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Horror रहस्यमयी कथाएँ complete

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अध्याय १३ काला जादू

भारतीय संस्कृति के प्रतिनिधित्व करने वाले साहित्य चारो वेद, अट्ठारहों महापुराण, अट्ठारहों उप पुराण, छ: शास्त्रों और उपनिषदों के अलावा चौंसठ विद्याये भी हैं और उन्हीं विद्याओं में एक विद्या है - काली विद्या । जिसे प्रचलित भाषा में काला जादू कहा जाता है। काला जादू का भारत के बाद अफ्रीका में अधिक विस्तार है। अफ्रीका में काला जादू बिभिन्न रूपों में पाया जाता है, लेकिन भारत में उसका सिर्फ एक ही राज है - जिसे पूर्ण मौलिक कहा जा सकता है। प्रस्तुत जो अविश्वसनीय और चमत्कार पूर्ण कहानी मैं आपको सुनाने जा रहा हूँ, वह काला जादू के अपने मौलिक रूप से ही सम्बन्धित है। काला जादू के काले कारनामों के विषय में मैने बहुत कुछ सुन रखा था और बहुत कुछ पढ़ भी रखा था, लेकिन कभी मुझे उसका अविश्वसनीय चमत्कार भी जीवन में देखने को मिलेगा...यह कभी सपने में भी नहीं सोचा था मैंने । सन् १९५४ ई. । उन दिनों मेरे मित्र थे, मि. सैमसन । मि. सैमसन थे तो अंग्रेज, लेकिन नाम मात्र के — भारतीयता उनकी नस-नस में भरी हुई थी । तंत्र-मंत्र में उनकी गहरी रूचि थी। उन्होंने उसका खूब अध्ययन भी किया था। इसलिए कभी-कदा मौका मिलने पर मुझसे तंत्र-मंत्र और जादू-टोना के विषयों पर गम्भीर चर्चा भी किया करते थे वह ।

एक बार विभागीय कार्य से पूर्वी सीमान्त प्रदेश की यात्रा करनी पड़ी। मि. सैमसन भी मेरे साथ थे। मैं जिस गांव में ठहरा हुआ था - उसकी आबादी पन्द्रह-सोलह सौ के लगभग थी। जिनमें अधिकतर खासी जाति के हरिजन थे। जिसका मुख्य धंधा था शराब बनाना और घूम-घूम कर बेचना।। गांव का नाम था सेमड़ापूड़ी। जिसके चारों ओर आसाम का घनघोर जंगल था और उस जंगल के भीतर से निकलकर एक पतली सी नदी वहती हुई वर्मा की सीमा के करीब किसी घाटी में जाकर बिलीन हो गई थी। उस जंगली नदी का नाम था - ऋषि कुल्पा । जिसके किनारे बसा था सेमड़ापूड़ी। गांव के बाहर नदी के तट पर एक छोटा सा पुराना मन्दिर था । मन्दिर के भीतर किसी देवी-देवता की मूर्ति नहीं थी। उसकी जगह छोटा-सा ताखा था, जिस पर सिन्दूर की गहरी पर्ते जमी हुई थी। बाद में पता चला, कि वह मन्दिर काली का स्थान है और वह बहुत जागृत है, हर तरह की मनोकामना उस स्थान पर पूरी होती है। जब सैमसन साहब को ये सारी बातें मालूम हई तो वे अपना अधिक से अधिक समय काली के स्थान पर ही बिताने लगे। उन्हें उस स्थान पर कभीकदा विचित्र अनुभूति होती थी। जिसे वह स्पष्ट रूप से बतला नहीं पाते थे।

खासियों का एक मुखिया था। जिसका नाम था साबजू । साबजू की उम्र साठ के ऊपर थी, लेकिन उसका काला जिस्म काफी गठीला और मजबूत था । मुखिया के अलावा वह काली के थान का पुजारी भी था। इसलिए उस समाज में उसका दोहरा प्रभाव था। सावज को तीन सन्ताने थी। एक लड़का और दो लड़कियाँ । लड़का सबसे बड़ा था और उसका नाम

था टेनेजू। टेनेजू बीस-बाइस साल का युवक था । बाप की तरह उसका रंग भी काला था, लेकिन उसके शरीर का गठन और नाक-नक्शा विशेष रूप से आकर्षक था । जब कभी वह चन्दनी रात में ऋषि,

कुल्पा के किनारे एकान्त में बैठकर आसामी बिरह गीत सुरीले स्वर में गाता - उस समय गांव की नवयुवतियाँ अपने-अपने बिस्तरों पर बेचैनी से करवटें बदलने लग जाती। इतना ही नहीं, उनके सीने की धड़कन बढ़ जाती। गांब में टेनेजू को चाहने बाली कुमारी बालाओं और युबतियों की कमी न थी। मगर टेनेजू प्यार करता था, सांबली से । वह हमेशा उसी की मोहक कल्पना में डूबा रहता था। कभी-कभी उसी की याद में वह ऋषि कुल्पा के किनारे रात की खामोशी में गीत भी गाया करता था। ये सब कुछ जानते समझते हुए भी वे बलायें, वे नव युवतियाँ बेबस थी। जब वे अपने सामने उस सजीले जवान को देखती, तो बस देखती ही रह जाती। सेमड़ापूड़ी से लगभग पचास-साठ मील पूरब की ओर एक गांव था लाल पहाड़ी। सांबली उसी गांव के सरदार हरख की इकलौती लड़की थी। सेमड़ापूड़ी में सांबली के मामा की शादी हुई थी। एक बार सांबली अपने पिता के साथ मामा के ससुराल आयी हुई थी। उस समय उसकी उम्र तेरह-चौदह साल से ज्यादान थी। उसके रूप-सौन्दर्य का क्या कहना ? इकहरी देह, गोरा रंग, कजरारी आँखे, पतली नाक, गुलाबी होंठ और काले धुंघराले बाल, सांबली के आते ही उसके रूप सौन्दर्य की गमक पूरे गांव में फैल गयी। हरख अगर अपने गांव और अपनी जाति बिरादरी का सरदार था तो सावजू भी उससे कम न था। इसलिए दोनों की दोस्ती होते देर न लगी। जातीय प्रथा के अनुसार दोनों ने हड़िया बदल कर पी। हड़िया, यानि शराब – खासी जाति में हड़िया बदलकर पीने का मतलब है- पकी दोस्ती । उन्हें स्थायी रखने के लिए यथा सम्भव दोनों परिवारों में वैवाहिक सम्बन्ध । जिस समय दो सरदार हड़िया बदलकर पी रहे थे, उसी समय नदी के किनारे टेनेजू और सांबली प्रेम के अथाह सागर में डूबे हुए थे । सांबली की जैतून की शाख की तरह कोमल उंगलियाँ टेनेजू के बालों से खेल रही थीं औरटेनेजू के हाथ फिसल रहे थे सांबली की पीठ और कमर पर। टेनेज़ और सांबली दोनों पहली ही नजर में एक-दूसरे को अपना दिल दे बैठे थे। टेनेज सांबली के रूप जाल में उलझा हुआ था - जबकि सांवली उसके बलिष्ठ शरीर के प्रति बुरी तरह आकर्षित थी। एक को रूप की प्यास थी, तो दूसरे को प्रबल पौरूष की। जब सांबली और टेनेज के प्रेम-प्रसंग का पता दोनों सरदारों को चला, तो तुरन्त दोनों की शादी पक्की कर दी गयी और इस सिलसिले में उस रात खूब खुशियाँ मनाई गयी । नाच-गाने हुए और गोश्त व शराब की दावत दी गयी पूरे गांव वालों को । जाति प्रथा के अनुसार सावजू ने अपने भाबी समधी को कुछ रूपये और पच्चीस हड़िये दिये और उसी के साथ अगले साल शादी का दिन भी निश्चित हो गया। अपने प्रेमी और होने वाले भावी पति की याद दिल में संजोये सांवली चली गयी वापस अपने घर। उसके जाते ही टेनेजू बिह्वल हो उठा। उसकी मानसिक स्थिति पागलों सी हो गयी-सांबली की यादों में खोया-खोया सा रहने लगा वह हर समय । उस गांव में विवाह की परम्परा विचित्र थी। लड़के के माता-पिता विवाह पक्का हो जाने पर लड़की के माँ-बाप को एक निश्चित अवधि के भीतर खास रकम दिया करते थे। वह न मिलने पर लड़की का बिवाह उसके माँ-बाप अन्यत्र तय कर देते थे। साबजू समय पर रकम का इन्तजाम न कर सका । निर्धारित धनराशि, निश्चित समय पर हरखू को

जब नहीं मिली, तो उसने सांबली का बिबाह एक दूसरी जगह तय कर दिया नाराज होकर । टेनेज की मानसिक स्थिति - प्रेमिका के वियोग में पहले से ही खराब थी, फिर जब उसे यह सुचना मिली कि सांबली का विवाह कहीं और हो रहा है तो, उसका खून खौल उठा एकबारगी। सेमड़ापूड़ी से लगभग ५०-६० मील की दूरी पर एक गांव गोल भूजा था। गोलभूजा में एक

आदिवासी तांत्रिक रहता था, जिसे लोग राठू प्रजापति के नाम से जानते थे। राठू प्रजापति को कई प्रकार की चमत्कारी सिद्धियाँ प्राप्त थीं। वह अपने काले जादू के बल पर मनचाहा काम कर सकता था । उसके पास सभी प्रकार की समस्याओं का समाधान था। मि. सैमसन न जाने कैसे उसके नाम से पहले से ही परिचित थे। उस इलाके में पहुँचने के दूसरे ही दिन मि. सैमसन मुझे अपने साथ लेकर

राठू प्रजापति से मिलने गोल भूजा गये । मैंने देखा - राठू प्रजापति का ब्यक्तित्व तो बिल्कुल साधारण था, लेकिन उसकी उल्लू जैसी आँखो में

एक विचित्र-सी चमक थी। लगता था वह इन्सानी आँखे नहीं, बल्कि किसी विषधर सर्प की आँखे हो। काला रंग, नाटा कद, गठीली देह । कुश और झाड़ की तरह रूखे, खड़े-खड़े सिर के बाल । उम्र यही पचास-पचपन के लगभग ।

राठू प्रजापति की झोपड़ी के सामने जब मैं पहुँचा, उस समय वह बाहर बैठकर बड़े इत्मीनान से हड़िया पी रहा था और उसके सामने ताजी कटी हुई काले रंग की एक मुर्गी पड़ी हुई थी। जिसका ताजा खून कच्चे फर्श पर फैला था। निश्चय ही वह कोई भयानक तांत्रिक क्रिया कर रहा था। हम दोनों को देखकर उठ खड़ा हुआ राठू प्रजापति । फिर जब उसे यह मालूम हुआ कि मि. सैमसन उसके नाम से परिचित है और उससे मिलने के लिए आये हुए हैं, तो उसने तुरन्त झोपड़ी के भीतर खाट बिछाकर बड़े आदर से हम दोनों का स्वागत किया। मैंने देखा - झोपड़ी के भीतर काफी जगह थी। एक ओर जमीन पर एक छोटा-सा तख्त लगा था। जिस पर रंग-बिरंगे कपड़ों में लिपटे कई गड़े पड़े थे। जिनके सभी अंग तो इंसानों जैसे थे, मगर चेहरे विभिन्न प्रकार के जानवरों के थे । उन तमाम गुडो में अजीब आकर्षण था - शायद उसी के कारण काफी देर तक उनकी ओर अपलक निहारता मैं। खैर, पूछने पर राठ प्रजापति ने बताया कि वे गुडे उसके काले जादु से सम्बन्धित हैं। उनके जरिए वह कोई भी पैशाचिक कार्य कर सकता है। इसलिए उस दिन टेनेजू पचास-साठ मील का जंगली रास्ता तय कर राठू प्रजापति के पास जा पहुँचा और उसको अपनी सारी व्यथा-कथा सुनायी और किसी भी तरह सांवली को पाने की इच्छा प्रकट की

सारी बातें सुनने के बाद राठू प्रजापति ने आश्वासन दिया कि वह अपने काला जादू की ताकत से कुछ ऐसा माहौल पैदा कर देगा कि लड़की की शादी और किसी के साथ न होकर उसी के साथ होगी । अत: सुनते ही टेनेजू प्रसन्न हो उठा। उसने तत्काल उस तांत्रिक के आदेश पर एक काला बकरा, तीन चार बोतल शराब और अन्य तांत्रिक वस्तुएँ लाकर उसे दे दी। उस दिन अमावस्या की काली अंधेरी रात थी। गाँव से थोड़ी ही दूर पर श्मशान था। राठू प्रजापति सारे सामानों को लेकर उस अंधेरी रात में श्मशान गया और साथ में टेनेजू को भी लेता गया । उस समय श्मशान में कोई लाश जल रही थी। जिसकी लाल पीली रोशनी में उस तांत्रिक ने वहाँ.जमीन ..

पर एक बड़ा-सा गोल घेरा बनाया और फिर उसके भीतर जमकर बैठ गया वह । पहले तो काफी देर तक वह कोई मंत्र पढ़ता रहा, फिर मंत्र पढ़ते-पढ़ते एक दीप जलाया उसने । उसके बाद एक धारदार

छरे से एक ही बार में उसने बकरे की गर्दन धड़ से अलग कर दी। दूसरे ही क्षण दायरे के भीतर चारों तरफ खून ही खून फैल गया। उसी समय जंगल के भीतर समवेत स्वर में सियारों के रोने की आवाज गूंज उठी। राठ प्रजापति ने बकरे के कटे सिर को दायरे के बाहर फेंक दिया। आश्चर्य की बात थी, उसके फेंकते ही न जाने कहाँ गायब हो गया बकरे का सिर । धड़ के भीतर उसने तीन-चार गुड़ों को, जिन्हें वह एक झोली में भरकर लाया था, डाल दिया। उन गुड्डों के भीतर जाते ही बकरे का धड़ बुरी तरह उछलने कूदने लगा, लेकिन कुछ क्षण बाद जब वह शान्त हुआ तो उसके भीतर से वे तमाम गुड्डे एक के बाद एक निकले और हवा में गायब हो गये। फिर उस तांत्रिक ने विचित्र भाषा और विचित्र शैली में कोई मंत्र पढ़ा । अत: वे गुड़े एक-एक कर वापस लौट आये, मगर उनका रूप-रंग बदला हुआ था। आरम्भ में उनकी आकृति बच्चों जैसी थी, मगर बाद में धीरे-धीरे वे अपने आप बढ़ने लगे । परिणामस्वरूप जब बेसात-आठ फुट के हो गये, तो उनकी आकृति अचानक राक्षसों जैसी हो गयी। उन राक्षसों के धड़ चौड़े, पैर लम्बे और सिर बेहद बड़े थे। जिन पर काफी लम्बे-लम्बे बाल थे। आँखे गोल थी। कान भी काफी बड़े थे। मुँह से खून टपक रहा था । थोड़ी दूर पर बैठा टेनेजू इन तमाम चमत्कार पूर्ण अलौकिक दृश्यों को मुँह बाये देख रहा था, लेकिन जब उसने उन राक्षसों को देखा, तो एकबारगी भय से सिहर उठा। उसका सारा शरीर कांपने लगा। वह इतना आतंकित हो गया था कि यदि उसके मन में सांबली को पाने की लालसा न होती, तो वह उसी क्षण भाग खड़ा होता वहाँ से। लेकिन अब तक उस तांत्रिक ने जोर-जोर से कोई मंत्र पढ़ना शुरू कर दिया, जिसके फलस्वरूप वे तमाम राक्षसी आकृतियाँ हवा में तैरती हुई वहाँ से चली गयी, किन्तु आश्चर्य की बात थी, क्योंकि उनके जाते ही दायरे के भीतर रखा बकरे का धड़ भी गायब हो गया। इतना ही नहीं, बल्कि उसके गायब होते ही तांत्रिक ने बगल में रखी शराब की बोतलें एक-एक करके खोली और गट-गट कर पीने लगा। आखिर जब सभी बोतलों की शराब खत्म हो गयी तो वह दायरे के बाहर निकला और आवाज देकर टेनेजू को अपने पास बुलाया। टेनेजू अभी भी भय से कांप रहा था, लेकिन जब बहू तांत्रिक के निकट आया, तो उस पिशाच सिद्ध जादूगर ने उससे कहा - "जा, अभी इसी समय अपने गांव वापस लौट जा। अब तेरी मंगेतर और किसी दूसरे के साथ नहीं ब्याही जायेगी। तेरा काम पक्का कर दिया मैंने ।”
 
उस समय सांबली वहाँ से लगभग ७०-८० मील दूर अपनी झोपड़ी में चारपाई पर सो रही थी, गहरी नींद में । अचानक उसकी नींद खुली। उसने देखा कि उसकी चारपाई के चारो ओर तीन-चार व्यक्ति खड़े हैं और उसकी ओर अपलक देख रहे हैं। परिणाम स्वरूप एकबारगी सांवली भय से चीख उठी लेकिन उसके चीखते ही वे व्यक्ति वहाँ से गायब हो गये। परन्तु पुन: दूसरी रात को भी ऐसा ही हुआ । रोज की तरह सांबली चारपाई पर सो रही थी । उस रात उसने झोपड़ी के किवाड़ भीतर से बन्द कर दिये थे। आधी रात के समय अचानक उसकी नींद फिर खुल गई। उसने इस बार अपनी चारपाई के चारो ओर खड़े तीन-चार ऐसे लोगो को देखा,

जिनकी आकृति अत्यन्त भयानक थी। वे किसी भी दृष्टि से मनुष्य नहीं कहे जा सकते थे। सबसे बड़ी बात तो यह थी कि उन सभी के पैर नहीं थे। उनके धड़ जैसे अधर में लटक रहे थे। उन्हें देखकर । सांबली इतनी भयभीत और आतंकित हो उठी थी कि उसके मुंह से इस बार चीख तक नहीं निकल सकी। कुछ देर बाद भयानक आकृति वाले लोग अचानक गायब हो गये। लेकिन यह क्या? उनके गायब होते ही सांबली बेहोश हो गई और जब होश आया, तो उसने देखा - सवेरा हो चुका था। परिवार के लोग उसके पास बैठे हुए थे, फिर उसने रात की सारी बातें बतायी, तो किसी को विश्वास नहीं हुआ। सभी ने यही कहा, "कोई बुरा सपना देखा होगा उसने ।” मगर सांवली इस बात को अच्छी तरह समझती थी कि वह सब कुछ सपना नहीं था, क्योंकि जो कुछ भी देखा था उसने, वह सच था। दिन भर सहमी-सहमी-सी थी वह । रात में भी उसी भय के कारण नींद नहीं आयी, इसलिए पूरी रात जागती रह गई वह । लेकिन भोर के समय थोड़ी देर के लिए झपकी-सी लगी सांवलीको और उसी स्थिति में इन्सान के रूप में विचित्र प्राणियों को अपने निकट देखा उसने । उन विचित्र प्राणियों की काफी हद तक शक्ल-सूरत इन्सानों जैसी ही थी, मगर उनके सिर कोहड़े के आकार के और काफी बड़े थे। छाती और पेट भी हद से ज्यादा बड़े थे, लेकिन पैर बांस की तरह लम्बे और पतले थे। उन्हें देखकर सांबली उसी अवस्था में भय से थर-थर कांपने लगी। आतंक के कारण उसके मुंह से चीख भी न निकल सकी उस समय । पहले तो वे विचित्र जीव सांबली की ओर घूर-चूर कर देखते रहे, फिर धीरे-धीरे आगे बढ़े और सांबली को उठा लिया । वह चाह कर भी विरोध न कर सकी। उसे ऐसा लगा कि वह आकाश में उन भयानक लोगों के साथ उड़ रही है और उड़ते हुए तीव्र गति से आगे बढ़ती जा रही है, तभी अचानक एक जोर से झटका लगा उसे और उसी के साथ उसकी तन्द्रा टूट गई । घबराकर उठ बैठी वह दूसरे क्षण । आँख फैलाकर आश्चर्य से देखने लगी चारो तरफ । उसने देखा कि वह अपनी झोपड़ी में नहीं, बल्कि ऋषिकुल्पा के किनारे काली के थान के चबूतरे पर पड़ी हुई है। इतनी दूर वह कैसे इतनी जल्दी पहुँच गयी? क्या सचमुच उसे आकाश में उड़ाकर वहाँ लाया गया था ? सब कुछ अविश्वसनीय था। सब कुछ चमत्कार पूर्ण था। मगर था सब सत्य । जिसे चाहकर भी झुठलाया नहीं जा सकता था। अब क्या होगा? सोचने लगी सांवली - अब कैसे वापस लौटेगी अपने गाँव ? परिवार के लोग भी खोज रहे होंगे, फिर जब उन्हें यह मालूम होगा कि वह यहाँ है, तो क्या सोचेंगे क्या समझेंगे ? गाँब के लोग बहाँ इकट्ठा हो गये । सभी को इस बात का आश्चर्य हो रहा था कि सांबली इतने सबेरे कैसे पहुँच गई वहाँ और वह भी अकेले । लेकिन सांबली के अकस्मात् आने की सूचना जब टेनेजू को मिली, तो खुशी से झूम उठा एकबारगी वह । दौड़ा-दौड़ा वह सांबली के पास पहुँचा और दोनों हाथ फैलाकर उसे आलिंगनबद्ध कर लिया उसने । दोनों एक-दूसरे से लिपटकर बहुत देर तक रोते रहे। उनके वियोग की पीड़ा आंसुओं के सहारे बाहर निकलती रही, मगर उनका वह मिलन क्षणिक था। कुछ ही देर बाद हरखू अपने आदमियों को लेकर आ धमका वहाँ और चीख-चीख कर कहने लगा, "मेरी लड़की पर सावजू ने काला जादू कराया है। मैं जादू का बदला जादू से लेकर छोडूंगा । कैसे नहीं हटेगा उसके काले जादू का असर ? यह देखना है उसे " जब मि. सैमसन को इन बातों का पता चला, तो वह तुरन्त सांबली से मिला सांबली ने उसे शुरू से अन्त तक की सारी घटनायें बतायी, फिर अन्त में उसने यह भी बताया कि किस प्रकार वहाँ पहुँची। सारा चमत्कार प्रजापति के गुड्डो का है। बे ही हैवानी शक्ल में बदलकर प्रजापति के संकेत पर सब कुछ कर रहे हैं - यह समझते देर न लगी मि.सैमसन को । मैंने उससे कहा, "अब आगे क्या होता है?

यह देखना है-" तीन-चार दिन के बाद एक व्यक्ति मिला वह सांबली के गांव का ही रहने वाला था। उसने बताया कि सांवली की हालत काफी नाजुक है। उसको जो कुछ भी खाने के लिए दिया जाता है, वह ईंट, पत्थर और कांच अथवा कील-कांटे की शक्ल में बदल जाता है। लड़की भोजन के अभाव में दिन-ब-दिन कमजोर होती जा रही है। अब तो चलने-फिरने से भी लाचार हो गयी है। अन्त में उस व्यक्ति ने कहा, "उसके घर वालों ने बड़े-बड़े तांत्रिकों को दिखाया, लेकिन कोई लाभ नहीं हुआ । अन्त में सभी ने यही कहकर उनको निराश कर दिया कि किसी ऊँचे किस्म के काला जादू जानने वाले तांत्रिक ने लड़की पर जादू कर दिया है। जिसे उस तांत्रिक के अलावा और कोई उसे ठीक नहीं कर सकता यह समाचार सुनकर मि. सैमसन सांबली को देखने के लिए व्यग्र हो उठे। दूसरे ही दिन हम दोनों चल पड़े । गांव के करीब पहुँचने पर यह भी पता चला कि पहले लड़की जो भी खाती थी, वह उसके मुंह में जाते ही पत्थर बन जाता था, मगर इधर लड़की में विस्मयकारी परिवर्तन हुआ है। वह दिन में अब आसानी से सब कुछ खाने लगी है, लेकिन शाम होते ही वह कुछ भी नहीं खा-पी सकती और खाने का प्रयत्न भी करे, तो खाना तुरंत मल-मूत्र में बदल जाती है। उस समय लड़की की हालत भी काफी खराब हो जाती है। यहाँ तक कि उसका सारा शरीर कांपने लगता है।

आखिर जब हम लोग वहाँ पहुँचे, तो शाम हो गयी थी। चारो तरफ अंधेरा फैलने लगा था। सांबली अपनी झोपड़ी के सामने पीपल के पेड़ के नीचे बैठी हुई थी। उसके शरीर का रंग हल्दी की तरह पीला पड़ चुका था। चेहरा काला हो गया था। आँखे भीतर धंसी हुई थी। परिवार के अलावा गांव के अन्य लोग भी वहाँ मौजूद थे। अत: हम लोगों को देख कर भीड़ में से निकलकर हरखू करीब आया और आदर से हाथ जोड़कर बैठने के लिए कहा उसने, फिर मि. सैमसन के कहने पर बे सारे पत्थरों, कीलों और कांच के टुकड़ों को लाकर उनके सामने रख दिया - जो खाना खाते हुए सांवली के मुंह से निकले

थे।

उसके बाद सांबली के सामने खाने की थाली रखी गई। हम लोगों ने देखा-ज्यों ही उसने ग्रास मुँह में रखा, वह तुरन्त बिष्ठा में बदल गया और उसकी दुर्गन्ध बाताबरण में फैल गई, फिर उसी के साथ दूसरे क्षण सांबली का सारा शरीर भी थर-थर कांपने लगा। तभी हरखू ने बताया, "उसकी लड़की पर काला जादू का भरपूर असर है और उस असर को हटाने के लिए उसने एक बहुत बड़े तांत्रिक को बुलाया है, जो काली विद्या में माहिर है।" फिर थोड़ा रूककर उसने आगे कहा, "साब, जिसने मेरी बेटी पर यह काला जादू किया है, वह अब नहीं बचेगा क्योंकि उस तांत्रिक का कहना है कि वह काला जादू के असर को उलट देगा, लेकिन जिसने किया है, वह तुरन्त मर जायेगा।" वह तांत्रिक यहाँ कब आने बाला है? यह पूछने पर हरखू ने कहा, कल वह पहुँच जायेगा और कल ही लड़की का इलाज भी करेगा। अतः हम लोग उस रात गांव में ठहर गये । दूसरे दिन दोपहर में वह तांत्रिक आया। हम लोग उसे देख कर हैरान रह गये । उसकी उम्र अधिक से अधिक चालीस वर्ष थी। दुबला-पतला शरीर, काला रंग। हद से ज्यादा लम्बा कद और मुड़ा हुआ सिर–साथ ही दाढ़ी-मूंछ भी सफाचट, गले में मणियों की मालाएं - जिसके साथ बन्दर के बच्चे की खोपड़ी भी झूल रही थी छाती पर । कपड़े के नाम पर उसने मात्र लाल रंग की लुंगी कमर में लपेट रखी थी। बगल में एक मदारियों जैसी कथरी की झोली

भी थी, फिर पूछने पर पता चला कि उस तांत्रिक का नाम सलाजू है और वह नागालैण्ड से आया है। गांव के बच्चे-बूढ़े, और मर्द सभी उस तांत्रिक को भय और उत्सुकता की नजरों से देख रहे थे। परिणामस्वरूप दिन ढलते ही हरखू की झोपड़ी के सामने मैदान में भीड़ इकट्ठी हो गयी । सभी के मन में जिज्ञासा और उत्सुकता थी, काली विद्या का तमाशा देखने के लिए - सांबली सम्मोहित-सी गर्दन झुकाये, पीपल के नीचे पत्थर की मूर्ति की तरह बैठी थी। थोड़ी देर बाद अंधेरा हो गया। तभी धीरे-धीरे चलकर तांत्रिक सांबली के करीब पहुँचा। पहले उसने झुककर सांबली के सारे शरीर को टटोला, फिर पालथी मारकर बैठ गया वह। कुछ देर तक आँखे बन्द किये कोई मंत्र मन में बुद-बुदाता रहा और उसी अवस्था में आँखे बन्द किये वह अपने और सांबली के चारो तरफ एक बड़ा-सा दायरा बनाया चाकू से । अपने बगल में दबी झोली से निकालकर उसने दो मानव खोपड़ी उस दायरे के भीतर रखी और उन खोपड़ियों के सामने दो मिट्टी के बड़े-बड़े दीप जलाये, फिर उसने इशारे से एक काला मुर्गा और दो बोतल शराब हरखू से मंगवाया वहाँ । जब वे चीजें आ गयी, तो उस तांत्रिक ने जोर-जोर कोई अटपटा-सा मंत्र पढ़ना शुरू कर दिया। जिसे हम दोनों भी उस तांत्रिक की हर गतिविधि को बड़े ध्यान से देख रहे थे। उसकी हर क्रिया-कलाप को समझने का प्रयास कर रहे थे। मंत्र पढ़ते-पढ़ते तांत्रिक का चेहरा लाल हो उठा अचानक और उसी के साथ दोनों दीप की लौ एक बार जोर से फड़फड़ायी और फिर ऊपर की ओर धीरे-धीरे उठने लगी और जब वे दोनों लौ लगभग तीन फुट ऊपर आकाश में उठ गयीं, तो तत्काल तांत्रिक के सामने रखी दोनों खोपड़ियों में शराब उड़ेल दी । शराब उड़ेलते ही हमने देखा कि वे दोनों खोपड़ियाँ सन्न-सन्न की आवाज करती हुई अपनी-अपनी जगह से अचानक हवा में उठी और कुछ ही क्षणों के बाद आकाश में गायब हो गयी ।
 
बड़ा ही विचित्र और चमत्कार पूर्ण दृश्य था वह, लेकिन जब वे खोपड़ियाँ गायब हो गयी, तो तांत्रिक ने मुर्गे की बलि दी और उसने खून को सांबली के सिर और छाती पर रगड़ा। उसके बाद बोतल में बची हुई शराब को पिया उसने। दोनों दीप की लौ पहले की ही तरह ऊपर की ओर उठी हुई थी और हवा में लपलपा रही थी। उस समय हमारे भय और आश्चर्य की सीमा न रही। ताज्जुब की बात थी, लौ के आस-पास उड़ते हुए पतंगे थोड़ी ही देर बाद इंसानों की शक्ल में बदल गये । बड़ा ही अनोखा और आश्चर्यजनक दृश्य भी वह । हम जरा आगे बढ़कर उस चमत्कार पूर्ण दृश्य को देखने लगे। दीप की कांपती और थर-थराती लौ के आस-पास ऐसी इंसानों की शक्लें नाच-कूद रही थी - जो मुश्किल से एक इंच की रही होगी, मगर उनके रूप और आकार-प्रकार बिल्कुल स्पष्ट थे। सबसे रहस्य की बात तो यह थी कि उन इंसानों के पैर नहीं थे। जिसे देख कर हम बिस्मयविमूढ़ थे। सांबली जो अभी तक सम्मोहित-सी पत्थर की मूर्ति बनी बैठी थी - एकाएक बेचैन होकर अपना पहलू बदलने लगी। उसका चेहरा पसीने से भींग उठा था और दोनों आँख बाहर निकल आई थी। सहसा डरावनी आवाज में वह चिल्लाने लगी और उसी समय हमने देखा कि चारो इन्सानी शक्ले सहसा

राठू प्रजापति के चमत्कारी गुड्डो के रूप में बदल गयी और फिर बे गुडे एक-एक कर लौ में जलने लगे । जब वे सभी जल गये - उसके कुछ ही देर बाद वे दोनों खोपड़ियाँ सनसनाती हुई वहाँ आ गयी और दीप का चक्कर लगाकर जमीन पर स्थिर हो गयी । अब उनमें शराब की जगह किसी इन्सान का ताजा खून भरा हुआ था । नागालैण्ड के भयंकर तांत्रिक ने लपककर उन खून से भरी खोपड़ियों को उठाया और गटा-गट कर सारा खून पी गया दूसरे क्षण वह । बड़ा ही रोमांचकारी और बीभत्स दृश्य था - जिसे देखकर वहाँ उपस्थित सभी लोग एक बारगी कांप उठे। मि,सैमसन को भी रोमांच हो आया। ..

हमारी हालत भी देखने लायक थी। मैंने देखा - सांबली पहले से अब काफी स्वस्थ लग रही थी। तांत्रिक के आदेश पर जब उसके सामने

खाना लाया गया, तो बड़े इत्मीनान से खाना खाने लगी वह । किसी भी प्रकार की परेशानी और तकलीफ नहीं हुई उसे । जब हरखू ने देखा, कि उसकी लड़की के खाने का नेवालान पत्थर बन रहा है और न तो बन रहा है कांच या लोहे का टुकड़ा, तो उसने लपककर उस भयानक तांत्रिक के दोनों पैर पकड़ लिये, मगर तांत्रिक ने उसे डांटकर अलग कर दिया। कहने की आवश्यकता नहीं, सांबली पर से राठू प्रजापति के काले जादू का असर हट चुका है और वह अब स्वस्थ थी, मगर खोपड़ी में शराब के बदले भरा खून कैसा था ? किसका था वह खून ? इसका। उत्तर हमें दूसरे ही दिन मिल गया । वह खून था टेनेजू का। टेनेजू मर चुका था और मरते समय उसके मुँह से बहुत सारा खून निकला था। जब राठू प्रजापति को टेनेजू के मरने की सूचना मिली, तो वह एकबारगी बौखला उठा। अपनी विद्या का अपमान सहन सकाराट्र प्रजापति । उसने तुरन्त एक काले मुर्ग की बलि देकर उसी समय सांबली पर मूठ मार दिया। आधी रात का समय था । लाल पहाड़ी गांव के लोगों ने देखा कि पश्चिम की ओर से एक बड़ी-सी कच्ची मिट्टी की हड़िया सनसनाती हुई आयी और हरखू की झोपड़ी के भीतर तीव्र गति से घुस गयी। दूसरे क्षण गांव वालों को झोपड़ी से एक भयानक आर्तनाद सुनाई दिया। वह आर्तनाद और किसी का नहीं, सांबली का था। उसके आर्तनाद को सुनकर घर के लोगों की नींद खुल गयी। लोगों ने देखा, सांबली अपनी चारपाई पर मृत पड़ी थी। उसके चेहरे पर भय का भाव था। आँखे बाहर निकल आई थीं। मुंह से भी हेर-सा खून निकलकर बिस्तर पर फैल गया था। दो भयानक तांत्रिक के काले जादू की लड़ाई में दो ऐसे युवा प्रेमियों को अपनी जान से हाथ धोना पड़ा, जिनकी कल्पना सजीव नहीं हुई थी । न तो सपने ही साकार हुए थे। इस घटना के बाद हम एक दिन भी रूकना उचित नहीं समझा अपना कार्य निपटा कर तत्काल वहाँ से रवाना हो गये और रास्ते भर बो सारी घटनाएँ चलचित्र की तरह घूमती रही।
 
अध्याय १४ अभिशप्त हवेली

जब मैं पश्चिम बंगाल और आसाम की सीमा से लगे - उस छोटे से स्टेशन पर उतरा तो उस समय सांझ की स्याह कालिमा धरती पर फैलने लगी थी। आकाश में काले-भूरे बादल घिरे हुए थे। हवा में भी सनसनाहट थी। मैं जानता था कि अभी भी बारिश हो सकती है - मगर फिर भी चल पड़ा मैं । चार-पाँच दिन पूर्व मुझे राय चौधरी कृष्ण काली मजूमदार का रजिस्टर्ड पत्र मिला था। पत्र में । उन्होंने मुझसे तुरन्त सारू पेटा आने का आग्रह किया था। एक अटैची में कुछ आवश्यक कपड़े और सामान रखकर दूसरे ही दिन चल पड़ा था मैं वाराणसी से। मजूमदार बाबू का मेरे ऊपर बड़ा स्नेह था। सन् १९५० में उनसे मेरा परिचय हुआ था। उन दिनों कलकत्ता में रहकर मैं बंगाल फिल्म के प्रसिद्ध निर्देशक विपिन सेन के साथ था। मजूमदार बाबू के कई मकान थे कलकत्ता में। उसके अलावा दो स्टूडियो भी थे। उन्होंने बिबाह नहीं किया था। वे किंचित कृपण थे । मेरा ख्याल है कि उनके पास काफी धन था और जायदाद भी। उनकी एक भांजी

थी यानी सगी बड़ी वहन की लड़की - नाम था चारूलता। काफी सुन्दर और आकर्षक थी चारूलता। उम्र यही थी बीस बाईस के लगभग – वैसे मैं विपिन सेन के साथ अवश्य रहता था सहयोगी के रूप में, लेकिन उसके अलावा बंगाल के शाक्त तंत्रों से संबंधित साहित्य पर व्यक्तिगत रूप से खोज एवं शोध कार्य भी कर रहा था मैं । बंगदेशीय शाक्त तांत्रिकों, साधकों, और सिद्ध पुरुषों का अभाव नहीं है। उनकी साधना, तपस्या और चमत्कारों के रहस्यों की गहरायी में उतरकर उनके तथ्यों से परिचित होने की लालसा भी कम न थी मुझमें। उन दिनों विपिन बाबू बैसे ही किसी तांत्रिक योगी अथवा चमत्कारी महापुरूष की जीवनी पर आधारित एक बंगला फिल्म बनाने की बात सोच रहे थे और जब उन्हें यह मालूम हुआ कि मैं तंत्र-मंत्र में गहरी रूचि रखता हूँ। बंगाल के तांत्रिकों, साधकों और चमत्कारी सिद्ध महात्माओं के प्रति मुझमें गहरी आस्था है। इन सबके अतिरिक्त मैं इन तमाम विषयों में खोज एवं शोध भी कर रहा हूँ। तो उन्होंने तुरंत मुझे बुलाया और बंगाल के किसी तंत्र साधक की जीवनी पर कथा लिखने के लिए कहा। एक सप्ताह के अन्दर ही कथा तैयार कर दी मैंने । पश्चिम बंगाल के प्रसिद्ध तारापीठ के चमत्कारी सिद्ध योगी बामा खेपा से सम्बन्धित थी मेरी वह कथा, शीर्षक भी रखा था मैंने बामा खेपा ही और इसी नाम से फिल्म भी बनी। विपिन बाबू जैसा चाहते थे - वैसी ही थी वह कथा । काफी प्रसन्न हुए वह और तत्काल काम शुरू कर दिया उन्होंने । चारूलता को अभिनय का काफी शौक था। कॉलेज में होने वाले बंगला नाटको में प्राय: वह भाग लिया करती थी। मेरे अनुरोध पर बिपिन बाबू ने फिल्म में प्रमुख नायिका का रोल दे दिया चारूलता को । उसके बाद भी विपिन बाबू के आग्रह पर बैसी ही तीन-चार कथाएं लिखी मैंने । उन सब पर भी विपिन बाबू ने फिल्में बनायी। परिणाम यह हुआ कि जहाँ एक ओर मैं मजूमदार बाबू के बिपुल नेह का पात्र बना वहीं दूसरी ओर चारूलता से मेरे सम्बन्ध और अधिक मधुर हो गये । सच तो यह था कि हम दोनों एक दूसरे से प्रेम करने लगे थे। उसके पास रूप था, यौवन था, कला थी और थी ख्याति । धन वैभव का भी अभाव नहीं था । मेरे पास क्या था ? सिवाय साहित्य की थोड़ी बहुत पूँजी के । मगर चारूलता इस सत्य से भली-भाँति परिचित थी कि उसकी सफलता का कारण एक मात्र मैं ही हूँ। इसलिए वह मुझे दिल से चाहने लगी थी। लेकिन हम दोनों का सम्बन्ध अधिक दिनों तक नहीं रहा । अचानक बिपिन बाबू का

देहान्त हो गया और मुझे कलकत्ता छोड़कर नौकरी के सिलसिले में दिल्ली जाना पड़ा। चारूलता से पत्र व्यवहार द्वारा सम्पर्क बना रहा। मजूमदार बाबू भी कभी कदा पत्र लिखते रहे मुझे। बाद में पत्र सम्बन्ध भी टूट गया । ऐसा लगा कि बाप-बेटी दोनों भूल गये मुझे। दोनों में से किसी को भी मेरी सुध नहीं रही। इस प्रसंग को बीते पूरे बीस बर्ष बीत गये थे। दीर्घ अन्तराल के बाद जब मुझे अचानक मजूमदार बाबू का वह रजिस्टई पत्र मिला तो एकबारगी चौंक पड़ा था मैं । पत्र से यह भी मालूम हुआ कि कलकत्ता के दोनों स्टूडियो बेचकर वे आसाम बंगाल के उस निर्जन प्रदेश में कोई पुरानी हवेली खरीद कर बस गये थे। वह हवेली किसी राज तांत्रिक की थी.. खैर । जब मैं उस छोटे से रेलवे स्टेशन से बाहर निकला तो अंधेरा और गहरा गया था। वहाँ से सारूपेटा के लिए एक पतली, कंकरीली, पथरीली सड़क गयी हुई थी। सबारी का कोई साधन नहीं था। वातावरण में घोर निस्तब्धता छाई हुई थी और छाया हुआ था गहन अन्धकार । उस चिपचिपे अन्धकार में आँखे गड़ाकर किसी प्रकार आगे बढ़ने लगा मैं । अचानक बूंदा-बांदी शुरू हो गयी । किसी प्रकार दो मील का सुनसान निर्जन रास्ता तय कर जब मैं सारू पेटा पहुँचा तो उस समय रात के नौ। बजने वाले थे। चारो तरफ वैसा ही गहरा सन्नाटा था - जैसा निर्जन, बीहड़ इलाकों में रात को पाया जाता है। जो बूंदा-बांदी चलते समय शुरू हुई थी - वह अब जोरदार बारिश में बदल गयी थी। धरती की उमस और जंगली वनस्पतियों की मिली-जुली गन्ध बातावरण में फैली हुई थी। बारिश से बचने के लिए मैं एक झोपड़ीनुमे दुकान के छाजन के नीचे खड़ा हो गया था। सोचा बारिश थमने पर हवेली का पता लगाऊँगा। तभी किसी ने मेरे कन्धे पर हाथ रखा और उत्फुल्ल स्वर में कहा - "शर्मा हो न ?” उस स्पर्श और स्वर - दोनों को पहचान लिया मैंने । वे राय चौधरी कृष्ण काली मजूमदार थे उनके एक हाथ में छाता था, और दूसरे हाथ में लालटेन थी। अपनी अटैची जमीन पर रखकर मजूमदार बाबू से लिपट गया मैं । पूरे बीस वर्ष के बाद हम मिले थे | कितनी ही बातें करने को हम बेताब थे । मगर जब मैंने उनकी तरफ देखा तो अचानक अवाक होकर देखता ही रह गया मैं । कितने बदल गये थे मजूमदार बाबू ? उनकी बलिष्ठ देहयष्टि कंकाल सी हो गयी थी। सिर के बाल बिलकुल झर गये थे और उनके चेहरे पर झुर्रियाँ पड़ गयी थी। उन्हें । देख कर सहसा मुझे विश्वास नहीं हुआ कि ये बही मजूमदार बाबू थे - जो कलकत्ता में शान-शौकत की जिन्दगी व्यतीत करते थे और जिनकी गणना कलकत्ता के रईसों में होती थी, आपकी तबीयत तो ठीक है मजूमदार बाबू - स्तब्ध होकर पूछा मैंने । वे हंसकर बिस्मय से स्वर में बोले - "पिछले साल तक तो मैं बिलकुल ठीक था शर्मा जी । लेकिन अब भय और आतंक ने जैसे मेरा खून चूस लिया है।" किसका भय ? मैंने पूछा। बही सब बतलाने के लिए तो मैंने तुम्हे यहाँ बुलाया है। वे बोले चलो हवेली में चलकर विस्तार से बातें करेंगे। बाहर की तरह हबेली के भीतर भी अन्धकार भरा था। सामने वाला कमरा काफी लम्बा-चौड़ा था।
 
आँखे गड़ाकर देखने पर भी उस बड़े कमरे में रखी बड़ी-बड़ी कुर्सियों और टेबुलों का केवल आभास होता था। कीचड़ भरे रास्ते से झाड़ियों को पार करके-पत्थर के जिस विशाल चबूतरे से होकर हम जिस कमरे में आये थे उसकी सीढ़ियाँ भी टूट गयी थीं। उनका एक-एक पत्थर डगमगा रहा था। मुझे एक कुर्सी पर बिठाकर मजूमदार बाबू बोले तुम यहीं बैठो शर्मा मैं अभी आया।

बाहर हवा का वेग बढ़ रहा था । पता नहीं, कहाँ से हवेली के भीतर हवा घुस रही थी और एक अस्पष्ट से रूदन की सृष्टि कर रही थी। वह आवाज सुनकर कोई भी व्यक्ति पसीने-पसीने हो जाता। मैंने उनकी तरफ देखना चाहा- मगर इसके पहले ही अपने हाथ की लालटेन उठाये हुए मजूमदार बाबू चले गये और जब वापस लौटे तो उनके हाथ में चाय की ट्रे थी। आप कहाँ चले गये थे मजूमदार बाबू, मैंने पूछा? मैं चाय बना रहा था बे बोले। चाय पी फिर मैने पूछा आप किसी भय और आतंक को कह रहे थे न ? किसी ने आपको धमकी दी है क्या ? कौन है वह आदमी ?

ऐसी कोई बात नहीं है। वे बोले- दरअसल मैं एक बहुत ही भयावह चक्कर में फंस गया हूँ शर्मा जी। मैं चौंककर बोला कैसा चक्कर ? मजूमदार बाबू जरा देर चुप रहकर अस्फुट से स्वर में बोले, "तुमने तंत्र-मंत्र में बहुत खोज की है। शायद अशरीरी शक्तियों के बारे में भी कुछ पढ़ा सुना होगा" आपका आशय क्या प्रेतात्माओं से है मैंने पूछा ? तभी हबा का एक तेज झोंका आया । छन्डी बरसाती हबा मन प्राणों को सिहरा गयी एकबारगी । पानी फिर जोर-शोर से बरसने लगा था। हवा भी बहुत तेज हो गयी थी। हबेली के खिड़की दरवाजे जोर-जोर से हिल रहे थे और उनसे रूदन जैसी अजीब स्वर की सृष्टि हो रही थी। पूरी हवेली में ऐसी ही आवाजें हो रही थी। मजूमदार बाबू ने सिर हिलाकर कहा, "हाँ"। मैंने पूछा प्रेतात्माएँ कहाँ है ? मजूमबार बाबू ने बतलाया कि वह हवेली प्रेत ग्रस्त थी। कलकत्ते के शोर-शराबे से दूर एकान्तवास के लिए उन्होंने वह हवेली केवल बीस हजार रूपये में खरीद ली थी। हवेली में चालीस कमरे और सोलह बारादरियाँ थीं। बीच में एक काफी लम्बा-चौड़ा तहखाना था, जो न जाने कब से बन्द पड़ा

था।" "इस हवेली का सौदा जब आप कर रहे थे, तब आपने इसके मालिक से इस बारे में दरयाफ्त नहीं किया था मैंने पूछा?" यही गलती तो मुझसे हो गयी मजूमदार बाबू बोले, वास्तव में मैं मिट्टी के मोल मिल रही इस विशाल

हवेली के लोभ में आ गया। कौन था इस हबेली का मालिक ? चूणामणि सान्याल, मजूमदार बाबू बोले वह अब यहाँ नहीं है – हवेली बेचकर न जाने कहाँ चले गये महाशय सपरिवार |

अपने पत्र में तो आपने किसी राज तांत्रिक की चर्चा की थी मैंने उनकी ओर देखते हुए पूछा ? हाँ ! उस राज तांत्रिक का नाम था भैरवानन्द कापालिक । एकाएक चौंक पड़ा मैं भैरवानंद कापालिक का नाम सुनकर । जाना पहचाना सा लगा मुझे वह नाम । बीस साल पहले जब मैं तांत्रिक-साधना और उससे सम्बन्धित सम्प्रदायों पर खोज और शोध कार्य कर रहा था उस समय मुझे कापालिक सम्प्रदाय से संबंधित एक प्राचीन हस्तलिखित पुस्तक अनायास ही मिल गई थी। जिसके लेखक थे चारुचन्द्र भिषगरन । चारू चन्द्र भिषगर न महाशय पश्चिम बंगाल के प्रसिद्ध बिद्वान और तांत्रिक थे। उन्होंने अपनी उस पुस्तक में कापालिक की चर्चा करते हुए भैरबानन्द कापालिक के सबंध में लिखा था कि वह एक भयानक पिशाचसिद्ध कापालिक था। राज परिवार की अनेकों युवतियों को अपनी भैरवी बनाया था। आवश्यकता पड़ने पर किसी भैरवी की बलि भी दे दिया करता था। वह अपनी साधना सिद्धि के लिए। थोड़ा रूककर मजूमदार बाबू ने आगे बतलाया कि लगभग सौ-सवा सौ वर्ष पहले इस इलाके के तालुकदार थे राधा मोहन राय सन् १८५७ ई. में उन्होंने अंग्रेजो की बड़ी मदद की थी। गौरांग

शासकों को कुमुक मुहैया की और सेना तथा नगदी भी दी थी। उसी के एवज में अंग्रेज शासकों ने उन्हें जागीर की उपाधि दी थी। राधा मोहन राय ऐश्वर्यशाली तालुकदार थे। धन, वैभव का अभाव नहीं

था अभाव था तो एक मात्र सन्तान का। उनकी पत्नी का नाम था मणिमाला देवी, पति पत्नी में जमीन-आसमान का अन्तर था। राधा मोहन राय जितने बड़े नास्तिक और बिलासी थे, उससे अधिक धर्मभीरू और सात्विक जीवन व्यतीत करने वाली थी मणिमाला देबी। काली की उपासिका थी वह । हवेली के भीतर ही मंगला काली का एक मन्दिर बनवा रखा था उन्होंने । उनका समय मन्दिर में पूजा-पाठ और ध्यान धारणा में ही गुजरता था। नवरात्रि में अखण्ड व्रत रखकर बड़े धूमधाम से दुर्गोत्सव मनाती थी वह । हर बार की तरह उस साल भी बड़े धूमधाम से दुर्गोत्सव मनाया जा रहा था हवेली में । प्रात: काल

का समय था मन्दिर में मंगला काली की भव्य मूर्ति के सामने बैठी हुई मणिमाला देवी ध्यान मग्न थी। जय शिव शंकर महादेव – बम ! बम ! बम-बम ! की आवाज लगाते हुये लाल वस्त्र पहने हाथ में

खप्पर कमण्डल लिए जटा जूटधारी एक सन्यासी ने पंचमुखी शंख की आवाज की । सन्यासी तनकर खड़ा था। शंख ध्वनि से हवेली कांप उठी। मणिमाला देवी का ध्यान भी भंग हो गया। वे दौड़कर बाहर आयी मन्दिर के । सन्यासी बार-बार शंख ध्वनि कर रहा था। दिव्य आभा थी उसके मुख पर । लम्बी चौड़ी देह लाल-लाल आँखे । माथे पर लाल सिन्दूर का तिलक – सन्यासी की ओर ताककर मणिमाला देवी क्षण भर के लिए स्तब्ध रह गयी। फिर धूल धूसरित भूमि पर साष्टांग लेटकर प्रणाम किया उन्हान - तुम समझ गये होगे वह सन्यासी और कोई नहीं भैरवानन्द कापालिक ही था। उसने कमण्डल का जल उन पर छिड़ककर कहा - शान्ति !शान्ति ! उठो रानी साहिबा उठो। फिर हाथ पकड़कर मणिमाला देवी को उठाते हुए उसने कहा मन को शान्त रखो मैं तंत्र साधक हूँ। देवी का आदेश पाकर यहाँ आया है। यह हवेली मुझे दान कर दो मैं इसमें देवी चामुण्डा की साधना करूंगा। तुमको सन्तान की प्राप्ति होगी।
 
भैरवानन्द कापालिक की बेश-भूषा और व्यक्तित्व से तो मणिमाला देवी आकर्षित हो ही गई थी और सन्तान प्राप्ति की बात जब सन्यासी के मुख से सुनी तो तुरन्त हाँ कर दी हवेली दान करने के लिए। राधा मोहन राय को जब ये बातें मालूम हुई तो खूब डांटा, फटकारा, अपनी पत्नी को— मगर उनकी जिद के सामने अन्त में झुकना पड़ा उन्हें। हवेली दान कर दी गई कापालिक भैरबानंद को । मणिमाला देवी को पूर्ण विश्वास था कापालिक पर | वह नित्य श्रद्धा और आस्थापूर्वक पूजा की सामग्री लेकर हवेली में जाती और घण्टों पूजा-अर्चना करती। कथा और उपदेश सुनती-कापालिक से। कभी-कभी तो पूरा दिन ही निकल जाता था हवेली में । रात जब थोड़ी गहरा जाती तब मणिमाला देवी हवेली के बाहर निकलती। उस समय उनकी आँखे लाल रहती और चलते समय पैर लड़खड़ाते होते। मणिमाला देवी तीसरी पत्नी थी । सन्तान की लालसा के वशीभूत होकर राधा मोहन राय ने एक के बाद एक तीन शादियाँ की थी पहली दो पत्नियाँ भी साथ रहती थीं। मगर सर्वाधिकार था मणिमाला देवी का ही सब कुछ ही मालकिन वे ही थीं। वह सुन्दर और आकर्षक थीं। उम्र भी यही करीब तीस के

आस-पास थी मगर देखने में बीस-बाईस साल से अधिक नहीं लगती थी वह । कुछ ही दिनों बाद एक आश्चर्यजनक बात हुई। वह क्या, मैंने पूछा? मणिमाला देवी तो नहीं, बल्कि मझली रानी गर्भवती हो गयी और समय पर एक पुत्र को जन्म दिया उन्होंने । राधा मोहन राय की खुशी का ठिकाना न रहा। उन्होंने पुत्र जन्म का उत्सव काफी धूम-धाम से मनाया। हजारो कंगले खिलाये गये गरीबों को खैरात दिया गया, ब्राह्मणों को भी दान दक्षिणा दिया गया। कापालिक को तो विशेष रूप से सम्मानित किया गया । ढेर सारे रत्न जड़ित आभूषण, बख और रूपये दिये गये उसे। मणिमाला देवी को यह सब अच्छा नहीं लगा था। बराबर मौन ही रही वह । किसी भी मंगल कार्य

और किसी भी उत्सब में भाग नहीं लिया उन्होंने। राधा मोहन राय ने भी कोई महत्व नहीं दिया उनको और बाद में तो वह पूरे परिवार की उपेक्षित हो गयी। अब वह पूरी रात बिताने लगी कापालिक के सान्निध्य में । कभी-कभी तो हफ्तों बाहर ही न निकलती हवेली के । हर समय मन्दिर में डूबी रहती वह । कापालिक को उन्होंने गुरु मानकर अपना तन-मन सब कुछ अर्पित कर दिया था उसे | कापालिक ने भी अपनी भैरवी बना लिया था उन्हें । तीन-चार साल तक तो सब कुछ ठीक था। मगर एक रात मणिमाला देवी अचानक गायब हो गयीं और उसके कुछ ही दिनों बाद उस कापालिक ने भी समाधि ले ली। बाद में राधा मोहन राय का पूरा परिवार ही धीरे-धीरे समाप्त हो गया। चिराग जलाने वाला भी कोई न बचा। कहने की आवश्यकता नहीं तब से अब तक यानी पिछले सौ वर्षों से यह हवेली बीरान पड़ी हुई थी। शर्मा जी लोग बताते हैं कि जो भी इस हवेली में रहा, साल भी जीवित नहीं रह पाया। मौत की एक अदृश्य सी छाया बराबर इस हवेली में डोलती रहती है। मैंने कहा आप भौतिक विज्ञान के विद्यार्थी रहे है. आपका मस्तिष्क वैज्ञानिक था । किन्तु अब लगता है कि आप फालतू बातों के चक्कर में पड़ गये हैं। ठीक-ठीक बतलाइये माजरा क्या है? मेरी बातें सुनकर वे बिचलित स्वर में बोले तुम अब चाहे जो कहो शर्मा लेकिन अब बिज्ञान पर से मेरा विश्वास हट चुका है।

वह कैसे ? उनके जुबान से मुझे बिस्मय हो रहा था। पिछले सौ वर्षों से मणिमाला देवी की अतृप्त आत्मा इस हबेली में भटक रही है और इसमें रहने बालों

की निर्ममतापूर्वक हत्या कर देती है। देखो, यह है उसका चित्र । कहकर उन्होंने लालटेन उठाकर सामने दीवार पर टंगे एक आदमकद तैल चित्र की ओर इशारा किया। मैंने चित्र को बड़े ध्यान से देखा । सचमुच अपने समय में अत्यधिक सुन्दर, कमनीय और आकर्षक युवती रही होगी मणिमाला देवी । लालटेन की पीली रोशनी में भी उनका भव्य राजसी व्यक्तित्व चमक-दमक रहा था। गले में स्फटिक-रुद्राक्ष की माला, चौड़े मस्तक पर लाल सिन्दूर का बड़ा सा गोल टीका और सुगठित चम्पई रंग की देह पर लिपटी हुई लाल रंग के चौड़े पाह की रेशमी साड़ी से स्पष्ट जाहिर होता था कि वह निश्चय ही उस कापालिक की भैरबी रही होंगी। फिर भी मुझे सब कुछ बड़ा अविश्वसनीय सा लगा । मजूमदार बाबू की दयनीय मुद्रा बड़ी ही विचित्र सी लगी। मैं बोला - आपने पहले कहा कि मणिमाला देबी गायब हो गयी और अब आप कह रहे है कि उनकी अतृप्त आत्मा इस हवेली में सौ साल से भटक रही है। मेरी समझ में नहीं आयी आपकी यह बात? लालटेन की लौ को तेज करते हुए मजूमदार बाबू बोले गायब होने की तो अफवाह है शर्मा जी । सच तो यह है कि उस कापालिक ने बलि दे दी थी मणिमाला देवी की और वह भी इसी हवेली में । आपको किसने बतलाया ? शशिधर पुजारी ने। कौन है यह शशिधर पुजारी? इसी बस्ती ने रहता है। उसके दादा हलधर पुजारी, राधा मोहन राय के खानदान के पुरोहित थे। वे इस बात को अच्छी तरह जानते थे कि मणिमाला देवी की बलि हवेली के तलघर में उस कापालिक ने अपनी किसी सिद्धि के लिए दी थी। मगर वह सिद्धि सफल नहीं हुई। फिर क्या हुआ? होगा क्या, उसी असफलता के कारण मणिमाला देवी की आत्मा मुक्त होने के बजाय प्रेतयोनि में तभी

से भटक रही है। हलधर पुजारी से देखा नहीं गया राय बंश का नाश मणिमाला देवी की प्रेतात्मा ने ही किया है वे इस बात से खूब परिचित थे । वे यह भी जानते थे कि जब तक उसे प्रेतयोनि से मुक्ति नहीं मिलेगी तब तक वह हवेली में रहने वालों का सत्यानाश करती ही रहेगी। इसलिए हलधर पुजारी कलकत्ता के काली मन्दिर से एक प्रेतबाधा निवारण यंत्र अभिमंत्रित कराकर ले आये। तांत्रिक ने उनको यह विश्वास दिलाया था कि जब तक वह सिद्धि यंत्र हवेली में मौजूद रहेगा वहाँ कोई अनिष्ट नहीं होगा लेकिन शर्मा जी तुमको यह जानकर विस्मय होगा कि साल में २२ अगस्त को हवेली में किसी की मौत होनी निश्चित होती है और उस रात वह सिद्धि यंत्र गायब हो जाता है तथा मौत हो जाने के बाद फिर वापस आ जाता है। अच्छा ! बिस्मित होकर बोल उठा मैं ।

हाँ, और यह क्रम अभी तक जारी है। तभी मुझे कुछ याद आया और उसी के साथ मेरा कलेजा धक-से, रह गया उस दिन २२ अगस्त था। २२ अगस्त १९७५ । मैंने कहा आज भी बही मनहूस तारीख है मजूमदार बाबू, बाईस अगस्त। हाँ, लगभग रोते हुए मजूमदार बाबू बोले, “इसलिए तो तुम्हे बुलाया है मैंने ।” आपको कुछ न होगा मजूमदार बाबू । मैंने दृढ़ता पूर्वक कहा, यह तो बतलाइए, वह सिद्ध यंत्र कहाँ है
 
लालटेन हाथ में लेकर मजूमदार बाबू उठ खड़े हुए और बोले, कमरे में आलमारी के भीतर रखा है। चलो, मैं तुमको दिखाता है। बगल वाला कमरा अपेक्षाकृत छोटा था मगर उसकी हालत भी कुछ ठीक नहीं थी। दीवारों के पलस्तर जगह-जगह टे थे। फर्श भी टूटा-फूटा था और वह भी धूल से अटा पड़ा था। मैंने देखा सामने की दीवार में बने आलमारी के पास मजूमदार बाबू गये और फिर उन्होंने यहाँ से कुछ उठाया। उस समय बारिश थम गयी थी सिर्फ झींगुरों की झी-झी आवाज सुनाई दे रही थी। उस वस्तु को लेकर मजूमदार बाबू मेरे पास आये। यह ६ इंच के लगभग ताम्रपात्र पर बना एक बिलक्षण तांत्रिक यंत्र था। उस पर सिन्दूर की न जाने कितनी परतें पुती हुई थी। यंत्र काला पड़ गया

था। इसी जगह में रखा रहता है यह मैंने पूछा ? हाँ मजूमदार बोले २२ अगस्त की रात को यह अपने आप गायब भी हो जाता है। तभी अंधेरे और सन्नाटे को चीरती हुई एक आबाज उठी। हम बुरी तरह सिहर उठे स्तब्ध होकर हम दोनों ने दरवाजे की तरफ देखा लेकिन वहाँ कोई भी नहीं था फिर हमें लगा कि कोई रो रहा था और रह-रहकर करूण स्वर में किसी को पुकार रहा था ध्यान से सुना मैंने उस रूदन स्वर को । लगा कोई कुत्ता रो रहा था। हवा अब जोरों से चलने लगी थी। लालटेन की लौ कांप रही थी । लगता था अब बुझी, तब बुझी। यह रोने की आवाज सुन रहे हो शर्मा । बिस्फारित दृष्टि से मेरी ओर देखते हुए मजूमदार बाबू ने पूछा

कहीं कोई कुत्ता रो रहा है मजूमदार बाबू! कुत्ते का रोना अशुभ होता है न मजूमदार बाबू, कम्पित स्वर में बोले। आपको कुछ नहीं होगा। मैने दृढ़ स्वर में कहा - रही आज रात की बात तो यह सकुशल कट जायेगी। सुवह होते ही हम कलकत्ता चलेंगे । यहाँ आपका रहना ठीक नहीं। कलकत्ता जाकर क्या करूँगा मैं ? वहाँ अब है ही कौन मेरा, मजूमदार बाबू विस्मय स्वर में बोले । क्यों, चारूलता तो है ही बहाँ।

चारूलता ही होती तो सब कुछ बेचकर यहाँ आकर एकान्तवासी क्यों बनता बुझे-बुझे स्वर में बोले मजूमदार बाबू चारू लता को क्या हुआ ? शंकित होकर पूछा मैंने । वह अब इस दुनिया में नहीं है। ऐं ! क्या कहा आपने ? ...चारूलता नहीं है इस दुनिया में ? नहीं। एकबारगी स्तब्ध रह गया मैं यह चुनकर । बारिश फिर शुरू हो गयी। मैं स्थिर भावशून्य दृष्टि से तांबे के उस यंत्र को देख रहा था जो अभिमंत्रित किया गया था। और जिसके बारे में दावा था कि जब तक वह हवेली में रहेगा कोई अनिष्ट नहीं होगा। मगर वह २२

अगस्त की रात को रहस्यमय ढंग से गायब हो जाता था और फिर बापस भी आ जाता था । तभी सहसा मेरे भीतर कुछ कौंधा । मजूमदार बाबू की तरफ देखकर मैंने कहा, मैं एक कप चाय और पियूंगा यदि आपको परेशानी न हो तो।

परेशानी किस बात की? स्टोव है, दद्ध भी रखा होगा। ठीक है मैंने कहा मैं यहीं बैठा हूँ। थोड़ा सुस्ताऊँगा, फिर आपसे अपने बारे में बात करूँगा। एक टूटी चिमनी बाले लैम्प को जलाकर मजूमदार बाबू मेज पर रखते हुए फिर बोले, मैं पांच मिनट में आया। कहते हुए बे बरामदे से लगे हुए एक कमरे में चले गये। मेज पर रखा हुआ वह सिद्ध तांत्रिक यंत्र लैम्प की रोशनी में चमक रहा था। मैंने उस पर हाथ फेरा तो वह जमा हुआ सिन्दूर मेरी उंगलियों में उतर आया, मैंने गौर से देखा तो उस यंत्र में मुझे कोई असाधारण बात नजर नहीं आयी। लेकिन मजूमदार बाबू कह रहे थे कि वह असाधारण था। उसमें असाधारणता क्या थी यही जानने के लिए मजूमदार बाबू को मैंने दूसरे कमरे में भेजा था। चाय तो सिर्फ बहाना था। मैं नितान्त आध्यात्मवादी नहीं हैं। भौतिकवादी भी हैं। पूरा प्रमाण मिलने पर ही मैं अशरीरी तत्वों पर विश्वास करता हूँ। फिर भी बरसात की उस भयानक रात्रि की नीरबता में आतंक की एक ठन्डी लहर दौड़ गयी मेरे कलेजे मे, मैं समझ गया था कि उस हवेली के साथ जुड़ी हुई किंबदन्तियों ने मजूमदार बाबू की मानसिक शान्ति नष्ट कर दी थी और आसन्न मृत्यु की आशंका से वे बुरी तरह

आतंकित हो गये थे। २२ अगस्त की रात को अपनी संभावित मृत्यु से डरकर उन्होंने मुझे बुलाया था । मेरा यह फर्ज था कि मैं उनकी रक्षा करूँ । मैंने टकटकी बांधे यंत्र को फिर से देखा उस पर लैम्प की कांपती हुई लौ पड़ रही थी, बरामदे से लो कमरे में स्टोव की भरी-भर्र की आवाज सुनाई दे रही थी। मजूमदार बाबू मेरे लिये चाय बना रहे थे। तभी कुत्ता फिर रोने लगा। उसकी मनहस आवाज हवा और बारिश को मथती हई पूरे बाताबरण में फैलने लगी। मैने यंत्र की ओर देखते हुए सोचा इसके गायब होने का मतलब है मौत । मेरे मन में भी धुक-धुकी लगी थी। लग रहा था कि मेरे सिर में दर्द होने लगेगा। पूरे तीन दिन के सफर ने मेरे शरीर को तोड़कर रख दिया था। सोचा था, मजूमदार बाबू के यहाँ पहुँचकर आराम

करूँगा और मिलूंगा चारूलता से लेकिन यहाँ तो भारी परेशानी मेरा इन्तजार कर रही थी। उस पागल बना देने वाले बातावरण में पगलाए हुए मजूमदार बाबू की तरह मैं भी पागल होता जा रहा

था। लैम्प की मद्धिम रोशनी में वह सिद्ध तांत्रिक यंत्र बैसे ही चमक रहा था। उसे मेज से उठाकर मैने अपने कोट की जेब में डाल लिया। हर साल २२ अगस्त की रात्रि में यंत्र के अपने आप गायब होने पर इस हवेली में किसी की मौत हो जाती है अब यह यंत्र गायब नहीं होगा। कम से कम २२ अगस्त की रात को तो गायब हो ही नहीं सकता क्योंकि मैंने अपनी कोट की जेब में सुरक्षित रख लिया है। मजूमदार बाबू को कुछ न होगा। दरवाजे पर लालटेन की पीली रोशनी उभरी। हवा में चाय की ट्रे लिये हुए मजूमदार बाबू भीतर आये। मैंने कहा, आपको बड़ी तकलीफ दे रहा हूँ। क्षमा कीजिएगा । परेशानी तो दरअसल तुम्हें हुई है। बनारस से आकर तुम जरा भी आराम नहीं कर पाये। अभी देखो... उनकी बात अधूरी ही रह गयी, मैंने देखा निगाहे दरवाजे पर टिक गयी थी और चेहरा बिवर्ण हो गया था। विस्फारित दृष्टि से वे दरवाजे की तरफ़ देख रहे थे । क्या बात है मजूमदार बाबू ? मैंने पूछा। लेकिन उन्होंने मेरी आवाज नहीं सुनी । बेसुध से बे टकटकी लगाये दरवाजे की तरफ देखते रहे और उनकी देह सूखे पत्ते की तरह कांप रही थी। वह आ गयी है... वह आ गयी है अस्फुट स्वर में बे बोले। मैने शंकित सतर्क होकर पूछा। अरे बही ! उदभ्रान्त दृष्टि से मेरी तरफ देखते हुए उन्होंने कहा और ट्रे में रखा प्याला फेंककर उन्होंने दरवाजे पर किसी को मारा। झन-झन कर टूट गया प्याला । भय और आतंक से मेरा सर्वांग भी झन-झना उठा एकबारगी। सूखे कण्ठ से मैंने कहा वहाँ तो कोई नहीं है मजूमदार बाबू । आप परेशान न हाँ। मैंने कहा था न ! वह जरूर आयेगी - कहते हुए बेहवेली के भीतर भागे और मेज, कुर्सी, लैम्प और मुझे भी धक्का देते हुए बे बगल के कमरे में घुस गये। मैं फ़र्श पर गिर पड़ा था किसी प्रकार मेज का सहारा लेकर उठा और लगभग दौड़ता हुआ मैं भी घुस गया उस कमरे में | घोर आश्चर्य हुआ मुझे कमरे की दीवारों के प्लास्टर टूटे हुए थे । फर्श पर धूल और गर्द की मोटी परतें जमी हुई थी। लगा मानों वर्षों से उस कमरे में कोई आया न हो। फर्श में नीचे जाने के लिए सीढ़ियाँ थी। निश्चय ही कमरे के नीचे तहखाना था । मैं अभी खड़ा इधर-उधर देख ही रहा था कि तभी मेरे कानों के पास किसी नारी के हंसने की आवाज आयी । आतंकित हो उठा मैं । उसी समय अप्रत्याशित रूप से हत्कम्पित स्वर में मजमदार बाबू की चीत्कार सनाई पड़ी मुझे। रक्त जमा देने वाले उस चीत्कार की आवाज तहखाने से आयी थी और फिर सुनायी दिया उनका भयातुर स्वर जैसे गला दबा रहा हो उनका काई । नीचे काफी लम्बा-चौड़ा था वह तहखाना । मैंने देखा तहखाने के बिल्कुल बीच में लगभग दो फुट ऊँची पत्थर की एक बेदी थी। जिस पर किसी तांत्रिक देवी की भयंकर मूर्ति स्थापित थी। मूर्ति लाल संगमरमर के पत्थर की थी जिसमें बड़ा सा खूटा था और उस खूटे, में फंसा हुआ एक नर कंकाल था।

"
 
कंकाल की खोपड़ी बगल में थी। जिससे साफ जाहिर था कि वहाँ उसकी बलि दी गयी थी। कंकाल के दोनों हाथों की कलाईयों में सोने की चूड़ियाँ झूल रही थीं और पैरों में सोने के पायजेब पड़े थे। निश्चय ही वह रानी मणिमाला देवी का ही कंकाल था यह समझते देर न लगी मुझे। उस कंकाल के पास ही मजूमदार बाबू फर्श पर पड़े बुरी तरह कांप रहे थे । जैसे बचाब की कोशिश कर रहे हो किसी से। धूल-धूसरित हो गयी थी उनके देह — भयानक आतंक से चेहरा बिकृत हो गया था और होंठ फड़फड़ा रहे थे।

आँखे पथरा सी गयी थीं। मजूमदार बाबू ! मजूमदार बाबू ! भयातुर कंठ से मैंने कहा - आप क्या कर रहे है यह ? मजूमदार बाबू कांपे। फिर निगाह उठाकर उन्होंने मेरी ओर देखा। उफ ! कैसी दहशत थी उन आँखों में ? फिर आहत सर्प की भांति वे अपना सिर पटकने लगे। वह अभिमंत्रित तांत्रिक यंत्र कहाँ है शर्मा...? कौन ले गया उसे ? तांत्रिक यंत्र ! छाती पर जैसे घूसा मारा किसी ने, जेब टटोलते हुए मैने कहा - यह रहा यंत्र, मजूमदार बाबू लेकिन आपको हो क्या गया है? बेदना काफी बढ़ गयी थी मजूमदार बाबू की। अस्पष्ट स्वर में गों-गों किये जा रहे थे है फिर भी मेरा बाक्य सुनकर जड़ दृष्टि उठाई उन्होंने मेरी ओर । लेकिन कैसा पैशाचिक-सा चमत्कार हो गया । वह तांत्रिक यंत्र गायब था मेरी जेब से, मुझे लगा जैसे पागल हो जाऊँगा। विह्वल स्वर में चिल्लाकर मैंने कहा - अरे यंत्र कहाँ गया ?...मैने तो अपनी जेब में रखा था उसे। किन्तु सुन नहीं पाये मजूमदार बाबू जैसे मेरा मनस्ताप भरा स्वर । उखड़े से निःश्वास के मध्य क्षीण स्वर में सिर्फ इतना ही कहा - देखो, वह खड़ी है मणिमाला देवी ! देखो, देखो कैसी चमक रही हैं। उसकी आँखे । और वह रहा सिद्ध तांत्रिक यंत्र उसकी मुट्ठी में और उनका सिर एक ओर लटक गया। मृत्यु की शीतल छाया लहरा उठी उनके मुख पर, वे मर चुके थे। मैंने स्पष्ट सुना, उस तूफानी रात की सिसकियों के बीच जैसे कोई नारी मेरे समीप से पायजेब की झन झन आवाज करती हँसती हुई गुजर गयी हो । सहसा हवा का एक तेज झोंका घुस आया तहखाने में और उसी के साथ सड़ांध से भर उठा बाताबरण लगा, मानों कई सड़ी-गली लाशें पड़ी हुई हो वहाँ कहीं? मेरी स्थिति विचित्र सी हो गई । सम्मोहन जैसा कुछ छाने लगा मुझ पर और उसी के साथ अजीब किस्म का भारीपन भी महसूस होने लगा मस्तिष्क में । धीरे-धीरे मेरी चेतना शक्ति लुप्त होने लग गयी । अवशता का भाव भी भरता जा रहा था मन में और उसी स्थिति में मेरी दृष्टि सहसा घूम गयी उस कंकाल की ओर | भय और आतंक से भर उठा एकबारगी मेरा मन, मुंह से चीख निकलते निकलते रूक गयी। कंकाल अपनी जगह धीरे-धीरे हिल रहा था और उसी अवस्था में बगल में पड़े मजूमदार बाबू के निर्जीव शरीर की ओर भी बढ़ रहा था।

फिर रूक न सका मैं वहाँ । न जाने कहाँ से ताकत आ गयी मुझमें। गिरता-पड़ता किसी प्रकार रहस्यमय तहखाने के बाहर निकला मैं । उस समय सारी सृष्टि डूबी हुई थी घोर अंधकार में । जोरों से बारिश हो रही थी और तेज अंधड़ चल रहा था। अंधेरे में टटोल कर अपनी अटैची उठाई मैने - और

आंधी-पानी की परवाह किये बिना तेजी से दौड़ता हुआ भागा वहाँ से मैं । इस रोमांचकारी और अविश्वसनीय घटना को घटे लम्बा समय हो गया है - मगर जब कभी उसकी स्मृति जागृत होती है तो मेरा सारा शरीर सिहर उठता है एकबारगी। वह धूल-धूसरित अभिशप्त हबेली अब खण्डहर में बदल चुकी है लेकिन उस इलाके के लोगों के मन में अभी भी हवेली के प्रति भय और आतंक है। लोगों का कहना है कि कभी-कभी रात में आज भी किसी के रोने-चीखने और करूण स्वर में बिलाप करने की आवाज सुनायी पड़ती है हवेली में।
 
अध्याय १५ प्यासी आत्माएँ

सन् १९४८ ई. । उन दिनों मैं कलकत्ता में रहता था। वैसे मैं मुख्य रूप से भूत-प्रेत और तंत्र-मंत्र पर व्यक्तिगत रूप से शोधकार्यों में जुटा हुआ था। मेरे मित्र थे अखिलेश राय चौधरी। परामनोविज्ञान के क्षेत्र में काफी प्रसिद्ध थे राय चौधरी । उन दिनों वे कलकत्ता विश्वविद्यालय में उच्चपद पर थे। एक दिन सांझ के समय - जब मैं कनिंग स्ट्रीट से गुजर रहा था - तभी एकाएक मिल गये राय चौधरी । काफी दिनों बाद मुलाकात हुई थी। मुझे देखते ही बोले वह - अरे ? भाई शर्मा जी ! कहाँ थे आप? मैं कुछ कहने ही जा रहा था कि तभी बीच में ही फिर बोल पड़े महाशय, तुम तो जानते ही हो कि मुझे उस छोटे-से मकान में परेशानी हो रही थी और पिछले महीने मैंने एक मकान देखा अलीपुर में। पसंद भी आ गया मुझे। कम-से-कम दो सौ साल पुराना होगा वह मकान। मगर बराबर मरम्मत होते रहने के कारण देखने में उतना पुराना नहीं लगता पहले उसमें छावनी के अंग्रेज अफसर रहा करते थे। इसलिए मकान के कमरे बिलायती ढंग से सजे हुये हैं। मकान हवादार और आराम देह तो है ही इसमें सन्देह नहीं। मैंने तुरन्त तीन महीने की पेशगी देकर उसे किराये पर ले लिया पर बन्धु, चौथे दिन ही मुझे मकान छोड़ना पड़ा। क्यों, किस लिए छोड़ दिया आपने ऐसा आरामदेह मकान ? कलकत्ते में तो ऐसा मकान मिलना कठिन ही है - मैने कहा। सच बात तो यह है कि उस लम्बे चौड़े हबेलीनुमे मकान में एक ऐसा कमरा है जो बिल्कुल खाली है। उस कमरे के पास से गुजरते समय मुझे प्रत्यक्ष रूप से कुछ दिखाई सुनाई नहीं पड़ता था - लेकिन एक अजीब से भय के कारण मेरा सारा शरीर रोमांचित हो उठता था। चौथे दिन सुवह मैंने मकान की रखवाली करने वाली बुढ़िया को बुलाया और मकान की चाभी उसे थमाते हुए बोला - भाई मुझे यह मकान ठीक नहीं लगता। इसलिए छोड़ रहा हूँ इसे । बुढ़िया रूखे स्वर में बोली - मैं उसकी वजह जानती हूँ साहब । फिर भी आप इस मकान में रहने वाले दूसरे सब किरायेदारों से ज्यादा टिके । ज्यादातर लोग तो दूसरे ही दिन मकान छोड़कर भाग खड़े होते हैं। आपसे पहले इस मकान में तीन दिन तो कोई टिका ही नहीं। मेरा ख्याल है कि वे लोग आपके ऊपर काफी मेहरबान रहे। बे कौन लोग - मैंने आश्चर्य से पूछा ? वहीं जो इस मकान में रहते हैं। वे चाहे भूत-प्रेत-जिन्न हो या और कुछ बतला नहीं सकती मैं । मगर बे कई हैं और काफी ताकत भी रखते हैं। उस बुढ़िया ने, भाई शर्मा, इतनी भयानक गम्भीरता से ये शब्द कहा कि मैं इसके बाद उससे बात करने की हिम्मत न कर सका। राय चौधरी की ये बाते सुनकर बेहद उत्सुक हो उठा मैं । हँसकर बोला - आप भूत-प्रेत से डरते नहीं। न जाने कितना विचित्र अनुभब भी हुआ है आपको, फिर क्यों इतना भयभीत हो गये आप? भाई, ऐसी बात नहीं । झेंपते हुए बोले राय चौधरी - बात दरअसल यह है कि मुझे अपनी पत्नी के कारण मकान छोड़ना पड़ा । तुम तो जानते ही हो कि वह हद से ज्यादा इरपोक और कमजोर दिल की

औरत है। उसी के बार-बार कहने पर छोड़ना पड़ा मुझे मकान । यदि आप कहें तो मैं उस रहस्यमय मकान में कम-से-कम एक रात तो अबश्य रहना चाहता हूँ - मैने सहज भाव से कहा। कहने की आवश्यकता नहीं - दूसरे ही दिन मैं अलीपुर के उस रहस्यमय मकान में बोरिया-बिस्तर लेकर पहुँच गया । उस जमाने में अलीपुर का इलाका आज की तरह गुलजार नहीं था। चारो तरफ खामोशी छायी हुई रहती थी। गिनती के पचास-साठ मकान थे - जो काफी पुराने थे। वह रहस्यमय मकान अलीपुर में सुनसान जगह पर था। पास ही दो एक दुकाने चाय की थी और एक छोटा-सा होटल भी था किसी बंगाली का। जिसमें चाय के अलावा दोनों वक्त खाना भी मिलता था। मकान भीतर से बन्द था। मैं जरा आगे बढ़ा । तभी उस होटल का छोकरा नौकर - जो जठे-प्लेट धो रहा था - मेरे करीब आया और बोला - साहब क्या आप किसी से मिलना चाहते हैं?

हाँ ! मैंने सुना है कि यह मकान किराये पर देने के लिए खाली है। हाँ, यह मकान तो साहब ! खाली है। एक मुसलमान औरत इसकी रखवाली करती थी। वह पिछले हफ्ते इसी मकान में मरी पायी गयी । उसकी मौत बेहद दर्दनाक और हादसे से भरी थी। मैंने खुद अपनी आँखों से उसकी लाश को देखा था। उसका चेहरा काफी डरावना लग रहा था। मुंह खुला था आँखे बाहर को उबल पड़ी थी। मुंह से हेर सारा खून निकल कर फर्श पर फैला हुआ था। थोड़ा रूककर छोकरा आगे बोला - साहब मकान भुतहा है। अब तो और भी लोग इसमें रहने को राजी न होंगे। इस मकान का मालिक कौन है - मैंने पूछा ? "नबाब, बहादुर अली खाँ ।” खाँ साहब रहते कहाँ है ? लेक रोड पर उनका वहत बड़ा आलीशान मकान है। उसी में रहते है खाँ साहब काफी जमीन जायदाद और बेशुमार दौलत है उनके पास साहब। इतना समाचार मेरे लिए काफी था। मैंने एक रुपया जेब से निकालकर उस छोकरे को इनाम दिया और उसी समय खाँ साहब के घर जा पहुँचा । संयोग से बे घर पर थे। चेहरे से बुद्धिमत्ता टपक रही थी। बातचीत करने का हंग भी उनका बड़ा ही शिष्ट और आकर्षक था । जब उनको यह मालूम हुआ कि मैं भूत-प्रेत के रहस्यमय विषयों पर खोज कार्य कर रहा हूँ - तो बेहद प्रसन्न हुए वे । बड़ी विनम्रता से बोले - मकान आप की खिदमत में हाजिर है। आप जब तक चाहें - उसमें रह सकते हैं। किराये की तो बात ही नहीं है। इस समय वह मकान बेहद बदनाम है। ऐसी हालत में अगर आप मकान के रहस्य का पता लगा लेंगे तो उलटे में ही आपका शुक्रगुजार रहेगा, बातचीत के सिलसिले में मुझे पता चला कि खाँसाहब की पत्नी अल्लाह को प्यारी हो चुकी है। औलाद के नाम पर एक लड़की है सिर्फ जिसका नाम है मेहरुन्निसा । जब मैंने पहली बार मेहरुन्निसा को देखा तो देखता ही रह गया उफ। कितनी खूबसूरत थी वह । शब्दों में उसके सौन्दर्य और उसकी रूप राशि का वर्णन मैं नहीं कर सकता । लगा-जैसे अजन्ता-एलोरा की गुफा की कोई अभिषारिका साकार हो गयी हो मेरे सामने । जाने कब..

"

तक मुग्ध भाव से देखता रहा मैं उसकी ओर। आपका यह मकान कब से मनहूस हो गया है ? मैंने पूछा। यह ठीक-ठीक बतलाना मुश्किल है। पर मुझे इतना जरूर याद है कि बहुत सालों से इसका यही हाल है। थोड़ा रूककर खाँ साहब आगे कहने लगे - सच तो यह है कि यह मकान मेरे चाचा का था। आज से चालीस साल पहले उन्होंने मुर्शीदाबाद के किसी नबाब से खरीदा था मामूली दामों में । उस जमाने में यह मकान कलकत्ते में इशरत महल के नाम से जाना जाता था। चाचा से ही सुना था कि नवाब साहब ऐयाश तबीयत के थे। शराब और शबाब का बेहद शौक था उन्हें। रोजाना रात में नवाब साहब की महफिल जमती थी इशरत महल में । नवाब साहब कमसीन तवायफों के मखमल के पट्टे में पिरोये घुघरुओं की मधुर आवाज की कोमल लड़ियों पर तैरती थिरकती शराब की महक और बेला चमेली जूही की मिली-जुली सांझ होते ही फैलने लग जाती थी इशरत के कोने-कोने में ।। कुछ दिनों बाद दूसरा महायुद्ध शुरू हो गया। बर्मा पर जापानियों के हमले का प्रभाव बंगाल पर भी पड़ा । नतीजा यह हुआ कि नवाब साहब को इशरत महल के अलावा बंगाल में मौजूद अपनी तमाम जमीन जायदादों को एक-एक कर बेचना पड़ा । मेरे चाचा की कोई औलाद न थी। जब वे मरे तो उनकी जायदाद सम्भालने के लिए लाहौर से कलकत्ता आना पड़ा, मुझे। यहाँ आने पर यह मकान मुझे इसी तरह सूना नजर आया। और पता लगा कि उसमें रूहों का डेरा है। मुझे ये बातें मनगढन्त और काल्पनिक लगी। मैने मकान को मरम्मत कराया। रंग रोगन कराया। नये ढंग के फर्नीचरों से सजाया और एक अंग्रेज अफ़सर को किराये पर दिया । मगर वह ज्यादा दिन टिक न सका। एक ससाह बाद ही भाग खड़ा हुआ। पूछने पर उसने बतलाया कि मकान काफी भयानक है। रहने के काबिल नहीं है। उसके बाद से किरायेदारो का सिलसिला चल पड़ा। मगर कोई भी किरायेदार एक सप्ताह से ज्यादा ठहर न पाता मकान में । नतीजा यह हुआ कि मकान पूरी तरह बदनाम हो गया। आज उसकी जो हालत है वह आप खुद ही देख रहे हैं। अन्त में खाँ साहब अपनत्व भरे स्वर में बोले- अगर आप मेरी सलाह मानते तो मैं आपसे यही कहूँगा कि आप रात को मकान में हर्गिज न रहे। हो सकता है जान का कोई खतरा पैदा हो जाय। यह सुनकर मैं हँस पड़ा । दृढ़ता के साथ कहा - मुझे इस मामले में बेहद दिलचस्पी है। और अनजानी परिस्थितियों में हिम्मत का दम्भ भरना मैं कायरता समझता है। फिर भी मैं आपको सिर्फ इतना बताना चाहता हूँ कि मैं खतरों के बीच ही पला हूँ। भूत-प्रेत और खतरनाक से खतरनाक जिन्नों से मेरा सामना अब तक कई बार हो चुका है। आपके भुतहे स्थान में रहने से भी मुझे अपने दिल की मजबूती पर पूरा भरोसा रहेगा।

खाँ साहब ने एक बार मेरी ओर गहरी नजरो से देखा फिर मकान की ताली मेरे हवाले कर दिया। कहने की जरूरत नहीं, उसी दिन मैंने भुतहे मकान में अपना डेरा डण्डा जमा दिया। जब मैं रात बिताने के लिए पहली बार उस मकान में पहुँचा तो मेरा नौकर देवी दरवाजे पर खड़ा मेरा इन्तजार करता हुआ मिला। देवी उड़ीसा का रहने वाला था। काफी हिम्मती था वह । मुझे उस पर पूरा भरोसा था। मुझे देखते ही बोला वह - साहब ! मकान तो हवादार और काफी आराम देह है। मगर बिजली न रहने से कुछ तकलीफ हो सकती है।
 
मैंने उसकी बात अनसुनी करते हुए पूछा - तुम सुवह से इस मकान में हो। तुमने अभी तक कोई अजीब बात देखी या सुनी तो नहीं ? हाँ, साहब, मकान कुछ अजीब जरूर है। यह बात तो माननी ही पड़ेगी, क्या-क्या ? मेरे उत्सुकता का बाध टूटने लगा। मुझे कई बार मकान के निचले हिस्से में तो कभी ऊपर हिस्से में किसी के पैरों की आहट सुनाई देती रही है। मुझे दो तीन बार ऐसा भी लगा कि जैसे कोई मेरे कानों के पास ही फुसफुसा कर बातें कर रहा हो । इसके अलावा मैंने कुछ नहीं देखा सुना। तुम डरे तो नहीं ? नहीं, साहब इसमें डरने की क्या बात है। यह सुनकर मुझे विश्वास हो गया कि चाहे जो हो यह उड़िया नौकर मेरा साथ छोड़ेगा नहीं। नवम्बर का महीना था। ठंड पड़ने लगी थी। हवा में तरावट थी, रात की कालिमा गहरा गयी थी। हल्के बादलों के सफेद टुकड़े नीले आकाश में तैर रहे थे। शुक्ल पक्ष की एकादशी का चांद बादलों की

ओट से बाहर निकल आया था। चारों ओर रूपहली चांदनी बिखरी हुई थी। मकान के ऊपरी हिस्से में मैंने एक कमरा अपने लिये ले लिया था । कमरा काफी लम्बा चौड़ा था काफी हवादार भी था – तीन-चार बड़ी-बड़ी खिड़कियाँ थी जिनमें से होकर हवा का सैलाब कमरे में थम रहा था। कुछ देर तक मैं खड़ा रहा खिड़की के पास और बाहर छिटकी हुई चांदनी का आनन्द लेता रहा। देवी, टेबल पर खाना लगा चुका था तब तक । खाना खाने के बाद मैं आराम से पैर फैला कर पलंग पर लेट गया। मेरे कमरे के बगल में एक और कमरा था । जिसका एक दरवाजा मेरे कमरे से भी खुलता था । देवी ने अपने सोने के लिए उसी कमरे में इन्तजाम किया था। वह भी खाना खाकर अपने कमरे में चला गया। धीरे-धीरे रात गुजर रही थी। मुझे नींद आने का प्रश्न ही नहीं था। मैं जागता रहा । कभी-कभी पलकें झपक जाती थी। एकाएक मुझे ऐसा लगा कि कोई कमरे में विचित्र ढंग से गहरी सांसे ले रहा है। निश्चय ही वह किसी इन्सान की सांस नहीं थी। और तभी मुझे कमरे के पास एक बड़ा सा पीला प्रकाश दिखाई दिया। जो मनुष्य के आकार के बराबर था। वह कुछ देर तक तो स्थिर रहा अपनी जगह पर फिर धीरे-धीरे आगे बढ़ने लगा। फिर वह प्रकाश छोटी-सी गोली के रूप में बदल गया। प्रकाश की वह रहस्यमयी गोली बहुत देर तक कमरे में चारों तरफ उछलती कूदती रही, फिर अचानक गायब हो गयी। इसी के साथ एक और विचित्र घटना घटी जिसकी सपने में भी मुझे आशा नहीं थी। सहसा अपने कमरे का दरवाजा धड़ाक से खोलकर देवी बाहर निकला। उस समय उसके चेहरे पर डर का जैसा भयानक भाव था वैसा मैंने भाव आजतक कहीं नहीं देखा । वह मेरे बगल से तेजी से निकल गया फुस-फुसाते हुए। भागिये साहब, भागिये..वह मेरे पीछे-पीछे आ रहा है। लगा जैसे वह आबाज देवी की न हो। वह तेजी से सीढ़ियाँ उत्तरकर मकान के मुख्य दरबाजे के पास पहुँचा। फिर उसने बन्द दरवाजा झटके से खोला और बेतहाशा बाहर भागा। मैंने उसे कई बार आवाज दी, लेकिन उसने मेरी आबाज पर कोई ध्यान नहीं दिया।

अब मैं उस भुतहे मकान में अकेला रह गया। मेरी समझ में नहीं आ रहा था कि देवी किस बात से इतना भयभीत हो गया था ? कौन उसका पीछा कर रहा था ? एक टार्च लेकर पूरे मकान का चक्कर लगाया मैंने मगर मुझे कोई सन्देहप्रद बस्तु दिखलाई नहीं दी कहीं। मैं अपने कमरे में वापस आया। बिस्तर पर लेट गया। रात काफी गुजर चुकी थी। चाँद पश्चिम की ओर झुक गया था । आकाश बिल्कुल साफ हो चुका था। मुझे बिस्तर पर लेटे अभी दस मिनट भी नहीं हुये होंगे कि सहसा मेरे सामने एक काली-सी छाया प्रकट हुई। वह शनैः शनैः अजीब रूप धारण करती जा रही थी। उसका आकार और डील-डौल किसी दैत्य की तरह था। उसका सिर मानो छत को छ रहा था। मैं बिस्फारित नेत्रों से देखता रहा । मेरा खून पानी होने लगा। सारा शरीर रोमांचित हो उठा। उस समय मुझे ऐसा लगा कि जैसे उस दानव रूप छाया के सिर से दो आँखे मुझे घूर रही है। मैं सांस और दम साधे पड़ा रहा चुपचाप बिस्तर पर - अब उस छाया के ऊपरी भाग से नीले और पीले रंग के प्रकाश की दो तेज किरणें मुझ पर पड़ रही थीं । ठीक उसी ऊँचाई से जहाँ मैंने दो आँखे देखी थी। मैंने बोलने की कोशिश की। पर गला जैसे बन्द हो गया था। मैंने उठने की भी कोशिश की मगर

बेकार – मुझे लगा - जैसे कोई अदम्य शक्ति मुझ पर अपना प्रभाव डाल रही है। जैसे कोई अत्यन्त गतिमान महान शक्ति मेरी इच्छा और मेरे संकल्प का विरोध कर रही है और मुझे उस समय ऐसा लगा कि उस महान शक्ति का विरोध करना मनुष्य की शक्ति के बाहर की बात है। मुझे उस समय असहायता और अपनी तुच्छता का ऐसा अनुभव हो रहा था कि बतला नहीं सकता।

ज्यों-ज्यों मेरी यह भावना बढ़ती गयी - वैसे ही बैसे मेरे मन में भय का संचार गहरा होता गया। काफी प्रयास के बाद मैने इच्छा शक्ति को दृढ़ किया और काफी ताकत लगाकर बिस्तर से उठा । पर तभी मुझे धक्का-सा लगा और मेरा शरीर निर्जीव-सा होकर फिर बिस्तर पर गिर पड़ा और उसी के साथ मेज पर जलती मोमबत्ती की रोशनी धीमी पड़ने लगी। मेरा आतंक और बढ़ गया । मोमबत्ती बुझी तो नहीं - लेकिन लगा कि जैसे कोई अदृश्य शक्ति उसकी "लौ" को धीरे-धीरे बुझाने की कोशिश कर रही है। सहसा बुझ गयी मोमबत्ती और धुप अंधेरा छा गया कमरे में। भयावह आतंक के भाव ने मुझे घेर लिया। अन्धकार के समुद्र में डूबे हए उस कमरे में मैं था और थी वह भयानक दैत्याकार विकराल काली छाया। उसकी शक्ति का मुझे इतना विकट और भयानक अनुभव हो रहा था कि मेरा रोम-रोम कांप रहा था । सचमुच उस समय आतंक अपनी चरमसीमा पर पहुँच गया था। बस, अब दो ही बातों की सम्भावना थी - या तो मैं चेतना शून्य हो जाऊँगा, या फिर किसी तरह उस मायाजाल को तोड़ दूंगा और सच मानिए मैंने उस मायाजाल को आखिर में तोड़ ही डाला। एकबारगी चीख उठा मैं और उसी क्षण मुझे अपने आत्मबल का अनुभव हुआ और मुझमें उठने

की शक्ति आ गयी । उठकर खिड़की की ओर दौड़ पड़ा मैं और उसका पल्ला खोल दिया। उस समय मुझे एक चीज की सख्त जरूरत थी - प्रकाश की । खिड़की खुलते ही मुझे पश्चिम में हलता हुआ चांद नजर आया साफ स्वच्छ और शान्त। चांद की हल्की पीली रोशनी कमरे में आ रही थी और वह काली विकराल छाया अब कमरे से गायब हो चुकी थी। मैं पलंग की ओर मुड़ा ही था कि मुझे ऐसा लगा कि सारा कमरा जोर से कांप उठा हो । फिर कमरे में चारो ओर से चिनगारियाँ जैसी गोलियाँ निकलने लगी हरी-पीली लाल-नीली। वे विभिन्न रंगो की प्रकाश गोलियाँ कमरे में द्रुतगति से चक्कर काटने लगीं। उसी स्थिति में दलान में पड़ी

एक पुरानी कुसी अपने आप खिसक कर मेरी मेज के सामने आकर रूक गयी। फिर कुसी पर एक युबती का आकार प्रकट हो गया। वह जिन्दा थी मगर मौत की तरह भयानक- युबती काफी सुन्दर थी, पर उस समय उस चेहरे पर शोक, चिंता, पीड़ा,और व्यथा की मिली-जुली छाया तैर रही थी।
 

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