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Incest विधवा माँ के अनौखे लाल

शाज़िया नंगी रूम में आती है और उसके साथ साथ दोनो शैतान भी.....कमरे में आ कर अनीस शाज़िया के गीले बालों को पोछने में मदद करता है और साथ ही साथ उसके बाकी शरीर को भी पोछता है.....जबतक जीशान शाज़िया के अलमीरा में से एक साड़ी और एक ब्लाउज और इनको निकालने के बाद दौर कर अपने कमरे से एक रस्सी ले कर आता है.....शाज़िया उसे सवालिया नजरो से देखती है जबकि अनीस मुस्कुराता है....

शाज़िया - मेरी पेटिकोट कहा है और ये रस्सी क्यों लाये हो....

जीशान - तुम बस देखती जाओ माँ....और जबतक काम पूरा नही हो जाता मुह बन्द रखना .....

भइया तुम माँ को नंगी तैयार करो मैं तुम्हारे बाद उसे खूबसूरती में चार चांद लगाऊंगा.....

अनीस शाज़िया के बालों को कंघी से सुलझाने लगता है और उन्हें सुलझाने के बाद उसके बदन को डीओ से खुश्बूदार बना देता है उसके बाद वो उसे उसकी बाहों को उठा कर काँखों में पाउडर लगता है और उसके बाद डियो दुबारा उठा कर उसकी गांड़ और चुत पे भी स्प्रे कर देता है और डियो के ठंडे अहसास से शाज़िया गनगना जाती है |

शाज़िया - क्या करते हो अनीस ये वहा लगाने की चीज थोड़े ही है |

अनीस हस कर रह जाता है और चिल्ला कर कहता है-

जीशान अब जल्दी करो और माँ को कपड़े पहना दो या ऐसे ही ले जाने का इरादा है आर ये कहते हुए शाज़िया की चूची को मुह में भर लेता है .....

शाज़िया उसे कुछ देर चूसने देती है जबतक जीशान उसके लिए कपड़े ले आता है और अनीस जा कर अपने मोबाइल से शाज़िया और जीशान की विडियो बनाने लगता है जीशान शाज़िया की कमर में वो रस्सी बांध देता है और शाज़िया को ब्लाउज पहना देता है वो उसके ब्लाउज की दो बटन्स खुले छोड़ देता है

शाज़िया - ये क्या कर रहा है कमर में रस्सी ब्लाउज के खुले बटन्स ऐसे ले जाओगे मुझे मैं ऐसे नहीं जा रही हु कही

जीशान उसकी कमर को पकड़ कर कहता है की रुको माँ तुम बस देखती रहो और मैंने और अनीस भईया ने क्या कहा है याद है ना |

शाज़िया – हां

जीशान - तो बस

और वो शाज़िया को साडी पहनाने लगता है साडी का एक भाग जिस को पेटीकोट में डालते है वो जीशान उस रस्सी के अंदर डालता है जो साडी को अच्छे से थाम लेता है नीचे गिरने नहीं देता शाज़िया आँखे गोल किए हुए देखती रहती है उसे तैयार करने के बाद दोनों भाई भी तैयार हो जाते है और निकल पड़ते है हॉल की तरफ

ऑटो में शाज़िया उन् दोनों के बीच बैठती है और शाज़िया को बिना पेटीकोट के साड़ी काफी अजीब एहसास दे रहा था मगर साथ ही साथ उसकी चूत भी गीली हो रही थी

ऑटो में उन तीनो के अलावा दो और मर्द आ कर बैठे ड्राईवर के अगल बगल और वो दोनों भी साइड मिरर से शाज़िया को देखने लगते है पूरी की पूरी रंडी लग रही थी ब्लाउज के खुले हुए दो हुक्स और साडी कमर से काफी नीचे वो दोनों को समझते देर ना लगी की ये दोनों लौंडे आज रात के ग्राहक है इस्के वो दोनों उसे पूरी तरह घूरते हुए अपने मंजिल पर पहोच जाते है और ऑटो से उतर कर चले जाते है जाते वक़्त घूम कर उसकी तरफ देखते जरुर है और शाज़िया भी उन दोनों को ही देखते रहती है जिसके बाद शाज़िया गुस्से में जीशान को देखती है और जीशान आँख बचाते हुए उसकी चूची को दबा देता है....

शाज़िया झटके से उसका हाथ हटाती है.......

अनीस इन दोनो की हरकतों को देखते रहता है कुछ ही देर में हॉल पहुच जाते है नाईट शो होने के कारण लोग कम ही थे वो दोनों अन्दर आने के बाद अपनी सीट पर बैठ जाते है और ऑटो की ही तरह शाज़िया उन् दोनों के बीच बैठी होती है.....
 
हॉल में औरते ना के बराबर थी जो थी वो लगभग अपने बाय्फरेंड्स के साथ मस्ती करने ही आई थी | फिल्म शुरू हुयी ..........भूतिया मूवी थी कुछ देर मे ही अपना असर दिखाना चालू कर दी......

जब जब हॉल में चीखने या ऐसी कोई भी जोरदार आवाज होती तो शाज़िया डर के मारे दोनों के हाथो को कस के पकड़ लेती.......शाज़िया के स्पर्श से दोनों के अंदर सुरसुरी और हवस खून बन कर दौड़ने लगे.......

उन्होंने शाज़िया की अधखुले ब्लाउज में से झाकती हुयी चुचियों को ऊपर ही उपर होठ रगडना चालू कर दिया जिससे शाज़िया का भी मन बहकने लगा और सबसे साइड की सीट होने का फायदा वो दोनों बखूबी उठा रहे थे कुछ ही देर में शाज़िया ने अपने ब्लाउज के बटन्स खुद ही खोल दिए और पूरी की पूरी चूची उन दोनों के मुह में ठूस दी और वो दोनों भी पुरे मन से शाज़िया की चूची चूसने काटने लगे.....

जिससे शाज़िया को दर्द के साथ साथ मजा भी आ रहा था मगर वो बड़ी ही मुस्किल से अपनी सिसकियो को रोक रही थी पाच मिनट चूसने के बाद अनीस अपना हाथ शाज़िया की टांगो की और ले जाता है और शाज़िया बात को समझते हुए अपनी टाँगे खोल देती है.......

अब कौन मूवी देखे...वो दोनों तो बस शाज़िया को गरम करने में लगे थे आज वो दोनों ने ठान लिया था की शाज़िया को पूरी तरह से बेशरम बना कर रहेंगे

अनीस शाज़िया की चिकनी चूत को साड़ी के ऊपर से ही मसल रहा था....

तभी जीशान शाज़िया की चूची से हाथ हटा कर नीचे की और लाता है और उसकी साडी को ऊपर करने लगता है शाज़िया उसे रोकने की कोसिस करती है मगर अनीस उसका हाथ पकड़ कर रोक लेता है और अपने नंगे लंड पर हाथ रख देता है शाज़िया नजर घुमा कर देखती है तो उसे विस्वास नहीं होता की दोनों ने अपने अपने लंड बाहर निकाल लिए है और अब उसके तरफ बढ़ रहे थे ......और उसे आभास हुआ की उसने अपने ब्लाउज को पूरा खोल रखा है तो उसे बहुत ही शर्मिंदगी भी हुयी और तभी अनीस उसकी चूची को छोड़ कर उसके गर्दन पर अपने होठो से वार कर देता है और ये शाज़िया की चूत में बाढ़ लाने के लिए काफी सरल उपाय था और हुआ भी ऐसा ही एक तो चूची पे जीशान का मुह और दुसरे पे अनीस के हाथ उफ़ .....शाज़िया आह कर उठी और उधर परदे पर भूत पूरा तांडव मचा रहा था

रात के समय का जंगल का सीन था और हॉल में घुफ्फ़ अँधेरा था जिसका फायदा ये दोनों पूरी तरह उठा रहे थे........इधर जीशान ने मौके का फायदा उठाते हुए शाज़िया की साड़ी कमर तक उठा दी जिसे शाज़िया ने अपनी गांड उठा कर पूरी तरह अपने कमर पर ले लिया अब वो एक तरह से पूरी नंगी थी हॉल में सीट पे बैठी हुयी....

झटपट जीशान ने दो ऊँगली शाज़िया की गीली चूत में डाल दिया जिसे शाज़िया की तेज सिसकी निकली मगर वो हॉल के शोर में दब कर रह गयी शाज़िया की गीली हुयी चूत में जीशान धनाधन ऊँगली अंदर बाहर करना शुरू किया और शाज़िया अपनी कमर उचका उचका कर उसके उंगलियों को निगलने पे तुली थी.....

अनायास ही शाज़िया के हाथ दोनों के लंड पे आ जाते है और वो उनकी मुठ मारने लगती है इधर अनीस उसके गर्दन से होते हुए उसके होठो को चबाने लगता है....और जीशान ऊँगली दनादन पेल रहा था उन दोनों के लंड को शाज़िया इतने जोर से हिला रही थी की वे दोनों भी उत्तेजना के चरम पर थे....कुछ ही देर में शाज़िया की चूत से फवारा छुट पड़ता है और इधर ये दोनों भी अपना अपना माल एक आह के साथ छोड़ देते है

शाज़िया का पूरा हाथ गिला हो जाता है और शाज़िया झरने के बाद भी उनके लंड हाथो में लिए हॉल की सीट पे लगभग नंगी बैठी अपनी सासों को नियंत्रित करने में लगी थी तभी जीशान और अनीस दोनों शाज़िया की एक एक चूची को अपने हाथो में ले कर उसके निप्पल को उमेठते हुए कहते है वाह माँ मजा आ गया ......
 
शाज़िया जो अपनी दोनों की दोनों चुचिया नंगी अपनों चूत गांड सब नंगी किए अपनी टाँगे फैलाये उस हॉल की एक सीट पे बैठी थी और उसके हाथ अभी भी उसके दोनों बेटो के लंड पर थी ..............

उनकी सीट प्रोजेक्टर के बिलकुल पास थी अगर कोई दर्शक पीछे की और आता या देखता तो शाज़िया की पुरे मिलकियत के दर्शन उसे हो जाते.....जो की एक खुली तिजोरी के माफिक थी..........

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जीशान - माँ क्या हुआ कुछ बोलती क्यों नहीं हो.....और शाज़िया की चूत को हाथ में ले कर मसल देता है शाज़िया आँखे बंद किए अपनी कमर उठा कर आह करती है और कहती है

शाज़िया - नजर घुमा कर देखो कौन औरत ऐसे नंगी बैठी होगी यहाँ....आह जीशान छोड़ न दर्द हो रहा है....ऊँगली कर ले मगर उसे निचोड़ मत ना आह बेटा.....

जीशान फटाक से अपनी दो उंगलिया उसकी गीली चूत में घुसा देता है

शाज़िया चिहुक जाती है और अनीस अपनी माँ के कमर को हल्का सा ऊपर की और उठा कर अपनी दो उंगलिया उसकी गांड में घुसा देता है जिसे शाज़िया बर्दास्त नहीं कर पाती और उसके मुह से एक हल्की मगर थोड़ी तेज चीख निकल जाती है ...........वो तो गनीमत रही की किसी ने देखा नहीं वरना बहुत कुछ हो सकता था.....

अनीस की दोनों उंगलिया शाज़िया की ताज़ी ताज़ी फटी हुयी गांड में घुसी हुयी थी और उसके गांड के छल्ले ने उसे बहुत ही जोर से पकड़ रखा था...

जीशान - क्या करती हो माँ कितनी जोर से चीखी थोड़ा बर्दास्त किया करो मेरी माँ...और हस देता है

शाज़िया जो दर्द से बेहाल थी क्योकि उसकी चूत में दो ऊँगली और गांड में दो दो उंगलिया अपनी चुचिया खोले.....वो भी एक सिनेमा हॉल की सीट पे बैठी थी....कहती है जिसकी गांड नयी नयी तुम्हारे इस मुसल से फाड़ी गयी हो उसे हगने पर भी दर्द होता है यहाँ तो तूमने एक तरह से अपनी लंड के छोटी हमशकल ऊँगली घुसा दी है.....दर्द नहीं होगा तो क्या होगा मजा आएअगा.....आह अनीस निकाल ले न....बेटा

अनीस - माँ मजा भी आएगा रुको तो सही...और ऊँगली हिलाने लगता है हलाकि हिलाने में बन रहा नहीं था फिर भी वो हिलाए जा रहा था मगर शाज़िया दर्द से और बेहाल होते जा रही थी और इधर जीशान ने भी अपनी ऊँगली हिलानी शुरू कर दी थी शाज़िया उनके लंड से हाथ हटा लेती है और उन दोनों के हाथो को पकड़ लेती है मगर केवल नाम के लिए.....वो दोनों ऊँगली करते हुए दुबारा से उसकी चूची की चूसने लगते है जिससे शाज़िया का दर्द और मजा दोहरा हो जाता है और कुछ ही पालो में शाज़िया की चूत और गांड रिसने लगती है और इन दोनो की उंगलिया लपालप अंदर बाहर होने लगती है

शाज़िया लगातार अपनी कमर उठाये हुए थी और अपनी टांगो को फैला रही थी और दोनों के हाथो के उंगलियों को अन्दर तक ले रही थी कुछ देर में शाज़िया एक बार दुबारा झड जाती है ...और जोर जोर से हाफ्ते हुए वही सीट पे बेहाल पस्त हो के फ़ैल जाती है और वो दोनों अपनी माँ को ऐसे देख के रोमांचित हो रहे थे....
 
कुछ ही देर में इंटरवल होने को था तो वो शाज़िया को सँभालने में मदद करते है और उसके और खुद के कपडे सही कर लेते है.....

शाज़िया उन दोनों को कहती है कौन सी फिल्म दिखाने लाये थे तुमदोनो...और वो दोनों हस देते है .....

जीशान अपने माँ के कान में कहता है "शाज़िया की प्यास"...... और हस देता है इस बात पे तीनो हस देते है और कुछ ही मिन्टो में इंटरवल हो जाता है...हॉल की लाइट्स जलने पे सब सामान्य ही रहता है और जीशान उठ कर पॉपकॉर्न और कोलड्रिंक ले आता है....वापिस फिल्म शुरू होने तक वो लोग हॉल से निकल कर रात के खाने के लिए कहा जाएँगे वो तय करते है और लाइट्स ऑफ़ होने के बाद वो लोग मूवी देखने लगते है इस बार कोई कुछ नहीं करता...बीस मिनट्स के बाद शाज़िया कहती है जीशान मुझे बाथरूम जाना है....अनीस भी ये सुनता है और कहता है इस वक़्त कहा जाओगी माँ थोड़ी देर रोक लो माँ बाहर निकल कर कर लेना

शाज़िया अपना मुह बनाते हुए कहती है की मुझे लगी अभी है और करुँगी बाद में मेरे को जोरो की लगी है ले चलो न यहाँ बाथरूम होंगे न....

तभी जीशान उसके साडी को उठाने लगता है.....शाज़िया कहती है ये क्या कर रहा है मुझे पिशाब आई है....उफ्फ छोड़ ना जीशान

मगर जीशान कहता है माँ रुको तो सही पिशाब कर लेना तुम पहले साडी तो उठाओ....और जीशान शाज़िया की साडी को पूरा ऊपर उठा देता है शाज़िया एक बार फिर से नीचे से नंगी हो जाती है जीशान अपनी कोलड्रिंक की बोतल जो आधी से ज्यादा खाली हो चुकी थी उसे फट से शाज़िया की चूत में घुसा देता है और कहता है मुतो माँ....

और शाज़िया कुछ सोचती नहीं और उस बोतल में मूतना शुरू कर देती है.....कोलड्रिंक के ठंडे बॉटल से शाज़िया को बहुत आनंद आता है और वो अपनी पूरी टंकी उस बॉटल में खाली कर देती है कुछ बूंदे बोतल से बाहर भी चु जाती है मूत लेने के बाद शाज़िया कहती है अब निकाल दे बाहर.....

जीशान बोतल बाहर निकाल लेता है....तभी अनीस अपनी बोतल शाज़िया की चूत में घुसेड़ देता है और उसे अंदर बाहर करने लगता है और शाज़िया बोतल के ठंडे एहसास के कारण अपने आप को उसके सुपुर्द कर देती है और अनीस आराम से उसकी बोतल से चुदाई करने लगता है

उफ्फ हाय ओह्ह जैसे आवाजे शाज़िया के मुख से निकलने लगती है और पंद्रह मिनट की चुदाई के बाद शाज़िया उसी बोतल में झड़ जाती है....और शाज़िया का चुत रस उस बोतल में जमा होने लगता है....पूरी तरह से झड़ने के बाद अनीस उस बोतल को निकालता है औऱ बड़े ही मजे से उसे पीने लगता है

जिसे देख शाज़िया शर्मा जाती है और कहती है धत्त बदमाश....तुमलोगो को पता नही कहाँ कहाँ से ये तरकीबे आती है....उफ्फ मेरी तो जान ही निकाल दी तुम लोगो ने....

जीशान कहता है अच्छा अब थोड़ा सा मूवी भी देख लो.....

शाज़िया अपनी साड़ी नीचे करने लगती है.....तब जीशान और अनीस दोनो उसे रोकते है और कहते है ऐसे ही बैठो न माँ कौन तुम्हे यह देख रहा है....और जीशान उसकी ब्लाउज के बटन खोल कर चुचियो को भी बाहर निकाल देता है

शाज़िया कुछ नही कह पाती....बस नंगी हुई मूवी देखने लगती है जो समझ से बाहर थी......और सौरभ और अनीस उसकी चुत और चुची से खेलने लगते है.....बीच बीच मे वो उसकी चुत में उंगली भी कर दे रहे थे......जिससे शाज़िया चिहुँक जा रही थी मगर अब उसे भी मजा आ रहा था तभी तो उसकी चूत गीली थी और चुची कि घुंडीया कड़ी हो गयी थी....

जब फ़िल्म खत्म होने को आई तब शाज़िया ने अपने कपड़े ठीक कर लिए और जीशान और अनीस ने भी फ़िल्म खत्म होने के बाद वो बाहर आये और होटल की तरफ चल पड़े.....
 
होटल में खाना कर वे लोग घर आ गये और बिना कुछ शरारत किये सो गये क्युकी शाज़िया काफी थक गयी थी और कमोबेश दोनों बेटो का भी यही हाल था .....

सुबह शाज़िया जब जागी तो दोनों बेटे घोड़े बेचे नंगे उसके बगल में सो रहे थे और उसकी हालात भी लगभग वैसी ही थी .....ब्लाउज खुला हुआ...और साड़ी आधे से ज्यादा जांघो तक चढ़ा हुआ वो उठती है और जा कर अपने कामो में लग जाती है .......

कुछ देर बाद दोनों जनाब अपनी नींद से जागते हुए कमरे से बाहर आते है और किचन में काम कर रही शाज़िया के गले लग जाते है और जीशान अपनी माँ के पहनावे को देख कर खुश होता है क्योकि शाज़िया ने उसके मन मुताबिक कपडे डाले हुए थे ......

तभी अनीस का फ़ोन बजता है.....वो फोन पिक करता है...

आवाज किसी बूढ़े की लग रही थी ....

आवाज - हेल्लो के बोलाता....अनीस बबुआ

अनीस - हां मै अनीस ही बोल रहा हु आप कौन...

आवाज - हम वसीम बोलातानी तोहार दादू .....बनारस से....और अचानक से वो रोने लगते है और कहते है की ऐ बेटा तोहार दादी चल बसल रे बबुआ .....और रोने की आवाज आती है फिर कहते है की तोहार माई कहा बारी बात करावा ......

अनीस फ़ोन हटाते हुए कहता है माँ बनारस से दादू का फोन है और कह रहे है की दादी चल बसी ...

शाज़िया और जीशान दोनों हक्के बक्के उसकी बात को सुनते है और शाज़िया दौड़ कर आती है वसीम से बात करने......

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दरसल जब शाज़िया और उसका परिवार बनारस में थे तो वे लोग अपने ससुराल से अलग हो कर रहते थे ...और शाज़िया के पति की मृत्यु के बाद शाज़िया ने भी उनसे सम्बन्ध सुधार ने की कोसिस नहीं करी क्योकि शाज़िया के पति द्वारा छोड़ा गया कर्ज उनके लिए काफी मुसिबते खड़ी कर चूका था और वो नहीं चाहती थी की उनकी मुसीबत उन दोनों बुजुर्गो पे पड़े.....|

बनारस में वसीम और उसकी पत्नी सरला.....अपने सरकारी क्वार्टर में रहते थे रेलवे की नौकरी से सेवानिवृत होने के बाद पेंशन पर जिंदगी अच्छे से कट रही थी मगर अब वसीम की एक मात्र साथी जीवनसंगिनी उसका साथ छोड़ गयी थी और वो बिलकुल अकेला हो गया था और जीवन के ऐसे पड़ाव पर अकेले गुजरबसर करना काफी मुस्किल था इसलिए उसने अपने पोतो और बहु के पास जाने की सोची....

इधर शाज़िया फ़ोन पे आ कर कहती है

शाज़िया - प्रणाम बाबूजी आप मत घबराइये हम अभी ही निकल रहे है यहाँ से कुछ घंटो में वहा पहुच रहे है आप बिलकुल मत घबराइये हम है और आ रहे है

इतनी देर में ही जीशान ने सारी बात समझते हुए 11 बजे की गाडी की टिकेट वेटिंग में ही मगर बुक कर दी और वो भी इस विपदा से थोड़ा चिंतित गया था मगर उन दोनों से ज्यादा शाज़िया व्याकुल लग रही थी जल्दी जल्दी अपने कपडे रखे और कुछ ही देर में वे लोग बनारस के लिए निकल चुके थे और अब शाज़िया भी रो रही थी ....

.ट्रेन अपने तय समय से थोड़ी लेट वाराणसी स्टेशन पहुची और अपने गंतव्य तक पहुचते पहुचते उनको शाम के चार बज गये वह पहुची तो देखा की वसीम और उनके आसपास के पडोसी और मित्र लोग सरला की अर्थी के पास बैठे शोकाकुल थे ...और पंडित अर्थी को शमशान ले जाने की अंतिम तयारी में था...और इंनके पहुचते ही वसीम का दर्द और फुट पड़ा और चीख पुकार से माहोल गमगीन हो गया शाज़िया सुर बाकी सब लोग वसीम को सान्तवना देने में लगे थे ....कुछ देर बाद अर्थी शमशान में पहुच चुकी थी और वहा की क्रिया के बाद देर रात वे घर को लौटे जहा मोहल्ले की कुछ औरते और शाज़िया थी....

घर पे आने के बाद बाकी सब लोग अपने अपने घर चले गए...और ये लोग सरला की याद में डूबे वसीम को सँभालने लगे...रात जैसे तैसे बीती,......अगले कुछ दिन तक सरला का श्राद्ध कार्यक्रम चला और पटना से इन् तीनो को आये हुए लगभग आधा महिना हो चला था और इन् 15 दिनों में शाज़िया ने सम्भोग की तरफ ध्यान ही नहीं दिया था नाही उसके बेटो ने क्योकि माहोल ही वैसा था ....दो तीन दिन के बाद जीशान वसीम से बोला .....

जीशान - दादू आप हमारे साथ पटना चलिए अब यहाँ रह कर क्या करियेगा वहां हमलोग के साथ रहिएगा तो आपको दादी की याद भी नहीं सताएगी और आपका मन भी लगा रहेगा.....

मगर उसकी इस बात से अनीस बिलकुल भी खुश नहीं हुआ क्योकि दादा के आने से उनकी और शाज़िया की चुदाई में दिक्कत आती मगर अब देर हो चुकी थी |

वसीम - बात तो तू ठीक कहत बारे बचवा बाकी दिक्कत इ बा की हम्मार पेंशनवा इहे आवे ला आऊ अगर हम एहा से चल गयनी ता ओक्कर का होई..उ के लिही...और तो और इ सरकारी घरवो छोरे के पड़ी ...

जीशान - कोई बात के टेनसन ना ली दादू हम बानी नु सब सेट कर देब आऊ जहवा दिक्कत बुझाई अनीस भईया बरले बानी मदद खातिर.....

वसीम - बाकी बचवा तू करबा का तानी हमरो बतवा....

जीशान - हम यहाँ के पता बदल के पटना के पता पे पेंशन भेजे के एप्लीकेशन डाल देब आऊ इ घर के भारा पे लगा देब आऊ हर महीने के महीने आ के भारा ले जाएब |

वसीम - बहुत बढ़िया उपाय लगावला है बचवा

जीशान - हां दादू बस इ सब काम निपटा के यहाँ से निकल चले के.....

शाज़िया मन ही मन सोचती है की ये जो भी हो रहा अच्छा नहीं हो रहा क्योकि इससे उसकी चुदाई में विघ्न पड़ने वाला था मगर अब तो बात काफी बढ़ चुकी थी तो उसने भी बीच में टोकना सही नहीं समझा और हां में हां मिला दी....

रात के खाने के बाद वसीम अपने कमरे में चला गया जहा जीशान उसके साथ सोता था और शाज़िया हॉल में और अनीस भी वही सोफे पे सोता था .......मगर आज की बात के बाद मौका देख कर अनीस ने जीशान से कहा था की दादू के सोने के बाद वो हम सब से मिलने हॉल में आएअगा..

रात के साढ़े बारह बज रहे थे अनीस सोफे पे लेटा हुआ था मगर आँखे खुली थी और उधर शाज़िया भी अपने बिस्तर पे लेटी हुयी थी तभी जीशान आता है और अनीस के पास जा कर बोलता है भाई क्या हुआ क्यों परेशान हो .......

शाज़िया भी उसकी आवाज सुन के वहा आ जाती है

अनीस - ये तू क्या कर रहा है दादा जी को वहा चलने को कहने की क्या जरुरत थी वह उनके आने से क्या दिक्कत होगी तुझे अंदाजा भी है.....

शाज़िया - हां जीशान तू भी न कभी कभी बेवकुफो की तरह हरकते करता है ...बता अब क्या करेंगे....

जीशान अरे मेरी प्यारी प्यारी माँ मैंने भी तुम्हारे इन् चुचियो का दूध पिया है और मैं इतना बेवकूफ तो हो नहीं सकता न की अपनी माँ को तकलीफ दू...और अपने भाई को भी...और वो आगे बढ़ कर शाज़िया की ब्लाउज को खोलने लगता है जिससे शाज़िया भी मदद करती है उतारने में अगले ही पल शाज़िया ऊपर से नंगी अपने दोनों बेटो के बीच बैठी होती है

जीशान और अनीस दोनों उसकी चुचियो से खेलने लगते है जीशान बोलता है दादा जी अगर हमारे साथ रहेंगे तो उनके पेंशन की राशि हमारे भी काम आएगी और रही बात आपके प्यास की तो उसके लिए भी मैंने सोच रखा है ...रात को दूध में दादू को नींद की गोलिया दे दिया करेंगे और फिर होगी अपनी रंगीन रात की शुरुवात और वो शाज़िया की चुचियो को चूसने लगता है

...इसको देख कर अनीस भी अपने सुरूर में आ जाता है और शाज़िया अपने दोनों बच्चों का सर अपनी छाती पे दबाने लगती है और कहती है चुसो बेटा आह इन्हें चुसो कितने दिनों से ये सुखी पड़ी थी आह बेटा आह ...

और फिर अनीस कहता है की दादा के जाने से दिक्कत तो होगी ही हम खुल के ये सब नहीं कर पाएँगे और तो और पकडे जाने का भी डर बना रहेगा

....शाज़िया भी अनीस की हां में हां मिलाती है ...क्योकि बात तो सही थी तभी जीशान कहता है .....तो अप्मने इस खेल में उनको भी शामिल कर लेंगे और क्या शाज़िया अपनी आखे गोल कर के कहती है की ये कभी नही हो सकता वो मेरे पिता सामान है और आगे से कभी ऐसी बात अपने जबां से मत निकलना ...और वो शांत बैठी रहती है...
 
जीशान - माँ क्या तुम भी तुरंत में मुह फुला लेती हो मैंने कहा न की तुम्हे कोई कुछ नहीं कर सकता जब तक हम ना चाह ले और वो फिर से शाज़िया की चूची मुह में भर लेता है और शाज़िया को आह भरने पे मजबूर कर देता है

अनीस का मन कशमकश में था पता नहीं आगे क्या होने वाला था और कुछ ही देर में शाज़िया नंगी हो कर दोनों बेटो से हॉल के फर्श पे चुद रही थी डेढ़ घंटे चुदने के बाद वो अपनी जगह पे जा कर सो गयी और दोनों शैतान भी मगर उन्हें मालूम नहीं था की उनकी ये रासलीला वसीम ने अपनी खुली आँखों से देख ली थी.....

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अगली सुबह शाज़िया जब जागी तो उसने पाया की उसके ब्लाउज के तीन बटन्स खुले हुए थे और उसकी एक चूची पूरी तरह से बाहर लटक रही थी वो हड्बडा कर उठती है और बाथरूम की और जाती है जहा वसीम पहले से दातुन कर रहा था..शाज़िया मन ही मन ये सोचती है की जब बाबूजी कमरे से बाहर आए होंगे तब उन्होंने मेरी चुचिया जरुर नजर आई होंगी हे भगवान् ये क्या हो गया वो नजरे चुराते हुए कहती है बाबूजी आप कब उठे हमे आवाज लगा दिया होता.......

वसीम - नही बहुरानी तू नींद में रहलू तो तहरा के तंग करल ठीक न सोचिनी एही से न उठावनी ह और मुस्कुरा देता है ...

शाज़िया बखूबी समझ जाती है की बाबूजी के मुस्कुराना किस ओर इशारा कर रहा था खैर वो भी नित्य क्रिया में लग गयी और फिर सब से नाश्ते के समय भेट हुयी जहा जीशान ने बोला की आज वो दादू के ऑफिस में एप्लीकेशन डालने जा रहा है और वो अनीस को कहता है की भईया तुम भी चलना मेरे साथ

अनीस - ठीक है

वसीम - बबुआ कोसिस करिह की काम जल्दी से जल्दी हो जाए ताकि हमहू तू लोगन के साथे पटना चल सकी ....और शाज़िया की तरफ देख कर मुस्कुरा देता है....शाज़िया इस बार बुरी तरह झेप जाती है

और कुछ देर बाद दोनों भाई अपने काम के लिए निकल जाते है........

………………………………………

नाश्ते के बाद शाज़िया दोपहर के खाने की तयारी कर के नहाने के लिए जाती है और इस समय वसीम अपने बरामदे में बैठा अखबार पढ़ रहा था...........तभी उसका ध्यान शाज़िया की तरफ गया जो नहाने के लिए गुस्सल्खाने में जा चुकी थी.वसीम के मन में खुराफात ने दस्तक दी और वो दबे पाँव बाथरूम की तरफ चल पड़ा अपनी बहु के जिस्म को निहारने जहा शाज़िया बेफिक्र हो कर नहा रही थी.....

वसीम उधर जा ही रहा था कि तभी जीशान और अनीस आवाज लगाते हुए घर मे आते है और वसीम हड़बड़ा कर वापस बरामदे में दौड़ा आता है जहाँ अनीस और जीशान एक साथ कहते है कि दादा जी माफ करियेगा काम मे देरी होगी आपके दफ्तर वालो ने कहा कि इस काम मे समय लगेगा कम से कम दो महीने कागजी काम है ऊपर आए पेंशन वाली इसलिए वसीम बेचारा ये बात सुन कर मायूस हो जाता है कहा वो शाज़िया को भोगने की तैयारी में थे और अब उसे यही रहना था अब इन दो महीनों में उसका काम बिगाड़ दिया था खैर वो अब नही जा सकेगा ये तय हो गया था और तभी शाज़िया नहा कर वहा आती है और उसे भी ये खबर मिलती है तो वो मन ही मन सोची की चलो बला टली.....

उसके बाद सभी खाना खाने बैठते है और शाज़िया ने आज ही निकलने का सोच लिया था और हुआ भी ऐसा ही वसीम बेचारा करता भी क्या.....

मगर इन् सब पचड़ों में पड़ कर अनीस के एक महीने की छुट्टी की वाट लग गयी थी और उसे अगले हफ्ते से काम पे जाना था....शाज़िया और जीशान अनीस तीनो के मुह लटके हुए थे.....इसी तरह वो देर रात घर पहुचे......घर की हालत भी खस्ता हो चुकी थी मगर शाज़िया अभी बहूत थकी हुई थी और दोनो बेटे भी बिना किसी शरारत के वो नींद की आगोश में समा गए.....

सुबह शाज़िया की आंख खुली तो पाया कि उसकी दोनो चुचिया उसके बेटो के मुह में है और जीशान के हाथ उसकी चुत के दरार पर घूम रहे है जिसका आभास होते ही शाज़िया ने अपनी टांगे खोल दी और फिर शुरू हुआ घमासान चुदाई का दौर....अगले कुछ ही पलों में शाज़िया नंगी हो चुकी थी और अनीस शाज़िया की चुत चाट रहा था और जीशान उसकी चुचिया को बेदर्दी से चूस चाट रहा था कुछ देर में दोनो के लौड़े शाज़िया के दोनों छेदों को फाड़ने के लिए तैयार थे और अगले कुछ देर के लिए शाज़िया की दर्द और लिज्जत भरी सिसकियों से कमरा गूंजता रहा.....

दोनो छेदों को अदल बदल कर अपने माल से भरने के बाद वो दोनो उठे और शाज़िया को भी साथ मे ले कर बाथरूम में घुस गए जहाँ नहाते वक्त भी एक राउंड चुदाई और हुई और फिर नहाने के बाद शाज़िया ने एक पेटिकोट पहन लिया और अनीस ने टॉवल लपेट लिया और घर की सफ़ाई में लग गए जबकि जीशान नास्ता का प्रबंध करने चला गया.....

घर की सफ़ाई और नास्ता के बाद तीनों हॉल में बैठे थे जहाँ शाज़िया बोली.....बनारस में बाबूजी ने मेरी चुचिया नंगी देख ली थी....और वो उसके बाद से मुझे अजीब नजरो से देख रहे थे......मुझे बहुत शर्म आ रही थी।

जीशान- कोई बात नही माँ देख ही लिया तो क्या हो गया.......तुम्हारी ये चुचिया है ही देखने के लिए....औऱ उसकी एक चुची को पेटिकोट के बंधन से बाहर निकाल देता है.....और दबाने लगता है.....

शाज़िया कुछ कहती इससे पहले

अनीस - मुझे तो इस बात का डर है कि दादू के यह आने के बाद हमारा ये प्यार से भरा रिश्ता कैसे चलेगा.....उफ्फ माँ और वो भी उसकी दूसरी चुची पे अपने होठ जामाता है.......जीशान के मन मे कुछ और ही था...

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इधर वाराणसी में वसीम अपनी पूरी कोसिस में लगा था की कैसे भी कर के वो अपनी पेनशन की राशी का भुगतान पटना करवा ले मगर विभाग उसकी सुन ही नही रहा था....उसे खाने पकाने की काफी दिक्कते आ रही थी मगर जीना तो था ही ........वसीम ने सोचा की अभी पेंशन आने में काफी वक़्त है सो वो पटना हो आये और पेंशन आने के समय पर यहाँ वापिस आ जाएगा और पेंशन ले कर वापिस पटना लौट जायेगा उसने सोचा की अब वो ऐसा ही करेगा मगर दिक्कत थी की उसके घर की देखभाल कौन करेगा उसे अभी तक कोई किरायदार नहीं मिला था ..............उसने सोचा की इसकी चिंता आने के बाद सोचेंगे अभी फ़िलहाल पटना हो कर आया जाए...और वो निकल पड़ता है पटना की ओर.....

………………………….

अनीस आज अपने ऑफिस जाने की तयारी में लगा था और शाज़िया किचन में केवल एक पेटीकोट में नास्ते का प्रबंध कर रही थी जीशान अपने कमरे में अपने काम को अंजाम दे रहा था जिसे उसे अपनी पार्ट टाइम जॉब वाली कंपनी में पहुचना था और उसे आज पैसे भी मिलने वाले थे इधर से शाज़िया के साथ सम्बन्ध बनाने के बाद से वो सही से ध्यान नहीं दे पाया था मगर अब काम भी जरुरी है

शाज़िया नास्ता टेबल पर लगाते हुए आवाज लगती है अनीस जीशान कहाँ हो आओ दोनों नास्ता कर लो फिर मै नहाने जाउंगी......

अनीस और जीशान दोनों टेबल पर आते है.

अनीस - ये क्या माँ तुम हमारे साथ नहीं खाओगी ऐसे में हम भी नहीं खाएंगे....

शाज़िया - एक थप्पड़ लगाउंगी सारी की सारी बेहूदगी धरी की धरी रह जाएगी समझा दिन भर ऑफिस में काम करना होता है और जनाब खाने नहीं खाएंगे चुप चाप खाओ समझे न ....

अनीस शाज़िया की ओर देख कर मुस्कुराता है और कहता है मेरी प्यारी माँ हमारे बारे में कितना सोचती है और उसे खीच कर अपनी गोद में बैठा लेता है .

जीशान - माँ नास्ते के साथ अगर दूध भी मिल जाता तो मजा आ जाता नास्ते का

इतना सुनना था की शाज़िया अपनी पेटीकोट की डोरी खीच देती है और पेटीकोट सरक कर उसके कमर तक आ जाता है अनीस तुरत एक चूची की मुह में भर लेता है उर जीशान कहता है वाह भाई वाह डिमांड मैंने की और मिल तुम्हे गया .........माँ ये गलत बात है

शाज़िया हस्ते हुए अपनी बाहे फैला कर उसको अपने पास बुलाती है जीशान अपनी थाली छोड़ कर वही अनीस के कुर्सी के पास आ जाता है और शाज़िया की दूसरी चूची की अपने मुह में भर लेता है और शाज़िया की सिसकी निकलनी चालू हो जाती है कुछ देर के बाद शाज़िया को बर्दास्त करना मुस्किल हो रहा था इसलिए उसने उन् दोनों को खुद से अलग किया और कहा की ऑफिस नहीं जाना क्या और उनको खाने के लिए बोलती है और जीशान कहता है माँ कुछ देर मेरे गोद में भी आओ न ऐसे ही दूध पिते पिते नास्ता करूँगा इस पर अनीस कुछ नहीं बोलता

शाज़िया उसके गोद से इसके गोद में आ जाती है और फिर नास्ता ख़तम होने तक वो बारी बारी से दोनों बेटो की गोद में आती जाती रही नास्ता के बाद वो अपनी पेटीकोट को बिना बांधे उठ खड़ी हुयी और अपने पेटीकोट को पकड़े पकड़े ही टेबल से झूठे बर्तन उठा कर किचन में रख आई और फिर शाज़िया बोली की अब तुम दोनों जाओ और जल्दी आना ....

जीशान - माँ मै तो दो घंटो में आ जाऊंगा ज्यादा देर हुयी तो मै तुम्हे फोन कर दूंगा ....

अनीस - माँ मै तो सीधे रात को ही मिलूँगा जीशान के तो मजे ही मजे है और उसकी तरफ देख कर मुह बनाता है जैसे उसे जलन हो रही हो....

शाज़िया उन दोनों को कहती है की चलो अब ख़ुशी ख़ुशी जाओ और शाम को कुछ अच्छी सी चीज खाने को ले आना मेरे लिए .

अनीस जीशान - ठीक है माँ वो दोनों घूमते है और आगे चलते है

शाज़िया उनके पीछे पीछे मगर चलने से पहले उसने अपनी पेटीकोट वही गिरा दी नंगी ही उन दोनों के पीछे पीछे चल दी मगर उन दोनों को जरा भी आभास नहीं हुआ की शाज़िया नंगी हो चुकी है गेट पे पहुचने के बाद वो दोनों पीछे घूमते है और शाज़िया को देख कर उनके लंड में तूफ़ान खड़ा हो जाता है

मगर शाज़िया उन्हें धकेल कर बाहर कर देती है और दरवाजे से सर निकालती है साथ ही साथ अपनी एक चूची पूरी की पूरी और अपनी एक टांग भी निकालती है जिससे उसकी चूत का कुछ भाग दर्शनीय हो जाता है उन्हें कहती है सुबह सुबह बिना दर्शन के कैसे जाने देती और हस देती है....

शाज़िया का घर के दरवाजे पे ऐसे खड़े होना बहुत ही कामुक दृश्य था उन दोनों के लिए मगर तुरत ही शाज़िया दरवाजा बंद कर देती है.......उन दोनों के जाने के बाद शाज़िया नंगी ही घर के बाकी काम करती है और फिर नहाने चली जाती है नहाने के बाद वो बाथरूम से नंगी ही अपने कमरे में आती है जहा वो एक पेटीकोट ही पहनती है और अपने बाल कंघी करने लगती है तभी दरवाजे पे दस्तक होती है...........
 
शाज़िया सोचती है की लगता है सुबह का दृश्य जीशान को बेचैन कर दिया है इसलिए जनाब तीन घंटे का बोल कर गए थे मगर एक घंटे में ही वापिस आ गये वो सोची की जैसे सुबह में विदा की थी वैसे ही स्वागत भी करू और वो अपनी पेटीकोट वही खोल कर गिरा देती है और पूरी नंगी सुलझे हुए बाल नहाने के बाद साबुन की खुसबू में सराबोर बदन लिए चल पड़ी दरवाजे की तरफ जहा दस्तक तेज होती जा रही थी वो चिल्ला कर बोली हा बाबा आ रही हु थोड़ा सबर तो करो बेटा और वो दरवाजा खोलती है जहा सामने देख कर शाज़िया की आँखे घूम जाती है......

सामने वसीम खड़ा था और शाज़िया को पूर्ण रूप से नंगी पा कर वसीम की सासे अटकने लगती है की वो ये क्या देख रहा है कही ये सपना तो नहीं शाज़िया का भी कमोबेश यही हाल था कुछ देर के लिए दोनों की आँखे एक दुसरे को ही देखती रहती है तभी वसीम दरवाजे को धकेलता हुआ घर में प्रवेश कर जाता है शाज़िया बेसुध सी उसकी किसी भी हरकत का कोई जवाब न देते हुए पीछे हट जाती है

जब वसीम उसे पुकारता है तब शाज़िया की निद्रा टूटती है और उसे ख्याल आता है की वो नंगी खड़ी है अपने बूढ़े ससुर के सामने और भाग कर कमरे में जाने के लिए मुडती है शाज़िया के हिलते चूतड़ वसीम पे कहर ढा रहे थे और तभी उसका पैर खाने की मेज से टकराता है और वो नंगी धम्म से गिर पड़ती है शाज़िया की दर्द के मारे चीख निकल जाती है.......

वसीम दौड़ कर शाज़िया के पास जाता है और उसकी टांग को उठाता है और शाज़िया दर्द से कराहती हुयी वही जमीं पे नंगी लेटी रहती है और वो कराहते हुए कहती है की बाबूजी मुझे छोड़ दीजिए मै ठीक हु और उठने की कोशिश करती है मगर दर्द के साथ वो वापिस से जमीन पे आ जाती है

वसीम - बहु तुम चिंता मत करो मै कुछ नहीं करूँगा और वो पूछता है की तुम्हारे कपड़े कहाँहै शाज़िया इशारो में कमरे की तरफ इशारा करती है वसीम उठ कर जाता है और वह से एक साडी उठा कर लाता है और शाज़िया के बदन पे डाल देता है और फिर पूछता है की बेटा शायद मोच आ गयी है कोई बाम हो तो बताओ मै मालिश कर देता हु

शाज़िया कोई चारा न देखते हुए सामने दराज की तरफ इशारा करती है और फिर साडी को अच्छे से अपने बदन पे लपेटने लगती है मगर साडी ठहरी पारदर्शी पीले रंग की जिसमें से शाज़िया का जिस्म का एक एक कतरा दिख रहा था उस साडी का होना ना होना सब एक ही था शाज़िया मन ही मन सोच रही थी की ये क्या हो गया कैसे हो गया अब बाबूजी क्या करेंगे साडी में से शाज़िया की चुचियो के निप्पल और चूत की दरार साफ़ साफ़ दिख रही थी जिसका नतीजा ये हुआ की वसीम के धोती में तम्बू बनना शुरू हो गया मगर वसीम ने उसे छुपाने की कोशिश बिलकुल नहीं करी क्योकि कही न कही उसकी तो आज चांदी चांदी हो गयी थी...........

वसीम - बहु कमरे में चलो मै वहा तुम्हारी चोट की मालिश कर दूंगा जिससे तुम्हे आराम मिलेगा और वो उसे उठाने लगता है शाज़िया बेमन से वसीम की बाहों का साहारा ले कर खड़ी होती है मगर अगले ही पल उसके बदन की साडी जमीं पे गिर जाती है और वो एक बार फिर अपने ससुर की बाहों में नंगी खड़ी थी

शाज़िया बेबस सी वसीम की और देखती है मगर वसीम उसकी साडी को उठा कर उसके बदन के बजाय अपने कंधे पर रखता है और उसके नंगे बदन को ले कर कमरे में चल पड़ता है चलते वक़्त शाज़िया की एक चूची पूरी की पूरी वसीम की छाती से रगड़ खा रही थी जिसका एहसास दोनों को हो रहा था.....कमरे में पहुच कर उसको बिस्तर पर लिटा देता है और शाज़िया शर्म से गडी जा रही थी मगर वो कुछ करने में असमर्थ थी अपने दर्द के सामने वसीम ने उसके बदन को फिर से साडी से ढक दिया और उसके पैरो की मालिश करने लगा....अभी उसने पैरो को पकड़ा ही था की दरवाजे पे दस्तक होती है......

वसीम शाज़िया को उसी हालत में छोड़ कर दरवाजा खोलने पहुचता है.....दरवाजे पे डाकिया खड़ा होता है वसीम से मुखातिब होते हुए वो कहता है अनीस कुमार का एक ख़त आया है और उसे लेने के बाद वसीम वापिस कमरे में आता है जहा शाज़िया अब् भी उसी हालत में लेटी हुयी थी वसीम उसके पास आ कर कहता है की अनीस बाबु के दफ्तर से एक ख़त आया है ...\\

शाज़िया धीमी आवाज में उसे कहती है सामने टेबल पर रख दीजिए अनीस आएगा तो खुद खोल कर देखेगा और चुप हो जाती है अब वसीम ने सोचा की अब बहु की दुखती नब्ज पकडनी ही होगी वरना ये ऐसे मेरे हत्थे नहीं चढ़ने वाली वो उसके नजदीक आ कर उसके पैर को अपने हाथो में लेते हुए कहता है..........

वसीम - बहु तुम अभी पूरी नंगी हो कर दरवाजा खोलने कैसे आ गयी और तुम पूरी नंगी थी ही क्यों.........

शाज़िया को जैसे इस सवाल से साप सूंघ गया हो उसे कोई जवाब देते न बन रहा था वो चुप चाप लेटी रही और वसीम अपनी बहु के चोटिल पाँव की मालिश करता रहा और वो उससे जवाब मांगने लगा मगर शाज़िया ने कोई जवाब न दिया आखिर अंत में वसीम ने ये बात कह ही दिया की उसे मालूम है की उसके जिस्मानी सम्बन्ध है अनीस और जीशान के साथ..........कमरे में सन्नाटा छा गया मगर वसीम उसके पाँव की मालिश करता रहा......

शाज़िया - मुझे माफ़ कर दीजिए बाबूजी मैंने ये जान बुझ कर नहीं किया पता नहीं मैं कैसे बहक गयी और मेरे और उन दोनों के बीच ये रिश्ता कायम हो गया वो अब उठ कर बैठ गयी थी और साथ ही साथ अपने बदन पर एकमात्र कपडे वो पीली साड़ी को अच्छे से अपने ऊपर ले लिया मगर शाज़िया की भारी और गोरी मुलायम चुचिया उस पीले पारदर्शी कपडे से नुमयिन्दा हो रही थी जिसपे वसीम की नजर अनायास ही चली जा रही थी और इधर शाज़िया अपने सफाई में बोले ही जा रही थी......एक कमरे में एक औरत अधनंगी हालत में अपने बूढ़े ससुर के सामने बैठी थी और अपने चोटिल पाँव की मालिश करवा रही थी उफ़....काफी कामुक दृश्य था ये
 
वसीम की हालत काफी ख़राब हो चुकी थी जिसको संभालना अब वसीम के बस की बात नहीं थी मगर फिर भी वो अपने पे काबू किये हुए था.....शाज़िया की सारी बात सुनने के बाद वसीम को सारा माजरा समझते देर न लगा की सारा का सारा किया धरा दोनों भाइयो का ही है सालो ने अपनी माँ को ही शीशी में उतार लिया

वाह रे मेरे चोदु पोतो क्या खूब कमाल किया वो मन ही मन बोला और फिर वो शाज़िया से मुखातिब होते हुए बोला बहु कोई बात नहीं अक्सर ऐसी गलती बच्चे जवानी में कर बैठते है मगर तुम्हे समझाना चाहिए थे उन्हें की ये रिश्ता सही नहीं है मगर तुम भी क्या करती मेरे बेटे के बाद से तुम भी तो अकेली ही जीवन बिता रही थी और तो और जीशान और अनीस जैसे जवान लंड मिले तो तुम्हारा भी मन व्याकुल हो गया मै समझ सकता हु क्युकी मेरी बीवी को गए हुए अभी कुछ ही हफ्ते गुजरे है मगर मुझे उसकी कमी बहुत खलती है और तुम तो...... और वो मुह घुमा लेता है

शाज़िया के मन से एक बोझ हल्का हो जाता है की उसके ससुर ने उसे समझा उसे गलत नहीं ठहराया वसीम अब उसके पाँव को छोड़ देता है और शाज़िया से कहता है बहु अब आराम मिला दर्द से शाज़िया अपने पाँव को हिला कर देखती है और कहती है जी बाबूजी

वसीम अब उसको कहता है की बहु मै अभी यही रहूँगा अगर तुम्हे बुरा न लगे तो क्योकि मुझे वहाँ रहने खाने की काफी दिक्कत हो रही थी और अब मेरी सरला के बगैर वो घर काटने को दौड़ता है मै महीने के महीने वह जा कर अपने पेंशन की राशि ले आया करूँगा.......

शाज़िया को ये सुन कर थोड़ा धक्का लगता है क्योकि वो ये नहीं चाहती थी की बाबूजी यहाँ आ कर रहे मगर अब वो यहाँ आ चुके थे और अब यही रहने भी वाले थे मगर साथ ही साथ उसे ये तसल्ली थी की वसीम उसे समझता है और उसके और उसके बेटो के बीच के सम्बन्ध को ले कर उसने कुछ गलत नहीं बोला नाही कोई ऐसी वैसी हरकत करी उसके साथ जबकि वो नंगी बैठी है उसके सामने इसलिए वो थोड़ी निश्चिंत हो गयी थी मगर टेंशन ये थी की उसके सामने वो चुदाई कैसे करवाएगी

तभी वो सोचती है की जीशान और अनीस कोई न कोई उपाय निकाल ही लेंगे और वो वसीम से कहती है .......

शाज़िया - कोई बात नहीं बाबूजी ये भी आपका ही घर है आपको पूछने की कोई जरूरत नहीं है आप आराम से यहाँ रहिये .....

अब जीशान कुछ देर में आने वाला था....

शाज़िया को उसी हाल में छोड़ कर वसीम अपने सामान को सहेजने चला जाता है कुछ ही देर में दरवाजे पे दस्तक होती है वसीम जा कर दरवाजा खोलता है सामने जीशान था......वो वसीम को देख कर थोडा सा आश्चर्यचकित हो जाता है मगर फिर अगले ही पल वो दादू कहते हुए सलाम करता है

जीशान - दादू आप कब आये अचानक न कोई फोन ना कोई खबर

वसीम - वो बेटा अचानक से प्लान बन गया तो आ गया यहाँ क्यों नहीं आना चाहिए था क्या और वो जीशान की तरफ कौतूहल भरी निगाहों से देखता है

जीशान - नहीं दादू कैसी बाते करते है आप भी ये आपका ही तो घर है ...माँ कहा है नजर नहीं आ रही....

माँ ओ माँ कहा हो माँ

शाज़िया रूम से ==== इधर बैठी हु जीशान बेटा कमरे में

जीशान - क्या हुआ माँ तुम्हारी आवाज कुछ अलग प्रतीत हो रही है और कमरे की तरफ कदम बढाता है

कमरे में पहुचते ही वो शाज़िया की हालत को देख कर सब समझ जाता है की यहाँ क्या हुआ होगा मगर वो फिर भी पूछता है की क्या हुआ माँ ऐसे हालत में क्यों बैठी हो वो भी तब जब दादाजी यहाँ मौजूद है तुम पागल तो नहीं हो गयी न माँ क्या हुआ

शाज़िया की आँखों में आसू आ जाते है और वसीम भी कमरे के बाहर ही खड़ा रह कर माँ बेटे की सारी बाते सुनता है की आखिर शाज़िया क्या कहती है......

शाज़िया ने एक ही सास में सारी की सारी कहानी बयां कर डाली........जीशान भी थोडा परेशांन हो गया मगर अगले ही पल वसीम कमरे में आया और बोला की बेटा मुझे गलत मत समझना मैंने ऐसा कुछ भी नहीं किया है जिससे तुम्हे या शाज़िया बहु को शर्मिन्दा होना पड़े और एक बात और बेटा मुझे तुमलोगों के इस रिश्ते पे कोई आपत्ति नहीं है बल्कि मै तो खुश हु की बहु की प्यास किसी और बाहर के व्यक्ति से ना बुझ कर खुद उसके दोनों बेटो से बुझ रही है इस बात को भी ले कर कोई मलाल न रखना बेटा अपने मन में......

जीशान भला क्या कहता वो चुप ही खड़ा रहा वहा पे.....वसीम शाज़िया के पास जा कर बोला....बहु तुम्हारा पैर कैसा है अब

शाज़िया - ठीक है बाबूजी

वसीम - बेटा खाना लगा दोगी क्या भूक लगी है सुबह का ही खाया हुआ हु.....

शाज़िया जो अभी तक केवल उसी साडी में बैठी थी जिसे वसीम ने उसके बदन पे लपेटा था वो उठती है और धीरे से कराहती हुयी किचन की और जाती है

.......उस साडी में से शाज़िया का गोरा बदन छिप कम दिख ज्यादा रहा था उसकी उभरी हुयी गांड और उसकी गांड की दरार में फँसा हुआ साड़ी का कपडा उफ्फ्फ और सामने से उसकी झूलती हुयी चुचिया और कपडे के भीतर से उसकी चुचियो के निप्पल उन् दोनों पे कहर ढा रहे थे

मगर जीशान अभी कुछ करने में हिचकिचा रहा था वही वसीम की हालत काफी ख़राब थी उसी वक़्त से जिस वक़्त वसे उसने शाज़िया को नंगी देखा था और अभी का सीन ने तो जैसे आग में घी का काम किया था......

शाज़िया उसी तरह कराहते हुए किचन में चली जाती है और कुछ देर बाद वो हॉल से आवाज लगाती है...बाबूजी जीशान खाना लग गया है...

दोनों दादा पोता कमरे से साथ ही बाहर आते है मगर दोनों में कोई बातचीत नहीं होती है शाज़िया सोचती है की माहोल थोडा तनावपूर्ण हो गया है इसे थोडा हल्का किया जाए वे दोनों आ कर टेबल के दो कोनो को पकड़ लेते है और शाज़िया खाना परोसने लगती है और परोसते वक़्त वो जान बुझ कर अपना पल्लू गिरा देती है जिससे उसकी दोनों दूध की टंकिया बाहर की और लटक जाती है जिसे देख कर दोनों मर्दों के हलक सुख जाते है

जीशान कुछ करता उससे पहले वसीम उसका पल्लू उठा कर उसके कंधे पे रख देता है मगर ठीक से ना रख पाने के कारण एक चूची पूर्णतः नंगी हो कर लटकती रहती है जिसे शाज़िया छुपाने की कोशिश बिलकुल भी नहीं करती

जीशान - माँ पल्लू ठीक कर लो वरना हम खाना ठीक से नहीं खा पायेंगे

वसीम जिसकी आँख शाज़िया पे ही जमी हुयी थी वो इस बात से अपनी आँखे हटाते हुए कहता है की हां बहु पल्लू सही कर लो

शाज़िया - जी करती हु खाना तो परोस लू पहले ....वैसे भी यह आप लोगो के अलावा कौन है ही और...

शाज़िया बिलकुल ही निश्चिन्त थी वसीम को ले कर क्योकि वो जान गयी थी की वसीम कुछ गलत हरकत उसके साथ सोच भी नहीं सकता जब तक की वो खुद न झुके उसके आगे या उसे कोई मौका दे और तो और शाज़िया के रिश्ते बारे में जान लेने के बाद शाज़िया का बचा कूचा डर भी निकल गया था इसलिए वो बेफिक्र थी......

उन दोनों को खाना देने के बाद वो वही एक कुर्सी पे बैठ गयी और अपनी अधनंगा बदन लिए अपने चोटिल पैर का मुआयना करने लगी....
 
वे दोनो खाते हुए शाज़िया को भी निहार रहे थे कुर्सी पे बैठी हुयी नंगी शाज़िया बहुत ही कामुक लग रही थी जीशान के लिए खुद को रोकना बहुत ही मुश्किल हो रहा था तभी वो जल्दी से खाना ख़त्म कर के शाज़िया को बोलता है आओ कमरे में चलो तुम्हारे पैर की मोच को ठीक किये देता हु और उसकी एक बाह को पकड़ कर कमरे में ले जाता है....वसीम ये कहते हुए दुसरे कमरे में चला जाता है की वो थोड़ी देर सोयेगा.....

कमरे में ले जा कर जीशान शाज़िया को पूरी नंगी कर देता है जबकि वसीम अपने कमरे में ना जा कर उन दोनों को कमरे के बाहर से देखने लगता है की कमरे में क्या हो रहा है .........

जीशान - माँ ये सब अचानक से क्या हुआ उस दिन तो तुम दादा को ले कर इतनी परेशां थी और अभी उनके सामने इस हालत में होने पे भी तुम्हे कोई दिक्कत नहीं .......

शाज़िया जो बिलकुल नंगी थी वो जीशान से गले मिलते हुए कहती है की बेटा पहले मैं इसलिए परेशां थी की कही बाबूजी मुझे गलत औरत न समझ बैठे और मेरा गलत फायदा न उठाए मगर वो ऐसे नहीं है तभी मैं थोड़ी निश्चिंत हो कर रह पायी वरना तुम मुझे जानते हो.......

वसीम इधर मन ही मन सोचता है की अगर थोड़ी कोशिश की जाए तो शायद मै भी बहु की जवानी का स्वाद चख सकू ....और वो वही खड़े रह कर आगे की बात सुनता है ......'

जीशान - वो अब तो ठीक है माँ मगर अनीस भईया का क्या उनको क्या बोलोगी......

शाज़िया - अनीस को समझाने में देर नहीं लगेगी और वैसे भी बाबूजी के पेंशन के पैसो से हमे भी थोड़ी आर्थिक मदद हो जाएगी

जीशान भी सोचा की बात तो सही कह रही थी शाज़िया और अगर दादू ने माँ के साथ कुछ किया भी तो कौन सी आफत आ जानी है उसने भी आगे बात को नहीं बढाया और शाज़िया के नंगे बदन को ले कर बिस्तर पे आ गया और कुछ ही पलो में दोनों माँ बेटे अपने काम क्रीडा में लीन हो गये जबकि वसीम दरवाजे पे खड़े हो कर ही मुठ मारने लगा पौने घंटे की चुदाई के बाद शाज़िया और जीशान वैसे ही नंगे एक दुसरे से लिपटे सो गये और वसीम भी अपने कमरे में चला गया ......
 
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