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Horror मौत की चाल

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अचानक रिंकी ने अपने सिर को अजीब ढंग से इधर-उधर घुमाना बंद कर दिया। फिर वो राज की ओर देख कर भयानक ढंग से मुस्कुराई , जैसे उसने राज की बात सुन ली हो।

''चलो। "राज ने जय और अनुराग की एक-एक बांह पकड़ी और दरवाजे की ओर बढ़ गया।

''अनुज।"-तभी पीछे से रिंकी ने आवाज लगाई।

तीनों दरवाजे के पास थमककर खड़े हो गए। उन्होंने घूम कर रिंकी की ओर देखा।

वो अब बिस्तर पर लेटी नहीं थी। वो उठ बैठी थी। और उन्हीं की ओर देख रही थी।

''तुममे से कोई जिंदा नहीं बचेगा।"-रिंकी की आवाज कमरे में गूंजी। उसकी आवाज पहले से भारी थी और रिंकी की आवाज न होकर किसी और की ही आवाज लग रही थी।

फिर वो जोर से हंसी।

उसकी हंसी भी बेहद भयानक थी।

तीनों एक झटके से पलटे और कमरे से बाहर निकल गए।

कमरे के बाहर डॉली, प्रीति और डोंगरा खड़े थे। बाहर निकलते ही राज ने सबसे पहला काम दरवाजे को बंद करने का किया।

''ये...ये सब क्या था?"-प्रीति चीख पड़ी।

कोई कुछ नहीं बोला।

जवाब शायद किसी के पास नहीं था।

या जो जवाब था, उसे कहने की हिम्मत किसी के पास नहीं थी।

''रिंकी ऐसा कैसे कर सकती है?"-डोंगरा घबराए से स्वर में बोला-''मैं...मैं उसे अच्छी तरह से जानता हूं। वो तो एक चींटी तक नहीं मार सकती।"

राज ने डोंगरा को ऐसे घूरकर देखा कि वो सहमकर चुप हो गया।

कुछ देर तक वहां सन्नाटा छाया रहा।

''हमें इस जगह को तुरंत छोड़ देना चाहिए।

"-फिर गलियारे में राज की आवाज गूंजी।

''क...क...क्या?"-डोंगरा के मुंह से लडख़ड़ाती सी आवाज निकली।

''हां।"-डॉली ने सहमति में सिर हिलाया-

''यहां रूकना अब खतरे से खाली नहीं है।"

''लेकिन जायेंगें कैसे?"-अनुराग बोला।

''हमें कोई न कोई रास्ता ढूंढना ही होगा।"-राज बोला।

तभी प्रीति की आवाज ने सबका ध्यान आकर्षित किया।

प्रीति उनसे थोड़ी दूरी पर दीवार से टिकी दोनों हाथों में चेहरा छिपाए रो रही थी।

उन्होंने एक-दूसरे की ओर देखा , फिर जय धीरे से प्रीति की ओर बढ़ा।

प्रीति के सिसकने की आवाज कमरे में गूंज रही थी।

''प्रीति।"-उसके पास पहुंचकर जय उसकी ओर हाथ बढ़ाते हुए धीमे स्वर में बोला।

''उसने मोहिनी को मार दिया।"-प्रीति अचानक चेहरे पर से हाथ हटाकर चीख पड़ी। जय ने सहमकर हाथ पीछे खींच लिया लेकिन फिर ये देखकर उसने राहत की सांस ली कि प्रीति का चेहरा आंसुओं में भीगा हुआ था।

जय ही नहीं, वहां मौजूद बाकी चारों के चेहरे पर भी तनाव की रेखाएं स्पष्ट रूप से परिलक्षित हो रहीं थीं।

''हिम्मत रखो, प्रीति...।"-जय ने उसे हिम्मत बंधाने की कोशिश की।

''क्या हिम्मत रखूं?"-प्रीति फिर चीख पड़ी-''यहां क्या हो रहा है? रिंकी ऐसी कैसे बन गई? क्या हुआ है उसे?"-फिर वो बोलते-बोलते अचानक रूक गई

, उसने राज की ओर देखा

, फिर अपने चेहरे से आंसू पोंछते हुए धड़धड़ाते हुए राज की ओर ऐसे बढ़ी

, जैसे उसे कुचलते हुए निकल जाएगी-

''तुम!

"-उसने राज के सीने की ओर उंगली ऐसे की , जैसे खंजर भोंक रही हो-''तुम पैरानॉर्मल इन्वेस्टिगेटर हो न। तुम बताओ यहां क्या हो रहा है? क्या हुआ है रिंकी को?"

''मुझे नहीं पता।"-राज शांति के साथ बोला-''ऐसा मैंने पहले कभी नहीं देखा...।"

''तो किसे पता है?"-प्रीति जोर से चीखी, फिर वो बारी-बारी से जय, अनुराग, डॉली और डोंगरा की ओर मुड़ते हुए चीखती रही-

''तुम्हें? तुम्हें? तुम्हें? या तुम्हें?"-डोंगरा पर तो वो इतनी जोर से चिल्लाई कि वो सहम कर पीछे हट गया।

''मुझे बताओ"-प्रीति हिस्टिरिया के मरीज की तरह चिल्ला रही थी''ये सब क्या हो रहा है? क्यों हो रहा है? हम लोगों के साथ ही क्यों हो रहा है? बताओ मुझे।"-कहते-कहते वो दीवार से टिक गई और रोते हुए दीवार से घिसटते हुए जमीन पर ही बैठ गई-''बताओ मुझे। वरना...वरना मैं पागल हो जाऊंगीं...पागल हो जाऊंगीं मैं...।"

जय आगे बढ़कर उसके पास बैठ गया। उसने प्रीति को गले से लगा लिया। प्रीति ने उसके सीने में मुंह छिपा लिया और बदस्तूर रोती रही।

''वहां नीचे मोहिनी के टुकड़े बिखरे हुए हैं जय...उसके टुकड़े...।"

गलियारे में मनहूसियत भरा सन्नाटा पसर गया।

कुछ देर बाद जब प्रीति शांत हुई तो राज ने जय को आंखों ही आंखों में इशारा किया।

''चलो प्रीति।"-जय प्रीति से धीरे से बोला-''नीचे चलते हैं। वहीं चलकर बात करते हैं। हम इस मुसीबत का कोई न कोई हल ढूंढ लेंगें।"

प्रीति ने उसके सीने पर से सिर उठा कर उसकी ओर देखा। उसकी आंखों में भय की झलक थी।

''न...न...नहीं...।"-वो कांपते से स्वर में बोली-''म..म...मैं नीचे नहीं जाऊंगीं...व...वहां...वहां मोहिनी के...मोहिनी के....।"-वो अपनी बात पूरी नहीं कर पाई। बस फटी-फटी सी आंखों से जय की ओर देखती रही। उसकी आंखों में दुनिया-जहान की दहशत दिखाई दे रही थी।

जय को कुछ नहीं करते देख कर राज आगे बढ़ा और उसने प्रीति की बांह पकड़कर उसे खड़ा कर दिया। प्रीति ने वैसी ही डरी-डरी सी नजरों से उसकी ओर देखा।

''देखो, प्रीति।-राज सख्त स्वर में बोला-''यहां जो कुछ भी हो रहा है, वो सब भयानक है, मैं मानता हूं। लेकिन इस तरह हिम्मत छोड़ देने से काम नहीं चलेगा। हिम्मत छोड़ देने का मतलब है पहले ही हार मान लेना। लेकिन हम अपनी आखिरी सांस तक कोशिश करेंगें। हमें किसी भी हालत में यहां से जाना ही होगा। और इसके लिए हम सबको हिम्मत दिखानी होगी। एक-दूसरे की मदद करनी होगी। इस तरह अपने होश खो देना अपने हाथों से अपनी कब्र खोदने जैसा ही है।"

प्रीति ने सहमति में सिर हिलाया। हालांकि उसके चेहरे से भय की छाया अब भी पूरी तरह विलुप्त नहीं हुई थी।

''ठ...ठीक है।"-वो बोली।

पीछे डॉली ने अनुराग के कान में कुछ कहा, जिसे सुनकर अनुराग की आंखें चौड़ी हो गईं। उसने डॉली की ओर देखा, फिर उसके चेहरे पर बेबसी देखकर डोंगरा को टहोका और उसे अपने पीछे आने का इशारा करते हुए सीढिय़ों की ओर बढ़ गया।
 
डोंगरा उसके पीछे नहीं जाना चाहता था लेकिन डॉली ने भी आंखों ही आंखों में डोंगरा को उसके पीछे जाने का इशारा किया तो डोंगरा जैसे मन-मन के कदम रखता हुआ अनुराग के पीछे सीढिय़ों की ओर बढ़ गया।

दोनों नीचे पहुंचे।

अनुराग आगे था इसलिए सबसे पहले सीढिय़ों से वही उतरा। बाहर मीटिंग रूम में कदम रखते ही उसे अपने प्राण सूखते से महसूस हुए।

बाहर वाला दरवाजा पूरा खुला हुआ था और बाहर दूर-दूर तक अंधेरा पसरा नजर आ रहा था।

बाहर जोरों की सर्द हवाएं चल रहीं थीं, जो कमरे में भी प्रवेश कर रहीं थीं।

अनुराग को अच्छी तरह याद था कि जब वे लोग रिंकी को बांध कर सीढिय़ों से ऊपर ले जा रहे थे, तो वो दरवाजा बंद था। डोंगरा, प्रीति और डॉली भी उनके पीछे-पीछे ही सीढिय़ों से ऊपर आ गए थे।

फिर दरवाजा किसने खोला?

अनुराग के शरीर ने जोर की कंपकंपी ली। हवाएं बेहद ठण्डी थीं और मौसम भी ठण्डा था लेकिन अनुराग को कंपकंपी ठण्ड के कारण नहीं आई थी।

खुले दरवाजे से बाहर अंधेरे में दूर हिलते पेड़ों के काले साए दिख रहे थे।

''ये...ये दरवाजा कैसे खुल गया?"-तभी पीछे से डोंगरा का खौफ भरा स्वर सुनाई दिया।

अनुराग ने पलटकर देखा। उसके पीछे डोंगरा भी सीढिय़ों से उतर आया था। खुला दरवाजा देखकर उसके चेहरे पर जैसे हल्दी-सी पुत गई थी। फिर अनुराग फर्श पर पड़े मोहिनी के टुकड़ों से बचते हुए सावधानीपूर्वक दरवाजे के पास पहुंचा और दरवाजा बंद करने की कोशिश करने लगा। उसे आश्चर्य हुआ, हवाएं इतनी तेज थीं कि उसे दरवाजा बंद करने में भी दिक्कत आ रही थी। फिर भी उसने ताकत लगाकर दरवाजा बंद कर ही दिया।

दरवाजा बंद करने में उसे इतनी ताकत लगानी पड़ी कि वो बंद दरवाजे से ही टिककर गहरी-गहरी सांसें लेने लगा। फिर उसने पलटकर डोंगरा की ओर देखा।

वो अब भी अपनी जगह वैसा ही बुत बना खड़ा था।

''तुम तो एक इंच भी नहीं हिले।"-अनुराग धीमे से बड़बड़ाया।

''क...क...क्या?"-डोंगरा के मुंह से निकला।

अनुराग ने कोई जवाब नहीं दिया। वो आगे बढ़ा। उसकी नजरें फर्श पर बिखरे मोहिनी के टुकड़ों पर थीं।

फिर वो उन्हीं टुकड़ों के पास घुटनों के बल बैठ गया और बिलख-बिलख कर रोने लगा।

डोंगरा अपनी जगह पर ऐसे खड़ा था, जैसे समझ नहीं पा रहा हो कि ऐसी स्थिति में उसे क्या करना चाहिए था।

तभी सीढिय़ों पर किसी के नीचे उतरने की आहट सुनाई दी।

डोंगरा की नजरें अपने-आप ही सीढिय़ों की ओर उठ गईं।

पहले सीढिय़ों पर एक छाया दिखाई दी

, फिर उसके पीछे-पीछे डॉली नजर आई।

डॉली को देख कर डोंगरा ने राहत की लम्बी सांस ली।

डॉली तेजी से नीचे उतरी, उसने अनुराग को रोते देखा और उसे नीचे भेजने के अपने फैसले पर मन ही मन खुद को कोसा। फिर वो नीचे बैठ गई और मोहिनी के टुकड़े उठा-उठा कर चद्दर पर रखने लगी। हालांकि ऐसा करते समय उसके हाथ इतनी जोर से कांप रहे थे कि उसे लग रहा था कि वो टुकड़े उसके हाथ से छूटकर गिर जाएंगें। या वो खुद ही बेहोश हो जाएगी।

हाथ, पैर, धड़...।

सब बड़े-बड़े टुकड़े थे।

कैसे?-डॉली के दिमाग में ये सवाल हथौड़े की तरह टकराया-रिंकी ने कैसे किया होगा ये सब?क्या उस छोटे से चाकू से...।

उस चाकू से कैसे...?डॉली का शरीर कांप उठा।

नहीं, वो इस बारे में नहीं सोचना चाहती थी।

सिर लुढ़ककर थोड़ी दूर चला गया था। उसे लेने के लिए डॉली को उठकर वहां तक जाना पड़ा। उसने दोनों हाथों में थामकर सिर को उठाया। मोहिनी के चेहरे की ओर देखने की उसकी हिम्मत नहंी हो रही थी। उसने बिना उसके चेहरे पर नजर डाले सिर को उठाया और ले जाकर पोटली में बाकी अंगों के साथ ही रख दिया।

''नहीं...।"-अनुराग बिलखते हुए ही घुटी-घुटी-सी आवाज में बोला-''नहीं...।"

डॉली ने पलटकर बेबस भाव से अनुराग की ओर देखा। वो अपने होंठ भींचे हुए गर्दन को दायें-बायें हिला रहा था। उसके गाल आंसुओं से तर हो रहे थे। डॉली ने आंखों ही आंखों में उससे क्षमायाचना की और सारे टुकड़ों को उसी चादर पर रखकर उनकी पोटली बना कर उठाई और उसे लेकर अंदर वाले कमरे में चली गई। ऐसा करते समय डॉली को अपनी टांगें बुरी तरह कांपती हुईं लग रहीं थीं। उसे लग रहा था वो रास्ते में ही गिर जाएगी। लेकिन अपनी सारी हिम्मत और शरीर की सारी ताकत समेट कर वो आगे बढ़ती रही। कमरे में उसने मोहिनी के शरीर के अंगों की पोटली आहिस्ता से एक कोने में रख दी

, जैसे मोहिनी जिंदा हो और पोटली जोर से रखने पर उसे चोट लग जाएगी। पोटली रखने पर उसमें रखे अंग सरककर इधर-उधर हुए, जिसकी हलचल चादर के ऊपर से भी सलवटों के रूप में दिखाई दी।

डॉली सिहर उठी।

फिर वो घूमकर बाहर वाले कमरे में पहुंची और वहां एक कुर्सी पर धराशायी होने वाले अंदाज में गिरकर गहरी-गहरी सांसें लेने लगी

, जैसे मीलों लम्बी रेस लगाकर आई हो।

अनुराग अपनी जगह पर बैठा बदस्तूर रोए जा रहा था।

डॉली को अपने अंदर इतनी हिम्मत नहीं लग रही थी कि वो अनुराग को हिम्मत बंधा सके।

इस वक्त तो उसे खुद हिम्मत की जरूरत थी।

उसी वक्त ऊपर से प्रीति, जय और राज भी नीचे आ गए।

प्रीति अब भी बुरी तरह डरी हुई लग रही थी और जय और राज भी बेहद गम्भीर थे।

वे तीनों नीचे मीटिंग रूम में पहुंचे, जहां अनुराग को जमीन पर बैठकर रोते हुए और डॉली को एक तरफ कुर्सी पर बेसुध सी पड़े देखकर उन्हें एक और झटका लगा।

उन्होंने प्रीति को एक कुर्सी पर बिठाया और राज डॉली को और जय अनुराग को सांत्वना देने की कोशिश करने लगा।

डोंगरा अपनी जगह पर जैसे पत्थर की मूर्ति बना हुआ उन सबकी वो हालत देख रहा था।

फिर यकायक उसे अपने शरीर में गुस्से की तीव्र लहर उठती महसूस हुई।

ये सब रिंकी ने किया था।

रिंकी।

मोहिनी के टुकड़े...।उफ्फ!

डोंगरा की मुट्ठियाँ भिंच गईं।

उसने देखा था कि उसी कमरे में, उसी जगह किस तरह जय, अनुराग और राज

तीनों मिलकर भी बड़ी मुश्किल से रिंकी को काबू कर पाए थे।

लेकिन उसे काबू करने का एक आसान तरीका था, जो उन्होंने इस्तेमाल नहीं किया था।

डोंगरा ने अपने कोट के अंदर की जेब को थपथपाकर उसमें रखी रिवॉल्वर के अपनी जगह पर होने की तस्दीक की, फिर धीमे से सीढिय़ों की ओर बढ़ गया।

वहां मौजूद लोग एक-दूसरे में ही इस कदर खोए हुए थे कि उनमें से किसी ने डोंगरा के सीढिय़ों से ऊपर जाने की ओर ध्यान ही नहीं दिया।

डोंगरा सीढिय़ों से ऊपर पहुंचा।वो बेहद सावधान था।

जरूरत पडऩे पर जेब से रिवॉल्वर निकालकर फायर करने में उसे कुछ ही सेकेंड लगने थेे।

कॉलेज टाइम में वो एनसीसी में रह चुका था और उसे अपनी निशानेबाजी पर भी बहुत भरोसा था।

उसे विश्वास था कि वो अब यहां से रिंकी के सिर पर से भूत उतारकर ही वहां से जाएगा।

चाहे उसके लिए उसे रिंकी की जान ही क्यों न लेनी पड़े।

वो उस कमरे के सामने पहुंचा

, जिसमें उन लोगों ने रिंकी को कैद किया था।

उसने धीरे से कमरे की कुण्डी खोल दी।

''रिंकी।"-कमरे में प्रवेश करते ही उसने रिंकी को आवाज दी।

सामने वो बैड खाली था, जिस पर रिंकी को बांध कर डाला गया था।

आश्चर्यचकित डोंगरा ने कमरे में चारों ओर निगाह दौड़ाई।

रिंकी कहीं भी नहीं थी।

उसके पीछे खुला हुआ दरवाजा घूमकर वापस बंद हो गया।
 
दरवाजा खुलने से दरवाजे के पीछे की जो जगह दरवाजे की आड़ में हो गई थी, रिंकी वहीं खड़ी थी।

लेकिन डोंगरा की उसकी ओर पीठ थी इसलिए वो उसे नहीं देख सका।

पीछे दरवाजा बंद होने की आहट सुनकर वो तुरंत पीछे घूमा।

लेकिन तब तक बहुत देर हो चुकी थी।

रिंकी किसी वहशी जानवर की तरह उस पर झपट पड़ी।

वो उसे धकेलते हुए कमरे की दूसरी दीवार के पास तक ले गई

, फिर उसने जोर का धक्का देकर डोंगरा को जमीन पर गिरा दिया।

अगले ही क्षण वो शैतान की तरह उस पर सवार थी।

रिंकी के एक हाथ में चाकू था, जिसे डोंगरा की मोटी गर्दन पर फेरते हुए, अपनी चमकती सुनहरी आंखों से उसे घूरते हुए रिंकी बोली-''कैसा है, डोंगरा?"

नीचे मीटिंग रूम में प्रीति ने देखा

, जय अनुराग के गले लगकर उसे हिम्मत बंधाने की कोशिश कर रहा था और राज डॉली को संभालने की कोशिश कर रहा था।

प्रीति को जोर की प्यास लग रही थी।

जाने कितनी देर से उसने पानी नहीं पिया था।

वो धीमे से उठी और सीढिय़ों वाले गलियारे से होते हुए किचन की ओर बढ़ गई।

ऊपर कमरे में डोंगरा रिंकी के नीचे दबा पत्ते की तरह थर-थर कांप रहा था।

रिंकी की चमकती आंखें जैसे उसकी आंखों को भेदकर अंदर उतर जाना चाहतीं थीं।

''क्या हुआ, डोंगरा?"-रिंकी अपनी शोलों की तरह दहक रहीं आंखों से उसे घूरते हुए बोली-''तुझे डर लग रहा है क्या? अपनी बेटी की उमर की लड़की से इश्क लड़ाते हुए तो तुझे कभी डर नहीं लगा? फिर अब क्यों इतना डर रहा है?"

डोंगरा के मुंह से बोल न फूटा। वो हक्का-बक्का सा अपने ऊपर सवार रिंकी के रूप में साक्षात मौत के रूप को देख रहा था।

''क्या तुझे अनचाही मौत से डर लग रहा है, मोटे?"-अचानक रिंकी की आवाज तीखी और तेज हो गई, वो चीखती हुई बोल रही थी-''तुझे पता है, कोई भूत कब बनता है? जब उसकी अनचाही मौत होती है। यहां जितनी आत्माएं हैं, सबकी मौत ऐसे ही हुई थी। वो सब तेरा इंतजार कर रहीं हैं। अब तेरी बारी है। तुझे अपनी बिरादरी में शामिल करने का वक्त आ गया है...।"

''नहीं।"-डोंगरा कांपते स्वर में बोला-''मुझे...मुझे जाने दो...। मैं यहां से चला जाऊंगा।"

वो जोर से हंसी।

''अब तू यहां से कभी नहीं जा पाएगा।"-वो चीखती सी आवाज में बोली-''अब तुझे हमेशा यहीं रहना है। हमेशा।"

फिर रिंकी का चाकू वाला हाथ नीचे आया और चाकू का फल डोंगरा के सीने में पैवस्त होता चला गया।

डोंगरा भैंसे की तरह डकरा उठा।

रिंकी ने चाकू खींचकर उसके शरीर से निकाला, उसका हाथ फिर सिर से ऊपर गया और फिर नीचे आया।

इस बार चाकू डोंगरा के पेट में धंस गया।

डोंगरा के गले से फिर चीख निकली।

फिर रिंकी किसी मशीनी पुतले की तरह उसी क्रिया की दोहराती रही।

उसका हाथ सिर के ऊपर जाता था, फिर नीचे आता और चाकू डोंगरा के शरीर के किसी हिस्से में घुस जाता।

कुछ ही वारों के बाद डोंगरा की सांसें थम गईं।

लेकिन रिंकी वही क्रिया दोहराती रही।

साथ ही वो भयानक ढंग से अपने सिर को झटका देते हुए दोहराती जा रही थी-''हमेशा...हमेशा...हमेशा...हमेशा...हमेशा...।"

''डोंगरा कहां है?"-अचानक जय का ध्यान काफी देर से कमरे से लापता डोंगरा की ओर गया।

अब तक अनुराग थोड़ा संभल चुका था। लेकिन उसका दिमाग अब भी सांय-सांय कर रहा था।

''वो शायद ऊपर गया है।"-अनुराग बोला-''शायद...शायद रिंकी के कमरे की निगरानी करने।"

''प्रीति भी नहीं दिख रही।"-जय चिंतित स्वर में बोला।

''प्रीति किचन में गई है।"-डॉली थके-से स्वर में बोली।

''मैं ऊपर डोंगरा के पास जा रहा हूं।"-अनुराग उठते हुए बोला-''शायद उसे मदद की जरूरत पड़े।"-कहकर अनुराग सीढिय़ों से ऊपर चला गया।

कमरे में अब वे तीन ही लोग थे।

अनुराग सीढिय़ां चढ़कर ऊपर की मंजिल पर पहुंचा।

वो जब सबसे ऊपर की सीढिय़ां चढ़ रहा था, तब उसे ऊपर कुछ अजीब-सी आवाजें सुनाईं दीं।

वो ऊपर पहुंचा, तब उसे समझ आया कि आवाजें उसी कमरे से आ रहीं थीं, जिसमें उन्होंने रिंकी को कैद किया था।

उसने गलियारे में कदम रखा। वहां आवाज सीढिय़ों के मुकाबले थोड़ी तेज थी लेकिन फिर भी साफ सुनाई नहीं दे रही थी।

कैसी आवाज थी वो?

उस आवाज में कुछ ऐसा था, जिससे न जाने क्यों अनुराग को दहशत सी हो रही थी।

वैसी ही दहशत, जैसी उसने उस रात सपने में उस डरावने आदमी को देखकर महसूस की थी।

न जाने क्यों उसे लगने लगा कि कुछ बहुत भयानक होने वाला था।

और सबसे बुरी बात तो ये थी कि ये कोई सपना नहीं था।

हकीकत थी।

अनुराग रिंकी के कमरे के दरवाजे के पास पहुंचा।

उसे देखकर हैरानी हुई कि दरवाजा बाहर से बन्द नहीं था। बल्कि दरवाजा बन्द ही नहीं था। बस भिड़ा हुआ था।

वहां आवाजें और साफ सुनाई दे रहीं थीं।

'खच्च...खच्च...हमेशा...हमेशा...खच्च...।'

अनुराग को अपने कदम भय से जड़ होते महसूस हुए। कुछ देर वो दरवाजे पर ही खड़ा रहा। फिर उसने अपनी पूरी हिम्मत बटोरकर दरवाजा खोला।

अन्दर का दृश्य देखकर उसे जैसे काठ मार गया।

अन्दर कमरे के बीचोंबीच दरवाजे के ठीक सामने रिंकी बैठी हुई थी। उसके सामने डोंगरा की लाश पड़ी थी। वैसे उसे लाश कहना ठीक नहीं था। अब वो लाश नहीं बल्कि खून से सना मांस का लोथड़ा बन कर रह गई थी। चाकू के अनगिनत वारों से उसे पहचानना भी मुश्किल हो रहा था।

और उसके पीछे बैठी रिंकी...

उसका चेहरा खून के छींटों से रंग गया था।

उसके बालों में भी खून के छींटें साफ दिख रहे थे। वो अब भी किसी मशीन की तरह डोंगरा की मांस का लोथड़ा बन चुकी लाश पर चाकू बरसाये जा रही थी। कमरे में चाकू बार-बार शरीर में गोदे जाने की 'खच्च...खच्च...' की आवाज गूंज रही थी।

और साथ ही गूंज रही थी रिंकी की आवाज।

वो सिर को बड़े अजीब ढंग से झटकते हुए बार-बार एक ही शब्द दोहरा रही थी-''हमेशा...हमेशा...।"

वो दृश्य देखकर अनुराग तो जैसे अपनी जगह पर पत्थर का हो गया।

उसे अपने शरीर में जान ही महसूस नहीं हो रही थी।

रिंकी के रूप में उसे साक्षात मृत्यु दिखाई दे रही थी।

तभी अचानक वक्त जैसे थम-सा गया।

रिंकी ने डोंगरा को बार-बार चाकू घोंपने की वहशियाना हरकत बन्द कर दी थी।

अपनी जगह पर पत्थर के बुत में तब्दील हो गये अनुराग की निगाहें जैसे उससे चिपककर रह गईं थीं।

उसे अपना दिमाग शून्य हो गया लग रहा था।

फिर रिंकी ने धीरे से डोंगरा की लाश पर से सिर उठाकर अनुराग की ओर देखा।

रिंकी का चेहरा...उफ्फफफ।

उसके चेहरे पर नजर पड़ते ही अनुराग के दिमाग को तेज झटका-सा लगा।

उसे ऐसा लगा, जैसे किसी ने उसे सम्मोहन की सी अवस्था से बाहर लाकर जमीन पर पटक दिया हो।

रिंकी का चेहरा खून के छींटों से भरा हुआ था।

लेकिन उससे भी ज्यादा डरावनी थीं उसकी आंखें...उसकी आंखों की पुतलियों के गिर्द सुनहरा चमकदार छल्ला चमक रहा था।

अनुराग पर नजर पड़ते ही वो जोर से खिलखिलाकर हंसी।

फिर जो हुआ

, वो अनुराग सपने में भी नहीं सोच सकता था।

रिंकी ने दोनों हाथ सामने डोंगरा की लाश के ऊपर रखे। उसकी नजरें अनुराग पर ठीक उसी तरह जमी हुईं थीं

, जैसे कोई शिकारी जानवर अपने शिकार पर नजरें जमाये हो। जिस तरह उसने सामने हाथ टिकाए थे

, वो शिकार पर झपटने के लिए तैयार किसी जानवर की तरह ही लग रही थी।
 
फिर वो अनुराग पर झपट पड़ी।

वो हरकत किसी भी हालत में इंसानी नहीं थी।‘

रिंकी दरवाजे से काफी दूर थी। लेकिन उसने ऐसी उछाल भरी जैसे वो कोई इंसान न होकर कोई शिकारी जानवर हो। उसका पूरा शरीर असामान्य तरीके से हवा में लहरा गया।

ऐन वक्त पर अनुराग की सर्वाइवल इन्स्ंिटक्ट ने उसका साथ दिया। उसने बला की फुर्ती से पीछे हटकर दरवाजा बंद कर दिया।

अन्दर दरवाजे से कोई चीज जोर से टकराई। जो कि जाहिर तौर पर रिंकी ही थी।

अनुराग ने उसी फुर्ती के साथ बाहर से दरवाजे में कुण्डी लगा दी और पीछे हटकर दीवार से चिपक गया। उसकी भयभीत निगाहें सामने दरवाजे पर थीं।

फिर दरवाजा अंदर की ओर से जोर से भड़भड़ाया जाने लगा।

अंदर की ओर से पड़ रही टक्करों से दरवाजा इतनी जोर से हिल रहा था कि लग रहा था कि अभी उखड़ जायेगा।

''अनुराग!"-अन्दर से रिंकी के चीखने की आवाज सुनाई दी-''दरवाजा खोलो...मुझे बाहर आने दो...मुझे...मुझे 'इस' के साथ अकेले मत बंद करो...बाहर आने दो मुझे...।-उसकी चीखती सी आवाज में अजीब किस्म की बेचैनी झलक रही थी।"

अनुराग क्या कहता? बोलना तो दूर की बात, वो अपने सूख कर लकड़ी हो रहे होंठों को हिला तक नहीं सका।

कुछ देर तक अन्दर से रिंकी दरवाजा खोलने के लिये चीखती रही, गिड़गिड़ाती रही।

फिर अचानक सन्नाटा छा गया।

अनुराग स्तब्ध सा दीवार से पीठ टिकाये सामने दरवाजे को देखता रहा।

फिर अचानक उसे अपने कन्धों के पास कुछ सरसराहट महसूस हुई।

उसने नजरेें झुकाकर देखने की कोशिश की कि उसके कन्धों पर क्या था?वो दो हाथ थे।सड़े-गले हाथ! जैसे किसी कई दिनों तक सड़ चुके मुर्दे के हों।और उन हाथों की उंगलियां भी साधारण नहीं थीं। जरूरत से कुछ ज्यादा ही लम्बी वे उंगलियां किसी सांप की तरह ही अनुराग के कंधों और गर्दन पर रेंग रहीं थीं।

अनुराग सिर से पांव तक पत्ते की तरह कांप उठा। उसने तुरंत वहां से हटने की कोशिश की लेकिन वे हाथ कुछ ज्यादा ही फुर्तीले निकले। उन्होंने अनुराग की गर्दन को दबोच लिया।

वो दीवार से निकले उन दोनों हाथों से अपनी गर्दन को छुड़ाने के लिये तड़प उठा। उसके दोनों हाथों ने उन शैतानी हाथों की कलाइयों को दबोच लिया और उनसे गर्दन को आजाद कराने की कोशिश करने लगे।

लेकिन शैतानी हाथों का शिकंजा कसता जा रहा था।और साथ ही घुटता जा रहा था अनुराग का दम!

सामने बन्द दरवाजे के पार से रिंकी के धीमे-धीमे हंसने की आवाज सुनाई दे रही थी।

''अनुराग...।"-हंसी के बीच से रिंकी की धीमी आवाज भी सुनाई दे रही थी, वो पहले की तरह चीख नहीं रही थी बल्कि ऐसी आवाज मेें बोल रही थी, जैसे उसकी उस हालत के मजे ले रही हो-''दरवाजा खोल दो...दरवाजा खोल दो न अनुराग...मैं रिंकी हूं...रिंकी...।"

उसके गले पर कसे हाथों की उंगलियां और भी लम्बी होकर किसी रस्सी की तरह अनुराग की पूरी गर्दन को अपने घेरे में कैद कर चुकीं थीं।

मौत को इतने करीब देखकर अनुराग ने अपनी पूरी ताकत झोंक दी। वो अपने हाथों से उन राक्षसी हाथों की कलाइयों को पकड़कर अपनी गर्दन को छुड़ाने की कोशिश करते हुए अपने शरीर को आगे की ओर खींच रहा था, जिससे उन हाथों के चंगुल से आजाद हो सके।

फिर अचानक उन हाथों ने उसकी गर्दन को आजाद कर दिया।

अपने आप को दीवार से दूर खींचने की कोशिश कर रहा अनुराग अचानक उन हाथों की कैद से आजाद होने पर खुद को सम्भाल नहीं पाया और जोर से सामने दरवाजे से जा टकराया।

उसका चेहरा जोर से दरवाजे से टकराया, जिससे उसे अपनी नाक में एकदम से गर्मी भर जाने जैसा अहसास हुआ और दिमाग में पटाखे से छूटते महसूस हुए।

वो दरवाजे से घिसटता हुआ जमीन पर ही गिर गया।

उन शैतानी हाथों से कुछ ही सेकेंडों के संघर्ष ने जैसे उसके शरीर से प्राण ही खींच लिए थे।

वो ऐसे हांफ रहा था, जैसे मीलों की रेस लगाकर आया हो।

उसका चेहरा बल्कि उसका पूरा शरीर ही पसीने से लथपथ हो चुका था।

उसने डरते-डरते पलटकर दीवार की ओर देखा।

दीवार पर उसकी हाइट की ऊंचाई पर गले के पास दीवार से निकले वो दोनों भयानक हाथ अब भी झूल रहे थे।

अनुराग आंखों में अविश्वास और दहशत लिए उन शैतानी हाथों को देखता रहा गया।

बीच-बीच में वो हाथ बुरी तरह फडफ़ड़ाते थे और उन से लटक रहीं लम्बी-लम्बी अमानवीय उंगलियां इस तरह आसपास घूमतीं थीं

, जैसे पकडऩे के लिए किसी चीज को तलाश कर रहीं हों।

वो दरवाजे से ही पीठ टिकाए उस भयानक दृश्य को देखता रहा।

वो उठकर भाग जाना चाहता था लेकिन दम घुटने के कारण उसे अपना दिमाग घूमता-सा महसूस हो रहा था।

फिर खुद पर काबू पाने के लिए उसने आंखें बंद कर लीं और वैसे ही दरवाजे से टिके हुए गहरी गहरी सांसें लेने लगा।

वो बस कुछ देर वैसे ही पड़े रहना चाहता था, जिससे अपने आप को थोड़ा सम्भाल सके।

जो कुछ उसने पिछले चंद मिनटों में देखा और महसूस किया था, उससे उबर सके।

उसे इस ख्याल से राहत मिली कि कम से कम उन शैतानी हाथों से तो पीछा छूटा।

खटाक्!

अचानक उसके सिर के ऊपर जोरदार आवाज हुई।

आवाज सुनते ही अनुराग की आंखें अपनी पूरी चौड़ाई में खुल गईं।

दरवाजा बिना कोई आवाज किए धीरे से अन्दर की ओर खुल गया।

खुद को लाख सम्भालने की कोशिश करने के बाद भी अनुराग का शरीर कमरे के अन्दर लुढ़कता चला गया।

पीछे दरवाजा भड़ाक की जोरदार आवाज के साथ ऐसे बन्द हो गया

, जैसे अब कभी नहीं खुलेगा।

गलियारा सुनसान था।

दीवार से निकले वो दोनों अमानवीय हाथ अब भी फडफ़ड़ा रहे थे, जैसे अपने शिकंजे में कसने के लिए किसी गर्दन की तलाश कर रहे हों।
 
दीवार से निकले वो दोनों अमानवीय हाथ अब भी फडफ़ड़ा रहे थे, जैसे अपने शिकंजे में कसने के लिए किसी गर्दन की तलाश कर रहे हों।

प्रीति किचन में पहुंची। उसने जग से एक गिलास में पानी भरा लेकिन उसे पीने के लिए गिलास को मुंह से लगाने ही वाली थी कि अचानक गिलास उसके हाथ से छूटते-छूटते बचा।

किचन में किसी बच्चे की हंसी की आवाज सुनाई दी थी।

प्रीति का चेहरा फक्क पड़ गया। उसने इधर-उधर देखा। थोड़ी ही दूर पर एक आठ-दस साल की उम्र का लड़का खड़ा उसे ही देख रहा था। उसके चेहरे पर मासूमियत के भाव थे। हालांकि उसके कपड़े काफी मैले-कुचैले हो रहे थे

, जैसे वो मिट्टी में लोट कर आया हो।

''तुम...।

"-प्रीति का स्वर कांप रहा था-

''तुम कौन हो?"

''मैं डेविड हूं।"-उसकी आवाज भी उसके चेहरे जैसी ही मासूम थी।

''तुम...तुम...यहां कैसे आए?"

''मैं तो यहीं रहता हूं।"-वो किचन के दरवाजे की ओर देखते हुए बोला। अचानक उसके चेहरे से मासूमियत गायब हो गई थी और वो डरा हुआ लगने लगा था।

प्रीति ने भी किचन के दरवाजे की ओर देखा।

वहां कुछ नहीं था।

वो किससे डर रहा था?

''वहां...क्या है?"-प्रीति भयभीत स्वर में बोली।

उस बच्चे ने प्रीति की ओर देखा, फिर अचानक उसका चेहरा गम्भीर हो गया।

''मौत।"-उसने कहा।

किचन का दरवाजा अचानक भड़ाक से बंद हो गया।

प्रीति के मुंह से चीख निकल गई।

उसने बच्चे की दिशा में देखा तो वो भी वहां नहीं था।

प्रीति ने आगे बढ़कर दरवाजा खोलने की कोशिश की तो उसका हैण्डल छूते ही उसके मुंह से चीख निकल गई।

दरवाजे का हैण्डल अंगारे की तरह दहक रहा था।

प्रीति ने तुरंत हाथ पीछे खींच लिया। उसने हाथ को देखा

, उस पर जलने का बड़ा-सा निशान था।

प्रीति ने वहां से निकलने के किसी दूसरे रास्ते की तलाश में किचन में नजरें दौड़ाई।

किचन में एकमात्र खिड़की थी लेकिन उसके आगे एक सीमेंट का बना काउंटर जैसा था-जैसा आम तौर पर किचन में होता है

, जिस पर गैस चूल्हा, स्टोव वगैरह रखते हैं।

प्रीति ने आनन-फानन में उस पर रखे सामान को हटाया और उस पर चढ़ गई। उसने खिड़की से बाहर झांककर देखा। वहां से जमीन काफी ऊंची लग रही थी। प्रीति ने एक पल के लिए बाहर देखा , फिर सीधे बाहर की ओर कूद गई।

जमीन पर गिरने के बाद वो जल्दी से उठ खड़ी हुई और दीवार के साथ-साथ चलते हुए मकान के सामने वाले हिस्से में पहुंची।

वहां हर तरफ अंधेरा छाया हुआ था।

मकान के सामने वाले मैदान जैसे हिस्से में जला हुआ केबिन और उनकी कारें खड़ीं थीं, जो कि अंधेरे के कारण साए जैसे दिख रहे थे।

प्रीति रूककर कुछ देर तक जले हुए केबिन को देखती रही।

यही एक तरीका था। इस मुसीबत से छुटकारा पाने का।

प्रीति ने एक बार पलटकर घर की ओर देखा, जो अंधेरे में किसी राक्षस की तरह सीना ताने खड़ा था, फिर उन कारों की ओर बढ़ गई।

वो इस घर को जलाकर खाक कर देगी। जैसे अनुराग ने उस केबिन को जलाकर खाक कर दिया।

पहले वो सब लोगों को बाहर बुला लेगी, फिर वो लोग पेट्रोल छिड़ककर उस मकान में आग लगा देंगें।

लेकिन उसे पेट्रोल चाहिए था।

राज और डॉली ने बताया था कि उन लोगों ने वहां आते समय रास्ते में एक पेट्रोल पंप से पेट्रोल लिया था।

प्रीति उनकी कार के पास पहुंची।

उसने कार के अगले हिस्से में झांककर देखा। वहां पेट्रोल की कैन नहीं थी।

कार की पीछे की एक खिड़की खुली थी। प्रीति ने उसमें झांककर देखा।

उसकी आंखें चमक उठीं।

सीट के नीचे पेट्रोल की कैन रखी दिखाई दे रही थी।

प्रीति ने कार के पिछले दरवाजे का हैंडल पकड़कर घुमाया।

दरवाजा खुल गया।

वो जल्दी से कार की पिछली सीट वाले हिस्से में घुस गई

कार के अंदर आने के बाद उसने सीट के नीचे रखी कैन का हैण्डल पकड़कर उसे खींचा। कैन हिली लेकिन बाहर नहीं आई। शायद वो किसी चीज से फंस रही थी।
 
प्रीति ने और ताकत लगाकर कैन को खींचा। इस बार कैन बाहर निकल आई।

प्रीति ने राहत की सांस ली। उसने कैन को हिलाकर देखा। पेट्रोल से भरी कैन भारी हो रही थी।

प्रीति के चेहरे पर संतोष की झलक थी।

तभी अचानक कार का दरवाजा भड़ाक की आवाज के साथ बंद हो गया।

प्रीति बुरी तरह चौंकी। उसने पलटकर देखा।

कार का दरवाजा अंदर से बंद हो चुका था।

कैसे...?

तभी उसे महसूस हुआ कि वो कार में अकेली नहीं थी।

ड्राइविंग सीट पर कोई बैठा था।

प्रीति ने डरते-डरते ड्राइविंग सीट की ओर देखा।

वहां वही पम्प अटेंडेंट बैठा था

, जिसकी तस्वीर उसने स्टोर रूम मे मिली उस किताब में मिली अखबार की कटिंग में देखी थी।

जिसके बारे में राज और डॉली ने भी उन्हें बताया था।

प्रीति सीट पर जैसे चिपककर रह गई। उसकी एक झलक ने ही उसके सारे मसामों ने पसीना उगल दिया।

नहीं...नहीं...।

वो कार से निकलकर भाग जाना चाहती थी लेकिन उसे अपने अंदर एक उंगली हिलाने जितनी ताकत नहीं लग रही थी।

तभी उसका ध्यान पैरों के पास हो रही हलचल पर गया।

कैन नीचे गिरी हुई थी और उसका ढक्कन भी खुल गया था

, जिससे पेट्रोल की मोटी धार निकलकर कार के फर्श को भिगो रही थी।

वो जैसे जड़वत-सी होकर कैन से बहते पेट्रोल को देखती रह गई।

देखते ही देखते उसके पैर एडिय़ों तक पेट्रोल में डूबने लगे।

कितना पेट्रोल था उस कैन में ?

प्रीति ने डरते-डरते सामने ड्राइविंग सीट पर बैठे उस पम्प अटेडेंट की ओर देखा।

उसके होंठों पर एक भयानक मुस्कान थी और हाथ में एक जलता हुआ लाइटर!

उसने लाइटर पिछली सीट वाले हिस्से की ओर उछाल दिया।

कार के अंदर का हिस्सा आग की लपटों में घिर गया।

प्रीति की चीखें रात के भयावह सन्नाटे को चीरती चली गईं।

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''मैं अभी आई।"-डॉली उठी और सीढिय़ों की ओर बढ़ गई।

''कहां जा रही हो?"-राज बोला।

''मुझे अनुराग से कुछ बात करनी है।"-कहकर डॉली सीढिय़ों से ऊपर चली गई।

राज डॉली के पीछे जाने की सोच ही रहा था कि अचानक किचन की ओर से जोर से दरवाजा बंद होने की आवाज सुनाई दी।

राज ने जय की ओर देखा , फिर दोनों बिजली की फुर्ती से लपकते हुए किचन के पास पहुंचे।

किचन का दरवाजा बाहर से बंद था।

'प्रीति।"-जय ने दरवाजा भड़भड़ाया लेकिन अंदर से कोई जवाब नहीं मिला।

राज ने दरवाजे का हैण्डल पकड़कर खोलने की कोशिश की लेकिन हैण्डल अंगारे की तरह सुलग रहा था। उस पर हाथ रखते ही राज को तुरंत हाथ वापस खींचना पड़ा।

''य...य...ये क्या है?"-राज हैरानी से दरवाजे के हैण्डल को देखते हुए बोला।

''क्या हुआ?"-जय बोला।

''ये हैण्डल तो...दहक रहा है।"

''हटो।"-जय ने राज को पीछे हटने के लिए कहा। गलियारा संकरा होने के कारण वहां ज्यादा जगह नहीं थी। वो गलियारा ऊपर वाले गलियारे जितना चौड़ा नहीं था। राज के पीछे हटते ही जय ने जोर से दरवाजे में लात मारी। फिर कंधे से टक्कर मारी।

दो-तीन टक्करों में दरवाजा खुल गया।

दोनों किचन के अंदर पहुंचे।

किचन खाली था।

''प्रीति कहां गई?"-जय के होश उड़े हुए थे।

राज ने स्टैण्ड पर बिखरे सामान को देखा, फिर उस झुककर खिड़की से बाहर झांकने की कोशिश की।

बाहर अंधेरा था।

''प्रीति!"-राज ने आवाज लगाई।

तभी उसे मकान के सामने के हिस्से से अजीब सी रोशनी उठी।

जैसे कुछ जल रहा हो।

साथ ही प्रीति की चीख सुनाई दी।

''प्रीति! "-राज जोर से चिल्लाया, फिर पलटकर गलियारे से होते हुए मीटिंग रूम के रास्ते घर से बाहर निकला। जय भी उसके पीछे ही था।

घर के बाहर का दृश्य देखकर दोनों को अपनी रगों में बहता खून जमता महसूस हुआ।

सामने राज की कार धूं-धूं करके जल रही थी और उसमें से प्रीति की चीखें सुनाईं दे रहीं थीं।

चीखें अब क्षीण होती जा रहीं थीं।

फिर चीखें बिल्कुल बंद हो गई।

''प्रीति!"-राज चीखते हुए कार की ओर दौड़ा। वो कार के पास पहुंचकर जलती हुई कार का दरवाजा खोलना चाहता था लेकिन उससे पहले ही जय ने उसे पीछे से दबोच लिया।

''छोड़ो!"-उसकी पकड़ से आजाद होने के लिए छटपटाता राज चीखा-''छोड़ो मुझे। मुझे प्रीति को बचाना होगा।"

''नहीं।"-जय को उसे रोकने के लिए पूरी ताकत लगानी पड़ रही थी। जय की आंखों से भी आंसुओं की धार बह कर उसके गालों को गीला कर रही थी-''हम कुछ नहीं कर सकते। कार पूरी जल रही है...।"

''नहीं...। प्रीति...।"-राजगला फाड़ कर चिल्लाया।

थोड़ी देर पहले अंधकार में डूबा हुआ घर के सामने का मैदान कार से उठती आग की लपटों से रोशन हो रहा था।

जय उसे तब तक मजबूती से पकड़े रहा, जब तक उसने राज के प्रतिरोध को क्षीण होता महसूस नहीं किया। फिर उसने धीरे से उसे अपनी बांहों की कैद से आजाद कर दिया।

''प्रीति।"-राज फूट-फूट कर रोते हुए जलती हुई कार के सामने ही घुटनों के बल बैठ गया-''प्रीति...।"

जय फटी-फटी आंखों से सामने जलती हुई कार को देख रहा था।

कार के अंदर धूं-धूं करके उठती आग की लपटों के बीच पिछली सीट पर कोयले की तरह काला हो चुका मानव शरीर दिखाई दे रहा था।

अचानक जय की चीख सुनकर राज का ध्यान जय की ओर गया।

उसने जय की ओर देखा तो पाया कि वो किसी चीज से छूटने की कोशिश कर रहा था।
 
राज ने उसके पैरों की ओर देखा। जमीन से निकले दो हाथ...नहीं...वो दो हाथ नहीं थे....बल्कि पांच-छ: हाथों ने जय के पैरों को मजबूती से पकड़ रखा था और उसे नीचे खींचने की कोशिश कर रहे थे।

''जय।"-राज चीखा और उसने झपटकर जय को पकड़ लिया और उसे खींचते हुए जमीन से निकले उन हाथों के चंगुल से आजाद कराने की कोशिश करने लगा।

लेकिन उन हाथों की संख्या बढ़ती ही जा रही थी। वे अब पांच-छ: से सात-आठ हो चुके थे। और सभी हाथ अलग-अलग लोगों के थे। कोई पतला, कोई मोटा लेकिन वे सारे हाथ सड़े-गले मुर्दों के ही लग रहे थे। उनमें से कुछ हाथ तो लम्बे होते जा रहे थे और ऊपर चढ़ते हुए उन्होंने जय के पैरों को घुटनों के पास से भी पकड़ लिया।

ये देखकर राज की आंखें फैल गईं कि वो हाथ जय को जमीन के अंदर खींचे ले रहे थे। जय के जूते तक पैर जमीन में धंस भी चुके थे और बाकी भी धंसते जा रहे थे।

जमीन के उस हिस्से में आस पास और भी हाथ निकल आए थे, जो इस तरह लहरा रहे थे, जैसे पकडऩे के लिए कोई चीज तलाश कर रहे हों।

जय ने नीचे जमीन में धंसते जा रहे अपने पैरों को देखा, जमीन से निकलते आ रहे हाथों की बढ़ती संख्या को देखा, फिर उसने पूरी ताकत से राज को अपने से दूर धक्का दे दिया।

राज लडख़ड़ाते हुए पीछे जा गिरा।

उसकी इस हरकत पर राज हक्का-बक्का रह गया।

उसने हैरानी से जय की ओर देखा।

राज के अलग होते ही वो हाथ अब जय को और भी आसानी से जमीन के अंदर खींच रहे थे। वो अब घुटनों तक जमीन में धंस चुका था।''जाओ।"-आंखों में बेबसी लिए जय राज की ओर देखते हुए चीखा-''मैं अब नहीं बचूंगा। वैसे भी इस दुनिया में मेरे लिए अब कुछ नहीं रहा। प्रीति...।"

राज विस्फारित नेत्रों से उसे देखता रह गया।

वो अब कमर तक जमीन में धंस चुका था। लम्बे हो रहे हाथ अब उसके कंधों तक पहुंच रहे थे। उसके चेहरे तक पहुंच रहे थे।

''जाओ। डॉली को ढूंढो। और तुम दोनों यहां से भाग जाओ। दूर चले जाओ।"

अब हाथों ने जय को लगभग पूरी तरह ढंक लिया था। वो सीने तक जमीन में धंस चुका था।

उसके चेहरे को भी हाथों ने ढंक लिया था। उन शैतानी हाथों के बीच से राज को जय की आंख दिखाई पड़ी और उसके चीखने की आवाज सुनाई दी-

''जाओ।"

फिर देखते ही देखते उन हाथों ने जय को पूरा जमीन के नीचे खींच लिया।

राज किसी तरह खुद को संभालाते हुए उठकर खड़ा हुआ। जलती हुई कार की रोशनी में जमीन पर अब कुछ ही हाथ दिखाई दे रहे थे। जय को लेने के लिए जो बहुत सारे हाथ निकले थे

, वो अब उसे लेकर जमीन के अंदर जा चुके थे।

जय की जिंदा कब्र बन चुकी थी।

राज ने एक नजर जलती हुई कार पर डाली, फिर घूमकर लडख़ड़ाते हुए वापस घर में प्रवेश कर गया।

उसका दिमाग सांय-सांय कर रहा था।

क्या उनमें से कोई जिंदा नहीं बचने वाला था?

अंदर कमरे में आने के बाद उसने एक बार फिर पलटकर दरवाजे से बाहर की ओर देखा। बाहर का दृश्य देखकर राज को अपने दिल की धड़कन रूकती हुई-सी महसूस हुई।

बाहर अब जमीन से कुछ लोग निकलकर बाहर आ रहे थे।

दो...चार...नहीं...वो बहुत सारे लोग थे।

राज में अब इससे ज्यादा देखने की हिम्मत नहीं थी। उसने जल्दी से दरवाजा बंद कर दिया।

बाहर से अब अजीब-अजीब आवाजें सुनाई देने लगीं थीं। किसी के रोने की, किसी के कराहने की, किसी के दर्द से चीखने की।

दरवाजा बंद करने के बाद उसने अपने दिमाग को ठिकाने पर लाने की कोशिश की। फिर किसी हथियार की तलाश में इधर-उधर नजरें दौड़ाईं।

थोड़ी दूरी पर उसे वो बड़ा-सा रैंच पड़ा नजर आया, जिसे अनुराग ने स्टोर रूम का ताला तोडऩे के लिए इस्तेमाल किया था।

राज ने झपटकर वो रैंच उठा लिया।

तभी दरवाजे पर बाहर से दस्तक पड़ी।

राज फिर दरवाजे की ओर घूम गया। उसने हाथों में रैंच मजबूती से पकड़ रखा था।

दरवाजे पर पडऩे वाली दस्तक तेज होने लगी। फिर ऐसा लगने लगा, जैसे एक नहीं बल्कि कई आदमी एक साथ दरवाजा खटखटा रहें हों। दस्तक तेज होती गई। फिर दरवाजा जोर-जोर से भड़भड़ाया जाने लगा। दरवाजा जोर-जोर से हिलने लगा। ऐसा लग रहा था पूरा दरवाजा चौखट से उखड़कर आ गिरेगा।
 
दरवाजे पर पड़ रही चोटों से भी ज्यादा डरावनी दरवाजे के उस पार से आ रहीं आवाजें थीं। बाहर से चीखने, दर्द से कराहने, रोने और किसी के भयानक ढंग से हंसने की मिली-जुली आवाजें सुनाईं दे रहीं थीं।

राज का दिल इतनी जोरों से धड़क रहा था, जैसे सीना फाड़कर बाहर निकल आयेगा।

फिर अचानक दरवाजे पर चोंटें पडऩी बंद हो गईं।

तभी किसी ने उसके कंधे पर हाथ रखा।

राज चौंककर पीछे घूमा। शायद वो वार कर ही देता लेकिन उसके पीछे खड़ी डॉली जोर से चीखी-

''राज, ये मैं हूं।"

डॉली को देखकर राज ने मीलों लंबी राहत की सांस ली। उसने आगे बढ़कर एक हाथ से डॉली को गले लगा लिया।

''थैंक गॉड!"-वो होंठों ही होंठों में बुदबुदाया-''थैंक गॉड, डॉली तुम ठीक हो।"

''चलो!"-फिर डॉली उसके हाथ को पकड़कर खींचते हुए अंदर वाले कमरे की ओर बढ़ी-''मुझे पता है हमें कहां जाना है।"

राज एक हाथ में रैंच थामे उसके पीछे चलने लगा। रैंच काफी बड़ा और भारी था, जिससे उसे एक हाथ में पकडऩे में काफी दिक्कत हो रही थी।

दोनों'मीटिंग रूम' के बाद वाला कमरा पार करके पिछले गलियारे में पहुंचे, जिसके अंत में वो दरवाजा था, जो घर के पिछले हिस्से में खुलता था।

गलियारे के अंत तक पहुंचकर पिछले दरवाजे के सामने उनके पैर थम गये।

''इसे तोड़ो।"-डॉली ने उसे दरवाजे पर झूल रहे ताले को तोडऩे के लिये कहा।

राज का रैंच वाला हाथ ऊपर उठा और तीव्रगति के साथ नीचे आया। लोहे से लोहा टकराने की जोर की आवाज गलियारे में गूंजी।

पीछे सबसे बाहर वाले कमरे में दरवाजे पर पड़ रही टक्करों की आवाज तेज हो गई थी। राज को तो इसी बात की हैरानी थी कि वो दरवाजा उतनी देर तक टिका कैसे हुआ था?

राज ने दोबारा-और भी ताकत से-ताले पर वार किया। लेकिन ताला अब भी अपनी जगह पर डटा हुआ था।

तभी बाहर वाले कमरे का दरवाजा टूटने की जोरदार आवाज सुनाई दी।

डॉली ने फुर्ती से गलियारे के अंदर वाला दरवाजा बंद कर दिया। वो दरवाजा बंद होते ही पूरा गलियारा अंधेरे में डूब गया। बाहर वाले कमरे से जो थोड़ी बहुत रोशनी गलियारे में आ रही थी, वो भी बंद हो गई।

पीछे के कमरों में कई लोगों के पैरों की आवाजें सुनाईं पड़ीं, फिर गलियारे के बंद दरवाजे पर भी जोरदार टक्कर पड़ी।

राज ने अंधेरे में ही अंदाजे से पूरी ताकत से ताले पर एक और वार किया।

इस बार ताला टूटकर नीचे जा गिरा।

ताला टूटते ही डॉली ने फुर्ती से कुण्डी खोलकर दरवाजा एक झटके से खोल दिया।

अब उनके सामने मकान का पिछला हिस्सा और अंधेरे में डूबा हुआ जंगल था।

डॉली ने राज का हाथ पकड़ा और दोनों तेजी से पिछले दरवाजे से बाहर निकल गए। डॉली तेजी से सामने अंधेरे जंगल की ओर जाना चाहती थी लेकिन राज ने उसका हाथ खींचकर उसे आगे से बढऩे से रोके रखा।

''क्या हुआ?"-डॉली ने तेज स्वर मे कहा। वो एक क्षण के लिये भी रूकना नहीं चाहती थी।

जवाब देने की जगह राज एक ओर को बढ़ गया। डॉली ने देखा कि वो किस ओर जा रहा था तो वहां अंधेरे में एक बुरी तरह मुड़ा-तुड़ा शरीर पड़े देख कर उसकी आंखें फैल गईं।

वो अनुराग था।

राज जमीन पर पड़े अनुराग के पास जाकर गिरने के से अंदाज में घुटनों के बल बैठ गया।

अनुराग की गर्दन पूरी तरह मुड़ी हुई थी। उसके हाथ पांव भी बुरी तरह मुड़े-तुड़े हुए लग रहे थे, जैसे उन्हें पूरी तरह घुमा दिया गया हो। वो पेट के बल जमीन पर पड़ा था लेकिन उसका चेहरा ऊपर आसमान की ओर था। उसकी आंखें...।

आंखें थीं ही नहीं।आंखों की जगह दो बड़े-बड़े काले गढ्ढे थे।वो मर चुका था।

लाश की हालत देख कर ऐसा लग रहा था, वो ऊपर से नीचे गिरा था।

राज का सिर अपने-आप ही ऊपर उठता चला गया।

ऊपर नजर पड़ते ही राज को ऊपर देखने के अपने फैसले पर ही अफसोस होने लगा।

ऊपर की मंजिल की खिड़की पर रिंकी बैठी थी।

उसके दोनों हाथ खिड़की के अगल-बगल के हिस्सों पर जमे हुए थे, घुटने मोड़ कर उसने अपने पैर खिड़की की चौखट पर टिका रखे थे और वो एकटक राज की ओर ही देख रही थी। उसके होंठ खून से सने हुए थे और मुंह खुला हुआ था।

सबसे भयानक थीं उसकी आंखें...।

अंधेरे में उसकी आंखें बल्ब की तरह चमक रहीं थीं। बल्कि चमक नहीं रही थीं, दहकते हुए अंगारों की तरह लग रहीं थीं। आंखों की पुतली के गिर्द सुनहरे रंग का छल्ला चमक रहा था।

''राज!"-पीछे से डॉली जोर से चिल्लाई।

डॉली की चीख सुनकर राज की तन्द्रा भंग हुई। उसी क्षण रिंकी ने ऊपर खिड़की से नीचे सीधे उसके ऊपर छलांग लगा दी।

राज भी आखिरी पल में पूरी फुर्ती का प्रयोग करते हुए जल्दी से वहां से हट गया और पूरी ताकत से डॉली की और दौड़ा, जो जंगल की सीमा सी बना रहे पेड़ों की कतार के पास खड़ी थी।

उसे पीछे कदमों की आवाजें तो सुनाई दीं लेकिन वो किसी एक आदमी के चलने की आवाजें नहीं थीं बल्कि ऐसा लग रहा था कि कई लोग एक साथ चल रहे थे।

डॉली के पास पहुंचने के बाद राज पीछे देखने का लाभ संवरण नहीं कर पाया। हालांकि जिस तरह रिंकी उस पर झपटी थी, उससे वो अच्छी तरह जानता था कि उसका भाग कर वहां तक भी आ पाना किसी चमत्कार से कम नहीं था।

वो तो मौत थी, जो किसी भी पल झपटकर उसे अपने पंजे में ले सकती थी।

राज ने पीछे देखा तो उसे अनुराग की लाश के पास ऊपर खिड़की की ओर देखने की तरह ही पीछे देखने का भी अफसोस हुआ।

दृश्य ही कुछ ऐसा था।

रिंकी-जिसे कि वो समझ रहा था कि वो उसके पीछे झपटेगी-अनुराग की लाश के ऊपर चढ़ी बैठी थी और अपनी दहकती सुनहरी आंखों से उसी की ओर देख रही थी।

घर के पिछले दरवाजे से कई लोग निकलकर उनकी ओर आ रहे थे।

लेकिन वो लोग...।

वो लोग नहीं थे।

वो तो लाशें थीं।

और लाशें भी साधारण नहीं बल्कि अलग-अलग टुकड़ों से बनी हुई लाशें।

किसी आदमी के धड़ पर औरत का सिर था तो किसी औरत के धड़ पर आदमी का सिर, किसी की एक बांह मोटी थी तो दूसरी पतली, एक पैर किसी और का था तो दूसरा पैर किसी और का, ऐसा लग रहा था जैसे फ्रैन्केस्टाइन के शैतान की तरह शरीर के अलग-अलग टुकड़े जोड़कर उन्हें बनाया गया था। उनके अंग भी गल-सड़कर भयानक बेहद भयानक दिख रहे थे।

वो दृश्य कभी न भूलने के लिए अनुज के दिमाग पर छप गया।

''राज, चलो।"-चीखती हुई डॉली ने उसका हाथ पकड़ा और उसे लेकर अंधेरे जंगल में प्रवेश कर गई।

मौत हर पल उनके पास आती जा रही थी।

क्या वो लोग सचमुच मौत से बचकर भाग सकते थे?

क्या सचमुच कोई मौत से बचकर भाग सका है?

तभी राज को अहसास हुआ कि वे लोग किस ओर भाग रहे थे।

वहीं तो आगे वो पुराना कब्रिस्तान था, जिसमें वो आठ कब्रें खुदी हुईं थीं।

शायद उन्हीं के लिये।

वो लोग कब्रिस्तान की ओर क्यों जा रहे थे?

अचानक उसे डॉली के दिमाग पर संदेह होने लगा।

क्या डॉली पागल हो गई थी?वो किसी भी हालत में उस कब्रिस्तान में नहीं जाना चाहता था।

''डॉली!"-राज ने प्रतिरोध जताने की कोशिश की।

''बस!"-अचानक डॉली दौडऩा बंद करके जमीन पर गिर गई-''यहीं पर। यहीं रूक जाओ।"
 
जंगल के बीच में इस तरह डॉली का वहां रूक जाना राज की बिल्कुल भी समझ में नहीं आया लेकिन उसने आदेश का पालन किया। वो भी डॉली की तरह वहीं जमीन पर गिर गया।

उसने डॉली की ओर देखा। वो कातर नजरों से चारों ओर देख रही थी। उनके चारों ओर घने अंधेरे में डूबा जंगल था।

वहां उन्हें बचाने वाला कोई नहीं था।

फिर डॉली को किस चीज की उम्मीद थी?डॉली का चेहरा देखकर राज को झटका-सा लगा।

वो बुरी तरह घबराई हुई, डरी हुई लग रही थी।

अब वही दोनों तो बचे थे।और उनके ज्यादा देर तक बचे रहने के आसार भी नहीं थे।

डॉली के चेहरे की ओर देखते हुए राज ने मन ही मन दृढ़ निश्चय किया।

चाहे कुछ भी हो, उन शैतानों को पहले उससे टकराना होगा। उसके बाद ही वो डॉली तक पहुंच सकते थे।

हालांकि अपने उस निश्चय पर उसे खुद ही शंका थी। आखिर वो उन शैतानों को डॉली तक पहुंचने से कैसे रोक सकता था

?नहीं रोक सकता था।अपनी जान देकर भी नहीं।

तभी राज को जमीन पर कुछ अहसास हुआ। उसने अंधेरे में ही जमीन पर हाथ रख कर जायजा लिया।

मिट्टी भुरभुरी थी। उसने अंधेरे में आंखें फाड़-फाड़कर जमीन को देखने की कोशिश की।

ऐसा लग रहा था, जमीन के उस हिस्से पर हाल ही में खुदाई की गई थी।

तो क्या वे लोग किसी कब्र पर लेटे थे?राज ने अविश्वसनीय भाव से डॉली की ओर देखा।

वो उसे ऐसी जगह लेकर क्यों आई थी?

तभी डॉली ने हाथों से ही जमीन को खोदना शुरू कर दिया।‘’

''डॉली!"-राज ने तीव्र स्वर में प्रतिरोध जताया-''ये क्या कर रही हो...?"

''खोदो इसे!"-डॉली तेज स्वर में बोली।

उनके पीछे कदमों की आहटें पास आ गईं थीं।

''डॉली चलो यहां से!"-राज ने उसका हाथ पकड़कर वहां से उठने की कोशिश की लेकिन डॉली ने जोर से उसका हाथ झटक दिया और और भी तेजी के साथ जमीन से मिट्टी खोदने लगी। उसका पूरा ध्यान बस जमीन को खोदने की ओर था।

''ये तुम क्या कर रही हो?"-राज चीख पड़ा-''वो शैतान हमारे एकदम पास आ गये हैं और तुम यहां कब्र खोदने में लगी हो...।"

''ये कब्र नहीं है!"-डॉली भी जवाब में चीख पड़ी-''ये वही जगह है, जहां डोंगरा ने उस सन्दूक को दबाया था।"

सन्दूक!

राज डॉली के बगल में ही घुटनों के बल बैठ गया और उसी की तरह हाथों से जमीन को खोदने लगा।

हालांकि उसे इस बात पर अधिक विश्वास नहीं था कि वहां नीचे से जो निकलेगा, उससे उनकी जान बच सकेगी लेकिन उसे इस बात की सम्भावना भी कम ही लग रही थी कि वे लोग वहां से भाग कर बच सकते थे।

उसे डॉली पर विश्वास था।

जमीन कुछ ही दिन पहले खोदी गई थी, जिससे उसे खोदने में ज्यादा दिक्कत नहीं आ रही थी। कुछ ही देर में वे गढ्ढा खोद चुके थे। उनके पीछे आने वाले वो शैतान अब तक उन तक पहुंच चुके होते लेकिन अब तो उनके कदमों की आवाजें भी सुनाई नहीं दे रहीं थीं।

अचानक राज का हाथ किसी ठोस चीज से टकराया।

डॉली ने फटाफट उस संदूक को खींचकर बाहर निकाला। अब तक राज की आंखें अंधेरे की इतनी अभ्यस्त हो चुकीं थीं कि वो उस संदूक को देखते ही पहचान गया।

वो वही संदूक था, जिसमें उस मनहूस जगह में आने के पहले ही दिन डोंगरा ने उनके सारे धार्मिक प्रतीक चिह्नों वाले लॉकेट, ब्रेसलेट वगैरह रखवा लिए थे।

डॉली ने जल्दी से संदूक खोला और उसमें रखे लॉकेट वगैरह निकाल कर हाथ में पकड़ लिए, फिर उसने राज का हाथ पकड़कर उसे अपने और पास खींच लिया और उससे लगभग चिपक सी गई। उसने राज का हाथ पकड़ कर अपने हाथ में रखे उन लॉकेट वगैरह पर ही रखवा लिया।

''क्या इससे काम होगा?"-राज ने पूछा।

डॉली ने जवाब नहीं दिया। उसने अंधेरे में भी पता नहीं कैसे ओम वाला लॉकेट ढूंढ निकाला था और उसे अपने गले में पहनकर उसे होंठों से लगाकर धीमी आवाज में लेकिन तेजी से हनुमान चालीसा का जाप कर रही थी।

अनुज ने भी उसका अनुसरण करते हुए वैसा ही एक लॉकेट अपने गले में पहन लिया। हालांकि अंधेरे में उसे पता नहीं चला कि उस लॉकेट पर क्या बना था। अचानक उसे अपने शरीर में ऊर्जा का संचार-सा महसूस होने लगा। अभी थोड़ी देर पहले उसे जहां उन दोनों के बचने की कोई सम्भावना नजर नहीं आ रही थी, वहीं एकदम से पता नहीं क्यों, उसे ऐसा लगने लगा, जैसे अब उनका कोई कुछ नहीं बिगाड़ सकता था।

अनुज खुद हैरान था। उसे अपने अंदर सकारात्मक ऊर्जा का संचार होता महसूस हो रहा था। उसे लगने लगा कि वो अब डॉली के साथ आराम से वहां से टहलते हुए दूर सड़क तक जा सकता था।

राज उठने भी लगा लेकिन डॉली ने उसका हाथ पकड़कर उसे वैसे ही बैठे रहने का इशारा किया।

राज ने विरोध नहीं किया। डॉली ही उसे वहां तक लेकर आई थी।

वो उसका विरोध नहीं कर सकता था।

डॉली लगातार हनुमान चालीसा पढ़ रही थी। राज ने महसूस किया कि वो धीरे-धीरे कांप भी रही थी। राज के मन में उसे सांत्वना देने, हिम्मत बंधाने की तीव्र इच्छा हुई लेकिन वो उसे बीच में टोकना नहीं चाहता था।

अचानक कुछ ऐसा हुआ कि राज को अपने अंदर की सारी सकारात्मकता हवा में गुम होती महसूस हुई।

उनके चारों ओर अंधेरे जंगल में चीख-पुकार, डरावनी आवाजों का शोर उठ खड़ा हुआ।

चारों ओर से ऐसी दर्दभरी चीखों की आवाजें आ रहीं थीं, जैसे लोगों को जिंदा काटा जा रहा हो। कोई एक नहीं बल्कि कई सारे लोग चीख रहे थे। रोने, कराहने, चीखने की हौलनाक आवाजें। घने अंधेरे जंगल से आ रही वो आवाजें किसी को भी हार्ट अटैक लाने के लिये काफी थीं। डॉली एक बार जोर से कांपकर राज के साथ और भी ज्यादा सट गई। राज ने भी उसे बांहों के घेरे में लेकर मजबूती से अपने से चिपका लिया। उसकी आंखें अंधेरे जंगल का जायजा ले रहीं थीं लेकिन पेड़ों के सायों के सिवा कुछ भी नहीं दिख रहा था। वो आवाजें चारों ओर से आ रहीं थीं। राज को ऐसा लग रहा था , जैसे वो आवाजें सिर्फ उसके कानों में ही प्रवेश नहीं कर रहीं थीं बल्कि किसी ठोस चीज की तरह उसके सिर को भी तोड़कर सीधे उसके दिमाग में घुस जाना चाह रहीं थीं। उसे ऐसा लग रहा था, जैसे उसके सिर को चारों ओर से किसी ठोस चीज से दबाया जा रहा था और किसी भी वक्त उसका सिर फट सकता था। उसे लग रहा था कि वो पागल हो जायेगा।

उसे अपनी आंखें बंद होती महसूस हुईं। उसे ऐसा लगा जैसे उसकी आंखें बंद हो गईं हों। वैसे भी वहां इतना अंधेरा था कि आंखें खुली रहने पर भी बंद जैसी ही लग रहीं थीं।

अचानक राज की आंखों के सामने उस मकान के सामने के मैदान का दृश्य साकार हो गया।

दिन का समय।

चारों ओर वीभत्स लाशें बिखरी हुईं थीं।

दर्द से तड़पते, रहम की भीख मांगते लोग।

उनके बीच में हाथ में खून से सनी कुल्हाड़ी लिए हुलिये और वेशभूषा से अंगे्रज अधिकारी लगने वाला एक दरिंदा।

वो तो वही था, जिसकी तस्वीर उन लोगों को स्टोर रूम में रखी उस किताब में मिली थी।

लेकिन वो तस्वीर उसे इस वक्त क्यों दिख रही थी ?

नहीं।वो तस्वीर नहीं थी। वो सजीव दृश्य था।

अचानक हाथ में खून टपकाती कुल्हाड़ी लिए वो अंग्रेज अधिकारी राज की ओर घूमा।

उसकी आंखें किसी पिशाच की तरह लग रहीं थीं। सामान्य से काफी बड़ी और जलते अंगारों की तरह दहकती हुई। कुछ-कुछ वैसी ही, जैसी रिंकी की आंखें हो गईं थीं लेकिन उसकी आंखें रिंकी की आंखों ज्यादा डरावनी लग रहीं थीं।

राजको उसकी नजरें अपने शरीर को भेदती सी महसूस हुईं। वो हाथ में कुल्हाड़ी लिए राज की ओर बढ़ा।

राज हतप्रभ-सा उसे अपनी ओर आते देखता रहा। वो अपने शरीर को हिला भी नहीं पा रहा था।

वो पिशाच राज के बिल्कुल पास आकर खड़ा हो गया। उसने एक हाथ में कुल्हाड़ी पकड़ी हुई थी और दूसरा हाथ राज की ओर बढ़ाया। उसका वो हाथ भी खून से सना हुआ था। बल्कि उस हाथ पर कुल्हाड़ी से ज्यादा खून लगा था।

राज को कुल्हाड़ी से ज्यादा डर उसके उस हाथ से लग रहा था। वो हाथ राज के नजदीक आता जा रहा था। राज को एक अनजाना भय अपने अंदर गहराई तक समाता हुआ महसूस हो रहा था। उसे लग रहा था वो अब जिंदा नहीं बचेगा।

आज हर हालत में उसकी मौत पक्की थी। इतनी भागदौड़ के बाद जब जीने की कुछ उम्मीद बंधी थी लेकिन अब वो फिर खुद को मौत के मुहाने पर खड़ा महसूस कर रहा था।

उसे लग रहा था, उस हाथ ने उसे छू दिया तो उसकी हालत मुर्दों से भी बद्तर हो जाएगी। वो किसी भी हालत में उस पिशाच के स्पर्श से बचना चाहता था। वो मर जाना चाहता था लेकिन उस हाथ से बचना चाहता था।

तभी उसे अपने हाथ पर दबाव महसूस हुआ।

एक झटके से वो उस मायालोक से बाहर निकल आया।

वो वहीं जंगल में था।

डॉली उसका हाथ दबा रही थी।

डॉली उसे वापस लाई थी।

जैसे अभी थोड़ी देर पहले डॉली ने उस जगह पर लाकर उसकी जान बचाई थी, वैसे ही अभी उस मायालोक से भी डॉली ने बाहर निकाला था।

राज को डॉली पर बेपनाह गर्व का अनुभव हुआ।‘

अंधेरे जंगल में चारों ओर से दर्दभरी खून जमा देने वाली चीख-पुकारों की आवाजें अब भी आ रहीं थीं लेकिन अभी-अभी उस मायालोक में उस पिशाच को इतने करीब से देखने और उसके खूनी हाथ के स्पर्श से बचने के बाद राज को वो आवाजें उतनी डरावनी नहीं लग रहीं थीं।

तभी उन आवाजों में कुछ और आवाजें भी शामिल हो गईं।

कुछ लोगों के हंसने-खिलखिलाने की आवाजें।

वो सब-आवाजें आपस में घुली-मिली जा रहीं थीं, जिससे उनमें अंतर करना मुश्किल हो रहा था लेकिन अनुज फिर भी उनमें से कुछ आवाजों को पहचान पाया।

एक बच्चे की खिलखिलाहट।

वैसी ही जैसी उन लोगों ने वहां पास में ही स्थित उस कब्रिस्तान में सुनी थी।

एक लड़की के हंसने की आवाज।

ध्यान से सुनने पर उन्हें समझ आया कि वो रिंकी की ही आवाज थी।

और एक पुरूष के हंसने की आवाज लेकिन वो आवाज बेहद भयानक लग रही थीे। उस आवाज में पता नहीं ऐसा क्या था कि उसे सुनकर खून जम जाने जैसा अहसास हो रहा था।

जाने क्यों राज को लगा कि वो आवाज उसी पिशाच की थी, जिससे अभी थोड़ी देर पहले जागती आंखों से देखे उस सपने में उसका सामना हुआ था।

उन हंसने की आवाजों के बीच उन दर्द भरी कराहों, चीखों की आवाजें और भी तेज हो गईं। ऐसा लग रहा था, वे लोग उन्हीं के भय से और भी ज्यादा चीख रहे थे। लेकिन उसके साथ ही वो हंसने की आवाजें भी तेज हो गईं। जैसे उन पिशाचों को उनकी दर्द भरी चीखों से असीम आनंद की प्राप्ती हो रही हो।

राज और डॉली एक-दूसरे से निपटे हुए उसी संदूक के ऊपर निश्चल पड़े रहे।

जंगल में उनके चारों ओर प्रेतलीला चलती रही।

रात ढलती रही।
 
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