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Horror आसुरी शक्तियां

हमने उसे आवाज़ें देते रहने को कहा— तब उसके साथ ही निकोल की भी आवाज़ आई और हमें समझ आया कि वे दोनों साथ ही थे। कुछ भूलभुलैयां से गलियारों और कक्षों से गुज़र कर हम वहां पहुंच पाये, जहां एक लोहे के दरवाज़े वाली कोठरी में दोनों बंद मिले। वे इतने सहमे और घबराये हुए थे कि आज़ादी मिलते ही रोने लगे। बाद में उस जगह से वापसी के दौरान उन्होंने बताया कि दोपहर को खाने के बाद वे भी सो गये थे और फिर रात में किसी वक़्त उनकी आँख खुली थी तो ख़ुद को उस जगह बंद पाया और तब भेड़ियों की गुर्राहटों समेत कई ऐसी आवाज़ें हो रही थीं, जैसे आसपास ढेरों ख़तरे मौजूद हों। वे इतना डर गये थे कि उन्हें आवाज़ लगाने तक की हिम्मत न पड़ी और वे ससेटे से वहीं दुबक रहे। अभी जब हमारी पुकार सुनी, तब उन्होंने प्रतिक्रिया दी।

उनकी हालत ऐसी थी कि वे उसी वक़्त वहां से भाग जाना चाहते थे— जबकि मैंने उन्हें समझाने की कोशिश की थी कि फिलहाल हमें बाहर के हालात का पता नहीं, तो बेहतर है कि वे पहले फ्रेश हो लें, कुछ खा पी लें और तब हम बाहर निकल कर देखें। बात उनकी समझ में आई… इस बीच मैंने उससे गाड़ी की चाबी के बारे में पूछा तो उसने बताया कि वह दराज में ही रहती थी— लेकिन जब वहां देखा तो चाबी नहीं थी। उन दोनों के पास भी फोन थे— लेकिन अब जब उन्होंने अपने कमरों में खोजे, तो बाकी सब सामान मौजूद था, बस फोन गायब थे।

हमें पहले से अंदाज़ा था, तो हम पर इस बात का क्या फ़र्क पड़ता— लेकिन वे बुरी तरह हताश हो गये… हमारी सलाह पर पहले उन्होंने बाथरूम का मुंह देखा, फिर किचन में आ कर खाया-पिया और आधे घंटे बाद फाईनली हम बाहर निकल पाने के लिये तैयार हो पाये।

अंदर भेड़ियों से निपटने के लिये कोई हथियार न मिला तो किचन से चाकू, एक डंडा और एक फावड़ा ही उठा लिया कि बिलकुल खाली हाथ तो न रहें।

बाहर इस वक़्त सुबह की रोशनी फैली हुई थी और दूर तक देखा जा सकता था। दूर पार्श्व में पहाड़ियां मौजूद थीं लेकिन हमारी निगाहें उस कैसल को घेरने वाली दीवार तक तक पहुंच कर थम गईं। वहां से जो गेट दिख रहा था, वह बंद था। दीवार की दशा वैसे भले ख़राब दिख रही हो, लेकिन सही-सलामत थी और इतनी ऊंची थी कि हमें अंदर रोके रखने में सफल थी। बिना किसी सीढ़ी या बड़े स्टूल के हम उसकी मुंडेर तक नहीं पहुंच सकते थे— या हमारे पास रस्सी और एंकर जैसा कुछ इंतज़ाम होता तो उसके सहारे भी दीवार पर चढ़ा जा सकता था। गेट का ऑप्शन हमारे लिये इस वजह से बेकार था कि उसमें इनबिल्ट आयरन लॉक लगा था और जिसकी चाबी हार्पर के पास ही रहती थी— जो कि दुर्भाग्य से अब मिसिंग थी।

"क्या हम वह ताला तोड़ नहीं सकते?" कॉनर ने हार्पर से पूछा।

"कैसे— वह कोई दरवाज़े में बाहर लटक रहा ताला नहीं है। गेट की चौड़ाई में ही फिक्स है कि उससे एंगल निकल कर सामने के लैंडिंग सॉकेट में फंस जाते हैं। कोई इलेक्ट्रिक कटर हो तो भले उससे काट लें— तोड़ना तो नामुमकिन है।"

"वह भेड़िये—" सहसा नैंसी चीख़ी।

हमने सिहरते हुए उधर देखा… गेट के बाईं ओर एक पेड़ के नीचे बैठे थे वे पांचों, जो अब हमें देखते खड़े हो गये थे। उनमें वह बड़ा भेड़िया नहीं था, जो कल रात दीवार से कूदा था— लेकिन वे पांचों भी काफी थे हमें फाड़ देने के लिये। हमारे पास कोई हथियार होता, तब भी हम उनका सामना करने का हौसला दिखाते… लेकिन डंडे, फावड़े और सब्ज़ी काटने वाले चाकू से भला उनका मुकाबला क्या होता। जब वे गुर्राते हुए हमारी तरफ़ बढ़े तो हमें पलट कर भागते ही बन पड़ा। नैंसी की हालत ऐसी नहीं थी कि इस तरह दौड़ सकती— तो मुझे ही उसे उठा कर कंधे पर लादना पड़ा। हालांकि इस तरह बाकियों के मुकाबले मैं धीमा तो हो गया, लेकिन नैंसी की चाल से तो फिर भी बेहतर था। वे भेड़िये आधी दूर तक ही पहुंच पाये थे कि हम कैसल के मुख्य गेट तक पहुंच गये।

फिर वे भी लॉन वाले एरिये तक पहुंच कर ठहर गये और वहीं पंजों से ज़मीन खुरंचने लगे— उनके खुले मुंहों से बहती लार उनके लंबे नुकीले दांतों को छूते घास तक पहुंच रही थी और शिकारी आँखें हम पर जमी हुई थीं। गेट पर पहुंच कर मैंने नैंसी को उतार दिया था।

हम अंदर हो गये और दरवाज़ा भिड़ा कर हांफने लगे।

"यह तो हमें ऐसे बाहर जाने भी नहीं देंगे… गेट अलग बंद है, गाड़ी की चाबी मिल भी जाये तो हमारे लिये बेकार है। दीवारों पर चढ़ने की सुविधा हमें है नहीं। हम करें तो क्या करें?" नैंसी ने दीवार से पीठ टिकाते हताश से स्वर में कहा।

"हमने पीछे की तरफ़ का एरिया नहीं देखा— उधर बाग़ है, उसके पार क्या है?" मैंने हार्पर और कॉनर को देखा।

"ऐसी ही दीवार चारों तरफ़ है— हालांकि पीछे चढ़ाई है, लेकिन उसे सीधे काट कर दीवार की शक्ल दे दी गई है। उस तरफ़ से ढलान के सहारे दीवार तक, और फिर दीवार के सहारे कूद कर अंदर तो आया जा सकता है, लेकिन अंदर से बाहर नहीं जाया जा सकता।" हार्पर ने नकारात्मक रूप से गर्दन हिलाते हुए कहा।

"दीवार पर चढ़ने का इंतज़ाम कहीं से नहीं?"

"नहीं— अमूमन कैसलों में होता है, लेकिन यहां नहीं है… और होता भी तो इन भेड़ियों के रहते हम वहां तक पहुंच नहीं सकते थे। वक़्त भी हमारे पास शायद दिन-दिन का ही है।" इस बार कॉनर ने जवाब दिया।

"और रात में फिर हमें वह सब झेलना पड़ेगा— जिसके बारे में सोच कर भी हिम्मत जवाब दे जाती है।"

"एक दिन मुझे मिस्टर ओलिवर ने बताया था कि एक रास्ता कैसल के तहखाने में मौजूद है… नीचे से एक ज़मीनी रास्ता हमें अंदर ही अंदर इस कैसल की सरहद से एकदम बाहर ले जा सकता है।" कुछ देर की खामोशी के पश्चात हार्पर ने सोचते हुए कहा।

"तुम्हें एग्जेक्टली उसके बारे में पता है?" निकोल ने पूछा।

"नहीं— पर मुझे तहखाने का रास्ता पता है और अगर हम वहां थोड़ी कोशिश करेंगे तो वह रास्ता हमें मिल सकता है।" हार्पर ने उम्मीद जताई।

"लेकिन तहखाने में—" नैंसी ने ज़ोर की झुरझुरी ली— "जैसी यह जगह है, उसे देखते तहखाने जैसी जगह जाना क्या रिस्की नहीं?"

"रात में तो वह अपनी मौत ख़ुद बुलाने जैसा हो सकता है, लेकिन दिन में ट्राई कर सकते हैं।" मैंने भी हिम्मत की यह कहने के लिये।

"फिर भी… वहां रोशनी नहीं होगी, पॉवर सप्लाई पर डिपेंड रहना पड़ेगा, जिसका हाल हम देख चुके हैं। मोबाइल से सपोर्ट मिल सकता था, पर वह हमारे पास रहने नहीं दिये गये। तो वहां देखने के लिये हम क्या करेंगे?"

"यहां कोई टॉर्च, लैंप या कैंडल वगैरह भी तो होंगी?" मैंने उन तीनों से सम्बोधित होते पूछा, जो यहां रह रहे थे।

"टॉर्च थी तो पर किचन में ही थी, जो अब नहीं दिख रही… माचिस और कैंडल अब भी मौजूद हैं।" हार्पर ने याद करते बताया।

"तो वही लो और चलो— यहां खड़े-खड़े बर्बाद करने के लिये हमारे पास वक़्त नहीं है।" इस बार मैं थोड़ा उतावला हो गया और सभी किचन की तरफ़ बढ़ लिये।

भले नैंसी के चेहरे से लग रहा था कि वह इस फैसले से खुश नहीं थी— लेकिन फिर भी अकेले उस फैसले को चुनौती देने की हालत में नहीं थी। तो हमने किचन से माचिस और मोमबत्तियां लीं और किचन से निकल कर उस ग़ैरआबाद हिस्से की तरफ़ बढ़ आये— जिधर से बकौल हार्पर, नीचे जाने का रास्ता था।

जहां निकोल और कॉनर बंद मिले थे, वहीं पास ही एक बाहर से बंद दरवाज़ा और भी मौजूद था— जिसे खोला तो नीचा जाती सीढ़ियां दिखीं, जो कुछ पायदानों के बाद अंधेरे में गुम हो रही थीं। शुरुआती सिरे पर ही स्विचबोर्ड मौजूद था— तो हमने सारे स्विच ऑन कर दिये और नीचे भरा अंधेरा रुख़्सत हो गया। हालांकि वहां भी बाकी कैसल की तरह ही बीमार सी पीली रोशनी मौजूद थी, लेकिन फिर भी सीढ़ियां नीचे तक देखी जा सकती थीं और हम ऊपर से ही देख सकते थे कि अंतिम पायदान पर कोई पड़ा था।

हमारा दिल ज़ोर से धड़का।

"कौन हो सकता है?" कॉनर के मुंह से निकला।

"मुझे तो मिस्टर ओलिवर ही लग रहे।" हार्पर ने तेज़ स्वर में कहा और हमारे रोक पाने से पहले ही वह नीचे उतरता चला गया।

हम ऊपर ही खड़े देखते रहे… वह नीचे उस मुर्दा से पड़े आदमी तक पहुंचा और उसे काउंट के रूप में पुकारते हुए हिलाया-डुलाया— फिर उसमें कोई हरकत न पा कर हमारी तरफ़ देखते निराशा से सर हिला दिया। हमें न समझ में आया कि अगर वह ओलिवर ही था तो मर कैसे सकता था। वह तो ख़ुद ही कोई खबीस रूह था। हम डरे-डरे और झिझकते हुए नीचे पहुंचे तो वह शरीर हमारी नज़र में आया।

पहचानना मुश्किल था, लेकिन अगर हार्पर निश्चित था तो हम भी कह सकते थे कि वह काउंट ओलिवर ही था। उसे जिस हाल में हमने देखा था, वहां आलरेडी उसके शरीर में खाल और हड्डियां ही बची थीं— लेकिन लाश देख कर लगता था कि उसमें जो नमी थी, वह भी सोख ली गई थी और वह लकड़ी के सूखे ठुंठ जैसा हो गया था। उसका मुंह खुला हुआ था, मसूढ़े काले पड़ कर ऊपर चढ़ चुके थे और लंबे दांत अपनी लंबाई में नज़र आ रहे थे। पथराई सी आँखें भी खुली हुई सामने देख रही थीं।

"लेकिन इन्हें हुआ क्या है… यह तो बिलकुल सूख गये हैं लकड़ी की तरह, जबकि कोई मरता भी है तो उसकी लाश गीली हो कर सड़ती है।" नैंसी ने गहरी उलझन से भरी निगाहों से मुझे देखा— लेकिन मेरे पास कोई जवाब नहीं था।

हमें पहले से समझ में नहीं आ रहा था कि जो भी हो रहा था, वह कैसे हो रहा था… और अब उस काउंट की भी लाश सामने पड़ी थी, जिसे हम उन सब बातों का ज़िम्मेदार समझ रहे थे।

27 October 2023

हमें यही नहीं समझ में आया कि अगर काउंट मर चुका था तो फिर हमें कैसल के अंदर कौन रोक रहा था… फिर कौन था इस खेल का असली सूत्रधार? कुछ देर वहीं सर खपाने के बाद जब हम आगे बढ़े तो नीचे हमें जैसे कैसल की पूरी एक मंजिल बनी मिली— जिसकी बनावट ऐसी थी कि हम जल्दी ही यह भी भूल गये कि हम आये किधर से थे… जब हमें बाहर ले जाने वाला कोई सुरंग टाईप रास्ता न मिला तो हम घबरा गये और जल्दी ही हमारा तनाव इतना बढ़ गया कि हम एक दूसरे को ब्लेम करते, एक दूसरे पर चिल्लाने लगे।

"हमें ऊपर ही रहना चाहिये था… वहां कम से कम खाने-पीने को तो था। यहां तो अगर हम फंसे रह गये तो भूखे मर जायेंगे।" थक कर एक चबूतरे पर बैठते हुए मैंने कहा।

"वहां रात भी हमें फेस करनी पड़ती और पता नहीं हमारा क्या अंजाम होता। हमारे पास एक उम्मीद थी कि हम निकल सकते हैं।" हार्पर ने अपनी झुंझलाहट प्रदर्शित की।

"मिला तो नहीं रास्ता।" नैंसी ने कटाक्ष किया।

"क्योंकि मैं पहले कभी नीचे नहीं आया… मुझे बस यही पता था कि यहां से बाहर जाने का एक रास्ता मौजूद है। मुझे तो यह भी नहीं पता था कि नीचे इतना सब बना हुआ है। मुझे लगा था कि कोई हॉल होगा, या दो-तीन कमरे होंगे… तहखाने के नाम पर और होता क्या है।"

"यार लड़ो मत… बाहर निकलने का कोई उपाय सोचो।" कॉनर ने याचना सी की।

"मिस्टर ओलिवर ने तुम्हें बताया किस परपज से होगा? था क्या उस आदमी के मन में?" मैंने हार्पर को देखा।

"अपने ग्रैंड सन को अपनी विरासत सौंपना चाहते थे और शायद सौंप कर मुक्त हो गये।" इस बार निकोल ने जवाब दिया।

"बकवास… मेरा उनसे कोई रिश्ता नहीं था। इंसान पहचानने की इतनी काबिलियत रखता हूँ मैं। मेरी दादी ने हो सकता है कि मेरे बाप को उसके जायज पति से न पैदा किया हो, लेकिन किसी अंग्रेज़ की पैदावार तो वे हर्गिज़ नहीं थे। किसी और दौर में ऐसे बचकाने दावे माने जा सकते थे, इस दौर में कोई नहीं मानेगा। काउंट को ऐसा लगा होता तो सबसे पहले वे मेरे पिता की या मेरी डीएनए टेस्टिंग करा के यह कनफर्म करते कि हम उनका ही वंश हैं। ऐसे ही कोई किसी के कहने से नहीं मान लेता— अगर मेरी दादी ने उनसे कहा भी था तो। मुझे तो वह कहानी भी फर्जी लगती है… मुझे नहीं लगता कि यह आदमी कभी इंडिया गया भी है या मेरी दादी ने इसे कभी देखा भी होगा।"

"क्या… फिर उन्होंने अपनी सारी धन-दौलत और करोड़ों की संपत्ति तुम्हारे नाम क्यों कर दी?" कॉनर ने चौंकते हुए मुझे देखा।

"जब मुझे यहां मर-खप ही जाना है तो भला किस काम की यह प्रापर्टी और यह दौलत… मुझे तो लगता है कि यह भी बस एक चारा थी मुझे यहां ला कर मेरा शिकार करने के लिये।"

"और यह शिकार किया किसने? काउंट तो ख़ुद ही मर चुके।" हार्पर ने तंज किया और मुझे कोई जवाब न सूझा।

"तुम आखिर इतने खास क्यों हो उस इंसान या ताक़त के लिये— जो इस सब तमाशों की ज़िम्मेदार है? जबकि तुम तो एक विदेशी हो और महीना भर पहले ही अमेरिका आये हो?" नैंसी का सवाल भी वही था, जो मेरे लिये ख़ुद एक पहेली था।

"नहीं जानता… ऊपरी तौर पर वही वजह नज़र आती है जो काउंट ने बताई थी, पर उस पर मेरा यक़ीन नहीं।" मैंने बेबसी से कंधे उचकाये।

कुछ देर और माथापच्ची करने के बाद हम फिर चल दिये। पहले जहां हम बाहर ले जाने वाले रास्ते को तलाश रहे थे, वहीं अब उन सीढ़ियों को ढूंढ रहे थे, जिनसे हम नीचे आये थे। बाहर शायद दोपहर हो चुकी होगी— लेकिन अंदर तो बस उन्हीं मरियल सी लाइटों का सहारा था, जो कि रात की तरह जलने-बुझने का तमाशा नहीं कर रही थीं, यही उनका बड़ा अहसान था हम पर।

आधा घंटा और भटके होंगे कि वे लाइटें मद्धम होने लगीं और हमारी सांसें अटकीं।
 
डर रोशनी जाने का नहीं था— उसके लिये मोमबत्तियां हमारे पास थीं। डर इस बात का था कि क्या रात वाला खेल शुरु हो गया? बत्तियां इस तरह जलना-बुझना विद्युत सप्लाई वालों का कारनामा तो नहीं हो सकता था, यह उनकी दिलचस्पी का क्षेत्र नहीं था। किसी फॉल्ट पर ऐसा हो सकता था, वह भी एक दो बार ही होता, फिर या लाइट आ ही जाती, या चली ही जाती। यह तो ऐसा था जैसे किसी मैकेनिज्म के सहारे इसे डिजाइन किया गया हो और कोई इंसान बैठा इसे इस तरह मैनेज कर रहा हो… लेकिन हमारे सिवा इंसान यहां था ही कौन? उसके सिवा फिर वही संभावना बचती थी, जो हमें सिहराने के लिये काफी थी।

सबके चेहरों पर बारह बज गये थे और मुंह सूख गये थे।

बत्तियां डिम होते-होते बुझ गईं तो हम सबने अपने पास मौजूद मोमबत्ती और माचिस निकाल कर हाथ में पकड़ ली।

"किसी दीवार के सहारे सट कर खड़े हो जाओ और एक बार देखो तो सही कि यह हमें क्या दिखाना चाहते हैं।" मैंने सरगोशी सी करते हुए कहा।

सबने शायद सर हिला कर सहमति दी होगी जो मैं देख पाने में असमर्थ था। हम सबसे नज़दीकी दीवार से सट कर खड़े हो गये। वहां बाहरी रोशनी पहुंचने की गुंजाइश थी नहीं— और अंदर की रोशनी जा चुकी थी। नतीजे में इतना घटाटोप अंधकार वहां काबिज था कि हाथ को हाथ नहीं सुझाई दे रहा था। मेरे पास नैंसी खड़ी थी, उसके बाद निकोल, फिर कॉनर और फिर हार्पर… सबने एक दूसरे का हाथ पकड़ रखा था। सांस अलग बेतरतीब हो रही थी और दिल अलग बेकाबू हो रहा था।

रात में बत्तियां बुझने के एक या दो मिनट बाद जल जाती थीं और उनमें एक तारतम्यता थी— बस आखिर में बच्चे के पैदा होने के समय ही देर तक जलती रही थीं। अब यह तमाशा यहां शुरु हुआ था तो देखना था कि उनका पैटर्न क्या था।

हम प्रतीक्षा करते रहे, लेकिन बत्तियां वापस जली ही नहीं… और न ही ऐसी कोई आवाज़ गूंजी, कि आसपास किसी के होने का अहसास पैदा हो। आधे घंटे तक हम वैसे ही थमे रहे और फिर ऊबने लगे।

"मुझे लगता है कि लाइट ही चली गई है… हम बेवजह डर रहे हैं। रोशनी करो।" अंततः मैंने ही उस निस्तब्धता को तोड़ा।

सबने ही शायद रोशनी के लिये माचिस संभाली होगी… पहले हमें माचिस ही जलानी थी— फ़िर मोमबत्ती जलानी थी, लेकिन जैसे ही मैंने तीली जलाई, बिलकुल ठीक सामने, बस एक फुट दूर कोई खड़ा दिखा— चेहरा वही जला और डरावना, आँखें उबल कर बाहर आ गई थीं, एक तरफ़ का मुंह कान तक फटा था और लंबे-नुकीले दांत बाहर से ही दिख रहे थे।

उसकी ख़ौफनाक आँखें मुझ पर टिकी थीं और मुंह ऐसे कांप रहा था, जैसे वह फट कर मेरा सर अपने अंदर समा लेने को आतुर हो रहा हो। चेहरा जनाना ही था, पर इतना घिनावना और डरावना था कि देखे जान सूखती थी। बड़ी मुश्किल से मैंने अपने हलक से उबल पड़ने को आतुर चीख़ रोकी थी— दिल ज़रूर किसी नन्हीं चिड़िया की तरह कांप गया था।

और ऐसा भी नहीं था कि वह नज़ारा केवल मेरे लिये ही था… आगे-पीछे सभी ने दियासलाई जलाई थी और सभी के सामने कोई न कोई मौजूद ही था। मैंने ख़ुद को चीख़ने से रोक लिया था और हार्पर ने भी इतना नियंत्रण बनाये रखा था— बाकी निकोल, कॉनर और नैंसी एकदम चीख़ पड़े थे। हार्पर का पता नहीं, पर मैं और नैंसी तो वह सब रात को फेस कर ही चुके थे— लेकिन कॉनर और निकोल के लिये शायद यह पहला इत्तेफाक था। कॉनर तो फिर किसी तरह ख़ुद को संभाल ले गया, लेकिन निकोल वहीं चकरा कर ढेर हो गई।

उन सभी प्रेत-प्रेतनियों ने जब मुंह खोले तो ऐसा लगा जैसे उनके मुंह फैलते ही चले गये हों, और वे इतने फैल गये कि हम पूरे के पूरे उनके मुंहों में समा सकते। अब हम सबकी हिम्मत जवाब दे गई और कांपती टांगों पर ही सही, पर हम भाग लिये… और भागने में भी, चूंकि अंधेरे के चलते कोई किसी को देख ही नहीं सकता था तो पता नहीं कौन किधर गया। सभी को बस अपनी ही ख़बर थी। मुसीबत इतनी ही नहीं थी— जब रोशनी ही नहीं थी और हम आँख होते हुए भी अंधे हो गये थे तो क्या पता चलता कि किधर दीवार थी और किधर रास्ता। इधर-उधर टकराते-टटोलते और गिरते-पड़ते वहां से हटे। किसी तरह बस हट ही पाये थे और एक जगह सिमट कर बैठ गये— जब पता ही नहीं था कि जाना कहां है तो जाते भी तो कहां जाते। मुझे अपनी बुजदिली पर गुस्सा आ रहा था— लेकिन यहां बहादुरी दिखाने की कोई गुंजाइश भी तो नहीं थी।

दस मिनट बाद मुझे लगा कि कोई मेरे पास है तो मेरे रोंगटे खड़े हो गये।

"यह तुम हो राज?" फिर कोई पास से फुसफुसाया तो मैंने राहत की सांस ली— मैं पहचान सकता था, वह नैंसी की आवाज़ थी।

"हां— मैं ही हूँ।" मैंने धीरे से कहा।

"कब तक ऐसे ही बैठे रहेंगे… हमें बाहर निकलना चाहिये। इनसे इतना क्यों डरना… आत्माएं ही तो हैं।"

"आत्माएं ही हैं से मतलब?"

"अरे पागल… उनका कुछ करने लायक शरीर तो कब का पीछे छूट चुका। वे ख़ुद से कुछ नहीं कर सकतीं। बस किसी को माध्यम बना कर ही दूसरे इंसान को नुकसान पहुंचा सकते हैं।"

"जैसे कल रात तुम हो गई थी।"

"हां— चलो अब रोशनी करो। हमें अंधेरा होने से पहले यहां से निकलना होगा।"

उसने हिम्मत बंधाई तो मैंने भी जी कड़ा किया और फिर से माचिस से एक तीली निकाल कर जलाई… लेकिन जलाते ही मेरे मुंह से एक तेज़ सिस्कारी निकल गई। वहां कोई नैंसी नहीं थी— बल्कि उन्हीं में से एक चुड़ैल छत से चमगादड़ की तरह पैर चिपकाए मेरे ठीक सामने उल्टी लटक रही थी। उसने मेरी मूत मारने वाली हालत देखी तो ज़ोर से कहकहा लगाते हंस पड़ी। मेरी कांपती टांगे मेरा बोझ न संभाल पाईं और मैं भरभरा कर वहीं ढेर हो गया। तीली भी गिरते ही बुझ गई और फिर अंधेरा हो गया। हंसने वाली फिर भी कहीं दूर न हटी— बल्कि ऐसा लगा जैसे वह कल रात पेड़ से टपके अजाब की तरह यहां छत से टपक कर फर्श पर फैली हो और घिसटते हुए मेरी तरफ़ बढ़ने लगी हो।

मैं खड़ा होने की कोशिश करता भाग लिया— लेकिन थोड़ी दूर जा कर ही किसी से टकरा कर फिर फैल गया। टकराने वाला भी शायद डर गया था और चीख़ पड़ा था— और उसकी चीख़ से मुझे गिरने से पहले से ही अंदाज़ा हो गया कि वह नैंसी थी। फिर उसके बदन की नर्म गर्माहट ने भी इस बात की पुष्टि करा दी।

"शश-शश— मैं हूँ राज। उठो और बस ऐसे ही बढ़ते चलो।" मैं उसे उठाते हुए बोला।

"कक-किधर बढ़ें?" वह सकपकाई सी बोली— ज़ाहिर है कि अंधेरे में कोई दिशा ही समझनी मुश्किल थी।

"ऑलराईट… रोशनी करो। सुनो— किसी तरफ़ देखने और डरने की ज़रूरत नहीं है। हार्पर— निकोल— कानर… रोशनी कर लो।" मैंने चिल्लाते हुए कहा— उस चुड़ैल की बात ने मुझे एक आइडिया तो दे ही दिया था कि उन्हें कुछ करने के लिये एक माध्यम चाहिये था।

पलट कर हार्पर और कॉनर की आवाज़ आई— फिर पहले हमसे काफी दूर दिखे हार्पर ने तीली जलाई, और फिर एक दर के पास खड़े कॉनर ने… लेकिन कॉनर के रोशनी करते ही हमें दिखा कि उसके ठीक पीठ की तरफ़ एक वैसा ही साया मौजूद था— जो शायद ऊंचा हो कर पहले ही अपना भाड़ सा मुंह फैला चुका था, लेकिन दिखा अब, जब कॉनर ने रोशनी की… और उसने कॉनर के सर को अपने जबड़े में फंसा लिया और चबाता चला गया। हम दोनों की ही चीख़ निकल गई और हार्पर उसे वार्न करने के लिये चिल्ला पड़ा था। उसी पल में कॉनर वाली तीली जैसे किसी हवा के झोंके से बुझ गई और वह अंधेरे में गुम हो गया।

मौत की दहशत ने हमें एक पल के लिये जड़ कर दिया… अभी-अभी बना कानफीडेंस एक सेकेंड में हवा हो गया।

हार्पर की जलाई रोशनी में हमें दिख गया था कि जिधर वह था, उसी तरफ़ रास्ता था— तो कांपते पैरों पर हम उधर ही भाग लिये। आधे रास्ते पहुंचे होंगे कि किसी से ठोकर खा कर हम दोनों ही फैल गये और शरीर का एक-एक जोड़ हिल गया। किसी तरह संभल कर उसे टटोला, जिससे टकराये थे— तो वह एक गर्म जनाना बदन निकला, जो निकोल का ही हो सकता था।

मैंने उसे फौरन उठा कर कंधे पर लाद लिया और नैंसी का हाथ पकड़ कर उधर ही भाग लिया, जिधर हार्पर था। हमारी आहटों से उसने भी हमारे आने का अनुमान लगा लिया था तो वहीं रुका रहा था और हमारे पहुंचते ही सरगोशी करते हुए बोला था— "इधर-इधर— मैंने रास्ता देख लिया है।"

इस बात ने और जान भर दी और हम उसके पीछे ही बढ़ने लगे। उसने कुछ दूर तो हमें कुछ मोड़ घुमाये, फिर हम सीढ़ी तक पहुंच गये।

"अब आगे सीढ़ियां हैं… संभाल के चढ़ना।"

हम आगे-पीछे ऊपर चढ़ने लगे और ऊपर हमें रोशनी का आभास मिलने लगा— जिसने हममें जोश पैदा कर दिया और हम सकुशल ऊपर पहुंच कर दरवाज़ा खोलते उस जगह से बाहर निकल आये।

"कॉनर तो रह गया।" हार्पर ने हांफते हुए मुझे देखा।

"अब उसके लिये यही कह सकते हैं कि तुम्हारी बेवकूफी का शिकार हो गया। जब तुम्हें रास्ते का कोई आइडिया ही नहीं था तो इस तरह नीचे ले जा कर फंसाने की क्या तुक थी।" मैं क्रोधित होते हुए उस पर चढ़ दौड़ा।

"मैं तो एक रास्ता ही सुझा रहा था, बचाव के लिये… मुझे क्या पता था कि नीचे किस तरह का तहखाना है।" वह झल्ला गया।

"जब पता ही नहीं था तो ज़बान बंद रखनी चाहिये थी।" मेरा ग़ुस्सा कम नहीं हो पा रहा था कि हमारे देखते-देखते कॉनर मारा गया है— यह कोई छोटी बात नहीं थी।

उसने फिर अपने बचाव में तर्क गढ़ा, लेकिन मुझे संतुष्ट न कर सका और हम ऐसे ही उलझे रहे। नैंसी इतनी दहशत खा गई थी कि उसने हस्तक्षेप करने की भी कोशिश न की, और हम चुपे तभी जब कुनमुनाते हुए निकोल होश में आ गई।

"कक-क्या हुआ?" वह हड़बड़ाते हुए उठ बैठी।

"अच्छी बात यह है कि हम उस तहखाने से बाहर आ चुके हैं और बुरी बात यह है कि वहां कॉनर मारा गया… और हम बस चार ही लोग बचे हैं।" मैंने सपाट लहजे में सच कह देना ठीक समझा और सुन कर उसके चेहरे पर मातम फैल गया।

वे दोनों पता नहीं कपल थे, या बस दोस्ती ही थी, लेकिन दोनों में बनती अच्छी थी तो एक की मौत दूसरे पर सदमे की तरह ही गुज़रनी थी।

हम वापस उस हिस्से से निकल कर रिहायश वाले हिस्से में आ गये, जो फिलहाल शांत पड़ा था।

"क्या यहां ऐसा कोई कमरा नहीं है, जो फुल पैक्ड हो— मतलब संदूक की तरह?" मैंने हार्पर से पूछा।

"करना क्या चाहते हो?" नैंसी ने प्रश्नात्मक मुद्रा में मुझे देखा।

"हम बाहर नहीं निकल सकते— यहां ख़ुद को सुरक्षित रखते इस बात का इंतज़ार तो कर ही सकते हैं कि शायद कोई हम तक पहुंच जाये। मैंने अपने फ्लैटमेट को सारी बातें व्हाट्सअप कर दी थीं और उसे कह भी दिया था कि मुझे यह सारा सिलसिला चमत्कार जैसा लग रहा है, अगर मैं अगले दो-तीन दिन तक उससे कांटैक्ट न करूं तो वह मेरी ख़बर ज़रूर ले ले। हो सकता है कि वही मुझे खोजने यहां तक आ जाये।"

"तो हमें ख़ुद को किसी कमरे में क़ैद करके सुरक्षित रखना है?" निकोल ने समझने का यत्न किया।

"हां— बस अंधेरा होने के बाद। मुझे नहीं लगता कि दिन में या रोशनी में यह अलाएं-बलाएं सक्रिय होती हैं। देखो, हमारे पास इतना खाना-पानी है कि हम दस दिन तो यहां गुज़ार ही सकते हैं। तो अगर हम दिन में इस कैसल के अंदर या बाहर, लेकिन आसपास ही रहें— तो हम किसी ख़तरे से बच सकते हैं, और रात को हम किसी कमरे में बंद हो जायें और बाहर जितना मर्ज़ी हो, यह बवाल मचाते रहें… हम अंधे-बहरे बने एक जगह सिमटे रहें।"

"ऐसा तो यहां इधर कोई कमरा नहीं— कांच वाली खिड़कियां सभी में हैं। बस ऊपर बिना ग्रिल के हैं और नीचे ग्रिल लगी है— लेकिन आत्माएं या इस तरह की ताक़तें कांच और ग्रिल से क्या रुकेंगी। हां, उस तरफ़ ज़रूर हैं ऐसे कमरे— लेकिन उधर की तो दीवारों का भी भरोसा नहीं कि कब कौन अपनी जगह छोड़ दे।" हार्पर का संकेत कैसल के उस ग़ैरआबाद हिस्से की तरफ़ था, जिधर बीती रात निकोल और कॉनर क़ैद थे।

"चलो— एक रात ऐसे ही किसी कमरे में देखते हैं रुक के। इस तरह हम कितना सर्वाइव कर सकते हैं। यह भी सामने आ जायेगा।"

"दो बज रहे हैं— अंधेरा होने के बाद हमारे लिये किचन तक आना मुश्किल होगा। क्यों न हम खाना-पीना अंधेरा होने से पहले ही कर लें।" नैंसी ने घड़ी देखते हुए कहा।

वही सही लगा… सुबह देर से पेट भरा था तो दोपहर में इतनी भूख भी नहीं थी। आराम से चार बजे तक चारों ने मिल कर खाना बनाया और खा-पी कर पांच बजे तक उस कमरे में आ सिमटे— जिसमें नैंसी का सामान ला कर रखा गया था। यह ठीक था कि कॉनर की इस तरह की मौत ने सभी के स्नायुओं पर गहरा असर डाला था— और निकोल पर उसका ज्यादा ही असर हुआ था, लेकिन जब अपनी जगह सभी जूझ रहे थे तो उस ग़म को पकड़े तो नहीं बैठे रह सकते थे।

बाहर सूरज एक पहाड़ी के पीछे बैठ गया था और आकाश पर उसकी लालिमा ही बची थी। वापसी करते परिंदों की चहचहाहट सामान्य स्थिति में एक सुहानी शाम का समां बनाती— लेकिन यहां तो अंधेरे की ओर जाते हर पल के साथ हमारा तनाव बढ़ता जा रहा था। ऐसे तो हमने नैंसी के कमरे में दुबकने से पहले कैसल के रिहाइश वाले हिस्से की सभी लाइटें जला दी थीं, लेकिन उनका कोई भरोसा नहीं था कि वे कब खेल करने लग जायें।

"तुम कैसे आई थी काउंट की सेवा में?" कुछ बात करने की गरज से मैंने निकोल से पूछा।

"कॉनर के कहने से… और वह कोई एड देख कर मिस्टर ओलिवर तक पहुंचा था, जो उन्होंने दिया था कि उन्हें कुछ दिनों के लिये दो मेल-फीमेल अटेंडेंट की ज़रूरत थी, जोन्सटाउन के पास कहीं रहने के लिये। फीमेल के लिये उसने मेरा नाम सुझा दिया था क्योंकि वह जानता था कि मुझे इस वक़्त जॉब की ज़रूरत थी।"

"ऐसी टेंपरेरी जॉब करने का मन हो गया?" नैंसी को थोड़ा आश्चर्य हुआ।

"जब इसके पीछे साल भर की सेलरी मिल रही है तो क्या बुराई है। कॉनर ने मुझे कनविंस किया था कि काउंट बस चंद दिनों के मेहमान थे, जो अपना आखिरी वक़्त अपने पुश्तैनी कैसल में बिताना चाहते थे। इसके पीछे हम साल भर की सैलरी पा सकते थे, जिससे हमारी एक साल की चिंता दूर हो सकती थी और हम थोड़े बेफिक्र हो कर अगली जॉब ढूंढ सकते थे।"

"तुम दोनों कपल थे?" मैंने पूछा।

"क्या— अगर सात-आठ बार सेक्स करने का मतलब कपल होना है तो कह सकते हैं, लेकिन वैसे हममें ऐसी कोई रिलेशनशिप नहीं थी। दोनों के अलग सपने थे और अलग गोल थे। यहां से फारिग हो कर मैं हारिसबर्ग जाने वाली थी और वह न्यूयार्क।"

"क्या बाहर की दुनिया में किसी से कम्यूनिकेट करने का हमारे पास कोई तरीका नहीं?" हार्पर ने पूछा।

"हमसे ज्यादा तो इस बात का पता तुम्हें होना चाहिये था— इस जगह को हमसे बेहतर तो तुम जानते हो। हमारे पास तो बस फोन ही थे— मेरा टूट गया और बाकियों के हटा दिये गये। अब आत्माएं क्यों फोन हटाने लगीं या हमें इस तरह कैसल में बंधक बनाने लगीं। उन्हें बहुत हुआ तो जान ही लेनी होगी न— ले लेतीं। इस तरह के खेल खेलना तो उनके बस का नहीं था। यह तो इंसानी हरकत ही है… अब अगर वह इंसान मिस्टर ओलिवर नहीं तो कौन?" मैंने हार्पर को घूर कर देखा।

"आप मुझ पर शक कर रहे हैं।" उसने फिर शिकायत सी ज़ाहिर की।

"नहीं… पर अगर कोई इंसान है भी इस तमाशे के पीछे, तो उसके बारे में तुम्हें कुछ आइडिया होना चाहिये हार्पर। हम तो इस जगह नये और अजनबी ही हैं।"

"मैं भी अजनबी ही हूँ— मैं उनके साथ पांच साल ज़रूर रहा हूँ लेकिन यह वक़्त पिट्सबर्ग में गुज़रा है। यहां साल में बस एक दो बार ही वे आते थे हफ्ता भर के लिये और साफ़-सफ़ाई करा कर चले जाते थे।"

"मतलब केयरटेकिंग के लिये यहां कोई रहता नहीं था— यह लावारिस पड़ा रहता था साल भर?" नैंसी ने आश्चर्य से हार्पर को देखा— "मुझे तो बताया था कि पीछे से इस जगह की प्रापर देखभाल होती थी। बस कायदे से साफ़-सफ़ाई साल में दो-तीन बार उनके आने पर ही होती थी।"

"वीरान तो नहीं थी— जोन्सटाउन में एक एजेंसी को देख-रेख का ज़िम्मा दे रखा है, वहां के बंगले और इस कैसल के लिये… तो ज़रूरत भर देखभाल वही करते हैं। हालांकि कैसल के मुकाबले जोन्सटाउन वाले बंगले का वे ज्यादा ख़्याल रखते हैं।"

बस ऐसे ही हम बातें करते रहे और अंधेरा घना होता गया। कैसल या वहां होते तमाशों पर ज्यादा देर बात नहीं कर सकते थे— क्योंकि उससे अवसाद पैदा हो रहा था। तो हम अलग-अलग अपनी ज़िंदगी से जुड़ी बातें बताने लगे… और तब नैंसी भी खुली कि वह क्यों अपनी पर्सनल लाईफ को लेकर ज्यादा बात नहीं करती थी। उसकी लाईफ में सबकुछ ठीक नहीं चल रहा था— माँ-बाप अलग हो चुके थे और वह पिता के साथ रहती थी, जबकि उसकी बहन माँ के साथ रहती थी और उसकी घोर कंपटीटर थी… इतनी ज्यादा कि उसने अपने शुरुआती तीन ब्वॉयफ्रेंड नैंसी के आशिक ही बनाये थे। वह नैंसी से ज्यादा खूबसूरत थी, जीनियस थी, लोगों को जल्दी इम्प्रेस कर लेती थी और इसी बात का फायदा उठाते वह उन लड़कों को शीशे में उतारने में कामयाब रही थी, जो नैंसी के लिये क़ीमती थे। अभी लास्ट वाले ने इसी तरह नैंसी से किनारा किया था और इस वजह से वह बुरी तरह फ्रस्ट्रेट हो गई थी।

हमें शक था कि बत्तियां जल-बुझ कर फिर हमारे ऊपर एक स्नायुविक दबाव बनायेंगी और हम तनाव का शिकार होंगे, तो हमने बत्तियां बुझा ही दी थीं और धीरे-धीरे अंधेरा इतना घना होता गया था कि हम बस सायों की तरह एक दूसरे को देख सकते थे। बाहर आज भी साफ़ मौसम था और चांद भले देर से निकला, पर निकल आया था— जिसकी उजली चांदनी बाहर फैली दिख रही थी। रात बढ़ने के साथ कांच पर शायद वे डरावने चेहरे फिर आ चिपकते— तो हमने खिड़कियों को पर्दे से कवर कर दिया था और एक तरह से घना अंधेरा कर के ही अपनी जगह सिमट रहे थे।

उस जगह एक डबल बेड मौजूद था— जिस पर मेरे कहने से नैंसी के साथ निकोल लेट गई थी और मैं हार्पर के साथ ही फर्श पर एक मोटा कंबल बिछा कर, तो एक लपेट कर पड़ गया था।

वक़्त बढ़ने के साथ ही अंधेरे के साथ सन्नाटा भी हावी होता गया था और बातें करते हम भी थक कर खामोश हो गये थे। अब बाहर से धीरे-धीरे ऐसी आवाज़ें और सरगोशियां उभरने लगी थीं, जैसे बाहर कई लोग मौजूद हों— चल-फिर रहे हों, आपस में बातें कर रहे हों। फिर थोड़े-थोड़े वक्फे से ऐसी आवाज़ें भी गूंजी, जैसे कोई भारी चीज़ छत से ज़मीन पर गिरी हो, या जैसे कोई चीज़ ज़मीन पर पटकी गई हो… एक बार तो इतने ज़ोर से इंसानी चीख़ भी गूंजी कि हमारे स्नायुओं को झकझोर कर रख दिया। लगा कि किसी इंसान को गिरा कर उसका गला काट डाला गया हो। हमारा शरीर थरथरा कर रह गया।

सब बातों से अप्रभावित रहते हमें सोने की कोशिश करनी थी— तय तो यही हुआ था… लेकिन अब वे आवाज़ें दिमाग़ पर ऐसा असर डाल रही थीं कि सोना तो दूर की बात थी, हम तो पूरी एकाग्रता से उन आवाज़ों को सुनने से भी ख़ुद को नहीं रोक पा रहे थे और बस सुनते हुए दहशत के मारे गठरी बने सिमटे पड़े थे।

समय का पहिया घूमता रहा— और धीरे-धीरे ग्यारह के क़रीब बज गये होंगे, जब सभी आवाज़ें शांत पड़ती गईं और ऐसा लगने लगा, जैसे वहां अब कोई बचा ही न हो। हम जानते थे कि यह बस भ्रम था— लेकिन अगर यह भ्रम कायम रहता तो हम इसी बहाने सो भी सकते थे। हमारे लिये तो बेहतर ही होता… हालांकि इस बात की उम्मीद कम ही थी।

जब पूरी तरह सन्नाटा छा गया और हम ऊंघने लगे, तब दूर कहीं एक आवाज़ गूंजी, जो सन्नाटे के चलते हवा के साथ बहती हुई हम तक चली आई। ऐसा लगा जैसे कैसल के वीरान वाले हिस्से से किसी ने हमें पुकारा हो… फिर जब दोबारा पुकारा गया तो हमें कनफर्म हुआ कि वह पुकार हमारे लिये थी और पुकारने वाला कॉनर था। इस बात ने हमारे दिमाग़ों पर ऐसी चोट पहुंचाई कि हम सभी हड़बड़ा कर उठ बैठे।

"क्या यह वाक़ई कॉनर है?" निकोल ने बेचैनी भरे स्वर में कहा।

"हमने उसे मरते देखा था।" नैंसी ने उलझन भरे अंदाज़ में कहा— कहते वक़्त उसका चेहरा मेरी तरफ़ था।

"नहीं— हमने बस एक हवा जैसी चीज़ को उसका सर अपने मुंह में लेते देखा था। फिर रोशनी ख़त्म हो गई थी।" हार्पर ने आपत्ति जताई।

"इस बात का क्या मतलब हुआ?" मैंने उसकी दिशा में देखा।

"हो सकता है कि इस बात को महसूस करके कॉनर दहशत के मारे बेहोश हो गया हो— तभी रियेक्ट न कर सका हो… वर्ना वे सब भूत-प्रेत, चुड़ैल, आत्मा, थे तो हवा ही। हवा उसके सर को कैसे चबा सकती है, जो हमने सोच लिया था।"

बात तो ठीक थी— यही बात तो मेरे पास लटकी वह प्रेतनी कह रही थी, जिसका मतलब यह था कि वे अपनी हरकतों से हमें इतना डरा सकते हैं कि हम ख़ुद ही हार्टफेल होने के चलते मर जायें— या वे एक इंसान को पजेस्ड करके उसके सहारे दूसरे इंसान को मरवा सकते हैं। ख़ुद से तो कुछ नहीं कर सकते— इस तर्क के हिसाब से तो कॉनर को भी मरा नहीं होना चाहिये… और जिस तरह अपनी सामान्य आवाज़ के साथ हमें पुकारता कैसल में ढूंढता फिर रहा था, उस हिसाब से तो उसके पजेस्ड होने की संभावना भी नहीं लगती थी।

"क्या हमें उसे देखना नहीं चाहिये… हो सकता है कि वह ठीक-ठाक हो और हम ही पागलों की तरह उसे तहखाने में छोड़ कर भाग आये।" निकोल ने बिस्तर से उठते हुए कहा।

"अभी एकदम बाहर मत जाओ… हमें पता है कि बाहर और भी बलाएं मौजूद हैं। अगर कॉनर सही सलामत भी है तो पहले देखो कि वे उसके साथ क्या बर्ताव करती हैं।" मैंने जल्दी से कहा और वह मेरे पास ही रुक गई।

बाहर कहीं दूर कॉनर हमें पुकारता फिर रहा था और हम तेज़ी से धड़कते दिल के साथ उसे नज़दीक होता महसूस कर रहे थे। हमें लग रहा था कि किसी भी पल वह डर कर चीख़ेगा— लेकिन ऐसा हुआ नहीं और वह हमारे नज़दीक आता गया। वह उस कॉरीडोर में आ कर भटकने लगा, जिसमें यह कमरा था— लेकिन कोई भी अप्रत्याशित घटना न हुई।

"अब हमें देखना चाहिये— लाईट जलाओ।" मैंने खड़े होते हुए कहा और हार्पर को संकेत किया।

स्विच बोर्ड उसी के पास था— उसने हाथ बढ़ा कर लाइट जला दी… और कमरे में प्रकाश होते ही निकोल और नैंसी के मुंह से ज़ोरदार चीख़ें निकल गईं। हम दो मर्द चीख़े तो नहीं, लेकिन सिस्कारी हमारे मुंह से भी निकल गई और दहशत की ऐसी लहर सर पर सवार हुई कि शरीर कुछ पलों के लिये लकवाग्रस्त ही हो गये।

कमरे की छत, दीवारों से वे आत्माएं अपने सबसे घिनावने और डरावने रूप में चिपकी और लटकी हुई थीं। सबके चेहरे ऐसे थे कि देखे दिल डूबता था— वे अपनी भेद डालने वाली ख़ौफनाक आँखें हम पर टिकाए थीं और उनके शरीर जो भौतिक न लग कर आभासी से लग रहे थे— अजीब अंदाज़ में कांपते-लहराते फैल रहे थे, सिमट रहे थे। वह नज़ारा धड़कनें रोक देने वाला था— अगर हमने पहली बार देखा होता तो… लेकिन सभी देख चुके थे, झेल रहे थे तो पहली प्रतिक्रिया में दहशत से भरे, जड़ होने के बाद संभल गये और झुरझुरी लेते हरकत में आ गये।

"दरवाज़ा खोलो— बाहर निकलो।" मैं चिल्लाया।

मेरी आवाज़ सुन कर बाहर कहीं भटकते कॉनर ने फिर मुझे ही पुकारा और हार्पर ने अपनी मनोदशा से उबरते हुए दरवाज़ा खोल दिया। सबसे पहले वही बाहर निकला, फिर निकोल निकल गई और फिर कांपती, लहराती नैंसी को लेकर मैं निकला। बाहर गलियारे में कॉनर मौजूद था— जो हमें कमरे से निकलते देख लपकते हुए हमारी तरफ़ बढ़ आया। इतनी राहत थी कि अभी बाहर की बत्तियां बिना नाटक किये जल रही थीं।

"तुम लोग तहखाने में मुझे छोड़ कर चले आये… मैं कब से अकेला वहां भटक रहा था। अब जा के रास्ता मिल पाया तो मैं ऊपर आ पाया।" वह निकोल को कंधों से पकड़ते शिकायती स्वर में बोला।

"तुम ठीक तो हो कॉनर?" निकोल ने उसे टटोला।

"हां, मैं ठीक हूँ— लेकिन तुम लोग अभी क्यों चीख़ी थी और इस तरह बाहर क्यों भागे?" उसने बाहर से कमरे में झांकने की कोशिश की।

"वही बलाएं मौजूद हैं अंदर… लेकिन यह अंदर कब आईं? हमें तो लगा था कि हम वहां सेफ हैं।" मैंने उलझते हुए नैंसी को देखा।

"जब वे फिजिकल यूनिट नहीं हैं तो उनके लिये कहीं आना-जाना क्या मुश्किल… किसी दरार से अंदर पहुंच गई होंगी।"

"सवाल यह है कि अब हम क्या करें— कहां जायें?" हार्पर ने चिंताजनक दृष्टि से हमें देखा।

और तभी वहां जलती बत्तियां डिम पड़ने लगीं— जैसे बस इसी की कसर रह गई हो। नैंसी वाले कमरे से निकल कर मैंने ही उसका दरवाज़ा बाहर से बंद कर दिया था— लेकिन इससे वे बलाएं अंदर तो फंसी नहीं रह जाने वाली थीं। अगर वे बंद कमरे के अंदर पहुंच सकती थीं, तो बंद कमरे से बाहर भी आ सकती थीं।

"बंद कमरे में सिमटने का फायदा नहीं— किचन में ही चलो। बाकी बची रात वहीं गुज़ारते हैं।" नैंसी ने अपनी तरफ़ से राय तो रखी, लेकिन मुझे सहमत होता कोई न दिखा।

"मुझे एक बात समझाओ… अगर यह बस हवा भर हैं और फिजिकली कुछ नहीं कर सकतीं, जैसा हम सोच रहे हैं… तो फिर यह बाहर उठा-पटक कैसे मचाये थीं? फिर यह बोल कैसे सकती हैं? आवाज़ें कैसे निकाल रही थीं?" बुझ कर ठंडी होती बत्तियों के बीच मैंने सभी के चेहरों पर दृष्टि फिराई।

"मुझे नहीं लगता कि वे कुछ नहीं कर सकतीं।" नैंसी के ही मुंह से सबसे पहले निकला।

"तो किचन में तो काफ़ी सामान भरा है, जिसका इस्तेमाल वे हमारे खिलाफ़ कर सकती हैं… मतलब आग ही लगा दें वहां, तो हम क्या कर पायेंगे। हमें किसी ऐसी खुली जगह पर चलना चाहिये, जहां उन्हें कोई सपोर्टिंग सामान न मिले, हमें नुकसान पहुंचाने के लिये। ऐसी जगह बाहर हो सकती है— या छत पर। बाहर वे भेड़िये हमें नहीं ठहरने देंगे— छत ही एक ऑप्शन बचती है। हार्पर— क्या तुम हमें छत तक ले जा सकते हो?"

"वह तो मैं भी ले जा सकता हूँ… हम दोनों ही दो-तीन बार ऊपर जा चुके हैं।" हार्पर के बजाय कॉनर बोल पड़ा।

"फिर ऊपर चलो… एक बार खुली जगह को भी आज़मा लेते हैं।" मैंने उसका कंधा थपका।
 
हालांकि बत्तियां बुझ चुकी थीं तो अंधेरा ही हावी था, लेकिन चूंकि बाहर चांदनी से भरी खिली हुई रात थी तो उसके प्रकाश का आभास हमें थोड़ा बहुत अंदर की अंधेरी जगहों पर भी देखने की सुविधा दे रहा था। कॉनर मेरा इशारा पा कर आगे बढ़ चला… जो आवाज़ें इतनी देर से शांत पड़ी हुई थीं, वे फिर होने लगीं और हमें महसूस होने लगा, जैसे हमारे आसपास ढेरों लोग मौजूद हों, जिन्हें हम देख नहीं पा रहे। हालांकि अंधेरा एक आवरण बना हुआ था हमारे बीच, लेकिन समझ हम सभी रहे थे कि अगर हम देख सकते— तो हमारे आसपास दीवारों और छतों से चिपकी वे बलाएं हमारे साथ ही हरकत कर रही होंगी। अच्छा था कि हम उन डरावनी सूरतों को देख नहीं पा रहे थे।

जिन सीढ़ियों से हम कल उतरे थे, उन्हीं से हो कर वापस ऊपर पहुंचे और फिर बजाय कॉरीडोर और बरामदे की तरफ़ बढ़ने के, उसी जगह से घूम कर तीसरे मजले की तरफ़ चढ़ने लगे। वह जिस शैली की बनावट का ढांचा था, उसमें कैसल की चौड़ाई भर ऊंची सपाट छत तो नहीं मिलनी थी— बल्कि अलग-अलग खंडों में कुछ खुली छतें मौजूद होनी चाहिये थीं, जो ढलुवां शेड से कवर न हों।

तीसरी छत तक पहुंचने के बाद भी हमें उसी जगह से घूम कर एक और सीढ़ी चढ़नी पड़ी… जिसके अंत में एक दरवाज़ा था, जो अधखुला पड़ा था और उसके बीच से बनी दरार के पार छत पर फैली चांदनी दिख रही थी। हम आखिरी सीढ़ी तक पहुंचे तो हवा में बहती एक आवाज़ भी हम तक पहुंच गई। ऐसा लगा जैसे जनानी आवाज़ में कोई लोरी के अंदाज़ में गीत गा रहा हो… यह विस्मयकारी था। अब तक हमें अजीब सी गुर्राहट भरी सरगोशियां ही सुनाई देती थीं, यह पहली बार था जब कोई स्पष्ट इंसानी आवाज़ सुनाई दे रही थी। हमारी जानकारी में वहां हमारे सिवा केवल काउंट ही था और वह भी मर चुका था।

"कौन हो सकता है?" मैंने सवालिया निगाहों से हार्पर को देखा।

"मुझे नहीं पता… हमारे सिवा यहां किसी को नहीं होना चाहिये।" हार्पर ने अनभिज्ञता से कंधे उचकाए।

"इन्हीं सब बलाओं में से कोई होगा— उन्होंने हमें ऊपर आते देखा तो ऊपर पहुंच गईं।" नैंसी ने अपने सूखते होंठों पर ज़बान फेरी।

"तो ठीक है… सामने बैठ कर ही सुनते हैं। बिना सामना किये तो छुटकारा भी नहीं।" मैंने नैंसी की पीठ थपथपाई और ख़ुद ही आगे बढ़ लिया।

पहले दरवाज़े से मैं पार हुआ, फिर मेरे पीछे वे… अब सामने ऊंची-नीची सपाट और ढलुवां, कई छतों वाला कैसल का ढांचा हमारे सामने मौजूद था और हम देख सकते थे कि उसे चारों तरफ़ से वही कुहासा घेरे हुए था, जो हमें रात को कैसल की बाहरी बाउंड्री वाल तक नहीं देखने देता था। अच्छा था कि वह ऊपर नहीं था और निखरी हुई चांदनी में हम ऊपर से पूरे कैसल के ढांचे को देख सकते थे। हम देख सकते थे कि ऊपर कहीं कोई नहीं था… सिवा एक पांच-छः साल के बच्चे के, जो इस छत से अलग मगर सामने की ही छत पर, इसी साइड की मुंडेर पर बैठा था। उसके तन पर कोई कपड़ा नहीं था और चांदनी में उसका बदन कुंदन की तरह चमक रहा था। उसके सामने ही एक बड़े आकार की बिल्ली बैठी थी और यह लोरी, जो हमने सुनी— वही बच्चा गा रहा था, और वह बिल्ली सुन रही थी।

हमारी आमद पर उनकी निमग्नता टूटी थी— और वे दोनों ही हमारी तरफ़ देखने लगे थे।

"बच्चा?" निकोल ने अचकचाते हुए हमें देखा।

"वही है शायद… हम दोनों के मेल से पैदा— लेकिन इसके बनने की स्पीड इतनी ज्यादा थी कि इसे इंसानी बच्चा माना ही नहीं जा सकता।" मैंने स्वीकार किया और नैंसी को पकड़ कर अपनी तरफ़ घुमा लिया— "बेहतर है कि तुम उसकी तरफ़ मत देखो। जानती हो न कि कल रात क्या हुआ था। यह खुली छत है— यहां हम धींगामुश्ती नहीं कर सकते।"

"वह मेरा बच्चा है।" लेकिन शायद उसे रोकने में देर हो चुकी थी— उसकी आवाज़, आँखें, चेहरा, सब बदल चुका था और उसने गुर्राते हुए जो मुझे धक्का दिया था तो मैं अपनी जगह से उछल कर सात-आठ फुट दूर आ गिरा था।

यह देख बाकी तीनों लोग भी डर कर उससे दूर छिटक गये थे और वह प्यार भरी माँ की तरह उस बच्चे को पुकारते उसकी तरफ़ बढ़ गई थी— बच्चे के पास बैठी बिल्ली ने जैसे चेतावनी जारी की, लेकिन नैंसी के क़दम न थमे। हार्पर और कॉनर मुझे संभालने बढ़े और मैं भी खड़ा हो गया। बिल्ली ने जब नैंसी को रुकते न पाया तो वह लगातार गुर्राने लगी— बच्चे ने उसे चुपाने की कोशिश की, लेकिन बिल्ली ने उसे पूरी तरह नज़रअंदाज़ कर दिया और जैसे ही नैंसी इस छत की मुंडेर को पार करके दोनों छतों के बीच वाले हिस्से में पहुंची, उसने नैंसी पर हमला कर दिया। नैंसी ने ख़ुद को बचाने के लिये हाथ-पैर चलाये लेकिन बिल्ली अविश्वसनीय गति से उस पर पंजों और दांतों से हमले करने लगी।

"उसे बचाओ… वह अपने आप में नहीं है।" मैं भी चीख़ता हुआ नैंसी की तरफ़ लपका तो मुझे देख बाकी तीनों लोग भी लपके।

उसी पल उस मासूम से दिखते बच्चे की आँखें काली पड़ गईं और चेहरा कांप कर वयस्कों जैसा हो गया— जो कि मेरे जैसा ही था। उसने किसी बड़े भेड़िये की तरह सीना फुलाते पूरी भयानकता से गुर्रा कर दिखाया और नैंसी पर छलांग लगा दी। उसका लक्ष्य नैंसी नहीं थी— बल्कि वह बिल्ली ही थी, जिसे उसने दबोच लिया और पूरी बेरहमी से उसे भंभोड़ डाला, जैसे कोई दरिंदा भंभोड़ता है। बिल्ली की गुर्राहटें उसकी कर्बनाक चीख़ों में बदल गईं और कुछ ही पलों में वह मुर्दा हो कर बच्चे के हाथ में झूल गई— जिसे अंत में उसने वहीं नीचे बनी एक बुर्जी पर पटक मारा।

जब वह बदला था और सीना फुलाते दहाड़ा था, तो हम कांप कर अपनी जगह थम गये थे और जब उसने बिल्ली को भंभोड़ा था तो हमें ख़ौफ से कांपते पीछे हटना पड़ा था। बिल्ली ने नैंसी को जख़्म पहुंचाए होंगे, लेकिन उसे शायद परवाह नहीं थी। उसने बिल्ली का काम तमाम होते ही ख़ुद को संभाला और बच्चे को पुकारते उसे अपनी बांहों में समेट लिया। उसके सीने में सिमटते बच्चे का चेहरा हमारी तरफ़ ही था और उसकी काली डरावनी आँखें हमें ही घूर रही थीं।

हम आहिस्ता-आहिस्ता पीछे हटने लगे। फिलहाल हम नैंसी की मदद करने की स्थिति में नहीं थे। ऐसी स्थिति में किसी की मदद तभी की जा सकती थी— जब वह मदद की उम्मीद करती। अभी तो हम उसके दुश्मन थे, जो उसके बच्चे को उससे दूर कर देना चाहते थे।

"यह तो हमारी चाल ही उल्टी पड़ गई— अब?" कॉनर ने धीरे से मुझे देखते हुए कहा।

"नो आइडिया— पर नैंसी को हम ऐसे छोड़ कर तो नहीं जा सकते।"

"और इस हालत में वही हमारे लिये मुसीबत बन गई तो?" निकोल ने पूछा।

"उसे हम छोड़ेंगे तो वह मारी जायेगी। वह अपने आप में नहीं है… कहीं से भी कूद गई, तो नीचे हमें ज़िंदा नहीं मिलेगी।"

पीछे हटते हम वहां पहुंच गये, जहां वह सीढ़ियों वाला दरवाज़ा था। कम से कम इतना तो हमारे हाथ में था कि स्थिति कुछ ज्यादा बिगड़ती तो हम पीछे भाग सकते थे। हां, इससे ज्यादा कर कुछ नहीं सकते थे कि मूर्खों की तरह सामने मौजूद उन माँ-बेटे को देखते रहें— जिनमें माँ अब बेटे को लेकर उसी मुंडेर पर बैठ गई थी और वही लोरी गाने लगी थी, जो इससे पहले वह बच्चा गा रहा था। बच्चे के मुकाबले नैंसी के मुंह से निकलती, भर्राहट भरी मर्दानी आवाज़ काफ़ी बेसुरी थी।

"हम पूरी रात क्या दर्शक बने ऐसे ही देखते रहेंगे?" थोड़ी देर चुप रहने के बाद जब निकोल बोली तो हम सिहर गये— कारण था कि अब उसकी आवाज़ बदल चुकी थी और उसमें भर्राहट के साथ एक गुर्राहट मौजूद थी, जो उस आवाज़ को सामान्य आवाज़ से अलग कर देती थी।

हमने चौंक कर देखा तो उसकी आँखें चढ़ी हुई थीं— जैसे पुतलियां माथे की तरफ़ चढ़ गई हों, चेहरा एकदम बदल कर खुरदरा हो गया था और नीली-नीली नसें उभर आई थीं। होंठ एकदम फट गये थे और दांतों पर एक गंदा सा आवरण चढ़ गया था— मुंह खुला था तो लार बह कर सीने तक पहुंच रही थी। मुट्ठियां भिंच गई थीं और हाथ-पैर अजीब तरह से अकड़ गये थे।

"निकोल— निकोल, होश में आओ।" कॉनर ने उसे पकड़ने की कोशिश की।

प्रतिक्रिया में उसने कॉनर के सीने पर इतने ज़ोरदार ढंग से हाथ मारा कि वह उछल कर कम से कम दस फुट दूर जा कर गिरा— और वह अकड़े-अकड़े, फर्श पर पैर पटकती ऐसे नैंसी की तरफ़ बढ़ने लगी, जैसे अब उससे अपना वक़्त बर्बाद करने का हिसाब चुका लेना चाहती हो। न उसे रोकने की मुझमें हिम्मत पैदा हुई, न हार्पर में— हम लाचारी, बेचारगी से उसे आगे बढ़ते देखते रहे। नैंसी ने ज़रूर प्रतिक्रिया दी थी और निकोल को देखते ऐसे गुर्राने लगी थी, जैसे रुक जाने की चेतावनी दे रही हो— लेकिन निकोल रुकने के मूड में नहीं थी।

हमने तरस खाने वाली दृष्टि से कॉनर को देखा तो वह फर्श की ओर मुंह किये दोनों हाथों के बल उठ रहा था। जैसे ही निकोल उस तक पहुंची, उसने निकोल का पैर पकड़ लिया और निकोल ने उसे छुड़ाने की कोशिश में पैर झटका तो ख़ुद ही फर्श पर पहुंच गई और अब कॉनर ही एकदम वहशी भेड़िये सा गुर्राते उस पर चढ़ बैठा। उसकी काया भी अब बदल चुकी थी और न आँखें ही वह रही थीं न चेहरा ही… चेहरा जैसे बुरी तरह खरोंच दिया गया था और आँखें सफेद हो गई थीं, जो हम दूर से भी देख सकते थे। अब दोनों एक ही हाल में थे और ऐसे भिड़े हुए थे जैसे दो दुश्मन भेड़िये आ भिड़े हों। उनकी उठा-पटक से छत ऐसे हिल रही थी, जैसे वहां आपस में दो हाथी भिड़े पड़े हों।

सामान्य अवस्था में निकोल का कॉनर से कोई मुकाबला नहीं था, लेकिन इस वक़्त वह उससे कम नहीं साबित हो रही थी। फिर भी— कॉनर मर्द था, शारीरिक शक्ति में उससे कहीं ज्यादा था। थोड़ी देर बाद हावी हो गया और निकोल को बेरहमी से पीटने लगा— यह तय था कि इस तरह की मार झेलने के बाद निकोल सामान्य होने के बाद भी बिस्तर से नहीं हिल पाने वाली थी… और हम बीच में हस्तक्षेप करने की कोई हैसियत ही नहीं रखते थे। ऐसी कोशिश में हमारा हाल उससे बुरा होता। हम बस बेबसी से अपने सामने वह सब होते देख ही सकते थे। जो नैंसी पहले निकोल को अपनी तरफ़ बढ़ते देख गुर्राने लगी थी— वह उसे कॉनर से भिड़े देख अब फिर उस बच्चे के सर को सहलाते अपनी भद्दी, बेसुरी आवाज़ में लोरी सुनाने लगी थी और वह बच्चा अपनी काली आँखों से हमें घूर रहा था… या शायद बस मुझे।

अचानक निकोल की चीख़ पर मेरा ध्यान नैंसी और बच्चे से हट कर उधर गया— और तब समझ में आया कि कॉनर ने निकोल को ऊपर से नीचे फेंक दिया था और अब ख़ुद मुंडेर से झांकते नीचे देख रहा था। मैंने महसूस किया कि मेरे कान तक एक सरगोशी पहुंची हो— च च… जैसे किसी ने मुझ पर तरस खाया हो। मैंने चौंक कर बच्चे की तरफ़ देखा तो उसके होंठों पर मुस्कराहट आते महसूस की और एक सर्द सी लहर मेरी रीढ़ से गुज़र गई।

"भाड़ में जाओ।" अचानक हार्पर बड़बड़ाया और पलट कर सीढ़ियों पर भाग लिया।

अब वहां या वह शैतानी बच्चा था, या फिर वे दो लोग जो अपने आप में नहीं थे। मैं उनका अगला शिकार हो सकता था। भले अब मेरी टांगें कांपने लगी थीं, लेकिन मैं वहां रुकने की हालत में नहीं था— तो मैं भी हार्पर के पीछे भाग लिया। अंधेरे में सीढ़ियां उतरते हर सीढ़ी पर यही लगता था कि मेरी कांपती टांगें मेरे बदन का बोझ नहीं संभाल पायेंगी और मैं ढह जाउंगा— लेकिन किसी तरह बस ख़ुद को गिरने से बचाये था।

सीढियां ख़त्म हुईं तो पता चला कि नीचे की बत्तियां फिर जल चुकी थीं। अच्छा ही था कि ऐसी बुरी मानसिक अवस्था में अंधेरे से नहीं जूझना पड़ा और आगे की दो और सीढ़ियां तय करते मैं नीचे पहुंच गया। हार्पर पता नहीं किधर निकल गया था— वह मुझे नज़र नहीं आया। मैंने फ़िर नैंसी वाले उसी कमरे में शरण ली, जिससे हम भागे थे। इस वक़्त वहां कोई अला-बला नहीं थी और कमरा शांत पड़ा था। यह मुश्किल से आधे से पौने घंटे के बीच हुआ तमाशा था, जिसने शरीर के साथ दिमाग़ को इतना थका दिया था कि अब कुछ सोचने तक का दिल नहीं कर रहा था। आज के हादसे से एक बात और समझ में आ गई थी कि यहां अपने सिवा किसी की फ़िक्र करने का कोई मतलब नहीं था… बस जब तक हम नार्मल थे, तब तक अपनी ही फ़िक्र कर लेते, उतना ही बहुत था।
 
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