S
StoryPublisher
Guest
अच्छी, तुम मेरी मां हो?" उसकी आंखों में कोई पहचान न थी-"सुना तुमने नमीरा! मेरी मां आई....।"
बेटे के अजनबी लहजे पर.....नफीसा पर दुख का पहाड़ ही तो टूट पड़ा। उसने आगे बढ़कर समीर राय को अपनी बांहों में भर लिया और रोते हुए बोली-“मैं तेरी मां हूं। तू मुझे पहचानता क्यों नहीं...?''
"पहचान तो रहा हूं। नमीरा को बता रहा हूं कि तुम मेरी मां हो। नमीरा सुनों, यह मेरी मां है। इन्हें अच्छी तरह पहचान लो..... । समीर राय के लहजे में अजनबियत अभी भी थी। वह नफीसा की तरफ देखते हुए बोला-"इसके लिए खाना लाओ...मेरी नमीरा भूखी है....।''
"हां, मैं इसके लिए बहुत-सा खाना लाई हूं. मैं तुम्हारी नमीरा को अपने हाथ से खाना खिलाऊंगी। आओ, तुम नीचे चलों। चलकर खाना देख लो। क्या-क्या खायेगी तुम्हारी नमीरा.....?" नफीसा ने बड़े अपनत्व से कहा ।
"हां, यह ठीक हैं.... ।'' समीर राय ने सहमति जतलाई। वह मां की बांहों से निकलकर फिर नमीरा के पास जा खड़ा हुआ....और धीरे से बोला-"नमीरा, तुम क्या-क्या खाओगी.....मुझे बताओं.... ।' फिर वह कान लगाकर जैसे कुछ सुनने लगा...फिर उसने गर्दन हिलाई जैसे सब समझ गया हो। वह बोला था-"ठीक है नमीर । मैं सब समझ गया। मैं अभी तुम्हारी पसन्द की डिशें लाता हूं....।" उसने मां को चलने को कहा व इशारा किया। वह तो जैसे जल्दी में था। जल्दी से कमरे से निकलकर सीढ़ियां उतरने लगा ।नीचे उतरकर वह राहदारी में आकर रूक गय। खड़े होकर चारों तरफ बावलों की तरह देखने लगा। जैसे वह किसी अजनबी न नई जगह आ गया हो। नफीसा उसके पीछे-पीछे थी। वह उसके करीब आ उसका हाथ पकड़ते हुए बोली-“इधर आओ , बेटे!''समीर राय ने एक नजर उसे देखा, फिर खामोशी से उसके साथ चला दिया.....जैसे किसी अंधे को लाठी का सहारा मिल जाये ।नफीस बेगम उसे अपने साथ नीचे वाले बैडरूप में ले आई...और दरवाजा भीतर से बन्द कर दिया। तभी उसने दरवाजे के लॉक में चाबी घूमने की आवाज सुनी। ताला बन्द होने की आवाज पर उसने सुकून का सांस लिया और समीर राय को सम्बोधित करते हुए बोली-“बैठ जाओं, बेटे..... ।'"
"जी.......।'" समीर राय ने कहा व यंत्रवत्-सा बैड पर बैठ गया। मों ने बेटे का चेहरा गौर से देखा तो दिल पर आरी-सी चल गई। दो दिन में उसकी हालत क्या से क्या हो गई थी। बिखरे बाल.....सुर्ख आंखें....जर्द चेहरा....बेतरतीब लिबास । यह तो वह समीर ही नहीं था।
“बेटा...नमीरा तुम्हारी शिकायत कर रही थी...... ।' नफीसा बेगम कुछ सोचकर बोली।
मेरी शिकायत......वह क्या?" समीर राय के चेहरे की जर्दी में उदासी घुल-मिल गई।
हां, बेटा.....शिकायत तो वह करेगी ही ना। कोई बीवी अपने शौहर को इस हालत में नहीं देख सकती....... ।'
“क्यों....मु...मुझे क्या हुआ.....?" समीर राय ने अपने आप पर नजर डालते हुए कहा ।
"वह कह रही थी.....इन्होंने न मुंह-हाथ धोया हैं, ना कपड़े बदले हैं और ना ही कुछ खासा हैं......
''ओह! ठीक है। मैं बाथरूम मे जाकर मुंह-हाथ धो लेता हूं......... |''
"तुम बाथरूप मे जाओ....मैं नमीरा से तुम्हारे कपड़े मंगवाती हूं..... ।'
"ठीक हैं...।" समीर राय बड़ी सअदातमंदी से बाथरूप में चला गया ।समीर के बाथरूप में जाते ही नफीसा ने दरवाजा बजाया। बाहर से फौरन आवाज आई-"जी मालकिन......।"
"मेरा सूटकेस लाओं, जो हवेली से लाई हूं.... |"
"जी मालकिन!" सरवरी ने जवाब दिया |कुछ देर बाद दरवाजा खुला और सरबरी एक सूटकेस लिये अन्दर आई और उसे मेज पर रखकर फौरन वापिस लौट गई।दरवाजे में फिर से ताला लग गया ।नफीसा बेगम ने सूटकेस से समीर राय के कपड़े व शेविंग बॉक्स निकाला और बाथरूप का दरवाजा खटखटाया ।
समीर राय ने थोड़ा-सा दरवाजा खोलकर हाथ बाहर निकाला। नफीसा ने कपड़े और शेविंग बॉक्स उसे थमाते हुए कहा-“नमीरा ने कहा हैं कि शेव भी बना लें...... ।'
समीर राय कुछ न बोला और कपड़े व बॉक्स ले लिया व बाथरूप का दरवाजा बन्द कर लिया ।पन्द्रह-बीस मिनट बाद जब वह बाथरूप से बाहर आया तो उसका रूप ही बदला हुआ था। नफीसा बेगम ने उसे देखकर सुकून का सांस लिया। बैठो, समीर...मुझे तुमसे कुछ बात करनी है......।" नफीसा ने उसका हाथ पकड़कर उसे बैड़ पर बैठाने की कोशिश की।
"नहीं... ।' समीर राय ने फौरन ही अपना हाथ छुड़ा लिया और दरवाजे की तरफ बढ़ते हुए बोला-"मुझें नमीरा के लिए खाना लेकर जाना हैं। वह मेरा इन्तजार कर रही होगी.....।
'समीर राय'खाना' अभी तक नहीं भूला था। नफीसा बेगम का ख्याल था कि वह जब नहा-छोकर आएगा तो उसमें थोड़ा-बहुत बदलाव जरूर आएगा, लेकिन वह तो वहीं-का-वहीं था। अपनी नमीरा की याद मे डूबा हुआ। नमीरा के लिए चिन्तित ।समीर राय ने दरवाजे का हैंडिल घुमाकर दरवाजा अपनी तरफ खींचा, लेकिन दरवाजा न खुला। दरवजा तो लॉक था-वह खुलता कैसे? उसने दूसरी बार हैण्डिल घुमाया, लेकिन दरवाजा टस से मस नहीं हुआ। अब उसका धैर्य-धीरज जाता रहा। वह झुंझलाकर बोला-“यह दरवाजा क्यों नहीं खुलता, खोलो दरवाजा.....।
''बेटा समीर...।" नफीसा बेगम जल्दी से उसके निकट आ गई-“बेटा आओ, इधर आओं, मेरे पास बैठो....मेरी बात सुन... '
"मुझे कुछ नहीं सुनना हैं......जल्दी से दरवाजा खोलो । यह किस गधे के बच्चे ने बन्द किया है...... मैं उसे गोली मार दूंगा।" उसने गुस्से से दरवाजा खटखटाया-"दरवाजा खोलो.......दरवाजा खोलते क्यों नहीं.......?"लेकिन दरवाजा तो बाकायादा एक मन्सूबे के तहत बन्द किया गया था और उनकी उस प्लानिंग पर बाहर अमल हो चुका था। जब समीर राय ने धाड़-धाड़ दरवाजा बजाया...कई लाते दरवाजे पर मारी और गुस्से से चिल्लाया-“गधे के बच्चों, दरवाजा खोलो....।''
तब अचानक दरवाज में चाबी घूमी और दरवाजा खुल गया। सामने दिलदार खड़ा था। उसके हाथ में चाबी थी। उसे देखते ही समीर राय आग-बबूला हो गया। उसने आव देखा न ताव....एक जोरदार थप्पड़ दिलदार के मुंह पर रसीद कर दिया। इतने जोर से कि दिलदार का मुंह फिर गया।"कुत्ते के बच्चे, तूने दरवाजा कैसे बन्द किया...?" उसने आग भरी आंखों से उसे घूरा व फिर भागता चला गया।उसने बड़ी तेजी से राहदारी पार की और धड़ाधड़ सीढ़ियां चढ़ता चला गया। वह ऊपर पहुंचा। ऊपर के बैडरूप का दरवाजा खुला हुआ था। वह पागलों की तरह भागता हुआ कमरे में दाखिल हुआ। उसका कन्धा दरवाजे की चौखट से टकराया। वह गिरते-गिरते बचा। कन्धे पर तीव्र चोट लगी थी, लेकिन उसने इसकी परवाह नहीं की वह अपने दोनों हाथ फैलाये जब बैड के निकट पहुंचा तो वहा का नक्शा बदला हुआ था ।बैड पर नमीरा की लाश मौजूद न थी। बैडशीट बदली जा चुकी थी। कमरे की अच्छी तरह सफाई कर दी गई थी। अभी कुछ देर पहले यहां जो गन्दगी थी, उसका कहीं पता नहीं था। इस वक्त वह कमरा एक आलीशान बंगले का आलीशान बैडरूप लग रहा था।
"नमीरा कहां गई...?" वह बड़बड़ाया। उसने तेजी से कमरे मे चारों तरफ नजरें दौड़ाई.....मगर वह उसे कहीं नजर नहीं आई-"नमीरा तुम कहां हों?" उसने जोर से पुकारा। फिर शायद उसे ख्याल आया कि नमीरा कहीं बाथरूम में न हों? वह लपककर बाथरूप के दरवाज पर पहुंचा। दरवाजा बन्द था। उसने बहुत धीरे से आवाज दी-"नमीरा....... "अन्दर से कोई आवाज न आई तो उसने दरवाज का हैण्डिल घुमाया। दरवाजा खुल गया। अन्दर अंधेरा था। वह दरवाजा बन्द करके वापिस पलटा तो किसी ने कमरे का दरवाजा बन्द कर दिया दरवजा लॉक करके सरवरी ने चाबी नफीसा बेगम के हाथ में दे दी और खुद जरा पीछे हटकर आदर के साथ खड़ी हो गई।
समीर राय को जब अहसास हुआ कि कमरा बाहर से लॉक कर दिया गया है तो वह दरवाजा जोर-जोर से पीटने लगा।"खोलो कमीनों.... दरवाजा खोलो...... |कुतिया के पिल्लो.....दरवाजा खोलो.... । अपने बेटे की विक्षिप्त चीखें वह दरवाजे से पीछे लगाये बड़ी खामोशी से सुन रही थी। वह समीर राय को बहला-फुसलाकर इसीलिये नीचे ले गई थी कि रोशन राय की योजना अनुसार नमीरा की लाश यहां से हटा दी जाएं नमीरा की लाश हटाने में मुश्किल से चन्द मिनट लगे। रौली दो बन्दों के साथ नमीरा की लाश को आनन-फानन में गाड़ी में डालकर ले गया। उसके बाद समीर राय को पता नहीं चला कि नमीरा को कहां दफनाया गया। दफनाया भी गया या उसे समुद्र में कहा दिया गया। किसी खड्ड में फेंका गया या किसी जंगल में जानवरों के नोंचने-खाने के लिए डाल दिया गया रोशन राय और नफीसा बेगम, दोनों का ही ख्याल था कि समीरा राय ने नमीरा की मौत का सदमा कुछ ज्यादा ही ले लिया हैं...इसलिए जितनी जल्दी सम्भव हो नमीरा की लाश को उससे लगल कर दिया जाये। वैसे भी एक लाश को किसी जिन्दा आदमी के साथ किस तरह रहने दिया जा सकता था ।समीर राय कमरे में बन्द बुरी तरह चीख रहा था। अपने बेटे की विक्षिप्त चीखें सुनकर नफीसा बेगम का दिल किसी पत्ते की तरह कांप रहा था। वह अपना दिल मुट्ठी में भींचे अपने आंसू पीने की कोशिश कर रही थी इतने में अन्दर से खिड़की का शीशा टूटने की आवाजा आई। खिड़की पर जाली का मजबूत फ्रेम लगा हुआ था। समीर राय ने खिड़की खोलने के बजाय, गुस्से में आकर तोड़ दी।नफीसा बेगम शीश टूटने की आवाज सुनकर खिड़की की तरफ लपकी। वह नफीसा बेगम को बाहर देखकर चीखा-"मेरी नमीरा कहां हैं....?
''वह मर गई हैं....वह अब इस दुनिया में नहीं है, मेरे बेटे.... |"
"तुम झूठ बोलती हो...।''
"मेरी बात का एतबार करों, मेरे बेटे! वह मर चुकी है। तू खुद ही तो उसकी लाश उठाकर लाया था..... ।'
"न. नहीं!'' वह बड़े जोर से चीखा-"वह नही मर सकती। उसे कोई नही मार सकता..... ।" यह कहकर उसने दूसरी खिड़की के शीशे पर धूंसा मारा |शीशा छनाक से टूट गया ।नफीसा बेगम से अब उसकी हालत देखी नहीं जा रही थी। वह तेजी से नीचे ड्राइंग रूप में पहुंची..जहां रोशन राय एक सोफे में धंसा किसी सोच में डूबा हुआ था। बदहवास नफीसा बेगम को देखकर वह एकदम खड़ा हो गया।"क्या हुआ......?
"समीर की हालत अच्छी नहीं हैं। उस पर जूनून सवार हैं। वह पागल हो गया है। जल्दी से किसी डॉक्टर को बुलवाएं...... नहीं तो वह अपने आपको जख्मी कर लेगा। वह खिड़कियों के शीशे तोड़ रहा है.......।" नफीसा बेगम बोलते बोलते रो पड़ी।
'' अच्छा....अच्छा......बाबा रो मत..... | मैं अभी करता हूं कुछ, तुम परेशान मत होओ।" यह कहकर उसने अपनी पॉकेट डायरी निकाली और दोबारा सोफे पर बैठ गया।उसने सोफे पर रखा मोबाइल फोन उठाया व डायरी में अपने एक परिचित लोकल डॉक्टर अंसारी के नम्बर देख उसके नम्बर मिलाये |डॉक्टर अंसारी बीस मिनट में ही अपने साथ एक एम्बुलेंस लेकर बंगले पर पहुंच गया।डॉक्टर अंसारी जब ताला खोलकर समीर के बैडरूप में दाखिल हुआ तो समीर राय बैड पर बैठा चीख रहा था। उसके हाथ शीशा तोड़ने की वजह से लहूलुहान थे। डॉक्टर ने पहले किसी तरह बहला-फुसला कर समीर राय को बेहोश की इन्जेक्शन लगाया। कुछ ही देर में समीर राय की आंखें बन्द होने लगी और फिर तेजी से उसको नींद आती चली गई ।फिर समीर राय को एम्बुलेंस में डालकर एक प्राइवेट हॉस्पिटल पहुंचा दिया गया। यहां एक माहिर मनोचिकित्सक की देख-रेख में फौरन उसका उपचार शुरू हो गया ।रोशन राय ने वहां के डॉक्टरों को सिर्फ इतना बताया कि समीर राय की बीवी का देहान्त हो
चुका है। उसे अपनी बीवी से बेपनाह मुहब्बत थी और चूकि उसकी मौत अचानक हुई, इस वजह से वह अपनी बीवी की मौत का यकीन नहीं कर रहा। सदमे से वह जुनून का शिकार हो गया है |विशेषज्ञ डॉक्टर ने पहले चरण में उसे सुकून देने वाली दवाएं देनी शुरू कर दी।
बेटे के अजनबी लहजे पर.....नफीसा पर दुख का पहाड़ ही तो टूट पड़ा। उसने आगे बढ़कर समीर राय को अपनी बांहों में भर लिया और रोते हुए बोली-“मैं तेरी मां हूं। तू मुझे पहचानता क्यों नहीं...?''
"पहचान तो रहा हूं। नमीरा को बता रहा हूं कि तुम मेरी मां हो। नमीरा सुनों, यह मेरी मां है। इन्हें अच्छी तरह पहचान लो..... । समीर राय के लहजे में अजनबियत अभी भी थी। वह नफीसा की तरफ देखते हुए बोला-"इसके लिए खाना लाओ...मेरी नमीरा भूखी है....।''
"हां, मैं इसके लिए बहुत-सा खाना लाई हूं. मैं तुम्हारी नमीरा को अपने हाथ से खाना खिलाऊंगी। आओ, तुम नीचे चलों। चलकर खाना देख लो। क्या-क्या खायेगी तुम्हारी नमीरा.....?" नफीसा ने बड़े अपनत्व से कहा ।
"हां, यह ठीक हैं.... ।'' समीर राय ने सहमति जतलाई। वह मां की बांहों से निकलकर फिर नमीरा के पास जा खड़ा हुआ....और धीरे से बोला-"नमीरा, तुम क्या-क्या खाओगी.....मुझे बताओं.... ।' फिर वह कान लगाकर जैसे कुछ सुनने लगा...फिर उसने गर्दन हिलाई जैसे सब समझ गया हो। वह बोला था-"ठीक है नमीर । मैं सब समझ गया। मैं अभी तुम्हारी पसन्द की डिशें लाता हूं....।" उसने मां को चलने को कहा व इशारा किया। वह तो जैसे जल्दी में था। जल्दी से कमरे से निकलकर सीढ़ियां उतरने लगा ।नीचे उतरकर वह राहदारी में आकर रूक गय। खड़े होकर चारों तरफ बावलों की तरह देखने लगा। जैसे वह किसी अजनबी न नई जगह आ गया हो। नफीसा उसके पीछे-पीछे थी। वह उसके करीब आ उसका हाथ पकड़ते हुए बोली-“इधर आओ , बेटे!''समीर राय ने एक नजर उसे देखा, फिर खामोशी से उसके साथ चला दिया.....जैसे किसी अंधे को लाठी का सहारा मिल जाये ।नफीस बेगम उसे अपने साथ नीचे वाले बैडरूप में ले आई...और दरवाजा भीतर से बन्द कर दिया। तभी उसने दरवाजे के लॉक में चाबी घूमने की आवाज सुनी। ताला बन्द होने की आवाज पर उसने सुकून का सांस लिया और समीर राय को सम्बोधित करते हुए बोली-“बैठ जाओं, बेटे..... ।'"
"जी.......।'" समीर राय ने कहा व यंत्रवत्-सा बैड पर बैठ गया। मों ने बेटे का चेहरा गौर से देखा तो दिल पर आरी-सी चल गई। दो दिन में उसकी हालत क्या से क्या हो गई थी। बिखरे बाल.....सुर्ख आंखें....जर्द चेहरा....बेतरतीब लिबास । यह तो वह समीर ही नहीं था।
“बेटा...नमीरा तुम्हारी शिकायत कर रही थी...... ।' नफीसा बेगम कुछ सोचकर बोली।
मेरी शिकायत......वह क्या?" समीर राय के चेहरे की जर्दी में उदासी घुल-मिल गई।
हां, बेटा.....शिकायत तो वह करेगी ही ना। कोई बीवी अपने शौहर को इस हालत में नहीं देख सकती....... ।'
“क्यों....मु...मुझे क्या हुआ.....?" समीर राय ने अपने आप पर नजर डालते हुए कहा ।
"वह कह रही थी.....इन्होंने न मुंह-हाथ धोया हैं, ना कपड़े बदले हैं और ना ही कुछ खासा हैं......
''ओह! ठीक है। मैं बाथरूम मे जाकर मुंह-हाथ धो लेता हूं......... |''
"तुम बाथरूप मे जाओ....मैं नमीरा से तुम्हारे कपड़े मंगवाती हूं..... ।'
"ठीक हैं...।" समीर राय बड़ी सअदातमंदी से बाथरूप में चला गया ।समीर के बाथरूप में जाते ही नफीसा ने दरवाजा बजाया। बाहर से फौरन आवाज आई-"जी मालकिन......।"
"मेरा सूटकेस लाओं, जो हवेली से लाई हूं.... |"
"जी मालकिन!" सरवरी ने जवाब दिया |कुछ देर बाद दरवाजा खुला और सरबरी एक सूटकेस लिये अन्दर आई और उसे मेज पर रखकर फौरन वापिस लौट गई।दरवाजे में फिर से ताला लग गया ।नफीसा बेगम ने सूटकेस से समीर राय के कपड़े व शेविंग बॉक्स निकाला और बाथरूप का दरवाजा खटखटाया ।
समीर राय ने थोड़ा-सा दरवाजा खोलकर हाथ बाहर निकाला। नफीसा ने कपड़े और शेविंग बॉक्स उसे थमाते हुए कहा-“नमीरा ने कहा हैं कि शेव भी बना लें...... ।'
समीर राय कुछ न बोला और कपड़े व बॉक्स ले लिया व बाथरूप का दरवाजा बन्द कर लिया ।पन्द्रह-बीस मिनट बाद जब वह बाथरूप से बाहर आया तो उसका रूप ही बदला हुआ था। नफीसा बेगम ने उसे देखकर सुकून का सांस लिया। बैठो, समीर...मुझे तुमसे कुछ बात करनी है......।" नफीसा ने उसका हाथ पकड़कर उसे बैड़ पर बैठाने की कोशिश की।
"नहीं... ।' समीर राय ने फौरन ही अपना हाथ छुड़ा लिया और दरवाजे की तरफ बढ़ते हुए बोला-"मुझें नमीरा के लिए खाना लेकर जाना हैं। वह मेरा इन्तजार कर रही होगी.....।
'समीर राय'खाना' अभी तक नहीं भूला था। नफीसा बेगम का ख्याल था कि वह जब नहा-छोकर आएगा तो उसमें थोड़ा-बहुत बदलाव जरूर आएगा, लेकिन वह तो वहीं-का-वहीं था। अपनी नमीरा की याद मे डूबा हुआ। नमीरा के लिए चिन्तित ।समीर राय ने दरवाजे का हैंडिल घुमाकर दरवाजा अपनी तरफ खींचा, लेकिन दरवाजा न खुला। दरवजा तो लॉक था-वह खुलता कैसे? उसने दूसरी बार हैण्डिल घुमाया, लेकिन दरवाजा टस से मस नहीं हुआ। अब उसका धैर्य-धीरज जाता रहा। वह झुंझलाकर बोला-“यह दरवाजा क्यों नहीं खुलता, खोलो दरवाजा.....।
''बेटा समीर...।" नफीसा बेगम जल्दी से उसके निकट आ गई-“बेटा आओ, इधर आओं, मेरे पास बैठो....मेरी बात सुन... '
"मुझे कुछ नहीं सुनना हैं......जल्दी से दरवाजा खोलो । यह किस गधे के बच्चे ने बन्द किया है...... मैं उसे गोली मार दूंगा।" उसने गुस्से से दरवाजा खटखटाया-"दरवाजा खोलो.......दरवाजा खोलते क्यों नहीं.......?"लेकिन दरवाजा तो बाकायादा एक मन्सूबे के तहत बन्द किया गया था और उनकी उस प्लानिंग पर बाहर अमल हो चुका था। जब समीर राय ने धाड़-धाड़ दरवाजा बजाया...कई लाते दरवाजे पर मारी और गुस्से से चिल्लाया-“गधे के बच्चों, दरवाजा खोलो....।''
तब अचानक दरवाज में चाबी घूमी और दरवाजा खुल गया। सामने दिलदार खड़ा था। उसके हाथ में चाबी थी। उसे देखते ही समीर राय आग-बबूला हो गया। उसने आव देखा न ताव....एक जोरदार थप्पड़ दिलदार के मुंह पर रसीद कर दिया। इतने जोर से कि दिलदार का मुंह फिर गया।"कुत्ते के बच्चे, तूने दरवाजा कैसे बन्द किया...?" उसने आग भरी आंखों से उसे घूरा व फिर भागता चला गया।उसने बड़ी तेजी से राहदारी पार की और धड़ाधड़ सीढ़ियां चढ़ता चला गया। वह ऊपर पहुंचा। ऊपर के बैडरूप का दरवाजा खुला हुआ था। वह पागलों की तरह भागता हुआ कमरे में दाखिल हुआ। उसका कन्धा दरवाजे की चौखट से टकराया। वह गिरते-गिरते बचा। कन्धे पर तीव्र चोट लगी थी, लेकिन उसने इसकी परवाह नहीं की वह अपने दोनों हाथ फैलाये जब बैड के निकट पहुंचा तो वहा का नक्शा बदला हुआ था ।बैड पर नमीरा की लाश मौजूद न थी। बैडशीट बदली जा चुकी थी। कमरे की अच्छी तरह सफाई कर दी गई थी। अभी कुछ देर पहले यहां जो गन्दगी थी, उसका कहीं पता नहीं था। इस वक्त वह कमरा एक आलीशान बंगले का आलीशान बैडरूप लग रहा था।
"नमीरा कहां गई...?" वह बड़बड़ाया। उसने तेजी से कमरे मे चारों तरफ नजरें दौड़ाई.....मगर वह उसे कहीं नजर नहीं आई-"नमीरा तुम कहां हों?" उसने जोर से पुकारा। फिर शायद उसे ख्याल आया कि नमीरा कहीं बाथरूम में न हों? वह लपककर बाथरूप के दरवाज पर पहुंचा। दरवाजा बन्द था। उसने बहुत धीरे से आवाज दी-"नमीरा....... "अन्दर से कोई आवाज न आई तो उसने दरवाज का हैण्डिल घुमाया। दरवाजा खुल गया। अन्दर अंधेरा था। वह दरवाजा बन्द करके वापिस पलटा तो किसी ने कमरे का दरवाजा बन्द कर दिया दरवजा लॉक करके सरवरी ने चाबी नफीसा बेगम के हाथ में दे दी और खुद जरा पीछे हटकर आदर के साथ खड़ी हो गई।
समीर राय को जब अहसास हुआ कि कमरा बाहर से लॉक कर दिया गया है तो वह दरवाजा जोर-जोर से पीटने लगा।"खोलो कमीनों.... दरवाजा खोलो...... |कुतिया के पिल्लो.....दरवाजा खोलो.... । अपने बेटे की विक्षिप्त चीखें वह दरवाजे से पीछे लगाये बड़ी खामोशी से सुन रही थी। वह समीर राय को बहला-फुसलाकर इसीलिये नीचे ले गई थी कि रोशन राय की योजना अनुसार नमीरा की लाश यहां से हटा दी जाएं नमीरा की लाश हटाने में मुश्किल से चन्द मिनट लगे। रौली दो बन्दों के साथ नमीरा की लाश को आनन-फानन में गाड़ी में डालकर ले गया। उसके बाद समीर राय को पता नहीं चला कि नमीरा को कहां दफनाया गया। दफनाया भी गया या उसे समुद्र में कहा दिया गया। किसी खड्ड में फेंका गया या किसी जंगल में जानवरों के नोंचने-खाने के लिए डाल दिया गया रोशन राय और नफीसा बेगम, दोनों का ही ख्याल था कि समीरा राय ने नमीरा की मौत का सदमा कुछ ज्यादा ही ले लिया हैं...इसलिए जितनी जल्दी सम्भव हो नमीरा की लाश को उससे लगल कर दिया जाये। वैसे भी एक लाश को किसी जिन्दा आदमी के साथ किस तरह रहने दिया जा सकता था ।समीर राय कमरे में बन्द बुरी तरह चीख रहा था। अपने बेटे की विक्षिप्त चीखें सुनकर नफीसा बेगम का दिल किसी पत्ते की तरह कांप रहा था। वह अपना दिल मुट्ठी में भींचे अपने आंसू पीने की कोशिश कर रही थी इतने में अन्दर से खिड़की का शीशा टूटने की आवाजा आई। खिड़की पर जाली का मजबूत फ्रेम लगा हुआ था। समीर राय ने खिड़की खोलने के बजाय, गुस्से में आकर तोड़ दी।नफीसा बेगम शीश टूटने की आवाज सुनकर खिड़की की तरफ लपकी। वह नफीसा बेगम को बाहर देखकर चीखा-"मेरी नमीरा कहां हैं....?
''वह मर गई हैं....वह अब इस दुनिया में नहीं है, मेरे बेटे.... |"
"तुम झूठ बोलती हो...।''
"मेरी बात का एतबार करों, मेरे बेटे! वह मर चुकी है। तू खुद ही तो उसकी लाश उठाकर लाया था..... ।'
"न. नहीं!'' वह बड़े जोर से चीखा-"वह नही मर सकती। उसे कोई नही मार सकता..... ।" यह कहकर उसने दूसरी खिड़की के शीशे पर धूंसा मारा |शीशा छनाक से टूट गया ।नफीसा बेगम से अब उसकी हालत देखी नहीं जा रही थी। वह तेजी से नीचे ड्राइंग रूप में पहुंची..जहां रोशन राय एक सोफे में धंसा किसी सोच में डूबा हुआ था। बदहवास नफीसा बेगम को देखकर वह एकदम खड़ा हो गया।"क्या हुआ......?
"समीर की हालत अच्छी नहीं हैं। उस पर जूनून सवार हैं। वह पागल हो गया है। जल्दी से किसी डॉक्टर को बुलवाएं...... नहीं तो वह अपने आपको जख्मी कर लेगा। वह खिड़कियों के शीशे तोड़ रहा है.......।" नफीसा बेगम बोलते बोलते रो पड़ी।
'' अच्छा....अच्छा......बाबा रो मत..... | मैं अभी करता हूं कुछ, तुम परेशान मत होओ।" यह कहकर उसने अपनी पॉकेट डायरी निकाली और दोबारा सोफे पर बैठ गया।उसने सोफे पर रखा मोबाइल फोन उठाया व डायरी में अपने एक परिचित लोकल डॉक्टर अंसारी के नम्बर देख उसके नम्बर मिलाये |डॉक्टर अंसारी बीस मिनट में ही अपने साथ एक एम्बुलेंस लेकर बंगले पर पहुंच गया।डॉक्टर अंसारी जब ताला खोलकर समीर के बैडरूप में दाखिल हुआ तो समीर राय बैड पर बैठा चीख रहा था। उसके हाथ शीशा तोड़ने की वजह से लहूलुहान थे। डॉक्टर ने पहले किसी तरह बहला-फुसला कर समीर राय को बेहोश की इन्जेक्शन लगाया। कुछ ही देर में समीर राय की आंखें बन्द होने लगी और फिर तेजी से उसको नींद आती चली गई ।फिर समीर राय को एम्बुलेंस में डालकर एक प्राइवेट हॉस्पिटल पहुंचा दिया गया। यहां एक माहिर मनोचिकित्सक की देख-रेख में फौरन उसका उपचार शुरू हो गया ।रोशन राय ने वहां के डॉक्टरों को सिर्फ इतना बताया कि समीर राय की बीवी का देहान्त हो
चुका है। उसे अपनी बीवी से बेपनाह मुहब्बत थी और चूकि उसकी मौत अचानक हुई, इस वजह से वह अपनी बीवी की मौत का यकीन नहीं कर रहा। सदमे से वह जुनून का शिकार हो गया है |विशेषज्ञ डॉक्टर ने पहले चरण में उसे सुकून देने वाली दवाएं देनी शुरू कर दी।