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Romance प्यासी शबनम लेखिका रानू

उसके बाद होटल मैनेजर के संकेत पर आयोजक ने दूसरा कप उठाया। प्रमुख अतिथि ने यह कप लेकर वन्दना को दिया। वन्दना ने इसे स्वीकार करते हुए प्रसन्नता प्रकट की। हॉल के अन्दर तालियां फिर गूंजने लगीं। वन्दना ने प्रमुख अतिथि को धन्यवाद दिया। ‘वन मिनट प्लीज।’ सहसा एक पत्रकार ने उसके स्टेज पर से सीढ़ियां उतरने से पहले ही उसका रास्ता रोककर कहा और अपने कैमरे का फोकस उस पर निशाना बनाकर ठीक करने लगा। उसके साथ ही वहां और भी पत्रकार अपना कैमरा लिए वन्दना के सामने आ चुके थे। वन्दना को रुक जाना पड़ा। तभी उसके बगल में लपककर खन्ना भी आ खड़ा हुआ। फिर फोटो के लिए अनेक फ्रलैशगन के बल्ब चमक उठे। अमर अपनी सुरक्षित कुर्सी पर बैठा खन्ना तथा वन्दना को देख रहा था। मनचले नवयुवक की फबती जब उसके कानों में पड़ी तो उसे ऐसा लगा मानो उस नवयुवक ने सबके सामने उसके गाल पर थप्पड़ रसीद कर दिया है। दर्शकों के ठहाके उसे यूं सुनाई पड़े मानो थप्पड़ लगने के बाद सब मिलकर उसका मजाक उड़ा रहे हैं। उसका मन किया कि वह यहां से उठकर अपने कमरे में चला जाए। परन्तु

उसने वन्दना को खन्ना के रहम और करम पर छोड़कर जाना उचित नहीं समझा। वन्दना को उसकी सीट तक छोड़ने के बाद खन्ना बड़ी आशा के साथ उसके समीप खड़ा रहा। शायद वन्दना उसे अपने समीप बैठने के लिए कहे। परन्तु खन्ना को वन्दना से कोई भी लिफ्ट नहीं मिली। वन्दना ने अपनी सीट पर बैठकर अपना पुरस्कृत कप मेज पर कुछ पटकते हुए रखा तो खन्ना चला गया। उसने कप मेज पर अमर की ओर बढ़ा दिया। अमर ने कप हाथ में लेकर देखा। फिर सब कुछ भूलकर हर्ष प्रकट करता हुआ बधाई देने लगा। होटल मैनेजर स्टेज के माइक पर फिर पुकारकर कह रहा था, ‘आज की दूसरी प्रतियोगिता नृत्य करने वाले सबसे अच्छे जोड़े के लिए है।’ दर्शकों ने पलटकर वन्दना को देखा। क्या दूसरी प्रतियोगिता में भी तो वन्दना बाजी नहीं मार ले गई? वन्दना तथा युवक के एक नृत्य पर सारा हॉल ही मुग्ध हो गया था। और उनका अनुमान ठीक ही निकला। होटल मैनेजर अपना ‘एनाउन्समेन्ट’ जारी रखते हुए कह रहा था, ‘और नृत्य में अपनी भरपूर कला का प्रदर्शन करने वाला जोड़ा है श्री कमल कुमार तथा कुमारी वन्दना सिंह का। कृपया आप दोनों स्टेज पर पधारें।’

‘हॉल एक बार फिर तालियों की गड़गड़ाहट से गूंज गया। वन्दना इठलाती मुस्कराती तथा बलखाती हुई उठ खड़ी हुई। अमर को प्यार भरी दृष्टि से उसने देखा तो अमर ने खामोश मुस्कान तथा चमकती हुई दृष्टि के साथ उसकी प्रसन्नता में सम्मिलित होते हुए उसे इस जीत पर भी पहले ही बधाई दे दी। वन्दना स्टेज पर जा खड़ी हुई तो साथ में उसके वह युवक भी आ खड़ा हुआ जो उससे आयु में छोटा था तथा जिसने टैब डांस के बाद उसके साथ नृत्य में साथ दिया था। प्रमुख महोदय ने पहले के समान ही आयोजक से इनाम के कप्स लेकर कमल कुमार तथा वन्दना को एक के बाद एक कप थमाते हुए बधाई दी और हाथ मिलाया। फिर वही पत्रकारों के कैमरों की फ्लैशगन की चमक - तालियों का शोर। वन्दना स्टेज की सीढ़ियां उतरी तो उसके पीछे-पीछे कमल कुमार भी उतर आया। कमल कुमार ने सभ्यता का ध्यान रखते हुए वन्दना को उसकी सीट तक छोड़ा। वन्दना ने कमल कुमार को अमर का परिचय दिया। बोली, ‘आप मिस्टर अमर हैं।’

कमल कुमार ने अमर से हाथ मिलाते हुए कहा, ‘आपसे भेंट करके वास्तव में बहुत प्रसन्नता प्राप्त हो रही है।’ कमल कुमार अमर के व्यक्तित्व से बहुत प्रभावित था। कमल कुमार के प्यार भरे व्यवहार ने उसका मन जीत लिया था। वन्दना ने कमल कुमार को यहां तक पहुंचाने के लिए धन्यवाद दिया। उसे बैठने के लिए भी पूछा। परन्तु कमल ने दो जवान दिलों के बीच खलल डालना उचित नहीं समझा। वह चला गया। वन्दना अपनी सीट पर बैठ गई। मुस्कराते हुए उसने अपना दूसरा जीता हुआ कप भी अमर की ओर बढ़ा दिया। यह कप पहले कप से अधिक बड़ा तथा सुन्दर था। अमर ने अपनी दोनों हथेलियों के मध्य वन्दना का हाथ दबाकर हर्ष प्रकट करते हुए उसे बधाई दी तथा उस पर गर्व प्रकट किया। वन्दना के लिए अमर की प्रसन्नता से बड़ी कोई प्रसन्नता नहीं थी। उसकी प्रतियोगिता जीतने की प्रसन्नता दोगुनी हो गई। होटल मैनेजर ने अगली प्रतियोगिता का परिणाम सुनाते हुए कुछ मनचलेपन से कहा, ‘और अब अपने दिलों को थामकर सुनिए कि आज की, या यूं कहिए कि इस होटल के पिछले पच्चीस वर्षों की सर्वाधिक महत्त्वपूर्ण प्रतियोगिता

में ‘ब्यूटी क्वीन’ का खिताब किस सुन्दरी के भाग्य में आया है? विचित्र बात तो यह है कि प्रतियोगिता का निर्णय करते समय आदरणीय निर्णायकों में से एक भी ऐसे निर्णायक महोदय नहीं निकले जिन्हें इस सुन्दरी के ‘ब्यूटी क्वीन’ होने पर किसी प्रकार का सन्देह हुआ हो। यह इस होटल के लिए हर्ष तथा ‘ब्यूटी क्वीन’ के लिए बड़े गर्व की बात है कि आज उस सुन्दरी ने---’ होटल मैनेजर ने रुकते हुए दृष्टि उठाकर वन्दना को भेद भरी दृष्टि से मुस्कराकर देखा। वन्दना के दिल की धड़कनें बढ़ गईं - एक अज्ञात प्रसन्नता का आभास करके। उसने अमर को देखा। अमर मुस्करा दिया, इस प्रकार मानो उसे पहले ही वन्दना के ‘ब्यूटी क्वीन’ बनने पर कोई सन्देह नहीं रह गया था। वन्दना की सुन्दरता के आगे तो देश-विदेश में भी दूर तक कोई उसकी बराबरी नहीं थी - विशेष कर उसकी अपनी दृष्टि में। होटल मैनेजर ने अपनी बात जारी रखते हुए फिर आरम्भ की। उसने कहा - ‘आज उस सुन्दरी ने इससे पहले भी दोनों प्रतियोगिताओं में विजेता बनने का सम्मान प्राप्त किया है।’ वन्दना की विजय पर अब किसी को सन्देह ही नहीं रहा। दर्शकों ने वन्दना को देखते हुए इतनी जोर की तालियां बजाईं कि स्वयं उनके कान फटने लगे। हॉल के अन्दर जोश

में आकर दर्शक सीटियां बजाने लगे। वन्दना के भाग्य की सराहना करते हुए अनेक दर्शक चीख उठे - ‘ऑर्केस्ट्रा---ऑर्केस्ट्रा।’ वन्दना को मानो प्रसन्नता का एक बहुत बड़ा खजाना मिल गया जिसे उसके लिए संभालना कठिन हो रहा था। प्रसन्नता से बेकाबू होकर उसका मन किया कि वह अमर की छाती से लग जाए। उससे कहे कि वह उसे अपनी बांहों में समाकर खूब प्यार करे। परन्तु इतने ऊंचे समाज में होने के पश्चात् वह साहस नहीं कर सकी। भारतीय पिता के रक्त ने उसकी इस इच्छा पर लाज की बेड़ियां डाल दीं। ‘तो आइए वन्दना जी---।’ तालियों का जोर कम होते-होते स्टेज पर खड़े होटल मैनेजर ने वन्दना को देखते हुए माइक पर उसका ध्यान अपनी ओर आकृष्ट किया। उसने कहा, ‘आज की तीसरी तथा सर्वाधिक महत्त्वपूर्ण प्रतियोगिता की विजेता ‘ब्यूटी क्वीन’ बनकर हमारे होटल का सम्मान बढ़ाइए।’ वन्दना स्टेज पर जा खड़ी हुई - दर्शकों की ओर मुखड़ा तथा अमर की ओर दृष्टि बिछाकर। परन्तु फिर वह प्रसन्नता की अधिकता के कारण अमर से भी दृष्टि नहीं मिला सकी तो उसने अपनी पलकें नीचे झुका लीं। होंठ मुस्कराने के

लिए बेकाबू होकर कांप-कांप उठते थे। पत्रकार थे कि स्टेज पर चढ़-चढ़कर उसकी तस्वीरें खींचते हुए उसे उसे और नर्वस कर रहे थे। फिर पिछले वर्ष की सुन्दरी (ब्यूटी क्वीन) ने उसके सामने आकर उसकी छाती पर कंधे से कमर तक एक नीला तथा लगभग छः इंच चौड़ा रेशमी पट्टा टांका जिस पर सामने चांदी के तारों द्वारा मोटे शब्दों में कढ़ा हुआ था ‘ब्यूटी क्वीन ऑफ सिल्वर जुबली - फिरदौस’। फिर पिछले वर्ष की सुन्दरी ने अपने हाथों से वन्दना के सिर पर ‘ब्यूटी क्वीन’ का एक मुकुट रखते हुए पहनाया। तालियों का शोर फिर गूंजा - गूंजता ही गया। फिर जब वह अपनी औपचारिकता पूरी करने के बाद एक किनारे खड़ी हो गई तो आज का सबसे बड़ा तथा सुन्दर चांदी का कप उठाकर प्रमुख अतिथि ने वन्दना को भेंट करके उसे बधाई दी। तालियों का शोर समुद्र की मौजों के समान एक बार फिर उठा। मौजों के इस बहाव में वन्दना मानो बहकर खुशी से पागल हो उठी। इसके बाद होटल मैनेजर ने प्रमुख अतिथि, पिछले वर्ष की सुन्दरी, आज के निर्णायकों तथा आयोजकों के साथ उन सभी यात्रियों, मेहमानों तथा उम्मीदवारों को भी धन्यवाद दिया जिन्होंने अपनी उपस्थिति देकर आज के इस अनूठे जश्न को सफल बनाने में सहायता दी थी।

कुछ देर बाद स्टेज पर ऑर्केस्ट्रा पार्टी ने अपना स्थान लिया। प्रोग्राम का अन्त करने के लिए उन्होंने अन्तिम नृत्य की धुन छेड़ी - मधुर, सुरीली तथा मद्धिम। नवजवान जोड़े फर्श पर उतर कर नृत्य करने लगे। वन्दना तथा अमर अपनी सीट पर बैठे प्रसन्नता में इतना अधिक डूबे हुए थे कि उन्हें आपस में बातें करने से अब तक समय नहीं मिला था। तभी वहां कबाब में हड्डी बनकर खन्ना फिर आ पहुंचा। ‘कांग्रेचुलेशन, वन्दना जी!’ उसने खड़े-खड़े कुछ झुक कर वन्दना से कहा, ‘आपने एक ही फंक्शन में एक के बाद एक तीन प्रतियोगिताएं जीतकर तो कमाल ही कर दिया।’ खन्ना ने अपनी बात पूरी की तो उसके होंठों से शराब का एक झपका उठा। उसने अपनी विजय के उपलक्ष में स्वयं ही खूब शराब नहीं पी थी बल्कि अपनी पार्टनर्स को भी शराब पिलाने में कोई कसर नहीं छोड़ी थी। फंक्शन में आज लगभग सभी पुरुषों ने शराब पीकर वातावरण का भरपूर आनन्द उठाया था। पुरुष क्या, उच्च समाज में शराब पीने पर विश्वास रखने वाली जाने कितनी भारतीय स्त्रियां भी शराब के शौक से वंचित नहीं थीं इसलिए वन्दना ने खन्ना के शराब पीने के शौक को नजरअंदाज कर दिया। परन्तु उससे बातें करते हुए उसे जरा भी खुशी नहीं हो रही थी। फिर भी सभ्यता को स्थिर रखते

हुए उसने अपने होंठों पर कृत्रिम मुस्कान उत्पन्न की और बोली, ‘धन्यवाद’। ‘क्या मैं प्रोग्राम के अन्तिम नृत्य में आपकी संगति का आनंद प्राप्त कर सकता हूं?’ उसने वन्दना को उठाने के लिए अपना बायां हाथ वन्दना की ओर बढ़ाया। वन्दना की ओर कुछ और झुकते हुए, इतना कि उसके होंठों से निकली शराब की दुर्गंध भाप बनकर वन्दना के मुखड़े पर छा गई। झुकते समय खन्ना शराब के नशे में कुछ लड़खड़ा भी गया था। वन्दना को मतली-सी आ गई। जो व्यक्ति शराब के नशे में अपने पैरों पर खड़ा होने में असमर्थ है वह उसके साथ नृत्य क्या करता? वैसे भी प्रोग्राम का अन्तिम नृत्य अपने प्रियतम अमर के साथ ही करने का इरादा किए बैठी थी। उसने उसी प्रकार बैठे-बैठे स्पष्ट शब्दों में इंकार किया। बोली, ‘आई एम सॉरी। मैं इस अन्तिम नृत्य के लिए अपना समय मिस्टर अमर के लिए सुरक्षित कर चुकी हूं।’ उसने अमर की ओर इशारा किया। वन्दना ने इंकार कर दिया था परन्तु अनिच्छुक तौर पर मुस्कराती रही ताकि हॉल का यह थिरकता सुन्दर वातावरण स्थिर रहे।

वह इस खुले अपमान को सहन नहीं कर सका, उसने सीधे खड़े होते हुए जोश में कहा, ‘मिस वन्दना, शायद आप नहीं जानतीं कि मैं किसी से किसी भी प्रकार का इन्कार सुनने का आदी नहीं हूं।’ खन्ना की बात सुनकर अमर अपने क्रोध पर काबू नहीं कर सका। वह तुरन्त खड़ा हो गया - अमेरिकी ढंग से कुछ झूलकर कंधे से कुछ झुकते हुए, बिल्कुल सतर्क, इस प्रकार मानो वह अचानक आने वाले हर खतरे से तैयार है। उसके एक हाथ की हथेली ‘करंट’ ढंग से सख्त हो गई। दूसरे हाथ की अंगुलियां पैंट की पॉकेट पर जाकर रुक गईं जहां पॉकेट के अन्दर छोटी-सी रिवॉल्वर थी। उसने दृष्टि मिलाकर खन्ना को देखा, मानो उसे आंखों द्वारा हर प्रकार की चुनौती दे रहा हो। खन्ना ने जोश में आकर जो कुछ कहा था उसे इसका अफसोस नहीं हुआ। अफसोस हुआ तो केवल इस बात का कि जो कुछ उसने कहा है उसे पूरा करने का यह स्थान नहीं था। वह अमर से नहीं घबराया। उसने जाते-जाते वन्दना से कहा, ‘तुम पछताओगी, बहुत पछताओगी। जिस किसी ने कभी मेरी इच्छा का आदर नहीं किया है उसे सारी जिन्दगी पछताने के अतिरिक्त कुछ हाथ नहीं लगा है।’ खन्ना ने घूरकर वन्दना को देखा, फिर अमर को भी। वह क्रोध में एक

झटके से पलटा और फिर मुट्ठी बांधकर अकड़ता हुआ हॉल के द्वार से होकर बाहर चला गया। खन्ना को हॉल के द्वार से होकर बाहर जाने वन्दना ने भी देखा था तथा अमर ने भी। खन्ना ने जिस प्रकार जाते-जाते वन्दना को धमकी दी थी उससे वन्दना का भयभीत होना स्वाभाविक था। आखिर वह एक लड़की ही तो थी। अपने जीवन की सुरक्षा के लिए वह हर क्षण अमर पर कैसे निर्भर रह सकती थी? यह माना कि अमर की आंखों के सामने उसका कोई कुछ भी नहीं बिगाड़ सकता था परन्तु यह आंखों के सामने वाली ही बात थी। पीठ-पीछे छिप-छिपाकर, धोखे से तो उस पर कोई आक्रमण कर सकता था। तब अमर क्या करता? वह कोई भगवान तो था नहीं जिसे हर आने वाले खतरे का एहसास पहले ही हो जाता। ऐसा सोचते हुए अचानक जाने कैसे वन्दना को डाकू शेर सिंह की याद आ गई। डाकू शेर सिंह। उसके नाम से ही वन्दना के दिल की धड़कनें तेज हो गईं। उसने सोचा - डाकू शेर सिंह उसके पीछे पहले ही हाथ धोकर पड़ा हुआ है और अब अपने लिए उसने एक और शत्रु उत्पन्न कर लिया। ‘किस सोच में पड़ गईं?’ अमर ने अपनी कुर्सी पर बैठते हुए वन्दना को चिन्तित देखा तो पूछा।

‘कुछ नहीं - कुछ भी तो नहीं।’ वन्दना ने अपनी चिंता पर मुस्कान का परदा डालते हुए कहा। ‘कुछ-न-कुछ बात तो जरूर ही है।’ अमर ने वन्दना की आंखों में झांकते हुए सच्चाई तलाश की। बोला, ‘बताओ ना क्या बात है? क्या उस रंगरूट की धमकी से डर गई हो?’ वन्दना ने खामोशी से सिर झुका लिया। कोई उत्तर नहीं दे सकी वह।
 
अमर को वन्दना की खामोशी से उत्तर मिल गया। उसने हाथ बढ़ाकर मेज के ऊपर ही वन्दना का रखा एक हाथ पकड़ लिया, बहुत प्यार के साथ बोला, ‘वन्दना, इस प्रकार मेरे प्यार का अनादर मत करो। मुझ पर विश्वास रखो। वन्दना, यदि तुम्हारा विश्वास मुझ पर से हट गया तो याद रखना मेरा अपना विश्वास भी मुझ पर से हट जाएगा। मैं तुम्हारे प्यार के सहारे जीवित तो रह सकता हूं परन्तु मन की सच्ची शांति मुझे तभी मिल सकती है जब मैं तुम्हारी हार्दिक भावनाओं की कदर करते हुए शेर सिंह से तुम्हारा बदला लेने में सफल हो जाऊंगा। खन्ना जैसे दीवाने रंगरूट तो आए-दिन उत्पन्न होते हैं, शराब पीकर तैश में आते हैं, लड़की से लिफ्ट न मिलने पर धमकाते हैं, फिर चले जाते हैं और नशा उतरते ही सब कुछ भूल जाते हैं। ऐसे लोगों की धमकी से

क्या डरना? मैंने तो अपने प्यार की खातिर डाकू शेर सिंह से बदला लेने का बीड़ा उठाया है। मैंने तुम्हारे दादाजी की मन की शांति के लिए भी शेर सिंह से उनका बदला लेने का वचन दिया है। तुम अच्छी तरह जानती हो कि बदले की इस आग को बुझाने के लिए ही वह प्रौढ़ आयु में भी गिन-गिनकर सांस ले रहे हैं। वन्दना-’ अमर का गला भर आया। वह अपने दिल की विवशता प्रकट करके वन्दना से मानो अपने इरादों की पूर्ति के लिए भीख मांगने लगा। अमर खामोश हो गया। भावुक शब्दों ने उसकी पलकों के कोने भिगो दिए थे। वन्दना चुपचाप अमर को देखती ही रह गई। उसके प्यार की गहराई का अनुमान लगाकर वन्दना की पलकें भी भीग गईं। अमर पर से दया आई। सहानुभूति से उसका दिल भर गया। अमर उसे कितना अधिक प्यार करता है। उसकी मन की भावनाओं का अमर को कितना अधिक ध्यान है। उसके एहसास पर दिल और जान से जाने के लिए अमर क्या नहीं करना चाहता है। अमर का असीम प्यार देखकर वन्दना का दिल उसके पगों में झुक गया। महान है ऐसा प्रेमी जिसके विचार इतने ऊंचे हैं। वह भाग्यवान है जिसे अमर जैसे व्यक्ति का प्यार मिला। ऐसा प्यार तो नारी सात जन्मों की तपस्या के बाद भी नहीं प्राप्त करती है। अमर अब तक

वन्दना का एक हाथ अपन दोनों हथेलियों के बीच दबाए हुए था। वन्दना ने अपना दूसरा हाथ अमर के हाथ पर रख दिया और अंगुलियां बिछाकर हल्के-से मुस्करा दी। अमर को उसकी दिली मुराद मिल गई। वन्दना ने उसके प्यार, उसके विश्वास की लाज रख ली थी। ऑर्केस्ट्रा की मद्धिम मधुर धुन हॉल के वातावरण में अब तक तैर रही थी। जोड़ों में पुरुष अब तक नृत्य करते हुए मानो किसी विशेष अवसर की प्रतीक्षा कर रहे थे। तभी स्टेज पर माइक के सामने खड़े होकर होटल मैनेजर ने नृत्य के इस अन्तिम भाग को टैब डांस में परिवर्तित करने की घोषणा कर दी। नवयुवकों की दृष्टि वन्दना पर बिछ गई। ‘आओ चलो, हम अपने कमरे में चलते हैं। रात बहुत बीत चुकी है।’ अमर ने टेबल पर रखे कप्स समेटते हुए कहा, वन्दना पर आस से बिछी अनेक नजरों से निश्चिंत। ‘अभी नहीं जा सकती।’ वन्दना ने रोकते हुए कहा। ‘क्यों?’ अमर ने आश्चर्य से पूछा। ‘इस अन्तिम टैब डांस में भाग न लेना मेरे लिए सभ्यता के विरुद्ध होगा।’ ‘लेकिन क्यों?’ अमर को और भी आश्चर्य हुआ।

‘ताकि जिस किसी की इच्छा हो वह आज की ब्यूटी क्वीन के साथ दो पल नृत्य का सम्मान प्राप्त करके अपने जीवन में एक यादगार उत्पन्न कर ले।’ ‘ओह!’ अमर की समझ में बात आ गई । नवयुवक वन्दना पर इसी आशा से आंखें बिछाए हुए थे। उसने मुस्कराकर कहा, ‘तो फिर इस यादगार का प्रारम्भ मैं ही क्यों न करूं?’ वन्दना का दिल खुशी से फूल गया। नृत्य के लिए दोनों लगभग एक साथ ही खड़े हो गए। वन्दना के जीते हुए इनाम टेबल पर रखे हुए थे इसलिए दोनों टेबल के समीप ही फर्श पर नृत्य करने लगे। फिर जब एक नवयुवक ने अमर के कंधे पर टैब किया तो वह मुस्कराता हुआ वन्दना से अलग हो गया और अपनी सीट पर आकर बैठ गया। आज से ब्यूटी क्वीन के साथ नृत्य का सम्मान प्राप्त करने के लिए नवयुवक थोड़ी-थोड़ी देर में ही ब्यूटी क्वीन के पार्टनर को टैब करके ब्यूटी क्वीन अपनी संगति के लिए छीन लेते थे। वन्दना भी हरेक की बांहों में मुस्कराकर जाते हुए औपचारिकता बरतती रही परन्तु उसे इसमें आनन्द भी बहुत आ रहा था। अमर को भी इस खेल-तमाशे जैसे नृत्य में बहुत आनन्द आने लगा। वास्तव में वन्दना जैसी ब्यूटी

क्वीन के साथ एक बार नृत्य करने के बाद कोई भी उसे कभी नहीं भूल सकता था।

वन्दना तथा अमर कप्स संभाले अपने कमरे में पहुंचे तो काफी रात बीत चुकी थी। मेज पर सारे कप्स रखने के बाद अमर ने बालकनी का द्वार खोला तो ठंडी हवाओं का एक तेज झोंका उसके शरीर से आ टकराया। वह बालकनी की रेलिंग पर आया। क्षितिज पर दूर-दूर तक घना अंधकार था। तारों की अनुपस्थिति ने ही बता दिया था कि क्षितिज पर घनी बदली है। वर्षा कभी भी हो सकती थी। अमर ने नीचे लॉन की ओर देखा। जगमगाता लॉन अब खामोश था। क्यारियों में लगे नन्हें-नन्हें फूल तूफानी वर्षा का आभास करके अपनी टहनियों तथा पत्तियों के बीच छिपने के प्रयत्न में लहरा रहे हैं। बालकनी की बत्ती जल रही थी। अमर ने स्विच ऑफ कर दिया। बालकनी में अंधकार की छाया आ गई। अमर वहीं खड़ा-खड़ा अपने प्यार की उस चिंगारी पर ध्यान देने लगा जिसे आज की घटना ने भड़काकर ज्वाला बना दिया था। कमरे के अन्दर वन्दना अपने कपड़े बदल रही थी। अपना नाइट गाउन पहनने के बाद वह भी अमर के समीप बालकनी पर आ खड़ी हुई। वहीं खड़े-खड़े उसने अपनी लटों को खोलकर हवा के झोंको से खेलने के लिए स्वतन्त्र छोड़ दिया। उसने अमर को देखा। अमर अंधकार में उसी

को देख रहा था। वन्दना ने मद्धिम स्वर में पूछा, ‘क्या देख रहे हो?’ ‘ब्यूटी क्वीन।’ अमर ने कहा। उसका स्वर प्यार के जज़्बात में डूबा हुआ था। उसका दिल वन्दना को अपनी बांहों में लेकर प्यार करने को मचलने लगा। ‘मैं भी तो कुछ देख रही हूं।’ वन्दना ने अमर की आंखों में देखा। प्यार से उसने एक ठंडी सांस ली। ‘क्या?’ अमर ने पूछा - अपने दिल पर काबू पाते हुए। ‘मानव की सबसे बड़ी सुन्दरता जो शायद केवल तुम्हें पुरुष के रूप में मिली है।’ ‘बहुत अधिक विश्वास है मुझ पर?’ अमर वन्दना के और समीप आया। ‘हां।’ वन्दना ने बड़े विश्वास के साथ कहा, ‘प्यार की नींव ही विश्वास के सहारे डाली जाती है।’ ‘वन्दना।’ अमर ने एक झटके से वन्दना की बांहें पकड़ लीं। रात के इस सुन्दर तथा रोमांचित वातावरण में वह सब-कुछ भूल जाना चाहता था, अपने-आपको, वन्दना को भी। वह दीवाना-सा हुआ जा रहा था। उसने वन्दना की आंखों में झांका।
 
बालकनी के अंधकार में वन्दना की आंखें इस प्रकार टिमटिमा रही थीं मानो घनी बदलियों के मध्य से दो नन्हें-नन्हें तारे झांक रहे हों। क्षण-भर तक अमर वन्दना को उसी प्रकार बांहों में पकड़कर देखता रहा। फिर उसे अपनी ओर खींचा। वन्दना ने किसी भी प्रकार का बचाव नहीं किया। वह अमर को उसी प्रकार देखती रही, खामोशी से। अमर ने झुकते हुए होंठ वन्दना के होंठों की ओर बढ़ा दिए। उसकी गरम-गरम सांसें वन्दना के मुखड़े पर छा गई। वन्दना को तब भी अमर पर विश्वास था, उसके प्यार पर विश्वास था, साथ ही अपने प्यार पर भी। अमर ने वन्दना का शरीर अपने सुपुर्द देखा तो उसे एक झटके से खींचकर अपनी छाती में समा लिया। वह वन्दना की ओर झुका - और। उसके होंठ वन्दना के होंठों के बिल्कुल समीप आ गए। होंठ मानो वन्दना के होंठों को अब छू ही लेना चाहते थे कि तभी बहुत जोर की बिजली कौंधी। बिजली कड़की भी। बादल गरजा तो गरजता ही गया---दूर तक। बिजली की कौंध में सारा शहर सुनहरे रंग में चमक उठा। पल भर की इस चमक में अमर ने देखा वन्दना की आंखों में उसके प्रति प्यार का अथाह सागर है - पवित्र प्यार का सागर, जिसकी नींव वास्तव में केवल विश्वास के ही सहारे डाली जाती है। अमर दिल-ही-दिल

में बहुत लज्जित हुआ। प्यार की दीवानगी में वह यह क्या करने जा रहा था? दीवानगी के जज़्बात का बहाना लेकर वह किस ओर भटक जाना चाहता था? उसे मानो अपनी स्थिति का अब होश आया। उसने वन्दना को अपनी छाती से अलग करते हुए उसकी बांहें छोड़ दीं। बहुत प्यार से उसने वन्दना को देखा। उसके देखने के अन्दाज में सीमित दीवानगी की पवित्रता थी। वन्दना चमकती दृष्टि से उसी को देख रही थी। उसके होंठों पर एक मुस्कान थी - अपने विश्वास की जीत की मुस्कान। अमर वन्दना की ओर थोड़ा झुका। फिर हाथ बढ़ाकर एक अंगुली द्वारा उसने वन्दना के मुखड़े पर बिखरी लटों को और बिखरा दिया। उसने वन्दना से कहा - ‘जाओ सो जाओ। बहुत रात हो गई है।’ अमर का स्वर जज़्बात की मिठास में डूबा हुआ था। ‘और तुम---?’ वन्दना ने पूछा। ‘मैं?’ अमर ने कहा - ‘मैं भी लेटूंगा।’ उस रात वन्दना नृत्य करते-करते बहुत थक चुकी थी। इसलिए पलंग पर लेटने के बाद वह तुरन्त ही सो गई। अमर कुछ देर तक अपने पलंग पर लेटा करवटें बदलता रहा। फिर उसे भी नींद आ गई।

अचानक बिजली की एक कड़क के साथ वन्दना की आंखें खुल गईं। बिजली की कौंध में उसने देखा कि शीशेदार खिड़कियों के उस पार घनी वर्षा हो रही थी। बादलों की गरज कमरे के अन्दर तक आ रही थी। कमरा पहले ही वातानुकूल था। वर्षा के कारण ठंड और बढ़ गई थी। वन्दना ने अपनी कलाई पर बंधी घड़ी की ओर देखा। सुबह के चार बजना चाहते थे। उसने अमर की ओर देखा। अमर को उसने आज पहली बार निश्चिंत सोते देखा था। शायद उसके प्यार की सफलता के विश्वास ने उसे निश्चिंत कर दिया था। अमर की छाती पर से उसका कम्बल सरका हुआ था। वन्दना उठी। बहुत प्यार के साथ उसने अमर को गर्दन तक कम्बल ओढ़ाया, कुछ देर तक वह अपने पलंग पर उसी प्रकार बैठी रही। फिर लेटकर कम्बल ओढ़ते हुए आंखें बन्द कर लीं। चार जिस समय वन्दना तथा अमर कार द्वारा दुर्गापुर के लिए चले तो पिछली वर्षा के कारण सड़कें भीगी हुई थीं। हवाओं में रात की ठंडक थी। वर्षा की नमी थी। पिछली वर्षा के कारण वृक्षों की पत्तियां धुलकर चमकती हुईं लहरा

रही थीं। लौटते समय वन्दना के बजाए अब अमर ही कार चला रहा था। कार जब दुर्गापुर में प्रविष्ट हुई तो अचानक दूर ही से ठाकुर नरेन्द्र सिंह की कोठी के सामने गांव की एक भीड़ एकत्र देखकर वन्दना तथा अमर चौंक पड़े। भीड़ में उन्हें खाकी वर्दी में अनेक पुलिस के व्यक्ति भी दिखाई पड़े। वन्दना का दिल धक से कर गया। अमर का दिल भी एक अज्ञात भय के कारण कांप गया। अमर ने कार कोठी के लॉन में रोकी। गांववासियों ने उन्हें कार से उतरने से पहले ही घेर लिया। एक ओर से अमर तथा दूसरी ओर से वन्दना कार से बाहर आई। ‘क्या बात है इंस्पेक्टर साहब?’ अमर ने इंस्पेक्टर से तुरन्त पूछा, ‘यहां इतनी भीड़ क्यों लगी है?’ इंस्पेक्टर ने एक बार वन्दना को देखा, सहानुभूति की दृष्टि से फिर अमर से बोला - ‘ठाकुर साहब की हत्या हो गई है।’ ‘क्या?’ अमर को विश्वास नहीं हुआ। वन्दना के दिल पर मानो बिजली गिर पड़ी। मुखड़ा जलकर सफेद पड़ गया था। उसका शरीर ऊपर से नीचे तक कांपने लगा। एक पग पीछे हटते हुए उसने मानो स्वयं से कहा ‘नहीं-नहीं-, ऐसा कभी नहीं हो सकता। नहीं।’

उसने नहीं के संकेत पर सिर हिलाते हुए मानो स्वयं को संतोष देना चाहा। उसका स्वर भी कांप रहा था। वह बहुत जोर से चीखी, ‘नहीं।’ फिर दीवानों के समान दौड़ते हुए उसने बरामदे की सीढ़ियां पार कीं और कोठी के अन्दर प्रविष्ट हो गई। ‘आप वन्दना जी के साथ रहिए।’ इंस्पेक्टर ने अमर को राय दी - ‘इस समय कोठी में उनका अपना कोई नहीं है। ठाकुुर साहब की लाश भी पुलिस पोस्टमार्टम के लिए ले जा चुकी है। रिपोर्ट मिलते ही---।’ अमर ने कुछ और सुनने की आवश्यकता नहीं समझी। इंस्पेक्टर की बात अधूरी छोड़कर वह पलटा और कोठी के अन्दर प्रविष्ट हो गया। वन्दना ठाकुर नरेन्द्र सिंह के शयन कक्ष में कालीन पर बेसुध पड़ी हुई फूट-फूटकर रो रही थी। स्त्रियां उसे पकड़कर तसल्ली दे रही थीं, ‘समझा रही थीं परन्तु वन्दना पर अपनी राय प्रकट करती हुई कह रही थी - ‘हमें क्या, पुलिस को भी विश्वास है कि यह अत्याचार तुम्हारे खानदानी शत्रु शेर सिंह का है। मरने वाला तो बेचारा मर गया परन्तु अब भी अमर ने ने तुम्हारे पूर्वजों का बदला उससे नहीं लिया

तो निश्चय ही तुम्हारे दादाजी की आत्मा को कभी शांति नहीं मिलेगी।’ अमर दरवाजे पर खड़ा उसकी बातें सुनकर सोच में डूब गया था। प्रौढ़ स्त्री की बातें उसके दिल को छू गई थीं। उसके पीछे पुलिस इंस्पेक्टर भी उपस्थित था। अमर कमरे के अन्दर प्रविष्ट हुआ। वन्दना के समीप ही वह नीचे कालीन पर बैठ गया। वन्दना ने उसे देखा तो उसकी आंखों में आंसुओं की धारा बढ़ गई। सिसकियों से उसके होठ ही नहीं सारा शरीर कांपने लगा। उसका मन करता था कि वह अमर की छाती से लिपट जाए। छाती पर सिर रखकर वह फूट-फूटकर रो पड़े। प्रेमी की छाती में मुखड़ा छिपाकर आंसू बहाने से किस प्रेमिका को ढांढस नहीं मिलती है? परन्तु वह उसी प्रकार चुपचाप आंसू बहाने पर विवश थी। अमर उसके लिए सब कुछ था परन्तु अभी वह उसका पति नहीं था। गांववासियों के समक्ष उसके सम्बन्ध खुले हुए थे। सभी जानते थे कि ठाकुर नरेन्द्र सिंह, अमर तथा वन्दना का रिश्ता पसंद करते थे। फिर भी गांव की स्त्रियों के सामने वन्दना कुंवारी थी तथा अमर उसके लिए पराया।

कुछ देर आंसू बहा लेने के बाद वन्दना को तसल्ली मिल गई तो वह अपनी बची हुई सिसकियों तथा होंठों की कम्पन पर काबू पाने का प्रयत्न करने लगी। पुलिस इंस्पेक्टर ने वन्दना को खामोश देखा तो अमर से कहा - ‘शेरसिंह के आदमियों ने तीन बजे घनी वर्षा आरम्भ होने के बाद ही किसी समय आक्रमण किया था। ठाकुर साहब की मांग के अनुसार हमने दो कांस्टेबल उनकी सुरक्षा तथा कोठी की चौकीदारी के लिए लगा दिए थे परन्तु शायद वर्षा के कारण उन दोनों कांस्टेबलों को कोठी के बरामदे में शरण लेनी पड़ गई थी। इस बीच वर्षा के शोर का लाभ उठाकर शेर सिंह के आदमियों ने कोठी पर आक्रमण कर दिया। उन्होंने कांस्टेबलों को गोलियों का निशाना बनाया। फिर ठाकुर साहब की हत्या कर दी। घनी वर्षा के कारण गांववासी या हम घोड़ों की टाप का स्वर नहीं सुन सके। वर्षा के कारण बादल गरज रहे थे इसलिए जब गोलियां चलीं और गूंज थाने तक पहुंची तो हमने यही सोचा कि बिजली कड़क रही है। आक्रमण की सूचना हमें गांव के शोरगुल द्वारा तब पहुंची जब वर्षा के रुकने तथा सुबह निकलने के बाद कोठी की महाराजिन कोठी पहुंची और बरामदे में दो सिपाहियों की लाश देखकर मस्तिष्क का

संतुलन खोती हुई चीखती-चिल्लाती वापस भाग खड़ी हुई।’ इंस्पेक्टर की बातें सुनते-सुनते वन्दना अपनी हिचकियों तथा सिसकियों पर पूर्णतया काबू पा चुकी थी। अमर भी खामोश था। अन्तिम संस्कार के लिए जब ठाकुर नरेन्द्र सिंह की लाश वापस मिली तो चिता के सामने अमर ने मन-ही-मन प्रतिज्ञा की कि ठाकुुर साहब की आत्मा को शांति पहुंचाने के लिए जब तक वह शेरसिंह से बदला नहीं लेगा, शांति की एक सांस नहीं लेगा। अंतिम संस्कार अगली सुबह हुआ था। उसके बाद भी गांववासी कोठी में आते रहे। समझाते रहे कि वन्दना को यह गांव छोड़कर सदा के लिए लंदन में अपनी मां के पास चले जाना चाहिए। नारी को बदले की भावना में जलकर क्रोध की आग बुझाने के बजाए अपने घर की चिन्ता करनी चाहिए। अमर को भी गांववासियों ने कुछ ऐसा ही समझाया कि उसे भी वन्दना के साथ लंदन चले जाना चाहिए। जब पुलिस शेर सिंह का कुछ नहीं बिगाड़ सकी तो वह क्या कर सकता है?

काफी देर बाद जब गांववासी उन्हें अकेला छोड़कर चले गए तो अमर ने वन्दना को अपनी छाती से लगा लिया। वन्दना को भी इसकी बहुत अधीरता के साथ प्रतीक्षा थी। अपने प्रेमी की बांहों में समाकर छाती से लगती हुई वह एक बार फिर फूट-फूटकर रो पड़ी। आंसू बहाते हुए उसने अमर की कमीज भिगो दी। अमर ही अब संसार में उसके लिए सब कुछ था। उस पर अपने दिल की तड़प प्रकट नहीं करती तो किस पर करती? अमर ने उसे संतोष दिया। उसकी लटों में अंगुलियां फेरीं, उसके आंसू अपने हाथों से पोंछे। उसके गाल प्यार से थपथपाए। उसके दुःख में वह बराबर का साझेदार था। वन्दना को मन का संतोष मिलने लगा। ‘वन्दना-।’ अचानक अमर ने कहा - ‘तुम्हारे पास अपना पासपोर्ट तथा अन्य कागजात पहले ही उपस्थित हैं। तुम---’ अमर सकुचाया। परन्तु फिर उसने कहा - ‘तुम ऐसा करो कि अपनी मां के पास लंदन चली जाओ।’ वन्दना ने आश्चर्य से अमर को देखा। ‘हां वन्दना---।’ अमर ने कहा - ‘गांववाले ठीक ही कहते हैं। लंदन में तुम्हारा जीवन बिल्कुल सुरक्षित रहेगा।’

‘क्यों? क्या तुम मेरे साथ नहीं चलोगे?’ वन्दना स्वयं गांववालों के सुझाव से प्रभावित थी। ‘नहीं वन्दना।’ अमर ने कहा - ‘इस समय मेरा तुम्हारे साथ जाना उचित नहीं होगा। अब मेरे सामने पहले से भी अधिक जिम्मेदारियां आ गई हैं। जब तक मैं इन्हें पूरा नहीं कर लूंगा यहां से कभी नहीं जाऊंगा।’ ‘तुम मेरे प्यार की खातिर इन जिम्मेदारियों को भूल जाओ।’ वन्दना ने उसे उसकी जिम्मेदारियों से मुक्त करते हुए समझाया - ‘भूल जाओ कि मैंने या दादाजी ने तुमसे कोई आशा की थी, शेर सिंह से बदला लेने के लिए तुम पर विश्वास किया था, तुम से वफादारी में उसे जीवित या मुर्दा स्थिति में गिरफ्तार करने की मांग की थी। मैं अब और अधिक दुःख नहीं सहन कर सकती। मैंने अपने जीवन का सब-कुछ खोने के बाद तुम्हें पाया है इसलिए तुम्हारे जीवन को खतरे में नहीं डाल सकती। मेरे साथ तुम भी लंदन चलो।’ ‘वन्दना-’ अमर ने वन्दना के गाल पर हथेली रखकर उसकी आंखों में झांका। बोला, ‘क्या तुम चाहती हो कि यहां से जाने के बाद तुम्हारा प्रेमी एक कायर तथा डरपोक व्यक्ति कहलाए? लोग उसके नाम पर थूकते हुए यह कहें

कि देखो, जिसके लिए ठाकुर नरेन्द्र सिंह ने इतना सब कुछ किया वह अपना वचन भूलकर भाग निकला? और फिर क्या यहां से जाने के बाद मैं अपनी ही दृष्टि में नहीं गिर जाऊंगा? तुमसे कभी दृष्टि मिलाकर बात कर सकूंगा? और फिर वन्दना-’ अमर ने एक सांस लेने के बाद कहा, ‘तुम्हारे पास तो इस समय तुम्हारे पासपोर्ट के साथ सभी कागजात तैयार हैं। मुझे तो अभी यह सब प्राप्त करने में समय लग जाएगा। और तब तक तो क्या मैं अब एक दिन भी तुम्हें यहां रोककर किसी प्रकार का भय मोल नहीं ले सकता। मैं चाहता हूं कि तुम आज ही लंदन के लिए रवाना हो जाओ, परन्तु यह बात यहां किसी को ज्ञात नहीं होनी चाहिए, न गांववासियों को और न पुलिसवालों को।’ वन्दना ने अमर को आश्चर्य से देखा। ‘हां वन्दना।’ अमर ने कहा, ‘मैं तुम्हारे यहां से जाने की बात छिपाए रखना चाहता हूं ताकि शेर सिंह समझे कि तुम कोठी में उपस्थित हो।’ वन्दना ने अमर की बात की गहराई समझी। उसे यह भी यकीन हो गया कि हजार समझाने के पश्चात् अमर अपनी जिद नहीं छोड़ेगा। वह एक आत्मसम्माननीय व्यक्ति है। उसने हार मानना कभी नहीं सीखा। फिर भी यदि अमर के

पास पासपोर्ट होता, अन्य कागजात होते तो वह से अपने प्यार की सौगंध देकर अवश्य लंदन जाने पर बाध्य कर देती। विवश होकर उसने अमर के सुझाव पर अपना दिल झुका दिया। हवाई जहाज का टाइम टेबल वन्दना के पास उपस्थित था। लंदन जाने वाले जहाज का समय भी उसे ज्ञात था इसलिए अमर की इच्छाओं का आदर करते हुए उसने उसी शाम अंधकार के बढ़ते ही अमर के साथ हवाई अड्डे के लिए गांव छोड़ दिया। हवाई जहाज में सीट मिल गई। नहीं मिलती तो हवाई अड्डे के होटल में ठहरकर वन्दना अगली सुबह लंदन जानेवाला जहाज पकड़ लेती। टिकट और पासपोर्ट की सारी औपचारिकता पूरी करने के बाद जहाज छूटने में समय बहुत कम रह गया था। फिर जब दो दिलों के बिछुड़ने की घड़ी आई तो वन्दना बहुत उदास थी। मन कर रहा था कि वह अमर को भी साथ ले चले। परन्तु यह कैसे संभव था? ‘लंदन जाकर मुझे भूल तो नहीं जाओगी।’ अमर ने वन्दना का हाथ पकड़कर कहा, कुछ मुस्कराते हुए। उसके स्वर में मजाक भी सम्मिलित था तथा गम्भीरता भी।

वन्दना के होंठ कांपे। गला भर आया। उसने कहा, ‘मुझ पर विश्वास नहीं है तो मुझे अपने पास रोक लो।’ ‘पगली।’ अमर ने प्यार से अपनी अंगुलियों द्वारा वन्दना का कपोल थपथपाया। बोला, ‘विश्वास नहीं होता तो स्वार्थी बनकर वास्तव में तुझे रोक लेता।’ वन्दना ने कोई उत्तर नहीं दिया। अमर से बिछुड़ने का एहसास करके उसका दिल अभी से ही फटा जा रहा था। सहसा माइक्रोफोन पर पुकार हुई। हवाई जहाज को छूटने में अब अधिक देर नहीं थी। यात्रियों को जहाज में बैठ जाने की आज्ञा दी गई थी। वन्दना ने अमर को देखा। उसकी आंखों में झांका। उसने इसके पहले इस अधिकता से कभी इच्छा नहीं की थी परन्तु अब अवश्य चाहा कि बिछुड़ने से पहले अमर उसे अपनी बांहों में समा कर सबके सामने ही प्यार कर ले। वन्दना के दिल के इस उमड़ते तूफान की लहरें उसके होंठों की कम्पन बन गई। अमर ने वन्दना के होंठों पर कांपती लहरें देखीं तो दिल के अन्दर उमड़ते तूफान का भी अनुमान लगा लिया। परन्तु जब वह वन्दना के विश्वास को ‘फिरदौस’ के एकांत कमरे में ठेस नहीं पहुंचा सका था तो इस समय कैसे पहुंचाता?

उसने अपनी दो अगुलियां वन्दना के कांपते होंठों पर रखते हुए बेकाबू होती लहरों को रोक दिया। फिर उसने अपनी अंगुलियां उठाकर अपने होंठों पर रखते हुए चूम लिया। वन्दना के होंठों का स्पर्श उसे मिल गया और शायद वन्दना को उसके होंठों का भी। सहसा यात्रियों को जहाज में अपनी सीटों पर पहुंचने की अन्तिम पुकार हुई। वन्दना की आंखों में आंसू आ गए। परन्तु अमर ने दिल पर पत्थर रखते हुए उसे हंसकर विदा करना उचित समझा। वन्दना का हवाई जहाज छूटने के बाद काफी रात हो गई थी इसलिए अपनी योजना को अगले दिन पूरा करने के लिए अमर वहीं शहर के एक होटल में ठहर गया। अगली सुबह वह शहर के सर्वोच्च पुलिस अधिकारी से उनके दफ्तर में मिला। पुलिस अधिकारी ने उसे आदर सम्मान के साथ अपने सामने खाली कुर्सी पर बिठाया तो अमर ने कुछेक क्षण सांस लेने के बाद उन्हें अपना परिचय देते हुए रामकहानी बताई। ‘मैंने वन्दना को पिछली रात लंदन भेज दिया है परन्तु नहीं चाहता कि यह भेद किसी को ज्ञात हो।’ अमर ने कहा, ‘कोठी में उसकी उपस्थिति का एहसास दिखाते हुए

मैं चाहता हूं कि डाकू शेर सिंह या उसके आदमी वन्दना का अपहरण करने के लिए कोठी पर आक्रमण करने को प्रलोभित होते रहें। परन्तु ऐसा वह आसानी से तभी कर सकते हैं जब उनके दिल से यह भय निकल जाए कि दुर्गापुर पहुंचने पर उन्हें वहां की पुलिस का सामना करना पड़ेगा।’ पुलिस अधिकारी कुछ समझे और कुछ नहीं भी समझे। मस्तक पर बल डालकर सोचते हुए वह अपनी कुर्सी पर पीठ टेक कर आराम से बैठ गए। फिर उन्होंने पूछा, ‘तुम कहना क्या चाहते हो?’ + ‘मेरी आपसे विनती है कि यदि आप दुर्गापुर की पुलिस चौकी को कुछ दिनों के लिए बन्द कर दें या वहां से सारी ही पुलिस हटा लें तो डाकुओं को वन्दना का अपहरण करने की खुली छूट मिल सकती है।’ अमर ने कहा, ‘जब डाकू आक्रमण करेंगे तो मैं किसी भी प्रकार उनके आदमियों में सम्मिलित होने की सफलता अवश्य प्राप्त कर लूंगा ताकि उनके गुप्त अड्डे का पता चला सकूं।’ ‘लेकिन-’ पुलिस अधिकारी ने मेज पर झुकते हुए कुछ सोचकर पूछा, ‘ऐसा तुमने उस समय क्यों नहीं किया जब दुर्गापुर में पुलिस का जरा भी प्रबंध नहीं था?’
 
‘तब तक मुझे इस बात का आभास नहीं था कि शेर सिंह वन्दना के अपहरण में अधिक रुचि रखता है।’ अमर ने कहा, ‘मैं यह समझता था कि शेर सिंह ठाकुर नरेन्द्र सिंह के वंश का केवल नाम और निशान मिटा देना चाहता है। इसीलिए मैं उनके साथ उनकी पोती का रक्षक बनकर दिन-रात उनके साथ रहता था। शेर सिंह से बदले की भावना मेरे अपने दिल के अन्दर भी है क्योंकि वह मेरे भी माता-पिता का हत्यारा है।’ पुलिस अधिकारी अमर की बात सुनकर सोच में पड़ गए। अमर का प्रस्ताव अच्छा था। गांववासी ही नहीं, पुलिस भी शेर सिंह के आतंक से तंग आ चुकी थी। शेर सिंह को जीवित या मुर्दा गिरफ्तार करने के लिए पुलिस कुछ भी करने को तैयार थी। ‘ठीक है-’ पुलिस अधिकारी ने कहा, ‘हम शीघ्र ही दुर्गापुर की पुलिस चौकी को हटाने का प्रबंध कर देंगे। परन्तु जब तुम्हें शेर सिंह के अड्डे का पता चल जाएगा तो तुम हमें तुरन्त कैसे सूचना दोगे?’ मैं चाहता हूं पुलिस चौकी के हटने के बाद आपके कुछ एक पुलिस इंस्पेक्टर्स तथा पुलिस कांस्टेबल सादी वेश-भूषा में ठाकुर नरेन्द्र सिंह की कोठी के मेहमान बनकर रहें,

बन्दूकों की पूरी तैयारी के साथ। पुलिस की अनुपस्थिति में शेर सिंह दुर्गापुर में दिल के उजाले में एक बार आक्रमण करने का परिणाम भोग चुका है इसलिए निश्चित है कि उसका जो भी आक्रमण होगा वह रात के समय ही होगा। मैं चाहता हूं कि जब डाकुओं का आक्रमण हो तो उनका सामना अचानक तथा उनकी आशा के विपरीत करके उन्हें घेरा जा सके। इन पुलिसवालों का दुर्गापुर के वासियों के लिए बिल्कुल अपरिचित होना आवश्यक है ताकि हमारी योजना पर किसी गांववासी को भी संदेह नहीं हो सके। घेराव करने के बाद जब आक्रमणकारियों पर अचानक गोलियों की वर्षा होगी तो उनका साहस टूट जाएगा। उनके बीच भगदड़ मच जाएगी। घबराहट में सब भाग निकलना चाहेंगे और तब उनके गिरोह में चुपचाप अंधकार का सहारा लेकर सम्मिलित होते हुए मुझे कोई परेशानी नहीं होगी।’ अमर ने पुलिस अधिकारी की बात का उत्तर देते हुए कहा, ‘मैं डाकुओं के गिरोह में सम्मिलित होकर अपना घोड़ा सबसे पीछे रखूंगा। रास्ते में थोड़ी-थोड़ी दूर पर मैं मरकरी जैसा नकली पदार्थ भी गिराता जाऊंगा। यह पदार्थ प्रकाश की बहुत हल्की-सी झलक पाकर भी चमक उठेगा। मैं चाहूंगा कि मेरे जाने के बाद मेरी पहले से दी आज्ञा का पालन करते हुए पुलिसवाले जीप का डिपर जलाए दूर से

मेरा पीछा इसी पदार्थ की चमक का सहारा लेकर करते रहें। मेरा पीछा करते समय, उनके पास जीप में, ‘वायरलेस’ का होना अत्यन्त आवश्यक है जिससे पुलिसवाले आपको सूचित करते रहें कि मैं डाकुओं के गिरोह में डाकू बनकर सम्मिलित होने में सफल हो चुका हूं। फिर आपको भी तुरन्त अपने जत्थे सहित पूरी तैयारी के साथ मेरे पीछे-पीछे आती पुलिस से जा मिलने के लिए निकल पड़ना होगा। वायरलैस के द्वारा आपको जंगल में मेरे फेंके चमकीले पदार्थ आपको अपनी मंजिल तक पहुंचाने में पूरी सहायता दे देंगे। मेरे निर्देशन के अनुसार मेरा पीछा करती पुलिस चट्टान की सुरंगों से पहले ही जंगल ही में एक स्थान पर रुक जाएगी। उधर जब मैं शेर सिंह के अड्डे का पता चलाकर वापस अपनी प्रतीक्षा करती पुलिस के पास आऊंगा तो मुझे यकीन है कि आप भी वहां उपस्थित होकर अपने जत्थे सहित तैयार मिलेंगे। तब हम तुरन्त ही शेर सिंह के अड्डे पर पहुंचकर घेराव डाल देंगे। ऐसा न हो कि वह अपने आदमियों सहित थोड़ा-सा भी समय पाकर भाग निकलने में सफल हो जाए’ अमर खामोश हो गया। पुलिस अधिकारी अमर की योजना सुनकर हैरान रह गए। अमर ने मानो उनके सामने एक जासूसी उपन्यास का अध्याय खोल कर रख दिया था। तथा प्रस्ताव में मानो एक

महत्त्चपूर्ण पात्र का अभिनय निभाने की उन्हें चुनौती दी थी। इसलिए उन्होंने अमर का साथ देना स्वीकार कर लिया। बोले, ‘ठीक है, शाम को पांच बजे एक बार तुम मुझसे भेंट कर लेना। मैं तुम्हारी भेंट पुलिस के एक होनहार इंस्पेक्टर से करा दूंगा। उसके बाद हम इस योजना पर ध्यान देते हुए तुम्हारी इच्छानुसार पूरी सहायता करने का प्रयत्न करेंगे।’ ‘धन्यवाद सर, धन्यवाद - बहुत-बहुत धन्यवाद।’ अमर ने कहा और खड़े होकर चलने को तैयार हुआ। उसने कहा, ‘आप विश्वास कीजिए सर, अपनी इस योजना द्वारा मैं आपको कभी निराश नहीं होने दूंगा।’ ‘आई विश यू बेस्ट ऑफ लक।’ पुलिस अधिकारी ने जोश से भरे इस नवयुवक से खड़े होकर हाथ मिलाया। फिर उसे जाने की आज्ञा दे दी। दफ्रतर के बाहर अपनी कार में बैठने के बाद अमर के अन्दर सबसे पहले आज का समाचार पत्र देखने की इच्छा तीव्र हुई। शाम पांच बजे पुलिस अधिकारी से मिलने की प्रतीक्षा में उसे अपना समय काटना था। वह अपने होटल पहुंचा। कमरे के द्वार का परदा अच्छी तरह फैलाने के बाद उसने समाचारपत्र के मुख-पृष्ठ की तस्वीर फिर देखी। नीचे दी गई पंक्तियों में वन्दना की प्रशंसा पढ़ी तो दिल

प्रसन्नता से इस प्रकार गर्वित हो गया मानो समाचारपत्र में छपी सारी प्रशंसाएं उसके अपने विषय में थीं। जज़्बात से बेकाबू होकर उसने तस्वीर में वन्दना के होंठों को चूम लिया तो ऐसा लगा मानो वास्तव में उसे वन्दना के होंठों का स्पर्श प्राप्त हो गया हो। फिर पलंग पर आड़े-आड़े लेटकर वह वन्दना की तस्वीर देखता हुआ उसके विचारों में तल्लीन हो गया। उस रात लगभग ग्यारह बजे अमर जब दुर्गापुर में कोठी पहुंचा तो उसकी कार के पीछे-पीछे सादी वेश-भूषा में पुलिस की दो जीप थीं। गांव में पूरी तरह सन्नाटा छाया था। कोठी पहुंचने के बाद अमर ने सबसे पहले पुलिस की जीप को कोठी के पीछे पुराने तथा वर्षों से बन्द गिराजों के अन्दर छिपाकर सुरक्षित कर दिया। उसके बाद कोठी का प्रवेश द्वार खोलकर बत्तियां जलाईं। पुलिसवालों के रहने का आरामदेह प्रबंध किया। कोठी इतनी बड़ी थी कि एक पुलिस चौकी क्या पुलिस हेडक्वार्टर कोठी में समा सकता था। उसके बाद उसने कोठी की ऊपरी मंजिल की चारों कोनों की बालकनी पर एक-एक सिपाही को चौकीदारी

के लिए खड़ा कर दिया, एक विशेष निर्देशन देकर, कि यदि डाकू आक्रमण करने कोठी पर आएं तो उन्हें कोठी के अन्दर प्रवेश करने से नहीं रोका जाए। केवल उनके आने की सूचना अन्दर पहुंचाई जाए। कोठी के अन्दर आने के बाद डाकुओं पर गोलियां अचानक चलेंगी। और फिर जब वह अपनी जान बचाकर भागें तो उस समय भी केवल हवाई फायर चलाकर उनको हताहत कर दिया जाए। इसके बाद अमर एक नवयुवक इंस्पेक्टर के पास शयनकक्ष में चला गया। शयन कक्ष में अतिरिक्त पलंग थे। एक पलंग इंस्पेक्टर को देने के बाद दोनों लेटे-लेटे आनेवाली घटनाओं पर ध्यान देते हुए योजना बनाने लगे। अगले दिन जब कोठी का द्वार गांववासियों को खुला मिला तो उन्होंने कोठी में आना आरम्भ कर दिया। तब कोठी के बरामदे में अमर सादी वेश-भूषा में खड़े कुछेक पुलिसवालों के साथ बातें कर रहा था। अमर ने गांववासियों को देखा तो अपने साथियों को छोड़कर उसने गांववासियों को बरामदे में ही रोक दिया। उनके स्वागत में उसने सभ्यता तथा नर्मी बरती ताकि उन्हें उसकी योजना पर सन्देह न हो। बरामदे में ही उसने कालीन बिछाई और उनके साथ बैठकर बातें करने लगा, गांववासियों की बातों से उसे पता चला कि दुर्गापुर की पुलिस चौकी पिछली ही शाम

बन्द कर दी गई है और सारे ही सिपाही गांव छोड़कर जा चुके हैं। ‘क्यों?’ अमर ने वास्तविकता जानने के पश्चात् अनजान बनकर आश्चर्य प्रकट किया। ‘कोई कहता है कि दुर्गापुर में रहकर पुलिसवाले शेर सिंह के अत्याचार का शिकार नहीं बनना चाहते, तो कोई कहता है जिस बजट का प्रस्ताव रखकर यहां पुलिस चौकी बनाई गई थी उसे सरकार ने मंजूर ही नहीं किया।’ ‘ओह।’ अमर ने खेद प्रकट किया। बोला - ‘यह तो बहुत बुरा हुआ।’ अमर को ज्ञात हुआ कि पिछली रात गांव में सन्नाटा क्यों छाया हुआ था। ‘हां---’ दूसरे गांववासी ने कहा - ‘परन्तु हम सरकार से अपने गांव के लिए पुलिस चौकी की मांग अवश्य करेंगे। हम आखिर कब तक शेर सिंह के अत्याचार सहन करते रहेंगे?’ ‘तुम लोग घबराते क्यों हो?’ अमर ने कहा - ‘शेर सिंह के अत्याचार से बचाने के लिए मैं जो तुम्हारे साथ हूं।’ ‘अरे बेटा-’ सहसा एक बूढ़े गांववासी ने कहा, ‘अब तुम वन्दना रानी के जीवन की सुरक्षा करोगे या पूरे गांव की?’

‘कैसी है वन्दना बिटिया?’ सहसा दूसरे प्रौढ़ व्यक्ति ने पूछा - ‘उस पर ठाकुर साहब की हत्या का गम कुछ कम हुआ कि नहीं?’ ‘अब तो वह काफी ठीक है।’ अमर ने वन्दना की वास्तविकता भेद में रखते हुए कहा - ‘परन्तु परसों उसका स्वास्थ्य बहुत गम्भीर हो गया था। अब भी उसे आराम की पूरी आवश्यकता है। डॉक्टर की आज्ञा है कि वन्दना से किसी को भी कुछ दिनों तक बिल्कुल मिलने नहीं दिया जाए।’ अमर ने बरामदे के किनारे सादी वेश-भूषा में खड़े पुलिसवालों को देखा। ‘यह कौन लोग हैं?’ सहसा उन्हें देखकर एक गांववासी ने पूछा। ‘इनमें एक डॉक्टर साहब हैं तथा दूसरा उनका सहायक।’ अमर ने कहा - ‘वन्दना के स्वस्थ होने तक यह दोनों यहीं रहेंगे ताकि वन्दना की देखरेख में कोई कमी नहीं हो। अन्य तीन नवयुवक मेरे मित्र हैं। जब तक वन्दना स्वस्थ होकर लंदन नहीं चली जाएगी मैं इन्हें अपने पास ही रखूंगा। शेर सिंह के आक्रमण के समय कम-से-कम इन मित्रों से मुझे कुछ सहायता तो मिल ही जाएगी।’

‘तो क्या तुमने निश्चित कर लिया है कि वन्दना बिटिया को अवश्य लंदन भेज देंगे?’ एक गांववासी ने पूछा। ‘बिल्कुल निश्चित कर चुका हूं।’ अमर ने कहा, ‘बस उसके स्वस्थ होने भर की देर है। उसे यहां अधिक रखकर मैं उसके जीवन पर अब किसी भी प्रकार का भय मोल नहीं ले सकता।’ ‘यह तो बेटा तुमने वास्तव में बहुत बुद्धिमानी की बात सोची।’ गांववासी ने अमर की दूरदर्शिता की सराहना की। और गांववासी चले गए। और खुशकिस्मती से दो दिन बाद ही अमर की यह अनोखी योजना एक बहुत बड़ा रंग लेकर आ गई जिसकी प्रतीक्षा अमर को मानो दो दिन से नहीं, वर्षों से थी। शेर सिंह को जब अपने आदमियों द्वारा ज्ञात हुआ कि वन्दना स्वस्थ होते ही लंदन के लिए भारत छोड़ देगी तो उसने उसका अपहरण करने के लिए अधिक प्रतीक्षा नहीं की। दो दिन बाद ही उसने पूरे प्रबन्ध के साथ कोठी पर आक्रमण करने के लिए अपने आदमियों को भेज दिया था, पुलिस की देखरेख से गांव वंचित था फिर भी उसने किसी प्रकार का भय मोल न लेते हुए कोठी पर अपने आदमियों को आक्रमण के लिए सुबह साढ़े तीन बजे भेजा था जो

गांववासियों के लिए दिन-भर खेतों पर कड़ी मेहनत करने के बाद निद्रा का सबसे सुहाना समय होता है। कोठी पर डाकुओं का आक्रमण हुआ तो अमर की योजना के अनुसार ही सारा काम सादी वेश-भूषा की पुलिस ने अंजाम दिया। कोठी की ऊपरी मंजिल पर बालकनी में खड़ी तैनात पुलिस ने डाकुओं को कोठी में प्रविष्ट होने दिया। फिर दनादन डाकुओं पर चारों ओर से ऐसी गोलियां चलीं कि डाकू हताश होकर भागने का रास्ता ढूंढने लगे। कुछेक डाकू मारे गए तो कुछेक जीवित भी गिरफ्तार कर लिए गए। गिरफ्तार डाकुओं में अमर के कद अनुसार एक डाकू को अलग कमरे में ले जाया गया जहां अमर ने उसके सारे वस्त्र पहन लिए। अपनी दोनों रिवॉल्वरों की पेटी उसने गोलियों सहित कमर से बांधी। फिर डाकू की बंदूक कंधे से लगाकर वह जैसे ही डाकुओं के भेष में तैयार हुआ, पुलिसवालों ने कुछेक बचे डाकुओं को बड़े सुन्दर तथा नाटकीय ढंग से कोठी से भाग निकलने का अवसर दे दिया। डाकुओं ने कोठी से अपनी जान का पीछा छुड़ाकर जब वापसी का रास्ता थामा तो अमर भी उन सबके पीछे-पीछे साथ था। रात का अंधकार था। ऊपर से बचे हुए डाकू परास्त और हताश थे। अपनी जान बचाकर भागते समय किसी की ओर देखने की आवश्यकता ही नहीं महसूस

की। यूं भी चट्टान की सुरंग के अन्दर अड्डे पर पहुंचने से पहले सभी डाकुओं की आंखों पर पट्टी बांध दी जाती थी इसलिए उनके गिरोह में धोखा देकर सम्मिलित होने वाला सुरंग के अन्दर पट्टी बांधते समय तुरन्त पहचाना जा सकता था। परन्तु अमर ने इसकी चिन्ता नहीं की थी। डाकुओं के साथ भागते समय वह जानता था कि उसके थोड़ी-थोड़ी दूर पर फेंके नकली मरकरी जैसे पदार्थ की चमक का सहारा लेकर पुलिस की जीप दूर से उसका पीछा कर रही है। डाकुओं के गिरोह के साथ वह चट्टान के सामने आया तो एक ओर पानी का झरना रात के अंधकार में तारों का प्रतिबिम्ब लिए झिलमिला रहा था, डाकुओं के पीछे-पीछे वह एक सुरंग में प्रविष्ट हुआ, सुरंग में बिल्कुल अंधकार था, अमर ने इसे अपने प्रति लाभदायक ही समझा। सुरंग के अन्दर सब घुड़सवार खामोश खड़े किसी विशेष बात की प्रतीक्षा कर रहे थे। वह भी उनकी खामोशी में सम्मिलित हो गया। उसकी आंखें जंगली चीते के समान अंधकार में इधर-उधर घूरती हुईं सतर्क थीं। सहसा एक जंगली पक्षी जैसे स्वर की घंटी बजी, रास्ता साफ होने का यह संकेत था। सुरंग के अन्दर पत्थरों के मध्य छुपने के कुछ सुरक्षित स्थान बने हुए थे। पक्षी का स्वर सुनकर कुछेक डाकू इन

स्थानों से बाहर निकल आए। सभी के एक हाथ में बन्दूकें थीं, तो दूसरे हाथ में तारे समान टिमटिमाती छोटी-छोटी टॉर्च। इसको देखते ही सारे घुड़सवार नीचे उतरे तो अमर ने भी ऐसा ही किया। छोटी-छोटी टॉर्च की टिमटिमाहट ने सुरंग के अन्दर हल्का प्रकाश फैला दिया था इसलिए अमर अन्य डाकुओं से हटकर और पीछे खड़ा हो गया। सहसा टॉर्च लिए डाकू आगे बढ़े। घोड़े से आए डाकुओं के मुखड़े पर प्रकाश फेंककर उन्हें पहचानते हुए उनकी आंखों पर पट्टी बांधने लगे। अमर का दिल धक-धक करने लगा। अपनी पेटी की रिवॉल्वर पर हाथ फेरते हुए उसने सुरंग के बाहर देखा। सुबह का अंधकार था। पौ फटने में अभी बहुत देर थी। उसने अपने घोड़े की लगाम हाथों में सख्त कर ली। तभी टॉर्च लिए एक डाकू अमर के पास भी आया। उसके मुखड़े पर उसने टॉर्च का हल्का-सा प्रकाश फेंका। अमर को वह नहीं पहचान सका तो अपनी आंखों पर जोर देकर टॉर्च को अमर के मुखड़े के और समीप किया। अमर की छाती के नीचे अन्धकार हो गया। डाकू के मुखड़े पर भी अंधकार था। डाकू ने अमर को न पहचान कर जैसे ही अपनी बन्दूक कंधे से उतारनी चाही वह अचानक अपनी कनपटी से नीचे गर्दन से सटी रिवॉल्वर की चुभन महसूस करके चौंक गया।

‘जबान से एक शब्द भी निकाला तो गोली गर्दन से पार हो जाएगी।’ अमर अंधकार का सहारा लेकर डाकू की गर्दन पर रिवॉल्वर रखे दबे स्वर में कह रहा था। डाकू के हाथ अपने कंधे पर रखी बन्दूक की ओर बढ़ते-बढ़ते रुक गए। उसे पसीना आ गया। ‘पट्टी बांधो।’ अमर ने उसी प्रकार डाकू की गर्दन पर रिवॉल्वर की नली सटाए हुए कहा, ‘लेकिन जरा आंखें बचाकर।’ डाकू ने कांपते हाथों से अमर की आज्ञा का पालन किया। परन्तु फिर उसे मानो एक संतोष प्राप्त हो गया। उसने सोचा, उसके आदमियों के साथ यह व्यक्ति एक बार अड्डे के अन्दर प्रविष्ट हो गया तो जीवित रहने का प्रश्न ही नहीं उठेगा। अमर ने अपने घोड़े की लगाम छोड़कर उसी हाथ द्वारा अपनी आंखों की पट्टी को ठीक किया। फिर जब सब डाकू सुरंग से बाहर निकलने लगे तो अमर ने अपने साथ के डाकू को उसी प्रकार दबे स्वर में आज्ञा दी, ‘मुझे सबके पीछे-पीछे ले चलो। और याद रखना, यदि चालाकी बरतने का जरा भी परिवर्तन किया तो---’ अमर की अधूरी बात ही डाकू को दोबारा सावधान करने के लिए बहुत थी।

सुरंग के बाहर निकलने के बाद सब डाकू झरने के सामने आए तो अचानक झरने का पानी रुक गया। झरने के बाद चट्टानों में एक द्वार खुला। द्वार के अन्दर एक लम्बी सुरंग थी जिसके अन्दर अगल-बगल झागदार बत्तियां जल रही थीं। सारे डाकू द्वार में प्रविष्ट होकर आगे बढ़ने लगे तो अन्त में अमर की भी बारी आई। अमर बहुत ध्यान से सुरंग के अन्दर देख रहा था परन्तु एक हाथ उसका रिवॉल्वर पर तैयार था तथा दूसरा हाथ घोड़े की लगाम थामे सख्त था। शेर सिंह के अड्डे के अंदर प्रविष्ट होने का रास्ता उसे मिल चुका था इसलिए उसने सुरंग के अंदर प्रविष्ट होने का रिस्क लेना बुद्धिमानी नहीं समझी। इससे पहले कि उसके सामने चलता डाकू उसे लेकर सुरंग के द्वार में प्रवेश करे, अमर ने तुरन्त रिवॉल्वर निकालकर एक गोली अपने सामने डाकू की पीठ पर दाग दी। एक धमाका हुआ। गूंज सुरंग के अंदर प्रविष्ट होकर दूर तक चट्टान की दीवारों से टकराती चली गई। धमाके के कारण चट्टानों के बाहर दरारों में आसपास के वृक्षों पर बैठे पक्षी चीखकर उड़ते हुए क्षितिज पर छा गए। उनकी चखचख चियूं-चियूं तथा चीं-चीं के स्वर से सारा जंगल भयभीत होकर कांप उठा। गोली का धमाका होते ही अमर के सामने का डाकू एक लाश बनकर वहीं गिर पड़ा था। सुरंग के द्वार के अन्दर सभी

डाकू पहुंच चुके थे। धमाके ने सबके अन्दर खलबली मचा दी। इससे पहले कि सब यह बात जान सकें कि धमाके की वास्तविकता के पीछे क्या भेद है, अमर बिजली के समान घोड़े पर सवार होकर चट्टानों के क्षेत्र से बाहर निकलकर अंधकार में जाने कहां लुप्त हो गया था। वास्तविकता का आभास करने के बाद डाकुओं ने अमर का पीछा करना चाहा। परन्तु सुरंग के बाहर निकलने से पहले ही सुरंग का द्वार अन्दर से बन्द हो चुका था। द्वार के बाहर एक झरना एक बार फिर अपने रंग पर आकर गिरता हुआ शोर मचाने लगा। झरने के पीछे चट्टान का द्वार शेर सिंह ने बन्द किया था। जो अपने सुरक्षित कमरे में एक टेलीविजन जैसे यन्त्र के सामने बैठा बहुत बेचैनी के साथ झरने के द्वार में प्रविष्ट होते अपने आदमियों के मध्य वन्दना तलाश कर रहा था। आशा के विपरीत जब वन्दना उसे नहीं दिखाई पड़ी तो उसने अमर का पीछा करवाने के बजाए चट्टान का द्वार अन्दर से बन्द कर दिया था। वह जानता था कि अब उसका खेल समाप्त हो चुका है। इस खेल को कभी-न-कभी तो समाप्त होना ही था इसलिए किसी प्रकार का रिस्क न लेकर उसने इस खेल को आज ही समाप्त कर देने का इरादा कर लिया। परन्तु

उसके भविष्य में क्या लिखा था वह नहीं जानता था। होनी को किसने टाला है। अमर जब जंगल में अपनी प्रतीक्षा करती पुलिस के पास पहुंचा तो सुबह की दूधिया चमक हल्के-हल्के क्षितिज पर बसेरा कर रही थी। वहां पुलिस अधिकारी भी अपने जत्थे सहित पहुंच चुके थे। सभी को अमर की चिंता सता रही थी। अमर के घोड़े की टाप सुनकर सब सतर्क हो गए थे। अमर जब उनके सामने घोड़े पर से उतरा तो बुरी तरह हांफ रहा था। ‘शेर सिंह के खुफिया अड्डे का पता चल गया है।’ अमर ने उसी प्रकार फूलती सांसों के साथ पुलिस अधिकारी को बताया - ‘अब हमें उस अड्डे को घेरने में एक मिनट भी देर नहीं करनी चाहिए। आइए मेरे साथ।’ अमर ने मानो पुलिस अधिकारी को ही आज्ञा दे दी। पुलिस वालों की आंखों की चमक बढ़ गई। लपक कर सब पुलिस की गाड़ियों में बैठ गए। अमर अपने घोड़े पर सवार हो गया। वह आगे बढ़ा तो पुलिस की गाड़ियां भी

उसके पीछे-पीछे जंगल का रास्ता काटती हुईं आगे बढ़ने लगीं। अमर पुलिस के जत्थे के साथ सुरंगों वाली चट्टान के पास पहुंचा तो सुबह के दूधिया वातावरण में और चमक आ गई थी। झरने के सामने वह अपने घोड़े से उतरा तो पुलिस अधिकारी तथा अन्य पुलिस कर्मचारी भी पुलिस गाड़ियों से उतरकर उसके पास चले आए। अमर ने पुलिस अधिकारी से कहा - ‘खुफिया अड्डे का मुख्य द्वार इसी झरने के पीछे है परन्तु इसे खोलने के लिए डाइनामाइट से उड़ाना पड़ेगा।’ उसने झरने की ओर संकेत किया। पुलिस अधिकारी ने ही नहीं, सभी पुलिसवालों ने झरने की ओर बहुत आश्चर्य से देखा। वे तो कभी सोच भी नहीं सकते थे कि इस झरने के पीछे भी कोई द्वार हो सकता है। पुलिस अधिकारी की आज्ञा पर झरने के अन्दर प्रविष्ट होकर चट्टान की दीवार डाइनामाइट द्वारा उड़ाने का तुरन्त प्रबन्ध किया गया। डाइनामाइट का धमका हुआ - बहुत तेज स्वर के साथ। सुबह की खामोशी में जैसे ज्वालामुखी फट गया हो। चट्टान की दीवार के टुकड़े-टुकड़े हो गए। देखते ही देखते झरने के गिरते पानी का शोर कम होने लगा। झरने की दीवार पतली

हो गई। पुलिसवालों ने देखा, झरने का पानी समाप्त होते ही उनके सामने एक सुरंग खुल गई थी। उन्हें ऐसा लगा मानो वह किसी ‘अरेबियन नाइट्स’ पर आधारित कोई जादू भरी फिल्म देख रहे हों। पुलिस अधिकारी की आज्ञा पर सर्चलाइट से काम लेते हुए कुछेक पुलिसवालों ने सुरंग के अंदर प्रवेश किया। अमर के साथ पुलिस अधिकारी भी थे। सुरंग के अंदर कुछ दूर चलने के बाद एक लोहे का द्वार मिला। पुलिस ने इसे भी डाइनामाइट करके उड़ा दिया इसके अंदर जब सारे पुलिसवाले प्रविष्ट हुए तो सर्चलाइट की चमक में यहां का एक अलग ही संसार देखकर भौंचक्के रहे गये । चट्टान की मजबूती से घिरा चट्टान के अन्दर यह काफी लम्बा तथा चौड़ा हॉल था जिसके एक किनारे डाकुओं के रहने के लिए अत्यन्त सुन्दर तथा छोटे-बड़े क्वार्टर बने हुए थे। देखने से ही पता चलता था कि आराम के साथ इनमें कुछेक अय्याशी की वस्तुओं से भरपूर हैं। क्वार्टर सभी खाली तथा सुनसान पड़े थे। सारे-के-सारे डाकू इतनी जल्दी कहां चले गए? कुछ पता ही नहीं चल रहा था। इस हॉल के अन्दर इधर-उधर चट्टानी दरारों से पानी प्रविष्ट होकर फैलता जा रहा था।
 
सर्चलाइट के झागदार प्रकाश में पुलिस अधिकारी को इस लम्बे-चौड़े हॉल के बाद एक लोहे का मजबूत बन्द दरवाजा फिर दिखाई दिया। पुलिस ने आज्ञा पाकर इसे भी डाइनामाइट से उड़ा दिया। पुलिसवाले आरम्भ से ही अपनी बंदूकें ताने हर खटके को निशाना बनाने को तैयार थे। सबने इस द्वार के अन्दर प्रवेश किया। यहां भी एक नया संसार था, वैज्ञानिक दृष्टि से पुलिसवालों की समझ से बिल्कुल बाहर। यहां कहीं ‘जूं’ तो कहीं ‘सूं’ का स्वर आता सुनाई पड़ रहा था। धुआं-धुआं समां-सा था चारों ओर। हर वस्तु बिखरी पड़ी थी। ऐसा लगता था मानो शेर सिंह ने अपने ही हाथों से डाइनामाइट द्वारा अड्डे को उड़ाकर नष्ट कर देने का प्रयत्न किया था। पुलिस वालों ने सर्चलाइट की सहायता से एक-एक कोने की छानबीन की। फिर भी किसी व्यक्ति की लाश हाथ नहीं लगी। इसके बाद इधर-उधर अनेक द्वार ऐसे थे जो हाथ के एक ही झटके से खुल गए। पुलिस ने हर कमरे की तलाशी ली। सभी कमरों में वैज्ञानिक वस्तुएं थीं - एक-से-एक अच्छी मशीनें परन्तु डाइनामाइट द्वारा सभी के पुर्जे-पुर्जे उड़ाकर उन्हें नष्ट कर दिया गया था। समीप का दरवाजा खोलकर अमर, पुलिस अधिकारी तथा अन्य कुछ पुलिस वाले दूसरे कमरे में प्रविष्ट हुए। यहां का वातावरण अत्यन्त गरम था। एक प्रकार की गैस

से सबका दम घुटने लगा। परन्तु गैस में इतना प्रभाव नहीं था जो जानलेवा सिद्ध होता क्योंकि गैस की मशीन डाइनामाइट के धमाके के कारण अब काम नहीं कर रही थी। धमाके के कारण गैस चैम्बर का फायर प्रूफ धातु से बना मजबूत द्वार कहीं-कहीं से चिटक गया था। द्वार के जोड़ों में दरारें पड़ गई थीं जहां से बची-खुची गैस बाहर आ रही थी। परन्तु पुलिस अधिकारी ने इस गैस का मुकाबला अपने आदमियों की जान पर खेलकर करना बुद्धिमानी नहीं समझी। पलटकर कमरे से बाहर निकलते हुए उन्होंने चीखकर सबको आज्ञा दी, ‘बाहर निकलो - तुरन्त।’ पुलिस अधिकारी के पीछे-पीछे उनके सभी आदमी तथा अमर लपककर इस कमरे से बाहर निकल आए। पुलिस अधिकारी ने द्वार को तुरन्त बन्द कर दिया। गैस का प्रभाव कम हो गया। पुलिस अधिकारी एक क्षण वहीं खड़ा सोचता रहा। कुछ क्षणों के बाद पुलिस अधिकारी ने समीप का दूसरा द्वार खोला। यह कमरा भी डाइनामाइट द्वारा नष्ट किया जा चुका था। परन्तु फिर भी यह अपनी अनुपम सुन्दरता ऐश और आराम की गवाही दे रहा था। उसकी छत कहीं-कहीं से टूटकर फर्श पर बिखरी पड़ी थी। गर्द की धुंध अब भी फैली हुई थी। एक ओर टेलीविजन जैसा एक बड़ा-

सा सेट था - धमाके के कारण टूटा-फूटा। अद्भुत ढंग की मशीनें टूटकर बिखरी पड़ी थीं। सहसा सर्चलाइट के झाग में पुलिसवालों की दृष्टि फर्श पर पड़ी जहां दो लाशें रक्त में डूबी हुई थीं। सभी इन लाशों की ओर खिंच आए। पुलिस अधिकारी ने देखा, इन दो व्यक्तियों की हत्याएं पीठ में गोली लगने के कारण हुई थीं। पुलिस अधिकारी की आज्ञा पर सर्चलाइट कमरे के अन्य स्थानों पर फेंकी जाने लगी। तभी एक किनारे दीवार से लगे तथा फर्श पर टेढ़ी पड़ी एक बड़ी फ्रेमदार तस्वीर को देखकर पुलिस अधिकारी चौंक पड़े। वह तस्वीर के समीप आए। तस्वीर परिचित थी। डाकू शमशेर सिंह की एक तस्वीर पुलिस के रिकॉर्ड में भी दर्ज थी। पुलिस का कौन जिम्मेदार व्यक्ति शमशेर सिंह को नहीं पहचानता था।

सर्चलाइट की झलक में पुलिसवालों की दृष्टि दीवार पर आड़ी होकर टंगी एक और फ्रेमदार तस्वीर पर पड़ी। सब के साथ पुलिस अधिकारी का ध्यान भी इधर खिंच आया। यह तस्वीर शमशेर सिंह के छोटे से परिवार की थी, उसकी पत्नी तथा बीच में बैठे उसकी नन्ही सन्तान की - शेर सिंह की, जब वह दो-तीन वर्ष का होगा। शेर सिंह की सूरत को कोई नहीं पहचानता था इसलिए सब बहुत ध्यान से उसकी बचपन की तस्वीर को ही देखते हुए उसके जवान रंग-रूप का अनुमान लगाने लगे। अचानक एक हल्की-सी कराह उठी। पुलिसवाले चौंक गए। सर्चलाइट ने तुरन्त ‘कराह’ का पीछा किया। एक ओर कुर्सी पर बैठा व्यक्ति अपने सामने की मेज पर सिर ढलकाए शायद जीवन की अन्तिम सांसें ले रहा था। सबने उसकी ओर बढ़ जाना चाहा परन्तु तभी अनुभवी पुलिस अधिकारी की दृष्टि सर्चलाइट की चमक में कुर्सी के नीचे जा पड़ी। बम? अपने साथियों को धक्का देते तथा अपनी जन की चिन्ता न करके कर्त्तव्य निभाते हुए पुलिस अधिकारी बम की ओर लपके। बम उठाकर उन्होंने तुरन्त दौड़ते हुए समीप का द्वार खोला और फिर बिना एक क्षण गंवाए बम दूर फेंक दिया। एक धमाका हुआ। धमाका

जोरदार था, इतना अधिक कि आसपास की वस्तुएं टुकड़ों में उड़कर बिखर गईं। फिर सब कुर्सी पर बैठे ढलके व्यक्ति के समीप पहुंचे। उस व्यक्ति के सिर से रक्त निकलकर बहते हुए कान और गर्दन के पास जम गया था। उसके सिर के बाल लम्बे थे। पुलिस अधिकारी ने लटों से पकड़कर उसका मुखड़ा अपनी ओर किया। मुखड़े पर झाड़ी समान तितर-बितर मूंछें तथा दाढ़ी थी - रक्त में डूबी हुई। सारा मुखड़ा ही रक्त में डूबा हुआ था। रक्त की पपड़ियां जम गई थीं। जाने कौन-सा व्यक्ति था यह? कोई भी तो इसे नहीं पहचानता था। इसी बीच अमर की दृष्टि अपरिचित व्यक्ति के गले में पड़े लॉकेट पर पड़ी। उसने तुरन्त झटककर लॉकेट उसके गले से बाहर खींच लिया। उसने लॉकेट खोला तो पुलिस अधिकारी की दृष्टि भी लॉकेट की ओर उठ गई। लॉकेट के अन्दर एक तस्वीर थी। तस्वीर को देखते ही पुलिस अधिकारी तथा अमर की आंखों की चमक बढ़ गई। दोनों ने दीवार पर टेढ़ी टंगी फ्रेमदार तस्वीर देखी - शमशेर सिंह के छोटे-से परिवार की तस्वीर। लॉकेट के फ्रेम में भी बिल्कुल वही तस्वीर थी। अमर तथा पुलिसवालों को इस व्यक्ति का परिचय मिल गया। आखिर शेर सिंह कानून के पंजों से नहीं बच सका। कानून से बचने के लिए उसने निश्चय

ही आत्महत्या का प्रयत्न किया होगा, आसपास के बम के धमाकों ने उसे घायल करके बेहोश भी कर दिया परन्तु जो बम उसने विशेष तौर पर अपनी मृत्यु के लिए सुरक्षित रखा था वह समय से न फूटकर उसे धोखा दे गया था। इंकार कर गई थी। पुलिस अधिकारी ने उसकी जान सुरक्षित करने के लिए उसे पुलिस की कड़ी निगरानी में अस्पताल भेजने का प्रबंध कर दिया। फिर पुलिस अधिकारी ने अमर से हाथ मिलाकर इतनी बड़ी सफलता पर उसे बधाई दी। उसके कंधे पर प्यार से हाथ रखकर उसने कहा, ‘तुमने अपने साहस तथा बल के सहारे जिस प्रकार हमारी सहायता करते हुए कानून का साथ दिया है उसे पुलिस विभाग कभी नहीं भूलेगा। इसके साथ ही शेर सिंह को सजा होते ही मैं उस पर रखे सारे इनामात सरकार द्वारा तुम्हें दिला दूंगा। तुम्हें किसी बात की चिन्ता करने की आवश्यकता नहीं पड़ेगी।’ अमर ने गम्भीर स्वर के साथ कहा, ‘मेरा इनाम यहां नहीं है। मेरा इनाम तो लंदन में है - सुरक्षित। आज मेरे दिल पर से एक बहुत बड़ा बोझ उतर गया है क्योंकि मैं ठाकुर नरेन्द्र सिंह को दिया वचन पूरा करने में कामयाब हुआ हूं। आज उनकी ही नहीं उनके बेटे तथा उनकी पत्नी की आत्मा को भी शांति प्राप्त हो गई होगी। आज मैं अपने कर्त्तव्य की परीक्षा

में खरा उतरा हूं। अपने इरादों में मैं सफल हुआ हूं। अब मेरे प्यार को साकार रूप मिलने से कोई नहीं रोक सकता। मुझे और कुछ भी नहीं चाहिए। अमर का स्वर जाने किस जज़्बात के दबाव में आकर भीग गया। शेर सिंह की गिरफ्तारी की सूचना दुर्गापुर गांव में ही नहीं अन्य सभी गांव तथा शहर में जंगली आग के समान पहुंच गई। अस्पताल के अन्दर शेर सिंह को होश में लाने के लिए पुलिस की कड़ी निगरानी में रखा गया था। परन्तु फिर भी जनता की घनी भीड़ अस्पताल पर टूट पड़ना चाहती थी। अमर दुर्गापुर पहुंचा तो वहां के निवासियों ने उसके स्वागत में उसे जीप से उठाकर अपने कंधे पर बिठा लिया। उसकी जय-जयकार करने लगे। स्त्रियां घर से मिठाइयां लेकर उसका मुंह मीठा कराने को लपक आईं। अब न शेरसिंह रहेगा न उसका भय। उस रात अमर को अपने गांववासियों से बहुत देर बाद फुर्सत मिली। काफी रात बीत गई थी फिर भी उसने सबसे पहले वन्दना को पत्र लिखा। पत्र में उसने शेर सिंह की गिरफ्तारी से संबंधित सारी घटना का उल्लेख किया। उसने

वन्दना को यह भी लिखकर बताया कि सारे शहर में शेर सिंह की गिरफ्तारी का क्या प्रभाव पड़ा है। ‘वन्दना’, उसने लिखा, ‘अब किसी में भी शेर सिंह के आतंक का कोई भय नहीं रहा। अब तो निश्चय ही तुम्हारे दादा-दादी जी, तुम्हारे पिता की आत्मा की भी शांति प्राप्त हो गई होगी। ‘तुम भी प्रसन्न हो ना वन्दना? अब तुम्हारा अतीत भूलकर भी तुम्हारे समीप नहीं फटकेगा। अब मैं होऊंगा, तुम होगी, और हमारा प्यार होगा, एक सुन्दर घर, जिसे चाहो तो लंदन में बस सकती हो या यहां भारत में, अपनी पुरानी कोठी को ही स्वर्ग का नया रूप देकर। मैं अब तुम्हारे साथ हर स्थिति में, हर स्थान पर रहकर बहुत सुखी रहूंगा - बिल्कुल निश्चिंत। समाज के सामने ऐसे प्यार की नींव डालेंगे जिसकी कोई उपमा नहीं होगी। चाहो तो अत्याचार के इस दरिन्दे को देखने के लिए तुम भारत आ सकती हो। अभी वह अस्पताल में है परन्तु स्वस्थ होने के बाद मुकदमा चलेगा। फिर अदालत उसे फांसी की सजा देकर उसके पापों के बोझ से इस धरती को मुक्त कर देगी। तुम्हारा और केवल तुम्हारा, अमर

पत्र लिखने के बाद अमर उसी प्रकार कुछ देर तक सोचता रहा। वन्दना इस पत्र को पाते ही आकाश में झूला-झूल जाएगी। उड़कर उसकी बांहों में चली आने को तड़प उठेगी। शेर सिंह को गिरफ्तार कराकर उसने मानो वन्दना के जीवन की एक साध पूरी कर दी थी। सुबह के लगभग ग्यारह बजना चाहते थे। अस्पताल से बाहर अब भी जनता का समूह एकत्र था। अस्पताल के एक विशेष वार्ड के अन्दर पुलिस की कड़ी निगरानी में शेर सिंह अब भी बेहोश अपने पलंग पर पड़ा हुआ था। उसके मुखड़े के घाव को अच्छी तरह धोने तथा साफ करने के लिए डॉक्टर को उसकी दाढ़ी-मूंछ की शेव करानी पड़ गई थी। शेव होने के बाद उसके मुखड़े की लालिमा चमक उठी थी। रंग-रूप निखर आया था। शेर सिंह के कमरे में डॉक्टरों के अतिरिक्त पुलिस अधिकारी, एक इंस्पेक्टर तथा अमर भी उपस्थित था। गिरफ्तारी के बाद शेर सिंह की प्रतिक्रिया देखने के लिए अमर से अधिक कौन इच्छुक होता। दुर्गापुर से वह अस्पताल के लिए सुबह-ही-सुबह चल पड़ा था। सभी शेर

सिंह के होश में आने की प्रतीक्षा बहुत बेचैनी के साथ कर रहे थे। सहसा शेर सिंह की आंखें फड़फड़ाईं। वार्ड के अन्दर उपस्थित सभी लोगों की आंखें शेर सिंह के मुखड़े पर चिपक गईं। कान सतर्क हो गए। शेर सिंह ने अपने मस्तक पर बल डाला, कुछ अधिक ही जोर देकर, मानो दर्द के कारण उसका सिर फटा जा रहा है। अचानक वह अपने दोनों हाथों से अपना सिर पकड़ता हुआ एक झटके के साथ उठकर बैठ गया। उसने अपनी आंखों पर जोर देकर कमरे के वातावरण को परखा। आंखें बंद करके उसने अपने सिर को एक बार जोर से झटका दिया। आंखों के साथ उसने मस्तक पर बल डालकर दोबारा जोर दिया और फिर आश्चर्य से अपने समीप के लोगों को देखा। उसने पूछा - ‘कौन हैं आप लोग? मुझे यहां क्यों लाया गया है?’ कमरे में उपस्थित सभी ने आश्चर्य से एक-दूसरे का मुंह देखा। शेर सिंह के इस विचित्र व्यवहार का कारण कोई समझ नहीं सका। ‘क्या चाहते हैं आप लोग?’ शेर सिंह ने दोबारा पूछा। फिर खिसियाकर मानो स्वयं पर ही चीख पड़ा - ‘क्या चाहते हैं आप लोग?’ शेर सिंह ने अपना सिर दोनों हाथों

से पकड़कर झिंझोड़ दिया। अचानक सिर पर बंधी पट्टी का एहसास करके वह चौंक गया। पट्टी पर हाथ फेरते हुए उसने आश्चर्य प्रकट किया। बोला - ‘यह क्या है? पट्टी? मैं कहां हूं? मैं---।’ ‘तुम एक अस्पताल में हो।’ सहसा डॉक्टर ने उसकी समस्या दूर करते हुए कहा। ‘अस्पताल?’ शेर सिंह को मानो विश्वास नहीं हुआ। उसने सख्ती के साथ चिड़चिड़ेपन से पूछा - ‘यहां मुझे कौन लाया है? क्यों लाया है?’ ‘यहां तुम्हें हम लेकर आए हैं।’ सहसा पुलिस अधिकारी ने कहा - ‘जिस समय हमने तुम्हें तुम्हारे अड्डे पर गिरफ्तार किया उस समय तुम घायल स्थिति में बेहोश थे। इसलिए तुम्हें हम यहां ले आए।’ ‘अड्डा? गिरफ्तार?’ शेर सिंह के लिए यह बात पहेलियों जैसी थी। ‘आप कैसी बातें कर रहे हैं?’ ‘हम तुम्हारी बातें कर रहे हैं शेर सिंह की - डाकू शेरसिंह की।’ पुलिस अधिकारी ने उसकी ओर झुकते हुए कुछ सख्ती से कहा। ‘डाकू शेर सिंह की?’ शेर सिंह ने पूछा - ‘डाकू शेर सिंह से मेरा क्या सम्बन्ध है?’

‘सम्बन्ध नहीं है।’ पुलिस अधिकारी ने कहा - ‘तुम स्वयं डाकू शेर सिंह हो।’ ‘डाकू शेर सिंह?’ शेर सिंह ने आश्चर्य से कहा - ‘यह नाम आज मैं जीवन में पहली बार सुन रहा हूं। मैं डाकू शेर सिंह नहीं हूं। मैं---मैं---।’ शेर सिंह ने बातों के बहाव में अपना परिचय देना चाहा, परन्तु उसे मानो स्वयं याद नहीं था कि वह कौन है। उसने पूछा - ‘मैं कौन हूं? कौन हूं मैं?’ शेर सिंह खिसियाकर फिर चीख पड़ा। पुलिस अधिकारी ने बहुत आश्चर्य के साथ डॉक्टर को देखा। डॉक्टर शेर सिंह को देखते हुए बहुत गम्भीर सोच में डूबा हुआ था। उसने अपने साथ खड़े अन्य डॉक्टरों को देखा। फिर उनसे बातें करने के लिए बगल के वार्ड में प्रविष्ट हो गया जो इस समय खाली पड़ा हुआ था। ‘क्या बात है डॉक्टर?’ पुलिस अधिकारी ने डॉक्टर के समीप पहुंचकर पूछा, ‘शेर सिंह ऐसी हरकत क्यों कर रहा है?’ ‘लगता है सिर की गहरी चोट ने उसकी याददाश्त खो दी है।’ डॉक्टर ने अपनी राय दी। ‘जी नहीं।’ तभी अमर ने कहा - ‘उसकी याददाश्त खोई नहीं है बल्कि वह याददाश्त खोने का नाटक कर रहा है।’

‘इसका मतलब यह हुआ कि जब तक वह अपनी याददाश्त खोने का नाटक करता रहेगा, उसे सजा नहीं हो सकती।’ पुलिस अधिकारी असमंजस में पड़ गए। ‘क्यों?’ अमर ने पूछा - ‘आखिर उसे सजा क्यों नहीं हो सकती जबकि सभी जानते हैं कि वह एक भयानक डाकू है, लुटेरा है, अगणित लोगों की हत्याएं करके उसने उनका चिह्न तक मिटा दिया है?’ ‘अभियुक्त को सजा सुनाने से पहले उसका पूरे होश और हवास में होना अत्यन्त आवश्यक है ताकि उसे भी अपनी सफाई में कुछ कहने का अवसर प्राप्त हो सके।’ अमर शेरसिंह की चाल पर खिसियाकर रह गया। कमबख्त को इतनी कठिनाई के बाद गिरफ्तार किया तो एक नई समस्या खड़ी कर दी। कुछ दिनों बाद शेर सिंह स्वस्थ हो गया। सरकार ने उसे सेन्ट्रल जेल भेज दिया जहां से वह मुकदमे की कार्यवाही के लिए पुलिस की कड़ी सुरक्षा में अदालत पहुंचाया जा सकता था। शेर सिंह की जमानत का कोई प्रश्न नहीं उठता था। उसके तो नाम से ही मानव का कलेजा कांप जाता था। फिर उसकी जमानत के लिए कोई सोचता भी कैसे? पुलिस अधिकारी ने शेर सिंह के केस में व्यक्तिगत रुचि

ली क्योंकि शेर सिंह को उसके अड्डे पर छापा मारकर वही गिरफ्तार करने वाला था। वह जानता था कि शेर सिंह की याददाश्त नहीं खोई है, फिर भी वह उसे चौंकाने के लिए, उसकी आंखों में उसकी वास्तविकता की प्रतिक्रिया देखने के लिए शेर सिंह को अपने जत्थे की सुरक्षा में उसके पुराने खुफिया अड्डे तक ले गया। अड्डे की उजाड़ स्थिति की सैर कराई परन्तु शेर सिंह पर किसी बात का कोई प्रभाव नहीं पड़ा। हर वस्तु को वह यूं देखता रहा मानो उसने यह सब पहली बार देखा है। पुलिस अधिकारी को शेर सिंह की सधी हुई चालाकी पर बहुत क्रोध आया। वह मन मारकर रह गया। शेर सिंह की याददाश्त वापस नहीं आई थी फिर भी अदालत की ओर से उस पर कानूनी कार्यवाही करने की पूरी तैयारी हो गई। सरकारी वकील ने इस बात का दावा किया था कि डाकू शेर सिंह सजा-ए-मौत से बचने के लिए अपनी याददाश्त खोने का नाटक कर रहा है परन्तु वह अदालत के सामने शेर सिंह से पेचीदा प्रश्नों के द्वारा उसके इस नाटक का भंडा फोड़ देगा। अदालत ने शेर सिंह के बचाव में भी एक वकील का प्रबन्ध कर दिया। फिर मुकदमा चला। हथकड़ियों के साथ शेर सिंह को अदालत में पेश किया गया तो सारा शहर उसे देखने तथा

उसका मुकदमा सुनने के लिए टूट पड़ा। सभी के होंठों पर शेर सिंह के प्रति तिरस्कार था, आंखों में घृणा समाई हुई थी। अदालत में पुलिस अधिकारी तथा अमर भी उपस्थित थे। सरकारी वकील ने शेर सिंह से प्रश्न पूछना आरम्भ किया। ‘नाम?’ ‘मुझे नहीं मालूम।’ शेर सिंह ने गम्भीरतापूर्वक कहा। ‘पिता का नाम भी नहीं मालूम?’ सरकारी वकील ने सब-कुुछ जानते हुए पूछा। ‘जी नहीं।’ शेर सिंह ने सरकारी वकील की आंखों में देखने के बाद अपना मुखड़ा खिसियाकर दूसरी ओर फेर लिया। ‘मैं तुम्हें बताता हूं कि तुम किसकी सन्तान हो।’ सरकारी वकील ने एकदम से जोश में आकर कहा - ‘तुम देश के एक भयानक अपराधी, एक निर्दयी हत्यारे डाकू शमशेर सिंह की संतान हो। तुम स्वयं एक भयानक अपराधी हो, हत्यारे हो।’ ‘आई ऑब्जेक्ट योर ऑनर।’ सहसा बीच में खड़े होकर वकीले-सफाई ने न्यायाधीश का ध्यान दिलाते हुए आपत्ति प्रकट की। बोला - ‘सरकारी वकील को अभियुक्त पर

बिना कोई दोष सिद्ध हुए ऐसी बात कहने का कोई अधिकार नहीं पहुंचता है।’ ‘यह मैं नहीं कानून कह रहा है, जनता कह रही है, वे लोग कह रहे हैं जो इस अभियुक्त के अत्याचार के शिकार हुए हैं।’ सरकारी वकील ने न्यायाधीश के कुछ कहने से पहले ही अपनी बात कह दी। न्यायाधीश संतुष्ट हो गए। सरकारी वकील शेर सिंह की ओर फिर मुड़ा। उसने अपना अधूरा छूटा वाक्य पूरा करते हुए कहा - ‘तुम्हारा नाम शेर सिंह है - डाकू शेर सिंह।’ ‘शेर सिंह, शेर सिंह।’ शेर सिंह नाम सुनता खिसियाता हुआ जोर से बड़बड़ा उठा। उसने कहा - ‘इस नाम को सुनते-सुनते मैं तंग आ गया हूं। आखिर आप लोग मानते क्यों नहीं कि मैं इस नाम से अनभिज्ञ हूं। मैं नहीं जानता आप लोग किस शेर सिंह का नाम मेरे सिर थोप देना चाहते हैं?’ ‘इसे पहचानते हो?’ सहसा सरकारी वकील ने अपनी पॉकेट से एक लॉकेट निकाला। इसे वह शेरसिंह की आंखों के सामने लाया। ‘नहीं।’ शेर सिंह ने इंकार किया।

‘और इन्हें?’ सरकारी वकील ने लॉकेट खोलकर तस्वीर शेर सिंह को दिखाई। शेर सिंह ने ‘नहीं’ के संकेत पर सिर हिला दिया। बोला, ‘मैंने इन लोगों को कभी नहीं देखा और न ही इनके विषय में कुछ जानता हूं।’ ‘हूं।’ सरकारी वकील कुछ निराश-सा हो गया। विवश होकर और अधिक जांच-पड़ताल करने के लिए जब सरकारी वकील ने अदालत से अगली तिथि का निवेदन किया तो अदालत ने मुकदमे की तिथि एक मास के लिए स्थगित कर दी। मुकदमे की अगली तिथि भी शीघ्र ही समीप आ गई। एक मास बीतते देर ही कितनी लगती है? शाम का समय था। अगले दिन शेर सिंह के मुकदमे की तिथि थी। अमर दुर्गापुर की कोठी के बरामदे में अकेला बैठा चुपचाप अगले दिन के मुकदमे के विषय में ही सोच रहा था। इस एक मास के अन्दर सरकारी वकील ने शेर सिंह के होंठों से सच्चाई स्वीकार कराने के लिए जाने क्या जांच की होगी और जाने क्या तैयारी की होगी। यदि सरकारी वकील के प्रश्नों के लपेट में आकर शेर सिंह ने अब भी अपने नाटक का लिबास नहीं छोड़ा तब क्या होगा?

सहसा कोठी के मुख्य द्वार में प्रविष्ट होकर एक टेलीग्राम वाले को बरामदे के सामने अपनी साइकिल खड़ी करता देखकर अमर चौंक गया। साइकिल खड़ी करता देखकर अमर चौंक गया। साइकिल खड़ी करने के बाद तार वाले ने अमर को सलाम किया और फिर तार का लिफाफा उसके नाम निकालता उसकी ओर बढ़ गया। अमर को उसने तार थमाते हुए हस्ताक्षर लिए और फिर चल पड़ा। अपनी वापसी की ओर तो अमर ने लिफाफे से तार बाहर निकाला। पढ़ा तो खुशी से चौंककर खड़ा हो गया। आंखों पर विश्वास ही नहीं हो रहा था। वन्दना अगली सुबह ही इस शहर के हवाई अड्डे पर पहुंच रही थी। हवाई जहाज के पहुंचने का समय नौ बजे था। अमर ने प्रसन्नता से बेकाबू होकर तार को चूम लिया। आखिर वन्दना के मन में उसकी सफलता ने अपने प्यार का रंग दिखा ही दिया। अब वह उसके बिना नहीं रह सकती। वह आ रही है। वन्दना आ रही है। अमर का दिल हुआ वह खुशी से नाच उठे। रात में बहुत देर से सोने के पश्चात् अमर सुबह जल्दी उठ गया। नहा धोकर वह हवाई अड्डे पहुंचा तो कुछ देर बाद अपने निश्चित समय पर हवाई जहाज हवाई अड्डे पर उतरा। स्टैंड पर खड़े अमर का दिल प्रसन्नताओं से धड़कने लगा। जहाज के रुकने के बाद अन्य यात्रियों के साथ वन्दना भी

निकास द्वार से बाहर निकली तो अमर को ऐसा लगा मानो वन्दना जहाज से नहीं किसी बादल के टुकड़े से बाहर आ रही हो। वन्दना के होंठों पर ऐसी खिलखिलाती मुस्कान थी मानो अपना लक्ष्य पूरा होने के बाद सारा संसार जीत लिया हो। अमर का दिल खुशी से उछलने लगा। वन्दना को तुरन्त ही अपनी छाती में समाने के लिए उसकी बांहें फड़कने लगीं। ऐसा लग रहा था मानो एक युग के बाद वह वन्दना से मिलने वाला था। सहसा वन्दना की दृष्टि अमर पर पड़ी। अमर ने तुरन्त खिलखिलाकर हाथ लहराते हुए वन्दना का स्वागत किया। वन्दना ने भी ऐसा ही कर दिया। उसके बाद जब दो प्रेमी आपस में मिले तो ऐसा मिले मानो दो दीवाने मिलते हैं। हवाई अड्डे पर अपने सामान का ‘क्लीअरेंस’ लेते हुए वन्दना को कुछ देर हो गई। अमर ने जब उसे बताया कि आज ही अदालत में दस बजे शेर सिंह की पेशी है तो वन्दना ने चाय तक पीने में रुचि नहीं ली। वह अदालत में चलकर उस व्यक्ति को देख लेना चाहती थी जिसका खानदान उसके खानदान का जानी शत्रु था, जिसके डाकू बाप शमशेर सिंह ने उसके उत्पन्न होने से पहले ही उसके पिता की हत्या कर दी थी। पिता के गम में उसकी दादी भी चल बसी थी। शेर सिंह रोहित का हत्यारा था। उसने तो

उसके बूढ़े दादा के जीवन पर भी दया नहीं खाई। अदालत जाते समय अमर ने जब रास्ते में वन्दना को बताया कि शेर सिंह गिरफ्तारी के बाद अपनी याददाश्त खोने का नाटक करते हुए स्वयं को मृत्युदण्ड से बचाने का प्रयत्न कर रहा है तो वन्दना शेर सिंह की चालाकी पर झल्लाकर रह गई। ‘परन्तु घबराने की कोई बात नहीं है। अमर ने उसे विश्वास दिलाया। कानून के हाथ बहुत लम्बे हैं। जब शेर सिंह अपने अड्डे पर पकड़ा जा सकता है तो उसका नाटक समाप्त होकर उसे मृत्युदण्ड मिलने में भी अधिक देर नहीं लगेगी।’ अदालत की इमारत के सामने अमर ने कार रोकी। वन्दना को लेकर जब वह इमारत के अन्दर प्रविष्ट हुआ तो अदालती कार्यवाही का समय आरम्भ हो चुका था। सहसा अदालत के अन्दर प्रविष्ट होते ही अमर की दृष्टि एक परिचित सूरत पर पड़ी। खन्ना? अमर चौंक गया। खन्ना अदालत के अन्दर बिल्कुल अन्तिम बेंच पर किनारे बैठा था। अमर के पग खन्ना के समीप ही रुक गए। खन्ना ने अमर को देखा। परन्तु जैसे ही उसकी दृष्टि वन्दना पर पड़ी वह चौंक कर खड़ा हो गया, इस प्रकार मानो उसने वन्दना को नहीं उसका प्रेत देख लिया हो। ‘तुम?’ अमर के होंठों से अनायास ही निकल पड़ा।

‘हां।’ खन्ना ने कनखियों से वन्दना को देखने के बाद कहा जो उसकी ओर से निश्चिंत कठघरे में खड़े अभियुक्त को देख रही थी। खन्ना ने मानो अपनी सफाई देते हुए कहा, ‘शेर सिंह का नाम बहुत सुन रखा था। इस बार आया और पता चला कि शेर सिंह की तिथि भी अदालत में आज ही है तो सोचा कि क्यों न ऐसे भयानक व्यक्ति को भी देखता चलूं।’ अमर ने कोई उत्तर नहीं दिया। शेर सिंह को देखने तथा उसका मुकदमा सुनने के लिए जाने कितने और लोग पहले ही अदालत में उपस्थित थे। उसने वन्दना को देखा। वन्दना की दृष्टि अदालत के अन्दर एक कटघरे में बन्द अपराधी पर गोंद के समान चिपकी हुई थी। अपराधी का सिर नीचे झुका हुआ था इसलिए वह उसे देखने में असमर्थ थी। फिर भी उसका दिल अचानक ही जाने क्यों छाती के अन्दर धक-धक करने लगा था। इसी बीच खन्ना ने आने वाले भय का अनुमान लगाया। वन्दना ने भारत वापस लौटकर तथा अदालत में अपनी उपस्थिति देकर उसकी आशाओं पर पानी फेर दिया था। अमर की उसकी ओर से निश्चिंत था। खन्ना चुपचाप उनकी दृष्टि बचाकर वहां से खिसक गया।

सहसा न्यायाधीश पधारे। अपनी न्याय की कुर्सी पर वह बैठे। मेज पर रखी फाइल को खोलकर देखने के बाद उन्होंने आज के मुकदमे की कार्यवाही आरम्भ करने की आज्ञा दे दी। सरकारी वकील आज और भी अधिक पेचीदा प्रश्न शेर सिंह से पूछने की तैयारी करके आया था। उसने खड़े होकर अदालत से निवेदन किया कि अभियुक्त को कटघरे से निकालकर ‘बॉक्स’ में लाया जाए। उसके निवेदन का तुरन्त आदर हुआ। शेर सिंह खड़ा हुआ। थका-मांदा तथा जीवन से हारा वह उसी प्रकार सिर झुकाए ‘बॉक्स’ की ओर बढ़ा तो वन्दना के दिल की धड़कन और तेज हो गई। तभी सरकारी वकील ने शेर सिंह से कहना चाहा, ‘अभियुक्त शेर सिंह---’ ‘मैं कह चुका हूं कि मुझे शेर सिंह कहकर न पुकारा जाए।’ सहसा शेर सिंह ने अपना मुखड़ा ऊपर उठाकर सरकारी वकील को देखते हुए कहा, ‘जब मैं स्वयं नहीं जानता कि मैं कौन हूं तो---’ वन्दना ने स्वर सुना तो उसे ऐसा लगा मानो उसके वर्षों से तरसते कानों के अन्दर शहद की मिठास टपककर दिल की गहराई में उतर गई। तभी उसने शेर सिंह का उठा

मुखड़ा देखा तो आंखों पर विश्वास नहीं कर सकी। दिल की धड़कनें अपनी चरम सीमा पर पहुंच गईं। अपने होश और हवाश क्षण भर के लिए खोकर उसने और भी सख्ती के साथ अमर की बांह थाम ली - एक नहीं दोनों हाथों से। अमर ने वन्दना को देखा। परन्तु वन्दना ने उसकी जरा भी चिन्ता नहीं की। वह बहुत जोर से चीखी, ‘रोहित’। वन्दना ने एक झटके के साथ अमर का हाथ छोड़ दिया। दौड़ती हुई वह अभियुक्त के पास जा पहुंची। खुशी से बेकाबू होकर वह कांपते स्वर में बोली, ‘रोहित, तुम जिंदा हो? तुम जिंदा हो रोहित?’ वन्दना को अपनी आंखों पर विश्वास ही नहीं हो रहा था। अभियुक्त के सामने जाकर उसने तुरन्त अभियुक्त की छाती में समा जाना चाहा परन्तु विटनेस बॉक्स उसकी रुकावट बन गया। वन्दना ने तब अपना हाथ बढ़ाकर अभियुक्त का हाथ पकड़ लिया। उसकी हथेली अपने दोनों हाथों के बीच रखकर वन्दना ने अपनी आंखों पर रख लिया। होंठों पर उसकी मुट्ठी को रखकर उसने सबके सामने ही दीवानों के समान चूमना आरम्भ कर दिया। फूट-फूट कर वह रो पड़ी। वह तो कभी स्वप्न में भी नहीं सोच सकी थी कि जो उसका पहला प्यार है वह मरने के बाद फिर जी उठेगा। इस प्यार के जी उठने के बाद वह कैसे स्वयं को रोक सकती थी?

‘कौन हैं आप? कौन हैं?’ अभियुक्त ने वन्दना से अपना हाथ छुड़ाए बिना ही पूछा। बोला, ‘मैंने आपको पहचाना नहीं।’ ‘मैं---’ वन्दना ने सिसकियों के मध्य कांपते होंठों द्वारा अभियुक्त को देखा। बोली, ‘मैं वन्दना हूं।’ ‘वन्दना?’ अभियुक्त ने अपने मस्तिष्क पर जोर दिया। ‘हां, तुम्हारी वन्दना।’ वन्दना ने कहा, ‘याद करो, जिस रात हम दोनों दुर्गापुर में अपनी कोठी पर पहुंचे थे तो शेर सिंह के आदमियों ने कोठी पर आक्रमण कर दिया था। तब तुम उन डाकुओं का पीछा करते हुए---’ वन्दना कह रही थी परन्तु अभियुक्त का मस्तिष्क कहीं और काम कर रहा था - बहुत तेजी के साथ। वन्दना नाम ने उस पर जादू जैसा प्रभाव डाला था। वह मानो स्वयं से कहने लगा, ‘वन्दना---वन्दना---रोहित - वन्दना।’ अचानक अभियुक्त के मस्तिष्क की सारी कड़ियां एक साथ ही खुल गईं। उसके मस्तिष्क को एक बड़ा झटका लगा। उसे चक्कर आ गया। अचेत होकर वह वहीं विटनेस बॉक्स में गिर पड़ा। गिरते समय भी होश गंवाते-गंवाते उसके होंठों पर केवल एक ही नाम था - वन्दना---वन्दना - वन्दना-

अभियुक्त और कोई नहीं रोहित ही था। शेर सिंह अब भी कानून की पहुंच से बाहर था। सन्! अदालत के अन्दर सन्नाटा छा गया। लोगों ने सोचा था क्या और क्या हो गया। सरकारी वकील की कार्यवाही का सारा प्रयत्न धरा का धरा रह गया। पुलिस अधिकारी की भी समझ में नहीं आया कि यह सब कैसे हो गया? भौंचक्के-से सब रोहित को देखते ही रह गए जिसका हाथ विटनेस बॉक्स से निकालकर अपनी आंखों पर रखते हुए वन्दना अब भी सिसकियों के साथ आंसू बहा रही थी। अदालत के द्वार के पास अमर चुपचाप खड़ा वन्दना को देख रहा था। रोहित को देखकर वन्दना पर जो प्रतिक्रिया हुई थी उसका एहसास करके अमर का दिल टूट गया था। रोहित को देखकर वन्दना ने जिस झटके से उसका हाथ छोड़ा था उसने अमर के सपनों के महल को गिराकर चकनाचूर कर दिया था। उसका हाथ छोड़कर वन्दना जिस तेजी के साथ रोहित की ओर लपक गई थी उसने अमर के दिल पर छाले उत्पन्न कर दिए थे। वन्दना के आंसू रोहित के प्रति बहते देखकर अमर के दिल पर पड़े छाले फूट पड़े। अमर के होंठों पर एकदम तोड़ती मुस्कान आ गई - फीकी और बेजान मुस्कान। अब इस अदालत में उसकी

क्या आवश्यकता रह गई थी। उसने एक गहरी सांस ली। पलटा। फिर भारी कदमों के साथ अदालत से बाहर निकल गया, सिर झुकाए उस जुआरी के समान जो एक ही दांव में अपना सब-कुछ खेलने के बाद हार जाता है। अमर सड़क पर आया। मन मानो एक ओर चलता चला गया। दिल टूट कर टुकड़े-टुकड़े हो चुका था। दर्द सहा नहीं जा रहा था। मन एकांत में फूट-फूट कर रो लेने को तड़प रहा था परन्तु वह एकांत की तलाश में कहां जाए और कहां नहीं, कुछ समझ में नहीं आ रहा था। परिस्थितियों ने उसे प्यार के ऐसे मोड़ पर ला पटका था जहां से मंजिल न आगे दिखाई देती थी न पीछे। काफी दूर तक अपने गम की लाश उठाकर भटकते-भटकते अमर एक ऐसे स्थान पर पहुंचा जहां सड़क पर काफी भीड़ एकत्र थी। अमर ने थोड़ा-सा कतराकर निकल जाना चाहा परन्तु तभी अपना नाम सुनकर चौंक पड़ा। ‘अमर भैया?’ कोई उसे पुकार रहा था। अमर ने रुककर इधर-उधर देखा। एक युवक उसके सामने आ खड़ा हुआ। ‘आपने मुझे पहचाना?’ युवक ने मुस्कराकर पूछा।

अमर ने अपने गम का लबादा झटककर फेंकते हुए युवक को ध्यान से देखा। युवक कमल कुमार था, ‘फिरदौस’ की प्रतियोगिता में वन्दना के साथ सबसे अच्छा नृत्य करने का विजेता। अमर के होंठों पर एक बेजान मुस्कान खेल गई। उसने ‘हां’ करके सिर हिला दिया। ‘समाचारपत्रों में डाकू शेर सिंह कांड के अन्तर्गत आपकी प्रशंसा पढ़कर आपसे मिलने को बहुत मन करता था।’ कमल ने कहा। फिर पूछा, ‘वन्दना दीदी कैसी हैं?’ ‘ठीक हैं।’ अमर के दिल में एक चुभन उठी। उसने एक गहरी सांस ली। वन्दना का विषय बदलने के लिए उसने इधर-उधर देखा। सड़क के बीच में एक कार बस से लड़कर सामने बिल्कुल पिचक गई थी। दुर्घटना भयानक लगी। उसने पूछा, ‘यहां किसी की दुर्घटना हो गई है?’ ‘अरे हां।’ कमल को मानो याद-सा आया। उसने कहा, ‘वह जो उस दिन ‘फिरदौस’ की प्रतियोगिता में दीदी के साथ पहला इनाम जीतने वाला एक व्यक्ति नहीं था, अरे वही खन्ना, उसे तो आप भी जानते हैं, कार द्वारा उसकी दुर्घटना हो गई है। बहुत सख्त चोट आई है। लोग उसे समीप के अस्पताल में ले गए हैं। पता नहीं बेचारा बचेगा भी या नहीं?’

‘ओह।’ मानवता के नाते अमर को दुःख हुआ। उसने कमल से अधिक बातें नहीं कीं। वन्दना का विषय उठते ही कहीं दिल की बात जबान पर न आ जाए। वह अपने अनजाने रास्ते की ओर बढ़ गया। राह चलते अचानक अमर को ध्यान आया दुर्गापुर की कोठी में उसके लिए कोई जगह तो रही नहीं। अब तो उस कोठी को आबाद करने वाला केवल रोहित है। रोहित की मुस्कराती आंखों के तले वन्दना के प्यार के दीपक जलेंगे और जलकर भस्म होने वाली बात होगी वह - अमर। फिर भी अमर टैक्सी द्वारा कोठी पहुंचा। वह जानता था कि रोहित की बेहोशी के बाद अदालत ने तुरन्त रोहित को अस्पताल भेज दिया होगा। वन्दना उसके पास होगी। कोठी पहुंचकर अमर ने अपना सामान एकत्र किया, केवल अपनी वस्तुएं लीं जो वह यहां साथ लेकर आया था। वन्दना की दिलाई एक भी वस्तु उसने नहीं रखी। और फिर दुर्गापुर छोड़ दिया। आखिर उसने वन्दना के पूर्वजों का बदला अब तक लिया भी कहां है? शेर सिंह अब स्वतन्त्र था - कानून की पकड़ से दूर। वह जब चाहे तब अत्याचार करना आरम्भ कर सकता था। अमर अपने असफल प्यार के परिणाम की पुष्टि करना चाहता था इसलिए कुछ दिनों के लिए वह शहर के

एक साधारण होटल में ठहर गया। शायद वन्दना उसके निःस्वार्थ तथा असीम प्यार को ध्यान में रखकर उससे मिलना पसंद करे। क्यों? यह तो अमर स्वयं भी अनुमान नहीं लगा सका। कभी-कभी आशा के विपरीत भी आशा बंध जाती है, तो कोई क्या करे? अगली सुबह जब अमर ने आज का ताजा समाचारपत्र उठाया तो एक सनसनी भेद पर से पर्दा हटा। बेहोशी के बाद अस्पताल में होश आते ही रोहित की याद वापस आ गई। पत्रकारों की उपस्थिति में रोहित ने पुलिस को बयान देते हुए बताया कि वह डाकू शमशेर सिंह के छोटे भाई का लड़का है। स्वतन्त्रता के बाद उसके चाचा शमशेर सिंह अपने छोटे भाई से मिले थे। उन्हें अपनी डाकाजनी तथा आगे चलकर प्रगति करने वाली अन्तर्राष्ट्रीय स्मगलिंग की योजना बताई थी। शमशेर सिंह ने उन्हें अपने खुफिया अड्डे का नक्शा दिखाकर विश्वास दिलाने का प्रयत्न किया था कि पुलिस नाक रगड़ती रह जाएगी, परन्तु उसके अड्डे का पता कभी नहीं चला सकेगी। तभी अचानक रोहित के घर के समीप पुलिस के आ जाने पर शमशेर सिंह को भाग निकलना पड़ा था। भागते समय शमशेर सिंह ने अपने अड्डे का नक्शा भाई के पास छोड़ दिया था ताकि वह शमशेर सिंह के गैंग में सम्मिलित हो जाए।
 
परन्तु रोहित के पिता को अपने बड़े भाई का गैर-कानूनी जीवन पसन्द नहीं आया। उनसे बचने के लिए वह लंदन चले गए। साथ में अड्डे का नक्शा भी लेते गए। उनका विचार था कि नक्शे द्वारा एक बार भाई से मिलकर वह उनके जीवन में सुधार लाने का प्रयत्न करेंगे तथा उन्हें भारत छोड़कर लंदन में बस जाने का सुझाव देंगे परन्तु जब शीघ्र ही उन्हें लंदन में एक प्रतिष्ठित स्थान प्राप्त होने लगा तो यही सोचकर वह सकुचाने लगे कि शमशेर सिंह के नाम वारंट है, भारत में वह डाकू के नाम से विख्यात है। यदि लंदन में आने के बाद शमशेर सिंह को किसी ने पहचान लिया तो उनकी अपनी सारी प्रतिष्ठा मिट्टी में मिल जाएगी। रोहित के पिता ने मरने से पहले एक बार सारी ही बातें अपने तथा शमशेर सिंह के विषय में रोहित को बता दी थीं, इस प्रकार मानो एक डाकू का भाई होने के कारण उनकी छाती पर पाप का मनों बोझ था। ऐसा न हो कि उनके बेटे को उनकी मृत्यु के बाद पता चले कि उसका पिता एक हत्यारे डाकू का भाई था तो उसे अपने पिता से घृणा हो जाए। उन्होंने उसे उस नक्शे के विषय में भी बताया था जो उनके बॉक्स में अब तक पड़ा हुआ था। उन्होंने इच्छा की थी कि उनके मरने के बाद वह उस नक्शे को जला देगा।

परन्तु जब रोहित ने अपने पिताजी की मृत्यु के बाद एक दिन उनके बॉक्स से नक्शा निकालकर जला देना चाहा तो जलाने से पहले उसकी दृष्टि यूं ही सरसराकर नक्शे की रेखाओं पर पड़ गई। तब रोहित ‘आर्कीटेक्ट’ की विशेष शिक्षा प्राप्त कर रहा था। उसके अंदर आरम्भ से ही किसी नक्शे को एक बार देख लेने के बाद अपने मस्तिष्क के परदे पर उतारकर सुरक्षित कर लेने की एक अद्वितीय विशेषता थी। नक्शे के अन्दर जब उसे एक झलक में अद्वितीय कला दिखाई पड़ी तो उसकी आंखें इसमें चिपक गईं। नक्शा किसी असाधारण वैज्ञानिक के मस्तिष्क का एक जीता-जागता नमूनाा था। रोहित सब-कुछ भूलकर नक्शे की पेचीदगी में खो गया और जब इसकी बारीकियों पर ध्यान करके वह उठा तो उसके ज्ञान में वृद्धि ही नहीं हुई बल्कि नक्शा उसके मन और मस्तिष्क की किताब पर नक्श भी हो चुका था। वन्दना से लंदन में भेंट होने के बाद उसने यह नहीं बताया था कि वह भारत के एक विख्यात डाकू का भतीजा है, विशेषकर ऐसी स्थिति में जब उसे पता चला कि वन्दना उसके चाचा की पुरानी जागीर बेलापुर के समीप दुर्गापुर गांव की ही रहनेवाली है। वन्दना को अपनी वास्तविकता बताकर वह उसे किसी भी स्थिति में नहीं खोना चाहता था।

वन्दना के दादाजी की मृत्यु के बाद वह एक रात भारत में नरेन्द्र सिंह की कोठी पहुंचा था तो नरेन्द्र सिंह बेहोश पड़े थे, उसी रात डाकुओं ने कोठी पर आक्रमण कर दिया। आक्रमण में कोठी की निर्दोष नर्सें तथा निजी सैक्रेटरी की हत्या हो गई। रोहित से यह अत्याचार सहन नहीं हो सका। गांव के शोरगुल से उसे पता चला कि आक्रमणकारी डाकू शेर सिंह के आदमी थे - डाकू शमशेर सिंह के बेटे शेर सिंह के आदमी। सुबह के अन्धकार में उसने डाकुओं का दूर से पीछा किया। फिर अड्डे से काफी दूर रुक गया। डाकू लुप्त हो गए तो उसने अपने मन और मस्तिष्क की किताब खोली। शमशेर सिंह के अड्डे का नक्शा दर्ज था। इसके सहारे वह अड्डे के अन्दर डाकुओं ने पकड़ा तो उसने बताया कि वह शेर सिंह का चचेरा भाई है। तब शेर सिंह के दो विशेष व्यक्तियों ने शेर सिंह के निजी कमरे में पहुंचा दिया था। शेर सिंह से भेंट करते समय रोहित तैश में था। उसने शेर सिंह को धिक्कारा। उसे उसने धमकाया था कि यदि वह स्वयं को कानून के सुपुर्द नहीं करेगा तो वह पुलिस के सामने उसके अड्डे का भेद खोल देगा। उसके अड्डे का नक्शा तो वह अपने पिता की अन्तिम इच्छानुसार जला चुका है परन्तु उसके मस्तिष्क में नक्शे की एक-एक रेखाएं सदा

ताजा रहेंगी। रोहित शेर सिंह का चचेरा भाई था। इसलिए उसका रंग-रूप शेर सिंह से थोड़ा बहुत मिलता-जुलता भी था। अन्तर था तो केवल आयु का, परन्तु शेर सिंह के सुन्दर व्यक्तित्व ने उसकी आयु का यह फासला भी कम कर दिया था। शेर सिंह के दिल पर रोहित की बातों का कोई प्रभाव नहीं पड़ा। इसके विपरीत जब उसे याद आया कि स्वतन्त्रता के बाद उसके पिता शमशेर सिंह के प्रस्ताव को तुच्छ समझ ठुकरा के रोहित के पिता ने अपना जीवन अलग कर लिया था तो उसे क्रोध आ गया। उसने रोहित को अपने साथ वाले निजी कमरे में बन्दी बना दिया। दूरदर्शिता से काम लेकर, यह सोचते हुए कि यदि कभी उसकी किसी भूल के कारण पुलिस को उसकी सूरत की पहचान प्राप्त हो जाएगी तो वह अपना बचाव करते हुए अपने स्थान पर रोहित की हत्या करके उसका शव प्रस्तुत कर देगा। वास्तविकता लाने के लिए वह रोहित का मुर्दा मुखड़ा थोड़ा घायल भी कर देगा। यही कारण था कि शेर सिंह ने रोहित के कपड़े पहनाकर किसी और की सिर कटी लाश नदी में फेंक दी थी ताकि पुलिस रोहित के भ्रम में उसकी तलाश करने का विचार छोड़ दे। और हुआ भी ऐसा ही। यूं भी रोहित को वन्दना के अतिरिक्त भारत में कोई नहीं

पहचानता था क्योंकि जिस रात वह वन्दना के साथ दुर्गापुर में कोठी पर आया था उसी रात आक्रमण पड़ गया था और उसी सुबह के अन्धकार में रोहित शेर सिंह के अड्डे के लिए निकल चुका था। आक्रमण के समय रात की भगदड़ में उसे ध्यान से देखकर पहचानने का प्रश्न ही नहीं उठता था। यही एकमात्र कारण था कि वन्दना की अनुपस्थिति में अदालत के अन्दर भी उसे कोई नहीं पहचान सका था। शेर सिंह ने रोहित को बन्दी बनाने के बाद उसे बता दिया था कि वह उसे क्यों तथा किस दिन के लिए जीवित रखे हुए है। रोहित के सामने वह पुलिस को मूर्ख तथा स्वयं को बुद्धिमान प्रकट करते हुए मानो उसे याद दिलाता रहता था कि यदि रोहित के पिता ने उसके पिता के प्रस्ताव को तुच्छ समझकर गिरोह में सम्मिलित होने से इन्कार नहीं किया होता तो आज उसकी स्थिति यह नहीं होती। शेर सिंह की दृष्टि वन्दना पर लगी हुई थी। शेर सिंह अपने दो विशेष व्यक्तियों से भी छिपकर चट्टान के पीछे नदी की ओर एक खुफिया रास्ते से रात के समय अक्सर बाहर निकल जाता था। बाहर के वातावरण में भी वह खूब अय्याशी करता था, अपने असली रूप में। असली रंग-रूप में उसके विशेष दो व्यक्तियों के अतिरिक्त उसे कोई नहीं पहचानता था। उसने जब वन्दना को ‘फिरदौस’ की रजत-

जयंती वाली रात में देखा तो उस पर दीवाना हो गया था। वन्दना ने जब प्रोग्राम के अन्त में उसके साथ नृत्य करने से स्पष्ट इन्कार कर दिया तो वह क्रोध में उसका शत्रु बन बैठा था। अपने अड्डे पर आकर उसने रात ही में ‘फिरदौस’ की सारी घटना बताते हुए कहा था कि वह वन्दना की प्रतीक्षा करे। वन्दना को उठाकर उसके अड्डे पर पहुंचा दी जाएगी। अपने अपमान के बदले में वह उसकी लाज लूटेगा। फिर जब उसका दिल वन्दना से भर जाएगा तो वह उसे दुर्गापुर की सीमा पर नग्न स्थिति में छोड़ देगा। वन्दना की लाज लूटते समय रोहित अपनी आंखों से देखेगा, परन्तु वन्दना उसे नहीं देख सकेगी। समाचारपत्र में रोहित ने अपने बयान में कहा था - ‘फिर शीघ्र ही एक दिन तड़के शेर सिंह को जाने कैसे ज्ञात हो गया कि उसके अत्याचार के दिन पूरे हो गए हैं। उसके अड्डे पर अब पुलिस कभी भी छापा मार सकती है। पुलिस का भय दिखाकर मेरे देखते-देखते उसने सारे ही डाकुओं को उनके परिवार सहित पुलिस से बचाने का बहाना बनाकर गैस-चैम्बर में छिपा दिया। गैस-चैम्बर का बटन दबाने के बाद उसने अपने दोनों विशेष व्यक्तियों द्वारा मुझे कैदखाने में हथकड़ियां पहनाईं। फिर हथकड़ियों की चाभी लेने के बाद उसने बहुत चालाकी तथा स्फूर्ति के साथ धोखा देते

हुए अपने ही उन दोनों व्यक्तियों की हत्या कर दी। उसके बाद वह मुझे रिवॉल्वर की नोक पर अपने विशेष कमरे में लेकर आया। मुझे उसने राजसी कुर्सी पर बिठाया, अपने गले का लॉकेट उतारकर उसने मेरे गले में पहनाने से पहले कहा कि जब पुलिस आएगी तो यह अड्डा बम द्वारा नष्ट हो चुका होगा। बदले में पुलिस को तुम्हारी लाश मिलेगी। तुम्हें पहचाना जाएगा तो केवल शेर सिंह के नाम से। विशेषकर ऐसी स्थिति में जब तुम्हारे गले से पुलिस को यह लॉकेट प्राप्त होगा। तब मैं सारा धन समेट कर यहां से बहुत दूर निकल जाऊंगा और लोग तुम में शेर सिंह को मुर्दा समझकर भूल जाएंगे।’ अपने होटल के अंदर समाचारपत्र पढ़ते समय अमर को याद आया, शेर सिंह को राजसी-कुर्सी के नीचे रखे बम को यदि पुलिस अधिकारी ने उठाकर दूर नहीं फेंका होता तो आज वास्तव में रोहित की लाश को शेर सिंह की लाश समझकर पुलिस इस केस का अन्त कर देती। शेर सिंह जितना भयानक तथा क्रूर था उतना ही बुद्धिमान और चालाक भी था। ‘उसके बाद शेर सिंह ने मेरे गले में अपना लॉकेट पहनाया।’ अमर ने रोहित का बयान समाचारपत्र में पढ़ा, ‘फिर अपनी रिवॉल्वर की मुठिया द्वारा मेरे सिर पर एक

गहरी चोट की। मुझ पर बेहोशी छाने लगी। बेहोश होते-होते मैंने महसूस किया, शेर सिंह मुझे हथकड़ियों के बंधन से मुक्त कर रहा था।’ समाचारपत्र में पुलिस अधिकारी का एक प्रश्न था। ‘रोहित जी, यह माना कि शेर सिंह ने स्वयं को आपसे छिपा रखने की कोई आवश्यकता नहीं समझी होगी क्योंकि आप उसके निजी बंदी थे। आपको वहां से मृत्यु ही छुटकारा दिला सकती थी इसलिए उसे आपसे कोई भय नहीं था। फिर भी आप उसके अंदर कोई ऐसी पहचान बता सकते हैं जिसके द्वारा पुलिस को उसकी गिरफ्तारी में सहायता मिले? अब आप ही एक ऐसे व्यक्ति बचे हैं जिसने उसे बहुत समीप से कई दिनों तक देखा है।’ ‘हां-।’ रोहित का उत्तर था - ‘उसकी दाहिनी हथेली में किसी वस्तु से कटने से एक नए चांद जैसा दाग पड़ा हुआ है जिसे पहली बार देखने के बाद मैंने यही समझा था कि यह दाग उसकी असाधारण हस्तरेखा है।’ नए चांद जैसा दाग? असाधारण हस्तरेखा? समाचारपत्र में यह बात पढ़ते ही अमर का माथा ठनका। उसकी आंखों के सामने ‘फिरदौस’ की रजत-जयंती वाली वह रात थिरक उठी जब खन्ना से भेंट करके हाथ मिलाते समय उसकी

दाहिनी हथेली उसकी अपनी हथेली में गड़-सी गई थी। हाथ अलग करते हुए अमर ने ध्यान भी दिया था। खन्ना की हथेली के मध्य नए चांद जैसा दाग था जिसे वह स्वयं खन्ना की असाधारण हस्तरेखा समझ बैठा था। नए चांद जैसा दाग? असाधारण हस्तरेखा। अमर को अधिक सोचने की आवश्यकता नहीं पड़ी। उसके मन के संदेह की पुष्टि करने के लिए खन्ना के पिछले सारे ही व्यवहार बहुत थे। मुकदमे की कार्यवाही सुनने के लिए भी वह अदालत में इसी कारण पहुंचा था क्योंकि उसे ज्ञात था कि रोहित मृत्यु से बचने के पश्चात् अपनी याद्दाश्त खो चुका है। ऐसी स्थिति में रोहित क्या स्वयं को नहीं पहचानता? अपनी पहचान के लिए वह अन्य लोगों से पहले ही निश्चिंत था। अमर ने समाचारपत्र एक ओर फेंका। फिर तुरन्त होटल से निकलने की तैयारी करने लगा। खन्ना की कार दुर्घटना के विषय में उसे कमल कुमार की कही बातें याद थीं - ‘बहुत चोट आई है। लोग उसे समीप के अस्पताल में ले गए हैं। समीप के अस्पताल।’ टैक्सी द्वारा अमर खन्ना के दुर्घटना स्थल पर पहुंचा। फिर समीप के अस्पताल पहुंचते उसे अधिक देर नहीं लगी। शीघ्र ही उसे अस्पताल में यह भी पता लग गया कि कार की दुर्घटना में पिछले दिन आया व्यक्ति किस वार्ड में है।

वह लपककर वार्ड में पहुंचा। एक व्यक्ति के सिर पर पट्टी लिपटी हुई थी। एक ही दृष्टि में वह उसे पहचान गया। खन्ना आंखें बन्द किए बेहोश पड़ा हुआ था। अमर ने तुरन्त फोन किया। फोन पुलिस अधिकारी ने ही रिसीव किया। वह कहीं जाने की तैयारी कर रहे थे। अमर ने उन्हें सारी ही घटना कह सुनाई। पुलिस अधिकारी तुरन्त अस्पताल के लिए चल पड़े। अमर बहुत बेचैनी के साथ उनकी प्रतीक्षा खन्ना के वार्ड में उसके पलंग के समीप ही बैठा कर रहा था। पुलिस अधिकारी को देखकर वह खड़ा हो गया। परन्तु फिर उनके इशारे पर चुपचाप अपने स्थान पर दोबारा बैठ गया। पुलिस अधिकारी भी अमर के बगल में बैठ गए, खन्ना के बिल्कुल समीप। सहसा मरीज के शरीर में अचानक बहुत जोर की कम्पन उत्पन्न हुई। पीड़ा की तड़प मानो उसे बेहोशी में भी पागल किए दे रही थी। मरीज ने बहुत सख्ती के साथ अपने दांतों द्वारा निचले होंठों को काटा। उसकी बन्द आंखें सख्ती के साथ भिंच कर और बन्द हो गईं। फिर अचानक खुल गईं। फिर कब, कहां से तथा किस मकसद के लिए उसके अन्दर क्षण भर के वास्ते होश और हवास में सोचने-समझने की शक्ति आ गई थी। उसने अमर को देखा।

दीपक बुझने से पहले अपनी सारी चमक के साथ एक बार अवश्य फड़फड़ाता है। खन्ना को देखकर अमर को ऐसा ही लगा। बिना एक क्षण गंवाए उसने मरीज को पुकारा - ‘शेर सिंह?’ अमर के इन शब्दों ने मानो मरीज को भी कुछ कहने का अवसर दिया था। मरीज एक क्षण अमर को उसी प्रकार देखता रहा। फिर उसकी पलकों का बोझ बन्द होने लगा। अमर के दिल की धड़कनें तेज हो गईं। क्या सफलता के इस मोड़ पर आने के पश्चात् वह खाली हाथों वापस चला जाएगा? परन्तु तभी जैसे मरीज के अन्दर क्षण भर के लिए एक बार फिर जान लौट आई। उसने अमर को देखा। शायद उसने अब अमर को पहचाना था, शायद अब उसके कानों में अमर के शब्द गूंज रहे थे। शेर सिंह? मरीज ने अमर के प्रश्न के उत्तर में हल्के से हां के संकेत पर सिर हिला दिया। इसके साथ ही उसकी आंखें बन्द होने लगीं - हो गईं, सदा के लिए। उसके होंठों पर एक आह तड़पी फिर उसके होंठ स्थिर हो गए। अमर ने पुलिस अधिकारी को देखा। पुलिस अधिकारी को मरीज का इकरारनामा मिल चुका था। उसने अमर की पीठ पर हाथ रख दिया।

शाम का समय था। दुर्गापुर की ओर पुलिस की एक जीप चली जा रही थी। जीप पुलिस का एक ड्राइवर चला रहा था, पुलिस अधिकारी का ड्राइवर, जिसके बगल में अमर बैठा हुआ था, बहुत खामोश। उसका दिल नहीं कर रहा था कि वह दुर्गापुर जाए, बल्कि मन चाह रहा था कि वापस अपनी अज्ञात मंजिल की ओर चलता हुआ वह चुपचाप भटक जाए। परन्तु वह वापस नहीं जा रहा था। वह दुर्गापुर जा रहा था। केवल एक बार के लिए - अन्तिम बार, वह भी अपने शुभचिंतक पुलिस अधिकारी के कहने के कारण। आखिर वन्दना से मिलने में बुराई ही क्या थी? वन्दना उससे अन्तिम बार भी नहीं मिलना पसंद करेगी? पुलिस अधिकारी को मानो विश्वास था कि जिस अमर ने वन्दना के लिए इतना सब कुछ किया वह उसे देखते ही सब-कुछ भूल जाएगी, भूलकर उसकी छाती से लिपट जाएगी। उससे कहेगी कि वह उसके बिना नहीं रह सकती। अमर ने भी आशा के विपरीत कुछ ऐसी ही बातें सोच ली थीं। वन्दना को उसने कभी प्यार की एक निशानी, प्यार की याद की यादगार समझकर एक अंगूठी दी थी। अपने मन के संतोष के लिए वह यह देखना चाहता था कि वन्दना

पर उसके प्यार की निशानी की अब क्या प्रतिक्रिया है? वह उस अंगूठी को अब भी अपनी आंखों से लगाती है या नहीं? उसे होंठों से लगाकर दिल का संतोष प्राप्त करती है या नहीं? उसकी दी हुई अंगूठी उसे उसके प्यार का एहसास दिलाती है या नहीं? उसके मन और मस्तिष्क पर छाई रहती है या नहीं? जीप कोठी के सामने रुकी। अमर जीप से नीचे उतरा। एक दृष्टि द्वारा उसने कोठी को देखा - बहुत ध्यान से। उसके प्यार की यादगार, शायद उसके प्यार की मजार थी यह। कोठी मजार समान ही सूनी पड़ी थी - खामोश, मानो कोठी के वातावरण ने अपनी सांसें रोक रखी हों। अमर ने भारी कदमों से बरामदे की सीढ़ियों को पार किया। वह बरामदे के द्वार पर पहुंचा। जवानी में पग रखने के बाद जब वह पहली बार इस कोठी के द्वार पर आया था तो उसे वन्दना मिली थी। आज यहां कोई भी नहीं था। उसने दरवाजे पर थपकी दी, तब भी उसके स्वागत में कोई नहीं आया। उसने अनिच्छुक होकर कमरे के अंदर झांका। कमरे के अंदर जलती शमा का प्रकाश सिसक रहा था। सिसकियां हवा के बहाव पर तड़पते होंठों की कंपन बन जाती थीं। कोठी सुनसान थी। कोठी में मानो कोई रहता ही नहीं था। परन्तु अमर को ज्ञात था कि रोहित को अस्पताल

से छुट्टी मिल गई है। वह वन्दना के साथ उसकी कोठी में रह रहा है। अमर के लिए तो अब यह कोठी पराई हो चुकी थी। जिस कोठी के दरवाजे उसके लिए सदा खुले रहते थे आज उसके एक दरवाजे पर थपकी देकर आज्ञा मांगने के बाद भी उसे कोई प्रवेश नहीं दे रहा था। अमर ने वापस लौट जाना चाहा। परन्तु तभी अचानक उसकी दृष्टि सामने द्वार से कुछ हटकर एक मेज के ऊपर रखी किसी चमकती हुई वस्तु पर पड़ी। उसकी दृष्टि मानो स्वयं ही उस ओर आकृष्ट होकर चिपक गई। चमकती हुई वस्तु जलती शमा की लहराती लौ में चकाचौंध बन गई थी। शायद शमा रो रही थी। या फिर शमा जलाकर मेज पर रखी वस्तु की ओर ही किसी ने उसका ध्यान खींचने का प्रयत्न किया था? अमर कुछ नहीं जान सका। परन्तु उसके दिल की धड़कनें अवश्य बढ़ गईं। बिना अधिकार ही उसके पग कमरे के अंदर उठ गए। वह मेज के समीप पहुंचा। शमा के प्रकाश में उसने देखा, शमा के कदमों तले एक अंगूठी रखी है - उसकी दी हुई अंगूठी, प्यार की निशानी। अंगूठी के ऊपर पिघली शमा की एक बूंद आंसू बनकर टपक गई थी। अमर को उसके प्यार का उत्तर मिल गया। उसके निःस्वार्थ प्यार पर असफलता की मुहर लग गई थी। उसके दिल के अन्दर एक कसक उठी - बहुत ही सख्त। दर्द बर्दाश्त नहीं हुआ तो आंखों में आंसू

छलक आए। होंठ सिसकियों के साथ कांप उठे तो उसने इन्हें दांतों तले दबा लिया। उसने अंगूठी उठाई। अंगूठी के साथ जो उसे शमा के आंसू का एक तोहफा मिला था, उसने उसे भी साथ ही रख लिया। फिर वह पलटा। चुपचाप दबे पगों वह कमरे से बाहर निकला। सीढ़ियां उतरकर वह लॉन में आया। जीप में बैठा। दिल कह रहा था कि वन्दना उसे कोठी के किसी-न-किसी भाग में खड़ी छिपकर अवश्य देख रही है। शायद आंसू भी बहा रही है। नारी का जब पहला प्यार ही अन्तिम प्यार होता है तो वह बीच में कैसे किसी और को जगह दे सकती है? शायद इसीलिए वह उसका सामना नहीं कर सकी जिसने परिस्थितियों का शिकार होकर अनेक स्वप्न दिखाए थे। अमर ने पलटकर कोठी की ओर एक बार भी नहीं देखा। फिर उसने ड्राइवर से कहा, ‘वापस चलो।’ अमर का गला दिल के आंसुओं से भर आया था। जीप आगे बढ़ी और फिर कुछ दूर जाकर शाम की धुंध में गुम होने लगी। कोठी की सबसे ऊंची मंजिल पर वन्दना चुपचाप अमर को जाता हुआ देख रही थी। उसके समीप ही रोहित भी खड़ा था। रोहित को वह अपने तथा अमर के विषय में एक-

एक बात बता चुकी थी। वन्दना की आंखों में आंसू थे। अमर को जाता देखकर उसके होंठों पर सिसकियां आने को तड़प उठी थीं। अमर को गम की घाटी में सदा के लिए ढकेलकर वह स्वयं खुशियों की चट्टान पर खड़ी हो गई थी। आखिर उसके प्यार के महल की नींव अनजाने में अमर की ही मजार पर क्यों बनी? परन्तु परिस्थिति ही ऐसी थी। कोई क्या कर सकता था। भाग्य का लिखा कौन मिटा सकता है? रोहित उसका पहला प्यार था। रोहित के प्यार की छाप उसके कुंवारे दिल पर पहली बार लगी थी, इसलिए इस छाप का गहरा होना स्वाभाविक ही था। अमर की जीप जब शाम की धुंध में गर्द का गुब्बारा उड़ाती हुई बहुत दूर जाकर वन्दना की दृष्टि से ओझल हो गई तो वन्दना के आंसू गालों पर बह आए। सिसकियों पर वह काबू नहीं कर सकी तो अपनी दोनों हथेलियों में मुंह छिपाते हुए फूट-फूटकर रो पड़ी। रोहित वन्दना के दिल की स्थिति से परिचित था। उसे वन्दना पर दया आई। नारी दिल के हाथों कितनी मजबूर होती है। परन्तु यह एक वक्ती जज़्बा था। वह जानता था कि वन्दना अमर को एक दिन अवश्य भूलने में सफल हो जाएगी। वह वन्दना को इतना प्यार देगा कि वन्दना अमर को भूले से भी याद करना छोड़

देगी। नारी को समय के साथ बदलना ही पड़ता है। यह तो समय की पुकार है। रोहित ने वन्दना का मुखड़ा अपने हाथ की दो अंगुलियों द्वारा ऊपर उठाकर अपनी आंखों के सामने किया। अन्धकार में वन्दना की आंखों के आंसू मोतियों के समान टिमटिमा रहे थे। उसने बहुत प्यार के साथ कहा, ‘इन बहुमूल्य आंसुओं को इस प्रकार मत बहने दो! इन्हें रोक लो। अब यह मेरी अमानत हैं - केवल मेरी।’ वह रात वन्दना के लिए कितनी दुःखदायी रात थी। परन्तु जब अगला दिन आया तो सुबह इतनी ही साफ और चमकदार थी जितनी पिछली रात की काली तथा घनेरी लटें। अपना नाइट गाउन पहने वह टहलती हुई कोठी के बरामदे में आ निकली। हवाएं स्थिर थीं। वातावरण खामोश था। सरसराती दृष्टि से वन्दना की आंखें कोठी के सामने उजड़े हुए लॉन पर उठ गईं। उसकी आंखें ठिठक गईं! सूखे हुए पौधों में अचानक जाने कैसे अगणित फूल खिल आए थे। वन्दना के पग बिना अधिकार ही उठकर बरामदे की सीढ़ियां उतरते हुए इन पौधों के समीप पहुंच गए। फूलों को वह ध्यान से देखने लगी। रात शबनम

के आंसू रोई थी। शायद शबनम के घने आंसुओं ने ही इन पौधों को सींचा था ताकि इन्हें नया जीवन प्राप्त हो सके। कलियां, फूल-पत्तियां और टहनियां सभी शबनम के आंसुओं से तर थी। फिर भी कलियों के होंठों पर मुस्कान थी। फूल के होंठों पर सुगंधित जीवन का एक नया संदेश था। पत्तियों में लहराती ताजगी थी और टहनियों में भी इनको सदा संभाले रखने की मजबूत झूम। वन्दना देखती ही रह गई समय के इस परिवर्तन को जो कितनी तेजी के साथ सागर के रेले के समान आया था और उसके सिर पर से निकल भी गया, उसे अपनी लपेट में लेकर डुबाने के बजाए यह रेला स्वयं किनारे से टकराकर चूर-चूर हो गया परन्तु उसे जीवन के एक नए किनारे पर छोड़ गया था। वन्दना सोचे बिना नहीं रह सकी - अमर का जीवन स्वयं भी तो एक प्यासी शबनम था। क्षितिज के जाने किस छोर से वह आया था। अमर ने उसके जज्बातों की प्यास बुझा दी परन्तु स्वयं प्यासा रहकर चला गया। प्यासी शबनम के समीप उसका जीवन क्षितिज से टूटकर अब भी हवा के जाने किस रास्ते पर भटक रहा है। जाने इस प्यासी शबनम की किसी अन्य ताजे फूल को मुस्कान प्राप्त होगी भी या नहीं? या फिर कहीं ऐसा तो नहीं कि यह प्यासी शबनम अपने ही अरमानों

की चिता पर टपककर सदा के लिए प्यासी ही भस्म हो जाएगी?

समाप्त
 
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