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Horror अनहोनी ( एक प्रेत गाथा )

"अच्छा, महाराज...।" पुरूषोत्तम ने बड़ी सावधानी के साथ कून्डा उठाया और बहुत सम्भल-सम्भल कर बाहर निकल गया।

"देवांग बाबू..अपनी जिन्दगी में कभी ऐसा नहीं हुआ। यह आखिर हुआ क्या।" ओघड़नाथ अपनी जगह पर धम्म से बैठते हुए बोला-"यह कमीना तो 'काला' हो गया।''मैं क्या कहूं..मैं अब क्या करूं...।"

देवांग निराश हो गया-“मेरी जान तो फिर से खतरे में पड़ गई।

"नहीं, देवांग बाबू... | तुम परेशान मत होओ। अभी एक 'अमल' और है मेरे पास, लेकिन उस 'अमल' में दो-तीन दिन लगेंगे। तुम्हें मेरे पास ही रहना होगा।'

'रहुंगा...। बरहा का पता मालूम करने के लिए मैं यहां तीन महीने भी रह सकता हूं..।

''बस-बस...फिर फिक की कोई बात नहीं। तुम यहां से बरहा का पता निशाना लेकर ही जाओगे...।' ओघड़नाथ ने उसे तसल्ली दी।

पुरूषोत्तम कुछ देर बाद ही खाली कून्डा लेकर झोंपड़ी में दाखिल हुआ, बोला-"महाराज, “काले' को नदी में बहा दिया।"

अच्छा किया... | वो सत्यानाशी तो बड़ा ही कमीना निकला। देख, तूने कून्डा अच्छी तरह धोया है या नहीं..?"ओघड़नाथ ने पूछा ।

"हां, महाराज...।

"ठीक है। फिर तू जा...।

''महाराज, एक खुशी की खबर है...।"

पुरूषोत्तम जाते-जाते रूक कर बोला।

"हैं...वो क्या..?"

ओघड़नाथ उसे घूरने लगा।“

घाट में एक चिता तैयार हो रही है, महाराज... | कोई अर्थी आने वाली है...।

"अरे, वाह! यह तो वाकई खुशी की खबर है। पता किया, कौन मरा है...कोई स्त्री या मर्द?

" पता करके आया हूं, महाराज! औरत की अर्थी है...।"

पुरूषोत्तम ने अपनी चमकती हुई मुस्कान भरी आंखों से ओघड़नाथ की तरफ देखा।

"बस, बन गया काम...।" ओघड़नाथ ने देवांग की तरफ देखा-"देवांग बाबू, तुम बड़ें खुशकिस्मत हो। जिसकी जरूरत थी वह भी अविलम्ब मिल गई। अब देखता हूं कि बरहा को कोई कैसे छिपा कर रखता है... ।

"अब तो तीन दिन नहीं लगेंगे...?" देवांग ने फौरन पूछा।

"नहीं, अब काम जल्दी बन जाएगा...।" ओघड़नाथ ने जवाब दिया और फिर अपने चेले से बोला-"जब वे लोग चले जाएं तो मुझे आकर बताना..।

''जी, महाराज...।" पुरूषोत्तम ने कहा व बाहर निकल गया। उसने सीधे श्मशान घाट का रूख किया था।वो वहां पीपल के पेड़ पर चढ़कर बैठ गया।अंधेरा फैलते ही पन्द्रह-बीस लोग एक अर्थी के साथ श्मशान घाट में पहुंचे। शव चिता पर रखकर आग लगाई गई। देखते-ही-देखते चिता भड़क उठी। फिर जलती लाश की सड़ांध चारों तरफ फैलने लगी। अर्थी के साथ आने वाले चिता के पूर्णतया भड़क जाने की इंतजार में खड़े रहे, फिर वे वापिस चल दिये। उन्हें अंदाजा हो चुका था कि लाश आधी से ज्यादा जल चुकी है। यही वे क्षण थे जब शव यात्रा में आए लोग लौट जाते थे।ओघड़नाथ को ऐसी ही लाश की जरूरत रहती थी और वह अधजली लाशों के साथ जो कुछ करता था...उसे देखकर एक अच्छा-भला आदमी भी बेहोश हो सकता था ।बहरहाल, जब उस अर्थी के साथ आने वाले लोग चले गए...तो पुरूषोत्तम पेड़ से नीचे उतरा और दौड़ लगाकर ओघड़नाथ की झोंपड़ी में पहुंचा। चलिये, महाराज...।" वह अंदर आते ही बोला।

"आओ...देवांग बाबू... | हमारे साथ चलोगे या यहीं बैठोगे? तुम्हें तो मालूम है कि हम मुर्दाखोर लोग हैं। अधजली लाश का मजा ही कुछ और होता है। आओ, तुम्हें दिखायें.. |"ओघड़नाथ ने मुस्कुराते हुए कहा ।

देवांग तो अधजले मांस का सुनकर ही थर्रा गया..और वह भी एक लाश के मांस का। वह थूक निगलते बोला-"ओघड़ तुम हो आओ, मैं..मैं यहां बैठा हूं..।"

"ठीक है। तुम बैठो। थोड़ी-सी भांग और पीओ। हम थोड़ी देर में आते हैं। जय काली...।" वह यह कहकर उठा और कंधे पर एक तेज धार गंडासा रखकर झोपड़ी से निकल गया ।ओघड़नाथ के बदन पर इस वक्त एक लंगोट के सिवा और कुछ नहीं था। वो कंधे पर गंडासा रखे पुरूषोत्तम के पीछे चला जा रहा था। चारों तरफ घुप्प अंधेरा था लेकिन उन दोनों को चलने में कोई दिक्कत पेश नहीं आ रही थी। यह रास्ता उनका देखा-भाला था। सो, वे पूरे इत्मीनान से चल रहे थे।चिता अभी जल रही थीं कुछ लकड़ियां जल चुकी थी...कुछ अभी पूरी नहीं जली थीं, ओघड़नाथ ने एक लम्बी-सी लकड़ी से लाश को कुरेद कर बाहर निकाला। उसे उठाकर निकट ही बहमी नदी में धोया और गंडासे से उसके टुकड़े करके, वो अभी एक टुकड़ा अपने मुंह में रखने ही वाला था कि अचानक तेज रोशनी उसकी आंखों पर पड़ी और साथ ही कोई लोहे की चीज उसकी कनपटी से आ लगी ।यही अमल पुरूषोत्तम के साथ भी दोहराया गया। ओघड़नाथ के लिए यह बिल्कुल नया अनुभव था। पहले तो उसकी समझ में ही नहीं आया कि ये कौन लोग हैं...फिर जब उन लोगों ने समझाया तो वो समझा कि उसकी कनपटी से पिस्तौल लगी हुई है जिसका घोड़ा दबाते ही गोलियां निकल कर उसकी खोपड़ी के आर-पार हो जाएगी।“

महाराज...तुम लोग चाहते क्या हो..?"

ओघड़नाथ घिघिया कर बोला।

"ओ, खब्बीस..! खड़ा हो और हमारे साथ चल...।" आने वाले ने सख्त लहजे में कहा।

"कहां जाना है..?" ओघड़नाथ कांप उठा।

"ज्यादा दूर नहीं... | इस श्मशान घाट के एक कोने में..." आने वाले ने बताया।

"वहां क्या है..?

''वहां कोई तेरा प्रतीक्षक है...।

'"कौन महाराज...?"

"अब सारे सवाल यहीं बैठे-बैठे कर लेगा...चल उठ खब्बीस...।" पिस्तौलधारी ने उसे एक लात जमाई।
 
ओघड़नाथ इस लात को बर्दाश्त कर गया, वह उठ खड़ा हुआ। पिस्तौलधारी ने पिस्तौल उसकी गर्दन से लगाई और उसे धक्का देते हुए बोला-"चल, आगे बढ़..!"पिस्तौलधारी उसे इसी पोजीशन में श्मशान घाट के एक कोने की तरफ ले चला.और उसका साथी पुरूषोत्तम को झोंपड़ी की तरफ ।

ओघड़नाथ ने रास्ते में उससे कई बार पूछा कि वो कौन है और क्या चाहता है? मगर उसे कोई जवाब न मिला। कोई जवाब मिला भी था तो वह यह कि उसे पिस्तौल के मूठ का प्रहार अपने कनपटे पर झेलना पड़ा था। तब जाकर वह चुप हुआ था ।कुछ दूर चलने के बाद एक पेड़ के पीछे से एक टार्च चमकी और आवाज सुनाई दी-"नादर, ले आये इस खब्बीस को...

''हां मालिक, ले आया हूं...।" पिस्तौलधारी, नादर ने जवाब दिया।

"इसे बिठाओ जमीन पर...।" पेड़ के पीछे से फिर जवाब आई और यह आवाज रोशनगढ़ी के समीर राय की थी।

"अच्छा, मालिक...।" नादर ने जवाब दिया और फिर ओघड़ से बोला-"भई, बैठ जा...।"

ओघड़नाथ की सिट्टी-पिट्टी गुम थी। उसकी समझ में नहीं आ रहा था कि यह सब हो क्या रहा है। वो खामोशी से जमीन पर बैठ गया।

"नादर, इसके चेहरे पर रोशनी डालो... ।" आदेश देते हुए समीर राय पेड़ के पीछे से निकल आया। उसके पीछे दो हथियारबंद व्यक्ति और भी थे, जो किसी भी खतरे से निपटने के लिए तैयार थे ।

नादर ने एक शक्तिशाली टार्च का बटन दबाकर उसका रूख ओघड़नाथ की तरु कर दिया। टार्च की रोशनी में ओघड़ का भयानक चेहरा और भी भयानक नजर आ रहा ।

समीर राय ने अरूणिमा का दिया हुआ नारियल हाथ में पकड़ा हुआ था। उसने चाकू निकाला और नादर के करीब होकर टार्च की रोशनी की तरफ हाथ बढ़ाकर चाकू से नारियल का एक छोटा-सा टुकड़ा काटा। वह पका हुआ सूखा नारियल था। इस नारियल में पानी के होने की कोई सम्भावना ही नहीं थी...और समीर राय ने उसे अपने कान के पास हिलाकर इसकी तस्दीक भी कर ली थी..लेकिन अब उसने जैसे ही नारियल से टुकड़ा अलग किया तो उसे एकाएक नारियल के भारी होने का अहसास हुआ। उसे लगा जैसे नारियल पानी से भरा हुआ हो |उस पहुंची हुई' ने उसे पैट्रोल पम्प कहा था ।समीर राय ने आगे बढ़कर और अपना हाथ लम्बा करके ओघडनाथ पर नारियल उलटना चाहा। लेकिन फिर फौरन ही अपना हाथ खींच लिया। यही ख्याल आया था कि अगर उस पर इस तरह नारियल का पानी डाल दिया तो वो अचानक उठकर खड़ा हो जाएगा। ऐसे में जाने फिर क्या स्थिति बने? वह अपने पीछे खड़े शख्स से बोला-"मुश्ताक..रस्सी भी साथ लाया है या नहीं..?"

"लाये हैं, मालिक...।" फौरन जवाब मिला ।

तो फिर इस कुत्ते के हाथ-पांव बांध | जल्दी कर... |"

मुश्ताक अंधेरे से निकल कर रोशनी में आया । नादर ने पिस्तौल की मूठ ओघड़नाथ के कनपटे से बजाई और बोला-"अपने हाथ-पांव आराम से बंधवा ले वरना...।

"लो बांध लो महाराज...।" ओघड़नाथ ने अपने हाथ फौरन आगे कर दिये थे ।मुश्ताक ने बड़ी दक्षता से उसके हाथ बांधे और उसे जमीन पर धक्का दे दिया ।अब समीर राय आगे बढ़ा और उसने जल्दी से नारियल उसके सिर के ऊपर रखकर उलट दिया। नारियल से आश्चर्यजनक तौर पर गट्-गट करके पानी निकलने लगा। जब वो उस पानी से भली-भांति भींग गया और नारियल का पानी भी खत्म हो गया तो समीर राय पीछे हटा । उसने पीछे हटते हुये नादर से भी दबी जुबान में पीछे हटने को कहा था |नादर, टार्च का रूख बदस्तूर ओघड़नाथ की तरफ रखे तेजी से हटा। समीर राय भी आठ-दस कदम पीछे हटकर रूक गया और फिर उसने ओघड़नाथ का निशाना लेकर उसके पेट पर दे मारा। नारियल का उसके शरीर से टकराना था कि एक तीव्र रोशनी-सी हुई और ओघड़नाथ का समूचा शरीर शोलों की लपेट में आ गया ।सहसा चीखें सुनाई देने लगीं। ये ओघड़नाथ की चीखें न थीं। ओघड़नाथ को तो चीखने का मौका ही नहीं मिला था। उसकी हृदयगति तो आग लगते ही बंद हो गई थी। ये आवाजें तो कहीं दूर से आ रही थीं..जैसे भटकती हुई दुष्टात्माएं चीख रही हों।सुनसान और वीरान श्मशान घाट में रूहों के चीखने की आवाजें एक हौलनाक समां पेश कर रही थीं सामने ओघड़नाथ शोलों की लपेट में था और किसी सूखी लकड़ी की तरह धूं-धूं जल रहा था।

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देवांग अभी ओघड़नाथ की वापसी का प्रतीक्षक ही था कि अचानक बहुत-सी बिल्लियों के रोने और लड़ने की आवाजें भी आने लगीं ये बिल्लियां बिल्कुल इन्सानी आवाज में रो रही थीं और ये आवाजें कहीं बहुत करीब से आ रही थीं, श्मशान घाट में इस तरह की आवाजों का सुनाई देना कोई अनोखी बात नहीं थी। देवांग अभी इन आवाजों पर गौर ही कर रहा था कि अंदर से शान्ति उर्फ नमीरा निकली वह चीखती हुई बाहर आई थी..जैसे किसी ने उसके गले पर छुरी रख दी हो। देवांग अभी बिल्लियों के रोने व चीखने की आवाजों को ही नहीं समझ पाया था कि अंदर से शान्ति निकल कर उसके पैरों में औंधे मुंह आकर गिरी और साकत हो गई देवांग उछल कर खड़ा हो गया ।उसने खौफजदा अंदाज में इस औरत को देखा जो चीखती हुई उसके कदमों में आ ढेर हुई थी। वह एक बेहद खूबसूरत और नौजवान औरत थी। देवांग बदहवास होकर अभी यही सोच रहा था कि वो झोपड़ी में ही बैठा रहे या उठकर बाहर निकल जाये कि अंदर से दो आदमी निकल कर आए। उनमें से एक ने राइफल की नाल देवांग के सीने पर रख दी और कर्कश लहजे में बोला-“खबरदार..हरकत मत करना... ।

इन नई मुसीबतों को देखकर देवांग तो जैसे अधमरा हो गया। उसने खौफजदा होकर हाथ ऊपर उठा दिये थे।

"शाबाश...।" राइफलधारी बोला-"अब जरा अपना मुंह इधर कर लो...।"

देवांग ने फौरन उनकी तरफ पीठ कर ली। नमीरा (शान्ति) जमीन पर पड़ी हुई थी...निश्चल..बेहरकत ।

ओघड़नाथ के मरते ही शान्ति का खेल भी खत्म हो गया था शान्ति की आत्मा..बेचैन होकर नमीरा की देह-ज्याग गई थी।नादर ने जमीन पर पड़ी हुई नमीरा की लाश को उठाकर कंधे पर डाला और फिर वे दोनों झोंपड़ी से निकल गये ।नादर टार्च रोशन किये नमीरा को कंधे पर डाले तेजी से भाग रहा था। वो जल्दी ही श्मशान घाट की सीमा से निकल गया और वहां पहुंच गया जहां समीर राय जीप में उसका प्रतीक्षक था। नादर ने नमीरा की लाश जीप की पिछली सीट पर डाली और समीर राय से बोला-“मालिक आप जायें... जरा उन खब्बीसों को भून कर आता हूं...

''अब छोड़ो नादर...हमें उनसे क्या लेना। जिसने मेरी नमीरा को कब्जे में रखा था..उसका हिसाब तो चुका दिया...।" समीर राय ने उसे समझाते हुए कहा-"वैसे, वहां हैं कितने आदमी?

''चार हैं, मालिक...।' नादर ने बताया।

"छोड़ो नादर...क्यों निर्दोषों का खून अपनी गर्दन पर लेते हो। मैं चलता हूं, तुम अपने बन्दों के साथ फौरन मेरे पीछे आओ...।" समीर राय बोला।

"जैसी आपकी मर्जी, मालिक...।" नादर ने अपना जोश दबाते हुए कहा-"आप बस दो मिनट ठहरें, मैं गाड़ी लेकर इधर ही आता हूं...। और फिर कुछ ही देर में दोनों गाड़ियां रोशनगढ़ी की तरफ लौट रही थीं।

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बड़ी विचित्र बात थी।हालांकि नमीरा को मरे हुये एक मुद्दत हो चुकी थी...लेकिन उसकी लाश अभी तक तरोताज थी। लगता था जैसे अभी कुछ देर पहले ही उसने प्राण त्यागे हों ।उसे नहला-धुला कर कफन पहना दिया गया था। लोग सुबह से ही उसके आखिरी दीदार को आ रहे थे। तमाम रिश्तेदार जमा हो गये थे। सब को बता दिया गया था कि नमीरा पर अब तक क्या गुजरी ।बरहा को इस हवेली में रहते करीब पन्द्रह दिन हो गये थे। वह बहुत जल्द...सभी से घुल-मिल गई थी। वह अपनी मां के बारे में बार-बार पूछती थी...लेकिन उसके बारे में कोई संतोषजनक जवाब नहीं मिलता था। समीर राय की समझ में नहीं आता था कि वह अपनी बेटी को अपनी मां के बारे में क्या बताए ।अंततः जब वह वक्त आ गया था और वह उसको यह बता व समझा सकता था कि उसकी मां इस दुनिया में नहीं रही है।समीर राय बरहा को अपनी गोद में उठाये, उस कमरे में दाखिल हुआ, जहां नमीरा का शव रखा था। बाप-बेटी को देखकर वहां मौजूद औरतों ने सिसकियां भरनी शुरू कर दीं।

"खुदा के वास्ते...रोयें नहीं... | मेरे सब्र का इम्तहान न लें...।" समीर ने दुख भरे लहजे में कहा |

उसके इस अनुरोध पर रोने वाली औरतों ने फौरन मुंह में दुपट्टे ढूंस लिये ।समीर राय धीरे-धीरे लाश की तरफ बढ़ा। नमीरा का चेहरा खुला हुआ था। उसके होठों पर मंद-मंद मुस्कान थी। आंखें कुछ इस तरह बंद थीं जैसे अभी सोई हो। उसका चेहरा देखकर समीर राय की आंखों में आंसू भरने लगे। उसने बड़ी मुश्किल से अपने निकलते आंसुओं पर काबू पाया। उसका गला रूधने लगा था, वह भर्राये स्वर में ही बरहा से मुखातिब हुआ-

"बेटा, यह तुम्हारी अम्मी है..तुम्हारी मां! इन्हें गौर से देख लो। यह पहला और आखिरी दीदार है। इसके बाद तुम इनहें कभी नहीं देख पाओगी। मेरी बच्ची...अपनी आंखों में बसा लो इनकी यह लुभावनी मुरत... । फिर जाने क्या हुआ? समीर राय जो अब तक बड़े धैर्य धीरज से काम ले रहा था और हर एक से ना रोने की विनती कर रहा था...खुद ही हौसला हार बैठा । बेअख्तयार उसके मुंह से सिसकी निकली और फिर यह सिसकी चीख में बदल गईं वह बरबस ही चीख-चीखकर रोने लगा |

बरहा ने अपने बाप को इस तरह रोता देखा तो अपने नन्हें-नन्हें खूबसूरत हाथों में उनका चेहरा लेते हुए बड़ी मासूमियत से बोली-“बाबा न रोयें...आप क्यों रोते हैं...मैं आ गई हूं ना अब आपके पास।"

समीर राय ने उसकी बात सुनकर उसे कलेजे से भींच लिया व बिलखते हुए ही बोला-"हां, बेटी। अब तुम ही सब कुछ हो मेरे लिए... "

नफीसा बेगम फौरन आगे बढ़ी उसने बरहा को बेटे की बांहों से खींचकर अपनी गोद में ले लिया और समीर राय का हाथ पकड़ कर बोली-" आओ, बेटे... ।"

समीर राय ने खुद पर काबू पाते हुए अपने आंसू पोंछे और अपनी मां के साथ कमरे से निकल गया ।समीर राय ने खुद अपने पूर्वजों के कब्रिस्तान में जाकर नमीरा की कब्र के लिए बेहतरीन जगह का चुनाव किया था। उसने अपने हाथों से नमीरा को कब्र में उतारा । आखिरी बार उसका चेहरा खोल कर देखा और झुककर सरगोशी में बोला-"नमीरा, मैं तुम्हारा मुजरिम हूं। मैं तुम्हारी हिफाजत न कर सका। हो सके तो मुझे माफ कर देना।"अब तक समीर राय ने जिस बेकरारी और बेचैनी से दिन काटे थे...नमीरा को अपने हाथों दफना कर उसके दिल को करार आ गया। उसने नमीरा की कब्र संगमरमर की बनवाई ।यूं भी वह अब जब भी हवेली लौटता...बरहा का फूल-सा चेहरा देखकर सब कुछ भूल जाता।

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देवांग नदी पार करके अपनी बस्ती की तरफ बढ़ा तो उसके दिल पर बड़ा बोझ था।परमान ने उसे ओघड़नाथ के पास भेजा था और उसे पूरा विश्वास था कि । ओघड़नाथ बरहा की तलाश में उसकी मदद जरूर करेगा। लेकिन वहां जिस तरह के वाकयात पेश आए थे...उन्होंने तो देवांग के होश ही उड़ा दिये थे |उसे याद आया कि ओघड़नाथ के जाने के बाद कोई औरत झोंपड़ी से निकलकर उसके कदमों में आकर गिरी थी और अभी वह समझ भी नहीं पाया था कि यक क्या माजरा है कि दो राइफलधारी नमुदार हुये थे और उनके हुक्म पर उसे हाथ उठा, मुंह दूसरी तरफ करना पड़ा था...वह काफी देर तक वैसे ही मुंह फेरे खड़ा रहा था और फिर जब उसने मुंह फेर कर देखा तो तो झोंपड़ी खाली थी। न वे राइफलधारी मौजूद थे और ना ही उसके कदमों में गिरने वाली औरत |फिर कुछ देर बाद पुरूषोत्तम बरहवास-सा झोंपड़ी में आया था...और उसने जो कुछ बताया वह और भी परेशानकुन था। फिर ओघड़नाथ के शेष दोनों चेले भी आ गये थे। सभी सिर जोड़कर सोचने लगे कि क्या करें? पुरूषोत्तम को अहसास था कि अगर उन्होंने बाहर निकल कर ओघड़नाथ को तलाश करना चाहा तो वे हथियारबंद आगन्तुम उन्हें जिन्दा नहीं छोड़ेंगे ।जब एक-डेढ़ घन्टा बीत गया और किसी भी हथियारबंद ने झोंपड़ी का रूख नहीं किया तो पुरूषोत्तम ने बाहर निकलकर ओघड़नाथ को खोजने का सुझाव दिया। देवांग खुद उसे ढूंढने को बेचैन था। वे चारों बाहर निकले और दो-दो की टोली में ओघड़नाथ की तलाश में निकल लिये।

कोई आधे घन्टे की तलाश के बाद उन्होंने ओघड़नाथ की जली हुई लाश ढूंढ निकाली ।तीनों चेले मिलकर ओघड़नाथ की लाश को झोपड़ी में ले आये और अब जो उन्होंने झोंपड़ी में जलते लैम्प की रोशनी में ओघड़नाथ के वजूद को देखा तो सभी काप कर रह गये औघड़नाथ की लाश जलकर कोयला हो गई थी और किसी लकड़ी की तरह सख्त हो गई थी। उनकी समझ में नहीं आया कि ओघड़नाथ को यह इस तरह किसने जलाया था। चेलों ने ओघड़नाथ की जली हुई लाश को झोंपड़ी में रखना उचित नहीं समझा । उन तीनों ने अपने गुरू की लाश को कंधों पर रखा और 'राम नाम सत्य है' बोलते हुए उसे नदी में फेंक आए।देवांग का अब वहां रूकना व्यर्थ था। वो सुबह होते ही अपनी राह लगा।अब वो अपनी बस्ती की तरफ अग्रसर था।और ज्यूं-ज्यूं उसके कदम उठ रहे थे, उसका दिल बैठता जा रहा था। उसका घर करीब आ रहा थां इस घर से ही तो बरहा को उठाया गया था। जाने कैसे शक्तिशाली लोग थे वे? उन्होंने हूरा को जख्मी कर दिया था और शायद उन्हीं लोगों ने ही ओघड़ना को जला डाला था ।अब वो क्या करे? क्या बस्ती छोड़कर भाग जाये? पर वो अपनी मां और पत्नी को छोड़कर कहीं भाग नहीं सकता था ।वह इसी उधेड़बुन में चला जा रहा था कि क्या करे और क्या ना करे ? कि वो अचानक किसी चीज से टकरा गया।वो हूरा था।

"देख कर चलो, देवांग...।" वो व्यंगपूर्ण स्वर में बोला-"कहो, क्या खबर लाए..?"

"असफल लौआ हूं... |

ओघड़नाथ कुछ नहीं कर सका। वो खुद जल मरा... |

"जल मरा...।" हूरा ने हैरत से कहा-"कैसे..?''

उसे किसी ने जला दिया और कुछ इस तरह जलाया कि वो जली हुई लकड़ी की तरह हो गया।" देवांग ने बताया।

और अब तुम कहां जा रहे थे.?" हूरा ने अपने सफेद दांत चमकाते हुए पूछा।

अपनी बस्ती...अपने घर...।" देवांग धीमे से बोला।"

तुम अपने घर को भूल जाओ...।" हूरा ने शुष्क स्वर में कहा।

"क्यों भूल जाऊं अपने घर को...?" देवांग ने विरोध किया-"वहां मेरी मां है...।"

"तुम्हें सजा भुगतनी होगी। परमान ने तुम्हें ओघड़नाथ के पास भेजकर एक मौका दिया था..लेकिन उस मौके से फायदा न उठा सके ।

"ओघड़नाथ बरहा को ढूंढने में असफल रहा और जब उसने अपना दूसरा 'अमल' करने की योजना बनाई तो उसे कुछ अज्ञात लोगों ने जला दिया। इसमें मेरा दोष क्या है..?" देवांग ने अपनी सफाई पेश की।

"दोष तो परमान का है जिसने तुम जैसे बेतकूफ पर भरोसा करके बरहा तुम्हारे हवाले कर दी। अब तुम मेरे साथ चलो और यह बेहूदा सफाइयां उसके सामने पेश करना।" हूरा गुर्राया।

"हूरा..तुम मुझे माफ नहीं कर सकते..?''

मैं तो माफ कर सकता हूं, लेकिन परमान नहीं...।"

तुम मुझे माफ कर दो। परमान से जाकर कह दो कि देवांग तुम्हें मिला ही नहीं...वो ना जाने कहां गायब हो गया है...।" देवांग ने उसे दया मांगती नजरों से देखते हुए गुहार की ।

तूने क्या मुझे बेवाकूफ समझा है। मुझे गलत मशवरे देता है। मैं अगर यह घन्टी घुमा कर तरे सिर पर मार दूं तो अभी तेरे सिर के दो टुकड़े हो जाएंगे। बस, अब तू सीधा खड़ा हो जा और मेरे साथ चल... । हूरा ने कहा और फिर अपने कंधे से उतार कर जंजीर में बंधी घन्टी जोर से जमीन पर मारी और हुंकारा भरा-"मैं हूं हूरा... |"उसी क्षण मिट्टी का बादल–सा उठा और वे दोनों उसमें गुम हो गये ।
 
जब हूरा ने देवांग को, परमान के सामने ले जा खड़ा किया तो परमान अपनी मसनद पर विराजमान था। रानी मलायका भी उसकी बगल में एक छोटी मसनद पर थी और दो सेविकाए उसके दाएं-बाए खड़ी थीं हूरा, देवांग की कलाई पकड़े कमरे में दाखिल हआ। उस कमरे के फर्श पर सात सांप अपना फन फैलाये..नीम दायरे की शक्ल में सर्पराज परमान के सामने मौजूद थे। देवांग को देखकर परमान के माथे पर बल पड़ गये।

परमान. ! मुजरिम हाजिर है... । हूरा ने देवांग को परमान के सामने करते हुए कहा।

कहां है बरहा..?" परमान गुस्से में आ गया। उसने चीखकर पूछा ।

देवांग सहम कर एक कदम पीछे हटा। हूरा ने फिर उसे आगे कर दिया।

"बोलता क्यों नहीं..?" परमान गर्जा ।

“मुझे नहीं मालूम...।" देवांग डरते-डरते बोला।

"क्या बरहा तेरे हवाले नहीं की गई थी? क्या तुझे उसकी हिफाजत के लिए नहीं कहा गया था?''

कहा गया था...

''फिर, उसे पेश कर मेरे सामने..मेरी अमानत वापिस कर...।“ परमान की आंखें शोले बरसाने लगीं।

परमान जानता है कि मैं मजबूर हूं निर्दोष हूं...। वे जाने कौन लोग थे, उन्होंने ओघड़नाथ को भी जला दिया।

अब फिर तेरे जलने की बारी है...।'

"मुझे माफ कर दीजिए, परमान... |"

मैंने तुझे एक मौका दिया, जो मैं कभी किसी को नहीं देता। तू नाकाम रहा। अब तू सजा के लिए तैयार हो जा।" यह कहकर उसने अपने सिर पर ताज की तरह सुशोभित सुनहरे सांप की तरफ आंखें उठाईं-"चलो, इसको ठिकाने लगाओ...।'

"नहीं...।" देवांग ने सहम कर आंखें बंद कर लीं।

परमान के सिर पर ताज की तरह सजे सुनहरे सांप ने अपनी जिव्हा तेजी से लपलपाई और फिर वह किसी स्प्रिंग की तरह खुला और पांच कदम दूर खड़े देवांग पर तीर की तरह चला। पलक झपकने में ही वो परमान के सिर पर से उड़कर देवांग के गले में जा लिपटा था ।उसने देवांग की गर्दन में एक खास जगह काटा और फिर उसकी गर्दन को अपनी लपेट में जकड़ना शुरू कर दिया ।एक ही क्षण में देवांग की आंखें उबल आईं...जुबान बाहर आ गई और वो खड़ा-खड़ा किसी शहतीर की तरह नीचे गिरा। फर्श पर गिरते ही उसके शरीर का जोड़-जोड़ अलग हो गया। वह मर चुका था। ये एक बड़ी भयानक मौत थी।देवांग के फर्श पर गिरने से पहले वह सुनहरा सांप फिर किसी स्प्रिंग की तरह खुला और तीर की तरह उड़ता हुआ परमान के सिर पर पहले की तरह आ जमा। अब वो जल्लाद फिर से । परमान के सिर का ताज था।

"हूरा...उठाओ...इस कूड़े का....।" परमान ने हुक्म दिया

हूरा न देवांग के शरीर के हिस्से लकड़ियों की तरह अपने दोनों हाथों पर जमाये और खामोशी से कमरे से निकल गया।

"चलो, सात सितारों तुम भी जाओ...।" परमान ने अपने सामने अर्द्धवृत्ताकार में फन उठाए सांपों से कहां ।वे फौरन ही फर्श पर रेंगने लगे।

"रानी मलायका, तुम भी जाओ. "रानी बिना कुछ बोले मसनद से उठ गई, और जब वह दरवाजे से बाहर निकल रही थी तो उसने परमान का एक और हुक्म सुना।

उसका आदेश सुनकर रानी मलायका सुलग उठी। वह हुक्म ही ऐसा था ।परमान ने अपने दाएं खड़ी सेविका से कहा था-"तबूह को बूलाओ... ।'

रानी मलायका के लिए तबूह का नाम किसी अंगारे से कम नहीं था। उसका नाम सुनते ही रानी के बदन में आग लग जाती थी। लेकिन परमान को किसी बात की परवाह नहीं थी। वह यह बात अच्छी तरह जानता था कि रानी, तबूह से ईर्ष्या रखती है। फिर भी वो जब चाहता और जहां चाहता तबूह को तलब कर लेता था और रानी मलायका अपनी आग में जलती रह जाती थी।आज भी यही हुआ था कि सबको निकाल कर परमान ने तबूह को बुलवा लिया था। रानी ने इसे अपमान महसूस किया था। उसने तय कर लिया कि वो अब तबूह को परमान से दूर करके ही रहेगी।रानी के जाने के बाद कमरे में एक सेविका रह गई। परमान ने उसे भी रूख्सत कर दिया। अब वह अकेला रह गया था। परमान इस वकत सख्त परेशानी का शिकार था। बरहा की गुमशुदगी उसे बेचैन किये हुये थी। अपनी परेशानी को कम करने के लिए ही उसने तबूह को बुलवाया था।तबूह राजनर्तकी ही नहीं, परमान की खास सलाहकार भी थी।थोड़ी ही देर बाद तबूह अपनी विशिष्ट, बिजलियां गिराती चाल चलती...परमान की सेवा में आ खड़ी हुई। उसके होठों पर दिल फरेब मुस्कान थी, आंखों में लगावट थी। वह परमान के सामने अपना सिर नंवाते बाली–“परमान, कैसे याद किया..?"

तबूह. इस वक्त हम बहुत परेशान हैं...।“ परमान ने कहा।

"तबूह को बता...क्या पेरशानी है... । शायद मैं तुझे कोई मशवरा दे सकूँ...।" तबूह बड़े अपनत्व के साथ बोली थी।

तबूह, मैंने तुझे इसीलिये बुलवाया है कि इस बस्ती में कोई है तो वो सिर्फ तू ही है। परमान बस तेरे ही मशवरे सुनता है और उसी पर अमल करता है। परमान को आज फिर तेरी जरूरत है...।"

"ऐसी क्या बात हुई...आखिर तू क्यों परेशानी है..?" तबूह चौंकी ही थी।

"बरहा नहीं मिली...उसका कुछ पता नहीं...।" परमान ने अपनी पीड़ा बताई ।

“देवांग को तूने ओघड़नाथ के पास भेजा था...क्या उसने कोई मदद नहीं की?" तबूह ने पूछा।"

उसने मदद करने की कोशिश की थी, लेकिन वो बरहा तक नहीं पहुंच सका। वो जल कर कोयला हो गया...।"

"जल कर कोयला हो गया?" तबूह की हैरानी बढ़ी थी, उसने परेशानी से कहा-"ओघड़नाथ अपनी बस्ती का एक 'जबरदस्त' बन्दा था। अगर वही नाकाम रहा तो इसका मतलब है कि बरहा को किसी बहुत ही खतरनाक शख्स ने गायब किया है...।''

"अब मैं क्या करूं तबूह... । रनत्तारो तो किसी सूरत नहीं मानेगा... ।” परमान बेबसी से अपने हाथ मलने लगा।

"देवांग कहां गया..?" तबूह ने पूछा ।

"देवांग को तो मैंने ठिकाने लगा दिया । वो अपनी लापरवाही की सजा पा गया।" परमान बोला ।

"अच्छा..अच्छा किया..तूने बहुत अच्छा किया.. “तबूह कुछ सोचते हुए बोली।

अब मैं बरहा को कहां तलाश करूं..?"

"परमान, यह तेरा काम नहीं। तू अब हूरा को भेज...।''

हूरा उन लोगों के हाथों खुद चोट खा चुका है। हमारा यह मोहरा भी पिट चुका है। शायद अब यह हूरा के बस की बात नहीं... ।'

"तो फिर अब मुझे आजमा... ।” तबूह ने बड़ी शोख अदा के साथ परमान को देखा।

"नहीं तबूह! मैं तुझे भेजकर किसी किस्म का खतरा मोल नहीं लेना चाहता। मैं तुझे किसी कीमत पर खोना नहीं चाहता। तू मेरे लिए बहुत कीमती है... |" परमान जज्बाती हो उठा।

"इन मेहरबान शब्दों के लिए मैं तेरी आभारी हूं। पर ऐसा कुछ कहते वक्त थोड़ा सतर्क रहा कर। अबर मेरे लिए तेरे ये उद्गार रानी मलायका के कानों में पड़ जायें तो वो तुझे या फिर मुझे जिन्दा न छोड़ेगी....।" तबूह ने मुस्कुरा कर कहा।

"वो एक बेवाकूफ औरत है।" परमान ने लापरवाही से कहा।“

एक औरत दूसरी औरत के मामले में बड़ी संवेदनशील व ईर्ष्यालु होती है...।" तबूह ने परमान को तिरछी नजरों से देखा।

"वो मेरा कुछ नहीं बिगाड़ सकती...।" परमान ने सख्त लहजे में कहा।

लेकिन मेरा तो बिगाड़ सकती है...।" तबूह मुस्कुराई ।

अगर उसने कभी इसकी जुर्रत की तो समझना वह उसकी जिन्दगी का आखिरी दिन होगा...।" परमान ने तीखे शब्दों में कहा।

"मुझे इतना मान देने का एक बार फिर शुकिया.. | अब मुझे जाने की इजाजत दे...।

"कहां...?" परमान नने चौंक कर पूछा ।

"बरहा की तलाश में... ''

मैं तुझे किस तरह भेज सकता हूं..।" परमान चिन्तित हो उठा।
 
"मुझ पर यकीन कर... देवांग नहीं हूं। न ही ओघड़नाथ हूं। उस बस्ती में जाऊंगी तो कुछ करके आऊंगी। वक्त लग सकता है, लेकिन तबूह को कोई बरहा के पास पहुंचने से कोई नहीं रोक सकता...।" तबूह ने विश्वासपूर्ण लहजे में दावा किया ।

“जानता हूं...परमान उसकी आंखों में झांकते हुए बोला।

फिर इजाजत दे...।" तबूह ने मुस्कुराते हुए कहा ।

"अकेली मत जा...यहां से किसी को साथ ले जा...।" परमान ने चिंता दिखाई।

"ठीक है, परमान! तेरा हुक्म सिर आंखों पर, लेकिन यहां ऐसा कौन है जो मेरे साथ जा सके..?"

"तेरे साथ जाने को तो..हर कोई तैयार हो जाएगा। लेकिन मैं किसी काम के बंदे को तेरे साथ भेजता हूं और मेरी नजर में इस वक्त सबसे सही बन्दा हूरा है।"

"हूरा...।" तबूह ने यह नाम बेअख्तयार दोहराया था ।यह नाम सुनकर उसके दिल की धड़कनें तेज हो गई थी हाय! परमान ने यह क्या नाम ले लिया था। इस 'हशी' ने तबूह के दिल में जगह बना ली थी। वह अब अपने ख्यालों में खोई रहती थी।"अगर हूरा का साथ मिल जाए तो फिर तो इस मिशन का मजा ही और होगा..फिर चाहे बरहा की तलाश में सदियों ही क्यों न बीत जाएं...।" वह यह सोचकर मुस्कुरा दी।

"क्यों मुस्कुराती है..?" परमान ने पूछा ।

"हूरा के नाम पर।" तबूह ने छिपाया नहीं, लेकिन मुस्कुराने की वजह नहीं बताई। वह बात बनाते बोली-“परमान तू जानता है वो एक ऐसा जंगली घोड़ा है, जिसके मुंह में लगाम नहीं...।

"हां, मैं जानता हूं, लेकिन तू फिक न कर। वो तुझे परेशान नहीं करेगा। मैं उसकी लगाम तेरे हाथ में देकर उसे तेरे साथ रवाना कर दूंगा...।“ परमान ने आश्वासन दिया।

"अरे, नहीं...परमान तू उसे कुछ न कहना। मैं उस जंगली घोड़े को सम्भाल लूंगी। मैं जानती हूं सम्भालना।

"ठीक है...जैसे तेरी मर्जी। जा फिर उसे ले जा...।' परमान ने कहा व खड़ा हो गया।दरवाजे की तरफ बढ़ते हुए वो तबूह को समझाता जा रहा था कि उसे कि उसे किस मुश्किल में क्या करना है।

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'वृक्ष-द्वार' पर पहुंचकर जंजीर में बंधी घन्टी हूरा ने जोर से पेड़ के तने पर मारी और हुंकारा भरा "मैं हूं हूरा...।"

"आ जा हूरा, अंदर आ जा...।" अंदर से फौरन आवाज आई, लेकिन कोई दिखाई नहीं दिया।

मेरे साथ तबूह भी है... । हूरा ने अंदर दाखिल होने से पहले कहा।

"यह कौन है? यह कहां जा रही है..?" इसे मैं नहीं जानता...।" भीतर से आवाज आई।

"तू परमान को तो जानता है?" हूरा ने सवाल किया।

"हूरा, क्या बात करता है। उसे मैं कैसे नहीं जानूंगा। मैं उसका गुलाम हूं..।" आवाज में नम्रता थी।

"तेरे उसी स्वामी ने इसे मेरे साथ भेजा है...।" हूरा ने तबूह की तरफ देखते हुए कहा।

"अच्छा। थोड़ा इंतजार कर... "

"ठीक है। कर लेता हूं...।" हूरा ने इत्मीनान से कहा, फिर तबूह के कान में धीरे से बोला-"यह परमान से तस्दीक करेगा...।'

''कर ले तस्दीक...।" तबूह मुस्कुरा दी-"हम कौन-सा बिला इजाजत जा रहे हैं...।

"थोड़ी देर बाद भीतर से आवाज आई-"आ जा रे हूरा! तबूह को भी ला... "

वे दोनों पेड़ के तने में बने दरवाजे में प्रवेश कर गये। हूरा नु तबूह को समझा दिया था कि अंदर किस तरह का रास्ता है, सो तबूह को भी अंधेरे के बावजूद कोई दिक्कत पेश नहीं आई। वे दोनों ढलवान पर दौड़ते चले गये। फिर वे एकाएक रोशनी में नहा गये। अब उनके सामने अनंत रेगिस्तान था।

"अब किधर चलना है..?" हूरा ने जंजीर से जुड़ी घन्टी अपने कंधे पर डालते हुए पूछा।

बताती हूं..।" यह कहकर तबूह जमीन पर बैठ गई और उसने रेत पर कुछ आड़ी-तिरछी रेखाएं खींचनी शुरू की। हूरा.. झुक कर उसके इस अमल को बड़ी दिलचस्पी से देखने लगा ।कुछ देर बाद तबूह ने पश्चिम की तरफ इशारा करते हुए कहा-"उस तरफ... |

"कैसे चलोगी...?" हूरा ने पूछा।

"ऊंट पर...।" तबूह ने मुस्कुराकर इच्छा व्यक्त की।

"ठीक है...।" कहते हुए हूरा ने जंजीर से बंधी घन्टी जोर से रेत पर मारी ।एकदम रेत का बादल उठा और जब यह रेता छटी

तो दो खूबसूरती से सजे हुए ऊंट सामने थे। वे दोनों ऊंटों पर सवार हो गये और कुछ ही देर बाद, दोनों ऊंट रेगिस्तान में रेत उड़ाते बगोलों की तरह गायब हो गये।

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इस शाम बड़ी अजीब बात हुई ।बरहा, जिसका नामा अब समीर राय ने हिना रख दिया था, वह अपनी दादी की गोद में चढ़ी हुई थी। समीर राय, नफीसा बेगम के सामने बैठा था, और नफीसा बेगम की खास मुलाजिमा लोंगसरी हिना के लिए सेब काट रही थी उस वक्त सभी खामोश बैठे थे कि हिना अचानक चौंक कर बोली-"हां...।

"यह 'हां' उसने कुछ इस तरह कहा था...जैसे किसी ने उसे पुकार हो... नफीसा बेगम ने हैरत से उसका चेहरा अपनी तरफ मोड़ा व फिर प्यार से पूछा-"क्या हा?"

"दादीजान...अभी किसी ने मुझे बरहा कह कर पुकारा। क्या आपने नहीं सुना..?"

"नहीं, मैंने तो नहीं सुना, लेकिन बेटा...अब तुम्हारा नाम हिना है। हिना समीर राय, तुम समीर की हिना हो...।

"जी दादी...।" वह फौरन बोली-“मैं जानती हूं...मेरा नाम अब हिना है और यह नाम मुझे बहुत पसन्द है। इसलिए भी कि मेरा यह नाम मेरे अब्बू ने रखा है...।

''तुम मेरी जान हो हिना...।" समीर राय बोल उठा।

"अरे...।" हिना फिर चौंक गई-"आवाज फिर आई है। जैसे किसी ने पुकारा हो बरहा... ।'"

' हैं....।" अब समीर राय परेशान हो गया-"यह क्या कह रही हो। हमने तो कोई आवाज नहीं सुनी... ।'"

"बाबा...किसी औरत की आवाज है... | आवाज भी जानी पहचानी लगती है। लेकिन इस वक्त समझ में नहीं आ रहा कि किसकी आवाज है...। हिना खोये-खोय से अंदाज में बोली थी।

इधर आओ..मेरे पास... ।" समीर राय बोला, वह कुछ उलझ-सा गया नजर आ रहा था ।हिना दादी की गोद से उतर कर, सामने सोफे पर बैठे समीर राय के पास चली गई। समीर ने उसे अपनी बाहो में समेंट लिया और उसे प्यार करके बोला-"मेरी हिना...कुछ नहीं है। तुम पेरशान मत होओ।"

इस बीच लोंगसरी ने सेब काटकर प्लेट मेज पर रख दी-"लो बेबी...सेब खाओ...।

"लोंगसरी, प्लेट मुझे दे दो। अपनी हिना को हम अपने हाथों से खिलायेंगे।" समीर राय ने कहा ।

लोंगसरी ने प्लेट उठाकर उसके हाथ में दे दी। समीर राय ने एक टुकड़ा हिना के मुंह में देते हुए कहा-"लो बेटी... "

हिना ने अपना छोटा-सा मुंह खोल कर सेब ले लिया व बड़ी नफासत से चबाने लगी। अभी उसने थोड़ा-सा ही मुंह चलाया था कि वह अचानक समीर राय की गोद से उतरी और बाहर की तरफ जाते हुए बोली-“बाबा! मैं अभी आती हूं...।"

"अच्छा, बेटे ।" समीर राय ने कहा व उसे दरवाजे से जाते देखने लगा ।

"अरे, समीर..देखना तो यह कहाँ गई है..?" नफीसा बेगम को जाने क्या ख्याल आया।"

अम्मी, बाहर गई है, आ जाएगी...।" समीर सहज भाव में बोला।

"अरी, ओ लोंगसरी! जा तो जरा.हिना के पीछे जा। देख तो वह कहां गई है?" नफीसा बेगम को चैन नहीं आया ।

लोंगसरी को मालकिन के लहजे पर कुछ खतरे का अहसास-सा हुआ...उसे भी हिना का बाहर जाना अजीब-सा लगा। वह तेजी से बाहर की तरफ भागी। फिर थोड़ी ही देर बाद वो जो खबर लाई, उसने समीर राय को चौंका दिया। उसने कमरे में कदम रखते ही घबराये लहजे में कहा-“मालिक, बीवी हवेली से बाहर जा रही है।"

समीर राय उछल कर खड़ा हो गया... जैसे करन्ट का झटका लगा हो। उसे फौरन अरूणिमा नामक उस भविष्यवक्ता युवती की याद आ गई, जिसकी कृपा से बच्ची हवेली तक पहुंची थी। उसने कहा था कि बच्ची की सुरक्षा का खास ख्याल रखना। उसे अकेली हवेली से बाहर न जाने देना! फिर यह भी ख्याल आया कि हिना को कोई अदृश्य शख्सियत नाम लेकर पुकार रही थीं"ओह! जरूर कोई गड़बड़ है...।" वह बिजली की सी तेजी के साथ उठकर भागा। बताओ, किधर गई है?" वह कमरे से निकलते हुए बोला ।

लोंगसरी उसके साथ दौड़ी। समीर राय जब हवेली के दरवाजे पर आया तो हिना हवेली और हवेली के मुख्य...बड़े गेट के बीच का फासला तय कर चुकी थी। वह बहुत तेज दौड़ रही थी...हैरत अंगेज तौर पर तेज हवेली के प्रवेश द्वार पर तैनात निगरानों को इसके सख्त आदेश थे कि हिना किसी सूरत में भी हवेली से बाहर न जाने पाये ।हिना को गेट की तरफ आता देखकर दोनों चौकीदार अलर्ट हो गये थे। उन दोनों ने समीर राय को हवेली से बाहर आते हुए भी देख लिया था। समीर राय ने जोर से हाथ हिलाकर उन्हें बच्ची को रोकने का इशारा किया था..और सीढ़ियां उतरकर खुद भी तेजी से बड़े दरवाजे की तरफ भागा था ।समीर राय अगर हिना को रोकने का इशारा न करता..तब भी दोनों चौकीदार होशियार हो चुके थे... वे हिना को हर्गिज-हर्गिज बाहर न निकलने देते।हिना जैसे ही चौकीदार के निकट पहुची, वो आगे बढ़ता हुआ बोला-"बीवी किधर जाती है..?"

"मैं बाहर जा रही हूं. हट जाओ मेरे सामने से... ।" हिना गुस्से के साथ बोली। उसका उस क्षण का गुस्सा भी आश्चर्यजनक था।

"बीवी, मेरी बात सुनो...।" चौकीदार ने झुककर उसे पकड़ना चाहा तो हिना बड़ी फुर्ती से उसकी टांगों के बीच से निकल गई चौकीदार को एक बच्ची से ऐसी फुर्ती की आशा नहीं थी। वह एकदम परेशान हो गया। फिर दोनों चौकीदार अपनी बंदूकें कंधों पर संभालते बच्ची के पीछे भागे।

हिना तेजी से दौड़ रही थीं और अभी गेट से निकलना ही चाहती थी कि उन दोनों ने मिलकर उन्हें पीछे से पकड़ लिया, फिर एक चौकीदार ने उसे गोद में उठा लिया।

"मुझे छोड़ दो...मुझे छोड़ दो...।" वह एकदम चीखकर बोली और अपने कोमल खूबसूरत हाथों के छोटे-छोटे घूसे बनाकर उस पर बरसाने लगी।समीर राय दौड़ता हुआ गेट तक पहुंच गया। उसने हिना को अपनी बांहों में ले लिया लेकिन हिना थी कि काबू में ही नहीं आ रही थी। यूं लगता था जैसे वह अपने होश में नहीं है। वह बार-बार मचल रही थी और एक ही बात बार-बार कह रही थी-"छोड़ दो...मुझे छोड़ दो... ।
 
'"कहां जाओगी, बेटा... ।” उसे बहलाने की कोशिश करता समीर राय वापिस हवेली की तरफ लौटा-"कहां जाना है हमारी बिटिया को..?

''मैं बाहर जाऊंगी... | वो मुझे बुला रही है...। हिना ने बाहर की तरफ इशारा किया।

“वो कौन..?" कौन है वो बेटा...?" समीर राय ने पुचकारते हुए पुछा ।“

कोई नहीं...।" हिना ने गुस्से से उसकी तरफ देखा-"आप मुझे छोड़ दें... ।“हिना फिर मचलने लगी...और कुछ इस तरह मचली कि समीर राय को उसे संभालना मुश्किल हो गया। वह बड़ी मुश्किल से उसे अपने कमरे तक लाया। उसने उसे बैड पर लिटाया।

हैरान परेशान नफीसा बेगम और लोंगसरी उसके साथ-साथ थीं हिना बैड पर लेट कर बुरी तरह तड़पने लगी। वह यकीनन अपने हवासों में नहीं थी। वह तो स्वप्निल से लहजे में बोल रही थी जैसे–“मुझे जाने दो...वह मुझे बुला रही है...।"

नफीसा बेगम ने उसकी यह हालत देखी तो कलेजा थाम लिया-"इसे क्या हुआ, बेटा?"

"कुछ पता नहीं, अम्मी। आप जरा कमरे का दरवाजा लॉक कर दें...।" समीर राय की बेचैनी बढ़ती जा रही थी ।लोंगसरी ने आगे बढ़कर दरवाजा बंद कर दिया।

नफीसा बेगम, जल्दी-जल्दी 'आयतें' पढ़ कर हिना पर फूंके मारने लगी। हिना के हाथ-पांव धीरे-धीरे ढीले पड़ने लगे और उसकी आवाज भी धीमी होते हुए एकदम सजह व सामान्य हो गई ।वह सो गई थी या फिर बेसुध थी अब । उसे शांत-संयत देखकर समीर राय ने इत्मीनान भरा सांस लिया और बेड पर बैठ गया। उसने मां को भी बैठने का इशारा किया।

"यह क्या मामला है..?" नफीसा बेगम, हिना को निहारे जा रही थी।

कुछ समझ में नहीं आ रहा, अम्मी...।" समीर राय स्वयं उलझन में था।

मुझे लगता है...यह किसी 'ऊपरी हवा' का असर है...।" नफीसा बेगम ने अपना ख्याल जाहिर किया।

"हां, बीवी जी...।" लोंगसरी बोल उठी-"आप ठीक कह रही हैं...।

"इसे अब ताले में बंद रखना पड़ेगा...।" समीर राय चिन्तातुर लहजे में बड़बड़ाया।

लेकिन बेटा, ऐसा हम कब तक करेंगे...?" नफीसा बेगम बोली ।

'अम्मी, मैं अभी निकलता हूं। उस अरूणिमा से मिलना होगा।" समीर मां की तरफ देखते हुए बोला-"इस सिलसिले में उसकी सलाह लेनी होगी...।

"इसे जागने तो दो। पता नहीं यह उठकर क्या करे...?"नफीसा बेगम खौफजदा लहजे में बोली ।

"यह जितनी देर सोये इसे सोने देना। बस इस बात का ख्याल रखना कि यह कमरे से बाहर न जाने । पाये।

"ठीक है, बेटा जाओ! अल्लाह मालिक है।" नफीसा बोली, उसे भी तो कोई और सहारा नजर नहीं आ रहा था। उसने आगे कहा-" तुम बस जितनी जल्दी हो सके लौट आना। हां अकेले मत निकलना, अपने साथ दो बन्दे जरूर ले जाना... |"

"ठीक है, अम्मी ! आप फिक्र न करें...।' समीर राय ने दरवाजा खोला और बाहर निकल गया। उसके बाहर निकलते ही नफीसा बेगम ने दरवाजा फौरन लॉक कर लिया और बैड पर बैठकर हिना को देखने लगी ।इस वक्त वह गहरी नींद में थी और बहुत प्यारी लग रही थी। नफीसा बेगम से रहा न गया...उसने उसे झुककर प्यार किया व बेअख्तयार बोली-"खुदा तुझे ऐसी-वैसी नजरों से बचाये...।"

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अपने 'सब्ज कालीन' वाले कमरे में जब अरूणिमा गाब-तकिये लगाकर और चादर सिर पर लेकर बैठ गई तो समीर राय बोला-"मैं बहुत पेरशान हुं, अरूणिमा जी...।"

अरूणिमा ने गहरी नजरों से समीर राय का चेहरा देखा, फिर गम्भीर लहजे में पूछा-"क्या हुआ?"

समीर राय ने उस घटना का विवरण बताया..जिसने उसे परेशान कर दिया था। मैं जानती थी कि वे शैतान इस बच्ची का पीछा आसानी से नहीं छोड़ेंगे। इसीलिये मैंने उसको अकेले हवेली से न निकलने की चेतावनी दी थीं आपने अच्छा किया जो उसे बाहर जाने से रोक लिया और यह भी अच्छा किया कि फौरन मेरे पास चले आए...।" अरूणिमा ने सारी घटना सुनने के बाद कहा ।

"मुझे बस आप ही अंधेरे में रोशनी की किरण नजर आईं..मैं यहां चला आया...।'

"आप अपनी हवेली के चारों तरफ...आधा मील के क्षेत्र में उन शैतानों को तलाश करें।" वह कुछ सोचती हुई बोली-" वे हवेली के निकट ही कहीं छिपे हुए हैं और जब वे नजर आ जाएं तो मैं आपको बताऊंगी कि क्या करना है। मैं अभी आपको एक नारियल दूंगी...।" यह कह वह उठी और बाहर निकल गई ।वह तुरंत ही वापिस भी आ गई थी, उसके हाथ में एक सालिम नारियल था। उसने नारियल समीर राय के हाथ में लिया व चंद हिदायतें भी दी और फिर बोली-"अपनी बच्ची हिना की अभी आपको सख्त निगरानी करनी है। वह बस अकेली हवेली से बाहर न जाए । आपको इस बात का खास तौर पर ख्याल रखना है।

'जी...! जैसे आपने कहा... वैसा ही होगा।" समीर राय ने विश्वास दिलाया।

"बस फिर आप जाएं... । ईश्वर रखवाला है...।" यह कहकर अरूणिमा ने अपने सिर से चादर उतारी और कमरे से निकल गई

यह समीर राय के लिए रूख्सती का सिगनल था, वह नारियल को मजबूती से पकड़े कमरे से निकल आया।

समीर राय जब अपनी जीप में हवेली में दाखिल हुआ तो अंधेरा हो चका था ।वह जीप से कुद, लगभग भागता हुआ ही अपने कमरे तक पहुंचा। दरवाजा अब भी बाहर से बंद था। उसे थोड़ा इत्मीनान हुआ। उसने दरवाजे पर दस्तक दी और लोंगसरी को आवाज दी-"लोंगसरी.दरवाजा खोलो.. !"लोंगसरी ने तुरन्त दरवाजा खोला और लोंगसरी को सामान्य व शांत-संयत देख, समीर राय को और भी इत्मीनान हुआ। उसने पूछा-"हिना कैसी है..?"

"बीवी अंदर हैं...खेल रही हैं...।" उसने समीर के लिए रास्ता छोड़ते कहा ।

समीर तेजी से अंदर दाखिल हुआ। हिना बैड पर अपने खिलौने फैलाये खेल में मग्न थी। समीर ने जाते ही उसे गोद में उठा लिया और अपने सीने से लगा कर गई बार उसे चूमा। हिना अपने बाप की बांहों में झूलने लगी ।जब नफीसा व समीर राय की आंखें मिली तो नफीसा बेगम ने इशारे से पूछा-"क्या हुआ..?"समीर राय ने इशारे का जवाब इशारे में दिया-"अभी आता हूं...।"फिर वह अपनी मां को बाहर ले आया और फिर अरूणिमा से हुई सारी बातचीत उन्हें कह सुनाई। वह सब सुनते ही नफीसा बेगम चिन्तित हो उठी।

अब क्या होगा...?" वह बोली-"तुम उन 'खब्बीसों' को कैसे ढूंढोगे बेटे?"

"काम थोड़ा टेढ़ा है, लेकिन नामुमकिन नहीं... | मैं दो-दो बंदों की टोलियां बनाकर चारों तरफ फैलाये देता हूं. खुद भी जीप लेकर निकलूंगा। यह काम मैं सुबह होते ही शुरू कर दूंगा। बस अम्मी, आप इस बीच हिना का ख्याल रखना। उसे रोकने के लिए अगर पीटना भी पड़े तो अफसोस न करना ।

"तुम फिक्र करो। मैं हिना को तालों में बंद रखूगी...।"

नफीसा बेगम ने यकीन दिलाया।

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सुबह होते ही समीर ने होशियार व समझदार दो-दो बन्दों की टोलियां बनाईं और उन्हें अच्छी तरह समझाकर विभिन्न दिशाओं में रवाना कर दिया ।यह बात तो समीर राय को भी मालूम न थी कि जिन लोगों को उन्हें तलाशना है...ढूंढ निकालना है...वे किस तरह के बन्दे हैं? और वे कैसे हैं और किस शक्ल में सामने आएंगे? उसने अपने बन्दों को बस यही हिदायत दी थी कि कोई भी गैर-मामूली...असाधारण व्यक्ति नजर आए और वो अपने इलाके का न लगे...तो उसे कुछ कहा न जाये बल्कि वहां एक बन्दा उसकी निगरानी के लिए रह जाये..और दूसरा बन्दा इत्तला देने फौरन हवेली की तरफ आए।हवेली के दक्षिण की तरफ खेत थे और पश्चिम में आमों के बाग थे। आमों का मौसम नहीं था, इसलिए वे बाग आमों से खाली थे। उत्तर की तरफ आबादी थी और पश्चिम की तरफ भी खेतिहर मजदूरों की रिहाईश थी ।समीर राय ने अंदाजा लगाया कि उत्तर-दक्षिण की तरफ तो किसी बाहरी आदमी का छिपना आसान नहीं था..ऐसे किसी आदमी के फौरन ही नजर में आ जाने की सम्भावना थी। पश्चिम-दक्षिण की तरफ दूर तक फैले हुये खेते थे..और घोड़े पर बैठकर आधा मील तो क्या, एक मील तक नजर डाली जा सकती थी और छिपे हुए बन्दों को तलाश किया जा सकता था। हां, जिस क्षेत्र में बाग थे, वहां मामला जरा मुश्किल था। बाग घने थे व अन्दर हमेशा अंधेरा रहता था। यानि कि जब तक बागों में अन्दर तक जाकर एक-एक चप्पा न छाना जाये किसी को तलाश कर सकना आसान न था ।यूं तो समीर राय ने अपने बन्दे चारों तरफ रवाना कर दिये थे लेकिन आमों को वह बाग जिसमें..पेड़ों की संख्या हजारों में थी.उस बाग में ही दुश्मन का मौजूद होना, किसी हद तक यकीनी था। इस बाग में छानबीन के लिए दो टोलियां भेजी थीं।

यूं 'तलाश' अभियान शुरू हुआ था ।दोपहर तक हर तरफ से टोलियां वापिस आ गई थीं और उन्हें आधे मील के एरिये में कोई भी बाहरी या संदिग्ध व्यक्ति नजर नहीं आया था। लेकिन अभी 'हजारी बाग' की तरफ गई दोनों टोलियां वापिस नहीं आई थीं |समीर राय ने भी शक्तिशाली दूरबीन द्वार...खेतों की तरफ का मीलों तक का जायजा लिया था, फिर उसने अपनी जीप में आबादियों की तरफ चक्कर लगाए थे...लेकिन नतीजा वही निकला था जो दूसरी टोलियों ने आकर बताया था ।समीर राय को अब 'हजारी बाग' में गई टोलियों का इंतजार था ।

इसी वक्त लोंगसरी, समीर राय के कमरे में दाखिल हुई और अपनी फूली हुई सांस के बीच, बड़ी मुश्किल से बोली-“मालिक, बाहर कोई आदमी आया है...।''

आदमी का जिक्र सुनते ही वह एकदम खड़ा हो गया और तेजी से कमरे निकल गया। हवेली के बरामदे में 'हजारी बाग' जाने वाली टोली का ही एक आदमी मौजूद था। उसका नाम रहीम था ।रहीमू ने मालिक को देखा तो वह फौरन आगे बढ़ा और बड़ी बेकरारी के साथ बोला-“मालिक, जल्दी चलिये। वे लोग 'हजारी बाग' में मौजूद हैं। मैं कुन्दन को वहां छोड़ आया हूं... ।“

ठीक है। एक मिनट रूको, मैं चलता हूं...।" कहते हुए समीर पलटा ।वह अपने कमरे में आया और तांत्रिका अरूणिमा का दिया हुआ नारियल सावधानी से उठाया और उल्टे पांव ही बाहर आ गया ।उसने बरामदे में आकर रहीम को अपने साथ आने का इशारा किया ।जीप हवेली के दरवाजे पर मौजूद थी। समीर राय ने रहीमू को पीछे बैठने का इशारा किया व फिर जीप को तूफानी रफ्तार से चलाते हुए हवेली के बड़े गेट पर आया। वहां से उसने दो और सशस्त्र बन्दों को भी जीप में बैठाया और जीप 'हजारी बाग' की तरफ दौड़ा दी ।रास्ते में रहीम ने जल्दी-जल्दी जो कुछ बताया, उसका विवरण यह था कि वो और कुन्दन बाग का एक-एक चप्पा छानते हुए आगे बढ़ रहे थे कि अचानक उनकी नजर एक लम्बे-चौड़े देवकाय शख्स पर पड़ी। उनकी तरफ उसकी पीठ थी। वह एक सफेद चादर में था और उसका बदन बिल्कुल काला था। एक घन्टी उसके कंधे से लटकी हुई थी। उस देवकाय को देखकर वे दोनों एक पेड़ की आड़ में हो गए और छिपकर उसे देखने लगे।वो देवकाय शख्स थोड़ा आगे जाकर पेड़ों में गुम हो गया..लेकिन घन्टी की टन टन की आवाज आ रही थी। वे दोनों छिपते-छिपाते आखिकार उसके ठिकाने पर पहुंच गये। वहां एक काले परिधान में एक बेहद दिलकश औरत उसकी प्रतीक्षक थी। इस खूबसूरत औरत ने अपने सामने एक गुड़िया रखी हुई थी और वह आंखें बंद किये कुछ पढ़ रही थी। वो देवकाय शख्स उसके सामने जमीन पर बैठ गया। यहां भी कुन्दन व रहीम की तरफ उस देव की पीठ थी। वो औरत सामने थी...लेकिन उसकी आंखें बंद थीं।यह दृश्य देखकर रहीमू ने कुन्दन को इशारा किया कि खामोशी से पेड़ पर चढ़ जाए...और वो खुद मालिक को बुलाने जाता है ।समीर राय, जीप को आधी-तूफान की तरह दौड़ाता, 'हजारी बाग' की तरफ बढ़ रहा था। रहीमू ने उसे बता दिया था कि उन्हें किस जगह से बाग में दाखिल होना है। समीर राय ने उस जगह से पहले ही जीप छोड़ दी ताकि वे रहस्यमय लोग सतर्क न हो जाएं ।फिर वे बड़ी सावधानी के साथ बाग में दाखिल हुए। अपने सशस्त्र बन्दों को समीर ने अपने दाएं-बाए मगर थोड़े फासले पर रखा, खुद उसके पास भी रिवाल्वर मौजूद था। रहीमू इन सबसे आगे था और इनका मार्गदर्शक बना हुआ था।

थोड़ा-सा अंदर जाने के बाद रहीमू ने अपने मुंह से तीतर की आवाज निकाली। कुछेक क्षणों में ही एक पेड़ की ऊंचाई से इसका जवाब आया। रहीम ने जान लिया कि कुन्दन अपनी जगह मौजूद व सुरक्षित है...और कुन्दन ने भी जान लिया कि रहीमू मालिक को लेकर आ गया है रहीमू एक बहुत होशियार व तेज बन्दा था, वह रोशन राय के साथ प्रायः शिकार पर जाया करता था। वो तीतर घेरने का माहिर था। वो बड़ी तेजी, कुशलता के साथ तीतरों के झुन्ड के सिरों पर पहुंच जाया करता था।आज भी यही हुआ। वो समीर राय को बड़ी होशियारी के साथ उन रहस्यमय लोगों के ठिकाने पर ले गया ।कुन्दन जिस पेड़ पर बैठा हुआ था...समीर राय और रहीमू उससे भी आगे पहुंच चुके थे और अब वह औरत व काला भुजंग देव...दोनों उनके बिल्कुल सामने और नजदीक थे । यहां उन्होंने एक छोटा-सा खेमा लगाया हुआ था। वह रहस्यमयी औरत खेमे के द्वार पर बैठी हुई थी। उसकी आंखें बंद थीं और सामने एक गुड़िया रखी थी और वह देवकाय शख्स उस औरत को बड़ी एकाग्रता के साथ देख रहा था..जैसे वो औरत कोई देवी हो और वो उसकी पुजारी ।

समीर राय ने खुदा का शुक्रिया अदा किया। इन दोनों की गतिविधियां बता रही थीं कि यह वे 'खबीस' हैं, जिनकी उन्हें तलाश थी और जिनकी तरफ अरूणिमा ने इशारा किया था और ये 'खबीस' इस वक्त बड़े बेहतरीन निशाने पर थे।समीर राय एक भी पल गंवाये बिना.नारियल हाथ में लिए थोड़ा-सा झुका और वह नारियल उन दोनों की तरफ लुढ़का दिया ।और जैसा कि अरूणिमा ने कहा था, बिल्कुल वैसा ही हुआ। यह ठीक है कि समीर राय ने वर नारियल अपनी पूरी ताकत से उनकी तरफ फेंक था...लेकिन जमीन असमतल थी और साधारण स्थिति में वह नारियल जमीन पर पांच-सात फुट लुढ़ककर रूक जाता...लेकिन समीर राय यह देखकर चकित रह गया कि वह नारियल कहीं रूके बिना ही...और आश्चर्यजनक तेजी से उन दोनों की तरफ लुढ़कता चला गया ।नारियल के निकट पहुंचते ही तबूह की आंखें एकदम खुल गईं।

लेकिन वक्त इतना कम था कि कुछ कर नहीं सकती थी। नारियल में छिपी आग उसे स्पष्ट तौर पर नजर आ गई थी और फिर, इससे पहले कि वो हूरा को होशियार करती, वह नारियल पूरे वेग से हूरा की कमर से आकर टकराया। टकराते ही वह नारियल चार हिस्सों में बंट गया।और फिर समीर राय की आंखों ने जो कुछ देखा, वह उसे हैरान कर देने के लिए काफी था। नारियल फटते ही आग कुछ इस तरह फैल गई थी...जैसे वे दोनों पैट्रोल के तालाब में बैठे हों। आग उन दोनों के चारों तरफ आनन-फानन में फैल गई थी और वे दोनों ऊंचे बुलन्द शोलों में घिर गये ।फिर यह आग जिस तेजी से लगी थी, उसी तेजी से बुझ भी गई। समीर राय तेजी से दौड़ कर उस जगह पहुंचा। उसके आदमी उसके पीछे थे |अब वहां कुछ भी नहीं था ।समीर राय का ख्याल था कि उसे उनकी जली हुई चीजों के अवशेष मिलेंगे लेकिन उस जगह तो जैसे झाडू फिरी हुई थी। लगता ही नहीं था कि अब से कुछ देर पहले यहां आग लगी थी। वहां उनका जला हुआ खेमा था ना जली हुई गुड़िया। वहां कोई चीज नहीं थी ।बहरहाल, खुशी की बात थी कि वे रहस्यमय लोग जल मरे थे...जो हिना को अपनी गिरफ्त में लेने की कोशिश कर रहे थे।समीर राय खुशी-खुशी हवेली पहुंचा और अपनी मां को सारी कहानी सुना दी।

वह बोली-"अजीब वाकया है, कुछ समझ में नहीं आया। आखिर वे लोग थे कौन?'

'अल्लाह ही बेहतर जानता है कि यह सब क्या मामला है। मैं तो खुद हैरान रह गया था।" समीर राय ने हिना की तरफ देखते हुए कहा-"इस मासूम पर तो कोई असर नहीं हुआ..?" कुछ सोच पूछा था उसने ।"

हां, हुआ क्यों नहीं... । एक बार तो इसमें इतनी ताकत आ गई थी कि मुझसे हाथ छुड़ाकरदरवाजे की तरफ भागी थी। लेकिन वह तो खैर थी कि दरवाजा लॉक था..वर्ना शायद उस वक्त इसे रोकना मुश्किल हो जाता....।" नफीसा बेगम ने बताया।"

अम्मी...वहां बाग में बैठी वह 'खूबसूरत बला' कोई अमल कर रही थी। उसकी आंखे बन्द थीं व सामने कपड़े की गुड़िया रखी थी। वैसे मां, वो औरत थी बहुत दिलकश । सांवली थी..लेकिन उसके चेहरे में कोई ऐसी बात थी कि आदमी उसे देखने पर मजबूर हो जाता था...।" समीर ने बताया।

"हाय, क्या पता कोई चुडैल थी..?" नफीसा सहम गई थी।

"अम्मी जान, क्या चुडैलें इतनी खूबसूरत होती हैं..?" समीर राय ने हंसते हुए पूछा।

"मुझे क्या पता...मैंने कौन-सी चुडैले देखी हैं... | बस अब किसी भूत-चुडैल का जिक्र न करो...।“ नफीसर बेगम ने कहा व हिना को अपने आंचल में छिपा लिया।

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