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Guest
"तुम्हें नहीं पता? कैसे मर्द हो? कहते हैं कि जब किसी लड़की को मर्द की हवस भरी निगाहें और वासना से कांपते हाथ छूने लग जायें, तब वह अपनी उम्र से पहले ही बड़ी हो जाती है। ऐसे ही मैं भी हो गई थी… एक अंग्रेज़ टीचर थे मेरे। उन्हें मैं पसंद थी तो अक्सर पढ़ाने के बहाने वे अपने घर बुला लिया करते थे और फिर अपनी निगाहों और हाथों से मुझे वह गंदे-गंदे स्पर्श देते थे। मुझे उनसे घिन आती थी और मैं वहां नहीं जाना चाहती थी— लेकिन मेरे घर वाले मुझे जबरन भेजते थे। वे ग़ुलाम लोग थे, मना करने की औकात ही नहीं थी… पर मुझे वह सब इतना बुरा लगता था कि मैं घर आ कर उल्टी करती थी, रोती थी… लेकिन किसी को मुझ पर तरस नहीं आता था।
अगले दिन मुझे फिर भेज दिया जाता। मेरी पढ़ाई का जिम्मा भी वही अंग्रेज लिये था तो पढ़ाई भी नहीं छुड़ाई जा सकती थी। फिर जब उस आदमी ने अपनी निगाहों और हाथों के इस्तेमाल से मुझे भोगने लायक जवान कर लिया तो मुझ पर चढ़ने लगा। मुझे उसकी वजह से मर्द ज़ात से ही नफ़रत हो गई और कोई वाकई भी मुझ पर तरस खाता था, तो मैं उस पर भरोसा नहीं कर पाती थी। कई साल यह झेलती रही मैं यह… बारहवीं तक की पढ़ाई भी हो गई, लेकिन फिर भी पीछा न छूटा उससे… फिर वह मेरे साथ नशे में मार-पीट भी करने लगा। एक दिन मुझे गुस्सा आ गया और मैंने एक पीतल का वास उसके सर पर दे मारा। वह तो मारा गया लेकिन बाद में मुझे भी पकड़ लिया गया… और जानते हो, वह लोग कितने सुअर थे।
उन्होंने मुझे कानून के हवाले नहीं किया, बल्कि ख़ुद ही एक तहखाने में बिना कपड़ों के क़ैद कर दिया… जहां मैं ठंड खाते मौत से लड़ती थी। वे मुझे कुछ खाने को भी नहीं देते थे और मेरे साथ वही सब करते थे जो वह हरामी करता था… बल्कि उससे ज्यादा वहशियाना तरीके से करते थे… और तब तक करते रहते, जब तक मैं बेहोश न हो जाती।" वह धीरे-धीरे याद करते और बातों के बीच छोटे-छोटे वक्फे लेते बोलती रही और सचिन ने बीच में कुछ इसलिये न टोका या पूछा कि उसकी लय बनी रहे।
"और फिर… होश में आने के बाद क्या होता?" जब अंतिम रूप से निशा को चुप होते देखा तो सचिन ने मुंह खोला।
"तो मैंने उन सबको मार डाला और आज़ाद हो गई… जब वे मेरे साथ दरिंदगी करते थे, तो तिल-तिल मरते मैं रोज़ भगवान से मांगती थी कि मुझे एक बार इतनी ताक़त दे दें कि मैं उन हरामजादों का वध कर सकूं… और मैंने कर दिया।"
"मतलब भगवान ने तुम्हें वह शक्ति दे दी?"
"पता नहीं… पता नहीं किसने दे दी, पर हां, मुझमें इतनी शक्ति आ तो गई कि मैं उन्हें मार सकी और वहां से आज़ाद हो सकी।"
"मतलब तुम्हें नहीं पता कि वह शक्ति तुम्हें किसने दी?"
"नहीं… मुझे जिस क़ैदखाने में डाला गया था, वहां पहले से एक काली छाया रहती थी, जो जब-तब मुझे दिखती थी और जब मैं उसके पास जाने की कोशिश करती तो ग़ायब हो जाती। जब वे दरिंदे मुझे नोचने आते तो वह रोशनदान पर जा चिपकती और वहां से देखती रहती। उसे वे लोग नहीं देख पाते, लेकिन मैं देखती थी और वह मुझे देखती थी… बस कुछ बोलती नहीं थी, न मेरी किसी बात का जवाब देती थी। फिर तीसरे दिन जब मैं भूख और कमज़ोरी से मर रही थी… तब उसने मेरे कान में हवा की तरह फुसफुसा कर कहा था कि जो तुम मांगती थी वह तुम्हें मिल गया। मुझे नहीं पता, न उसने बताया कि वह मुझे उसने दिया या भगवान ने दिया… बस उस दिन मैंने महसूस किया कि मुझे वाकई वह शक्ति मिल गई थी, जो चाहिये थी और मैंने काली की तरह उन दुष्टों का नाश कर दिया और आज़ाद हो गई।"
"और यहां कैसे आ गई?"
"भटकते हुए… मुझे भटकने का बहुत शौक है… खास कर चांदनी रातों में। मैं बस कहीं की कहीं पहुंच जाती हूँ लेकिन बस इन पहाड़ों की सीमा में ही।"
"वैसे यह बात कब की है, जब तुम्हारे साथ यह सब हुआ?"
"मुझे नहीं याद… तब अंग्रेज ही हमारे मालिक थे और वही हमारे जीने मरने के फैसले करते थे।" उसके शब्द बता रहे थे कि वह आज़ादी से पहले की बात कर रही थी।
"और तब से तुम बस ऐसे ही भटक रही हो?"
"हां… बस जिससे दोस्ती हो जाती है, उसके पास रुक जाती हूँ। जैसे निशा से हो गई तो उसके पास रुक गई… अब मुझे लगता है कि तुमसे हो गई है तो कल तुम्हारे पास रुक जाउंगी… तुम्हें मेरे रुकने से एतराज़ तो नहीं होगा?"
"क्या— नन-नहीं… मुझे क्या एतराज़ होगा। जैसा तुम्हें अच्छा लगे।"
"अच्छा, मेरा हास्टल आ गया। अब मैं चलती हूँ।"
"ज़रूर… और हां, निशा से मेरी हैलो बोलना।"
वह मुस्कराते हुए हास्टल के गेट की तरफ़ बढ़ गई और सचिन कल की तरह ही सीधे निकलता चला गया।
आज की बातों से उसे पक्का यक़ीन हो गया कि वह पर्सनैलिटी डिसऑर्डर से ही जूझ रही थी, लेकिन दो बातें समझ से परे थीं… पहली कि रात को वह किस तकनीक से उसके पास आई और फिर चली भी गई कि उसे अहसास तक न हो पाया और दूसरी कि किसी ऐसी बीमारी से पीड़ित रोगी सामान्य अवस्था में दिन के होशो हवास वाले समय में अपने मूल व्यक्तित्व में रहता है और किसी खास समय में ही दूसरी पर्सनैलिटी में शिफ्ट होता है, जो निशा के केस में रात का वक़्त होना चाहिये था क्योंकि दिन में तो उसे अपनी पढ़ाई के साथ सोशल लाईफ भी फेस करनी होती थी— लेकिन यहां उल्टा हो रहा था कि वह दिन में अपने आप में नहीं थी और रात में पूरी तरह होशोहवास में थी… ऐसा कैसे था?
बाकी बचे दिन को उसने इसी गुत्थी को सुलझाने में गुज़ारा। नेट पर भी सर्च कर के इस बारे में काफी कुछ पढ़ा, वीडियो देखे— लेकिन किसी ठोस नतीजे पर न पहुंच सका… और रात को फिर अपनी कल वाली ड्यूटी पर लग गया।
आज उसने दूर से नज़र रखने की ज़रूरत न समझी थी क्योंकि निशा से मतलब भर पहचान हो चुकी थी… तो सीधे हास्टल के पीछे ही पहुंच गया था और मैदान की तरफ़ वाले कोने से सट कर खड़ा हो गया था कि दोनों तरफ़ नज़र रख सके। धीरे-धीरे प्रतीक्षा के पल लंबे होने लगे तो सिग्रेट की तलब लगने लगी— लेकिन वहां सिग्रेट भी नहीं पी सकता था कि फिर उसे दूर से देखा जा सकता।
खड़े-खड़े घंटा भर गुज़र गया और वह उक्ताने लगा, लेकिन देवी के दर्शन न हुए… और फिर ठीक सर पर, बाउंड्री वाल के ऊपर उसे सरसराहट महसूस हुई तो सर स्वमेव ही ऊपर उठ गई।
पहले देखा था, तो ऊपर तारों भरा आकाश था, इस बार देखा तो जैसे कोई स्याह कपड़ों का गुच्छा सा था जो सर के इतने पास पहुंच चुका था कि बचना असंभव था। उसे संभालने के लिये हाथ ऊपर किये, लेकिन हाथों से किसी चीज़ का स्पर्श न हुआ— अलबत्ता ऐसा ज़रूर लगा कि उस पर भारी भरकम सी कोई अदृश्य सी चीज़ लाद दी गई हो और उसके वज़न को झेल न पाने के चलते वह भरभरा कर ढेर हो गया हो। दिमाग़ कुछ पल के लिये संज्ञाशून्य हो गया— लेकिन शरीर में पैदा हुई छटपटाहट जल्दी ही उसे फिर होश में ले आई और दम घुटता सा लगा। उसने जल्दी-जल्दी हाथ-पैर चलाये— स्पर्श तो फिर किसी चीज़ का न हुआ, लेकिन ऐसा लगा जैसे कोई चीज़ ऊपर से हट गई हो और अब वह सांस भी ले सकता है और देख भी सकता है।
लेकिन देख कर एकदम से सर चकरा गया कि वह किसी अंधेरी जगह था— अभी चंद सेकेंड पहले तो वह हास्टल की बाउंड्री के कोने से सटा खड़ा था, जहां दो तरफ़ वह दूर तक देख सकता था— लेकिन यहां तो किसी तरफ़ कुछ दिख ही नहीं रहा था और हवा में मौजूद घुटन बता रही थी कि वह कोई बंद जगह थी। ऐसा कैसे हो सकता था— यह किसी तरह संभव नहीं था… उसके शरीर के सारे रोंगटे खड़े हो गये।
फिर कान तक किसी के सिसकने की आवाज़ पहुंची तो दूसरा झटका लगा… अब यह क्या था? उसने आँखें अंधेरे में गड़ाईं— वे जब अंधेरे की थोड़ी अभ्यस्त हुईं तो एक जगह दीवार में बड़ी हल्की दरारें दिखीं। उसने जल्दी से खड़े हो कर ज़मीन टटोलते क़दम बढ़ाए और उस जगह पहुंच कर देखा— तो वह सड़ती लकड़ी का दरवाज़ा निकला, जो इतना मोटा तो था कि काफी सड़ चुकने के बाद भी बरक़रार था। अच्छी बात थी कि उसमें ताला या बाहर से सांकल नहीं लगी थी, तो वह उसे खोल कर बाहर निकल सका।
अगले दिन मुझे फिर भेज दिया जाता। मेरी पढ़ाई का जिम्मा भी वही अंग्रेज लिये था तो पढ़ाई भी नहीं छुड़ाई जा सकती थी। फिर जब उस आदमी ने अपनी निगाहों और हाथों के इस्तेमाल से मुझे भोगने लायक जवान कर लिया तो मुझ पर चढ़ने लगा। मुझे उसकी वजह से मर्द ज़ात से ही नफ़रत हो गई और कोई वाकई भी मुझ पर तरस खाता था, तो मैं उस पर भरोसा नहीं कर पाती थी। कई साल यह झेलती रही मैं यह… बारहवीं तक की पढ़ाई भी हो गई, लेकिन फिर भी पीछा न छूटा उससे… फिर वह मेरे साथ नशे में मार-पीट भी करने लगा। एक दिन मुझे गुस्सा आ गया और मैंने एक पीतल का वास उसके सर पर दे मारा। वह तो मारा गया लेकिन बाद में मुझे भी पकड़ लिया गया… और जानते हो, वह लोग कितने सुअर थे।
उन्होंने मुझे कानून के हवाले नहीं किया, बल्कि ख़ुद ही एक तहखाने में बिना कपड़ों के क़ैद कर दिया… जहां मैं ठंड खाते मौत से लड़ती थी। वे मुझे कुछ खाने को भी नहीं देते थे और मेरे साथ वही सब करते थे जो वह हरामी करता था… बल्कि उससे ज्यादा वहशियाना तरीके से करते थे… और तब तक करते रहते, जब तक मैं बेहोश न हो जाती।" वह धीरे-धीरे याद करते और बातों के बीच छोटे-छोटे वक्फे लेते बोलती रही और सचिन ने बीच में कुछ इसलिये न टोका या पूछा कि उसकी लय बनी रहे।
"और फिर… होश में आने के बाद क्या होता?" जब अंतिम रूप से निशा को चुप होते देखा तो सचिन ने मुंह खोला।
"तो मैंने उन सबको मार डाला और आज़ाद हो गई… जब वे मेरे साथ दरिंदगी करते थे, तो तिल-तिल मरते मैं रोज़ भगवान से मांगती थी कि मुझे एक बार इतनी ताक़त दे दें कि मैं उन हरामजादों का वध कर सकूं… और मैंने कर दिया।"
"मतलब भगवान ने तुम्हें वह शक्ति दे दी?"
"पता नहीं… पता नहीं किसने दे दी, पर हां, मुझमें इतनी शक्ति आ तो गई कि मैं उन्हें मार सकी और वहां से आज़ाद हो सकी।"
"मतलब तुम्हें नहीं पता कि वह शक्ति तुम्हें किसने दी?"
"नहीं… मुझे जिस क़ैदखाने में डाला गया था, वहां पहले से एक काली छाया रहती थी, जो जब-तब मुझे दिखती थी और जब मैं उसके पास जाने की कोशिश करती तो ग़ायब हो जाती। जब वे दरिंदे मुझे नोचने आते तो वह रोशनदान पर जा चिपकती और वहां से देखती रहती। उसे वे लोग नहीं देख पाते, लेकिन मैं देखती थी और वह मुझे देखती थी… बस कुछ बोलती नहीं थी, न मेरी किसी बात का जवाब देती थी। फिर तीसरे दिन जब मैं भूख और कमज़ोरी से मर रही थी… तब उसने मेरे कान में हवा की तरह फुसफुसा कर कहा था कि जो तुम मांगती थी वह तुम्हें मिल गया। मुझे नहीं पता, न उसने बताया कि वह मुझे उसने दिया या भगवान ने दिया… बस उस दिन मैंने महसूस किया कि मुझे वाकई वह शक्ति मिल गई थी, जो चाहिये थी और मैंने काली की तरह उन दुष्टों का नाश कर दिया और आज़ाद हो गई।"
"और यहां कैसे आ गई?"
"भटकते हुए… मुझे भटकने का बहुत शौक है… खास कर चांदनी रातों में। मैं बस कहीं की कहीं पहुंच जाती हूँ लेकिन बस इन पहाड़ों की सीमा में ही।"
"वैसे यह बात कब की है, जब तुम्हारे साथ यह सब हुआ?"
"मुझे नहीं याद… तब अंग्रेज ही हमारे मालिक थे और वही हमारे जीने मरने के फैसले करते थे।" उसके शब्द बता रहे थे कि वह आज़ादी से पहले की बात कर रही थी।
"और तब से तुम बस ऐसे ही भटक रही हो?"
"हां… बस जिससे दोस्ती हो जाती है, उसके पास रुक जाती हूँ। जैसे निशा से हो गई तो उसके पास रुक गई… अब मुझे लगता है कि तुमसे हो गई है तो कल तुम्हारे पास रुक जाउंगी… तुम्हें मेरे रुकने से एतराज़ तो नहीं होगा?"
"क्या— नन-नहीं… मुझे क्या एतराज़ होगा। जैसा तुम्हें अच्छा लगे।"
"अच्छा, मेरा हास्टल आ गया। अब मैं चलती हूँ।"
"ज़रूर… और हां, निशा से मेरी हैलो बोलना।"
वह मुस्कराते हुए हास्टल के गेट की तरफ़ बढ़ गई और सचिन कल की तरह ही सीधे निकलता चला गया।
आज की बातों से उसे पक्का यक़ीन हो गया कि वह पर्सनैलिटी डिसऑर्डर से ही जूझ रही थी, लेकिन दो बातें समझ से परे थीं… पहली कि रात को वह किस तकनीक से उसके पास आई और फिर चली भी गई कि उसे अहसास तक न हो पाया और दूसरी कि किसी ऐसी बीमारी से पीड़ित रोगी सामान्य अवस्था में दिन के होशो हवास वाले समय में अपने मूल व्यक्तित्व में रहता है और किसी खास समय में ही दूसरी पर्सनैलिटी में शिफ्ट होता है, जो निशा के केस में रात का वक़्त होना चाहिये था क्योंकि दिन में तो उसे अपनी पढ़ाई के साथ सोशल लाईफ भी फेस करनी होती थी— लेकिन यहां उल्टा हो रहा था कि वह दिन में अपने आप में नहीं थी और रात में पूरी तरह होशोहवास में थी… ऐसा कैसे था?
बाकी बचे दिन को उसने इसी गुत्थी को सुलझाने में गुज़ारा। नेट पर भी सर्च कर के इस बारे में काफी कुछ पढ़ा, वीडियो देखे— लेकिन किसी ठोस नतीजे पर न पहुंच सका… और रात को फिर अपनी कल वाली ड्यूटी पर लग गया।
आज उसने दूर से नज़र रखने की ज़रूरत न समझी थी क्योंकि निशा से मतलब भर पहचान हो चुकी थी… तो सीधे हास्टल के पीछे ही पहुंच गया था और मैदान की तरफ़ वाले कोने से सट कर खड़ा हो गया था कि दोनों तरफ़ नज़र रख सके। धीरे-धीरे प्रतीक्षा के पल लंबे होने लगे तो सिग्रेट की तलब लगने लगी— लेकिन वहां सिग्रेट भी नहीं पी सकता था कि फिर उसे दूर से देखा जा सकता।
खड़े-खड़े घंटा भर गुज़र गया और वह उक्ताने लगा, लेकिन देवी के दर्शन न हुए… और फिर ठीक सर पर, बाउंड्री वाल के ऊपर उसे सरसराहट महसूस हुई तो सर स्वमेव ही ऊपर उठ गई।
पहले देखा था, तो ऊपर तारों भरा आकाश था, इस बार देखा तो जैसे कोई स्याह कपड़ों का गुच्छा सा था जो सर के इतने पास पहुंच चुका था कि बचना असंभव था। उसे संभालने के लिये हाथ ऊपर किये, लेकिन हाथों से किसी चीज़ का स्पर्श न हुआ— अलबत्ता ऐसा ज़रूर लगा कि उस पर भारी भरकम सी कोई अदृश्य सी चीज़ लाद दी गई हो और उसके वज़न को झेल न पाने के चलते वह भरभरा कर ढेर हो गया हो। दिमाग़ कुछ पल के लिये संज्ञाशून्य हो गया— लेकिन शरीर में पैदा हुई छटपटाहट जल्दी ही उसे फिर होश में ले आई और दम घुटता सा लगा। उसने जल्दी-जल्दी हाथ-पैर चलाये— स्पर्श तो फिर किसी चीज़ का न हुआ, लेकिन ऐसा लगा जैसे कोई चीज़ ऊपर से हट गई हो और अब वह सांस भी ले सकता है और देख भी सकता है।
लेकिन देख कर एकदम से सर चकरा गया कि वह किसी अंधेरी जगह था— अभी चंद सेकेंड पहले तो वह हास्टल की बाउंड्री के कोने से सटा खड़ा था, जहां दो तरफ़ वह दूर तक देख सकता था— लेकिन यहां तो किसी तरफ़ कुछ दिख ही नहीं रहा था और हवा में मौजूद घुटन बता रही थी कि वह कोई बंद जगह थी। ऐसा कैसे हो सकता था— यह किसी तरह संभव नहीं था… उसके शरीर के सारे रोंगटे खड़े हो गये।
फिर कान तक किसी के सिसकने की आवाज़ पहुंची तो दूसरा झटका लगा… अब यह क्या था? उसने आँखें अंधेरे में गड़ाईं— वे जब अंधेरे की थोड़ी अभ्यस्त हुईं तो एक जगह दीवार में बड़ी हल्की दरारें दिखीं। उसने जल्दी से खड़े हो कर ज़मीन टटोलते क़दम बढ़ाए और उस जगह पहुंच कर देखा— तो वह सड़ती लकड़ी का दरवाज़ा निकला, जो इतना मोटा तो था कि काफी सड़ चुकने के बाद भी बरक़रार था। अच्छी बात थी कि उसमें ताला या बाहर से सांकल नहीं लगी थी, तो वह उसे खोल कर बाहर निकल सका।