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अध्याय ३ अब मैं मुक्ति चाहती हूँ
योग तंत्र ज्योतिष के अनुसंधान ने पिछले तीस वर्षों के अन्दर मुझको जिन मानबेतर शक्तियों से परिचित कराया और जिन अलौकिक सत्यों की अनुभूति करायी, उनसे मेरे सामने जीवन और जगत के तमाम गृह रहस्य अनावृत हुए हैं। संसार में सबसे रहस्यमय है मनुष्य और उसका जीवन। यद्यपि आज का विज्ञान ग्रहों-नक्षत्रों पर पहुँचने का प्रयास कर रहा है और इसमें उसे सफलता भी मिल रही है, फिर भी अभी तक यह रहस्य नहीं खुल पाया कि मनुष्य क्या है और जीवन क्या है? मैं कौन हूँ, कहाँ से आया हूँ और कहाँ चला जाऊँगा-ये तीनों प्रश्न अनादि है और इन्हीं के उत्तर में भारतीय दर्शन की रचना हुई है। योग दर्शन को छोड़कर अन्य सभी दर्शन केवल सिद्धान्तों का प्रतिपादन करते हैं। योग दर्शन ही एकमात्र ऐसा दर्शन है जो ज्ञानात्मक और क्रियात्मक रूप से मानव और मानव जीवन के तिमिराच्छन्न रहस्यों को अनावृत्त करता है। उस समय मेरी उम्र मात्र सोलह वर्ष थी। एक दिन हरिश्चन्द्र घाट के श्मशान में जलती हुई एक चिता देख कर मेरे मन में अचानक वैराग्य की भावना पैदा हो गयी। लाश एक युवक की थी। शायद कुछ ही समय पूर्व उसका विवाह हुआ था। पत्नी के हाथों में लगी मेहदी का रंग अभी छटा भी नहीं था कि उसका जीवन वैधव्य की कठोर चट्टान से टकरा गया। वह एक ओर सीढ़ी पर बैठी विलाप कर रही थी।
मैं गालों पर हाथ धरे सोचने लगा-यह युवती किस लिये और किसके लिये विलाप कर रही है? उसके पति के शरीर में कौन था? वह कहाँ से आया था। फिर कहाँ चला गया? यदि यह सब वह नहीं जानती तो विलाप किसलिये कर रही है? क्या पार्थिव शरीर के लिये ? शायद शरीर के प्रति मोह ही बिलाप का एक मात्र कारण है। मृत्यु की धारणा मृत्यु के प्रति भय पैदा करती है और इसी से आभास होता है जीवन नाशबान है। यही भाबना दृढ होकर बैराग्य का रूप धारण कर लेती है। इसी बैराग्य ने मुझे जहाँ एक ओर अन्तर्मुखी बना दिया, वहीं दूसरी ओर मुझमें सत्य की खोज की प्रवृति भी जागृत कर दी। जलती हुई चिता अब राख में बदल चुकी थी। श्मशान में सांझ की स्याह चादर फैलने लगी थी। बोझिल मन लिये मैं भारी कदमों से हरिश्चन्द्र घाट की सीढ़ियाँ चढ़कर ऊपर आया। यह मेरा विद्यार्थी जीवन था, पर बहुत ही कष्टमय। बिजली बत्ती का इन्तजाम नहीं था सो रात्रि की पढ़ाई म्युनिसिपैलिटी की लालटेन की रोशनी में होती थी। मगर उस रात मन विषण्ण था। पढ़ाई-लिखायी में जी नहीं लगा। काफी देर तक चारपायी पर विचारमग्न पड़ा रहा, फिर न जाने कब नींद आ गयी। उसी अवस्था में मैंने एक विचित्र स्वप्न देखा...वास्तव में वह स्वप्न मेरे जीवन का संक्रांति काल बन गया। और वह स्वप्न था मैं चारपायी से धीरे-धीरे उठा। कमरे में अन्धकार था-मगर उस अन्धकार में भी मैंने अपने पार्थिव शरीर को बिस्तर पर निरचेष्ट पड़ा हुआ देखा। उस समय मेरे शरीर के चारों ओर रंग-बिरंगे प्रकाश के स्फुलिंग घूम रहे थे। दरबाजे बन्द थे, पर मैं बिना उन्हें खोले ही कमरे के बाहर निकल आया। बाहर शुक्ल पक्ष की चांदनी छिटकी हुई थी। शान्त चांदनी के रूपहले प्रकाश में मैंने गंगा के किनारे एक मढ़ी पर मृग चर्म के आसन पर पद्मासन मुद्रा में बैठी हुई एक युवती को देखा। बाद में मालूम हुआ कि वह भैरवी थी-शरीर पर लाल रंग की रेशमी साड़ी और उसी रंग का दुपट्टा था। दोनों भुजाओं, मस्तक और गले में लाल चन्दन की पतली रेखायें। दोनों भौहों के बीच लाल सिन्दुरका गोल दीका। आम की.. फांक जैसी कुछ-कुछ रक्ताभ आँखें। कण्ठ में बड़े आकार के रूद्राक्ष की माला। कलाइयों में शंख की चूड़ियाँ। शरीर का रंग एकदम काला। नाक-नक्श आकर्षक और कमनीय, मगर स्थिर और कठोर, कसा हुआ सुडौल तन। पास ही चमचमाता हुआ बड़ा सा त्रिशूल रखा था। उसकी बड़ी-बड़ी काली आँखों की अपलक दृष्टि से बंधा हुआ सा मैं उसके सामने स्थिर होकर खड़ा हो गया। उसकी दष्टि देखकर ऐसा लगा मानों वह मेरी प्रतीक्षा कर रही थी। आँखें मिलते ही हठात् मेरा सारा शरीर बेबस हो गया। मर्म को बेधने बाली उसकी उस तीक्ष्ण और स्थिर दृष्टि में एक बिचित्र सम्मीहन था। मैं मंत्रमुग्ध सा ताकता ही रह गया। भैरवी की पलकें एक बार धीरे से गिरी, फिर मूक संकेत से उसने मुझे अपने समीप बुलाया। जब मैं पास पहुँचा तो उसका दाहिना हाथ मेरे सिर पर उठ गया। मानों वह मुझे आशीर्वाद दे रही हो,
लेकिन सहसा मुझको झटका सा लगा। भैरबी स्थिर दृष्टि से अपलक मेरी ओर देख रही थी। फिर वह उठ खड़ी हुई और मुझे अपने पीछे आने का संकेत करके चलने लगी। मैं उसके पीछे-पीछे किस स्थान पर पहुँचा, यह नहीं बतला सकूँगा। उस समय भैरवी का रूप बड़ा ही निर्मम और भयंकर था। मुझे साथ ले जाकर वह एक विशाल-श्मशान में खड़ी हो गयी। बहाँ चारों ओर पीपल, पाकड़ और गूलर के पेड़ खड़े थे और हर पेड़ के नीचे नर-कंकाल, हड्डियाँ, खोपड़ियाँ आदि पड़ी हुयी थी। मेरा दम घुटने लगा। श्मशान क्षेत्र के सामने एक विशाल मंदिर था। ऊपर जाने के लिये सैकड़ों सीहियाँ थीं। भैरवी के साथ किसी अज्ञात सम्मोहन के वशीभूत होकर मैं मंदिर की सीढियाँ चढ़कर ऊपर पहुँचा। देखा तो मंदिर के सामने पञ्च प्रेतासन है। बगल में पारिजात के पेड़ के नीचे सहस्रमुण्डी आसन है। उसके दूसरी ओर पंचवटी है। सिंहद्वार से प्रवेश करके मैं मुख्य मंदिर में पहुँचा। भीतर घना अन्धकार था। एक ओर पंचमुखी दीपाधार पर घी के दीप जल रहे थे-उसके मन्द आलोक में मैने सामने देबी छिन्नमस्ता की सजीब-सी रक्तवर्ण पाषाण प्रतिमा देखी। वह षोडश दल कमल के ऊपर आसीन थीं। कमल पुष्प के भीतर रति मुद्रा में आलिंगनबद्ध युवक-युवती लेटे हुये थे-जिनके ऊपर माँ के दोनों पैर थे। माँ के एक साथ में शोणित लगा बिकराल खड्ग था और दूसरे में स्वयं माँ का ही रक्त से सना मुण्ड। कटे हुये गले से रक्त की तीन धारायें निकल कर अगल-बगल खड़ी हाकिनी डाकिनी और शाकिनी की प्रतिमाओं के मुँह में गिर रही थीं। किसी का क्षीण स्वर सुनाई पड़ा-"ये तीनों रक्तधारायें ज्ञान, भक्ति और वैराग्य की प्रतीक हैं।” माँ के सामने खड़े वहत सारे लोग अपनी-अपनी बेदना अर्पित कर रहे थे। मैं भी जाकर उन्हीं के साथ खड़ा हो गया, किन्तु मेरी कौन-सी बेदना थी... कौन सी व्यथा थी? भैरवी भी मेरे निकट ही खड़ी थी। गम्भीरता के बावजूद उसका काला चेहरा मुझे उस समय बड़ा सुन्दर लगा। उसकी दृष्टि भी उतनी अन्तभेदी नहीं थी, पर अपलक और कठोर अवश्य थी। एकाएक मेरा मन अशान्त हो गया। भैरबी की दृष्टि पैनी होती जा रही थी। सहामुण्डी आसन पर बैठने से मन को शान्ति मिलेगी-यह सोचकर मैं उधर ही बढ़ गया। चारो ओर अंधेरा था। वातावरण स्तब्ध था। हवा की सरसराहट भी चौंका देती थी। मैं पालथी मारकर आसन पर बैठ गया। मन अपने आप शान्त होने लगा। फिर बिलकुल शान्त होकर किसी अतल गहरायी में इब गया। वह एक विचित्र अलौकिक अनुभूति थी। मैं समर्पण के एक नये प्रवाह में विभोर था और उसी अपार्थिव अनुभूति के बीच मैं अपने पार्थिव शरीर में वापस लौट आया। मेरा वह गहरा स्वप्न टूट गया। मगर यह क्या? मेरे कमरे का दरवाजा टूट कर एक ओर झूल रहा था।
कमरे में बहुत सारे लोग इकटे थे। सभी रो रहे थे। मेरा शरीर चारपायी से उतारकर जमीन पर लिटा दिया गया था और शब-यात्रा की व्यवस्था की जा रही थी। मैं संसार के लिये मर चुका था और मरे हुये काफी समय गुजर चुका था। अर्थात् मुझको जागने में यदि एक-दो घंटे की और देर हो जाती तो निस्सन्देह मेरी पार्थिव काया चिताको अर्पित कर दी गयी होती। मैं उठकर बैठ गया। ऐसा लगा मानों गहरी नींद सोकर उठा होऊँ। लोग अचकचाकर मुझसे तरह तरह के प्रश्न करने लगे, किन्तु भला मैं उन्हें क्या उत्तर देता, क्या कहता। यदि मैं उन तमाम दृश्यों और अनुभूतियों के बारे में बतलाता भी तो भला कौन विश्वास करता। गम्भीर होकर मैं सोचने लगा-क्या वास्तव में मैं मर गया था? क्या सचमुच इस बीच शरीर और संसार से मेरा संबंध टूट चुका था? यदि हाँ तो वह कौन सा शरीर और कौन का संसार था? वह सत्य था या यह सत्य है? यदि दोनों जीवन सत्य है, दोनों शरीर सत्य है और दोनों संसार भी सत्य है, तो जैसे यहाँ मर कर मैं उस संसार में जीवित हो उठा था वैसे ही उस संसार में भी मर कर अब इस स्थल जगत में जीवित हो उठा हूँ फिर? अब तक इस संसार के लिये मृत और उस अनजाने लोक के लिये जीवित था, परन्तु अब वहाँ के लिये मृत और यहाँ के लिये जीवित हूँ। मेरे सामने एक रहस्यमयी गुत्थी थी, जिसे मैं उस समय नहीं सुलझा सका। तब मेरी उम्र ही क्या थी... अनुभव और ज्ञान ही कितना था। हाँ, उस अनोखी अविश्वसनीय घटना ने मेरे लिये एक ऐसा मार्ग जरूर खोल दिया, जिस पर चलकर मैंने ऐसे तमाम सत्यों की खोज की और अनुभव प्राप्त किए जो लौकिक स्तर पर सम्भव नहीं है।
जीवन शाश्वत है। उसकी धारा अबाध गति से प्रवाहित है। मृत्यु से जीवन धारा में किसी प्रकार का व्यतिक्रम नहीं उत्पन्न होता, न तो कोई प्रभाव ही पड़ता है उस पर। उत्पत्ति से लेकर मानब जीवन विभिन्न स्तरों पर क्रम से विकसित होता रहता है। आज के भौतिकवादी बाताबरण और पैतृक परम्परा को मानते हैं। इस सन्दर्भ में ज्योतिष शास्त्र का कहना है कि जीवन को बराबर गतिमान बनाये रखने के लिये सौर-मण्डल की रश्मियों का प्रभाव प्रमुख है। सौर रश्मियों के विकिरण का प्रभाव सबसे ज्यादा मनुष्य की आत्मा, मन और विचारों पर पड़ता है। गर्भ में शिशु के आने पर वे सौर रश्मियाँ अपना प्रभाव डालना शुरू कर देती हैं। फिर उत्पत्ति से लेकर मृत्युपर्यन्त की जीवन यात्रा के दौरान उनका प्रभाव क्रमश: क्षीण होता जाता है। ज्योतिष के इस सिद्धान्त को आज वैज्ञानिकों ने भी स्वीकार कर लिया है। सर्वविदित है कि एटमबम के विकिरण ने हिरोशिमा के शिशुओं पर अपना प्रभाव डाला था।
योग तंत्र ज्योतिष के अनुसंधान ने पिछले तीस वर्षों के अन्दर मुझको जिन मानबेतर शक्तियों से परिचित कराया और जिन अलौकिक सत्यों की अनुभूति करायी, उनसे मेरे सामने जीवन और जगत के तमाम गृह रहस्य अनावृत हुए हैं। संसार में सबसे रहस्यमय है मनुष्य और उसका जीवन। यद्यपि आज का विज्ञान ग्रहों-नक्षत्रों पर पहुँचने का प्रयास कर रहा है और इसमें उसे सफलता भी मिल रही है, फिर भी अभी तक यह रहस्य नहीं खुल पाया कि मनुष्य क्या है और जीवन क्या है? मैं कौन हूँ, कहाँ से आया हूँ और कहाँ चला जाऊँगा-ये तीनों प्रश्न अनादि है और इन्हीं के उत्तर में भारतीय दर्शन की रचना हुई है। योग दर्शन को छोड़कर अन्य सभी दर्शन केवल सिद्धान्तों का प्रतिपादन करते हैं। योग दर्शन ही एकमात्र ऐसा दर्शन है जो ज्ञानात्मक और क्रियात्मक रूप से मानव और मानव जीवन के तिमिराच्छन्न रहस्यों को अनावृत्त करता है। उस समय मेरी उम्र मात्र सोलह वर्ष थी। एक दिन हरिश्चन्द्र घाट के श्मशान में जलती हुई एक चिता देख कर मेरे मन में अचानक वैराग्य की भावना पैदा हो गयी। लाश एक युवक की थी। शायद कुछ ही समय पूर्व उसका विवाह हुआ था। पत्नी के हाथों में लगी मेहदी का रंग अभी छटा भी नहीं था कि उसका जीवन वैधव्य की कठोर चट्टान से टकरा गया। वह एक ओर सीढ़ी पर बैठी विलाप कर रही थी।
मैं गालों पर हाथ धरे सोचने लगा-यह युवती किस लिये और किसके लिये विलाप कर रही है? उसके पति के शरीर में कौन था? वह कहाँ से आया था। फिर कहाँ चला गया? यदि यह सब वह नहीं जानती तो विलाप किसलिये कर रही है? क्या पार्थिव शरीर के लिये ? शायद शरीर के प्रति मोह ही बिलाप का एक मात्र कारण है। मृत्यु की धारणा मृत्यु के प्रति भय पैदा करती है और इसी से आभास होता है जीवन नाशबान है। यही भाबना दृढ होकर बैराग्य का रूप धारण कर लेती है। इसी बैराग्य ने मुझे जहाँ एक ओर अन्तर्मुखी बना दिया, वहीं दूसरी ओर मुझमें सत्य की खोज की प्रवृति भी जागृत कर दी। जलती हुई चिता अब राख में बदल चुकी थी। श्मशान में सांझ की स्याह चादर फैलने लगी थी। बोझिल मन लिये मैं भारी कदमों से हरिश्चन्द्र घाट की सीढ़ियाँ चढ़कर ऊपर आया। यह मेरा विद्यार्थी जीवन था, पर बहुत ही कष्टमय। बिजली बत्ती का इन्तजाम नहीं था सो रात्रि की पढ़ाई म्युनिसिपैलिटी की लालटेन की रोशनी में होती थी। मगर उस रात मन विषण्ण था। पढ़ाई-लिखायी में जी नहीं लगा। काफी देर तक चारपायी पर विचारमग्न पड़ा रहा, फिर न जाने कब नींद आ गयी। उसी अवस्था में मैंने एक विचित्र स्वप्न देखा...वास्तव में वह स्वप्न मेरे जीवन का संक्रांति काल बन गया। और वह स्वप्न था मैं चारपायी से धीरे-धीरे उठा। कमरे में अन्धकार था-मगर उस अन्धकार में भी मैंने अपने पार्थिव शरीर को बिस्तर पर निरचेष्ट पड़ा हुआ देखा। उस समय मेरे शरीर के चारों ओर रंग-बिरंगे प्रकाश के स्फुलिंग घूम रहे थे। दरबाजे बन्द थे, पर मैं बिना उन्हें खोले ही कमरे के बाहर निकल आया। बाहर शुक्ल पक्ष की चांदनी छिटकी हुई थी। शान्त चांदनी के रूपहले प्रकाश में मैंने गंगा के किनारे एक मढ़ी पर मृग चर्म के आसन पर पद्मासन मुद्रा में बैठी हुई एक युवती को देखा। बाद में मालूम हुआ कि वह भैरवी थी-शरीर पर लाल रंग की रेशमी साड़ी और उसी रंग का दुपट्टा था। दोनों भुजाओं, मस्तक और गले में लाल चन्दन की पतली रेखायें। दोनों भौहों के बीच लाल सिन्दुरका गोल दीका। आम की.. फांक जैसी कुछ-कुछ रक्ताभ आँखें। कण्ठ में बड़े आकार के रूद्राक्ष की माला। कलाइयों में शंख की चूड़ियाँ। शरीर का रंग एकदम काला। नाक-नक्श आकर्षक और कमनीय, मगर स्थिर और कठोर, कसा हुआ सुडौल तन। पास ही चमचमाता हुआ बड़ा सा त्रिशूल रखा था। उसकी बड़ी-बड़ी काली आँखों की अपलक दृष्टि से बंधा हुआ सा मैं उसके सामने स्थिर होकर खड़ा हो गया। उसकी दष्टि देखकर ऐसा लगा मानों वह मेरी प्रतीक्षा कर रही थी। आँखें मिलते ही हठात् मेरा सारा शरीर बेबस हो गया। मर्म को बेधने बाली उसकी उस तीक्ष्ण और स्थिर दृष्टि में एक बिचित्र सम्मीहन था। मैं मंत्रमुग्ध सा ताकता ही रह गया। भैरवी की पलकें एक बार धीरे से गिरी, फिर मूक संकेत से उसने मुझे अपने समीप बुलाया। जब मैं पास पहुँचा तो उसका दाहिना हाथ मेरे सिर पर उठ गया। मानों वह मुझे आशीर्वाद दे रही हो,
लेकिन सहसा मुझको झटका सा लगा। भैरबी स्थिर दृष्टि से अपलक मेरी ओर देख रही थी। फिर वह उठ खड़ी हुई और मुझे अपने पीछे आने का संकेत करके चलने लगी। मैं उसके पीछे-पीछे किस स्थान पर पहुँचा, यह नहीं बतला सकूँगा। उस समय भैरवी का रूप बड़ा ही निर्मम और भयंकर था। मुझे साथ ले जाकर वह एक विशाल-श्मशान में खड़ी हो गयी। बहाँ चारों ओर पीपल, पाकड़ और गूलर के पेड़ खड़े थे और हर पेड़ के नीचे नर-कंकाल, हड्डियाँ, खोपड़ियाँ आदि पड़ी हुयी थी। मेरा दम घुटने लगा। श्मशान क्षेत्र के सामने एक विशाल मंदिर था। ऊपर जाने के लिये सैकड़ों सीहियाँ थीं। भैरवी के साथ किसी अज्ञात सम्मोहन के वशीभूत होकर मैं मंदिर की सीढियाँ चढ़कर ऊपर पहुँचा। देखा तो मंदिर के सामने पञ्च प्रेतासन है। बगल में पारिजात के पेड़ के नीचे सहस्रमुण्डी आसन है। उसके दूसरी ओर पंचवटी है। सिंहद्वार से प्रवेश करके मैं मुख्य मंदिर में पहुँचा। भीतर घना अन्धकार था। एक ओर पंचमुखी दीपाधार पर घी के दीप जल रहे थे-उसके मन्द आलोक में मैने सामने देबी छिन्नमस्ता की सजीब-सी रक्तवर्ण पाषाण प्रतिमा देखी। वह षोडश दल कमल के ऊपर आसीन थीं। कमल पुष्प के भीतर रति मुद्रा में आलिंगनबद्ध युवक-युवती लेटे हुये थे-जिनके ऊपर माँ के दोनों पैर थे। माँ के एक साथ में शोणित लगा बिकराल खड्ग था और दूसरे में स्वयं माँ का ही रक्त से सना मुण्ड। कटे हुये गले से रक्त की तीन धारायें निकल कर अगल-बगल खड़ी हाकिनी डाकिनी और शाकिनी की प्रतिमाओं के मुँह में गिर रही थीं। किसी का क्षीण स्वर सुनाई पड़ा-"ये तीनों रक्तधारायें ज्ञान, भक्ति और वैराग्य की प्रतीक हैं।” माँ के सामने खड़े वहत सारे लोग अपनी-अपनी बेदना अर्पित कर रहे थे। मैं भी जाकर उन्हीं के साथ खड़ा हो गया, किन्तु मेरी कौन-सी बेदना थी... कौन सी व्यथा थी? भैरवी भी मेरे निकट ही खड़ी थी। गम्भीरता के बावजूद उसका काला चेहरा मुझे उस समय बड़ा सुन्दर लगा। उसकी दृष्टि भी उतनी अन्तभेदी नहीं थी, पर अपलक और कठोर अवश्य थी। एकाएक मेरा मन अशान्त हो गया। भैरबी की दृष्टि पैनी होती जा रही थी। सहामुण्डी आसन पर बैठने से मन को शान्ति मिलेगी-यह सोचकर मैं उधर ही बढ़ गया। चारो ओर अंधेरा था। वातावरण स्तब्ध था। हवा की सरसराहट भी चौंका देती थी। मैं पालथी मारकर आसन पर बैठ गया। मन अपने आप शान्त होने लगा। फिर बिलकुल शान्त होकर किसी अतल गहरायी में इब गया। वह एक विचित्र अलौकिक अनुभूति थी। मैं समर्पण के एक नये प्रवाह में विभोर था और उसी अपार्थिव अनुभूति के बीच मैं अपने पार्थिव शरीर में वापस लौट आया। मेरा वह गहरा स्वप्न टूट गया। मगर यह क्या? मेरे कमरे का दरवाजा टूट कर एक ओर झूल रहा था।
कमरे में बहुत सारे लोग इकटे थे। सभी रो रहे थे। मेरा शरीर चारपायी से उतारकर जमीन पर लिटा दिया गया था और शब-यात्रा की व्यवस्था की जा रही थी। मैं संसार के लिये मर चुका था और मरे हुये काफी समय गुजर चुका था। अर्थात् मुझको जागने में यदि एक-दो घंटे की और देर हो जाती तो निस्सन्देह मेरी पार्थिव काया चिताको अर्पित कर दी गयी होती। मैं उठकर बैठ गया। ऐसा लगा मानों गहरी नींद सोकर उठा होऊँ। लोग अचकचाकर मुझसे तरह तरह के प्रश्न करने लगे, किन्तु भला मैं उन्हें क्या उत्तर देता, क्या कहता। यदि मैं उन तमाम दृश्यों और अनुभूतियों के बारे में बतलाता भी तो भला कौन विश्वास करता। गम्भीर होकर मैं सोचने लगा-क्या वास्तव में मैं मर गया था? क्या सचमुच इस बीच शरीर और संसार से मेरा संबंध टूट चुका था? यदि हाँ तो वह कौन सा शरीर और कौन का संसार था? वह सत्य था या यह सत्य है? यदि दोनों जीवन सत्य है, दोनों शरीर सत्य है और दोनों संसार भी सत्य है, तो जैसे यहाँ मर कर मैं उस संसार में जीवित हो उठा था वैसे ही उस संसार में भी मर कर अब इस स्थल जगत में जीवित हो उठा हूँ फिर? अब तक इस संसार के लिये मृत और उस अनजाने लोक के लिये जीवित था, परन्तु अब वहाँ के लिये मृत और यहाँ के लिये जीवित हूँ। मेरे सामने एक रहस्यमयी गुत्थी थी, जिसे मैं उस समय नहीं सुलझा सका। तब मेरी उम्र ही क्या थी... अनुभव और ज्ञान ही कितना था। हाँ, उस अनोखी अविश्वसनीय घटना ने मेरे लिये एक ऐसा मार्ग जरूर खोल दिया, जिस पर चलकर मैंने ऐसे तमाम सत्यों की खोज की और अनुभव प्राप्त किए जो लौकिक स्तर पर सम्भव नहीं है।
जीवन शाश्वत है। उसकी धारा अबाध गति से प्रवाहित है। मृत्यु से जीवन धारा में किसी प्रकार का व्यतिक्रम नहीं उत्पन्न होता, न तो कोई प्रभाव ही पड़ता है उस पर। उत्पत्ति से लेकर मानब जीवन विभिन्न स्तरों पर क्रम से विकसित होता रहता है। आज के भौतिकवादी बाताबरण और पैतृक परम्परा को मानते हैं। इस सन्दर्भ में ज्योतिष शास्त्र का कहना है कि जीवन को बराबर गतिमान बनाये रखने के लिये सौर-मण्डल की रश्मियों का प्रभाव प्रमुख है। सौर रश्मियों के विकिरण का प्रभाव सबसे ज्यादा मनुष्य की आत्मा, मन और विचारों पर पड़ता है। गर्भ में शिशु के आने पर वे सौर रश्मियाँ अपना प्रभाव डालना शुरू कर देती हैं। फिर उत्पत्ति से लेकर मृत्युपर्यन्त की जीवन यात्रा के दौरान उनका प्रभाव क्रमश: क्षीण होता जाता है। ज्योतिष के इस सिद्धान्त को आज वैज्ञानिकों ने भी स्वीकार कर लिया है। सर्वविदित है कि एटमबम के विकिरण ने हिरोशिमा के शिशुओं पर अपना प्रभाव डाला था।