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Horror अनहोनी ( एक प्रेत गाथा )

वह एक अनूठी रात थी....।

आकाश के माथे पर चांद किसी दुल्हन के टीके की तरह चमक रहा था। पूरे चांद की रात थी। रेत के समुद्र पर चांदनी किसी चादर की तरह फैली हुई थी, फिर भी यह एक भयावह होलनाक रात थी।

ऐसी उजली-रोशन रात और ऐसी भयावह..?

जब दिलों पर बहशत हो। अगले पल की खबर ने हो कि क्या होने वाला है तो चांदनी क्या करेगी? चांद का सौन्दर्य कौन देखेगा? बाहर का मौसम तो उसी वक्त अच्छा लगता है....जब इन्सान के भीतर का मौसम महका हुआ हो। उसके मन-मस्तिष्क में सुकून हो..... ।

दूर क्षितिज तक फैल रेगिस्तान...किसी मोटे कालीन की तरह बिछी रेत। हौले-हौले बहमी हुई ठण्डी हवा। किसी हसी मनमोहक चेहरे की तरह चमकता हुआ उज्जवल चांद, लेकिन मंत्र-मुग्ध कर देने वाली रात से सम्मोहित होने वाला यहां कोई नहीं था।

नमीरा थी.....लेकिन उसे अपना होश नहीं था।

उस पर जो जुल्म हुआ था, उस पर वह हैरतजदा थी। गुमसुम थी। यह अचानक क्या से क्या हो गयाथा। उसकी एक दिन की बच्ची को उससे छीन लिया गया था और उसे एक तेज रफ्तार ऊंट पर डालकर रेगिस्तान में अकेला छोड़ दिया गया था। उस नन्हीं-सी जान से क्या अपराध हो गया था।

खुद उसे भी यही सजा दी गई थी।

ऊंट तेजी से भागा जा रहा था और उसे अपने आपको सम्भालना मुश्किल हो रहा था। उसकी अपनी हाली ठीक नहीं थी। आज ही तो उसने एक बच्ची को जन्म दिया था । अत्यधिक कमजोरी थी...ऐसी औरत का तो बहुत ख्याल रखा जाता है. लेकिन रोशन राय ने उस पर जुल्म की इन्तहा कर दी थी। बच्ची तो उससे छीनी ही थी.....उसे भी हवेली से निकाल बाहर किया था।

आखिर उसका क्या दोष था?

दोष तो था। वह एक गरीब की बेटी थी। हवेली के इकलौते वारिस से शादी की थी और अब उसने एक लड़की को जन्म दे दिया था। अपराध-ही-अपराध थे....कसूर-ही-कसूर थे उसके । प्रसव पीड़ा सु गुजरी थी वह। अब ऊंट की तेज रफ्तारी ने उसे और भी निढाल कर दिया था। उसकी आंखें धुंधलाई जा रही थीं। दिमाग पर गुब्बार-सा छा रहा था। यही महसूस हो रहा था उसे जैसे वो रेत के अन्दर धंसी जा रही हो। ऊंटट ककी दुम से बंधी घन्टी की टन टन धीरे-धीरे मद्धिम पड़ती जा रही थी।

फिर कुछ देर बाद उसे होश न रहा कि वह कहां है और किस हाल में है।

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इसी रात की सुबह!

सुबह का उलाला फैलने लगा था। कंगनपुर में जिन्दगी अंगड़ाई ले रही थी। हाकम अली अपेन कमरे से निकल अपने जानवारों को चारा डालने के लिए बाड़े की तरफ बढ़ा। वह जब 'बाड़े के दरवाजे पर पहुंचा तो उसने एक अजीब मंजर देखा। पहले तो उसे यकीन ही नहीं आया। अपनी नजर का धोखा महसूस हुआ, लेकिन वह नजर का धोखा नहीं था।

वह उसी का ऊंट ही था.... जो बाड़े के दरवाजे पर बैठा ऊंची गर्दन किये जुगाली किए जा रहा था। उसकी पीठ पर काठी बंधी हुई थी उस काठी में एक औरत बेसुध-सी पड़ी थी। इस अजीब नजारे ने उसे दहलाकर रख दिया। वह तेजी से अपने ऊंट की तरफ बढ़ा।

वह एक खूबसूरत औरत थी, जिन्दा थी, मगर बेहोश थी।

हाकम अली उस औरत को ऊंट सहित अपेन घर ले आया। घर की औरतों ने उसे औरत को पूरी सावधानी से ऊंट से उतारा और सहन में बिछी एक चारपाई पर लिटा दिया।

हाकम अली की मां ने उसे औरत का अच्छी तरह मुआयना किया। वह औरत किसी अच्छे घर की लगती थी। पहली समस्या उसे होश में लाने की थी। हाकम अली की मां ने उसके मुंह पर धीरे-धीरे पानी के छींटे ङ्केमारे....उसके अलव सहलाये। कुछ देर बाद जाकर औरत के निर्जीव हरकत हुई। उसने धीरे-से आखें खोल दी।

उसने अपने सामने देहात की एक बूढ़ी औरत को पाया....जो बड़धी चिन्ता से उसकी तरफ देख रही थी। उसे आंखें खोलते देख, बूढी औरत के चेहरे के भाव तेजी से बदले। उसका चेहरा खुशी से खिल उठा।

___ "लेटी रहो....अभी उठने की कोशिश न करो। मैं तुम्हारे लिए दूध लाती हूं।" वह मुहब्बत से बोली।

___ "अम्मा, तुम बैठो..मैं लाती हूं दूध....." हाकम अली का बीवी चांद ने कहा।

"अच्छा ठीक है। जरा जल्दी ला...।" और फिर वह बूढ़ी हाकम अली की मां, उस औरत से मुखातिब हुई-"तुम कौन हो बेटी?"

"मेरा नाम नमीरा है...मांजी....।" वह नमीरा थी...उसने अपनी कजोर आवाज में जवाब दिया।

हाकम अली की मां ने जब महसूस किया कि नमीरा कमजोरी की वजह से बोलने में दिक्कत महसूस कर रही है तो उसने उससे और कुछ न पूछा।

नमीरा को गर्म-गर्म दूध पिलाया। कुछ देर बाद मक्की की रोटी, मक्खन और गुड़ का नाश्ता कराया। नमीरा भूखी थी। पेट में कुछ पड़ा तो उसे सुकून मिला। उसने अपनी आंखें पूरी तरह खोल दी और इस घर को नजरें घुमाकर देखा।

वह एक छप्पर तले चारपाई पर लेटी हुई थी। उस घर में तीन औरतें थीं....एक हाकम की मां, जो उसकी सेवा करने में सबसे आगे थी..दूसरी हाकम अली की बीवी चांद, जो अपनी सास की मदद कर रही थी..और तीसरी हाकम अली की छोटी बहन.... कोई सत्रह-अठारह बरस की...वो दूर खड़ी बस नमीरा को देखे जा रही थी।

"मां जी, मैं कहां हूं...?" नमीरा ने बुढ़िया से पूछा।

"यह कंगनपूर है बेटा! सरहदी इलाका । लेकिन तुम कहां से आई हो...?" अम्मा ने पूछा।

"अब मैं क्या बताऊं कि मैं कहो से आई हूं..?" नमीरा दुविधा का शिकार थी।

अम्मा मुस्कुराकरक बोली-"अरी बताएगी नहीं तो हमें पता कैसे पड़ेगा कि तुम कहां की हो?"

"मैं रोशनगढ़ी की हूं...।" नमीरा ने सच बोला।

"तू कहां जा रही थी....?"

__"कहीं नहीं, अम्मा.....बस किस्मत जहां ले आई, वहां आ गई....।" नमीरा ने भीगी आंखों के साथ जवाब दिया।

"आखिर कुछ पात तो पड़े कि इस नाजुक हालत में तू घर से क्यों निकली..?"

इस सवाल के जवाब में नमीरा ने कुछ छिपाना ठीक नहीं समझा। जो उस पर गुजरी थी... सक कह सुनाई।

हाकम अली की मां उसकी कहानी सुनकर हैरान रह गई। यह सन्देह तो पहले ही था कि वह किसी बड़े घर की औरत है। उसका अन्दाजा सही था। नमीरा हवेली से आई थी और रोशनगढ़ी के मशहूर जागीरदार रोशन राय की बहू थी।

उसने नमीरा की दुखभरी दास्तान हाकम अली को कह सुनाई। वह भी नमीरा की आपबीती सुनकर स्तब्ध रह गया।

हाकम बली ने कुछ सोचा, फैसला किया और फिर अपनी मां को नमीरा का खास ख्याल रखने की हिदायत दे खुद राजा सलीम की हवेली पहुंच गया। नमीरा के बारे में उसे बताना जरूरी समझा था हाकम अली ने।
 
हवेली पहुंचकर हाकम अली ने अपने आने के इत्तला भिजवाई। राजा सलीम अपनी तीनों बीवियों के साथ नाश्ता कर रहा था। हवेली की सेविका ने झुककर राजा सलीम को बताया

"राजा भाई....बाहर मास्ट हाकम अली आया

"इस वक्त..? राजा सलीम ने हैरत से पूछा-"इस वक्त क्यों आया है?"

"मालूम नहीं जी....।" बेचारी नौकरानी भला क्या बताती।

"मालूम करवाओ....." राजा सलीम ने उसे सर्द निगाहों से देखते हुए कहा।

हाकम अली मास्टर नहीं था। वह पिछले वक्तों का मैट्रिक पास था। हवेली के बच्चे को शाम को पढ़ाने आता था, इसीलिये हवेली में मास्टर हाकम अली कहलाता था।

सेविका बाहर से खबर लेकर आई। उसने राजा सलीम के निकट होकर और जरा-सा झुककर कहा-"वो जी...कोई खास खबर लेकर आया है।"

"ठीक है....उसे बरामदे में बैठाओ। हम नाश्ता करके आते हैं....." राजा सलीम ने आदेश दिया।

___ नाश्ता करने के बाद जब राजा सलीम मूंछों पर ताब देता हुआ बरामदे में पहुंचा तो हाकम अली एक 'मूढ़े पर बैठा हुआ था। राजा सलीम को देखते ही वह उठा खड़ा हुआ और अपने हाथ जोड़ दिये।

__ "बैठो, मास्टर! सुनाओं सुबह-सुबह आज कहां निकल पड़े?"

"राजा साई!" आपके लिए एक ऐसी खबर लेकर आया हूं कि सुनोगे तो जी खुश हो जायेगा।"

"अच्छा...!" राजा सलीम की आंखें मुस्कुराने लगीं। वह तख्त पर बैठ, 'गाव तकिये का सहारा ले कर बोला-"भाई! अब मास्टरों के पास भी हमारे लिए खबरें होने लगी और वह भी जी खुश करने वाली। अच्छा भई, तो फिर सुनाओ। तुम्हारी खबर भी सुन लेते हैं......"

हाकल अली तख्त की तरफ झुका व भेदपूर्ण सरगोशी में बोला-"राजा भाई, खास खबर है। अकेले में.... ।” उसने दायें तरफ खड़े मुलाजिम की तरफ कनखियों से देखा व बात अधूरी छोड़ दी।

"ओहो..आज तो कमाल ही होगा..... ।” कहते हुए राजा सलीम ने अपने मुलाजिम को जोन का इशारा किया-"मास्टर के पास जी खुश करने वाली खबर है....और वह भी खुफिया....अकेले में सुनाने वाल, वाह, मास्टर तो फिर सुनाओ....।"

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"राजा साई....खबर जागीरदार रोशन राय के बारे में है......"

"अच्छा...! राजा सलीम ने फिर फिर हैरत से आंखें मटकाईं। यह उसके बात करने का एक खास अन्दाजा था-"फिर तो बाबा वाकई खबर जोरदार होगी। जल्दी सुनओ...।"

"राजा साई......रोशन राय की बहू मेरे घर में बैठी है।"

"क...क्या..?" राजा सलीम फौरन सीधा होकर बैठ गया-"बहू! मास्टर तेरा मतलब है है समीर राय की बीवी...?"

"हां, राजा साई! अब बिल्कुल ठीक समझे..।"

"अरे मास्टर! तू खबर तो वाकई बड़ी जोरदार और खतरनाक लाया है। भई, तू तो एक मोटे ईनाम का हकदार हो गया...हम तो मुझे निरा मास्टर समझते थे, पर तू बड़े काम का बन्दा निकला। अब तू जरा पूरी बात बता। समीर राय की बीवी कंगनपुर और वह भी तेरे घर कैसे पहुंची.....?"

हाकम राय ने अक्षरशः वह सब कुछ बता दिया जो नमीरा ने उसकी मां की बताया था।

"बाबा, यह बात तो कुछ समझ में नहीं आई। आखिर रोशन राय ने अपनी बहू को ऊंट पर बैठाकर रेगिस्तान में क्यों हांक दिया...और सबसे हैरत की बात यह है कि वह ऊंट कंगनपुर कैसे आ गया और भी तेरे दरवाजे के आगे।" राजा सलीम ने अपना दिमाग लड़ाया था।
 
"राजा साई! वह मेरा ऊंट है। उसे मैंने पन्द्रह दिन पहले पैंठ में बेचा था। जब उसे रेगिस्तान में हांका गया.. वह भी अकेले....तो उसने कंगनपुर का रास्ता पकड़ लिया। वह मेरा ऊंट था...मेरे बाड़े में पहुंच गया....." हाकम अली ने बताया।

___ "अरे, हां.....ऐसा ही हुआ होगा। ऐसा ही होना था.....।" राजा सलीम ने फिर आंखें फाड़ी-"और यह जो हुआ है, वाकई कमाल हुआ है। मास्टर, तूने आज बड़ा कमाल किया है...तेरा इनाम पक्का | अब मैं तुझे जैसा बताता हूं... तेरा इनाम पक्का। अब मैं तुझे जैसा बताता हूं...वैसा कर....."

"जो हुक्म राजा साई...."

"आ, मूढ़ा लाकर इधर बैठ जा मेरे पास....।" राजा सलीम ने बड़ी खुशदिली से कहा। वह मास्टर से, एक मुलाजिम से कुछ ज्यादा ही मीठे लहजे में बात कर रहा था।

किसी जमाने में राजा सलीम और रोशन राय की दोस्ती की मिसालें दी जाती थीं। ऐसी दोस्ती किसी-किसी का नसीब होती है। राजा सलीम हालांकि इतना बड़ा जमींदार नहीं था..जितना बड़ा रोशन राय...लेकिन उसका रोब व दबदबा रोशन राय से ज्यादा था। राजा सलीम की पहुंच व असरो-रसूख उच्चाधिकारियों से लेकर राजनेताओं तक था। वह अपना काम निकलवाना खूब जानता था। उसने रोशन राय के भी बहुत-से टेढ़े काम करवाये थे। जहां रोशन राय का असरो-रसूख काम न आता था...वहां राजा सलीम का मोहरा चल जाता।

उन दोनों की दोस्ती काफी पुरांनी थी। स्कूल का साथ, कालेज तक गया। दोनों ग्रेज्यूऐट थे....लेकिन शिक्षा ने उन दोनों का कुछ नहीं 'बिगाड़ा था। उनकी करतूतें देखकर उनकी डिग्रियां भी शर्माती थीं।

फिर यही दोस्ती एक दिन दुश्मनी में बदल गई। जग-प्रसिद्ध है कि दुश्मनी तीन चीजों की वजह से होती है-एक पैसा, दूसरी औरत और तीसरा जमीन। लेकिन यहां दुश्मनी की बुनियाद एक चौथी चीज थी। जी हां, चौथी।

वो एक घोड़ी थी। इसमें सन्देह नहीं कि वह अरबी नस्ल की घोड़ी बला की खूबसूरत थी। उसका मालिक अरबाब खान था। अरबाब खान........राजा सलीम और रोशन राय, दोनों का ही सांझा दोस्त था। तब अरबाब खान ने उन दोनों को अपने इलाके में शिकार के लिए बुलवाया था।

और जब अरबाब खान, जीप की जगह अपनी घोड़ी पर सवार होकर हवेली से बाहर आया था तो वे दोनों घोड़ी को देखकर दंग रह गये थे। दोनों ही जीप में बैठते-बैठते रुक गये थे। अरबाब खान अपनी घोड़ी दौड़ाता हुआ उनके करीब पहुंचा और घोड़ी से उतर गया। उसने घोड़ी की गर्दन थपथपाते हुए पूछा था

"कैसी है...?"

"बहुत शानदार...।" राजा सलीम के मुंह से निकला।

___ "बहुत खूबसूरत.।" रोशन राय मन्त्र-मुन्ध-सा बोला।

"अरबाब खान..! क्या इसे बेचोगे...?" राजा सलीम के मुंह से बेइख्तियार निकला था।

___ "राजा, ऐसी बात क्यों करते हो...क्या यह आपको पसन्द है...?" अरबाब खान ने पूछा।

__ "पसन्द....! अरे बाबा, मैं तो इसे देखते ही इस पर आशि हो गया..” राजा सलीम ने मुस्कुराते हुए कहा।

"बस तो राजा साई...यह घोड़ी आपकी हुई...." अरबाब खान ने अपनत्वपूर्ण स्वर में ऐलान कर दिया।

"शुक्रिया अरबाब खान.....तुम्हारा बहुत-बहुत शुक्रिया....।" राजा सलीम ने तकल्लुफ न किया और घोड़ी फौरन कबूल कर ली....जबकि रोशन राय इस घोड़ी को हसरत से देखता ही रह गया। उसे अपने आप पर गुस्सा था कि उसने बोलने में पहल क्यों न की। क्यों सोचता रह गया, वरना यह मुश्की घोड़ी उसकी हो चुकी होती।

शिकार खत्म हुआ, वे लोग अपनी-अपनी हवेलियों की तरफ लौट गये। लेकिन यह घोड़ी रोशन राय के दिमाग में बैठकर रह गई। वह हर वक्त उसी की कल्पना में रहने लगा। रह-रहकर उसके दिल में कसक होती.....यही सोचता कि जाने उसने बोलने में पहल क्यों नहीं की....वरना घोड़ी उसकी होती।

फिर यह चुभन बढ़ती ही गई। दिल में यह कांटा जो चुभा हुआ था। उसने चाहा कि उस घोड़ी का ख्याल उसके जहन से निकल जाए..लेकिन ज्यों-ज्यों वह उसे दिल से निकालने की कोशिश करता था, त्यों-त्यों वह उसके दिल में बसती जाती और उसकी यह ततलके । अंततः ऐसी बढ़ी कि रोशन राय वह करने कर उतर आया जो किसी ने न किया होगा।

उसने एक दिन रौली को अपने बैडरूम में बुलवाया। बैडरूम में बुलावे का मतलब था, संगीन मामला।

रौली फौरन हाजिर हुआ।

"जी मालिक, हुक्म...!" वह रोशन राय के सामने सिर झुकाकर खड़ा हो गया।

___ "रौली, राजा सलीम के पास चन्द दिन पहले एक मुश्की घोड़ी आई है। उसको ठिकाने लगाना है...'' रोशन राय ने अपना फैसला उस सुनाया।

"मालिक, अगर मैंने सुनने में कोई गलती नहीं की है तो...आपका मतलब है कि उस घोड़ी को मारना है....? रौली हकीकत रोशन राय का हुक्म सुनकर चकरा गया था। किसी घोड़ी का कत्ल और वह भी जो एक खास करीबी दोस्त की मिल्कियत हो..ऐसी घोड़ी की मौत भाला क्या अर्थ रखती थी।

__"मालिक, उसे मार डालने की बजाय, उसे वहां से निकाल क्यों ने लाऊं....?" रौली ने हिम्मत करके पूछा था।

"बेवाकूफ, हम उस कहां छिपाकर रखेंगे? वह छिपाकर रखने की चीज थोड़ी है...।"

"मालिक, अगर आपका उस पर दिल आ गया है तो राजा साई से ले लें...." रौली ने फिर हिम्मत करके एक सुझाव दिया।

"वो घोड़ी उसने खुद अरबाब साहब से तोहफा कबूल की है, बाबा उसे हम उससे कैसे मांग सकते हैं?" रोश्पन ने मजबूरी बताई।

"अच्छा, मालिका....!" रौली के चेहरे पर उलझन के भाव थे। यह मसला उसकी समझ में नहीं आया था।

"देखो, बाबा! बात यह है कि जो चीज हमें पसन्द आ जाए....उसे हम किसी और के पास रहने नहीं देते। इसलिए, बाबा यह हमारी मजबूरी है। रौली, तुम हमारी मजबूरी को समझो, बाबा।"

"ठीक है, मालिक! मैं अब समझ गया । आप बेफिक्र हो जाएं...।" रौली ने मोहलत चाही।

___ "जा हमने तीन दिन दिये....." रोशन राय खुशदिली से बोला-"पर एक बात याद रहे। तुम मेरे खास आदमी हो, इसलिए तुम्हें यह खास काम सौंप रहा हूं। दोस्ती का मामला है, जरा ख्याल रखना। तुम पर किसी की नजर न पड़े...।"

लेकिन सारे फैसले इन्सान के हाथ में नहीं होते....कभी-कभी तकदीर भी अपना खेल खेलती है।
 
कुछ फैसले वह अपने हाथ में ले लेती है। ऐसे फैसले, जिन्हें तकदीर अपने हाथ में ले लेती है....प्रायः इतिहास लिखते हैं, यह फैसला भी कुछ ऐसा ही था। इससे इतिहास लिखा गया।

एक बेमिसाल मजबूत दोस्ती, एक बेमिसाल मजबूत दुश्मनी में बदल गई।

रौली ने तो अपने तौर पर हम मुमकिन सावधानी रखने की कोशिश की थी, लेकिन कोशिश के बावजूद वह देख व पहचान लिया गया।

अपनी मालूमात के हिसाब से वह पूर्ण सावधानी के साथ ही राजा सलीम के जानवरों के बाड़े में दाखिल हुआ था। इस घोड़ी के लिए जरा अलग से जगह बनाए गई थी। इस तबेले में उसे घोड़ी के अलावा दो घोड़े और थे और ये दोनों एक साथ बंधे थे।

जब रौली बाड़ें में दाखिल हुआ तो आधी रात का वक्त था। बाड़े में अंधेरा फैला हुआ था। एक चारपाई पर दो शख्स सो रहे थे।अब तकदीर ने अपना खेल शुरू किया ।एक शख्स की आंख अचानक खुल गई। उसने मलगजे अन्धेरे में एक साये को मुश्की घोड़ी की तरफ बढ़ते हुए देखा। वह फौरन उठकर बैठ गया। उसने तकियं के नीचे से टॉर्च निकाली व दबे पांव उस साये के पीछे हो लिया। उसने उसे पीछे से दबोच लेने का मन बनाया था।अभी वह साये से पांच कदम पीछे था कि तकदीर ने जैसे अपना फैसला लिख डाला और वह क्षण इतिहास बन गया ।रौली ने घोड़ी के निकट पहुंचते ही अपना हाथ उठाया और घोड़ी के सिर का निशाना लेकर फायर कर दिया, फिर उसने दो गोलियां और दागीं। ताकि घोड़ी की मौत यकीनी हो जाए। इसके बाद वह तेजी से पलटा। पलटते ही उसके चेहरे पर टॉर्च की रोशनी पड़ी फायर की आवाज सुनकर दूसरा शख्स, जो चारपाई पर सो रहा था, भी तड़पकर उठा। उसने टॉर्च की रोशनी में एक चेहरा देखा और इस चेहरे का वह अच्छी तरह पहचानता था। उसने इस बन्दे को जाने कितनी बार रोशनी राय के साथ देखा था।टॉर्च की रोशनी ने जब रौली के चेहरे को उजागर कर दिया तो उसने उस टॉर्च वाले पर भी गोली चलाने में जरा देर न लगाई। गोली खाकर बन्दा नीचे गिरा और रौली विद्युतीय गति से बाहर निकल गया।दूसरे शख्त की हिम्मत न हुई कि वह उठकर रौली का पीछा करे। वह अपने साथ का अंजाम देख चुका था। हां, उसे अभी यह मालूम न था कि तबेले में आने वाली नई घोड़ी का भी काम –तमाम हो चुका है।सुबह की रोशनी राजा सलीम की हवेली में तहलका मचाती हुइ उतरी थी |वाड़े का रखवाला राजा सलोम के सामने खड़ा थर-थर कांप रहा था। वह अपने मालिक को बता चुका था कि घोड़ी और उसके साथी को गोली मारने वाला रोशन राय का खास बन्दा रौली थी |राजा सलीम बहुत ही कांइयां आदमी था। वह इस घटना को पी गया।न उसने रोशन राय से कोई शिकायत की और ना ही किसी को बताया कि उसके एक आदमी और घोड़ी को मारने की इस वरदात में रोशन राय का आदमी शामिल है। वह रोशन राय से उसी गर्मजोशी से मिला....जिस तरह मिलता था ।राजा सलीम ने कुछ समय तक खामोश रहने के बाद अपना हाथ दिखाया ।जितने अरसे खामोशी रही, रोशन राय बहुत खुश रहा कि रौली ने बड़ी होशियारी के साथ इस काम को अंजाम दिया है। वह घोड़ी अगर उसे नहीं मिल सकी थी, तो वह राज साहब के पास भी न रही थी। वह सोच भी नहीं सकता था कि राज सलीम के अन्दर कैसा तूफान उठ रहा है।मामला ठण्डा पंड चुका था। रोशनी राय निश्चिन्त था कि उधर राजा सलीम ने एक दिन बाबू करन्ट नाम के अपने एक गुर्गे को बुलवा भेजा ।दस मिनट बाद ही बाबू 'करन्ट' हाथ बांधे उसके सामने खड़ा था। राजा सलीम तब अपने बाग में था....वह बाग में पड़ी कुर्सी पर बैठ गया और उसने बाबू करन्ट' को निहारते हुए कहां हां भई, बाबू 'करन्ट' आ गये तुम......

"जी, राजा साई....... ।'' बाबू ‘करन्ट' ने आदर के साथ कहा।

"खूब! तो अब यह बताओं कि क्या तुम सिर्फ नाम के 'करन्ट' हो या किसी को वाकई करन्ट मार सकते हो......।" राजा सलीम ने अपने विशिष्ट अंदाज में आंखे फैलाई।

"राजा साई! आप हुक्म करेंख चार सौ चालीस वोल्ट का करन्ट लगे ही गले है।" बाबू ने अपने सीने पर हाथ रखकर जानिसारी से कहा ।

"तो तुम्हें रोशनगढ़ी जाना हैं, बाबू.... । राजा सलीम ने हुक्म सुनाया।"जाऊंगा, राजा साई। सिर के बल जाऊंगा....।''

"आज मैं तुझे एक राज की बात बताता हूं, गौर से सेन.....।"वह जो हमारी मुश्की घोड़ी और बन्दे की जिसने जान ली थी...जानता हैं वो कौन था ?"

"राजा साई । अगर इसी का पता चल जाता तो मैं कातिल को पाताल से भी घसीट लाता..... ।

“वो रोशन राय का बन्दा रौली था..... ।' राजा सलीम ने उसे बताया।\

हैरत हुई सुनकर राजा साई.....।'' बाबू सचमुच हैरान हुआ था-"ऐसा काम उसे रौली ने क्यों किया?"

"इसमें रौली का कोई कसूर नहीं। उसे जैसा हुक्म मिला वैसा कर दिया। अभी बाबा, मैं जो तुम्हें हुक्म दूंगर तुम क्या करोंगें?'

"वही राजा साई....जो आप हुक्म करेंगे।'

"अब देखो, बाबू करन्ट....रोशन राय ने हमारी पसन्द की घोड़ी मरवा दी, तो खून का बदला तो खून ही है ना बाबा..?" राजा सलीम ने पूछा ।

“बिल्कुल राजा साई.....बिल्कुल.... ।” बाबू ने हामी भरी ।
 
"वही राजा साई....जो आप हुक्म करेंगे।'

"अब देखो, बाबू करन्ट....रोशन राय ने हमारी पसन्द की घोड़ी मरवा दी, तो खून का बदला तो खून ही है ना बाबा..?" राजा सलीम ने पूछा ।

“बिल्कुल राजा साई.....बिल्कुल.... ।” बाबू ने हामी भरी ।

"तो फिर सुन! रोशन राय की घुड़साल में दस-बारह घोड़े है। उनमें सबसे उम्दा और कीमती घोड़ा सफेद रंग का है। उस घोड़े की पहचान यही हैं कि वह पूरा का पूरा सफेद हैं...मगर उसके माथे पर रूपये बराबर का काला निशान है। रोशन राय की जान हैं यह घोड़ा। बस, तुम्ह उस घोड़े को अस्तबल से निकालना है। कर लोगे यह काम....?" राजा सलीम ने अपनी छोटी-छोटी आंखों से बाबू को घूरकर देखा।

"जान पर खेलकर करूंगा...।" बाबू करन्ट' ने पुख्ता लहजे में कहा।

बस तो बाबू 'करन्ट.....तू करन्ट की तरह दौड़ जा। पर एक बात का ख्याल रखना.गोली नहीं चलानी हैं.....कुल्हाड़ी चलानी है....।'

“राजा साई.... समझा नहीं....।

" बाबू, उसकी सूरत देखने लगा। कोई बात नहीं, बाबू करन्ट'...मैं तुझे समझाता हूं कि क्या करना है... |फिर राजा सलीम ने इस पेशेवर गुर्गे को अच्छी तरह समझा किदया कि क्या करना है और करना है?

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वह कयामत की सुबह थी।रोशनी राय को उठाकर जब रौली ने वह दिल दहला देने वाली खबर सुनाई तो रोशन राय की आंखों के सामने अंधेरा छा गया। जिस घोड़े में उसकी जान थी, उसकी जान निकाल ली गई थी।अस्तवला के चौकीदार को बांधकर सफेद घोड़ा निकाला गया और उसे हवेली के फाटक पर लाकर उसकी गर्दन तन से जुदा कर दी गई। यह वारदात अंजाम देने वाले तीन थे। अपना काम निपटा वे तीनों विभिन्न दिशाओं में निकल गये थ।रोशन राय बावजुद कोशिश के यह न जान सका कि आखिर यह वारदात की किसने? हालांकि इतना तो वह समझ ही गया था कि इस वारदात के पीछे, राजा सलीम के अलावा और कोई नहीं हो सकता। रोशन राय अभी तक सन्तुष्ट व निश्चित था कि राजा सलीम आंख खोल दी थी। राज सलीम ने अपना इन्तकाम कमाल-होशियारी व ज्यादा दिलेरी के साथ लिया था ।रोशन राय ने अपनी पूरी कोशिश कर डाली कि राजा सलीम के खिलाफ कोई सबूत, कोई सुराग हाथ लग जाए। लेकिन वह नाकाम रहा। बाबू 'करन्ट' ने अपने दो साथियों के साथ कुछ इस अंदाल मे यह वारदात की थी कि कोई सुराग....कोई सबूत ने छोड़ा था ।अब दोनों दोस्तों के बीच नफरत की दीवार खड़ी हो गई थी। दोनों ने एक-दूसरे के सामने ऐसा कुछ जाहिर नहीं किया था। दोनों के बीच दिखावे की दोस्ती बरकरार थी और दोस्ती के इस पेड़ को गिराने में रोशन राय का ज्यादा हाथ था। पहल उसने की थी और राजा सलीम ने सबूत होने के बावजूद रोशन राय से कोई गिला-शिकवा नहीं किया था ।जबकि रोशन राय के पास कोई सबूत न होने के बाद भी उसके दिल में इन्तकाम की आग भड़कती जाती थी।इसके बाद चुनाव आ गये। हालांकि दोनों के क्षेत्र अलग-अलग थे और इससे पहले रोशन राय ने कभी चुनावों में भाग लेने की कोशिश भी नहीं की थीं.लेकिन इस बार दोनों ने एक ही क्षेत्र से इलैक्शन लड़ने की ठान ली। दोनों ने ही अपनी-अपनी पार्टियों से टिकट प्राप्त कर लिए और चुनाव की गहमागहमी शुरू हो गई है।दोनों ने एक दूसरे के खिलाफ बोलना शुरू कर दिया।रोशन राय की कोशिश होती थी कि जहां राजा सलीम की जनसभा हो, वहीं उसका भी जलसा हो। परिणामस्वरूप दोनों की जनसभाएं हंगामों की भेंट चढ़ने लगी और फिर वह वक्त भी आ गया, जब दोनों दोस्त खुलकर एक-दूसरे के आमने-सामने आ गये। दोस्ती अन्दर ही अन्दर दुश्मनी में बदली और फिर इसने राजनैतिक रंग ले लिया ।फिर वह वक्त आया कि दोनों उम्मीदवारों ने एक ही दिन, एक ही जगह और एक ही वक्त जनसभा का ऐलान कर दिया।

दोनों यह बात अच्छी तरह जानते थे कि इस ऐलान का क्या नतीजा निकलेगा। उन दोनों के ही समर्थकों ने अपना-अपना स्टेज बनवाने की कोशिश की। खूब हंगामा हुआ, खून-खराबा हुआ, गोलियां चलीं, राजा सलीम के बाजू में भी एक गोली लगी। रोशन राय को भी घाव आये। दोनों उम्मीदवार अपने-अपने जख्म चाटते अपने-अपने इलाकों में वापिस चले गय...जलसा कोई न कर सका ।इस आपस के टकराव व टकराव में गुण्डागर्दी का नतीजा वही निकला जो निकलना चाहिये था। उन क्षेत्र से एक तीसरा आजाद उम्मीदवार विजयी रहा। इस शिकस्त ने उन दोनों के दिलों में इन्तकाम की आग और भी भड़का दी |अब दोनों दुश्मन एक-दूसरे को नीचा दिखाने के लिए जो चाहते कर गुजरते और छिपाने की बजाय दिढोरा पीट देते कि यह काम उसने किया है। अब दोस्ती थीं, तो अपने शिखर पर थी...अब दुश्मनी हुई तो उसकी भी सीमा न रही।अब दोनों एक-दूसरे की जान के दुश्मन थे।और इस दुश्मनी का एक बेहद घिनौना रूप तो तब सामने आया कि इस बीच राजा सलीम के बेटे की बहू को डाकुओं के एक गिरोह ने अगवा कर लिया। रोशन राय तब जब यह खबर पहुंची तो उसने राजा सलीम की बहू को डाकुआं के सरदार से फिरौती देकर, अपने कब्जे में कर लिया और फिर उसकी लाश राजा सलीम की हवेली भिजवा दी राजा सलीम तड़प कर रह गया ।यूं राजा सलीम अब किसी मौके की तलाश में था कि मौका खुद-ब-खुद चलकर उसके पास आ गया नमीरा की जुबानी जो कुछ मालूम हुआ..उससे जाहिर होता था कि रोशन राय के लिए अपनी इस बहू के लिए कोई महत्त्व न था। उसने खुद ही उसके साथ शैतानों का-सा व्यवहार किया था, लेकिन थी तो वह रोशन राय की बहू ही ना।

उसके इकलौते बेटे समीर राय की बीवी ।उसने मास्टर हाकम अली को 'शाबाशी देकर और ईनाम का वायदा करके, चन्द हिदायतों के साथ रूख्सत किया और अपनी प्लानिंग तैयार करने लगा और फिर इसी प्लानिंग के अनुसार बाबू 'करन्ट' ने हाकम अली के घर से नमीरा को उठाया और उसकी हत्या करके उसे कालीन में लपेटा और रातों-रात उस सड़क पर डाल आया जो हाई-वे की मिलाती थी...तो दूसरी तरफ से रोशनगढ़ी को जाती थी ।जाहिर था कि जिसकी भी नजर उस कालीन पर पड़ेगी, वो इस खबर को हवेली मे रोशन राय तक जरूर पहुंचाएगा |अब इसका क्या कहिये कि वह पहला शख्त खुद उसका पति समीर राय ही निकलेगा।समीर अपनी बीवी की गुमशुदगी से परेशान था। हालात बता रहे थे कि उसकी बीवी, जैसा कि उसे बताया गया था, मरी नहीं हैं और जब उसने अपनी बीवी की तलाश में सरगर्मी दिखाई और वह इस राज के नजदीक पहुंचने लगा तो उसके बाप ने उसे बम्बई लौट जाने पर मजबूर कर दिया।

समीर ने हवेली छोड़ दी...वह अपनी मां की आंखों में आंसू नही देख सकता था ।अब उसे क्या पता था कि जिन आंसुओ की वजह से उसने हवेली छोड़ना मंजूर कर लिया, वे आंसू खुद उसकी आंखों में भर आएंगे। उसकी बीवी यूं राह में मिल जाएगी।नमीरा की लाश देखकर उसके दिल में टीसें-सी उठी....जब्त-संयम के तमाम बन्द दुख के रैले में बह गये। वह फूट-फूट कर रो दिया ।रौली और होली उसे वापिस हवेली ले जाना चाहते थे लेकिन उसने जाने से इंकार कर दिया। उसने अपनी नमीरा की लाश की अपने हाथों में उठाया और उसे गाड़ी की पिछली सीट पर डाल दिया और खुद भी उसके साथ बैठ गया।"चलो, बम्बई चलो....।" उसने बेहद सर्द लहजे में हुक्म दिया ।रौली ने जब समीर को लाश के साथ पिछली सीट पर बैठे देखा, समझ लिया कि समीर अब किसी कीमत पर हवेली नहीं लौटेगा। उसने फौरन फैसला किया और होली को एकऔर बन्दे के साथ वापिस हवेली जाने को कहा और खुद दो बन्दों के साथ गाड़ी में बैठ गया और ड्राइविंग सीट सम्भाल ली और गाड़ी, समीर राय के आदेशानुसार मुम्बर की तरफ रवाना हो गई।

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गाड़ी के नजरों से ओझल हो जाने के बाद.... होली और उस बन्दे ने कालीन को रोल किया। वह इस वक्त हवेली से दस-पन्द्रह किलोमीटर के फासले पर थे... पर संयोग से उन्हें एक ऊंट गाड़ी में लिफ्ट मिल गई। यह ऊंट गाड़ी रोशनगढ़ी की ही थी, इसलिए उन्हें हवेली तक पहुंचने में थोडा वक्त तो लगा, लेकिन दिक्कत कोई न आई होली ने हवेली में पहुंचकर कालीन बरामदे में रखवाया और खुद रोशन राय की तलाश में चल पड़ा। उसकी नजर नफीस बेगम की खास सेविका लोंगसरी पर पड़ी और वो लपक कर उसके पास पहुंचा ।

“क्या हुआ...?" लोंगसरी ने होली की परेशान सूरत देखकर पूछा था।

"मालिक कहां हैं......?" होली ने उल्टा सवाल किया।

वह मालकिन के साथ नाश्ता कर रहे हैं.....।" लोंगसरी ने बताया।

जब नाश्ता कर लें तो उन्हें खबर देना कि मैं उनसे मिलना चाहता हूं, बहुत जरूरी काम हैं।"

लोंसगरी जब अन्दर पहुंची तो रोशन राय नाश्ता कर चुका था । लोंसगरी ने आदर भाव से झुकते हुए कहा-"मालिक, वो होली आया है। कोई खबर लाया हैं"

"होली आया हैं.....।" रोशन राय ने चौंककर घड़ी देखी-"क्या उसके साथ रौली भी हैं........।"

"नही मालिक, अकेला है....।

"ठीक हैं। मैं अपने कमरे में जा रहा हूं....तुम उसे वहां भेज दो....।" रोशन राय, नफीसा बेगम के चेहरे पर नजर डालता हुआ, उठ गया व बड़ी शान के साथ चलता हुआ कमरे से निकल गया ।वह अपने 'मुलाकात के खास कमरे में पहुंचकर सोफे पर बैठा ही था कि उसके मोबाइल फोन की घंटी बजी। मोबाइल का बटन दबाकर

". उसने बड़े गम्भीर लहजे में कहा-"हैल्लो...... ।'"

हा...हा...हा...।" उधर से एक जहरीजा कहकहा सुनाई दिया।

"कौन हो तुम.?" रोशन राय भड़क उठा।

"हा..हा....हा....।" उधर से फिर कहकहा उभरा ।अब रोशन राय ने फौरन ही इस आवाज को पहचान लिया। यह कहकहा सुनकर वह अन्दर ही अन्दर खौफजदा हो गया। वह अच्छी तरह जानता था कि इस जहरीली हंसी के पीछे जरूर हंसने वाले की फतह की खबर होगी। उसकी फतह चालें रोशन राय की कोई शिकस्त । यह धड़कते दिल के साथ खबर की इन्तजार करने लगा।लेकिन उधर से सम्बन्ध विच्छेद कर लिये गये। लाईन कट गई |रोशर राय ने अपना मोबाइल बन्द करके एक झटके से उसे सोफे पर फेंक दिया।

तभी एक मुलाजिम अन्दर आया और हाथ जोड़कर खड़ा हो गया।

"होली आया हैं...?" रोशन राय ने पूछा ।

"जी मालिक....।''

भेजो उसे... "नौकर के बाहर निकलते ही, होली सहमा हुआ-सा कमरे में दाखिल हुआ। उसकी सूरत देखते ही रोशन राय ने अंदाला लगा लिया कि वह कोई परेशानकुन खबर लाया है ।

"मुंह खोल । क्या मुसीबत आई हैं.....? बोलता क्यों नहीं...?" रोशर राय ने झुंझालकर कहा ।

“मालिक, मेरे पास कोई अच्छी खबर नहीं.... ।' होली धीरे से बाला।"

अरे, बाबा। मेरे पास जो भी खबर हैं वह बता। ज्यादा ड्रामा न कर.....।" रोशर राय सर्द लहजे में बोला।

"मालिक यहां से कोई दस-बारह किलोमीटर दूर.हमें सड़क पर एक लिपटा हुआ कालीन पड़ा मिला। मैंने और रौली ने उसे खोला तो मालिक उसमें से छोटी मालकिन की लाश निकली.... ।'

"होली ने बदस्तूर सहमे-सहमे लहजे में खबर सुनाई।"छोटी मालकिन की ला.... !

तेरा मतलब हैं समीर राय की बीवी की लाश?" इस खबर ने रोशन राय की रीढ़ की हड्डी में सर्दी दौड़ा दी... उसने घबराकर तस्दीक चाही थी।

"जी मालिक....।'' होली ने तस्दीक कर दी। मालिक, लाश तो छोटे मालिक बम्बई ले गये। वह हवेली वापिस आने पर किसी भी तरह राजी न हुए। रोली उनके साथ गया हैं और मैं यहां आपके पास आ गया। मैं वह कालीन जरूर ले आया हूं जिसमें छोटी मालकिन की लाश लिपटी हुई थी। कालीन बाहर बरामदे में पड़ा हैं-

"रोशन राय को इस वक्त कुछ सुनाई नहीं दे रहा था। हर तरफ से बस, कहकहे की आवाज आ रही थी। यह कहकहा जहर में बुझा हुआ था....... उसका दिल चीर रहा था ।यह जहरीला कहकहा राजा सलीम का था

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वे मुम्बर तक गाड़ी में ही पहुंचे थे।मुम्बई पहुंचने तक गाड़ी में मौत का -सा सन्नाटा छाया रहा।किसी में हिम्मत न थी कि वह समीर राय से कुछ कह सकता। रौली बस नजर उठाकर आइने में देख लेता था रोशन राय न नमीरा का सिर अपनी गोद में रखा हुआ था वह बार-बार सिर पर हाथ फेरकर उसका चेहरा देखता था। नमीरा का चेहरा जर्द था और उसके होठों पर हल्की-सी मुस्कान थी। नमीरा के होठों की तराश कुछ ऐसी ही थी कि वह जब भी अपने होठ हल्के से बन्द करती थी तो यूं महसूस होता जैसे मुस्कुरा रही हो। वही मुस्कान मरने के बाद भी उसके बन्द होठों पर मौजूद थी।समीर राय उसका चेहरा देखता तो उसकी आंखों से आंसू जारी हो जाते पूरे रास्ते उसकी आंखों से गर्म-गर्म आंसू निकलकर उसे गालों पर बहते रहे। उसके आंसू पोंछने वाला कोई न था। खुद उसे उन्हें रोकने की सुध नहीं थी। वह रोता या अपने आंसू पोंछता ।मुम्बई में दाखिल होने से पहले रौली न समीर राय से पूछा-'मालिक....कहां जाएंगे...?"".....!

" समीर राय ने कई घन्टे बाद किसी की आवाज सुनी तो चौंका |वह तो अपनी सुध में ही कब था। जब से उसने नमीरा की लाश देखी थी...उस पर दुखों के पहाड़ टूट पड़े थे....उसके तो हवास गुम थे। नमीरा की लाश के साथ वह होस्टल तो जा नहीं सकता था। क्षणिक सोच के बाद ही वह बोला-अपने बान्द्रा वाले बंगले पर चलो.. |रौली, समीर राय के इस फैसले से खुश हुआ। उसे खौफ था कि मालिक किसी ऐसी जगह चलने को न कह दें..जहां वह उनके साथ न जा सके। वह समीर राय के साथ ही रहना चाहता था, ताकि वह रोशर राय को हालात से आगाह करता रह सके |अपने बान्द्रा वाले बंगले पर पहुंचकर समीर राय ने वहां मौजूद मुलाजिम दिलदार को ऊपर का बैडरूप खोलने का हुक्म दिया ।फिर समीर राय ने नमीरा को गाड़ी से निकाला और उसे अपने कन्धे पर डालकर ऊपर वाले उसी बैडरूप में ले गया। उसने बहुत धीरे-से नमीरा को बिस्तर पर लिटाया, कुछ इस तरह कि ठेस ने लग जाये ।फिर उसने उसके हाथ-पांव सीधे कियं..सिर के नीचे तकिया ठीक किया और फिर उसे कुछ ऐसी नजरों से देखा जैसे उससे, उसे अकेला छोड़कर जाने की इजाजत मांग रहा हो। फिर वह तेजी से पलटा। बैडरूप से निकला। दरवाजा लॉक किया वे तेजी से नीचे आया ।रौली नीचे खड़ा दिलदार से बातें कर रहा था। समीर राय को आते देखा तो बड़े आदरभाव से उसकी तरफ बढ़ आया।

"रौली....अब तुम जाओ। यहां मैं अब तुम्हें चन्द मिनट भी बर्दाश्त नहीं करूंगा। फौरन हवेली लौट जाओं और अब्बू से कह देना कि वह यहां आने की कोशिश न करें। उनसे कह देना कि नमीरा की तरह अब उनका समीर भी उनके लिए मर गया। जाओ, रौली जाओ...।" बोलते-बोलते उसके लहजे में जैसें आग भर गई था। गुस्से से उसने अपनी मुट्ठियां भींच लीं।

"ठीक हैं, मालिक.... | जैसी आपकी मर्जी... ।” रौली ने सिर नवांते कहा और फिर फौरन पलट भी लिया |वो अपने दोनों साथियों के साथ गाड़ी में जा बैठा। उसने बड़ी महारत से गाड़ी बैक की और फिर तेजी से सीधा निकलता चला गया....जैसे डर हो कि अगर उसने जरा भी देर की तो कहीं समीर राय उसे गोली न मार दे ।गाड़ी के गेट से निकलते ही समीर राय ने दिलदार को हुक्म । दिया"दिलदार, गेट बन्द कर दो!'

"जी मालिक..... ।" दिलदार तेजी से गेट की तरफ भागा ।समीर राय भीतर तक हिला हुआ था। जज्बात चैन नहीं लेने दे रहे थे। सहसा, उसे नमीरा के अकेले होने का ख्याल आया। उसकी तन्हाई का ख्याल करके वह जल्दी-जल्दी सीढ़ियां फलांगता हुआ ऊपर पहुंचा और बैडरूप में दाखिल होकर दरवाजा अन्दर से बन्द कर लिया।फिर बैड पर आ बैठा व बेकरारी से नमीरा का ठण्डा-सर्द हाथ थाम लिया....और होठों ही होठों में बड़बड़ाया-"नमीरा मुझे माफ करना। मैं तुम्हें तन्हा छोड़कर नीचे चला गया था। मैं अब्बू के कुत्ते को भगाने गया था। देखो...मुझे देर तो नहीं हुई ना, मैं फौरन ही आ गया हूं....।" नमीरा की मौत ने उसके दिलों-दिमाग पर गहरा असर डाला था....और यह असर बढ़ता ही जा रहा था। उसे नमीरा को हवेली मैं अकेले छोड़ते का गहरा रंज था। शादी करके, वह तो जैसे उसे भूल ही गयाथा। वह तो संगीत की दुनिया व उसके हंगामों में कुछ ऐसा गुम था कि नमीरा उसके जहन से ही जैसें निकल गई थी। यहां तक कि नमीरा का आखिरी और चन्द शब्दों का मार्मिक पत्र भी उसे हवेली लौटने को मजबूर नहीं कर सका था। मैं खुद को बहुत अकेली.....बेहद तन्हा महसूस करती हूं। हो सके तो मुझसे मिल जाओं...।"इस खत के मिलते ही वह तड़प उठा था।......उसने फौरन ही हवेली जाने का फैसला भी कर लिया था। पर बुरा हो संगीतभरी शामों का...कुछ दोस्त उसे एक म्यूजिक कन्सर्ट' में ले गए। बस, एक शाम गुजरी और नमीरा के उस पत्र से उभरी भावनाएं धीमी पड़ गई और फिर वह रोज जाने की सोचता......लेकिन वक्त टलता रहा। आज जाता हूं....आज जाता हूं' की सोचकर उसने घर फोन भी नहीं किया था। बाप के लाख कहने पर भी समीर राय ने अपने पास मोबाइल नहीं रखा था। हां, वह कभी-कभी अपनी मां को फोन जरूर कर लिया करता था.. वह भी अपने किसी दोस्त के मोबाईल से या एस.टी.डी. बूथ से। मां से ही नमीरा का कुशल-क्षेम मालूम हो जाता था।फिर एक दिन समीर राय को बड़ी शिद्दत नमीरा की याद आई और उसने पक्का इरादा कर लिया कि कुछ भी हो जाए वह कल जरूर रोशनगढ़ी जाएगा। संयोग से उस वक्त उसे एक दोस्त को मोबाइल फोन भी उपलब्ध था, सो उसने उसी वक्त मां को अपने हवेली आने की इत्तला भी दे दी।काश, उसे पता होता कि नमीरा के बुलावे पर ना जाकर उसने कितनी बड़ी भूल कर दी है। भूल नहीं, बल्कि अपराध....एक ऐसा अपराध जिसकी सजा वह ताजिन्दगी काटता रहेगा... सिसकता रहेगा.....बिलखता रहेगा।नमीरा उसकी मुहब्बत थी। उसने नमीरा से बड़ी चाह से शादी की थी और नमीरा ने भी उसके लिए अपने मां-बाप को छोड़ दिया था। हालाकि समीर राय ने भी नमीरा को अपनाकर अपने मां-बाप को नाराज किया था, लेकिन यह और बात थी कि उन्होंने उसे अलग नहीं किया था। वे समीर को अलग कर भी नही सकते थे....समीर राय उनकी इकलौती सन्तान जो थी ।

समीर राय मृत नमीरा की सूरत देखे जा रहा था और उसके दिमाग में नमीरा के साथ बीते दिनों की फिल्म बड़ी तेजी से चल रही थी। वह बड़बड़ाये जा रहा था, बोजे जा रहा था.......और नमीरा आंखे मूंदे....होंठों पर मुस्कान सजाये खामोशी से सुने जा रही थी।इसी तरह पूरी रात बीत गई ।सुबह होते ही रोशनगढ़ी से नफीसा बेगम का फोन आया। रिसीवर दिलदार ने उठाया।"हैल्लो....।" वह बोला ।,

“कौन दिलदार....?" उधर से नफीस बेगम ने पूछा।

"जी मालकिन! सलाम मालकिन..... | मैं दिलदार बोल रहा हूं.....।" दिलदार ने उनकी आवाज पहचानते ही जवाब दिया।

"छोटे मालिक कहां हैं...?" नफीसा नें पूछा।"

वह तो जी, ऊपर के कमरे में है जी। जब से आए हैं, वहीं हैं जी। कमरा अन्दर से बन्द कर रखा हैं। मैंने और सरवरी ने ऊपर का कई बार चक्कर लगाया हैं जो, मगर दरवाजा बन्द ही पाया है।" दिलदार ने संक्षेप में रात की रिपोर्ट दे डाली ।

“जा, अब ऊपर जा....।" नफीसा बेगम ने आदेश दिया-"दरवाजा खटखटा कर बाता कि मेरा फोन हैं......।'

'अच्छा जी! जाता हूं जी......।'' दिलदार रिसीवर रखकर उठ गया दिलदार की बीवी सरवरी, किचन में नाश्ता तैयार कर रही थी। फोन की घंटी सुन वह भी दिलदार के पास आ खड़ी हुई थी। दिलदार ने रिसीवर रखा तो उसने इशारे से पूछा-"क्या हुआ?"
 
"हवेली से मालकिन का फोन हैं.....वह छोटे मालिक को बुला रही हैं......।" दिलदार ने कमरे से निकलते हुइ बताया ।सरवरी उसके साथ हो ली थी।ऊपर पहुंचकर दिलदार ने दरवाजे के हैंडिल को धीरे से घुमाया, लेकिन दरवाजा ने खुला।

वह अन्दर से बन्द था। फिर वो दरवाजा खटखटाने ही वाला था कि सरवरी ने उसे आवाज दी-"दिलदार, इधर आ..... |

सरवरी की आवाज में कुछ ऐसी बात थी कि वह चौंके बिना न रहा। वो उसके निकट पहुंचकर बोला-"हां, क्या हुआ ?"सरवरी उसका हाथ थामकर खामोशी से खिड़की की तरफ हुआ था। खिड़की शीशे की थी और बीच से थोड़ा-सा परदा सरका हुआ था। भीतर लाईट जल रही थी और बीच से थोड़ा-सा परदा सरका हुआ था। भीतर लाईट जल रही थी। खुले हुए परदे से समीर राय साफ नजर आ रहा था। वह गीले तौलिये से नमीरा का मुंह साफ कर रहा था।"लगता हैं, छोटे मालिक पागल हो गये है। कोई लाश का भी मुंह धुलाता हैं। "दिलदार परेशान होकर बोला-"अब क्या करूं सरबरी! दरवाजा बजाऊं.....?''"हां, बजाओं....।" सरवरी ने मशवरा दिया-'उन्हें बता दो कि मालकिन का फोन आया है।"दिलदार हिम्मत करके आगे बढ़ा और फिर दरवाजा बजाकर फौरन पीछे हट गया। उसने अपनी बीवी को भी अपने करीब कर लिया। वह भयभीत लग रहा था। इसी अन्देशे से कि दरवाजा खोल, समीर राय जाने क्या प्रतिक्रिया दिखाये।लेकिन दरवाजा बजाने को कोई असर नहीं हुआ। कुद देर की इन्तजार के बाद भी दरवाजा नहीं खुला था। दिलदार आगे बढ़ने की बजाये पीछे हट गया। उसने अब सरवरी को आगे कर दिया था। मजबूर सरवरी को दरवाजा खटखटाना पड़ा ।कुछ क्षणों बाद भीतर से खटपट की आवाज आई। दरवाजा खुला और समीर राय का चेहरा दिखा। सरवरी उसका चेहरा देखकर सिहर गई।

समीर राय के चेहरे पर दीवानगी के भाव थे......उसकी आंखे सुर्ख थी....... जैसें वह रातभर न सोया हो। बाल बिखरे हुए थे। लिबास बेतरतीब था।"सरवरी, नाश्ता ला....।'' वह सरवरी को देखते ही बोला था-"मेरी नमीरा कब से नाश्ते का इन्तजार कर रही है।

''हाय अल्लाह!" समीर राय की बात सुन सरवरी बदहवास होकर एकदम पीछे हट गई।

"छोटे मालिक....हवेली से मालकिन का फोन आया है ........वह आपकों बुला रही हैं।' दिलदार आगे बढ़कर बोला।

"अरे बेवाकूफ! मेरी बात सुन। मेरी नमीरा रात से भुखी है। उसके लिए जल्दी से नाश्ता ला । जा, जल्दी कर..... ।" समीर राय ने अपनी कही। दिलदार की बात तो उसने जैसे सुनी ही नहीं थी।

"छोटे मालिक...मैं अभी नाश्ता ले आती हूं...।' सरवरी बोल उठी-"आप तब तक मालकिन से बात कर लें।

कौन मालकिन.......?" समीर राय ने खोये-खोये अंदाज में पूछा।"

आपकी अम्मी, छोटे मालिक.....।" सरवरी ने हैरत व परेशानी से जवाब दिया-"क्या आप अपनी मां को भी भूल गये?''

''यहां से दफा हो जा सरवरी....।" समीर ने उसे घूरा-“मेरा कोई नहीं हैं। मेरी बस नमीरा हैं। जा जल्दी नाश्ता ला। वह कब से नाश्ते का इन्तजार कर रही हैं......।" इतना कह उसने धड़ाक् से दरवाजा बन्द कर दिया ।

वे दोनों हैरान-परेशान से एक दूसरे का मुंह तकने लगे। अब क्या करें...त्र"

दिलदार बोला-"मालकिन को क्या बताएं..?

"मालकिन से कुछ छिपाने की जरूरत नहीं हैं दिलदार... |उन्हें सब साफ-साफ बता दें....।"

सरवरी सीढ़ियों की तरफ बढ़ते हुइ बोली।"तो तू बात कर ले ना।

तू उन्हें समझाकर बता देगी......।"

दिलदार ने उसके साथ सीढ़ियां उतरते हुए कहा।

"ठीक हैं....चल, मैं करती हूं बात....।" सरवरी ने हिम्मत दिखाई नीचे पहुंचकर सरवरी ने कालीर पर बैठते हुए रिसीवर उठाया और नफीसा बेगम को वह सब बता दिया जो उसने देखा व सुना था ।वह सब कुछ सुनकर नफीसा बेगम के तो जैसे होश ही उड़ गये। उसका इकलौता व लाडला बेटा और उसकी यह हालत। वह अगर सचमुच पागल हो गया तो, वह तो कहीं की नहीं रहेगी। उसने फौरन अपने आपकों सम्भाला और समीर राय की विक्षिप्तता के मद्देनजर उसने सरवरी को हिदायत दी-"सरवरी देख, छोटे मालिक का ख्याल रखना। दिलदार से कहकर बंगले के गेट पर ताजा डलवा दें। कहीं छोटे मालिक बाहर न निकल जाएं। मैं अभी बड़ें मालिक के साथ निकल रही हूं। तुम दोनों हमारे पहुंचने तक छोटे मालिक का ख्याल रखो। वह जैसा कहें....कर देना।ठीक हैं....?"

"जी मालकिन ठीक हैं..... । आप बेफिक्र हो जाएं। हम वैसा ही करेंगे जैसा आपका हुक्म हैं...।'

"सरवरी का जवाब सुनकर नफीसा बेगम ने राहत महसूस की । वह जानती थी सरवरी एक सुघंड गृहस्थन हैं

और वह समीर राय को अच्छी तरह से सम्भाल लेगी। उसने रिसीवर नीचे रखा तो सामने ही बैठे हुए रोशन राय न अपनी मूंछो को ताव दिया, फिर पूछा-"क्या हुआ नफीसा.....??'

'फौरन बम्बई चलने का इन्तजाम करें। हमारे बेटे ने पूरी रात लाश के साथ गुजारी है। वह बहकी-बहकी बातें कर रहा है। कहीं वह सचमुच ही पागल न हो जाए ?" नफीसा बेगम की आवाज में कम्पन था।

"क्या कह रहा हैं.....कुछ बताओं तो.....।' रोशन राय ने पूछा।

"वह लाश का मुंह धुला रहा है। लाश के लिए नाश्ता मांग रहा है। आया, कुछ समझ में?" नफीसा बेगम ने ठंडी आह भरी

रोशन राय के चेहरे पर भी चिन्ता के भाव उभरे। वह उठ खड़ा हुआ-"यह तो बड़ी संजीदा और खतरनाक बात हैं। तुम जल्दी से तैयार हो जाओं। मैं रौली से कहता हूं, वह गाड़ी निकाले.....

''ठीक हैं......" नफीसा बेगम ने छलक आए आंसू पोंछे और तैयारी में लग गई।

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रौली ने गाड़ी बंगले के गेट के सामने रोककर पहले दो बार हॉर्न बजाया, फिर गाड़ी से उतरकर गेट की कॉलबैल भी दो-तीर बार लगातार दबाई और फिर स्टेयरिंग पर आ बैठा।दिलदार भागकर गेट तक आया। सरवरी भी बंगले से बाहर आ गई |दिलदार ने ताला खोल, गेट के दोनों पट खोल दिये। रौली गाड़ी अन्दर लेता चला गया। गाड़ी रोक उसने फुर्ती से उतरकर पिछला दरवाजा खोला । पहले रोशन राय और फिर नफीसा बेगम उतरी। दिलदार ने दोनों को सलाम किया और हाथ जोड़कर खड़ा हो गया ।वे दोनों सिर के इशारे से सलाम का जवाब देते हुए बंगले में दालिख हो गये रोशन राय ड्राइंग रूम में सोफे पर बैठ गया। नफीसा बेगम बैडरूप में जा घुसी और बैड पर अधलेटी-सी बैठ गई। सरवरी ने फौरन मालकिन के पैर पकड़ लिये और उन्हें आहिस्ता-आहिस्ता दबाने लगी।

“समीर कहां है...?" नफीसा बेगम ने पूछा।

"छोटे मालिक ऊपर ही है। मैं उन्हें नाश्ता दे आई थी.....।" सरवरी ने बताया ।

वह अभी तक बैडरूप से निकला नहीं?" नफीसा चिन्तित दिखने लगी।

"नहीं, मालकिन!''

आओ, मेरे साथ ऊपर चलों।" नफीसा बेगम ने पैर पलंग से लटकाये। सरवरी ने जल्दी से उन्हें जूते पहनाये और पीछे हटकर खड़ी हो गई नफीसा बेगम बैडरूप से बाहर आई, राहदारी पार करके सीढ़ियां चढ़ने लगी। सरवरी उसकी पीछे ही थी।नफीसा बेगम का दिल तेजी से धड़क रहा था। ऊपर पहुंचकर उसने दो लम्बे-लम्बे सांस लिए और सरवरी को दरवाजा खटखटाने का इशारा किया ।सरवरी ने दरवाजे पर दस्तक देने के साथ आवाज भी लगाई-"छोटे मालिक....छोटे मालिक...दरवाजा खोलि...

"अन्दर से खटपट की आवाजे आई, फिर दरवाजा खुल गया। समीर राय का बदशतजदा चेहरा सामने था। नफीसा बेगम बेटे का चेहरा देखकर भौंचक्की रह गई। दिल एक टीस-सी उठी और उसने आगे बढ़कर समीर राय का चेहरा अपने दोनों हाथों में ले लिया और फिर भर्राई आवाजा में बोली-"मेरे चांद, यह तूने अपनी क्या हालत बना ली है...?"

समीर राय ने उन्हें अजनबी निगाहों से देखा और अपना चेहरा उनके हाथों से अलग कर लिया, फिर पलटा व कमरे के अन्दर चला गया। नफीसा बेगम उसके पीछे लपकी कमरे का बुरा हाल था। नमीरा की लाश बैड पर पड़ी थी और नाश्ता उसके चारों तरफ बिखरा हुआ था। समीर राय ने उसे भरपूर नाश्ता कराने की कोशिश की थी। नमीरा के मुंह पर जैम, मक्यन, ब्रेड के पीस लिपटे हुए थे। कपड़ों पर चाय बिखरी पड़ी थी।समीर राय के हाथों में बटर लगा पीस अब भी मौजूद था। वह बड़ी फिक्रमंदी से नमीरा की तरफ बढ़ा, जैसे नाश्ते में देर हो रही हो। उसने बड़े चाव से पीस नमीरा के मुंह पर रखा व बोला-"नमीरा, जल्दी से नाश्कता कर लो, प्लीज...... | ये लोग आ गये हैं। सब छीनकर ले जाएंगे तुमसे...।"

"नहीं, बेटे! तुम परेशान ने होओं। मैंने नमीरा के लिये ढेरों खाना बनवाया है। मैं उसे अपने हाथों से खिलाऊंगी। नमीरा से कोई कुछ नहीं छीनेगा बेटे!" बेटे की मनोस्थिति पर अन्दर-ही-अन्दर रोते हुए धीरज दर्शाते हुए बोली ।

" हां.....।" समीर राय का चेहरा खुशी से दम उठा-"तुम बहुत अच्छी हो। तुम बहुत अच्छी हो। तुम कौन हों?

''हाय, मेरे लाल.....!" नफीसा बेगम का कलेजा छलनी हो गया-"तू मुझे भी नहीं पहचानता। अरे, मैं तेरी मां हूं।"
 
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