिस दरवाज़े पर उसने शिद्दत से निगाहें जमा रखी थी वो हल्की आवाज़ के साथ खुला और नीम अंधेरे में उसने किसी को उस दरवाज़े से बाहर निकलते देखा। उसने आंखें सिकोड़ कर उस निकलने वाले व्यक्ति को पहचानने की कोशिश की। अगले ही पल उसके सख़्ती से भिंचे हुए होठों पर एक ऐसी मुस्कान थिरक उठी जो ज़हर से बुझी हुई थी।

उधर दरवाज़े से निकलने वाले व्यक्ति ने दरवाज़े को बंद किया और फिर पलट कर एक तरफ को बढ़ता चला गया। नीम अंधेरे में उस व्यक्ति की आकृति को देख कर ऐसा लगा जैसे वो कोई औरत थी क्योंकि मंद मंद चलती हवा से उसका लिबास लहरा उठता था। जिस तरह से उसका लिबास हवा में लहरा उठता था उससे साफ ज़ाहिर होता था कि वो उस व्यक्ति के बदन पर मौजूद साड़ी थी। बहरहाल वो औरत कुछ ही देर में अंधेरे में दिखनी बंद हो गई।

पेड़ के पीछे छिपे साए ने लगभग दो मिनट का समय बर्बाद किया और फिर आस पास का अच्छी तरह जायजा लेने के बाद पेड़ के पीछे से निकल कर घर के दरवाज़े की तरफ बढ़ चला। अंदाज़ ऐसा था जैसे वो किसी बहुत ही ज़रूरी और ख़ास मकसद से आगे बढ़ रहा हो। चेहरे पर पहले की ही तरह पत्थर जैसी सख़्ती क़ायम थी। पेड़ से थोड़ा दूर जब वो आया तो उसके बाएं हाथ में कुछ नज़र आया जो स्पष्ट नज़र नहीं आ रहा था।

दरवाज़े के पास पहुंच कर साए ने दरवाज़े की सांकल को पकड़ कर सामान्य अंदाज़ में बजाया। हालाकि उसने महसूस किया कि दरवाज़ा अंदर से कुंडी द्वारा बंद नहीं है किंतु इसके बावजूद उसने दरवाज़े को खुद अंदर की तरफ धकेलना ज़रूरी नहीं समझा था। बल्कि सांकल द्वारा दस्तक दे कर बड़े आराम से किसी के द्वारा दरवाज़ा खोलने की प्रतीक्षा करने लगा था। किस्मत अच्छी थी उसकी, ज़्यादा इंतज़ार नहीं करना पड़ा उसे क्योंकि कुछ ही पलों में उसने दरवाज़े के बीच बनी झिरी से लालटेन की रोशनी अपनी तरफ ही आती देखी।

साया एकदम से सतर्क सा हो गया। सख़्त चेहरे पर और भी ज़्यादा सख़्ती उभर आई और साथ ही जबड़े कस गए। बाएं हाथ में जो चीज़ उसने ले रखी थी उस पर उसकी पकड़ और भी ज़्यादा सख़्त हो गई। तभी अंदर से उसकी तरफ आता लालटेन का प्रकाश तेज़ हो गया। ज़ाहिर है दरवाज़ा खोलने के लिए जो कोई भी आ रहा था वो दरवाज़े के पास पहुंच चुका था।

"मैंने दरवाज़ा अंदर से बंद नहीं किया था मां।" दरवाज़े के उस पार से किसी लड़की की आवाज़ उभरी____"फिर सांकल बजाने की क्या ज़रूरत थी तुम्हें? वैसे दिशा मैदान कर के बड़ा जल्दी आ गई तुम?"

इस वाक्य के ख़त्म होते ही दरवाज़ा खुला। ज़ाहिर है उस लड़की ने ही दरवाज़ा खोला जिसने ये उपरोक्त वाक्य बोले थे। दरवाज़ा खुला तो लालटेन के प्रकाश में साए की नज़र जिस लड़की पर पड़ी वो मुरारी की बेटी अनुराधा थी। साए के होठों पर एकदम से ज़हरीली मुस्कान उभर आई। उधर अनुराधा ने जैसे ही लालटेन के प्रकाश में दरवाज़े के बाहर किसी अजनबी शख़्स को खड़ा देखा तो वो बुरी तरह घबरा गई। एक पल को तो ऐसा लगा जैसे उसके हाथ से लालटेन ही छूट जाएगी किंतु फिर जल्दी ही उसने खुद को सम्हाला और उस अजनबी व्यक्ति को पहचानने की कोशिश की। उसे उस अजनबी व्यक्ति को पहचानने में ज़्यादा समय नहीं लगा। जैसे ही उसने उसे पहचाना तो उसके चेहरे पर आश्चर्य के भाव उभर आए। आंखें फट सी पड़ीं।

इससे पहले कि अनुराधा कुछ बोल पाती अचानक बिजली सी कौंध गई और अनुराधा पर मानों पूरे वेग से क़यामत सी टूट पड़ी। बाहर खड़े व्यक्ति ने बिजली की सी फुर्ती से बाएं हाथ में ली हुई चीज़ को ज़मीन पर गिरा कर अनुराधा को दबोच लिया। मारे दहशत के अनुराधा की चीख तो निकली लेकिन मुंह में अजनबी की सख़्ती के साथ जम गई हथेली के चलते बाहर न निकल सकी। व्यक्ति ने पूरी ताक़त लगा कर उसे दबोच लिया था।

अनुराधा उससे छूटने के लिए बुरी तरह छटपटाने लगी थी लेकिन खुद को उस व्यक्ति से छुड़ा नहीं पा रही थी। डर और घबराहट के मारे उसका पल भर में ही बुरा हाल हो गया था। उसके एक हाथ में लालटेन थी जो नीचे ज़मीन पर गिर गई। शुक्र था कि आग लगने की बजाय वो बुझ गई थी। पलक झपकते ही घुप्प अंधेरा छा गया किंतु अनुराधा को ऐसा लगा जैसे उसके अपने जीवन में भी अंधेरा छाने वाला है। वो अभी भी बुरी तरह उस व्यक्ति की मजबूत पकड़ से छूटने की जी तोड़ कोशिश कर रही थी लेकिन तभी जैसे उस पर वज्रपात हो गया और वो एकदम शांत पड़ती चली गई।

व्यक्ति ने उसकी कनपटी के खास हिस्से पर ज़ोर से हाथ का प्रहार किया था जिसके चलते अनुराधा को पीड़ा तो बहुत हुई लेकिन उसकी चीख हथेली पर जमी व्यक्ति की हथेली के अंदर ही घुट कर रह गई। अगले कुछ ही पलों में अनुराधा बेहोशी की गर्त में डूबती चली गई। तभी अंदर से किसी बच्चे ने आवाज़ लगाई। शायद अंधेरा हो जाने की वजह से अनुराधा का भाई अनूप डर गया था इस लिए उसने अनुराधा को आवाज़ लगाने लगा था।

उस व्यक्ति ने फ़ौरन ही अनुराधा के बेहोश जिस्म को उठा कर अपने कंधे पर लादा और फिर झुक कर ज़मीन पर पड़ी अपनी वस्तु को उठा कर तेज़ी से एक तरफ को बढ़ता चला गया। कुछ ही क्षणों में ये भयावह घटना घट चुकी थी जिसकी किसी को दूर दूर तक भनक नहीं लगी थी।

✮✮✮✮

सरोज को शौच क्रिया से निपटने में ज़्यादा समय नहीं लगा था। वो ज़्यादा दूर गई भी नहीं थी। यूं तो वो दिन ढलते ही शौच क्रिया से फुर्सत हो जाया करती थी किंतु आज उसे कई बार जाना पड़ गया था। असल में पेट ख़राब होने की वजह से ऐसा हुआ था। शौच क्रिया से वो जल्दी इस लिए निवृत हो गई थी क्योंकि उसे अपनी बेटी की फ़िक्र थी। एक तो उसका घर गांव से अलग एकांत में बना हुआ था और दूसरे पिछले कुछ समय से रुद्रपुर में जो घटनाएं घट रहीं थी उससे भी वो फिक्रमंद थी।

सरोज उस वक्त बुरी तरह चौंकी जब उसने अपने घर का मुख्य द्वार खुला पाया और अंधेरे में बेटे अनूप के रोने की आवाज़ सुनी। वो अपने बेटे को पुकारते हुए तेज़ी से अंदर दाख़िल हुई तो अचानक ही उसका पैर लालटेन में पड़ गया जिससे वो लड़खड़ा कर गिर पड़ी। उधर अपनी मां की आवाज़ सुनते ही अनूप रोता हुआ अंधेरे में ही उसकी तरफ भागता हुआ आया।

"क...क्या हुआ मेरे बच्चे?" सरोज जल्दी से उठ कर अनूप के पास पहुंची और उससे बोली____"तू रो क्यों रहा है? तेरी दीदी कहां है और....और यहां अंधेरा क्यों है बेटे?"

"दीदी न‌ई है....दीदी न‌ई है।" अनूप रोते बिलखते हुए बोला तो सरोज जो पहले से ही चिंता में थी वो अब बुरी तरह घबरा गई।

अपने बेटे को सम्हाले वो अनुराधा को इधर उधर पुकारने लगी मगर अनुराधा जब यहां हो तो वो कोई जवाब भी दे। इतना पुकारने पर भी जब अनुराधा का कोई जवाब न मिला तो सरोज का मारे घबराहट के बुरा हाल हो गया। भयंकर अनिष्ट की आशंका के चलते उसकी रुलाई फूट गई। उसे याद आया कि दरवाज़े के पास किसी चीज़ से उसका पैर टकराया था। वो भागते हुए दरवाज़े की तरफ गई और अंधेरे में टटोल कर उसने उस चीज़ को ढूंढा। सरोज ये जान कर और भी ज़्यादा घबरा उठी कि जिस चीज़ से उसका पैर टकराया था वो लालटेन है। उसके मन में एक ही पल में न जाने कितने सवाल चकरा उठे। उसने फ़ौरन ही लालटेन को सही किया और फिर अंधेर में ही अंदाजन रसोई के पास आ कर माचिस को खोजा। माचिस से लालटेन को जला कर उसने चारो तरफ देखा।

दरवाज़े के पास लालटेन पड़ी मिली थी उसे, जहां पर लालटेन का तेल ज़मीन पर गिरा हुआ था। सरोज के मन में तरह तरह के ऐसे ख़याल उभरने लगे जो प्रतिपल उसे आतंकित किए दे रहे थे। वो लालटेन लिए पागलों की तरह अनुराधा को यहां वहां ढूढने लगी। जब घर के अंदर उसे अनुराधा न मिली तो वो घर से बाहर निकल कर चारो तरफ देखने लगी। काफी खोजने के बाद भी जब उसे अपनी बेटी न मिली तो वो बरामदे में बैठ कर फूट फूट कर रोने लगी।

पहले उसे लगा था कि शायद उसकी तरह अनुराधा भी शौच क्रिया करने चली गई होगी लेकिन बार बार उसके ज़हन में लालटेन का दरवाज़े के पास इस तरह पड़े होने का ख़याल आ जाता जो उससे यही कहता कि कुछ तो बुरा हुआ है यहां। उसकी बेटी के साथ कुछ तो अनिष्ट हुआ है। एक एक कर के सारी बातें उसकी आंखों के सामने किसी चलचित्र की तरह चमकने लगीं।

जब वो आई थी तो दरवाज़ा खुला हुआ था जोकि उसकी नज़र में असंभव बात थी। वो अच्छी तरह जानती थी कि वो दरवाज़ा बंद कर के गई थी और अनुराधा कभी इस तरह रात के वक्त दरवाज़ा खुला नहीं छोड़ सकती थी। फिर उसे याद आया कि हर तरफ अंधेरा था और उसका बेटा अनूप बुरी तरह रोए जा रहा था। आगे बढ़ी तो लालटेन पर उसका पैर पड़ा था। उसके बाद उसका बार बार अनुराधा को पुकारना और जवाब में अनुराधा की तरफ से कोई प्रतिक्रिया ना मिलना। ये सब बातें सोचते ही सरोज अब समझ चुकी थी कि उसकी बेटी के साथ कुछ तो बुरा हुआ है वरना यहां की ऐसी हालत ना होती।

सरोज एकदम से उछल कर खड़ी हो गई। अपनी बेटी के साथ वो कोई भी अनिष्ट नहीं होने देगी। ऐसा सोच कर उसने फ़ौरन लालटेन उठाया और अनूप को ले कर दरवाज़े की तरफ तेज़ी से बढ़ चली। दरवाज़े को यूं ही आपस में भिड़ा कर वो उस तरफ बढ़ती चली गई जिधर वैभव का नया मकान बना हुआ था।

कुछ ही देर में हाथ में लालटेन और साथ में अनूप को लिए वो मकान में पहुंच गई। यूं तो रात ज़्यादा नहीं हुई थी अभी किंतु अंधेरा पूरी तरफ फैल चुका था। मकान में कुछ ऐसे लोग मौजूद थे जिन्हें मकान की चौकीदारी के लिए रखा गया था। सरोज दनदनाते हुए एकदम से अंदर ही घुस गई। मकान के अंदर चार व्यक्ति थे जो लालटेन जलाए बैठे थे। उनके बीच देसी दारू की बोतलें और बीड़ी के बंडल रखे हुए थे। अचानक ही सरोज को आया देख वो सब उछल पड़े।

"अरे! काकी तु...तुम?" एक युवक से व्यक्ति ने हड़बड़ाते हुए सरोज से पूछा____"ह...हाथ में लालटेन लिए इस वक्त यहां कैसे?"

"म...मेरी बेटी नहीं मिल रही बेटा।" सरोज बुरी तरह बिलख उठी, बोली____"म...मैंने उसे हर जगह खोजा मगर वो नहीं मिली। उसके साथ कुछ बुरा हुआ है....भगवान के लिए उसे खोजो। मेरा जी बहुत घबरा रहा है। कहीं किसी ने....।"

सरोज से आगे कुछ बोला ना गया और उसकी रुलाई फूट गई। अपनी मां को रोता देख अनूप भी रोने लगा। उधर उसकी बातें सुन कर चारो व्यक्ति हड़बड़ा कर उठ खड़े हुए।

"य...ये क्या कह रही हो काकी?" पहले वाले युवक ने ही बौखला कर पूछा____"तुम्हारी बेटी भला इस वक्त कहां जा सकती है?"

सरोज ने रोते बिलखते सारी बात उन्हें बता दी और अपनी आशंका भी ज़ाहिर कर दी। सारी बातें सुन कर वो चारो सन्नाटे में आ गए। देशी दारू का नशा तो सरोज के आने पर ही छू मंतर हो गया था।

"भ...भुवन कहा है?" सरोज को एकदम से भुवन का ख़याल आया तो वो हड़बड़ा कर जल्दी से पूछ बैठी____"भुवन को बुलाओ। उससे कहो कि उसकी बहन किसी ख़तरे में है। व...वैभव को भी ख़बर भेजो कोई। हे भगवान! मेरी बेटी के साथ कुछ मत होने देना। उस मासूम को बचा लेना मेरे ईश्वर।"

चार में से दो सरोज की ही उमर के थे। अतः समय की गंभीरता का उन्हें एहसास हुआ। सरोज के कहने पर दो लोग फ़ौरन ही लट्ठ ले कर मकान से बाहर की तरफ दौड़ पड़े।

"चिंता मत करो सरोज भौजी।" एक व्यक्ति ने कहा____"अनुराधा बिटिया को कुछ नहीं होगा। वो तो बहुत अच्छी बिटिया है। भगवान उसके साथ कभी कुछ बुरा नहीं होने देगा। तुम किसी प्रकार की चिंता न करो। बिल्लू और जुगनू गए हैं यहां से। वो जल्दी ही भुवन और छोटे कुंवर को इस बात की सूचना दे देंगे।"

सरोज बेबस भाव से अपने बेटे को लिए वहीं बैठ गई। हालाकि उसका जी तो यही चाह रहा था कि वो खुद ही लालटेन ले कर अपनी बेटी को ढूंढने निकल जाए लेकिन उसे भी पता था की रात के अंधेरे में वो अकेली कहां और कैसे खोज पाएगी अपनी बेटी को? हर गुज़रते पल के साथ उसकी बेचैनी और आशंका के चलते उसकी घबराहट बढ़ती ही जा रही थी।

✮✮✮✮

उस वक्त पिता जी और किशोरी लाल के साथ मैं बैठक में बैठा हुआ था जब अचानक ही एक दरबान ने आ कर बताया कि दो लोग मेरे लिए कोई सूचना देने आए हैं। मैं फ़ौरन ही दरबान के साथ बाहर गया।

बिल्लू और जुगनू सीढ़ियों के नीचे खड़े थे। मशाल की रोशनी थी इस लिए साफ दिख रहा था कि वो दोनों बहुत ज़्यादा परेशान और जल्दी में थे। उन्हें देखते ही मैं पहचान गया कि वो दोनों वही हैं जो मेरे नए बने मकान की चौकीदारी करते हैं। उधर मुझे देखते ही वो दोनों बड़ी तेज़ी से मेरे पास आए और फिर एक ही सांस में जो कुछ मुझे बताया उसे सुन कर मैं सकते में आ गया। सरोज काकी की ही तरह मेरे मन में भी बुरे बुरे ख़याल उभरने लगे। उन दोनों ने बताया कि उन्होंने इस बात की सूचना भुवन को भी दे दी है।

बात क्योंकि मेरी अनुराधा से संबंधित थी और वो भी ऐसी जिसने पलक झपकते ही मेरे अंदर भूचाल सा ला दिया था। उन्हें वापस भेज कर मैं अंदर आया तो पिता जी ने पूछा क्या बात है? मैं उन्हें कोई जवाब न दे सका। देता भी कैसे? जवाब देने का मतलब था उनके सामने अनुराधा से अपने संबंधों को उजागर कर देना। तभी मुझे याद आया कि पिता जी को तो पहले से ही इस बारे में सब पता है। आज रूपा के द्वारा ही मुझे इस बात का पता चला था। कुछ पल गवा कर मैंने उन्हें बता दिया कि मामला क्या है और अब मैं अनुराधा की तलाश में जा रहा हूं।

पिता जी मेरी बात सुन कर खुद भी भौचक्के से रह गए थे। इससे पहले कि वो कुछ कहते मैं भागता हुआ अपने कमरे में पहुंचा। तकिए के नीचे से रिवॉल्वर निकाल कर उसे अपनी कमर में खोंसा और फिर भागते हुए ही नीचे आया। कुछ ही पलों में मैं मोटर साईकिल में बैठा उड़ा चला जा रहा था। इधर पिता जी भी हरकत में आ गए थे और अपने आदमियों को जाने क्या क्या निर्देश देने लगे थे।

साहूकार के घर के पास पहुंचा तो बाहर ही गौरी शंकर काका मिल गए। उनके साथ गांव के दो लोग और थे और साथ ही रूपचंद्र भी। मुझे देखते ही उन्होंने मुझे रुकने का संकेत दिया। मजबूरन मुझे रुकना ही पड़ा।

"इस वक्त मुझे मत रोकिए काका।" मैंने सामान्य लहजा अपनाते हुए कहा____"मैं इस वक्त बहुत जल्दी में हूं।"

"क्या हुआ वैभव?" रूपचंद्र एकदम से बोल पड़ा____"तुम कुछ परेशान से नज़र आ रहे हो? सब ठीक तो है ना?"

"मेरे पीछे बैठो।" मैंने जाने क्या सोच कर रूपचंद्र से कहा____"रास्ते में सब बताऊंगा।"

"अगर वाकई में बहुत जल्दी में हो तो कोई बात नहीं बेटा।" गौरी शंकर ने अपनेपन से कहा____"रूप बैठ जा बेटा। वैभव के साथ जा, तू भी देख कि वैभव बेटा आख़िर किस बात से परेशान है? अगर कोई परेशान वाली बात है तो ये तेरा फर्ज़ बनता है कि तू अपने होने वाले बहनोई की हर परेशानी को दूर करने की कोशिश करे।"

"चलो वैभव।" रूपचंद्र झट से मेरे पीछे बैठते हुए बोला तो मैंने फ़ौरन ही मोटर साईकिल आगे दौड़ा दी।

"वैसे बात क्या है वैभव?" रास्ते में रूपचंद्र ने पूछा____"इस समय ऐसी कौन सी बात हो गई हैं जिसके चलते तुम इतनी जल्दी में हो?"

"अनुराधा अपने घर से ग़ायब है रूपचंद्र।" मैंने सख़्त भाव से कहा____"मेरे आदमियों को उसकी मां ने जो कुछ बताया है उससे साफ ज़ाहिर होता है कि उसके साथ कोई अनहोनी हुई है।"

"क...क्या??? ये क्या कह रहे हो तुम?" रूपचंद्र बुरी तरह उछल पड़ा था, बोला____"कब हुआ ये और कैसे हुआ?"

"ये तो मुझे नहीं पता।" मैंने कहा____"लेकिन इतना पता है कि जिसने भी ये किया है वो मेरे हाथों ऐसी मौत मरेगा कि दुबारा पैदा होने से इंकार कर देगा।"

"हे भगवान!" रूपचंद्र कह उठा____"आख़िर किसने किया होगा ऐसा?"

"कहीं इसके पीछे तुम्हारा हाथ तो नहीं है?" मैंने सख़्त भाव से कहा____"मुझे सच सच बता दो रूपचंद्र वरना तुम सोच भी नहीं सकते कि तुम किस क़दर मेरे गुस्से और क़हर का शिकार हो सकते हो।"

"य...ये तुम क्या कह रहे हो वैभव?" रूपचंद्र बुरी तरह चौंका____"तुम सोच भी कैसे सकते हो कि ऐसा मैंने किया होगा? मैं मानता हूं कि एक समय था जब मैंने उस बेचारी के साथ ग़लत करने की कोशिश की थी लेकिन मेरा यकीन मानो तब से मैंने उसके साथ कुछ ग़लत करने का सोचा तक नहीं है। अगर तुम्हें मुझ पर यकीन नहीं है तो मैं अपनी बहन रूपा की क़सम खा कर कहता हूं ये बात। तुम अच्छी तरह जानते हो कि मैं अपनी जान से भी ज़्यादा प्यारी बहन की झूठी क़सम नहीं खा सकता।"

"समझ में नहीं आ रहा कि आख़िर कहां गई होगी अनुराधा?" मैं बेहद चिंतित भाव से बोल पड़ा____"ये तो पक्की बात है कि वो खुद इस समय कहीं नहीं गई होगी। ज़रूर इसके पीछे कोई न कोई वजह है।"

"अब ये तो सरोज काकी से ही विस्तार में पता चलेगा कि क्या हुआ था?" रूपचंद्र ने कहा____"मैं तो ईश्वर से यही प्रार्थना करता हूं कि उस मासूम के साथ कुछ भी बुरा न हो। मुझे पता है कि तुम उससे प्रेम करते हो और उससे ब्याह भी करना चाहते हो। सच कहूं तो मैं भी चाहता हूं कि वो तुम्हारी पत्नी बने। रूपा और अनुराधा दोनो के साथ तुम्हारा ब्याह हो। इस नाते अनुराधा मेरी बहन ही तो बन जाएगी।"

रूपचंद्र जाने क्या क्या बोलता जा रहा था और इधर मेरा ज़हन ये सोचने में लगा हुआ था कि आख़िर अनुराधा गई तो गई कहां? क्या सच में कोई अनहोनी हुई है इसके साथ? इस एहसास से ही मेरा वजूद थर्रा उठा। जल्दी ही मैं अपने मकान में पहुंच गया जहां सरोज काकी और भुवन पहले से ही बैठे मेरा इंतज़ार कर रहे थे।

"क...काकी कैसे हुआ ये सब?" मैं सरोज काकी के क़रीब पहुंचते ही पूछ बैठा जिसके जवाब में सरोज काकी रोते हुए सब कुछ बताती चली गई। सुन कर मेरी भी हालत ख़राब हो गई।

मैंने फ़ौरन ही भुवन से कहा कि वो अपने सभी आदमियों को अनुराधा की खोज में हर तरफ भेजे। मेरे ऐसा बोलने पर भुवन ने कहा कि उसने मेरे आने से पहले ही ऐसा कर दिया है। उसके बाद मैं, भुवन और रूपचंद्र तीनों भी अनुराधा की खोज में निकल पड़े।

उधर पिता जी भी हरकत में आ गए थे। शायद उन्हें भी किसी अनिष्ट की आशंका हो गई थी जिसके चलते उन्होंने फ़ौरन ही शेरा को तलब किया और उसे हुकुम सुना दिया। कुछ ही देर में क‌ई सारे आदमी अनुराधा की खोज में हाथों में मशाल लिए हर जगह फैलते चले गए। इस बात का ख़ास ख़याल रखा गया कि गांव में किसी को इस बात की ख़बर न हो वरना बेकार में ही हंगामा मच जाएगा।

सारी रात मैं, भुवन, रूपचंद्र और हमारे इतने सारे आदमी अनुराधा को खोजते रहे लेकिन अनुराधा का कहीं पता न चला। मेरी हालत पागलों जैसी हो गई थी। भुवन का भी बुरा हाल था। अनुराधा को उसने अपनी छोटी बहन मान लिया था। उसकी अपनी कोई बहन नहीं थी इस लिए अनुराधा से उसका बहुत लगाव हो गया था। रूपचंद्र भी हमारे साथ सारी रात इधर उधर भटकता रहा मगर कहीं भी अनुराधा का पता न चला।

सुबह की भोर होने वाली थी जब हम सब थके हारे और बेबस से सरोज काकी के पास पहुंचे। वो अभी भी मेरे मकान में ही बैठी हुई थी। अनूप तो उसकी गोद में सोया हुआ था लेकिन वो गुमसुम सी बैठी हुई थी। उसके चेहरे से साफ पता चल रहा था कि वो बहुत ज़्यादा रोई थी और अब वो किसी पत्थर की मूरत में तब्दील हुई नज़र आ रही थी। हमारे आने का उसे आभास तक न हुआ था। मेरे झिंझोड़ने पर ही उसकी चेतना वापस आई थी।

उसके बाद सरोज काकी के पूछने पर जब मैंने ये बताया कि अनुराधा नहीं मिली तो वो बिफर पड़ी। चीख पड़ी और फिर फूट फूट कर रोने लगी। उसके रोने की आवाज़ सुन कर अनूप भी जाग गया और अपनी मां को यूं रोता देख वो भी रोने लगा। जी तो मेरा भी कर रहा था कि गला फाड़ कर रोऊं मगर मैं बड़ी मुश्किल से अपने जज़्बातों को रोके हुए था। समझ में नहीं आ रहा था कि अनुराधा आख़िर गई कहां? अब तक तो हम सब समझ चुके थे कि अनुराधा अपनी मर्ज़ी से कहीं नहीं गई थी। यानि सच में उसके साथ कोई अनहोनी हुई थी। मन में बुरे ख़यालों के सिवा कुछ नहीं उभर रहे थे।

ऐसे ही धीरे धीरे सुबह हो गई और दिन का उजाला हो गया। अभी मैं भुवन से फिर से अनुराधा को खोजने चलने की बात बोलने ही वाला था कि तभी एक आदमी भागता हुआ हमारे पास आया और फिर हांफते हुए उसने हमें जो कुछ बताया उसने हम सबको हिला कर रख दिया।​
 
अध्याय - 113
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ऐसे ही धीरे धीरे सुबह हो गई और दिन का उजाला हो गया। अभी मैं भुवन से फिर से अनुराधा को खोजने चलने की बात बोलने ही वाला था कि तभी एक आदमी भागता हुआ हमारे पास आया और फिर हांफते हुए उसने हमें जो कुछ बताया उसने हम सबको हिला कर रख दिया।


अब आगे....


पूरा रुद्रपुर इकट्ठा हो गया था वहां और तो और दूसरे गांव के लोग भी दौड़े चले आ रहे थे। ख़बर जंगल में फैली आग की तरह लपलपाते हुए हर जगह फैलती चली जा रही थी। मैं, भुवन, रूपचंद्र, सरोज काकी और उसका बेटा जब कई सारे आदमियों के साथ उस इकट्ठा हुई भीड़ के क़रीब पहुंचे तो कानों में जाने कितने ही लोगों का करुण क्रंदन गूंजता सुनाई दिया। मेरी हालत पागलों जैसी थी और मुझसे भी ज़्यादा पागल हालत सरोज की थी। सारे रास्ते वो रोते बिलखते हुए आई थी।

भीड़ को चीरते हुए हम सब जैसे ही अंदर दाखिल हुए और फिर जैसे ही हमारी नज़रें उस दृश्य पर पड़ीं तो जैसे दिलो दिमाग़ में गाज ही गिर गई। आंखों के सामने अंधेरा सा छा गया। इससे पहले कि मैं उस अंधेरे में विलीन हो कर वहीं ज़मीन पर गिर पड़ता मेरे कानों में सरोज काकी की हृदय विदारक चीख पड़ी जिससे मैं चेतना विहीन होने से बच गया।

वो एक मध्यम आकार का पेड़ था जोकि ज़्यादा मोटा नहीं था। उसकी ही एक शाख पर अनुराधा की लाश रस्सी के सहारे लटकी हुई थी। उसके जिस्म पर मौजूद कपड़े जगह जगह से फटे हुए थे और पूरा जिस्म खून से नहाया हुआ था। गर्दन आधे से ज़्यादा कटी हुई और उसके सीने के थोड़ा नीचे से पेट तक का हिस्सा चीरा हुआ था। ऐसा प्रतीत हो रहा था जैसे किसी ने बड़ी ही बेदर्दी से क़रीब एक बीता चीर दिया था। कटे हुए गले से और पेट के उस हिस्से से ही इतना ज़्यादा खून बहा था कि अनुराधा का पूरा जिस्म नहा गया था। उसके पैरों के नख से होता हुआ लहू नीचे ज़मीन पर गिरा हुआ था। ज़मीन पर गिरा खून दूर तक फैलता चला गया था।

अनुराधा की इतनी भयंकर लाश को देख कर सरोज की भयंकर चीख निकल गई थी और वो पागलों की तरह झपट कर उसकी लाश से जा लिपटी थी। फिज़ा में पहले से ही करुण क्रंदन गूंज रहा था और अब सरोज के रोने धोने से और भी ज़्यादा वातावरण गुंजायमान हो उठा था। इधर मेरी हालत ख़राब थी। मैं अनुराधा की लाश को अपलक देखे जा रहा था। कच्ची ज़मीन पर खड़ा मैं एकदम पत्थर की मूरत बन गया था। कानों में शोर तो सुनाई दे रहा था लेकिन जिस्म में कोई प्रतिक्रिया नहीं हो रही थी।

मुझे नहीं पता कब तक मैं पत्थर की मूरत बना खड़ा रहा। होश तब आया जब किसी ने मुझे पूरी ताक़त से झिंझोड़ कर पुकारा। मैंने चौंक कर झिंझोडने वाले की तरफ देखा। वो भाभी थीं जो बुरी तरह रोते हुए मुझे पुकार रहीं थी। उन्हें यूं रोता देख मेरे चेहरे पर आश्चर्य के भाव उभर आए किंतु उनसे कुछ कह न सका मैं। लोगों का शोर और रोना धोना अब भी मेरे कानों में गूंज रहा था लेकिन ऐसा प्रतीत हो रहा था जैसे उसका मुझ पर कोई असर नहीं हो रह था।

"वैभव...!!!!" मेरी हालत देख भाभी और भी ज़्यादा रोते हुए चीखीं____"होश में आओ। मेरी तरफ देखो वैभव।"

भाभी का चीखना सुन कर मैं फिर से चौंका और उनकी तरफ देखने लगा। दिमाग़ एकदम से शून्य हो गया था मेरा। मैं मूर्खों की तरह इधर उधर देखने लगा। कुछ ही दूरी पर पिता जी, मां, मेनका चाची, कुसुम, शेरा, किशोरी लाल उसकी पत्नी और कजरी खड़ी थी। मां, चाची और कुसुम तो रोए जा रही थी लेकिन पिता जी नम आंखों से एकटक मेरी तरफ देखे जा रहे थे।

तभी कुछ जीपें आ कर रुकीं और उनमें से महेंद्र सिंह, ज्ञानेंद्र सिंह और अर्जुन सिंह आदि बाहर निकले। वो लगभग भागते हुए पिता जी के पास पहुंचे।

"ठाकुर साहब ये सब कैसे हो गया?" महेंद्र सिंह ने बौखलाए हुए लहजे में पूछा।

"क...क्या बताएं?" पिता जी के मुख से गंभीरता में डूबा स्वर निकला___"हमें तो समझ ही नहीं आ रहा कि ये सब कैसे और क्यों हुआ? सच कहें तो ऐसा प्रतीत हो रहा है जैसे हम कोई भयानक ख़्वाब देख रहे हैं।"

"खुद को सम्हालिए ठाकुर साहब।" अर्जुन सिंह ने पिता जी के कंधे पर हाथ रखते हुए कहा____"जिस किसी ने भी ये किया है उसका इस दुनिया में एक पल भी जीने का अधिकार नहीं है।"

सरोज काकी अपनी बेटी की खून से लथपथ हुई लाश से लिपटी रोए जा रही थी। उसका बेटा अनूप भी बुरी तरह रोए जा रहा था। आस पास मौजूद औरतें उसे सम्हालने में लगी हुईं थी जिनमें मां और मेनका चाची भी थीं। कदाचित भाभी के द्वारा उन्हें पता चल गया था कि लाश किसकी है? एक तरफ भुवन भी हिचक हिचक कर रोए जा रहा था। अचानक वो भाग कर मेरे पास आया।

"छ...छोटे कुंवर।" फिर वो रोते बिलखते हुए बोला____"मेरी बहन को मार डाला किसी निर्दई ने। मेरी मासूम सी बहन को बेरहमी से मार डाला। अब किसे अपनी बहन कहूंगा छोटे कुंवर? अब कैसे मैं......।"

भुवन से आगे कुछ बोला ना गया और वो फूट फूट कर रो पड़ा। उसकी बातें सुन कर मैं एक बार फिर से चौंका और हैरानी से उसकी तरफ देखने लगा। एकाएक मेरी नज़र कुछ ही दूरी पर पेड़ की शाख से लटकी लाश पर पड़ी तो मैं बुरी तरह चौंका। भाभी जो मुझे सम्हाले सिसकियां ले कर रो रहीं थी उन्हें मैंने एक तरफ धकेला और उस लाश की तरफ बढ़ चला। मुझे ऐसा महसूस हुआ जैसे वो लाश मुझे अपनी तरफ खींच रही है। जल्दी ही मैं उसके पास पहुंच गया। उधर कुछ ही दूरी पर खड़े पिता जी और बाकी लोगों की नज़रें भी मुझ पर पड़ गईं। वो सब के सब एकाएक फिक्रमंद हो उठे।

मैं लाश के पास पहुंच कर उसे गौर से देखने लगा। लाश का चेहरा खून से तो नहीं लेकिन मिट्टी से एक दो जगह पुता हुआ था। जिस्म से सारा खून निकल जाने की वजह से वो एकदम निस्तेज और धुंधला सा पड़ गया था। उसके गले में एक काला धागा था जिसमें एक ताबीज बंधा हुआ था। उसके दोनों हाथ रस्सी से बंधे हुए थे जोकि ऊपर को उठे हुए थे। हाथ में बंधी रस्सी का सिरा पेड़ की शाख पर बंधा हुआ था। शाख ज़्यादा ऊपर नहीं थी। अनुराधा के पैरों के नीचे कच्ची ज़मीन का फ़ासला मुश्किल से दो या तीन फिट रहा होगा।

अभी मैं अनुराधा की लाश को गौर से देख ही रहा था कि अचानक किसी ने मुझे झिंझोड़ दिया जिससे मैं बुरी तरह लड़खड़ा गया। मैंने फ़ौरन ही सिर नीचे किया तो देखा सरोज मेरे पैरों के पास गिरी जोरों से रोए जा रही थी। सरोज काकी को यूं रोता देख मैं एक बार फिर से चौंका। कानों में अभी भी बड़ा तेज़ करुण क्रंदन गूंज रहा था लेकिन आश्चर्य की बात थी कि उसका कोई असर नहीं हो रहा था मुझ पर।

"मेरी बेटी को किसी ने मुझसे छीन लिया वैभव।" मेरे कानों में सरोज की रोती हुई आवाज़ पड़ी____"तुम्हारी होने वाली पत्नी को किसी ने मार डाला। आख़िर क्या बिगाड़ा था किसी का मेरी बेटी ने?"

सरोज जाने क्या क्या कहते हुए रोए जा रही थी। उसकी बातें सुन कर मां और मेनका चाची एक झटके से पलटी और मुझे देखते ही उनकी रुलाई फूट गई। मां ने झपट कर मुझे अपने कलेजे से लगा लिया। अचानक मेरे मनो मस्तिष्क में धमाका सा हुआ और इसके साथ ही मेरी चेतना जो अब तक कहीं लुप्त सी हो गई थी वो तीव्र गति से जागृत हुई। लोगों के जिस शोर से मुझे कोई फ़र्क नहीं पड़ रहा था उस शोर से अब मैं बुरी तरह हिल गया। मैंने एक झटके से मां को खुद से अलग किया। आश्चर्य से मैंने आंखें फाड़ फाड़ कर इधर उधर देखा और फिर मेरी घूमती हुई निगाह पेड़ पर रस्सी द्वारा लटकी अनुराधा की लाश पर अटक गई। अनुराधा को पहचानते ही मेरे ऊपर जैसे बिजली गिर पड़ी।

"न...नहीं‌‌।" मैं हलक फाड़ कर चिल्लाया और झपट कर अनुराधा से लिपट गया। आंखें जो अब तक सूखी हुई थीं वो पलक झपकते ही आंसुओं का समंदर बन गईं।

"य....ये नहीं हो सकता।" मैं अनुराधा के जिस्म को अपनी बाहों में समेटे रोते हुए चीखा____"तुम इस तरह मुझे छोड़ कर नहीं जा सकती अनुराधा। भगवान के लिए वापस आओ। वापस आओ मेरी अनू....।"

मैं फूट फूट कर रो पड़ा। मेरी हालत एक ही पल में बद से बदतर हो गई। अनुराधा के जिस्म को बाहों में समेटे मैं जाने क्या क्या कहते हुए विलाप करने लगा। मेरा रुदन सुन कर जहां सरोज दहाड़े मार कर रोने लगी थी वहीं मां और मेनका चाची भी रोने लगीं थी। कुसुम भाग कर मेरे पास आई और पीछे से मुझसे लिपट कर रोने लगी।

वातावरण चीखों पुकार से गूंज रहा था। हर शख़्स की आंखें नम थीं। अभी सबका रोना धोना चालू ही था कि अचानक वातावरण में किसी के द्वारा हलक फाड़ फाड़ कर हंसने की आवाज़ें गूंज उठीं। हंसने की ये भीषण आवाज़ को सुन कर वहां मौजूद हर व्यक्ति बुरी तरह उछल पड़ा और भौचक्के से हो कर इधर उधर देखने लगा।

मेरे कानों में भी किसी के द्वारा हंसने की आवाज़ पड़ चुकी थी। हंसने वाले का अट्टहास रुकने का नाम ही नहीं ले रहा था जिसके कारण सबका रोना धोना किसी जादू की तरह थम गया। पलक झपकते ही सन्नाटा सा छा गया किंतु उस सन्नाटे में सिर्फ किसी के ज़ोर ज़ोर से हंसने की ही आवाज़ गूंज रही थी। ऐसा लग रहा था जैसे हंसने वाला पागल हो गया हो।

मेरे ज़हन में बिजली सी कौंधी। हंसने की आवाज़ पेड़ के पीछे की तरफ से आ रही थी। मैं अनुराधा की लाश को छोड़ कर पेड़ के पीछे की तरफ लपका। जैसा कि पहले ही बताया जा चुका है पेड़ ज़्यादा मोटा नहीं था। मैं जैसे ही पीछे पहुंचा तो ये देख कर भौचक्का सा रह गया कि पेड़ के पीछे कोई नहीं है किंतु हंसने की आवाज़ अभी भी आ रही थी। मैंने गुस्से से पलट कर इधर उधर देखा। क़रीब सात आठ क़दम की दूरी पर एक और पेड़ था जोकि बड़ा सा था। मैंने गौर किया तो पता चला आवाज़ उस तरफ से ही आ रही थी। मैंने पागलों की तरह उस पेड़ की तरफ दौड़ लगा दी। मुझे उस तरफ भागता देख पिता जी और बाकी लोग चौंके। किसी अनिष्ट की आशंका के चलते वो सब भी मेरे पीछे लपके।

अभी मैं उस पेड़ के पास पहुंचा ही था कि तभी उस पेड़ के पीछे से निकल कर जो व्यक्ति मेरे सामने आया उसे देख कर मेरी आंखें हैरत से फट गईं। वो चंद्रकांत था, जी हां चंद्रकांत। मुझ पर नज़र पड़ते ही वो और भी ज़्यादा ज़ोर से अट्टहास लगाते हुए हंसने लगा। ऐसा लगा जैसे किसी ने उसे हंसने का श्राप दे दिया था। एकदम पागलों जैसा नज़र आ रहा था वो। उसके कपड़ों पर जगह जगह खून लगा हुआ था। तभी मेरी नज़र उसके दाहिने हाथ में पड़ी। उसके दाहिने हाथ में खून से सनी कुल्हाड़ी थी।

"आख़िर आ ही गया तू।" चंद्रकांत अपनी पागलों जैसी हंसी को रोकते हुए कहा____"सच कहूं तो ईश्वर से यही प्रार्थना कर रहा था कि सबसे पहले मैं तुझे ही देखूं और....और देख ले, मेरी प्रार्थना को कबूल कर लिया ईश्वर ने। तभी तो सबसे पहले मैंने तुझे ही देखा यहां....हा हा हा हा ।"

"त...तूने मारा अनुराधा को??" उसका लहजा और उसकी बातें सुनते ही मेरा खून खौल उठा। उसकी तरफ अंगारे उगलती आंखों से देखते हुए चीखा____"क्यों....क्यों मारा उस मासूम को? आख़िर क्या दुश्मनी थी तेरी उससे?"

"हा हा हा।" चंद्रकांत एक बार फिर पागलों की तरह हंसा और फिर मुस्कुराते हुए बोला____"उससे मेरी कोई दुश्मनी नहीं थी लेकिन....लेकिन तुझसे तो थी। तू उससे प्रेम करता था न और उससे ब्याह करना चाहता था न, इसी लिए.....इसी लिए उसको अपनी इस कुल्हाड़ी से काट कर मार डाला।"

"हरामजादे।" मैं गुस्से से चीखते हुए उस पर झपट पड़ा____"तूने मेरी अनुराधा को मार डाला। मैं तुझे ज़िंदा नहीं छोडूंगा मादरचोद।"

चंद्रकांत को कदाचित इतना जल्दी मुझसे ऐसी उम्मीद नहीं थी इस लिए वो इसके लिए सतर्क नहीं था। इधर झपट कर मैंने एक मजबूत घूंसा उसके चेहरे पर जड़ दिया। चंद्रकांत एक चीख के साथ ज़मीन पर गिर गया। उसके हाथ से कुल्हाड़ी छूट कर दूर छिटक गई।

"तूने मेरी अनुराधा को मार डाला कुत्ते।" मैं गुस्से से उबलते हुए उसकी कुल्हाड़ी उठा कर उसके क़रीब पहुंचा____"इसी कुल्हाड़ी से तूने मेरी अनुराधा को बेदर्दी से मारा है ना तो अब तेरा भी हाल उसके जैसा ही करूंगा मैं।"

चंद्रकांत के चेहरे पर एकाएक दहशत के भाव उभर आए। तभी पीछे से पिता जी और महेंद्र सिंह की चीख मेरे कानों में पड़ी। वो मुझे रुकने को बोल रहे थे मगर देर हो चुकी थी। मैं गुस्से से पागल हो चुका था। मैंने घुमा कर कुल्हाड़ी का वार चंद्रकांत की एक टांग पर किया।

खच्च की आवाज़ के साथ उसकी एक टांग उसके जिस्म से कट कर जुदा हो गई। चंद्रकांत दर्द से हलक फाड़ कर चिल्लाया और फिर चीखता ही चला गया। कटी हुई टांग से बड़ी तीव्र मात्रा में खून बहने लगा था जो वहीं ज़मीन पर फैलने लगा था।

"और चीख बेटीचोद।" इससे पहले कि पिता जी या कोई और मुझ तक पहुंच पाता मैंने एक बार फिर से कुल्हाड़ी घुमाई और अगले ही पल चंद्रकांत के जिस्म का एक और अंग कट कर अलग हो गया। चंद्रकांत की भयानक चीखें फिज़ा में गूंजने लगी। इस बार मैंने उसकी दूसरी टांग काट दी थी। चंद्रकांत ज़मीन पर जल बिन मछली की तरह तड़प रहा था। खून से सनी कुल्हाड़ी लिए मैंने उसकी कटी हुई एक टांग को उठाया और उसके मुख में रख दिया। टांग से बहता हुआ खून उसके मुख में भरने लगा जिसे वो छटपटाते हुए उगलने की कोशिश करने लगा।

"तुझे इंसानों को काटने का बहुत शौक है ना।" मैं ज़बरदस्ती उसकी कटी टांग को उसके मुख में घुसेड़ते हुए गुर्राया____"खून बहाने का बहुत शौक है ना। अब अपनी ही कटी टांग का खून पी। शायद अपना खून पीने से तेरी प्यास बुझ जाए।"

चंद्रकांत कुछ बोलने की हालत में नहीं था। असहनीय दर्द से वो बहुत ज़्यादा तड़प रहा था। तभी कई जोड़े हाथों ने मुझे पकड़ लिया और चंद्रकांत से दूर ले जाने लगे।

"छोड़ दो मुझे।" मैं गुस्से से हलक फाड़ कर चीखा____"मैं इस मादरचोद के जिस्म की बोटी बोटी कर डालूंगा।"

कहने के साथ ही मैंने पूरी ताक़त से झटक दिया उन सबको। मुझे पकड़े हुए लोग लड़खड़ा कर दूर जा गिरे। उनसे छूटते ही मैं चंद्रकांत की तरफ लपका। मेरे हाथ में अभी भी उसकी कुल्हाड़ी थी। तभी पिता जी ने तेज़ आवाज़ में मुझे रुक जाने को कहा मगर मैं न रुका और फिर अगले ही पल जैसे चंद्रकांत के ऊपर एक और क़यामत आ गई। कुल्हाड़ी घूमी और फिर खच्छ से उसके जिस्म के एक और अंग को काट कर अलग कर दिया। चंद्रकांत दर्द से फिर चिल्लाया और पहले से ज़्यादा दर्द में तड़पने लगा।

"बता मादरचोद।" खून टपकाती कुल्हाड़ी लिए मैं उसके चेहरे के पास बैठ कर चीखा____"बता, क्यों मेरी अनुराधा को मारा तूने? बता वरना, इसी कुल्हाड़ी से मैं पहले तेरी बीवी और फिर तेरी बेटी को काटूंगा।"

बीवी से तो ख़ैर उसे कोई मोह नहीं था लेकिन बेटी की बात सुनते ही उसके चेहरे पर दहशत उभर आई। कुछ देर वो मुझे देखता रहा फिर अचानक से वो दर्द को बर्दास्त करते हुए फिर से हंसने लगा। उसे हंसता देख मेरा खून फिर से खौल उठा। इससे पहले कि मैं फिर से उसकी कुल्हाड़ी से उसका कोई अंग काट कर अलग करता मुझे फिर से कई लोगों ने पकड़ लिया।

इस बार शायद ज़्यादा लोगों ने मुझे मजबूती से पकड़ लिया था इस लिए चाह कर भी मैं उनसे खुद को छुड़ा न सका। ये अलग बात है कि मैं गुस्से से चीखता रहा और उन सबको जान से मार देने की धमकियां देता रह गया।

पिता जी के हुकुम पर वो लोग मुझे मजबूती से पकड़े रहे। गांव के लोग भागते हुए यहां भी इकट्ठा हो गए थे। चंद्रकांत की हालत बहुत ही ज़्यादा ख़राब थी। उसकी दोनों टांगें और एक हाथ कट चुके थे और उसका खून बहुत तेज़ी से निकलते हुए ज़मीन पर फैलता जा रहा था। उस पर अब बेहोशी तारी होने लगी थी।

"तुमने एक निर्दोष और मासूम लड़की को क्यों मार डाला चंद्रकांत?" महेंद्र सिंह ने उसके क़रीब आते हुए पूछा____"आख़िर उस लड़की ने तुम्हारा क्या बिगाड़ा था?"

"उसने मेरा कुछ नहीं बिगाड़ा था ठाकुर साहब।" चंद्रकांत ने अपने दर्द को सहते हुए ऐसे लहजे में कहा जैसे उसे अपने किए का कोई पछतावा ना हो, बोला____"बल्कि बिगाड़ा तो इस वैभव ने था। इसने मेरे घर को बर्बाद किया था, बदले में मैंने भी इसकी खुशियां बर्बाद कर दी। मुझे पता चल गया था कि ये मुरारी की लड़की से प्रेम करता है और उससे ब्याह भी करना चाहता है इस लिए मैंने इसकी ज़िंदगी से उस लड़की को हमेशा हमेशा के लिए अलग कर दिया। अब ये उसके दुख में जीवन भर तड़पेगा। हा हा हा हा, अब जा कर मैंने सही मायनों में इससे अपना बदला लिया है।"

चंद्रकांत की बात सुन कर जहां महेंद्र सिंह कुछ न बोल सके वहीं मैंने एक बार फिर से छूटने की कोशिश की। खुद को छुड़ाने के लिए मैं उन लोगों को गुस्से में गालियां बकने लगा जो लोग मुझे मजबूती से पकड़े हुए थे लेकिन मेरी गालियां सुन कर भी उन लोगों ने मुझे नहीं छोड़ा।

उधर महेंद्र सिंह को जैसे होश आया तो उन्होंने कुछ लोगों को चंद्रकांत के कटे हुए अंगों पर कपड़ा बांधने का हुकुम दिया ताकि चंद्रकांत का खून बहना बंद हो जाए और वो मरे नहीं। हुकुम सुन कर जल्दी ही कुछ लोग आगे बढ़े और अपना अपना गमछा निकाल कर चंद्रकांत की टांगों और हाथ में बांधने लगे। चंद्रकांत देखते ही देखते शांत पड़ गया था। वातावरण में अजीब आतंक सा छा गया था।

कुछ ही देर में कुछ लोगों की सहायता से चंद्रकांत को महेंद्र सिंह की जीप में लाद दिया गया। महेंद्र सिंह के कहने पर उनका एक आदमी फ़ौरन ही जीप को शहर के लिए दौड़ा दिया। साथ में कुछ और लोग भी बैठ गए थे जो चंद्रकांत की देख भाल के लिए थे।

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चंद्रकांत की बीवी प्रभा और बेटी कोमल उसी भीड़ में मौजूद थीं। बड़ी मुश्किल से एक सदमे से उबरीं थी वो और जब उन्हें ये पता चला कि चंद्रकांत ने ही अनुराधा नाम की लड़की की इस बेदर्दी से हत्या की है तो उन्हें ज़बरदस्त झटका लगा था। पैरों तले से ज़मीन ग़ायब हो गई थी। प्रभा की तो पहले ही हालत कुछ ठीक नहीं थी लेकिन कोमल को भी गहरा आघात लगा था। उसके पिता ने उसकी बहू की हत्या जिस वजह से की थी उसके लिए तो उसने खुद को किसी तरह समझा लिया था किंतु अनुराधा की हत्या का जो कारण उसने अपने पिता के मुख से सुना था उससे उसे बेहद दुख पहुंचा था। ऐसे जघन्य अपराध के लिए उसे अपने पिता से घृणा सी हो गई थी। घटना स्थल से वो ज़बरदस्ती अपनी मां को खींचते हुए घर ले आई थी।

"बापू ने हमें कहीं का न छोड़ा मां।" कोमल ने कहीं खोए हुए कहा____"एक निर्दोष और मासूम की इस तरह से हत्या कर के उन्होंने बहुत बड़ा पाप किया है। किसी जन्म में उन्हें अपने इस अपराध की माफ़ी नहीं मिलेगी।"

प्रभा अपनी बेटी की बात सुन कर कुछ न बोली। असल में वो कुछ बोलने की हालत में ही नहीं थी। उसके चरित्र हीन होने का पता उसकी बेटी को तो पता चल ही गया था किंतु अब उसके मायके वालों को भी पता चल चुका था। हालाकि उसके मायके वालों में से किसी ने उसे इसके बारे में कुछ कहा नहीं था लेकिन वो खुद ज़रूर अपनी नज़रों में गिर चुकी थी। बड़ी मुश्किल से वो अपनी बेटी से नज़रें मिला पाने की हिम्मत जुटा पाई थी। पिछले दो महीने से वो अपने घर में ही बंद रहती थी। बाहर निकलने की उसमें हिम्मत नहीं होती थी। दिशा मैदान करने के लिए वो या तो तब जाती थी जब बिल्कुल ही अंधेरा हो जाता था या फिर सुबह भोर के समय, जब कोई बाहर उसे नहीं दिखता था। पहले कुछ औरतें उससे मिलने भी आ जाती थीं लेकिन अब तो कोई आता भी नहीं था। शायद कोई भी मर्द अपने घर की बहू बेटी को उसके घर जाने की इजाज़त नहीं देता था। ज़ाहिर है कोई भी नहीं चाहता था कि उनकी बहू बेटियों पर उनकी चरित्र हीनता की छाया पड़े।

"अब हमारा क्या होगा मां?" प्रभा जब काफी देर तक कुछ ना बोली तो कोमल ने फिर कहा____"अब तो बापू भी जीवित नहीं बचेंगे। भैया भाभी की तरह वो भी हमें अकेला छोड़ कर इस दुनिया से चले जाएंगे। अब तो हम अकेले हो गए मां। अब कैसे हमारा गुज़ारा होगा? अब कैसे जी सकेंगे हम?"

"इसका एक ही उपाय है।" प्रभा कुछ सोचते हुए निर्विकार भाव से बोली____"आज रात हम दोनों ज़हर खा लेते हैं। हम दोनों भी इस दुनिया से हमेशा के लिए चले जाएंगे। उसके बाद तो हर समस्या से मुक्ति ही मिल जाएगी?"

"म....मां।" अपनी मां की बात सुन कर कोमल अंदर ही अंदर कांप गई। कांपते स्वर में बोली____"य...ये तुम कैसी बातें कर रही हो?"

"क्या मैंने कुछ ग़लत कहा?" प्रभा ने एकदम सपाट भाव से कहा____"सच ही तो कहा है मैंने। जिस तरह की हमारी हालत है और जिन हालातों से हम गुज़र रहे हैं उससे मुक्ति पाने का तो बस यही एक उपाय है।"

"न...नहीं मां।" कोमल झट से अपनी मां का हाथ पकड़ कर बोल पड़ी____"भगवान के लिए ऐसा मत कहो। अपने दुखों से मुक्ति पाने का ये सही रास्ता नहीं है। आत्महत्या कर लेना तो सबसे बड़ा पाप है न मां।"

"जानती हूं।" प्रभा जैसे किसी और ही दुनिया में थी, बोली____"फिर भी लोग बड़ी खुशी से पाप करते हैं। मैंने तेरे बापू को धोखा दे कर पाप किया। तेरी भाभी ने अपने पति को धोखा दे कर पाप किया और तेरे बापू ने एक निर्दोष लड़की की हत्या कर के पाप किया। सब पाप ही करते हैं बेटी। इस लिए अब एक पाप और सही। हम दोनों मां बेटी आज रात ज़हर खा कर खुदकुशी करने का आख़िरी पाप कर लेते हैं। उसके बाद फिर कोई पाप नहीं होगा हमसे।"

प्रभा जिस लहजे में बातें कर रही थी उससे कोमल का समूचा वजूद थरथरा उठा था। एक अंजाना ख़ौफ उसके अंदर घर कर गया था जिसने उसे बुरी तरह भयभीत कर दिया। वो झपट कर अपनी मां से लिपट गई और फिर फूट फूट कर रोने लगी। प्रभा ने निर्विकार भाव से उसके सिर पर हाथ फेरना चालू कर दिया। उसकी आंखें जाने किस शून्य में अटकी हुईं थी?​
 
अध्याय - 114
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चंद्रकांत शहर पहुंच ही नहीं पाया था। रास्ते में ही उसने दम तोड़ दिया था जिसके चलते महेंद्र सिंह के आदमी उसे वापस ले आए थे। हर तरफ कोलाहल सा मचा हुआ था। किसी को भी अपने निजी कामों का होश नहीं था। अब तक ये बात हर तरफ फैल गई थी कि जिस लड़की की लाश पेड़ पर रस्सी के सहारे लटकी मिली थी उसकी बड़ी बेरहमी से हत्या करने वाला चंद्रकांत था। उसने सिर्फ अपनी निजी दुश्मनी अथवा ये कहें कि वैभव से बदला लेने के लिए ऐसा किया था। इस मामले के बारे में लगभग सब चंद्रकांत की निंदा कर रहे थे और उसे बुरा भला कह रहे थे। कुछ ऐसे भी लोग थे जो इस मामले के बारे में दबी ज़ुबान में वैभव का भी नाम ले कर दोष दे रहे थे।

लोगों की मदद से अनुराधा की लाश को पेड़ से उतार कर उसके गांव ले आया गया था। वहीं दूसरी तरफ चंद्रकांत के ससुराल वाले आ गए थे इस लिए वो उसके अंतिम संस्कार की तैयारी में लग गए थे।

सरोज का बहुत बुरा हाल था। वो अब तक न जाने कितनी बार बेटी के वियोग में बेहोश हो चुकी थी। उसको सम्हालने के लिए निरंतर मेरी भाभी उसके साथ ही थीं। उन्होंने सरोज को मां कहा था शायद इसी वजह से वो अपना कर्तव्य निभा रहीं थी। उनका चेहरा देख कर कोई भी बता सकता था कि उन्हें इस दुखद घटना के चलते कितना दुख हुआ था और वो कितना रोई थीं। मेरी मां का भी हाल ज़्यादा बेहतर नहीं था इस लिए मेनका चाची और निर्मला काकी उन्हें अपने साथ हवेली ले गईं थी। कुसुम तो मेरे साथ ही थी लेकिन कजरी भाभी के साथ थी।

साहूकार गौरी शंकर भी इस घटना से बेहद दुखी था। उसके घर की बड़ी औरतें भी आई थीं लेकिन अब वो वापस जा चुकीं थी। रूपा को जब ये पता चला था कि जिस लड़की की लाश मिली है वो उसकी होने वाली सौतन है तो वो भागते हुए घटना स्थल पर आई थी। अनुराधा की भयानक लाश देख कर बुरी तरह हिल गई थी वो। उसके बाद वो जाने क्या क्या सोच कर रोने लगी थी। उसका भाई रूपचंद्र उसकी भावनाओं को बखूबी समझता था इस लिए उसने उसे सम्हाले रखे था।

मैं एकदम से गुमसुम सा हो गया था। रह रह कर अनुराधा का चेहरा मेरी आंखों के सामने उजागर हो जाता और मेरी आंखों को रुला देता। पहली बार मुझे एहसास हुआ था कि अपनी चाहत अपनी मोहब्बत से हमेशा के लिए जुदा हो जाना कितना असहनीय होता है। मैं जब भी रोने लगता तो कुसुम एक मां की तरह मुझे अपनी आगोश में ले कर शांत कराने की कोशिश करने लगती। वो खुद भी मेरी हालत से दुखी थी। पहले तो उसे पता ही नहीं था कि मेरा और अनुराधा का क्या रिश्ता है और फिर जब उसे पता चला तो जैसे उसके ऊपर बिजली ही गिर पड़ी थी। वो तभी से मेरे साथ थी और मेरा ख़याल रख रही थी।

पिता जी ने कई बार मुझे हवेली जाने के लिए कहा था। यहां तक कि ज्ञानेंद्र सिंह ज़बरदस्ती मुझे हवेली ले जाने पर भी उतारू हो गया था लेकिन मैंने ये कह कर हवेली जाने से मना कर दिया था कि मैं अंतिम समय तक अपनी अनुराधा के साथ ही रहूंगा। मजबूरन पिता जी को मेरी बात माननी ही पड़ी। गांव के आधे से ज़्यादा लोग मुरारी के गांव आ गए थे। मुरारी के गांव वाले तो पहले से ही वहां मौजूद थे। सरोज काकी की देवरानी और उसकी बेटियां भी थीं जो अनुराधा की मौत से दुखी हो कर रोए जा रहीं थी।

अनुराधा के साथ ऐसा होगा ये किसी ने कल्पना तक नहीं की थी। मैं तो बार बार हड़बड़ा कर इधर उधर देखने लगता था। मुझे ऐसा लगता था जैसे अनुराधा किसी तरफ से आ रही है। आंखों के सामने उसका वही सांवला सा चेहरा उभर आता, जिस चेहरे में दुनिया भर की मासूमियत और दुनिया भर की सादगी थी। मेरे ठकुराईन कहने पर जब वो एकदम से शर्मा जाती तो मैं उसे मंत्र मुग्ध सा हो कर देखने लगता था। फिर जैसे ही मुझे वर्तमान की वास्तविकता का एहसास होता तो मेरी रुलाई फूट पड़ती। दिल तड़प उठता। अंदर से हूक उठती और मन करता दहाड़े मार कर रो पड़ूं।

मुरारी के घर के बाहर पेड़ पर बने चबूतरे पर मैं बैठा हुआ था। मेरे साथ कुसुम और भुवन थे। कुछ दूरी पर पिता जी और गौरी शंकर खड़े थे। महेंद्र सिंह अपने भाई ज्ञानेंद्र सिंह को यहां रहने को बोल गया था और खुद चंद्रकांत के अंतिम संस्कार में सम्मिलित होने चला गया था।

घर के बाहर ही बगल से कई सारी औरतें अनुराधा को नहला धुला का तैयार कर रहीं थी ताकि उसका अंतिम संस्कार किया जा सके। औरतों ने चारो तरफ से कपड़ों द्वारा एक घेरा बना रखा था जिससे कि बाकी लोग अंदर के मंज़र को देख ना सकें। पिता जी के कहने पर कुछ लोग पहले ही मुरारी की ज़मीन पर उसकी अंतिम क्रिया की तैयारी में लगे हुए थे। उनके इस काम में मुरारी के गांव वाले भी साथ में लगे हुए थे।

"न...नहीं।" औरतों का घेरा जैसे ही हटा और मेरी नज़र अनुराधा पर पड़ी तो मैं हलक फाड़ कर चीख पड़ा।

मेरी चीख सुन कर सब के सब चौंके और मेरी तरफ देखने लगे। पिता जी और गौरी शंकर भी मेरी तरफ देखने लगे थे। इधर मेरी इस चीख से कुसुम और भुवन भी उछल से पड़े।

"देखो अब कोई शोर शराबा मत करना।" पिता जी झट से मेरे पास आ कर बोले____"शांति पूर्वक उसकी अंतिम क्रिया को करने दो।"

"मेरी अनुराधा को ये लोग इस तरह नहीं ले जा सकते पिता जी।" मैं चबूतरे से उतर कर दुखी भाव से बोल पड़ा____"कृपया इनसे कहिए कि ये लोग मेरी अनुराधा को दुल्हन की तरह सजाएं।"

"ये...ये क्या कह रहे हो तुम?" पिता जी के साथ साथ बाकी सब भी बुरी तरह चौंक पड़े।

"मैं बिल्कुल ठीक कह रहा हूं पिता जी।" मेरी आंखें छलक पड़ीं____"वो मेरी होने वाली पत्नी थी। मैं उसे दिलो जान से प्रेम करता था। मैंने उससे ब्याह करने का वचन दिया था। मैं अपनी अनुराधा को दुल्हन बना के ही विदा करूंगा। कृपया इनसे कहिए न कि ये मेरी अनुराधा को दुल्हन की तरह सजाएं।"

पिता जी ही नहीं बल्कि सब के सब दंग रह गए। किसी के मुख से कोई बोल ना फूट सका। इधर मेरी बात सुन कर जहां कुसुम और भुवन रो पड़े वहीं दूर खड़ी औरतें भी रो पड़ीं। सरोज तो दहाड़े मार कर ही रोने लगी। चारो तरफ कोलाहल के बावजूद सनसनी सी फैल गई।

"ठीक है।" कुछ देर सोचने के बाद पिता जी ने गंभीरता से कहा____"अगर तुम यही चाहते हो तो ठीक है।"

कहने के साथ ही पिता जी ने औरतों से मुखातिब हो कर कहा कि वो अनुराधा को दुल्हन के जोड़े में सजाने की तैयारी करें। कुछ लोगों को गांव के बाज़ार में भेजा गया और फ़ौरन ही अनुराधा के लिए सुहागन बनाने का सारा समान मंगाया गया। उसके बाद औरतों ने आंसू बहाते हुए अनुराधा को दुल्हन की तरह सजाना शुरू कर दिया।

उस वक्त मेरा कलेजा फट गया जब मैंने अपनी अनुराधा को दुल्हन की तरह सजा देखा। कितनी सुंदर और मासूम दिख रही थी वो। मेरा दिल किया कि भाग कर जाऊं और झपट कर उसे अपनी आगोश में भर लूं। कदाचित पिता जी को इस बात का अंदेशा था इस लिए उन्होंने भुवन को इशारे से समझा दिया था कि मुझे सम्हाले रखे।

अनुराधा को अर्थी में लिटा कर लोग शमशान की तरफ बढ़ चले। सबकी आंखें नम थीं, औरतें चाह कर भी अपना रोना बंद नहीं कर पा रहीं थी। भुवन और शेरा मुझे सम्हाले चल रहे थे। कुसुम भाभी के पास चली गई थी।

जैसे ही लोग अनुराधा को मुरारी की ज़मीन की तरफ ले जाने लगे तो एक बार फिर मैं चीख पड़ा। किसी को समझ न आया कि अब क्या हुआ? आख़िर अब क्यों मैंने उन्हें रोक दिया? पिता जी ने जब मुझसे सवाल किया तो मैंने कहा कि अनुराधा का अंतिम संस्कार मेरी ज़मीन पर होगा। ऐसा इस लिए क्योंकि अब वो मेरी पत्नी बन चुकी थी और इस नाते उसका अंतिम संस्कार उसके अपने पति की मिट्टी में ही होगा। इतना ही नहीं उसका दाह संस्कार मैं खुद करूंगा।

एक बार फिर से सब दंग रह गए। सब के सब पिता जी की तरफ देखने लगे थे। पिता जी ने बात की गंभीरता को समझा और फ़ौरन ही आदेश दिया कि अर्थी को हमारी ज़मीन पर ले जाया जाए।

जल्दी ही हम सब उस जगह पर पहुंचे जहां से हमारी ज़मीनें शुरू होती थी। मेरा नया मकान भी वहीं पर बना हुआ था। पिता जी के हुकुम पर लोग फ़ौरन ही पास के जंगल में जा कर लकड़ियां ले आए और चिता तैयार करने लगे।

महापंडित के निर्देश पर मैंने सबसे पहले अनुराधा की मांग में सिंदूर भरा और उसे पूर्ण रूप से सुहागन बनाया। उसके बाद सारी रस्मों के बाद मैंने उसकी चिता को अग्नि दी। ये सारे कार्य करते हुए मैं बड़ी मुश्किल से खुद को सम्हाले हुए था। मेरा जी कर रहा था कि लकड़ी की चिता पर लेटी अपनी अनुराधा को एक बार अपने सीने से लगा लूं। एक दो बार मैंने कोशिश भी की लेकिन लोगों ने मुझे ऐसा करने नहीं दिया।

जलती आग ने देखते ही देखते अपना उग्र रूप धारण कर लिया और सम्पूर्ण चिता को अपने लपेटे में ले लिया। भीषण आग की लपटों के बीच अनुराधा का मृत जिस्म धुंधला सा दिखने लगा और फिर एक समय ऐसा आया जब सब कुछ समाप्त हो गया। मैं शेरा और भुवन से घिरा उस धधकती आग को अपलक देखता रहा। मैंने महसूस किया कि जैसे जैसे वो आग धीमी पड़ती जा रही थी वैसे वैसे एक आग मेरे सीने में अपना वजूद बना कर सुलगने लगी थी।

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बारह दिन कब और कैसे गुज़र गए मुझे पता ही नहीं चला। मैं तो जैसे अब इस संसार में था ही नहीं। मेरा ज़्यादातर समय उस जगह पर गुज़रता जहां पर अनुराधा की चिता जलाई गई थी। मैं घंटों उसकी चिता के पास बैठा रहता और उससे दुनिया जहान की बातें करता। भुवन मेरी इस हालत को देख कर दुखी होता और मुझे बहलाने की कोशिश करता। जब पिता जी खुद मुझे लेने आते तब उनके ज़ोर देने पर ही मैं वापस हवेली जाता। इस बीच सरोज काकी भी अपने बेटे अनूप के साथ मेरे नए मकान के पास ही बैठी रहती थी। रूपचंद्र हर रोज़ मुझसे मिलने या तो हवेली आता या फिर उस जगह जहां मैं अपनी अनुराधा के पास होता।

तेरहवीं के दिन पिता जी ने पूरी ईमानदारी से हवेली में अनुराधा की तेरहवीं का आयोजन किया। सरोज काकी, उसका बेटा और उसकी देवरानी हवेली आए हुए थे। सबकी मौजूदगी में मैंने पंडित जी के निर्देश पर पूजा की। उसके बाद सबको विधिवत भोजन करवा कर उन्हें दान दक्षिणा दी।

दूसरी तरफ चंद्रकांत के यहां भी यही कार्यक्रम हुआ था। उसके ससुराल वालों ने ही सारी क्रियाएं की थीं।

बड़ी मुश्किल से मैं अपने चाचा और बड़े भैया के सदमे से उबरा था और अब अनुराधा की मौत से मैं एक बार फिर से सदमे में पहुंच गया था। वैसे ये कहना ज़्यादा बेहतर होगा कि इस हादसे ने मुझे अंदर तक तोड़ दिया था। मैं अब मैं नहीं रह गया था। चौबीसों घंटे मैं अनुराधा के ख़यालों में उसकी हत्या क्यों की गई इसके बारे में सोचता रहता था। चंद्रकांत ने उसकी हत्या मेरी वजह से की थी। उसने मुझसे बदला लेने के लिए अनुराधा की हत्या की थी। ज़ाहिर है हत्या भले ही उसने की थी लेकिन अपनी अनुराधा का असल हत्यारा मैं खुद था। अनुराधा मेरे दुष्कर्मों की वजह से आज इस दुनिया में नहीं थी। ये एक ऐसा सच था जिसका एहसास मुझे एक पल के लिए भी चैन से जीने नहीं दे रहा था।

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मैं अपना बैग ले कर जैसे ही नीचे आया तो मां ने मुझे पुकारा जिसके चलते मैं अपनी जगह पर ठिठक गया। आज कल मैं किसी से ज़्यादा बात नहीं करता था और ना ही हवेली में रुकता था। पिछले पंद्रह दिन से मैं खेतों की तरफ भी नहीं गया था। सबको इस बात का एहसास था कि मैं अनुराधा की वजह से ही ऐसी हालत में था इस लिए कोई मुझे बेवजह टोंक कर ना तो परेशान करता था और ना ही इस क़दर समझाने की कोशिश करता था कि मैं उनकी बातों से नाराज़ अथवा गुस्सा हो जाऊं। इस बीच भाभी ज़रूर मेरे आस पास ही रहती थीं, वो भी तब जब मैं हवेली में होता। वो मुझे बड़े ही प्यार से समझातीं और दुनिया जहान की बातों के द्वारा मुझे बहलाने की कोशिश करतीं।

"ये हाथ में बैग लिए कहां जा रहा है बेटा?" मां ने मेरे पास आ कर मुझसे पूछा____"क्या कहीं जा रहा है तू?"

"हां।" मैंने संक्षिप्त सा जवाब दिया।

"अरे! कहां जा रहा है तू?" मां के चेहरे पर हैरानी के साथ साथ चिंता के भाव उभर आए।

"जहां मेरा मन लगता है।" मैंने निर्विकार भाव से कहा और आगे बढ़ने ही लगा था कि मां ने हड़बड़ा कर मुझे फिर से रोक लिया।

"क...क्या मतलब है तेरा?" मां एकदम से मेरे सामने ही आ कर खड़ी हो गईं, बोलीं____"कहां मन लगता है तेरा?"

"जहां मेरी अनुराधा है।" मैंने पूर्व की भांति ही निर्विकार भाव से कहा____"अब से मैं वहीं रहूंगा। यहां मेरा दम घुटता है...मुझे कुछ भी अच्छा नहीं लगता।"

मां मेरी बात सुन कर सन्न रह गईं। हैरान परेशान सी वो देखती रह गईं मुझे। हम दोनों की बात सुन कर मेनका चाची, भाभी, कुसुम, निर्मला काकी और कजरी भी आ गई।

"ये...ये तू क्या कह रहा है बेटा?" मां ने चिंतित भाव से कहा____"नहीं नहीं, तू कहीं नहीं जाएगा। तू हमें छोड़ कर कहीं नहीं जाएगा। यहीं रहेगा...मेरे पास...अपनी मां के पास।"

"मुझे मजबूर मत कीजिए मां।" मैंने इस बार बेबसी के साथ साथ आवेशयुक्त स्वर में कहा____"मुझे जाने दीजिए वरना....।"

"वरना???" मां की आंखें फैल गईं____"वरना क्या करेगा तू...हां?"

"अगर किसी ने मुझे मजबूर किया।" मैंने निर्णायक भाव से कहा____"तो...तो मैं ज़हर खा कर खुदकुशी कर लूंगा। फिर मेरी लाश को लिए बैठे रहना अपने पास।"

"व..वैभव।।" मां की चीख निकल गई। आगे बढ़ कर उन्होंने एक झन्नाटेदार थप्पड़ जड़ दिया मेरे बाएं गाल पर। थप्पड़ के लगते ही मेरे कान झन्ना गए। पलक झपकते ही गुस्सा तो बहुत आया लेकिन मैंने खुद को सम्हाल लिया, कुछ बोला नहीं।

"तेरी हिम्मत कैसे हुई ऐसा बोलने की?" फिर मां ने चीखते हुए कहा और फिर अचानक ही उनकी रुलाई फूट गई। लपक कर अपनी दोनों हथेलियों में मेरा चेहरा लिया और फिर रोते हुए बोलीं____"तुझे अपनी मां के पास नहीं रहना तो मत रह लेकिन ज़हर खाने की बात कभी मत करना। अब तू ही तो बचा है। अपने बड़े भाई की तरह तू भी मुझे छोड़ कर चला जाएगा तो कैसे जी पाऊंगी मैं?"

कहने के साथ ही उन्होंने झपट कर मुझे अपने कलेजे से लगा लिया और फूट फूट कर रोने लगीं। उन्हें यूं रोता देख बाकी सबकी भी आंखें छलक पड़ीं। मैं खुद भी अपने आपको रोक न सका और मां को जोरों से खुद से छुपका लिया।

"तुझे मेरी क़सम है।" मां ने मुझसे छुपके हुए किंतु रोते हुए कहा____"आज के बाद कभी ऐसी बात मत बोलना वरना तुझसे पहले मैं खुद ज़हर खा कर जान ले लूंगी अपनी।"

"हां मैं कभी ऐसा नहीं बोलूंगा।" मैंने रुंधे गले से कहा____"लेकिन आप भी मुझे मत रोकिए। यहां मेरा मन नहीं लगता। मुझे अपनी अनुराधा के पास रहना है। उसके पास रहता हूं तो दिल को थोड़ा सकून मिलता है मुझे।"

"ठीक है।" मां ने मुझसे अलग हो कर कहा____"अगर तेरी यही इच्छा है तो जा तू लेकिन मुझे वचन दे कि तू अपनी मां से मिलने हर रोज़ आएगा।"

"हां मैं आपको वचन देता हूं।" मैंने कहा और फिर उनके आंसू पोंछ कर बाहर की तरफ बढ़ चला।

बैठक के सामने से गुज़रा ही था कि पिता जी ने आवाज़ दे कर मुझे अपने पास आने को कहा। मन तो नहीं किया लेकिन जाना ही पड़ा। उनके पास किशोरी लाल और अर्जुन सिंह बैठे हुए थे। उन्होंने मुझे कुछ देर तक देखा और फिर पूछा कहां जा रहा हूं मैं? जवाब में मैंने उनसे भी वही कहा जो मां से कह चुका था। ज़हर खाने वाली बात नहीं कही उनसे। मेरी बात सुन कर वो कुछ देर जाने क्या सोचते रहे और फिर इतना ही कहा कि अपना ख़याल रखना।

मैं बैठक से निकल कर हवेली से बाहर आ गया। कुछ ही पलों में मैं मोटर साईकिल में बैठा उड़ा चला जा रहा था। आस पास कौन था मुझे किसी से कोई मतलब नहीं था। बस इस बात की खुशी सी महसूस हो रही थी कि अब से मैं ज़्यादातर अपनी अनुराधा के पास ही रहूंगा। जब तक मेरा मन करेगा उसकी चिता के पास बैठ कर उससे बातें करूंगा।

✮✮✮✮

"वैभव की मानसिक हालत ठीक नहीं लगती है ठाकुर साहब।" अर्जुन सिंह ने चिंतित भाव से दादा ठाकुर की तरफ देखते हुए कहा____"उस लड़की की मौत से यकीनन उसे गहरा आघात लगा है। आपको जल्द से जल्द कुछ न कुछ करना होगा।"

"हां हम समझते हैं अर्जुन सिंह।" पिता जी ने गहरी सांस ले कर कहा____"असल में दिल और प्रेम के मामले बहुत ही संवेदनशील होते हैं। हमें हाल ही में उस लड़की से उसके प्रेम के बारे में पता चला था किंतु हमें ये बिल्कुल भी अंदाज़ा नहीं था कि वो उस लड़की को इस क़दर प्रेम करता होगा।"

"ये उसके प्रेम की दीवानगी ही थी ठाकुर साहब कि उसने उस दिन उस लड़की को दुल्हन की तरह सजवा कर तथा उसकी मांग में सिंदूर भर कर उसे अपनी पत्नी बनाया और फिर खुद उसका अंतिम संस्कार भी किया।" अर्जुन सिंह ने कहा____"वहां मौजूद लोगों ने भी उस हैरतअंगेज दृश्य को देखा था और अब इतने दिन गुज़र जाने के बाद भी वो उसके सदमे से उबर नहीं पाया है। मुझे डर है कि वो उस अवस्था में न पहुंच जाए जहां से उसको वापस लाना मुश्किल हो जाए।"

"अर्जुन सिंह जी सही कह रहे हैं ठाकुर साहब।" किशोरी लाल ने गंभीरता से कहा____"अगर ऐसा ही हाल रहा तो वाकई छोटे कुंवर की मानसिक अवस्था इससे भी बद्तर हो जाएगी। हमें जल्द से जल्द उन्हें इस हालत से निकालने का कोई उपाय करना होगा।"

"आप लोग ही बताएं कि उसे इस हालत से बाहर निकालने के लिए हमें क्या करना चाहिए?" पिता जी ने चिंतित भाव से कहा____"हमें सिर्फ उसके इस हाल की ही चिंता नहीं है बल्कि इस बात की भी चिंता है कि उसकी जान का दुश्मन वो सफ़ेदपोश अभी भी हमारी पकड़ में नहीं आया है। आज जिस तरह से वो उस जगह पर रहने के लिए गया है उससे उस सफ़ेदपोश को उसकी जान लेने के लिए कोई मुश्किल पेश नहीं आएगी।"

"हां वाकई ये भी एक चिंता का विषय हो गया है।" अर्जुन सिंह ने सिर हिलाते हुए कहा____"आपको उसकी सुरक्षा का बंदोबस्त करना होगा अब। उसे उस वीरान जगह पर अकेला नहीं छोड़ा जा सकता।"

"वो तो हम करेंगे ही।" दादा ठाकुर ने कुछ सोचते हुए कहा____"हम अपने बेटे पर किसी भी तरह का संकट नहीं आने देंगे। चंद्रकांत ने अगर ऐसा न किया होता तो आज हमारे सामने ऐसे हालात न होते। उससे हमें ऐसे कृत्य की सपने में भी उम्मीद नहीं थी। उस दिन अपनी बहू की हत्या के बाद वो पश्चाताप की अग्नि में जलते हुए रो रहा था और कह रह था कि उसने जो अपराध किया है उसके लिए उसे भगवान भी माफ़ नहीं करेगा। मगर अब सोचते हैं तो ऐसा प्रतीत होता है जैसे उसका वो सब कहना महज झूठ था, दिखावा था। असल में तो उसके मन में कुछ और ही था।"

"उस दिन छोटे कुंवर ने उसके साथ जो कुछ किया था।" किशोरी लाल ने जैसे संभावना ब्यक्त करते हुए कहा____"कहीं उसी की वजह से तो नहीं वो छोटे कुंवर से खुंदक खा गया था?"

"हां ऐसा भी हो सकता है।" दादा ठाकुर ने सिर हिलाया____"वैसे भी वो हमारे बेटे को ही अपना असल दुश्मन समझता था। उसके हिसाब से हमारा बेटा ही सबसे बड़ा दोषी था जिसकी वजह से उसकी बीवी और बहू ने उसे धोखा दे कर वैसा संबंध बनाया था।"

"सच तो ये है ठाकुर साहब कि हर इंसान अपनी मर्ज़ी से ही अच्छा या बुरा कर्म करता है।" अर्जुन सिंह ने कहा____"एक सच ये भी है कि ताली हमेशा दोनों हाथों से ही बजती है। चंद्रकांत की बहू का तो समझ में आता है कि वो जवान थी और उसने वैभव जैसे लड़के के व्यक्तित्व से प्रभावित हो कर उससे अनैतिक संबंध बना लेने में कोई संकोच नहीं किया अथवा ये नहीं सोचा कि ये ग़लत है किंतु चंद्रकांत की अपनी बीवी ने ऐसा क्यों किया? अपने बेटे की उमर के लड़के के साथ उसने कैसे संबंध बना लिया? क्या उसे एक बार भी अपनी उमर का ख़याल नहीं आया होगा? क्या उसे ऐसा अनैतिक संबंध बना लेने की बात सोच कर भी शर्म नहीं आई होगी? मुझे पूरा यकीन है ठाकुर साहब कि वैभव भले ही चाहे जैसे चरित्र का रहा हो लेकिन चंद्रकांत की बीवी पर उसने खुद डोरे नहीं डाले होंगे। ज़रूर उसने ही वैभव को ऐसे अनैतिक संबंध के लिए किसी न किसी तरीके से फांसा रहा होगा।"

"इससे क्या फ़र्क पड़ता है अर्जुन सिंह?" दादा ठाकुर ने कहा____"ग़लत तो ग़लत ही होता है चाहे जिसने भी किया हो। हम ये नहीं कहते कि ग़लती किसकी थी बल्कि हम ये कहते हैं कि इस ग़लती के लिए बदले की भावना में जो तरीका अपनाया गया वो ग़लत था। चंद्रकांत और रघुवीर को अगर ऐसे संबंधों का पता चल ही गया था तो उन्हें इस मामले को हमारे सामने रखना चाहिए था। इसके बाद भी अगर हम उनके साथ कोई संतोष जनक न्याय न करते तो उनका ऐसा करना जायज़ होता। क्योंकि तब उनके द्वारा कुछ भी ग़लत करने के ज़िम्मेदार हम खुद भी होते। हम मुखिया थे और मुखिया के रूप में सबके साथ पूरी ईमानदारी से न्याय करना हमारा सबसे पहला फर्ज़ होता। चंद्रकांत ने या उसके बेटे ने ऐसा कुछ नहीं किया बल्कि उन्होंने खुद ही फ़ैसला करने का सोचा। अपने घर की बहू अथवा बीवी को उन्होंने कुछ नहीं कहा और हमारे परिवार को तबाह कर दिया। उन लोगों की हत्या की जिनका कहीं कोई कसूर ही नहीं था। जिसका कसूर था अगर उन्होंने उसकी हत्या की होती तो हमें भी इतना दुख न होता क्योंकि हम ये सोच कर खुद को समझा लेते कि ग़लती हमारे बेटे ने भी की थी।"

"अब छोड़िए इन बातों को ठाकुर साहब।" अर्जुन सिंह ने गहरी सांस छोड़ते हुए कहा____"इसमें सारा दोष चंद्रकांत और उसके बेटे का ही बस नहीं था बल्कि साहूकारों का भी तो था। वो लोग भी तो उस हत्याकांड के बराबर साझीदार थे।"

"किसी और को क्या दोष दें।" दादा ठाकुर ने कहा____"सारा दोष तो नियति का रहा है और हमारे पिता जी का। साहूकारों के दिल में नफ़रत की भावना को जन्म देने वाले वही तो थे। हमने या हमारे भाई ने तो कभी उनके साथ कुछ ग़लत नहीं किया था। सबसे बड़ी बात ये कि हम गौरी शंकर के पिता चंद्रमणि से उस गुनाह की माफ़ी मांगने भी गए थे जिस गुनाह से हमारा कोई संबंध ही नहीं था। ख़ैर सच तो ये है कि कभी कभी हमें वो मिल जाता है जिसका हक़दार कोई और होता है। हमारे पिता के द्वारा किए गए कर्मों की सज़ा उन्हें नहीं बल्कि हमारे भाई और बेटे को मिली। हमें अब तक समझ नहीं आया कि ईश्वर का ये कैसा विधान है?"

पिता जी की बातें सुन कर अर्जुन सिंह फ़ौरन कुछ ना बोल सके। थोड़ी देर और अलग अलग विषय पर बातचीत हुई उसके बाद अर्जुन सिंह दादा ठाकुर से इजाज़त ले कर चले गए। उनके जाने के बाद दादा ठाकुर ने शेरा को बुला कर उसे कुछ बेहद ज़रूरी कार्य करने के निर्देश दिए।​
 
अध्याय - 115
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पिता जी की बातें सुन कर अर्जुन सिंह फ़ौरन कुछ ना बोल सके। थोड़ी देर और अलग अलग विषय पर बातचीत हुई उसके बाद अर्जुन सिंह दादा ठाकुर से इजाज़त ले कर चले गए। उनके जाने के बाद दादा ठाकुर ने शेरा को बुला कर उसे कुछ बेहद ज़रूरी कार्य करने के निर्देश दिए।

अब आगे....


"अगर यही हाल रहा तो परिस्थितियां और भी बिगड़ जाएंगी।" फूलवती ने गंभीरता से कहा____"वैभव तो उस लड़की के चलते कुछ ज़्यादा ही सदमे में है। रूप ने बताया कि वो दिन भर उस लड़की की चिता के पास ही बैठा रहता है और पागलों की तरह उससे इस तरह बातें करता रहता है जैसे सचमुच में उसके सामने उसकी अनुराधा ही बैठी रहती हो।"

"उसकी ये हालत ही ज़ाहिर करती है कि वो उस लड़की से किस हद तक प्रेम करता था।" गौरी शंकर ने अधीरता से कहा____"प्रेम होता ही ऐसा है भौजी। हमारी बिटिया भी तो उससे प्रेम करती रही है। हमने पहले कभी भले ही उसके बारे में नहीं सोचा था किंतु अब हमें इस बात का एहसास हो चुका है कि इसके पहले वो वैभव के लिए कितना दुखी रहती रही होगी। ख़ैर जो भी हो लेकिन अब वैभव को उसकी इस स्थिति से निकालने के लिए कुछ न कुछ करना ही पड़ेगा।"

"हम भला क्या कर सकते हैं?" फूलवती ने कहा____"जब उसके अपने माता पिता अब तक कुछ नहीं कर पाए तो हम क्या कर लेंगे?"

"उसके माता पिता कुछ नहीं कर पाए तो इसका मतलब ये नहीं है कि कोई भी कुछ नहीं कर पाएगा।" गौरी शंकर ने कहा____"मेरे मन में कई दिनों से एक विचार उभर रहा है और मुझे यकीन है कि अगर वैसा किया जाए तो वैभव को वापस पहले जैसी अवस्था में लाया जा सकता है।"

"वो कैसे?" फूलवती के साथ साथ बाकी लोगों के चेहरों पर भी हैरानी और उत्सुकता के भाव उभर आए।

"हो सकता है कि आप लोगों को मेरा वो विचार थोड़ा अजीब और अनुचित लगे मगर ये भी यकीन मानिए कि उसके सिवा दूसरा कोई चारा नहीं है।" गौरी शंकर ने समझाने वाले अंदाज़ में कहा____"आप सब जानते हैं कि वैभव की ये हालत उस लड़की खो देने की वजह से हुई है जिसे वो बेहद प्रेम करता था। ऐसे में अगर उसे फिर से वैसा ही कोई प्रेम करने वाला मिल जाए तो बहुत हद तक मुमकिन है कि वो अनुराधा के सदमे से बाहर आ जाए।"

"बात तो ठीक है।" फूलवती ने कहा____"लेकिन ऐसा होगा कैसे? मेरा मतलब है कि ऐसा कोई प्रेम करने वाला कहां मिलेगा जो उसे अपना प्रेम दे सके?"

"आप भी कमाल करती हैं भौजी।" गौरी शंकर ने अजीब भाव से कहा____"वैभव को प्रेम करने वाला कहीं बाहर थोड़े ना मिलेगा। वो तो यहीं मिलेगा...हमारे अपने घर में। मेरा इशारा रूपा बिटिया की तरफ है।"

"ये...ये क्या कह रहे हो तुम?" फूलवती के साथ साथ बाकी सभी चौंक पड़े।

"मैं बिल्कुल ठीक कह रहा हूं भौजी।" गौरी शंकर स्पष्ट और मजबूत लहजे में बोला____"हमारी बिटिया वैभव से प्रेम करती है और ये भी सच है कि वैभव के दिल में भी उसके प्रति कोमल भावनाएं तो हैं ही। अब अगर ऐसे हालात में हमारी बिटिया उसके दुख को दूर करने की कोशिश करे तो शायद वो अनुराधा के सदमे से बाहर निकल आए।"

"हां ऐसा हो तो सकता है।" फूलवती ने सोचने वाले भाव से कहा____"लेकिन हमारी बिटिया का ऐसा करना क्या उचित होगा? मेरा मतलब है कि गांव समाज के लोग क्या इसे सही ठहराएंगे? क्या वो हमारी बिटिया के बारे में तरह तरह की बातें नहीं बनाने लगेंगे?"

"आपको लोगों के द्वारा बातें बनाने की फ़िक्र है या वैभव के ठीक होने की?" गौरी शंकर ने अजीब भाव से उल्टा सवाल किया जिसके जवाब में फूलवती अथवा कोई भी कुछ बोल ना सका।

"देखिए भौजी, गांव समाज के लोगों का तो काम ही है कुछ न कुछ सोचते रहना।" गौरी शंकर ने कहा____"हम अच्छा काम करेंगे तब भी वो कुछ न कुछ नुक्स निकालेंगे और उल्टा सीधा बोलेंगे और ग़लत काम करेंगे तब तो बोलेंगे ही। कोई भी किसी के बारे में कभी अच्छा नहीं सोचता। यहां ज़रूरी ये है कि हम संजीदा हो गए हालातों को कैसे सामान्य अवस्था में लाएं? उसके लिए हमें अगर कोई सही तरीका नज़र आता है तो हम ज़रूर उस तरीके को अपनाएंगे। वैसे भी इसमें कुछ ग़लत अथवा अनुचित बात तो होनी नहीं है। दादा ठाकुर ने तो अपने बेटे वैभव से हमारी बिटिया का ब्याह पहले ही पक्का कर दिया है तो ऐसे हालात में अगर उनकी होने वाली बहू अपने होने वाले पति की बेहतरी के लिए कोई अच्छा काम करती है तो इसमें किसी को क्या एतराज़ होगा? मेरा ख़याल है कि अगर इस बारे में मैं खुद दादा ठाकुर से बात करूंगा तो वो भी इस बात से सहमत ही होंगे।"

"अगर ऐसी बात है तो ठीक है।" फूलवती ने कहा____"हम में से किसी को कोई एतराज़ नहीं है लेकिन ऐसा करने से पहले तुम एक बार दादा ठाकुर से भी इस बारे में बात कर लो। आख़िर उनकी जानकारी में ये बात रहे तो ज़्यादा बेहतर होगा। उन्हें ये नहीं लगना चाहिए कि हम कोई भी काम उनकी मर्ज़ी के खिलाफ़ या मनमाने तरीके से कर रहे हैं।"

"सही कहा आपने।" गौरी शंकर ने कहा____"मैं हाल चाल पूछने के लिए हवेली जाने ही वाला था तो अब इस बारे में भी उनसे बात कर लूंगा।"

कुछ देर ऐसी ही बातों के बाद गौरी शंकर उठा और अपना लट्ठ ले कर बाहर निकल गया। रूपचंद्र वहीं बैठा था। गौरी शंकर के जाने के बाद वो उठा और अपनी बहन रूपा के कमरे की तरफ बढ़ता चला गया।

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रूपा अपने कमरे में खिड़की के पास कुर्सी पर गुमसुम सी बैठी थी। उसकी नज़रें खिड़की के बाहर जाने किस शून्य में जमी हुईं थी। उसे ये तक न पता चला कि कब उसके कमरे का दरवाज़ा खोल कर उसका भाई कमरे में आ गया था। रूपचंद्र जब कमरे में आया तो उसकी नज़र अपनी बहन पर पड़ी। अपनी बहन को खिड़की के बाहर गुमसुम अवस्था में देखता देख बहुत बुरा लगा उसे। वो चलते हुए रूपा के क़रीब पहुंचा और फिर उसे पुकारा।

"भ...भैया?" रूपा एकदम से चौंकी, फिर सम्हल कर बोली____"आप कब आए?"

"बस अभी ही आया हूं।" रूपचंद्र ने कहा____"ख़ैर ये बता कहां खोई हुई थी?"

रूपचंद्र के इस सवाल पर रूपा फ़ौरन कुछ बोल ना सकी। मुरझाए चेहरे पर वेदना के भाव उभर आए जिसे छुपाने के लिए उसने फिर से खिड़की की तरफ अपना चेहरा कर लिया।

रूपचंद्र को बखूबी अपनी बहन के अंदर के हाल का एहसास था इस लिए उसने दुबारा वो सवाल नहीं किया। कुछ देर वो कुछ सोचता रहा फिर उसने रूपा को वो सारी बातें बताई जो अभी कुछ देर पहले गौरी शंकर और फूलवती के बीच हुई थीं।

"तेरे लिए ये एक बेहतर अवसर है रूपा।" सारी बात बताने के बाद रूपचंद्र ने एक गहरी सांस लेते हुए कहा____"और इस बात के लिए भी कि तू अपने सच्चे कर्म से वैभव को वापस पहले जैसी अवस्था में ले आए।"

"क...क्या आपको लगता है कि मेरी किसी कोशिश से कुछ हो सकता है?" रूपा ने गंभीरता से कहा____"क्या आपको लगता है कि जिस अवस्था में वो हैं उसमें वो किसी को अपने पास रहने देंगे?"

"मैं ऐसे परिणामों के बारे में नहीं सोचता मेरी बहन।" रूपचंद्र ने कहा____"मैं सिर्फ ये यकीन से कह सकता हूं कि अगर तू कोशिश करेगी तो बदलाव ज़रूर नज़र आएगा। एक बात और, तुझे भी ऐसे परिणाम के बारे में नहीं सोचना चाहिए बल्कि अपने सच्चे प्रेम पर भरोसा रखना चाहिए। तुझे ये सोचना चाहिए कि अगर तेरे प्रेम में शिद्दत होगी तो वैभव पर उसका असर ज़रूर होगा। बाकी ऊपर वाले की मर्ज़ी।"

"आप सही कह रहे हैं।" रूपा ने कुछ सोचते हुए कहा____"शायद ऊपर वाला इस अवस्था में मेरे प्रेम और त्याग की परीक्षा लेना चाहता है। अगर ऐसा है तो ठीक है। मैं तैयार हूं भैया। अपने प्रेम को साबित करने के लिए मैं हर परीक्षा दूंगी। उनको सामान्य हालत में लाने की पूरी कोशिश करूंगी।"

"ये हुई न बात।" रूपचंद्र ने हल्के से मुस्कुराते हुए कहा____"मुझे तुझ पर और तेरे प्रेम पर पूरा भरोसा है। मुझे पूरा यकीन है कि तेरे प्रयासों से वैभव पहले जैसी अवस्था में लौट आएगा। ख़ैर, अब तू यूं उदास और दुखी हो के मत बैठ। गौरी काका दादा ठाकुर से मिलने गए हैं। मुझे यकीन है कि दादा ठाकुर काका को इसकी अनुमति दे देंगे। तू भी तैयार रहना और हां, तेरा ये भाई तेरी सहायता के लिए हर समय तैयार रहेगा।"

कहने के साथ ही रूपचंद्र ने प्यार से रूपा के सिर पर हाथ फेरा और फिर कमरे से बाहर निकल गया। उसके जाने के बाद रूपा ने एक गहरी सांस ली और फिर किसी गहरे ख़याल में खो गई।

✮✮✮✮

"हमें ये देख कर बेहद अच्छा लगा कि आप लोग वैभव के प्रति चिंतित हैं और उसे उसकी ऐसी अवस्था से बाहर निकालने के लिए ये सब करने का सोचा है।" बैठक कक्ष में दादा ठाकुर ने गौरी शंकर की तरफ देखते हुए कहा____"सच कहें तो हमारी समझ में भी नहीं आ रहा था कि वैभव को उसके इस हाल से कैसे बाहर निकालें? हम अच्छी तरह जानते हैं कि जिस अवस्था में वो है उसमें से निकालने के लिए उस पर कोई ज़ोर ज़बरदस्ती अथवा सख़्ती से काम लेना बिल्कुल भी उचित नहीं होगा। उसके लिए तो प्रेम, सहानुभूति और प्रोत्साहन ही चाहिए होगा।"

"यही सब सोच कर तो हमने ऐसा करने का फ़ैसला किया है ठाकुर साहब।" गौरी शंकर ने कहा____"हम में से किसी को भी इस बात से कोई फ़र्क नहीं पड़ेगा कि हमारी बिटिया के द्वारा ऐसा करने से गांव समाज के लोग क्या कहेंगे अथवा क्या सोचेंगे। हम सिर्फ ये चाहते हैं कि सब कुछ पहले की तरह बेहतर हो जाए।"

"हां हम समझते हैं गौरी शंकर।" दादा ठाकुर ने सिर हिलाया____"और सच कहें तो तुम्हारे विचार सुन कर हमें अत्यंत खुशी हुई है। अब हमें यकीन भी होने लगा है कि जल्द ही सब कुछ ठीक हो जाएगा। रही बात लोगों के कुछ सोचने की तो इस बात की फ़िक्र मत करो तुम। रूपा तुम्हारी बेटी ही नहीं बल्कि हमारी होने वाली बहू भी है। अगर वो अपने होने वाले पति की बेहतरी के लिए ऐसा कुछ करती है तो ये अच्छी बात है। हम जानते हैं कि वो वैभव से बेहद प्रेम करती है और वो उसे ऐसी अवस्था में देख कर दुखी भी होगी।"

"वो तो दुखी है ही ठाकुर साहब।" गौरी शंकर ने कहा____"हम सब भी दुखी हैं। खास कर इस बात से कि उस मासूम के साथ चंद्रकांत ने ऐसा किया। अपनी बहू की हत्या करने का उसे उतना पाप नहीं लगा होगा जितना कि अनुराधा बिटिया की हत्या करके लगा होगा। मुझे यकीन है कि मरने के बाद उसे नरक में घोर यात्नाएं ही दी जा रहीं होंगी।"

"अब इन सब बातों को मत दोहराओ गौरी शंकर।" दादा ठाकुर ने सहसा आहत हो कहा____"हम बहुत कोशिश करते हैं ये सब भूलने की मगर कामयाबी नहीं मिलती। हर वक्त हमें वही सब याद आता रहता है और फिर हमारी आत्मा तड़पने लगती है। ईश्वर ही जाने कि आख़िर वो ये सब क्यों चाहता था?"

दादा ठाकुर की इन बातों से गौरी शंकर गंभीरता से जाने क्या सोचने लगा था। कुछ देर और इधर उधर की बातें हुईं उसके बाद गौरी शंकर उठ कर चला गया।

✮✮✮✮

ठकुराईन सुगंधा देवी की बग्घी मुरारी के घर के सामने पहुंच कर रुकी। सुगंधा देवी के साथ उनकी बहू रागिनी भी थी। बग्घी को मंगत नाम का एक तंदुरुस्त मुलाजिम ले के आया था। सुगंधा देवी और उनकी बहू रागिनी दोनों ही सरोज से मिलने और उसका हाल चाल पूछने यहां आईं थी।

घर के बाहर घोड़ों की हिनहिनाहट सुन कर सरोज ने दरवाज़ा खोला तो बाहर हवेली की ठकुराईन और उनकी बहू को दरवाज़े की तरफ आते हुए देखा। उसके मुरझाए चेहरे पर पल भर के लिए हैरानी के भाव उभरे किंतु फिर वो पहले की ही तरह गुमसुम सी नज़र आने लगी। उधर दोनों सास बहू की नज़र भी सरोज पर पड़ चुकी थी।

"कैसी हो सरोज बहन?" ठकुराईन सुगंधा देवी ने सरोज के निकट पहुंचते ही सामान्य भाव से पूछा तो सरोज ने दरवाज़े से एक तरफ हटते हुए धीमें स्वर में कहा____"बस अपने प्राण निकलने का इंतज़ार कर रही हूं ठकुराईन।"

"अरे! ऐसा मत कहो सरोज।" सुगंधा देवी ने अपनी बहू के साथ अंदर आंगन में आने के बाद कहा____"हम जानते हैं कि तुम अपनी बेटी के विरह से दुखी हो किंतु ऐसे कब तक चलेगा? इस दुख को तो किसी तरह भुलाना ही पड़ेगा। हमें भी अनुराधा के इस तरह चले जाने का बेहद दुख है। वैसे तो थोड़ा बहुत हमें पता था लेकिन रागिनी बहू के द्वारा हमें सब कुछ पता चल गया था। इसी के द्वारा पता चला था कि अनुराधा कितनी अच्छी लड़की थी और कितनी मासूम थी। ईश्वर ही जाने की उस अभागन के साथ ऐसा कर के उसे क्या मिल गया है?"

सुगंधा देवी की इन बातों से सरोज की आंखें छलक पड़ीं। बड़ी मुश्किल से उसने अपनी रुलाई को फूट पड़ने से रोका। रागिनी ने आगे बढ़ कर सरोज को अपने गले से लगा लिया।

"मैं भी तो आपकी बेटी हूं ना मां।" फिर उसने उसे छुपकाए हुए ही कहा____"अनुराधा चली गई तो क्या हुआ आपकी ये बड़ी बेटी तो है न आपके पास।"

सरोज ने ये सुना तो इस बार वो फूट फूट कर रो पड़ने से खुद को रोक न सकी। उसने कस कर रागिनी को अपने कलेजे से भींच लिया। सुगंधा देवी को रागिनी ने सब कुछ बता दिया था इस लिए इस वक्त दोनों को इस तरह बातें करते और भरत मिलाप सा करते देख उनकी आंखें भी छलक पड़ीं थी।

कुछ देर यही आलम रहा, फिर रागिनी और सरोज एक दूसरे से अलग हो गईं। सरोज ने खुद को सम्हालते हुए आंगन में एक चारपाई ला कर बिछाई जिस पर सुगंधा देवी उसके कहने पर बैठ गईं। उसके बाद सुगंधा देवी के मना करने पर भी सरोज लोटा ग्लास में पानी ले आई और उन्हें पीने के लिए दिया। थोड़ी सी इस औपचारिकता के बाद ठकुराईन के ज़ोर देने पर सरोज आख़िर उनके पास ही बैठ गई।

सरोज का बेटा अनूप आंगन में एक कोने में खेल रहा था जो अब अपनी मां के पास आ कर घर आए मेहमानों को गौर से देखने लगा था। सुगंधा देवी ने उसे अपने पास बुलाया और उसे दुलार करने लगीं।

"किसी अपने को खो देने का दुख कैसा होता है इसका हमें एहसास है बहन।" फिर उन्होंने गंभीरता से कहा____"हमने भी अपना देवर और अपना एक बेटा खोया है। आज भी उसकी याद में कलेजा फटता है। अपनी इस बहू को इस सफेद लिबास में देखते हैं तो दिल तड़प उठता है लेकिन क्या करें? ईश्वर की करनी पर हम इंसानों का कोई ज़ोर कहां होता है? किसी तरह खुद को समझाते हैं और फिर खुद को पत्थर बनाने की कोशिश करते हैं। अनुराधा के साथ जो हुआ वो नहीं होना चाहिए था लेकिन शायद यही नियति में लिखा था। हमें जब ये पता चला कि हमारा बेटा उससे प्रेम करता है और उससे ब्याह करना चाहता है तो हमें बड़ी खुशी हुई थी।"

"मेरा तो अब सब कुछ उजड़ गया ठकुराईन।" सरोज ने दुखी भाव से कहा____"पहले पति को खोया और अब बेटी को खो दिया। इतने बड़े घर में अब मैं और मेरी ये नन्ही सी जान किसी भूत की तरह रह रहे हैं। ये पगला दिन भर मुझसे पूछता है कि अनू दीदी कहां गई है? कब आएगी? जब ये इस तरह पूछने लगता है तो जवाब देना मुश्किल पड़ जाता है। ऊपर वाले की तरफ देख कर मन ही मन उससे पूछती हूं कि बता अब क्या जवाब दूं अपने बेटे को? अकेले में उसे याद कर के खूब रोती हूं। बार बार ऐसा लगता है कि कहीं से वो मां कह के पुकारेगी मुझे इस आस में अपने कान लगाए रहती हूं मगर जब कहीं से उसकी आवाज़ नहीं आती तो रुलाई फूट जाती है।"

"हां हम समझते हैं बहन।" सुगंधा देवी ने अपनी आंखों से छलक आए आंसू को पोंछते हुए कहा____"अपनी औलाद के जाने का दुख बहुत असहनीय होता है। जीवन भर उसकी याद में कलेजा फटता रहता है लेकिन इसके बावजूद हमें सब कुछ सहते हुए फिर से आगे बढ़ना पड़ता है। हम यही कहेंगे हैं कि अपने लिए न सही अपने इस बेटे के लिए इस दुख से बाहर निकलने की कोशिश करो। इस मासूम के लिए खुद को मजबूत बनाओ और इसकी अच्छे से देख भाल करो।"

"यही सोच कर तो मैंने खुद को रोक रखा है ठकुराईन।" सरोज ने कहा____"वरना तो अब एक पल भी जीने का मन नहीं करता। वैभव की तरह मैं भी दिन भर उसी जगह पर बैठी रहती हूं जहां पर मेरी बेटी का अंतिम संस्कार किया गया था।"

"ये अच्छी बात नहीं है बहन।" सुगंधा देवी ने अधीरता से कहा____"जाने वाली तो चली गई लेकिन अब तुम्हें भी उसके लिए इतना दुखी नहीं होना चाहिए वरना उसकी आत्मा भी ये सोच कर दुखी होती रहेगी कि उसकी मां दुखी है। अपने बेटे पर ध्यान दो और खुद को बहलाने के लिए किसी न किसी काम में अपना मन लगाए रखो। यही बात वैभव को भी समझाने की कोशिश करते हैं लेकिन वो भी तुम्हारी तरह अनुराधा के लिए व्यथित है। एक मां होने नाते उसको इस हालत में देखा भी नहीं जाता। बस ऊपर वाले से यही प्रार्थना करते हैं कि सब कुछ ठीक हो जाए और अब आगे कभी किसी के साथ ऐसा कुछ न हो।"

"मेरा भी आपसे यही कहना है मां कि आप खुद को इस तरह दुखी मत रखिए।" सहसा रागिनी ने अधीरता से कहा____"मैंने आपको मां कहा है तो आपकी बड़ी बेटी होने के नाते मैं भी आपको इस तरह दुखी हालत में नहीं देख सकती। मुझे पता था कि आप अनुराधा को याद कर के खुद को दुखी किए होंगी इसी लिए मां जी से कहा कि आपके घर चलें।"

"आपने बहुत अच्छा किया बहू रानी जो यहां चली आईं।" सरोज ने कहा____"आपको देख लिया तो मन को बहुत सुकून मिला है। ये एहसास भी हो रहा है कि इस दुनिया में मेरे अपने के रूप में अभी कोई तो है।"

"बिल्कुल मां।" रागिनी ने कहा____"मैं हमेशा आपकी बेटी ही बनी रहूंगी। जब भी आपका मन करे आप हवेली आ जाया करना और मैं तो आती ही रहूंगी अपनी मां से मिलने।"

रागिनी की बातें सुन कर सरोज की आंखें एक बार फिर छलक पड़ीं। काफी देर तक ऐसी ही बातों का दौर चला और फिर दोनों सास बहू सरोज से इजाज़त ले कर और दुबारा आने का बोल कर वहां से चल पड़ीं।

कुछ ही देर में दोनों बग्घी में बैठी वहां पहुंची जहां वैभव ने नया मकान बनवाया था। मकान से क़रीब पच्चीस तीस क़दम की दूरी पर उन्हें वैभव नज़र आया जो अनुराधा की चिता के पास बैठा हुआ था। ये देख कर जहां सुगंधा देवी का कलेजा फट पड़ा वहीं रागिनी के दिल में भी एक हूक सी उठी।

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मैं उस वक्त उछल सा पड़ा जब किसी ने मेरे दाहिने कंधे पर हाथ रखा। अपनी अनुराधा के ख़यालों में खोया मैं आंखें बंद किए बैठा था। हर तरफ सन्नाटा सा छाया हुआ था। दूर दूर तक कोई नज़र नहीं आता था। सब कुछ शांत था लेकिन एक मेरा दिलो दिमाग़ था जहां अशांति ही अशांति थी।

किसी का हाथ अपने कंधे पर महसूस करते ही मैं उछल पड़ा था और फिर पलट कर पीछे देखा तो नज़र मां और भाभी पर पड़ी। मकान के पास बग्घी खड़ी थी और वो दोनों चल कर मेरे पास आ गईं थी।

"इस तरह कब तक बैठा रहेगा मेरा बेटा?" मां ने दुखी भाव से कहा____"क्या इस तरह बैठे रहने से मेरे बेटे को उसकी अनुराधा वापस मिल जाएगी?"

"मैं तो उसी के पास बैठा हूं मां।" मैंने पूरे आत्मविश्वास से कहा____"वो मेरे पास ही तो है। मैं दिन भर उससे बातें करता हूं लेकिन....लेकिन वो मुझसे कोई बात नहीं करती। मेरे किसी सवाल का जवाब भी नहीं देती वो। शायद बहुत ज़्यादा रूठ गई है मुझसे। ख़ैर कोई बात नहीं, मैं मना लूंगा उसे।"

"हां सही कह रहा है तू।" मां ने अपने जज़्बातों को बड़ी मुश्किल से रोकते हुए कहा____"वो सच में तुझसे बहुत ज़्यादा रूठ गई है। जानता है क्यों? क्योंकि तू दिन भर उसे याद करते हुए खुद को दुखी रखता है। तेरा खुद को इस तरह दुखी रखना उसे बिल्कुल भी अच्छा नहीं लगता बल्कि इससे उसे बहुत तकलीफ़ होती है। तू उसकी तकलीफ़ों को नहीं समझता इस लिए वो तुझसे रूठ गई है।"

"क...क्या सच में ऐसा है मां?" मैं एकदम से हैरान हो कर बोल पड़ा____"क्या इसी लिए वो मुझसे रूठ गई है और कोई जवाब नहीं देती है?"

"हां इसी लिए।" मां ने कहा____"वो चाहती है कि तू उसे याद कर के इस तरह खुद को दुखी मत करे। प्रेम तो वही होता है ना जिसमें इंसान अपने प्रेमी अथवा प्रेमिका को किसी भी तरह से कोई तकलीफ़ न दे। अगर तू वाकई में अनुराधा से सच्चे दिल से प्रेम करता है तो यूं खुद को दुखी रख के अपनी अनुराधा को कोई तकलीफ़ मत दे। बल्कि उसके लिए ऊपर वाले से यही प्रार्थना कर कि वो जहां भी है ईश्वर उसे शांति प्रदान करे।"

"इ...ईश्वर????" मैं एकदम हिकारत के से भाव में कह उठा____"कौन सा ईश्वर मां? कौन से ईश्वर से प्रार्थना करूं मैं? क्या उससे जिसने एक निर्दोष और मासूम का जीवन छीन लिया? नहीं हर्गिज़ नहीं, मैं ऐसे किसी ईश्वर को नहीं जानता और ना ही जीवन में कभी उसके सामने कोई प्रार्थना करूंगा।"

"ऐसा मत कह मेरे लाल।" मां एकदम से तड़प कर मेरे चेहरे को सहलाते हुए बोलीं____"ईश्वर के बारे में कभी बुरा भला नहीं बोलना चाहिए। मानती हूं कि उसने जो किया ठीक नहीं किया है लेकिन फिर भी अगर उसने ऐसा किया है तो उसके पीछे उसकी कोई वजह रही होगी। हर इंसान को अपने कर्मों का फल मिलता है, फिर चाहे वो इस जन्म के कर्मों के हों या पिछले जन्मों के।"

"मैं ये सब नहीं जानता मां।" मैंने सपाट भाव से कहा____"मैं सिर्फ इतना जानता हूं आपके ईश्वर ने सबसे पहले मेरे चाचा और मेरे बड़े भैया को मुझसे छीना। मेरी उस भाभी का सुहाग छीन लिया जिन्होंने हमेशा उसकी आराधना और पूजा भक्ति की। उसके बाद उसने मेरी अनुराधा को मुझसे छीन लिया। आखिर आपके ईश्वर ने छीनने के अलावा किया क्या है मां? नहीं, मैं ईश्वर को नहीं मानता। अब आप जाइए, मुझे अपनी अनुराधा से अभी ढेर सारी बातें करनी हैं।"

मां तड़प कर रह गईं। कहने को तो बहुत कुछ था उनके मन में लेकिन समझ चुकी थीं कि इस वक्त मुझे कुछ कहना अथवा समझाना व्यर्थ था। दूसरी तरफ भाभी संजीदा भाव से मेरी तरफ देख रहीं थी। कुछ देर मां जाने क्या सोचती रहीं फिर मुझसे बोलीं____"अच्छा ठीक है अब घर चल। देख घंटे भर बाद शाम भी होने वाली है।"

"आप जाइए मां।" मैंने कहा____"मेरा जब मन करेगा आ जाऊंगा।"

"ठीक है।" मां ने ज़्यादा कुछ कहना जैसे मुनासिब न समझा, बोलीं____"समय से घर आ जाना....चल बेटी।"

"आप जाएं मां जी।" भाभी ने मां से कहा____"मैं कुछ देर यहीं वैभव के पास ही रहूंगी। शाम होने से पहले वैभव के साथ आ जाऊंगी।"

भाभी की बात सुन कर मां कुछ पलों तक जाने क्या सोचती रहीं फिर बोलीं____"ठीक है बेटी, मैं जा रही हूं लेकिन इसे साथ लाने में देर मत करना।"

भाभी ने सहमति में सिर हिलाया। मां वापस पलट कर बग्घी की तरफ चली गईं। उधर भाभी तब तक उन्हें जाता देखती रहीं जब तक कि वो बग्घी में बैठ कर वहां से चली नहीं गईं। उनके जाने के बाद वो वापस मेरे पास आ गईं।​
 
अध्याय - 116
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ललिता देवी को अपने कमरे में आया देख रूपा चौंकी। पिछले कुछ समय से ललिता देवी अपनी बेटी से थोड़ा नम्र भाव से बातें करने लगीं थी वरना इसके पहले वो हमेशा ही उसे खरी खोटी सुनाते हुए उस पर लानत भेजती रहीं थी। रूपा अपनी मां द्वारा डांट पड़ने से और लानत भेजने से बहुत दुखी हो जाया करती थी और फिर अकेले में खूब रोती थी। उसने प्रेम के चलते अपना सब कुछ वैभव को क्या सौंप दिया था जैसे बहुत भयंकर गुनाह हो गया था उससे। घर का कोई भी सदस्य उससे ढंग से बात करने की तो दूर कोई उसकी तरफ देखना तक गवारा नहीं करता था।

उसके ताऊ यानि मणि शंकर की बेटियां जो उससे उमर में बड़ी थीं वो उससे कभी बात नहीं करती थीं। इतने बड़े परिवार के इतने सारे लोगों के बीच वो एकदम से अकेली हो गई थी। सिर्फ एक ही शख़्स था जो उससे बातें करता था और उसे समझता था। यानि उसके ताऊ की बहू कुमुद जोकि उसको अपनी सहेली भी मानती थी किंतु उसने भी उस दिन उससे मुंह मोड़ लिया था जिस दिन दादा ठाकुर द्वारा घर के सभी मर्दों और लड़कों को मार दिया गया था। किसी और की करनी की सज़ा उसे मिल गई थी। रूपा को बाकी किसी से इतनी शिकायत नहीं थी जितनी कि उसे जन्म देने वाली अपनी मां से थी। ऐसा नहीं था कि वो खुद को दोष नहीं देती थी लेकिन वो ये भी सोचती थी कि इसके लिए क्या उसे इतना बड़ा दंड मिलना चाहिए था?

ख़ैर वक्त बदला, हालात बदले और अब सब कुछ सामान्य सा हो गया था। ललिता देवी ने जब पहली बार रूपा से थोड़ा नम्रता से बात की तो उसे पहले तो यकीन ही नहीं आया लेकिन फिर उसे ऐसी खुशी महसूस हुई जैसे दुनिया की सबसे बड़ी सौगात मिल गई हो। तड़प कर वो अपनी मां के सीने से लिपट जाना चाहती थी और जी भर के रो लेना चाहती थी। जैसे ही उसने ऐसा करने की कोशिश की तो ललिता देवी ने हाथ दिखा कर उसे रोक दिया था। ये देख रूपा को झटका लगा था। उसका जी चाहा था कि फूट फूट कर रो पड़े लेकिन फिर बड़ी मुश्किल से उसने अपनी भावनाओं को सम्हाला था। ज़हन में बस यही सवाल उभरा था कि क्या कोई मां इतनी कठोर हो सकती है?

"खुश तो बहुत होगी ना तू?" ललिता देवी ने रूपा की तरफ देखते हुए निर्विकार भाव से ब्यंग्य सा किया____"आख़िर सब कुछ तेरे मन का जो हो रहा है।"

अपनी मां की ये बात सुन कर पलक झपकते ही रूपा की आंखें भर आईं। पहले से ही दुखी हृदय और भी ज़्यादा घायल हो गया। ऐसा लगा जैसे पिघलता हुआ कांच कांनों से होते हुए सीधा दिल में पहुंच गया हो। रूपा ने आंखें बंद कर के अपने अंदर बुरी तरह मचल उठे जज़्बातों को काबू करने की कोशिश की।

"ख़ैर।" ललिता देवी ने कहा____"मैं ये कहने आई थी कि कल सुबह तैयार रहना। तेरा जो भी अपना समान हो उसे एक थैले में डाल लेना। रूपचंद्र सुबह तुझे उसके पास छोड़ आएगा जिसको तूने प्रेम में पड़ कर पहले ही सब कुछ सौंप दिया है।"

इस बार लाख कोशिशों के बाद भी रूपा अपनी आंखें छलक पड़ने से रोक न पाई। चेहरे पर अथाह पीड़ा के भाव नुमायां हो उठे। दिल में ही नहीं बल्कि समूचे जिस्म में शूल चुभते महसूस हुए उसे।

"अगर मैं आप सबकी नज़र में इतनी ही बुरी हूं मां।" फिर उसने रुंधे हुए गले से कहा____"तो क्यों मुझे अब तक ज़िंदा रखा हुआ है? मैंने अगर इस परिवार की इज्ज़त और मान मर्यादा को मिट्टी में ही मिला दिया है तो क्यों मुझे जीवित रखा हुआ है आप लोगों ने? अगर मुझे जान से मार नहीं सकते तो बस एक बार अपने मुंह से कह दो मैं खुद अपनी जान दे दूंगी और आप सबको हर दुख से मुक्ति मिल जाएगी।"

"बकवास मत कर।" ललिता देवी ने सख़्त नज़रों से घूरते हुए कहा____"मुझे तेरा ये रोना धोना और तेरी ये बेहूदा बातें नहीं सुननी हैं। तू मेरी कोख का कलंक है। तूने जो किया है उसके लिए मैं तुझे कभी माफ़ नहीं करूंगी।"

"वाह! बहुत खूब।" दरवाज़े से रूपचंद्र की आवाज़ आई तो ललिता देवी चौंकते हुए पीछे पलटीं। उधर रूपचंद्र कमरे के अंदर दाखिल होते हुए बोला____"धन्य हो मेरी माता धन्य हो। ईश्वर करे हर संतान को आपके जैसी मां दे।"

"क्या बक रहा है तू?" ललिता देवी ने गुस्से से कहा____"और ये किस लहजे में बात कर रहा है तू अपनी मां से?"

"मां से???" रूपचंद्र के चेहरे पर एकाएक हिकारत के भाव उभर आए, बोला____"क्या आप अपने बारे में कह रहीं हैं ललिता देवी? न न चौंकिए मत....मैं अब आपको ललिता देवी ही कहूंगा क्योंकि जो औरत अपनी बेटी को न समझे और उससे इस तरीके से बात करे कि बेटी का हृदय हाहाकार कर उठे वो औरत किसी की मां नहीं हो सकती। उस औरत को मां कहना ही नहीं चाहिए।"

"ख़ामोश।" ललिता देवी गुस्से में चीख पड़ी____"तेरी हिम्मत कैसे हुई अपनी मां को ऐसा बोलने की?"

"और आपकी हिम्मत कैसे हुई मेरी बहन को बुरा भला कहने की?" रूपचंद्र उससे भी ज़्यादा ज़ोर से दहाड़ा। गुस्से से तमतमा गया था वो, बोला____"आख़िर ऐसा कौन सा गुनाह कर दिया है इसने जिसके लिए आज इतने समय से आप सब इसे प्रताड़ित करते आ रहे हैं? प्रेम ही तो किया है इसने। किसी एक व्यक्ति को ही तो अपना सब कुछ मान लिया है इसने तो कौन सा पाप कर दिया है? अगर उसका ऐसा करना पाप है तो उससे ज़्यादा पाप मैंने किए हैं। मुझे भी इसके जैसे प्रताड़ित कीजिए लेकिन नहीं, कोई मुझे क्यों प्रताड़ित करेगा? मैं तो लड़का हूं ना, घर का मर्द हूं ना। मर्द एक नहीं दो नहीं बल्कि हज़ारों औरतों से संबंध बनाए रखे तो वो पाप नहीं कहलाता मगर....लड़की....लड़की जात अगर किसी एक व्यक्ति से प्रेम कर ले और उसे अपना सब कुछ मान कर उसे अपना सब कुछ दे दे तो वो पाप हो जाता है। वो लड़की चरित्रहीन हो जाती है और उसकी अपनी मां उसे ऐसे ऐसे शब्दों के बाण चला कर उसका दिल दुखाती है कि लड़की तड़प कर ही मर जाए।"

"भ...भैया चुप हो जाइए।" रूपा बीच में ही बोल पड़ी____"मां को ऐसा कहना शोभा नहीं देता आपको।"

"मुझे बोलने दे रूपा।" रूपचंद्र ने सहसा आहत हो कर कहा____"तेरे खातिर जो आवाज़ मुझे पहले उठानी चाहिए थी वो आज उठाने से मत रोक मुझे। मुझे तो ये सोच सोच कर ग्लानि होती है कि इसके पहले मैं ऐसी मानसिकता का शिकार क्यों था कि तुझे समझ न सका? सबकी तरह मैंने भी तो तेरा बहुत दिल दुखाया है मेरी बहन। भगवान का शुक्र है कि उसने वक्त रहते मुझे सद्बुद्धि दे दी और मुझे तेरी अच्छाईयों का और तेरे प्रेम का एहसास करवा दिया। लेकिन ये लोग अभी भी तुझे ग़लत समझते हैं। ये लोग अभी भी खुद को पाक साफ समझते हैं।"

"भगवान के लिए भैया।" रूपा ने मिन्नत की____"किसी को कुछ मत कहिए।"

"ये लोग तुझे चुप करा सकते हैं रूपा लेकिन मुझे नहीं।" रूपचंद्र जैसे पूरे जलाल पर था____"और ना ही मैं चुप होने वाला इंसान हूं। बहुत दिनों से इन लोगों का तमाशा देख रहा हूं मैं। इन लोगों का ज़ोर सिर्फ तुझ पर चलता है बाकी इनके बस का कुछ नहीं रहा अब। ख़ैर किसी और को क्या कहूं? सबसे ज़्यादा दुख तो इस बात का है कि जिसने तुझे जन्म दिया उसे ही अपनी बेटी के दिल पर नश्तर चलाने में ज़रा भी संकोच नहीं होता। सुना है मां और बेटी के बीच ऐसा गहरा संबंध होता है कि दोनों एक दूसरे को बिना कुछ कहे एक दूसरे के अंदर का मर्म समझ लेती हैं लेकिन यहां तो दूर दूर तक ऐसा कुछ है ही नहीं। इतना कुछ हो जाने के बाद भी इन्हें ये एहसास नहीं हुआ कि जिस बेटी के हृदय में ये नश्तर चला रही हैं उसी बेटी के प्रेम की वजह से आज हम दुबारा लोगों के बीच सिर उठा कर चलने के क़ाबिल बनने वाले हैं। इन्हें ये एहसास नहीं है कि जिस बेटी पर ये अब तक लानत भेजती आईं हैं उसी बेटी के प्रेम की वजह से इस घर की दूसरी बेटियों का भविष्य उज्ज्वल होगा।"

"य...ये सब आप क्या कह रहे हैं भैया?" रूपा कांपते स्वर में बोली। वो बेहद घबराई हुई नज़र आ रही थी। बार बार अपनी मां को भी देख रही थी वो।

"मैं एक ऐसा सच कह रहा हूं मेरी बहन।" रूपचंद्र ने दो टूक भाव से कहा____"जिसे ये लोग जानते तो हैं मगर हजम नहीं कर पा रहे हैं। झूठा मान गुमान अभी भी इनके अंदर घर बनाए बैठा हुआ है। इन्हें आज की वास्तविकता दिखती तो है लेकिन ये उसे मानने से इंकार कर रहे हैं। ख़ैर छोड़ो, सच तो ये है मेरी बहन कि ये परिवार और परिवार के ये सब लोग तेरे लायक हैं ही नहीं। तू तो चमकता हुआ एक नगीना है जिसे इस घर में नहीं बल्कि एक ऐसे घर में होना चाहिए जहां के लोग तेरी सच्चे दिल से क़दर करें। आज ललिता देवी ने जिस तरह अपनी बातों से तेरा दिल दुखाया है उससे मेरा भी मन दुखी हो गया है। मैंने फ़ैसला कर लिया है कि जहां मेरी बहन रहेगी वहीं मैं रहूंगा। सारी उमर तेरे के साथ रहूंगा और तेरा ख़याल रखूंगा। कल सुबह हम दोनों इस घर से हमेशा के लिए चले जाएंगे।"

"न....नहीं।" ललिता देवी भयभीत सी हो कर चीख पड़ीं। भाग कर वो रूपचंद्र के पास आईं और फिर रोते हुए बोलीं____"ये तू कैसी बातें कर रहा है बेटा? तू....तू अपनी मां को छोड़ के कैसे चला जाएगा यहां से? नहीं नहीं, मैं तुझे कहीं नहीं जाने दूंगी। मुझे माफ़ कर दे। पढ़ी लिखी नहीं हूं ना इस लिए मुझमें रत्ती भर का भी दिमाग़ नहीं है। तू मेरी बातों को भुला दे बेटा।"

"नहीं ललिता देवी।" रूपचंद्र ने सपाट लहजे में कहा____"जिस औरत के दिल में मेरी बहन के लिए कोई लगाव, कोई इज्ज़त और कोई क़दर नहीं उस औरत को मुझे बेटा कहने का कोई अधिकार नहीं है।"

"न...नहीं ऐसा मत बोल मेरे लाल।" ललिता देवी आहत भाव से बोलीं____"मैंने कहा न कि मुझसे भूल हो गई है। मेरा यकीन कर, अब से मैं किसी को कुछ नहीं कहूंगी।"

"कैसे यकीन करूं?" मैंने कहा____"अगर आपको अपनी भूल का एहसास हो गया होता तो इस वक्त आप मुझसे नहीं बल्कि मेरी बहन से माफ़ी मांगती और सच्चे दिल से अपनी बेटी को स्नेह और प्यार देते हुए उसे अपने कलेजे से लगा लेती। मगर नहीं, आपको तो सिर्फ अपने बेटे से मतलब है। आप नहीं चाहती कि आपका बेटा आपको और इस घर को छोड़ कर कहीं चला जाए। मतलब साफ है कि अभी भी आपको अपनी बेटी से और उसकी किसी बात से कोई मतलब नहीं है।"

"नहीं नहीं, ऐसी बात नहीं है रूप बेटा।" ललिता देवी हड़बड़ा कर बोलीं____"रूपा मेरी बेटी है और मैं उससे भी उतना ही प्यार करती हूं जितना कि तुझसे।"

"तो फिर साबित कीजिए।" रूपचंद्र ने कहा____"मुझे दिखाइए कि आप अपनी बेटी से कितना प्यार करती हैं और उसकी कितनी क़दर करती हैं।"

ललिता देवी अपने बेटे की बात सुन कर झट से रूपा के पास गई और उससे बोलीं____"मुझे माफ़ कर दे मेरी बच्ची। मैंने सच में तुझे हमेशा ग़लत ही समझा है। अपनी बातों से तेरा बहुत दिल दुखाया है मैंने। ईश्वर किसी बेटी को मेरे जैसी मां न दे।"

"नहीं मां।" रूपा बुरी तरह तड़प कर अपनी मां से लिपट गई, बोली____"ऐसा कभी मत कहना। मैं ईश्वर से यही प्रार्थना करती हूं कि मुझे हर जन्म में आप ही मां के रूप में मिलें।"

रूपा की ये बात सुन कर ललिता देवी की आंखें छलक पड़ीं। उन्होंने कस कर रूपा को अपने कलेजे से लगा लिया। कुछ दूरी पर खड़ा रूपचंद्र नम आंखों से ये अनोखा मंज़र देख रहा था। उसके चेहरे पर एक अलग ही तरह की खुशी की चमक दिखने लगी थी। एक ऐसा सुकून महसूस हो रहा था उसे जिससे उसे परम संतुष्टि सी हो गई थी। ऐसा लग रहा था जैसे उसने कोई बहुत बड़ा काम कर दिया था। इधर मां बेटी काफी देर तक एक दूसरे से लिपटी आंसू बहाती रहीं। फिर दोनों अलग हुईं और एक दूसरे के आंसू पोछने लगीं।

दरवाज़े के बाहर कुछ लोगों की मौजूदगी का रूपचंद्र को एहसास हुआ तो उसने पलट कर उस तरफ देखा। उसकी दोनों भाभियां और बहनें दरवाज़े की ओट में खड़ी थीं। उन सबकी आंखों में आंसू दिखाई दे रहे थे। उन्हें इस तरह खड़े देख एकाएक रूपचंद्र के चेहरे पर गुस्से के भाव उभर आए।

"क्या यहां पर कोई तमाशा हो रहा है जिसे आप सब यहां चुपचाप खड़ी देख रहीं हैं?" फिर उसने लगभग ऊंची आवाज़ में उनके क़रीब जा कर कहा____"दफा हो जाओ यहां से वरना मुझसे बुरा कोई नहीं होगा।"

रूपचंद्र गुस्से से दहाड़ा तो जहां एक तरफ दरवाज़े के बाहर खड़ी वो लोग बहुत ज़्यादा घबरा गईं वहीं दूसरी तरफ ललिता और रूपा ने चौंक कर रूपचंद्र की तरफ देखा।

"क...क्या हुआ बेटा?" फिर ललिता देवी ने फ़ौरन ही चिंतित भाव से उससे पूछा____"किसे दफा हो जाने को बोल रहा है तू और...और इतना गुस्से में क्यों नज़र आ रहा है तू?"

"गुस्से में नज़र ना आऊं तो क्या करूं?" उसने आवेश में आ कर कहा____"ये सब यहां खड़ी चुपचाप तमाशा देख रही हैं। ये वो लोग हैं मां जो कहने को तो इस घर की बहू बेटियां हैं लेकिन बहू बेटियों जैसा कोई काम नहीं किया है इन्होंने।"

"अरे! ये क्या बोले जा रहा है तू?" ललिता देवी के चेहरे पर आश्चर्य के भाव उभर आए____"तेरा दिमाग़ तो ठीक है ना? ये क्या अनाप शनाप बोले जा रहा है तू?"

"मैं अनाप शनाप नहीं बोल रहा मां।" रूपचंद्र ने कहा____"बल्कि इनकी सच्चाई बता रहा हूं। जैसे अब तक आप अपनी बेटी को दुश्मन की नज़र से देखती आ रहीं थी वैसे ही ये सब मेरी बहन को अपना सबसे बड़ा दुश्मन समझती रही हैं। इनमें से किसी ने भी रूपा से बात करना तो दूर उसकी तरफ देखना तक गवारा नहीं किया था। इतना कंजर तो कोई दुश्मन भी नहीं होता जितना कि ये सब हैं।"

रूपचंद्र की बातें सुन कर उन सबने शर्म से सिर झुका लिया। उन सबके चेहरों से साफ नज़र आ रहा था कि वो अपने किए पर शर्मिंदा हैं। इधर कमरे में पलंग पर बैठी रूपा अपने भाई को देखते हुए ये सोच कर खुशी से गदगद हुई जा रही थी कि उसके रूप भैया आज सबसे उसके ऊपर किए गए दुर्ब्यौहार का बदला ले रहे हैं और सबको खरी खोटी सुना रहे हैं। जाने क्यों इस सबसे रूपा को एक असीम सुख और शांति का आभास होने लगा था।

✮✮✮✮

भाभी मेरे पास आ कर मेरे बगल से ही कच्ची ज़मीन पर बैठ गईं थी। हम दोनों की आंखों के सामने लगभग तीन क़दम की दूरी पर अनुराधा की चिता थी जहां पर अब जली हुई राख तो थी किंतु वो भी चिता के चारो तरफ दूर दूर थोड़ा थोड़ा पड़ी हुई नज़र आती थी। ऐसा इस लिए क्योंकि चिता के बीच में गोबर से लीप दिया गया था। उसमें अब सूखे हुए कुछ फूल ही पड़े दिख रहे थे जो अब लगभग मुरझा गए थे। कुछ दिन पहले तक उसमें कुछ अनाज के दाने भी पड़े हुए दिखते थे किंतु चिड़ियों ने उन्हें चुग लिया था।

मैं हर रोज़ उसी चिता को अपलक देखते हुए बैठा रहता था और अपनी समझ में अपनी अनुराधा से बातें करता रहता था। जबकि सच तो यही था कि मैं खुद ही बड़बड़ाता रहता था। न वहां पर कोई मेरी बातें सुनता था और ना ही मेरी अनुराधा मेरी किसी बात का कभी कोई जवाब देती थी। जवाब तो वो तब दे जब वो वहां पर कहीं हो।

"आप मां के साथ गईं नहीं?" एकाएक जब मेरी नज़र भाभी पर पड़ी तो मैंने उनसे निर्विकार भाव से पूछा____"और...और यहां इस तरह क्यों बैठ गईं हैं? आप जाइए यहां से, मुझे अकेले में अपनी अनुराधा से अभी बहुत सारी बातें करनी है।"

"मुझे भी उससे ढेर सारी बातें करनी है।" भाभी ने एक नज़र मेरी तरफ देखने के बाद कहा____"आख़िर वो मेरी भी तो छोटी बहन थी। क्या तुम मुझे मेरी छोटी बहन से बातें नहीं करने दोगे?"

"ह...हां हां क्यों नहीं।" मैं एकदम से बोल पड़ा____"मुझे माफ़ कर दीजिए। आप सही कह रही हैं। आपको अपनी छोटी बहन से ज़रूर बात करनी चाहिए। आप उससे बात कीजिए भाभी। शायद वो आपको ही कोई जवाब दे, मुझे तो वो कोई जवाब ही नहीं देती है। पता नहीं क्यों इतना नाराज़ हो गई है मुझसे?"

कहने के साथ ही मेरी आवाज़ भर्रा गई और आंखों से आंसू छलक पड़े। भाभी ने मेरी तरफ देखा और फिर अपना एक हाथ मेरे पीछे से बढ़ा कर मेरा बाजू पकड़ते हुए खुद से छुपका लिया।

"वो तुमसे नाराज़ नहीं हुई है वैभव।" भाभी ने बड़े प्यार से समझाते हुए कहा____"बल्कि मैं तो ये कहूंगी कि वो तुमसे नाराज़ हो ही नहीं सकती। तुम उसे इतना प्रेम करते हो कि वो एक पल के लिए भी तुमसे नाराज़ नहीं हो सकती।"

"तो फिर वो मुझसे बात क्यों नहीं करती भाभी?" मैंने दुखी हो कर कहा____"उससे कहिए न कि एक बार मुझे अपनी आवाज़ सुना दे। सिर्फ एक बार, हां भाभी बस एक बार अपने मुख से मेरा नाम ले कर मुझे पुकारे। बदले में मैं भी उसे ठकुराईन कहूंगा। आपको पता है उसे मेरे मुंह से अपने लिए ठकुराईन सुनना बहुत अच्छा लगता था। आप उससे कहिए न कि वो मुझे एक बार अपनी आवाज़ सुना दे।"

मेरा इतना कहना था कि भाभी ने तड़प कर मुझे और भी ज़्यादा खुद से छुपका लिया। उनकी आंखों से आंसू छलक पड़े थे। अपनी रुलाई को बड़ी मुश्किल से रोका हुआ था उन्होंने।

"अगर ये संभव होता तो मैं ज़रूर उससे कहती वैभव।" फिर उन्होंने गंभीरता से कहा____"और वो भी ज़रूर अपनी आवाज़ तुम्हें सुनाती लेकिन ये तो ऐसी बातें हैं जो कभी संभव ही नहीं हो सकतीं। अगर ऐसा होता तो क्या मैं एक बार भी तुम्हारे भैया की आवाज़ न सुन पाती? आज भी अकेले में उन्हें आवाज़ देती हूं और उनसे फ़रियाद करती हूं कि सिर्फ एक बार मेरे ख़वाब में ही आ कर मुझे अपनी सूरत दिखा दें लेकिन वो कभी ऐसा नहीं करते। जानते हो वैभव वो ऐसा क्यों नहीं करते?"

"क..क्यों नहीं करते भाभी?" मैंने उनसे अलग हो कर उनकी तरफ देखा।

"क्योंकि वो बहुत दूर जा चुके हैं।" भाभी ने उसी गंभीरता से कहा____"एक ऐसी जगह जहां से मेरे ख़्वाबों में आने के लिए उन्हें कोई रास्ता ही नहीं दिखता।"

"क्या सच में?" मैंने हैरानी से उन्हें देखा____"पर ऐसा क्यों भाभी? उन्हें रास्ता क्यों नहीं दिखता?"

"ईश्वर ही जाने।" भाभी ने गहरी सांस ली____"या फिर ऐसा हो सकता है कि सच में कोई रास्ता ही न हो। अगर होता तो क्या वो कभी मेरे ख़्वाबों में नहीं आ जाते? आख़िर वो भी तो मुझसे बहुत प्रेम करते थे। तुम्हारी अनुराधा भी शायद ऐसी ही जगह चली गई है जहां से ना तो वो तुम्हें आवाज़ दे सकती है और ना ही शायद वो कभी तुम्हारे ख़्वाबों में आ सकती है लेकिन....।"

"लेकिन??" मैंने उलझन पूर्ण भाव से देखा उन्हें।

"लेकिन इसके बावजूद तुम उसे अपने बहुत पास महसूस कर सकते हो।" भाभी ने कहा____"तुम जिस जगह पर भी रहोगे वहां से भी उसे अपने पास ही महसूस कर सकते हो।"

"वो कैसे?" मैंने हैरानी से उनकी तरफ देखा।

"अपने दिल पर हाथ रख कर और आंखें बंद कर के जब भी उसका नाम लोगे तो वो तुम्हें अपनी मौजूदगी का आभास कराएगी।" भाभी ने रहस्यपूर्ण भाव से कहा____"तुम्हारे दिल की हर धड़कन में तुम्हें उसकी मौजूदगी का आभास होगा।"

भाभी ने इतना कहा ही था कि मैंने फ़ौरन ही अपना हाथ अपने दिल पर रख कर अपनी आंखें बंद कर ली। मन ही मन अनुराधा का नाम लिया और फिर उसे महसूस करने लगा। कुछ ही देर में मेरे होठों पर हल्की मुस्कान उभर आई। मुझे ऐसा प्रतीत हुआ जैसे सच में मेरी अनुराधा मेरे दिल की हर धड़कन में मौजूद है। बंद पलकों में अचानक उसका ऐसा अक्श उभर आया था जिसमें उसके चेहरे पर शर्म भी थी और मुस्कान भी। अपनी बन्द पलकों में अनुराधा को देख कर मेरी खुशी की कोई सीमा ना रही।

जाने कितनी ही देर तक मैं आंखें बंद किए और दिल पर अपना हाथ रखे बैठा रहा। मन कर रहा था कि अब यूं ही उमर भर आंखें बंद किए बैठा रहूं मगर तभी भाभी की आवाज़ से मैं उस खुशी रूपी समंदर से बाहर आ गया। आंखें खोल कर भाभी की तरफ देखा तो वो मुझे ही देख रहीं थी। एकाएक मुझे जाने क्या हुआ कि मैं लपक कर भाभी से लिपट गया।

"आपने बिल्कुल सच कहा था भाभी।" फिर मैं उनसे लिपटे हुए ही खुशी से बोल पड़ा____"मैंने सच में अपनी अनुराधा को महसूस किया और पता है....मैंने अनुराधा को भी देखा। वो मुझे देख के मुस्कुरा रही थी भाभी।"

"फिर तो ये अच्छी बात है ना?" भाभी ने मेरी पीठ पर प्यार से हाथ फेरते हुए कहा____"अब तुम जब चाहोगे तब अपनी अनुराधा को महसूस भी कर सकोगे और उसे देख भी सकोगे।"

"हां भाभी।" मैंने उनसे अलग हो कर बोला____"अब तो मैं हर रोज़ हर पल उसे महसूस करूंगा और देखूंगा भी।"

"ठीक है जैसी तुम्हारी इच्छा।" भाभी ने कहा____"अच्छा अब घर चलो। देखो शाम होने वाली है।"

"हां ठीक है।" मैं फ़ौरन उठ कर खड़ा हो गया।

भाभी ग़ौर से मुझे देख रहीं थी। शायद वो ये समझने की कोशिश कर रहीं थी कि अब मेरी मानसिक हालत कैसी है? मैं पहले की अपेक्षा थोड़ा बेहतर महसूस कर रहा था क्योंकि इतने दिनों बाद मैंने अपनी अनुराधा को महसूस किया था। इस लिए मुझे एक अलग ही खुशी का आभास हो रहा था। ख़ैर जल्दी ही मैं और भाभी मकान के पास आ गए।

मोटर साइकिल को स्टार्ट कर के मैंने भाभी को पीछे बैठाया और फिर चल पड़ा। ठंडी हवा चेहरे से टकराई तो एक अलग ही सुकून महसूस हुआ। रास्ते में भाभी मुझसे कई तरह की बातें करती रहीं। वो महसूस करना चाहती थीं कि मेरी हालत में कितना सुधार हुआ है। ख़ैर कुछ ही समय में हम दोनों हवेली पहुंच गए।
 
अध्याय - 117
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मोटर साइकिल को स्टार्ट कर के मैंने भाभी को पीछे बैठाया और फिर चल पड़ा। ठंडी हवा चेहरे से टकराई तो एक अलग ही सुकून महसूस हुआ। रास्ते में भाभी मुझसे कई तरह की बातें करती रहीं। वो महसूस करना चाहती थीं कि मेरी हालत में कितना सुधार हुआ है। ख़ैर कुछ ही समय में हम दोनों हवेली पहुंच गए।
अब आगे....


रात खा पी कर सुगंधा देवी जब अपने कमरे में पहुंचीं तो दादा ठाकुर को पलंग पर अधलेटी सी अवस्था में कुछ सोचते हुए पाया। सौभाग्य से आज बिजली गुल नहीं थी इस लिए कमरे में बल्ब का मध्यम प्रकाश था और साथ ही कमरे की छत पर लटक रहा पंखा भी मध्यम गति से चल रहा था।

सुगंधा देवी ने दरवाज़े को अंदर से कुंडी लगा कर बंद किया और फिर जा कर पलंग पर बैठ गईं। उनके आने की आहट से दादा ठाकुर सोचो के भंवर से बाहर आ गए थे किंतु चेहरे के भावों से यही प्रतीत हो रहा था जैसे अभी भी मन में कुछ चल रहा हो।

"क्या हुआ? सब ठीक तो है ना?" सुगंधा देवी ने उनके चेहरे को ग़ौर से देखते हुए पूछा____"ऐसा प्रतीत हो रहा है जैसे कुछ चल रहा है आपके मन में।"

"नहीं, ऐसी कोई ख़ास बात नहीं है।" दादा ठाकुर ने जैसे लापरवाही से कहा____"बस ऐसे ही मन में इधर उधर की बातें गूंज रहीं थी।"

सुगंधा देवी ने बड़े ध्यान से अपने पति परमेश्वर को देखा। पिछले तीस सालों से वो उनकी जीवन संगिनी बनी हुईं थी। इतना तो वो समझतीं ही थी कि दादा ठाकुर के चेहरे पर उभरने वाले भाव कौन सी कहानी बयां करते थे? ख़ैर उन्होंने उठ कर अपनी रेशमी साड़ी को अपने बदन से अलग किया और फिर उसे सलीके से तह कर के लकड़ी की आलमारी के पास दीवार में लगी लकड़ी की खूंटी पर टांग दिया। उसके बाद वो वापस पलंग की तरफ बढ़ चलीं। अब उनके बदन पर सिर्फ पेटीकोट और ब्लाउज था।

सुगंधा देवी का जिस्म इस उमर में भी ऐसा कसा हुआ और तंदुरुस्त था कि वो जवान औरतों को भी मात देती थीं। एकदम गोरा सफ्फाक़ बदन जिसमें कहीं कोई दाग़ नहीं था। उमर के चलते बदन में थोड़ा भराव ज़रूर हो गया था लेकिन उसे मोटापा हर्गिज़ नहीं कहा जा सकता था। ब्लाउज में कैद बड़ी बड़ी छातियां अभी भी जवान औरतों की तरह तनी हुईं थी। उसके नीचे हल्का निकला हुआ गोरा सफ्फाक़ पेट जिसके बीच में गहरी किंतु खूबसूरत नाभी थी।

दादा ठाकुर ने एक भरपूर नज़र उनके जिस्म पर डाली और फिर सुगंधा देवी की आंखों की तरफ देखा। सुगंधा देवी तब तक पलंग के पास पहुंच कर पलंग में बैठ चुकीं थी।

"ऐसे क्या देख रहे हैं?" दादा ठाकुर को अपलक अपनी तरफ देखता देख सुगंधा देवी के चेहरे पर सहसा लाज की सुर्खी उभर आई, फिर बोलीं____"इरादे तो नेक हैं ना आपके?"

"अभी तक तो नेक ही थे।" दादा ठाकुर पहले तो हड़बड़ाए फिर हल्के से मुस्कुरा कर बोले____"मगर लगता है आज आप हमें गुस्ताख़ी करने पर मजबूर कर देंगी।"

"तो इतनी देर से अकेले में यही सोचते बैठे रहे थे आप?" सुगंधा देवी आंखों में थोड़ा हैरत के भाव ला कर बोलीं____"हमें लगा था कोई गंभीर बात थी।"

"अरे! ऐसी बात नहीं है।" दादा ठाकुर ने जैसे ख़ुद को सम्हाला____"असल में अभी जब हमने आपको इस अवस्था में देखा तो बस यूं ही मज़ाक में कह दिया आपसे।"

"अच्छा जी मज़ाक में कहा है आपने?" सुगंधा देवी ने बनावटी हैरानी दिखाई____"हमें तो लगा था कि एक मुद्दत बाद आज किसी अन्य दिशा से सूर्य निकल आया है।"

"ऐसा क्यों कहती हैं आप?" दादा ठाकुर के माथे पर सहसा शिकन उभर आई।

"ख़ैर जाने दीजिए।" सुगंधा देवी ने बेचैनी से पहलू बदला____"वैसे सच सच बताइए इतनी देर से किन ख़यालों में खोए हुए थे आप?"

दादा ठाकुर फ़ौरन कुछ ना बोले। कुछ देर तक वो ध्यान से सुगंधा देवी के चेहरे पर मौजूद भावों को समझने की कोशिश करते रहे, फिर एक दीर्घ सांस लेने के बाद बोले____"हम असल में रागिनी बहू और वैभव के बारे में सोच रहे थे।"

"उन दोनों के बारे में??" सुगंधा देवी अनायास ही चौंकीं____"ये क्या कह रहे हैं आप?"

"आज शाम जब हम और किशोरी लाल जी बैठक में बैठे हुए थे।" दादा ठाकुर ने कहा____"उसी समय बाहर से रागिनी बहू और वैभव को आते देखा था। हम ये सोच कर थोड़ा चौंके थे कि जाते समय तो आप उसके साथ थीं तो वापसी में वो वैभव के साथ क्यों आई थी?"

"वो दरअसल बात ये है कि वापसी में हम अपने बेटे के पास गए थे।" सुगंधा देवी ने बताया____"सोचा था उसे भी अपने साथ ही हवेली ले आएंगे लेकिन उसने आने से इंकार कर दिया था। हमारे बहुत ज़ोर देने कर वो माना लेकिन कहने लगा वो बाद में आएगा। अब आपको तो पता ही है कि इस समय वो जिस तरह की हालत में है उसमें हम उस पर ज़्यादा ज़ोर ज़बरदस्ती अथवा दबाव नहीं डाल सकते। इस लिए हमने रागिनी से कहा कि चलो हम लोग चलते हैं तब रागिनी ने ही कहा कि वो भी वैभव के पास कुछ देर वहीं बैठेगी और फिर उसे ले कर ही हवेली आएगी। वैसे, उसको वैभव के साथ आया देख आप इतना सोच में क्यों पड़ गए थे? कहीं आपके मन में उसके चरित्र के प्रति कोई संदेह तो नहीं पैदा हो गया?"

"नहीं नहीं, ऐसा तो हम सोच भी नहीं सकते सुगंधा।" दादा ठाकुर ने झट से कहा____"उसके चरित्र पर संदेह करना पाप करने के समान है। हम तो उस वक्त उन दोनों को साथ देख कर कुछ और ही सोचने लगे थे।"

"क्या मतलब है आपका?" सुगंधा देवी जैसे उलझ सी गईं____"आप क्या सोचने लगे थे?"

"उन दोनों को देख कर हम गुरु जी द्वारा कही गई बातें सोचने लगे थे।" दादा ठाकुर ने कहा____"उनके अनुसार हमारे बेटे के जीवन में ऐसी दो औरतों का योग था जो उसकी पत्नी बनेंगी। अनुराधा की हत्या हो जाने से पहले तक हम यही सोच रहे थे कि उसके जीवन में उसकी पत्नी के रूप में जो दो औरतें आएंगी वो रूपा और अनुराधा ही होंगी। ये अलग बात है कि हम अपनी बहू रागिनी को हमेशा खुश देखने और उसके जैसी बहू की चाहत में उसका ब्याह भी वैभव से कर देने की सोच रहे थे। अब जबकि उस मासूम लड़की अनुराधा की मौत हो चुकी है तो अनायास ही हम ये सोचने लगे थे कि कहीं वो दूसरी औरत हमारी बहू रागिनी तो नहीं थी?"

सुगंधा देवी के मनो मस्तिष्क में एकाएक जैसे धमाका सा हुआ। पलक झपकते ही उनके ज़हन में भी ये बात बैठती चली गई। चेहरे पर हैरत के भाव लिए वो दादा ठाकुर को देखने लगीं।

"अरे! हां ये तो सही कह रहे हैं आप।" फिर उन्होंने उसी हैरत के साथ कहा____"अभी तक ये बात हमारे मन में आई ही नहीं थी। आती भी कैसे? हालात ही ऐसे बने हुए हैं कि इस तरफ हमारा ध्यान ही नहीं गया।"

"यानि अब आप भी इस बात को मानती हैं कि जिन दो औरतों की बात गुरु जी ने कही थी उनमें से एक रूपा है तो दूसरी हमारी बहू रागिनी है।" दादा ठाकुर के चेहरे पर अजीब से भाव थे।

"निःसंदेह।" सुगंधा देवी ने सिर हिलाया____"अब तो यही लग रहा है ठाकुर साहब और शायद इसी लिए उन्होंने ये भी कहा था कि अगर हम चाहते हैं कि रागिनी बहू हमेशा के लिए हमारे पास ही बहू के रूप में रहे तो हम उसकी शादी वैभव से कर दें।"

"बिल्कुल ठीक कहा आपने।" दादा ठाकुर ने उत्साहित भाव से कहा____"हालाकि ज़ाहिर तौर पर उन्होंने दो औरतों में रागिनी की बात नहीं कही थी। यानि कहीं न कहीं उन्हें भी इस बात का अंदेशा था कि इस तरह की कोई घटना घटेगी और फिर अंततः रागिनी उन दो औरतों की गिनती में आ जाएगी।"

"इसका मतलब तो ये भी हुआ कि उन्हें अनुराधा की हत्या वाली घटना होने का पहले से ही अंदेशा था।" सुगंधा देवी ने सोच पूर्ण भाव से कहा____"और बताया इस लिए नहीं क्योंकि उनके अनुसार वो विधि के विधान में कोई हस्ताक्षेप नहीं करना चाहते थे?"

"हां शायद यही बात हो सकती है।" दादा ठाकुर ने सिर हिलाया____"सिद्ध पुरुष लोग कभी भी दैवी विधान पर कोई बाधा उत्पन्न नहीं करते।"

"तो अब क्या सोचा है आपने?" सुगंधा देवी ने सहसा गहरी सांस ले कर पूछा।

"उन दोनों को साथ में आया देख हम यही सब सोचने लगे थे।" दादा ठाकुर ने कहा____"ख़ैर हमने फ़ैसला कर लिया है कि अब हम जल्द से जल्द इस बारे में समधी जी से बात करेंगे।"

"वो तो ठीक है ठाकुर साहब।" सुगंधा देवी ने कहा____"लेकिन हमें लगता है कि इस मामले में अभी हमें ज़ल्दबाज़ी नहीं करनी चाहिए। हमारा मतलब है कि अभी तो हमारा बेटा भी ऐसी मानसिक हालत में नहीं है कि वो ये सब ठंडे दिमाग़ से सुन सके या इस पर विचार कर सके।"

"उसका दिमाग़ ठंडा करने का भी इंतज़ाम हो गया है ठकुराईन।" दादा ठाकुर के होठों पर सहसा रहस्यपूर्ण मुस्कान उभर आई____"और वो इंतज़ाम ऐसा है कि अब हमें वैभव की ऐसी मानसिक हालत की कोई चिंता ही नहीं रही।"

"बड़ी हैरतअंगेज बातें कर रहे हैं आप?" सुगंधा देवी एकाएक चकित भाव से बोलीं____"आख़िर ऐसा क्या हो गया है जिसके चलते आप हमारे बेटे के लिए एकदम से निश्चिंत हो गए हैं?"

"असल में साहूकार गौरी शंकर हमसे मिलने आया था।" दादा ठाकुर ने कहा____"वो भी अपने होने वाले दामाद की ऐसी मानसिक हालत के लिए चिंतित था। ख़ैर अपने दामाद को इस स्थिति से बाहर निकालने का उसने हमें एक ऐसा अद्भुत उपाय बताया जिसे सुन कर हम चकित रह गए थे।"

"ऐसा कौन सा उपाय बताया था उसने?" सुगंधा देवी और भी ज़्यादा चकित नज़र आईं।

उनके पूछने पर दादा ठाकुर ने उन्हें गौरी शंकर की सारी बातें बता दी। जिसे सुन कर सुगंधा देवी बहुत ज़्यादा हैरान हुईं। कुछ देर तक वो जाने क्या सोचती रहीं।

"बड़ी ही दिलचस्प बात है ये।" फिर उन्होंने गहरी सांस लेते हुए कहा____"हमें तो यकीन ही नहीं हो रहा कि गौरी शंकर इस मामले में इतनी बड़ी बात सोच सकता है और उस पर अमल भी कर सकता है। ख़ैर तो आपने क्या जवाब दिया उसे?"

"अब क्योंकि ये उसका ही सुझाव था और इसमें कोई बुराई भी नहीं थी तो हमने फ़ौरन ही उसे मंजूरी दे दी।" दादा ठाकुर ने कहा____"आख़िर हम भी तो यही चाहते हैं कि हमारा बेटा जल्द से जल्द इस मानसिक अवस्था से बाहर निकल आए और फिर वो उसी तरह अपनी ज़िम्मेदारियां निभाने लगे जैसे इसके पहले वो निभा रहा था।"

"क्या आपको लगता है कि गौरी शंकर की भतीजी हमारे बेटे को उसकी ऐसी मानसिक हालत से निकालने में कामयाब होगी?" सुगंधा देवी ने कहा____"सीधी सी बात है कि जब वो लड़की इसके पहले अपना सब कुछ सौंप कर भी हमारे बेटे के दिल में अपने प्रति प्रेम की भावना नहीं जगा सकी थी तो क्या अब वो ऐसे हालात में ऐसा कुछ कर पाएगी?"

"आपकी बात अपनी जगह सही हैं।" दादा ठाकुर ने कहा____"लेकिन ज़रूरी नहीं कि जो पहले नहीं हो सका वो कभी नहीं हो पाएगा। आप भी जानती हैं कि पहले में और अब में बहुत फ़र्क आ चुका है। पहले आपका बेटा क्या था और अब क्या बन गया है। इसी आधार पर हम ये बात इतने यकीन के साथ कह रहे हैं कि जो पहले नहीं हो सका वो अब ज़रूर होगा। वैसे भी पहले तो उस लड़की में बहुत सी पाबंदियां थी जबकि अब ऐसा नहीं है। वो अपने होने वाले पति की बेहतरी के लिए पूरी आज़ादी से कुछ भी करेगी।"

"शायद आप ठीक कह रहे हैं।" सुगंधा देवी ने सिर हिलाया____"ख़ैर ये सब तो ठीक है लेकिन अब हमारी बहू का क्या? हमारा मतलब है कि उसे इस बात के लिए कैसे राज़ी किया जाए कि वो अपने ही देवर से ब्याह कर ले?"

"हां ये ज़रूर सोचने का विषय है अब।" दादा ठाकुर ने गहरी सांस ली____"ये आसान नहीं होगा लेकिन अगर गुरु जी की बातों को सच मान कर चलें तो संभव है कि उसे राज़ी करने में हमें इतनी मुश्किल भी न आए। ख़ैर, फिलहाल तो इस बारे में हम सबसे पहले समधी साहब से बात करेंगे। उनकी रज़ामंदी के बाद ही सोचेंगे कि उसे कैसे राज़ी किया जाए?"

कुछ देर और इसी संबंध में बातें हुईं फिर दोनों ही चादर ओढ़ कर लेट गए। दोनों का ज़हन जाने कैसे कैसे विचारों में उलझा हुआ था और फिर जाने कब नींद ने उन्हें अपनी आगोश में ले लिया।

✮✮✮✮

सुबह हुई।
साहूकार गौरी शंकर के घर में काफी चहल पहल थी। सब हंसी खुशी जल्दी जल्दी अपने अपने कामों में लगे हुए थे। आज काफी समय बाद इस घर के लोगों के चेहरों पर खुशी की चमक नज़र आ रही थी। आज से पहले जिस लड़की से कोई बात करना तो दूर उसकी तरफ देखना तक गवारा नहीं करता था आज सब उसे अपनी पलकों पर लिए हुए थे।

रूपा के कमरे का आलम ही अलग था। ऐसा लग रहा था जैसे आज उसकी वैसे ही विदाई की तैयारियां हो रहीं थी जैसे ब्याह के बाद होती हैं। रूपा से उमर में जो बड़ी बहनें थी वो उसे खुशी खुशी सजाने के लिए आईं थी। उसकी दोनों भाभियां भी थीं। सब की सब उसे छेड़े जा रहीं थी। ऐसी ऐसी बातें बोल कर हंसने लगतीं थी कि रूपा बेचारी शर्म से पानी पानी हो जाती थी। कमरे के दरवाज़े की ओट में खड़ी उसकी मां ललिता देवी नम आंखों से अपनी बेटी की खुशी और उसका शर्म से पानी पानी होना देख रही थी। सहसा जाने क्या सोच कर उसकी एक आंख से आंसू का एक कतरा छलक पड़ा और गोरे गाल से होते हुए नीचे ज़मीन पर जा गिरा। उसने हड़बड़ा कर अपने आंसू पोछे और फिर पलट कर बाहर चली गई।

कुछ देर में फूलवती कमरे में दाख़िल हुई। उसने जब सबको इस तरह से रूपा को छेड़ते देखा तो झूठा गुस्सा दिखाते हुए सबको डांटना शुरू कर दिया। उसकी डांट सुन कर सब चुप हो गईं। फूलवती इस परिवार की थोड़ी सख़्त महिला थीं जिनके सामने बाकी औरतें और लड़कियां कम ही बोलती थीं। बहरहाल फूलवती ने सबको डांटते हुए कहा कि वो रूपा को सामान्य तरीके से ही तैयार करें। क्योंकि वो अभी सचमुच की दुल्हन बन कर नहीं जा रही है बल्कि एक ज़रूरी काम से जा रही है।

फूलवती की इन बातों से सभी लड़कियों का और दोनों भाभियों का चेहरा उतर गया। उनकी इच्छा यही थी कि वो सब रूपा को किसी दुल्हन की तरह तैयार कर के ही विदा करें। ख़ैर जल्दी ही सबको ये समझ आ गया कि सच में रूपा को दुल्हन की तरह नहीं सजाना चाहिए।

कुछ ही देर में सबने रूपा को सामान्य तरीके से तैयार कर दिया। एक थैले में उसकी ज़रूरत के हिसाब से कपड़े डाल दिए और वो सब सामान भी जो लड़कियां प्रयोग करती हैं।

सुबह के आठ बज रहे थे। ललिता देवी ने अपने हाथों से और बड़े प्यार से अपनी बेटी रूपा को खाना खिलाया। रूपा खाना कम खा रही थी रो ज़्यादा रही थी। आज काफी समय के बाद उसे अपनी मां का इतना स्नेह और प्यार मिल रहा था। अपनी बेटी को यूं आंसू बहाते देख ललिता देवी की भी आंखें बरस रहीं थी। ये सोच कर कि उसने इतने समय तक अपनी बेटी का कितनी कठोरता से दिल दुखाया था। ख़ैर किसी तरह रूपा ने खाना खाया। सब उसको घेरे हुए थीं।

रूपचंद्र बैठक में गौरी शंकर के पास बैठा हुआ था। रेखा ने आ कर उससे कहा कि रूपा अब जाने को तैयार है तो वो उठ कर अंदर की तरफ चल पड़ा। जल्दी ही वो अंदर आंगन में पहुंच गया। उसकी नज़र रूपा पर पड़ी। आज उसे अपनी बहन अलग ही नज़र आ रही थी। जब हर तरफ से इंसान को प्यार और खुशी मिलती है तो चेहरा अलग ही नज़र आने लगता है। रूपा के अलग नज़र आने का यही कारण था। अचानक ही रूपा को कुछ याद आया तो वो एकदम से उस तरफ बढ़ चली जिस तरफ परिवार के सबसे बुजुर्ग व्यक्ति का कमरा था, यानि चंद्रमणि का।

"दादू, देखिए रूपा दीदी आपसे मिलने आई हैं।" शिव शंकर की दूसरी बेटी मोहिनी ने पलंग पर पड़े चंद्रमणि को आवाज़ लगाते हुए कहा।

चंद्रमणि के कमज़ोर जिस्म में हलचल हुई। वो करवट लिए लेटा हुआ था। आवाज़ सुन कर वो धीरे से पलटा तो एकाएक उसकी निगाह उसकी दो नातिनों पर पड़ी।

"मैं जा रही हूं दादू।" रूपा ने सहसा आगे बढ़ कर चंद्रमणि के क़रीब आ कर भारी गले से कहा____"आप अपना ख़याल रखिएगा।"

"अ..अरे! कहां जा रही है मेरी बच्ची?" चंद्रमणि ने अपनी कमज़ोर आवाज़ में पूछा।

रूपा को समझ न आया कि वो क्या जवाब दे? उसे एकाएक शर्म महसूस होने लगी। मोहिनी उसे चुप देख हल्के से मुस्कुराई फिर आगे बढ़ कर उसने चंद्रमणि को संक्षेप में सब कुछ बता दिया। सच जान कर चंद्रमणि के चेहरे पर हैरानी के भाव उभर आए। कुछ देर वो जाने क्या सोचता रहा फिर सहसा उसके चेहरे पर खुशी की चमक उभर आई। कमज़ोर आंखों में एकाएक आंसू तैरते नज़र आए।

"ई..ईश्वर मेरी बच्ची को सदा खुश रखे।" फिर उसने कांपते स्वर में कहा____"भगवान तेरा कल्याण करे बेटी। अब तू ही इस परिवार की डूबती नैया को बचा सकती है। तेरे ही हाथों इस परिवार के लोगों का भला निहित है।"

"ये आप क्या कह रहे हैं दादू?" रूपा का गला रुंध गया।

"त...तुझे क्या लगता है मुझ बूढ़े को कुछ पता नहीं है?" चंद्रमणि के सूखे होठों पर सहसा मुस्कान उभरी____"अरे! मैं सब जानता हूं मेरी बच्ची। मैं जानता हूं कि तू दादा ठाकुर के बेटे से प्रेम करती है और....और मैं ये भी जानता हूं कि इसके लिए इन सबने तुझे बहुत बुरा भला कहा होगा। तुझे बहुत कष्ट दिए होंगे इन कंजरों ने। अपनी औलाद को अच्छी तरह जानता हूं मैं। आज अगर तू इस उद्देश्य से जा रही है तो मैं समझ गया हूं कि इन लोगों ने तुझे अपना झूठा प्यार दिखा कर ही जाने की अनुमति दी होगी।"

"द...दादू।" रूपा से सहन न हुआ तो वो झपट कर चंद्रमणि से लिपट गई और फूट फूट कर रो पड़ी।

चंद्रमणि ने उसके सिर पर बड़े स्नेह से हाथ फेरा और फिर अपनी कमज़ोर आवाज़ में कहा____"तेरा इस तरह से बिलख बिलख कर रोना बता रहा है कि मैंने जो कहा वो सच है। पत्थर दिल वाले तुझे समझ नहीं सके मेरी बच्ची लेकिन...लेकिन मैं समझता हूं तुझे। मैं समझता हूं कि ईश्वर क्या खेल खेलना चाहता था। ख़ैर तू रो मत मेरी बहादुर बच्ची। तेरे दादू का आशीर्वाद और दुआएं मेरे मरने के बाद भी हमेशा तेरे साथ रहेंगी। तू जा....खुशी खुशी जा। ऊपर वाला तुझे हर पथ पर कामयाब करे और हमेशा खुशियां दे।"

दरवाज़े के पास घर का हर सदस्य खड़ा बातें सुन रहा था और ये सोच कर खुद को कोस रहा था कि अब से पहले क्यों उन लोगों ने रूपा को इतना दुख दिया और उसे नहीं समझा? बहरहाल, रूपा अपने दादू का आशीर्वाद और उनकी दुआएं ले कर बाहर निकली।

एक एक कर के वो सबसे मिली और फिर रूपचंद्र के पीछे पीछे घर से बाहर की तरफ बढ़ चली। सचमुच ऐसा प्रतीत हो रहा था जैसे वो अपने ससुराल जा रही है। फ़र्क सिर्फ़ इतना ही था कि बेटी जब पहली बार विदा होती है तो वो हद से ज़्यादा रोती है और अपने रुदन से हर व्यक्ति को रुला देती है लेकिन यहां फिलहाल रुदन जैसा माहौल नहीं था। जल्दी ही सब बाहर चौगान में आ गए।

रूपचंद्र अपनी बहन का थैला जीप में रख कर जीप की स्टेयरिंग सम्हाले बैठ गया था। रूपा सबसे मिलने के बाद चुपचाप आ कर जीप में रूपचंद्र के बगल से बैठ गई।

"बेटा, उस मकान को अच्छे से देख लेना।" फूलवती ने रूपचंद्र से कहा____"और जिस किसी भी चीज़ की वहां कमी दिखे तो उसे दूर कर देना।"

"फ़िक्र मत कीजिए बड़ी मां।" रूपचंद्र ने कहा____"मेरे रहते मेरी बहन को किसी भी चीज़ की ना तो कमी होगी और ना ही कोई बाधा आएगी।"

कहने के साथ ही रूपचंद्र ने मन ही मन ईश्वर का नाम लिया और फिर जीप को आगे बढ़ा दिया। पीछे खड़े हर व्यक्ति ने मन ही मन ऊपर वाले को याद कर के सब कुछ अच्छा करने और होने की प्रार्थना की।

सारे रास्ते रूपचंद्र अपने बगल से सोचो में गुम बैठी अपनी बहन को ये समझाता रहा कि वो किसी बात की चिंता न करे। सब कुछ अच्छा ही होगा और ऊपर वाला कभी भी उसके सच्चे प्रेम का निरादर नहीं होने देगा। रूपचंद्र की बातें रूपा के मानस पटल पर टकरा तो ज़रूर रहीं थी लेकिन वो कुछ बोल नहीं रही थी। उसके मन में तो बस यही चल रहा था कि क्या कभी कहीं ऐसा हुआ होगा जो आज उसके साथ होने जा रहा था? क्या किसी के घर वालों ने बिना ब्याहे अपनी बेटी अथवा बहन को इस तरह से विदा किया होगा? क्या किसी लड़की को इस तरह से अपने प्रेम के चलते ऐसा कुछ करना पड़ा होगा?

रूपा ऐसे न जाने कितने ही सवालों के भंवर में उलझी हुई थी। उसे पता ही न चला कि कब रास्ता गुज़र गया और मंज़िल आ गई। जीप के रुकने पर जब रूपचंद्र ने उसे पुकारा तभी वो वर्तमान में आई। उसने चौंक कर इधर उधर देखा तब उसे एहसास हुआ कि वो उस जगह पहुंच गई है जहां पर रह कर उसे अपने होने वाले पति की मानसिक हालत को सुधार कर उसे सामान्य हालत में लाना था। एकाएक उसके ज़हन में कई सवाल चकरा उठे____'क्या वो ऐसा कर पाएगी? क्या उसका यहां पर रहना वैभव को क़बूल होगा? क्या वैभव को ये पसंद आएगा कि वो उसे उसकी मानसिक हालत से बाहर निकालने का प्रयास करे?'

"क्या हुआ?" जीप से उतर कर जब रूपचंद्र ने रूपा को वैसे ही बैठे देखा तो पूछा____"क्या सोच रही है? अरे! अब कुछ मत सोच पागल। चल आ, बेवजह फालतू की बातें सोच कर खुद को हल्कान मत कर।"

रूपा ख़ामोशी से नीचे उतरी। तब तक रूपचंद्र ने जीप से उसका थैला निकाल कर अपने हाथ में ले लिया था। उधर मकान के बाहर किसी जीप के आने की आहट सुन मकान के अंदर मौजूद कुछ ऐसे लोग बाहर निकल आए जो मकान की रखवाली करते थे। बाहर रूपचंद्र और एक लड़की को देख उन सबके चेहरों पर चौंकने वाले भाव उभर आए।

रूपचंद्र जानता था कि उन लोगों को कुछ पता नहीं है इस लिए उसने सीधे सीधे भुवन के बारे में पूछा तो उनमें से एक ने बताया कि भुवन तो छोटे कुंवर के खेतों पर होगा। यूं तो रूपचंद्र को सब पहचानते थे और ये भी जानते थे कि मौजूदा समय में रूपचंद्र से उनके छोटे कुंवर के बेहतर संबंध हैं। बहरहाल रूपचंद्र ने उन सबको बताया कि अब से यहां पर वैभव और उसकी होने वाली पत्नी यानि रूपा इसी मकान में रहेंगे। अतः जल्द से जल्द मकान की साफ सफाई शुरू करवाओ।

पहले तो उन सबको बड़ी हैरानी हुई लेकिन फिर जल्दी ही वो लोग मकान की साफ सफाई में लग गए। इधर रूपा चुपचाप खड़ी इधर उधर देख रही थी। तभी सहसा उसकी घूमती हुई निगाह उस जगह पर जा कर ठहर गई जिस जगह पर अनुराधा का अंतिम संस्कार किया गया था। यहां से भी वो जगह साफ नज़र आ रही थी। रूपा के जिस्म में झुरझुरी सी हुई और फिर वो इस तरह उस तरफ बढ़ चली जैसे कोई अज्ञात ताक़त उसे अपनी तरफ खींचने लगी हो।​
 
अध्याय - 118
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सुबह का वक्त था।
नाश्ता वगैरह करने के बाद मैं अपना एक थैला ले कर हवेली से बाहर जाने के लिए निकला तो बैठक से पिता जी ने आवाज़ दे कर बुला लिया मुझे। मजबूरन मुझे बैठक कक्ष में जाना ही पड़ा। मेरे दिलो दिमाग़ में अभी भी अनुराधा का ही ख़याल था।

"बैठो, तुमसे कुछ ज़रूरी बात करनी है।" पिता जी ने सामान्य भाव से कहा तो मैं एक नज़र किशोरी लाल पर डालने के बाद वहीं रखी एक कुर्सी पर चुपचाप बैठ गया।

"देखो बेटे।" पिता जी ने थोड़ा गंभीर हो कर बहुत ही प्रेम भाव से कहा____"हम जानते हैं कि इस समय तुम्हारी मानसिक स्थिति ठीक नहीं है। सच कहें तो उस लड़की की इस तरह हुई मौत से हमें भी बहुत धक्का लगा है और मन दुखी है। हम अच्छी तरह जानते हैं कि वो लड़की तुम्हारे लिए बहुत मायने रखती थी और वो तुम्हारे जीवन का एक अभिन्न अंग बनने वाली थी लेकिन नियति में शायद तुम दोनों का साथ बस इतना ही लिखा था। हम तुमसे ये नहीं कहेंगे कि तुम उसे भूल जाओ क्योंकि हम अच्छी तरह समझते हैं कि ऐसा तुम्हारे लिए संभव नहीं है। हमने अपने बांह के भाई और अपने बेटे को खोया तो उन दोनों को भुला देना हमारे लिए भी संभव नहीं रहा है। लेकिन बेटे, ये भी सच है कि हमें होनी और अनहोनी को क़बूल करना पड़ता है। हालातों से समझौता करना पड़ता है। ऐसा इस लिए क्योंकि हमें जीवन में आगे बढ़ना होता है। खुद से ज़्यादा अपनों की खुशी के लिए, अपनों की बेहतरी के लिए। ये आसान तो नहीं होता लेकिन फिर भी मन मार कर ऐसा करना ही पड़ता है। शायद इसी लिए जीवन जीना आसान नहीं होता।"

मैं ख़ामोशी से पिता जी की बातें सुन रहा था। उधर वो इतना सब बोल कर चुप हुए और मेरी तरफ ध्यान से देखने लगे। किशोरी लाल की नज़रें भी मुझ पर ही जमी हुईं थी।

"ख़ैर, हम तुम्हें किसी भी बात के लिए मजबूर नहीं करेंगे।" सहसा पिता जी ने गहरी सांस ले कर पुनः कहा____"लेकिन हां, हम ये उम्मीद ज़रूर करते हैं कि तुम हमारी इन बातों को समझोगे और हालातों को भी समझने का प्रयास करोगे। इतना तो तुम भी जानते हो कि इस परिवार में अब तुम ही हो जिसे सब कुछ सम्हालना है। तुम्हें एक अच्छा इंसान बनना है। सबके बारे में अच्छा सोचना है और सबका भला करना है। जब कोई अच्छा इंसान बनने की राह पर चल पड़ता है तो उसे सबसे ज़्यादा दूसरों के हितों की चिंता रहती है। उसे अपने सुखों का और अपने हितों का त्याग भी करना पड़ता है। जब तुम सच्चे दिल से ऐसा करोगे तभी लोग तुम्हें देवता की तरह पूजेंगे। ख़ैर ये तो बाद की बातें है लेकिन मौजूदा समय में फिलहाल तुम्हें अपनी इस मानसिक स्थिति से बाहर निकलने की कोशिश करनी है।"

"जी मैं कोशिश करूंगा।" मैं धीमी आवाज़ में बस इतना ही कह सका।

"बहुत बढ़िया।" पिता जी ने कहा____"जैसा कि हमने कहा हम तुम्हें किसी भी बात के लिए मजबूर नहीं करेंगे इस लिए अगर तुम अपने उस नए मकान में ही कुछ समय तक रहना चाहते तो वहीं रहो, हमें कोई एतराज़ नहीं है।"

"हां मैं फिलहाल वहीं रहना चाहता हूं।" मैं पिता जी की बात से अंदर ही अंदर ये सोच कर खुश हो गया था कि अब मैं बिना किसी विघ्न बाधा के अपनी अनुराधा के पास ही रहूंगा।

"ठीक है।" पिता जी ने ध्यान से मेरी तरफ देखते हुए कहा____"तो अब जब तक तुम्हारा मन करे वहीं रहो। हम तुम्हारे लिए ज़रूरत का कुछ सामान शेरा के द्वारा भिजवा देंगे। एक बात और, वहां पर अगर तुम्हारे साथ कोई और भी रहना चाहे तो तुम उसे मना मत करना।"

"क...क्या मतलब??" मैं एकदम से चौंका।

"जब तुम वहां पहुंचोगे तो खुद ही समझ जाओगे।" पिता जी ने अजीब भाव से कहा____"ख़ैर अब तुम जाओ। हमें भी एक ज़रूरी काम से कहीं जाना है।"

मन में कई तरह की बातें सोचते हुए मैं बैठक कक्ष से बाहर आ गया। जल्दी ही मोटर साईकिल में बैठा मैं खुशी मन से अपनी अनुराधा के पास पहुंचने के लिए उड़ा चला जा रहा था। इस बात से बेख़बर कि वहां पर मुझे कोई और भी मिलने वाला है।

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"आपको क्या लगता है किशोरी लाल जी?" दादा ठाकुर ने वैभव के जाते ही किशोरी लाल की तरफ देखते हुए पूछा____"इससे कोई बेहतर नतीजा निकलेगा?"

"उम्मीद पर ही दुनिया क़ायम है ठाकुर साहब।" किशोरी लाल ने कहा____"यकीन तो है कि छोटे कुंवर पर जल्दी ही बेहतर असर दिखेगा। वैसे गौरी शंकर जी ने बहुत ही दुस्साहस भरा और हैरतअंगेज काम किया है। मेरा मतलब है कि छोटे कुंवर को इस हालत से बाहर निकालने के लिए उन्होंने अपनी भतीजी को इस तरह से काम पर लगा दिया।"

"इसे काम पर लगाना नहीं कहते किशोरी लाल जी।" दादा ठाकुर ने गहरी सांस ली____"बल्कि किसी अपने के प्रति सच्चे दिल से चिंता करना कहते हैं। हम मानते हैं कि उसने बड़ा ही अविश्वसनीय क़दम उठाया है और लोगों के कुछ भी कहने की कोई परवाह नहीं की है लेकिन ये भी सच है कि ऐसा उसने प्रेमवश ही किया है। हमें आश्चर्य ज़रूर हो रहा है लेकिन साथ ही हमें उनकी सोच और नेक नीयती पर गर्व का भी आभास हो रहा है। ख़ास कर उस लड़की के प्रति जिसने अपने हर कार्य से ये साबित किया है कि वो वास्तव में हमारे बेटे से किस हद तक प्रेम करती है।"

"सही कह रहे हैं आप।" किशोरी लाल ने कहा____"वो लड़की सच में बड़ी अद्भुत है। मुझे तो ये सोच के हैरानी होती है कि जिस परिवार के लोगों की मानसिकता कुछ समय पहले तक इतने निम्न स्तर की थी उस परिवार में ऐसी नेक दिल लड़की कैसे पैदा गई?"

"कमल का फूल हमेशा कीचड़ में ही जन्म लेता है किशोरी लाल जी।" दादा ठाकुर ने कहा____"और अपने ऐसे वजूद से समस्त सृष्टि को एक उदाहरण प्रस्तुत करता है। ख़ैर, अब तो ये देखना है कि वैभव अपने साथ उस लड़की को उस मकान में रहने देगा अथवा नहीं? और अगर रहने देगा तो वो लड़की किस तरीके से तथा कितना जल्दी हमारे बेटे की हालत में सुधार लाती है?"

"मैं तो ऊपर वाले से यही प्राथना करता हूं ठाकुर साहब कि जल्द से जल्द सब कुछ ठीक हो जाए।" किशोरी लाल ने कहा____"छोटे कुंवर का जल्द से जल्द बेहतर होना बहुत ज़रूरी है।"

"सही कहा।" दादा ठाकुर ने कहा____"ख़ैर चलिए हमें देर हो रही है।"

दादा ठाकुर कहने के साथ ही अपने सिंहासन से उठ गए तो किशोरी लाल भी अपनी कुर्सी से उठ कर खड़ा हो गया। कुछ ही देर में वो दोनों जीप में बैठ गए। दादा ठाकुर के हुकुम पर स्टेयरिंग सम्हाले बैठे हीरा लाल नाम के ड्राइवर ने जीप को आगे बढ़ा दिया।

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कुछ ही समय में मकान की बहुत अच्छे से साफ सफाई हो गई। रूपचंद्र ने जा कर मकान के अंदर का अच्छे से मुआयना किया और फिर संतुष्ट हो कर अपनी बहन का थैला एक कमरे में रख दिया। कमरा पूरी तरह खाली था। मकान ज़रूर बन गया था लेकिन उसमें चारपाई अथवा पलंग वगैरह नहीं रखा गया था। मकान के बाहर वाले हाल में लकड़ी की एक दो कुर्सियां और टेबल ज़रूर थीं जो चौकीदारी करने वाले लोग उपयोग कर रहे थे। रूपचंद्र के मन में इसी से संबंधित कुछ विचार उभर रहे थे जिसके लिए वो कोई विचार कर रहा था।

बाहर आ कर रूपचंद्र आस पास का मुआयना करने लगा। मकान के बाहर चारो तरफ की ज़मीन काफी अच्छे से साफ कर दी गई थी। कुछ ही दूरी पर एक कुआं था जिसके चारो तरफ पत्थरों की पक्की जगत बनाई गई थी और साथ ही उसमें लोहे के दो सरिए दोनों तरफ लगे हुए थे जिनके ऊपरी सिरों पर छड़ लगा कर उसमें लकड़ी की एक गोल गड़ारी फंसी हुई दिख रही थी। उसी गड़ारी में रस्सी फंसा कर नीचे कुएं से बाल्टी द्वारा पानी ऊपर खींचा जाता था।

कुएं के चारो तरफ गोलाकार आकृति में पत्थर की बड़ी बड़ी पट्टियां लगा कर उसे पक्के मशाले से जोड़ कर ज़मीन से करीब घुटने तक ऊंची पट्टी बनाई गई थी। उस पट्टी में बैठ कर बड़े आराम से नहाया जा सकता था या फिर कपड़े वगैरा धोए जा सकते थे। ख़ास बात यह थी कि इस तरह का कुआं रुद्रपुर गांव में भी नहीं था जो आधुनिकता का जीवंत प्रमाण लग रहा था। वैभव ने कुएं की इस तरह की बनावट कहीं देखी थी इस लिए उसने मिस्त्री से वैसा ही पक्का कुआं बनाने का निर्देश दिया था। रूपचंद्र उस कुएं को बड़े ध्यान से देख रहा था। ज़ाहिर है ऐसा कुआं उसने पहली बार ही देखा था। मन ही मन उसने वैभव की सोच और उसके कार्य की प्रसंसा की और फिर वापस मकान के पास आ गया। सहसा उसकी नज़र कुछ ही दूरी पर चुपचाप खड़ी अपनी बहन रूपा पर पड़ी।

रूपा, अनुराधा की चिता के पास खड़ी थी। ये देख रूपचंद्र की धड़कनें एकाएक तेज़ हो गईं और साथ ही वो फिक्रमंद हो उठा। वो तेज़ी से अपनी बहन की तरफ बढ़ता चला गया।

"तू यहां क्या कर रही है रूपा?" रूपचंद्र जैसे ही उसके पास पहुंचा तो उसने अधीरता से पूछा। अपने भाई की आवाज़ सुन रूपा एकदम से चौंक पड़ी। उसने झटके से गर्दन घुमा कर रूपचंद्र की तरफ थोड़ा हैरानी से देखा।

"क्या हुआ?" रूपचंद्र ने फिर पूछा____"तू यहां क्या कर रही है और....और तू यहां आई कैसे?"

"व...वो भैया।" रूपा ने धड़कते दिल से कहा____"मैं बस ऐसे ही चली आई थी यहां। अचानक ही इस तरफ मेरी नज़र पड़ गई थी। फिर जाने कैसे मैं इस तरफ खिंचती चली आई?"

"ख..खिंचती चली आई???" रूपचंद्र चौंका____"ये क्या कह रही है तू?"

"ये कितनी अभागन थी ना भैया?" रूपा ने सहसा संजीदा हो कर अनुराधा की चिता की तरफ देखते हुए कहा____"ना इस संसार के लोगों को इसकी खुशी अच्छी लगी और ना ही उस ऊपर वाले को। आख़िर उस कंजर का क्या बिगाड़ा था इस मासूम ने?"

कहने के साथ ही रूपा की आंखें छलक पड़ीं। दिलो दिमाग़ में एकाएक जाने कैसे कैसे ख़याल उभरने लगे थे उसके। रूपचंद्र को समझ न आया कि क्या कहे? उसे भी अपने अंदर एक अपराध बोझ सा महसूस हो रहा था। उसे याद आया कि उसने भी तो उस मासूम के साथ एक ऐसा काम किया था जो हद दर्जे का अपराध था। अपने अपराध का एहसास होते ही रूपचंद्र को बड़े जोरों से ग्लानि हुई। उसने आंखें बंद कर के अनुराधा से अपने किए गुनाह की माफ़ी मांगी।

"काश! इस मासूम की जगह मुझे मौत आ गई होती।" रूपा के जज़्बात जैसे उसके बस में नहीं थे, दुखी भाव से बोली____"काश! इस गुड़िया को मेरी उमर लग गई होती। हे ईश्वर! हे देवी मां! तुम इतनी निर्दई कैसे हो गई? क्यों एक निर्दोष का जीवन उससे छीन लिया तुमने? क्यों उसके प्रेम को पूर्ण नहीं होने दिया?"

"बस कर रूपा।" रूपचंद्र का हृदय कांप उठा, बोला____"ऐसी रूह को हिला देने वाली बातें मत कर।"

"आपको पता है भैया।" रूपा ने रुंधे गले से कहा____"जब ये जीवित थी तो मैंने इसके बारे में जाने क्या क्या सोच लिया था। मैंने सोच लिया था कि जब हम दोनों हवेली में बहू बन कर जाएंगी तो वहां मैं इसे अपनी सौतन नहीं मानूंगी बल्कि अपनी छोटी बहन मानूंगी। अपनी गुड़िया मान कर इसे हमेशा प्यार और स्नेह दिया करूंगी लेकिन.....लेकिन देखिए ना...देखिए ना ऐसा कुछ भी तो नहीं होने दिया भगवान ने। उसने मेरी छोटी बहन, मेरी गुड़िया को पहले ही मुझसे दूर कर दिया।"

रूपा एकाएक घुटनों के बल बैठ गई और फिर फूट फूट कर रो पड़ी। रूपचंद्र ने बहुत कोशिश की खुद को सम्हालने की मगर अपनी भावनाओं के ज्वार को सम्हाल न सका। आंखें अनायास ही छलक पड़ीं। उसने आगे बढ़ कर रूपा के कंधे पर हाथ रखा और उसे सांत्वना देने लगा। अभी वो उससे कुछ कहने ही वाला था कि तभी उसके कानों में मोटर साइकिल की आवाज़ पड़ी तो उसने पलट कर देखा।

वैभव अपनी मोटर साईकिल से इस तरफ ही चला आ रहा था। मोटर साइकिल की आवाज़ से रूपा का ध्यान भी उस तरफ गया। उसने फ़ौरन ही खुद को सम्हाल कर अपने आंसू पोछे और फिर उठ कर खड़ी हो गई। वैभव पर नज़र पड़ते ही उसकी धड़कनें एकाएक तेज़ तेज़ चलने लगीं थी। रूपचंद्र के इशारे पर वो मकान की तरफ चल पड़ी।

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मैं जैसे ही मकान के सामने आया तो सहसा मेरी नज़र रूपचंद्र और रूपा पर पड़ गई। उन दोनों को यहां देख मैं बड़ा हैरान हुआ। दोनों के यहां होने की मैंने बिल्कुल भी कल्पना नहीं की थी। मुझे समझ न आया कि वो दोनों सुबह के इस वक्त यहां क्या कर रहे हैं? बहरहाल, मैंने मोटर साईकिल को रोका और फिर उसका इंजन बंद कर के उससे नीचे उतर आया। रूपा अपने भाई के पीछे आ कर खड़ी हो गई थी। उसके चेहरे पर थोड़ा घबराहट के भाव थे।

"हम तुम्हारा ही इंतज़ार कर रहे थे वैभव।" मैं जैसे ही मोटर साईकिल से उतरा तो रूपचंद्र ने थोड़ा बेचैन भाव से कहा।

"किस लिए?" मैंने एक नज़र रूपा की तरफ देखने के बाद रूपचंद्र से पूछा____"क्या मुझसे कोई काम था तुम्हें?"

"नहीं, ऐसी तो कोई बात नहीं है।" रूपचंद्र ने जैसे खुद को सम्हालते हुए कहा____"वैसे दादा ठाकुर ने क्या तुम्हें कुछ नहीं बताया?"

"क्या मतलब?" मैं एकदम से चौंका____"मैं कुछ समझा नहीं। क्या उन्हें कुछ बताना चाहिए था मुझे?"

"हां वो दरअसल बात ये है कि गौरी शंकर काका ने उनसे तुम्हारे बारे में चर्चा की थी।" रूपचंद्र ने सहसा नज़रें चुराते हुए कहा। उसके चेहरे पर बेचैनी उभर आई थी और साथ ही पसीना भी। कुछ अटकते हुए से बोला____"देखो तुम ग़लत मत समझना। वो बात ये है कि....।"

"खुल कर बताओ बात क्या है?" मैंने सहसा सख़्त भाव से पूछा____"और तुम दोनों यहां क्या कर रहे हो?"

"देखो वैभव बात जो भी है तुम्हारी भलाई के लिए ही है।" रूपचंद्र को मानो सही शब्द ही नहीं मिल रहे थे जिससे कि वो अपनी बात मेरे सामने बेहतर तरीके से बोल सके, झिझकते हुए बोला____"दादा ठाकुर भी यही चाहते हैं, इसी लिए हम दोनों यहां हैं लेकिन...।"

"लेकिन???"

"लेकिन ये कि मैं तो चला जाऊंगा यहां से।" उसने बड़ी हिम्मत जुटा कर कहा____"मगर मेरी बहन यहीं रहेगी....तुम्हारे साथ।"

"क...क्या???" मैं एकदम से उछल ही पड़ा____"ये तुम क्या कह रहे हो? तुम्हें होश भी है कि तुम क्या बोल रहे हो?"

"मैं पूरी तरह होश में ही हूं वैभव।" रूपचंद्र ने इस बार पूरी दृढ़ता से कहा____"रूपा का यहां तुम्हारे साथ ही रहना दादा ठाकुर की मर्ज़ी और अनुमति से ही हुआ है। हालाकि उन्होंने ये भी कहा है कि तुम पर किसी तरह की कोई ज़ोर ज़बरदस्ती नहीं है कि तुम उनकी अथवा हमारी ये बात मानो लेकिन....तुम्हें भी समझना होगा कि सबका तुम्हारे लिए चिंतित होना जायज़ है। हम सब जानते हैं कि इस हादसे के चलते तुम बहुत ज़्यादा व्यथित हो...हम लोग भी व्यथित हैं, लेकिन ये भी सच है वैभव कि हमें बड़े से बड़े दुख को भी भूलने की कोशिश करनी ही पड़ती है और फिर जीवन में आगे बढ़ना पड़ता है। अगर तुमने अपने चाहने वालों को खोया है तो हमने भी तो एक झटके में अपने इतने सारे अपनों को खोया है। हमें भी तो उनका दुख है लेकिन इसके बावजूद हम किसी तरह जीवन में आगे बढ़ने की कोशिश कर रहे हैं।"

"ये सब तो ठीक है।" मैंने संजीदा हो कर कहा____"लेकिन मेरी समझ में ये नहीं आ रहा कि इसके लिए यहां मेरे पास तुम्हारी बहन क्यों रहेगी?"

"मौजूदा समय में तुम प्रेम के चलते दुखी हो वैभव।" रूपचंद्र ने कहा____"और तुम्हारे इस दुख को प्रेम से ही दूर करने की कोशिश की जा सकती है। तुम भी जानते हो कि मेरी बहन तुमसे कितना प्रेम करती है। तुम्हारी ऐसी हालत देख कर वो भी बहुत दुखी है। वो तुम्हें इस हालत में नहीं देख सकती इस लिए वो तुम्हारे साथ यहां रह कर तुम्हारा दुख साझा करेगी और अपने प्रेम से तुम्हारा मन बहलाने की कोशिश करेगी।"

रूपचंद्र की ये बातें सुन कर मेरे ज़हन में विस्फोट सा हुआ। मैंने हैरत से आंखें फाड़ कर रूपा की तरफ देखा। अपने भाई के पीछे खड़ी थी वो इस लिए जैसे ही मैंने उसकी तरफ देखा तो उसने मुझसे नज़रें मिलाई। उसकी आंखों में याचना थी, दर्द था, समर्पण भाव था और अथाह प्रेम था।

"देखो रूपचंद्र।" फिर मैं उसके भाई से मुखातिब हुआ____"मुझे इस हालत से निकालने के लिए तुम्हें या किसी को भी कुछ करने की ज़रूरत नहीं है और ना ही यहां मेरे साथ तुम्हारी बहन को रहने की ज़रूरत है। इस समय मुझे सिर्फ अकेलापन चाहिए इससे ज़्यादा कुछ नहीं।"

"ठीक है जैसी तुम्हारी इच्छा।" रूपचंद्र ने मायूस सा हो कर कहा____"मैं अभी एक ज़रूरी काम से शहर जा रहा हूं। वापस आऊंगा तो रूपा को ले जाऊंगा यहां से। तब तक तो रूपा यहां रह सकती हैं न?"

मैंने अनमने भाव से हां में सिर हिलाया और फिर अपना थैला ले कर मकान के अंदर की तरफ चला गया। मेरे जाने के बाद रूपचंद्र ने पलट कर अपनी बहन की तरफ देखा। वो भी उतरा हुआ चेहरा लिए चुपचाप खड़ी थी।

"तू फ़िक्र मत कर।" फिर रूपचंद्र ने उससे कहा____"मैंने वैभव से जान बूझ कर शहर जाने की बात कही है और तुझे तब तक यहां रहने को बोला है। जब तक मैं यहां वापस नहीं आता तब तक तो तू यहीं रहेगी। अब ये तुझ पर है कि तू कैसे वैभव को इस बात के लिए राज़ी करती है कि वो तुझे यहां रहने दे। ख़ैर अब मैं जा रहा हूं। दोपहर के समय तुम दोनों के लिए घर से खाना ले कर आऊंगा। अगर उस समय तक तूने वैभव को राज़ी कर लिया तो ठीक वरना फिर तुझे मेरे साथ वापस घर चलना ही पड़ेगा।"

रूपा की मूक सहमति के बाद रूपचंद्र ने बड़े स्नेह से उसके सिर पर हाथ फेरा और फिर अपनी जीप में बैठ कर चला गया। उसके जाने के बाद रूपा ने एक गहरी सांस ली और फिर पलट कर मकान के अंदर की तरफ देखने लगी। उसके मन में अब बस यही सवाल था कि आख़िर वो किस तरह से वैभव को राज़ी करे?​
 
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