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"अच्छा, महाराज...।" पुरूषोत्तम ने बड़ी सावधानी के साथ कून्डा उठाया और बहुत सम्भल-सम्भल कर बाहर निकल गया।
"देवांग बाबू..अपनी जिन्दगी में कभी ऐसा नहीं हुआ। यह आखिर हुआ क्या।" ओघड़नाथ अपनी जगह पर धम्म से बैठते हुए बोला-"यह कमीना तो 'काला' हो गया।''मैं क्या कहूं..मैं अब क्या करूं...।"
देवांग निराश हो गया-“मेरी जान तो फिर से खतरे में पड़ गई।
"नहीं, देवांग बाबू... | तुम परेशान मत होओ। अभी एक 'अमल' और है मेरे पास, लेकिन उस 'अमल' में दो-तीन दिन लगेंगे। तुम्हें मेरे पास ही रहना होगा।'
'रहुंगा...। बरहा का पता मालूम करने के लिए मैं यहां तीन महीने भी रह सकता हूं..।
''बस-बस...फिर फिक की कोई बात नहीं। तुम यहां से बरहा का पता निशाना लेकर ही जाओगे...।' ओघड़नाथ ने उसे तसल्ली दी।
पुरूषोत्तम कुछ देर बाद ही खाली कून्डा लेकर झोंपड़ी में दाखिल हुआ, बोला-"महाराज, “काले' को नदी में बहा दिया।"
अच्छा किया... | वो सत्यानाशी तो बड़ा ही कमीना निकला। देख, तूने कून्डा अच्छी तरह धोया है या नहीं..?"ओघड़नाथ ने पूछा ।
"हां, महाराज...।
"ठीक है। फिर तू जा...।
''महाराज, एक खुशी की खबर है...।"
पुरूषोत्तम जाते-जाते रूक कर बोला।
"हैं...वो क्या..?"
ओघड़नाथ उसे घूरने लगा।“
घाट में एक चिता तैयार हो रही है, महाराज... | कोई अर्थी आने वाली है...।
"अरे, वाह! यह तो वाकई खुशी की खबर है। पता किया, कौन मरा है...कोई स्त्री या मर्द?
" पता करके आया हूं, महाराज! औरत की अर्थी है...।"
पुरूषोत्तम ने अपनी चमकती हुई मुस्कान भरी आंखों से ओघड़नाथ की तरफ देखा।
"बस, बन गया काम...।" ओघड़नाथ ने देवांग की तरफ देखा-"देवांग बाबू, तुम बड़ें खुशकिस्मत हो। जिसकी जरूरत थी वह भी अविलम्ब मिल गई। अब देखता हूं कि बरहा को कोई कैसे छिपा कर रखता है... ।
"अब तो तीन दिन नहीं लगेंगे...?" देवांग ने फौरन पूछा।
"नहीं, अब काम जल्दी बन जाएगा...।" ओघड़नाथ ने जवाब दिया और फिर अपने चेले से बोला-"जब वे लोग चले जाएं तो मुझे आकर बताना..।
''जी, महाराज...।" पुरूषोत्तम ने कहा व बाहर निकल गया। उसने सीधे श्मशान घाट का रूख किया था।वो वहां पीपल के पेड़ पर चढ़कर बैठ गया।अंधेरा फैलते ही पन्द्रह-बीस लोग एक अर्थी के साथ श्मशान घाट में पहुंचे। शव चिता पर रखकर आग लगाई गई। देखते-ही-देखते चिता भड़क उठी। फिर जलती लाश की सड़ांध चारों तरफ फैलने लगी। अर्थी के साथ आने वाले चिता के पूर्णतया भड़क जाने की इंतजार में खड़े रहे, फिर वे वापिस चल दिये। उन्हें अंदाजा हो चुका था कि लाश आधी से ज्यादा जल चुकी है। यही वे क्षण थे जब शव यात्रा में आए लोग लौट जाते थे।ओघड़नाथ को ऐसी ही लाश की जरूरत रहती थी और वह अधजली लाशों के साथ जो कुछ करता था...उसे देखकर एक अच्छा-भला आदमी भी बेहोश हो सकता था ।बहरहाल, जब उस अर्थी के साथ आने वाले लोग चले गए...तो पुरूषोत्तम पेड़ से नीचे उतरा और दौड़ लगाकर ओघड़नाथ की झोंपड़ी में पहुंचा। चलिये, महाराज...।" वह अंदर आते ही बोला।
"आओ...देवांग बाबू... | हमारे साथ चलोगे या यहीं बैठोगे? तुम्हें तो मालूम है कि हम मुर्दाखोर लोग हैं। अधजली लाश का मजा ही कुछ और होता है। आओ, तुम्हें दिखायें.. |"ओघड़नाथ ने मुस्कुराते हुए कहा ।
देवांग तो अधजले मांस का सुनकर ही थर्रा गया..और वह भी एक लाश के मांस का। वह थूक निगलते बोला-"ओघड़ तुम हो आओ, मैं..मैं यहां बैठा हूं..।"
"ठीक है। तुम बैठो। थोड़ी-सी भांग और पीओ। हम थोड़ी देर में आते हैं। जय काली...।" वह यह कहकर उठा और कंधे पर एक तेज धार गंडासा रखकर झोपड़ी से निकल गया ।ओघड़नाथ के बदन पर इस वक्त एक लंगोट के सिवा और कुछ नहीं था। वो कंधे पर गंडासा रखे पुरूषोत्तम के पीछे चला जा रहा था। चारों तरफ घुप्प अंधेरा था लेकिन उन दोनों को चलने में कोई दिक्कत पेश नहीं आ रही थी। यह रास्ता उनका देखा-भाला था। सो, वे पूरे इत्मीनान से चल रहे थे।चिता अभी जल रही थीं कुछ लकड़ियां जल चुकी थी...कुछ अभी पूरी नहीं जली थीं, ओघड़नाथ ने एक लम्बी-सी लकड़ी से लाश को कुरेद कर बाहर निकाला। उसे उठाकर निकट ही बहमी नदी में धोया और गंडासे से उसके टुकड़े करके, वो अभी एक टुकड़ा अपने मुंह में रखने ही वाला था कि अचानक तेज रोशनी उसकी आंखों पर पड़ी और साथ ही कोई लोहे की चीज उसकी कनपटी से आ लगी ।यही अमल पुरूषोत्तम के साथ भी दोहराया गया। ओघड़नाथ के लिए यह बिल्कुल नया अनुभव था। पहले तो उसकी समझ में ही नहीं आया कि ये कौन लोग हैं...फिर जब उन लोगों ने समझाया तो वो समझा कि उसकी कनपटी से पिस्तौल लगी हुई है जिसका घोड़ा दबाते ही गोलियां निकल कर उसकी खोपड़ी के आर-पार हो जाएगी।“
महाराज...तुम लोग चाहते क्या हो..?"
ओघड़नाथ घिघिया कर बोला।
"ओ, खब्बीस..! खड़ा हो और हमारे साथ चल...।" आने वाले ने सख्त लहजे में कहा।
"कहां जाना है..?" ओघड़नाथ कांप उठा।
"ज्यादा दूर नहीं... | इस श्मशान घाट के एक कोने में..." आने वाले ने बताया।
"वहां क्या है..?
''वहां कोई तेरा प्रतीक्षक है...।
'"कौन महाराज...?"
"अब सारे सवाल यहीं बैठे-बैठे कर लेगा...चल उठ खब्बीस...।" पिस्तौलधारी ने उसे एक लात जमाई।
"देवांग बाबू..अपनी जिन्दगी में कभी ऐसा नहीं हुआ। यह आखिर हुआ क्या।" ओघड़नाथ अपनी जगह पर धम्म से बैठते हुए बोला-"यह कमीना तो 'काला' हो गया।''मैं क्या कहूं..मैं अब क्या करूं...।"
देवांग निराश हो गया-“मेरी जान तो फिर से खतरे में पड़ गई।
"नहीं, देवांग बाबू... | तुम परेशान मत होओ। अभी एक 'अमल' और है मेरे पास, लेकिन उस 'अमल' में दो-तीन दिन लगेंगे। तुम्हें मेरे पास ही रहना होगा।'
'रहुंगा...। बरहा का पता मालूम करने के लिए मैं यहां तीन महीने भी रह सकता हूं..।
''बस-बस...फिर फिक की कोई बात नहीं। तुम यहां से बरहा का पता निशाना लेकर ही जाओगे...।' ओघड़नाथ ने उसे तसल्ली दी।
पुरूषोत्तम कुछ देर बाद ही खाली कून्डा लेकर झोंपड़ी में दाखिल हुआ, बोला-"महाराज, “काले' को नदी में बहा दिया।"
अच्छा किया... | वो सत्यानाशी तो बड़ा ही कमीना निकला। देख, तूने कून्डा अच्छी तरह धोया है या नहीं..?"ओघड़नाथ ने पूछा ।
"हां, महाराज...।
"ठीक है। फिर तू जा...।
''महाराज, एक खुशी की खबर है...।"
पुरूषोत्तम जाते-जाते रूक कर बोला।
"हैं...वो क्या..?"
ओघड़नाथ उसे घूरने लगा।“
घाट में एक चिता तैयार हो रही है, महाराज... | कोई अर्थी आने वाली है...।
"अरे, वाह! यह तो वाकई खुशी की खबर है। पता किया, कौन मरा है...कोई स्त्री या मर्द?
" पता करके आया हूं, महाराज! औरत की अर्थी है...।"
पुरूषोत्तम ने अपनी चमकती हुई मुस्कान भरी आंखों से ओघड़नाथ की तरफ देखा।
"बस, बन गया काम...।" ओघड़नाथ ने देवांग की तरफ देखा-"देवांग बाबू, तुम बड़ें खुशकिस्मत हो। जिसकी जरूरत थी वह भी अविलम्ब मिल गई। अब देखता हूं कि बरहा को कोई कैसे छिपा कर रखता है... ।
"अब तो तीन दिन नहीं लगेंगे...?" देवांग ने फौरन पूछा।
"नहीं, अब काम जल्दी बन जाएगा...।" ओघड़नाथ ने जवाब दिया और फिर अपने चेले से बोला-"जब वे लोग चले जाएं तो मुझे आकर बताना..।
''जी, महाराज...।" पुरूषोत्तम ने कहा व बाहर निकल गया। उसने सीधे श्मशान घाट का रूख किया था।वो वहां पीपल के पेड़ पर चढ़कर बैठ गया।अंधेरा फैलते ही पन्द्रह-बीस लोग एक अर्थी के साथ श्मशान घाट में पहुंचे। शव चिता पर रखकर आग लगाई गई। देखते-ही-देखते चिता भड़क उठी। फिर जलती लाश की सड़ांध चारों तरफ फैलने लगी। अर्थी के साथ आने वाले चिता के पूर्णतया भड़क जाने की इंतजार में खड़े रहे, फिर वे वापिस चल दिये। उन्हें अंदाजा हो चुका था कि लाश आधी से ज्यादा जल चुकी है। यही वे क्षण थे जब शव यात्रा में आए लोग लौट जाते थे।ओघड़नाथ को ऐसी ही लाश की जरूरत रहती थी और वह अधजली लाशों के साथ जो कुछ करता था...उसे देखकर एक अच्छा-भला आदमी भी बेहोश हो सकता था ।बहरहाल, जब उस अर्थी के साथ आने वाले लोग चले गए...तो पुरूषोत्तम पेड़ से नीचे उतरा और दौड़ लगाकर ओघड़नाथ की झोंपड़ी में पहुंचा। चलिये, महाराज...।" वह अंदर आते ही बोला।
"आओ...देवांग बाबू... | हमारे साथ चलोगे या यहीं बैठोगे? तुम्हें तो मालूम है कि हम मुर्दाखोर लोग हैं। अधजली लाश का मजा ही कुछ और होता है। आओ, तुम्हें दिखायें.. |"ओघड़नाथ ने मुस्कुराते हुए कहा ।
देवांग तो अधजले मांस का सुनकर ही थर्रा गया..और वह भी एक लाश के मांस का। वह थूक निगलते बोला-"ओघड़ तुम हो आओ, मैं..मैं यहां बैठा हूं..।"
"ठीक है। तुम बैठो। थोड़ी-सी भांग और पीओ। हम थोड़ी देर में आते हैं। जय काली...।" वह यह कहकर उठा और कंधे पर एक तेज धार गंडासा रखकर झोपड़ी से निकल गया ।ओघड़नाथ के बदन पर इस वक्त एक लंगोट के सिवा और कुछ नहीं था। वो कंधे पर गंडासा रखे पुरूषोत्तम के पीछे चला जा रहा था। चारों तरफ घुप्प अंधेरा था लेकिन उन दोनों को चलने में कोई दिक्कत पेश नहीं आ रही थी। यह रास्ता उनका देखा-भाला था। सो, वे पूरे इत्मीनान से चल रहे थे।चिता अभी जल रही थीं कुछ लकड़ियां जल चुकी थी...कुछ अभी पूरी नहीं जली थीं, ओघड़नाथ ने एक लम्बी-सी लकड़ी से लाश को कुरेद कर बाहर निकाला। उसे उठाकर निकट ही बहमी नदी में धोया और गंडासे से उसके टुकड़े करके, वो अभी एक टुकड़ा अपने मुंह में रखने ही वाला था कि अचानक तेज रोशनी उसकी आंखों पर पड़ी और साथ ही कोई लोहे की चीज उसकी कनपटी से आ लगी ।यही अमल पुरूषोत्तम के साथ भी दोहराया गया। ओघड़नाथ के लिए यह बिल्कुल नया अनुभव था। पहले तो उसकी समझ में ही नहीं आया कि ये कौन लोग हैं...फिर जब उन लोगों ने समझाया तो वो समझा कि उसकी कनपटी से पिस्तौल लगी हुई है जिसका घोड़ा दबाते ही गोलियां निकल कर उसकी खोपड़ी के आर-पार हो जाएगी।“
महाराज...तुम लोग चाहते क्या हो..?"
ओघड़नाथ घिघिया कर बोला।
"ओ, खब्बीस..! खड़ा हो और हमारे साथ चल...।" आने वाले ने सख्त लहजे में कहा।
"कहां जाना है..?" ओघड़नाथ कांप उठा।
"ज्यादा दूर नहीं... | इस श्मशान घाट के एक कोने में..." आने वाले ने बताया।
"वहां क्या है..?
''वहां कोई तेरा प्रतीक्षक है...।
'"कौन महाराज...?"
"अब सारे सवाल यहीं बैठे-बैठे कर लेगा...चल उठ खब्बीस...।" पिस्तौलधारी ने उसे एक लात जमाई।