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Romance प्यासी शबनम लेखिका रानू

अमर ने वन्दना को देखा। वह जानता था कि वन्दना क्या सोच सकती है। परन्तु उसे दुःख नहीं हुआ। जिस निर्दयता के साथ रोहित की हत्या करने के बाद उसकी सर-कटी लाश पाई गई थी उसको दृष्टिकोण में रखते हुए वन्दना का रोहित को भूलना लगभग असम्भव-सा था क्योंकि रोहित वन्दना का पहला प्यार था और रोहित ने वन्दना के प्रति ही अपनी जान गंवाई थी। इसके अतिरिक्त अमर अपने दिल से भी विवश था। उसका प्यार निःस्वार्थ था। वन्दना के जीवन-भर काम आना, उसका दुःख अपना बनाकर वन्दना पर अपनी सारी प्रसन्नताएं निछावर कर देना अमर ने मानो अपने प्यार का मकसद तथा जीवन का लक्ष्य बना लिया था। कुछ सुन्दरताएं पुरुषों को इस सीमा तक भी प्रभावित करती हैं। यही कारण है कि जब वन्दना को रोहित के विचारों में तल्लीन देखकर अमर के मन में यदि कोई टीस उठी भी तो उसने उसका गला घोंट दिया। मानव जिसे प्यार करता है उसके लिए वह कभी भी नहीं चाहता कि वह उसके अतिरिक्त किसी और को प्यार दे। मानव का यह स्वभाव है। परन्तु इस वास्तविकता के पश्चात् अमर वन्दना की विवशता समझता था। वन्दना भी तो आखिर एक नारी ही थी। वह कैसे भूल सकती थी कि उसने अमर से भी पहले किसी को प्यार किया है? इन सारी बातों की वास्तविकता

समझते हुए अमर सब-कुछ चुपचाप सहन कर लेता था क्योंकि उसका प्यार निःस्वार्थ था, जो कभी कुछ कहता नहीं था, मांगता नहीं था, झनझनाकर अपने प्यार का प्रदर्शन नहीं करता था। ठाकुर नरेन्द्र सिंह ने अमर को खाना छोड़कर वन्दना की ओर खोए देखा तो उन्हें दुःख हुआ। उससे सहानुभूति भी हुई। जब वन्दना और अमर एक-दूसरे को प्यार करने लगे हैं तो वन्दना को कम-से-कम रोहित को याद करके अमर के सामने ऐसा व्यवहार नहीं करना चाहिए। उन्होंने वन्दना को इस विषय पर बाद में समझाने के लिए सोच लिया। अमर का ध्यान अपनी ओर खींचते हुए उन्होंने पूछा, ‘तुम्हें---’ वह एक क्षण रुके। फिर बोले, ‘तुम्हें विदेशी नृत्य आता है?’ ‘जी।’ अमर ने सब-कुछ भूलकर अपना ध्यान ठाकुर साहब की ओर समेटा। उसने कहा, ‘जिस अंग्रेज शिकारी के यहां काम करता था वहां आए-दिन पार्टियां हुआ करती थीं। वहां जोड़ों को नृत्य करते देखकर अक्सर मेरे कदम भी रेडियोग्राम पर बजते रिकॉर्ड के ‘रिदम’ पर उछल पड़ते थे। इसलिए देखते-देखते मैं थोड़ा-बहुत नृत्य तो सीख ही गया हूं। हां फर्श पर उतरने का अवसर आज तक नहीं मिला और न ही मैंने कभी इसकी आशा ही की थी।’

‘फ्लोर पर संगीत के लिए इतना ही बहुत है।’ ठाकुर साहब ने कहा, ‘शेष तुम्हें वन्दना सिखा देगी। स्लो डांस तो इस प्रकार चल जाएगा। फास्ट डांस वह शायद तुम्हारे ही साथ नहीं करेगी क्योंकि फास्ट डांस कठिन होता है।’ नरेन्द्र सिंह ने अपने मुंह में दूसरा कौर डाला। लंच ले चुकने के बाद नरेन्द्र सिंह अपने शयन कक्ष में आराम के लिए गए तो कुछ समय के लिए उनके साथ वन्दना को अकेला छोड़कर अमर भी अपने कमरे में चला गया। ठाकुर नरेन्द्र सिंह ने पलंग पर बैठने के बाद वन्दना को अपने समीप बुलाया। उसे समीप बिठाकर उसके सिर पर प्यार से हाथ रखा। फिर उसे समझाते हुए बोले, ‘बेटी, जो बीत गया उसे भूल जा। अतीत को छाती से लगाए रखने वाला कभी प्रसन्न नहीं रहता। अन्दर-ही-अन्दर वह घुट-घुटकर घुलता रहता है। फिर उसके जीवन की गाड़ी आसानी से आगे नहीं बढ़ती। जिस व्यक्तित्व का अब इस संसार में कोई अस्तित्व ही नहीं रहा उसे याद रखने से क्या लाभ?’ ‘रोहित को भूलना तो मैं भी चाहती हूं, दादाजी’, वन्दना ने भर्राए स्वर में कहा, ‘और अब उसे भूलने का साधन भी प्राप्त कर दिया है परन्तु---परन्तु रोहित यदि अपने-आप ही याद आ जाए तो मैं क्या कर सकती हूं?’

‘इसीलिए तो राय दे रहा हूं कि आज तू अमर के साथ ‘फिरदौस’ का प्रोग्राम अटैण्ड कर ले।’ नरेन्द्र सिंह ने कहा, ‘दो-चार ऐसे ही प्रोग्राम तुझे अमर के साथ अटैण्ड करने को मिल गए तो अमर स्वयं ही तेरे दिल से रोहित को इस प्रकार भुला देगा कि तू उसे भूले से भी कभी याद नहीं करेगी। अमर की खामोशी से प्रकट होता है कि वह तुझे रोहित से कम प्यार नहीं करता। बल्कि मैं तो कहूंगा कि वह तुझे रोहित से कहीं अधिक प्यार करता है। मेरे जीते-जी यदि तेरे जीवन से यह अतीत की छाया मिट जाए तो निश्चय ही मैं इसी कारण सब-कुछ भूलकर अन्तिम सांसें चैन से तोड़ दूंगा।’ वन्दना उसी प्रकार सिर झुकाए खामोश रही। वह अपने दादाजी की बातों से सहमत थी। ‘जाओ बेटी, जाकर तैयार हो जाओ।’ नरेन्द्र सिंह ने कहा, ‘शहर जाकर अभी से अमर को आज के प्रोग्राम में भाग लेने योग्य वस्त्र दिला देना ताकि वह वहां नवयुवकों को अच्छे और बहुमूल्य वस्त्र पहने देखकर हीन भावना का शिकार न हो सके। और हां’, अचानक नरेन्द्र सिंह को मानो याद आया। उन्होंने कहा, ‘सम्भवतया प्रोग्राम में बहुत देर हो जाए, इसलिए रात में गांव मत लौटना। वहीं होटल में ही दो कमरे बुक कर लेना - एक अपने लिए तथा दूसरा अमर के लिए। यहां अपनी रक्षा के लिए मैं चौकी के पुलिस

अफसर द्वारा दो कांस्टेबल का प्रबंध करा लूंगा। मेरी चिन्ता तुम जरा भी मत करना।’ वन्दना अपने दादाजी की चिन्ता से मुक्त हो गई। उसे अपने दादाजी की बातें अमर के लिए भी बहुत पसन्द आईं। ‘फिरदौस’ के प्रोग्राम में अमर को हर क्षण उसी की संगति में रहना था इसलिए अमर को अच्छे तथा बहुमूल्य कपड़े पहनाना परस्पर आवश्यक था। अमर के लिए इतना सब-कुछ करने के बहाने ही वन्दना को अज्ञात प्रसन्नता का आभास हुआ। मानव जिसे प्यार करता है उसके लिए सब कुछ करते हुए मानव को दोगुनी प्रसन्नता प्राप्त होती है। यह भी प्यार का एक पवित्र रूप है। वन्दना रोहित की याद में जितनी गम्भीर थी उससे अधिक यह प्रसन्नता मिली कि उसे आज अमर के साथ नृत्य करने का अवसर पहली बार प्राप्त हो रहा है। वह उठी और अपने कमरे में पहुंचकर जाने की तैयारी करने लगी। अभी से ही उसे शहर जाकर बहुत सारी वस्तुएं खरीदनी थीं। कुछ देर बाद, जब ठाकुर नरेन्द्र सिंह पलंग पर लेटकर आराम करने लगे तो शयनकक्ष के द्वार पर अमर पहुंचा। नरेन्द्र सिंह को आराम करते देखकर अमर ने लौट जाना चाहा परन्तु उनकी आंखें खुली हुई थीं। ऊंचे तकिए पर

उठा मुखड़ा द्वार की ओर ही था। अमर को लौटता देखकर उन्होंने उसे तुरन्त अन्दर बुलाया। बोले, ‘आओ-आओ, बेटे आओ। अन्दर आओ।’ अमर ने उनकी बात सुनी तो उनकी ओर बढ़ते हुए कहा, ‘आप आराम कीजिए मैं फिर आ जाऊंगा।’ अमर उनके पास आकर खड़ा हो गया। ‘आराम तो अब मुझे तब ही मिलेगा जब---।’ नरेन्द्र सिंह ने एक गहरी सांस ली। हर क्षण शेर सिंह से बदले की भावना में वह इस प्रकार अन्दर-ही-अन्दर जलते रहते थे कि इस समय भी आराम की बात सुनकर वह कह देना चाहते थे कि आराम उन्हें तब ही मिलेगा जब उनके बदले की आग बुझ जाएगी। परन्तु यह समय इन बातों का नहीं था इसलिए वह कहते-कहते संभलकर रुक गए। उन्होंने बात बदलते हुए कहा, ‘आओ, यहां बैठो।’ लेटे-ही-लेटे एक किनारे खिसककर उन्होंने अमर को अपने समीप पलंग पर ही बैठने का इशारा किया। अमर पलंग पर उनके समीप ही पैंतियाने की ओर बैठ गया। ‘देखो बेटा’, उन्होंने कहा, ‘तुम्हें वन्दना अपने साथ ‘फिरदौस’ के प्रोग्राम में ले जाएगी। लेकिन प्रोग्राम से

पहले, वह तुम्हें कुछ वस्तुएं दिलाने शहर के मार्केट भी ले जाएगी। वहां वह जो कुछ भी दिलाए उसे स्वीकारने से तुम इन्कार मत करना वर्ना उसका दिल टूट जाएगा। वह ऐसा अपनी प्रसन्नता के साथ तुम्हारी प्रसन्नता के लिए ही करेगी। मैं जानता हूं कि अब तुम ही उसकी प्रसन्नता हो, सुख और शांति हो, उसका भविष्य हो। यदि उसकी किसी नादान भूल के कारण तुम्हें चोट पहुंचे तो उसे मन-ही-मन क्षमा कर देना।’ ‘जी।’ अमर ने एक वफादार बेटे के समान सिर झुकाकर कहा। उसने सोचा कि ठाकुर साहब द्वारा उसे पिता का प्यार मिल रहा है। वन्दना द्वारा उसे एक प्रेमिका का प्यार प्राप्त है। निश्चय ही आगे चलकर यह प्यार उसकी जीवन-संगिनी के प्यार में परिवर्तित हो जाएगा। अभी से ही खाना-पीना तथा रहना सब उसकी सुविधा के लिए उसे कोठी की ओर से प्राप्त है। ऐसे ऊंचे वंश का चिराग बनने के लिए तो लोग सात जन्म लेते हैं फिर भी नहीं बन पाते हैं और वह शायद अपने पहले ही जन्म में इस वंश का दीपक बन रहा है। कितना भाग्यवान है वह। मन-ही-मन उसने यही सोचा कि जब वन्दना आज शाम उसकी आवश्यकताओं की वस्तुएं दिला रही है तो क्यों न वह भी वन्दना के लिए कोई वस्तु खरीदकर उसे भेंट कर दे? यद्यपि वन्दना का स्तर देखते

हुए उसकी भेंट की हुई वस्तु तुच्छ होगी परन्तु वन्दना उसे प्यार करती है इसलिए उसकी दी हुई तुच्छ भेंट को भी एक बहुमूल्य वस्तु समझकर वह स्वीकारने से कभी इन्कार नहीं करेगी। उसने भी आज शाम अपनी ओर से वन्दना को कुछ-न-कुछ भेंट देने का निश्चय कर लिया। थोड़ी-बहुत धन राशि उसकी पिछली कमाई, उसके पास पहले ही जमा थी। ‘और हां बेटे’, नरेन्द्र सिंह ने जैसे अमर को याद दिलाया। उन्होंने कहा, ‘फिरदौस में नृत्य के समय भी तुम रिवॉल्वर अपने साथ अवश्य रखना। मेरी बच्ची की सुरक्षा में जाने कब उसकी आवश्यकता पड़ जाए। किसी को जान से मारने के बजाए उसे निहत्था करके गिरफ्तार कराने में प्राथमिकता देना। डाकुओं की बात अलग होती है परन्तु वहां कौन किस भेष में आए कोई नहीं जानता।’ नरेन्द्र सिंह ने एक क्षण बाद फिर कहा, ‘वन्दना से मैंने कह दिया है कि रात में गांव लौटने की आवश्यकता नहीं है। वहीं तुम दोनों होटल में ठहर जाना और सुबह होने के बाद ही गांव वापस आना। रात के समय इतनी दूर से सुनसान रास्ता तय करना उचित नहीं है। दिन की बात और होती है।’ ‘आपके यहां रात-भर अकेले रहने से आपको कोई खतरा तो नहीं उत्पन्न होगा?’ अमर ने उनके प्रति चिन्ता व्यक्त की।

‘बिल्कुल नहीं।’ नरेन्द्र सिंह ने पूरे विश्वास से कहा, ‘मैं अपनी सुरक्षा के लिए चौकी से दो कांस्टेबल मांग लूंगा। वैसे भी मुझे अब अपने व्यक्तिगत जीवन में डाकुओं का डर जरा भी नहीं रहा।’ ‘जी?’ अमर कुछ समझा नहीं। ‘हां-’ ठाकुर नरेन्द्र सिंह ने कहा, ‘क्योंकि मैं जानता हूं कि शेर सिंह को मेरे जीवन से अधिक मेरी बदनामी की आवश्यकता है। वह जानता है कि मैं बूढ़ा हो चुका हूं। उसने मेरी हत्या नहीं करवाई तब मैं प्राकृतिक मृत्यु के बहाने शीघ्र ही चल बसूंगा। दरअसल-’ नरेन्द्र सिंह ने पलंग पर बैठकर सिरहाने की टेक लगाते हुए मानो भेद की बात कही। बोले, ‘मेरे विचार में शेर सिंह वन्दना का अपहरण करके मुझे सबके सामने अपमानित करने में अधिक विश्वास रखता है। वन्दना की हत्या करनी होती तो उसके आदमी उसकी हत्या उस दिन दूर से भी कर सकते थे जिस दिन तुम्हारे कारण उन्हें परास्त होना पड़ा था आखिर उन्हें उस सिपाही की हत्या करने से कौन रोक सका जिसने वन्दना की लाज बचाने का प्रयत्न किया था?’ अमर ने एक गहरी सांस ली। ठाकुर नरेन्द्र सिंह की बातों में भार था, ठोसपन था। उसे संतोष मिला। धोखेधड़ी से

तो वन्दना की हत्या वास्तव में कोई भी कर सकता था परन्तु वन्दना का अपहरण करना कठिन था और उसके रहते तो बिल्कुल ही असंभव है। ऐसा दृढ़ विश्वास अमर को अपने ऊपर था। वन्दना को उसके अपहरण से बचाना उसे अधिक आसान प्रतीत हुआ। शाम होने में अधिक देर नहीं थी। वन्दना ने अपनी कार शहर की सबसे बड़ी तथा अच्छे वस्त्रों की दुकान के सामने रोकी। बड़े-बड़े शीशे के शो-केस ही इस बात का पता देते थे कि यहां सुंदर वस्त्रों तथा कपड़ों की कमी नहीं है। स्पष्ट प्रकट था कि इस दुकान की वस्तुएं भी काफी महंगी होंगी। शहर की यह सुंदर दुकान यहां चार-पांच वर्ष पहले ही खुली थी जब वन्दना लंदन में थी। अमर भी तब बम्बई में ही काम कर रहा था। आज पहली बार ही उन दोनों का इस दुकान के अन्दर जाना हो रहा था। वन्दना ने कार से उतरकर अपनी ओर के द्वार का शीशा ऊपर किया तो दूसरी ओर से अमर भी अपनी ओर का आगे और फिर पीछे के कार का शीशा बन्द करने लगा। वन्दना ने कार लॉक की। कार लॉक करना आवश्यक था क्योंकि वन्दना अपने साथ एक छोटा सूटकेस भी लाई थी जिसमें पूरा मेकअप का सामान

था। इसके साथ आज शाम के प्रोग्राम में पहनने के लिए वह अपना विशेष फैशनेबल वस्त्र लाई थी जिसे आज शाम होटल में कमरा लेने के बाद वह कमरे में ही नहा-धोकर इस वस्त्र को पहनने का इरादा रखती थी। रात में सोने के लिए भी वह अपने अलग कपड़े लाई थी। अमर भी अपने साथ एक छोटे-से एयर बैग में एक जोड़ा अतिरिक्त वस्त्र लाया था। रात में सोने के लिए भी कुर्ता-पायजामा लेकर चला था। जब दोनों दुकान के शीशे का द्वार खोलकर एक के पीछे एक अन्दर प्रविष्ट हुए तो दुकान के अन्दर का वातावरण बदला हुआ था। दुकान वातानुकूल थी। वंदना अमर को ‘पैन्ट्स डिपार्टमेंट’ के काउण्टर पर ले गई। अमर के लिए वस्त्र खरीदने से पहले ही उसके दिल को एक विचित्र ही प्रसन्नता का आभास होने लगा। प्यार की प्रसन्नता प्राप्त करने का एक यह भी ढंग है जो वह इस समय अपने प्रेमी के लिए सब कुछ खरीदते हुए प्राप्त कर रही थी। बहुत चहक-चहक कर उसने अमर के योग्य अनेक तथा सुंदर रंगीन सूट निकलवाए, देखे तथा भली-भांति परखे भी। अमर उसके समीप ही चुपचाप खड़ा रहा। वन्दना की पसन्द उसके प्रति जाने क्या हो और जाने क्या नहीं? वन्दना ने वहीं खड़े-खड़े कुछेक कोट अमर के कंधे पर डालते हुए उसे पहनाकर

भी देखे। कौन-सा सूट अमर के व्यक्तित्व को अधिक उजागर करता है। अमर वन्दना की पसन्द को अपनी पसन्द समझकर बहुत प्रसन्न था। अचानक वन्दना की आंखों के सामने एक लाल कोट पड़ गया - लाल कोट, जिसे अच्छे व्यक्तित्व का मालिक पहन ले तो राजकुमार लगने लगे। उसे देखते ही वन्दना अचानक गम्भीर हो गई। अज्ञात तौर पर वह खो भी गई जिसके लिए उसकी इच्छा नहीं थी। ऐसा बिना अधिकार ही हुआ। उसे रोहित के साथ वह पहली भेंट याद आ गई जो लंदन के वर्डलैंड (होटल) में हुई थी। कोट पर हाथ रखे तथा अंगुलियां फेरते हुए उसकी आंखों के सामने वह दृश्य घूम गया जब एक रंगीन शाम वह रोहित के साथ ‘वर्डलैंड’ में नहीं बल्कि ‘मेफेअर’ में नृत्य करते हुए बिता रही थी। वह दिन कोई भी हो सकता था परन्तु रविवार का दिन नहीं था क्योंकि लंदन में लगभग सभी होटलों में रविवार के दिन किसी भी प्रकार का रंगीन प्रोग्राम नहीं होता है। ‘मेफेअर’ की उस रंगीन शाम रोहित ने नीला सूट पहन रखा था। ऐसे अवसरों पर वह अपने कोट के कॉलर में सफेद गुलाब लगाना नहीं भूलता था - केवल सफेद गुलाब। किसी और रंग का गुलाब वन्दना ने रोहित के कोट के कॉलर पर कभी नहीं देखा था इसलिए साफ प्रकट था

कि सफेद गुलाब ही रोहित की विशेष पसन्द है - केवल सफेद गुलाब। यह पसन्द तब वन्दना की पसन्द भी बन गई थी। मानव जिससे प्रेम करता है उसकी पसन्द, उसकी अपनी पसन्द स्वयं ही बन जाती है। प्यार भरे दिल का यह स्वभाव है। उस ‘मेफेअर’ की शाम भी रोहित ने अपने नीले कोट के कॉलर में एक सफेद गुलाब ही टांक रखा था जो इस समय उस तारे के समान टिमटिमा रहा था मानो शाम डूबने से पहले ही नील गगन पर आ गया हो। ऑर्केस्ट्रा की धुन पर रोहित की छाती से लगी वन्दना ने थिरकते हुए उसके कोट के कॉलर में लगे फूल की सुगंध नथुनों द्वारा अपने दिल की गहराई में उतारी और फिर एक गहरी सांस लेकर उसने कहा था, ‘एक बात बताऊं, रोहित?’ रोहित ने उसी प्रकार पूछा था, वंदना के हाथ को छोड़कर, ठोड़ी से दो उंगलियों द्वारा उसका मुखड़ा ऊपर उठाते हुए। उसका दूसरा हाथ वन्दना की कमर पर उसी प्रकार था। ‘उस दिन, मेरा मतलब---’ वन्दना ने रोहित की आंखों में झांका। कुछ लजाई। फिर बोली, ‘चौबीस दिसम्बर वाली रात के सूट में तुम मुझे बहुत अच्छे लग रहे थे। वह लाल कोट---’ वन्दना कहते-कहते रुक गई। उसने अपनी पलकें नीचे झुका लीं।
 
‘क्यों?’ रोहित ने मजाक में पूछा, ‘क्या इस सूट में अच्छा नहीं लगता?’ ‘नहीं, ऐसी बात नहीं है परन्तु---’ वन्दना ने तुरन्त कहा परन्तु बात अधूरी छोड़कर चुप हो गई। रोहित की छाती पर उसने फिर सिर रख दिया। ‘अगर तुम्हें वह सूट इतना ही पसन्द है तो कहो मैं उसे हर उत्सव में पहन लिया करूंगा।’ रोहित ने वन्दना की बात रखनी चाही। ‘हुश!’ वन्दना ने कहा, ‘कोई देखेगा तो क्या कहेगा? सब समझेंगे कि तुम्हारे पास केवल वही एक सूट है।’ ‘इसीलिए तो मैं सदा अलग-अलग ढंग और रंग के वस्त्र पहनता हूं। जब कभी किसी उत्सव में जाना पड़ता है तो सूट भी अलग-अलग ढंग और रंग के पहनना आवश्यक समझता हूं। हां, सफेद गुलाब मेरी पसन्द अवश्य है जिसे मैं किसी उत्सव में जाते समय अपने कॉलर में न लगाऊं तो मुझे अपने सूट की शोभा अधूरी मालूम पड़ती है।’ रोहित ने अपने कॉलर में टंके फूल की ओर इशारा किया।

‘आपको यह कोट पसन्द है?’ अचानक दुकानदार ने वन्दना को खोई हुई स्थिति में कोट पर अंगुलियां फेरते देखा तो उसने पूछा। वन्दना के अतिरिक्त उसे और भी ग्राहकों को देखना था। ‘जी?’ वन्दना चौंक गई। चौंककर अपने विचारों से वापस आई तो उसने अपने समीप अमर को खड़े देखा। अमर गम्भीर था। शायद वन्दना के दिल की स्थिति का उसे उचित अनुमान था। वन्दना का लाल कोट पर उंगलियां फेरकर खो जाना कोई अर्थ रखता था। तब भी वह वन्दना के लिए मुस्करा दिया। एक कटु मुस्कान थी यह जिसे देखकर वन्दना मन-ही-मन तड़प उठी। यह उसने क्या कर दिया? अमर की संगति में वह रोहित के लिए खो गई? क्या इस बात का अमर को अनुमान हो सकता है? वन्दना कुछ समझ न सकी परन्तु उसके दिल में चोर था, अमर की संगति में रहने के पश्चात् वह रोहित की याद में खो गई थी, इसलिए वह दुःखी होने के साथ मन-ही-मन लज्जित भी हुई। ‘इन्हें पसन्द न हो, मुझे तो यह कोट बहुत पसन्द है।’ अमर ने वन्दना को इशारा करते हुए कोट पर उंगलियां

फेरीं। उसने अज्ञात बनकर वन्दना के दिल की बात रख ली थी।

वन्दना निश्चिंत नहीं हो सकी। वह अपनी हरकत पर अब भी मन ही मन लज्जित थी। ‘इस कोट के साथ मैच करता कोई पैंट भी दिखाइए।’ वन्दना ने अब अमर पर उसकी पसन्द छोड़ी। रोहित की पसंद के कपड़े पहनकर, या वह कपड़े जिसे पहनकर रोहित का व्यक्तित्व उसकी दृष्टि में खिल उठता था, उसे अमर पर थोपना अमर के साथ अत्याचार करना था, अमर के निःस्वार्थ प्यार से नाजायज लाभ उठाना था तथा उसके प्यार के साथ अन्याय करना था। दुकानदार ने एक से बढ़कर एक चमकदार और सुन्दर बने बनाए पैंट्स दिखाए। पैंट के कपड़ों को पकड़कर वन्दना भी कोट के रंग से मिलान करती और अमर भी। कोई भी आंखों में नहीं फबता था। दोनों की पसन्द मानो एक ओर रह गई थी। अचानक एक पैंट पर वन्दना की उंगलियां स्वयं ही चिपक गईं - क्रीम रंग की पैंट। क्षण-भर के लिए वह फिर गंभीर हो गई। अमर ने वन्दना की ठहरी उंगलियां देखीं। फिर उसके मुखड़े पर ध्यान दिया। उससे वन्दना के दिल की बात छिपी नहीं रह सकी। उसने तुरन्त अनजान बनकर दुकानदार से कहा - ‘यह पैंट बिल्कुल ठीक लगेगा। मेरे लाल कोट पर तो बहुत अधिक भला लगेगा।’

वन्दना ने अमर को गम्भीरतापूर्वक देखा परन्तु कुछ भी नहीं कह सकी वह। दिल के अन्दर अतीत का वही चोर। अमर ने निश्चय ही उसके दिल की किताब पढ़ ली है। इस किताब के अन्दर उसने अमर का नाम देख लिया है। ‘हां-।’ अमर ने कहा - ‘कपड़े तो मैंने पसंद कर लिए। अब मैं पैंट और कोट का ट्रायल कहां लूं?’ उसने काउण्टरमैन से पूछा। ‘उधर वह ड्रेसिंग केबिन है।’ काउण्टरमैन ने एक ओर इशारा करते हुए कहा - ‘कपड़े पहन लीजिएगा तो घंटा बजा दीजिएगा। हमारा टेलर आ जाएगा। सूट की फिटिंग में जो कुछ भी कमी होगी वह एक घंटे के बाद जब आप ‘शॉपिंग’ करके लौटिएगा तो यहां पूरी हो चुकी होगी। तब आप सूट कलेक्ट कर लीजिएगा।’ अमर ड्रेसिंग-केबिन में जाकर कपड़े बदलने लगा। नया सूट पहनने के बाद उसने केबिन की घंटी का बटन दबा दिया। टेलर-मास्टर तुरन्त उसकी सेवा में उपस्थित हुआ। उसने कपड़ों को ऊंचा-नीचा करके फिटिंग का सही नाप लिया और फिर चला गया। अमर ने अपने पुराने कपड़े पहने। फिर जब केबिन से निकल कर दुकान में आया तो वन्दना ‘टाई’ के काउण्टर पर खड़ी थी। उसके सामने

काउण्टर पर टाइयों का ढेर लगा हुआ था परन्तु एक विशेष टाई हाथ में लिए वह खोई हुई थी - क्रीम रंग की सुन्दर टाई थी हय जिस पर पतली लाल रंग की लहरदार नहीं परन्तु सीधी धारियां बनी हुई थीं। अमर चुपचाप उसके पीछे आकर खड़ा हो गया। एक अनुमान लगाकर उसके मन में टीस अवश्य उठी परन्तु अपने प्यार के लिए वह इस टीस पर काबू पा गया। वन्दना यदि रोहित के विचारों में तल्लीन है तो उसके प्रति उसे चिन्तित नहीं होना चाहिए। रोहित तो इस संसार में रहा नहीं। एक-न-एक दिन जब वन्दना उसकी बन जाएगी तो उसे रोहित को भूलना ही पड़ेगा। भारतीय नारी के लिए अपने पति के होते हुए किसी पराए पुरुष की याद में तड़पना महापाप है और वन्दना एक भारतीय नारी थी। क्या हुआ उसने एक अंग्रेज मां की कोख से जन्म लिया था परन्तु उसके शरीर में एक भारतीय पिता का ही रक्त था। हां, यदि वन्दना से विवाह होने के बाद रोहित की मृत्यु हुई होती तो बात अलग होती। तब भूले-भटके वन्दना को उसे याद करने का पूरा अधिकार होता परन्तु अब ऐसी कोई भी बात नहीं थी इसलिए अमर वन्दना की ओर से निश्चिंत हो गया। निश्चिंतता के एहसास ने उसके अन्दर एक हर्ष उत्पन्न कर दिया जिसे आगे बढ़कर प्रकट करते हुए उसने वन्दना के हाथ से टाई छीनकर अपने हाथ में ले ली।
 
उसने कहा - ‘वाह, यह टाई तो वास्तव में बड़ी सुन्दर है। जो सूट तुमने मुझे अभी-अभी दिखाया है उस पर तो यह बहुत ही अधिक शोभा देगी।’ वन्दना अमर की प्रसन्नता में सम्मिलित होकर खिल उठी। इस समय उसके दिल में चोर नहीं समाया क्योंकि यह टाई वैसी नहीं थी जैसी एक बार चौबीस दिसम्बर की रात के उत्सव में रोहित ने अपने लाल कोट के साथ पहन रखी थी। यद्यपि इस टाई में क्वालिटी का अन्तर बहुत था परन्तु डिजाइन का जो अन्तर था वह केवल इतना था कि रोहित की टाई में पतली लाल धारियां लहरदार थीं और इसमें धारियां सीधी थीं। फिर भी यह अन्तर वन्दना के लिए बहुत बड़ा था जिसने उसके दिल को बहुत संतोष दिया। अमर को वह हर वस्तु रोहित समझकर नहीं पहना रही है - उसने ऐसा सोचा। इसके बाद वन्दना ने अमर के लिए और भी बहुत वस्त्र खरीदे, रंगीन ‘फैशनेबल’ कपड़े, कोट, पैंट तथा एकरंगी सूट भी। इन कपड़ों को खरीदते समय उसने अपनी पसंद का ध्यान रखा परन्तु रोहित की पसंद का इसमें कोई दखल नहीं था। अमर ने इस बात का एहसास वन्दना की निश्चिंत चहक में पाया तो उसे खुशी हुई, बल्कि उसने सोचा कि वन्दना इससे पहले जब भी कपड़ों को देखकर खोई तो उस समय निश्चय ही उसके खोएपन में रोहित की पसन्द का

कोई दखल नहीं था। उसने अनुमान लगाया कि उस समय कपड़े देखकर वन्दना यह सोच रही होगी कि यह कपड़े उसके अमर पर कैसे लगेंगे? उस पर शोभा देंगे भी या नहीं? अमर सांवला है इसलिए कपड़ों का चुनाव करते समय रंगों का ध्यान रखना आवश्यक है। अमर मन-ही-मन अपने दिल में रोहित के विरुद्ध आए विचारों पर बहुत लज्जित हुआ परन्तु अपने मन की बात इस समय वन्दना को बताकर क्षमा मांगना उसने उचित नहीं समझा। वन्दना ने हर कपड़े का बिल बनाकर तैयार रखने की आज्ञा दुकानदार को दी। फिर अपनी कार दुकानदार को दिखाकर वहां छोड़ते हुए वह अमर के साथ पैदल ही समीप की दुकानों में शॉपिंग के लिए निकल पड़ी। शहर का सबसे बड़ा मार्केट था यह। सभी वस्तुएं यहां आसानी से मिल जाती थीं। अमर के साथ चलते-चलते उसकी निगाह घड़ी की एक बड़ी दुकान पर पड़ी। अमर को लेकर वह उस दुकान में प्रविष्ट हो गई। काउण्टर पर दुकानदार से जब उसने पुरुषों की कलाई घड़ी निकालने को कहा तो अमर ने वन्दना को आश्चर्य से देखा। ‘यह घड़ी किसके लिए ली जा रही है?’ उसने पूछा। ‘तुम्हारे लिए।’ वन्दना ने लापरवाही से कहा।

‘लेकिन मैं तो पहले ही एक घड़ी पहने हूं।’ अमर ने अपनी कलाई पर बंधी घड़ी वन्दना को दिखाते हुए कहा। ‘कपड़े भी तो तुम पहले से ही पहने थे। फिर मैंने तुम्हें कपड़े क्यों दिलाए?’ अमर ने उससे कुछ कहना चाहा परन्तु समझ में नहीं आया कि इन्कार में उसे कैसे समझाए। तभी दुकानदार ने अनेक घड़ियां बहुमूल्य तथा सस्ती भी, अत्यन्त सुन्दर तथा सादी भी, उन दोनों के सामने शीशे के काउण्टर पर रख दीं। वन्दना ने खूबसूरत, बहुमूल्य तथा थोड़ी घड़ियां एक के बाद एक अमर की चौड़ी कलाई पर रखकर देखीं। आखिर एक घड़ी अपनी कलाई पर रखकर देखी। आखिर एक घड़ी अपनी कलाई पर ऊपर नीचे खिसका कर जब अमर ने उसमें अपनी रुचि प्रकट की तो वन्दना ने उसे तुरन्त खरीद लिया। अमर का दिल कृतज्ञ होकर वन्दना के कदमों तले झूल गया, इतना अधिक कि वह धन्यवाद में उससे एक शब्द भी नहीं कह सका। परन्तु एक विचार उसके मन में अवश्य आ गया। अपनी पैंट के पॉकेट पर हाथ फेरते हुए उसने तय कर लिया कि वन्दना जब उसे इतनी अधिक वस्तुएं दिला रही है तो वह भी वन्दना के लिए कुछ-न-कुछ अवश्य खरीदेगा, उसे भेंट में देने को। तब क्या वन्दना उस

गरीब की दी हुई वस्तु को स्वीकारने से कभी इन्कार कर सकेगी? कभी नहीं। उसके बाद वन्दना ने अमर को एक जूतों की दुकान से दो जोड़े जूते अलग-अलग डिजाइन तथा रंग के दिलाए जिसे अमर ने स्वयं पसन्द किया था। एक लाल कोट से मैच खाता जूता था तो दूसरा लगभग हर रंग के कपड़ों पर चलने वाला काला जूता था। अमर के लिए उसने अनेक मोजे भी अलग-अलग रंग तथा डिजाइन के लिए। बाजार की अन्य बची-खुची शॉपिंग करने के बाद दोनों अपनी कार के पास पहुंचे। सारा सामान कार में रखने के बाद उन्होंने कार को फिर ‘लॉक’ किया। उसके बाद जब वन्दना कपड़ों का बिल अदा करने के लिए दुकान में प्रविष्ट हुई तो अमर उसके साथ ही था। वन्दना जब काउण्टर पर बिल का चेक काटने लगी तो दुकानदार ने उससे कहा - ‘मैडम, आखिर इन कपड़ों को आप कहीं-न-कहीं तो सिलवाएंगी ही। फिर क्यों न इसे सिलाने के लिए आप हमारी ही दुकान के टेलर मास्टर को दे दें। कपड़ा हमारी मिल का है इसलिए हम जानते हैं कि इसे काटते समय किन-किन बातों का ध्यान रखना चाहिए।’

वन्दना ने एक पल सोचा। आखिर कहीं-न-कहीं तो उसे यह कपड़े वास्तव में सिलवाने हैं। फिर यह तो सिले-सिलाए कपड़ों की सबसे फैशनेबल दुकान है। कपड़े सिलवाने के लिए इससे अच्छी दुकान और क्या हो सकती है? उसने पलटकर काउण्टरमैन से कहा - ‘ठीक है, जो सूट अभी-अभी आपने सिला है उसको छोड़कर बाकी कपड़े आप सिलने के लिए रख सकते हैं। हम फिर कभी आकर ‘कलेक्ट’ कर लेंगे।’ काउण्टरमैन ने बगैर सिले कपड़ों का पैकिट वापस लेते हुए अमर से कहा - ‘आप ड्रेसिंग केबिन में पहुंचिए। मैं सम्पूर्ण नाप के लिए टेलर मास्टर को भेजता हूं।’ अमर ड्रेसिंग केबिन की ओर बढ़ा। यह दूसरा ड्रेसिंग केबिन था, पहले ड्रेसिंग केबिन से कुछ दूर। यहां एक नहीं अनेक ड्रेसिंग केबिन थे जो शाम के समय अधिकतर भरे रहते थे। अमर के केबिन में टेलर मास्टर आया। उसने उसके कपड़ों की फिटिंग का नाप लिया। अमर आगे-पीछे घूम-घूमकर अपना नाप देने लगा। अचानक उसकी दृष्टि केबिन के शीशे द्वारा दुकान के लेडीज डिपार्टमेंट के द्वार पर पड़ी जो शीशे का बना हुआ था। एक बार फिर उसे वन्दना

का ध्यान आया तो उसने अपनी पॉकेट पर हाथ फेरा। टेलर मास्टर नाप लेकर चला गया तो वह अपने इरादे को साकार रूप देने के लिए अपने केबिन से निकलने के बाद तुरन्त लेडीज डिपार्टमेंट में प्रविष्ट हो गया। एक काउण्टर पर जाकर उसने वन्दना के लिए अनेक वस्त्र देखे। वन्दना के रूप को दृष्टिकोण में रखते हुए कोई भी वस्त्र उसे अच्छा नहीं लग रहा था। फिर भी उसने अन्त में एक बहुत ही सुन्दर हल्के रंग की रेशमी ‘मैक्सी’ चुन ही ली। मैक्सी का ब्लाउज-नुमा ऊपरी भाग पीठ से कुछ खुला हुआ था। कमर से नीचे चोगा समान ढीला-ढाला वस्त्र था यह पूरी ‘मैक्सी’ उसी रंग के रेशमी कपड़े के सुन्दर झालर से भरी पड़ी थी। उसने उसे निकालकर अलग रख दिया और अन्य मैक्सी देखने लगा। शायद यहां उसे वन्दना के दिल इससे भी अच्छी मैक्सी या दूसरे वस्त्र मिल जाएं जिससे वन्दना का रंग रूप और खिल उठे। वन्दना के रंग-रूप के आगे सभी रंग, सभी डिजाइन फीके पड़ सकते थे। इयर वन्दना ने बिल-काउण्टर पर अपना हिसाब किया। फिर वह अमर की प्रतीक्षा करने लगी। अमर तब भी नहीं आया तो वह अपने कपड़ों का पैकेट वहीं बिल-काउण्टर पर छोड़कर लेडीज डिपार्टमेंट की ओर बढ़ गई। उसने सोचा, यदि लेडीज डिपार्टमेंट में उसके पसन्द की कोई वस्तु

मिल गई तो वह उसे अपने लिए खरीद लेगी। परन्तु जैसे ही वह लेडीज डिपार्टमेंट के शीशे के द्वार पर पहुंची, बाहर से ही उसकी दृष्टि अंदर अमर पर पड़ गई। अमर का यहां आना उसे कुछ भी समझ में नहीं आया। उसने दरवाजा खोला। डिपार्टमेंट के अन्दर प्रविष्ट हुई। चुपचाप जाकर वह अमर के पीछे खड़ी हो गई। अमर हरे रंग की मैक्सी को अलग किए उस पर हाथ रखे हुए था। आखिर इस मैक्सी के अतिरिक्त उसे और कोई मैक्सी पसंद नहीं आई। उसने इस मैक्सी में टांके हुए मूल्य के कार्ड को देखा तो वन्दना की दृष्टि ने भी मूल्य को पढ़ लिया। वह चुपचाप पीछे सरक गई। अमर मैक्सी पैक करने लगा। वन्दना बिल काउण्टर पर पहुंची। उसने अमर की खरीदी हुई मैक्सी का दाम चुकाया। अमर का रंग-रूप काउण्टरमैन को उसने समझा दिया कि यह मूल्य हरे रंग की उस मैक्सी का है जो अमर ला रहा है। काउण्टर मैन बिल की अदायगी पाकर चुप हो गया। फिर वन्दना ने बिल काउण्टर पर खड़े एक नौकर से उसके वस्त्रों का पैकिट कार में रखने को कहा। नौकर पैकिट समेटने लगा तो वन्दना दुकान का द्वार खोलकर कार की ओर बढ़ गई। उसने स्टेयरिंग के समीप कार के द्वार का लॉक खोला। स्टेयरिंग के सामने सीट पर बैठने के बाद उसने हाथ बढ़ाकर

पिछला गेट खोला। नौकर ने सारे पैकिट पिछली सीट पर रख दिए। वन्दना ने गेट बन्द कर दिया। फिर अपनी सीट पर बैठे-ही-बैठे वन्दना ने अपनी ओर के गेट का शीशा नीचे किया, अपनी बाईं ओर के गेट का भी शीशा नीचे किया जिधर अमर बैठता था। फिर उसने हाथ बढ़ाकर सामने के छोटे दर्पण का कोण इस प्रकार बनाया कि पीछे कपड़े की दुकान का निकास द्वार स्पष्ट दिखाई पड़ने लगा। अब वह उसी प्रकार बैठे-बैठे अमर को दुकान से निकलता देख सकती थी, बिना पीछे मुड़े हुए। अनजान बनती हुई वह चुपचाप सामने के दर्पण में अमर को देखती हुई उसकी प्रतीक्षा करने लगी। उसके होंठों पर इस समय शरारत-भरी बड़ी मीठी मुस्कान थी। कुछ समय बाद अमर दुकान के गेट से बाहर निकला। उसके हाथ में वस्त्र का एक पैकिट था। वह तुरन्त गम्भीर हो गई मानो कुछ जानती ही न हो। अमर भी गम्भीर था। कुछ उदास भी था। आकर वह वन्दना के बाएं द्वार की खिड़की पर झुका। फिर अन्दर उसकी ओर झांकते हुए उसने पूछा, ‘वन्दना जी, क्या मैं पूछ सकता हूं कि आपने मेरी खरीदी हुई मैक्सी का दाम अपने पास से क्यों अदा किया?’

‘क्यों?’ वन्दना ने उसे देखते हुए पूरे अधिकार से कहा, ‘क्या मुझे तुम्हारी खरीदी हुई वस्तु का मूल्य चुकाने का कोई अधिकार नहीं है?’ ‘वह तो है लेकिन---’ अमर ने सोचा। तभी अचानक उसे भी एक शरारत सूझी। वह दबे होंठों हल्के-से मुस्करा दिया। फिर बोला, ‘लेकिन आप कहां तक और कब तक मेरे लिए उन वस्तुओं का मूल्य चुकाती रहेंगी जो मैं किसी दूसरे के लिए खरीदता रहूंगा?’ ‘किसी दूसरे के लिए?’ वन्दना ने मानो स्वयं से कहते हुए सोचा। अमर को उसने बहुत ध्यान से देखा। उसके मुखड़े की सारी दबी शरारत गुल हो गई। ‘जी हां।’ अब अमर के लिए वन्दना को मूर्ख बनाने की बारी थी। उसने लापरवाही प्रकट करते हुए कहा, ‘दरअसल यह---’ उसने अपने हाथ के पैकिट की ओर संकेत किया, ‘यह मैंने अपने एक मित्र की बहन के लिए खरीदा है। बहुत प्यार करती है मुझे वह। बहुत अधिक चाहती है।’ अमर ने उसी लापरवाही के साथ अपनी ओर का गेट खोला। फिर अन्दर सीट पर बैठ गया। पैकिट उसने अपनी गोद में रख लिया।
 
वन्दना बहुत गम्भीर हो गई - बहुत उदास। अमर ने मानो उसके सपनों को एक ही झटके में तोड़कर चकनाचूर कर दिया था। उसके किस मित्र की यह कौन बहन उत्पन्न हो गई जिसके विषय में अमर ने आज तक उससे जिक्र नहीं किया था? उसका मन किया कि तुरन्त अमर को धक्का देकर कार से बाहर निकाल दे। उसके मुंह पर वह सारे पैकिट दे मारे जो उसने अभी-अभी उसके लिए कितने प्यार से खरीदे थे। शायद वह ऐसा कर भी देती। नारी सब-कुछ सहन कर सकती है परन्तु उस पुरुष के दिल में किसी पराई नारी का प्यार देखकर कभी सहन नहीं कर सकती जिसे वह प्यार करती है। ‘अब आप चलेंगी भी या फिर मार्केट में कोई तमाशा बनाने का विचार है?’ अमर ने वन्दना के इरादों को भांपते हुए कहा परन्तु वास्तविकता नहीं खोली। वन्दना की बेरुखी देखकर उसे आनन्द आने लगा था। वन्दना ने अनिच्छुक होकर कार आगे बढ़ा दी। मार्केट नहीं होता तो वह वास्तव में यहां एक तमाशा बनाने से कभी नहीं चूकती। आते-जाते लोगों के अतिरिक्त सामने का दुकानदार भी क्या कहता? अभी-अभी दोनों उसकी दुकान में कितने प्यार से खरीदारी कर रहे थे और अब बाहर जाकर झगड़ा कर रहे हैं। वन्दना की उदासीनता और बढ़ गई।

गला अन्दर-ही-अन्दर सूखने लगा। दिल के अन्दर प्यार की जलन का एहसास उसने पहली बार किया था। इसलिए दिल में उठती टीस पर काबू पाना कठिन हो गया। फिर भी काबू पाने के प्रयत्न में वह अपने निचले होंठ के किनारे को अन्दर दबाकर दांतों द्वारा काटने लगी। परन्तु जब दिल की चुभन तब भी कम नहीं हुई तो उसकी पलकें भीग गईं। उसने अमर को नहीं देखा। परन्तु अमर उसे देख रहा था, कनखियों से। उसके जीवन का यह पहला प्यार था इसलिए वन्दना की स्थिति देखकर उसे आनन्द भी आ रहा था और तरस भी। उसने कुछ देर और खामोश रहना उचित समझा। वंदना की तड़प में उसके प्रति कितना प्यार है? कुछ ही दूर बाद वन्दना ने उस सड़क पर कार मोड़ दी जो दुर्गापुर गांव को वापस जाती थी तथा जिधर से वह दोनों शहर आए थे। इस सड़क पर आते ही वन्दना ने कार की गति अचानक इतनी तेज कर दी मानो तुरन्त ही दुर्गापुर पहुंच जाना चाहती हो - या फिर वह कोई दुर्घटना करने पर अचानक तुली बैठी हो। ‘आप इधर कहां चल रही हैं?’ अमर ने कहा, ‘इधर तो हम गांव वापस जा रहे हैं।’

वंदना ने तुरन्त ब्रेक पर अपना पैर जमा दिया कार के पहिए चीख पड़े। कार एक झटके से रुक गई। पीछे से गर्द का एक गुब्बार उड़कर सामने आया और फिर फैलकर हवाओं में लुप्त हो गया। वंदना ने पलटकर अमर को देखा - कुछ घूर कर। अमर का दिल धड़क गया। वंदना से मजाक करके उसने कोई अनुचित काम तो नहीं किया? वन्दना अन्दर ही अपने दर्द भरे क्रोध की आग में इस प्रकार जल रही थी कि उसने अमर के मुखड़े की चिंता पर ध्यान नहीं नहीं दिया। उसने तड़पकर कहा, ‘हां, मैं गांव ही वापस जा रही हूं। तुम नहीं जाना चाहते तो मत जाओ। यहीं उतर जाओ, अभी और इसी समय। ऐसा न हो कि तुम्हारे मित्र की बहन तुम्हें मेरे साथ देख ले।’ वन्दना ने हाथ बढ़ाकर पीछे से वस्त्रों के पैकिट उठाना चाहे परन्तु उसके नन्हें हाथ में केवल एक ही पैकिट आया। पैकिट उठाकर उसने कार के अन्दर ही अमर के मुंह पर मारते हुए कहा, ‘यह लो, इन कपड़ों का पहनकर तुम उससे मिलने जाओगे तो वह और दीवानी हो जाएगी।’ ‘अरे-अरे!’ अमर ने अपना बचाव करना चाहा परन्तु पैकिट उसके मुखड़े पर लग चुका था। पैकिट को उसने गोद में गिरने के बाद संभाल लिया।

वन्दना ने अमर की चिंता नहीं की। हाथ बढ़ाकर वह पीछे की सीट से दूसरा पैकिट उठाने लगी। पैकिट उठाते हुए उसने कहा, ‘इन कपड़ों में से कुछ अपने मित्र को भी दे देना ताकि उसे भी तुमसे कोई शिकायत नहीं रहे।’ उसने क्रोध में यह पैकिट भी अमर के मुंह पर दे मारा। ‘लेकिन---’ अमर ने इस पैकिट को भी अपनी गोद में संभालकर अपनी सफाई देनी चाही। बात यहां तक बढ़ जाएगी उसने जरा भी नहीं सोचा था। वन्दना के दिल में उठी टीस अब उसे चुभने लगी। परन्तु वन्दना ने उसे कुछ कहने का अवसर नहीं दिया। वह पीछे से एक पैकिट और उठाने लगी। बात जारी रखते हुए उसने उसी क्रोध में कहा, ‘यह सारी ही वस्तुएं तुम साले-बहनोई एक-दूसरे में बांट लेना। यह लो।’ वन्दना ने इस बार फिर अमर के मुखड़े पर पैकिट पटक देना चाहा। उसका स्वर कांपने लगा था। गला भर्रा रहा था। शायद वह रो पड़ना चाहती थी। परन्तु इस बार अमर ने अपने मुंह पर पैकिट लगने से पहले ही हाथों द्वारा रोककर थाम लिया। उसने कहा, ‘वन्दना!’ प्यार के जाने किस बहाव में आकर अमर के मुंह से वन्दना का खड़ा नाम निकल गया। वन्दना चौंककर

क्षण-भर के लिए रुक गई। परन्तु फिर उसने दोबारा शक्ति लगाकर अमर के हाथ में पैकिट छुड़ा लेना चाहा ताकि अमर के मुंह पर यह पैकिट अवश्य दे पटके परन्तु उसके क्षण भर के रुक जाने से ही अमर को अपनी बात कहने का अवसर मिल चुका था। उसने तुरन्त कहा, ‘वन्दना, वह सब मैंने तुमसे मजाक में कहा था।’ वन्दना के हाथ अमर के हाथ से पैकिट छुड़ाते-छुड़ाते रह गए। पकड़ जैसी थी, जहां थी वहीं स्थिर रह गई। अपने कानों पर मानो उसे विश्वास नहीं हुआ। उसने मस्तक पर बल डालकर अमर को बहुत ध्यान से देखा। ‘मैं ठीक कह रहा हूं वन्दना, मेरा मतलब---वन्दना जी।’ अमर ने बात सुधारकर कहा, ‘जो मैक्सी मैंने ली है उसे मैं केवल आपको ही भेंट देना चाहता हूं। परन्तु आपने इस गरीब को उसका मूल्य भी चुकाने नहीं दिया।’ वन्दना तब भी अमर को उसी प्रकार देखती रही। परन्तु उसके मस्तक के बल अवश्य कम हो गए। ‘आप ही सोचिए-’ अमर ने फिर कहा, ‘जब से मैं दुर्गापुर आया हूं केवल एक ही रात गांव के चाचा के यहां ठहरा था। उनके पास न कोई लड़का है न लड़की। फिर मेरी मित्रता यहां होती किससे? उसके अगली सुबह ही से तो

मैंने आपके यहां नौकरी कर ली है। दिन-रात आपके ही साथ तो छाया बनकर रहता हूं। आखिर आपने आज तक मुझे गांव में या कहीं अकेले जाते कभी देखा है?’ वन्दना का मस्तक ढीला पड़ गया। उसकी आंखों के आंसू मोती बनकर चमक उठे। होंठों पर एक मुस्कान आते-आते रह गई। पैकिट उसने वापिस लेकर अपनी गोद में डाल लिया। फिर सीधे बैठकर उसने अपना बांया हाथ स्टेयरिंग पर रखा। फिर अपने दाहिने हाथ की कोहनी मोड़ते हुए उसने बगल में कार की खिड़की पर टिका दी, कोहनी को खिड़की से थोड़ा बाहर निकालकर। अपनी गर्दन को बाहिने मोड़ते हुए उसने अपना सिर थोड़ा नीचे झुकाते हुए ठोड़ी दाहिने कंधे के कोने पर टेक दी और फिर पलकें उठाकर वह खिड़की द्वारा बाहर के संसार में देखने लगी - बहुत ही खामोशी के साथ। ‘आप मुझसे नाराज है क्या?’ अमर ने वन्दना को खामोश देखकर पूछा। वन्दना ने कोई उत्तर नहीं दिया। अमर की ओर उसने दृष्टि उठाकर देखा तक नहीं। दूर क्षितिज में देखती वह उसी प्रकार खामोश रही।

‘आपने मेरी बात का उत्तर नहीं दिया।’ अमर ने फिर कहा। उसके स्वर में पश्चाताप का दर्द था। बात जारी रखते हुए उसने पूछा, ‘क्या मैं यह समझ लूं कि मेरे एक छोटे-से मजाक के कारण अब आप मुझसे कभी बात नहीं करेंगी?’ वन्दना ने अपना मुखड़ा उठाकर अमर को देखा। वन्दना की पलकें अब भी भीगी हुई थीं। आंखों के किनारे अब भी आंसुओं से तर हो रहे थे। अमर से वन्दना के यह आंसू देखे नहीं गए। उफ! कितना दर्द था उसकी नीली आंखों की नदी में। यदि उसकी कही बात मजाक न होकर सत्य होती तो वन्दना का दिल ही टूट जाता। स्पष्ट प्रकट था कि वन्दना के पहले प्यार ने उसे धोखा नहीं दिया था। धोखा दिया था उसे प्रकृति ने, रोहित की हत्या का बहाना लेकर। ऐसी स्थिति में वह अमर से धोखे की आशा कैसे कर सकती थी। जिस हाल कि उसने अपना भविष्य उसके सहारे छोड़ रखा था। अमर ने उसी पश्चात्तापी स्वर में कहा, ‘मुझे क्षमा कर दीजिएगा। अब मैं आपसे कभी ऐसा मजाक नहीं करूंगा। मैं भूल गया था कि मुझे आपसे मजाक करने का कोई अधिकार नहीं है।’ ‘क्यों तुमने मुझसे ऐसा मजाक किया था?’ वन्दना ने सीधे बैठकर उसकी आंखों में झांका।

‘यूं ही, बस मन के अन्दर स्वयं ही एक इच्छा उत्पन्न हो गई थी।’ अमर ने कहा। ‘फिर भी इच्छा के पीछे कोई कारण तो होगा ही?’ वन्दना ने कुरेद की। ‘शायद----’ अमर ने सोचते हुए कहा, ‘अपने मजाक की प्रतिक्रिया देखकर आपके प्यार की थाह जानना चाहता था।’ ‘थाह मिली?’ वन्दना ने पूछा। ‘आपके प्यार की कोई थाह नहीं।’ अमर ने कहा, ‘आप सचमुच मुझे प्यार करती हैं।’ वन्दना खामोश हो गई। सोचने पर विवश हो गई कि क्या वह वास्तव में अमर को बहुत प्यार करती है? यदि वास्तव में ऐसा है तो वह अमर की संगति में रहकर भी रोहित के विचारों में क्यों खो जाती है? क्या यह अमर के प्यार का अपमान नहीं है? उसके साथ वह धोखा नहीं कर रही है? जिस प्रकार अमर की संगति में रहने के पश्चात् वह रोहित के विचारों में खो जाती है उसी प्रकार संगति में रहकर यदि अमर किसी पराई लड़की के विचारों में तल्लीन हो जाए तो उस पर क्या बीतेगी? अमर के प्यार की गहराई का अनुमान लगाकर वन्दना अपनी ही दृष्टि में गिरने लगी

तो उसने तय कर लिया कि वह अपने दिल और दिमाग को अमर के अधिकार में इस प्रकार सुपुर्द कर देगी कि अमर उसकी एक-एक सांस पर छा जाएगा। तब दिन-रात वह अमर के ही सपनों में खोई रहेगी। अनिच्छुक होकर भी जब रोहित उसे याद आएगा तो वह उसके विचारों में तल्लीन न हो सकेगी। परन्तु ऐसा होगा किस प्रकार? किस प्रकार वह रोहित को सदा के लिए भूलकर दिन-रात के सपनों में केवल अमर को ही देखने में सफल होगी? रोहित उसका पहला प्यार था । रोहित की बांहों में रहकर उसने प्यार के अगणित सुन्दर सपने देखे थे, परन्तु जो भाग्य को स्वीकार था वह तो होकर ही रहा। ऐसी स्थिति में वन्दना के लिए रोहित को भूलना आसान काम नहीं था परन्तु असम्भव भी नहीं था क्योंकि अब रोहित इस संसार में नहीं था। और जो इस संसार में नहीं रहते उनकी याद में तड़पने तथा आंसू बहानेवाला समाज के साथ मिलाकर आगे नहीं बढ़ पाता है। वन्दना दिल की गहराई से अमर को पहले ही अपना बना चुकी थी। अब उसने स्वयं भी दिल की गहराई से अमर की बन जाने का दृढ़ निश्चय कर लिया। ‘अब आप दुर्गापुर चलेंगी या---’ अमर ने उसे खोया देखा तो पूछा।

वन्दना चौंक पड़ी। फिर हल्के से मुस्करा दी। उसने अपनी गोद में पड़ा पैकिट पीछे सीट पर फेंका तो अमर ने भी अपनी गोद के सारे पैकिट उठाकर पीछे की सीट पर डाल दि। वन्दना ने कार बैक की और फिर वापसी की ओर चलते हुए कुछ दूर बाद कार ‘फिरदौस’ के रास्ते पर मोड़ दी। फिर इत्मीनान के साथ कार चलाती हुई वह सीट पर पीछे पीठ टेककर आराम से बैठ गई। ‘वैसे---’ अमर ने कुछ देर बाद थोड़ा सकुचाते हुए पूछा, ‘एक बात पूछने का अधिकार मिल सकता है?’ ‘तुम्हें मुझसे हर बात पूछने का अधिकार है। बातें पूछने का क्या, तुम्हें आज्ञा देने का भी पूरा अधिकार है।’ वन्दना ने कहा, ‘पूछो, क्या पूछना चाहते हो?’ ‘यही कि---’ अमर एक क्षण रुका। फिर बोला, ‘क्या इस गरीब ने आपके लिए अपनी पसन्द की मैक्सी लेकर कोई अपराध या अनुचित बात कर दी थी जिसे स्वीकार न करते हुए आपने मुझे बिना बताए ही इसकी कीमत चुपचाप बिल-काउण्टर पर चुका दी?’ ‘नहीं, ऐसी बात नहीं हे।’ वन्दना ने तुरन्त कहा, ‘बल्कि दरअसल मैं नहीं चाहती थी कि तुम अपनी गाढ़ी कमाई का पैसा इतनी आसानी से उस जैसी बहुमूल्य वस्तु पर खर्च

करो। कम-से-कम अभी नहीं चाहती। बाद की बात और हे। जब मैं तुमसे स्वयं ही नई-नई ऐसी फरमाइशें करूंगी कि तुम पूरा करते-करते थक जाओगे।’ बाद की बात? अमर ने वन्दना की बात पर ध्यान दिया तो उसकी आंखों में एक सपना जागा। वन्दना उसके साथ मिलकर अपने प्यार को साकार रूप देने का निर्णय पहले ही किए बैठी है। अमर को इसके अतिरिक्त चाहिए भी क्या था? ‘अभी यदि तुम मुझे कुछ देना ही चाहते हो तो इतनी बहुमूल्य वस्तु मत दो, कोई छोटी-मोटी वस्तु दे देना - बतौर तोहफा, या निशानी के तौर पर कोई ऐसी वस्तु जिसे मैं सदा अपनी आंखों के सामने रखकर दिन-रात तुम्हारे विचार में खोई रहूं। वैसे एक बात याद रखना - तोहफा देने या लेने का आनन्द तब ही है जब तोहफा लेनेवाले को मालूम ही न हो कि उसे क्या मिल रहा है?’ अमर खामोश हो गया। सोच में डूब गया कि वन्दना को वह ऐसी वस्तु तोहफे में क्या दे जो उसे पसन्द आ जाए तथा जो हर क्षण उसकी आंखों के सामने रहकर उसे उसकी याद दिलाती रहे? तीन

वन्दना ने जब अपनी कार ‘फिरदौस’ की चारदीवारी के अन्दर एक ओर रंग-बिरंगी कारों की पंक्ति में पार्क की तो शाम ढल रही थी। क्षितिज पर दूर-दूर तक बादलों के टुकड़े छिटके हुए थे जिनके होंठों पर डूबते सूर्य की लालिमा मुस्करा रही थी, शायद रात के समय आने वाले तूफानी वातावरण से अनभिज्ञ जिसका अभी किसी को भी अनुमान नहीं था। फिरदौस की वातानुकूल इमारत के अन्दर प्रविष्ट होकर वन्दना अमर को लिए सबसे पहले रिसेप्शनिस्ट के काउण्टर पर पहुंची। वहां उसने दो अलग-अलग ‘सिंगिल’ कमरों की मांग की। परन्तु सिंगिल रूम एक भी नहीं मिल सका। सब कमरे पहले ही बुक थे। फिरदौस की रजत-जयंती तो दूर की बात थी, यहां यूं भी आजकल विदेशी यात्रियों का मेला-सा लगा रहता था क्योंकि यात्रियों के लिए शहर और उसके आस-पास के दृश्य देखने का सबसे अच्छा मौसम यही था। अब? वन्दना सोच में पड़ गई। परन्तु जब वन्दना को पता चला कि होटल में एक डबल-रूम खाली है तो उसने इसे लेने में जरा भी देर नहीं की। ऐसा न हो कि यह कमरा भी हाथ से निकल जाए। कमरा लेने के बाद दोनों एक ही कमरे में कैसे रहेंगे यह बात उसने बाद के लिए छोड़ दी। अमर से उसे किसी भी प्रकार का कोई भय नहीं

था। आखिर आज नहीं तो कल, कभी-न-कभी तो अवश्य ही उसे अमर के साथ हर क्षण बिताना ही था, उसके सामने खुलकर आना ही था, उसकी बांहों में समाकर उसकी सांसों में रचना ही था। फिर आज की केवल एक ही रात एक कमरे में उसके साथ अलग-अलग पलंग पर सोने में हर्ज ही क्या था? कमरे की चाभी लेकर उसने एक वेटर को अपने साथ अपनी कार के पास ले जाना चाहा ताकि कार से सारा सामान निकालकर वह उसके कमरे तक पहुंचा दे। परन्तु तभी अमर ने उसे मना करते हुए कहा, ‘आप क्यों कष्ट कर रही हैं? कार की चाभी मुझे दीजिए और आप कमरे में पहुंचिए। मैं सारा सामान कार से निकलवाकर आ रहा हूं।’ वन्दना ने एक क्षण सोचा। फिर कार की चाभी अमर को थमाते हुए उसने कहा, ‘ठीक है, मैं चल रही हूं। तुम सामान निकलवाकर लाओ।’ वन्दना होटल के एक गलियारे से होकर लिफ्ट की ओर बढ़ गई। उसका कमरा होटल की सबसे ऊंची मंजिल पर था, इमारत के एक किनारे। अमर कार के समीप पहुंचा। वेटर द्वारा उसने सारा सामान उठवाया - वन्दना का सूटकेस तथा आज के खरीदे हुए कपड़ों तथा अन्य वस्तुओं के पैकिट। अमर ने कार लॉक की और जब वेटर होटल के प्रवेश द्वार की ओर बढ़ा तो अमर भी उसके पीछे-पीछे चल पड़ा। होटल के अन्दर

लिफ्ट से पहले वही गलियारा था जिधर से वन्दना अपने कमरे के लिए गई थी। अचानक अमर की दृष्टि गलियारे में एक आभूषणों की दुकान पर पड़ी। शो-केस में अनेक हीरे-जवाहरात से जड़े सोने के सेट सजे रखे जगमगा रहे थे। अगल-बगल साधारण तथा असाधारण सोने की अंगूठियां भी रखी हुई थीं। अंगूठी? अमर का मस्तक अचानक ही ठनक गया। वन्दना की बातें उसे याद आ गईं जो उसने उससे उपहार लेने के विषय में कहीं थीं। वन्दना ने कहा था - अभी यदि तुम मुझे कुछ देना ही चाहते हो तो इतनी बहुमूल्य वस्तु मत दो, कोई छोटी-मोटी वस्तु दे देना - बतौर तोहफा या निशानी के तौर पर कोई ऐसी वस्तु जिसे मैं सदा अपनी आंखों के सामने रखकर दिन-रात तुम्हारी याद में खोई रहूं।’ अमर के बढ़ते पग धीमे पड़ गए। उसने अपने साथ सामान लेकर चलते वेटर को भी आवाज देकर रोक दिया। फिर वह दो पग मुड़कर आभूषणों की दुकान के शो-केस के सामने जा खड़ा हुआ। आभूषणों के साथ उनका मूल्य भी लिखा हुआ था। अमर ने सोचा - वन्दना को उपहार या बतौर निशानी देने के लिए अंगूठी से अच्छी क्या वस्तु हो सकती है? अंगूठी पहनने के बाद अंगूठी का स्वर्ण हर क्षण उसे याद दिलाता रहेगा कि यह किसकी दी हुई निशानी है। इस

प्रकार उसके विचारों से कभी आजाद नहीं हो सकेगी। अमर ने अपनी पॉकेट को एक बार यहां भी टटोला। फिर दुकान के शीशेदार द्वार में प्रविष्ट हो गया। कुछ देर बाद जब अमर दुकान से बाहर निकला तो उसके होंठों पर एक भेद-भरी मीठी मुस्कान थी। वेटर को उसने चलने की आज्ञा दी और फिर उसके साथ-साथ लिफ्ट की ओर बढ़ गया। जब अमर अपने कमरे में प्रविष्ट हुआ तो वन्दना यात्रा तथा शॉपिंग की थकान दूर करने के लिए एक सोफे पर धंसी तथा सामने की मेज पर पैर फैलाए आराम कर रही थी। अमर को देखने के पश्चात् वह थकावट के कारण उसी प्रकार बैठी रही। अमर के पीछे-पीछे सामान लिए वेटर भी कमरे में प्रविष्ट हुआ था। उसने कमरे के एक कबर्ड के अन्दर सारा सामान ठीक से रख दिया। कबर्ड के बाहर पलड़े पर मानव कद का दर्पण जड़ा हुआ था।
 
वेटर ने कमरा छोड़ने से पहले पूछा, ‘इस समय कुछ खाना है साहब?’ ‘हां-’ वन्दना ने कहा, ‘दो सेट कॉफी ले आना।’ अमर ने कमरे का निरीक्षण किया। कमरा अच्छा-खासा और बड़ा था - वातानुकूल। दीवार के कोने-कोने तक

कालीन बिछी थी। सोफा सेट, श्रृंगार मेज अतिरिक्त, मेज कुर्सी आदि सभी आवश्यकताओं की वस्तुएं उपस्थित थीं। कमरे के बाद एक बालकनी थी जिसका द्वार ताजी हवा प्राप्त करने के लिए वन्दना पहले ही खोल चुकी थी। अमर ने वन्दना के आराम में बाधा डालना उचित नहीं समझा। वह बालकनी पर निकल आया। सहसा दरवाजे पर किसी ने थपकी दी। वन्दना ने अपने पैरों को सामने की मेज पर से हटाकर नीचे करते तथा ठीक से सोफे पर बैठते हुए कहा, ‘कम इन।’ उसे ज्ञात था कि इस समय कमरे में आने वाला कौन हो सकता है। दरवाजा खुला। सामने वेटर कॉफी की ट्रे लिए उपस्थित था। अन्दर आकर उसने वन्दना के सामने वाली मेज पर ट्रे रखी तो अमर भी बालकनी छोड़कर उसके सामने आ बैठा। दोनों कॉफी पी रहे थे कि अचानक कमरे में रखे फोन की घंटी बजी। वन्दना ने कॉफी का प्याला तश्तरी में रखने के बाद टेलीफोन रिसीव किया। वह बोली, ‘यस?’ ‘आपको आज के फंक्शन के लिए कोई टेबल तो रिजर्व नहीं करानी है?’ कॉल होटल के मैनेजर की ओर से आया था। उसने कहा, ‘हम अपने होटल में ठहरे यात्रियों को ऐसे रिजर्वेशन में मिलना प्राथमिकता देते हैं।’

‘क्या समय पर हॉल के अन्दर पहुंचने के बाद टेबल का मिलना कठिन होगा?’ वन्दना ने पूछा। ‘कुछ कहा नहीं जा सकता कि बैठने के लिए कुर्सियां भी मिलेंगी। क्योंकि आज होटल का विशेष उत्सव है।’ मैनेजर ने कहा, ‘यदि आपको फंक्शन में भाग लेना है तो अभी से टेबल रिजर्व करा लेने में सुविधा होगी।’ ‘ठीक है।’ वंदना ने कहा, ‘आप दो कुर्सियों के साथ एक टेबल रिजर्व कर दें।’ ‘थैंक्यू मैडम।’ मैनेजर ने कहा। फिर दोनों की ओर से फोन कट गया। कॉफी पीने के बाद वंदना की ही थकावट दूर नहीं हुई बल्कि अमर भी ताजगी महसूस करने लगा। फिर कुछ देर के लिए वह दोनों बालकनी पर चले आए। ‘लगता है आज रात काफी वर्षा होगी।’ वन्दना ने ठण्डी सांस लेकर कहा। ‘जी हां।’ अमर उससे सहमत हुआ। उसने कहा, ‘बल्कि मुझे तो ऐसा लगता है मानो आज रात कोई तूफान आने वाला है।’

तूफान? वन्दना का दिल हल्के से कांप गया। उसने अमर को ध्यान से देखा। परन्तु अमर उसकी ओर से निश्चिंत था। अमर ने अपनी बात अनजाने में कही थी इसलिए वह इस बात की ओर से निश्चिंत हो गई। वन्दना को ‘फिरदौस’ की रजत-जयंती के फंक्शन में भाग लेना था इसलिए उसने स्नान करते समय अपनी लटों को पानी से भीगने से बचाए ही रखा। भीगने के बाद लटों को सूखने में समय लग सकता था। स्नान के बाद जब वह स्नान कक्ष से बाहर निकली तो उसके शरीर के ऊपर टावल का एक गाउन था जिससे उसका शरीर पूर्णतया ढंका हुआ था। कमरे में आकर वह श्रृंगार मेज के सामने बैठी तो अमर अपने कपड़े निकालकर स्नान कक्ष में प्रविष्ट हो गया। दरवाजा अन्दर से बन्द करके वह स्नान करने लगा तो वन्दना भी निश्चिंत होकर रात के फंक्शन में जाने की तैयारी पूरी सुन्दरता के साथ करने लगी। स्नान करने के बाद अमर ने आज शाम के प्रोग्राम में पहनने वाली पैंट तथा कमीज आदि पहनी। फिर स्नान-कक्ष से जब वह बाहर निकला तो वन्दना उसकी पसन्द की खरीदी हुई मैक्सी को पहनकर श्रृंगार मेज के सामने बैठी अपने होंठों पर लिपस्टिक लगाती हुई अपनी असीम सुन्दरता को अंतिम टच दे रही थी। बाहर वर्षा का समां

था परन्तु अमर को लगा मानो वन्दना की सुन्दरता की बिजली अभी से ही सारे होटल पर गिर पड़ना चाहती हो। अमर के बढ़ते पग जहां-तहां रुक गए। आंखें वन्दना पर इस प्रकार चिपक गईं मानो वन्दना की सुन्दरता मकनाती सी थी। वन्दना को अपनी पसन्द की मैकसी में देखकर उसे अत्यधिक प्रसन्नता हुई। ऐसे महत्त्वपूर्ण अवसर पर भी वन्दना ने उसकी पसन्द की मैक्सी पहनकर उसके प्यार की लाज रख ली थी। वर्ना वन्दना के पास तो पहले ही विदेश से लाई एक-से-एक बढ़कर मैक्सी थीं।

‘क्या देख रहे हो?’ वन्दना ने अपने होंठों पर लिपस्टिक लगाने के बाद दर्पण में उसे देखते हुए पूछा। अमर कबर्ड छोड़कर वन्दना के समीप आया - बिल्कुल समीप। उसने वन्दना की आंखों में झांका। पूछा, ‘बता दूं?’ ‘हां-हां।’ वन्दना ने बैठे-बैठे आंखें ऊंची करके उसकी ओर देखते हुए कहा। ‘इस समय आप इस वस्त्र में बहुत अधिक सुन्दर लग रही हैं।’ अमर ने एक गहरी सांस ली। वन्दना हल्के से मुस्कराकर खड़ी हो गई। नारी सुन्दर हो या कुरूप, अपनी प्रशंसा सुनकर फूली नहीं समाती है। परन्तु वन्दना पर अमर की बात का अधिक प्रभाव नहीं पड़ा। अमर ने तो उसे इस प्रकार बना-संवरा अपने जीवन में पहली बार देखा था। उसने अमर से कहा, ‘तुम्हारी पसन्द की मैक्सी है ना, इसलिए सुन्दर तो लगूंगी ही। अब तुम भी जल्दी से तैयार हो जाओ। फिर देखना तुम भी इस लाल कोट में कितने अच्छे लगोगे।’ अमर मुस्कराकर कबर्ड की ओर दोबारा बढ़ गया। वन्दना पूरी तरह तैयार हो चुकी थी। उसने सोचा, वह अमर के कोट के कॉलर में टांकने के लिए बाहर लॉन से एक

फूल क्यों न तोड़कर ले आए? इसी बीच अमर भी अपने कपड़े पहनकर तैयार हो जाएगा। परन्तु उसने तय किया कि वह अमर के कोट में टांकने के लिए गुलाब का कोई भी रंग का फूल अवश्य ले आएगी परन्तु सफेद फूल हरगिज नहीं लाएगी। ऐसा उसने अपने दिल को प्यार का सच्चा प्रमाण देने के लिए सोचा था, वह प्यार जो वह अब अमर से कर रही थी। उसने अमर से कहा, ‘तुम तैयार होओ मैं अभी आती हूं।’ कुछ देर बाद उसके कमरे का दरवाजा खुला। अमर कबर्ड के दर्पण के सामने से हटने ही वाला था कि उसने पलटकर देखा दरवाजे में वन्दना प्रविष्ट हो रही थी, बिल्कुल परियों के समान मुस्कराती, बल खाती, इस प्रकार मानो फर्श पर काली बिछी होने के पश्चात् उसके नन्हें पैरों में लोच न आए। वन्दना के हाथ में गुलाब का एक सुन्दर फूल था - पीला गुलाब, अमर के पैंट के क्रीम रंग से काफी मेल खाता हुआ। गुलाब भी वन्दना के समान ही मुस्करा रहा था। अमर ने सोचा, वन्दना को अंगूठी भेंट करने के लिए इससे अच्छा समय और कोई नहीं हो सकता। भेद भरे ढंग में वह मुस्कराया। अंगूठी भेंट करने से पहले ही उसका दिल प्रसन्नता से अन्दर-ही-अन्दर उछलने लगा। वन्दना स्वयं सरप्राइज पाकर प्रसन्नता से खिल उठेगी।

उसने अंगूठी निकालने के लिए अपने कोट की पॉकेट में हाथ डालना चाहा, परन्तु तभी वन्दना का खिला मुखड़ा अचानक गम्भीरता में परिवर्तित देखकर वह चौंक गया। वन्दना के मुखड़े की सारी मुस्कान इस प्रकार गुम हो गई थी मानो किसी खिले हुए फूल को अचानक पतझड़ के झोंके ने अपनी लपेट में लेकर मुर्झा दिया हो। उसके बढ़ते पग जहां-तहां रुक गए - अमर से कुछ ही दूरी पर। उसके हाथ का पीला गुलाब वहीं छूटकर कालीन पर गिर पड़ा। अमर कुछ समझा नहीं। बल्कि वन्दना की अचानक बदली हुई स्थिति को देखकर वह चिंतित होते हुए अपने कोट की पॉकेट से अंगूठी निकालना भूल गया। उसने वन्दना को ऊपर से नीचे तक देखा। वन्दना एक मूर्ति समान खामोश थी। उसने वन्दना के समीप पग बढ़ाते हुए पूछा, ‘क्या बात है वन्दना जी? आप अचानक इस कदर गम्भीर क्यों हो गईं? आपका स्वास्थ्य तो ठीक है ना?’ ‘यह---’ वन्दना ने बड़ी कठिनाई से कांपते स्वर में कहना चाहा परन्तु फिर खामोश हो गई। उसकी दृष्टि अमर के कोट के कॉलर पर जमी हुई थी। अमर के लाल कोट के कॉलर में एक गुलाब टंका हुआ था - सन सफेद गुलाब। उसने गर्दन झुकाकर अपने कोट

के कॉलर में लगे फूल को देखा। फिर आश्चर्य से पूछा, ‘यह क्या?’ वह वन्दना की बदली हुई स्थिति का कारण समझ नहीं सका। ‘यह फूल---’ वन्दना ने सफेद गुलाब को देखते हुए फिर कहना चाहा, ‘परन्तु दोबारा खामोश हो गई। उसके दिल के अन्दर चोर था इसलिए वह सोच रही थी कि अमर को कैसे ज्ञात हुआ कि रोहित अपने कोट के कॉलर में सदा सफेद ही गुलाब लगाया करता था? जहां तक लाल कोट का प्रश्न था, अमर को लाल कोट पर रोहित की पसन्द का सन्देह हो सकता था क्योंकि कोट को आज दुकान से खरीदते समय वह बिना अधिकार ही रोहित के विचारों में खो गई थी, इस प्रकार कि उसे अपने समीप खड़े अमर तथा दुकान का भी ध्यान नहीं रह गया था। पैंट को खरीदते समय भी वह क्रीम रंग के पैंट पर अंगुलियां रखकर क्षण भर के लिए गम्भीर होती हुई अवश्य खो गई थी इसलिए यदि अमर ने उस पर किसी प्रकार का सन्देह किया होगा तो कोई अनुचित बात नहीं की होगी। यही बात पतली लाल रंग की सीधी धारीदार क्रीम रंग की टाई पर भी लागू हो सकती थी, यद्यपि इस टाई में तथा रोहित की टाई में डिजाइन का अन्तर था, परन्तु अमर को रोहित की सफेद गुलाब वाली

पसन्द का कैसे ज्ञान हुआ, वन्दना कोई अन्दाजा नहीं लगा सकी। ‘आप इस फूल के विषय में सोच रही हैं?’ अमर ने वन्दना को इतनी देर तक चिंतित तथा खामोश देखा तो पूछना ही पड़ा। ‘---’ वन्दना ने होंठों से कुछ नहीं कहां सूखे गले में थूक अटका हुआ था। थूक घोंटने के पश्चात् जब वह कुछ न कह सकी तो उसने ‘हां’ के संकेत पर अपना सिर धीरे-से हिला दिया। ‘यह फूल मुझे कपड़ों के उस दुकानदार ने दिया था जहां से आज हमने ढेरों कपड़े लिए हैं।’ अमर ने भोलेपन से कहा। ‘दुकानदार ने?’ वन्दना मानो कुछ समझी नहीं।? ‘जी हां - सोवेनीअर (स्मारिका) के रूप में। क्यों?’ अमर ने आश्चर्य से पूछा। ‘कुछ नहीं, कुछ भी नहीं।’ वन्दना ने एक गहरी सांस ली। मुस्कराई। फिर दृष्टि नीचे बिछा दी जहां उसके कदमों के समीप कालीन पर उसका लाल पीला गुलाब पड़ा हुआ था।
 
अमर ने भी नीचे पड़े गुलाब को देखा। फिर बोला - ‘समझा।’ उसके नादान दिल ने मानो वन्दना के दिल की बात समझ ली थी। उसने झुककर कालीन पर से पीला गुलाब टहनी द्वारा पकड़कर उठा लिया। फूल को देखने के बाद उसने वन्दना से कहा - ‘आप मेरे कोट में लगाने के लिए यह फूल बहुत प्रेम से लेकर आई थीं।’ अमन ने अपने हाथ में लिए पीले गुलाब को टहनी द्वारा अंगुलियों में नचाते हुए कहा - ‘परन्तु जब आपने कोट में यह सफेद गुलाब लगा देखा तो आपका मुस्कराता मुखड़ा अचानक ही गंभीर हो गया। क्यों?’ अमर हाथ के गुलाब को अपने नथुनों के समीप लाया। गुलाब ताजा था, सुगंधित। फूल की सुगंध को उसने नथुनों द्वारा दिल की गहराई में उतारा। फिर इसी गुलाब को देखकर बोला - ‘यह तो ताजा गुलाब है - आपके समान बहुत सुन्दर। परन्तु मेरे कोट के कॉलर में जो सफेद गुलाब लगा है ना? यह तो बिल्कुल नकली गुलाब है, सुगंध रहित। पतले रबर फोम का बना हुआ है। सोवेनीअर में मिली वस्तु को स्वीकार करने से इंकार भी नहीं किया जा सकता।’ वन्दना मुस्कराई। वह अमर के और समीप आई। अमर के कोट में लगे सफेद फूल को देखने के बाद उसने कहा, ‘जब असली तथा सुगंधित फूल उपलब्ध हों तो नकली

तथा सुगन्ध रहित फूल का उपयोग निरर्थक होता है।’ वन्दना ने एक हाथ द्वारा अमर के कोट से नकली गुलाब निकाल दिया। इस फूल को उसने अरुचित होकर देखा, मानो दिल को कोई संतोष दे रही हो। रोहित की पसंद को ठुकराकर अमर के लिए अपनी पसन्द को महत्त्व देते हुए मानो वह अपने प्यार का सच्चा सबूत दे रही थी - स्वयं को तथा दिल के संतोष के लिए अमर को भी। फिर उसने वहीं खड़े-खड़े फूल सामने खुले द्वार द्वारा बालकनी के उस पार बाहर फेंक दिया। फिर उसने अमर के हाथ से असली गुलाब लिया। अपने हाथ द्वारा उसने इस फूल को अमर के कोट के कॉलर में लगा दिया। जहां असली फूल द्वारा अमर के लाल कोट की शान बढ़ी वहां अमर के व्यक्तित्व की शान भी वन्दना की आंखों में बढ़ गई। वह एक कदम पीछे हटी। अमर को उसने ऊपर से नीचे तक देखा। आज के सूट में अमर उसे इतना सुन्दर, इतना प्रभावशाली लगा कि वह रोहित का आकर्षण भी भूल गई। उसने अमर की आंखों में झांका। फिर मुस्कराते होंठों से बोली - ‘आओ चलो, हम लॉन में चलकर बैठते हैं। फंक्शन आरम्भ होने में अभी काफी देर है।’

जब वंदना तथा अमर होटल के निकाल द्वार से बाहर निकल कर लॉन के सामने खुले वातावरण में आए तो क्षितिज पर सूर्य की अन्तिम लालिमा का भी कहीं कोई चिह्न नहीं रह गया था। अन्धकार दूर-दूर तक छाया हुआ था। यदि अंधकार कहीं नहीं था तो होटल के आसपास नहीं था। होटल की रजत जयंती के कारण होटल की इमारत रंगीन बल्बों तथा नीआन लाइट्स से इस प्रकार जगमगा रही थी कि अंधकार के बढ़ते पग होटल की चारदीवारी से काफी दूर ही ठहर गए थे। सुन्दर क्यारियों तथा फुलवारियों से सुसज्जित हरे-भरे लॉन में सदाबहार वृक्षों पर भी छोटे-छोटे रंगीन बल्ब ऐसे सजे हुए थे। सदाबहार की नन्ही-नन्ही कतरन जैसी पत्तियों के मध्य यह रंगीन बल्ब ऐसे लग रहे थे मानो उनके अन्दर फूल खिलकर मुस्करा रहे हों। लॉन के बीच पानी के एक छोटे से टैंक में पानी का फव्वारा भी था - रंगीन और झागदार फव्वारा। हवाओं का बहाव और बढ़ गया था इसलिए फव्वारे का पानी अपनी धारा बदलकर कभी-कभी उड़ते हुए उन यात्रियों तक भी चला जाता था जो फव्वारे से कुछ दूर लॉन चेयर्स पर बैठे व्हिस्की या बीयर पीते हुए आपस में बातें करके आज की सुन्दर शाम का पूरा आनन्द उठा रहे थे। अशोक के तने की छाया में धुंध का सहरा लेकर बैठे अनेक नवजवान जोड़े अपने-अपने

रोमांस में डूबे हुए थे। कुछेक विदेशी नवयुवक-नवयुवतियों के जोड़े होटल के ऐसे विदेशी वातावरण से प्रभावित होकर इसे विदेश समझ बैठे थे और खुले-आम एक-दूसरे का चुम्बन ले रहे थे। निकास द्वार के सामने खुले वातावरण में खड़े होकर वन्दना तथा अमर ने लॉन में चारों ओर दृष्टि दौड़ाई। शायद कहीं कोने-कतरे में एक मेज के साथ दो खाली कुर्सियां मिल जाएं। और आखिर उन्हें दो लॉन कुर्सियों के बजाए खाली कुर्सियों के साथ एक मेज दिखाई पड़ ही गई - लॉन के एक किनारे, क्यारियों तथा फुलवारियों के मध्य। दोनों होटल की इमारत के सामने तथा लॉन के बाहर-ही-बाहर उन खाली कुर्सियों की ओर बढ़ गए। परन्तु अचानक अमर के एक पैर तले कुछ आ गया। कोई नर्म-सी वस्तु थी यह। शायद किसी का रूमाल गिर पड़ा हो जिस पर उसका अचानक ही पैर पड़ गया था। जिसका रूमाल गिरा होगा शायद आगे-पीछे या इधर-उधर इसे उठाने के लिए आ रहा होगा, यह सोचकर अमर तुरन्त कुछ उचककर किनारे हट गया। उसने रुककर देखा, वह फूल था, सफेद फूल, फोम का बना नकली फूल, परन्तु देखने में असली। अमर ने इमारत के कोने पर सबसे ऊंची मंजिल की ओर आंख उठाई। कोने पर कमरा उसी का था। उसने चैन की एक

सांस ली। यह फूल उसके कमरे से वन्दना के हाथों ने ही तो फेंका था। वन्दना भी नीचे पड़े फूल को बड़े ध्यान से देख रही थी। इस फूल को उसने घृणा से फेंका था फिर भी जब उसने अमर के जूते द्वारा इस फूल को रौंदी स्थिति में देखा तो जाने क्यों, बिना अधिकार ही उसके मन में एक दर्द-सा उठ गया। उसे ऐसा लगा मानो अमर ने अनजाने में उस फूल को नहीं बल्कि उसके दिल को अपने जूते द्वारा दबाकर सख्ती से रौंद दिया है। जिसे वह अपने तन-मन से प्यार करता है वह उसकी संगति में चलते रास्ते अपने स्वर्गवासी प्रेमी के लिए खो जाती है तो उसे दुःख होता। पुरुष का स्वभाव ही ऐसा है। रोहित उसका प्रेमी होने के अतिरिक्त और था भी क्या? पति होता तब बात अलग होती। मंगेतर बनने के बाद भी यदि वह मरता तो एक सीमा तक अमर उसकी विवशता को समझने का अवश्य प्रयत्न करता परन्तु मरने से पहले रोहित का उससे कोई भी तो ऐसा सम्बन्ध नहीं था जिससे उसके उस प्यार पर आंच आती जो वह अमर से कर रही थी। उसे अपनी स्थिति पर दया आई। परन्तु अमर को दुःखी न करने के लिए वह हल्के से मुस्करा दी, अपने लिए न सही अमर के लिए तो उसे मुस्कराना ही था। उसने कहा -

‘बस यूं ही खयालों में डूब गई थी।’ वह लॉन की फुलवारी की ओर बढ़ गई। ‘इतना अधिक खयालों में और वह भी मेरी संगति में रहते हुए खयालों में डूब जाना अच्छी बात नहीं है।’ अमर ने वन्दना के साथ बढ़ते हुए कहा, ‘मेरे प्यार में कोई कमी होती तो बात अलग थी।’ ‘तुम्हारे प्यार में कोई कमी होती तो मैं तुम्हारी ओर इतना अधिक आकृष्ट कभी नहीं होती।’ वन्दना ने कहा और चलते-चलते अमर का हाथ पकड़ लिया ताकि यदि उसके खो जाने के कारण उसके दिल में कोई टीस उठी हो तो वह उसका दर्द भूल जाए। और वन्दना के स्पर्श से वास्तव में तुरन्त अमर के दिल के दर्द पर अचूक मरहम का काम किया। वह वास्तव में सब कुछ भूलकर वन्दना के लिए मुस्कराने लगा। वन्दना ने सोचा - अमर कितना सीधा है, भोला-भाला। उसने मन-ही-मन तय कर लिया कि अब चाहे कुछ हो, वह अपने मन और मस्तिष्क पर सदा काबू रखेगी। यदि रोहित उसे कभी भूले-भटके याद भी आया तो वह उसका विचार अपने मन और मस्तिष्क से तुरन्त झटक कर दूर करते हुए अमर की बांहों में समा जाएगी। जाने क्यों रोहित की आत्मा उसे शांति से नहीं रहने देना चाहती थी? आखिर रोहित के जीवनकाल में उसने उसे प्यार देने में कमी

ही क्या रख छोड़ी थी? अब जब भगवान को ही स्वीकार नहीं था कि रोहित अपनी छोटी तथा सीमित आयु होने के कारण उसका बने तो कोई क्या कर सकता था? भगवान ने उसे विधवा होने से पहले ही बचा लिया यह क्या कम कृपा थी उसकी? दोनों अपनी मेज के समीप पहुंचे। चारों ओर क्यारी ही क्यारी थीं। फुलवारियों के फूल मरकरी बल्ब के झाग तथा रंगीन बल्बों से मिले-जुले प्रकाश में नहाए मुस्करा रहे थे। छोटे-छोटे रंगीन फूल अधिक थे जो बहुत सुन्दर लग रहे थे। कुर्सी पर बैठने से पहले वन्दना खड़ी होकर इन फूलों को निहारने लगी। निहारते हुए वह कुछ सोच ही रही थी। अमर ने भी कुर्सी पर बैठने से किनारा किया। वन्दना के समीप खड़े होकर फूलों को देखने में वह भी दिलचस्पी लेने लगा।
 
वन्दना ने फुलवारी पर से दृष्टि उठाकर अमर के कोट के कॉलर में लगे फूल को देखा। हल्के से मुस्कराई। फिर बोली, ‘तुम मेरी लटों में इन सुन्दर फूलों का गुच्छा नहीं टांकोगे?’ ‘जी?’ अमर अचानक चौंक गया। उसने स्वप्न में भी नहीं सोचा था कि वन्दना उसे ऐसी बात कहेगी।

‘जी हां।’ वन्दना ने कुछ इतराकर कहा - ‘क्या आपका मन नहीं करता कि मेरी इन सूनी लटों में फूलों का एक सुन्दर गुच्छा बनाकर टांक दें?’ अमर ने तुरन्त झुकते हुए छोटे-छोटे सुन्दर रंगीन फूलों को टहनी से तोड़ा। इनका एक छोटा सा सुन्दर गुच्छा बनाया। फिर उसने वन्दना के सामने खड़े होकर उसे चमकती दृष्टि से देखा। वन्दना मुस्कराई। फिर बल खाकर पलटते हुए उसने अपनी पीठ अमर की ओर की तो वृक्ष की हल्की छाया में उसका सिर कुछ ढंक सा गया। अमर ने हाथ बढ़ाकर बहुत प्यार के साथ उसकी लटों में फूलों का गुच्छा टांक दिया, काले बादलों में नन्हें-नन्हें तारे टिमटिमाकर मुस्करा उठे। वृक्ष की हल्की छाया में वन्दना की लटें सुनहरी से अधिक काली ही दिखाई पड़ रही थीं। वन्दना अमर की ओर पलटी। अमर के आगे अपने प्यार की चांदनी बिछाकर बोली - ‘थैंक यू माई लव, थैंक यू वेरी मच।’ अमर को प्यार की इस चांदनी में अपने भविष्य की मंजिल और मसीप दिखाई पड़ने लगी।

लॉन चेयर्स पर वन्दना तथा अमर एक-दूसरे के बिल्कुल समीप बैठे थे। कुछ देर बाद वेटर उनकी सेवा में उपस्थित हुआ। ‘दो पाइन एपल जूस।’ वन्दना ने ऑर्डर दिया। वेटर चला गया। अमर खामोाश ही रहा। उसके मस्तिष्क के अन्दर उसके कोट की पॉकेट में रखी अंगूठी घूमने लगी। उसने अपनी पॉकेट टटोली। सोचा, अभी-अभी उसने वन्दना की लटों में फूल टांके हैं। क्या अब एकदम से उसे अंगूठी देना भी उचित सिद्ध हो सकता है? परन्तु फिरदौस के हरे-भरे लॉन का यह रोमांचित वातावरण, फूलों की सुगन्ध में डूबा समां, मस्त-मस्त इठलाती हवाएं, क्या ऐसा सुन्दर समय उसे अब और कभी मिल सकेगा। उसने वन्दना को उपहार में सरप्राइज देने के लिए उसका हाथ अपने हाथ में मांगना चाहा ताकि उसकी आंखें बन्द कराकर अचानक उसकी एक अंगुली में अपने प्यार की निशानी पहना दे। उसने वन्दना का हाथ मांगने के लिए कहा, ‘वन्दना जी।’ ‘वन्दना जी नहीं, वन्दना - केवल वन्दना।’ वन्दना ने अमर के दिल के अन्दर उठती अभिलाषाओं से अनभिज्ञ कहा।

अमर खामोश हो गया। वन्दना का खड़ा नाम तुरन्त ही लेने का उसमें साहस उत्पन्न नहीं हुआ। जिसे सदा वह वन्दना जी कहकर पुकारता आ रहा था, उसे अब एकदम से वन्दना और केवल वन्दना कैसे कह सकता था? अंगूठी वाली बात तो उसके मस्तिष्क से इस प्रकार निकल गई मानो उसने अंगूठी का विषय छेड़ने का विचार ही नहीं किया था। वन्दना ने उसे समझाया। बोली, ‘जब हम दोनों प्यार में इतना आगे बढ़ आए हैं तो हमारे बीच किसी प्रकार की औपचारिकता क्यों हो? औपचारिकता में प्यार अवश्य है परन्तु प्यार से अधिक इसमें संकोच भी है, औपचारिकता में अपनत्व है परन्तु अपनत्व से अधिक परायापन भी है। औपचारिकता बरतने से आदर पलता है परन्तु प्यार को वह थाह नहीं झलकती जो दिल के अन्दर होती है। शायद इसीलिए मानव भगवान से किसी प्रकार की औपचारिकता नहीं बरतता, उसे ‘आप’ कहने के बजाए ‘तू’ या ‘तुम’ कहकर सम्बोधित करता है क्योंकि वह उसे दिल की गहराई से प्यार करता है जिसे भगवान पहले ही नाप-तोल चुका होता है। सहसा वहां होटल का वेटर आ गया। उसके हाथ ने ट्रे के अन्दर दो पाइन एपल के जाम थे। जाम उसने उन दोनों के

सामने वाली मेज पर रख दिए और बिल एक छोटी प्लेट में रखकर वन्दना की ओर मेज पर बढ़ा दिया। वन्दना ने सौ रुपए का नोट बिल की प्लेट में डाला। वेटर चला गया ताकि बिल के साथ शेष राशि वापस लाए। उसके जाने के बाद वन्दना ने अपना जाम उठाया तो अमर ने भी अपना जाम हाथ में उठा लिया। रात के दस बज चुके थे। ‘फिरदौस’ के बड़े हॉल में नृत्य आरम्भ हुए काफी देर हो चुकी थी। ऑर्केस्ट्रा की मद्धिम तथा सुरीली धुन हॉल के वातावरण को मुग्ध किए हुए थी। विदेशी यात्रियों तथा मेहमानों से हॉल खचाखच भरा हुआ था। मदहोशी का संसार था। नवजवान क्या बूढ़े भी अपने-अपने जोड़ों के साथ एक-दूसरे की बांहों में बांहें डाल थिरकते हुए मदहोशी के इस संसार में डूब से गए थे। धीमी गति के नृत्य का यह समां बस देखते ही बनता था। जो नृत्य नहीं कर रहे थे वह विदेशी शराब का जाम अपने हाथ में थामे अपना अलग समूह बनाए खड़े होकर या अपनी सुरक्षित कुर्सियों पर बैठकर अपनी निजी या इधर-उधर की बातों में खोए हुए थे। कुछेक नवयुवक या दिलफेंक प्रौढ़ जिन्हें नृत्य के लिए अनेक सुन्दरियों का साथ मांगने पर भी

नहीं मिल सका था, अपना गम गलत करने के बहाने इस समय ‘बार-काउण्टर’ पर बैठे विदेशी शराब की चुस्की लेते हुए नृत्य करती सुन्दरियों को वासना-भरी दृष्टि से देखकर दिल की उमड़ती प्यास बुझा रहे थे। परन्तु वासना की यह प्यास शराब पीने के बाद और बढ़ती जा रही थी। नृत्य करती अनेक सुन्दरियां ऐसी थीं जिनके ब्लाउज तथा टॉप के गले सामने से काफी चौड़े तथा छाती पर गहराई की सीमा तक काफी खुले हुए थे। कुछेक सुन्दरियां पीठ से कमर तक बिल्कुल ही नग्न थीं। ऐसे में बार-काउण्टर पर बेकार खड़े होकर शराब पीते नवयुवकों तथा बूढ़ों की वासना-भरी प्यास कम होने के बजाए भला बढ़ती भी क्यों नहीं? इन नौजवान सुन्दरियों को देख कर लड़की की संगति के भूखे इन व्यक्तियों की जबान से तो कभी-कभी लार भी टपककर होंठों पर आ जाती थी। नृत्य के फर्श पर एक किनारे वन्दना भी अमर की बांहों में थिरक रही थी। अमर के पग विदेशी संगीत के ‘रिदम’ पर स्वयं ही थिरक उठे थे इसलिए उसे वन्दना के इशारों पर धीमी गति वाला नृत्य सीखने में अधिक समय नहीं लगा। इस समय मद्धिम गति में बजती ऑर्केस्ट्रा की धुन विशेष तौर पर ‘फाक्स ट्राट’ नृत्य के लिए ही बज रही थी जिस पर कदम-से-कदम मिलाकर धीरे-धीरे उठाते हुए वन्दना तथा

अमर ही नहीं फर्श के लगभग सभी जोड़े एक-दूसरे की बांहों में बांहें डाले खो-से गए थे। हॉल के अन्दर नृत्य के फर्श के समीप एक कोने में ही उन्हें एक सुरक्षित मेज मिली थी जहां वन्दना तथा अमर ने अपना डिनर समाप्त करने के बाद ही नृत्य करना आरम्भ किया था। अचानक ऑर्केस्ट्रा की धुन का यह भाग समाप्त हो गया। जोड़ों ने जोरदार ताली बजाकर इस धुन की प्रशंसा की। कुछेक जोड़ों ने फर्श छोड़कर अपने स्थान पर जाना चाहा परन्तु तभी ‘एनाउन्सर’ ने स्टेज के माइक पर आकर ‘एनाउन्स’ किया कि अगली धुन, ‘टैब डांस’ के लिए है। ‘टैब डांस’ अर्थात् कोई भी पुरुष फर्श पर किसी नृत्य करते जोड़े के नवयुवक पार्टनर के कंधे पर हाथ द्वारा ‘टैब’ (थपकी) करके उसको उसकी लेडी पार्टनर से अलग करते हुए उसकी लेडी पार्टनर को अपने साथ स्वयं डांस के लिए प्राप्त कर सकता है। ‘टैब डांस’ का एनाउन्समेंट पूरा होते ही ऑर्केस्ट्रा अपनी तेज धुन के साथ आरम्भ हो गया। जोड़े भी फुर्ती के साथ चहक-चहक कर नृत्य करने लगे। ‘टैब डांस’ उन लोगों के लिए एक सुनहरा अवसर था जिनके पास अपनी कोई भी लेडी पार्टनर नहीं थी तथा

जिन्हें मांगने पर अपरिचित सुन्दरियों का साथ अन्य डांस के लिए नहीं लिम सका था। मनचले बूढ़े तथा नवयुवक इस नृत्य से लाभ उठाने के लिए तुरन्त नृत्य के फर्श पर चले आए। सुन्दर तथा जवान लड़कियों को चुन-चुनकर उन्होंने उनके पार्टनर को कंधे से टैब किया और उनकी सुन्दरियां छीनकर स्वयं नृत्य करने लगे। परन्तु अपनी निजी लेडी पार्टनर छिनने के बाद वह नवयुवक भी अधिक देर सब्र नहीं करते जो अपनी लेडी पार्टनर के साथ प्रोग्राम में आरंभ से ही नृत्य करते आए थे। एक छोटा-सा चक्कर लगाकर वे फिर अपनी लेडी पार्टनर के साथ नृत्य करते अपरिचित व्यक्ति के पास पहुंच जाते, उसे टैब करते ओर हटाकर दुबारा अपनी लेडी पार्टनर वापस ले लेते थे। सुन्दरी भी अपरिचित पुरुषों की बांहों से स्वतन्त्र होने के बाद अपने पुराने पार्टनर की बांहों में आते ही खिल उठती थी। वन्दना भी अमर की बांहों में बड़े सन्तोष के साथ नृत्य कर रही थी। यद्यपि ‘टैब डांस’ के समय ऑर्केस्ट्रा के धुन की गति तेज थी परन्तु फिर भी दोनों कदमों-से-कदम मिलाकर धीमा ‘फाक्स ट्राट’ करते रहे। ऑर्केस्ट्रा की इस धुन पर तेज तथा धीमा, सभी प्रकार का नृत्य किया जा सकता था। सहसा किसी ने पीछे से अमर के कंधे पर हाथ रखकर टैब करते हुए कहा, ‘एक्सक्यूज मी (क्षमा कीजिए)।’

वन्दना अमर को टैब डांस का अर्थ समझा चुकी थी। अमर ने पलटकर देखा। एक अत्यन्त सुन्दर व्यक्ति था वह जिसके मुखड़े का रंग कंधारी अनार के समान लाल-सुर्ख था। घनी लटें, घनी भवें, बड़ी-बड़ी आंखें, गालों पर घनी तथा चौड़ी कलमें। लम्बे कद के साथ उसकी छाती चौड़ी ओर कमर पतली थी। उसके शरीर पर भारतीय स्टेट के राजाओं के समान बन्द गले का सफेद कोट था। पैंट काले रंग की थी - चमकदार। वह देखने में स्वयं ही किसी स्टेट का राजा लगता था। अमर ने ही नहीं वन्दना ने भी उसे ऊपर से नीचे तक देखा। दोनों ही उसके व्यक्तित्व से प्रभावित थे। सभ्यता की मांग पूरा करते हुए अमर ने वन्दना को छोड़ दिया। उस अपरिचित व्यक्ति ने जब अपने हाथ आगे बढ़ाते हुए वन्दना के लिए फैलाए तो वन्दना मुस्कराती तथा बल खाती हुई फूलों से लदी एक टहनी के समान उसकी बांहों में चली गई। वन्दना के लिए मानो यह बात को महत्त्व ही नहीं रखती थी। वह विदेशी संस्कृति की दिलदादा थी, विदेशी सभ्यता में रंगी हुई थी। विदेश ढंग के फंक्शन में वह सम्मिलित होने आई थी। फिर क्यों न वह विदेशी सभ्यता का यहां मान रखती? अमर ने वन्दना को अपनी ओर से निश्चिंत पाकर उस व्यक्ति के साथ नृत्य करते देखा तो उसकी छाती पर

सांप लोट गया। वह वहां एक विदेशी सभ्यता के जश्न में सम्मिलित होने अवश्य आया था परन्तु उसका स्वभाव विदेशी वातावरण में डूबा हुआ नहीं था। वह यहां आए अन्य भारतीय नवयुवक-नवयुवतियों के समान एडवांस भी नहीं था। वह असली भारतीय था। वह अपने इस भारतीयपन की वास्तविकता को कैसे भूल सकता था? वह यह बात कैसे सहन कर सकता था कि जिसे वह इतना अधिक प्यार करता है, जो कल उसकी पत्नी बनेगी वह आज किसी और की बांहों में समाई रहे और वह भी उसकी आंखों के सामने? वन्दना के ऐसे उच्च समाज पर उसे दुःख हुआ। परन्तु इसके साथ ही उसे अपनी हीन भावना पर क्रोध भी आया। यदि ऐसा ही था तो वन्दना के साथ इस फंक्शन में सम्मिलित होने क्यों आया? अमर ने अपनी सुरक्षित मेज की ओर बढ़ जाना चाहा परन्तु तभी जाने किधर से एक बाज (पक्षी) समान उड़कर चहकती हुई एक सुन्दरी उसके सामने आ खड़ी हुई। अमर चौंककर रुक गया। ‘हाय हैंडसम।’ सुन्दरी ने उसी चहक के साथ अपनी आंखों को नचाकर बड़ी अदा से अमर को देखा। उसका रास्ता रोकती हुई वह अपने होंठों को बिल्कुल अंग्रेजी समान चौड़ा तथा गोल करके बोली, ‘रोमिंग अलोन? कम

ऑन, लेट अस हैव द प्लेजर ऑफ डांस टुगेदर (अकेले भटक रहे हो? आओ हम-तुम भी इस नृत्य का आनन्द उठाएं)।’ अमर ने इस लड़की को देखा तो उसे मतली-सी आ गई। फिर भी उसने सभ्यता का ध्यान रखते हुए इन्कार में कहा, ‘क्षमा कीजिए, मैं नृत्य करते-करते पहले ही बहुत थक चुका हूं।’ लड़की को अमर के इन्कार पर बड़ा आश्चर्य हुआ। शायद वह अपने को सुन्दरता की प्रतिमा समझे हुए थी। अमर के इन्कार पर वह अपना अपमान समझकर दिल-ही-दिल में झल्ला उठी। परन्तु फिर उसने अपने होंठों को मिलाकर अन्दर समेटा। अपने हाथों को फैलाकर मजबूरी प्रकट करते हुए उसने अपने कंधों को अमेरिकी ढंग से झटका दिया, इस प्रकार मानो उसने हंसों के मध्य किसी कौए का साथ गलती से मांग लिया था। अमर ने इसकी चिन्ता नहीं की। वह जाकर अपनी सुरक्षित कुर्सी पर बैठ गया। उसके समीप से नृत्य करते जोड़े निकल रहे थे फूल समान खिलते, मुस्कराते तथा बात करते हुए। उन्हें अपने आस-पास की भीड़ की जरा भी चिन्ता नहीं थी। ऐसे शुभ अवसरों पर भीड़ में धक्का खाने

के बाद भी कौन किसकी चिन्ता करता है? यह तो प्यार में खोकर कुछ भी नहीं याद रखने का समय होता है। अमर ने फर्श पर नृत्य करते जोड़ों को देखा।
 
देखा। भीड़ में वन्दना उस अपरिचित व्यक्ति के साथ नृत्य करती हुई जाने कहां खो गई थी। मन-ही-मन खिसियाकर अमर ने अपनी दृष्टि नृत्य की ओर से हटा ली। मेज पर कोहनी को टेके तथा हथेली में सिर लटकाकर रखे वह विदेश से इस भारतीय देश में आकर कदम जमाने वाले उच्च समाज की सभ्यता पर ध्यान करने लगा। पुरुष क्यों अपनी पत्नी को किसी दूसरे व्यक्ति की बांहों में थिरकता देखकर आपत्ति नहीं करता? भाई का रक्त अपनी बहन को दूसरों की बांहों में थिरकता देखकर क्यों नहीं क्रोध में उबल उठता है? बेटा अपनी बूढ़ी मां को एक पराए व्यक्ति के साथ नृत्य करता देखकर क्यों चुप रह जाता है? पिता अपनी बेटी को एक पराए युवक के साथ नृत्य करने से क्यों नहीं मना करता है? आखिर क्या इन लोगों के शरीर का रक्त ठंडा पड़ चुका है या इन लोगों के शरीर में रक्त नाम की कोई धारा ही नहीं है? अमर ने दृष्टि उठाकर देखा। वन्दना अपने अपरिचित पार्टनर के साथ नृत्य करती उसी की ओर आ रही है। वह बहुत खामोश थी। परन्तु उसका पार्टनर मानो जबरदस्ती उससे बहुत चहक-चहककर बातें कर रहा था। वह शायद

वन्दना से बहुत घुल-मिल जाना चाहता था। वन्दना की दृष्टि अमर पर पड़ी तो उसने अमर को बेबस दृष्टि से देखा मानो कह रही हो कि वह उठकर उसके पार्टनर को टैब करते हुए उससे मुक्ति दिलाने के बाद अपनी बांहों में समा ले। अमर ने वन्दना की दृष्टि का अर्थ कुछ-कुछ समझा था। नृत्य में इस समय उसे किसी भी पुरुष को टैब करने का अधिकार पूरा था इसलिए उसने उठकर वन्दना के पार्टनर को टैब करने का विचार किया। परन्तु तभी उसके बिल्कुल समीप से एक बूढ़ा जोड़ा नृत्य करता हुआ निकला। फर्श पर भीड़ बहुत अधिक थी इसलिए अमर को क्षण भर के लिए ठहर जाना पड़ा। तभी एक सोलह-सत्रह वर्षीय युवक वहां आया। उसने नृत्य करते बूढ़े जोड़े के कंधे को टैब किया। बोला, ‘अंकल, प्लीज एक्सक्यूज मी।’ उस युवक ने उसकी बूढ़ी पार्टनर का साथ मांगा था। ‘यू आर वेलकम माई सन (तुम्हारा स्वागत है मेरे बेटे)’। बूढ़े व्यक्ति ने जिन्दादिली के साथ अपनी लेडी पार्टनर का साथ छोड़ दिया। युवक ने अपना हाथ बूढ़ी स्त्री की ओर फैलाया और बोला, ‘कम ऑन आंटी।’

और वह बूढ़ी स्त्री हंसती मुस्कराती अपने बेटे से भी छोटी आयु के युवक की बांहों में चली गई और नृत्य का आनन्द उठाने लगी। अमर ने नृत्य का यह दस्तूर देखा तो वह कुछ सोच में पड़ गया। वन्दना नृत्य करती हुई उसकी ओर काफी समीप आ चुकी थी। अमर उठ खड़ा हुआ। उसने आगे बढ़कर वन्दना के पार्टनर को टैब कर देना चाहा कि तभी उससे पहले उस बूढ़े ने वन्दना के पार्टनर को टैब कर दिया जिसे टेब करके युवक ने उसकी बूढ़ी पार्टनर छीन ली थी। वन्दना मानो बहुत देर से इसी प्रतीक्षा में थी। उसने स्वयं ही अपने पार्टनर का साथ तुरन्त छोड़ दिया और उस बूढ़े व्यक्ति की बांहों में चली गई। उसका पहला पार्टनर उसका मुंह देखता रह गया - बूढ़े व्यक्ति पर मन-ही-मन खिसियाता हुआ। अपने पहले पार्टनर से छुटकारा पाकर वन्दना के मुखड़े का मुरझाया फूल खिल उठा। उसने अमर को देखा। मुस्कराई। अब वह बूढ़े व्यक्ति के साथ सन्तुष्ट थी। अमर को भी सन्तोष मिल गया। बूढ़े व्यक्ति को अब तुरन्त ही टैब करके वन्दना को छीनना उसने सभ्यता के विरुद्ध समझा। ‘अनजाइंग, माई डाटर?’ उस बूढ़े व्यक्ति ने वन्दना के साथ थिरककर अमर के समीप से निकलते हुए पूछा।

‘ओह यस अंकल, वेरी मच।’ वन्दना ने चहककर कहा। उसने अमर को देखा फिर अपने बूढ़े पार्टनर के साथ थरकती हुई आगे निकल गई। अमर वन्दना की ओर से निश्चिंत हो गया। अपनी कुर्सी पर बैठ गया। दूसरी कुर्सी अपने स्थान पर रखकर पत्रकार जाने कहां तथा किसकी तस्वीरें खींचने चला गया था। क्षण-भर पहले की घटनाओं ने अमर के सोचने की धारणाएं बदल दी थीं। धीमे-धीमे उसकी आंखों के सामने इस विदेशी संस्कृति, इस विदेशी सभ्यता का दूसरा पहलू भी उजागर होने लगा। उसने बम्बई शहर में एक अंग्रेज शिकारी के यहां वर्षों काम किया था। उनके बंगले में उसने अनेक विदेशी नृत्य के प्रोग्राम बहुत समीप से देखे थे। क्रिसमस, नया वर्ष, घर के किसी सदस्य की वर्षगांठ पर ही खाने-पीने तथा नृत्य की पार्टियां नहीं हुआ करती थीं बल्कि ऐसी शानदार पार्टियां वह उस समय भी अवश्य देते थे जब कभी उनके हाथों शिकार के मध्य जंगल में कोई खूंखार जानवर, शेर या बब्बर शेर मारा जाता था। तब उनकी पार्टियों में उसने अपने मालिक की पत्नी को दूसरे की बांहों में तथा दूसरे की पत्नी, बहू या बेटी को अपने मालिक की बांहों में अनेक बार थिरकते देखा था। उनकी पत्नी बहू बेटियां भी उनके

सामने ही उनके मेहमानों के साथ नृत्य करने में जरा भी नहीं लजाती थीं, वरन् उन्हें नृत्य करने में आनन्द आता था। स्वयं उसके अंग्रेज मालिक दूसरी स्त्रियों के साथ नृत्य करने में बहुत आनन्द प्राप्त करते थे। प्रायः उसने अपने मालिक की बेटी या बहू को स्वयं उनसे नृत्य का साथ मांगते देखा तथा सुना था। और जब नृत्य समाप्त हो जाता तो सब मेहमानों के साथ वह इस प्रकार घुल-मिलकर बातें करने लगते मानो सब-के-सब एक ही खानदान के सदस्य हों। अमर की आंखों के सामने उसके अंग्रेज मालिक की बातें घटना के रूप में एक के बाद एक प्रकट हुईं तो उसके सामने बालरूम डांस का दूसरा रूप पूर्णतया उजागर हो गया। वह दिल-ही-दिल में लज्जित हुआ। संकीर्ण मन का होने के कारण उसने इस समाज के लिए कितनी सारी उलटी बातें समझ ली थीं। कहीं वन्दना को उसके संकीर्ण मन की झल्लाहट का एहसास तो नहीं हो गया हे? शायद नहीं। शायद हां। यदि वन्दना को उसकी हीन भावना का ज्ञान हो गया है तो उसे वन्दना को प्रसन्न करके उसका दिल जीतना ही पड़ेगा। उस पर अपनी निश्चिन्तता का प्रदर्शन इस प्रकार करना पड़ेगा मानो जब वह उसका साथ छोड़कर अन्य अपरिचित व्यक्ति की बांहों में थिरकती हुई गई थी

तो उसके दिल पर उसके प्रति कोई भी गलत प्रभाव नहीं पड़ रहा था। वन्दना बालरूम डांस का पूरा आनन्द उठा रही थी इसलिए वह भी बालरूम का पूरा आनन्द उठा रहा था। अमर ने नृत्य करके जोड़ों की ओर देखा। ऑर्केस्ट्रा की धुन पहले से अब कहीं अधिक तेज थी। नवयुवक-नवयुवतियों के जोड़े भी अब काफी तेज गति के साथ नृत्य करते हुए टैब डांस का पूरा आनन्द उठा रहे थे। सभी चहक रहे थे, खुश थे, अपने जोड़े के साथ खोए निश्चिन्त थे। अमर ने देखा, वन्दना अब उस युवक के साथ बहुत तेज गति के साथ नृत्य करती हुई चहक रही थी जो उससे आयु में कम था जिसने अमर की सुरक्षित मेज के समीप एक बूढ़े व्यक्ति को टैब करके उसकी बूढ़ी पत्नी का साथ ले लिया था। बालरूम डांस के इस जोड़े का सम्बन्ध कितना अछूता था, कितना पवित्र। इस मध्य वन्दना ने जाने कितनों को टैब डांस का साथ दिया होगा, वह स्वयं नहीं जानती होगी। इस मध्य उस युवक ने जाने कितनी लड़कियों को नचाया होगा स्वयं उसे भी नहीं याद होगा। परन्तु इस समय जब वह युवक वन्दना को अपने इशारे पर नचा रहा था तो ऐसा लगता था मानो अपनी दीदी को नृत्य में थकाकर पस्त कर देना चाहता हो। परन्तु वन्दना नृत्य करने में उससे भी कहीं आगे थी। युवक वन्दना को अपने इशारे पर नृत्य कराते-

कराते स्वयं वन्दना के इशारों पर नृत्य करने लगा तो वन्दना बच्चों समान खिलखिलाकर हंस पड़ी। युवक भी कुछ झेंप-सा गया परन्तु उसने वन्दना का साथ नहीं छोड़ा। ऑर्केस्ट्रा की तज गति पर यह नृत्य की ऐसी जाइविंग थी कि नृत्य करते जोड़े अपने नृत्य की रुचि भूलकर वन्दना तथा उसके पार्टनर का नृत्य देखने लगे। एनाउन्सर स्टेज पर खड़ा-खड़ा वन्दना तथा उसके जोड़े का नृत्य बहुत ध्यान से देख रहा था। इस जोड़े के नृत्य ने उसे इतना प्रभावित किया कि उसने तुरन्त ऑर्केस्ट्रा की गूंज मद्धिम कराते हुए स्टेज से एनाउन्स करके नृत्य के मध्य ही ‘टैब डांस’ का प्रोग्राम समाप्त कर दिया परन्तु नृत्य जारी रखा। ऐसा न हो कि टैब डांस से लाभ उठाकर कोई वन्दना के पार्टनर को उससे अलग करते हुए अपनी संगति के लिए छीन ले और तब इस नृत्य का सारा मजा किरकिरा हो जाए। अब जो पार्टनर जिसके साथ था उसके लिए सुरक्षित हो गया। वन्दना को नृत्य के लिए अच्छा साथी मिला था। स्टेज द्वारा टैब डांस समाप्त करने की सूचना प्रसारित होते ही ऑर्केस्ट्रा की धुन में और तेजी आ गई। परन्तु वन्दना ऐसी तेज गति से बजने वाली धुन पर ही नृत्य का वास्तविक आनन्द उठाती थी। वन्दना बिजली की तेजी लिए अपने शरीर के अंग-अंग को थिरकाने लगी। उसकी स्टेपिंग पर आंखें नहीं टिकती थीं।

नृत्य के इस अनोखे कमाल को देखकर अन्य नृत्य करते जोड़ों ने अपना नृत्य छोड़ दिया। वन्दना तथा उसके पार्टनर को उन्होंने फर्श पर ही चारों ओर से घेर लिया तो दूर खड़े दर्शकों को उनका नृत्य देखने के लिए अपनी कुर्सियों पर खड़ा हो जाना पड़ गया। अमर ने ऐसा सुन्दर तथा सभ्यता के अन्दर सीमित विदेशी नृत्य अपने जीवन में प्रत्यक्ष रूप से तो क्या सिनेमा के परदे पर भी कभी नहीं देखा था। उसकी वन्दना इतना सुन्दर नृत्य करती है, वह सुन्दर होने के साथ-साथ इतनी गुणी भी है, वह कभी सोच भी नहीं सकता था। वन्दना के नृत्य ने उसका दिल मोह लिया। वह तुरन्त अपनी कुर्सी से उठा और फर्श पर वन्दना को घेरे भीड़ को चीरकर सामने जा खड़ा हुआ। वन्दना को वह बहुत प्रशंसनीय दृष्टि से देखने लगा। वन्दना के नृत्य का कमाल देखकर उसके मुखड़े पर प्रसन्नता की लालिमा छा गई। उससे सब्र नहीं हो सका तो वह चीखकर कह उठा, ‘बैक अप वन्दना’। उसने वन्दना को और भी प्रोत्साहित किया था, सराहनीय स्वर में। वन्दना के कानों में मानो ऑर्केस्ट्रा का नया साज गूंज गया था - परिचित साज। उसने नृत्य करते हुए दृष्टि उठाकर अमर की ओर देखा। अमर उसके समीप ही था। आंखें चार हुईं तो वन्दना मुस्करा दी। प्रोत्साहन मिला तो उसके अन्दर

और जोश उत्पन्न हो गया। नृत्य की गति में तेजी के साथ उसने स्टेपिंग तथा बांहों और कमर की लचक के ऐसे-ऐसे कमाल दिखाए कि देखने वाले वाह-वाह कर उठे। नृत्य करते-करते वह पसीने में तर हो गई। उसका पार्टनर भी पसीने में तर होकर हांफने लगा। फिर ऑर्केस्ट्रा की एक तेज गूंज के साथ जब नृत्य समाप्त हुआ तो दर्शकों ने इतनी तेज ताली बजाकर उन दोनों की सराहना की कि हॉल का कोना-कोना गूंज गया। युवक के कुछेक साथियों ने युवक को अपने कंधों पर उठा लिया तो अमर भी वन्दना को बधाई देने के लिए उसके सामने जा खड़ा हुआ। वन्दना की ओर भी बहुत से नवयुवक घेरे उसे पहले ही बधाई दे रहे थे। अमर ने वन्दना का ध्यान अपनी ओर खींच कर स्वयं भी उसे बधाई देना आवश्यक समझा परन्तु तभी उसे बगल से धक्का देकर किनारे सरकाते हुए वही सुन्दर तथा अच्छे डील-डौल वाला व्यक्ति आ गया जिसने आरम्भ में टैब डांस का लाभ उठाकर उससे उसकी वन्दना छीन ली थी। अमर उस पर खिसियाकर रह गया परन्तु कुछ कहकर उसने बात बढ़ाना उचित नहीं समझा। उसकी चिंता न करते हुए उस सुन्दर व्यक्तित्व के मालिक ने वन्दना की ओर हाथ बढ़ाते हुए कहा, ‘कांग्रेचुलेशन - बधाई स्वीकार हो।’

‘थैंक यू, थैंक यू वेरी मच, मिस्टर खन्ना।’ वन्दना ने कहा और सभ्यता बरतते हुए उसने अपना दाहिना हाथ बढ़ाकर उस व्यक्ति से हाथ मिला लिया। मिस्टर खन्ना! अमर ने मन-ही-मन नाम दोहरा कर अपने होंठ चबाएः तो नृत्य के बीच इन दोनों का परिचय भी हो चुका है? परन्तु नृत्य के मध्य ऐसा होता ही रहता है। उसके दिल को वन्दना से कोई शिकायत नहीं थी परन्तु वह मन-ही-मन खन्ना पर अवश्य खिसियाने लगा। जाने क्यों? क्या अमर के दिल के अन्दर खन्ना के प्रति ईर्ष्या की कोई आग तो नहीं थी? ‘अपना रूमाल देना।’ वन्दना ने अमर से कहा। उसका मुखड़ा ही नहीं शरीर भी पसीने से तर था। वन्दना की बात सुनकर खन्ना ने अपनी पॉकेट से रूमाल निकालकर वन्दना को देना चाहा, परन्तु वन्दना ने लेने से इन्कार कर दिया। अमर अपनी पॉकेट से रूमाल निकाल चुका था। उसने अमर से रूमाल लिया और अपने पूरे मुखड़े तथा गले का पसीना पोछती हुई अपनी सुरक्षित मेज की ओर बढ़ गई। वन्दना ने अमर का रूमाल इस्तेमाल किया तो अमर के दिल में प्रसन्नता की लहर दौड़ गई। उसने अपने समीप खड़े खन्ना को देखा जो जबरदस्ती उसके प्यार के

जीवन में खलनायक बनने का प्रयत्न कर रहा था। अमर के प्रति भी खन्ना के मन में ईर्ष्या की आग थी जिस वह इस समय दबाए हुए थे परन्तु यह आग अमर से छिपना कठिन थी। एक नाव में दो अपरिचित यात्री हों, तब भी उन्हें एक-दूसरे की मंजिल का पता चल ही जाता है।
 
है। अमर वन्दना के पीछे तेज कदमों से चलकर उसके साथ हो लिया। परन्तु खन्ना ने भी वन्दना का साथ नहीं छोड़ा। अमर वन्दना के सामने मेज की दूसरी ओर बैठा तो खन्ना भी बिन बुलाए मेहमान के समान वहां आ धमका। उसने समीप की टेबल से एक कुर्सी खींची और अमर और वन्दना के बीच कांटा बनकर बैठ गया। अमर को उस पर सख्त क्रोध आया। ‘वन्दना जी-’ खन्ना ने बहुत मिलनसारी प्रकट करते हुए कहा, ‘आपने तो आज वास्तव में कमाल कर दिया। कहां सीखा आपने इतना अच्छा नृत्य?’ ‘लंदन से ही सीखा है।’ वन्दना ने अनिच्छुक होकर खन्ना की बात का उत्तर दिया। ‘लंदन में आपका कौन रहता है?’ खन्ना ने बात बढ़ाई। ‘वहां मेरी मां रहती हैं।’ वन्दना ने न चाहते हुए कहा। नृत्य के कारण वन्दना का शरीर इतना गर्म हो चुका था कि

बार-बार पसीना पोंछने के बाद भी उसके मुखड़े तथा गले के गड्ढे में पसीना आता ही जा रहा था, यहां तक कि जब अमर का रूमाल पसीने से भीगकर तर हो गया तो उसने इसे मेज के किनारे फंसा दिया। ‘दूसरा रूमाल चाहिए?’ खन्ना ने अपनी पॉकेट से रूमाल निकालते हुए पूछा। ‘नो। थैंक यू।’ वन्दना ने स्पष्ट इन्कार किया। खन्ना का मुंह छोटा-सा होकर रह गया, परन्तु वह इतनी जल्दी हार मानने वाला नहीं था। बेशर्मों के समान वह वहीं जमकर बैठा रहा। ‘आप भारत में कब तक रहेंगी?’ खन्ना ने फिर अपनी बातों का सिलसिला आरम्भ किया। ‘कोई ठीक नहीं।’ वन्दना ने खन्ना की बात का अनुमान लगाते हुए कहा। ऐसा न हो कि वह भविष्य में कोई प्रोग्राम रखकर उसे निमन्त्रित करे। उसने बात जारी रखी। बोली, ‘शायद दस-पन्द्रह दिन बाद ही जाना पड़ जाए।’ वन्दना के पास खन्ना को किसी प्रकार की आशा न देते हुए उससे सदा के लिए पीछा छुड़ाने का यही बहाना था। ‘ओ---’ खन्ना ने गोल-सा मुंह बनाया। वह कुछ सोचने पर भी विवश हो गया।

सहसा वहां से एक वेटर निकला। खन्ना ने चुटकी बजाकर उसका ध्यान अपनी ओर खींचा और उसे अपने पास बुलाया। वेटर आ गया तो उसने कहा, ‘तीन शैम्पेन - जल्दी।’ खन्ना ने उसे ऑर्डर दिया। ‘तीन क्यों डार्लिंग, मैं भी तो हूं।’ सहसा खन्ना के पीछे से एक आवाज आई। स्वर लड़की का था फिर भी कर्कश था। लड़की ने आते ही बेतकल्लुफ होकर समीप की एक कुर्सी खींची और खन्ना के सामने बैठ गई। अपनी बात जारी रखते हुए उसने कहा, ‘परन्तु मैं शैम्पेन नहीं पिऊंगी। मेरे लिए व्हिस्की मंगाएं।’ लड़की की अंगुलियों में एक लम्बा पाइप था जिसके सिर पर एक सिगरेट फंसी हुई थी। उसने अमर को देखते हुए मुस्कराकर एक गहरा कश लिया और फिर सारा धुआं अमर के मुखड़े पर फूंक दिया। फिर अमर की आंखों में देखते हुए अपनी आंखें मींचकर बोली, ‘हाई हैण्डसम।’ अमर को उस लड़की की सभ्यता पर सख्त क्रोध आया। मन हुआ वह इस लड़की के मुखड़े पर एक जोरदार थप्पड़ रसीद करे। परन्तु यह फाइव स्टार होटल था। यहां का समाज इस समय विदेशी रंग में डूबा हुआ था। वह रक्त के घूंट पीकर रह गया। यह लड़की थी जिसने टैब डांस के मध्य अमर के फ्लोर छोड़ते समय उसका रास्ता रोकते हुए

उसके साथ नृत्य करने का प्रस्ताव रखा था और तब अमर ने इंकार कर दिया था। अमर को अब अंदाज होने लगा कि इस लड़की ने आगे होकर क्यों इसके साथ नृत्य करने का प्रस्ताव रखा था। दरअसल यह लड़की खन्ना की परिचित है। खन्ना ने वन्दना को टैब डांस में उससे छीन लिया था और यह लड़की नहीं चाहती थी कि वह भी खन्ना को टैब करके अपनी प्रेयसी को वापस छीन ले। इसीलिए यह लड़की उसे अपने साथ नृत्य करके फंसाए रखना चाहती थी। निश्चय ही खन्ना ने वन्दना को उसके साथ नृत्य करते देखने के बाद ही इस लड़की के साथ ऐसी योजना बनाई होगी ताकि वह वन्दना का साथ अधिक-से-अधिक समय तक प्राप्त करता रहे। नृत्य के समय भी लोग सुन्दरियों को अपनी बांहों में देर तक समाए रखने के लिए कैसे-कैसे हथकंडे अपनाते हैं, यह अमर को अब पता चला। ‘आप मिस बेला हैं।’ खन्ना ने उस लड़की का परिचय वन्दना को दिया। औपचारिकता बरतते हुए उसने अमर को भी देखा। बात जारी रखते हुए उसने वन्दना से कहा - ‘आप मेरी काफी पुरानी मित्र हैं।’ फिर उसने बेला से कहते हुए वन्दना की ओर संकेत किया। बोला - ‘आप वन्दना जी हैं। और आप---।’ खन्ना ने अमर की ओर संकेत किया। परन्तु

उसे स्वयं अमर का परिचय नहीं ज्ञात था इसलिए उसने परिचय के लिए वन्दना की ओर देखा। ‘आप मिस्टर अमर हैं - अमर सिंह।’ वन्दना ने अमर का परिचय देना आवश्यक समझा। उसने खन्ना का परिचय भी अमर को दिया। बोली - ‘और आप मिस्टर खन्ना हैं।’ ‘हलो!’ खन्ना ने अमर से हाथ मिलाने में अच्छाई समझी। ‘हलो!’ अमर ने भी खन्ना से हाथ मिलाने में अधिक बुराई नहीं समझी। परन्तु जब उसने हाथ मिलाया तो खन्ना की हथेली उसकी हथेली में कुछ गड़-सी गई। हथेली छोड़ते हुए अमर ने ध्यान दिया। खन्ना की हथेली के मध्य एक नए चन्द्रमा जैसा दाग था। यह दाग किसी वस्तु से कट जाने के कारण बना था या उसकी यह एक असाधारण हस्तरेखा थी, अमर अन्दाज नहीं लगा सका तो उसने उसका ध्यान छोड़ दिया। ‘हलो।’ वन्दना ने भी छोटा सा उत्तर देकर बात समाप्त कर दी। परन्तु उसे बेला से मिलकर कोई प्रसन्नता नहीं हुई थी। वरन उसे बेला से घृणा होने लगी। ‘हाई हैंडसम? हाउ डू यू डू?’ बेला ने अमर से भी कहा, हाथ मिलाने के लिए उसकी ओर अपना हाथ बढ़ाते हुए।

अमर मन-ही-मन इस लड़की पर पहले से खिसियाया हुआ था। उसने हाथ मिलाने से स्पष्ट दूरी बरती। हाथ मिलाने के बजाए उसने खालिस भारतीय ढंग में हाथ जोड़कर उसे नमस्ते कर दिया। बेला झेंप गई। परन्तु खन्ना के समान वह भी निर्लज्ज थी। मुस्कराते हुए उसने फिर चहकना आरम्भ कर दिया। वेटर अब तक वहीं खड़ा हुआ था। उसे देर होने लगी तो उसने खन्ना से पूछा, ‘तीन शैम्पेन और एक स्कॉच व्हिस्की?’ ऑर्डर की पुष्टि करना उसके लिए आवश्यक था। ‘हां, जरा जल्दी लेकर आओ।’ खन्ना ने कहा। ‘लेकिन आप यह तीन शैम्पेन किसके लिए मंगवा रहे हैं?’ वन्दना ने हाथ के इशारे से वेटर को जाने से पहले रोककर खन्ना से पूछा। ‘क्यों?’ खन्ना ने आश्चर्य से पूछा - ‘एक अपने लिए, दो आप दोनों के लिए।’ खन्ना ने वन्दना के साथ अमर को भी देखा। ‘लेकिन हम दोनों ड्रिंक बिल्कुल नहीं करते।’ वन्दना ने कहा। ‘यह ड्रिंक कहां है।’ खन्ना ने कहा - ‘यह तो सॉफ्ट ड्रिंक है।’

‘आई एम सॉरी।’ वन्दना ने स्पष्ट शब्दों में इन्कार किया। मन-ही-मन खिसियाकर उसने खन्ना के प्रति सोचा, अजीब व्यक्ति है यह। उसका पीछा ही नहीं छोड़ता है और अब उनसे शराब की जिद किए जा रहा है। ‘नृत्य में आप काफी थक चुकी हैं।’ खन्नाने तब भी उसका पीछा नहीं छोड़ा। उसने कहा - ‘यदि आप केवल एक पैग ही पी लेंगी तो सारी थकावट---।’ ‘मिस्टर खन्ना-।’ इस बार अमर से सब्र नहीं हो सका तो उसने अपनी आवाज में कुछ सख्ती लाकर कहा - ‘आपसे एक बार कहा जा चुका है कि हम ड्रिंक नहीं करते।’ ‘ड्रिंक तो मैं भी नहीं करता हूं लेकिन---।’ खन्ना पर अमर की रुआबदार आवाज का कोई प्रभाव नहीं पड़ा। परन्तु फिर उसने अपनी जिद छोड़ दी। वेटर को जाने का संकेत करके उसने बात पलट दी। वह वन्दना से बोला, ‘खैर छोड़िए इन बातों को। हां, यह बताइए, यदि आपके लंदन जाने से पहले मैं आपकी इसी होटल में एक विदाई पार्टी दूं तो क्या आप स्वीकार करेंगी?’ ‘आई एम सॉरी।’ वन्दना ने फिर स्पष्ट इन्कार किया - ‘मुझे जाने से पहले जरा भी समय नहीं मिल सकेगा।’ वन्दना को खन्ना की जिद पर क्रोध आने लगा।

सहसा ऑर्केस्ट्रा की धुन फिर आरम्भ हुई। मद्धिम गति में नृत्य करने की यह एक बहुत ही सुरीली धुन थी। जवान जोड़े फर्श पर उतरने लगे। खन्ना ने वन्दना को देखा। बोला - ‘लेट अस हैव ए लिटिल डांस।’ उसने खड़े होते हुए वन्दना की ओर हाथ बढ़ाया। ‘आप जानते हैं मैं पहले ही बहुत थक चुकी हूं।’ वन्दना ने क्रोध में खन्ना पर रक्त का घूंट पीकर कहा - ‘मैं और अधिक नृत्य नहीं कर सकती।’ ‘ओह यस, आई एम सॉरी।’ खन्ना ने अपने स्थान पर बैठते हुए कुछ झेंपकर कहा - ‘मैं तो भूल ही गया था कि आप पिछले नृत्यों में बहुत थक चुकी हैं।’

‘क्यों न मिस्टर अमर।’ बेला ने सिगरेट का कश लेने से पहले कहा - ‘नृत्य का आनन्द चलकर हम ही दोनों उठाएं?’ अमर को समझते देर नहीं लगी कि बेला खन्ना से मिलकर उसे वन्दना के साथ एकांत प्रदान करना चाहती है। बेला की इस चाल पर अमर का रक्त उबल गया। वन्दना के प्रति इन दोनों की जाने क्या साजिश हो? उसने तैश में आकर कहा, ‘मेरा मूड तो नृत्य करने में बिल्कुल नहीं है। नृत्य करने का मूड आपका कर रहा है और साथ में मिस्टर खन्ना का भी। आप ही दोनों क्यों नहीं नृत्य के लिए फ्लोर पर चले जाते हैं?’ ‘ऐं?’ खन्ना मानो अपने ही फेंके जाल का शिकार हो गया। मुस्कराकर अपनी झेंप मिटाते हुए उसने कहा - ‘हां-हां, क्यों नहीं, क्यों नहीं।’ उसने तुरन्त खड़े होते हुए बेला से कहा, ‘आओ बेला, कुछ देर हम दोनों नृत्य करें।’ बेला के इरादों पर भी पानी फिर गया था क्योंकि वह खन्ना के इरादों को पूरा करने में असमर्थ थी। वह उठी और अनमनी-सी होकर खन्ना के साथ फ्लोर की ओर बढ़ गई। ‘इडियट्स।’ उन दोनों के जाने के बाद वन्दना ने मानो स्वयं से दांत पीसते हुए कहा और फिर एक शांति की सांस

ली। ‘जाने कहां-कहां से चले आते हैं अपना पागलपन दिखाने? टैब डांस के समय कमबख्त ऐसा चिपका कि पीछा ही नहीं छोड़ रहा था। जिस किसी ने भी उसे टैब किया, उसके लिए उसने मुझे छोड़ने से स्पष्ट इंकार कर दिया।’ ‘अच्छा।’ अमर ने खन्ना के असभ्य साहस पर आश्चर्य प्रकट किया। ‘हां।’ वन्दना ने कहा, ‘यह तो अच्छा हुआ कि एक बुजुर्ग ने आकर खन्ना को टैब किया तो मैं स्वयं ही उसका हाथ छोड़ कर उन बुजुर्ग के साथ नृत्य करने लगी वरना वह तो मेरा अन्तिम घड़ी तक पीछा नहीं छोड़ने वाला था। नृत्य के समय आरम्भ में तो कमबख्त बड़े सभ्य ढंग से बातें कर रहा था - आप कहां रहती हैं? दिन-भर क्या प्रोग्राम रहता है? आदि-आदि। मैं भी औपचारिकता बरतते हुए सब-कुछ बताती गई। परन्तु जब मेरे बिना पूछे वह अपनी प्रशंसा के पुल बांधने लगा तो मुझे उसका मुझमें रुचि लेने का कारण समझ में आने लगा। मैं तो उसकी बातें सुनते-सुनते थक गई। इडियट को ठीक से डांस करना भी तो नहीं आता है। बार-बार मेरे पैरों पर चढ़ा जाता था।’ वन्दना ने बुरा-सा मुंह बनाया।
 
उन दोनों की संगति को अब तक खन्ना ने बहुत बोर किया था अब जब वह चला गया तो अमर को अपनी बातें करने का अवसर मिला। उसने अपनी कोट की पॉकेट में हाथ डालते हुए कहा, ‘यह बताओ, तुम्हें याद है आज शाम तुमने क्या कहा था?’ ‘क्या कहा था?’ वन्दना ने आश्चर्य से पूछा, कुछ गम्भीर मुद्रा में। ‘यही कि तोहफा देने या लेने का आनन्द तभी है जब तोहफा लेने वाले को ज्ञात न हो कि उसे क्या मिल रहा है?’ ‘ओह।’ वन्दना को याद आया। उसने कहा - ‘हां-आं, कहा तो था। परन्तु क्यों?’ ‘पहले अपना हाथ इधर दो और आंखें बन्द करो। उसके बाद मैं बताऊंगा।’ अमर ने भेद भरे ढंग से कहा। वन्दना अमर की बातों का अर्थ समझ गई। परन्तु उसे सही सही यह अनुमान नहीं हो सका कि अमर उसे तोहफे में क्या देना चाहता है। वह मुस्कराई। फिर उसने अपना हाथ मेज पर अमर की ओर बढ़ाकर अपनी आंखें बन्द कर लीं। अमर ने अपने दाहिने हाथ के अंगूठे तथा अंगुली के बीच अंगूठी थामी। फिर बाएं हाथ द्वारा बहुत कोमलता से उसने अपनी अंगुलियों तथा हथेली के ऊपर वन्दना की

हथेली रखी। वन्दना की अंगुलियों को उसने बहुत ध्यान से देखा, प्यार के साथ भी। गुलाबी लम्बी अंगुलियां गुलाबी नाखून। उसने बहुत कोमलता के साथ वन्दना की एक अंगुली में अंगूठी पहना दी। वन्दना की सारी ही अंगुलियां कांप गईं, सारा शरीर, प्रसन्नता की एक नई मिठास का आभास करके। उसके होंठों पर मुस्कान दौड़ गई तो उसने अमर के कुछ कहने से पहले ही अपनी आंखें खोल दीं। अमर ने उसकी हथेली छोड़ दी। वन्दना अंगूठी पहनी अपनी अंगुली को अपनी आंखों के समीप लाई। ध्यान से वह अंगूठी देखने लगी - बहुत प्यार के साथ भी। सोने की यह एक छोटी-सी अंगूठी थी - कारीगरी में अत्यन्त सुन्दर। अमर ने उसे यह अंगूठी बहुत प्यार से दी थी इसलिए इससे अच्छी वस्तु अब उसके लिए इस संसार में कोई रह ही नहीं गई थी। उसने कहा - ‘तो यही तोहफा देने के लिए मेरी बात याद दिला रहे थे?’ ‘हां।’ अमर ने कहा - ‘बन्द का यह नाचीज तोहफा निशानी के तौर पर स्वीकार करने में आपका अब तो कोई आपत्ति नहीं है ना?’ ‘बिल्कुल नहीं।’ वन्दना ने कहा - ‘इस खूबसूरत अंगूठी को मैं अपने प्यार की एक अनुपम यादगार समझकर जीवन भर अपने पास रखे रहूंगी। इसे कभी भी अपनी अंगुली से

नहीं उतारूंगी। यह तो अब मेरे प्यार का एक अंग बन गई है।’ वन्दना ने बहुत प्यार के साथ अंगूठी को अपने गाल से लगा लिया। पलकों से इसे चूम लिया। होंठ द्वारा भी अंगूठी को प्यार कर लिया तो अमर को ऐसा लगा मानो वन्दना ने अंगूठी को नहीं उसके होंठों को भी प्यार कर लिया है। ‘अमर---’ वन्दना ने अचानक गम्भीर होकर कहा - ‘तुम मुझे कितना प्यार करते हो। कितना विश्वास है तुम्हें मुझ पर। इसीलिए कभी-कभी मैं सोचती हूं कि अनजाने में, अपनी इच्छा के विरुद्ध मैं यह पाप क्यों कर बैठती हूं जो तुम्हारा ऐसा असीम प्यार प्राप्त करने के बाद मुझे हरगिज नहीं करना चाहिए।’ ‘पाप? कैसा पाप?’ अमर कुछ समझा नहीं। ऑर्केस्ट्रा की मद्धिम धुन हॉल के वातावरण में तैर रही थी, रंग-बिरंगे परिवर्तित होते प्रकाश में नृत्य करते जोड़े एक-दूसरे की बांहों में समाए छाया बने हुए थे। किसी को मानो किसी की चिंता ही नहीं थी। नृत्य करते हुए प्यार के संसार में सब मदहोश से हो गए थे। वन्दना ने खड़े होते हुए अमर से कहा, ‘आओ मेरे साथ। नृत्य के मध्य में तुम पर इस समय अपने दिल का हाल खोलकर रख देना चाहती हूं।

इसके बाद तुम ही निर्णय करो कि इतना प्यार तुमसे करने के पश्चात् क्या मैं एक पाप का शिकार हूं या नहीं?’ अमर तब भी कुछ नहीं समझा। खड़े होने के बाद वह वन्दना के समीप आया। अपना हाथ उसने वन्दना की हथेली में रख दिया। वन्दना उसी गम्भीरता के साथ अमर को नृत्य के फर्श पर ले गई। फर्श पर अमर ने अपनी बांहें वन्दना के लिए फैलाईं तो वन्दना उसकी बांहों में समाकर इस प्रकार छाती से लग गई मानो अमर से अब कभी अलग नहीं होना चाहती। कुछ देर तक दोनों इसी प्रकार नृत्य करते रहे - बहुत खामोशी के साथ। फिर जब वन्दना ने अमर की हथेली का गरम-गरम स्पर्श अपने गालों पर महसूस करके अपना मुखड़ा ऊपर उठाया तथा अमर की आंखों में झांका तो अमर चौंक गया। वन्दना की नीली आंखें भी भीगी हुई थीं। शायद नृत्य करते समय वह उसकी छाती में मुंह छिपाकर दबी सिसकियों के साथ रो रही थी, शायद इसीलिए कि वह अमर की दृष्टि में नहीं बल्कि अपनी दृष्टि में अमर की पापिन थी। अमर के निःस्वार्थ प्यार के योग्य वह स्वयं को नहीं समझ रही थी।

‘क्या बात है वन्दना? तुम कुछ परेशान-सी हो?’ अमर ने उसके दोनों ही कपोलों को अपनी हथेलियों के मध्य रखकर उसकी आंखों में प्यार से झांका और सहानुभूति प्रकट की। अब वन्दना का हर गम उसका अपना गम था, वन्दना का दर्द उसकी अपनी तड़प थी। ‘अमर-’ वन्दना का गला भर्रा रहा था। उसने कहा, ‘मेरा विश्वास करो, ‘मैं तुम्हें बहुत प्यार करती हूं। बहुत चाहती हूं तुम्हें और इसीलिए नहीं मांगती कि मेरा अतीत मेरे प्यार-भरे संसार में जाग लगाए। फिर जाने क्यों जब कभी मैं उन वस्तुओं को देखती हूं जिनसे रोहित का सम्बन्ध रहा है तो न चाहते हुए भी रोहित मेरे मन और मस्तिष्क में अवश्य चला आता है। आज भी जब दुकान में मैं तुम्हारे लिए वस्त्र देख रही थी तब कपड़ों का रंग देखकर बिना अधिकार ही मुझे रोहित याद आ गया था। शायद तुम्हें नहीं मालूम कि रोहित के साथ लंदन में मेरी पहली भेंट नृत्य के एक फंक्शन में उस समय हुई थी जब वह तुम्हारे इस लाल कोट के समान ही कोट पहने हुए था।’ वन्दना ने उसके कोट के कॉलर पर अंगुलियां फेरीं। बात जारी रखते हुए उसने कहा, ‘उस समय वह तुम्हारे इस पैंट समान क्रीम रंग की पैंट भी पहने हुए था। वह सफेद गुलाब जो तुमने कोट में लगाया था वह भी रोहित की पसन्द का ही था जिसे देखकर मैं स्वयं

पर इसीलिए झुंझला गई थी, क्योंकि मैं नहीं चाहती थी कि रोहित की याद हमारे प्यार के मध्य किसी प्रकार की दीवार बने। और इसीलिए मैंने वह फूल तुम्हारे कॉलर से निकालकर कमरे से बाहर फेंक दिया था। उस समय फूल फेंकने के बाद मुझे बहुत अधिक संतोष मिला था, प्रसन्नता भी मिली थी कि मैं अपने अतीत को ठुकराने में सफल हूं परन्तु जब लॉन में जाते हुए उस सफेद फूल पर तुम्हारा कदम पड़ा तो जाने क्यों मुझे ऐसा लगा कि तुमने उस फूल को नहीं मेरे दिल को मसल दिया है। और इसीलिए मैं उस समय भी लॉन में खड़े-खड़े थोड़े समय के लिए अपने आपको भूल गई थी।’ ‘मुझे सब मालूम है वन्दना।’ अमर ने नृत्य पर हल्के-हल्के पग बढ़ाते हुए कहा। ‘फिर भी तुम खामोश रहे?’ वन्दना को अमर के प्यार की थाह मिलना कठिन हो गई। ‘हां-’ अमर ने कहा, ‘क्योंकि मुझे अपने प्यार पर विश्वास है। मेरा प्यार निःस्वार्थ है। किसी बात की मांग नहीं करता। यह क्या कम है कि तुम मुझे इतना प्यार करती हो?’ ‘प्यार तो मैं वास्तव में तुम्हें बहुत करती हूं, अमर।’ वन्दना ने कहा, ‘परन्तु क्या इतना करने के पश्चात् तुम्हारी ही संगति

में रहते हुए रोहित को याद करके मैं तुम्हारे साथ विश्वासघात नहीं करती हूं?’ तुम्हारे ही सामने उनके विचारों में खोकर क्या मैं तुम्हारे प्यार का अपमान नहीं करती हूं? क्या यह सब पाप नहीं है?’ ‘नहीं वन्दना, यह कोई पाप नहीं है।’ अमर ने उसे समझाया, ‘यह तुम्हारी एक मजबूरी है। ऐसी परिस्थिति किसी भी मानव के साथ हो सकती है। अतीत किसी का पीछा इतनी आसानी से नहीं छोड़ता। फिर तुम्हारे साथ तो एक ऐसी घटना घटी है जिसका शिकार तुम मनोवैज्ञानिक तौर पर हो गई हो। रोहित ने तुम्हारा बदला लेने के लिए ही अपनी जान गंवाई थी इसलिए उसकी याद को इतनी जल्दी भुला देना तुम्हारे लिए आसान नहीं होगा। तुम उसे चेतन में नहीं तो अवचेतन स्थिति में ही याद करती रहोगी। परन्तु ऐसा सदा नहीं रहेगा। इसका एक इलाज भी है। जिस दिन मैं शेर सिंह से तुम हारे पिता तथा रोहित की हत्या का बदला लेने में सफल हो जाऊंगा उस दिन तुम्हारे अतीत का यह भार तुम्हारे दिल से अपने आप ही उतर जाएगा - हमेशा-हमेशा के लिए। तब तुम्हारा मन और मस्तिष्क बदले की भावना के बन्धन से स्वयं ही सदा के लिए मुक्त हो जाएगा और फिर तब तुम देख लेना वन्दना, मैं तुम्हारे मन और मस्तिष्क पर इस प्रकार छा जाऊंगा कि तुम सब कुछ

भूलकर दिन-रात प्रति पल, मेरे और केवल मेरे ही विचारों में तल्लीन रहने लगोगी।’ ‘काश।’ वन्दना ने एक गहरी सांस के साथ कामना की, ‘ऐसा समय शीघ्र ही आ जाएगा।’ उसने अमर की छाती पर अपना मुखड़ा फिर रख दिया। ‘वह दिन अब अधिक दूर भी नहीं रहा।’ अमर ने वन्दना को अपनी बांहों में सख्ती से समाते हुए छाती में छिपा लिया। बोला, ‘मेरा दिल कहता है कि वह दिन दूर नहीं जब मैं तुम्हारा तथा तुम्हारे दादाजी का बदला लेने में शीघ्र ही सफल हो जाऊंगा।’ ऑर्केस्ट्रा की धुन उसी प्रकार बज रही थी, बजती रही। रंगीन प्रकाश अपना रंग बदलकर अब पहले से अधिक गहरा होता जा रहा था। कुछ देर बाद ऑर्केस्ट्रा की धुन थम गई। जोड़ों ने भी थिरकना बन्द कर दिया। तालियां बजीं। फिर जोड़े अपने-अपने स्थान पर जाकर बैठ गए। यह एक लम्बे समय का विश्राम था। इसी विश्राम के मध्य नृत्य में भाग लेने वाले आज की प्रतियोगिता में जीते गए इनाम बांटना था। प्रतियोगिता के विजेताओं को उपहार बांटने के लिए प्रमुख अतिथि के रूप में शहर के मेयर को बुलाया गया था।

जब सारे उम्मीदवार और दर्शक अपने-अपने स्थान पर बैठ गए तो होटल का प्रबन्धक ऑर्केस्ट्रा के स्टेज पर एक किनारे माइक के सामने आया। ऑर्केस्ट्रा बजाने वाले कलाकार स्टेज छोड़कर जा चुके थे तथा उसकी कुर्सियों के आगे कुछेक आरामदेह कुर्सियां आज के निर्णायकों तथा प्रमुख अतिथि के लिए लगा दी गई थीं। इधर होटल के प्रबन्धक ने माइक संभाला, उधर यह आदरणीय हस्तियां इन आरामदेह कुुर्सियों पर आकर बैठ गईं। प्रमुख अतिथि के बगल में पिछले वर्ष की चुनी हुई इसी होटल की ‘ब्यूटी क्वीन’ भी बैठी हुई थी जिसे आज के उत्सव में विशेष तौर पर बुलाया गया था। माइक के मसीप ही एक मेज रख दी गई थी जिस पर आज के प्रोग्राम के विजेताओं को दिए जाने वाले उपहार रखे हुए थे - चांदी के छोटे-बड़े कप्स। होटल मैनेजर ने माइक पर तेज स्वर के साथ कहा, ‘योर अटेन्शन प्लीज (कृपया ध्यान दें)’। हॉल के अन्दर दर्शकों के मध्य खामोशी छा गई। सब ने आवाज पर ध्यान लगाकर स्टेज की ओर देखा। प्रमुख अतिथि ने अधिक समय न लेते हुए अपने छोटे-से भाषण में फंक्शन के आयोजकों की सराहना की तथा उन्हें बधाई दी जिनकी मेहनत के कारण यह फंक्शन इतनी सुन्दरता के साथ सफल हुआ था। उन्होंने होटल तथा

होटल के सभी कर्मचारियों को भी रजत-जयंती के इस शुभ अवसर पर बधाई दी और इच्छा प्रकट की कि रजत-जयंती पर ही नहीं बल्कि हर वर्षगांठ पर यह होटल इसी प्रकार से सुन्दर प्रोग्राम रखकर नवयुवक-नवयुवतियों को विदेशी प्रतियोगिताओं में भी भाग लेने के लिए उत्साहित करता रहेगा। इसके बाद आज के प्रोग्राम में विजेताओं का नाम पुकारने के लिए होटल मैनेजर एक बार फिर माइक के सामने आया। फिर तेज स्वर में कहा, ‘आज के प्रोग्राम में जो नृत्य करता जोड़ा सर्वाधिक सुन्दर रहा उसमें पहले विजेता का नाम है श्री दिनेश खन्ना।’ हॉल के अन्दर बहुत जोर की ताली बजीं। होटल मैनेजर ने तालियों का शोर समाप्त होते ही हाथ के कागज पर एक दृष्टि डालकर फिर कहा, ‘इस सर्वाधिक जोड़े में दूसरे विजेता का नाम है कुमारी वन्दना सिंह।’ वन्दना के स्वागत में इस बार दर्शकों ने तालियां और जोर से बजाईं। ‘मैं आज के प्रोग्राम के इस सर्वाधिक सुन्दर जोड़े से निवेदन करता हूं कि कृपया स्टेज पर आकर अपना दर्शन

दें और इनाम ले जाएं।’ तालियों का शोर कम होते-होते होटल के मैनेजर ने फिर कहा। एक किनारे खन्ना अपनी सीट पर बेला तथा अन्य लड़कियों के झुण्ड में बैठा हुआ बहुत प्रसन्न था। वह होटल मैनेजर की बात सुनकर खड़ा हो गया। वन्दना को भी होटल मैनेजर का अनाउंसमेंट सुनने के बाद स्टेज पर जाना ही था। नहीं जाती तो वह अपनी अशिष्टता का प्रमाण देती। जब वह स्टेज की ओर बढ़ी तो दूसरी ओर से खन्ना भी उसके समीप आकर स्टेज की ओर बढ़ गया। स्टेज पर एक अन्य आयोजक आकर अभी-अभी खड़ा हुआ था। खन्ना तथा वन्दना के स्टेज पर आते ही प्रमुख अतिथि भी खड़े हो गए थे। आयोजक ने एक कप उठाकर प्रमुख अतिथि की ओर बढ़ाया तो प्रमुख अतिथि ने इसे लेकर बधाई देते हुए कप खन्ना को थमा दिया। खन्ना ने कुछ झुकते हुए कप बहुत संभालकर अपने हाथों में ले लिया, इस प्रकार मानो यह कप नहीं वन्दना का सुन्दर दिल था जो उसे उपहार में मिला था। फिर उसने अपना दाहिना हाथ आगे बढ़ाकर प्रमुख अतिथि से मिलाते हुए कहा, ‘धन्यवाद महोदय, धन्यवाद।’
 
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