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Horror भूत बंगला

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भूत बंगला

चैप्टर १: लन्दन,UK

“नह्ह्हीईईईईईईईइ ………………………..”पूरे कमरे में उसकी चीख गूँज उठी.

“उफ्फ्फ…… फिर वोही सपना, आखिर क्यों आता है मुझे यह डरावना सपना बार बार.”

रात के बारह बज रहे थे. वो बिस्तर से उठा और बेसिन पे लडखडाते कदमो से जा पंहुचा. चेहरे पे ठन्डे पानी के छींटे मार कर उसे कुछ सुकून मिला. वो बाहर अपार्टमेन्ट की बालकोनी में आ गया. सामने का नज़ारा बहुत सुन्दर था.

लन्दन दुनिया के सबसे बड़े शहरो में आता है और ज़ाहिर सी बात है की आधी रात में भी लन्दन में चहल पहल रहती है. लन्दन रात में भी उतना ही व्यस्त रहता है जितना दिन में.

थोड़ी देर वही खड़े रहने के बाद जब उसे ठण्ड लगने लगी तो वो भारी कदमो से वापस अपने बेडरूम में आ गया. रात ज्यादा हो गयी थी, येही सोच कर वो वापस सो गया. यह अजीब सपने उसे बचपन से आते थे, पर अब तो उसे जैसे इसकी आदत हो गयी थी.

टर्र्र्रन्न्न टर्र्र्रन्न्न

उसके मोबाइल में अलार्म बज उठा.

“हे शीट! आज पापा ने ऑफिस बुलाया है, अगर में लेट हो गया तो वो मुझे कच्छा चबा जायेंगे.” वो तपाक से बिस्तर से उठा और जल्दी जल्दी अपना सुबह का रूटीन करने लगा. फिर भी निकलते निकलते उसे देरी हो ही गयी.

“माय गोड आज तो पापा के गुस्से का सामना करना ही पड़ेगा.” वो जल्दी से अपना अपार्टमेन्ट लोक करके गेराज से अपनी कार निकलते हुए सोचने लगा. तेज़ रफ़्तार से गाड़ी भगाते हुए उसे जल्दी पापा के ऑफिस पहुचना था.

खैर लेट ही सही वो ऑफिस पहुँच ही गया. अपने पापा के केबिन में पहुच कर वो सामने कुर्सी पर बैठ गया, उसे लगा की आज तो उसे डांट पड़ने वाली है क्यूंकि उसके पापा काम के मामले में बहुत सख्त थे.

“आखिर साहबजादे आ ही गए!!! करण तुम्हे तो पता ही है की हमारा बिज़नस कितना घाटे में जा रहा है फिर भी तुम लेट आ रहे हो ऑफिस में.”

“आई ऍम सॉरी डैड….अब से लेट नहीं करूँगा.”

“ह्म्म्म….यू बेटर कीप दट इन मंद सन. मेरे पास तुम्हारे लिए एक काम है.” करण के पापा ने गंभीर होके कहा.

“या सॉर डैड बताइए क्या काम है ?”

“अक्चुली तुम्हे इंडिया जाना पड़ेगा.”

“क्यों डैड ऐसा क्या काम आ गया की आप मुझे लन्दन से इंडिया जाने को बोल रहे है.”

“कोई और चोइस नहीं है बेटे, यह लो फाइल इसमें सब डिटेल्स है, पढ़ लो और तैयार हो जाओ इंडिया जाने के लिए, एंड रेमेम्बेर इट्स ओउर लास्ट चांस अगर यह मौका हमारे हाथ से निकल गया तो हमारे बिज़नस को बहुत लोस होगा.” करण अपने पापा के हाथो से फाइल लेके केबिन से निकल गया.

 
“ना जाने ऐसा क्या काम है की डैड मुझे व्यक्तिगत रूप से इंडिया भेज रहे है, पर ज़रूर काफी जरुरी होगा नहीं तो यह काम हमारे इंडिया के अजेंट्स ही कर देते.”

करण एक सुन्दर, स्मार्ट और होशियार नौजवान लड़का था, उसकी उम्र यही कोई 24-25 साल होगी, रंग गोरा, हलकी नीली आँखे और बाल भी लम्बे रखे थे उसने, हाईट भी अछि खासी थी, वैसे वो कोई बॉडी बिल्डर तो नहीं था पर जिम जाने से उसकी स्लिम बॉडी परफेक्ट शेप में थी. उसके लूक्स होलीवूड हीरो ब्रेडेली कूपर से कम नहीं थी. बहुत सी लडकिया गयी पर कोई भी उसका दिल नहीं जीत सकी.

उसके पापा मिस्टर. यशवंत मल्होत्रा का लन्दन में रियल एस्टेट का बड़ा बिज़नस था. वो कांट्रेक्ट बेसिस पे घरो को बिल्डर्स से लेके पब्लिक को बेचते थे. पर कुछ सालो से उन्हें बिज़नस में बहुत लोस हो रहा था और अब तो हालत यह थी की उनके पास लन्दन में कोई फ्लेट्स बचे ही नहीं थे. यह सब का असली गुनाहगार उनका दामाद यानि करण का जीजा अजीत था.

खैर अपने बिज़नस को बचने के लिए यशवंत ने इंडिया में उसके 20 साल पहले खरीदे हुए बंगले को बेचने की सोची ताकि कुछ प्रोफिट हो सके.

करण फाइल खोल के बंगले की डिटेल्स पढने लगा.

“हम्म्म्म……..तो यह बंगला राजस्थान के जोधपुर शहर के बाहरी इलाके में बना हुआ है, और इसमें लिखा है की आस पास के लोग कहते है की यहाँ भूत प्रेतों का डेरा है…….ह्म्म्म….

करण फाइल बंद कर के सोचने लगा,“What the ****…….आज के जमाने में भी लोगो को भूत प्रेत पे विश्वास है, होना हो यह अजीत का ही कोई गन्दा चाल है ताकि लोग डर के मारे हमारा बंगला नहीं खरीदे और हमे बिज़नस में ऐसे ही लोस होता रहे.”

“खैर अब जब डैड ने कह ही दिया है तो इंडिया जाना ही पड़ेगा.”

अगले ही दिन करण अपना सामान पैक कर के तैयार हो गया इंडिया जाने के लिए.

 
चैप्टर 2: जोधपुर, राजस्थान (इंडिया)

वो सीधा फलाईट से जोधपुर इंटरनेशनल एअरपोर्ट पे उतरा. बाहर निकलते ही उसे सामने उसके डैड की कंपनी का अधिकारी दिखाई पड़ा.

“हेल्लो सर जी … वेलकम टू जोधपुर, में इज मनोहर लाल फरोम पास का गाँव … एंड आई वर्क फॉर यौर फादर.” मनोहर ने देहाती स्टाइल में टूटी फूटी अंग्रेजी बोलनी चाही.

“कोई बात नहीं मनोहर तुम मुझसे हिंदी में बात कर सकते हो.” करण मनोहर के बोलने के ढंग पे मुस्कुरा उठा.

“का करे सर हमको तो लगा था की आप बीदेस में रहते है तो बिदेसी भाषा ही बोलत होंगे.” मनोहर ने करण का सामान उठा कर कार की डिक्की में रख diya.

“अरे कोई ज़रूरी थोड़े ही है की जो विदेश में रहे वो इंग्लिश ही बोले.” हँसता हुआ करण कार में बैठ गया और अपने मंजिल की तरफ बढ़ चला.

पूरे रास्ते भर मनोहर चपड़ चपड़ बोलता रहा जिसे करण एक कान से सुन कर दुसरे कान से निकाल देता था. मनोहर एक हंसमुख मिज़ाज का आदमी था, उसकी उम्र यहीं कोई 35 40 होगी.

जोधपुर में करण पहली बार आया था और यहाँ की संस्कृति देख कर उसका मन मोहित हो गया. राजसी ठाठ बाट और राजपूतो का आन बान और शान पूरे शहर में दिखाई दे रहा था. वहां ढेरो सारे विदेशी टूरिस्ट भी दिखाई दे रहे थे

“दिस प्लेस हज गोट ए ग्रेट potiantal इन टूरिस्म……..यदि हम यह बंगला न बेच कर इसे हाई प्रोफाइल होटल के रूप में डेवेलोपे करे तो ज्यादा प्रोफिट हो सकता है.” करण सोचने लगा, तभी उसे बंगले के बारे में उडी अफवाए याद आ गयी.

“मनोहर मैं कुछ पूछु तुमसे ?”

“अरे हा हा सर, अब आपकी जिम्मेदारी म्हारी है, जो पूछना है पूछिए.” मनोहर खिल खिलाता हुआ बोला और गाड़ी चलाने लगा.

“मेने इस बंगले के बारे में सुना है की यहाँ भूत प्रेत का वास है.”

“अब कौन जाने सर इस्मा कितना सच है सरजी, पर मन्ने तो कई बार लोगो से यह भूत प्रेत के बारे में सुन रखा है.”

करण कुछ ना बोला और गाडी चलती रही जब तक जोधपुर का बाहरी इलाका ना आ गया. लोग कम ही दिखाई दे रहे थे यहाँ और वो भी अपने राजस्थानी लिबास में थे, शायद गाँव वाले थे.

करण को सामने एक बहुत बड़ा, पुराने ज़माने का बंगला दिखाई दिया.

 
चैप्टर 3- बंगला

कार बंगले के सामने जा के रुकी. करण कार से उतरा, तो पीछे से कुछ लोगो की भीड़ जाती हुई दिखाई दी.

“यह कौन लोग है मनोहर ?”

“पता नहीं सरजी, माहरे को नहीं पता, लगता है कौनो के अर्थी जा रही है...”

“अर्थी…?”

तभी उस भीड़ में से एक आदमी निकला और इन दोनों की तरफ आने लगा.

“आप इस बंगले के मालिक है न ?” उसने करण से सवाल किया.

“हा मेरे पिताजी ने यह बंगला बहुत पहले खरीदा था.”

करण की बात सुनते ही न जाने उस आदमी को क्या हो गया, जिस आँखों में आंसू थे उसमे अंगारे आ गए. उसने करण को धक्का देते हुए उसका कॉलर पकड़ लिया.

“थारे वजह से आज म्हारा भाई जिन्दा नहीं है….मन्ने कहे रहो मालिक से की ये बंगला श्रापित है.” उसने करण का गला पकड़ लिया.

मनोहर ने जैसे तैसे करके उस आदमी को अलग किया पर जाते जाते उस आदमी ने चीख के करण को बोला, “चले जाओ अगर अपनी जान प्यारी हो तो चले जाओ वर्ना मरोगे सब के सब……….थारी जान ले लेगा वो...”

गर्दन छूटते ही करण को खांसी आ गयी. उस आदमी ने सच मुच उसका दम ही निकल दिया था.

थोडा सांस लेते हुए उसने मनोहर से पुछा, “ये...यह सब क्या है मनोहर…..कौन था यह आदमी ?”

मनोहर ने करण को पानी देते हुए कहा, “सर जी इसका नाम भुवन है, ये और इसका भाई दोनों इस बंगले के चौकीदार थे. यह दोनों कहते थे की इस बंगले में भूत है. दो हफ्ते पहले एक रात को इसका भाई अकेले चौकीदारी कर रहा था, और अगली सुबह उसकी लाश यही जहाँ आप खड़े है वहीँ मिली.”

 
मनोहर की बात सुन कर करण झट से उस जगह से हट गया. “क्या अंधविश्वास है इन लोगो के मन में….हुह!” उसने थोडा रेलक्स किया और अभी अभी जो हुआ उसके बारे में सोचने लगा.

उसने सामने बंगले को देखा. बंगला आलिशान था. एक बड़ा सा दरवाज़ा था उसके सामने जैसे हर पुराने राजस्थानी घरो में होता था. बंगले के चारो तरफ गार्डन्स थे जिनमे भिन्न भिन्न प्रकार के फूल खिले थे.

करण ने सामने बंगले का नाम प्लेट पढ़ा, “चौहान विल्ला”

“अरे इसपे तो हमारा नाम यानी ‘मल्होत्रा विल्ला’ होना चाहिए, खैर इसे में बदलवा दूंगा.” उसने मन में सोचा.

“अरे मनोहर मेरा सामान बंगले में रखवा दो और आज से तुम भी मेरे साथ यही इस बंगले में रहोगे जब तक मैं न सोच लू की हमे इस बंगले के साथ क्या करना है.”

“बिलकुल सर जी, आपका हुकुम म्हारे सर आँखों पर.” मनोहर करण का सब सामान बंगले के अन्दर ले गया.

बंगला बहुत ही भव्य था, बहुत से कमरे थे उसके अन्दर. छत पर बड़ा सा झालर था. दीवारों पर राजा महाराजाओ की पेंटिंग्स थी, ज़मीन पे नक्काशी की हुई कालीन थी. सच में लग रहा था जैसे इसे किसी बहुत अमीर आदमी ने बनवाया होगा.

बंगले की भव्यता के बावजूद किसी को भी उसमे मनहूसियत का एहसास हो सकता था. आलिशान होने के बावजूद हरचीज़ बेजान लग रही थी जैसे किसि से बहुत डरी सहमी हो.

अनजानी शान्ति फैली हुई थी बंगले के अन्दर. मौत का मंज़र था उस बंगले में .

“मेरा सामान यह सामने वाले कमरे में रख दो और कुछ खाने का इंतज़ाम करवाओ .”

मनोहर उसका सामान एक कमरा खोल के रख दिया और बोला, “सर जी म्हारे को एक बहुत बढ़िया ढाबे के बारे में पता है वहीँ चलते है खाने के लिए.”

“आई होप इट विल बी गुड…….चलो चलते है.”

मनोहर बहार जाके कार स्टार्ट करने लगा पर करण अभी भी बंगले को अन्दर से देख रहा था.

अचानक उसके कानो में पानी गिरने की हल्की सी आवाज़ आई, जैसे कोई नहा रहा हो. पहले तो उसे लगा की उसके कान बज रहे है पर जब उसे लगा की वाकई में कही से पानी गिरने की आवाज़ आ रही है तो उसे ज़रा अजीब सा लगा क्यूंकि अभी अभी तो मनोहर ने बंगले का ताला खोला था तो उसमे कोई कैसे नहा सकता है.

आवाज़ अभी भी आ रही थी, करण के कान खड़े हो गए, वो आवाज़ की दिशा में ऊपर वाली मंजिल की और बढ़ने लगा. जो आवाज़ हल्की थी वो अब तेज़ होती जा रही थी. उसने एक कमरा खोला जिसमे एक अटेच्ड बाथरूम था. पानी गिरने की आवाज़ अब स्पष्ट सुनाई दे रही थी और उसी बाथरूम से आ रही थी.

करण ने कांपते हाथो से बाथरूम का दरवाज़ा खोला और अन्दर झाँका …………. पर उसे हैरत तब हुई जब उसने देखा की बाथरूम के सारे नल बंद है और कही भी पानी नहीं है. चारो और शान्ति थी और अब वो आवाज़ भी बंद हो गयी थी.

“कहीं यह मेरा वहम तो नहीं! ……….. नहीं नहीं मेने पानी गिरने की आवाज़ साफ़ साफ़ सुनी थी.”

पर फिर उसे लगा की शायद थोड़ी देर पहले बंगले के बहार हुई घटना से उसका दिमाग घूम गया है ……………. पर तभी उसके नाक में साबुन की खुशबू भर गयी. उसने देखा की न तो वहां कोई है

और न ही वहां कोई साबुन है, पूरा बाथरूम खाली था. जब उसे फिर साबुन की खुसबू आई तो उसे कुछ समझ नहीं आया की वहां क्या हो रहा है ………………. उसके बदन में डर की एक तेज़ लहर दौड़ गयी.

वो तेज़ी से बाथरूम से भागा ….. उस रूम से भागा ….. सीढियों से नीचे भागा……..दरवाज़ा खोल के पूरे बंगले से भागा …… और भागता ही रहा जब तक वो कार तक नहीं पहुँच गया जहाँ मनोहर उसका इंतज़ार कर रहा था.

“क्या हुआ सर जी ……. थारे माथे पे पसीना ?”

“कुछ नहीं मनोहर वो गर्मी है ना इसलिए, तुम कार स्टार्ट करो कुछ खा के आते है.” करण को अभी जो कुछ हुआ उसे बिलकुल विश्वास नहीं हो रहा था. उसके हाथ पैर अभी भी कांप रहे थे. वो बदहवास सा पीछे वाली सीट पर बैठा था.

 
चैप्टर 4: ढाबा

वो दोनों ढाबे तक पहुच गए. मनोहर ने करण को खोया खोया देखा तो उस से रहा नहीं गया, “क्या हुआ सर जी,आप परेशान लग रहे है ?”

“कहा ना मनोहर ऐसी कोई बात नहीं है.” करण ने खीज के कहा.

मनोहर चुप हो गया. वेटर टेबल पे दाल फ्राई और नान ले आया. दोनों खाने लगे. बहार कोई हंगामा हो रहा था जिसपे करण का ध्यान गया. उसने देखने की कोशिस की तो एक ब्रह्मण ढाबा के सामने भिख्सा मांग रहा था.

“निकालो इस भिखारी को यहाँ से, अपने बाप का माल समझ रखा है जो रोज़ यहाँ खाना मांगने चला आता है.” ढाबे के मालिक ने उस ब्रह्मण को धक्का दे दिया.

करण ने ऐसा कुछ लन्दन में नहीं देखा था. उसे उस ब्रह्मण पे दया आ गयी.

वो दोनों खाना खा के उठ गए थे. वो बाहर कार तक आये तो देखा वो ब्राह्मन अभी भी वहीँ था.

“तुम आ गए …………….. ” उस ब्राह्मन ने करण से कहा. उसके चेहरे पर एक चमक सी आ गयी थी, वो उसको ऐसे देख रहा जैसे उसे बरसो से जानता हो.

“आप मुझे जानते है बाबा ?” करण ने विनम्रता से उस ब्राह्मन से कहा.

“अरे हट हट, जा यहाँ से …… भीख मांगने के लिए हमारे सर जी ही मिले थे क्या.” मनोहर ने उस ब्राह्मन को डांट के दूर किया.

“बाबा ये लो कुछ पैसे, ये आपके काम आयेंगे.” करण ने उस ब्रह्मण को पैसे थमाने चाहे पर उसने अपना हाथ वापस खीच लिया.

“नहीं बेटा मुझे भीख नहीं चाहिए,बस मुझे तो ख़ुशी है की तू आ गया नहीं तो ‘उसे’ ना जाने और कितना दर्द सहना पड़ता.” कहते हुए वो ब्रह्मण अपनी पोटली उठाने लगा.

“आप कौन है बाबा ? आप मुझे कैसे जानते है ? और मुझे आपकी बातें मुझे कुछ समझ में नहीं आई.” करण कहता ही रहा पर वो ब्रह्मण नहीं रुका और अपने राह चल दिया.

मनोहर ने कार का दरवाज़ा खोलते हुए कहा, “आप फ़िक्र मत करिए सर जी, यह ज़रूर कोई ढोंगी होगा, आप तो विदेश में रहते है ना इसलिए आप इसे जान नहीं पाए.”

करण की समझ में कुछ नहीं आ रहा था. वो कार में बैठ के बंगले की तरफ चल दिया. उसकी परवरिश विदेशी स्कूल में हुई थी जो हर चीज़ में वैज्ञानिक वजह खोजने की कोशिश करते थे.

पर जो सवाल करण के दिमाग में उठ रहे थे, जो उसके साथ आज हुआ था उसका जवाब तो शायद किसी के पास नहीं थे, यहाँ तक की विज्ञान के पास भी नहीं

 
चैप्टर 5: बंगले का इतिहास

शाम ढल चुकी थी. करण का सामान ठीक ठाक कमरे में रखने और कुछ ज़रूरी काम करने में उनका पूरा दिन बीत गया.

“उफ्फ्फ .…काम तो सब हो गया मनोहर, अब आराम कर लेते है.” वो सोफे पे बैठ गया.

“मैं एक बात कहूँ सर जी.” मनोहर ने कहा

“हां बोलो मनोहर.”

“सर जी आप विदेश में तो बहुत सी अंग्रेजी दारु पीते होंगे पर में आपको अपने तरफ से आज रात एक देसी राजस्थानी दारु पिलाना चाहता हु.”

“ठीक है मनोहर ले आओ जो लाना है, वैसे भी आज मेरा सर घूम रहा है दिन की घटनाओं से.”

“तो फिर ठीक है सर जी मैं अभी लेके आता हूँ.” मनोहर ख़ुशी मन से बाहर चला गया दारु लाने.

मनोहर के जाते ही करण बंगले में अकेला हो गया. वो इधर उधर देख के मन ही मन बंगले की तारीफ़ कर रहा था. उसे ख़ुशी हुई की उसके पापा ने यह खूबसूरत बंगला खरीदा.

फिर अचानक उसे दिन की घटनाएं याद आ गयी.

“मेरी समझ में कुछ नहीं आ रहा, सुबह उस भुवन नाम के आदमी ने मेरी गर्दन पकड़ ली और अपने भाई के मौत का जिम्मेदार मुझे बताने लगा, और तो और मुझे चेतावनी देने लगा की मुझे इस बंगले से दूर चले जाना चाहिए.”

“फिर ऊपर वाले कमरे के बाथरूम से पानी गिरने की आवाज़ आने लगी जबकि वहां कोई नहीं था, ऊपर से साबुन की महक भी आ रही थी जैसे कोई नहा रहा हो जबकि वहा कोई साबुन नहीं था, इन्फक्ट पूरा बाथरूम खाली था.”

“दोपहर को ढाबे पे खाने के बाद वो अजीबो गरीब ब्रह्मण मिल गया जो मुझ से ऐसे बात कर रहा था जैसे मुझे सालो से जानता हो. और वो कोई दर्द-वर्द की बातें भी कर रहा था. मनोहर तो बोल रहा था की वो ढोंगी है, पर मुझे नहीं लगता, क्यूंकि अगर वो ढोंगी होता तो मुझसे पैसे ज़रूर लेता पर वो बिना पैसे लिए ही चला गया.”

करण अपने ही ख्यालों के उधेड़-बुन में खोया हुआ था की उसे मनोहर आता हुआ दिखाई दिया.

“यह लो सर जी यह है म्हारे देश की देसी दारु, पी के देखो सारी अंग्रेजी दारु भूल जाओगे.” मनोहर करण के पास आके बैठते हुए बोला.

उसके हाथ में चार-पांच दारु की बोतलें थी. उसने एक खोलके करण को दी.

“ओह वाऊ ! यह तो कडवी है.” करण मुह बनाता हुआ बोला.

“थारे को पसंद नहीं आई ?”

“अरे नहीं नहीं बढ़िया है.” करण करता भी क्या, उसे यहाँ देशी दारु ही मिलने वाली थी.

 

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