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फिर बाजी पाजेब
Lekhak समीर
सेठ दौलतराम ने टेलीफोन की घंटी सुनी और रिसीवर कान से लगाकर बोले
"यस...दौलत बिल्डर्स ।"
“सेठजी, मैं एस्टेट एजेंट कृपाशंकर बोल रहा हूं।"
"फरमाइए कृपाशंकरजी।"
"सेठजी ! आपने 'वरसोवा' में एक बंगले का सौदा मेरे सुपुर्द किया था न ?"
"हां...हां....क्या हुआ ?"
"वह लोग किसी तरह भी पचास लाख से नीचे आने को तैयार नहीं हैं। मैंने पार्टी की ओर से पैंतीस लाख तक लगा दिए हैं।"
"कृपाशंकर जी..अगर हो सके तो दस-पांच लाख कम करा लीजिए वर्ना पचास लाख ही में सौदा कर लीजिए।
"मगर मेरे ख्याल में तो पचास लाख बहुत हैं, सेठजी।"
-
"नहीं कृपाशंकरजी, पचास लाख में वह महंगा नहीं-क्योंकि वह जगह एयरपोर्ट से काफी दूर है-वहां पन्द्रह-बीस माले तक की इमारत खड़ी की जा सकती है।"
"ओह इस प्वायंट पर तो मैंने गौर ही नहीं किया था।"
"परवाह मत कीजिए-आप एस्टेट एजेंट हैं बिल्डर तो नहीं न ?"
"आप ठीक कह रहे हैं।"
"मैं प्रेम के हाथ पांच लाख रूपए का चैक भिजवा रहा हूं...आप फौरन एडवांस देकर सौदा पक्का कर लीजिए...अभी किसी बिल्डर की नजरें उस बंगले तक नहीं पायीं।"
"ओके...सेठ साहब !"
सेठ दौलतराम ने रिसीवर रख दिया। इन्टरकॉम का बटन दबाकर उन्होंने रिसीवर फिर कान से लगा लिया।
दूसरी ओर से आवाज आई-"हुक्म सेठजी।"
"जरा मेरे पास आइए।"
फिर सेठ दौलतराम ने चैकबुक निकाली और पांच लाख की रकम भरकर साइन कर दिए। कुछ ही देर बाद इजाजत लेकर प्रेम अंदर दाखिल होकर शिष्टता से खड़ा हो गया। कृपाशंकर ने चैक उसकी ओर बढ़ाकर कहा-"जल्दी से जल्दी यह चैक कृपाशंकरजी को दे आइए, पर्सनली।"
प्रेम ने चैक लिया...उसे देखा और पूछा-"तो क्या उस बंगले का सौदा पक्का हो गया ?"
"आज हो जाएगा।"
"कितने में ?"
"शायद पचाल लाख में ही।"
"लेकिन सर ! यह रकम तो बहुत है...लगता है कृपाशंकर जी बीच में कुछ गोलमाल कर रहे हैं।"
सेठ दौलतराम ने घूरकर प्रेम को देखा और बोले-“मिस्टर प्रेम, आप न एस्टेट एजेंट हैं न बिल्डर...आप सिर्फ के असिस्टैंट मैनेजर हैं।"
"यस सर !"
"किस जमीन या इमारत की क्या कीमत हो सकती है, यह आप हमसे ज्यादा नहीं समझ सकते...यूं भी कृपाशंकरजी बहुत पुराने एस्टेट एजेंट हैं-हमें उन पर पूरा भरोसा है।"
"यस सर !"
"एक बात और।
"फरमाइए।"
"आपके अंदर मीन-मेख निकालने की आदत बहुत बुरी है...आप इसे छोड़ दीजिए और अपने काम से काम रखिए।"
.
“यस सर, आई एम सॉरी सर !"
"जाइए ! कृपाशंकर आपकी राह देख रहे होंगे।"
प्रेम बाहर निकल आया-उसके माथे पर बल और आंखों में गुस्सा था...उसे देखते ही एक बाबू ने अर्थपूर्ण मुस्कराहट के साथ कहा-"लगता है, मालिक ने आज फिर डोज दे दिया है।"
"बड़े बाबू ! ऐसे 'डोज' से तो मेरा हाज्मा बढ़ता है...यूं भी प्रेम को जीवन भर असिस्टैंट मैनेजर की कुर्सी पर तो लड़ना नहीं है।"
"अच्छा !"
"और क्या...यह कृपाशंकर से मोल-भाव...मालिक और कन्स्ट्रक्शन का तजुर्बा मिल रहा है...यही शिक्षा और मूल लाभ है जो आगे चलकर काम आएगा....फिर एक दिन 'दौलत बिल्डर्स' के सामने ही प्रेम बिल्डर्स का बोर्ड नजर आएगा।"
"बड़ी ऊंची उड़ान भर रहे हैं।"
"पंखों से ज्यादा इरादों की दृढ़ता की जरूरत होती है ऊंची उड़ान के लिए, बड़े बाबू ।'
"तब तो आप शायद हमें नहीं भूलेंगे।"
"आप हमें मत भूलिए, हम आपको नहीं भूलेंगे।"
"बस, आप हुक्म करते रहिए।"
Lekhak समीर
सेठ दौलतराम ने टेलीफोन की घंटी सुनी और रिसीवर कान से लगाकर बोले
"यस...दौलत बिल्डर्स ।"
“सेठजी, मैं एस्टेट एजेंट कृपाशंकर बोल रहा हूं।"
"फरमाइए कृपाशंकरजी।"
"सेठजी ! आपने 'वरसोवा' में एक बंगले का सौदा मेरे सुपुर्द किया था न ?"
"हां...हां....क्या हुआ ?"
"वह लोग किसी तरह भी पचास लाख से नीचे आने को तैयार नहीं हैं। मैंने पार्टी की ओर से पैंतीस लाख तक लगा दिए हैं।"
"कृपाशंकर जी..अगर हो सके तो दस-पांच लाख कम करा लीजिए वर्ना पचास लाख ही में सौदा कर लीजिए।
"मगर मेरे ख्याल में तो पचास लाख बहुत हैं, सेठजी।"
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"नहीं कृपाशंकरजी, पचास लाख में वह महंगा नहीं-क्योंकि वह जगह एयरपोर्ट से काफी दूर है-वहां पन्द्रह-बीस माले तक की इमारत खड़ी की जा सकती है।"
"ओह इस प्वायंट पर तो मैंने गौर ही नहीं किया था।"
"परवाह मत कीजिए-आप एस्टेट एजेंट हैं बिल्डर तो नहीं न ?"
"आप ठीक कह रहे हैं।"
"मैं प्रेम के हाथ पांच लाख रूपए का चैक भिजवा रहा हूं...आप फौरन एडवांस देकर सौदा पक्का कर लीजिए...अभी किसी बिल्डर की नजरें उस बंगले तक नहीं पायीं।"
"ओके...सेठ साहब !"
सेठ दौलतराम ने रिसीवर रख दिया। इन्टरकॉम का बटन दबाकर उन्होंने रिसीवर फिर कान से लगा लिया।
दूसरी ओर से आवाज आई-"हुक्म सेठजी।"
"जरा मेरे पास आइए।"
फिर सेठ दौलतराम ने चैकबुक निकाली और पांच लाख की रकम भरकर साइन कर दिए। कुछ ही देर बाद इजाजत लेकर प्रेम अंदर दाखिल होकर शिष्टता से खड़ा हो गया। कृपाशंकर ने चैक उसकी ओर बढ़ाकर कहा-"जल्दी से जल्दी यह चैक कृपाशंकरजी को दे आइए, पर्सनली।"
प्रेम ने चैक लिया...उसे देखा और पूछा-"तो क्या उस बंगले का सौदा पक्का हो गया ?"
"आज हो जाएगा।"
"कितने में ?"
"शायद पचाल लाख में ही।"
"लेकिन सर ! यह रकम तो बहुत है...लगता है कृपाशंकर जी बीच में कुछ गोलमाल कर रहे हैं।"
सेठ दौलतराम ने घूरकर प्रेम को देखा और बोले-“मिस्टर प्रेम, आप न एस्टेट एजेंट हैं न बिल्डर...आप सिर्फ के असिस्टैंट मैनेजर हैं।"
"यस सर !"
"किस जमीन या इमारत की क्या कीमत हो सकती है, यह आप हमसे ज्यादा नहीं समझ सकते...यूं भी कृपाशंकरजी बहुत पुराने एस्टेट एजेंट हैं-हमें उन पर पूरा भरोसा है।"
"यस सर !"
"एक बात और।
"फरमाइए।"
"आपके अंदर मीन-मेख निकालने की आदत बहुत बुरी है...आप इसे छोड़ दीजिए और अपने काम से काम रखिए।"
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“यस सर, आई एम सॉरी सर !"
"जाइए ! कृपाशंकर आपकी राह देख रहे होंगे।"
प्रेम बाहर निकल आया-उसके माथे पर बल और आंखों में गुस्सा था...उसे देखते ही एक बाबू ने अर्थपूर्ण मुस्कराहट के साथ कहा-"लगता है, मालिक ने आज फिर डोज दे दिया है।"
"बड़े बाबू ! ऐसे 'डोज' से तो मेरा हाज्मा बढ़ता है...यूं भी प्रेम को जीवन भर असिस्टैंट मैनेजर की कुर्सी पर तो लड़ना नहीं है।"
"अच्छा !"
"और क्या...यह कृपाशंकर से मोल-भाव...मालिक और कन्स्ट्रक्शन का तजुर्बा मिल रहा है...यही शिक्षा और मूल लाभ है जो आगे चलकर काम आएगा....फिर एक दिन 'दौलत बिल्डर्स' के सामने ही प्रेम बिल्डर्स का बोर्ड नजर आएगा।"
"बड़ी ऊंची उड़ान भर रहे हैं।"
"पंखों से ज्यादा इरादों की दृढ़ता की जरूरत होती है ऊंची उड़ान के लिए, बड़े बाबू ।'
"तब तो आप शायद हमें नहीं भूलेंगे।"
"आप हमें मत भूलिए, हम आपको नहीं भूलेंगे।"
"बस, आप हुक्म करते रहिए।"