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Horror अगिया बेताल

अचानक चौरंगी के हाथ में रिवॉल्वर चमक उठी । वे दोनों कुछ समझ भी न पाए कि लगातार दो गोलियां चलीं। फिर उनके चेहरे दहशत में डूबते चले गये ।

"यह रहा तुम्हारा इनाम । लेकिन सेवकों । तुम लोग पवित्र हाथों से पवित्र हाथों से मरे हो इसलिये सीधे स्वर्ग जाओगे ।"

वे दोनों फर्श पर गिरकर एड़ियाँ रगड़ रहे थे। चौरंगी ने उनकी कोई परवाह नहीं की। वह बक्सों की तरफ बढ़ा । रिवॉल्वर चोगे के भीतर रखकर उसने बक्से को उठाने का प्रयास किया। अभी वह बक्से पर झुका ही था कि एक आवाज़ कमरे में गूंजी।

"क्या यह बोझ नहीं उठाया जा रहा है बाबा ?"

चौरंगी एकदम उछलकर खड़ा हो गया । धनंजय ने भी उस तरफ निगाह डाली। दरवाज़े पर महामाया गन थामे खड़ा था ।

उसका लिबास चिथड़ों में झूल रहा था । चेहरे पर खरोंचे लगीं थीं और जगह-जगह खून के धब्बे नज़र आ रहे थे ।

“तुम। तुम यहाँ कैसे ?"

"मैंने तुम्हारा कारोबार संभाला है इसलिये मेरे लिये यह ज़रूरी था कि हर रास्ते का ज्ञान रखूं ।"

"महामाया मेरे पास इतना वक्त नहीं है जो तुमसे बहस करूँ। मैं सोचता हूं कि उन लोगों ने चारों तरफ से नाकाबंदी कर दी है। तुम्हारी सुरक्षा व्यवस्था इतनी कच्ची थी कि उन्होंने हेलिकॉप्टर भी नष्ट कर दिया है । यहाँ घुसपैठिये कैसे आ गये और अब तुम युद्ध में लड़ने की बजाये मेरी टोह लेते फिर रहे हो।" ‘

"जिस तरह आप युद्ध में शहीद नहीं होना चाहते वैसे ही मैं भी नहीं होना चाहता ।"

" और इस गन का क्या मतलब जो तुम्हारे हाथ में है ?"

"मैंने सोचा कहीं आप सेवक को भी इनाम न देने लगो ।”

चारगी का हाथ गाउन की तरफ सरक रहा था ।

"सावधान चौरंगी बाबा हाथ बाहर खींचकर रखो वरना मुझे तुम्हें इनाम देना पड़ेगा ।" महामाया का स्वर एकदम भयानक हो गया ।

चौरंगी का हाथ वहीं रुक गया ।

"हाथ ऊपर उठाकर दीवार से लग जाओ ।"

"तुम्हारा मतलब ?.."

"मतलब मेरी गन समझा देगी। फौरन वैसा करो जैसा मैं कह रहा हूं । मेरे पास फालतू वक्त नहीं है कहीं ऐसा न हो कि गोली चल जाये ।"

उसे हाथ उठाकर घूमना पड़ा, परन्तु वह विचलित नहीं था ।

"चलो दीवार की तरफ ।"

चौरंगी उस भाग की तरफ घूमा था जिधर अँधेरा था और सीढ़ियां भी थी और धनंजय भी । वह एक-एक कदम रखता हुआ धनंजय की तरफ बढ़ रहा था । धनंजय के दिल की धड़कनें तेज़ हो गयीं । अब ऐसी स्थिति नहीं थी जो वह अपने आपको छिपा पाता । बस कुछ ही पल शेष रह गये थे ।

धनंजय ने अपनी माइनर हथेली में ले ली। उसकी पकड़ मजबूत हो गयी, जैसे ही चौरंगी ने उसे देखा । देखकर ठिठका । धनंजय ने सेफ्टी केच हटा दिया। माइनर मैगज़ीन की गोलियां छोड़ने के लिये तैयार थी । चौरंगी के चेहरे पर हैरत के भाव आये। परन्तु वह कुछ बोला नहीं

आगे बढ़कर दीवार से चिपक जाओ। याद रखो तुम मेरे निशाने पर ही हो।" महामाया गरजा ।

वह आगे बढ़ा । उसके कदम धनंजय के सर के समीप आकर रुक गये ।

"अब तुम मरने के लिये तैयार हो जाओ चौरंगी। लेकिन मैं तुम्हें ईश्वर का स्मरण करने का अवसर अवश्य दूँगा ।"

"तुम यहाँ से निकल न पाओगे ।" चौरंगी बोला ।

"यह मेरे सोचने की बात है । अपने ईश्वर को याद करो ।”

धनंजय चौरंगी के लबादे की आड़ में सिमट गया था । वह जानता था कि महामाया चौरंगी को अच्छी प्रकार देख रहा है, परन्तु उसकी निगाह फर्श की तरफ नहीं घूमी होगी या फिर चौरंगी के लबादे ने पूरे परदे का काम किया था जिस कारण वह धनंजय को नहीं देख पाया ।

उसकी गन सीधी हुई ।

और इससे पहले कि वह चौरंगी को शूट करता धनंजय ने अपना हाथ चौरंगी की टांगों के बीच बढ़ा दिया था और ट्रिगर भी दबा दिया था गोली ठीक निशाने पर पड़ी ।

महामाया के माथे पर सुराख बन गया। वह फिरकनी की तरह घूमता हुआ ज़मीन पर गिरा। उसकी गन से छूटी गोली छत से टकराई इसके साथ ही वह बिजली की तेज़ी से खड़ा हुआ और चौरंगी के सीने पर माइनर टिका कर सीधा हो गया ।

"क्या वह मर गया ?" चौरंगी ने अस्फुट स्वर में पूछा ।

"जो मेरे निशाने पर आ जाये उसे मरना ही पड़ेगा ।"

“तुमने मेरी जान बचाई इसके लिये बहुत-बहुत धन्यवाद ।"

"परन्तु मुझे इनाम देने की बात न करना बाबा, तुम्हें बचाना तो मेरा फर्ज़ था ।"

"ओह ।" चौरंगी ने हाथ नीचे करने चाहे ।

"यह हाथ ऊपर ही रखो बाबा, मैं तुम्हें बता चुका हूं कि जो मेरे निशाने पर होता है उसे मरना ही पड़ता है ।"

"मैं समझा नहीं । तुम्हें मुझसे क्या बैर ?”

"मेरा महामाया से ही क्या बैर था ।"

"तुम कहना क्या चाहते हो आखिर । तुमने इसे मेरे सीने पर क्यों रखा हुआ है ?"

धनंजय ने उसके गाउन में हाथ डालकर रिवॉल्वर खींच ली ।

"तुम मेरे शिकार हो महामाया के नहीं इसलिये मैंने तुम्हें मरने नहीं दिया ।"

"कौन हो तुम। और । और। है भगवान मैंने यह पूछा ही नहीं कि तू है कौन और यहाँ कैसे पहुँचा ?"

ज़रा पीछे हटो। रोशनी की तरफ । वहाँ तुम मुझे अच्छी प्रकार देख सकोगे। चलो चौरंगी अब तुम्हारे सारे रंग खत्म हो गये हैं । तुम्हें अपनी घिनौनी ज़िन्दगी का अन्तिम नज़ारा भी तो देखना चाहिये । पीछे हटो मेरा माइनर तैयार है ।"

"कहीं तुम वह तो नहीं हो जिसने बेताल के बेटे को मेरी कैद से उड़ाया ?"

"मैं वही हूं दोस्त । पर मेरा परिचय इतने में ही खत्म नहीं हो जाता । मेरा परिचय यह भी है ।" धनंजय ने उसकी नाक पर एक जोरदार घूंसा मारा और वह लड़खड़ाता हुआ पीछे हटा, अवसर दिये बिना धनंजय ने उछलकर उसके पेट पर लात जमा दी । वह चीखता हुआ दीवार से टकराया और उसने गिरते हुए कलाबाज़ियाँ खाईं ।

तभी माइनर से गोली चली और महामाया की गन फर्श पर रपटती हुई एक कोने में जा पहुँची । चौरंगी ने उसी पर कलाबाज़ी खाई थी वहाँ उसके हाथ कुछ न लगा ।
 
धनंजय घूमकर सामने आ गया, उसने चौरंगी के मुंह पर एक ठोकर जड़ दी। वह रोशनी में जा लुढ़का । धनंजय उसी तरफ कूद पड़ा ।

" देख चौरंगी मैं कौन हूं । मैं वह पत्रकार धनंजय हूं जिसे तूने शाप दिया था। तूने मेरे सारे परिवार का नाश किया, और मैं समय की प्रतीक्षा में भटकता रहा, बता अब तेरी शक्ति कहाँ गई ?"

अचानक चौरंगी की मुट्ठी में राख उड़ी ।

धनंजय ने कहकहा लगाया ।

"तेरा यह शस्त्र भी बेकार है, क्योंकि मैं वह तेल लगाकर आया हूं जिससे तेरी इस राख का कोई असर मुझपर नहीं हो सकता । चौरंगी अब तू एक ऐसे साँप की तरह लाचार है जिसकी रीढ़ की हड्डी टूट चुकी है, मैं जब चाहूं तुझे गोली मार सकता हूं मगर मैं ऐसा नहीं करूँगा, तुझे मैं अपने साथ ज़िंदा ले चलूँगा ।"

चौरंगी के माथे से खून बह रहा था । उसका चेहरा थकावट के कारण चूर हो गया लगता था। वह धीरे-धीरे उठ खड़ा हुआ और दीवार से सटकर हांफने लगा ।

यह एक रोशन गलियारा था । जिसमें विद्युत प्रकाश जल रहा था,

गलियारे का अंत एक द्वार पर होता नज़र आ रहा था । धनंजय ने उस तरफ एक उड़ती निगाह डाली । वह चौरंगी को खत्म नहीं कर सकता था क्योंकि उसे यहाँ से बाहर निकलने का जो एक मार्ग मालूम था वह बन्द हो चुका था । चौरंगी को शायद यह बात अभी पता नहीं थी ।

“क्या तुम मुझे कानून के हवाले करोगे ? मेरे खिलाफ तुम्हारे पास क्या प्रणाम है ?" चौरंगी ने अपनी साँस पर काबू पाते हुए कहा । "

अगर मुझे कानून का सहारा लेना होता तो आदिवासियों की जगह पुलिस की मदद लेता, मैं जनता हूं कि पुलिस और कानून तुम्हारा कुछ नहीं बिगाड़ सकता ।"

"फिर तुम मुझे कहाँ ले जाना चाहते हो ?"

"यह बात मैं बताऊंगा, इस वक्त तो तुम्हें बाहर ले जाऊँगा, तुम्हें उन लोगों की अदालत में पेश करूँगा जो तुम्हारी बर्बादी की राह देख रहे हैं । जो तुमसे इंतकाम लेना चाहते हैं ।"

"तो फिर वक्त क्यों ज़ाया कर रहे हो ? निकलो बाहर मैं उन लोगों का सामना करने के लिये तैयार हूं।"

"बाहर निकलना अब इतना आसान नहीं चौरंगी ।"

“क्या मतलब ? अभी तो तुम सुरंग के रास्ते आये हो ।"

"वह रास्ता हमेशा के लिये बन्द हो चुका... सुरंग ढह गई ।” चौरंगी के माथे की नसें फड़क उठी ।

अचानक उसने कहकहा लगाया ।

"तो यह बात है, इसी वजह से तुम गोली नहीं चला रहे हो, मैं तो अपने आपको मरा समझ चुका हूं परन्तु तुम खुशी का दिन देखे बिना दिन देखे बिना कब्र में फंस गये हो ।"

"तुझे दूसरा रास्ता बताना होगा। वरना तुझे उस तरफ चलना होगा जहाँ जंग हो रही है ।"

"जंग |?" वह ठहाका मारकर हंस पड़ा, "अभी कुछ देर में तुम्हें आग की लपटें दिखाई देंगी, जो यहाँ भी पहुँचती होंगी, नहीं तो धुआँ तो भरने ही वाला होगा। वहाँ जंग कहाँ है ? वहाँ तो सिर्फ आग है, बोलो चलते हो आग में ? जेनरेटर तक भी आग पहुँच चुकी होगी, इसके बाद बिजली से खुलने वाले सारे रास्ते बन्द हो जायेंगे और लाइन कट जायेगी ।"

“मुझे डराओ नहीं । उसी तरफ चलो चाहे आग हो या धुआँ। या तो मैं तुम्हें उनके सामने झोंक दूँगा या तुम्हें उनसे बचने के लिये दूसरा रास्ता बताना ही पड़ेगा ।"

"तुम्हारे सामने बड़ी भारी विवशता है कि तुम मेरा कुछ भी नहीं बिगाड़ सकते ।"

"यह तुम्हारी ग़लतफहमी है ।" इतना कहकर उसने माइनर जेब में रखी और चौरंगी पर लात घूंसों की बरसात शुरू कर दी । वह भी शायद यही चाहता था । वह जूडो-कराटे सीखा हुआ जान पड़ता था । धनंजय के हौसले बुलंद थे। कुछ देर चौरंगी जिस व्यंग से पिटा था, उससे लगता था कि मार के आगे वह अधिक देर नहीं टिक सकता परन्तु इस बार चौरंगी का रूप ही दूसरा था । धनंजय का एक भी वार उसपर सफल नहीं बैठ रहा था ।

इसी दृढ़ युद्ध के बीच धुएं का गुब्बार उड़ता हुआ गलियारे में तैर गया । धुआ उस दरवाज़े से आ रहा था जो गलियारे के अंत में था। धुए क पहले झोंके के साथ ही वह दोनों रुक गये ।

चौरंगी ने कहकहा लगाया - "मैंने झूठ नहीं कहा था, अब आग हमसे बहुत करीब है ।"

इसका अहसास उसे भी हो गया था ।

उसने दरवाज़े के पार एक शोला भड़कता देखा, फिर आग का जाल नज़र आने लगा। यह स्थिति बड़ी भयानक थी। वे दोनों ही ऐसी स्थिति में थे, जहाँ एक तरफ कुआं था तो दूसरी तरफ खाई ।

उसी क्षण विद्युत प्रकाश भी गुम हो गया। अब सिर्फ आग का प्रकाश वहाँ धीरे-धीरे तेज़ पड़ता जा रहा था। धनंजय के चेहरे पर और भी बेचैनी फैलती जा रही थी। उसकी तपिश धीरे-धीरे तेज़ पड़ती जा रही थी । उसने चौरंगी की तरफ देखा जो शांत भाव से खड़ा था ।

अपनी मौत से पहले मैं तुम्हें मरता देखना पसंद करूँगा ।"

"इस बात को मैं भी समझता हूं, परन्तु मुझे विश्वास है कि बाहर निकलते ही तेरा हथियार फिर से गोली उगलने के लिये तैयार हो जायेगा । अगर तू अपने सारे हथियार फेंक दे तो मैं तुझे बाहर निकलने के रास्ते पर ले जा सकता हूं ।

आग की लपटें करीब आती जा रही थीं ।

"तुम्हारी यह शर्त मुझे मंजूर है ।" धनंजय ने कहा ।

"तो फेंक दो हथियार ।"

धनंजय ने हथियार फेंक दिये ।

"जब तक हम बाहर न निकलें, हमें एक अच्छे दोस्त की तरह व्यवहार करना है।" चौरंगी बोला ।

दोस्त की तरह या

"तुम जैसे आदमी के साथ दोस्ती करना मेरे लिये मुनासिब नहीं, फिर भी जान बचाने के लिये यह विचार अच्छा है ।"

"आओ तो दोनों आदमी एक-एक बक्सा उठा लें ।”

दोनों वापस बक्से के पास पहुँचे। आग की तपिश इस स्थान पर भी पहुँच चुकी थी अतः इन्हें जल्दी ही वह जगह छोड़नी पड़ी। वे सीढ़ियां उतरते हुए सुरंग के कमरे में पहुँचे । चौरंगी ने स्पाती द्वार की तरफ चलने के लिये कहा । शीघ्र ही वह द्वार के पास पहुँच गए। चौरंगी ने द्वार पर लटक रही एक ज़ंजीर को पूरी शक्ति लगाकर खींचा। स्पाती द्वार खुलता चला गया। इस दरवाज़े के भीतर ज़मीन के अन्दर बना एक छोटा सा घाट था, जिसमें एक छोटी नौका खड़ी नज़र आ रही थी, दूसरी ओर पानी से भरी सुरंग थी। चौरंगी ने नाव में बक्सा रखा और फुर्ती के साथ घूम पड़ा । उसके हाथ में स्टेनगन दबी थी । यह गन नौका के गुप्त खाने में रखी थी। उसकी गतिविधि धनंजय से छिपी नहीं रह सकी । उसने फौरन टॉर्च बुझाकर पानी में डाइव लगा दी । गोलियों की तड़तड़ाहट के साथ ही वहाँ गुप्त अन्धकार छा गया ।

चौरंगी ने नौका का इंजन तैयार किया और उसे सुरंग में दौड़ा दिया । नौका का अग्रिम प्रकाश सुरंग को चीरता चला गया। कुछ समय बाद ही वह सुरंग से निकलकर एक जंगली नहर में आ गया। वह खुले आकाश के नीचे था । आकाश में चंद्रमा तैर रहा था । उसे दूर आकाश में शोले भड़कते नज़र आये। साथ ही भयानक जंगी शोर सुनाई पड़ा, जो धीरे-धीरे लोप हो गया। स्टेनगन संभाले वह खतरे की सीमा से बाहर आ गया । यहाँ से मुख्य सड़क अधिक दूर नहीं थी । वह जानता था आदिवासी अभी कई घटा तक घरा डाल पड़ रहग, फिलहाल वह उनके घेरे से बाहर था। नौका द्वारा आगे नदी में जाना खतरे से खाली नहीं था । इस नदी के दोनों तरफ उसके गुप्त ठिकाने थे। नदी पर उसका अपना एक घाट था, जिसमें अक्सर सामान आया-जाया करता था । इस बात को आदिवासी अच्छी तरह जानते थे, इसलिये आगे नौका का प्रयोग नहीं किया जा सकता था ।

उसने बक्सा नौका से उतारा, एक बक्सा तो वह वहीं छोड़ आया था । उसने धनंजय को पानी में कूदते देख लिया था अतः वहाँ रुककर गोलियां बरसाते रहना उसने ठीक नहीं समझा । उस बक्से को तो वह समय रहते बाद में भी ला सकता था और इस बात को भी वह अच्छी तरह जानता था कि धनंजय जीवित होने के बाद भी सुरंग से तैर कर बाहर नहीं निकल सकता था। पानी की उस सुरंग में सर्प तैरते थे जो नौका की आवाज़ से दूर इधर-उधर दुबक जाते थे, परन्तु दूसरी स्थिति में वह पूरी तरह सुरंग पर कब्ज़ा जमाये रहते थे। इसके अलावा कई स्थानों पर कीचड़ और दलदल थी ।

दूसरे बक्से में वह आवश्यक कागज़ात थे जिनके द्वारा वह ब्लैकमेलिंग करता था। नकद पूँजी जो हीरे जवाहरातों के रूप में थी वह साथ ले आया था ।

नौका रोकने के उपरांत वह बक्सा उतार कर चल पड़ा। इस स्थान का चप्पा-चप्पा उसने छाना हुआ था, वह जानता था यहाँ कुछ पुराने खंडहर और गुफाएं हैं, जहाँ बक्से को छिपाया जा सकता है। जल्द ही उसने एक गुफा तलाश कर ली। वह टॉर्च जलाए उसमें बढ़ता चला गया। किसी खतरनाक जानवर से सामना होने की उसे कोई उम्मीद नहीं थी ।
 
गुफा के अंतिम छोर पर पहुँचते ही उसे एक दरार नज़र आई । बक्सा एक तरफ रख कर वह दरार को टटोलने लगा । अन्दर प्रकाश डालते ही उसे वह दरार चौड़ी नज़र आई। उसको उपयुक्त समझ कर वह बक्से सहित दरार में समा गया । भीतर एक गुफा और थी । उसने बक्सा एक स्थान पर रखा और टॉर्च का प्रकाश चारों तरफ डालने लगा । एकाएक वह इस प्रकार उछल पड़ा जैसे बिजली का करंट छू गया हो । यह रस्सी का फंदा था जो उसकी गर्दन पर गिरा था। पहले उसने फंदे को सर्प समझा परन्तु शीघ्र ही उसने अपने गले में फंदे का कसाव महसूस किया । उसके हाथ से टॉर्च छूट गई और दोनों हाथ फंदे पर जा पहुँचे । अचानक उसके पाँव ज़मीन से उखड़ गये। वह धड़ाम से गिरा और फिर उठता चला गया। उसे इतने तेज़ झटके लगे कि वह बचाव के लिये कुछ भी न कर पाया । उसकी स्टेनगन बक्से के ऊपर ही रखी रह गयी और वह अन्धकार में घिसटता हुआ गुफा की दूसरी दिशा में जा रहा था, फिर वह खुले आकाश के नीचे आ गया ।

उसने आगे एक घुड़सवार को तेज़ घोड़ा दौड़ाते हुए देखा । रस्सी का दूसरा छोर वहीं समाप्त होता जा रहा था और वह सवार बेताल का बेटा ही था जो उसे अनजानी दिशा में घसीटता ले जा रहा था ।

पत्थरों की ठोकरें खाता उसका मस्तिष्क अन्धकार में लोप हो गया ।

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अर्ध मूर्छित अवस्था में वह नहर के किनारे आ लगा। उसकी एक टांग में गोली का ज़हर फैल रहा था जो स्टेनगन के ब्रष्ट से लगी थी । यदि उसकी यह टांग ज़ख्मी न होती तो वह अंतिम क्षण तक चौरंगी की उस नाका का पिछला भाग नहीं छोड़ता, परन्तु सुरंग का सामा पार होते ही उसे नौका छोड़ देनी पड़ी। यहाँ तक का सफर उसने भयानक दर्द के साथ तय किया था। तेज़ चलती नौका के पीछे उसका सारा शरीर पानी में डूब रहा था । उसके हाथों की शक्ति तब तक जवाब दे चुकी थी अतः उसने नौका का पार्श्व भाग छोड़ दिया । सुरंग में तो पीछे अँधेरा था, इसलिये उसके देखे जाने का खतरा कम था, परन्तु खुले आकाश के नीचे आते ही उसे चाँदनी में स्पष्ट देखा जा सकता था । यदि उसपर ज़रा भी निगाह पड़ जाती तो अपनी जान बचाना उसके लिये कठिन हो जाता ।

इसलिये उसने नौका छोड़कर नहर का किनारा पकड़ लिया था और वहाँ से धीरे-धीरे खिसकता हुआ आगे बढ़ गया था। यह संयोग ही था कि उस स्थान से अधिक दूर नहीं था, जहाँ वह घोड़ा छोड़कर गया था । चारों दिशाओं का मुआइना करते हुए उसने एक चट्टान का रुख लिया और किसी तरह उस पर जा चढ़ा। हवा तेज़-तेज़ चल रही थी ।

तांत्रिक के इस घोड़े की कई विशेषताएं उसे मालूम थीं । विशेष अंदाज में सीटी बजाने के बाद वह उस जगह पहुँच सकता था, यदि सीटी उसे सुनाई दे तो । हवा का रुख उसी ओर था। धनंजय ने निरन्तर सीटियां बजायीं उसके बाद खामोशी के साथ इन्तज़ार करने लगा । उसकी थकान इतनी बढ़ चुकी थी कि वह किसी भी समय बेहोश हो सकता था । परन्तु किसी भी क्षण बेहोश होने से पहले ही घोड़ा वहाँ पहुँच चुका था । उसने घोड़े की पीठ सहलाई और उसे शाबाशी देकर पीठ पर सवार हो गया । इसके बाद घोड़े की पीठ पर ही उसकी चेतना लुप्त हो गई ।

जब उसे होश आया तो सामने चन्द्र बेताल, तांत्रिक, विनीता, बेंजो और नागर खड़े थे। उसकी गोली निकाली जा चुकी थी और टांग पट्टियों से जकड़ी हुई थी ।

“आपका यह पूरा परिवार आपके होश में आने की प्रतीक्षा कर रहा था, मास्टर हमने सबकुछ जीत लिया बदले में दस आदिवासी और आपके ज्योतिषी काम आ गये ।'

“ले । लेकिन । वह । वह तो भाग गया ।" धनंजय कराहा ।

"नहीं, वह आपके हुक्म की प्रतीक्षा में है, आपके इस लाड़ले बेटे ने उसे गुफाओं में पकड़ लिया था और उसकी बुरी गत बना दी है। वह पागल हो गया है, वह दीवार से बंधा खड़ा है और पागलों के समान चीख रहा है ।

"शाबाश बेटा ।" धनंजय ने चन्द्र की तरफ देखा, "तुमने अपने बाप की मौत का बदला ले लिया, अब तुम अपनी माँ को समझाओ ।"

“उसका जादू खत्म हो चुका है।" इस बार तांत्रिक बोला, “उसने विनीता से माफी मांगी है, पर वह किस-किस से माफी मांगेगा, मैंने उसके लिये एक खंजर रखा है, जिसपर मेरा तुम्हारा और सब का नाम अंकित है, जो उससे बदला लेना चाहते थे, यह वही खंजर है, जिससे मेरे पिता की मृत्यु हुई थी। उस वक्त उसके मठ पर सिर्फ मेरे पिता का नाम था तब चौरंगी ने यह दिखाने की कोशिश की थी कि मेरे पिता ने आत्महत्या की थी, लेकिन मेरे पिता खून से उसका नाम लिखकर जा चुके थे, मैं उसी खंजर पर उन लोगों के नाम गुदवाता रहा जो इसने शिकार बनाये, मुझे मालूम था एक दिन यही खंजर उसके सीने में होगा । आओ मैं तुम लोगों का इन्तेज़ार कर रहा हूं, यह बलि सबके सामने चढ़ाई जायेगी ।

इतना कहकर चांडिक तांत्रिक दूसरी ओर चला गया ।

चौरंगी को पागलों जैसी हालत में देखकर धनंजय ने उसके मुंह पर थूक दिया और चांडिक तांत्रिक से कहा - "अब यह तुम्हारा मुजरिम है । हम सबने अपना इन्तेकाम ले लिया, इस पागल का खून हमारे लिये किसी काम का नहीं । हमें इजाजत दो चांडिक । हम तुम्हारे इस क्षेत्र से जा रहे हैं।"

"कोई किसी का खून बहाए इसके लिये मैं किसी को विवश नहीं करता ।" चांडिक बोला - "तुमने बदला ले लिया अब मेरा हिसाब बाकी है, वह मैं कर लूँगा और यदि तुम जाना ही चाहते हो तो मैं रोक भी नहीं सकता । मेरे ख्याल से तुम सब लोग जाओगे, यह लड़का भी अपनी माँ के बिना नहीं रह सकता, परन्तु धनंजय मैं तुम्हें अकेले में एक गुप्त मंत्र बताऊंगा । वह तुम्हारे काम आयेगा ।"

"

तांत्रिक उसे अकेले में ले गया ।

शायद तुम इस बात को नहीं जानते कि इस लड़के के दो रूप हैं । एक में यह साधारण बच्चा है। जिसे माँ का दुलार भी चाहिये और बाप का साया भी। दूसरे रूप में यह उस अगिया बेताल का अंश है जिसे चाँद की तेईसवीं रात बलि देकर जगाया गया था इसलिये जब भी चाँद की तेईसवीं रात आयेगी यह अपने आपे में नहीं रहेगा... उस वक्त इसे खून की ज़रूरत महसूस होगी... बेताल इसके भीतर जाग उठेगा और यह उस रात बड़ा खूंखार बन जायेगा। ऐसे में यह किसी का भी खून कर सकता है । अभी यह बच्चा है, खून करने योग्य नहीं । परन्तु यह रक्त स्नान ले चुका है। यदि ऐसा न होता तो इसके ऊपर बेताल का साया नहीं रहता । जिस कारण यह आग में सुरक्षित रहता है। इसका मतलब यह भी है कि चाँद की तेईसवीं रात में यह रक्त स्थान लेता है । कब से ले रहा है। मैं नहीं कह सकता । इसी कारण इसकी शक्ति असाधारण इंसानों जैसी बन गई है । और जैसे-जैसे यह क्रम चलता रहेगा यह बेहद शक्तिवान बनता जायेगा । बहुत संभव है कि अगिया बेताल की सम्पूर्ण शक्ति इसमें आ जाये । फिर यह अमर हो जायेगा । इसलिये मैं तुमको अकेले में यह बताना चाहता था कहीं तुम अनभिज्ञ रहकर किसी बड़ी उलझन में न पड़ जाओ ।"

"ओह । यह बात मुझे बेंजो ने भी बताई थी कि एक रात यह घोड़ा लेकर कहीं चला गया था और सवेरे इसके शरीर पर खून के छींटे थे । क्या इसने उस रात किसी की हत्या की थी ?"

"कोई ज़रूरी नहीं कि इसने मनुष्य की हत्या की हो, किसी जानवर की भी हो सकती है, मनुष्य का पालतू जानवर, मुर्गी, बकरी वगैरह, परन्तु आगे चलकर यह मनुष्य की बलि भी ले सकता है। इसके लिये तुम एक बात का ध्यान रखना, चाँद की तेईसवीं रात मुर्गा या बकरा कटवाकर इसके पास छोड़ देना और उस रात ऐसा इंतज़ाम रखना कि यह कमरे से न निकल सके । अव्वल तो अपने पास किसी जानवर को देखते ही यह उसे मारकर रक्त स्नान ले लेगा और इसकी उत्तेजना खत्म हो जायेगी, फिर भी कमरे में बन्द रखना ज़रूरी है ।"

"मैं इन बातों का ध्यान रखूँगा ।"

"मैंने उसकी माँ को यह सब नहीं बताया । वह बेचारी कहाँ भटकती रहेगी, उसका जीवन तो बर्बाद हो चुका है, इसलिये तुम्हें ही इन माँ-बेटे को अपनी छत्रछाया में रखना है। मैं उससे पूछ चुका हूं।"

म एक बात साच रहा हूँ, यह सिलासला कब तक चलता रहगा ? " चिन्ता न करो, यह सिलसिला सिर्फ तेईस वर्ष की आयु तक रहेगा, उस हालत में जबकि इसे तेईस मनुष्य बलि से बचा लिया जायेगा, और यदि इसने तेईस इंसानों के रक्त का स्नान ले लिया तो फिर यह इंसान नहीं, साक्षात अगिया बेताल होगा। जब इसकी आयु तेईस वर्ष की हो जाये तो तुम्हारी ड्यूटी खत्म हो जायेगी ।"

"फिर तो इसे अपना बेटा बनाने की गुंजाइश है ?"

"बस यही समझाना था ।"

दोनों वापस पहले वाले स्थान पर लौट आये ।

इसी प्रकार एक वर्ष बीत गया । धनंजय ने यह रहस्य किसी पर प्रकट नहीं किया और न वह अपने कर्तव्य को भूला था । वह नगर के ऐसे भाग में रहता था, जहाँ दूर तक सन्नाटा छाया रहता था । यहीं उसने पोल्ट्री फॉर्म खोला हुआ था । यह मात्र दिखावा था, वरना उसके पास धन की कोई कमी नहीं थी। मुर्गी पालन की आड़ में बड़े इत्मीनान से चन्द्र बेताल को रक्त स्नान दे दिया करता था । इस बीच कभी कोई परेशानी नहीं हुई। उसका अधिकतर समय पोल्ट्री फॉर्म पर ही बीतता था । उसके पास एक छोटी सी घोड़ागाड़ी थी। जिससे वह अक्सर नगर हो आया करता था। इसी घोड़ा गाड़ी से चन्द्र बेताल स्कूल जाया करता था। वह प्रखर बुद्धि का था । उसने एक साल में दो क्लासें पास कर ली थीं ।

इन्हीं दिनों की बात है। हाईवे पर चलने वाले तेज़ वाहन की चपेट में घोड़ागाड़ी आ गयी। उस दिन वह सवेरे-सवेरे नगर में अण्डों की सप्लाई देने निकला था। एक मोड़ पर वेलेन्ज का भारी ट्रक तेज़ रफ्तार से आता हुआ घोड़ा गाड़ी से टकराया और घोड़ा गाड़ी चकनाचूर होकर सड़क पर बिखर गई । घोड़ा तत्काल ही मर गया ।

ट्रक घटना स्थल पर नहीं रुका । धनंजय के घायल शरीर को राहत पहुँचाने के बजाये वह लोग भाग निकले। धनंजय घायल अवस्था में सड़क पर धीरे-धीरे रेंगता रहा। उसे अपनी मृत्यु स्पष्ट नज़र आ रही थी । कुछ समय बीता । फिर उसे सामने से कार के आने का धूमिल दृश्य नज़र आया । उसने हाथ उठाकर रुकने का संकेत किया ।

वह स्टेशन वैगन थी ।

उसका संकेत पाते ही स्टेशन वैगन रुक गई ।

उसमें दो आदमी सवार थे। एक लम्बे कद का इकहरे शरीर का और दूसरा नाते कद का ।

लम्बा वाला व्यक्ति उतरकर धनंजय के पास पहुँचा । धनंजय धीरे- धीरे कराह रहा था। थोड़ी देर उसके पास रुककर लम्बे कद वाला व्यक्ति वापस पलटा । और वह स्टेशन वैगन के पास पहुँचा |

'यह तो वही आदमी है," उसने धीरे से कहा, "जिसके फॉर्म पर हम जा रहे थे।"

"तुमने कैसे जाना ?"

"इस तरफ एक ही मुर्गी फॉर्म है और सड़क पर अण्डों की टोकरियाँ बिखरी पड़ी हैं। उसने भी यही कहा कि उसे फॉर्म पर पहुँचा दो ।"

"फॉर्म पर क्यों ? वह तो घायल है, उसने अस्पताल की बात नहीं कही ?"

"वह बहुत बुरी तरह घायल है अकल । वह बच नहीं सकता । ऐसी स्थिति में वह अपने फॉर्म पर ही जाना पसंद करेगा। अगर आप कहें तो मैं उसे उठा लाऊं ?"

"फॉर्म में दाखिल होने के लिये हमारे पास इससे उपयुक्त बहाना कोई न होगा। तुम्हारी सहायता के लिये मैं भी उतरूं?"

"एक बात सोच लीजिये अंकल ।” लम्बे व्यक्ति ने कहा, “यदि वह रास्ते में मर गया तो ?"

" भीतर टेप रिकॉर्डर है, उसका आखिरी बयान टेप कर लो... हम उसकी आखिरी सहायता कर रहे हैं, कत्ल नहीं कर रहे हैं, वह दुर्घटना में मर रहा है, और पुलिस इस बात को अच्छी तरह समझ सकती है कि हमारी गाड़ी दुर्घटनाग्रस्त नहीं हुई ।"

"ओके अंकल, मैं उसे ले आता हूं ।'

उसने स्टेशन वैगन का पिछला द्वार खोला और कुछ देर बाद ही धनंजय के रक्त रंजित शरीर को उसमें डाल दिया । धनंजय को बेहद पीड़ा हो रही थी। वह कराहता हुआ अटकते स्वर में कुछ बोल रहा था | लम्बे कद वाले आदमी ने फौरन टेप रिकॉर्डर का माइक्रोफोन उसके सामने कर दिया । वह उससे दुर्घटना के बारे में पूछने लगा । उसने ट्रक का हवाला दिया जिसका उसे नंबर भी याद था इसके अलावा वह कुछ ऐसे शब्द बड़बड़ाया जो उनके पल्ले नहीं पड़े। परन्तु उसने एक प्राइवेट डायरी का शब्द भी कहा था - उसके बाद के शब्द उसके गले में ही अटकने लगे ।

स्टेशन वैगन हिचकोले खाती हुई आगे बढ़ रही थी ।
 
फॉर्म पर पहुँचने से पहले ही धनंजय ने दम तोड़ दिया। उसके नेत्र अधखुली स्थिति में स्थिर हो गये । लम्बे कद के आदमी ने टेप रिकॉर्डर पैक करके उसके नेत्र बन्द कर दिये और लम्बी साँस खींच कर एक सिगरेट जला लिया ।

फिर वह धीरे से बोला - "वह खत्म हो गया ।"

स्टेशन वैगन झटके के साथ फॉर्म पर रुक गई ।

"क्या कहा तुमने ?" नाटे आदमी ने पूछा ।

"वह मर गया ।"

“इसका मतलब यह हुआ कि हमारे लिये काम बढ़ गया ।" नाटे आदमी ने महीन स्वर में कहा - "उतर कर देख मोंटू यहाँ कौन-कौन हैं ?"

मोंटू नीचे उतरा और अत्यन्त सुस्त चाल से सर खुजाता हुआ मकान की ओर चल पड़ा। मकान के बाहर दोनों तरफ मुर्गियों के बाड़े थे, जो फड़फड़ाती आवाज़ से गुंजायमान हो रहे थे । वैगन इन बाड़ों से बीस मीटर दूर खड़ी थी। इनके बीच चौड़ा रास्ता था । जो बड़े दालान तक पहुँचता था । दालान के दायें-बाएँ फूलों की क्यारियां थीं और उस पार शेड बना था । दालान के पीछे एक छोटा सा सुन्दर बंगला था। जिसमें पूर्णतया शान्ति नज़र आ रही थी ।

बंगले के बरामदे में पहुँचकर मोंटू ने घंटी बजाने के लिये हाथ बढ़ाया । तभी दरवाज़ा खुल गया । सामने एक अनुपम सुंदरी खड़ी थी, जिसके शरीर पर बेहद सादा लिबास था । बरबस मोंटू की निगाह उसके वक्षस्थल पर जम गई ।

“क्या बात है ? कौन हो तुम लोग ?" स्त्री ने पूछा । उसने उड़ती दृष्टि से कार को देख लिया था ।

मोंटू ने लम्बी साँस खींची - "समझ नहीं आ रहा मैं तुम्हें यह बुरी खबर किस प्रकार से दूँ ।"

“कैसी बुरी खबर ?" स्त्री चौंकी ।

“आओ मेरे साथ । मैं तुम्हें अपने अंकल से मिला देता हूं ।"

"मैं समझी नहीं, आखिर तुम कहना क्या चाहते हो ?"

"मैं कैसे कहूं, मुझमें इतनी शक्ति नहीं कि यह बात तुम्हें बता सकूं, मेरे अंकल उस गाड़ी में हैं, तुम उनसे ।"

" अच्छा ठीक है मैं तुम्हारे अंकल से ही बात करती हूं।"

वह स्त्री निर्भीक स्वभाव की लगती थी। जब वह स्टेशन वैगन की तरफ जा रही थी तो मोंटू की निगाह उसके भारी नितम्बों पर ठहर गई, जो एक दूसरे से संघर्ष करते हुए मोंटू के दिलों-दिमाग पर बिजली का करंट दौड़ा रहे थे । वह सोचने लगा । यह स्त्री उसकी बीवी कैसे हो सकती है ? दोनों की आयु में बीस वर्ष से अधिक का अन्तर है । वह टकटकी लगाये उसी तरफ देखता हुआ इन्हीं विचारों में खोया था कि पीछे से किसी ने गरजकर कहा

"हैंड्स अप ।"

मोंटू एकदम चौंक पड़ा। उसके चेहरे के भाव तेज़ी से बदले और आँखों में साँप जैसा पैनापन आ गया। चेहरा कठोर पड़ गया । मांसपेशियाँ तनती चली गई। उसकी पीठ पर कोई वस्तु चुभ रही थी ।

उसने धीरे-धीरे हाथ उठा लिये ।

अन्दर की तरफ मुड़ो। जल्दी वरना गोली मार दूँगा ।" चेतावनी मिली ।

"इस अचानक हमले का कारण ?"

“मैं एक सूरत पर तुम्हारी जान बख्श सकता हूं ।"

"किस सूरत पर ?"

" अगर तुम मुझे जंगल में शिकार खेलने के लिये गाड़ी में ले जाओगे । यहाँ से चालीस मील दूर । खेड़ा के जंगल में ।"

“बस इतनी सी बात । हम तो खुद ही शिकार खेलने निकले हैं ।"

"तुम मुझसे अच्छे शिकारी नहीं हो सकते ।"

'इसका फैसला तो शिकार खेलते समय हो जायेगा। ज़रा यह बन्दूक तो हटाओ। मैं तो डर ही गया था ।"

" अगर तुमने धोखेबाजी की तो मैं शूट कर दूँगा ।" इतना कहकर उसने जोरदार ठहाका लगाया और मोंटू के सामने आ गया । उसके हाथ में एक लकड़ी का डंडा था ।

" देखा मेरा करतब ?" वह हंसकर बोला ।

"छोकरे तू बड़ा मक्कार है ।"

“मेरे पास राइफल भी है, डैडी ने छिपाकर रखी है। लेकिन हम लोग शिकार खेलने ज़रूर चलेंगे। मैं एक साल से कह रहा हूं।"

"इतनी छोटी सी उम्र मैं तू क्या शिकार खेलेगा भला ?"

"अगर मेरे हाथ में राइफल होती तो मैं तुझे अभी बता देता ।" उसी समय मोंटू ने अपने अंकल को आते देखा । मोंटू का ध्यान लड़के की तरफ से हट गया । वह प्रश्नवाचक निगाहों से अंकल को देखने लगा ।

“उसे गश आ गया। पहले उसकी आँखों में आँसू आये फिर वह वहीं पर गिर पड़ी। मैं समझता हूं तुम उसे अच्छी प्रकार उठाकर भीतर लिटा सकते हो ।" अंकल बोला फिर उसने लड़के की तरफ देखा ।

“यह उसका लड़का है ।"

"हाँ ।"

"तो इसे बता दो कि इसके लड़के का एक्सीडेंट हो गया है ।"

वह दोनों अंग्रेज़ी में बात कर रहे थे। लेकिन चन्द्र अंग्रेज़ी समझ लेता था। पिता के एक्सीडेंट की बात सुनते ही वह सहम गया और चीखकर बोला - "कहाँ हैं मेरे डैडी ?"

"वैगन में उसका शव पड़ा है।" इतना कहकर नाटा व्यक्ति पलट पड़ा । चन्द्र उसकी बात सुनते ही दौड़ता हुआ वैगन की तरफ बढ़ गया । फिर कुछ क्षण में ही उसके रोने चिल्लाने का स्वर सुनाई दिया । वह अपने डैडी के शव से लिपटा हुआ था ।

बड़ी मुश्किल से उसे हटाया गया ।

मोंटू ने पहले उसकी माँ को ढोया, कोमल और गुदगुदे शरीर को ढोते हुए वह अजीब सा रोमांच महसूस कर रहा था । भारी होने की अपेक्षाकृत वह नाटा उसका बोझ ढो सकता था ।

धनंजय का मृत शरीर स्ट्रेचर के ज़रिये उठाया गया । नाटा व्यक्ति बड़ी खामोशी के साथ चहलकदमी कर रहा था। मोंटू उस सुन्दर स्त्री के बेहोश शरीर में से झाँक रहे स्तनों को निहार रहा था । चन्द्र अपने पिता के शव से लिपटा हुआ रो रहा था ।

राति लेने लगा। एक कमरे नाटा व्यक्ति उस बंगले के भीतर को गश्त लेने लगा । एक कमरे से दूसरा कमरा फिर अवसर पाकर उसने सबसे पहले टेलीफोन के तार काट दिए । अब उसे विश्वास हो गया कि खेल बहुत आसान है। एक औरत और एक बच्चा है, उन्हें अधिक देर इंतज़ार नहीं करना चाहिए । वह जब वापस पहले वाले कमरे में पहुँचा, तो लड़का मोंटू पर चीख रहा था ।

"तुमने मेरे डैडी को कैसे मारा है ? तुम बोलते क्यों नहीं ? मुझे इतना बच्चा न समझो।"

“मैंने कहा न ट्रक से एक्सिडेंट हुआ, हम तो तुम्हारे सहयोगी हैं।" "लड़के अब यह रोना धोना बन्द करो ।" नाटे आदमी ने कहा - "यह बताओ कि तुम्हारा या तुम्हारे पिता का इस शहर में कोई सगा सम्बन्धी है ?"

"हाँ । और मैं उन्हें फ़ोन भी कर सकता हूं। मुझे पुलिस को भी फ़ोन करना पड़ेगा । क्योंकि तुम लोग मुझे शरीफ आदमी नहीं लगते। तुमने मेरी माँ को भी बेहोश कर दिया है।"

लड़का फ़ोन के पास झपटा। कुछ देर बाद उसे मालूम हुआ कि फ़ोन पर कोई आवाज़ नहीं है। वह मौत की तरह खामोश पड़ा है। टेलीफोन का रिसीवर रखकर वह पलटा । मोंटू उसके सर पर खड़ा था । उसका पंजा आगे बढ़ा। लड़का बौखलाहट में पीछे हटा। उसे दाल में काला नज़र आया । वह तुरन्त छलांग मारकर भागा। वह उस कमरे की तरफ जा रहा था जहाँ उसके पिता ने राइफल छिपाई हुई थी। वह एक अलमारी में पड़ी थी। वह भागता हुआ सीधा अलमारी के सामने जा पहुँचा । उसने हैंडल घुमाया । परन्तु अलमारी पर ताल पड़ा था । उसे एक झटका सा लगा । उस शिकारा चाकू का ध्यान आया । परन्तु चाकू दूसरे कमरे में था । वह एकदम पलटा, शायद उस कमरे में अलमारी की चाभी भी मिल जाये। वह आगे बढ़ना ही चाहता था कि दरवाज़े पर उसे मोंटू खड़ा नज़र आया। मोंटू उस समय बड़े भयानक अंदाज में खड़ा था।

उसने आगे बढ़कर दरवाज़ा भीतर से बन्द कर दिया ।

बन्द कमरे में लड़के के चीखने की आवाज़ आई, फिर धम्म से गिरने की उसके बाद खामोशी छा गई। थोड़ी देर बाद मोंटू हाथ झाड़ता हुआ बाहर निकला ।

अब हमें घर का कोना कोना छान मारना चाहिए ।"

"शुरू हो जाइये ।"

"बंगले का दरवाज़ा भीतर से लॉक कर दो।"

मोंटू मुख्य द्वार की तरफ चल पड़ा । नाटे व्यक्ति ने बेहोश पड़ी स्त्री को टटोलती निगाह से देखा । उसके अभी होश में आने की कोई गुंजाइश नहीं थी क्योंकि वह क्लोरोफॉर्म सूंघ चुकी थी। अब वह बिना झिझक इत्मीनान से काम कर सकते थे ।

उन्होंने बंगले का एक-एक कोना छानना शुरू कर दिया ।

दो घंटे की लगातार तलाशी के बाद भी वे निश्चिंत नज़र नहीं आ रहे थे। इन दो घंटों के भीतर पुलिस वाले घटनास्थल पर पहुँच चुके थे । किसी ने पुलिस को सूचना दे दी थी कि सड़क पर एक घोड़ागाड़ी चकनाचूर पड़ी है, परन्तु वहाँ किसी इंसान का नामोनिशान नहीं । पुलिस दुर्घटना की जाँच-पड़ताल करने लगी। बिखरी हुई अण्डों की टोकरियों से स्पष्ट होता था कि वह घोड़ागाड़ी किसी पोल्ट्री फॉर्म से आ रही थी । दुर्घटना किसके साथ पेश आई, इसकी अभी कोई प्राथमिक रिपोर्ट नहीं थी । बात कुछ समझ में नहीं आ रही थी ।

पुलिस ने घटनास्थल पर पत्थर रख दिए और सड़क का अवरोध हटाने के लिये सारा सामान एक तरफ लगा दिया। घोड़ा मर चुका था । उन्होंने वायरलेस से ट्रक मंगाने की सूचना दे दी और अपनी रिपोर्ट क मंगाने की सूचना दे दी औ लिखने लगे ।

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पहली बार मोंटू ने एक समझदार आदमी की तरह सवाल किया “पुलिस यहाँ पहुँचने वाली होगी । हमारी गाड़ी बाहर ही खड़ी है । तीन घंटे बीत चुके हैं अब तक किसी-न-किसी ने दुर्घटना की सूचना दे दी होगी ।"

“मुझे इसका पूरा अनुमान है।" नाटा आदमी बोला - "वह औरत होश में आने वाली है, मैं टेलीफोन के तार जोड़ता हूं। तुम अस्त-व्यस्त सामान ठीक करो ।"

और उस लड़के का क्या होगा ? मैंने उसके साथ मार पीट की है ।" “उस लड़के को आसपास कहीं छिपा देना और गाड़ी साथ ले जाना, मैं यहाँ रहूंगा, बाकी सब मुझ पर छोड़ दो। ज़्यादा से ज़्यादा पुलिस एक घंटा रहेगी।"

"अंकल, क्या हमें अब भी सावधान रहना चाहिए ?"

“अब हमें उस औरत से पूछताछ करनी होगी, जब तक आखिरी साँस रहती है मैं उम्मीद लगा कर रखता हूं। शायद इसने कहीं और छिपाकर रखा हो । यह औरत इसलिये महत्वपूर्ण है क्योंकि यह इसकी बीवी नहीं है ।"

"फिर.?" मोंटू ने आश्चर्य से पूछा ।

"यह चौरंगी की दासी थी, उसके पास ऐसी असंख्य दासियाँ थीं ।"

“तब तो बड़ा भाग्यवान रहा होगा ।" मोंटू ने एक बार फिर विनीता की तरफ देखा ।

और चौरंगी को तबाह करने के बाद इसने इस औरत पर कब्ज़ा ले लिया ।"

"आप तो ऐसे कह रहे हैं जैसे वह औरत न होकर ज़मीन-जायदाद हो ।"

"औरत ज़मीन जायदाद ही होती है मोंटू, अच्छा अपना काम शुरू कर जल्दी, वरना पुलिस के सामने जवाब देना भारी पड़ जायेगा ।"

दोनों अपने काम में लग गये ।

जब मोंटू लड़के को लेकर चला गया तो नाटा व्यक्ति बेहोश पड़ी औरत को होश में लाने का उपाय करने लगा। दस मिनट बाद ही वह होश में आ गयी । उसने चारों तरफ देखते हुए पलकें झपकाईं ।

"आपने तो हमारे लिये मुसीबत ही खड़ी कर दी। मैं तीन घंटे से आपके होश में आने की राह देख रहा हूं ।"

वह हड़बड़ाकर उठी । उसे सबकुछ याद आ गया। उसका सर भारी हो गया था। दोनों हाथों से सर थामते हुए उसने पानी माँगा । नाटे आदमी ने उसे पानी का गिलास दिया ।

“मेरा आखिरी सहारा भी टूट गया ।" वह कराही - "भगवान ने मुझे इतने दुःख क्यों दिए हैं ?"

"

धीरज रखिये, जो होना था हो गया ।"

ओह मैं तो भूल ही गई थी, आपसे इस बारे में पूछना कुछ याद नहीं रहा ।"

"मेरा नाम कर्नल बर्मन है, मैं उधर से आ रहा था तब तुम्हारा पति अंतिम साँस ले रहा था। उसने अपने फॉर्म का पता बताया तो मैं यहाँ ले आया ।"

वह दूसरा ?"

"वह मेरा भतीजा है। इस वक्त तुम्हारे पुत्र को लेकर गया है। शायद तुम्हारा पुत्र उसके साथ सगे सम्बन्धियों को खबर देने गया होगा । मैंने इसलिये अपने भतीजे को भेजा । और मैं अभी तक इस बारे में निर्णय ही नहीं कर पाया कि पुलिस में रिपोर्ट करनी चाहिये या नहीं ? मैंने सोचा जब तक तुम्हें होश नहीं आ जाता। मैं शांत रहूंगा ।"

कुछ समय पुलिस की गाड़ी वहाँ आ चमकी । उन्हें यह निर्णय लेने में थोड़ा समय लगा था कि गाड़ी किस फॉर्म से आ रही थी। लेकिन बर्मन ने तब तक विनीता को अच्छी तरह हैंडल कर लिया था ।

पुलिस उनका बयान लेने के बाद शव को लेकर चली गई। शव की डॉक्टरी जाँच होना अनिवार्य था । बर्मन ने उस ट्रक का नंबर भी पुलिस को बता दिया था जिसका हवाला धनंजय से उसे मिला था । बर्मन के पास पुलिस के हर प्रश्न का उत्तर सुरक्षित था, फिर भी पुलिस ने उसे हिदायत दी कि बिना सूचना दिए वह फिलहाल शहर छोड़कर न जाये । क्योंकि पुलिस को उसकी ज़रूरत पर सकती थी। लेकिन बर्मन ऐसी किसी चेतावनी से घबराने वाला नहीं था ।

पुलिस के जाने के बाद वहाँ सन्नाटा छा गया ।

पांच मिनट तक कोई कुछ न बोला । वह दूर होती गाड़ी की ध्वनि सुनता रहा फिर खिड़की की तरफ आ पहुँचा। जब दूर तक कोई तिनका भी हिलता नज़र नहीं आया तो वह पलट पड़ा । धीमी-धीमी चाल चलता हुआ वह विनीता के पास पहुँचा ।

"मेरे ख्याल से अब कल से पहले यहाँ कोई नहीं आयेगा ।" बर्मन बोला - "इतना वक्त मेरे लिये पर्याप्त है। इतनी देर में तो मैं दो देशों को लाँघ जाता हूं ।" उसकी आवाज़ में बर्फ जैसी ठंडक थी। उसने निगाह उठायी, विस्मय और हलके से भय के कारण एक झुरझुरी सी दौड़ कर रह गई ।

बर्मन के जबड़ों से भयंकरता झाँक रही थी ।

“मैं कुछ समझी नहीं, क्या वह लोग शहर से किसी को बुलाने नहीं गये ?"

" शहर जाकर वह क्या करेंगे ? क्या टेलीफोन से काम नहीं चल सकता था ?"

"ओह! इस बारे में तो मैंने सोचा ही नहीं था ।"

“थोड़ी देर पहले यह लाइन कटी थी, हमने सबकुछ अपने माफिक कर लिया था और हम अपना काम खत्म करके चले भी जाते लेकिन हम असफल रहे और इस कारण हमें कुछ खतरनाक बन जाना पड़ा था ।"

"क्या मतलब ?" वह काँप गई, वह किसी नई दुर्घटना की आशंका से काँप गई।

"तुम एक अबला औरत हो और सिर्फ खूबसूरती के कारण तुमने बला औरत हो और सिर्फ खूबसूरती किसी-न-किसी की प्रेमिका या रखेल या दासी रही हो । हम बहुत दिनों तक उस पाखण्डी के लिये ब्लैकमेलिंग का माध्यम बने रहे... मेरा मतलब चौरंगी बाबा से, उसके पास कुछ खतरनाक किस्म के दस्तावेज़ थे, जो तुम्हारे दुर्भाग्य से यहाँ होने चाहिये । धनंजय ने उसकी हत्या की थी, हमें मालूम है और उसकी सारी सम्पत्ति इन लोगों ने बराबर बाँट ली थी । आश्रम उखाड़ कर खंडहरों में बदल दिया गया । जहाँ वह तांत्रिक रहता है। खैर हमें इस बात से कुछ लेना-देना नहीं, हमें तो वे सारे कस्टमर वापस चाहिये जिनसे हम रकम उगाही करके चौरंगी को भेजते थे परन्तु वे तभी देंगे जब वे सारे कागज़ात हमारे पास होंगे, उनके बिना हम किसी को ब्लैकमेल नहीं कर सकते, मैंने सारी कहानी बता दी है ताकि तुम संशय में न रहो और इस काम के लिये हम किसी की हत्या भी कर सकते हैं ।"

"तो। तो क्या उनको तुमने मारा ?"

"नहीं, यह तो संयोग की बात थी, उसके मर जाने से हमें भारी नुकसान हुआ, जो इतना वक्त खराब करना पड़ रहा है अन्यथा वह शराफत से सब कुछ बता देता । वह न सही तो तुम सही, बताओ तो ज़रा वे कागज़ात कहाँ रखे हैं ?"

विनीता को उसका इरादा स्पष्ट नज़र आ रहा था । उसकी बातों से यह बात भी साफ हो गई थी कि चन्द्र उसके कब्ज़े में है, फिर भी उसने पूछ ही लिया ।

" चन्द्र कहाँ है ?"

वह भयंकर तरीके से मुस्कुराया - "उसकी गर्दन पर छुरी है, मैं तुम्हें कुछ दर पहल बता चुका हू कि अपने उद्देश्य के लिये हम किसी का हत्या भी कर सकते हैं ।"

" ओह । तुमने उस बच्चे को ?”

"काम की बात करो मैडम, वह बच्चा जीवित चाहिए या । वे कागज़ात ?"

"हे भगवान । मैं क्या करूँ ? पता नहीं कौन से कागज़ात हैं वह बड़बड़ाई फिर रोआँसे स्वर में बोली - "मुझे उस बारे में कुछ भी नहीं मालूम ।"

"सब यही कहते हैं... मेरे लिये यह अनुभव पुराना है।” इतना कहकर उसने इस कदर उसके बाल पकड़े और खींचते खींचते दूसरे हाथ से शिकारी चाकू चलाया कि बाल कटकर उसके हाथ में आ गये ।

"यह आधे बाल हैं ।"

-

वह धड़ाम से गिरी । बर्मन ने कटे हुए बालों को हाथ में लपेटा और शिकारी चाकू का ब्लेड दायें-बायें घुमाकर धमकाने लगा ।

अब मैं तुम्हारा एक-एक बाल नोचना शुरू करूँगा, पहले तुम्हारे सर के बाल, फिर बगल के और । उसके बाद ।'

"नहीं ।" वह चीख पड़ी, "मैं अपने बच्चे की कसम खाकर कहती हूं मुझे कुछ नहीं मालूम। मुझपर दया करो।"

|"

"मैं अपने दया करने का तरीका तुम्हें बता चुका हूं।"

"सारा घर तुम्हारे सामने है। मैं सच-सच कहती हूं। मैं नहीं जानती

"वो हम सब तलाश कर चुके हैं। हमें किसी गुप्त जगह के बारे में जानना है । कोई गुप्त तहखाना ?"

"यहाँ कोई गुप्त खाना नहीं है।"

" अच्छी बात है ।" वह आगे बढ़ा। विनीता हड़बड़ाती हुई पीछे हटी फिर दीवार से जा सटी । दीवार के पास ही मेज़ पर दो गुलदस्ते रखे थे । एकाएक उसकी हिम्मत जागी और इस मुसीबत से छुटकारा पाने के लिये उसने संघर्ष करना उचित समझा ।

विनीता का ज़ोर-ज़ोर से धड़कने वाला दिल कह रहा था कि अब उसकी मृत्यु आ गई है। और उसे जिंदा रहकर करना भी क्या है ? उसे इस बारे में कुछ पता नहीं और वह जिंदा रही तो उन्हें विश्वास नहीं आयेगा। क्या पता वे चन्द्र बेताल को कष्ट पहुँचाएं ? उसने उस बेताल से प्रार्थना की कि अपने बेटे की रक्षा करे, जिस अगिया बेताल के बारे में उसने काफी कुछ सुना था । उसका ध्यान आते ही उसके शरीर में बल आ गया और उसका हाथ गुलदस्ते पर लपक पड़ा ।

जोरों के साथ गुलदस्ता उसके हाथ से छुटा । वह बर्मन की छाती पर पड़ा... बर्मन दो कदम पीछे को लड़खड़ाया फिर फुर्ती के साथ चौपाये की तरह आगे बढ़ा । उसके लिये वह स्त्री एकाएक खतरनाक हो गई थी । इस बार उसने मेज़ लुढ़का दी । बर्मन पीछे कूद गया ।

विनीता को थोड़ा अवसर मिला । वह दरवाज़े की तरफ भाग खड़ी हुई। उसे अब एक नई बात सूझ गई थी । बर्मन भी उसका इरादा भाप गया था। वह भी द्वार की तरफ दौड़ पड़ा। जैसे ही विनीता द्वार खोल रही थी, बर्मन का पंजा विनीता पर पड़ा । विनीता एक ओर को खिसक गई तो बर्मन के हाथ उसकी साड़ी का पल्लू आ गया । बर्मन ने उसे ही ज़ोर से खींचा। वह फिरकनी की तरह घूमी और साड़ी का एक हिस्सा पकड़ कर चीखी ।

बर्मन उसकी साड़ी थामे थामे ही आगे बढ़ा। जब वह बिलकुल निकट आ गया तो विनीता ने साड़ी को कमर पर रोके रहने का प्रयास छोड़कर दोनों नाखूनों का प्रयोग उसके चेहरे पर किया । बर्मन के लिये यह चोट घातक थी । उसकी आँख बाल-बाल बची। वह गुर्राता हुआ पीछे हट गया ।

विनीता ने दरवाज़ा खोला । वह साड़ी छोड़कर सीधे बाहर जा निकली । ।
 
बर्मन उसका पीछा छोड़ने वाला नहीं था । मुर्गीखाने के आसपास यह आँख मिचौली चलती रही, फिर वह एक खेत की तरफ यथाशक्ति लगाकर दौड़ पड़ी। मुर्गियों का शोर पीछे छोड़ बर्मन भी उसके पीछे दौड़ा। आगे झाड़ झंकार और पेड़ों की कतारें थीं। वह जंगली बाग का कोना था । विनीता जब उस क्षेत्र में दाखिल हुई तो उसका ख्याल था झाड़ी झंकारों के कारण आसानी से उस शैतान की निगाहों से ओझल हो जायेगी। एक जगह उसका पेटीकोट कांटे में फंस गया । भागते- भागते वह गिरी । फिर उठी । पेटीकोट चर्र... की आवाज़ में दो भागों में बंट गया ।

अब वह दौड़ी तो पेटीकोट अलग उड़ रहा था और गोरी टाँगे अलग। वह इसी प्रकार झाड़ियों को पार करती आगे बढ़ रही थी । अब उसे पीछे बर्मन नज़र नहीं आ रहा था । उसे दो झाड़ियों के लम्बे कुंज नज़र आये जो काफी दूर तक गए थे। ये कुंज काफी घने थे और ऊंचे थे । यहाँ वह आसानी के साथ छिपकर कुछ देर अपनी साँसों पर काबू पा सकती थी। अब तक उसके कपड़े तार-तार हो चुके थे, बदन पर एक दो स्थानों से खून भी रिस रहा था। जंगली शेरनी की तरह बिखरी नज़र आ रही थी ।

वह उसी रास्ते पर बढ़ी। कुछ दूर जाते ही जैसे ही उसने छिपने का स्थान तलाश करना चाहा उसे कार के पहिये नज़र आये, फिर वह एकदम चौक पड़ी । झाड़ियों में फिर वही स्टेशन वैगन खडी थी और उसकी छत पर मोंटू बैठा नज़र आ रहा था। हालांकि उसने मोंटू को अब देखा था परन्तु मोंटू ने उसको काफी देर पहले देख लिया था । सहमी हुई सी स्थिति में वह पीछे हटती चली गई। मोंटू उसी प्रकार बैठा रहा ।

अचानक वह किसी से टकराई। फिर उसने महसूस किया जैसे उसकी गर्दन पर सलाखें गढ़ गई हों। उसके कंठ से बचाओ - बचाओ की आवाज़ निकली, जो एक झटके के साथ झाड़ियों में डूब गयी ।

"इसने मुझे बहुत थका दिया है।" बर्मन चीख, "अब इसे तुम संभालो ।"

"यह पहले ही मेरे सँभालने की चीज़ थी ।" मोंटू बोला, "तुम जैसे बूढ़े आदमी को इस फेर में नहीं पड़ना चाहिए।" इतना कहकर मोंटू ने अपनी कमीज़ उतारकर एक तरफ फेंक दी। फिर उसने पतलून उतारते हुए कहा - "जाओ अंकल तुम झाड़ी के पीछे छिप जाओ, मैं इससे निबटता हूं।"

इतना कहकर वह उस झाड़ी में कूद पड़ा जहाँ विनीता लगभग बेसुध पड़ी थी। ठीक उसी समय स्टेशन वैगन में बेहोश पड़े चन्द्र बेताल को होश आया । और वह फटी-फटी निगाहों से शीशे के भीतर से अपनी माँ के साथ होते ज़ुल्म को देखने लगा । उसके हाथ बंधे थे, मुंह पर टेप चढ़ा था । इसी प्रकार उसकी टांगें भी कसी थीं और वह अपनी माँ के

लिये कुछ भी नहीं कर सकता था ।

आधी रात के समय वे विनीता के शव को कब्र में गाड़कर फारिग हुए । विनीता की मृत्यु यातनाओं के दौर से गुज़रकर हुई थी और चाचा भतीजे ने अधिक रंज प्रकट किये बिना लाश को गाड़ दिया था। इस बीच बर्मन ने वह पर्सनल डायरी खोज निकाली थी जिसका हवाला धनंजय ने मरते समय दिया था। यह बात उन्हें बाद में ध्यान आई थी । टेप सुनने पर उन्हें मालूम हुआ कि उसने एक आले का ज़िक्र किया था । जो मुर्गी खाने में बना था । इस डायरी को ढूंढने में उन्हें अधिक समय बर्बाद नहीं करना पड़ा। किन्तु डायरी पढ़ने के बाद जिन रहस्यों से पर्दा उठा, वह उनके लिये अभूतपूर्व थे ।

दो बजे रात्रि को अंतिम वार्ता के बाद वे रवाना हो गये । परन्तु उन दोनों के साथ चन्द्र बेताल भी था ।

'तुम इसे कहाँ-कहाँ घुमाते रहोगे ?” मोंटू ने कहा, "क्यों न हम इसे भी ठिकाने लगा दें ?"

"बेवकूफ की औलाद है तू ।" बर्मन बोला, “हमारे लिये वह हीरा है, हीरा ।"

"क्या मतलब ?"

"तुझे मैंने बताया नहीं कि डायरी के लफ्ज़ों के अनुसार एक बक्सा पानी की सुरंग में रह गया था, जिसमें वह कागज़ात थे। वह जगह आदिवासियों के कब्ज़े में है, अब वहाँ जाना आसान काम नहीं । उस जगह पर पहुँचने के लिये यह छोकरा काम आयेगा । मैंने तुम्हें बताया था कि इसे वे चमत्कारी फरिश्ता समझते थे। इस फरिश्ते के कारण हम सारे आदिवासियों पर कब्ज़ा जमा लेंगे। वे कितने खूंखार हैं, यह तो तुम्हें मालूम ही है । अब मेरा एक प्लान है, जिस तरह चौरंगी ने वहाँ पर हेडक्वार्टर बना रखा था उसी तरह से मैं भी अपने गैंग का गुप्त अड्डा वहाँ पर स्थापित कर लूँगा ।"

"लेकिन हमारा गैंग है कहाँ ? ले देकर हम दो ही तो बचे हैं।"

"मैं सबको इकट्ठा कर लूँगा, लेकिन इस वक्त हमारा सबसे पहला काम उन दस्तावेज़ों को खोजना है ।"

"मेरी समझ में एक बात नहीं आती, जैसा उस डायरी में लिखा है क्या वह लड़का वैसा ही चमत्कारी है ?"

“उन दिनों इसके बारे में खूब अफवाह उड़ी थी। मैं थोड़ा बहुत तन्त्र जानता हूं, लेकिन इतनी गहराई से नहीं, फिर भी तन्त्र-मन्त्र में नर बलि से बहुत बड़े-बड़े काम सिद्ध किये जा सकते हैं । चाँद की तेईसवीं रात में हम इस लड़के की हिंसक प्रकृति देखेंगे। अगर यह सचमुच बेताल का बेटा है तो यह बहुत सी गुप्त शक्तियों का मालिक बन सकता है ऐसा होने पर हम इसके द्वारा क्या कुछ नहीं कर सकते ? मगर मैंने यह बात सच पाई तो मैं इसे गुप्त शक्तियों की ओर ले जाऊँगा ।"

"कैसे...?"

"नरबली से ।" बर्मन का स्वर अत्यन्त ठन्डा था, "यह काम आदिवासियों द्वारा आसानी से करवाया जा सकता है । वे लोग अपने देवताओं को बलि देते हैं ।"

मोंटू ने आगे कुछ नहीं पूछा ।

चन्द्र बेताल एक बार फिर उन आदिवासी जंगलों की ओर लौट रहा था आर चाद का तइसवी रात सिर्फ पाच दिन दूर रह गई था ।

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वहाँ केवल मन्दिर शेष था, मन्दिर के एक ओर गुफाएं थीं, दूसरे तरफ खंडहरों में बदल चुके मूर्तियों के चिन्ह थे । आदिवासियों ने मन्दिर को देवताओं का स्थल बना दिया था और गुफाओं में विभिन्न प्रकार की मूर्तियाँ रख छोड़ी थीं ।

बर्मन और मोंटू को सन्यासियों का वेश बदलना पड़ा। गांव में जब वे चन्द्र बेताल को लेकर पहुँचे तो आदिवासियों ने तुरंत उस चमत्कारी बालक को पहचान लिया और फिर उनका जोरदार स्वागत हुआ । लेकिन बर्मन ने जल्द ही मुखिया को समझाया कि वे मन्दिर में विश्राम करने आये हैं। उन्होंने अपने आपको चमत्कारी बालक का दूत बताया था।

इससे पहले उन्होंने चन्द्र बेताल को बुरी तरह आतंकित करके सिर्फ मौन रहने के लिये कहा था। वह मौन ही था । परन्तु उसे भूली बिसरी बातें याद आ रही थीं। वह इस धरती को भूला नहीं था और उसे याद आ रहा था कि यहाँ के लोग उसे ईश्वर का अवतार समझते थे ।

साँझ के वक्त उन्हें मन्दिर में पहुँचा दिया गया। चार आदिवासी उनकी सेवा के लिये जुट गए। अधिक थके होने के कारण उन्होंने उस रात विश्राम किया और चन्द्र बेताल को दावा के प्रभाव में रखा। अगले दिन वे उस सुरंग की तलाश करने लगे। जिसका हवाला डायरी में था । पहले दिन उन्होंने पानी की नहर खोज निकाली । पानी की यह सुरंग एक बड़े पठार में जाकर समाप्त हो गई थी ।

जब वे इस प्रकार की खोजबीन में लगे रहते थे तो चन्द्र बेताल को दवाओं के प्रभाव से गहरी निद्रा में सुलाकर जाते थे। इसी प्रकार खोजबीन में पांच दिन बीत गये। इन पांच दिनों में वह बुरी तरह थककर चूर हो गये थे। उन्हें अभी तक किसी प्रकार की सफलता नहीं मिली थी। रात्रि के समय वह चन्द्र बेताल की एक टांग पर ज़ंजीर कस देते थे, जो भारी पत्थर से जकड़ी होती थी । बेताल एक ही जगह विवश पड़े रहने पर बाध्य था ।

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पांचवीं रात भी ऐसा करके वे लोग थके हारे सो गये । बर्मन यह बात भूल गया था कि आज चाँद की तेईसवीं रात है, चन्द्र बेताल के लिये उन्मादी और कातिलाना रात । जिस समय चाँद का उजाला एक झरोखे से भीतर आकर उसके चेहरे पर तैर रहा था वह आँखें खोल बेचैनी के साथ करवटें बदलने लगा । उसके चेहरे पर दरिंदगी के भाव थे और वह बड़ा भयानक लग रहा था । कभी वह मुट्ठियाँ बन्द करता तो कभी खोलता । फिर वह झटके के साथ खड़ा हो गया । उसने झरोखे की तरफ मुंह उठाया और अपने बालपन की वास्तविकता से दूर बेताल लोक में चला गया । उसके भीतर बेताल करवट ले रहा था जो उसे उत्तेजित करता जा रहा था और उसमें शक्ति भारती जा रही थी

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उसे खून का स्नान देने वाला कोई नहीं था ।

वह आगे को खिसका... ज़ंजीर बज उठी। उसने नीचे देखा, उसके बाद पत्थर को खींचने लगा । पत्थर ज़ंजीर का झटका खाकर आगे सरकने लगा । इस समय उसके लिये पत्थर खींचना दुर्लभ कार्य नहीं था । वह एक द्वार पर पहुँचकर रुक गया। भीतर वे दोनों सो रहे थे । उनके शरीर देखकर बेताल का चेहरा और भी खूंखार हो गया । वह वास्तविक जीवन में उन अपराधियों को नहीं भूल सकता था । उसे उनके गुनाह याद थे। एक के बाद एक । वे सभी मंजर उसके सामने चक्रवात की तरह से घूम रहे थे ।

वह आगे बढ़ा ।

पहले इस ज़ंजीर से छुटकारा पाना ज़रूरी था ।

और वह सोते शिकार से भी नहीं खेलना चाहता था ।

ज़ंजीर बहुत मोटी थी, आसानी से नहीं टूट सकती थी । उसकी निगाह राइफल पर जम गयीं। वह थोड़ा और आगे खिसका, फिर उसने लम्बे लेटकर राइफल खींच ली । उसके बाद वह भारी थैला भी उठा लिया जिसमें उनके हथियार और ऐम्युनिशन पड़ा था । वे सम्मोहित सी निद्रा में सो रहे थे। उन्हें इसका ज़रा भी पता न था कि मौत उनके सर पर मंडरा रही है। बेताल का बेटा वह सामान समेटकर बाहर निकला । वह एक दूसरे द्वार तक पत्थर को खींचता हुआ खुले आकाश के नीचे आ गया। फिर उसने राइफल की बैरक पांव के पास ज़ंजीर के कुंडल पर टिकाई और फायर कर दिया ।

धमाके की आवाज़ से वातावरण काँप उठा । आसपास के वृक्षों और घोसलों में सो रहे पक्षी भी फड़फड़ा उठे । उनका सामूहिक शोर वातावरण में सुनाई दिया। बेताल के बेटे ने आसमान में उड़ते परिंदों को देखा, राइफल उठाई और एक फायर और कर दिया । उसका खूनी खेल शुरू हो गया था ।

फायरिंग की आवाज़ उन दोनों को जगाने के लिये पर्याप्त थी । वे हड़बड़ा कर उठ गये। सबसे पहले उन्होंने अपने हथियार टटोले, परन्तु सारे शस्त्र गायब थे । कुछ देर के लिये वे स्तब्ध से रह गये थे। फिर कुछ जागरूकता आते ही वे दोनों उछलकर खड़े हो गये ।

“उस लड़के को देखो।" बर्मन बोला ।

मोंटू बाहर भागा, फिर पलटा ।

"वह नहीं है।"

" नहीं है ?" बर्मन का स्वर आश्चर्य में डूबा था, "ओह ।" "क्या वही गोलियां चला रहा है ? तुमने सुना ?"

"हां दो बार राइफल की आवाज़ । अगर वही है तो उसे फौरन पकड़ो

"सावधान अंकल । मुझे याद है उसने बताया था कि वह राइफल चलाना जानता है और अच्छा निशानेबाज़ है ।"

"मैं सोच रहा हूं कहीं उसने खुद को गोली न मार ली हो, जो भी है । भारी गड़बड़ है । वह अकेला नहीं हो सकता। किसी ने उसकी सहायता की है, नहीं तो वह इतना बड़ा पत्थर कैसे घसीट सकता था ?"

बर्मन टॉर्च के प्रकाश में चारों तरफ का मुआइना कर रहा था ।

“भतीजे । तुम उस झरोखे से निकलो । मैं सामने से जाता हूं।"

कुछ देर बाद वे अलग-अलग दिशाओं से बाहर निकले । परन्तु उन्हें कुछ भी नज़र नहीं आ रहा था ।

निकट ही एक फायर गूंजा ।

मोंटू उधर को झपटने को हुआ, बर्मन ने उसका हाथ थाम लिया । "वह छोकरा अकेला है, मैंने उसकी छाया देखी है ।" मोंटू ने कहा

'हरामजादा हमारी गोलिया खराब कर रहा है ।"

"मोंटू कसूर मेरा है, माय गॉड। वह बात मुझे याद नहीं थी कि आज चाँद की तेईसवीं तारीख है ।"

"तो क्या उसमें इतनी शक्ति आ गई है ?"

"हमें विश्वास करना ही पड़ेगा ।"

पर तुमने कहा था कि इस रात उसपर खूनी जुनून सवार होना चाहिए। तो उसने हमें सोते में क्यों नहीं मार दिया ? वह हमारे खून का भी स्नान कर सकता था ।"

'शायद अभी जुनून पूरी तरह चढ़ा नहीं । अभी उसने आज़ाद होने के लिये यह काम किया ।"

“तब तो हमें फौरन उसे दबोच लेना चाहिए, वरना हम भारी मुसीबत में फंस जायेंगे । वह हमें आदिवासियों से भी कटवा सकता है । मुझे लगता है उसने हमारे हथियार इसलिये छीने हैं ।"

उन्हें एक किलकारी सुनाई दी ।

अब उन्हें भय प्रतीत होने लगा । फिर भी एक दूसरे पर साहस जताने के लिये वह सावधानी के साथ उस ओर बढ़ गये । जहाँ बेताल का बेटा जाता दिखाई दे रहा था। वे दोनों उसका पीछा कर रहे थे ।

अचानक बेताल का बेटा दौड़ पड़ा ।

"पकड़ो साले को, उसने देख लिया है, वह डरकर भाग रहा है ।" बर्मन बोला ।

उसके भागने से दोनों का साहस बढ़ गया। वे अंधा धुंध दौड़ पड़े । इस भागदौड़ में उन्हें इसका ज़रा भी ध्यान नहीं रहा कि वे किन-किन रास्तों पर दौड़ रहे हैं। उन्हें जहाँ से तनिक झलक नज़र आती वह उसी ओर दौड़ पड़ते। इसी तरह दौड़ते हुए वे लोग कंदराओं और गुफाओं के जाल में जा फंसे । यहाँ पहुँचे तो सहसा बेताल के बेटे की झलक लुप्त हो गई ।

दोनों की टॉर्चे सुरंग की दीवारों को टटोल रही थीं ।
 
"मैं इधर जाता हूं।" बर्मन ने कहा, "तुम उधर ।"

सुरंग के भीतर ही दो रास्ते थे । वे अलग-अलग रास्तों में समा गये । यह दो रास्ते उनके जीवन के अलग-अलग रास्ते थे। जिनसे वापस लौट कर मिलने की कोई गुंजाइश नहीं थी। सबसे पहले मोंटू मौत की खोह में पहुँचा । खोह के बीचोबीच आग का गोला चमका और विस्फोट के साथ लपटें उठने लगीं। मोंटू एकदम बौखलाकर खोह की दीवार से टकराया फिर उसके नेत्र आश्चर्य से फैलते चले गये । आग के दायरे में वह लड़का खड़ा था । ऐसा लगता था कि लपटें उसके शरीर से फूट रही हों, उसकी शक्ल बड़ी भयानक लग रही थी, आँखें सुख अंगारों के समान लग रही थीं ।

मोंटू अपने जीवन में पहली बार ऐसा भयानक दृश्य देख रहा था । वह सोचने लगा, "क्या यह लड़का आग में जलता हुआ भी जीवित है ?"

अचानक लड़का आगे बढ़ा ।

मोंटू काँप गया । अचानक उसे याद आया । इस लड़के के बारे में ऐसी अफवाह उसने चौरंगी के ज़माने में भी सुनी थीं। उसके झुरझुराते हुए शरीर में आत्म विश्वास की चेतना जागी ।

लड़के ने हाथ फैलाया, उसके हाथ में लोहे की वही ज़ंजीर थी जो उसकी टांग पर बंधी थी। आग के कारण वह लाल पड़ती जा रही थी । उसने बूट के अन्दर छिपा गरारीदार चाकू बाहर खींचा और उसे खोलकर खड़ा हो गया। वह अपने आपको अच्छा चाकूबाज़ समझता था । "वहीं रुक जा छोकरे ।" उसने अपने स्वर का संतुलन कायम रखते हुए कहा - "मैं तेरी इस आग से नहीं डर सकता ।"

लड़का कुछ नहीं बोला, वह ज़ंजीर झुलाता इतना आगे बढ़ आया कि मोंटू को पीछे हटना पड़ा। फिर उसने चाकू खींच मारा । चाकू आग में नाचता नज़र आया । खन्न के साथ ज़ंजीर से टकराया फिर एक ओर गिर गया। अब मोंटू दहशत के कारण पसीने से भीग गया । उसका अंतिम हथियार भी हाथ से जा चुका था। अब उसने एक पत्थर उठाकर मारा । पत्थर भी धम्म से ज़ंजीर से टकरा कर एक ओर गिरा, उसके बाद वह लगातार पत्थर मारता इधर-उधर घूमता रहा । इस बीच लपटें और तेज़ हो गयीं ।

मोंटू की खोह में भीषण गर्मी का आभास हुआ। वह पसीने से बुरी तरह भीगा हुआ था । खोह से बाहर निकलने का उसे कोई रास्ता नज़र नहीं आ रहा था । जब वह काफी थक गया तो वह चीखने लगा । वह बर्मन को भाव पूर्ण स्वर में आवाजें देने लगा । इसी बीच उसपर सुर्ख हो चुकी ज़ंजीर पड़ी। उसके कपड़े झुलस गये, शरीर पर भयानक पीड़ा जनक प्रहार हुआ, और उसके कंठ से फटे बांस की तरह चीखें निकल पड़ीं। अगले वार पर उसकी खाल झुलसने लगी। वह चारों हाथ-पाँव फैलाये बेताल के बेटे पर टूट पड़ा पर शीघ्र ही वह आग में झुलसता हुआ ज़मीन पर गिरा, वह तड़पने लगा, फिर लोहे की जंजीर ने उसकी खाल खींचनी शुरू कर दी।

शीघ्र ही वह बेहोश हो गया ।

बेताल का बेटा तेज़ी के साथ पीछे हट गया ।

आग धीरे-धीरे शांत होने लगी । परन्तु उसका शरीर अब भी अंगारे के समान तपा था ।

मोंटू को जब होश आया तो वह उल्टा लटका हुआ था । उसके शरीर पर ऐसे बंधन कसे थे कि रक्त सर के भाग में जमा महसूस हो रहा था । चेहरा गर्म हुआ लगता था और पांव का हिस्सा मुर्दा सा हो गया था । उसपर पानी के छीटें से पड़ रहे थे ।

निकट ही मशाल जल रही थी और उसपर पानी की फुहार छत से गिर रही थी । उसने पीड़ा से जबड़ों को कसते हुए इधर-उधर देखा । उसका शरीर सर से पांव तक नग्न था और पानी की फुहार के कारण वह नहाया हुआ प्रतीत होता था ।

उसके अलावा वहाँ कोई नहीं था ।

यह स्याह दीवारों वाला कक्ष था, जिसमें एक आदमकद द्वार नज़र आ रहा था ।

अचानक पानी की फुहार बन्द ही गई। फिर उसने अपने गले में चुभन महसूस की। यह चुभन गहरी और भयानक पड़ती जा रही थी जैसे कोई धारदार ब्लेड उसकी गर्दन पर चारों ओर से चुभ रहा हो । उसने चीखना चाहा परन्तु गले से आवाज़ नहीं निकली। उसकी आँखें फैलती चली गयीं और जीभ मुंह से बाहर निकलने लगी ।

एक क्षण ऐसा भी आया कि जब उसकी आँखें स्थिर हो गयीं थीं ।

आतम बार उसन बताल के बट का नग्न आकृति अपन ठाक नाच देखी थी । परन्तु वह दृश्य बहुत धुंधला सा था । उसे आभास हो चुका था कि वह भयानक कष्टप्रद मौत मर रहा है ।

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बर्मन सुरंगों में भटक रहा था। उसे न तो बेताल का बेटा नज़र आ रहा था न मोंटू, उसकी स्थिति अंधों के समान थी। एक के बाद दूसरा रास्ता खुलता जाता और अंत कहीं न मिलता । वह इस बात को अच्छी तरह समझ चुका था कि वह भटक गया है, अब उसे बाहर निकलने की चिंता सता रही थी । उसने एक दो बार मोंटू को आवाज़ दी। परन्तु उसकी आवाज़ सुरंगों में ही ध्वनित होकर रह गई। गूँज कानों से टकराती और फिर दीवारों में खो जाती । जब वह काफी थक गया तो एक स्थान पर बैठ गया ।

कई मिनट उस स्थिति में गुज़र गये ।

सहसा उसे किसी के हंसने का स्वर सुनाई दिया । वह उछल कर खड़ा हुआ। हंसी कहीं आसपास से ही आ रही थी। उसने चारों तरफ टॉर्च का प्रकाश डाला । परन्तु कुछ नज़र नहीं आया । सहसा आवाज़ एक दिशा में गुम होती प्रतीत हुई। वह किसकी हंसी थी, इस बारे में वह कोई अनुमान नहीं लगा पाया ।

परन्तु वह उस दिशा में अवश्य चल पड़ा । जहाँ आवाज़ गुम होती प्रतीत हुई थी। उसने एक-एक कदम सावधानी के साथ रखा । उसे एक रास्ते पर बढ़ते हुए सहसा प्रकाश का धुंधला चिन्ह महसूस हुआ । यह प्रकाश दायीं ओर वाले रास्ते पर था । वह उसी तरफ मुड़ गया । कुछ कदम चलने के बाद ही वह टॉर्च ऑफ करके रुक गया ।

सामने एक आदमकद दरवाज़ा था, जिससे धुंधला प्रकाश बाहर आ रहा था। वह बहुत सीमित थी और कभी-कभी उसकी दिशा बदलती प्रतीत होती, कभी वह धूमिल पड़ जाता तो कभी तेज़। वह दबे कदम उस ओर बढ़ा ।

प्रकाश के धुंधलेपन में पहुँचते ही उसे विचित्र सी ठन्डक का आभास हुआ ।

वह और आगे बढ़ा । न जाने क्यों उसका दिल तेज़ तेज़ धड़क रहा था । उसके नेत्रों में बेचैनी के लहर करवटें ले रही थी । वह दीवार से चिपकता हुआ आदमकद द्वार की आड़ में हुआ फिर उसने दूसरी तरफ झाँक कर देखा । हलके उजाले में उस ओर का दृश्य देखते ही उसके गले से कसमसाती आवाज़ निकली फिर उसे अपना हलक फंसता महसूस हुआ ।

उस ओर एक नंगा शव लटका था, जिसका सर गायब था, और गर्दन से बूँद- बूँद खून नीचे टपक रहा था पीछे एक मशाल जल रही थी । जो हवा के झोंके से कभी कम और कभी अधिक हो जाती । नीचे एक पात्र रखा था, खून उसी में टपक-टपक कर जमा हो रहा था ।

दूसरी तरफ हल्की आँच में तपता हुआ वह लड़का नज़र आ रहा था, जिसने एक नरमुंड हाथ में पकड़ा हुआ था। वह उस नरमुंड को देख- देख कर मुस्कुरा रहा था ।

बर्मन ने अच्छी तरह पहचान लिया, वह मुंड किसी और का नहीं बल्कि मोंटू का है । बर्मन के हाथ-पांव फूल गए। आँखों के आगे अन्धकार छाने लगा । उसके सामने वह दृश्य एक बुरे स्वप्न के समान था । उसके भीतर इतना साहस नहीं रहा था कि वह आगे बढ़े ।

बेताल का बेटा अपने खेल में मस्त था I

बर्मन ने वहाँ से भाग निकलने में ही भलाई समझी। मोंटू की दर्दनाक मृत्यु उसके सामने थी और वह इस बात को भली प्रकार समझ रहा था कि मौत उसके सर पर भी मंडरा रही है ।

वह वापस भागा और उसके बाद भागता ही चला गया । न जाने किन-किन रास्तों से भागता रहा। फिर ठोकर खाकर गिरा और अन्धकार में लुढ़कता चला गया । वह सीढ़ियों से लुढ़कता हुआ सर के बल गिरा । सर किसी सख्त वस्तु से टकराया था जिसने उसकी चेतना शक्ति छीन ली ।

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बर्मन को जब होश आया तो उसने अपने आपको उजाले में पाया । आँखें खोलकर उसने चारों तरफ देखा । फिर वह उछलकर बैठ गया । सर में चक्कर आया । वह दोनों हाथों से सर थामकर पीड़ा को दबाता हुआ सामने देखने लगा ।

सामने एक व्यक्ति बैठा था, वह काला लबादा पहने था । उसकी लम्बी-लम्बी जटाएं थीं, कानों में चमकते कुंडल थे, सीने पर सफेद खोपड़ी बनी थी ।

वह एक लोहे की कुर्सी पर बैठा था। उसके दोनों तरफ दो स्टूल रखे थे। जिनमें दो खोपड़ियाँ पड़ी थीं। सामने एक त्रिशूल गड़ा था । बर्मन को उसका चेहरा ठीक त्रिशूल के पीछे दिखाई दे रहा था। जो त्रिशूल पर अटका सा प्रतीत होता था ।

"खैर मनाओ कि रात बीत चुकी है।" उसके मुंह से ऐसी आवाज़ निकली जैसे कि कोई कंकाल बोल रहा हो - "उस ईश्वर से प्रार्थना करो कि ऐसी रात फिर कभी न आये ।"

उसका स्वर इतना प्रभावशाली था कि बर्मन ने फौरन ईश्वर से दुआ मांगी।

"तुम मुझे नहीं जानते होंगे।" वह बोला ।

बर्मन ने इनकार में गर्दन हिलाई ।

और तुम यह भी नहीं जानते होंगे कि मैंने तुम्हें क्यों बचा लिया ?" बर्मन चुप रहा ।

"हरामजादे ! तू इस योग्य नहीं है कि तुझे ज़िंदा रखा जाये ।"

वह एकदम भयानक स्वर में चीख कर बोला ।

बर्मन के पांवों तले ज़मीन सरक गई । वह फर्श पर सर टिकाकर बैठ गया ।

" अगर शर्म से डूब कर मरना था तो किसी नदी में ही डूब मरता ।" वह बोला - "चल सर उठा । उठा सर । और सीधा होकर बैठ ।"

बर्मन ने वैसा ही किया ।

"तुमने उसकी माँ को मार दिया । उसका आखिरी सहारा भी लूट लिया ।

"मैं। मैंने नहीं । मोंटू ने । म । मैं ।"

"मैं सब जानता हूं इसलिये मोंटू को उसकी सज़ा मिल गई है, सुन हरामजादे, मैं उसे इंसान बनाना चाहता था। सिर्फ तेईस वर्ष की बात थी, इसलिये मैंने उसे तन्त्र-मन्त्र की दुनिया से दूर भेज दिया था । मैं नहीं चाहता था कि बेताल का साया उसपर हावी हो जाये, और सुन, अब तक वह इसाना रक्त से दूर था, उसने छाट-माट जानवरा का रक्त स्नान किया था, पर तुम दोनों के कारण उसे इंसानी शिकार से खेलने का मौका मिल गया । बदले की चिंगारी ने बेताल को भड़का दिया और वह नर रक्त के लिये जाग उठा । अब यह बहुत बड़ी समस्या बन गई है I"

"तू जानता है कि जब शेर या चीते को आदमी का रक्त चखने को मिल जाता है तो वह आदमखोर हो जाता है, इंसानी रक्त में इतना बड़ा सम्मोहन होता है, जिसे यह स्वाद मुंह लग जाये वह इसे कभी नहीं छोड़ सकता । उसके भीतर सारी शैतानियत जाग उठेगी। यह शराब, अफीम, कोकेन सभी प्रकार के नशों से अधिक घातक है । और वह मनुष्य रक्त भेंट ले चुका है। अब वह एक रात का दरिंदा बन गया है, परन्तु ज्यों-ज्यों वह बड़ा होता जायेगा । उसकी दरिंदगी बढ़ती जायेगी, वह आदम रूप में खूंखार भेड़िया बन जायेगा ।
 
रात उसकी प्यास तुम्हारे उस भतीजे के रक्त से ही बुझ गई उसका ध्यान तुम्हारी तरफ से हटा रहा अन्यथा तुम भी मौत के करीब थे और उन सुरंगों से कभी न निकल पाते। उसने खोपड़ियां सजानी शुरू कर दीं हैं और अब वह ऐसी जगह छिप गया है जहाँ कोई आसानी से नहीं पहुँच सकता, जिस प्रकार इन्सान के दिल में कोई न कोई डर छिपा रहता है, ऐसा ही डर उसमें है, लेकिन यह डर अधिक समय तक नहीं रहेगा ।

मैं क्या दुनिया की कोई ताकत उसे मनुष्य रक्त से अलग नहीं कर सकती । सिर्फ मृत्यु उसे छुटकारा दिला सकती है।"

वह कुछ पल के लिये रुका फिर उठ खड़ा हुआ। उसने एक खोपड़ी हाथ में ले ली ।

“मैं एक तांत्रिक हूं।" वह बोला - "लेकिन ऐसे तांत्रिक तुम्हें कम मिलेंगे जो हानि पहुँचाने के लिये अपने तन्त्र का इस्तेमाल नहीं करते । बुराई के दुश्मन बनकर तांत्रिक का जीना दुर्लभ होता है, परन्तु मैं इसी सिद्धांत का पालन कर रहा हूं, चौरंगी बुरा था, वह मेरा दुश्मन नंबर हूं, चौरंगी बुरा था, वह में एक था, इसलिये मिट गया ।

अब मुझे लगता है कि इस दुनिया में नब्बे प्रतिशत लोग बुराई के रास्ते पर चलते रहे हैं और कुछ तो शैतानियत की सीमा लांघ चुके हैं। उनके अन्याय ज़ुल्म से न जाने कितने घर उजड़ जाते होंगे, मुझ जैसे सीधे इंसानों को अपने पिता से हाथ धोना पड़ा होगा। दुनिया का हर कोना अपराध, घृणा और खून-खराबे से लबालब भरता जा रहा है और कुछ लोग तो ऐसे हैं जिन्हें एक पल भी ज़िंदा रहने का अधिकार नहीं है। जैसे तुम ।"

बर्मन के शरीर में कम्पन की लहर दौड़ गई ।

कुछ कागज़ातों को प्राप्त करने के लिये तुमने यह खेल खेला लेकिन तुमने अपने इस कृत्य से न सिर्फ मेरी बल्कि उस नादान बच्चे की भी आँख खोल दी, इसलिये यह ऐसा शैतान बनेगा, ऐसा नर पिशाच होगा, जो सिर्फ इंसानी रक्त के बलि लेगा। वह भी उन इंसानों की जिन्हें कानून नहीं मार पाता और जिन्हें जीने का कोई अधिकार नहीं । तू यह सब देखने के लिये जीवित रहेगा, तू उसका गुलाम बनकर ज़िंदा रहेगा, वह रोज़ तुझे दस कोड़ों की सज़ा देगा, तुझे आखिरी दम तक बर्दाश्त करना होगा, जिस दिन तूने भागने की कोशिश की या चन्द्र बेताल की आज्ञाओं का उलंधन किया, वह सबसे पहले बिना अन्न जल ग्रहण किये तेरे शिकार पर निकल जायेगा । याद रख आज के बाद वह अकेला नहीं होगा, मेरी तेज शक्ति उसके साथ होगी, बोल तुझे यह सब मंजूर है ?"

"म। मंजूर है।" जान बचती देख वह बोला ।

" तू अब भी नहीं समझा कि मैंने ऐसा फैसला क्यों किया ?" तांत्रिक हंसा, "तू समझ भी नहीं सकता । क्या तेरा बूढ़ा बाप एक वैज्ञानिक नहीं है ?"

बर्मन बुरी तरह चौंक पड़ा ।

"वह एक जर्मनी है और तू उसकी नाजायज़ संतान है। उसने एक भारतीय महिला से प्रेम किया था वह तुमसे सिर्फ बीस साल बड़ा है । तू अपने बाप से पेंशन लेता है या एक प्रकार से ब्लैक मेल कर रहा है क्योंकि तेरी माँ ने वेश्या का जीवन जिया । और तेरा वह जर्मनी बाप अपनी गलती की सज़ा आज भी भुगत रहा है या फिर वह तुम्हारी माँ को पैसे भेजना अपने प्रेम का कर्तव्य समझता है। पर कुछ भी हो । तेरा उससे किसी-न-किसी रूप में सम्बन्ध है ।"

"फिर मेरे उस बाप से आपको क्या मतलब ?"

"मतलब है । मुझे ऐसे किसी वैज्ञानिक की ज़रूरत है... मैं चन्द्र बेताल को तन्त्र-मन्त्र से विकसित करूंगा और वह विज्ञान के चमत्कारों से उसे सजा देगा । फिर चन्द्र को तेईस वर्ष में संसार का सबसे शक्तिवान सबसे खतरनाक अमर व्यक्ति बना दूँगा, अग्नि जिसके वश में होगी । उसे दुनिया की बड़ी से बड़ी शक्ति पराजित नहीं कर सकती । विज्ञान के युग में वह कहीं धोखा न खा जाये इसलिये वह स्वयं बहुत बड़ा वैज्ञानिक होगा । और जब ऐसा हो जायेगा तो मैं उसे महाबली बेताल का मन्त्र दे दूँगा । उसके बाद सारे संसार के बेताल उसके गुलाम बनते जायेंगे और वह अपना राज्य बढ़ा कर एक छत्र राज्य स्थापित कर लेगा । मैं सौगंध खाकर कहता हूं जिस दिन मेरा यह संकल्प पूरा हो जायेगा उस दिन दुनिया से तुम जैसे बुरे आदमियों का बीज भी नाश हो जायेगा ।"

अब तेरे माध्यम से मैं उसके लिये तेरे जर्मनी पिता को यहाँ बुलाऊंगा जब तक उसकी साधना पूरी नहीं होगी हम में से कोई यहाँ से नहीं जायेगा ।"

बर्मन उसका भयानक इरादा सुनकर सिहर गया। क्या वह बेताल के बेटे को सचमुच वैसा बना देगा ? क्या वह अजर अमर हो जायेगा ? क्या वह समस्त बेताल शक्तियों का स्वामी बन जायेगा ? परन्तु उसके भीतर तो शैतान का राज्य होगा, फिर वह अच्छाई का रास्ता कैसे अपनायेगा ? उसने यह प्रश्न तांत्रिक से पूछना चाहा पर उसका साहस न पड़ा । वह इस बात को अपने ढंग से सोच रहा था । बेताल का बेटा कभी अच्छाई के रास्ते पर नहीं जायेगा । उसके भीतर का शैतान बुराई का मार्ग खोजेगा और उस रास्ते पर वह उसे ले जायेगा । फिर वह बेताल के बेटे की शक्ति से क्या कुछ नहीं कर सकता । जब उनके पास वैज्ञानिक शक्ति भी होगी तो वह दुनिया का सबसे खतरनाक इन्सान बन जायेगा । ज़रूरत इस बात की है कि बेताल का बेटा उसके काबू में रहे ।
 
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