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अचानक रिंकी ने अपने सिर को अजीब ढंग से इधर-उधर घुमाना बंद कर दिया। फिर वो राज की ओर देख कर भयानक ढंग से मुस्कुराई , जैसे उसने राज की बात सुन ली हो।
''चलो। "राज ने जय और अनुराग की एक-एक बांह पकड़ी और दरवाजे की ओर बढ़ गया।
''अनुज।"-तभी पीछे से रिंकी ने आवाज लगाई।
तीनों दरवाजे के पास थमककर खड़े हो गए। उन्होंने घूम कर रिंकी की ओर देखा।
वो अब बिस्तर पर लेटी नहीं थी। वो उठ बैठी थी। और उन्हीं की ओर देख रही थी।
''तुममे से कोई जिंदा नहीं बचेगा।"-रिंकी की आवाज कमरे में गूंजी। उसकी आवाज पहले से भारी थी और रिंकी की आवाज न होकर किसी और की ही आवाज लग रही थी।
फिर वो जोर से हंसी।
उसकी हंसी भी बेहद भयानक थी।
तीनों एक झटके से पलटे और कमरे से बाहर निकल गए।
कमरे के बाहर डॉली, प्रीति और डोंगरा खड़े थे। बाहर निकलते ही राज ने सबसे पहला काम दरवाजे को बंद करने का किया।
''ये...ये सब क्या था?"-प्रीति चीख पड़ी।
कोई कुछ नहीं बोला।
जवाब शायद किसी के पास नहीं था।
या जो जवाब था, उसे कहने की हिम्मत किसी के पास नहीं थी।
''रिंकी ऐसा कैसे कर सकती है?"-डोंगरा घबराए से स्वर में बोला-''मैं...मैं उसे अच्छी तरह से जानता हूं। वो तो एक चींटी तक नहीं मार सकती।"
राज ने डोंगरा को ऐसे घूरकर देखा कि वो सहमकर चुप हो गया।
कुछ देर तक वहां सन्नाटा छाया रहा।
''हमें इस जगह को तुरंत छोड़ देना चाहिए।
"-फिर गलियारे में राज की आवाज गूंजी।
''क...क...क्या?"-डोंगरा के मुंह से लडख़ड़ाती सी आवाज निकली।
''हां।"-डॉली ने सहमति में सिर हिलाया-
''यहां रूकना अब खतरे से खाली नहीं है।"
''लेकिन जायेंगें कैसे?"-अनुराग बोला।
''हमें कोई न कोई रास्ता ढूंढना ही होगा।"-राज बोला।
तभी प्रीति की आवाज ने सबका ध्यान आकर्षित किया।
प्रीति उनसे थोड़ी दूरी पर दीवार से टिकी दोनों हाथों में चेहरा छिपाए रो रही थी।
उन्होंने एक-दूसरे की ओर देखा , फिर जय धीरे से प्रीति की ओर बढ़ा।
प्रीति के सिसकने की आवाज कमरे में गूंज रही थी।
''प्रीति।"-उसके पास पहुंचकर जय उसकी ओर हाथ बढ़ाते हुए धीमे स्वर में बोला।
''उसने मोहिनी को मार दिया।"-प्रीति अचानक चेहरे पर से हाथ हटाकर चीख पड़ी। जय ने सहमकर हाथ पीछे खींच लिया लेकिन फिर ये देखकर उसने राहत की सांस ली कि प्रीति का चेहरा आंसुओं में भीगा हुआ था।
जय ही नहीं, वहां मौजूद बाकी चारों के चेहरे पर भी तनाव की रेखाएं स्पष्ट रूप से परिलक्षित हो रहीं थीं।
''हिम्मत रखो, प्रीति...।"-जय ने उसे हिम्मत बंधाने की कोशिश की।
''क्या हिम्मत रखूं?"-प्रीति फिर चीख पड़ी-''यहां क्या हो रहा है? रिंकी ऐसी कैसे बन गई? क्या हुआ है उसे?"-फिर वो बोलते-बोलते अचानक रूक गई
, उसने राज की ओर देखा
, फिर अपने चेहरे से आंसू पोंछते हुए धड़धड़ाते हुए राज की ओर ऐसे बढ़ी
, जैसे उसे कुचलते हुए निकल जाएगी-
''तुम!
"-उसने राज के सीने की ओर उंगली ऐसे की , जैसे खंजर भोंक रही हो-''तुम पैरानॉर्मल इन्वेस्टिगेटर हो न। तुम बताओ यहां क्या हो रहा है? क्या हुआ है रिंकी को?"
''मुझे नहीं पता।"-राज शांति के साथ बोला-''ऐसा मैंने पहले कभी नहीं देखा...।"
''तो किसे पता है?"-प्रीति जोर से चीखी, फिर वो बारी-बारी से जय, अनुराग, डॉली और डोंगरा की ओर मुड़ते हुए चीखती रही-
''तुम्हें? तुम्हें? तुम्हें? या तुम्हें?"-डोंगरा पर तो वो इतनी जोर से चिल्लाई कि वो सहम कर पीछे हट गया।
''मुझे बताओ"-प्रीति हिस्टिरिया के मरीज की तरह चिल्ला रही थी''ये सब क्या हो रहा है? क्यों हो रहा है? हम लोगों के साथ ही क्यों हो रहा है? बताओ मुझे।"-कहते-कहते वो दीवार से टिक गई और रोते हुए दीवार से घिसटते हुए जमीन पर ही बैठ गई-''बताओ मुझे। वरना...वरना मैं पागल हो जाऊंगीं...पागल हो जाऊंगीं मैं...।"
जय आगे बढ़कर उसके पास बैठ गया। उसने प्रीति को गले से लगा लिया। प्रीति ने उसके सीने में मुंह छिपा लिया और बदस्तूर रोती रही।
''वहां नीचे मोहिनी के टुकड़े बिखरे हुए हैं जय...उसके टुकड़े...।"
गलियारे में मनहूसियत भरा सन्नाटा पसर गया।
कुछ देर बाद जब प्रीति शांत हुई तो राज ने जय को आंखों ही आंखों में इशारा किया।
''चलो प्रीति।"-जय प्रीति से धीरे से बोला-''नीचे चलते हैं। वहीं चलकर बात करते हैं। हम इस मुसीबत का कोई न कोई हल ढूंढ लेंगें।"
प्रीति ने उसके सीने पर से सिर उठा कर उसकी ओर देखा। उसकी आंखों में भय की झलक थी।
''न...न...नहीं...।"-वो कांपते से स्वर में बोली-''म..म...मैं नीचे नहीं जाऊंगीं...व...वहां...वहां मोहिनी के...मोहिनी के....।"-वो अपनी बात पूरी नहीं कर पाई। बस फटी-फटी सी आंखों से जय की ओर देखती रही। उसकी आंखों में दुनिया-जहान की दहशत दिखाई दे रही थी।
जय को कुछ नहीं करते देख कर राज आगे बढ़ा और उसने प्रीति की बांह पकड़कर उसे खड़ा कर दिया। प्रीति ने वैसी ही डरी-डरी सी नजरों से उसकी ओर देखा।
''देखो, प्रीति।-राज सख्त स्वर में बोला-''यहां जो कुछ भी हो रहा है, वो सब भयानक है, मैं मानता हूं। लेकिन इस तरह हिम्मत छोड़ देने से काम नहीं चलेगा। हिम्मत छोड़ देने का मतलब है पहले ही हार मान लेना। लेकिन हम अपनी आखिरी सांस तक कोशिश करेंगें। हमें किसी भी हालत में यहां से जाना ही होगा। और इसके लिए हम सबको हिम्मत दिखानी होगी। एक-दूसरे की मदद करनी होगी। इस तरह अपने होश खो देना अपने हाथों से अपनी कब्र खोदने जैसा ही है।"
प्रीति ने सहमति में सिर हिलाया। हालांकि उसके चेहरे से भय की छाया अब भी पूरी तरह विलुप्त नहीं हुई थी।
''ठ...ठीक है।"-वो बोली।
पीछे डॉली ने अनुराग के कान में कुछ कहा, जिसे सुनकर अनुराग की आंखें चौड़ी हो गईं। उसने डॉली की ओर देखा, फिर उसके चेहरे पर बेबसी देखकर डोंगरा को टहोका और उसे अपने पीछे आने का इशारा करते हुए सीढिय़ों की ओर बढ़ गया।
''चलो। "राज ने जय और अनुराग की एक-एक बांह पकड़ी और दरवाजे की ओर बढ़ गया।
''अनुज।"-तभी पीछे से रिंकी ने आवाज लगाई।
तीनों दरवाजे के पास थमककर खड़े हो गए। उन्होंने घूम कर रिंकी की ओर देखा।
वो अब बिस्तर पर लेटी नहीं थी। वो उठ बैठी थी। और उन्हीं की ओर देख रही थी।
''तुममे से कोई जिंदा नहीं बचेगा।"-रिंकी की आवाज कमरे में गूंजी। उसकी आवाज पहले से भारी थी और रिंकी की आवाज न होकर किसी और की ही आवाज लग रही थी।
फिर वो जोर से हंसी।
उसकी हंसी भी बेहद भयानक थी।
तीनों एक झटके से पलटे और कमरे से बाहर निकल गए।
कमरे के बाहर डॉली, प्रीति और डोंगरा खड़े थे। बाहर निकलते ही राज ने सबसे पहला काम दरवाजे को बंद करने का किया।
''ये...ये सब क्या था?"-प्रीति चीख पड़ी।
कोई कुछ नहीं बोला।
जवाब शायद किसी के पास नहीं था।
या जो जवाब था, उसे कहने की हिम्मत किसी के पास नहीं थी।
''रिंकी ऐसा कैसे कर सकती है?"-डोंगरा घबराए से स्वर में बोला-''मैं...मैं उसे अच्छी तरह से जानता हूं। वो तो एक चींटी तक नहीं मार सकती।"
राज ने डोंगरा को ऐसे घूरकर देखा कि वो सहमकर चुप हो गया।
कुछ देर तक वहां सन्नाटा छाया रहा।
''हमें इस जगह को तुरंत छोड़ देना चाहिए।
"-फिर गलियारे में राज की आवाज गूंजी।
''क...क...क्या?"-डोंगरा के मुंह से लडख़ड़ाती सी आवाज निकली।
''हां।"-डॉली ने सहमति में सिर हिलाया-
''यहां रूकना अब खतरे से खाली नहीं है।"
''लेकिन जायेंगें कैसे?"-अनुराग बोला।
''हमें कोई न कोई रास्ता ढूंढना ही होगा।"-राज बोला।
तभी प्रीति की आवाज ने सबका ध्यान आकर्षित किया।
प्रीति उनसे थोड़ी दूरी पर दीवार से टिकी दोनों हाथों में चेहरा छिपाए रो रही थी।
उन्होंने एक-दूसरे की ओर देखा , फिर जय धीरे से प्रीति की ओर बढ़ा।
प्रीति के सिसकने की आवाज कमरे में गूंज रही थी।
''प्रीति।"-उसके पास पहुंचकर जय उसकी ओर हाथ बढ़ाते हुए धीमे स्वर में बोला।
''उसने मोहिनी को मार दिया।"-प्रीति अचानक चेहरे पर से हाथ हटाकर चीख पड़ी। जय ने सहमकर हाथ पीछे खींच लिया लेकिन फिर ये देखकर उसने राहत की सांस ली कि प्रीति का चेहरा आंसुओं में भीगा हुआ था।
जय ही नहीं, वहां मौजूद बाकी चारों के चेहरे पर भी तनाव की रेखाएं स्पष्ट रूप से परिलक्षित हो रहीं थीं।
''हिम्मत रखो, प्रीति...।"-जय ने उसे हिम्मत बंधाने की कोशिश की।
''क्या हिम्मत रखूं?"-प्रीति फिर चीख पड़ी-''यहां क्या हो रहा है? रिंकी ऐसी कैसे बन गई? क्या हुआ है उसे?"-फिर वो बोलते-बोलते अचानक रूक गई
, उसने राज की ओर देखा
, फिर अपने चेहरे से आंसू पोंछते हुए धड़धड़ाते हुए राज की ओर ऐसे बढ़ी
, जैसे उसे कुचलते हुए निकल जाएगी-
''तुम!
"-उसने राज के सीने की ओर उंगली ऐसे की , जैसे खंजर भोंक रही हो-''तुम पैरानॉर्मल इन्वेस्टिगेटर हो न। तुम बताओ यहां क्या हो रहा है? क्या हुआ है रिंकी को?"
''मुझे नहीं पता।"-राज शांति के साथ बोला-''ऐसा मैंने पहले कभी नहीं देखा...।"
''तो किसे पता है?"-प्रीति जोर से चीखी, फिर वो बारी-बारी से जय, अनुराग, डॉली और डोंगरा की ओर मुड़ते हुए चीखती रही-
''तुम्हें? तुम्हें? तुम्हें? या तुम्हें?"-डोंगरा पर तो वो इतनी जोर से चिल्लाई कि वो सहम कर पीछे हट गया।
''मुझे बताओ"-प्रीति हिस्टिरिया के मरीज की तरह चिल्ला रही थी''ये सब क्या हो रहा है? क्यों हो रहा है? हम लोगों के साथ ही क्यों हो रहा है? बताओ मुझे।"-कहते-कहते वो दीवार से टिक गई और रोते हुए दीवार से घिसटते हुए जमीन पर ही बैठ गई-''बताओ मुझे। वरना...वरना मैं पागल हो जाऊंगीं...पागल हो जाऊंगीं मैं...।"
जय आगे बढ़कर उसके पास बैठ गया। उसने प्रीति को गले से लगा लिया। प्रीति ने उसके सीने में मुंह छिपा लिया और बदस्तूर रोती रही।
''वहां नीचे मोहिनी के टुकड़े बिखरे हुए हैं जय...उसके टुकड़े...।"
गलियारे में मनहूसियत भरा सन्नाटा पसर गया।
कुछ देर बाद जब प्रीति शांत हुई तो राज ने जय को आंखों ही आंखों में इशारा किया।
''चलो प्रीति।"-जय प्रीति से धीरे से बोला-''नीचे चलते हैं। वहीं चलकर बात करते हैं। हम इस मुसीबत का कोई न कोई हल ढूंढ लेंगें।"
प्रीति ने उसके सीने पर से सिर उठा कर उसकी ओर देखा। उसकी आंखों में भय की झलक थी।
''न...न...नहीं...।"-वो कांपते से स्वर में बोली-''म..म...मैं नीचे नहीं जाऊंगीं...व...वहां...वहां मोहिनी के...मोहिनी के....।"-वो अपनी बात पूरी नहीं कर पाई। बस फटी-फटी सी आंखों से जय की ओर देखती रही। उसकी आंखों में दुनिया-जहान की दहशत दिखाई दे रही थी।
जय को कुछ नहीं करते देख कर राज आगे बढ़ा और उसने प्रीति की बांह पकड़कर उसे खड़ा कर दिया। प्रीति ने वैसी ही डरी-डरी सी नजरों से उसकी ओर देखा।
''देखो, प्रीति।-राज सख्त स्वर में बोला-''यहां जो कुछ भी हो रहा है, वो सब भयानक है, मैं मानता हूं। लेकिन इस तरह हिम्मत छोड़ देने से काम नहीं चलेगा। हिम्मत छोड़ देने का मतलब है पहले ही हार मान लेना। लेकिन हम अपनी आखिरी सांस तक कोशिश करेंगें। हमें किसी भी हालत में यहां से जाना ही होगा। और इसके लिए हम सबको हिम्मत दिखानी होगी। एक-दूसरे की मदद करनी होगी। इस तरह अपने होश खो देना अपने हाथों से अपनी कब्र खोदने जैसा ही है।"
प्रीति ने सहमति में सिर हिलाया। हालांकि उसके चेहरे से भय की छाया अब भी पूरी तरह विलुप्त नहीं हुई थी।
''ठ...ठीक है।"-वो बोली।
पीछे डॉली ने अनुराग के कान में कुछ कहा, जिसे सुनकर अनुराग की आंखें चौड़ी हो गईं। उसने डॉली की ओर देखा, फिर उसके चेहरे पर बेबसी देखकर डोंगरा को टहोका और उसे अपने पीछे आने का इशारा करते हुए सीढिय़ों की ओर बढ़ गया।