S
StoryPublisher
Guest
अग्रिमा का कमरा:
अग्रिमा अपने कमरे में जाकर बाथरूम में घुस गयी और नहाकर तौलिया लपेटे हुए बाहर आयी और अपने भाइयों की प्रतीक्षा करने लगी. कुछ ही समय में असीम और कुमार भी आ गए. अग्रिमा अब सोच रही थी कि उसने जोश में अधिक ही मांग लिया. पर अब तीर चल चुका था और दोनों भी कमरे में भी आ चुके थे. अग्रिमा के चेहरे के भाव असीम ने पढ़ लिए.
असीम: “देख अगर तुझे लगता है कि कुछ नहीं करना है, तो कोई बात नहीं है. दिल करे तभी कुछ करना. नहीं तो बाद में दुखी हो जाएगी.”
अग्रिमा: “नहीं भाई, चुदवाने का तो मन पूरा है, पर आप दोनों को एक साथ झेलने का बूता अभी मेरा नहीं है.”
असीम: “हमने तो ये सोचा ही नहीं. अधिक से अधिक एक को चूसेगी और एक से चुदेगी। और वो भी प्यार से जैसे मॉम ने कहा है. तेरे भाई हैं दुश्मन नहीं.”
अग्रिमा: “तो फिर हमें समय नहीं गँवाना चाहिए.” कहते हुए अग्रिमा ने अपने तौलिये को ढ़ीला किया तो वो सरककर नीचे गिर गया और अग्रिमा का मनमोहक शरीर दोनों भाइयों के ऑंखें चौंधियाने लगा.
असीम और कुमार तुरंत ही अपने कपडे निकालकर नंगे हो गए. अग्रिमा ने उन्हें बिस्तर पर बैठने के लिए कहा और फिर उनके सामने बैठकर उनके लंड चूसने लगी.
असीम और कुमार ने उसे अपनी मन भर कर उनके लौडों को चूसने दिया फिर उसे उठाया।
“हमें भी कुछ चखने को दे दो अब तो.”
ये कहकर असीम बिस्तर पर लेटा और अग्रिमा को कुमार ने अपनी चूत असीम के मुंह पर रखने के लिए कहा. अग्रिमा उलटी होकर असीम में मुंह पर बैठी और असीम ने अपनी लपलपाती जीभ को उसकी कमसिन चूत की चाशनी चाटने के लिए अंदर धकेल दिया. अग्रिमा काँप उठी और वो अभी इस अनुभव का आनंद ही ले रही थी कि उसे अपनी गांड के ऊपर कुछ रेंगता हुआ अनुभव हुआ. उसने मुड़कर देखा तो कुमार अपनी जीभ से उसकी गांड कुरेद रहा था. आनंद विभोर होकर अग्रिमा ने एक गहरी साँस ली और अपने शरीर को अपने दोनों भाइयों को सौंप दिया.
असीम और कुमार इस विद्या में प्रवीण थे. उन्हें घर और बाहर दोनों से इन दोनों बिलों को कैसे आनंदित किया जाता है, की भरपूर शिक्षा दीक्षा प्राप्त थी. अग्रिमा को इसका आनंद एक साथ कम ही मिलता था क्योंकि वो जब भी इन्हें अपनी माँ और सलोनी की चुदाई करते देखती थी तो उसे एक भय सताता था कि खिन उसके साथ ऐसा किया तो क्या होगा. पर आज उसने अपने आप को समर्पित कर दिया था. और दोनों ने उसे विश्वास भी दिलाया था कि वो उसे उतने ही प्यार से चोदेगे जितने प्यार से उसे उसके पिता आशीष और दादा जीवन चोदते हैं.
अपने दोनों छेदों में चल रही जीभ का ही ये प्रभाव था कि अग्रिमा जल्दी ही अपने रस से असीम के चेहरे को भिगाने लगी. उसकी कसी तंग चूत अब अधिकाधिक रस छोड़ रही थी. उसका शरीर भी इस दोहरे प्रहार से अपने आप को प्रफुल्लित अनुभव कर रहा था. जब अग्रिमा दो तीन बार झड़ गयी तो असीम का चेहरा इतना भीग चुका था कि उसके लिए अब और रुकना असंभव था. उसने हाथ के संकेत से कुमार को कहा कि अब बस करो.
कुमार ने अग्रिमाा की गांड से अपना मुंह हटाया और उसके नितम्बों पर हल्की सी चपत लगाई. अग्रिमाा ने पाने आप को असीम के मुंह से उठाया.
“अब कुछ चुदाई हो जाये.”
अग्रिमाा ने सिर हिलाया.
“तो ऐसा है कि पहले असीम आपकी चुदाई करेंगे और तुमरे लंड को चूसोगी और फिर हम दोनों अपने स्थान बदलेंगे.”
“पर आप में से कोई भी मेरी गांड मारने का प्रयास नहीं करेगा.”
असीम हँसते हुए, “पता है, मॉम ने पहले ही तुम्हारी गांड से दूर रहने को कहा है. पर एक बात बताओ, क्यों नहीं तुम पापा से अपनी गांड मरवा ही लेतीं, जिससे हमारे लिए भी ये उपलब्ध हो जाये.”
“पहले भाग्या को चोद लो, फिर मेरी गांड में लंड डालने के बारे में सोचना.”
“अरे, बकरी की माँ कब तक खैर मनाएगी. उसे तो चुदना ही हमसे, बस दिन गईं रहे हैं.”
“तो इसके लिए भी गिनो. अब छोड़ो और जो मिल रहा है उसको ही चोद लो.”
कुमार बिस्तर पर लेटा और अग्रिमाा ने उसके लंड को अपने मुंह में लिया और बड़े प्यार से चूसने लगी. असीम ने उसके पीछे जाकर उसकी चूत में अपने लंड को धीरे से डाला और कुछ ही देर में पूरे लंड को अंदर कर दिया. फिर वो हल्के धक्कों के साथ उसकी चुदाई करने लगा. अग्रिमाा कुमार के लंड को चूसने में मस्त थी और उसे भी अपनी चूत की ये धीमी चुदाई बहुत मजा दे रही थी. उसे पता था कि अगर उसने गलती से भी थोड़ा तेज चोदने के लिए बोला तो उसके भाई लोग उसकी चूत की धज्जियाँ उड़ा देंगे.
असीम अपने आप को संभालते हुए उसे बड़े प्यार से चोदता रहा. उसने समय देखकर गति कुछ बढ़ाई पर इतनी नहीं कि अग्रिमाा को परेशानी हो. इस प्यार भरी चुदाई से अग्रिमाा झड़ने लगी और जब वो दो बार झड़ गयी तो उसके भाइयों ने अपने स्थान बदले. कुमार असीम से कुछ अधिक तीव्रता से चोद रहा था, पर अब तक अग्रिमाा की चूत असीम के लंड और अपने स्खलन से उसकी इस चुदाई को सरलता से सहन कर रही थी. उसका शरीर अब उसका साथ छोड़ रहा था. उसकी चूत भी अब बिना रुके रस बहा रही थी.
अंत में अग्रिमाा एक और बार झड़ी और वीर निढाल हो गयी. कुमार ने अपने लंड को बाहर निकाला और असीम और वो दोनों मुठ मारने लगे. उन्होंने अग्रिमाा को सीधा किया और उसे अपना मुंह खोलने के लिए कहा. जैसे ही रस की फुहार निकलीं तो अग्रिमाा के चेहरे पर और मुंह में कामरस की बौछार हो गयी. दोनों भाइयों ने अग्रिमाा को वीर्य का स्नान करने के बाद ही अपने लौडों को छोड़ा. अग्रिमाा के चेहरे पर सफ़ेद गाढ़ा चिपचिपा वीर्य बह रहा था. उसके चेहरे पर एक असीम संतुष्टि के भाव थे. उसने अपनी उँगलियों से वीर्य को एकत्रित किया और अपने मुंह में डाल लिया.
“सच में आज मुझे आप दोनों ने इतना आनंद दिया है कि इसकी मैं तुलना नहीं कर सकती. मैं व्यर्थ ही आपसे चुदवाने में संकोच कर रही थी. अब आप जब चाहो, तब मेरी इस प्रकार की चुदाई कर सकते हो.”
“जब तक तुम ऐसी चुदाई चाहोगी, ऐसी ही करेंगे. जिस दिन तुम्हारा मन बदला उस दिन भी हम तुम्हें पूरी संतुष्टि देंगे.”
“आज आप दोनों यहीं सो जाओ. आज के लिए इतना ही, पर मैं अकेले नहीं सोना चाहती.”
“ठीक है, चलो अब मुंह धो लो, फिर सोते हैं.”
“नहीं, मुझे इसी प्रकार से सोना है.”
ये सुनकर कुमार ने बत्ती बंद की और दोनों भाई अग्रिमाा के अगल बगल लेट गए और कुछ ही देर मैं सब सो गए.
*******
अगले दिन:
आशीष सुबह जल्दी निकल गया. असीम और कुमार भी अग्रिमा के कमरे से अपने कमरे में आकर कुछ देर और सो रहे थे. नौ बजे सलोनी ने उन्हें जाकर जगाया और दोनों नाश्ते के लिए आ गए. नाश्ते के बाद सब अपने अपने काम में लग गए. असीम और कुमार दोपहर का खाना खाकर बाहर चले गए. अग्रिमा अपने कमरे में ही रही. शाम होने को थी. सुनीति के पास किसी का फोन आया. बात करने के बाद उसके चेहरे पर एक ख़ुशी छा गयी. छह बजे तक आशीष भी आ गए. और उनके पीछे पीछे असीम और कुमार भी.
सभी लोग बैठक में बैठे तो सुनीति ने कहा, “आज मधुजी का फोन आया था. उन्होंने बताया कि स्मिता ने असीम के लिए स्वीकृति दी है. अब हमारे पास एक सप्ताह का समय है अगर हम मना करना चाहें तो. पर एक बात है, कि जो भी निर्णय हम उन्हें बताएँगे, वो तथस्ट होगा. बदलने की अनुमति नहीं है.”
आशीष: “मेरे विचार से महक और असीम को एक दिन के लिए साथ घूमने के लिए भेजो. हाँ, उन्हें अपनी सीमा में रहना है. और अगर इसके बाद वो दोनों एक दूसरे को ठीक समझते हैं तो हमें भी स्वीकृति दे देनी चाहिए.”
सुनीति: “ये ठीक है, मैं एक बार मधुजी से इसके लिए पूछ लेती हूँ.” उसने फोन पर बात की और बताया कि इसमें कोई आपत्ति नहीं है. फिर उसने स्मिता से बात की और उसकी स्वीकृति के बाद कहा कि असीम और मख ही ये निश्चित करें कि उन्हें कब जाना है.
अब आशीष बोला: “मैं जिस अनुबंध के लिए गया था वो हमारी खेतों की उपज को सीधे रिसोर्ट को देने का है. मनोहर जी के ऐसे पाँच और रिसोर्ट हैं और हमें उन पाँचों को अपनी उपज देनी होगी.”
सुनीति: “पर इतनी कैसे पूरी पड़ेगी उनके लिए?”
आशीष: “पिताजी ने उनके चारोँ मित्रों के खेत, जिसमे तुम्हारे पिताजी के खेत भी हैं, एक ही मैनेजर के प्रबंध में दिए हैं. मेरे विचार से वे भी इस अनुबंध का अपरोक्ष रूप से भागीदार बन सकेंगे. हम उन सबसे उपज लेकर सीधे रिसोर्ट को देंगे. उन्हें और हमें सबको इसमें लाभ मिलेगा.”
सुनीति: “अपने पापाजी से बात की? या अपने ही आप सब तय कर लिया.”
आशीष: “आज करूंगा. अभी तो अपने ही आप तय किया है. मुझे इसमें सबका लाभ दिख रहा है.”
सुनीति (कुछ चिंता से): आप पापाजी से बात कर लीजिये, अभी.”
आशीष: :ओके, बेबी.”
आशीष ने फिर जीवन से बात की और उसे नए अनुबंध के बारे में बताया और उनके मित्रों की उपज खरीदने का भी प्रयोजन समझाया. जीवन ने कहा कि वो सबसे बात करेगा और कुछ ही देर में बताएगा. जीवन का एक घंटे बाद फोन आया और उसने कहा कि उसके मित्र इस अनुबंध से खुश हैं, परन्तु वो आशीष की कम्पनी को दो प्रतिशत फीस देने की जिद किये बैठे हैं. उनका कहना है कि अधिकतर कार्य और आशंका के लिए आशीष को ही उत्तरदायी मन जायेगा. इसीलिए, ये फीस उसे लेनी चाहिए. अंत में आशीष ने भी स्वीकार किया और सब ने इसे स्वीकृति दे दी.
जीवन का गाँव, कुछ दिन बाद:
आज जीवन और गिरी अपने शहर लौट रहे थे. बलवंत और गीता भी उनके साथ थे. बलवंत ने भी एक ड्राइवर बुला लिया था जो उसकी गाड़ी शहर छोड़कर लौटेगा. निकलते समय गिरी की आँखों में आंसू थे. वो सबसे गले मिल मिलकर रो रहा था. सभी उसके इस अश्रुपूर्ण आलिंगन का अपनी ओर से भी यथावत उत्तर दे रहे थे. स्त्रियों ने विशेषकर उसके आलिंगन का भरपूर साथ दिया. इन दस दिनों में उसकी सेक्स की ऊर्जा लौट आयी थी और इसके लिए वो इन सबका हमेशा के लिए आभारी था. इन दस दिनों में उसने हर स्त्री के हर अंग को भरपूर भोगा था. उनके पति भी उसे इसके लिए उत्साहित करते रहे थे. मुंह, चूत हो या गांड कोई भी छेद अछूता नहीं रहा था. वो इस समय को कभी नहीं भूल सकते थे.
गिरी: “आपको कभी भी लगे की ऐसी कोई भी समस्या है जिसमे मैं आपकी सहायता कर सकता हूँ तो मुझे अवश्य बताना. आप ने मुझे नया जीवनदान दिया है, और इसके लिए मैं आपका सदैव के लिए ऋणी रहूंगा.”
उन सबको घर आने का निमंत्रण देकर वो गाड़ी में बैठने लगा तो उसे पीछे से निर्मला ने अपनी बाँहों में ले लिया.
“भाईसाहब, आप भी जब चाहें हमारे घर आईये. वैसे भी हमारे गाँव में वैद्य की बड़ी कमी है.”
सब इस बात पर हँसते हुए एक दूसरे से विदा लिए और गाड़ियां शहर की ओर दौड़ पड़ीं.
********
अगली बार मिलेंगे अगले परिवार से
अग्रिमा अपने कमरे में जाकर बाथरूम में घुस गयी और नहाकर तौलिया लपेटे हुए बाहर आयी और अपने भाइयों की प्रतीक्षा करने लगी. कुछ ही समय में असीम और कुमार भी आ गए. अग्रिमा अब सोच रही थी कि उसने जोश में अधिक ही मांग लिया. पर अब तीर चल चुका था और दोनों भी कमरे में भी आ चुके थे. अग्रिमा के चेहरे के भाव असीम ने पढ़ लिए.
असीम: “देख अगर तुझे लगता है कि कुछ नहीं करना है, तो कोई बात नहीं है. दिल करे तभी कुछ करना. नहीं तो बाद में दुखी हो जाएगी.”
अग्रिमा: “नहीं भाई, चुदवाने का तो मन पूरा है, पर आप दोनों को एक साथ झेलने का बूता अभी मेरा नहीं है.”
असीम: “हमने तो ये सोचा ही नहीं. अधिक से अधिक एक को चूसेगी और एक से चुदेगी। और वो भी प्यार से जैसे मॉम ने कहा है. तेरे भाई हैं दुश्मन नहीं.”
अग्रिमा: “तो फिर हमें समय नहीं गँवाना चाहिए.” कहते हुए अग्रिमा ने अपने तौलिये को ढ़ीला किया तो वो सरककर नीचे गिर गया और अग्रिमा का मनमोहक शरीर दोनों भाइयों के ऑंखें चौंधियाने लगा.
असीम और कुमार तुरंत ही अपने कपडे निकालकर नंगे हो गए. अग्रिमा ने उन्हें बिस्तर पर बैठने के लिए कहा और फिर उनके सामने बैठकर उनके लंड चूसने लगी.
असीम और कुमार ने उसे अपनी मन भर कर उनके लौडों को चूसने दिया फिर उसे उठाया।
“हमें भी कुछ चखने को दे दो अब तो.”
ये कहकर असीम बिस्तर पर लेटा और अग्रिमा को कुमार ने अपनी चूत असीम के मुंह पर रखने के लिए कहा. अग्रिमा उलटी होकर असीम में मुंह पर बैठी और असीम ने अपनी लपलपाती जीभ को उसकी कमसिन चूत की चाशनी चाटने के लिए अंदर धकेल दिया. अग्रिमा काँप उठी और वो अभी इस अनुभव का आनंद ही ले रही थी कि उसे अपनी गांड के ऊपर कुछ रेंगता हुआ अनुभव हुआ. उसने मुड़कर देखा तो कुमार अपनी जीभ से उसकी गांड कुरेद रहा था. आनंद विभोर होकर अग्रिमा ने एक गहरी साँस ली और अपने शरीर को अपने दोनों भाइयों को सौंप दिया.
असीम और कुमार इस विद्या में प्रवीण थे. उन्हें घर और बाहर दोनों से इन दोनों बिलों को कैसे आनंदित किया जाता है, की भरपूर शिक्षा दीक्षा प्राप्त थी. अग्रिमा को इसका आनंद एक साथ कम ही मिलता था क्योंकि वो जब भी इन्हें अपनी माँ और सलोनी की चुदाई करते देखती थी तो उसे एक भय सताता था कि खिन उसके साथ ऐसा किया तो क्या होगा. पर आज उसने अपने आप को समर्पित कर दिया था. और दोनों ने उसे विश्वास भी दिलाया था कि वो उसे उतने ही प्यार से चोदेगे जितने प्यार से उसे उसके पिता आशीष और दादा जीवन चोदते हैं.
अपने दोनों छेदों में चल रही जीभ का ही ये प्रभाव था कि अग्रिमा जल्दी ही अपने रस से असीम के चेहरे को भिगाने लगी. उसकी कसी तंग चूत अब अधिकाधिक रस छोड़ रही थी. उसका शरीर भी इस दोहरे प्रहार से अपने आप को प्रफुल्लित अनुभव कर रहा था. जब अग्रिमा दो तीन बार झड़ गयी तो असीम का चेहरा इतना भीग चुका था कि उसके लिए अब और रुकना असंभव था. उसने हाथ के संकेत से कुमार को कहा कि अब बस करो.
कुमार ने अग्रिमाा की गांड से अपना मुंह हटाया और उसके नितम्बों पर हल्की सी चपत लगाई. अग्रिमाा ने पाने आप को असीम के मुंह से उठाया.
“अब कुछ चुदाई हो जाये.”
अग्रिमाा ने सिर हिलाया.
“तो ऐसा है कि पहले असीम आपकी चुदाई करेंगे और तुमरे लंड को चूसोगी और फिर हम दोनों अपने स्थान बदलेंगे.”
“पर आप में से कोई भी मेरी गांड मारने का प्रयास नहीं करेगा.”
असीम हँसते हुए, “पता है, मॉम ने पहले ही तुम्हारी गांड से दूर रहने को कहा है. पर एक बात बताओ, क्यों नहीं तुम पापा से अपनी गांड मरवा ही लेतीं, जिससे हमारे लिए भी ये उपलब्ध हो जाये.”
“पहले भाग्या को चोद लो, फिर मेरी गांड में लंड डालने के बारे में सोचना.”
“अरे, बकरी की माँ कब तक खैर मनाएगी. उसे तो चुदना ही हमसे, बस दिन गईं रहे हैं.”
“तो इसके लिए भी गिनो. अब छोड़ो और जो मिल रहा है उसको ही चोद लो.”
कुमार बिस्तर पर लेटा और अग्रिमाा ने उसके लंड को अपने मुंह में लिया और बड़े प्यार से चूसने लगी. असीम ने उसके पीछे जाकर उसकी चूत में अपने लंड को धीरे से डाला और कुछ ही देर में पूरे लंड को अंदर कर दिया. फिर वो हल्के धक्कों के साथ उसकी चुदाई करने लगा. अग्रिमाा कुमार के लंड को चूसने में मस्त थी और उसे भी अपनी चूत की ये धीमी चुदाई बहुत मजा दे रही थी. उसे पता था कि अगर उसने गलती से भी थोड़ा तेज चोदने के लिए बोला तो उसके भाई लोग उसकी चूत की धज्जियाँ उड़ा देंगे.
असीम अपने आप को संभालते हुए उसे बड़े प्यार से चोदता रहा. उसने समय देखकर गति कुछ बढ़ाई पर इतनी नहीं कि अग्रिमाा को परेशानी हो. इस प्यार भरी चुदाई से अग्रिमाा झड़ने लगी और जब वो दो बार झड़ गयी तो उसके भाइयों ने अपने स्थान बदले. कुमार असीम से कुछ अधिक तीव्रता से चोद रहा था, पर अब तक अग्रिमाा की चूत असीम के लंड और अपने स्खलन से उसकी इस चुदाई को सरलता से सहन कर रही थी. उसका शरीर अब उसका साथ छोड़ रहा था. उसकी चूत भी अब बिना रुके रस बहा रही थी.
अंत में अग्रिमाा एक और बार झड़ी और वीर निढाल हो गयी. कुमार ने अपने लंड को बाहर निकाला और असीम और वो दोनों मुठ मारने लगे. उन्होंने अग्रिमाा को सीधा किया और उसे अपना मुंह खोलने के लिए कहा. जैसे ही रस की फुहार निकलीं तो अग्रिमाा के चेहरे पर और मुंह में कामरस की बौछार हो गयी. दोनों भाइयों ने अग्रिमाा को वीर्य का स्नान करने के बाद ही अपने लौडों को छोड़ा. अग्रिमाा के चेहरे पर सफ़ेद गाढ़ा चिपचिपा वीर्य बह रहा था. उसके चेहरे पर एक असीम संतुष्टि के भाव थे. उसने अपनी उँगलियों से वीर्य को एकत्रित किया और अपने मुंह में डाल लिया.
“सच में आज मुझे आप दोनों ने इतना आनंद दिया है कि इसकी मैं तुलना नहीं कर सकती. मैं व्यर्थ ही आपसे चुदवाने में संकोच कर रही थी. अब आप जब चाहो, तब मेरी इस प्रकार की चुदाई कर सकते हो.”
“जब तक तुम ऐसी चुदाई चाहोगी, ऐसी ही करेंगे. जिस दिन तुम्हारा मन बदला उस दिन भी हम तुम्हें पूरी संतुष्टि देंगे.”
“आज आप दोनों यहीं सो जाओ. आज के लिए इतना ही, पर मैं अकेले नहीं सोना चाहती.”
“ठीक है, चलो अब मुंह धो लो, फिर सोते हैं.”
“नहीं, मुझे इसी प्रकार से सोना है.”
ये सुनकर कुमार ने बत्ती बंद की और दोनों भाई अग्रिमाा के अगल बगल लेट गए और कुछ ही देर मैं सब सो गए.
*******
अगले दिन:
आशीष सुबह जल्दी निकल गया. असीम और कुमार भी अग्रिमा के कमरे से अपने कमरे में आकर कुछ देर और सो रहे थे. नौ बजे सलोनी ने उन्हें जाकर जगाया और दोनों नाश्ते के लिए आ गए. नाश्ते के बाद सब अपने अपने काम में लग गए. असीम और कुमार दोपहर का खाना खाकर बाहर चले गए. अग्रिमा अपने कमरे में ही रही. शाम होने को थी. सुनीति के पास किसी का फोन आया. बात करने के बाद उसके चेहरे पर एक ख़ुशी छा गयी. छह बजे तक आशीष भी आ गए. और उनके पीछे पीछे असीम और कुमार भी.
सभी लोग बैठक में बैठे तो सुनीति ने कहा, “आज मधुजी का फोन आया था. उन्होंने बताया कि स्मिता ने असीम के लिए स्वीकृति दी है. अब हमारे पास एक सप्ताह का समय है अगर हम मना करना चाहें तो. पर एक बात है, कि जो भी निर्णय हम उन्हें बताएँगे, वो तथस्ट होगा. बदलने की अनुमति नहीं है.”
आशीष: “मेरे विचार से महक और असीम को एक दिन के लिए साथ घूमने के लिए भेजो. हाँ, उन्हें अपनी सीमा में रहना है. और अगर इसके बाद वो दोनों एक दूसरे को ठीक समझते हैं तो हमें भी स्वीकृति दे देनी चाहिए.”
सुनीति: “ये ठीक है, मैं एक बार मधुजी से इसके लिए पूछ लेती हूँ.” उसने फोन पर बात की और बताया कि इसमें कोई आपत्ति नहीं है. फिर उसने स्मिता से बात की और उसकी स्वीकृति के बाद कहा कि असीम और मख ही ये निश्चित करें कि उन्हें कब जाना है.
अब आशीष बोला: “मैं जिस अनुबंध के लिए गया था वो हमारी खेतों की उपज को सीधे रिसोर्ट को देने का है. मनोहर जी के ऐसे पाँच और रिसोर्ट हैं और हमें उन पाँचों को अपनी उपज देनी होगी.”
सुनीति: “पर इतनी कैसे पूरी पड़ेगी उनके लिए?”
आशीष: “पिताजी ने उनके चारोँ मित्रों के खेत, जिसमे तुम्हारे पिताजी के खेत भी हैं, एक ही मैनेजर के प्रबंध में दिए हैं. मेरे विचार से वे भी इस अनुबंध का अपरोक्ष रूप से भागीदार बन सकेंगे. हम उन सबसे उपज लेकर सीधे रिसोर्ट को देंगे. उन्हें और हमें सबको इसमें लाभ मिलेगा.”
सुनीति: “अपने पापाजी से बात की? या अपने ही आप सब तय कर लिया.”
आशीष: “आज करूंगा. अभी तो अपने ही आप तय किया है. मुझे इसमें सबका लाभ दिख रहा है.”
सुनीति (कुछ चिंता से): आप पापाजी से बात कर लीजिये, अभी.”
आशीष: :ओके, बेबी.”
आशीष ने फिर जीवन से बात की और उसे नए अनुबंध के बारे में बताया और उनके मित्रों की उपज खरीदने का भी प्रयोजन समझाया. जीवन ने कहा कि वो सबसे बात करेगा और कुछ ही देर में बताएगा. जीवन का एक घंटे बाद फोन आया और उसने कहा कि उसके मित्र इस अनुबंध से खुश हैं, परन्तु वो आशीष की कम्पनी को दो प्रतिशत फीस देने की जिद किये बैठे हैं. उनका कहना है कि अधिकतर कार्य और आशंका के लिए आशीष को ही उत्तरदायी मन जायेगा. इसीलिए, ये फीस उसे लेनी चाहिए. अंत में आशीष ने भी स्वीकार किया और सब ने इसे स्वीकृति दे दी.
जीवन का गाँव, कुछ दिन बाद:
आज जीवन और गिरी अपने शहर लौट रहे थे. बलवंत और गीता भी उनके साथ थे. बलवंत ने भी एक ड्राइवर बुला लिया था जो उसकी गाड़ी शहर छोड़कर लौटेगा. निकलते समय गिरी की आँखों में आंसू थे. वो सबसे गले मिल मिलकर रो रहा था. सभी उसके इस अश्रुपूर्ण आलिंगन का अपनी ओर से भी यथावत उत्तर दे रहे थे. स्त्रियों ने विशेषकर उसके आलिंगन का भरपूर साथ दिया. इन दस दिनों में उसकी सेक्स की ऊर्जा लौट आयी थी और इसके लिए वो इन सबका हमेशा के लिए आभारी था. इन दस दिनों में उसने हर स्त्री के हर अंग को भरपूर भोगा था. उनके पति भी उसे इसके लिए उत्साहित करते रहे थे. मुंह, चूत हो या गांड कोई भी छेद अछूता नहीं रहा था. वो इस समय को कभी नहीं भूल सकते थे.
गिरी: “आपको कभी भी लगे की ऐसी कोई भी समस्या है जिसमे मैं आपकी सहायता कर सकता हूँ तो मुझे अवश्य बताना. आप ने मुझे नया जीवनदान दिया है, और इसके लिए मैं आपका सदैव के लिए ऋणी रहूंगा.”
उन सबको घर आने का निमंत्रण देकर वो गाड़ी में बैठने लगा तो उसे पीछे से निर्मला ने अपनी बाँहों में ले लिया.
“भाईसाहब, आप भी जब चाहें हमारे घर आईये. वैसे भी हमारे गाँव में वैद्य की बड़ी कमी है.”
सब इस बात पर हँसते हुए एक दूसरे से विदा लिए और गाड़ियां शहर की ओर दौड़ पड़ीं.
********
अगली बार मिलेंगे अगले परिवार से