• Hello Friends You can Register on the Forum and by posting you can earn money too.

Horror रहस्यमयी कथाएँ complete

  • Thread starter Thread starter StoryPublisher
  • Start date Start date
अध्याय ३ अब मैं मुक्ति चाहती हूँ

योग तंत्र ज्योतिष के अनुसंधान ने पिछले तीस वर्षों के अन्दर मुझको जिन मानबेतर शक्तियों से परिचित कराया और जिन अलौकिक सत्यों की अनुभूति करायी, उनसे मेरे सामने जीवन और जगत के तमाम गृह रहस्य अनावृत हुए हैं। संसार में सबसे रहस्यमय है मनुष्य और उसका जीवन। यद्यपि आज का विज्ञान ग्रहों-नक्षत्रों पर पहुँचने का प्रयास कर रहा है और इसमें उसे सफलता भी मिल रही है, फिर भी अभी तक यह रहस्य नहीं खुल पाया कि मनुष्य क्या है और जीवन क्या है? मैं कौन हूँ, कहाँ से आया हूँ और कहाँ चला जाऊँगा-ये तीनों प्रश्न अनादि है और इन्हीं के उत्तर में भारतीय दर्शन की रचना हुई है। योग दर्शन को छोड़कर अन्य सभी दर्शन केवल सिद्धान्तों का प्रतिपादन करते हैं। योग दर्शन ही एकमात्र ऐसा दर्शन है जो ज्ञानात्मक और क्रियात्मक रूप से मानव और मानव जीवन के तिमिराच्छन्न रहस्यों को अनावृत्त करता है। उस समय मेरी उम्र मात्र सोलह वर्ष थी। एक दिन हरिश्चन्द्र घाट के श्मशान में जलती हुई एक चिता देख कर मेरे मन में अचानक वैराग्य की भावना पैदा हो गयी। लाश एक युवक की थी। शायद कुछ ही समय पूर्व उसका विवाह हुआ था। पत्नी के हाथों में लगी मेहदी का रंग अभी छटा भी नहीं था कि उसका जीवन वैधव्य की कठोर चट्टान से टकरा गया। वह एक ओर सीढ़ी पर बैठी विलाप कर रही थी।

मैं गालों पर हाथ धरे सोचने लगा-यह युवती किस लिये और किसके लिये विलाप कर रही है? उसके पति के शरीर में कौन था? वह कहाँ से आया था। फिर कहाँ चला गया? यदि यह सब वह नहीं जानती तो विलाप किसलिये कर रही है? क्या पार्थिव शरीर के लिये ? शायद शरीर के प्रति मोह ही बिलाप का एक मात्र कारण है। मृत्यु की धारणा मृत्यु के प्रति भय पैदा करती है और इसी से आभास होता है जीवन नाशबान है। यही भाबना दृढ होकर बैराग्य का रूप धारण कर लेती है। इसी बैराग्य ने मुझे जहाँ एक ओर अन्तर्मुखी बना दिया, वहीं दूसरी ओर मुझमें सत्य की खोज की प्रवृति भी जागृत कर दी। जलती हुई चिता अब राख में बदल चुकी थी। श्मशान में सांझ की स्याह चादर फैलने लगी थी। बोझिल मन लिये मैं भारी कदमों से हरिश्चन्द्र घाट की सीढ़ियाँ चढ़कर ऊपर आया। यह मेरा विद्यार्थी जीवन था, पर बहुत ही कष्टमय। बिजली बत्ती का इन्तजाम नहीं था सो रात्रि की पढ़ाई म्युनिसिपैलिटी की लालटेन की रोशनी में होती थी। मगर उस रात मन विषण्ण था। पढ़ाई-लिखायी में जी नहीं लगा। काफी देर तक चारपायी पर विचारमग्न पड़ा रहा, फिर न जाने कब नींद आ गयी। उसी अवस्था में मैंने एक विचित्र स्वप्न देखा...वास्तव में वह स्वप्न मेरे जीवन का संक्रांति काल बन गया। और वह स्वप्न था मैं चारपायी से धीरे-धीरे उठा। कमरे में अन्धकार था-मगर उस अन्धकार में भी मैंने अपने पार्थिव शरीर को बिस्तर पर निरचेष्ट पड़ा हुआ देखा। उस समय मेरे शरीर के चारों ओर रंग-बिरंगे प्रकाश के स्फुलिंग घूम रहे थे। दरबाजे बन्द थे, पर मैं बिना उन्हें खोले ही कमरे के बाहर निकल आया। बाहर शुक्ल पक्ष की चांदनी छिटकी हुई थी। शान्त चांदनी के रूपहले प्रकाश में मैंने गंगा के किनारे एक मढ़ी पर मृग चर्म के आसन पर पद्मासन मुद्रा में बैठी हुई एक युवती को देखा। बाद में मालूम हुआ कि वह भैरवी थी-शरीर पर लाल रंग की रेशमी साड़ी और उसी रंग का दुपट्टा था। दोनों भुजाओं, मस्तक और गले में लाल चन्दन की पतली रेखायें। दोनों भौहों के बीच लाल सिन्दुरका गोल दीका। आम की.. फांक जैसी कुछ-कुछ रक्ताभ आँखें। कण्ठ में बड़े आकार के रूद्राक्ष की माला। कलाइयों में शंख की चूड़ियाँ। शरीर का रंग एकदम काला। नाक-नक्श आकर्षक और कमनीय, मगर स्थिर और कठोर, कसा हुआ सुडौल तन। पास ही चमचमाता हुआ बड़ा सा त्रिशूल रखा था। उसकी बड़ी-बड़ी काली आँखों की अपलक दृष्टि से बंधा हुआ सा मैं उसके सामने स्थिर होकर खड़ा हो गया। उसकी दष्टि देखकर ऐसा लगा मानों वह मेरी प्रतीक्षा कर रही थी। आँखें मिलते ही हठात् मेरा सारा शरीर बेबस हो गया। मर्म को बेधने बाली उसकी उस तीक्ष्ण और स्थिर दृष्टि में एक बिचित्र सम्मीहन था। मैं मंत्रमुग्ध सा ताकता ही रह गया। भैरवी की पलकें एक बार धीरे से गिरी, फिर मूक संकेत से उसने मुझे अपने समीप बुलाया। जब मैं पास पहुँचा तो उसका दाहिना हाथ मेरे सिर पर उठ गया। मानों वह मुझे आशीर्वाद दे रही हो,

लेकिन सहसा मुझको झटका सा लगा। भैरबी स्थिर दृष्टि से अपलक मेरी ओर देख रही थी। फिर वह उठ खड़ी हुई और मुझे अपने पीछे आने का संकेत करके चलने लगी। मैं उसके पीछे-पीछे किस स्थान पर पहुँचा, यह नहीं बतला सकूँगा। उस समय भैरवी का रूप बड़ा ही निर्मम और भयंकर था। मुझे साथ ले जाकर वह एक विशाल-श्मशान में खड़ी हो गयी। बहाँ चारों ओर पीपल, पाकड़ और गूलर के पेड़ खड़े थे और हर पेड़ के नीचे नर-कंकाल, हड्डियाँ, खोपड़ियाँ आदि पड़ी हुयी थी। मेरा दम घुटने लगा। श्मशान क्षेत्र के सामने एक विशाल मंदिर था। ऊपर जाने के लिये सैकड़ों सीहियाँ थीं। भैरवी के साथ किसी अज्ञात सम्मोहन के वशीभूत होकर मैं मंदिर की सीढियाँ चढ़कर ऊपर पहुँचा। देखा तो मंदिर के सामने पञ्च प्रेतासन है। बगल में पारिजात के पेड़ के नीचे सहस्रमुण्डी आसन है। उसके दूसरी ओर पंचवटी है। सिंहद्वार से प्रवेश करके मैं मुख्य मंदिर में पहुँचा। भीतर घना अन्धकार था। एक ओर पंचमुखी दीपाधार पर घी के दीप जल रहे थे-उसके मन्द आलोक में मैने सामने देबी छिन्नमस्ता की सजीब-सी रक्तवर्ण पाषाण प्रतिमा देखी। वह षोडश दल कमल के ऊपर आसीन थीं। कमल पुष्प के भीतर रति मुद्रा में आलिंगनबद्ध युवक-युवती लेटे हुये थे-जिनके ऊपर माँ के दोनों पैर थे। माँ के एक साथ में शोणित लगा बिकराल खड्ग था और दूसरे में स्वयं माँ का ही रक्त से सना मुण्ड। कटे हुये गले से रक्त की तीन धारायें निकल कर अगल-बगल खड़ी हाकिनी डाकिनी और शाकिनी की प्रतिमाओं के मुँह में गिर रही थीं। किसी का क्षीण स्वर सुनाई पड़ा-"ये तीनों रक्तधारायें ज्ञान, भक्ति और वैराग्य की प्रतीक हैं।” माँ के सामने खड़े वहत सारे लोग अपनी-अपनी बेदना अर्पित कर रहे थे। मैं भी जाकर उन्हीं के साथ खड़ा हो गया, किन्तु मेरी कौन-सी बेदना थी... कौन सी व्यथा थी? भैरवी भी मेरे निकट ही खड़ी थी। गम्भीरता के बावजूद उसका काला चेहरा मुझे उस समय बड़ा सुन्दर लगा। उसकी दृष्टि भी उतनी अन्तभेदी नहीं थी, पर अपलक और कठोर अवश्य थी। एकाएक मेरा मन अशान्त हो गया। भैरबी की दृष्टि पैनी होती जा रही थी। सहामुण्डी आसन पर बैठने से मन को शान्ति मिलेगी-यह सोचकर मैं उधर ही बढ़ गया। चारो ओर अंधेरा था। वातावरण स्तब्ध था। हवा की सरसराहट भी चौंका देती थी। मैं पालथी मारकर आसन पर बैठ गया। मन अपने आप शान्त होने लगा। फिर बिलकुल शान्त होकर किसी अतल गहरायी में इब गया। वह एक विचित्र अलौकिक अनुभूति थी। मैं समर्पण के एक नये प्रवाह में विभोर था और उसी अपार्थिव अनुभूति के बीच मैं अपने पार्थिव शरीर में वापस लौट आया। मेरा वह गहरा स्वप्न टूट गया। मगर यह क्या? मेरे कमरे का दरवाजा टूट कर एक ओर झूल रहा था।

कमरे में बहुत सारे लोग इकटे थे। सभी रो रहे थे। मेरा शरीर चारपायी से उतारकर जमीन पर लिटा दिया गया था और शब-यात्रा की व्यवस्था की जा रही थी। मैं संसार के लिये मर चुका था और मरे हुये काफी समय गुजर चुका था। अर्थात् मुझको जागने में यदि एक-दो घंटे की और देर हो जाती तो निस्सन्देह मेरी पार्थिव काया चिताको अर्पित कर दी गयी होती। मैं उठकर बैठ गया। ऐसा लगा मानों गहरी नींद सोकर उठा होऊँ। लोग अचकचाकर मुझसे तरह तरह के प्रश्न करने लगे, किन्तु भला मैं उन्हें क्या उत्तर देता, क्या कहता। यदि मैं उन तमाम दृश्यों और अनुभूतियों के बारे में बतलाता भी तो भला कौन विश्वास करता। गम्भीर होकर मैं सोचने लगा-क्या वास्तव में मैं मर गया था? क्या सचमुच इस बीच शरीर और संसार से मेरा संबंध टूट चुका था? यदि हाँ तो वह कौन सा शरीर और कौन का संसार था? वह सत्य था या यह सत्य है? यदि दोनों जीवन सत्य है, दोनों शरीर सत्य है और दोनों संसार भी सत्य है, तो जैसे यहाँ मर कर मैं उस संसार में जीवित हो उठा था वैसे ही उस संसार में भी मर कर अब इस स्थल जगत में जीवित हो उठा हूँ फिर? अब तक इस संसार के लिये मृत और उस अनजाने लोक के लिये जीवित था, परन्तु अब वहाँ के लिये मृत और यहाँ के लिये जीवित हूँ। मेरे सामने एक रहस्यमयी गुत्थी थी, जिसे मैं उस समय नहीं सुलझा सका। तब मेरी उम्र ही क्या थी... अनुभव और ज्ञान ही कितना था। हाँ, उस अनोखी अविश्वसनीय घटना ने मेरे लिये एक ऐसा मार्ग जरूर खोल दिया, जिस पर चलकर मैंने ऐसे तमाम सत्यों की खोज की और अनुभव प्राप्त किए जो लौकिक स्तर पर सम्भव नहीं है।

जीवन शाश्वत है। उसकी धारा अबाध गति से प्रवाहित है। मृत्यु से जीवन धारा में किसी प्रकार का व्यतिक्रम नहीं उत्पन्न होता, न तो कोई प्रभाव ही पड़ता है उस पर। उत्पत्ति से लेकर मानब जीवन विभिन्न स्तरों पर क्रम से विकसित होता रहता है। आज के भौतिकवादी बाताबरण और पैतृक परम्परा को मानते हैं। इस सन्दर्भ में ज्योतिष शास्त्र का कहना है कि जीवन को बराबर गतिमान बनाये रखने के लिये सौर-मण्डल की रश्मियों का प्रभाव प्रमुख है। सौर रश्मियों के विकिरण का प्रभाव सबसे ज्यादा मनुष्य की आत्मा, मन और विचारों पर पड़ता है। गर्भ में शिशु के आने पर वे सौर रश्मियाँ अपना प्रभाव डालना शुरू कर देती हैं। फिर उत्पत्ति से लेकर मृत्युपर्यन्त की जीवन यात्रा के दौरान उनका प्रभाव क्रमश: क्षीण होता जाता है। ज्योतिष के इस सिद्धान्त को आज वैज्ञानिकों ने भी स्वीकार कर लिया है। सर्वविदित है कि एटमबम के विकिरण ने हिरोशिमा के शिशुओं पर अपना प्रभाव डाला था।
 
सौर रश्मियाँ तीन प्रकार की हैं-वे आत्मा, मन और विचारों पर अलग-अलग अपना प्रभाव तो डालती ही है, इसके अलावा मनुष्य के स्थूल, सूक्ष्म और कारण शरीरों की रचना भी करती है। विचारों के स्तर पर रथूल शरीर, मन के स्तर पर सूक्ष्मशरीर और आत्मा के स्तर पर कारण शरीर का निर्माण बे रश्मियाँ ही करती है। मेरी इस कहानी की रहस्यमयी घटनाओं को समझने के लिये यह भी बतला देना आवश्यक है कि मनुष्य के एक साथ दो व्यक्तित्व होते हैं-आन्तरिक और बाह्य। इनके आधार पर मनुष्य एक साथ दो जीवन व्यतीत करता है। इन दोनों व्यक्तियों की उत्पत्ति मूलत: दो के संयोग से समझना चाहिये। बाह्म व्यक्तित्व का निर्माण मन और पार्थिव तत्वों के संयोग से होता है-इसका दूसरा नाम स्थूल जीवन है। आन्तरिक व्यक्तित्व का निर्माण मन और आत्मा के संयोग से होता है। भेषज विज्ञान इस तथ्य को अब अस्वीकार नहीं करता।

अब सामने आता है मन और आत्मा से सम्बन्धित प्रश्न? मन और आत्मा मूलत: एक चीज है, किन्तु रूप दो है-पहला रूप अर्थात् मन क्रियाशील है, जबकि दूसरा रूप अर्थात् आत्मा स्थिर है और मन की क्रियाओं का एकमात्र साक्षी है। मन और आत्मा के अस्तित्व को किसी न किसी रूप में प्राय: सभी धर्मों ने स्वीकार किया है। भौतिक विज्ञान की भी जब गति अवरूद्ध होने लगी तो उसे भी इनके अस्तित्व को स्वीकार करना पड़ा। यदि इसे स्वीकार न कर लिया गया होता कि मनुष्य का एक मन भी होता है तो शायद मनोविज्ञान का तो अस्तित्व ही नहीं होता। हालांकि मन अगोचर वस्तु है। मन को दो भागों में विभक्त किया गया है-व्यक्त और अव्यक्त अथवा चेतन और अचेतन। अव्यक्त अथवा अचेतन परामनोविज्ञान का विषय है। तांत्रिक साधना मन की इन दोनों अवस्थाओं से शुरू होकर आत्मसाधना में परिवर्तित हो जाती है। तीनों शरीर इस साधना के माध्यम मात्र हैं। मृत्यु का अर्थ है मन से पार्थिव तत्वों का पृथक होना है। यह अलगाव तभी होता है जब सौर रश्मियों का प्रभाव क्षीण हो जाता है। मन और विचार तत्व के बीच चित्त है। बिचार जब धीरे-धीरे चित्त में और चित्त मन में लीन हो जाता है तब मन मस्तिष्क के मूल केन्द्र में जाकर स्थित हो जाता है और बाह्य चेतना लुप्त हो जाती है। इसे मृत्यु की मूर्छा कहते हैं। आत्मा से मन का तथा मन से विचार तत्व व चित्त का तादात्म्य सूक्ष्मतम प्राण (ईथर) के धरातल पर स्थापित होता है। प्राण ही सबको एक सूत्र में पिरोए रहता है। मूल केन्द्र में मन के स्थित होते ही प्राण में झटका लगता है और वह मन को अपने साथ लेकर शरीर के किसी भी रास्ते से बाहर निकल जाता है-यह मृत्यु का पहला रूप है। आत्मा अपना अस्तित्व शरीर के मूल केन्द्र में बनाये रखती है, जिसके फलस्वरूप रथूल दृष्टि से मृत्यु हो जाने के बाद भी सिर का पिछला भाग गर्म रहता है, जो इस बात की ओर संकेत करता है कि अभी शरीर में आत्मा का अस्तित्व है। मृत्यु के समय बाताबरण में एक नीरब बिस्फोट होता है इसके साथ ही शरीर के परमाणुओं का विघटन शुरू हो जाता है। शरीर नष्ट हो जाने के बाद भी वे परमाणु बातावरण में बिखरे रहते हैं। उनमें बासना के कण भी विद्यमान रहते हैं, जिनके कारण वे परमाणु बासना के अनुसार फिर से । आकार बनाने की दिशा में प्रवृत्त हो उठते हैं। सूक्ष्मतम प्राण वायु के कणों का आश्रय लेकर वे परमाणु एक स्थान पर एकत्र होने लगते हैं। जब एक दूसरे से आकर्षित होकर बे पूर्ण रूप से एकत्र हो जाते हैं, तब स्थूल शरीर जैसे रूप का निर्माण कर बैठते हैं। इसी रूप को बासनामय या प्रेतशरीर कहते हैं। सूक्ष्मजगत का यह शरीर निम्न स्तर का होता है। आत्मा बिना शरीर के कभी नहीं रह सकती। उसे कोई भी किसी भी प्रकार का शरीर चाहिये। बासना शरीर का निर्माण मनुष्य की चित्त वृत्ति पर आधारित है-कभी यह जल्दी हो जाता है तो कभी देर भी लग जाती है। मगर जब निर्माण पूरा हो जाता है, उसके बाद ही स्थूल शरीर को छोड़कर अपने केन्द्र से आत्मा निकलती है और तत्काल बासना शरीर में प्रवेश कर जाती है। यह मृत्यु का दूसरा रूप है। शरीर कोई भी हो - उसकी रचना में कुछ समय लगता है। गर्भ में स्थूल शरीर की रचना पूर्ण होने पर ही आत्मा प्रबेश करती है। स्थूल शरीर में प्रवेश करते ही आत्मा उस शरीर को गर्भ के बाहर निकालने के लिये प्रयत्न करने लगती है। बासना-शरीर में आत्मा को प्रेतात्मा की संज्ञा दी गयी है। यहाँ भी वह वासनामय मन के क्रिया कलापों का साक्षी है। मन बासना बेग के कारण अशान्त रहता है। स्थूल शरीर कर्मप्रधान है। वासना का योग कर्म से होता है, अत: स्थूल-शरीर के अभाव में प्रेतात्मा अपनी वासना को पूर्ण कर सकने में असमर्थ होती है-यही उसका मूल दुख है। प्रेतात्मा अपनी बासना को पूर्ण करने के लिये प्राय: मनुष्य का सहारा लिया करती है। जीवन काल में जो मुख्य बासना-कामना होती है, वही प्रेतजीवन में मुख्य क्लेश का कारण भी बनती है। उन्हें पूर्ण करने के लिये, तृप्त होने के लिये प्रेतात्मायें चक्कर लगाया करती हैं और अपनी कामना के अनुकूल मनुष्य के भीतर प्रवेश करके उसे पूर्ण कर लेती हैं। यदि प्रेतात्मा शक्तिशाली होती है तो अनुकुल मनुष्य के अभाव में वह किसी भी मनुष्य के भीतर प्रवेश करके इच्छानुसार उससे काम करवा कर तृप्ति अनुभव करती है। बासना अच्छे संस्कार की भी होती है और बुरे संस्कार की भी। यह पढ़कर आपको आश्चर्य होगा कि हम और आप सहसा जो अच्छा या बुरा काम कर बैठते हैं, जिसकी कल्पना भी कभी नहीं की गयी होती है, समझ लीजिये कि वह काम किसी प्रेतात्मा द्वारा प्रेरित होकर ही किया गया है।

कभी-कभी प्रेतात्मायें मनुष्य के भीतर प्रवेश करके स्थायी रूप से अपनी बासना को पूर्ण करने का प्रयास करती हैं। इस स्थिति को "प्रेतबाधा" की संज्ञा दी गयी है। यदि बासना-शरीर की रचना पूर्ण नहीं हो पायी है तथा आत्मा स्थूल-शरीर में ही बनी है, और ऐसी अवस्था में स्थूल-शरीर को जला दिया गया, तो समझें कि ऐसे मृत मनुष्य की मुक्ति में काफी समय लगता है। उसकी आत्मा बिना शरीर के भटकती रहती है। ऐसी आत्मा को जीवात्मा की संज्ञा दी गयी है। जीवात्माओं में प्रेतात्माओं से कहीं अधिक शक्ति होती है। यदि उनकी वासना अच्छे संस्कार की है तो वे अनुकूल मनुष्य की सहायता करती है, उसे प्रेरणा देती है और उनके अभाव को पूर्ण करने की चेष्ठा करती है, किन्तु यदि वह जीवात्मा बुरे संस्कार बाली है तो वह दुष्ट और चरित्रहीन मनुष्यों के कार्य क्षेत्र में सहायता करेगी। प्रेतात्मायें पृथ्वी के गुरुत्वाकर्षण से बाहर नहीं निकल पाती, किन्तु जीवात्मायें उसकी सीमा के बाहर निकल कर अन्य ग्रहों-नक्षत्रों तक की यात्रा करने में समर्थ होती है। प्राणशक्ति की प्रबलता के कारण इनकी गति सर्वत्र होती है। वे अपनी प्रबल इच्छाशक्ति के साथ संकल्प शक्ति को भी युक्त करके कुछ समय के लिये अपने पूर्व स्थूल शरीर का भी निर्माण कर उसके माध्यम से भौतिक सुख पाने की क्षमता रखती हैं। इसके अलावा वे कल्पना के अनुसार स्थूल सृष्टि कर सकने में भी समर्थ होती है। उस बिचित्र अविश्वसनीय घटना के लगभग बीस बर्ष बाद-जबकि मैं उसे प्राय: भूल चुका था-मुझे मरणोत्तर जीवन के इसी रहस्यमयी विषय पर "ओरियन्टल रिसर्च सोसायटी" की ओर से शोध कार्य करने के लिये नेपाल जाना पड़ा। मैं शुरू से ही एकान्त प्रेमी हूँ। संयोग से मेरे एक नेपाली मित्र । महोदय ने मेरे रहने की काफी सुन्दर व्यवस्था कर दी। जो मकान मिला, एक मंजिला था। तीन बड़े बड़े कमरे थे।
 
मकान काफी पुराना होते हुये भी साफ-सुथरा और हवादार था। मैंने एक कमरा तो अपने नौकर "थापा" को रहने के लिये दे दिया, शेष दो में से एक कमरे को अध्ययन कक्ष बनाया और दूसरे को शयन कक्ष। मकान के पीछे काफी लम्बा-चौड़ा दालान भी था। उसी में एक ओर थापा ने भोजन आदि बनाने का इन्तजाम कर लिया। जिस इलाके में मकान था, उसके तीन ओर तो ऊँचे-ऊँचे पहाड़ थे, जिनकी चोटियों पर हमेंशा बर्फ जमी रहती थी। एक ओर मीलों तक फैली हुई समतल घाटी थी। उसके छोर पर पूरब की ओर मुड़ती हुई एक पहाड़ी नदी वहती थी। उसके पार घने जंगलों का सिलसिला था। उस शान्त घाटी में मेरे मकान के अलावा नदी से थोड़ी दर पर पाँच-छ: मकान और थे, मगर उनमें कोई रहता नहीं था। मेरे घर से लगभग एक मील दूर उन स्थानों के उत्तर में किसी विशाल मंदिर का ध्वन्साबशेष था। जब घाटी में रात का अंधेरा घिर जाता तो अपने मकान और आस-पास की निस्तब्धता मुझे इतनी आकर्षक लगती कि मैं छत पर बैठा घंटों उसका आनन्द लेता था। उस दिन कार्तिक की पूर्णिमा थी। पहाड़ों के हिमाच्छादित उत्तुंग, शिखरों की ओट से पूर्णिमा का रूपहला चांद झांक रहा था। घाटी में कुहरे की सफेद चादर में लिपटी स्निग्ध चांदनी बिखरी हुई थीं। सहसा उस निस्तब्ध बाताबरण में धीमें स्वर में किसी के गीत गाने की आवाज गूंजने लगी। ऐसा लगा मानों कोई करूण कण्ठ से विरह-गीत गा रहा हो। ध्यान से सुनने पर स्पष्ट हो गया-वह नारी स्वर था। करूणा में डूबे उस गीत में असीम व्यथा और व्याकुलता थी। आधी रात को यह कौन स्त्री विरह-वेदना से कातर स्वर में गया रही है? कुछ ही क्षणों बाद वह गीत मर्मभेदी चीत्कार और बिहल रूदन में बदल गया, लेकिन तमाम दयार्दता के बावजूद उस क्रंदन की विशिष्टता अलग ही झलक रही थी। कुल मिलाकर मुझे वह गीत और रूदन दोनों ही अमानवीय लगे। जब मैंने दूसरे दिन थापा से इसके बारे में पूछा तो उसने बताया कि हर पूर्णमासी की रात इसी प्रकार. किसी स्त्री के पहले गीत गाने की. फिर रोने की आवाज सनाई पड़ती है. पर आज तक उस स्त्री की शक्ल किसी ने नहीं देखी है। वह कौन है, क्यों गाती है, फिर रोती क्यों है... इसे भी आज तक कोई नहीं जान सका है। इतना जरूर सबको मालूम है कि वह आवाज मन्दिर के खण्डहर से आती है। उस दिन मेरा मन किसी काम में नहीं लगा। चित्त में अजीब सी व्याकुलता समायी रही। दूसरे दिन न जाने किस प्रेरणा के वशीभूत होकर मैं नदी की ओर चला गया। मन्दिर के ध्वन्सावशेष के सामने पहुँचकर मैं एकदम स्तब्ध रह गया।

सहसा बीस वर्ष पूर्व स्वप्न में देखे गये मन्दिर का आकार-प्रकार मेरे मानस-पटल पर स्पष्ट हो गया। कहीं कोई असमानता नहीं थी। सब कुछ बही था। वैसी ही सीढ़ियाँ, वही सहवमुण्डी आसन का चबूतरा, बही पंच प्रेतासन और पंचवटी का बही वृक्ष। सिर्फ इतना ही अन्तर था कि मन्दिर अब खंडहर में बदल चुका था और सब कुछ ज्यों का त्यों था। न जाने किस भावावेश में मैं मन्दिर के भीतर चला गया। सामने देबी छिन्नमस्ता की हूबहू बैसी ही पाषाण प्रतिमा खड़ी थी। काफी देर तक मन्दिर के चारो ओर घूमता रहा। मेरे समाने एक अविश्वसनीय सत्य था। मैंने कभी कल्पना तक न की थी इसकी। बड़ी देर तक घूमने के बाद मैं सहखमण्डी के चबूतरे पर बैठ गया और सोचने लगा उस रोज अपने शरीर से मेरे निकलने का प्रयोजन क्या था? वह भैरवी कौन थी? अपने साथ मुझे किसलिये इतनी दूर इस मन्दिर में ले आई थी। जब मन्दिर का पार्थिव अस्तित्व है तो उस भैरवी का भी .....। एकाएक दिमाग को झटका सा लगा। वह भैरबी अब पार्थिव शरीर में कहाँ होगी? जब स्वप्न की स्थिति में उसके साथ आया था, उस समय यह मन्दिर खण्डहर के रूप में नहीं था। निश्चय ही वह भैरबी मुझे सैकड़ों वर्ष अतीत में ले गयी थी-जिस समय वह मन्दिर अपनी आन बान शान से खड़ा रहा होगा। इसका मतलब वह भैरबी निश्चय ही कोई सूक्ष्म शरीरधारिणी आत्मा थी। एक महीने के बाद फिर पूर्णिमा की रात आयी। अर्द्धरात्रि का समय। वैसा ही निस्तब्ध, शान्त बाताबरण। ओस में भीगी चांदनी बिखरी हुई थी। सहसा वायुमण्डल में गीत की स्वर-लहरी थिरकने लगी। फिर वही करूण क्रन्दन और रूदन। आबाज मन्दिर की ओर से ही आ रही थी। मैं तैयार बैठा था। तुरन्त मन्दिर की ओर चल पड़ा। वहाँ पहुंचने में अधिक समय नहीं लगा। रूदन का करूण स्वर मन्दिर की दीवारों से टकराकर अभी गूंज ही रहा था।

सीढ़ियाँ चढ़कर मैं ऊपर पहुँचा। वहाँ का दृश्य देखकर मैं स्तब्ध अबाक् रह गया। अपने स्थान से हिल डुल भी नही सका। जड़बत खड़ा ताकता ही रह गया-सामने पंचवटी के नीचे सहखमुंडी आसन के चबूतरे पर बीणा बजाता हुआ एक युबक तल्लीन होकर कातर स्वर में धीरे-धीरे राधा का बिरह गीत गा रहा था। उसके पैरों को किसी की घनी केश-राशि घेरे हये थी। कोई युवती थी शायद। वह उस युबक के दोनों पैर सीने से लगाये रो रही थी। सहसा युबक ने कहा, "छोटी माँ, अब चलिये। भोर होने वाली है।" "चलती हूँ।” युबती गिड़गिड़ा उठी, "मगर एक बार फिर बही गीत सुना दो। कृष्ण के बिरह में कातर राधा की व्याकुलता...' "नहीं, अब नहीं। तुम मुझे पथभ्रष्ट करने पर तुली हुई हो। अब, चली जाओ। मैं तुमको बार-बार मना करता हूँ कि यहाँ मत आया करो, लेकिन...' "लेकिन तुम्हारा गीत...तुम्हारा स्वर मुझे पागल बना देता है। मैं अपने को बहुत समझाती है पर तुम्हारे गीत की मूर्च्छता मुझे यहाँ आने पर विवश कर देती है। फिर मैं अपने को रोक नहीं पाती।" युवती गीले स्वर में कह रही थी, "रही पथभ्रष्ट करने की बात, सो किसने किसको पहले पथभ्रष्ट किया है-यह तुम अच्छी तरह जानते हो। तुमने ही मेरे आचरण, संयम,निष्ठा और दस वर्षों की कठोर साधना को अपनी सम्मोहन-शक्ति से नष्ट कर दिया। आत्मा की मुक्ति की ओर अग्रसर मेरे जीवन में तुमने ही बिष घोल दिया। बैधव्य के कठोर संयम मेरे आचरण पर तुमने ही कुठाराघात किया है। दोष किसका है? मैंने तुमको पहले नहीं चाहा था। तुम यहाँ आये ही क्यों? किसका इशारा था तुम्हारे बहाँ आने में? बोलो...बोलो...

" मगर युबक ने युवती की बातों पर कोई ध्यान नहीं दिया। बीणा को कन्धे पर रखकर वह धीरे-धीरे पैर उठाता हुआ एक ओर चल पड़ा। युबती दोनों हाथों के बीच मुँह छिपा कर फफक-फफक कर रोने लगी। उसके रूदन का करूण कातर स्वर मन्दिर की दीवारों से टकराकर बातावरण में बिखरने लगा। मैं युवती के समीप जाकर खड़ा हो गया। मेरा मन विचलित हो उठा था। देशकाल को जैसे भूल गया था। आखिर मुझसे रहा नहीं गया तो हौले से पूछ बैठा-"तुम कौन हो? तुम्हारा दुख मुझसे देखा नहीं गया। मेरा हृदय फटा जा रहा है तुम्हारा स्थिति देखकर। बोलो, तुम कौन हो?"

युबती मेरी बात सुनकर खड़ी हो गयी। उसके ऊपर भरपूर चाँदनी पड़ रही थी उस समय। हे भगवान ! मेरे सामने बही भैरबी खड़ी थी-स्वप्नवाली भैरबी। शरीर का सारा रक्त जैसे बर्फ हो गया। आँखें मिलते ही मैं बेबस हो गया। सिर्फ दो फुट की दूरी से दो जलती हुई स्थिर आँखें मेरे चेहरे की ओर देख रही थी...ये क्या किसी बाघिन की आँखें हैं? मैं कांप उठा। नहीं, ये किसी युवती की आँखें है। सारा शरीर पाषाण की तरह निश्चल था, आँखें भर मशाल की तरह जल रही थी। उसी क्षण मानों मुझे होश आया। शरीर की नस-नस में मानों एक बिजली सी दौड़ गयी। सहसा बे जलती हुई आँखें बुझ गई। चेहरे पर सहज भाव उभर आया। मेरा हाथ थाम कर बोली-"मैं कौन हूँ...बही जानना चाहते हो न ? मैं तुम्हारी ही प्रतीक्षा में थी। उस दिन गंगा घाट पर तुम मुझसे मिले थे-तभी से तुम्हारी प्रतीक्षा कर रही थी। तुमको यहाँ पाकर बड़ी शान्ति मिली। आओ मेरे साथ।"

मैं उसकी यह रहस्यमयी बातें समझ नहीं सका, पर सम्मोहित सा उसके पीछे-पीछे चल पड़ा। वह मुझे लेकर एक दुमंजिले मकान में पहुँची। उस लम्बे-चौड़े कमरे में प्रकाश हो रहा था। एक और बड़ा सा पलंग था, जिस पर रेशमी चादर बिछी थीं। सामने लकड़ी के एक छोटे से मन्दिर में कृष्ण काली की पीतल की मूर्ति थी, जिसके गले में जबा पुष्प की माला पड़ी थी। घी का चौमुखा दीप जल रहा था। धूपबत्ती भी जल रही थी। कमरे के सुगन्धित बाताबरण में एक विचित्र सी अलौकिक शान्ति छायी हुई थी। वह कहने लगी- "मेरा नाम शकुन्तला है, पर मैं दुष्यन्त की शकुन्तला नहीं हूँ। बस शकुन्तल की व्यथा और ब्याकुलता भर है मुझ में। इसी से मुझे यह नाम सार्थक लगता है। तुमको कैसा लगा?"

"बहुत सुन्दर।"

"बैठो। पलंग पर ही बैठो। संकोच मत करना।”

मैं पलंग पर बैठ गया। उसने कृष्ण काली के सामने रखी हुई चांदी की कटोरी उठा ली। उस समय वह बहुत शान्त और गम्भीर थी। उसकी चितवन में गहरापन था, पर तीक्ष्णता नहीं थी। उसने कटोरी की ओर इशारा करते हुये पूछा,"पीयोगे?"

"क्या है?"

"तीर्थ यानी मदिरा। माँ का प्रसाद है। इन्कार मत करना।" यह कहकर उसने तीर्थ-यात्र मेरे होठों से लगा दिया। मैं उसे एक सांस में पी गया। मदिरा बड़ी मीठी लगी, मगर सारा शरीर एकदम झनझना उठा।
 
शकुन्तला ने वह कटोरी फिर तीर्थ से भरी और अपने गले में ढाल लिया। इसके साथ ही उसको आँखें रक्ताभ हो गयीं। अब उसके रूप में उग्रता के स्थान पर सौम्यता का भाव उतर आया था। यौवन की उष्णता का स्पर्श और मदिरा के गुलाबी नशे का मिला-जुला प्रभाव मेरे बिबेक को भी ले डूबा। मैंने अपने को उसके आलिंगन में बंध जाने दिया। उसी अवस्था में कानों के पास उसका कोमल स्वर सुनाई पड़ा। वह कह रही थी-मैं एक मूर्तिमान अभिशाप हूँ। एक ऐसा हीन व्यक्तित्व हूँ जो किसी के काम नहीं आ सकी। कुमारीत्व का विसर्जन स्त्रीत्व के बल पर ही सम्भव है। मैं बाल विधवा हूँ। बंगाल की एक रियासत की छोटी रानी। पति का मुख देखने के पूर्व ही मैं विधवा हो गयी थी। वैधव्य के कठोर नियमों का पालन करते हुए मैंने एक युवा तांत्रिक सन्यासी से तंत्र की दीक्षा ले ली। तंत्र की साधना आत्मा की साधना है। इसके लिए पहले मन को साधना पड़ता है, लेकिन मैं मन को नहीं साध सकी और अपने दीक्षा गुरू से ही प्रेम कर बैठी। वह भी मुझसे प्रेम करता था-मगर पवित्र प्रेम...निस्वार्थ...गुरू तुल्य प्रेम। मगर मेरा प्रेम बासना में डूबा था।

तंत्र साधना में "वासना" का कोई स्थान नहीं है। बासना-कामना के जन्म लेते ही सब कुछ नष्ट हो जाता है। मगर मुझे इसकी चिन्ता नहीं थी। सन्यासी शायद मेरे मनोभाव समझ गया था सोएकदिन बिना बतलाये यहाँ चला आया। कहीं वह मेरी वासना की आग में झुलस कर पथभ्रष्ट न हो जाय शायद इसीलिए, मुझसे दूर हो गया था। मगर मैंने उसका पोछा नहीं छोड़ा। खोजती हुई मैं भी आ गयी यहाँ। जानते हो, मुझे यहाँ आए कितने वर्ष हो गये। पूरे सौ वर्ष। तब से यहीं भटक रही हूँ। मेरे दीक्षा गुरू, वह तांत्रिक सन्यासी भी तभी से भटक रहा है।"

.

.

एक दीर्घ निःश्वास लेकर उसने आगे कहना शुरू किया -"जब तक मेरा कुमारीत्व भंग नहीं होगा, तब तक मैं इसी तरह भटकती रहूँगी। तुम मुझे उबार लो...मुझे अपना लो। मेरे मन में जलती हुई आग को बुझा दो। मेरी अतृप्त कामना को पूर्ण कर दो। तुम्हारा एहसान कभी नहीं भूलूंगी। उसका कण्ठ अबरुद्ध हो गया। क्षण भर रूक कर वह भींगे स्वर में बोली, "तुम उच्च तंत्र साधक परिवार के हो। तुम्हारे रक्त में साधना का संस्कार है। उसकी स्पर्शानुभूति से मैं कृतार्थ हो जाऊँगी। मैं तुमको अब नहीं छोड़ सकती।" कहते-कहते उसने मुझे आलिंगन में जकड़ लिया। उसके अपरूप सुन्दरता की पर्ते खुल गयी, चांद सा उजला मुखड़ा, घनी स्याह केश राशि, बड़ी-बड़ी काली कजरारी आँखें, आकर्षक भंगिमा में उभरे हुये यौबन के चिन्ह सब निर्बसन होकर धीरे-धीरे मेरे अस्तित्व में लीन होने लगे और अन्त में उसका संगमरमरी शरीर मुझसे एकाकार हो गया। फिर मुझे होश नहीं रहा। पता नहीं कब, किसी क्षण वह कुमारी से पूर्ण नारी बन बैठी... जब चेतना लौटी तो देखा - मैं कमरे में निहाल पड़ा है और थापा पास खड़ा घूर रहा था।

मुझे चैतन्य देख कर वह बोला-"साहब ! मैं आपको पूरी रात खोजता रहा। आप यहाँ कब और कैसे पहुँच गये? मैंने थापा को कुछ नहीं बतलाया। जब चलने लगा तो अचानक धूल से भरे उस उजाड़ कमरे के एक कोने में दृष्टि पड़ गई। मैं आश्चर्य चकित रह गया-वहाँ सोने का एक लॉकेट पड़ा था। उस लॉकिट को मैंने उस भैरवी के गले में झूलते देखा था। इस घटना को हये लगभग सोलह वर्ष हो गये। सचमुच उस तांत्रिक भैरवी ने मेरा साथ नहीं छोड़ा। आज भी मैं उसकी आत्मा से मुक्त नहीं हूँ। जिसको मैं अनुभव अवश्य करता हूँ, मगर उसे किसी को बतला नहीं सकता। फिर भी मैं सन्तुष्ट हूँ, प्रसन्न हूँ। जीवन के प्रति शिकायत नहीं है, क्योंकि मैं जीवन

का रहस्य समझ गया हूँ। अन्त में यह बताना देना आवश्यक है कि उस तांत्रिक भैरवी से मुझे कोई भौतिक लाभ नहीं है। यह सत्य है कि यदि मैंने उसे लौकिक सुख दिया तो उसके बदले उसने मेरी पारलौकिक सहायता की। उसकी सहायता से उसके साथ चलकर मैं आज जिस स्थान पर पहुँचा हूँ, वह मानव चेतना की उच्चतम भूमि है, जहाँ पहुँचने के लिये लोग योग का सहारा लेते हैं।
 
अध्याय ४ परकाया प्रवेश

योग की उच्चतम सिद्धियों में एक सिद्धि परकाया प्रवेश भी है। परकाया प्रवेश का सीधा सा अर्थ है दूसरे के शरीर में प्रवेश करना। यह विशेषत: योग द्वारा ही सम्भव है, पर तंत्र की उच्चतम साधना । द्वारा भी लोग दूसरे के शरीर में इच्छानुसार प्रवेश कर सकते हैं। जिन मृतात्माओं में बासना और इच्छाशक्ति की प्रबलता रहती है, वे भी किसी की शरीर में प्रविष्ट हो जाती है। इसे भी एक प्रकार से "परकाया प्रवेश" की ही संज्ञा दी जा सकती है। मृतात्मायें जीवित और मृत दोनों शरीरों में प्रवेश करती हैं। जीवित शरीर में प्रवेश कर के जिस व्यक्ति का वह शरीर होता है, उसके माध्यम से वह अपनी अतृप्त वासना और इच्छाओं की पूर्ति करती है। इसी को "प्रेत-बाधा" की संज्ञा दी गयी है। मानव शरीर में वैसे तो ७२ हजार नाड़ियाँ हैं। केवल मस्तिष्क में ही लगभग ६ हजार नाडियाँ है, मगर उन सब नाड़ियों में मुख्य नाड़ियाँ तीन ही है- प्राणवहा, रक्तबहा और मनोबहा। जीवन धारण की प्रमुख प्रक्रियायें बराबर इन्हीं तीनों नाड़ियों में होती रहती है। इनके पूर्ण रूप से शिथिल हो जाने पर ही शरीर के परमाणुओं का विघटन शुरू होता है और शरीर से दुर्गन्ध निकलने लगती है। मृत्यु के बाद, पर तीनों नाड़ियों के शिथिल होने के पहले यदि अवसर मिल जाय तो स्वयं जीवात्मा अपने पार्थिव शरीर में प्रवेश कर पुन: जीवित हो सकती है। ऐसी बहुत सी घटनायें आप लोगों ने पढ़ी सुनी होगी कि अमुक व्यक्ति मरने के कुछ समय बाद फिर से जीवित हो उठा। जीवात्मा को अपने मृतकाया में पुनः प्रवेश करने की सम्भावना तो कम ही रहती है, मगर मृतात्माओं द्वारा प्रवेश करने की सम्भावना सर्वाधिक होती है। वे अबसर पाते ही मृतकाया में मुख के मार्ग से प्रवेश कर जाती हैं।

उनकी गर्मी के प्रभाव से शिथिल हो रही नाड़ियाँ पुनः चैतन्य हो उठती है और अपना-अपना काम करने लगती हैं। इस प्रकार दूसरे के शरीर में मृतात्मायें बहुत कम ही रह पाती हैं। फिर भी यदि कोई श्रेष्ठ और उच्च कोटि की मृतात्मा चाहे तो वह ऐसे शरीर में दीर्घकाल तक भी रह सकती है। काशी में एक दण्डी स्वामी रहते थे। नाम था स्वरूपानन्द। बेदान्त दर्शन के प्रकाण्ड विद्वान थे। मैंने विद्यार्थी जीवन में उन्हीं से बेदान्त का अध्ययन किया था। ८० वर्ष की अवस्था में भी वे पूर्ण स्वस्थ थे और उस समय वेदान्त पर एक पुस्तक लिख रहे थे। लेकिन एक दिन अकस्मात उनकी मृत्यु हो मयी। केवल मामूली सा ज्वर हुआ था। आखिर शव को जल प्रवाह के लिये ले जाया गया। शवयात्रा में मैं भी था। यथाविधि केदारेश्वर मन्दिर के सामने स्वामी स्वरूपानन्द का शव गंगा में प्रवाहित कर दिया गया। इसके ठीक दो काल बाद एक युवक सन्यासी मुझे मिला। वह मुझे देख कर मुस्कराया, बोला "पहचानते हो मुझे?" "नहीं ! मैं तो आपको पहली बार देख रहा हूँ।" मैंने कहा। सन्यासी ने गम्भीर स्वर में कहा, "मैं स्वामी स्वरूपानन्द हूँ।"

"यह कैसे सम्भव हो सकता है।"

"सम्भव है, सब कुछ सम्भब है।" उस युवक सन्यासी का नाम भी स्वरूपानन्द ही था। उसने जो विचित्र कथा सुनाई, वह अत्यन्त रहस्यमय थी। पता चला कि अपनी अधूरी पुस्तक को पूरी करने के लिये ही स्वामी स्वरूपानन्द की मृतात्मा प्रबल बासना बेग के फलस्वरूप एक ऐसे ब्राह्मण युवक के शरीर में प्रवेश कर गयी थी जिसकी उसी समय बीमारी के कारण मृत्यु हुई थी। उसके शरीर में जीवित होकर स्वामी स्वरूपानन्द ने पुनः सन्यास ले लिया और इसके बाद वे अधूरी पड़ी अपनी पुस्तक के लेखन कार्य में जुट गये। उच्चकोटि के तांत्रिक भी अपनी किसी कामना को पूरी करने के लिये कुछ समय के लिये विशेष तांत्रिक क्रिया के बल पर किसी जीवित व्यक्ति के शरीर में प्रवेश कर जाते हैं। काशी के नारद घाट मुहल्ले में काली जी का प्राचीन मन्दिर है। बाहर से तो वह मकान-सा लगता है, पर भीतर काली की भव्य प्रतिमा स्थापित है। १८-२० वर्ष पूर्व एक बंगाली सज्जन बहाँ पुजारी के रूप में नियुक्त हुये थे। नाम था चारुचन्द्र अवधूत। उनकी अवस्था उस समय ७० वर्ष से कम नहीं थी, फिर भी साधना के तेज से उनका मुख हमेशा प्रदीप्त रहता था।

चारू महाशय को कई सिद्धियाँ प्राप्त थीं। वे प्राय: रोजाना पूजा-पाठ करने के बाद अपनी कोठरी को भीतर से बन्द करके शरीर के बाहर निकल जाया करते थे। यदि उनको कुछ खाने की इच्छा हुई तो उस समय खा रहे किसी भी व्यक्ति के शरीर में रहस्यमय ढंग से प्रवेश कर जाते थे और पूर्ण रूप से तृप्त होकर बाहर निकल आते। इसी प्रकार वे अपनी तमाम इच्छायें पूरी कर लिया करते थे। जब मैंने उनकी इस क्रिया को पकड़ा तो हँस कर कहने लगे, "एक ही शरीर से आत्मा की सारी इच्छायें कैसे पूरी की जा सकती है? शरीर प्रकृति के नियम और धर्म में बंधा हुआ है, भला उसे तोड़कर कैसे सारी इच्छाओं को पूरा किया जा सकता है।" लेकिन परकाया प्रवेश के ये सब रूप मुझे उतना प्रभावित नहीं कर सके, जितना कि परकाया प्रवेश सिद्ध हिमालय के एक महान योगी ने मुझे प्रभावित कर और चमत्कृत किया था। मेरी रचनाओं को पढ़कर अब तक आप इतना तो अवश्य ही जान गये होंगे कि मैं शुरू से ही एक खोजी प्रवृति का आदमी हूँ।

मेरी अपनी भावना है, अपने विचार हैं और अपने सिद्धान्त हैं। मैं उसी के अनुसार योग तंत्र की दिशा में खोज करता रहता हूँ और मुझे इसमें सफलता भी मिलती है। यौगिक क्रियाओं द्वारा परकाया प्रबेश सभी योगियों के वश की बात नहीं है। इस विश्व में दो सत्ताएं हैं वस्तुपरक और आत्मपरक, दोनों को एक में जोड़ना ही "योग" का काम है। जहाँ तक वस्तुपरक सत्ता है- वहाँ तक शरीर है। उसके बाद आत्मा का ब्यापार शुरू हो जाता है। योग का कार्य है वस्तु सत्ता पर अधिकार कर आत्म सत्ता में प्रवेश करना। "यम" से लेकर "धारणा" तक योग यात्रा बस्तुपरक सत्ता की दीर्घयात्रा है। "सविकल्प समाधि" आत्मसत्ता यानी आत्मजगत में प्रवेश का मुख्य द्वार है - जिसमें योगी मनोमय शरीर द्वारा प्रवेश करता है। योग साधना की उच्चतम अबस्थाओं की प्राति के लिये एक मात्र मनोमय शरीर ही "साधन" है। जो वास्तव में सच्चे अर्थों में योगी हैं, वे स्थूल शरीर के रहते हये भी मनोमय शरीर में जीते हैं और बही शरीर उनकी साधना का माध्यम भी होता है। मनोमय शरीर अत्यन्त महत्वपूर्ण है। यही शरीर आत्मा का वाहक है। इस संसार और ब्रह्माण्ड के सभी लोक-लोकान्तरों में इसी शरीर को लेकर आत्मा गमन करती है। दार्शनिक के शब्दों में मनोमय शरीर से आत्मा का अलग होना ही मोक्ष, निर्वाण अथवा मुक्ति है। एक बार संबंध टूट जाने पर आत्मा.. जान होनी ही मोतियाण का की महिमा नोना फिर शरीर पकड़ सकती- यही आत्मा की मुक्ति है।

इस अवस्था में न वह कहीं जा सकती है और न कहीं जन्म ही ले सकती है। समाधि के कई स्तर हैं और उन स्तरों की अपनी-अपनी उन्नतियाँ हैं। समाधि के उन्नतिशील स्तरों में मनोमय शरीर के पूर्ण विकसित हो जाने पर योगी किसी प्रकार के समय और स्थान की बाधा के बिना किसी भी व्यक्ति से संबंध स्थापित कर सकता है...बिना बोले किसी के विचार को पढ़ सकता है...हजारों मील दूर बैठे ब्यक्ति के विचारों को भी जान-समझ सकता है...बिना कहे, बिना बतलाये और बिना समझाये कोई बात दूसरे में प्रवेश करा सकता है...किसी का संस्कार भी किसी में डाल सकता है...स्थूल शरीर के बाहर निकलकर लम्बी यात्रा कर सकता है...शरीर के बाहर घूम सकता है...और अत्यधिक उन्नत हो जाने पर मनोमय शरीर द्वारा किसी के भी पार्थिव शरीर में चाहे वह मृत हो या जीवित, प्रवेश कर सकता है। योग की जितनी भी सिद्धियाँ हैं, उन सबका संबंध मनोमय शरीर से ही समझना चाहिये। आपने कुण्डलिनी, सहस्रार, षट्चक आदि की चर्चा अवश्य सुनी होगी। आपने शायद यह भी सोचा होगा कि ये सब स्थूल शरीर में ही होंगे। जी नहीं, ये सब मनोमय शरीर में हैं। कुण्डलिनी एक महत्वपूर्ण शक्ति केन्द्र है। मनोमय-शरीर में जीने वाला व्यक्ति ही कुण्डलिनी को जगा सकता है और उसकी शक्ति की सहायता से अपनी आध्यात्मिक उन्नति भी कर सकता है। स्थूल शरीर और मनोमय-शरीर के बीच में सूक्ष्म-शरीर है। प्रेत-शरीर और वासना-शरीर इसी के रूपान्तर हैं। प्रारम्भिक अवस्था में योगी और तांत्रिक इस शरीर से अवश्य काम लेते हैं, मगर महत्वपूर्ण कामों के लिये इस शरीर का कोई उपयोग नहीं है। इस शरीर से उत्पन्न रूकावटों को हटाकर मनोमय-शरीर से संबंध स्थापित करने के लिये ध्यान योग" अति उत्तम साधन है। तांत्रिक लोग इससे भी एक कदम आगे हैं। बे इस साधन के साथ मदिरा का शोधन कर उसका भी सेवन करते हैं। आपको मालूम होना चाहिये कि मनोमय-शरीर बहुत नाजुक होता है। वह अन्य नशीली वस्तुओं से तो नहीं- मगर शराब से तुरन्त प्रभावित होता है।

उच्चकोटि के योगपरक तांत्रिक, प्राणायाम से सधे श्वास-प्रश्वास के मध्य पड़ने वाले अन्तर में अपने मन को एकाग्र करते हैं, फलस्वरूप तुरन्त ही कुछ समय में मनोमय-शरीर से उनका सम्पर्क हो जाता है। फिर वे कुछ भी कर सकते हैं- प्रेतात्माओं, सूक्ष्मात्माओं अथबा देवात्माओं आदि से किसी भी काम के लिये अलौकिक सहायता प्रास कर सकते हैं। कुछ सीमा तक असम्भव दीखने वाले कामों को भी पूरा कर सकते हैं। तरह-तरह के चमत्कारों का भी प्रदर्शन कर सकते हैं। अब प्रश्न यह है कि योगियों के लिये परकाया प्रवेश की क्यों और किसलिये आवश्यकता है? इसके उत्तर में मैं आपको संक्षेप में इतना ही बतला सकूँगा कि योगियों की मति-गति हमारी आपकी मति-गति से काफी भिन्न होती है। हम लोग जिस वस्तु को साध्य रूप में अपनाते हैं, उसे वे साधन के रूप में स्वीकार करते हैं। निर्लिस भाव से योग में पूर्ण तृप्त हुये बिना कोई भी योगी नहीं हो सकता, यह आप समझ लीजिये। योगियों के लिये यह संसार एक रंग मंच है। वे संसार आदि का अनुभव प्रास करने के लिये अथवा अपने किसी अधूरे पड़े सांसारिक कार्य को पूरा करने के लिये अथवा संसार का अध्यात्मिक कल्याण करने के लिये अपने अनुकूल किसी के शरीर में प्रवेश करते हैं। एक कारण और भी है- वह यह कि यदि उनका अपना शरीर अति वृद्ध या कमजोर हो गया होता है और उसके जरिये योग की कठिन साधना नहीं हो पाती है तो वे उसको त्याग कर किसी स्वस्थ और अनुकूल शरीर में प्रवेश कर जाते हैं। यह तो हुई मेरी कथा की पृष्ठभूमि- जिसके आधार पर मैं आपको हिमालय निवासी एक ऐसे योगी की कौतूहलपूर्ण कथा सुनाने जा रहा हूँ, जिसने दो सौ वर्ष के दीर्घकाल में अपने निज शरीर को सुरक्षित रखते हुये सोलह बार "परकाया प्रवेश" किया था।

जब मैंने पूछा कि परकाया प्रवेश का उद्देश्य क्या था तो उस महायोगी ने गम्भीर स्वर में बतलाया "संसार के विभिन्न रूपों का अनुभव प्राप्त करना।" उस योगी से मेरी भेंट हिमालय में हुई थी। योग-तंत्र के विद्वानों का कहना है कि भारत "महायोनि पीठ" है, जिसके उपरी दोनों कोणों पर महासरस्वती पीठ (कश्मीर) और महालक्ष्मीपीठ (कामरूप) है तथा नीचे के कोण पर महाकाली पीठ (कन्याकुमारी) है। मध्य में बिन्दु रूप शिव (महाकालेश्वर, उज्जैन) है। इस महायोनि पीठ के ऊपर हिमालय की गोद में पूरब से पश्चिम तक लगभग ६० मील का क्षेत्र बिल्कुल शून्यमय है। योगी तांत्रिकों की भाषा में यह हिम क्षेत्र"महाश्मशान" के नाम से प्रसिद्ध है। गोरख नाथ ने इसी महाश्मशान में साधना की थी। आदि शंकराचार्य से पराजित होकर कापालिक ने भी अपनी साधना के लिये इसी क्षेत्र को चुना था। गोरखनाथ की प्रसिद्ध अखण्ड धूनी इसी स्थान पर है। धूनी से निकलने बाली धूमशिखा आज भी कभी-कदा किसी भाग्यवान को आकाश का स्पर्श करती हुई दिखलायी पड़ जाती है। उस प्रदेश की हिमाच्छादित चट्टानों से टकराती हई "अलख निरसन की आबाज तो आज भी प्राय: लोगों को सुनाई पड़ जाती है। इसी क्षेत्र में कैलाश, मानसरोवर, रूप कुण्ड, गौरीकुण्ड भी है और चर्मचक्षु से परे कुछ ऐसे योगाश्रम, सिद्धाश्रम और मठ भी हैं जिनमें उच्च अवस्था प्रास दो सौ से हजार वर्ष की आयु वाले सिद्धों और योगियों की मण्डिलयाँ निवास करती हैं। उन्हीं में वह महायोगी भी थे, जिनकी मैंने अभी चर्चा की है। उनका नाम था सत्यानन्द सरस्वती। देखने में तो वे साठ-पैंसठ वर्ष से अधिक के नहीं लगते थे, किन्तु उनकी वास्तविक उम्र दो सौ वर्ष थी। चेहरे पर अलौकिक तेज था। नेत्रों में प्रखर ज्योति। शरीर का रंग गोरा, मूंछ, दाढ़ी तो नहीं थी, पर सिर की जटायें जमीन को छूती थीं। उनके शरीर से हमेशा विचित्र प्रकार की सुगन्ध निकलती रहती थी। महायोगी सत्यानन्द सरस्वती ने जो रोमांचक कथा सुनाई थी, वह उन्हीं के शब्दों में इस प्रकार है : पंचभूत तत्वों पर विजय प्राप्त कर लेने पर दो सौ ही क्या, दो हजार वर्षों तक भी पार्थिव शरीर को रखा जा सकता है। आत्मा और शरीर के संबंध की अवधि को ही काल या उम्र कहते हैं। मेरे इस दो सौ बर्ष के जीवन में रोमांच, कौतूहल और रहस्यों का एक ऐसा इतिहास छिपा हुआ है जिसका अनुभव शायद आज कोई भी एक साथ नहीं कर सका होगा। समझ में नहीं आता कि कहाँ से शुरू करूँ। पहले क्या कहूँ, अनगिनत कहानियाँ हैं। यह शरीर जितना कीमती और महत्वपूर्ण है तथा इसका कितना उपयोग है- यह मनुष्य तब समझता है, जब शरीर उसके हाथ से निकल जाता है। प्रत्येक जीबन चाहे वह पचास बर्ष का हो या सौ बर्ष का-अपने आपमें एक कहानी है।

मैंने दो सौ वर्षों के दीर्घ अन्तराल में इस प्रकार की सोलह कहानियाँ एकत्र की है। जिस शरीर को तुम अपने सामने पालथी मारे आसन पर बैठा हुआ देख रहे हो, यह माता-पिता का दिया हुआ शरीर है। प्रकृति की ओर से मुझे इस शरीर से जो जीवन भोगने के लिये मिला था, उसी से मैं अपनी कथा शुरू कर रहा हूँ उस समय ब्रिटिश शासन था। मैं सरकारी कर्मचारी था। अच्छा पद, अच्छा बेतन था। परिवार में मैं था और मेरी पत्नी कमला थी। मैं सब तरह से सुखी और सम्पन्न था। कोई भी अभाव नहीं था मुझे। शायद मेरा पूरा जीवन इसी प्रकार बीत जाता- मगर नियति तो कुछ और ही थी। एक दिन जरा-सी बीमारी ने मेरी पत्नी को मुझसे छीन लिया। यों देखने में नहीं लगता था कि वह मर गयी है। बल्कि ऐसा जान पड़ता मानो वह गहरी नींद में सो रही हो। मृत्यु उसमें कोई भी परिवर्तन न ला सकी थी। होंठो पर पर वहीं मन्द मुस्कान थी। वहीं अधखुली स्वप्निल आँखें जिनमें मेरे लिये प्यार छलकता था। होंठो का अमृत, चेहरे की कान्ति कुछ भी कम नहीं हुआ था। लेकिन मेरी सारी खुशी, सारा उत्साह और सारी उमंग छिन गयी थी। सारी कामना-लालसा एकबारगी खत्म हो गयी थी। आत्म-विश्वास का महल ढह गया था और संसार में सौन्दर्य का जो आकर्षण था वह खत्म हो चुका था।

मैंने नौकरी छोड़ दी। उस समय मेरी उम्र सिर्फ तीस वर्ष की थी। शान्ति पाने लिये मैं हरिद्वार चला गया। जब मैं वहाँ गुफाओं और पर्वत-शिखरों पर भटक रहा था, तभी मेरी भेंट एक साधु से हुई। उनके चेहरे पर अद्भुत सौम्यता और तेज था किन्तु वह एक मुर्द का मांस नोच-नोच कर खा रहे थे। भयमिश्रित कौतूहल के कारण मैं उनके पीछे-पीछे हो लिया। उन्होंने भी मुझे पीछे-पीछे आते देखा, पर कुछ बोले नहीं। आखिर मैंने उनको अपनी पीड़ा सुनाई। वे चुपचाप निर्विकार सुनते रहे। उनके चेहरे पर न कोई भाव आया, न गया। उनकी मुद्रा पहले की तरह शान्त और निर्विकार रही। मुझे आशा थी कि वे कुछ कहेंगे- शान्ति के दो शब्द या फिर ब्रह्मज्ञान का रहस्य, जिसे सुनकर मैं अपनी पीड़ा भूल सकूँगा, परन्तु उनकी चुप्पी से भी मुझे कोई निराशा या झुंझलाहट नहीं हुई। उनके व्यक्तित्व में चुम्बक जैसा आकर्षण था, जो मुझे कुछ सोचने-समझने नहीं दे रहा था। धीरे-धीरे काफी समय बीत गया, किन्तु इस दीर्घ अबधि में वे मुझसे एक बार भी नहीं बोले थे। अचानक एक दिन सबेरे उन्होंने कहा, "आज मैं जा रहा हूँ।”

"जी, कहाँ?" उन्होंने दूर बर्फ से ढंकी चोटियों की ओर इशारा कर दिया। मैं चुपचाप उस ओर देखता रहा। बर्फीली चोटियाँ सूरज की सुनहली किरणों से सोने जैसी जगमगा रही थी। फिर भी वहाँ जैसे रहस्य का गहरा धुन्ध छाया हुआ था।

मैं बोला- "मैं भी चलूँगा।"

"नहीं तू बहाँ नहीं जा सकता।" मैंने कोई उत्तर नहीं दिया। फिर न जाने क्या हुआ, झक कर उनके चरण पकड़ लिये। बारह महीने के सम्पर्क ने मुझे जो मानसिक शान्ति दी थी, वह मुझे कहीं नहीं मिली थी। वे चुपचाप खड़े गहरी नजरों से मेरी ओर देखते रहे। एकाएक मैं कह उठा, "मैं अब लौट कर अपने पिछले संसार में नहीं जाना चाहता। वह अब है भी नहीं। लेकिन कामना-बासना और भोग लालसा के पीछे भागते हुये संसार को मैंने देखा है- उसे ही और विशाल एवं व्यापक रूप में देखना चाहता हूँ।" "यह तो परकाया प्रवेश की सिद्धि से ही सम्भव है।" उन्होंने फुसफुसाकर कहा, "अच्छा आ, चल मेरे मैं उनके साथ हिमालय की ओर चल पड़ा। दो माह की यात्रा के बाद इस गुफा में पहुँचा। फिर उस महात्मा के साथ रहकर पूरे पच्चीस वर्ष मैंने इसी गुफा में योग साधना की। फिर मेरे गुरूदेव की समाधि का समय आ गया। समाधि ग्रहण करने के पूर्व उन्होंने मुझे अपने निकट बुलाया। उस समय मेरी आँखों में आँसू थे। एक महापुरुष से हमेशा-हमेशा के लिये संबंध टूट रहा था। मन बिगलित और कण्ठ अवरुद्ध था मेरा। गुरूदेव गम्भीर स्वर में बोले- "मैं अपनी इच्छा शक्ति से तुझे एक अपूर्व योग सिद्धि प्रदान कर रहा हूँ। इसके बल पर जब तेरी इच्छा हो, अपने पार्थिव शरीर को छोड़कर विशुद्ध आत्मा बन जाना, फिर जब तक तेरी इच्छा हो किसी के भी मृत शरीर में वास करना। तुझे जीवन का विराट रूप देखने को मिलेगा।
 
परकाया प्रवेश की विलक्षण सिद्धि मुझे मिल गयी। दूसरे दिन सबेरे ही मैंने पद्मासन पर बैठकर उस सिद्धि की सहायता से अपने शरीर का त्याग कर दिया। अब मेरे सामने ही मेरा पार्थिव शरीर पद्मासन में बैठा था। मैंने अपनी ओर देखा, मैं स्थिर नहीं था। हबा के कम्पन के साथ मेरा अस्तित्व भी झूल रहा था अधर में। चारो ओर निस्तब्धता थी। एक विलक्षण अनुभूति से मैं अपने आपको निर्विकार अनुभव कर रहा था। चारों तरफ का मोहक वातावरण देखकर मुझे लगा जैसे मैं किसी ऐसे संसार में हूँ जहाँ अपार तुष्टि और शान्ति है। एक मोह के वशीभूत मैं कुछ देर अपने शरीर के चारो ओर चक्कर काटता रहा, फिर अचानक ही जैसे मैंने उस मोह को जीत लिया और अपने पार्थिव शरीर को इसी गुफा में छोड़कर सहारनपुर की ओर बढ़ चला। इच्छा करते ही मैं वहाँ पहुँच गया। मेरे सामने पूरा शहर था। पत्थर और लोहे-सीमेन्ट से बनी इमारतों के आरपार भी मैं इस प्रकार देख सकता था, जैसे बे पारदर्शी शीशे की बनी हों। मनुष्य कितने भ्रम में जीवन व्यतीत करता है और अपने भ्रम पूर्ण विश्वास के कारण वह हर समय कितना छला जाता है, इसका उदाहरण मुझे तुरन्त मिल गया।

एक मठ में भजन-कीर्तन हो रहा था। महन्त जी निर्विकार भाब से एक ऊँची चौकी पर आसन लगाये थे। शरीर पर रेशमी भगवा वस्त्र था। मस्तक पर त्रिपुण्ड लगा था। एक ओर भक्तगण बैठे थे और दूसरी ओर महिलायें। सभी भक्ति-भाव से विभोर झूमते हुए हरि भजन कर रहे थे। सहसा महन्त जी आसन से उठकर भीतर कमरे में चले गये। थोड़ी देर बाद एक प्रौढ़ महिला भी अपनी बगल में बैठी युवती के साथ उठी, और दूसरे रास्ते से महन्त जी के कमरे में पहुँच गयी। वह प्रौढ़ा और महन्त जी शायद सधे-बधे थे। युवती बहुत सुन्दर थी। शायद हाल में ही उसकी शादी हुई थी। प्रौढ़ा ने उसे कमरे के भीतर हकेल कर बाहर से दरवाजा बन्द कर दिया। मैने कमरे में झांककर देखा। अब महन्त जी का असली रूप मेरे सामने था। वे उस युवती को अंक में समेटे हुए विषय-भोग में लिप्त थे। वह युवती छटपटा रही थी। महन्त जी का पैर पकड़ कर गिड़गिड़ा रही थी, मगर... मुझसे आगे नहीं देखा गया। मैं वहाँ से चल पड़ा। थोड़ी दर पर एक मकान में एक युवती अपने पति को बड़े प्रेम से भोजन करा रही थी। पति भी पुलकित होकर भोजन कर रहा था। मैं सोचने लगा पति पत्नी का कितना नैसर्गिक प्रेम है यह। मगर मेरा सोचना गलत था। पति जैसे ही भोजन करके मकान से बाहर निकला, दूसरे रास्ते से एक युवक भीतर घुस आया। उसे देखते ही वह युवती उसके गले से लिपट गयी। वह युवक उसका प्रेमी था। मेरा मन खिन्न हो गया। फिर आगे बढ़ा तो एक सेठ जी को होटल के कमरे में एक षोडशी के साथ जबर्दस्ती मुंह काला करते देखा। सेठ जी शराब के नशे में धुत थे और बार-बार कह रहे थे, "मैंने तेरे लिये पांच सौ रूपये तेरे बाप को दिये हैं। पूरा चुकता हो जायेगा, तभी तुझे छोडूंगा प्यारी। चल आ ... मेरे पास आ ..." लड़की की हालत दयनीय थी। नोच-खसोट से साड़ी-ब्लाउज कई जगह से फट गये थे। आखिर थक कर वह लुढ़क पड़ी। फिर सेठ उसके शरीर के साथ मनमानी करने लगा। मेरी इच्छा हुई कि उस युवती की सहायता करूँ। अपना हाथ बढ़ाया भी, मगर उनके और मेरे बीच अचानक जैसे एक ठोस पारदर्शक दीवार आकर खड़ी हो गयी। मैं चाहकर भी उस बेसहारा युवती की कोई सहायता नहीं कर सका।

पता नहीं कितनी देर तक मैं इसी प्रकार विभिन्न सांसारिक खेलों को देखता रहा। कहीं क्रोध था तो कहीं द्वेष, घृणा या बासना। धर्म के नाम पर बासना का नग्न रूप देखकर मेरा मन उचट गया। उसी समय देखा- कुछ दर पर एक अर्थी जा रही थी। लाश किसी बद्ध सेठ की थी। न जाने क्यों मेरे मन में आया कि मृत शरीर को छु लूं और मैंने आश्चर्य से देखा कि मैं उस मृत शरीर को छू सकता है। तब याद आया कि गुरूदेव ने कहा था कि मैं मृत शरीर में प्रवेश कर सकता है। यह याद जाते ही मुझे इच्छा हुई कि मैं जीबित हो उ और परकाया प्रवेश सिद्धि की सहायता से मैं दूसरे ही क्षण सेठ जी के मृत शरीर में बैठ गया। यह मेरा प्रथम परकाया प्रवेश था। शरीर में प्रवेश करते ही मेरी भौतिक चेतना बापस लौट आयी। इस बात का मुझे पहली बार अनुभव हुआ कि पृथक होने पर आत्मा अपने-आप में असीम शक्ति और व्यापक सत्ता का अनुभव करती है, परन्तु जब वह शरीर की सीमा में बंध जाती हैं तो उसकी शक्ति और सत्ता संकुचित हो उठती है मैं अभी तक अपने आप में जो व्यापकता अनुभव कर रहा था, शरीर में प्रविष्ट होते ही उसके अनुसार अपनी शक्ति और सीमा का अनुभव करने लगा। सेठ जी का शरीर बंधा था। उसमें प्रवेश करते ही मुझे उसके बंधन का अनुभव हुआ। मैंने जोर से बोलना चाहा, मगर शरीर की दुर्बलता के कारण ऐसा नहीं कर सका। फिर भी मुझे जीवित देख कर भीड़ में खलबली मच गयी। कुछ लोगों को प्रसन्नता हुई और कुछ लोगों के मुंह लटक गये । क्यों? इसका रहस्य बाद में खुला। सेठ जी का नाम था नरोत्तम दास । वह करोड़पति सेठ थे। काफी लम्बा-चौड़ा ब्यापार था । साठ वर्ष की उम्र में उन्होंने तीसरी शादी की थी। पत्नी का नाम था शोभा । सेठ जी की पहली पत्नी से एक लड़का था- पुरुषोत्तमदास । शोभा और पुरुषोत्तम - दोनों हम उम्र ही थे अत: दोनों एक दूसरे के प्रति आकर्षित हो गये। बाद में बही आकर्षण प्रेम और शारीरिक संबंध में बदल गया। सेठ नरोत्तमदास शोभा को हर प्रकार से खुश रखते थे, पर वे उसकी तन की प्यास बुझा सकने में असमर्थ थे। जब शोभा को पहली बार पुरूषोत्तम दास से पुरुष-सुख मिला तो वह निहाल हो उठी। फिर तो दोनों रोज बासना का खेल खेलने लगे । पुरूषोत्तम को बचपन से ही बुरी आदतें पड़ गयी थीं

.

| वह शराब पीता था, जुआ खेलता था और उसकी रातें बेश्याओं की गोद में बीतती थी। रूपये-पैसे की कमी उसे बराबर बनी रहती थीं। शोभा काफी चालाक औरत थी। वह पुरुषोत्तम दास की इस कमी को पूरी करने लगी । पुरुषोत्तमदास जितने रुपये मांगता, वह झट से निकाल कर उसे दे देती। इसके बदले पुरुषोत्तमदास भी शोभा को अधिक से अधिक खुश करने लगा। अब तो उसके साथ बैठकर बेझिझक शराब भी पीने लगी थी। पूरी-पूरी रात बे शराब के नशे में चूर एक दूसरे से लिपटे पड़े रहते थे। ऐसी ही स्थिति में एक दिन सेठ जी की नजर उन दोनों पर पड़ गयी। उनको सहसा अपनी आँखों पर विश्वास ही नहीं हुआ, किन्तु सत्य सत्य ही था । वे आपे से बाहर हो गये और दोनों को उसी समय उठा कर डांटने-फटकारने लगे, मगर उन दोनों पर इसका कोई प्रभाव नहीं पड़ा। इसके दूसरे ही दिन सेठ जी अपने बिस्तर पर मरे पाये गये। कहते हैं, उनका हार्ट फेल हो गया था। कुछ क्षण मौन रहने के बाद स्वामी सत्यानन्द ने फिर कहना शुरू किया - दूसरे के शरीर में प्रवेश कर के मैं जिन्दा तो हो गया था, परन्तु अब मेरे सामने कठिनाई यह थी कि मैं वहाँ किसी को पहचानता नहीं था। मुझे घेरे हये कई लोग खड़े थे। सेठ नरोत्तमदास का किससे क्या संबंध था - यह तुरन्त समझ पाना मेरे लिये कठिन था अब मुझे चतुराई से काम लेना था। एक मोटा-सा ब्यक्ति जो मेरे करीब ही बैठा था। मैंने उससे धीरे से कहा, "मुझे सहारा दो। मेरा सिर दर्द कर रहा है । मुझे आराम की जरूरत है।"

मैं तुरन्त सेठ जी के सजे-धजे कमरे में पहुंचा दिया गया। आँखें बन्द करके मैं बिस्तर पर पड़ा रहा। तभी मुझे देखने के लिये शोभा कमरे में आयी । गजब की खूबसूरत थी वह । मेरी आँखे सहसा चौंधिया गयीं। उसने आँखों में छलक आये आँसू पोछते हये कहा, "मुझे छोड़कर कहाँ चले गये थे तुम?" फिर मेरे सीने पर अपना सिर रखकर वह फफक-फफक कर रोने लगी।

"उफ।”

"क्या हुआ?" शोभा बोला।

“सीने में दर्द हो रहा है ।”

"क्यों?...मालिश कर दूँ ?"

"नहीं मालिश-बालिश करने की जरूरत नहीं हैं। अपने आप ठीक हो जायेगा।"

"क्या तुमने मुझे अभी भी माफ नहीं किया?"

"माफ करने के लिये ही तो मैं मर कर फिर वापस लौट आया।" इतना कहकर मैंने गहरी नजरों से शोभा की ओर देखा । वह सहम गयी। शायद मेरी आँखों की भाषा पढ़ ली थी उसने। करीब एक साल मैं सेठ नरोत्तमदास के शरीर में रहा। इस बीच मैंने संसार के सारे सुखों को भोगा, मगर मैंने इस बात का भी अनुभव किया कि जर्जर और अशक्त शरीर हमेशा आत्मा की आवाज को पूरी तरह नहीं प्रकट कर पाता था । जो जिन्दगी स्वस्थ शरीर में सुन्दर और आकर्षक दिखती थी, वही इस बड़े शरीर के कारण धुंधली और कुरूप दिखती । अक्सर मुझे लगता कि बूढ़ा सड़ा हुआ शरीर मेरी आत्मा को जीत लेगा । मैं हार जाऊँगा । उस समय मेरी इच्छा होती थी कि इस शरीर को छोड़ कर पुन: विशुद्ध आत्मा बन जाऊँ, लेकिन सुख का लालच मुझे बार-बार इस विचार से हटा देता । मैं सोचता क्या हुआ,यदि मैं कान से कम सुन पाता हया मुझे आँख से कम दिखता है। मैं इन्द्रियों के सुख का तो अनुभव कर ही सकता हूँ। लेकिन एक दिन बिरक्ति और अपने आपसे घृणा की मेरी यह भाबना बहुत अधिक बढ़ गयी और सिद्धि की सहायता से मैंने तुरन्त सेठ नरोत्तमदास का बूढ़ा जर्जर शरीर छोड़ दिया। मगर उसे छोड़ने के पहले मैंने सारी चल-अचल सम्पत्ति का एक ट्रस्ट बनाकर उसकी जिम्मेदारी सरकार को दे दी। शरीर के बाहर आते ही मैंने स्वतन्त्रता महसूस की। सिर्फ एक क्षण के लिये शरीर के बंधन के प्रति आकर्षण हुआ, लेकिन तुरन्त ही मैंने उस आकर्षण पर विजय प्राप्त कर ली और एक बार फिर कमल के पत्ते की तरह निर्लिप्त होकर मैं संसार की भोग-लालसाओं की भाग-दौड़ को देखता-महसूस करता और उसकी निरर्थकता समझता हुआ विचरण करने लगा।

योगी सत्यानन्द पल भर चुप होकर कुछ सोचते रहे, फिर कहने लगे मैं तुम्हें अपने सभी अनुभव नहीं सुनाना चाहता। मेरे पास इतना समय भी नहीं है। इतना ही कह सकता हूँ कि अपने इस लम्बे जीवन के दौरान मैं अक्सर इच्छानुसार चोला बदल लिया करता था। जो चोला लेता था उसी की व्यथा विचित्र होती। उन दिनों देशी राजाओं के साथ ब्रिटिश सरकार का भयंकर युद्ध छिड़ा हुआ था। एक बार मैं यों ही घूम रहा था अचानक मेरी नजर एक सुन्दर युवक पर पड़ी। वह सड़क पर पड़ा था। शायद मर गया था वह । उसका सारा शरीर खून से भीगा हुआ था। सीने में कई गोलियाँ लगी थीं। पास ही खड़े उसके साथी हर-हर महादेव का नारा लगा रहे थे । कुछ लोग लाश से लिपट कर रोती हुई उसकी माँ को हटाने की कोशिश कर रहे थे । मुझसे एक माँ का करूण क्रंदन नहीं देखा गया सो तुरन्त ही मैं उस युवक के शरीर में प्रवेश कर जीवित हो उठा। युवक का नाम बलवन्त सिंह था । उसका शरीर पूर्ण स्वस्थ था। जरूर उसकी आत्मा मेरी आत्मा से महान थी, क्योंकि जब तक मैं उसके शरीर में रहा, मुझे उस शरीर रूपी आवरण की महानता की निरन्तर अनुभूति होती रही। वह अनुभब कुछ ऐसा ही था, जैसा झोपड़े में रहने वाला गरीब किसान ऊँचे आलीशान महल में जाने पर करता है। कुछ दिनों के बाद मेरा चित्त फिर स्वतन्त्र होने के लिये व्याकुल हो उठा । यों सुनने में यह बात । आश्चर्यजनक मालूम होती होगी कि किस तरह बार-बार मैं मानव शरीर को इतनी जल्दी त्याग देता था।

क्या सांसारिक सुख भोग की लालसा और मोह मुझे मानव शरीर से अलग होते समय ललचाते नहीं थे? सचमुच शरीर का एक जबर्दस्त आकर्षण था, पर विशुद्ध आत्मा बने रहने में जिस सार्बभौमिक शून्यता, एकान्त और शान्ति का अनुभव होता था वह सांसारिक परेशानियों की तुलना में कहीं ज्यादा मोहक थी। संसार में मनुष्य शान्ति और आनन्द पाने के लिये जितना संघर्ष करता है, क्या उस संघर्ष के बाबजूद उसे बे दोनों चीजें सच्चे अर्थों में मिल पाती हैं ? नहीं कभी नहीं जीबन एक मृग-मरीचिका है। यहाँ सब कुछ खोना है। गंवाना हैं पाना कुछ भी नहीं है। विशेष आत्मा बन जाने पर मैं अपने आपको इस संसार में अनुभव करते हुये भी जिस बातावरण में रहता था, उसमें असीम शान्ति और असीम आनंद था, जिसकी अनुभूति इस संसार और शरीर में रहते हये मनुष्य कभी भी नहीं कर सकता। उस बातावरण में एक अद्भुत शून्यता छायी रहती थी। कभी-कदा केबल शंख की ध्वनि और भगवान के कीर्तन के स्वर भर बहाँ सुनाई पड़ जाते थे, बस । जब मैं विशुद्ध आत्मा के रूप में रहता तो मनुष्यों की सांसारिक लीला निर्विकार और तटस्थ भाव से देखा करता, लेकिन फिर पता नहीं किस प्रेरणा से किसी मृत शरीर में प्रवेश करके एक साधारण प्राणी बन जाता था। मुझे ठीक-ठीक याद नहीं कि मैं जितनी बार मृत शरीर में प्रविष्ट हुआ, बे कौन लोग थे? जीवन और मृत्यु का यह लम्बा चक्क था और मैं उनकी भावनाओं से निर्लिस सिर्फ एक कौतूहल की सृष्टि करता हुआ क्रमहीन आवागमन की जंजीर में जकड़ा हुआ था। मुझे अपने द्वारा त्यागे गये शरीर का मोह कभी नहीं हुआ। शरीर छोड़ने के बाद उसकी क्या गति होती है - यह भी जानने की कभी उत्कंठा नहीं हुई। जब मैं किसी के शरीर में प्रवेश करता, तब उस शरीर की पहले की संज्ञा मझेदी जाती। यद्यपि मझे अपने पहले का इतिहास-पूर्व रूपी आवरण में घिरी आत्मा अपना इतिहास एकदम भूल जाती और न शरीर का जो इतिहास होता, उसे ही स्वीकार कर लेती। हाँ, एक बात और बतला दूं, जब मैं विशुद्ध आत्मा बनकर आत्म लोक में रहता था, तब मुझे समय का कोई ज्ञान नहीं होता था, वहाँ हर समय उषाकालीन जैसा हल्का सफेद प्रकाश तैरता रहता था । पर जब मैं संसार में आता तो मुझे तुम लोगों के हर समय के ज्ञान की अनुभूति होने लगती थी। इसी तरह न जाने कितने वर्ष बीत गये। एक दिन अचानक काशी के प्रति आकर्षण पैदा हुआ।

उस समय मैं एक सन्यासी के शरीर में था। मुझे ऐसा लगा, मानों वहाँ कोई करूण स्वर में मुझे पुकार रहा है। मैं तुरन्त काशी पहुंच गया । सांझ का समय था। टहलता हुआ मैं श्मशान घाट की ओर चला गया। वहाँ दर्जनों चितायें जल रही थीं। उन पर घी-तेल, चन्दन, धूप आदि डाला जा रहा था । एक ओर मरने वाले के सगे-सम्बन्धी बैठे पिण्डदान कर रहे थे। उन लोगों को घेरे हुए दर्जनों पण्डे खड़े थे। सहसा मैंने देखा - एक बूढ़ा आदमी कफन में लिपटी हुई एक लाश बांहों में उठाये अकेला चला आ रहा है। कोई उसका साथ देने वाला भी नहीं। मैंने पास जाकर कहा, "तुम थक गये होगे लाओ लाश मुझे दे दो।" बूढ़े की आँखों से आंसू वह रहे थे । लाश को मेरे हाथों में देते हुये उसने कहा, "जरा संभाल कर लेना। मेरा इकलौता बेटा है।" उसके लिये वह अभी तक वह"है" था "था नहीं हुआ था। लाश मुझे थमाकर वह पीछे की ओर पलटा । कुछ दूर पर एक युवती खड़ी थी। बूढ़े ने बताया, "वह मेरी बहू है, इसी लड़के की औरत ।" इतना कहकर बूढ़ा रोने लगा। जब जी कुछ हल्का हुआ तो कहने लगा - "बाबा जी, पिछले महीने ही मेरे बेटे की शादी हई थी। शादी के दो ही दिन बाद यह अचानक बीमार पड़ गया, फिर इसकी लाश ही उठी खाट से । दवा-दारू में सारी जमा पूँजी खत्म हो गयी । बहू के जेबर भी बिक गये । आखिर मुझे और बहू को बेसहारा छोड़कर चला गया मेरा लाल।" मैंने नजर घुमाकर बहू की ओर देखा, चूंघट काढ़े वह जड़बत् खड़ी थी । बेचारी के पैरों के महाबर और हाथों की मेहदी भी अभी नहीं छूटी थी। धीरे-धीरे वह भी सिसक रही थी।
 
मेरा मन करूणा से भर गया। अत: आँखें दूसरी ओर घुमा लीं। तभी एक डोम चिल्लाता हुआ पास आया - "ए..ए...तुम लोग इधर कैसे आये ? यहाँ राजाओं और पुण्यात्माओं के क्रिया-करम होते हैं।"

दूसरा डोम बोला - "उधर उस तरफ ले चलो मुर्दे को और क्रिया-करम के लिये दो सौ रूपये निकालो | जल्दी करो धन्धे का समय है।"

दो सौ रूपये ? सुनते ही बढ़ा एकदम सकपका गया । जैसे उसे लकवा मार गया हो ? उसके पास तो दो रूपये नहीं थे उस समय । सारी रकम और जमा पूंजी तो खत्म हो गयी बेटे के इलाज में । थोड़ी देर बाद जब उसे होश आया तो वह पास ही सामने खड़ी वह के पास पहुँचा। रूंआसे स्वर में बोला, “बहू ये लोग तो बिना रूपये लिये श्मशान में क्रिया करम भी नहीं करने देंगे .. अब क्या होगा,

बहू मौन साधे चुप खड़ी रही, कुछ बोली नहीं। फिर कुछ क्षण बाद उसका एक हाथ आंचल के बाहर निकला तो गोरे रंग की उसकी पतली-पतली कोमल उंगलियों के बीच मंगल सूत्र लटक रहा था। "बाबूजी।” हौले से युबती बोली, "इसे ले लीजिये और देकर उनका क्रिया-करम करिये।” “बहू यह तो मंगल सूत्र है ।” कहते-कहते बूढ़ा फूट-फूट कर रोने लगा। "बाबू जी, अब कहाँ रह गया वह मंगल सूत्र ? अब बही नहीं रहे तो उनके मंगलसूत्र को रखकर अब क्या करूंगी?" उसी समय सहसा पूर्वी हवा का एक झोंका आया और युवती का घूघट हट गया। उसका चांद-सा चेहरा देखकर चौंक पड़ा मैं । घोर आश्चर्य हुआ मुझे। उस युवती का चेहरा मेरी पत्नी कमला से बिल्कुल मिलता-जुलता प्रतीत होता था । कहीं कोई वैषम्य नहीं था। वैसी ही बड़ी-बड़ी कजरारी

आँखें, वैसी ही नुकीली लम्बी नाक और वैसे ही गुलाब के फूल जैसे कोमल रक्ताभ होंठ। बिल्कुल वैसा ही रंग-रूप । आकुल हो उठा मेरा मन । समझते देर नहीं लगी शायद कमला की आत्मा ने ही उस युबती के रूप में जन्म लिया था। शायद उसी की बिहलता भरी करूण पुकार थी जो मुझे काशी खींच ले आयी थी। दीर्घ अन्तराल के बाद बिछड़ी हुई दो आत्माओं का मिलन हुआ था और वह भी इस रूप और परिस्थिति में । मगर यह युबती क्यों और कैसे विश्वास करेगी कि दो सौ वर्ष पूर्व वह जिसकी प्रियतमा थी, वह आज साधु के वेष में उसके सामने खड़ा है। मैं उलझन में पड़ गया। पर जब मैं किसी भी कीमत पर कमला की आत्मा को छोड़ने को तैयार नहीं था।

दो सौ वर्ष पहले की अशान्ति एकाएक भड़क उठी थी मेरे भीतर । उस युवती के रूप में सामने खड़ी कमलाको आलिंगनबद्ध कर लेने के लिये व्याकुल हो रहा था मेरा मन । मैं तरन्त वहाँ से हट गया

और कुछ दूर जाकर एकान्त में लेट गया। फिर अपनी सिद्धि की सहायता से सन्यासी का वह शरीर छोड़ दिया और दूसरे ही क्षण उस युवक की मृत काया में प्रवेश कर गया। कमला को पाने के लिये यही रास्ता था मेरे सामने, पर युवक के शरीर में घसते ही पहली बार एक विचित्र प्रकार की घुटन का अनुभव हुआ। शायद इसलिये कि उसे मरे बहुत अधिक समय हो गया था

और रोग-ग्रस्त शरीर की नाड़ियाँ एक-एक कर सुख चुकी थीं। जीबित होते ही मैं हाथ-पैर पटककर जोर-जोर से चिल्लाने लगा, "मुझे खोलो, खोलो मुझे...मैं मरा नहीं हूँ.. "

मेरी आवाज सुनकर चारों तरफ खलबली मच गयी। कुछ लोग तो डर कर भागने लगे। शायद किसी की नजर साधु की लाश पर भी पड़ गयी । वह बहीं से चिल्लाता, "अरे! यह साधु कैसे मर गया, अभी तो वहाँ खड़ा-खड़ा बुड्ढे से बातें कर रहा था..." दूसरे ने कहा, "कहीं यह साधु ही तो नहीं मर कर इस छोकरे की लाश में घुस गया है ?" “यह कैसे हो सकता है ?" अभी हो-हल्ला हो ही रहा था कि किसी ने एक डॉक्टर बुलाकर मेरी जांच पड़ताल करानी शुरू कर दी। तब तक मैं स्वयं कफन हटाकर उठकर बैठ गया था। डॉक्टर ने मेरे सीने को टटोला, फिर नाड़ी देखी और आखिर उसने मुझे जीवित घोषित कर दिया। मैं चिल्लाया, "कमला" | कमला नहीं बेटा मनोरमा है तेरी औरत का नाम । यह भी भूल गये क्या ? वह बूढ़ा ब्यक्ति मेरे करीब

आ खड़ा हुआ। मैं अपने आप बुदबुदाया, "इससे क्या हुआ? शरीर भले ही मनोरमा का हो, आत्मा तो मेरी कमला की है उसमें । मेरे पुकारते ही मनोरमा ने लपककर मेरे गले में अपनी कोमल बाहें डाल दी और मेरे कन्धे पर सिर रखकर रोने लगी। मैंने उसकी काली पलकों पर हाथ फेरते हुये उसे धीरे से उठाया और हौले से कहा, "मंगल सूत्र कहाँ है उसे पहन लो । उस मंगल सूत्र ने ही तुम्हें फिर सुहागिन बना दिया मनोरमा ।" मगर मनोरमा मेरी रहस्यपूर्ण बातों को नहीं समझ सकी। उसने सिर्फ आश्चर्य से मेरी ओर देखा, जैसे उसे विश्वास ही न हो रहा हो कि मैं जिन्दा हो उठा हूँ। धीरे-धीरे मुझे सब कुछ मालूम हो गया। मैंने जिस मृत युवक के शरीर में प्रवेश किया था, उसका नाम मुरारी लाल था। उसकी एक छोटी-सी दुकान थी। उसी की आमदनी से गृहस्थी का सारा खर्च चलता था। घर की हालत दयनीय थी। चारो ओर अभाव ही अभाव था। मृत मुरारी लाल के शरीर में रहते हुये मुझे चार मास के ऊपर हो गये थे। स्वस्थ आत्मा और मनोरमा की सेवा पाकर मेरा शरीर जल्दी ही निरोग हो गया। मनोरमा रोज सबेरे मुझे प्रेम से भोजन कराकर दुकान भेज देती और स्वयं घर-गृहस्थी में लग जाती। पहले मेरी इच्छा हुई कि मै मनोरमा को सब कुछ बतला दूं । यह स्पष्ट कर दूं कि मैं उसका पति नहीं, बल्कि उसके बर्तमान पति के शरीर में दो सौ वर्ष पहले के उसके पति की आत्मा हूँ, परन्तु कुछ अपनी कमजोरी और कुछ उसका कमला जैसा असाधारण सौन्दर्य और प्रेम मुझे चुप रहने को विवश कर देता, सोचता हूँ जीवन के प्रति इतना जबर्दस्त मोह मुझे पहले कभी नहीं हुआ था । मनोरमा में मैं कमला की मोहक छवि देखता था। उसके प्यार को कमला का प्यार समझता था । गरीबी और अभावों से जूझती हुई जिन्दगी में हम दोनों एक दूसरे के सहारा थे। हमारे दिन शान्ति के साथ बीत रहे थे। जीवन में न बिरक्ति थी, न उपेक्षा । मैं करीब-करीब यह भूल गया था कि मैं एक विशुद्ध

आत्मा भर हूँ। शरीर को मेरे जीवन का साध्य नहीं बनना है...और यह भूल गया था कि मरीचिका के बंधन को तोड़ सकू, इसीलिये मैंने गुरुदेव से सिद्धि का फल मांगा था । मुझे सिर्फ अपना संसार - अपनी पत्नी, एक घर और एक छोटी-सी दुकान मात्र की याद रह गयी थी। यदि मेरे लिये कोई सुख था तो वह सिर्फ पत्नी के सान्निध्य में था।

एक दिन जब दुकान से थका-हारा लौटकर आया तो मनोरमा मेरे बालों को सहलाते हुई हौले से बोली, "सुनते हो ?" "क्या ?" "तुम पिता बनने वाले हो ?" "पिता।" मैंने हँस कर मनोरमा की ओर देखा, लेकिन इस समाचार ने मेरे मन में हलचल मचा दी। यह किसका पुत्र है? क्या मुरारी लाल का, जिसका यह शरीर है? उस समय मुझे इसका उत्तर नहीं मिला परन्तु बाद में, जब मैं मुरारी लाल का शरीर छोड़ कर अन्यत्र भटक रहा था, तब मुझे इसका उत्तर मिल गया । वह लड़का मेरी आत्मा का ही अंश था। मैं जहाँ कहीं भी गया, मुझे उसकी याद बराबर आती रही। दूर रहकर भी वह जैसे हर समय, हर क्षण मेरे साथ रहा । मुझे बराबर यह महसूस होता रहा जैसे मैं अपना ही एक अंश काशी में छोड़ आया हूँ। दो सौ वर्ष की लम्बी यात्रा में मैंने सिर्फ तीन-चार गुफा में पड़े अपने इस निज शरीर में प्रवेश किया था। जब मैंने मुरारी लाल का शरीर छोड़ा, उस समय मुझे फिर अपना यह शरीर अपनी ओर आकर्षित करने लगा। मैं बिना कहीं रुके सीधा यहाँ चला आया— देखा तो मेरा अपना पार्थिव शरीर गुफा के भीतर निश्चेष्ट पड़ा है। मुझे अपने शरीर के प्रति जबरदस्त मोह हुआ। ऐसा मोह मुझे किसी दूसरे का शरीर ग्रहण करते या परित्याग करते समय कभी नहीं हुआ था। मैंने अनुभव किया कि माता-पिता द्वारा प्रदत्त पार्थिव शरीर के प्रति आत्मा को जो मोह-माया होता है, वही बास्तविक होती है। दूसरे का शरीर, उसके लिये किराये के मकान के समान होता है। मैं अपने निजी शरीर में प्रवेश कर जीबित हो उठा । अट्ठारह साल हो गए - तब से मैं इसी शरीर में इसी गुफा में हूँ। इतना कहने के बाद स्वामी सत्यानन्द चुप हो गये।

रात आधी से ज्यादा गुजर चुकी थी। बाताबरण में बिचित्र नीरवता छायी हई थी। बाहर अनबरत हिमपात हो रहा था । मैंने एक बार स्वामी जी की ओर देखा। वे किसी गहरे विचार में डूबे हुये थे। जब उनकी विचार-तन्द्रा टूटी तो मैंने पूछा - "आपने मुरारी लाल का शरीर क्यों छोड़ा - यह तो बतलाया ही नहीं ? यह सुनकर स्वामी जी पहले तो हसे, फिर गम्भीरता से बोले, "मनोरमा ने मेरे दबे हये संस्कार को एकबारगी जगा दिया एक दिन । उसी समय मैंने मुरारीलाल का शरीर छोड़ने का फैसला कर लिया। बात यह हुई कि उस रोज दुकान से आकर मैं लेटा हुआ था कि अचानक मनोरमा ने मर जाने का ताना दिया। बात कुछ न थी, फिर भी उसका व्यंग्य मुझेछगया । मेरे मन की स्वतन्त्रता की उद्दाम कामना,

जो काफी अर्से से दबी-दबी सुलग रही थी - एकाएक भभक उठी । मैंने सोयी हुई मनोरमा को एक बार भर नजर देखा और उसी रात मुरारी लाल का शरीर छोड़ दिया। फिर न जाने कहाँ-कहाँ भटकता रहा । दो-तीन बार मन में मनोरमा के प्रति मोह जागृत हुआ। जब नहीं रहा गया तो उसे देखने के लिये गया भी, पर तब तक लोग मुरारी लाल की लाश जला चके थे । मनोरमा पागलों की तरह विलाप कर रही थी। कुछ देर तक उसे देखता रहा, फिर वहाँ से चला आया। किन्तु मेरे मन में

शान्ति नहीं है। कभी-कभी सोचता है कि मेरी आत्मा का अंश लेकर पैदा होने वाला मेरा पुत्र इस समय युवक हो गया होगा । निश्चय ही वह गरीबी और अभाव में ही पलकर बड़ा हुआ होगा। मनोरमा को उसके पालने-पोसने में कितने कष्ट उठाने पड़े होंगे । उसके भीतर बैठी कमला की आत्मा

भी मुझे कम ब्याकुल नहीं करती। मनोरमा का मोह और कमला की आत्मा का आकर्षण - दोनों मिल कर मुझे अशान्त किये रहते है." फिर थोड़ा रूककर लम्बी सांस लेते हुये स्वामी जी ने कहा, "जीवन मृत्यु के चक्र में आत्मा कब से फंसी है - यह बतला पाना कठिन है। एक बार आत्मा इस चक्र में फंस गई तो फिर उसका निकल पाना असम्भब ही है। दो सौ वर्ष की लम्बी अपनी जीवन यात्रा में मैंने इस बात का अनुभव किया कि

आत्मा के कई बर्ग हैं। कालचक्र में घूमती हुई जब तक एक ही वर्ग की दो आत्मायें संयोगवश मिल जाती हैं तो अलग हो जाने पर वे फिर एक दूसरे से मिलने के लिये व्याकुल रहती हैं - इसमें सन्देह नहीं । कौन सी आत्मा किस आत्मा के लिये व्याकुल है - यह नहीं बतलाया जा सकता । वास्तव में बही व्याकुलता मन की अशान्ति है, जिसे लेकर मनुष्य बार-बार जन्म लेता है और यह मानी हुई बात है कि दो बिछड़ी हुई आत्मायें कभी-न-कभी मिलती जरूर हैं। यदि उन दोनों में पूर्व मिलन का ज्ञान है तो वे एकाकार होकर इस संसार के आवागमन से और कालचक्र से हमेशा-हमेशा के लिये मुक्त हो। जाती है। काश ! मनोरमा के शरीर में बसी कमला की आत्मा को भी मेरी तरह पूर्व मिलन का ज्ञान हो गया होता हो..." स्वामी सत्यानन्द फिर चुप हो गये और निर्विकार भाव से गुफा के बाहर शून्य में ताकने लगे। धीरे-धीरे दस साल का लम्बा अर्सा गुजर गया। एक प्रकार से मैं स्वामी सत्यानन्द को और उनकी स्मृति कथाओं को भूल ही चुका था। फिर इस बात की तो कभी कल्पना भी नहीं की थी कि बनारस में उनसे एक बार फिर भेंट हो जाएगी। मैं नित्य की भांति उस दिन भी सांझ के समय गंगा किनारे चुपचाप बैठा था, उसी समय किसी के पदचाप से तन्द्रा भंग हो गयी मेरी। सिर घुमाकर पीछे की ओर देखा तो गोरे रंग के एक प्रौढ़ सज्जन खड़े मुस्करा रहे थे। वह सिल्क का कुर्ता और कीमती धोती पहने हुए थे। उंगलियों में हीरे, मानिक और पुखराज की अंगूठियाँ थी और चेहरे पर लक्ष्मी का तेज दमक रहा था। कोई धनी सज्जन है- यह समझने में कठिनाई नहीं हुई। मेरी ओर देखते हुए उनके मुस्कराने का ढंग ऐसा लगा, जैसे वे मुझसे परिचित हैं। अचानक उन्होंने पूछा, "आपने मुझे पहचाना नहीं ?" "जी...जी नहीं।" "मैं स्वामी सत्यानन्द हूँ।” "आप सत्यानन्द है ?" विस्मय से मैं ताकता ही रह गया। "जी हाँ ! वैसे आपका विस्मित और आश्चर्यचकित होना स्वाभाविक ही हैं, क्योंकि जिस शरीर में आपने मुझे हिमालय की गुफा में देखा था, उसे में वहीं छोड़ आया हूँ और जिस शरीर में आप मुझे इस समय देख ही रहे है, यह कलकत्ता के एक करोड़पति सेठ की काया है।" अचानक चन्दन की भीनी-भीनी सुगन्ध से भर गया बाताबरण । सेठ जी के रूप में स्वामी सत्यानन्द को देखकर मुझे घोर आश्चर्य हो रहा था। "परकाया प्रवेश" की उनकी कथा उन्हीं के मुँह से सुनी अवश्य थी, फिर भी उसे एकदम सहज ही मेरा मन स्वीकार नहीं कर सका था। स्वामी सत्यानन्द मुस्कराते हुये मेरे पास बैठ गए और कहने लगे, "चार-पाँच महीने पहले मैंने

हरिद्वार में एक पंडितजी का शरीर ग्रहण किया था और उसी शरीर से मनोरमा और उसके बेटे को देखने के लिये बनारस आया था। माँ-बेटे की हालत बहुत ही दयनीय थीं । मनोरमा की जर्जर काया एवं भिखारिनों जैसा बेश और उसके बेटे कश्यप की शोचनीय स्थिति देख कर मेरा मन करूणा से भर उठा । घोर दरिद्रता के कारण मनोरमा बेटे को पढ़ा-लिखा नहीं सकी । अत: कश्यप अखबार बेचकर किसी प्रकार गृहस्थी का खर्च चलाता था । मैं सोचने लगा कि माँ बेटे की कैसे सहायता करूँ । बुद्धि काम नहीं कर रही थीं। मैं पंडितजी की काया त्याग कर फिर बिशुद्ध आत्मा बन गया। एक दिन यों ही शहर में भटक रहा था कि मेरी नजर एक मोटर पर पड़ी। मोटर से एक सेठ उतर रहा था। उसी समय उसका हार्टफेल हो गया । मैं तुरन्त ही उस सेठ के शरीर में घुस गया। फिर मैंने तुम्हारा भी पता लगाया। सेठ जी के कोई औलाद नहीं है। शरीर तो उसका देख ही रहे हैं आप। मेरा विचार है कि कश्यप को गोद ले लूँ। दत्तक पुत्र के रूप में वह सेठ की अपार सम्पत्ति का मालिक हो जायेगा और मेरा भी कर्तब्य पूरा हो जायेगा। दरिद्रता के दुख को मैंने खूब महसूस किया है और यह नहीं चाहता कि उस दुख को मेरी आत्मा का कोई अंश भी सहे । यदि यह काम हो गया तो सचमुच मेरी आत्मा को परम शान्ति मिलेगी। मौत शरीर की नहीं, आत्मा की भी होती हैं। मैं महसूस करने लगा हूँ कि एक समय ऐसा भी आता है, जब आत्मा किसी भी शरीर में रहने से इन्कार कर देती है। अब मेरा ऐसा ही समय आ गया है। मैं समझ रहा हूँ, मेरी आत्मा अब किसी भी शारीरिक बंधन को स्वीकार नहीं करेगी।" स्वामी सत्यानन्द के कहे अनुसार मैं दूसरे ही दिन कश्यप से मिला । उस समय वह गोदौलिया चौराहे पर खड़ा अखबार बेच रहा था। जब मैंने उसको बतलाया कि कलकत्ता के एक सेठ उसे गोद लेना चाहते हैं तो वह भौचक्का-सा मेरी ओर देखने लगा। सेठ जी उसी दिन कश्यप और मनोरमा के साथ मुझे भी लेकर कलकत्ता रवाना हो गये और एक सप्ताह के भीतर ही कानूनी रूप से उन्होंने कश्यप को गोद ले लिया। महीने भर बाद ही सुना कि सेठ जी का हार्ट फेल हो गया। उसके बाद स्वामी जी से मेरा पुन: सम्पर्क न हो सका ..... लगता है उनकी आत्मा उच्चावस्था को प्राप्त कर दिव्य लोक पहुँच गई।
 
अध्याय ५ ब्रह्म पिशाच की प्रेमिका

रात आधी से ज्यादा गुजर चुकी थी। कमरे का बाताबरण बिल्कुल खामोश और बोझिल था, जिसमें रहस्यमयता का एहसास भी घुला हुआ था । स्फटिक की वेदी पर जलती हुई दीपशिखा एक बार कांपी, फिर वृत्ताकार रूप में चारों ओर फैलने लगी। एक सीमा तक फैलने के बाद उसका प्रकाश गहरा नीला हो गया और उसके बाद हल्का गुलाबी। उस गुलाबी प्रकाश में मैंने एक सुन्दर-सजीले युबक का आकर्षक रूप उभरते हुए देखा । वह युबक मुगलकालीन वेश-भूषा में था। उसकी आँखों में चमक और चेहरे पर रोब था, मगर मुझसे नजर टकराते ही उसका रोबदार चेहरा स्याह पड़ गया,

और आँखों की चमक भी बुझ सी गयी। दीपशिखा के उस गुलाबी प्रकाश के चमचमाते धब्बे पर से एकाएक युवक की शक्ल गायब हो गयी। उसके बाद वहाँ जो दृश्य उभरा - वह एक सजी-संवरी महफिल का था । इतिहास के पन्नों पर एकबारगी छा जाने वाले टीपू सुल्तान की महफिल का। एक लम्बा चौड़ा हाल था, जिसके चारो ओर नक्काशीदार खम्भे थे। फर्श पर ईरानी कालीन बिछा हुआ था और खम्भों में जूही, चमेली, रात रानी की लड़ियों की मालायें लिपटी हुई थीं। हाल के एक ओर गद्दी बिछी हुई थीं, जिस पर मखमल की चादर पड़ी हुई थी। उस गद्दी पर मसनद का सहारा लेकर सुल्तान बैठा था। हाल के दूसरी ओर भी उसी तरह गद्दी लगी हुई थी, जिस पर सुल्तान के हाकिम एवं सिपहसालार के अलावा अमीर, अमराव बैठे थे। तरह-तरह के इत्रों और फूलों की मिली-जुली सुगन्ध से महफिल का बाताबरण सुगन्धित हो रहा था। महफिल में उस रात चुनी हुई, कमसिन नर्तकियाँ बुलायी गई थीं। वे सभी एक साथ नृत्य कर रही थीं। घुघरुओं की झंकार के बीच कभी-कभी बाह ! वाह ! और माशाल्लाह का स्वर गूंज उठता था । नृत्य कर रही नर्तकियाँ एक से एक बढ़कर हसीन, सुन्दर और जवान थीं, मगर सुलतान की पारखी नजर जिस हसीना पर बार-बार फिसल जाती थी - वह लाखों में एक थी।

सचमुच उसके बेपनाह हुस्न ने सुलतान की रगो में दौड़ते हुये खून की रफ्तार को तेज कर दिया था। नृत्य करते समय उस हसीना के धुंघराले बालों की कोई आवारा लट उसके चांद जैसे मुखड़े पर जब बिखर जाती, तो ऐसा लगता था, मानों पूर्णमासी के रूपहले चांद को सावन भादों के काले बादल के किसी स्याह टुकड़े ने ढकने की कोशिश की हो और तभी सुलतान की मजबूत उंगलियों में फंसा जाम कांप उठता और शराब फर्श पर छलक जाती। सुलतान के मुंह से दबी हुई आवाज निकल पड़ती "या अल्लाह क्या हुन है ?" एकाएक दीप-शिखा का रंग बदलकर हल्का नीला हो गया और उसी के साथ दृश्य भी बदल गया। अब मैं उस हल्ले नीले प्रकाश में सिर्फ उस हुस्न की मलिका को देख रहा था, जिसने सुलतान की आँखों की नींद और दिल का चैन छीन लिया था । वह गुलमोहर की छांव में उदास बैठी हुई थी। कभी-कभी चौंक पड़ती थी, चौंककर अपने चारो ओर देखने लगती थी। कौन थी वह नर्तकी ? क्यों इतनी उदास और सहमी-सहमी थी वह उस समय ? मुझे समझ में नहीं आ रहा था। तभी मुझे सामने से बही युबक आता दिखलायी पड़ा, जिसे मैंने प्रकाश के धब्बे पर शुरू शुरू में देखा था। नर्तकी शायद उसी का इन्तजार कर रही थी। युवक के नजदीक आते ही उसका मुरझाया हुआ चेहरा गुलाब के फूल की तरह खिल उठा और फिर वह युवक से लिपट गयी। मिलन के उन क्षणों में दोनों में जो बातें हुई, उससे दोनों का संबंध साफ जाहिर हो गया । नर्तकी का नाम - सलीमा था और युवक का नाम था - भानु । दोनों एक-दूसरे को चाहते थे और जल्द से जल्द शादी कर लेना चाहते थे। मगर दोनों के बीच सम्प्रदाय की वही रूकावट थी, जिसका सामना सदियों से एक दूसरे को चाहने वाले लोग करते आ रहे हैं। सलीमा के स्याह धुंघराले बालों को अपने उंगलियों से सहलाता हुआ युबक हौले से बोला -

"अमावस्या की अंधेरी रात में तुझे लेने आऊँगा सलीमा । तैयार रहना तुम । मैं यही कहने आया था

ठीक है - सलीमा ने जवाब दिया । दीप-शिखा एक बार फिर झिलमिलाई प्रकाश का दायरा एक बार फिर कसमसाया । अब मैं जो दृश्य देख रहा था, वह किसी पहाड़ी इलाके का था । सामने एक पहाड़ी नजर आ रही थी, जिसके नीचे से बेहद पतली और आड़ी-तिरछी सीढ़ियों की कतार घूमती हुई ऊपर को गयी थी। जहाँ से सीढियाँ खत्म हुई थी। उसी के सामने एक दरवाजा था, जिस पर नक्काशी का काम था। उसके बाद पत्थरों से पटा हुआ एक चबूतरा था। चबूतरे के ठीक बीचो-बीच पहाड़ी के एक दम चोटी पर एक सुन्दर सा मकान था । वह सफेद संगमरमर के लाल पत्थर का अभूतपूर्व संयोग करके बनाया गया था चबूतरे के चारो कोनों पर ऊँची-ऊँची चार मीनारें थीं। बीच में मकान के ऊपर झिलमिलाता हुआ एक गुम्बज था। मुझे वह महलनुमा मकान काफी अच्छा लगा। जहाँ तक नजर जाती थी, हरियाली छायी थीं । जो दूर क्षितिज की नीलिमा में जाकर मिल गयी थी। बीच-बीच में पर्वत श्रेणियों की अल्पना थी। सीढ़ियों की कतार जंगल के हरे-भरे प्रदेश तक उतर गयी थी। इन प्राकृतिक मनोरम दृश्यों को। देख कर एकाएक मेरे मस्तिष्क में गहरे अतीत की एक स्मृति जागृत हो उठी। लगभग पन्द्रह सोलह साल पहले मैंने मनोरम प्रकृति की गोद में छिपे हुए इस अद्भुत महल के ध्वंसावशेष को मैसूर के हासान जिले स्थित श्रबण बेला-गोला में देखा था । श्रबण बेला-गोला में करीब साठ फुट ऊँची गोमतेश्वर की प्राचीन मूर्ति है। मैं उसी को देखने गया था।

वहीं मैंने काफी दूर पर एकान्त बन प्रदेश में स्थित इस महल का ध्वंसावशेष देखा था। उस समय मैं अचानक ही अकेला घूमते-घूमते काफी देर तक निकल गया था। मुझे महल और मीनारों के खण्डहरों ने अपनी ओर बरबस खींच लिया था। मैं टूटी-फूटी धूल से भरी सीढ़ियों पर काफी देर तक बैठा रहा था । वहाँ बड़ी शान्ति थीं। ऐसा लगता था, मानों उस खण्डहर में बहुत सारी आत्माएं गहरी नींद में सो रही हो । दीप-शिखा के प्रकाश में उभर आये महल और मीनारों को देखकर सचमुच मैं स्तब्ध रह गया। कैसा विचित्र संयोग था? भूतकाल में जिस महल के खण्डहर को देखा था, उसी के शानदार रूप को वर्तमान में देख रहा था । सांझ की स्याह कालिमा फैलती जा रही थी। गोधूलि बेला के हल्के प्रकाश में पक्षियों का कलर ब बन्द नहीं हुआ था। चबूतरे पर धीमें कदमों से एक युवती चहलकदमी कर रही थीं। वह जाफरानी रंग का चूड़ीदार पाजामा और उसी रंग का अंगरखा पहने हुए थी। सिर और चेहरे का आधा हिस्सा आसमानी रंग की एवं पतली सी ओढ़नी से ढका हुआ था । छाती और पीठ पर केशों की दो वेणियाँ सांप की तरह झूल रही थीं। बेणी में नरगिस के फूल लगे हुये थे। युवती असाधारण सुन्दरी सलीमाही थी। मैंने देखा सलीमा के चेहरे पर चिंता का भाव था। वह अपने दोनों हाथ पीछे की ओर बांधे चबूतरे पर चहल-कदमी कर रही थी। अपने पतले होठों को दाँतों से दबाकर वह अपनी उत्तेजना को दबाये रखने का व्यर्थ प्रयास कर रही थी।

कभी-कभी वह चौंककर नीचे काफी दूर तक फैले हुए घने जंगलों की ओर देखने लगती थी, जैसे किसी के आने की प्रतीक्षा में उसका मन चंचल हो रहा था । थोड़ी देर बाद तेजी से आते हुए घोड़े की टाप सुनाई देने लगी। क्षण भर बाद ही जंगल की सीमा रेखा को भेदकर घोड़े की पीठ पर एक सवार आता हुआ दिखायी पड़ा। सबार ने सीढ़ियों के नीचे पहुँचकर घोड़े की लगाम खींची। लगाम खींचते ही दूधिया सफेद रंग का वह अरबी पैर उठाकर खड़ा हो गया। सवार ने एक बार ऊपर की ओर देखा, फिर छलांग लगाकर घोड़े की पीठ पर से नीचे कूद गया और जल्दी-जल्दी सीढ़ियाँ चढ़ने लगा। उस सवार को पहचानने में मुझे कठिनाई नहीं हुई। वह भानु था। वह प्रसन्न मुद्रा में आखिरी सीढ़ी पर पैर रखते हुए खुले हुए दरवाजे की किवाड़ों को थाम कर खड़ा हो गया । उसका पौरूष नवयौवन की आभा से दीस था। उस समय मुझे उसकी आकृति, हँसी और खड़े होने की भंगिमा सुन्दर लगी। हीरे और पन्ने से जड़ित उसका मूल्यवान शिरखाण देखने से यह समझा जा सकता था कि वह किसी हिन्दू राजवंश का राजकुमार था । दरवाजे पर हाथ रखे मन्द-मन्द मुस्कराता खड़ा रहा भानु और कुछ दूर पर चित्र की तरह स्थित खड़ी रही सलीमा। कुछ क्षण बाद प्यार भरे स्वर में भानु ने पुकारा - "सलीमा" | टीपू सुल्तान का आदमी आया था ?
 
आहिस्ता इतने जोर से नहीं। सुनो ! वह आज आया था । अब्बाजान ने बचन दिया है। सुलतान के हाथ में मुझे उपहार के रूप में सौंप देने पर उन्हें सारी जायदाद वापस मिल जायेगी। शान्त स्वर में सलीमा बोली।

यह सुनकर भानु का चेहरा फीका पड़ गया..."तो मुझे क्या करने को कहती हो ?" उसी भाब और उसी मुद्रा में भानु ने प्रश्न किया।

आँखों से आँखे मिलाकर बिना पलक झपकायें ताकती रही सलीमा। उसकी बड़ी-बड़ी आँखें जैसे गुलाबी शीराजी के नशे से मदिर हो उठी थी। हवा के से स्वर में वह बोली - "तुम हिन्दू ब्राह्मण हो। मैं मुसलमान पठान हूँ। चाँद सितारे और आसमान को गवाह बनाकर हमने जो कसम खायी हैं, वह क्या बेकार चली जायेगी। क्या हमारा वह स्वप्न झठा हो जायेगा। क्या हमारा जीवन,हमारा यौवन हमारी सारी आशाएं बेकार हो जायेगी ? मिट्टी में मिल जायेंगी । हमेशा के लिए दफन हो जायेंगी? बोलो - कुछ कहो, कुछ जबाब दो ?"

पत्थर की बुत की तरह खड़ा रहा भानु । निश्चय, निर्विकार - नहीं ऐसा नहीं होगा।

आबेग से कांपते हुए स्वर में सलीमा कहती गयी - "कतरा जो दरिया में मिल जाये तो दरिया हो जाये वह काम अच्छा हैं, जिसका मकसद अच्छा हो - तुम पुरूष हो, मैं नारी है। तुम हमारा सौन्दर्य चाहते हो और हम तुम्हारा ऐश्वर्य यानी शौर्य ।” जरा रूककर एकाएक दबे हुए, मगर कठोर स्वर में सलीमा बोली - "भानु ! तुम मुझे आज और अभी यहाँ से ले चलो । अमावस की रात का मैं इन्तजार नहीं कर सकती।

"अभी ?” - विस्मित हुआ भानु ।

"हाँ ! हाँ ! अभी !' और बक्त अब नहीं है। कल ही अब्बाजान मुझे सुल्तान के भरे दरबार में पेश करने वाले है। इसीलिये कहती हूँ-"

स्थिर खड़ा रहा भानु। सांझ की गोधूलि, रात के घने अंधेरे में बदल चुकी थी। चारो ओर गहरी निस्तब्धता छा गयी थी। भानु की आँखों में संकल्प की चमक एकबारगी उठी। वह अपनी जगह से जरा-सा भी हटे बगैर बोला - "ठीक है यही सही।" उसके मुँह की बात मुँह में ही रह गयी । अचानक हवा में एक सीटी गूंज उठी। एक क्षीण और तेज आवाज हुई ।

सलीमा चौंक पड़ी, लेकिन वक्त और नहीं था । क्षण भर के अन्दर ही विष से बुझा हुआ एक तीर आकर भानु की पीठ में बिंध गया। उसके मुंह से एक आबाज तक नहीं निकल पायी । उसका दमकता हुआ चेहरा वेदना से विकृत हो गया। उसने अपने बायें हाथ से तीर निकालने की व्यर्थ कोशिश की। दूसरे ही क्षण उसकी निष्प्राण काया सीढ़ियों पर लुढ़क गयी।

बज्राहत-सी खड़ी रह गयी सलीमा। जब उसकी चेतना वापस लौटी, तो एक और पदचाप सुनाई पड़ने लगी। एक हाथ में लम्बा-सा धनुष लिए एक दीर्घकाय व्यक्ति आगे बढ़ आया और सलीमा को देख कर अट्टहास कर उठा, बोला - "क्यों री सलीमा ! तुम्हारे काफिर मेहमान का क्या हाल है ?

सलीमा की दोनों आँखें नफरत से जल उठी। उसने घृणात्मक और रोष भरे स्वर में कहा - "मेरे करीब मत आओ तुम ।"

'शाबाश बेटी। लड़की के पास उसका बाप आये भी नहीं। क्या कहती हो तुम?" इतना कहकर वह विशालकाय व्यक्ति और करीब आ गया।

तभी एक भयंकर काण्ड हो गया। सलीमा ने लपक कर भानु के निष्प्राण शरीर को अपनी गोद में उठाया और खुले दरवाजे से पहाड़ के नीचे कूद पड़ी। चीत्कार करती हुई भानु की लाश को लिए उसकी देह नीचे चली गयी। उसके साथ झिलमिलाता हुआ दीप एकबारगी बुझ गया और बाताबरण में एक खिन्नता भरी खामोशी छा गयी।

अरबी तंत्र-मंत्र के अन्दर जितनी भी अलौकिक सिद्धियाँ हैं, उनमें "चिरागे हाजरात" का नाम सबसे ऊपर हैं। उसके जरिये कम से कम चार सौ साल पीछे तक की किसी भी घटना के दृश्य को चिराग की रंग-बिरंगी रोशनी के धब्बे पर देखा जा सकता है। चिरागे हाजरात की जानकारी एक फकीर ने मुझ पर खुश होकर दी थी। उसने कहा था कि यह इल्म अपने आपमें काफी कीमती और खतरनाक है । वक्त-जरुरत पर ही इसका इस्तेमाल करना चाहिए। अरबी मंत्र की जबरदस्त शक्ति के आकर्षण में फंस कर चौथे आसमान पर रहने वाली रूहें- अतीत की किसी भी घटना के तमाम दृश्यों को हूबहू बर्तमान में लाकर पेश कर दिया करती हैं, मगर इसके लिए काफी मानसिक शक्ति की जरूरत पड़ती है। इसके अलावा हर वक्त जान का खतरा भी बना रहता है | जरा सी गलती होने पर चौथ आसमान की बेरूह छोड़ती नहीं। चिरागे हाजरात के जरिये अभी मैंने अतीत की जिन घटनाओं को देखा था, वे घटनाएं एक ऐसी लड़की के पूर्व जन्म से संबंधित थी, जो काफी लम्बे अर्से से ब्रह्म पिशाच की भयंकर बाधा से परेशान और पीड़ित थी। बड़े-बड़े ज्योतिषी और तांत्रिक भी उस बेचारी लड़की को इस ब्रह्म पिशाच के चंगुल से मुक्त न करा सके थे और न तो मुक्त करा सकी थी - दुनिया भर के देवी-देवताओं की तमाम मान मनौतियाँ, और उनकी पूजा इत्यादि। ब्रह्म पिशाच के जरिये लड़की को शारीरिक तकलीफ तो पहुँचती ही थी, उस लड़की की शादी में रूकावट पड़ गयी थी। पहले तो शादी कहीं तय नहीं हो पाती थी। अगर तय भी हो जाती तो तुरन्त कट भी जाती थीं। ऐसा एक दो बार नहीं बल्कि दर्जनों बार हुआ था। उस ब्रहा पिशाच की आत्मा का कहना था कि वह लड़की उसकी प्रेमिका है और वह भी पिछले तीन जन्म की। वह कभी भी अपनी प्रेमिका की शादी किसी गैर आदमी से न होने देगा। बात अपनी जगह पर बिल्कुल ठीक थी। कोई भी प्रेमी चाहे वह इन्सान हो या शैतान- अपनी प्रेमिका को किसी की। दुल्हन बनी हुई नहीं देख सकता। भला कौन इसे देख सकता है। कौन अपने सीने पर पत्थर रखकर बर्दाश्त कर सकता है? कौन इस तरह अपनी तमाम आशाओं और कामनाओं की लाश को जलता हुई देख सकता है। यह प्रेम कथा उस समय और मार्मिक एवं दयनीय हो गयी, जब मैंने चिरागे हाजरात की गुलाबी रोशनी में उस लड़की के पिछले जन्म की एक और घटना को देखा। वह लड़की-जिसके जिस्म के भीतर सलीमा की रूह पनाह पा रही थीं, पिछले जन्म में भी एक गरीब ब्राह्मण परिवार में पैदा हुई थीं। उस वक्त उसका नाम था राधा। अगर मेरी तरह आप सलीमा को देखे होते, तो राधा और सलीमा में कोई फर्क नजर न आता आपको। बही रूप, वही रंग और वहीं सौन्दर्य । कहीं कोई वैषम्य नहीं। मैं भी अवाक रह गया था। सलीमा को राधा की शक्ल में देखकर । मुझे तो पहले विश्वास ही नहीं हुआ कि सलीमा की रूह ने जन्म लिया है राधा के रूप में। पुनर्जन्मवाद को न मानने वाले मुसलमान की रूह क्या पुन: जन्म ले सकती है? वह भी हिन्दू परिबार में ? हाँ ! ले सकती है। इस तर्क का जबाब दिया मेरी बुद्धि ने । किसी अदम्य लालसा अथवा कामना को लेकर कोई भी आत्मा यदि मर जाती हैं तो उसकी पूर्ति के लिए निश्चित ही उसे कभी न कभी जन्म लेना पड़ेगा चाहे वह हिन्दू की आत्मा हो या मुसलमान की रूह। दीप-शिखा की जलती हुई लौ एक बार कसमसाई और फिर एकबारगी फैल गयी। उसके फैले हुए हल्के नीले प्रकाश में मैंने राधा को पीपल के छांव तले बैठी हुई देखा। उसके हाथ में एक पत्र था - जिसे वह बार-बार पढ़ती थी और रख देती थी। पढ़ती थी और रख देती थी। लगता था कि उस पत्र ने राधा के कलेजे को झकझोर कर रख दिया था। वह पत्र उसके प्रेमी गोपी का था। भानु की आत्मा ने ही जन्म लिया था गोपी के रूप में । मगर न राधा ही जानती थी कि गोपी उसके पूर्व जन्म का प्रेमी भानु है न गोपी ही इस रहस्य को जानता था कि उसकी राधा उसके पूर्व जन्म की सलीमा है। कितनी विचित्र लीला थी प्रकृति के विधान की। वह बेचैन होकर पत्र पड़ने लगी,"बड़ी कठिनता से तुम्हारा पता पा सका हूँ, परन्तु फिर भी विश्वास नहीं होता कि यह पत्र तुमको मिलेगा। एक बार तुमसे मिलना चाहता हूँ। बहुत सारी बातें हैं। सात साल की लम्बी कहानी में बहुत से उतार-चढ़ाब आये हैं । आज मैं एकदम एकाकी हूँ। आश्रय का भूखा और स्नेह का प्यासा । दारूण कष्टों से घिरा, अंधेरे में डूबा हुआ हूँ। पत्र मिले तो फौरन जबाब देना । इतनी दया अवश्य करना । मैं तुम्हारे पत्र की प्रतीक्षा बेसब्री से करूंगा।"
 
सारी रात उस पत्र के शब्द राधा के मन के आकाश पर सावन-भादो की घटना की तरह छाये रहे। दूसरे दिन कांपते हाथों से उसने लिखा, "तुम्हारा पत्र मिल गया है, मैं बनारस में ही हूँ। स्कूल में अध्यापिका हूँ पर तुमको इतने सालों के बाद मेरा पता जानने की जरूरत क्यों पड़ गयीं? कैसे याद आयी मेरी तुम्हें? यहाँ आना चाहो तो आओ । मेरे घर का द्वार तुम्हारे लिए सदा खुला है। तुम्हारे कष्ट निवारण के लिए जो कुछ हो सकेगा करूगी । सुनू भी तो क्या कष्ट है तुम्हे ? अपने को एकाकी क्यों लिखा है? यह विशेषण तो भगवान ने मुझे दिया है। पत्र लिखना कब आ रहे हो ? प्रतीक्षा करूंगी।"

राधा प्रतीक्षा करती रही। फिर एक पत्र आया । गोपी ने लिखा था - "तुम्हारा पत्र पाकर बहुत खुश हुआ । आधा कष्ट तो तुम्हारी लिखावट देखकर ही समास हो गया। आधा तुम्हें देखकर समास हो । जायेगा। इतने सालों के बाद तुम्हारी सुधि आयी है, यह तुमने गलत लिखा है। ईश्वर साक्षी है, एक दिन भी तुमको भुला नहीं सका हूँ। परिस्थितियों ने मुझे तुमसे अलग कर दिया यह सही है पर हृदय में तुम्हें मैं कभी अलग नहीं कर सका हूँ। विश्वास करो राधा । एक पल के लिए भी तुम्हें मैं बिसार नहीं पाया हूँ। तुमको भूल जाना क्या मेरे लिए सम्भब हैं ? तुम्ही मेरी जिन्दगी थी और तुम्ही मेरी जिन्दगी रहोगी। इस धारणा को कोई मिटा नहीं सकता। तुम मुझे विश्वासघाती समझो या अधम, पर मेरे लिए जो तुम सात साल पहले थी, वहीं अब भी हो । जब वे दारूण दिन आये थे, तुम्ही अचानक मुझसे छिप गयी थी। मैंने तुम्हे कितना खोजा, पर तुम्हें फिर न देख सका। विवश होकर मैंने सिर पर कफन रख लिया। फिर क्या-क्या हुआ? क्या-क्या सहा मैंने- तुम सुनोगी? इन सालों में तुम पर क्या बीती, कुछ नहीं जान पाया। तुमने भी काफी व्यथा सही होगी यही लगता है। मेरा विश्वास है कि यही हुआ भी होगा, पर अब शायद हमारे डूबे हुए नक्षत्र फिर से उभर आये हैं। शायद हमारे कष्टों का अन्त हो जाये । बहुत जल्दी तुमसे मिलने आ रहा हूँ। तुम्हारे पत्रों के सहारे तब तक मन को सन्तोष दूंगा। पत्र तो दोगी न?" राधा ने अथाह अन्त सागर में तैरते हुए लिखा - "तुम्हारा पत्र पाकर आँसू नहीं रोक पा रही हूँ। कितना रूलाया है तुमने मुझे? मैं तुमसे बिछड़ कर सालों रोती रही। फिर जैसे स्रोत ही सूख गया । आँखें सूनी रह गयी। सब सूना हो गया । सात सालों के बाद आज अचानक फिर उस सूखी नदी में । बाढ़ आ गयी है। तुम क्या मुझे जिन्दगी भर रुलाते ही रहोगे?"विश्वासघाती” मैंने तुमको कभी नहीं कहा। "अधम" तुम कैसे हो सकते हो? तुमने सच ही लिखा है - परिस्थितियाँ आदमी को विवश कर देती है। इसे मैं भी मानती हूँ । छुट्टी कब तक मंजूर होगी? कब आओगे-लिखना। उधर से पत्र फिर नहीं आया। "तार " आया, "सात तारीख की शाम को हवाई जहाज से आ रहा हूँ

राधा ने गुसलखाने में घुसकर जल्दी-जल्दी कपड़े उतारे। अपना ही शरीर देखने लगी- सामने शीशे में। यह कोमल काया आज तक अती रही। यह नैवेद्य का प्रसून आज तक किसी देवता के चरणों में अर्पित न हुआ। ये बांहलताएं, ये सुकुमार अधर, ये स्निग्ध कपोल, ये...पूजा का फूल थाली में रखा रखा कुम्हलाता रहा । रूपश्री मन्द पड़ गयी। उसने जाना ही नहीं । उसने कभी ध्यान ही नहीं दिया। आज लग रहा है, कालरथ के पहिये के नीचे कोई कली जैसे कुचल गयी। ..

राधा ने शीशे से नजर हटा ली। वह पानी की धार के नीचे बैठ गयीं। राधा ऐरोड्रोम पर एक घंटा पहले ही पहुँच गयी। उसे एक एक पल भारी लग रहा था। अचानक बेटिंग रूम में खलबली मच गयीं। मालूम हुआ कि इण्डियन एयर लाइन्स के प्लेन का एक्सीडेन्ट हो गया। उसी प्लेन से तो आ रहा था गोपी। राधा की आँखों के आमने एकबारगी अंधेरा छा गया। उसका तन-मन जड़ हो गया । प्लेन में सफर करने वाले यात्रियों में कोई बचा नहीं था । गोपी भी नहीं बचा । दूसरे दिन उसकी अधजली लाश राधा को सौंप दी गयी। फिर अन्तिम दृश्य मेरे सामने उभरा । बड़ा ही करू ण और हृदय बिदारक दृश्य था, जिसे देखकर मैं अपने आँसुओं को रोक न सका। मैंने देखा- गोपी की अधजली लाश को सीने से लिपटाकर बेसुध पड़ी थी, राधा। उसके बाल बिखरे हुए थे। मगर यह क्या ? जब लोगों ने लाश से राधा को अलग करने की कोशिश की, तो देखा गया कि राधा भी गोपी की तरह इस संसार को हमेशा-हमेशा के लिए छोड़ कर चली गयी हैं। कितनी भारी बिडम्बना थी। कितना क्रूर अन्याय किया प्रकृति ने राधा के जीवन के साथ । पिछले जन्म में दोनों न मिल सके थे। इस जन्म में भी दोनों एक न हो सके । गोपी की लाश के साथ ही राधा की लाश चिता पर रखी गयी और चिता धूं-धूकर जलने लगी, तो उसकी लाल पीली लपटों के बीच मैंने एक अपूर्व दृश्य देखा- जो आश्चर्यजनक और कौतूहलपूर्ण था । मैंने देखा-गोपी की आँखों में झांकती हई राधा कह रही थीं, "फिर छोड़कर मुझे चले गये न तुम?...मगर मैं तुम्हारा साथ नहीं छोडूंगी। तुम जहाँ रहोगे वहीं मैं भी रहूँगी । जहाँ जाओगे तुम वहाँ मैं भी जाऊँगी। मेरा तुम्हारा जनम-जनम का साथ है। हम दोनों को मौत भी अलग नहीं कर सकती

"हाँ ! राधा ! कोई भी शक्ति हमें अलग नहीं कर सकती।" थोड़ा रूककर आगे बोला गोपी- “मगर कभी परिस्थितियों ने हम दोनों को फिर अलग कर दिया तो क्या होगा?" गोपी की छाती से अपना सिर टिकाकर राधा ने हौले से कहा - "होगा क्या ? मैं तुम्हारा इन्तजार करूँगी और तुम भी मेरा इन्तजार करना । करोगे न इन्तजार? "नहीं राधा ऐसा कैसे हो सकता हैं ? मैं भला कैसे भूल सकता हूँ तुमको ? कैसे अपनी आत्मा की गहरायी से तुम्हारी छवि निकाल सकता हूँ?" चिता की लपटें एक बार हवा में लहरायी और फिर धीरे-धीरे कम होती गयी । अन्त में उसी के साथ खत्म हो गया अतीत का वह मार्मिक प्रसंग भी । मेरा मन विषण्ण हो उठा। अब भानु और सलीमा के तीसरे जन्म की पीड़ा भरी और आँसुओं में डूबी हुई कथा थी। सलीमा की आत्मा ने राधा की मृत्यु के बाद काशीपुर के एक ब्राह्मण परिवार में जन्म ले लिया था,

--

जिसका नाम था सरोज शर्मा । मगर भानु की आत्मा गोपी के शरीर को छोड़ने के बाद जन्म न ले सकी। दुर्घटना में अकाल मृत्यु हुई थी, इसलिये उसको मनुष्य का शरीर मिलने के बजाय ब्रह्म पिशाच की योनि मिली थीं। मानब योनि में जितनी आय शेष रहती हैं, उसकी आठ गुनी आयु भोगनी पड़ती हैं ब्रह्म पिशाच की योनि में । मुझे इस बात का घोर आश्चर्य हुआ कि ब्रह्म पिशाच की योनि में चले जाने के बावजूद भी गोपी अपनी राधा को न भूल सका था और न उसका साथ ही छोड़ सका था। गोपी की आत्मा सूक्ष्म शरीर में थी और राधा की आत्मा स्थूल शरीर में सरोज के रूप में। पर इससे कोई फर्क नहीं पड़ा। सरोज के जन्म लेते ही गोपी का सूक्ष्म शरीरधारी ब्रहा पिशाच उसके साथ हर समय रहने लगा। भला वह क्या जनता था कि उसका इस प्रकार संबंध बनाये रखने के फलस्वरूप सरोज को कितनी शारीरिक और मानसिक वेदना सहनी पड़ रही हैं। कितनी बाधाओं का सामना करना पड़ रहा हैं? पहले इसे बीमारी समझी गयीं । बीमारी समझकर काफी इलाज कराया गया, मगर लाभ कुछ होता भी कैसे? कोई रोग होता तब तो दवा काम करती । वहाँ तो बाधा थी और वह भी ब्रह्म बाधा । उसे कोई न समझ सका और न कोई बतला ही सका । सरोज का जीबन अभिशाप बन गया। वह अपने आप में घुटती रही, बर्बाद होती रही। उसे क्या मालूम था कि उसका जन्म जन्म का प्रेमी ही उसके लिए अभिशाप बन गया हैं। उसी के कारण उसका भविष्य, दुर्भाग्य के अन्धकार में डूब चुका है और जीवन के सारे सपने टूटकर बिखर चुके हैं। "कभी-कभी सरोज का चेहरा तमतमा उठता। आँखे भी लाल हो जाती और उस स्थिति में अपने आप बड़बड़ाने लग जाती। उसके सामने कोई उसकी शादी की चर्चा करता, तो उसका रूप और अधिक भयंकर हो उठता था । वह चीख-चीख कर कहने लगती - “वह शादी कभी नहीं करेगी।" सरोज का कमरा अलग था- वह हमेशा अपने कमरे को साफ और सजाकर रखती थी। किसी को अपने कमरे में आने न देती। जब कोई चला भी जाता, तो उसे कमरे के बाताबरण में तरह-तरह के फूलों और इत्रों की सुगन्ध बिखरी हुई मिलती थी। परिवार के सभी लोग हैरान थे कि इन सब का कारण क्या हैं ? सरोज अपने कमरे में किसी को क्यों नहीं जाने देती ? इतनी ज्यादा सफाई क्यों रखती है और कमरे में इतनी सुगन्ध कहाँ से आती है ?

हर रात की तरह उस रात भी बाताबरण में गहरी खामोशी छायी हुई थी। शायद तीसरा प्रहर था। कमरे का बन्द दरवाजा अपने आप फटाक से खुल गया और उसी के साथ हवा का एक सर्द झोंका आकर कमरे में बिखर गया । गहरी नींद में सो रही सरोज एकबारगी चौककर उठ बैठी। उसने अंधेरे में ही देखा कि उसके बिस्तर के करीब एक लम्बी-चौड़ी काठी का युवक उसकी ओर निहारते हुए मुस्करा रहा था। युवक हद से ज्यादा सुन्दर और आकर्षक था। उसके जिस्म का रंग बर्फ की तरह सफेद था । वह चूड़ीदार पायजामा और केसरिया रंग का चुस्त कुर्ता पहने था। उसकी आँखें बड़ी बड़ी और स्वप्निल थीं। काले धुंघराले बाल कन्धे तक झूल रहे थे। कानों में हीरे के बुन्दे थे, उंगलियों में नीलम, पुखराज और माणिक की अंगूठियाँ थीं । गले में मोतियों की माला भी पड़ी थी। उस स्याह गहरी काली रात में, इस तरह अपने सामने एक अपरिचित युवक को देख कर सरोज चीखना चाही, मगर चीख न सकी और न तो किसी को पुकार कर बुला ही सकी। आहिस्ते-आहिस्ते चलकर वह युबक, सरोज के करीब पहुँचा और धीरे से बोला- "मलीमा पहचाना "नहीं मैं भानु हूँ। तुम्हारा भानु... "

सरोज संभल पाती इसके पहले ही उस युवक ने लपककर उसे अपने आगोश में ले लिया और फिर... । दूसरे दिन सवेरे सरोज ने रात की सारी घटनायें घर वालों को बतलायी तो किसी को उन पर विश्वास नहीं हुआ। घटना की सत्यता जानने के लिए सरोज के छोटे भाई सुरेश ने उस रात उसके कमरे में सोने का निश्चय किया। समय धीरे-धीरे गजरने लगा और उसी के साथ रात भी गहराती गयी, मगर सुरेश की आँखों में नींद नहीं थीं। वह तो बास्तबिकता को जानने के लिये व्याकुल था। तीसरे पहर थोड़ी सी झपकी लग गयी उसे और उसी अवस्था में सुरेश को ऐसा लगा जैसे कोई अदृश्य व्यक्ति उसकी छाती पर चढ़कर उसका गला दबा रहा है। वह पीड़ा से कराह उठा और उस अदृश्य व्यक्ति के पंजे से अपने को मुक्त करने की कोशिश करने लगा, पर उसे सफलता नहीं मिली। उसने चीखना भी चाहा, मगर अवरुद्ध कण्ठ से गों-गों के सिवा और कोई आवाज न निकल सकी। भय, पीड़ा और आतंक से उसका बुरा हाल हो रहा था। कौन था वह ? किसकी फौलाद जैसी उगलियाँ उसका गला दबा रही थीं? जब उसने ये सारी बातें घरवालों को बतलायी तो सभी लोगों का मन भय से,आतंक और संशय के मिले-जुले भाब से भर गया। सरोज पर किसी आत्मा का साया है, यह समझते देर न लगी। फिर उसी दिन से पूजा पाठ, व्रत-उपवास और तंत्र-मंत्र झाड़-फूक का सिलसिला चल पड़ा। दिन के बाद महीने और महीने के बाद साल पर साल गुजरते गये । पैसा पानी की तरह वहता रहा। बड़े-बड़े, तांत्रिक-मांत्रिक, ओझा और मौलवी अपनी-अपनी शक्तियों की आजमाइश करते रहे, मगर सभी असफल रहे न कोई साया को हटा सका और न किसी प्रकार का लाभ ही पहुँचा सका। उन्हीं दिनों सुरेश के हाथ नूतन कहानियों का कोई अंक लगा जिसमें प्रकाशित मेरी रचना को पढ़कर सुरेश की आँखों में चमक आ गयी और आशा का बुझा हुआ दीप फिर से जल उठा।
 

Similar threads

S
Replies
69
Views
70
StoryPublisher
S
S
Replies
4
Views
5
StoryPublisher
S
S
Replies
2
Views
15
StoryPublisher
S
S
Replies
4
Views
6
StoryPublisher
S
Back
Top