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अमर ने वन्दना को देखा। वह जानता था कि वन्दना क्या सोच सकती है। परन्तु उसे दुःख नहीं हुआ। जिस निर्दयता के साथ रोहित की हत्या करने के बाद उसकी सर-कटी लाश पाई गई थी उसको दृष्टिकोण में रखते हुए वन्दना का रोहित को भूलना लगभग असम्भव-सा था क्योंकि रोहित वन्दना का पहला प्यार था और रोहित ने वन्दना के प्रति ही अपनी जान गंवाई थी। इसके अतिरिक्त अमर अपने दिल से भी विवश था। उसका प्यार निःस्वार्थ था। वन्दना के जीवन-भर काम आना, उसका दुःख अपना बनाकर वन्दना पर अपनी सारी प्रसन्नताएं निछावर कर देना अमर ने मानो अपने प्यार का मकसद तथा जीवन का लक्ष्य बना लिया था। कुछ सुन्दरताएं पुरुषों को इस सीमा तक भी प्रभावित करती हैं। यही कारण है कि जब वन्दना को रोहित के विचारों में तल्लीन देखकर अमर के मन में यदि कोई टीस उठी भी तो उसने उसका गला घोंट दिया। मानव जिसे प्यार करता है उसके लिए वह कभी भी नहीं चाहता कि वह उसके अतिरिक्त किसी और को प्यार दे। मानव का यह स्वभाव है। परन्तु इस वास्तविकता के पश्चात् अमर वन्दना की विवशता समझता था। वन्दना भी तो आखिर एक नारी ही थी। वह कैसे भूल सकती थी कि उसने अमर से भी पहले किसी को प्यार किया है? इन सारी बातों की वास्तविकता
समझते हुए अमर सब-कुछ चुपचाप सहन कर लेता था क्योंकि उसका प्यार निःस्वार्थ था, जो कभी कुछ कहता नहीं था, मांगता नहीं था, झनझनाकर अपने प्यार का प्रदर्शन नहीं करता था। ठाकुर नरेन्द्र सिंह ने अमर को खाना छोड़कर वन्दना की ओर खोए देखा तो उन्हें दुःख हुआ। उससे सहानुभूति भी हुई। जब वन्दना और अमर एक-दूसरे को प्यार करने लगे हैं तो वन्दना को कम-से-कम रोहित को याद करके अमर के सामने ऐसा व्यवहार नहीं करना चाहिए। उन्होंने वन्दना को इस विषय पर बाद में समझाने के लिए सोच लिया। अमर का ध्यान अपनी ओर खींचते हुए उन्होंने पूछा, ‘तुम्हें---’ वह एक क्षण रुके। फिर बोले, ‘तुम्हें विदेशी नृत्य आता है?’ ‘जी।’ अमर ने सब-कुछ भूलकर अपना ध्यान ठाकुर साहब की ओर समेटा। उसने कहा, ‘जिस अंग्रेज शिकारी के यहां काम करता था वहां आए-दिन पार्टियां हुआ करती थीं। वहां जोड़ों को नृत्य करते देखकर अक्सर मेरे कदम भी रेडियोग्राम पर बजते रिकॉर्ड के ‘रिदम’ पर उछल पड़ते थे। इसलिए देखते-देखते मैं थोड़ा-बहुत नृत्य तो सीख ही गया हूं। हां फर्श पर उतरने का अवसर आज तक नहीं मिला और न ही मैंने कभी इसकी आशा ही की थी।’
‘फ्लोर पर संगीत के लिए इतना ही बहुत है।’ ठाकुर साहब ने कहा, ‘शेष तुम्हें वन्दना सिखा देगी। स्लो डांस तो इस प्रकार चल जाएगा। फास्ट डांस वह शायद तुम्हारे ही साथ नहीं करेगी क्योंकि फास्ट डांस कठिन होता है।’ नरेन्द्र सिंह ने अपने मुंह में दूसरा कौर डाला। लंच ले चुकने के बाद नरेन्द्र सिंह अपने शयन कक्ष में आराम के लिए गए तो कुछ समय के लिए उनके साथ वन्दना को अकेला छोड़कर अमर भी अपने कमरे में चला गया। ठाकुर नरेन्द्र सिंह ने पलंग पर बैठने के बाद वन्दना को अपने समीप बुलाया। उसे समीप बिठाकर उसके सिर पर प्यार से हाथ रखा। फिर उसे समझाते हुए बोले, ‘बेटी, जो बीत गया उसे भूल जा। अतीत को छाती से लगाए रखने वाला कभी प्रसन्न नहीं रहता। अन्दर-ही-अन्दर वह घुट-घुटकर घुलता रहता है। फिर उसके जीवन की गाड़ी आसानी से आगे नहीं बढ़ती। जिस व्यक्तित्व का अब इस संसार में कोई अस्तित्व ही नहीं रहा उसे याद रखने से क्या लाभ?’ ‘रोहित को भूलना तो मैं भी चाहती हूं, दादाजी’, वन्दना ने भर्राए स्वर में कहा, ‘और अब उसे भूलने का साधन भी प्राप्त कर दिया है परन्तु---परन्तु रोहित यदि अपने-आप ही याद आ जाए तो मैं क्या कर सकती हूं?’
‘इसीलिए तो राय दे रहा हूं कि आज तू अमर के साथ ‘फिरदौस’ का प्रोग्राम अटैण्ड कर ले।’ नरेन्द्र सिंह ने कहा, ‘दो-चार ऐसे ही प्रोग्राम तुझे अमर के साथ अटैण्ड करने को मिल गए तो अमर स्वयं ही तेरे दिल से रोहित को इस प्रकार भुला देगा कि तू उसे भूले से भी कभी याद नहीं करेगी। अमर की खामोशी से प्रकट होता है कि वह तुझे रोहित से कम प्यार नहीं करता। बल्कि मैं तो कहूंगा कि वह तुझे रोहित से कहीं अधिक प्यार करता है। मेरे जीते-जी यदि तेरे जीवन से यह अतीत की छाया मिट जाए तो निश्चय ही मैं इसी कारण सब-कुछ भूलकर अन्तिम सांसें चैन से तोड़ दूंगा।’ वन्दना उसी प्रकार सिर झुकाए खामोश रही। वह अपने दादाजी की बातों से सहमत थी। ‘जाओ बेटी, जाकर तैयार हो जाओ।’ नरेन्द्र सिंह ने कहा, ‘शहर जाकर अभी से अमर को आज के प्रोग्राम में भाग लेने योग्य वस्त्र दिला देना ताकि वह वहां नवयुवकों को अच्छे और बहुमूल्य वस्त्र पहने देखकर हीन भावना का शिकार न हो सके। और हां’, अचानक नरेन्द्र सिंह को मानो याद आया। उन्होंने कहा, ‘सम्भवतया प्रोग्राम में बहुत देर हो जाए, इसलिए रात में गांव मत लौटना। वहीं होटल में ही दो कमरे बुक कर लेना - एक अपने लिए तथा दूसरा अमर के लिए। यहां अपनी रक्षा के लिए मैं चौकी के पुलिस
अफसर द्वारा दो कांस्टेबल का प्रबंध करा लूंगा। मेरी चिन्ता तुम जरा भी मत करना।’ वन्दना अपने दादाजी की चिन्ता से मुक्त हो गई। उसे अपने दादाजी की बातें अमर के लिए भी बहुत पसन्द आईं। ‘फिरदौस’ के प्रोग्राम में अमर को हर क्षण उसी की संगति में रहना था इसलिए अमर को अच्छे तथा बहुमूल्य कपड़े पहनाना परस्पर आवश्यक था। अमर के लिए इतना सब-कुछ करने के बहाने ही वन्दना को अज्ञात प्रसन्नता का आभास हुआ। मानव जिसे प्यार करता है उसके लिए सब कुछ करते हुए मानव को दोगुनी प्रसन्नता प्राप्त होती है। यह भी प्यार का एक पवित्र रूप है। वन्दना रोहित की याद में जितनी गम्भीर थी उससे अधिक यह प्रसन्नता मिली कि उसे आज अमर के साथ नृत्य करने का अवसर पहली बार प्राप्त हो रहा है। वह उठी और अपने कमरे में पहुंचकर जाने की तैयारी करने लगी। अभी से ही उसे शहर जाकर बहुत सारी वस्तुएं खरीदनी थीं। कुछ देर बाद, जब ठाकुर नरेन्द्र सिंह पलंग पर लेटकर आराम करने लगे तो शयनकक्ष के द्वार पर अमर पहुंचा। नरेन्द्र सिंह को आराम करते देखकर अमर ने लौट जाना चाहा परन्तु उनकी आंखें खुली हुई थीं। ऊंचे तकिए पर
उठा मुखड़ा द्वार की ओर ही था। अमर को लौटता देखकर उन्होंने उसे तुरन्त अन्दर बुलाया। बोले, ‘आओ-आओ, बेटे आओ। अन्दर आओ।’ अमर ने उनकी बात सुनी तो उनकी ओर बढ़ते हुए कहा, ‘आप आराम कीजिए मैं फिर आ जाऊंगा।’ अमर उनके पास आकर खड़ा हो गया। ‘आराम तो अब मुझे तब ही मिलेगा जब---।’ नरेन्द्र सिंह ने एक गहरी सांस ली। हर क्षण शेर सिंह से बदले की भावना में वह इस प्रकार अन्दर-ही-अन्दर जलते रहते थे कि इस समय भी आराम की बात सुनकर वह कह देना चाहते थे कि आराम उन्हें तब ही मिलेगा जब उनके बदले की आग बुझ जाएगी। परन्तु यह समय इन बातों का नहीं था इसलिए वह कहते-कहते संभलकर रुक गए। उन्होंने बात बदलते हुए कहा, ‘आओ, यहां बैठो।’ लेटे-ही-लेटे एक किनारे खिसककर उन्होंने अमर को अपने समीप पलंग पर ही बैठने का इशारा किया। अमर पलंग पर उनके समीप ही पैंतियाने की ओर बैठ गया। ‘देखो बेटा’, उन्होंने कहा, ‘तुम्हें वन्दना अपने साथ ‘फिरदौस’ के प्रोग्राम में ले जाएगी। लेकिन प्रोग्राम से
पहले, वह तुम्हें कुछ वस्तुएं दिलाने शहर के मार्केट भी ले जाएगी। वहां वह जो कुछ भी दिलाए उसे स्वीकारने से तुम इन्कार मत करना वर्ना उसका दिल टूट जाएगा। वह ऐसा अपनी प्रसन्नता के साथ तुम्हारी प्रसन्नता के लिए ही करेगी। मैं जानता हूं कि अब तुम ही उसकी प्रसन्नता हो, सुख और शांति हो, उसका भविष्य हो। यदि उसकी किसी नादान भूल के कारण तुम्हें चोट पहुंचे तो उसे मन-ही-मन क्षमा कर देना।’ ‘जी।’ अमर ने एक वफादार बेटे के समान सिर झुकाकर कहा। उसने सोचा कि ठाकुर साहब द्वारा उसे पिता का प्यार मिल रहा है। वन्दना द्वारा उसे एक प्रेमिका का प्यार प्राप्त है। निश्चय ही आगे चलकर यह प्यार उसकी जीवन-संगिनी के प्यार में परिवर्तित हो जाएगा। अभी से ही खाना-पीना तथा रहना सब उसकी सुविधा के लिए उसे कोठी की ओर से प्राप्त है। ऐसे ऊंचे वंश का चिराग बनने के लिए तो लोग सात जन्म लेते हैं फिर भी नहीं बन पाते हैं और वह शायद अपने पहले ही जन्म में इस वंश का दीपक बन रहा है। कितना भाग्यवान है वह। मन-ही-मन उसने यही सोचा कि जब वन्दना आज शाम उसकी आवश्यकताओं की वस्तुएं दिला रही है तो क्यों न वह भी वन्दना के लिए कोई वस्तु खरीदकर उसे भेंट कर दे? यद्यपि वन्दना का स्तर देखते
हुए उसकी भेंट की हुई वस्तु तुच्छ होगी परन्तु वन्दना उसे प्यार करती है इसलिए उसकी दी हुई तुच्छ भेंट को भी एक बहुमूल्य वस्तु समझकर वह स्वीकारने से कभी इन्कार नहीं करेगी। उसने भी आज शाम अपनी ओर से वन्दना को कुछ-न-कुछ भेंट देने का निश्चय कर लिया। थोड़ी-बहुत धन राशि उसकी पिछली कमाई, उसके पास पहले ही जमा थी। ‘और हां बेटे’, नरेन्द्र सिंह ने जैसे अमर को याद दिलाया। उन्होंने कहा, ‘फिरदौस में नृत्य के समय भी तुम रिवॉल्वर अपने साथ अवश्य रखना। मेरी बच्ची की सुरक्षा में जाने कब उसकी आवश्यकता पड़ जाए। किसी को जान से मारने के बजाए उसे निहत्था करके गिरफ्तार कराने में प्राथमिकता देना। डाकुओं की बात अलग होती है परन्तु वहां कौन किस भेष में आए कोई नहीं जानता।’ नरेन्द्र सिंह ने एक क्षण बाद फिर कहा, ‘वन्दना से मैंने कह दिया है कि रात में गांव लौटने की आवश्यकता नहीं है। वहीं तुम दोनों होटल में ठहर जाना और सुबह होने के बाद ही गांव वापस आना। रात के समय इतनी दूर से सुनसान रास्ता तय करना उचित नहीं है। दिन की बात और होती है।’ ‘आपके यहां रात-भर अकेले रहने से आपको कोई खतरा तो नहीं उत्पन्न होगा?’ अमर ने उनके प्रति चिन्ता व्यक्त की।
‘बिल्कुल नहीं।’ नरेन्द्र सिंह ने पूरे विश्वास से कहा, ‘मैं अपनी सुरक्षा के लिए चौकी से दो कांस्टेबल मांग लूंगा। वैसे भी मुझे अब अपने व्यक्तिगत जीवन में डाकुओं का डर जरा भी नहीं रहा।’ ‘जी?’ अमर कुछ समझा नहीं। ‘हां-’ ठाकुर नरेन्द्र सिंह ने कहा, ‘क्योंकि मैं जानता हूं कि शेर सिंह को मेरे जीवन से अधिक मेरी बदनामी की आवश्यकता है। वह जानता है कि मैं बूढ़ा हो चुका हूं। उसने मेरी हत्या नहीं करवाई तब मैं प्राकृतिक मृत्यु के बहाने शीघ्र ही चल बसूंगा। दरअसल-’ नरेन्द्र सिंह ने पलंग पर बैठकर सिरहाने की टेक लगाते हुए मानो भेद की बात कही। बोले, ‘मेरे विचार में शेर सिंह वन्दना का अपहरण करके मुझे सबके सामने अपमानित करने में अधिक विश्वास रखता है। वन्दना की हत्या करनी होती तो उसके आदमी उसकी हत्या उस दिन दूर से भी कर सकते थे जिस दिन तुम्हारे कारण उन्हें परास्त होना पड़ा था आखिर उन्हें उस सिपाही की हत्या करने से कौन रोक सका जिसने वन्दना की लाज बचाने का प्रयत्न किया था?’ अमर ने एक गहरी सांस ली। ठाकुर नरेन्द्र सिंह की बातों में भार था, ठोसपन था। उसे संतोष मिला। धोखेधड़ी से
तो वन्दना की हत्या वास्तव में कोई भी कर सकता था परन्तु वन्दना का अपहरण करना कठिन था और उसके रहते तो बिल्कुल ही असंभव है। ऐसा दृढ़ विश्वास अमर को अपने ऊपर था। वन्दना को उसके अपहरण से बचाना उसे अधिक आसान प्रतीत हुआ। शाम होने में अधिक देर नहीं थी। वन्दना ने अपनी कार शहर की सबसे बड़ी तथा अच्छे वस्त्रों की दुकान के सामने रोकी। बड़े-बड़े शीशे के शो-केस ही इस बात का पता देते थे कि यहां सुंदर वस्त्रों तथा कपड़ों की कमी नहीं है। स्पष्ट प्रकट था कि इस दुकान की वस्तुएं भी काफी महंगी होंगी। शहर की यह सुंदर दुकान यहां चार-पांच वर्ष पहले ही खुली थी जब वन्दना लंदन में थी। अमर भी तब बम्बई में ही काम कर रहा था। आज पहली बार ही उन दोनों का इस दुकान के अन्दर जाना हो रहा था। वन्दना ने कार से उतरकर अपनी ओर के द्वार का शीशा ऊपर किया तो दूसरी ओर से अमर भी अपनी ओर का आगे और फिर पीछे के कार का शीशा बन्द करने लगा। वन्दना ने कार लॉक की। कार लॉक करना आवश्यक था क्योंकि वन्दना अपने साथ एक छोटा सूटकेस भी लाई थी जिसमें पूरा मेकअप का सामान
था। इसके साथ आज शाम के प्रोग्राम में पहनने के लिए वह अपना विशेष फैशनेबल वस्त्र लाई थी जिसे आज शाम होटल में कमरा लेने के बाद वह कमरे में ही नहा-धोकर इस वस्त्र को पहनने का इरादा रखती थी। रात में सोने के लिए भी वह अपने अलग कपड़े लाई थी। अमर भी अपने साथ एक छोटे-से एयर बैग में एक जोड़ा अतिरिक्त वस्त्र लाया था। रात में सोने के लिए भी कुर्ता-पायजामा लेकर चला था। जब दोनों दुकान के शीशे का द्वार खोलकर एक के पीछे एक अन्दर प्रविष्ट हुए तो दुकान के अन्दर का वातावरण बदला हुआ था। दुकान वातानुकूल थी। वंदना अमर को ‘पैन्ट्स डिपार्टमेंट’ के काउण्टर पर ले गई। अमर के लिए वस्त्र खरीदने से पहले ही उसके दिल को एक विचित्र ही प्रसन्नता का आभास होने लगा। प्यार की प्रसन्नता प्राप्त करने का एक यह भी ढंग है जो वह इस समय अपने प्रेमी के लिए सब कुछ खरीदते हुए प्राप्त कर रही थी। बहुत चहक-चहक कर उसने अमर के योग्य अनेक तथा सुंदर रंगीन सूट निकलवाए, देखे तथा भली-भांति परखे भी। अमर उसके समीप ही चुपचाप खड़ा रहा। वन्दना की पसन्द उसके प्रति जाने क्या हो और जाने क्या नहीं? वन्दना ने वहीं खड़े-खड़े कुछेक कोट अमर के कंधे पर डालते हुए उसे पहनाकर
भी देखे। कौन-सा सूट अमर के व्यक्तित्व को अधिक उजागर करता है। अमर वन्दना की पसन्द को अपनी पसन्द समझकर बहुत प्रसन्न था। अचानक वन्दना की आंखों के सामने एक लाल कोट पड़ गया - लाल कोट, जिसे अच्छे व्यक्तित्व का मालिक पहन ले तो राजकुमार लगने लगे। उसे देखते ही वन्दना अचानक गम्भीर हो गई। अज्ञात तौर पर वह खो भी गई जिसके लिए उसकी इच्छा नहीं थी। ऐसा बिना अधिकार ही हुआ। उसे रोहित के साथ वह पहली भेंट याद आ गई जो लंदन के वर्डलैंड (होटल) में हुई थी। कोट पर हाथ रखे तथा अंगुलियां फेरते हुए उसकी आंखों के सामने वह दृश्य घूम गया जब एक रंगीन शाम वह रोहित के साथ ‘वर्डलैंड’ में नहीं बल्कि ‘मेफेअर’ में नृत्य करते हुए बिता रही थी। वह दिन कोई भी हो सकता था परन्तु रविवार का दिन नहीं था क्योंकि लंदन में लगभग सभी होटलों में रविवार के दिन किसी भी प्रकार का रंगीन प्रोग्राम नहीं होता है। ‘मेफेअर’ की उस रंगीन शाम रोहित ने नीला सूट पहन रखा था। ऐसे अवसरों पर वह अपने कोट के कॉलर में सफेद गुलाब लगाना नहीं भूलता था - केवल सफेद गुलाब। किसी और रंग का गुलाब वन्दना ने रोहित के कोट के कॉलर पर कभी नहीं देखा था इसलिए साफ प्रकट था
कि सफेद गुलाब ही रोहित की विशेष पसन्द है - केवल सफेद गुलाब। यह पसन्द तब वन्दना की पसन्द भी बन गई थी। मानव जिससे प्रेम करता है उसकी पसन्द, उसकी अपनी पसन्द स्वयं ही बन जाती है। प्यार भरे दिल का यह स्वभाव है। उस ‘मेफेअर’ की शाम भी रोहित ने अपने नीले कोट के कॉलर में एक सफेद गुलाब ही टांक रखा था जो इस समय उस तारे के समान टिमटिमा रहा था मानो शाम डूबने से पहले ही नील गगन पर आ गया हो। ऑर्केस्ट्रा की धुन पर रोहित की छाती से लगी वन्दना ने थिरकते हुए उसके कोट के कॉलर में लगे फूल की सुगंध नथुनों द्वारा अपने दिल की गहराई में उतारी और फिर एक गहरी सांस लेकर उसने कहा था, ‘एक बात बताऊं, रोहित?’ रोहित ने उसी प्रकार पूछा था, वंदना के हाथ को छोड़कर, ठोड़ी से दो उंगलियों द्वारा उसका मुखड़ा ऊपर उठाते हुए। उसका दूसरा हाथ वन्दना की कमर पर उसी प्रकार था। ‘उस दिन, मेरा मतलब---’ वन्दना ने रोहित की आंखों में झांका। कुछ लजाई। फिर बोली, ‘चौबीस दिसम्बर वाली रात के सूट में तुम मुझे बहुत अच्छे लग रहे थे। वह लाल कोट---’ वन्दना कहते-कहते रुक गई। उसने अपनी पलकें नीचे झुका लीं।
समझते हुए अमर सब-कुछ चुपचाप सहन कर लेता था क्योंकि उसका प्यार निःस्वार्थ था, जो कभी कुछ कहता नहीं था, मांगता नहीं था, झनझनाकर अपने प्यार का प्रदर्शन नहीं करता था। ठाकुर नरेन्द्र सिंह ने अमर को खाना छोड़कर वन्दना की ओर खोए देखा तो उन्हें दुःख हुआ। उससे सहानुभूति भी हुई। जब वन्दना और अमर एक-दूसरे को प्यार करने लगे हैं तो वन्दना को कम-से-कम रोहित को याद करके अमर के सामने ऐसा व्यवहार नहीं करना चाहिए। उन्होंने वन्दना को इस विषय पर बाद में समझाने के लिए सोच लिया। अमर का ध्यान अपनी ओर खींचते हुए उन्होंने पूछा, ‘तुम्हें---’ वह एक क्षण रुके। फिर बोले, ‘तुम्हें विदेशी नृत्य आता है?’ ‘जी।’ अमर ने सब-कुछ भूलकर अपना ध्यान ठाकुर साहब की ओर समेटा। उसने कहा, ‘जिस अंग्रेज शिकारी के यहां काम करता था वहां आए-दिन पार्टियां हुआ करती थीं। वहां जोड़ों को नृत्य करते देखकर अक्सर मेरे कदम भी रेडियोग्राम पर बजते रिकॉर्ड के ‘रिदम’ पर उछल पड़ते थे। इसलिए देखते-देखते मैं थोड़ा-बहुत नृत्य तो सीख ही गया हूं। हां फर्श पर उतरने का अवसर आज तक नहीं मिला और न ही मैंने कभी इसकी आशा ही की थी।’
‘फ्लोर पर संगीत के लिए इतना ही बहुत है।’ ठाकुर साहब ने कहा, ‘शेष तुम्हें वन्दना सिखा देगी। स्लो डांस तो इस प्रकार चल जाएगा। फास्ट डांस वह शायद तुम्हारे ही साथ नहीं करेगी क्योंकि फास्ट डांस कठिन होता है।’ नरेन्द्र सिंह ने अपने मुंह में दूसरा कौर डाला। लंच ले चुकने के बाद नरेन्द्र सिंह अपने शयन कक्ष में आराम के लिए गए तो कुछ समय के लिए उनके साथ वन्दना को अकेला छोड़कर अमर भी अपने कमरे में चला गया। ठाकुर नरेन्द्र सिंह ने पलंग पर बैठने के बाद वन्दना को अपने समीप बुलाया। उसे समीप बिठाकर उसके सिर पर प्यार से हाथ रखा। फिर उसे समझाते हुए बोले, ‘बेटी, जो बीत गया उसे भूल जा। अतीत को छाती से लगाए रखने वाला कभी प्रसन्न नहीं रहता। अन्दर-ही-अन्दर वह घुट-घुटकर घुलता रहता है। फिर उसके जीवन की गाड़ी आसानी से आगे नहीं बढ़ती। जिस व्यक्तित्व का अब इस संसार में कोई अस्तित्व ही नहीं रहा उसे याद रखने से क्या लाभ?’ ‘रोहित को भूलना तो मैं भी चाहती हूं, दादाजी’, वन्दना ने भर्राए स्वर में कहा, ‘और अब उसे भूलने का साधन भी प्राप्त कर दिया है परन्तु---परन्तु रोहित यदि अपने-आप ही याद आ जाए तो मैं क्या कर सकती हूं?’
‘इसीलिए तो राय दे रहा हूं कि आज तू अमर के साथ ‘फिरदौस’ का प्रोग्राम अटैण्ड कर ले।’ नरेन्द्र सिंह ने कहा, ‘दो-चार ऐसे ही प्रोग्राम तुझे अमर के साथ अटैण्ड करने को मिल गए तो अमर स्वयं ही तेरे दिल से रोहित को इस प्रकार भुला देगा कि तू उसे भूले से भी कभी याद नहीं करेगी। अमर की खामोशी से प्रकट होता है कि वह तुझे रोहित से कम प्यार नहीं करता। बल्कि मैं तो कहूंगा कि वह तुझे रोहित से कहीं अधिक प्यार करता है। मेरे जीते-जी यदि तेरे जीवन से यह अतीत की छाया मिट जाए तो निश्चय ही मैं इसी कारण सब-कुछ भूलकर अन्तिम सांसें चैन से तोड़ दूंगा।’ वन्दना उसी प्रकार सिर झुकाए खामोश रही। वह अपने दादाजी की बातों से सहमत थी। ‘जाओ बेटी, जाकर तैयार हो जाओ।’ नरेन्द्र सिंह ने कहा, ‘शहर जाकर अभी से अमर को आज के प्रोग्राम में भाग लेने योग्य वस्त्र दिला देना ताकि वह वहां नवयुवकों को अच्छे और बहुमूल्य वस्त्र पहने देखकर हीन भावना का शिकार न हो सके। और हां’, अचानक नरेन्द्र सिंह को मानो याद आया। उन्होंने कहा, ‘सम्भवतया प्रोग्राम में बहुत देर हो जाए, इसलिए रात में गांव मत लौटना। वहीं होटल में ही दो कमरे बुक कर लेना - एक अपने लिए तथा दूसरा अमर के लिए। यहां अपनी रक्षा के लिए मैं चौकी के पुलिस
अफसर द्वारा दो कांस्टेबल का प्रबंध करा लूंगा। मेरी चिन्ता तुम जरा भी मत करना।’ वन्दना अपने दादाजी की चिन्ता से मुक्त हो गई। उसे अपने दादाजी की बातें अमर के लिए भी बहुत पसन्द आईं। ‘फिरदौस’ के प्रोग्राम में अमर को हर क्षण उसी की संगति में रहना था इसलिए अमर को अच्छे तथा बहुमूल्य कपड़े पहनाना परस्पर आवश्यक था। अमर के लिए इतना सब-कुछ करने के बहाने ही वन्दना को अज्ञात प्रसन्नता का आभास हुआ। मानव जिसे प्यार करता है उसके लिए सब कुछ करते हुए मानव को दोगुनी प्रसन्नता प्राप्त होती है। यह भी प्यार का एक पवित्र रूप है। वन्दना रोहित की याद में जितनी गम्भीर थी उससे अधिक यह प्रसन्नता मिली कि उसे आज अमर के साथ नृत्य करने का अवसर पहली बार प्राप्त हो रहा है। वह उठी और अपने कमरे में पहुंचकर जाने की तैयारी करने लगी। अभी से ही उसे शहर जाकर बहुत सारी वस्तुएं खरीदनी थीं। कुछ देर बाद, जब ठाकुर नरेन्द्र सिंह पलंग पर लेटकर आराम करने लगे तो शयनकक्ष के द्वार पर अमर पहुंचा। नरेन्द्र सिंह को आराम करते देखकर अमर ने लौट जाना चाहा परन्तु उनकी आंखें खुली हुई थीं। ऊंचे तकिए पर
उठा मुखड़ा द्वार की ओर ही था। अमर को लौटता देखकर उन्होंने उसे तुरन्त अन्दर बुलाया। बोले, ‘आओ-आओ, बेटे आओ। अन्दर आओ।’ अमर ने उनकी बात सुनी तो उनकी ओर बढ़ते हुए कहा, ‘आप आराम कीजिए मैं फिर आ जाऊंगा।’ अमर उनके पास आकर खड़ा हो गया। ‘आराम तो अब मुझे तब ही मिलेगा जब---।’ नरेन्द्र सिंह ने एक गहरी सांस ली। हर क्षण शेर सिंह से बदले की भावना में वह इस प्रकार अन्दर-ही-अन्दर जलते रहते थे कि इस समय भी आराम की बात सुनकर वह कह देना चाहते थे कि आराम उन्हें तब ही मिलेगा जब उनके बदले की आग बुझ जाएगी। परन्तु यह समय इन बातों का नहीं था इसलिए वह कहते-कहते संभलकर रुक गए। उन्होंने बात बदलते हुए कहा, ‘आओ, यहां बैठो।’ लेटे-ही-लेटे एक किनारे खिसककर उन्होंने अमर को अपने समीप पलंग पर ही बैठने का इशारा किया। अमर पलंग पर उनके समीप ही पैंतियाने की ओर बैठ गया। ‘देखो बेटा’, उन्होंने कहा, ‘तुम्हें वन्दना अपने साथ ‘फिरदौस’ के प्रोग्राम में ले जाएगी। लेकिन प्रोग्राम से
पहले, वह तुम्हें कुछ वस्तुएं दिलाने शहर के मार्केट भी ले जाएगी। वहां वह जो कुछ भी दिलाए उसे स्वीकारने से तुम इन्कार मत करना वर्ना उसका दिल टूट जाएगा। वह ऐसा अपनी प्रसन्नता के साथ तुम्हारी प्रसन्नता के लिए ही करेगी। मैं जानता हूं कि अब तुम ही उसकी प्रसन्नता हो, सुख और शांति हो, उसका भविष्य हो। यदि उसकी किसी नादान भूल के कारण तुम्हें चोट पहुंचे तो उसे मन-ही-मन क्षमा कर देना।’ ‘जी।’ अमर ने एक वफादार बेटे के समान सिर झुकाकर कहा। उसने सोचा कि ठाकुर साहब द्वारा उसे पिता का प्यार मिल रहा है। वन्दना द्वारा उसे एक प्रेमिका का प्यार प्राप्त है। निश्चय ही आगे चलकर यह प्यार उसकी जीवन-संगिनी के प्यार में परिवर्तित हो जाएगा। अभी से ही खाना-पीना तथा रहना सब उसकी सुविधा के लिए उसे कोठी की ओर से प्राप्त है। ऐसे ऊंचे वंश का चिराग बनने के लिए तो लोग सात जन्म लेते हैं फिर भी नहीं बन पाते हैं और वह शायद अपने पहले ही जन्म में इस वंश का दीपक बन रहा है। कितना भाग्यवान है वह। मन-ही-मन उसने यही सोचा कि जब वन्दना आज शाम उसकी आवश्यकताओं की वस्तुएं दिला रही है तो क्यों न वह भी वन्दना के लिए कोई वस्तु खरीदकर उसे भेंट कर दे? यद्यपि वन्दना का स्तर देखते
हुए उसकी भेंट की हुई वस्तु तुच्छ होगी परन्तु वन्दना उसे प्यार करती है इसलिए उसकी दी हुई तुच्छ भेंट को भी एक बहुमूल्य वस्तु समझकर वह स्वीकारने से कभी इन्कार नहीं करेगी। उसने भी आज शाम अपनी ओर से वन्दना को कुछ-न-कुछ भेंट देने का निश्चय कर लिया। थोड़ी-बहुत धन राशि उसकी पिछली कमाई, उसके पास पहले ही जमा थी। ‘और हां बेटे’, नरेन्द्र सिंह ने जैसे अमर को याद दिलाया। उन्होंने कहा, ‘फिरदौस में नृत्य के समय भी तुम रिवॉल्वर अपने साथ अवश्य रखना। मेरी बच्ची की सुरक्षा में जाने कब उसकी आवश्यकता पड़ जाए। किसी को जान से मारने के बजाए उसे निहत्था करके गिरफ्तार कराने में प्राथमिकता देना। डाकुओं की बात अलग होती है परन्तु वहां कौन किस भेष में आए कोई नहीं जानता।’ नरेन्द्र सिंह ने एक क्षण बाद फिर कहा, ‘वन्दना से मैंने कह दिया है कि रात में गांव लौटने की आवश्यकता नहीं है। वहीं तुम दोनों होटल में ठहर जाना और सुबह होने के बाद ही गांव वापस आना। रात के समय इतनी दूर से सुनसान रास्ता तय करना उचित नहीं है। दिन की बात और होती है।’ ‘आपके यहां रात-भर अकेले रहने से आपको कोई खतरा तो नहीं उत्पन्न होगा?’ अमर ने उनके प्रति चिन्ता व्यक्त की।
‘बिल्कुल नहीं।’ नरेन्द्र सिंह ने पूरे विश्वास से कहा, ‘मैं अपनी सुरक्षा के लिए चौकी से दो कांस्टेबल मांग लूंगा। वैसे भी मुझे अब अपने व्यक्तिगत जीवन में डाकुओं का डर जरा भी नहीं रहा।’ ‘जी?’ अमर कुछ समझा नहीं। ‘हां-’ ठाकुर नरेन्द्र सिंह ने कहा, ‘क्योंकि मैं जानता हूं कि शेर सिंह को मेरे जीवन से अधिक मेरी बदनामी की आवश्यकता है। वह जानता है कि मैं बूढ़ा हो चुका हूं। उसने मेरी हत्या नहीं करवाई तब मैं प्राकृतिक मृत्यु के बहाने शीघ्र ही चल बसूंगा। दरअसल-’ नरेन्द्र सिंह ने पलंग पर बैठकर सिरहाने की टेक लगाते हुए मानो भेद की बात कही। बोले, ‘मेरे विचार में शेर सिंह वन्दना का अपहरण करके मुझे सबके सामने अपमानित करने में अधिक विश्वास रखता है। वन्दना की हत्या करनी होती तो उसके आदमी उसकी हत्या उस दिन दूर से भी कर सकते थे जिस दिन तुम्हारे कारण उन्हें परास्त होना पड़ा था आखिर उन्हें उस सिपाही की हत्या करने से कौन रोक सका जिसने वन्दना की लाज बचाने का प्रयत्न किया था?’ अमर ने एक गहरी सांस ली। ठाकुर नरेन्द्र सिंह की बातों में भार था, ठोसपन था। उसे संतोष मिला। धोखेधड़ी से
तो वन्दना की हत्या वास्तव में कोई भी कर सकता था परन्तु वन्दना का अपहरण करना कठिन था और उसके रहते तो बिल्कुल ही असंभव है। ऐसा दृढ़ विश्वास अमर को अपने ऊपर था। वन्दना को उसके अपहरण से बचाना उसे अधिक आसान प्रतीत हुआ। शाम होने में अधिक देर नहीं थी। वन्दना ने अपनी कार शहर की सबसे बड़ी तथा अच्छे वस्त्रों की दुकान के सामने रोकी। बड़े-बड़े शीशे के शो-केस ही इस बात का पता देते थे कि यहां सुंदर वस्त्रों तथा कपड़ों की कमी नहीं है। स्पष्ट प्रकट था कि इस दुकान की वस्तुएं भी काफी महंगी होंगी। शहर की यह सुंदर दुकान यहां चार-पांच वर्ष पहले ही खुली थी जब वन्दना लंदन में थी। अमर भी तब बम्बई में ही काम कर रहा था। आज पहली बार ही उन दोनों का इस दुकान के अन्दर जाना हो रहा था। वन्दना ने कार से उतरकर अपनी ओर के द्वार का शीशा ऊपर किया तो दूसरी ओर से अमर भी अपनी ओर का आगे और फिर पीछे के कार का शीशा बन्द करने लगा। वन्दना ने कार लॉक की। कार लॉक करना आवश्यक था क्योंकि वन्दना अपने साथ एक छोटा सूटकेस भी लाई थी जिसमें पूरा मेकअप का सामान
था। इसके साथ आज शाम के प्रोग्राम में पहनने के लिए वह अपना विशेष फैशनेबल वस्त्र लाई थी जिसे आज शाम होटल में कमरा लेने के बाद वह कमरे में ही नहा-धोकर इस वस्त्र को पहनने का इरादा रखती थी। रात में सोने के लिए भी वह अपने अलग कपड़े लाई थी। अमर भी अपने साथ एक छोटे-से एयर बैग में एक जोड़ा अतिरिक्त वस्त्र लाया था। रात में सोने के लिए भी कुर्ता-पायजामा लेकर चला था। जब दोनों दुकान के शीशे का द्वार खोलकर एक के पीछे एक अन्दर प्रविष्ट हुए तो दुकान के अन्दर का वातावरण बदला हुआ था। दुकान वातानुकूल थी। वंदना अमर को ‘पैन्ट्स डिपार्टमेंट’ के काउण्टर पर ले गई। अमर के लिए वस्त्र खरीदने से पहले ही उसके दिल को एक विचित्र ही प्रसन्नता का आभास होने लगा। प्यार की प्रसन्नता प्राप्त करने का एक यह भी ढंग है जो वह इस समय अपने प्रेमी के लिए सब कुछ खरीदते हुए प्राप्त कर रही थी। बहुत चहक-चहक कर उसने अमर के योग्य अनेक तथा सुंदर रंगीन सूट निकलवाए, देखे तथा भली-भांति परखे भी। अमर उसके समीप ही चुपचाप खड़ा रहा। वन्दना की पसन्द उसके प्रति जाने क्या हो और जाने क्या नहीं? वन्दना ने वहीं खड़े-खड़े कुछेक कोट अमर के कंधे पर डालते हुए उसे पहनाकर
भी देखे। कौन-सा सूट अमर के व्यक्तित्व को अधिक उजागर करता है। अमर वन्दना की पसन्द को अपनी पसन्द समझकर बहुत प्रसन्न था। अचानक वन्दना की आंखों के सामने एक लाल कोट पड़ गया - लाल कोट, जिसे अच्छे व्यक्तित्व का मालिक पहन ले तो राजकुमार लगने लगे। उसे देखते ही वन्दना अचानक गम्भीर हो गई। अज्ञात तौर पर वह खो भी गई जिसके लिए उसकी इच्छा नहीं थी। ऐसा बिना अधिकार ही हुआ। उसे रोहित के साथ वह पहली भेंट याद आ गई जो लंदन के वर्डलैंड (होटल) में हुई थी। कोट पर हाथ रखे तथा अंगुलियां फेरते हुए उसकी आंखों के सामने वह दृश्य घूम गया जब एक रंगीन शाम वह रोहित के साथ ‘वर्डलैंड’ में नहीं बल्कि ‘मेफेअर’ में नृत्य करते हुए बिता रही थी। वह दिन कोई भी हो सकता था परन्तु रविवार का दिन नहीं था क्योंकि लंदन में लगभग सभी होटलों में रविवार के दिन किसी भी प्रकार का रंगीन प्रोग्राम नहीं होता है। ‘मेफेअर’ की उस रंगीन शाम रोहित ने नीला सूट पहन रखा था। ऐसे अवसरों पर वह अपने कोट के कॉलर में सफेद गुलाब लगाना नहीं भूलता था - केवल सफेद गुलाब। किसी और रंग का गुलाब वन्दना ने रोहित के कोट के कॉलर पर कभी नहीं देखा था इसलिए साफ प्रकट था
कि सफेद गुलाब ही रोहित की विशेष पसन्द है - केवल सफेद गुलाब। यह पसन्द तब वन्दना की पसन्द भी बन गई थी। मानव जिससे प्रेम करता है उसकी पसन्द, उसकी अपनी पसन्द स्वयं ही बन जाती है। प्यार भरे दिल का यह स्वभाव है। उस ‘मेफेअर’ की शाम भी रोहित ने अपने नीले कोट के कॉलर में एक सफेद गुलाब ही टांक रखा था जो इस समय उस तारे के समान टिमटिमा रहा था मानो शाम डूबने से पहले ही नील गगन पर आ गया हो। ऑर्केस्ट्रा की धुन पर रोहित की छाती से लगी वन्दना ने थिरकते हुए उसके कोट के कॉलर में लगे फूल की सुगंध नथुनों द्वारा अपने दिल की गहराई में उतारी और फिर एक गहरी सांस लेकर उसने कहा था, ‘एक बात बताऊं, रोहित?’ रोहित ने उसी प्रकार पूछा था, वंदना के हाथ को छोड़कर, ठोड़ी से दो उंगलियों द्वारा उसका मुखड़ा ऊपर उठाते हुए। उसका दूसरा हाथ वन्दना की कमर पर उसी प्रकार था। ‘उस दिन, मेरा मतलब---’ वन्दना ने रोहित की आंखों में झांका। कुछ लजाई। फिर बोली, ‘चौबीस दिसम्बर वाली रात के सूट में तुम मुझे बहुत अच्छे लग रहे थे। वह लाल कोट---’ वन्दना कहते-कहते रुक गई। उसने अपनी पलकें नीचे झुका लीं।