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“मोनिका, कैसे भी हुई, यह कहानी खत्म तो हुई!”
“मुझे हैरानी है विलियम जैसा आदमी नागप्पा जैसे आदमी से धोखा खा गया।”
“गलती कौन नहीं करता!”
“विलियम गलती करने वाला आदमी नहीं था।”
“कई बार हालात ऐसे बन जाते हैं कि आदमी गलती करता है, धोखा खाता है।”
“लेकिन नागप्पा! उस जैसे आदमी ने विलियम का गला रेतने की जुर्रत की!”
“की। उस्तुरा उसके घर से बरामद हुआ है।”
“यकीन नहीं आता।”
“भेजा फिरेला है!” — एंथोनी भड़क उठा — “तू क्या समझती है मैंने खामखाह एक आदमी का खून करवा दिया है?”
तभी एकाएक फोन की घण्टी बज उठी।
एंथोनी ने हाथ बढ़ाकर रिसीवर उठाया।
“कौन है?” — वह रूखे स्वर में बोला।
“गुलफाम!” — आवाज आयी — “टोनी!”
“हां। क्या हुआ?”
“लल्लू ने जात दिखा दी।”
“मतलब?” — एंथोनी रिमोट कन्ट्रोल से टी.वी. की आवाज बन्द करता बोला।
“उसने काम नहीं किया। मैंने खुद अपनी आंखों से देखा।”
“जीसस!” — वह डिब्बे से हासिल होने वाले सात लाख रुपये के बारे में सोचता बोला — “यानी कि वो साला वीरू तारदेव अभी सलामत है?”
“अपुन ये कब बोला?”
“ओह!” — बात समझकर एकाएक एंथोनी हंसा — “ओह!”
“हमें लल्लू का कुछ करने का है। छोकरा टूट जायेंगा और हमें नपवा देंगा।”
“अभी नहीं। अभी कुछ नहीं करने का। जो करने का है, घाटकोपर बैंक वाले काम के बाद करने का है। अभी हमें लल्लू की जरूरत है। उस जैसा टॉप का ड्राइवर हमें खड़े पैर नहीं मिलने वाला।”
“ठीक है। जैसा तू बोले।”
लाइन कट गयी।
एंथोनी ने रिसीवर रख दिया।
ब्लू फिल्म में अब उसकी रूचि नहीं रही थी।
मोनिका में भी नहीं। उसे अफसोस था कि वह लल्लू को करम चन्द नहीं बना सका था।
एक गलत आदमी को चुनकर गलती उसने की थी लेकिन उसकी सजा लल्लू को मिलने वाली थी।
मौत की सजा!
आधी रात के करीब अष्टेकर थाने के करीब ही ट्रांजिट कैम्प के नाम से जाने जाने वाले इलाके के एक ढ़ाबे में बैठा था। ढ़ाबे में लोग जहां मेज पर बैठकर खाना खाते थे, वहीं बेवड़ा पीते थे लेकिन आज ढ़ाबे में इलाके के बड़े दरोगा की मौजूदगी की वजह से किसी मेज पर भी बेवड़े की बोतल प्रकट नहीं हुई थी। यह बात जुदा थी कि आज अगर ऐसा हुआ होता तो अष्टेकर ने वो नजारा इसलिए नजरअन्दाज कर दिया होता क्योंकि आज वह खुद आधी बोतल शराब पीकर आया था।
कब्रिस्तान में मार्था को विलियम की कब्र के सिरहाने खड़ा देखकर वह बहुत आन्दोलित हुआ था। उसी का नतीजा यह निकला था कि आज उसने वो काम किया था जिसे वह सख्त नापसन्द करता था।
उसने थाने में ही बैठकर शराब पी ली थी।
तभी ढ़ाबे का मालिक अजमेर सिंह उसके पास पहुंचा।
“खाना लाऊं, माई-बाप?” — वह खुशामदभरे स्वर में बोला।
“नहीं।” — अष्टेककर सिर उठाकर बोला — “अभी नहीं।”
“थोड़ी और?” — उसने अंगूठा अपने मुंह से लगाया।
अष्टेकर ने घूरकर उसकी तरफ देखा।
अजमेर सिंह ने खींसे निपोरीं और अपनी खुली, लहराती दाढ़ी पर हाथ फेरा।
“और क्या हाल है?” — अष्टेकर ने पूछा।
“वदिया।” — अजमेर सिंह बोला।
“धन्धा कैसा चल रहा है?”
“वदिया।”
“गुण्डे, बदमाशों, मवालियों को तो इधर पनाह नहीं देता?”
“नई जी, बिल्कुल नईं। वाहे गुरु दी सौं।”
“बाल-बच्चे कैसे हैं?”
“एक नम्बर के हरामी हैं, जी। खून पीत्ता होया ने। सारा दिन लड़ते रहते हैं आपस में। शोर-शराबा, धक्का-मुक्की तोड़-फोड़, यही कुछ होता रहता है सारा दिन। मां दी तो पागलखाने जाने जैसी हालत कर देते हैं लानती। वाहे गुरु बचाये ऐसी औलाद से तो।”
“कितने बच्चे हैं?”
“पांच।” — अजमेर सिंह ने उसे पंजा दिखाया — “चार मुंडे, इक कुड़ी। लेकिन कुड़ी मुंडयां तों ज्यादा कम्बख्त है, जी। भ्रांवा दी बराबरी करके लड़दी ए, जी। जम के बराबर दा मुकाबला करदी ए, जी। सारा दिन हाहाकार मचाई रखदे ने बच्चे सौरी दे।”
अष्टेकर की आंखों के सामने कब्र में दफन विलियम का चेहरा आ गया। मार्था से उसकी शादी हुई होती तो आधी दर्जन से कम बच्चे पैदा किये बिना वह न माना होता।
कितना शौक था उसे औलाद का।
“अजमेर सिंह” — अष्टेकर धीरे बोला — “तेरी जगह मैं होता तो शिकायत न कर रहा होता। घर में कम-से-कम तेरा कोई है तो सही जिसके पास तूने जाना होता है।”
“मैं समझ गया, जी, तुहाडी बात।” — अजमेर सिंह सहमति में गर्दन हिलाता बोला।
“नहीं। नहीं समझा तू। समझ भी नहीं सकता।”
“माई-बाप, मैं होया निरा अनपढ़। अंगूठाछाप। मैनूं की समझ...”
“इस बात का पढ़ाई से कोई रिश्ता नहीं। सरदार, जैसी गृहस्थी तेरी है, वैसी गृहस्थी के लिए मैं अपना सर्वस्व न्योछावर कर सकता हूं।”
“घाटे में रहोगे, जी। आप ही सुखी हो। बीमारी, फीसां, कापियां-किताबां, किराया-भाड़ा, राशन-पानी, औलाद दे अग्गे की फिक्र में पिसकर रह जाओगे,जी। आपां बहुत दुखी जे, जी।”
“तू झूठा है।”
“चलो जी, मैं झूठा ही सही। अब खाना भेजूं?”
“हां, भेज।”
भेजने की जगह अजमेर सिंह एक ट्रे में अष्टेकर के लिए खुद खाना लेकर आया।
अष्टेकर ने अभी पहला ही कौर तोड़ा था कि हवलदार पाण्डुरंग उसे ढ़ाबे के भीतर दाखिल होता दिखाई दिया। वह लम्बे डग भरता अष्टेकर के करीब पहुंचा। उसने अष्टेकर के कान में जल्दी से कुछ कहा।
अष्टेकर ने एक गहरी सांस ली, हाथ में थमा कौर उसने वापिस ट्रे में डाल दिया और उठ खड़ा हुआ।
कम्पोजिट पिक्चर बनाने वाले पुलिस के आर्टिस्ट के साथ जोगलेकर रात के एक बजे तक थाने में बैठा। आर्टिस्ट उसे दर्जनों की तरह के नाक, कान, होंठ, ठोढ़ी, माथा, आंखों वगैरह के फोटोग्राफ दिखाता था जिसमें से उसने लल्लू से मिलते अंग छांटने होते थे। जब वह वे अंग छांट चुका होता था तो आर्टिस्ट उनकी एक कम्पोजिट पिक्चर तैयार करके दिखाता था जो कि जोगलेकर को लल्लू जैसी नहीं लगती थी। आर्टिस्ट उसके द्वारा बताए गए फर्कों के मद्देनजर नयी ड्राइंग बनाता था लेकिन जोगलेकर को वह भी उस पैसेंजर जैसी नहीं लगती थी जिसने उससे पचास रुपये उधार लेकर लौटाये नहीं थे।
“मुझे हैरानी है विलियम जैसा आदमी नागप्पा जैसे आदमी से धोखा खा गया।”
“गलती कौन नहीं करता!”
“विलियम गलती करने वाला आदमी नहीं था।”
“कई बार हालात ऐसे बन जाते हैं कि आदमी गलती करता है, धोखा खाता है।”
“लेकिन नागप्पा! उस जैसे आदमी ने विलियम का गला रेतने की जुर्रत की!”
“की। उस्तुरा उसके घर से बरामद हुआ है।”
“यकीन नहीं आता।”
“भेजा फिरेला है!” — एंथोनी भड़क उठा — “तू क्या समझती है मैंने खामखाह एक आदमी का खून करवा दिया है?”
तभी एकाएक फोन की घण्टी बज उठी।
एंथोनी ने हाथ बढ़ाकर रिसीवर उठाया।
“कौन है?” — वह रूखे स्वर में बोला।
“गुलफाम!” — आवाज आयी — “टोनी!”
“हां। क्या हुआ?”
“लल्लू ने जात दिखा दी।”
“मतलब?” — एंथोनी रिमोट कन्ट्रोल से टी.वी. की आवाज बन्द करता बोला।
“उसने काम नहीं किया। मैंने खुद अपनी आंखों से देखा।”
“जीसस!” — वह डिब्बे से हासिल होने वाले सात लाख रुपये के बारे में सोचता बोला — “यानी कि वो साला वीरू तारदेव अभी सलामत है?”
“अपुन ये कब बोला?”
“ओह!” — बात समझकर एकाएक एंथोनी हंसा — “ओह!”
“हमें लल्लू का कुछ करने का है। छोकरा टूट जायेंगा और हमें नपवा देंगा।”
“अभी नहीं। अभी कुछ नहीं करने का। जो करने का है, घाटकोपर बैंक वाले काम के बाद करने का है। अभी हमें लल्लू की जरूरत है। उस जैसा टॉप का ड्राइवर हमें खड़े पैर नहीं मिलने वाला।”
“ठीक है। जैसा तू बोले।”
लाइन कट गयी।
एंथोनी ने रिसीवर रख दिया।
ब्लू फिल्म में अब उसकी रूचि नहीं रही थी।
मोनिका में भी नहीं। उसे अफसोस था कि वह लल्लू को करम चन्द नहीं बना सका था।
एक गलत आदमी को चुनकर गलती उसने की थी लेकिन उसकी सजा लल्लू को मिलने वाली थी।
मौत की सजा!
आधी रात के करीब अष्टेकर थाने के करीब ही ट्रांजिट कैम्प के नाम से जाने जाने वाले इलाके के एक ढ़ाबे में बैठा था। ढ़ाबे में लोग जहां मेज पर बैठकर खाना खाते थे, वहीं बेवड़ा पीते थे लेकिन आज ढ़ाबे में इलाके के बड़े दरोगा की मौजूदगी की वजह से किसी मेज पर भी बेवड़े की बोतल प्रकट नहीं हुई थी। यह बात जुदा थी कि आज अगर ऐसा हुआ होता तो अष्टेकर ने वो नजारा इसलिए नजरअन्दाज कर दिया होता क्योंकि आज वह खुद आधी बोतल शराब पीकर आया था।
कब्रिस्तान में मार्था को विलियम की कब्र के सिरहाने खड़ा देखकर वह बहुत आन्दोलित हुआ था। उसी का नतीजा यह निकला था कि आज उसने वो काम किया था जिसे वह सख्त नापसन्द करता था।
उसने थाने में ही बैठकर शराब पी ली थी।
तभी ढ़ाबे का मालिक अजमेर सिंह उसके पास पहुंचा।
“खाना लाऊं, माई-बाप?” — वह खुशामदभरे स्वर में बोला।
“नहीं।” — अष्टेककर सिर उठाकर बोला — “अभी नहीं।”
“थोड़ी और?” — उसने अंगूठा अपने मुंह से लगाया।
अष्टेकर ने घूरकर उसकी तरफ देखा।
अजमेर सिंह ने खींसे निपोरीं और अपनी खुली, लहराती दाढ़ी पर हाथ फेरा।
“और क्या हाल है?” — अष्टेकर ने पूछा।
“वदिया।” — अजमेर सिंह बोला।
“धन्धा कैसा चल रहा है?”
“वदिया।”
“गुण्डे, बदमाशों, मवालियों को तो इधर पनाह नहीं देता?”
“नई जी, बिल्कुल नईं। वाहे गुरु दी सौं।”
“बाल-बच्चे कैसे हैं?”
“एक नम्बर के हरामी हैं, जी। खून पीत्ता होया ने। सारा दिन लड़ते रहते हैं आपस में। शोर-शराबा, धक्का-मुक्की तोड़-फोड़, यही कुछ होता रहता है सारा दिन। मां दी तो पागलखाने जाने जैसी हालत कर देते हैं लानती। वाहे गुरु बचाये ऐसी औलाद से तो।”
“कितने बच्चे हैं?”
“पांच।” — अजमेर सिंह ने उसे पंजा दिखाया — “चार मुंडे, इक कुड़ी। लेकिन कुड़ी मुंडयां तों ज्यादा कम्बख्त है, जी। भ्रांवा दी बराबरी करके लड़दी ए, जी। जम के बराबर दा मुकाबला करदी ए, जी। सारा दिन हाहाकार मचाई रखदे ने बच्चे सौरी दे।”
अष्टेकर की आंखों के सामने कब्र में दफन विलियम का चेहरा आ गया। मार्था से उसकी शादी हुई होती तो आधी दर्जन से कम बच्चे पैदा किये बिना वह न माना होता।
कितना शौक था उसे औलाद का।
“अजमेर सिंह” — अष्टेकर धीरे बोला — “तेरी जगह मैं होता तो शिकायत न कर रहा होता। घर में कम-से-कम तेरा कोई है तो सही जिसके पास तूने जाना होता है।”
“मैं समझ गया, जी, तुहाडी बात।” — अजमेर सिंह सहमति में गर्दन हिलाता बोला।
“नहीं। नहीं समझा तू। समझ भी नहीं सकता।”
“माई-बाप, मैं होया निरा अनपढ़। अंगूठाछाप। मैनूं की समझ...”
“इस बात का पढ़ाई से कोई रिश्ता नहीं। सरदार, जैसी गृहस्थी तेरी है, वैसी गृहस्थी के लिए मैं अपना सर्वस्व न्योछावर कर सकता हूं।”
“घाटे में रहोगे, जी। आप ही सुखी हो। बीमारी, फीसां, कापियां-किताबां, किराया-भाड़ा, राशन-पानी, औलाद दे अग्गे की फिक्र में पिसकर रह जाओगे,जी। आपां बहुत दुखी जे, जी।”
“तू झूठा है।”
“चलो जी, मैं झूठा ही सही। अब खाना भेजूं?”
“हां, भेज।”
भेजने की जगह अजमेर सिंह एक ट्रे में अष्टेकर के लिए खुद खाना लेकर आया।
अष्टेकर ने अभी पहला ही कौर तोड़ा था कि हवलदार पाण्डुरंग उसे ढ़ाबे के भीतर दाखिल होता दिखाई दिया। वह लम्बे डग भरता अष्टेकर के करीब पहुंचा। उसने अष्टेकर के कान में जल्दी से कुछ कहा।
अष्टेकर ने एक गहरी सांस ली, हाथ में थमा कौर उसने वापिस ट्रे में डाल दिया और उठ खड़ा हुआ।
कम्पोजिट पिक्चर बनाने वाले पुलिस के आर्टिस्ट के साथ जोगलेकर रात के एक बजे तक थाने में बैठा। आर्टिस्ट उसे दर्जनों की तरह के नाक, कान, होंठ, ठोढ़ी, माथा, आंखों वगैरह के फोटोग्राफ दिखाता था जिसमें से उसने लल्लू से मिलते अंग छांटने होते थे। जब वह वे अंग छांट चुका होता था तो आर्टिस्ट उनकी एक कम्पोजिट पिक्चर तैयार करके दिखाता था जो कि जोगलेकर को लल्लू जैसी नहीं लगती थी। आर्टिस्ट उसके द्वारा बताए गए फर्कों के मद्देनजर नयी ड्राइंग बनाता था लेकिन जोगलेकर को वह भी उस पैसेंजर जैसी नहीं लगती थी जिसने उससे पचास रुपये उधार लेकर लौटाये नहीं थे।