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Thriller कागज की किश्ती

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“मोनिका, कैसे भी हुई, यह कहानी खत्म तो हुई!”

“मुझे हैरानी है विलियम जैसा आदमी नागप्पा जैसे आदमी से धोखा खा गया।”

“गलती कौन नहीं करता!”

“विलियम गलती करने वाला आदमी नहीं था।”

“कई बार हालात ऐसे बन जाते हैं कि आदमी गलती करता है, धोखा खाता है।”

“लेकिन नागप्पा! उस जैसे आदमी ने विलियम का गला रेतने की जुर्रत की!”

“की। उस्तुरा उसके घर से बरामद हुआ है।”

“यकीन नहीं आता।”

“भेजा फिरेला है!” — एंथोनी भड़क उठा — “तू क्या समझती है मैंने खामखाह एक आदमी का खून करवा दिया है?”

तभी एकाएक फोन की घण्टी बज उठी।

एंथोनी ने हाथ बढ़ाकर रिसीवर उठाया।

“कौन है?” — वह रूखे स्वर में बोला।

“गुलफाम!” — आवाज आयी — “टोनी!”

“हां। क्या हुआ?”

“लल्लू ने जात दिखा दी।”

“मतलब?” — एंथोनी रिमोट कन्ट्रोल से टी.वी. की आवाज बन्द करता बोला।

“उसने काम नहीं किया। मैंने खुद अपनी आंखों से देखा।”

“जीसस!” — वह डिब्बे से हासिल होने वाले सात लाख रुपये के बारे में सोचता बोला — “यानी कि वो साला वीरू तारदेव अभी सलामत है?”

“अपुन ये कब बोला?”

“ओह!” — बात समझकर एकाएक एंथोनी हंसा — “ओह!”

“हमें लल्लू का कुछ करने का है। छोकरा टूट जायेंगा और हमें नपवा देंगा।”

“अभी नहीं। अभी कुछ नहीं करने का। जो करने का है, घाटकोपर बैंक वाले काम के बाद करने का है। अभी हमें लल्लू की जरूरत है। उस जैसा टॉप का ड्राइवर हमें खड़े पैर नहीं मिलने वाला।”

“ठीक है। जैसा तू बोले।”

लाइन कट गयी।

एंथोनी ने रिसीवर रख दिया।

ब्लू फिल्म में अब उसकी रूचि नहीं रही थी।

मोनिका में भी नहीं। उसे अफसोस था कि वह लल्लू को करम चन्द नहीं बना सका था।

एक गलत आदमी को चुनकर गलती उसने की थी लेकिन उसकी सजा लल्लू को मिलने वाली थी।

मौत की सजा!

आधी रात के करीब अष्टेकर थाने के करीब ही ट्रांजिट कैम्प के नाम से जाने जाने वाले इलाके के एक ढ़ाबे में बैठा था। ढ़ाबे में लोग जहां मेज पर बैठकर खाना खाते थे, वहीं बेवड़ा पीते थे लेकिन आज ढ़ाबे में इलाके के बड़े दरोगा की मौजूदगी की वजह से किसी मेज पर भी बेवड़े की बोतल प्रकट नहीं हुई थी। यह बात जुदा थी कि आज अगर ऐसा हुआ होता तो अष्टेकर ने वो नजारा इ‍सलिए नजरअन्दाज कर दिया होता क्योंकि आज वह खुद आधी बोतल शराब पीकर आया था।

कब्रिस्तान में मार्था को विलियम की कब्र के सिरहाने खड़ा देखकर वह बहुत आन्दोलित हुआ था। उसी का नतीजा यह निकला था कि आज उसने वो काम किया था जिसे वह सख्त नापसन्द करता था।

उसने थाने में ही बैठकर शराब पी ली थी।

तभी ढ़ाबे का मालिक अजमेर सिंह उसके पास पहुंचा।

“खाना लाऊं, माई-बाप?” — वह खुशामदभरे स्वर में बोला।

“नहीं।” — अष्टेककर सिर उठाकर बोला — “अभी नहीं।”

“थोड़ी और?” — उसने अंगूठा अपने मुंह से लगाया।

अष्टेकर ने घूरकर उसकी तरफ देखा।

अजमेर सिंह ने खींसे निपोरीं और अपनी खुली, लहराती दाढ़ी पर हाथ फेरा।

“और क्या हाल है?” — अष्टेकर ने पूछा।

“वदिया।” — अजमेर सिंह बोला।

“धन्धा कैसा चल रहा है?”

“वदिया।”

“गुण्डे, बदमाशों, मवालियों को तो इधर पनाह नहीं देता?”

“नई जी, बिल्कुल नईं। वाहे गुरु दी सौं।”

“बाल-बच्चे कैसे हैं?”

“एक नम्बर के हरामी हैं, जी। खून पीत्ता होया ने। सारा दिन लड़ते रह‍ते हैं आपस में। शोर-शराबा, धक्का-मुक्की तोड़-फोड़, यही कुछ होता रहता है सारा दिन। मां दी तो पागलखाने जाने जैसी हालत कर देते हैं लानती। वाहे गुरु बचाये ऐसी औलाद से तो।”

“कितने बच्चे हैं?”

“पांच।” — अजमेर सिंह ने उसे पंजा दिखाया — “चार मुंडे, इक कुड़ी। लेकिन कुड़ी मुंडयां तों ज्यादा कम्बख्त है, जी। भ्रांवा दी बराबरी करके लड़दी ए, जी। जम के बराबर दा मुकाबला करदी ए, जी। सारा दिन हाहाकार मचाई रखदे ने बच्चे सौरी दे।”

अष्टेकर की आंखों के सामने कब्र में दफन विलियम का चेहरा आ गया। मार्था से उसकी शादी हुई होती तो आधी दर्जन से कम बच्चे पैदा किये बिना वह न माना होता।

कितना शौक था उसे औलाद का।

“अजमेर सिंह” — अष्टेकर धीरे बोला — “तेरी जगह मैं होता तो शिकायत न कर रहा होता। घर में कम-से-कम तेरा कोई है तो सही जिसके पास तूने जाना होता है।”

“मैं समझ गया, जी, तुहाडी बात।” — अजमेर सिंह सहमति में गर्दन हिलाता बोला।

“नहीं। नहीं समझा तू। समझ भी नहीं सकता।”

“माई-बाप, मैं होया निरा अनपढ़। अंगूठाछाप। मैनूं की समझ...”

“इस बात का पढ़ाई से कोई रिश्‍ता नहीं। सरदार, जैसी गृहस्थी तेरी है, वैसी गृहस्थी के लिए मैं अपना सर्वस्व न्योछावर कर सकता हूं।”

“घाटे में रहोगे, जी। आप ही सुखी हो। बीमारी, फीसां, कापियां-किताबां, किराया-भाड़ा, राशन-पानी, औलाद दे अग्गे की फिक्र में पिसकर रह जाओगे,जी। आपां बहुत दुखी जे, जी।”

“तू झूठा है।”

“चलो जी, मैं झूठा ही सही। अब खाना भेजूं?”

“हां, भेज।”

भेजने की जगह अजमेर सिंह एक ट्रे में अष्टेकर के लिए खुद खाना लेकर आया।

अष्टेकर ने अभी पहला ही कौर तोड़ा था कि हवलदार पाण्डुरंग उसे ढ़ाबे के भीतर दाखिल होता दिखाई दिया। वह लम्बे डग भरता अष्टेकर के करीब पहुंचा। उसने अष्टेकर के कान में जल्दी से कुछ कहा।

अष्टेकर ने एक गहरी सांस ली, हाथ में थमा कौर उसने वापिस ट्रे में डाल दिया और उठ खड़ा हुआ।

कम्पोजिट पिक्चर बनाने वाले पुलिस के आर्टिस्ट के साथ जोगलेकर रात के एक बजे तक थाने में बैठा। आर्टिस्ट उसे दर्जनों की तरह के नाक, कान, होंठ, ठोढ़ी, माथा, आंखों वगैरह के फोटोग्राफ दिखाता था जिसमें से उसने लल्लू से मिलते अंग छांटने होते थे। जब वह वे अंग छांट चुका होता था तो आर्टिस्ट उनकी एक कम्पोजिट पिक्चर तैयार करके दिखाता था जो कि जोगलेकर को लल्लू जैसी नहीं लगती थी। आर्टिस्ट उसके द्वारा बताए गए फर्कों के मद्देनजर नयी ड्राइंग बनाता था लेकिन जोगलेकर को वह भी उस पैसेंजर जैसी नहीं लगती थी जिसने उससे पचास रुपये उधार लेकर लौटाये नहीं थे।
 
यूं ही रात का एक बज गया।

तंग आकर जोगलेकर उठ खड़ा हुआ और अगले रोज फिर आने का वादा करके घर लौट गया।

बीस हजार रुपये का इनाम अभी उसकी पहुंच से बहुत दूर था।

अष्टेकर ने वीरू तारदेव की लाश का मुआयना किया।

लाश के कटे गले से भल-भल करके निकलता खून जब कमरे से बाहर राहदारी में बह आया था तो किसी पड़ोसी की उस पर निगाह पड़ी थी और उसने पुलिस को फोन किया था।

अष्टेकार ने लाश में दो बातें खास तौर से नोट कीं।

अपनी मौत की घड़ी में भी जो वीरू तारदेव वही अपना बदूनुमा बोरे जैसा लम्बा ओवरकोट पहने था जिसके बिना अष्टेकर ने उसे कभी नहीं देखा था।

उसका गला भी ऐन उसी तरीके से कटा हुआ था जिस से वह पहले विलियम का और फिर नागप्पा का कटा देख चुका था।

अगले दिन अखबार में वरसोवा बीच से दो नौजवान लड़कियों की नंगी, गोली खाई लाशों की बरामदी की खबर छपी जो कि इन्स्पेक्टर अष्टेकर ने भी पढ़ी और भूल गया। वैसी वारदात मुम्बई शहर में होती ही रहती थीं। वरसोवा उसका इलाका नहीं था और जिन केसों की वह तफ्तीश कर रहा था, उनका उस वारदात से कोई रिश्‍ता नहीं था।

खबर के साथ हत्प्राण लड़कियों के नाम नहीं छपे थे क्योंकि अभी उनकी शिनाख्त नहीं हो सकी थी। शोभा और शान्ता के नाम छपे होते तो अष्टेकर शायद उस खबर से उतना निर्लिप्त न रहता।

उसने अखबार फेंका और कोलीवाड़े की तरफ रवाना हो गया।

पिछली रात वहां से सिर्फ वीरू तारदेव की लाश ही उठाई गई थी, मौकायवारदात की व्यापक जांच-पड़ताल उसने अभी करनी थी, किन्हीं उपलब्ध गवाहों के बयान उसने अभी लेने थे।

लल्लू दोपहर को तब सोकर उठा जब उसकी मां ने उसे झिंझोड़ कर जगाया।

“अरे, क्या हो गया है तुझे!” — उसकी मां झल्लाई — “या तो घर आता नहीं। आता है तो सोया रहता है।”

“सोने दे, मां।” — लल्लू भुनभुनाया।

“मैंने तेरे लिए तीसरी बार चाय बनाई है। ले, पी ले।”

“रख दे। पीनी होगी तो पी लूंगा।”

“रखने से फिर ठण्डी हो जायेगी।”

“अच्छा, अच्छा।”

“अभी मैं सब्जी लेने बाजार गई थी तो सड़क पर बड़ी चर्चा थी।”

“किस बात की?” — लल्लू ने यूं ही पूछ लिया।

“इलाके में हुए खून की। पिछली रात किसी ने किसी का गला काटकर खून कर दिया।”

लल्लू चाबी लगे खिलौने की तरह उछल कर उठा।

उसकी मां हकबका कर तनिक पीछे हट गयी।

“क्या हुआ?” — वह बोली।

“जिसका खून हुआ, उसका कोई नाम सुना तूने? कौन था वो?”

“मुझे क्या पता कौन था वो! लेकिन” — मां एक क्षण ठिठककर बोली — “नाम लोग ले रहे थे।”

“क्या? क्या नाम?”

“अजीब-सा नाम था। आदमी का नहीं किसी आबादी का नाम लगता था।”

“तारदेव! वीरू तारदेव!”

“हां। यही। तू कैसे जानता है? तू तो अभी सोकर उठा है?”

“तूने ठीक से सुना था? लोग मरने वाले का यही नाम ले रहे थे?”

“हां। लेकिन तू...”

लल्लू बाहर को भागा।

“अरे, कहां जा रहा है, अभागे?” — मां पीछे से चिल्लाई — “चाय तो पीता जा। मैंने तीसरी बार बनाई है।”

“आकर पीता हूं।”

लल्लू सड़क पर आया और लगभग दौड़ता हुआ घटनास्थल पर पहुंचा।

वीरू तारदेव के घर वाली इमारत के सामने भीड़ लगी हुई थी। उसी भीड़ में उसे अष्टेकर भी दिखाई दिया जो कुछ लोगों से बातचीत कर रहा था।

लल्लू तनिक करीब सरक आया।

वीरू तारदेव अगर गला कटने से मरा था तो टोनी फौरन समझ जाने वाला था कि लल्लू उसको सौंपे गये काम को अंजाम नहीं दे पाया था।

लेकिन वीरू तारदेव का गला काटा तो किसने काटा?

गुलफाम अली ने?

“इन्स्पेक्टर साहब” — एक आदमी, जो शायद प्रेस रिपोर्टर था, अष्टेकर से पूछ रहा था — “क्या इस कत्ल का मिशन हस्पताल में हुए रामचन्द्र नागप्पा के कत्ल से कोई रिश्‍ता हो सकता है? कत्ल का तरीका तो दोनों केसों में एक ही है।”

“अभी मैं कुछ नहीं कह सकता।” — अष्टेकर उखड़े स्वर में बोला — “अभी तफ्तीश जारी है।”

“अपना अन्दाजा तो बताइये!”

“कत्ल अन्दाजों के दम पर हल नहीं होते, रिपोर्टर साहब।”

“कोई अपना जाती खयाल ही बताइये।”

“मेरा कोई जाती खयाल नहीं है।”

“विलियम का कत्ल भी” — एक दूसरा रिपोर्टर बोला — “इसी तरीके से हुआ था। क्या तीनों का कातिल एक ही आदमी हो सकता है?”

अष्टेकर खुद भी उस सवाल पर बहुत गौर कर चुका था।

“फिलहाल मैं कुछ नहीं कह सकता। अब आप लोग तशरीफ ले जाइये।”

और वह उस झुण्ड से अलग हुआ।

तभी उसकी निगाह लल्लू पर पड़ी।

वह लम्बे डग भरता लल्लू के करीब पहुंचा।

“हजारे!” — अष्टेकर बोला, वह उन दुर्लभ लोगों में से था जो उसे लल्लू नहीं कहते थे — “तू यहां क्या कर रहा है?”

“कुछ नहीं!” — लल्लू तनिक हड़बड़ाये स्वर में बोला — “इधर से गुजर रहा था। मैं पास ही तो रहता हूं! भीड़ देखकर ठिठक गया।”

“सुना तो होगा कि कल रात यहां वीरू तारेदव नाम के एक आदमी का कत्ल हो गया है?”

“हां, सुना है।”

“किससे सुना है?”

“कई लोग चर्चा कर रहे थे।”

“तू जानता था मरने वाले को?”

“मामूली जान-पहचान थी। पास्कल के बार में रोज आने वालों में से था वो।”

“पिछली बार रामचन्द्र नागप्पा के कत्ल में तो तेरी गवाही खुर्शीद ने दी थी और मैंने उसकी बात पर विश्‍वास करके तेरा खयाल छोड़ दिया था। इस बार कौन गवाही देगा तेरी?”

“मुझे गवाही की भला क्या जरूरत है? क्या इस इलाके में होने वाले हर कत्ल के लिए मेरे पर शक किया जाया करेगा?”

“जब तक टोनी और गुलफाम से यारी रखेगा, तब तक ऐसा ही होगा।”

“यह तो धांधली है!”

“इस धांधली से बचना चाहता है तो अपने लच्छन सुधार ले। मैंने तेरे बारे में खुर्शीद से भी बात की थी। उसने तुझे कुछ नहीं कहा? कुछ नहीं समझाया?”

“कहा था। समझाया था।” — लल्लू के मुंह से निकला — “उसने भी मुझे यही कहा था कि मैं टोनी और गुलफाम की यारी छोड़ दूं और यह शहर छोड़कर उसके साथ कहीं दूर निकल जाऊं।”

“उसने तुझे लाख रुपये की सलाह दी थी। वह लड़की तेरे जैसे घौंचू से प्यार करती है। उसके प्यार की कद्र कर, उसकी सलाह पर अमल कर वर्ना बेमौत मारा जायेगा।”

“अच्छा!”

“अच्छा यूं न कह, साले, जैसे मेरे पर कोई अहसान कर रहा हो। हामी अपने आप पर, अपनी कमउम्री पर रहम खाकर भर। समझा!”

लल्लू का सिर मशीन की तरह सहमति में हिला।
 
जोगलेकर का दिमाग भन्नाया जा रहा था और उसके ब्लडप्रेशर का ग्राफ ऊंचा, और ऊंचा उठता जा रहा था।

पुलिस आर्टिस्ट द्वारा बनाई गई फाइनल कम्पोजिट पिक्चर उनके सामने थी।

“इन्स्पेक्टर साहब” — वह झल्लाया — “मैं कहता हूं, यह तसवीर रत्ती भर भी उस लड़के की सूरत से नहीं मिलती जो मुझे ट्रेन में मिला था। इस तसवीर की आंख, कान, नाक सिर कुछ नहीं मिलता उस लड़के से।”

“तसवीर आपके द्वारा छांटे गये आंख, कान, नाक, सिर वगैरह को ही कम्पोज करके बनाई गई है।” — पेनणेकर बोला।

“फिर भी नहीं मिलती।”

“फिर कैसे बात बनेगी? आपकी जानकारी के लिए आपने जो पर्स हमें दिया था, उस पर से उठाया गया एक अंगूठे का निशान वन हण्ड्रेड पर्सेन्ट उस निशान से मिलता है जो हमारे पास पहले से उपलब्ध है। अगर आप कम्पोजिट पिक्चर पास कर दें तो अपराधी चुटकियों में पकड़ा जायेगा।”

“कैसे पास कर दूं? आपके आर्टिस्ट द्वारा बनाई गई तसवीर का तो उस लड़के की सूरत से दूरदराज का भी रिश्‍ता नहीं। मैं कहता हूं आपका आर्टिस्ट रद्दी है। उसे कुछ नहीं आता। उससे अच्छी ड्राइंग तो मेरी दस साल की लड़की कर लेती है।”

“वो इन कामों के लिए विशेष रूप से प्रशिक्षणप्राप्त आर्टिस्ट है।”

“नानसेंस।”

“ठीक है।” — पेनणेकर हथियार डालता बोला — “मैं मुम्बई से आर्टिस्ट बुलवाता हूं।”

“कब?”

“आज ही। अभी। मैं अभी मुम्बई पुलिस हैडक्वार्टर में फोन करता हूं।”

रात ग्यारह बजे लल्लू अड्डे पर पहुंचा।

टोनी और गुलफाम वहां पहले से मौजूद थे।

लल्लू आधा घण्टा लेट पहुंचा था जिसकी वजह से मन-ही-मन एंथोनी अंगारों पर लोट रहा था लेकिन प्रत्यक्षत: नार्मल दिखाई देने का भरसक प्रयत्न कर रहा था। कल के आखिरी काम के लिए अभी उसे लल्लू की जरूरत जो थी।

“आ, लल्लू। बैठ।” — एंथोनी मीठे स्वर में बोला।

परेशानहाल लल्लू उनके सामने एक कुर्सी पर बैठ गया।

“कैसा है?”

“ठीक हूं।” — लल्लू बोला।

“परेशान क्यों दिख रहा है?”

“कुछ नहीं। यूं ही।”

“फिर भी?”

“टोनी, मैं एकदम ठीक हूं।”

“सच बोल रहा है न?”

“हां।”

“कल के काम के लिए तैयार है न?”

“हां।”

“पूरी मजबूती, मुस्तैदी के साथ?”

“हां।”

“यहां भी तैयारी मुकम्मल है। हर जरूरी चीज हमने पहले ही जमा कर ली हुई है। वर्दियां, धुंयें के बम, हथियार, चोरी की नकली नम्बर प्लेट वाली बढ़िया कार, सब कुछ। कार तूने भीतर आते वक्त बाहर खड़ी देखी ही होगी!”

“हां, देखी थी।”

“एकदम चौकस कार है। तूने चलानी है इसलिए फिर भी तू चैक कर लेना।”

“ठीक है।”

“विस्की पियेगा?”

“पी लूंगा।” — लल्लू ने एक बार जोर से थूक निकली, फिर बोला — “लेकिन टोनी, पहले मैं कुछ कहना चाहता हूं।”

“क्या?”

लल्लू ने फिर थूक निगली।

“जो कहना है, बेखौफ कह, लल्लू।”

“टोनी, कल रात मैंने वीरू तारदेव का खून नहीं किया था।”

“क्या!”

“हां।”

“तू वहां गया ही नहीं था?”

“गया था। लेकिन मुझे उस खस्ताहाल, रोते-बिलखते, अपनी जिन्दगी की भीख मांगते, बूढ़े पर तरस आ गया था। मैं उस लाचार बूढ़े का खून करने के लिए अपने आपको तैयार नहीं कर सका था।”

“तेरा मतलब है तूने उसे खल्लास नहीं किया?”

“नहीं।”

“कमाल है! मैं तो समझ रहा था अपना लल्लू बहादुरी दिखा गया था। उसे शूट करने की जगह उसका गला रेतने की हिम्मत कर गया था।”

“मैंने कुछ नहीं किया। मैं कसम खाकर कहता हूं मैंने उसे नहीं मारा। मैं उसे एकदम चौकस, जीता-जागता, सही-सलामत छोड़कर आया था।”

“हूं। यानी कि उसे किसी और ने मारा! किसी और को भी रंजिश थी उससे! चलो, जो हुआ, अच्छा हुआ। हमारा काम किसी और ने कर दिया।”

“ऐसा?”

“हां। लल्लू, जब यह काम तूने नहीं किया, मैंने नहीं किया, गुलफाम ने नहीं किया तो जाहिर है कि किसी और ने किया। बरोबर?”

“बरोबर।”

“लेकिन काम फिर भी हो गया। बरोबर?”

“बरोबर।”

“अगर इस वजह से परेशान है तो खुश हो जा। खुश हो जा कि तुझे खून नहीं करना पड़ा।”

लल्लू के चेहरे पर रौनक आयी।

“टोनी” — फिर वह धीरे से बोला — “मैं एक बात और कहना चाहता हूं।”

“वो भी बोल।”

“कल के बाद मैं ये तमाम काम छोड़ना चाहता हूं। कल की बैंक डकैती के बाद मैं अपना हिस्सा लेकर यह शहर ही छोड़ देना चाहता हूं। मैं खुर्शीद के साथ शादी बनाकर कहीं और रहना चाहता हूं। तुम लोगों को कोई एतराज तो नहीं?”

“अरे, हमें क्या एतराज होगा!” — एंथोनी बोला — “लल्लू, तू शौक से अपनी पसन्द का रास्त चुन।”

लल्लू ने चैन की सांस ली।

“तू कहता है बैंक से हमें बहुत मोटी रकम हासिल हो सकती है?”

“हां। कम से कम साठ लाख की। करोड़ तक भी हो सकती है। मेरी जानकारी पक्की है।”

“फिर क्या वान्दा है! फिर तो हमारे पास खूब पैसा होगा। फिर तो हम खुद ही इस गुनाहभरी जिन्दगी से किनारा कर लेंगे। क्यों, गुलफाम?”

“बरोबर।” — गुलफाम बोला — “क्या रखेला है रोज-रोज रिस्क लेने में!”

“गुलफाम” — लल्लू हर्षित स्वर में बोला — “यह तो तूने बहुत ही बढ़िया बात कही!”

“अब विस्की हो जाये?”

“हो जाये।”

विस्की पीते समय लल्लू के मानसपटल पर एक ही दृश्‍य उभर रहा था।

उसके बायें हाथ में नोटों से भरा सूटकेस था, दायां हाथ खुर्शीद की कमर में था और वह एक ऐसे अनजाने शहर की एक अनजानी सड़क पर चला जा रहा था जो मुम्बई से बहुत दूर था जहां उन्हें कोई नहीं जानता था।

एक दिन और। बस ए‍क दिन और।

बैंक घाटकोपर के इलाके में था जहां से प्रति सप्ताह कम से कम साठ लाख रुपया — कई बार इससे ज्यादा भी — इन्डस्ट्रियल एरिया ले जाया जाता था। बैंक दो बजे बन्द होता था, उसके ठीक दस मिनट बाद एक बख्तरबन्द गाड़ी बैंक में पहुंचती थी जिसमें लोहे के ट्रंकों में बन्द रुपया लाद दिया जाता था। बख्तरबन्द गाड़ी के साथ केवल एक सशस्त्र गार्ड होता था।

दो बजने में पांच मिनट पर एक मर्सिडीज कार बैंक के सामने आकर रुकी जिसमें से धोती, कुर्ता, टोपी, चप्पल, चश्‍माधारी दो मारवाड़ी सेठ बाहर निकले। दोनों के हाथ में कैनवस के थैले थे।

वे बैंक की तरफ बढ़ गए और गाड़ी का ड्राइवर — जो कि लल्लू था — गाड़ी आगे निकाल कर ले गया।

दोनों मारवाड़ी एंथोनी और गुलफाम थे।

एंथोनी बैंक के हाल में वहां जा खड़ा हुआ जहां एक लकड़ी का डैस्क था। डैस्क पर कलम-दवात और बैंक के काम के वाउचर वगैरह पड़े थे। डैस्क के नीचे रद्दी कागज़ डालने के लिए एक टोकरी पड़ी थी।

एंथोनी एक वाउचर उठाकर उसे भरने का बहाना करने लगा।

बैंक बन्द होने का वक्त हो रहा था इसलिए उस वक्त वहां बहुत ज्यादा ग्राहक मौजूद नहीं थे।

गुलफाम अली हाल के ही एक कोने में मौजूद टायलेट की तरफ बढ़ चला। एंथोनी ने अपना थैला ऊंचा किया, उसके भीतर हाथ डाल कर कुछ निकालने का बहाना किया लेकिन हकीकतन भीतर मौजूद धुयें के बम के साथ जुड़ी टाइम क्लॉक को चालू कर दिया।

टाइम क्लॉक में बम फटने का टाइम दो बजकर दस मिनट पर दर्ज था।

ऐसा ही इन्तजाम गुलफाम अली के पास मौजूद थैले में था।

एंथोनी ने एक बार चारों तरफ निगाह डाली और फिर थैला चुपचाप रद्दी की टोकरी में डाल दिया।

डैस्क पर एक अखबार पड़ा था। उसने अखबार को दोहरा करके रद्दी की टोकरी पर इस प्रकार डाला कि वह उसके मुंह पर अटक गया।

वह डैस्क के पास से हटा और वापिस बाहर निकलने के रास्ते की ओर बढ़ा।

तभी गुलफाम अली टायलेट से बाहर निकला।

वह खाली हाथ था।

गेट पर खड़े दरबान ने दो बजते पाकर गेट का चैनल गेट इस प्रकार खींच दिया था कि उसके दोनों पल्लों में सिर्फ एक आदमी के गुजरने लायक झिरी रह गयी। अब वह केवल भीतर मौजूद लोगों को बाहर निकलने दे रहा था, किसी नये ग्राहक को भीतर दाखिल नहीं होने दे रहा था।

दोनों आगे पीछे गेट से निकले।

गार्ड की या किसी और की तवज्जो इस बात की तरफ नहीं गई थी कि वे दो मारवाड़ी भीतर दाखिल होते वक्त खाली हाथ नहीं थे और यह कि भीतर उन्होंने बैंक की किसी सेवा का कोई लाभ नहीं उठाया था।

तभी लल्लू ने मर्सिडीज उनके सामने लाकर रोकी।

दोनों उसकी पिछली सीट पर सवार हो गए।

लल्लू ने मर्सिडीज आगे बढ़ा दी।

एंथोनी ने गाड़ी में लगी डिजिटल क्लॉक पर निगाह डाली।

दो बजकर दो मिनट हुए थे।

लल्लू सड़क पर कार दौड़ाता रहा। उसे खूब मालूम था कि उसने क्या करना था। उसने थोड़ी देर इधर-उधर कार चलानी थी और फिर ऐन दो बजकर दस मिनट पर फिर बैंक वाली सड़क पर पहुंच जाना था।

दो बजकर दस मिनट पर मोड़ काट कर वह फिर बैंक वाली सड़क पर दाखिल हुआ।

दूर से ही उन्हें बख्तरबन्द गाड़ी बैंक के सामने खड़ी दिखाई दे गई।

गाड़ी का सशस्त्र गार्ड उसके पृष्ठभाग में खड़ा था और चाबी लगाकर उसका पिछला दरवाजा खोल रहा था।

लल्लू मन्थर गति से मर्सिडीज आगे सरकाता रहा।

दो आदमी लोहे के दो ट्रंक उठाये बैंक से बाहर निकले।

तभी बैंक के भीतर एक-के-बाद-एक दो धमाके हुए और फिर बैंक की खिड़कियों दरवाजों से धुआं बाहर निकलता दिखाई देने लगा।

बैंक के गार्ड ने फौरन अपने पीछे चैनल गेट के साथ ही लगा लकड़ी का दरवाजा बन्द कर दिया। ऐसे मौकों के लिए उसे यही निर्देश था।

ट्रंक उठाये व्यक्ति बख्तरबन्द गाड़ी के खुले दरवाजे की तरफ लपके। गाड़ी के रायफलधारी गार्ड ने कन्धे से रायफल उतार ली और सावधान की मुद्रा में आ गया।
 
भीतर पता नहीं क्या हो गया था लेकिन अब नोटों से भरे ट्रंकों का फौरन से पेश्‍तर गाड़ी में लादा जाना और गाड़ी का दरवाजा बन्द किया जाना जरूरी था। बैंक के गार्ड ने सुरक्षावश बैंक का दरवाजा बन्द कर दिया था इसिलए ट्रंक उठाये आदमी भीतर वापिस नहीं जा सकते थे।

भीतर चिल्ल-पों मच गई थी। धुयें के बादल अब गहरे होकर बाहर निकल रहे थे।

मर्सिडीज करीब पहुंची तो एंथोनी ने निसंकोच बख्तरबन्द गाड़ी के गार्ड को शूट कर दिया।

गुलफाम की गोलियों के शिकार ट्रंक उठाये दोनों आदमी बने।

फिर मर्सिडीज के बैंक की ओर के दोनों दरवाजे खुले, सड़क पर मौजूद लोगों को त्रस्त करने के लिए हवा में गोलियां चलाते टोनी और गुलफाम बाहर निकले और सड़क पर गिरे पड़े ट्रंकों की ओर झपटे।

दोनों ने एक-एक ट्रंक उठाया और वापिस मर्सिडीज की ओर भागे। गाड़ी के दोनों दरवाजे तब भी खुले थे, गाड़ी स्टार्ट थी, गियर में थी और लल्लू उसे किसी भी क्षण वहां से उड़ा ले जाने को तत्पर था।

गुलफाम का लक्ष्य अगला खुला दरवाजा था और टोनी का पिछला।

तभी बख्तरबन्द गाड़ी की ड्राइविंग सीट पर से ड्राइवर नीचे कूदा। उसने पिछवाड़े का रुख किया तो दो आदमियों को नोटों के ट्रंक लेकर मर्सिडीज की तरफ लपकता पाया। उसके नेत्र फैल गए। वह फौरन वापिस गाड़ी में सवार होने को लपका। उसका इरादा गाड़ी को मर्सिडीज के रास्ते में अड़ाने या साथ टकरा देने का था।

गुलफाम ने अपने वाले ट्रंक को गाड़ी में फेंका और उसके पीछे ही भीतर जुस्त लगा दी।

ऐसा ही एंथोनी ने किया।

लेकिन इससे पहले कि वह मर्सिडीज के भीतर हो पाता, एक गोली सनसनाती हुई आई और उसके कन्धे को छीलती हुई गुजर गई। गोली इतनी शक्तिशाली थी कि वह उसके उतने ही वार से फिरकनी की तरह घूम गया और मर्सिडीज से बाहर सड़क पर‍ गिरा।

आगे बख्तरबन्द गाड़ी का ड्राइवर गाड़ी को दायें काट रहा था।

एक क्षण में तीनों मारे जा सकते थे या पकड़े जा सकते थे।

एंथोनी को गाड़ी में सवार हो गया जानकर लल्लू ने गाड़ी को पहले ही हरकत दे दी हुई थी। एंथोनी उसे रियरव्यू मिरर में गाड़ी के भीतर न दिखाई दिया तो उसने ब्रेक पर पांव मारा।

“लल्लू!” — एंथोनी चिल्लाया — “भाग जा।”

वह खुद उठकर विपरीत दिशा में भागा।

लल्लू ने गाड़ी को फिर स्पीड दी। तब तक बख्तरबन्द गाड़ी इतनी तिरछी हो चुकी थी कि मर्सिडीज का उसके पहलू में से गुजर पाना असम्भव था।

उस घड़ी में लल्लू ने पता नहीं क्या किया कि गाड़ी के एक तरफ के दोनों पहिये उठ गये और गाड़ी कोई पैंतालीस अंश के कोण पर तिरछी होकर निहायत खतरनाक हालत में बख्तरबन्द गाड़ी को पार कर गई।

एंथोनी पर गोली बैंक के गार्ड ने चलाई थी। उसने सारा नजारा बाथरूम की खिड़की में से देखा था। उसने खिड़की की ग्रिल में से रायफल की नाल निकालकर बाहर गोली दाग दी थी।

उसने रायफल की दूसरी गोली भी भागते हुए एंथोनी की दिशा में दागी।

दूसरी गोली एंथोनी की टांग में लगी।

एंथोनी लड़खड़ाया, गिरा, गिर कर उठा और अपनी लंगड़ा चली टांग के सहारे सड़क पर भागता चला गया। वह कुछ ही कदम भागता था कि फिर लड़खड़ा जाता था। वह जानता था कि वह ज्यादा दूर नहीं भाग सकता था।

पीछे शोर मचा हुआ था।

बैंक का दरवाजा खोलकर रायफल में फिर से गोलियां भरता बैंक का दरबान बाहर सड़क पर आ गया था।

उसी क्षण मर्सिडीज वापिस लौटी। पहले वाले ही असम्भव अन्दाज से वह बख्तरबन्द गाड़ी की बगल से गुजरी।

मर्सिडीज में से गुलफाम ने एंथोनी पर फिर से गोली चलाने को तत्पर दरबान को शूट कर दिया।

दरबान कटे वृक्ष की तरह नीचे गिरा। उसके हाथ से रायफल छूट गई।

एंथोनी फिर लड़खड़ाया। इस बार वह सम्भल न सका। वह जहां लड़खड़ाया, वहीं धराशायी हो गया। वह दोबारा उठने का प्रयत्न करने लगा लेकिन अब वह काम उसे असम्भव लगने लगा।

लल्लू तूफानी रफ्तार से मर्सिडीज को एंथोनी के पहलू में लाया और ब्रेक पर लगभग खड़ा हो गया। ब्रेकों की एक भीषण चरचराहट की आवाज के साथ गाड़ी क्षण मात्र के लिए गतिशून्य हुई। उस क्षण में गुलफाम गाड़ी से बाहर कूदा, उसने सड़क पर गिरे पड़े एंथोनी को जबरन उठाकर उसके पैरों पर खड़ा किया और उसे लगभग घसीटता हुआ मर्सिडीज की तरफ ले चला। उसने उसे मर्सिडीज की पिछली सीट पर धकेला और खुद भी उसके साथ सवार हो गया।

दरवाजा अभी बन्द भी नहीं हुआ था कि लल्लू ने फिर तूफानी रफ्तार से गाड़ी दौड़ा दी।

तभी सायरन बजाती फ्लाईंग स्क्वायड की एक गाड़ी बैंक के सामने पहुंची।

उत्तेजित भीड़ में से हर कोई पुलिस को बताने लगा कि उस सारे हंगामे के लिए जिम्मेदार मर्सिडीज किधर भागी थी।

फ्लाईंग स्क्वायड की गाड़ी तुरन्त उस दिशा में भागी लेकिन उन्हें मर्सिडीज की हवा भी न मिली। लल्लू तो जैसे मर्सिडीज सड़क पर नहीं चला रहा था, हवा में उड़ा रहा था।

“पुलिस की वो गाड़ी वायरलैस वाली थी।” — गुलफाम बोला — “आगे कहीं रोड ब्लॉक मिल सकता है। गोली से जख्मी एंथोनी और नोटों के ट्रंक हमें पकड़वा देंगे।”

“तो क्या करें?” — लल्लू बोला — “गाड़ी तो छोड़ नहीं सकते!”

“हां। और जो गाड़ी हमने तब्दील करनी थी, वो इतने हंगामे की वजह से पीछे घाटकोपर में ही रह गई।”

“रोड ब्लॉक कोई चुटकियों में थोड़े ही हो जाएगा! मैं पहले ही धारावी पहुंच जाऊंगा।”

“तेज रफ्तार गाड़ी चलाएगा तो स्पीडिंग का चालान करने के लिए कोई ट्रैफिक पुलिस वाला भी रोक सकता है।”

“देखा जाएगा।” — लल्लू दिलेरी से बोला।

गुलफाम ने हैरानी से उसकी तरफ देखा।

लेकिन रास्ते में कोई ट्रैफिक का चलान करने वाला न मिला, कोई रोड ब्लॉक न मिला।

वे निर्विघ्न अड्डे पर पहुंच गए।

वहां सबसे पहले एंथोनी की तरफ तवज्जो दी गयी।

गोली उसे घुटने से थोड़ी ऊपर जांघ के पिछले भाग में लगी थी।

गुलफाम ने जख्म से ऊपर कसकर एक कपड़ा रस्सी की तरह गोल लपेट कर बांधा तो खून बहना बन्द हुआ।

“लल्लू” — एंथोनी कठिन स्वर में बोला — “डमडम, मैंने तुझे भाग जाने के लिए कहा था, तू वापिस क्यों लौट आया?”

“टोनी” — लल्लू बोला — “तुझे पता है मैं क्यों वापिस लौटा! ऐसे कहीं मैं भाग सकता था!”

एंथोनी के होंठों पर एक फीकी मुस्कराहट आयी।

“भाग तो सकता था” — वह बोला — “लेकिन भागा नहीं। शुक्रिया। शुक्रिया, करम चन्द।”

“तू मेरे को करम चन्द बोला?”

“हां।”

“टोनी, आज तू मेरे को बहुत बड़ा ईनाम दियेला है। तू मेरे को करम चन्द बोल रयेला है।”

“अभी मैं तेरे को इससे बड़ा ईनाम दूंगा।”

“वो क्या?”

“अभी मालूम होयेंगा। पहले ट्रंक निकालकर ला। देखें, कितना माल मिला।”

लल्लू मर्सिडीज में से ट्रंक निकालने बाहर चला गया।

“बाटली निकाल।” — एंथोनी बोला।

“टोनी” — गुलफाम बोला — “विस्की पियेंगा तो खून और बहेंगा।”

“अरे, ऐसी की तैसी खून की। साले, मैं दर्द से मरा जा रहा हूं।”

गुलफाम बोतल निकाल लाया।

एंथोनी ने उसके हाथ में से बोतल झपट ली और उसका एक बड़ा सा घूंट नीट ही गले से उतारा।

“लल्लू को शबाशी दे रयेला है।” — गुलफाम बोला — “मेरे कू लगता है अब तू लल्लू को खल्लास करना नहीं मांगता।”

“हां।” — एंथोनी बोला — “उसने मेरी जान बचाई है। जीने दे उसे।”

“ठीक है।”

“साले ने आज तो कमाल ही कर दिया। ऐसी ड्राइविंग तो मैंने सपने में नहीं देखी।”

“मैंने भी। तू और बड़ा क्या ईनाम देगा उसे?”

तभी लल्लू दोनों ट्रंक उठाये वापिस लौटा।

ट्रंकों मे ताले तोड़े गए और उनमें से नोट निकाल कर गिने गए।

पूरे पिचहत्तर लाख रुपए निकले।

“इसमें से पच्चीस लाख तेरे।” — एंथोनी बोला।

“पच्चीस लाख!” — लल्लू के नेत्र फैल गए — “यानी कि बराबर का हिस्सा! टोनी, बराबर का हिस्सा!”

“हां। बराबर का हिस्सा। मैंने कहा था मैं तुझे और भी बड़ा ईनाम दूंगा। यही तेरा बड़ा ईनाम है। बराबर का हिस्सा। निकाल ले अपना हिस्सा।”

“शुक्रिया, लेकिन टोनी...”

“क्या?”

“थोड़े अरसे के लिए मैं अपना हिस्सा यहीं छोड़ना चाहता हूं। मैं जाने की तैयारी कर चुकने के बाद अपना हिस्सा ले जाऊंगा।”

“ठीक है। वान्दा नहीं। अपना हिस्सा जब मर्जी ले जाना। वैसे जाने का तेरा पक्का फैसला है?”

“हां।”

“खुर्शीद के साथ?”

“हां।”

“ठीक है। खुश रह।”
 
एक बजे के करीब कल्याण में जोगलेकर के घर के लेटरबक्स में डाकिए ने एक चिट्ठी छोड़ी जो कि उसकी बीवी ने निकाली।

जोगलेकर थोड़ी ही देर पहले थाने से लौटा था। मुम्बई से आर्टिस्ट के आने में अभी वक्त लगना था इसलिए वह घर लौट आया था और रात का जागा होने की वजह से बिना नहाए-धोए, बिना खाए-पिए बिस्तर के हवाले हो गया था।

उसकी बीवी ने उसे गहरी नींद से जगाया।

“तुम्हारी बड़ी अजीब चिट्ठी आयी है।” — बीवी बोली।

“जमना बाई, तेरे पर खुदा की मार। तूने यह बताने के लिए मुझे जगा दिया! जानती है मैं रात भर नहीं सोया था। जानती है मैंने अभी फिर...”

“चिट्ठी के साथ एक पचास का नोट भी है।”

“तो जाकर उसकी भेलपूरी खा, पाव भाजी खा, सब्जी तरकारी ला, मुझे क्यों सताती है?”

“चिट्ठी में लिखा है यह कल्याण से मुम्बई का भाड़ा है। कल्याण से मुम्बई का भाड़ा क्या पचास रुपये लगता है?”

“भाड़ा! पचास रुपये! चिट्ठी!” — जोगलेकर एकाएक उठकर बैठ गया।

“हां। तुमने क्या कभी किसी को भाड़े के लिए पचास रुपये एधार दिये थे?”

“हां।”

“वही भाड़ा वापिस लौटा है। शुक्रिया की चिट्ठी के साथ।

“चिट्ठी!” — जोगलेकर एकाएक उत्तेजित हो उठा और गला फाड़कर चिल्लाया — “चिट्ठी कहां है?”

“मेरे पास है।” — जमना बाई हड़बड़ा कर बोली — “तुम यूं चिल्लाने क्यों लगे हो, जी? और ये पचास रुपये...”

“अरे, पचास रुपये को झाड़ू मार, जमना बाई। चिट्ठी! चिट्ठी दिखा।”

“ये लो।”

जोगलेकर ने बीवी के हाथ से चिट्ठी झपटी और कांपते हाथों ने दो बार तह की हुई वह चिट्ठी खोली। सबसे पहले उसने यही देखा कि चिट्ठी में भेजने वाले का पता था या नहीं।

उसने देखा चिट्ठी पर तो लिखने वाले के नाम की जगह केवल लल्लू लिखा था। लेकिन लिफाफे पर पूरा नाम और पता था :

करम चन्द हजारे, पांचवीं गली, लिच्छवी की चाल, खोली नम्बर पच्चीस, कोलीवाड़ा मुम्बई — 400022।

उसने चिट्ठी पढ़ी। लिखा था :

श्रीमान जोगलेकर साहब,

आपके पचास रुपये वापिस भेज रहा हूं। मुसीबत के वक्त काम आने का बहुत-बहुत शुक्रिया। भगवान आपका भला करे।

लल्लू।

जोगलेकर उछल कर बिस्तर से निकला। उसने अपनी बीवी को बांहों में भर लिया और उसे चक्कर देने लगा।

“अरे, छोड़ो।” — जमना बाई छटपटाती हुई बोली — “छोड़ो मुझे। छोड़ो। छोड़ो।”

जोगलेकर रुका। उसने उसके पांव जमीन पर टिकाकर उसे बन्धनमुक्त किया।

“हे भगवान!” — जमना बाई हांफती हुई बोली — “एक पचास के नोट की इतनी खुशी!”

“यह पचास का नहीं” — जोगलेकर खुशी से दमकता बोला — “बीस हजार दर्शनी हुंडी है।”

“क्या!”

“और जमना बाई, वैसे तो मैंने तेरी टांग तोड़ देनी थी लेकिन जा, मैंने तुझे माफ किया।”

“किस बात के लिये?”

“मेरी चिट्ठी खोलने के लिये। आगे से तू बेशक मेरी कोई भी चिट्ठी खोल लिया करना।”

“अरे, इस चिट्ठी में ऐसा क्या निकला है जो...”

“अभी कुछ न पूछ, जमना बाई। अभी तेरी समझ में कुछ नहीं आयेगा। मैं जा रहा हूं।”

“कहां?”

“इन्स्पेक्टर पेनणेकर के पास। थाने।”

“हे भगवान! फिर थाने!”

लल्लू ने खुर्शीद का दरवाजा खटखटाया।

“मैं लल्लू हूं।” — साथ ही वह बोला — “दरवाजा नहीं खोलना तो मत खोल लेकिन भीतर है तो मेरी बात सुन ले।”

दरवाजा खुला।

चौखट पर खुर्शीद प्रकट हुयी।

लल्लू को खुशी में पगलाया देखकर वह बहुत हैरान हुयी।

“क्या हुआ?” — वह बोली।

“मैं यह बताने आया हूं कि मैं अब्बी यह शहर छोड़ने को तैयार हूं। सुना! अगले हफ्ते नहीं। अब्बी का अब्बी! मैं तेरे साथ कहीं भी चलने को तैयार हूं।”

“सच कह रहा है?”

“हां।”

“सिर्फ मैं और तू? तेरी मां नहीं? तेरी दादी नहीं?”

“नहीं। और तेरी भी मां नहीं। तेरी बहन भी नहीं। क्या कहती है?”

“लेकिन कब? कहां? कैसे?”

“यह तू सोच। तू नहीं कहती थी कि रेलवे स्टेशन पर चलेंगे और जहां की भी गाड़ी तैयार होगी, उस पर सवार हो जायेंगे!”

“हां। कहती थी।”

“तो फिर?”

“ठीक है। मैं थोड़ा सामान बटोर लूं और मां और बहन को समझा लूं।”

“हां। ठीक है। मैं घर जाता हूं। यही काम मुझे भी करने हैं। तू दो घण्टे में तैयार होकर मेरे घर आ जाना।”

“ठीक है।”

“और यह ले।” — लल्लू ने नोटों का एक मोटा पुलन्दा उसकी तरफ बढ़ाया। वे नोट कल्याण वाली डकैती में उसके हिस्से में से थे।

“यह क्या है?”

“रख ले। अपने लिए नहीं। अपनी मां और बहन के लिये।”

“मेरे पास भी तो पैसे हैं!”

“फिर भी रख ले। तू और मैं कोई दो हैं!”

“तेरे को भी तो अपने घर वालों के लिये रोकड़ा चाहिये होगा!”

“उसके लिये मेरे पास और हैं।”

“किधर से मारे?”

“फिर बताऊंगा। अभी टेम नहीं है। ले, पकड़।”

खुर्शीद ने नोटों का पुलन्दा थाम लिया। वापिस भीतर दाखिल होने के लिये वह घूमी।

“खुर्शीद।” — लल्लू धीरे से बोला।

खुर्शीद ने फिर घूमकर उसकी तरफ देखा।

“क्या है, रे?” — वह असमंजसपूर्ण भाव से बोली।

“मैं” — लल्लू भर्राये स्वर में बोला — “तेरे से बहुत मुहब्बत करता हूं।”

एकाएक खुर्शीद की आंखों में आंसू छलक आए। अपने आंसू छुपाने के लिए वह दौड़कर घर में घुस गयी।

एंथोनी की फियेट कार जोगेश्‍वरी की तरफ बढ़ रही थी। कार गुलफाम चला रहा था। एंथोनी कार की पिछली सीट पर तकियों के सहारे अधलेटा सा बैठा था। उसके गोली के जख्म में से खून बहना बन्द हो गया था लेकिन वह दर्द से अभी भी अधमरा हुआ जा रहा था।

“अबे” — वह पीड़ा से बिलबिलाता बोला — “कार, चला रयेला है कि ठेला!”

“अपुन एटी पर जा रयेला है।” — एंथोनी बोला — “तेरे कू डॉक्टर के पास पहुंचने की जल्दी है इस वास्ते तेरे कू ठेला चलता लग रयेला है।”

“तौबा! सबसे खतरनाक रोकड़ा यही पीटा।”

“रोकड़ा भी तगड़ा। झकास।”

“हां! वो तसल्ली तो बरोबर है।”

“रोकड़ा अड्डे पर ही पड़ेला है। जबकि अड्डा एक बार लुट चुका है।”

“अड्डे को अब कोई खतरा नहीं। उस करतूत के लिए जिम्मेदार तीनों जने मर चुके हैं। वीरू तारदेव भी, और वो दोनों फंटियां भी।”

“यानी कि अड्डा सेफ है?”

“हां। एक बात और।”

“क्या?”

“डिब्बे को अब तक वीरू तारदेव की मौत की खबर लग चुकी होगी। उससे सात लाख रुपया लाने का है।”

“वो देगा?”

“बरोबर देगा।”

“न दिया तो?”

“तो उसको खल्लास करना मांगता है।”

“टोनी, खल्लास तो लल्लू को भी करना मांगता था। तू उसको जिन्दा छोड़कर गलती कर रयेला है।”

“वो मेरा लाइफ बचायेला है।”

“वो हमारे वास्ते खतरनाक साबित हो सकता है।”

“अरे, क्या खतरनाक साबित हो सकता है!” — एंथोनी तनिक झल्लाया — “वो तो उस रण्डी के साथ मुम्बई छोड़कर जा रयेला है। इधर होयेंगा तो खतरनाक साबित होयेंगा न!”

“अगर वो पकड़ा गया तो एक घण्टे में तोते की तरह सब कुछ रट देंगा।”

“पकड़ा काहे कू जायेंगा?”

“अपुन बोला ‘अगर’।”

“तो अपना भी नाम एंथोनी फ्रांकोजा है। अपुन उसको हवालात में, जेल में, कहीं भी खल्लास करके दिखायेंगा। हमारे खिलाफ जुबान खोलने के लिए वो जिन्दा नहीं बचेंगा।”

“फिर क्या वान्दा है!”
 
शाम को चार बजे के करीब कल्याण थाने के थानाध्यक्ष इन्स्पेक्टर पेनणेकर की टेलीफोन काल मुम्बई पुलिस के हैडक्वार्टर पर रिसीव की गई। इन्स्पेक्टर अष्टेकर संयोगवश उस वक्त पुलिस हेडक्वार्टर पर ही था। वह वहां वीरू तारदेव के कत्ल की फॉरेन्सिक रिपोर्ट हासिल करने आया था। उसे बताया गया था कि वीरू तारदेव का गला ऐन उसी स्टाइल से काटा गया था जैसे पहले रामचन्द्र नागप्पा का और उससे पहले विलियम फ्रांसिस का काटा गया था।

पेनणेकर की काल रिसीव करने वाले इन्स्पेक्टर ने बताया कि पिछले हफ्ते कल्याण के पंजाब बैंक में पड़ी डकैती के एक सस्पेक्ट की शिनाख्त के लिए वहां की पुलिस को मुम्बई पुलिस की मदद चाहिए थी।

“क्या है उनके पास?” — अष्टेकर ने पूछा।

“उनके पास सस्पेक्ट के एक अंगूठे का एकदम क्लियर निशान है और नाम है।”

“नाम क्या है?¬”

“करम चन्द हजारे।”

अष्टेकर बुरी तरह चौंका।

“सिर्फ नाम या कुछ और भी?”

“पता भी।”

“पता क्या?”

सब-इन्स्पेक्टर ने पता बताया।

पता निश्‍चय ही लल्लू की खोली का था।

“इस करम चन्द हजारे के नाम गिरफ्तारी का वारन्ट जारी हो रहा है।” — सब-इन्स्पेक्टर ने बताया — “सस्पेक्ट क्योंकि आप ही के थाने का है इसलिए वारन्ट आपको ही भेजा जाएगा।”

“वारन्ट तैयार है तो मैं अभी ले जाता हूं।”

“मैं मालूम करता हूं।”

सब-इन्स्पेक्कटर उठकर कमरे से बाहर चला गया।

अष्टेकर लल्लू के बारे में सोचने लगा।

साला! गधा! — वह मन-ही-मन भुनभुनाया — मैंने कहा था सम्भल जा नहीं तो मरेगा। नहीं सम्भला। नहीं सम्भला, साला ढक्कन!

खुर्शीद ने एक हसरतभरी आखिरी निगाह अपने उस घर पर डाली जहां वह पैदा हुई थी, पैदा होकर जवान हुई थी, जवान होकर बाई बनी थी और अब बाई से गृहिणी बनने जा रही थी।

अपनी मां पर जब उसने अपना निर्णय जाहिर किया था तो उसने बहुत हाल दुहाई मचाई थी लेकिन जब उसने उसकी हथेली पर लाख रुपये के नोट रखे थे तो वह यूं शान्त हो गई थी जैसे पानी का छींटा पड़ने से उफनता दूध शान्त हो जाता था।

बहुत कमीनी थी उसकी मां। जानती थी कि जब तक लाख रुपया खतम होता, तब तक छोटी तैयार हो जाती और खुर्शीद की जगह वो धन्धा करने लगती।

उसने अपने बैडरूम की तरफ देखा तो उसे उस रात की याद आई जब वह लल्लू को पहली बार घर लाई थी। तब अपनी जिन्दगी में पहली बार वह किसी ऐसे मर्द के साथ लेटी थी जो अपनी हवस की प्यास बुझाकर उसके नंगे, मसले हुए जिस्म पर कुछ मुड़े-तुड़े नोट नहीं उछाल गया था।

वह एक नर्क से निजात पा रही थी लेकिन फिर भी उसका मन मसोस रहा था। एक जानी-पहचानी जिन्दगी छोड़कर वह एक अंजान, अजनबी जिन्दगी में कदम रखने जा रही थी। वह अपनी मां का घर छोड़ रही थी लेकिन कोई शहनाई नहीं बज रही थी, कोई उसे विदा नहीं कर रहा था, किसी की आंखों में उसके लिए आंसू की एक बूंद नहीं थी।

अपना सूटकेस उठाये, मन पर एक अंजाना-सा बोझ लिए, वह सड़क पर आ गयी।

लल्लू की मां और दादी माथे पर हाथ रखे लल्लू के सामने बैठी थीं और लल्लू को एक सूटकेस में अपना समान भरते देख रही थीं। लल्लू के चेहरे पर ऐसी मुस्कुराहट थी जैसी उन औरतों ने कभी किसी के चेहरे पर नहीं देखी थी।

“हे भगवान!” — उसकी मां बोली — “मेरे करम फूट गए जो मैंने ऐसी औलाद पैदा की। देखो तो लड़के को! शादी हुयी नहीं और गृहस्थी बसाने जा रहा है।”

“जात धरम से बाहर की लड़की के साथ!” — दादी माथे पर हाथ मारती बोली।

“क्या हमने तुझे इसी दिन के लिए पैदा किया था” — मां बोली — “कि तू...”

“मां” — लल्लू बड़े सब्र से बोला — “ज्यादा बात का बतंगड़ मत बना। मैं कुछ दिनों के लिए ही तुम्हें अकेला छोड़कर जा रहा हूं। मैं कहीं जाकर अपनी गृहस्थी जमा लूं, फिर तुम्हें भी वहीं ले जाऊंगा। मैं पीछे तुम्हारे लिए रुपये-पैसे का पूरा इन्तजाम करके जा रहा हूं।”

“लेकिन कहां? जा कहां रहा है तू?

“यह अभी खुद मुझे भी नहीं पता।”

“उस... उस मुसलमान लड़की को तो पता होगा जिसके साथ तू जा रहा है?”

“नहीं, उसे भी नहीं पता।”

“लल्लू की मां” — दादी बोली — “मैं कहती हूं यह पागल हो गया है। इस पर कोई भूत सवार हो गया है। हमें कोई झाड़ा-पोंछा करने वाला बुलाना चाहिए जो इसे कोई धूनी देकर इस पर चढ़ा भूत उतर सके।”

“क्या पागलों जैसी बातें कर रही है, दादी!” — लल्लू बोला।

“लो! अब मुझे पागल कह रहा है।”

“अरे, मैंने पागल नहीं कहा है। कहा है कि तू बातें पागलों जैसी कर रही है।”

“लल्लू की मां, अपने बेटे को कह अगर इस बुढ़ौती में मेरी कोई सेवा नहीं कर सकता तो मुझे गाली तो न दे।”

“लो! पहले मां बात का बतंगड़ बना रही थी, अब दादी बनाने लगी!”

तभी दरवाजे पर दस्तक पड़ी।

“खुर्शीद आ गयी!” — लल्लू हर्षित भाव से बोला।

उसने लपककर दरवाजा खोला।

चौखट पर इन्स्पेक्टर अष्टेकर खड़ा था।

लल्लू हड़बड़ाकर एक कदम पीछे हट गया।

“हजारे” — अष्टेकर गम्भीरता से बोला — “तेरी कहानी खत्म हो गयी।”

“क-क्या?”

“मेरे पास तेरी गिरफ्तारी का वारन्ट है।” — और उसने एक कागज़ खोलकर लल्लू की नाक के सामने फड़फड़ाया।

लल्लू के चेहरे पर हवाईयां उड़ने लगीं।

“मुझे अफसोस है कि सबसे पहले तू फंसा।”

लल्लू चुप रहा।

लल्लू की मां उठकर लल्लू के पीछे पहुंची। उसने आशंकित आंखों से अष्टेकर की तरफ देखा।

“अरे, यह क्या हो रहा है, रे, लल्लू?” — वह व्याकुल भाव से बोली।

“कुछ नहीं, मां।” — लल्लू फंसे स्वर में बोला — “मैं जरा...”

“अम्मा” — अष्टेकर बोला — “तेरा बेटा सशस्त्र डकैती के इलजाम में गिरफ्तार हो रहा है।”

मां का मुंह खुले का खुला रह गया। फिर वह जहां खड़ी थी, वहीं धम्म से बैठ गई।

“अरे, लल्लू की मां” — वृद्धा दादी उठकर गिरती-पड़ती उसकी तरफ लपकी — “क्या हो गया तुझे?”

“मां” — लल्लू बोला — “तू घबरा नहीं। मैंने कुछ नहीं किया है। इन्स्पेक्टर साहब को जरूर कोई गलतफहमी है। देख लेना ये मुझे अभी छोड़ देंगे। मैं बस गया कि आया। मैं गया कि आया।”

आखिरी वाक्य कहते-कहते लल्लू की आवाज भर्रा गयी और आंखें छलछला आयीं।

क्या सोचा था और क्या हो गया था!

“मुझे तेरे को” — अष्टेकर धीरे से बोला — “हथकड़ी पहनानी होगी।”

“बाहर चलकर, इन्स्पेक्टर साहब” — लल्लू कातर स्वर में बोला — “बाहर चलकर। मेहरबानी होगी।”

अष्टेकर ने सहमति में सिर हिलाया। फिर उसने लल्लू को अपने आगे चलने के लिए कहा।

लल्लू और इन्स्पेक्टर आगे-पीछे चाल की सीढ़ियां उतरने लगे।

नीचे एक पुलिस की जीप खड़ी थी। वे सीढ़ियां उतरकर उसकी तरफ बढ़े।

खोलियों में से लोग बाहर निकल आए थे और उचक-उचककर वो नजारा देख रहे थे।

वे जीप के करीब पहुंचे।

“अब।” — अष्टेकर वर्दी की बैल्ट में खुंसी हथकड़ी निकालता बोला।

लल्लू ने सहमति में सिर हिलाया।

अष्टेकर ने उसके हाथ पीठ पीछे किए और उनमें हथकड़ी पहना दी। फिर उसने लल्लू की बांह पकड़कर उसे जीप में बिठाया।

तभी एक टैक्सी वहां आकर रुकी और उसमें से खुर्शीद बाहर निकली।

लल्लू को हथकड़ी पहनायी जाती उसने टैक्सी रुकने से पहले ही देख ली थी।

वह दौड़कर जीप के करीब पहुंची।

लल्लू के चेहरे पर एक विषादपूर्ण मुस्कराहट आयी।

खुर्शीद मुंह बाये उसे देखती रही। उसके होंठ फड़फड़ाए लेकिन मुंह से बोल न फूटा।

“मैं तेरे को क्या बोला था” — अष्टेकर खुर्शीद से सम्बोधित हुआ — “कि अपराध एक कागज़ की नाव की तरह होता है जो बहुत देर तक, बहुत दूर तक नहीं चलती।”

“म-मैं” — खुर्शीद बड़ी मुश्‍किल से बोल पाई — “एक मिनट इससे बात कर सकती हूं?”

अष्टेकर ने सहमति में सिर हिलाते हुए उसे जीप में लल्लू के साथ बैठ जाने का इशारा किया और स्वयं अपने दो हवलदारों को लेकर जरा परे हो गया।

“क-क्या हुआ?” — खुर्शीद लल्लू की बगल में बैठती बोली।

“हम थोड़ा-सा लेट हो गए!” — लल्लू धीरे से बोला।

“लेकिन हुआ क्या?”

“कुछ नहीं हुआ। म-मेरा मतलब है, खास कुछ नहीं हुआ। कोई बड़ी बात नहीं है। मैं खामखाह गिरफ्तार किया जा रहा हूं। इनके पास मेरे खिलाफ कोई सबूत नहीं है।”

“लेकिन तूने किया क्या था?”

“किया था कुछ। यह मेरी पहली गिरफ्तारी है। मेरी जमानत हो जाएगी। टोनी मुझे बाहर करा लेगा।”

“अरे, उसकी वजह से तो तू अन्दर हो रहा है!”

“नहीं, नहीं। ऐसा नहीं है। वो मुझे छुड़ा लेगा। वो जरूर मुझे छुड़ा लेगा। वो...”

लल्लू का गला रुंध गया।

एक क्षण खामोशी रही।

“मेरा एक काम करेगी?” — फिर वह पहले जैसे ही रुंधे कण्ठ में बोला।

“हां, हां। बोल!” — खुर्शीद बोली — “बोल न!”

“मेरे आंसू पोंछ दे।”

उसके आंसू पोंछने के उपक्रम में खुर्शीद खुद हिचकियां ले लेकर रोने लगी।

अष्टेकर जीप के करीब पहुंचा।

खुर्शीद ने एक आखिरी आश्‍वासनपूर्ण निगाह लल्लू पर डाली और जीप से नीचे उतर आयी।

जीप वहां से रवाना हुयी।

वह अपलक जब तक लल्लू को देखती रही जब तक जीप मोड़ काटकर दृष्टि से ओझल न हो गई।

फिर वह घूमी और मन-मन के कदम रखती प्रतीक्षारत टैक्सी की तरफ वापिस बढ़ चली।

उसी नर्क में वापिस लौटने के लिए जिसको वह अभी थोड़ी ही देर पहले अलविदा कहकर आई थी।
 
गुलफाम ने कार को एक पुराने से बंगले के भीतर दाखिल किया और उसके अर्द्धवृत्ताकार ड्राइव वे से गुजरते हुए कार को पोर्टिको में ले जाकर रोका।

उसने तब तक कार का हॉर्न बजाया जब तक एक कोई साठ साल का लेकिन चाकचौबन्द बूढ़ा बंगले से बाहर न निकल आया।

उस आदमी का नाम डॉक्टर अटल था। उसी बंगले में वह एक छोटा-सा नर्सिंग होम और क्लिनिक चलाता था।

गुलफाम कार से निकला और उसके करीब पहुंचा।

“टोनी आयेला है।” — वह डॉक्टर से बोला।

“फिर गोली खा के?” — डॉक्टर अप्रसन्न स्वर में बोला।

“हां। टांग में। बहुत तकलीफ में है।”

“यह हमेशा यहीं क्यों आता है? कहीं और जाकर क्यों नहीं मरता?”

“खुद ही पूछ लो।”

“मैं क्या पूछूं? मैंने पिछली बार बोला था कि यहां न आया करे। मैं बूढ़ा आदमी हूं, किसी मुसीबत...”

तभी एंथोनी कार से बाहर निकल आया। वह घायल टांग पर बिना जोर दिये कार का सहारा लेकर खड़ा हो गया।

“अबे, बूढ़े” — एंथोनी कठोर स्वर में बोला — “मुसीबत तब आयेगी जब तू मेरी गोली निकालने से इंकार करेगा।”

“मुझे धमकी मत दे, टोनी। अब धमकियां सहने की मेरी उम्र नहीं है।”

“शायद तेरी पोती की हो!”

“क्या?”

“जो मैडीकल कालेज में पढ़ती है। अगर तूने मेरी गोली निकालने में कोई हुज्जत की या पुलिस को खबर करने की कोशिश की तो कल जब तू मैडीकल कालेज के होस्टल में अपनी पोती के लिए फोन करेगा तो वह वहां नहीं होगी। वह फूल जैसी लड़की फूली हुई, सड़ांध मारती, लाश के तौर पर समुद्र में से बरामद होगी। यह मेरा वादा है तेरे से।”

“मैं तुझे इस काबिल छोडूंगा ही नहीं। मैं आपरेशन टेबल पर ही तेरा काम तमाम कर दूंगा।”

“और गुलफाम का काम कैसे तमाम करेगा?”

डॉक्टर ने गुलफाम की तरफ देखा।

गुलफाम बड़े खतरनाक ढंग से मुस्कराया।

“मैं” — डॉक्टर मरे स्वर में बोला — “स्ट्रेचर के साथ आर्डरली को बुलाता हूं।”

“नहीं” — एंथोनी बोला — “मैं खुद चल कर भीतर जाऊंगा। मैं नहीं चाहता कि किसी को खबर हो कि मुझे गोली लगी है। गुलफाम, मुझे सहारा दे।”

गुलफाम उसे सहारा देकर डॉक्टर के पीछे-पीछे बंगले के भीतर ले चला।

डॉक्टर ने एक बन्द कमरा खोला और एक तरफ हट गया।

गुलफाम ने एंथोनी को भीतर बिछे पलंग पर लिटा लिया।

एंथोनी ने अपना शरीर ढीला छोड़ दिया और जोर-जोर से हांफने लगा। उस का चेहरा पीड़ा से विकृत हो रहा था।

डॉक्टर के कहने पर गुलफाम ने उसके कपड़े उतार दिये।

डॉक्टर ने जख्म का मुआयना किया और बड़ी संजीदगी से सिर हिलाते हुए एक इंजेक्शन तैयार करने लगा।

“मैं यहीं गोली निकालूंगा।” — डॉक्टर गुलफाम से बोला — “यह बेहोशी का इंजेक्शन है। फिर भी यह बहुत उछले कूदेगा। इसे तुम्हीं ने सम्भालना होगा और साथ में मेरी मदद भी करनी होगी। कर सकोगे या मैं नर्सों और आर्डरलियों को बुलाऊं?”

“किसी को नहीं बुलाने का है। गुलफाम, तू जो बोलेंगा, करेंगा।” — एंथोनी बोला।

गुलफाम ने सहमति में सिर हिलाया।

डॉक्टर ने उसकी बांह में इंजेक्शन घोंप दिया।

थाने में लल्लू की तसवीरें खिंची और उसकी सारी उंगलियों के निशान लिए गए।

“अब तो तू पैसे वाला आदमी है!” — फिर अष्टेकर बोला — “कोई बड़ा वकील कर लेना। जमानत आसानी से करा देगा।”

लल्लू खामोश रहा।

“हिस्सा बराबर का मिला या कुछ कम?”

लल्लू परे देखने लगा।

“अबे, जवाब दे!”

“कैसा हिस्सा?” — लल्लू बोला।

“तुझे मालूम है कैसा हिस्सा! कल्याण की उस बैंक डकैती का हिस्सा, जिसकी वजह से तू गिरफ्तार हुआ है।”

“मेरा किसी बैंक डकैती से कोई वास्ता नहीं।”

“तेरा अक्ल से भी कोई वास्ता नहीं। साले, कभी सोचा तू जेल चला गया तो तेरी मां का क्या होगा, तेरी दादी का क्या होगा! कभी सोचा! एक तेरी वजह से कितनी जिन्दगियों का खाना खराब होगा, कभी सोचा! वो लड़की जिसके साथ तू भाग रहा था, अब सोच रही होगी कि तेरे जैसे जेल के पंछी की बीवी बनने से तो वह रण्डी ही अच्छी थी। देख लेना, वह कल फिर से धन्धा शुरू कर देगी। बल्कि आज ही रात से...”

लल्लू कुर्सी से उछला और पगलाये हुए सांड की तरह अष्टेकर पर झपटा लेकिन अष्टेकर के पांव की एक ही ठोकर ने उसे गेंद की तरह वापिस उछाल दिया। जिस कुर्सी पर वह बैठा था उसी से उलझता वह फर्श पर ढ़ेर हो गया। उसने उठकर कुर्सी पर बैठने का उपक्रम किया तो अष्टेकर ने ठोकर मार कर कुर्सी उससे बहुत परे उछाल दी। लल्लू उसके पैरों के पास फर्श पर पड़ा रहा।

“हजारे दि गैंगस्टर!” — अष्टेकर अपने जूते से उसकी पसलियों को टहोकता हुआ तिरस्कारभरे स्वर में बोला — “बैंक डकैत! हत्यारा! वाह! खूब तरक्की की! खूब नाम रोशन किया आपने जन्नतनशीन बाप का!”

“मेरे बाप को बीच में मत लाओ।” — लल्लु गुस्से में बोला।

“साले, तेरा बाप बीच में है इसीलिए तो अभी तक तू सलामत है। इसीलिए तो अपने पर झपटने की एवज में मैंने तेरे हाथ-पांव नहीं तोड़े। क्या भूल गया कि ऐसी ही हरकत की तेरे उस्ताद को छः महीने की सजा हुई थी?”

लल्लू चुप रहा।

“उठ के खड़ा हो।”

पीठ पीछे हथकड़ी लगी होने की वजह से लल्लू बड़ी मुश्‍किल से उठकर अपने पैरों पर खड़ा हुआ।

“देख। मेरी बात सुन। गौर से मेरी बात सुन। क्योंकि मैं तेरे मतलब की बात कहने जा रहा हूं। तेरे भले की बात कहने जा रहा हूं। सुन रहा है?”

“हां।”

“मुझे कल्याण की बैंक डकैती से कोई मतलब नहीं। मुझे घाटकोपर की बैंक डकैती से भी कोई मतलब नहीं। मुझे सिर्फ कत्ल से मतलब है।”

“कि-किसके कत्ल से?”

“वीरू तारदेव के कत्ल से। नागप्पा के कत्ल से। विलियम के कत्ल से। खासतौर से विलियम के कत्ल से। तू उस कत्ल के बारे में कुछ जानता है। मुझे पूरी गारन्टी है तू इन तीनों कत्लों के बारे में कुछ जानता है।”

“मैं कुछ नहीं जानता।”

“तू जानता है। जो कुछ तू जानता है, वो मुझे बताएगा तो फायदे में रहेगा। मेरा साथ देगा तो मैं तेरे खिलाफ बहुत हलका केस बना दूंगा। मैं सरकारी वकील को भी समझा दूंगा कि वह कोशिश करे कि तुझे कम से कम सजा हो। मैं यह भी कोशिश करूंगा कि जेल में तेरा वक्त बड़े आराम से कटे। तुझे बामशक्कत जेल न काटनी पड़े। तुझे कोई हलका काम मिले। अब बोल, क्या कहता है?”

“मैं किसी कत्ल के बारे में कुछ नहीं जानता।”
 
“ठीक है। एक मिनट के लिए कत्ल को भूल जा और अपने उस्तादों की तरफ ध्यान दे। हजारे, मैं तेरे को तेरे फायदे की बात बोलता हूं।”

“क्या?”

“बैंक डकैती के मामले में तू टोनी और गुलफाम के खिलाफ गवाही देने की हामी भर। फिर मैं तुझे वादामाफ गवाह बनवा दूंगा। फिर तुझे सजा होगी ही नहीं। बोल, क्या कहता है?”

“मैं किसी बैंक डकैती के बारे में कुछ नहीं जानता। टोनी और गुलफाम मेरे उस्ताद नहीं। उनसे मेरी कोई यारी नहीं। मेरी उनसे सिर्फ मामूली दुआ-सलाम है और वो भी इसलिए क्योंकि हम एक ही इलाके में रहते हैं।”

“तू नहीं मानेगा।” — अष्टेकर असहाय भाव से गर्दन हिलाता बोला — “तुझे अक्ल नहीं आगी। तू लाइलाज हो चुका है। तू मरेगा।”

अष्टेकर घूमा और लम्बे डग भरता हुआ कोठरी से बाहर निकल गया।

डॉक्टर अटल ने गोली गुलफाम की हथेली पर रख दी।

“यह चौथी गोली है” — वह बोला — “जो मैंने तेरे दोस्त के जिस्म में से निकाली है। इसे कह मेरे पर एक अहसान करे और अगली बार मुझे गोली दिल या खोपड़ी में से बरामद करने का मौका दे।”

गुलफाम ने सशंक भाव से एंथोनी के कागज की तरह सफेद हो चुके चेहरे की तरफ देखा।

“ये इस वक्त कैसा है?” — उसने पूछा।

“बद्किस्मती से जिन्दा है!” — डॉक्टर बोला — “जिन्दा है फिर गोली खाकर यहां लौटकर आने के लिए।”

“एकदम चौकस कब होगा?”

“बीस-पच्चीस दिन में। लेकिन यहां से दफा होने लायक एक हफ्ते में हो जाएगा।”

“ओह! फिर तो मुझे भी एक हफ्ता यहां रहना पड़ेगा!”

“मेरी बद्किस्मती।”

बहुत जोर मारकर अष्टेकर ने उसी रोज एंथोनी फ्रांकोजा और गुलफाम अली के घरों की तलाशी के लिए सर्च वारन्ट इशू करवा लिये।

पहले वह अपने दल बल के साथ गुलफाम अली के यहां पहुंचा।

उसकी खस्ताहाल खोली में से कुछ भी न बरामद हुआ।

फिर वह एंथोनी के फ्लैट पर पहुंचा।

उसने कालबैल बजाई तो दरवाजा मोनिका ने खोला।

वह स्कर्ट-ब्लाउज पहने थी और निहायत कमसिन और हसीन लग रही थी।

“क्या है?” — मोनिका बड़ी रुखाई से बोली।

अष्टेकर के चेहरे पर बड़े सख्त भाव आए लेकिन उसने अपने आप पर जब्त कर लिया और धीरे से बोला — “एंथोनी घर पर है?”

“नहीं।” — उत्तर मिला।

“कहां गया?”

“पता नहीं।”

“कब लौटेगा?”

“पता नहीं।”

“मेरे पास यहां की तलाशी का वारन्ट है।”

“क्या!”

अष्टेकर ने उसे वारन्ट दिखाया।

“जब टोनी घर हो तो आना।” — मोनिका बोली और उसने दरवाजा बन्द करने का उपक्रम किया।

“मैं इन्तजार नहीं कर सकता।” — अष्टेकर जबरन उसे दरवाजा बन्द करने से रोकता बोला — “वारन्ट यहां की तलाशी का है। यह यहां जो भी मौजूद हो, उसे सर्व किया जा सकता है। तुम यहां मौजूद हो।”

“लेकिन...”

“रास्ते से हटो। मुझे जबरदस्ती करने पर मजबूर मत करो।”

“तुम्हें तलाश किस चीज की है?”

“किसी सूत्र की। किसी सबूत की।”

“किस चीज के सबूत की?”

“बैंक डकैती के। कत्ल के भी।”

“कत्ल!”

“हां। वीरू तारदेव का। रामचन्द्र नागप्पा का। विलियम फ्रांसिस का।”

“तुम मेरे घर में मेरे पति के कत्ल का सबूत तलाश करना चाहते हो?”

“यह तुम्हारा घर नहीं। यह टोनी का घर है। तुम इस घर में सिर्फ रहती हो। अब रास्ते से हटो।”

बड़े अनिच्छापूर्ण ढंग से उसने चौखट छोड़ी।

पुलिसिए भीतर दाखिल हुए।

तलाशी आरम्भ हुई।

तलाशी के दौरान उनकी तवज्जो सजावटी फायरप्लेस की तरफ भी गई। उन्होंने उसके सामने लगे सजावटी लट्ठे, हटाये और टीन की चादर को ठोका-बजाया।

फिर उन्होंने अष्टेकर की तवज्जो उसकी तरफ दिलाई।

उसने भी चादर को हिला-डुला कर देखा और फिर बोला — “यह चादर अलग से फिट की गई मालूम होती है।”

“हां” — मोनिका बोली — “यह न हो तो धुएं की चिमनी में से हवा और धूल कमरे में आती है। फायरप्लेस इस्तेमाल तो होती नहीं इसलिए इसके आगे यह चादर फिट करवा दी गई थी।”

“तुम्हें कैसे मालूम?”

“टोनी ने बताया था।”

“तुम्हें वाकेई नहीं मालूम टोनी कहां है?”

“क्यों? तुम्हारे पास क्या उसकी गिरफ्तारी का भी वारन्ट है?”

“नहीं। अभी नहीं। लेकिन उसका दोस्त करम चन्द हजारे पकड़ा जा चुका है।”

“लल्लू?”

“हां!”

“उसे क्यों पकड़ा? वो तो बड़ा भला लड़का है!”

“होता था भला लड़का। तभी तक जब तक टोनी से नहीं मिला था।”

“इन्स्पेक्टर, तुम मेरे सामने यूं बार-बार टोनी की इन्सल्ट नहीं कर सकते।”

“क्या कहने! टोनी के लिए इतनी वफादारी! उस शख्स के लिए इतनी वफादारी जिसका तुम्हारे हसबैंड के कत्ल में हाथ हो सकता है!”

“तुम पागल हो और खामखाह टोनी पर इलजाम लगा रहे हो। उसका विलियम के कत्ल से कोई वास्ता नहीं। विलियम का कत्ल रामचन्द्र नागप्पा ने किया था।”

“कौन कहता है?”

“टोनी कहता है।”

“वो तो ऐसा कहेगा ही!”

“यही सच है।”

“नहीं है। पोस्टमार्टम की रिपोर्ट कहती है कि विलियम फ्रांसिस, रामचन्द्र नागप्पा और वीरू तारदेव तीनों का खून एक ही शख्स ने किया है। टोनी ने तुम्हें गलत पट्टी पढ़ाई है। नागप्पा जैसा चूहा विलियम का गला काटने की हिम्मत नहीं कर सकता। नागप्पा और विलियम का कोई मेल नहीं बैठता। दोनों में किसी भी लिहाज से कुछ भी कामन दिखाई नहीं देता। विलियम के स्टैण्डर्ड और रख-रखाव के लिहाज से विलियम नागप्पा जैसे आदमी को अपने पास बिठाने लायक नहीं समझने वाला था। फिर याद करो, विलियम का कत्ल कार की ड्राइविंग सीट पर बैठे हुआ था। किसी ने पीछे से उसका गला काटा था।

विलियम अपनी कार में नागप्पा जैसे आदमी को क्यों बिठाता? विलियम के कत्ल का स्टाइल ही पुकार-पुकार कर कह रहा है कि यह काम किसी ऐसे आदमी का था जिस पर विलियम को भरोसा था। जो विलियम का यार-दोस्त था, करीबी था।”

“ऐसा आदमी कार की पिछली सीट पर क्यों बैठा हुआ था? विलियम के साथ क्यों नहीं बैठा हुआ था?”

“उसकी कोई वजह हो सकती है।”

“जो कि तुम्हें मालूम नहीं!”

“नहीं मालूम। मैं मौकायवारदात पर मौजूद नहीं था। मैं ज्योतिषी भी नहीं।”

“दावा तो यही करते हो!”

“नहीं करता। तुम मेरे खिलाफ हो इसलिए ऐसी बातें करती हो। देखो, नागप्पा खूनी होता तो खुद उसका उसी तरीके से खून न हो गया होता।”

“उसका खून क्यों हुआ?”

“जाहिर है कि उसकी जुबान बन्द करने के लिए। वह होश में आने पर यह साबित करके दिखा सकता था कि उसने विलियम का खून नहीं किया था। वह उस आदमी का नाम ले सकता था जिसने असल में विलियम का खून किया था।”

“मैं ये सब नहीं सुनना चाहती। अगर तुम्हारा काम खत्म हो गया हो तो बरायमेहरबानी जाओ यहां से।”

“जाता हूं। तुम्हें जो मैंने कहा है उस पर गौर करना और सोचना कि क्या तुम्हें हर वो पट्टी पढ़ लेनी चाहिए जो टोनी तुम्हें पढ़ाये।”

अपने पीछे निहायत फिक्रमन्द मोनिका को छोड़कर अष्टेकर वहां से विदा हो गया।
 
अगले रोज सुबह लल्लू को मजिस्ट्रेट का सामने कचहरी में पेश किया गया।

पिछली रात उसने हवालात में काटी थी और बहुत बुरी तरह से काटी थी। एक ही रात ने उसे उसकी आने वाली जिन्दगी के लिए निहायत फिक्रमन्द बना दिया था।

खुर्शीद पता कर चुकी थी कि उस रोज सुबह लल्लू को कचहरी में पेश किया जाना था और उसकी जमानत के लिए सुनवाई होनी थी।

खुर्शीद लल्लू की मां के साथ कचहरी में मौजूद थी। उसी ने लल्लू के लिए एक वकील मुकर्रर किया था।

लल्लू के खिलाफ चार्जशीट पढ़कर सुनाई गयी।

यह सुनकर मैजिस्ट्रेट का चेहरा गम्भीर हो गया कि सशस्त्र डकैती के साथ-साथ उस पर किसी कत्ल में शरीक होने का भी शक था।

लल्लू के वकील ने इस बात की दुहाई दी कि सरकारी पक्ष ने उसके मुवक्किल के खिलाफ कोई पुख्ता सबूत पेश नहीं किया था। और यह कि लल्लू कमउम्र था और जिन्दगी में वह उसकी पहली गिरफ्तारी थी।

मैजिस्ट्रेट ने जमानत की रकम एक लाख रुपया मुकर्रर की।

लल्लू ने कातर भाव से खुर्शीद की तरफ देखा।

खुर्शीद ने आंखों ही आंखों में उसे आश्‍वासन दिया और उठ खड़ी हुई।

उसकी मां के पास एक लाख रुपया था। उसमें से पिचहत्तर हजार रुपये तो लल्लू के ही दिए हुए थे।

कल्याण थाने का इन्स्पेक्टर पेनणेकर खुद मुम्बई आकर अष्टेकर से मिला। उसने अष्टेकर को अपना परिचय दिया और मुम्बई आने का मन्तव्य बताया।

वह लल्लू को अपने इलाके में हुई वारदात की तफ्तीश के लिए कल्याण ले जाना चाहता था।

“सस्पेक्ट को अभी तुम नहीं ले जा सकते।” — अष्टेकर बोला।

“क्यों?” — पेनणेकर के माथे पर बल पड़ गये।

“क्योंकि अभी मुझे यहां उसकी जरूरत है।”

“हमें भी जरूरत है।”

“मुझे तुम्हारी जरूरत की खबर है।”

“गुड। फिर तो उसे हमारे साथ भेजने से तुम्हें कोई एतराज नहीं होगा!”

“होगा। है। तुम्हारी बैंक डकैती छोटा केस है। यहां एक बड़े केस में उसकी जरूरत है।”

“बड़ा केस!”

“हां। कत्ल का केस। ट्रिपल मर्डर का केस।”

“मुझे तुम्हारे केस से कोई मतलब नहीं। मुझे अपने केस से मतलब है। उस सस्पेक्ट को हमने तलाश किया है।”

“उसे हमने गिरफ्तार किया है।”

“वह मेरा मुजरिम है।”

“लेकिन मेरी हिरासत में है। और कुछ दिन ऐसे ही रहेगा। तुम अगले हफ्ते उसके बारे में पता करना।”

“मैं उसे आज ही साथ लेकर जाऊंगा।”

“यह नहीं हो सकता। मेरे होते यह नहीं हो सकता।”

“तुम मेरे सस्पेक्ट को यूं यहां रोके नहीं रख सकते।”

“नहीं रख सकता! मैं रखे हुए हूं।”

“मैं कमिश्‍नर साहब से बात करूंगा।”

“मेरी बला से।”

“इन्स्पेक्टर अष्टेकर, यू विल बी सॉरी।”

“एण्ड यू बिल बी मोर सो” — अष्टेकर गला फाड़कर चिल्लाया — “इफ यू डू नाट लीव इमीजियेटली। एण्ड डू नाट स्पीक इंगलिश विद मी। आई हेट पीपल स्पीकिंग इंगलिश विद मी। आई हेट स्पीकिंग इंगलिश। सो आई हेट पीपल हू मेक मी स्पीक इंगलिश। अण्डरस्टैण्ड! अण्डरस्टैण्ड, डैम यू!”

पेनणेकर हड़बड़ाकर उठा और वहां से कूच कर गया।

“अम्मा।” — खुर्शीद हड़बड़ी से अपनी मां से बोली — “वो रुपये निकाल।”

“कौन से रुपये?” — मां जान-बूझकर अनजान बनती बोली।

“अरे, वही जो मैंने तुझे कल शाम को दिये थे। लाख रुपये।”

“जब दिए थे तो वापिस क्यों मांग रही है?”

“मुझे उनकी जरूरत है।”

“जरूरत है तो नहीं देने थे! मैंने क्या तेरे से मांगे थे?”

“तब जरूरत नहीं थी। अब जरूरत है।”

“अब क्यों जरूरत है?”

“वो...वो गिरफ्तार है। मैंने उसकी जमानत करानी है। जमानत के लिए एक लाख रुपया चाहिए।”

“वो कौन? वही मरखने भैंसे जैसा लौंडा, जिसके साथ तू भाग रही थी।”

“मैं भाग नहीं रही थी।”

“जा तो रही थी! अपनी मां को छोड़ कर! जिसने तुझे पाल-पोसकर इतना बड़ा किया, किसी काबिल बनाया, उसे छोड़ कर!”

“किस काबिल बनाया?” — खुर्शीद जलकर बोली — “क्या बनाया तूने मुझे?”

“अरी कम्बख्त, रण्डी की औलाद रण्डी नहीं होगी तो और क्या होगी? रण्डी की किस्मत में कहीं इज्जत लिखी होती है?”

“मेरी किस्मत में लिखी है।”

“उस हलकट के साथ, जो जेल में है?”

“हां। वह छूट जायेगा। उसने कुछ नहीं किया है। वह नाहक पकड़ा गया है।”

“नाहक पकड़ा गया है!” — मां ने मुंह बिचकाया — “तो जा, जाकर रह इज्जत से। यहां क्यों आई है?”

“अपना रुपया लेने। कहा तो! मेरा रुपया वापिस कर।”

“वो तो मैंने खर्च लिया।”

“इतनी जल्दी कैसे खर्च लिया? कहां खर्च लिया?”

“अरी, छिनाल! अपनी मां से हिसाब मांगती है? जवाबतलबी करती है?”

“मां, मेरी रकम वापिस कर दे नहीं तो...”

“नहीं तो क्या करेगी तू?” — मां तमककर बोली।

“मैं... मैं तेरा खून पी जाऊंगी।”

“ठहर जा, हरामजादी।” — मां कहरभरे स्वर में बोली — “रण्डी की जनी। जानती नहीं किससे बात कर रही है! ठहर जा तू...”

मां ने झाड़ू से पीटकर खुर्शीद को घर से निकाला।

खुर्शीद सड़क पर आ खड़ी हुई। उसे अपने सामने अंधेरा-ही-अंधेरा दिखाई दे रहा था।

वह पास्कल के बार में पहुंची।

यहां उसने टोनी और गुलफाम के बारे में पूछा।

मालूम हुआ कल से दोनों के पांव वहां नहीं पड़े थे।

उसने दोनों को मुम्बई शहर में हर मुमकिन जगह पर ढ़ूंढ़ा।

दोनों में से किसी का भी पता न चला।

सुबह से शाम हो गई।
 
लल्लू की जमानत न हो सकी।

जेल जाते समय लल्लू की पांडी नाम के एक जेबकतरे से मुलाकात हुई जो कि अभी चार महीने पहले जेल से छूटा था और डेढ़ साल की सजा पाकर फिर जेल जा रहा था। पुलिस की वैन में वह लल्लू की बगल में बैठा था और दोनों की एक-एक कलाई में एक ही हथकड़ी थी इसलिए जेल के भीतर बैरेक में पहुंचने तक वह उसके साथ ही रहा। उसने हंसते हुए खुद ही बताया कि वह उसकी सातवीं जेल यात्रा थी।

लल्लू को उम्र में वह बड़ी हद चालीस का लगा।

लल्लू ने उसे नहीं बताया था लेकिन फिर भी पांडी को मालूम था कि लल्लू पर बैंक डकैती का अभियोग था। इतने में ही पांडी लल्लू से बहुत प्रभावित दिखाई देने लगा था।

बैरेक में उनकी हथकड़ी खोल दी गयी।

“तू” — पांडी उसकी बगल में बैठता बोला — “वाकई बैंक लूटता है?”

“नहीं” — लल्लू लापरवाही से बोला — “मैं तो सिर्फ डिरेवर था। गाड़ी चलाने कू।”

“फिर भी हिस्सा तो तेरा बराबर का होयेंगा?”

“हां।”

“जब पैसे वाला आदमी है तो जमानत काहे नहीं कराई?”

लल्लू ने उत्तर नहीं दिया। हकीकतन इस बात से वह खुद हैरान परेशान था कि खुर्शीद ने उसकी जमानत नहीं भरी थी।

“अब तू इधर आ ही गया है” — पांडी उसके और करीब सरकता बोला — “तो तेरे को एकाध लैसन देने का है।”

“लैसन! कैसा लैसन?”

“इधर नट्टू रविराम नाम का एक लाइफर है...”

“लाइफर क्या?”

“लाइफर नहीं समझता! जिसे उम्र कैद हुई हो।”

“ओह!”

“जो इधर का बड़ा बाप है।”

“बड़ा बाप!”

“हां। इधर जो सबसे बड़ा दादा होता है, जिससे सब डरते हैं, कैदी भी और पुलिस वाले भी।”

“पुलिस वाले भी?”

“हां। बड़े साहब नहीं। छोटे-मोटे पुलिस वाले। सन्तरी हवलदार वगैरह।”

“हूं।”

“हां तो मैं बोला, इधर का जो ऐसा बड़ा दादा होता है, उसको सब लोग बड़ा बाप बोलता है। तेरे को उससे बच के रहना मांगता है। नये कैदी को तो वो बहुत ही ज्यादा खराब करता है।”

“क्या करता है?”

जवाब ने पांडी खीं-खीं करके हंसा।

लल्लू उलझनपूर्ण भाव से उसकी तरफ देखता रहा।

“पिछली बार जब मैं इधर था, तब नट्टू बड़ा बाप नहीं था। तब बड़ा बाप कोई और था। उससे नट्टू भी डरता था। वो छूट गया तो उसकी जगह नट्टू बड़ा बाप बन गया।”

“पहले बड़ा बाप कौन था?” — लल्लू ने यूं ही पूछ लिया।

“बड़ा टॉप का हेंकड़ था वो भी। उसका नाम एंथोनी फ्रांकोजा था लेकिन हर कोई उसे टोनी पुकारता था।”

“वो टोनी? धारावी वाला?”

“हां, वही। तू उसे जानता है?”

“वो तो मेरा यार है!”

“अरे बाप, क्यों बोम मार रयेला है?”

“मैं सच कह रहा हूं। वो तो मेरा जिगरी यार है। उसी के साथ तो मैं...”

लल्लू खामोश हो गया।

“सच्ची?” — पांडी बहुत प्रभावित दिखाई देने लगा।

“हां।”

“फिर तेरे को कोई डर नहीं। नट्टू को यह मालूम होगा तो वो तेरे को कुछ भी नहीं बोलेंगा। टोनी से नट्टू भी डरता था। देखने में नट्टू टोनी से डबल है लेकिन फिर भी डरता था। टोनी की निगाह में ऐसी कोई बात थी कि उसके घूर लेने भर से लोगों के पेशाब निकलने लगते थे। तेरे कू तो मालूम होयेंगा!”

“हां, मालूम है।”

टोनी की ऐसी धाक जानकर लल्लू का उसे बताने को जी चाहने लगा कि उसने टोनी की जान बचाई थी, वह डकैती के बाद एक बार भाग निकलने के बाद वापिस न लौटा होता तो टोनी खतम था, लेकिन वह खामोश रहा।

फिर वह टोनी को भूलकर, पांडी को भूलकर, जेल को भूलकर खुर्शीद के सपने देखने लगा।

बहुत सुहाने सपने। जन्नत के सपने। उस जन्नत के सपने जो उसके हाथों में आते-आते रह गयी।

सुबह के नौ बजे थे जब कि गुलफाम ने एंथोनी को झिंझोड़ कर जगाया।

एंथोनी कराहता हुआ उठा। उसने देखा गुलफाम उसके सामने एक विशेष स्थान से मोड़ा हुआ उस रोज का अखबार लहरा रहा था।

एंथोनी ने अखबार उसके हाथ से ले लिया और अपनी नींद से भरी आंखें उस पर फोकस करने की कोशिश करने लगा। हैडलाइन पर निगाह पड़ते ही उसकी आंखों से नींद उड़ गयी :

कल्याण बैंक डकैती का अभियुक्त गिरफ्तार।

उसने जल्दी-जल्दी बाकी समाचार पढ़ा। लिया था :

कल्याण पुलिस ने दावा किया है कि पिछले सप्ताह कल्याण के पंजाब बैंक पर पड़े डाके के कम-से-कम एक अभियुक्त की शिनाख्त की स्थिति में वे पहुंच गए हैं। उस कथित अभियुक्त का नाम करम चन्द हजारे बताया जाता है जोकि मुम्बई के धारावी नामक इलाके का रहने वाला है। उसके एक अंगूठे का निशान डकैती में इस्तेमाल की गई एम्बैसेडर कार, जो कि एक वीरान फार्म में खड़ी पाई गई थी, में पड़ी उस फिफ्टी पर से उठाया गया था जो उसने सिख बहुरूप धारण के लिए इस्तेमाल की थी।

कल्याण थाने के एस.एच.ओ. अजय पेनणेकर ने अपने एक बयान में इस सम्वाददाता को बताया कि हजारे नामक अभियुक्त अभी मुम्बई पुलिस की ही कस्टडी में है क्योंकि अभी उससे हाल ही में हुई तीन हत्याओं का कोई सूत्र मिलने की मुम्बई पुलिस की पूरी आशा है। इन्स्पेक्टर पेनणेकर ने फिलहाल यह बताने से इंकार कर दिया है कि कैसे उन्हें हजारे नामक अभियुक्त की खबर लगी। उसका कहना है कि यह बात आम हो जाने से डकैती में शामिल अन्य दो व्यक्तियों की गिरफ्तारी में दिक्कत पेश आ सकती है। फिर भी इन्स्पेक्टर पेनणेकर ने इतना जरूर बताया कि उसके पास एक गवाह है जो निर्विवाद रूप से कल्याण बैंक डकैती में हजारे का हाथ सिद्ध कर सकता है।

खबर अभी और भी लम्बी थी लेकिन एंथोनी ने उसे अक्षरश: पढ़ने की कोशिश न की। उसने जल्दी-जल्दी बाकी सत्तरों पर निगाह दौड़ाई और फिर अखबार परे फेंक दिया।

उसने गुलफाम की तरफ देखा।

गुलफाम का चेहरा बेहद गम्भीर था।

“अपना मिस्टेक था।” — एंथोनी बड़बड़ाया — “फुल मिस्टेक अपना था। अपुन साला सॉफ्ट पड़ गया। सेन्टी हो गया साला। लल्लू के बच्चे को तभी खल्लास करना मांगता था। साला, ढक्कन, पीछे फिंगरप्रिंट छोड़कर आयेला था।”

“वो स्टोरी अब खत्म है।” — गुलफाम गम्भीरता से बोला — “अब यह बोल कि अब क्या करना मांगता है! वो साला एक मिनट में मुंह फाड़ देंगा। सब कुछ बक देंगा। फिर सोच ले कि हम दोनों किधर होयेंगा!”

“उसका मुंह बन्द करना होयेंगा।”

“कैसे? वो तो जेल में बैठेला है!”

“उसका जेल में मुंह बन्द करना होयेंगा।”

“वो कैसे होयेंगा?”

“मेरे किए होयेंगा। उस जेल में एक आदमी है जो वहीं लल्लू को खल्लास कर देंगा। बस मेरे कू उसको मैसेज पहुंचाना मांगता है। फिर लल्लू का मुंह बन्द हो चुका होयेंगा।”

“अगर वो पहले ही मुंह फाड़ चुका होयेंगा तो?”

“जो होयेंगा, सामने आयेंगा। मेरे को टेलीफोन करने का है। टेलीफोन कू इधर ही लाने का इन्तजाम कर।”

गुलफाम सहमति में सिर हिलाता उठकर बाहर चला गया।

दोपहर को ही लल्लू को जेल के मौजूदा ‘बड़े बाप’ के दर्शन हो गए।

नट्टू रविराम ढ़ाई मन की थुलथुल लाश था। उसका चेहरा लाल भभूका और आंखें अंगारों की तरह दहकती थीं। उसका सिर घुटा हुआ था और गर्दन इतनी मोटी थी कि कंधों का ही हिस्सा मालूम होती थी।

वह मैस का खाना खा रहा था और दो कैदी उसकी अगल-बगल खड़े थे।

“अबे, पांडी!” — पांडी को देखकर वह बोला, उसकी आवाज ऐसी थी जैसे भैंसा डकरा रहा हो — “साले, फिर आ गया!”

“हीं हीं हीं।” — पांडी ने खींसें निपोरीं — “बाप, यह साला मुम्बई का पब्लिक लोग कुछ ज्यादा ही होशियार हो गयेला है।”

“तेरे साथ यह नया छोकरा कौन है?”

“यह हजारे है। यह अपने एंथोनी फ्रांकोजा का जिगरी है।”

“कौन बोलता है?”

“यही बोलता है।”

“साले, कभी टोनी का थोबड़ा भी देखेला है?”

लल्लू ने उत्तर न दिया। उसे सूझा तक नहीं कि सवाल उससे हो रहा था।

“अबे, बहरा है?” — नट्टू दहाड़ा।

“क-क... क्या?” — लल्लू हड़बड़ाया।

“मैं तेरे कू पूछा, कभी टोनी का थोबड़ा भी देखेला है?”

“हां। देखेला है। टोनी अपना पक्का यार है। जिगरी।”

“उसका पक्का यार तो कोई और था।”

“हां! पहले था। विलियम फ्रांसिस। लेकिन अब करम चन्द हजारे।”

“उसका मां-बाप किधर रह रयेला है?”

“खण्डाला में।”

“धरावी में उसका अड्डा कहां है?”

“पास्कल के बार में।”

“विलियम को कौन खल्लास कियेला था?”

“यह अपुन को नहीं मालूम।”

नट्टू हंसा।

“ठीक।” — वह बोला — “मेरे कू तू पसन्द आयेला है। इदर कोई मुश्‍किल होयेंगा तो अपुन तेरे कू इधर बड़ा बाप के पास आना मांगता है। टोनी के दोस्त के साथ अपुन कोई ज्यास्ती होना नेई मांगता। सब लोग सुना।”

वहां मौजूद तमाम कैदियों ने सहमति में सिर हिलाया।

फिर नट्टू ने उसकी तरफ से मुंह फेर लिया।

तभी छड़ी टेकता एक कैदी उनके करीब से गुजरा।

“यह नागप्पा है।” — पांडी ने बताया — “कुछ महीने पहले नट्टू इसके साथ बद्सलूकी करने का कोशिश कियेला था।”

“कैसी बद्सलूकी?” — लल्लू बोला।

पांडी ने अपने बायें हाथ की पहली उंगली और अंगूठे का गोल दायरा बनाया और उसमें अपने दायें हाथ की उंगली फिराई।

“ओह!” — लल्लू के मुंह से निकला।

“इसने नट्टू का कहना तो माना ही नहीं था, ऊपर से उससे भिड़ बैठेला था। नट्टू ने इस कू बहुत मारा और टांग तो ऐसी तोड़ी कि आज तक ठीक नहीं हुयी।”

“नट्टू को कुछ नहीं हुआ?”

“उसको मैजिस्ट्रेट के सामने पेश कियेला था जेल वाला दरोगा। नट्टू की दो साल की सजा बढ़ गयी थी लेकिन उसे साला कौन परवाह है!”

“एक नागप्पा तो मेरे इलाके में भी होता था!”

“रामचन्द्र नागप्पा! वो नशे की गोलियां बेचने वाला! जिसका हस्पताल में मर्डर होयेला है?”

“हां। वही।”

“यह लंगड़ा नागप्पा उसी का तो भाई है!”

“ओह!” — लल्लू एक क्षण ठिठका और फिर बोला — “यह किस जुर्म में जेल में है?”

“स्मैक बेचने के जुर्म में।”

“बाद में नट्टू ने इसे छोड़ दिया?”

“छोड़ता तो नट्टू इसे नहीं! मानता तो वो इसका खून करके ही! लेकिन किसी के कहने पर छोड़ दिया।”

“किसके कहने पर?”

“यहां के पुराने बड़े बाप के कहने पर।”

“किसके? टोनी के?”
 

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