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“हां। टोनी यहां से छूटते वक्त भी बोलकर गयेला था कि लंगड़े नागप्पा को कोई कुछ न कहे। तब से ये साला लंगड़ा इधर फुल सेफ है।”
“टोनी ऐसा क्यों बोला?”
“क्या मालूम क्यों बोला! तेरे कू नहीं मालूम! तू बोलता है वो तेरा पक्का फिरेंड है।”
“नहीं” — लल्लू अपलक लंगड़े को देखता बोला — “मेरे कू नहीं मालूम।”
एंथोनी ने दसवीं बार अपने फ्लैट पर फोन किया तो दूसरी तरफ से मोनिका का जवाब मिला।
“कहां थी?” — एंथोनी चिल्लाया — “दसवीं बार फोन कर रहा हूं।”
“बाजार गयी थी। तुम कहां हो?”
एंथोनी ने बताया और फिर पूछा — “क्या खबर है?”
“अष्टेकर फ्लैट की सर्च का वारन्ट लेकर आया था। पूरी तलाशी लेकर गया है।”
“कुछ मिला?” — एंथोनी हड़बड़ाया।
“नहीं। नकली फायर प्लेस पर उसे शक हुआ था लेकिन टीन की चादर उससे सरकी नहीं थी।”
“ओह!” — एंथोनी ने चैन की सांस ली — “और?”
“लल्लू गिरफ्तार है। जेल में है वो...”
“मुझे मालूम है। मैंने अखबार में पढ़ा है। दरअसल मैंने उसी की वजह से फोन किया है। मेज के दराज में मेरी एक डायरी है। उसमें नरेश माने नाम के एक आदमी का टेलीफोन नम्बर है! वह नम्बर मुझे चाहिए।”
“वो कौन है?”
“वो जेल में हवलदार है। मैं चाहता हूं वह जेल में लल्लू का वैसा ही खयाल करे जैसा उसने कभी मेरा किया था।”
“या जैसे तुमने रामचन्द्र नागप्पा का किया था!” — मोनिका व्यंग्यपूर्ण स्वर में बोली।
“क्या मतलब हुआ इसका?” — एंथोनी सख्ती से बोला।
“अष्टेकर कहता है कि पोस्टमार्टम की रिपोर्ट से यह साबित होता है कि जिस आदमी ने नागप्पा का खून किया था, उसी ने विलियम का भी खून किया था।”
“यानी कि अष्टेकर ज्यादा भरोसे का आदमी है तेरे लिये! तुझे अष्टेकर की बात पर विश्वास है, मेरी बात पर नहीं! बेवकूफ औरत, वो पुलिसिया तेरे को मूर्ख बना कर गया। पोस्टमार्टम की रिपोर्ट से ऐसी बातें साबित नहीं होतीं। वो दोनों कोई गोली खाकर नहीं मरे थे जो साबित किया जा सकता कि दोनों को लगी गोलियां एक ही रिवॉल्वर से निकली थीं। उस्तुरे से कटे गले का मुआयना करके नहीं बताया जा सकता कि दोनों वार करने वाला हाथ एक ही था। नागप्पा उस्तुरे के वार से इसलिए मरा है क्योंकि मैं चाहता था कि वो वैसे ही मरे जैसे उसने विलियम को मारा था। अगर मुझे मालूम होता कि तू ऐसे अहमकों जैसे नतीजे निकालेगी तो मैं नागप्पा को शूट करवाता।”
“लेकिन” — मोनिका उलझन में पड़ गयी — “अष्टेकर कहता था कि...”
“उस पुलिसिये की बातों पर मत जा। वह मेरा दुश्मन है। वह तुझे बहका कर, बेवकूफ बनाकर मेरे खिलाफ तेरी जुबान खुलवाना चाहता है। मोनिका, मुझे अपना खैरखाह मानना सीख। मेरे पर भरोसा करना सीख।”
“स-सॉरी। सॉरी, टोनी।”
“तेरे को सॉरी होना ही मांगता है। तू तो ऐसे बोलने लगती है जैसे विलियम का कत्ल मैंने किया हो! ऐसी बातों का मेरे को बुरा नहीं लगेगा?”
“सॉरी।”
“छोड़। अब वो नम्बर बता।”
एक मिनट बाद मोनिका ने उसे नरेश माने का टेलीफोन नम्बर बताया।
टोनी ने सम्बन्धविच्छेद करके वो नया नम्बर डायल किया।
“माने?” — दूसरी ओर से उत्तर मिलते ही वह बोला।
“हां।” — आवाज आयी — “कौन?”
“टोनी।”
“टोनी!”
“हां। पहचाना?”
“पहचाना। क्या मांगता है?”
“एक मेहरबानी।”
“कैसी मेहरबानी?”
“एक मैसेज डिलीवर करने का है।”
“ऐसे काम डाकखाने में होते हैं। तारघर में होते हैं।”
“वहां फीस कम लगती है और देर ज्यादा लगती है। टोनी को ज्यादा फीस देकर जल्दी काम कराना पसन्द है।”
“मैसेज बोला।”
“तू फीस बोल।”
“जो तू देगा। मेरे को तेरे पर एतबार है।”
“मेरे पर एतबार करके कभी घाटे में नहीं रहेगा, माने।”
“मैसेज बोल, टोनी।”
“मैसेज जेल में अपने नट्टू रविराम को देने का है। जेल में एक नया छोकरा आयेला है। नाम है करम चन्द हजारे। तेरे को नट्टू को सिर्फ इतना बोलना है कि उस छोकरे का रिकार्ड बन्द करने का है क्योंकि जो बात लंगड़ा नागप्पा जानता है, वो बात वह छोकरा भी जानता है और छोकरा अपना रिकार्ड चालू करने की तैयारी कर रहा है। बाकी नट्टू खुद समझ जायेगा।”
“उसे करना क्या होगा?”
“वो तेरे मतलब की बात नहीं। नट्टू जानता है उसका क्या करने का है, कैसे करने का है, कब करने का है।”
“ठीक है। मैसेज पहुंच जायेगा।”
“तेरा रोकड़ा तेरे पास पहुंच जायेगा।”
“शुक्रिया।”
सम्बन्धविच्छेद हो गया।
शाम को लल्लू को जेलर के आफिस में तलब किया गया।
लल्लू वहां पहुंचा तो उसने वहां जेलर की जगह इन्स्पेक्टर अष्टेकर को बैठा पाया।
उसने लल्लू को अपने सामने एक कुर्सी पर बैठने का इशारा किया। वह बैठ गया तो वह बोला — “कैसा है, हजारे?”
“ठीक हूं।” — लल्लू भावहीन स्वर में बोला।
“यह जगह पसन्द आयी?”
“ठीक है।”
“पसन्द कर ही ले। लम्बा रहना है तूने यहां।”
लल्लू खामोश रहा।
“तूने मेरी राय के बारे में कुछ सोचा?”
“कौन-सी राय के बारे में?”
“सरकारी गवाह बनने की राय के बारे में।”
“मुझे मुखबिरी पसन्द नहीं।”
“मैं तेरी वफादारी की कद्र करता हूं लेकिन यह वफादारी तू गलत लोगों के लिए दिखा रहा है, हजारे। टोनी और गुलफाम ऐसी वफादारी दिखाने के काबिल नहीं। क्या?”
लल्लू चुप रहा।
“देख। देर सवेर उन दोनों ने फंसना तो है ही। कानून के हाथ बड़े लम्बे होते हैं। मुजरिम इनकी पकड़ से वक्ती तौर पर बचा रह सकता है, हमेशा के लिए नहीं। छोड़ना तो मैंने उन दोनों को है नहीं। वे लोग बाद में मेरे फन्दे में फंसे तो उसका तेरे को क्या फायदा पहुंचेगा? कुछ भी नहीं। वो दोनों जब फांसी पर लटक रहे होंगे तो तू तब भी यहीं होगा। यानी कि तेरी वफादारी बेकार जाएगी। हजारे, अगर तेरे में रत्ती भर भी अक्ल बाकी है तो इस सुनहरे मौके को कैश कर। तू हामी भर, मैं कल ही तुझे यहां से आजाद करवा दूंगा, बोल, क्या कहता है?”
“मुझे नहीं पता तुम क्या कह रहे हो, मेरी समझ में तो कुछ नहीं आ रहा।”
अष्टेकर ने असहाय भाव से गर्दन हिलाई। वह कुछ क्षण अपलक हजारे को देखता रहा, फिर बोला — “कचहरी में तूने अपनी मां की सूरत नहीं देखी होगी। मैंने देखी थी। जब तुझे हथकड़ी डालकर ले जाया जा रहा था, उस वक्त उसके चेहरे पर ऐसे भाव थे जैसे चाहती हो कि तभी जमीन फट जाती और वह उसमें समा जाती। एक ही बेटा और वो भी तेरे जैसा! पास-पड़ोस में क्या मुंह दिखाएगी वो? लोग जब नकली हमदर्दी जताते हुए ताने देंगे कि बेचारी विधवा माई का इकलौता बेटा सात साल के लिए जेल में बन्द है तो बेचारी वहीं गिर के मर नहीं जाएगी!”
“स... सात साल!” — लल्लू के मुंह से निकला।
“साल-छः महीने कम सही। पांच साल से ऊपर सजा तो तुझे होगी ही होगी।”
लल्लू के मुंह से बोल न फूटा।
“टोनी ऐसा क्यों बोला?”
“क्या मालूम क्यों बोला! तेरे कू नहीं मालूम! तू बोलता है वो तेरा पक्का फिरेंड है।”
“नहीं” — लल्लू अपलक लंगड़े को देखता बोला — “मेरे कू नहीं मालूम।”
एंथोनी ने दसवीं बार अपने फ्लैट पर फोन किया तो दूसरी तरफ से मोनिका का जवाब मिला।
“कहां थी?” — एंथोनी चिल्लाया — “दसवीं बार फोन कर रहा हूं।”
“बाजार गयी थी। तुम कहां हो?”
एंथोनी ने बताया और फिर पूछा — “क्या खबर है?”
“अष्टेकर फ्लैट की सर्च का वारन्ट लेकर आया था। पूरी तलाशी लेकर गया है।”
“कुछ मिला?” — एंथोनी हड़बड़ाया।
“नहीं। नकली फायर प्लेस पर उसे शक हुआ था लेकिन टीन की चादर उससे सरकी नहीं थी।”
“ओह!” — एंथोनी ने चैन की सांस ली — “और?”
“लल्लू गिरफ्तार है। जेल में है वो...”
“मुझे मालूम है। मैंने अखबार में पढ़ा है। दरअसल मैंने उसी की वजह से फोन किया है। मेज के दराज में मेरी एक डायरी है। उसमें नरेश माने नाम के एक आदमी का टेलीफोन नम्बर है! वह नम्बर मुझे चाहिए।”
“वो कौन है?”
“वो जेल में हवलदार है। मैं चाहता हूं वह जेल में लल्लू का वैसा ही खयाल करे जैसा उसने कभी मेरा किया था।”
“या जैसे तुमने रामचन्द्र नागप्पा का किया था!” — मोनिका व्यंग्यपूर्ण स्वर में बोली।
“क्या मतलब हुआ इसका?” — एंथोनी सख्ती से बोला।
“अष्टेकर कहता है कि पोस्टमार्टम की रिपोर्ट से यह साबित होता है कि जिस आदमी ने नागप्पा का खून किया था, उसी ने विलियम का भी खून किया था।”
“यानी कि अष्टेकर ज्यादा भरोसे का आदमी है तेरे लिये! तुझे अष्टेकर की बात पर विश्वास है, मेरी बात पर नहीं! बेवकूफ औरत, वो पुलिसिया तेरे को मूर्ख बना कर गया। पोस्टमार्टम की रिपोर्ट से ऐसी बातें साबित नहीं होतीं। वो दोनों कोई गोली खाकर नहीं मरे थे जो साबित किया जा सकता कि दोनों को लगी गोलियां एक ही रिवॉल्वर से निकली थीं। उस्तुरे से कटे गले का मुआयना करके नहीं बताया जा सकता कि दोनों वार करने वाला हाथ एक ही था। नागप्पा उस्तुरे के वार से इसलिए मरा है क्योंकि मैं चाहता था कि वो वैसे ही मरे जैसे उसने विलियम को मारा था। अगर मुझे मालूम होता कि तू ऐसे अहमकों जैसे नतीजे निकालेगी तो मैं नागप्पा को शूट करवाता।”
“लेकिन” — मोनिका उलझन में पड़ गयी — “अष्टेकर कहता था कि...”
“उस पुलिसिये की बातों पर मत जा। वह मेरा दुश्मन है। वह तुझे बहका कर, बेवकूफ बनाकर मेरे खिलाफ तेरी जुबान खुलवाना चाहता है। मोनिका, मुझे अपना खैरखाह मानना सीख। मेरे पर भरोसा करना सीख।”
“स-सॉरी। सॉरी, टोनी।”
“तेरे को सॉरी होना ही मांगता है। तू तो ऐसे बोलने लगती है जैसे विलियम का कत्ल मैंने किया हो! ऐसी बातों का मेरे को बुरा नहीं लगेगा?”
“सॉरी।”
“छोड़। अब वो नम्बर बता।”
एक मिनट बाद मोनिका ने उसे नरेश माने का टेलीफोन नम्बर बताया।
टोनी ने सम्बन्धविच्छेद करके वो नया नम्बर डायल किया।
“माने?” — दूसरी ओर से उत्तर मिलते ही वह बोला।
“हां।” — आवाज आयी — “कौन?”
“टोनी।”
“टोनी!”
“हां। पहचाना?”
“पहचाना। क्या मांगता है?”
“एक मेहरबानी।”
“कैसी मेहरबानी?”
“एक मैसेज डिलीवर करने का है।”
“ऐसे काम डाकखाने में होते हैं। तारघर में होते हैं।”
“वहां फीस कम लगती है और देर ज्यादा लगती है। टोनी को ज्यादा फीस देकर जल्दी काम कराना पसन्द है।”
“मैसेज बोला।”
“तू फीस बोल।”
“जो तू देगा। मेरे को तेरे पर एतबार है।”
“मेरे पर एतबार करके कभी घाटे में नहीं रहेगा, माने।”
“मैसेज बोल, टोनी।”
“मैसेज जेल में अपने नट्टू रविराम को देने का है। जेल में एक नया छोकरा आयेला है। नाम है करम चन्द हजारे। तेरे को नट्टू को सिर्फ इतना बोलना है कि उस छोकरे का रिकार्ड बन्द करने का है क्योंकि जो बात लंगड़ा नागप्पा जानता है, वो बात वह छोकरा भी जानता है और छोकरा अपना रिकार्ड चालू करने की तैयारी कर रहा है। बाकी नट्टू खुद समझ जायेगा।”
“उसे करना क्या होगा?”
“वो तेरे मतलब की बात नहीं। नट्टू जानता है उसका क्या करने का है, कैसे करने का है, कब करने का है।”
“ठीक है। मैसेज पहुंच जायेगा।”
“तेरा रोकड़ा तेरे पास पहुंच जायेगा।”
“शुक्रिया।”
सम्बन्धविच्छेद हो गया।
शाम को लल्लू को जेलर के आफिस में तलब किया गया।
लल्लू वहां पहुंचा तो उसने वहां जेलर की जगह इन्स्पेक्टर अष्टेकर को बैठा पाया।
उसने लल्लू को अपने सामने एक कुर्सी पर बैठने का इशारा किया। वह बैठ गया तो वह बोला — “कैसा है, हजारे?”
“ठीक हूं।” — लल्लू भावहीन स्वर में बोला।
“यह जगह पसन्द आयी?”
“ठीक है।”
“पसन्द कर ही ले। लम्बा रहना है तूने यहां।”
लल्लू खामोश रहा।
“तूने मेरी राय के बारे में कुछ सोचा?”
“कौन-सी राय के बारे में?”
“सरकारी गवाह बनने की राय के बारे में।”
“मुझे मुखबिरी पसन्द नहीं।”
“मैं तेरी वफादारी की कद्र करता हूं लेकिन यह वफादारी तू गलत लोगों के लिए दिखा रहा है, हजारे। टोनी और गुलफाम ऐसी वफादारी दिखाने के काबिल नहीं। क्या?”
लल्लू चुप रहा।
“देख। देर सवेर उन दोनों ने फंसना तो है ही। कानून के हाथ बड़े लम्बे होते हैं। मुजरिम इनकी पकड़ से वक्ती तौर पर बचा रह सकता है, हमेशा के लिए नहीं। छोड़ना तो मैंने उन दोनों को है नहीं। वे लोग बाद में मेरे फन्दे में फंसे तो उसका तेरे को क्या फायदा पहुंचेगा? कुछ भी नहीं। वो दोनों जब फांसी पर लटक रहे होंगे तो तू तब भी यहीं होगा। यानी कि तेरी वफादारी बेकार जाएगी। हजारे, अगर तेरे में रत्ती भर भी अक्ल बाकी है तो इस सुनहरे मौके को कैश कर। तू हामी भर, मैं कल ही तुझे यहां से आजाद करवा दूंगा, बोल, क्या कहता है?”
“मुझे नहीं पता तुम क्या कह रहे हो, मेरी समझ में तो कुछ नहीं आ रहा।”
अष्टेकर ने असहाय भाव से गर्दन हिलाई। वह कुछ क्षण अपलक हजारे को देखता रहा, फिर बोला — “कचहरी में तूने अपनी मां की सूरत नहीं देखी होगी। मैंने देखी थी। जब तुझे हथकड़ी डालकर ले जाया जा रहा था, उस वक्त उसके चेहरे पर ऐसे भाव थे जैसे चाहती हो कि तभी जमीन फट जाती और वह उसमें समा जाती। एक ही बेटा और वो भी तेरे जैसा! पास-पड़ोस में क्या मुंह दिखाएगी वो? लोग जब नकली हमदर्दी जताते हुए ताने देंगे कि बेचारी विधवा माई का इकलौता बेटा सात साल के लिए जेल में बन्द है तो बेचारी वहीं गिर के मर नहीं जाएगी!”
“स... सात साल!” — लल्लू के मुंह से निकला।
“साल-छः महीने कम सही। पांच साल से ऊपर सजा तो तुझे होगी ही होगी।”
लल्लू के मुंह से बोल न फूटा।