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Thriller कागज की किश्ती

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“हां। टोनी यहां से छूटते वक्त भी बोलकर गयेला था कि लंगड़े नागप्पा को कोई कुछ न कहे। तब से ये साला लंगड़ा इधर फुल सेफ है।”

“टोनी ऐसा क्यों बोला?”

“क्या मालूम क्यों बोला! तेरे कू नहीं मालूम! तू बोलता है वो तेरा पक्का फिरेंड है।”

“नहीं” — लल्लू अपलक लंगड़े को देखता बोला — “मेरे कू नहीं मालूम।”

एंथोनी ने दसवीं बार अपने फ्लैट पर फोन किया तो दूसरी तरफ से मोनिका का जवाब मिला।

“कहां थी?” — एंथोनी चिल्लाया — “दसवीं बार फोन कर रहा हूं।”

“बाजार गयी थी। तुम कहां हो?”

एंथोनी ने बताया और फिर पूछा — “क्या खबर है?”

“अष्टेकर फ्लैट की सर्च का वारन्ट लेकर आया था। पूरी तलाशी लेकर गया है।”

“कुछ मिला?” — एंथोनी हड़बड़ाया।

“नहीं। नकली फायर प्लेस पर उसे शक हुआ था लेकिन टीन की चादर उससे सरकी नहीं थी।”

“ओह!” — एंथोनी ने चैन की सांस ली — “और?”

“लल्लू गिरफ्तार है। जेल में है वो...”

“मुझे मालूम है। मैंने अखबार में पढ़ा है। दरअसल मैंने उसी की वजह से फोन किया है। मेज के दराज में मेरी एक डायरी है। उसमें नरेश माने नाम के एक आदमी का टेलीफोन नम्बर है! वह नम्बर मुझे चाहिए।”

“वो कौन है?”

“वो जेल में हवलदार है। मैं चाहता हूं वह जेल में लल्लू का वैसा ही खयाल करे जैसा उसने कभी मेरा किया था।”

“या जैसे तुमने रामचन्द्र नागप्पा का किया था!” — मोनिका व्यंग्यपूर्ण स्वर में बोली।

“क्या मतलब हुआ इसका?” — एंथोनी सख्ती से बोला।

“अष्टेकर कहता है कि पोस्टमार्टम की रिपोर्ट से यह साबित होता है कि जिस आदमी ने नागप्पा का खून किया था, उसी ने विलियम का भी खून किया था।”

“यानी कि अष्टेकर ज्यादा भरोसे का आदमी है तेरे लिये! तुझे अष्टेकर की बात पर विश्‍वास है, मेरी बात पर नहीं! बेवकूफ औरत, वो पुलिसिया तेरे को मूर्ख बना कर गया। पोस्टमार्टम की रिपोर्ट से ऐसी बातें साबित नहीं होतीं। वो दोनों कोई गोली खाकर नहीं मरे थे जो साबित किया जा सकता कि दोनों को लगी गोलियां एक ही रिवॉल्वर से निकली थीं। उस्तुरे से कटे गले का मुआयना करके नहीं बताया जा सकता कि दोनों वार करने वाला हाथ एक ही था। नागप्पा उस्तुरे के वार से इसलिए मरा है क्योंकि मैं चाहता था कि वो वैसे ही मरे जैसे उसने विलियम को मारा था। अगर मुझे मालूम होता कि तू ऐसे अहमकों जैसे नतीजे निकालेगी तो मैं नागप्पा को शूट करवाता।”

“लेकिन” — मोनिका उलझन में पड़ गयी — “अष्टेकर कहता था कि...”

“उस पुलिसिये की बातों पर मत जा। वह मेरा दुश्‍मन है। वह तुझे बहका कर, बेवकूफ बनाकर मेरे खिलाफ तेरी जुबान खुलवाना चाहता है। मोनिका, मुझे अपना खैरखाह मानना सीख। मेरे पर भरोसा करना सीख।”

“स-सॉरी। सॉरी, टोनी।”

“तेरे को सॉरी होना ही मांगता है। तू तो ऐसे बोलने लगती है जैसे विलियम का कत्ल मैंने किया हो! ऐसी बातों का मेरे को बुरा नहीं लगेगा?”

“सॉरी।”

“छोड़। अब वो नम्बर बता।”

एक मिनट बाद मोनिका ने उसे नरेश माने का टेलीफोन नम्बर बताया।

टोनी ने सम्बन्धविच्छेद करके वो नया नम्बर डायल किया।

“माने?” — दूसरी ओर से उत्तर मिलते ही वह बोला।

“हां।” — आवाज आयी — “कौन?”

“टोनी।”

“टोनी!”

“हां। पहचाना?”

“पहचाना। क्या मांगता है?”

“एक मेहरबानी।”

“कैसी मेहरबानी?”

“एक मैसेज डिलीवर करने का है।”

“ऐसे काम डाकखाने में होते हैं। तारघर में होते हैं।”

“वहां फीस कम लगती है और देर ज्यादा लगती है। टोनी को ज्यादा फीस देकर जल्दी काम कराना पसन्द है।”

“मैसेज बोला।”

“तू फीस बोल।”

“जो तू देगा। मेरे को तेरे पर एतबार है।”

“मेरे पर एतबार करके कभी घाटे में नहीं रहेगा, माने।”

“मैसेज बोल, टोनी।”

“मैसेज जेल में अपने नट्टू रविराम को देने का है। जेल में एक नया छोकरा आयेला है। नाम है करम चन्द हजारे। तेरे को नट्टू को सिर्फ इतना बोलना है कि उस छोकरे का रिकार्ड बन्द करने का है क्योंकि जो बात लंगड़ा नागप्पा जानता है, वो बात वह छोकरा भी जानता है और छोकरा अपना रिकार्ड चालू करने की तैयारी कर रहा है। बाकी नट्टू खुद समझ जायेगा।”

“उसे करना क्या होगा?”

“वो तेरे मतलब की बात नहीं। नट्टू जानता है उसका क्या करने का है, कैसे करने का है, कब करने का है।”

“ठीक है। मैसेज पहुंच जायेगा।”

“तेरा रोकड़ा तेरे पास पहुंच जायेगा।”

“शुक्रिया।”

सम्बन्धविच्छेद हो गया।

शाम को लल्लू को जेलर के आफिस में तलब किया गया।

लल्लू वहां पहुंचा तो उसने वहां जेलर की जगह इन्स्पेक्टर अष्टेकर को बैठा पाया।

उसने लल्लू को अपने सामने एक कुर्सी पर बैठने का इशारा किया। वह बैठ गया तो वह बोला — “कैसा है, हजारे?”

“ठीक हूं।” — लल्लू भावहीन स्वर में बोला।

“यह जगह पसन्द आयी?”

“ठीक है।”

“पसन्द कर ही ले। लम्बा रहना है तूने यहां।”

लल्लू खामोश रहा।

“तूने मेरी राय के बारे में कुछ सोचा?”

“कौन-सी राय के बारे में?”

“सरकारी गवाह बनने की राय के बारे में।”

“मुझे मुखबिरी पसन्द नहीं।”

“मैं तेरी वफादारी की कद्र करता हूं लेकिन यह वफादारी तू गलत लोगों के लिए दिखा रहा है, हजारे। टोनी और गुलफाम ऐसी वफादारी दिखाने के काबिल नहीं। क्या?”

लल्लू चुप रहा।

“देख। देर सवेर उन दोनों ने फंसना तो है ही। कानून के हाथ बड़े लम्बे होते हैं। मुजरिम इनकी पकड़ से वक्ती तौर पर बचा रह सकता है, हमेशा के लिए नहीं। छोड़ना तो मैंने उन दोनों को है नहीं। वे लोग बाद में मेरे फन्दे में फंसे तो उसका तेरे को क्या फायदा पहुंचेगा? कुछ भी नहीं। वो दोनों जब फांसी पर लटक रहे होंगे तो तू तब भी यहीं होगा। यानी कि तेरी वफादारी बेकार जाएगी। हजारे, अगर तेरे में रत्ती भर भी अक्ल बाकी है तो इस सुनहरे मौके को कैश कर। तू हामी भर, मैं कल ही तुझे यहां से आजाद करवा दूंगा, बोल, क्या कहता है?”

“मुझे नहीं पता तुम क्या कह रहे हो, मेरी समझ में तो कुछ नहीं आ रहा।”

अष्टेकर ने असहाय भाव से गर्दन हिलाई। वह कुछ क्षण अपलक हजारे को देखता रहा, फिर बोला — “कचहरी में तूने अपनी मां की सूरत नहीं देखी होगी। मैंने देखी थी। जब तुझे हथकड़ी डालकर ले जाया जा रहा था, उस वक्त उसके चेहरे पर ऐसे भाव थे जैसे चाहती हो कि तभी जमीन फट जाती और वह उसमें समा जाती। एक ही बेटा और वो भी तेरे जैसा! पास-पड़ोस में क्या मुंह दिखाएगी वो? लोग जब नकली हमदर्दी जताते हुए ताने देंगे कि बेचारी विधवा माई का इकलौता बेटा सात साल के लिए जेल में बन्द है तो बेचारी वहीं गिर के मर नहीं जाएगी!”

“स... सात साल!” — लल्लू के मुंह से निकला।

“साल-छः महीने कम सही। पांच साल से ऊपर सजा तो तुझे होगी ही होगी।”

लल्लू के मुंह से बोल न फूटा।
 
“हजारे, वफादारी दिखाना चाहता है तो अपनी बूढ़ी, बेसहारा मां के लिए दिखा, अपनी कब्र में पांव लटकाये बैठी दादी के लिए दिखा। खुर्शीद के लिए दिखा जो कचहरी में बैठी तेरे अंजाम से खौफ खाती आंखों ही आंखों में अपने आंसू पी रही थी। तेरी वफादारी के हकदार वे लोग हैं, न कि वो डेढ़ दीमाक एंथोनी फ्रांकोजा और गुलफाम अली। हजारे, जरा सोच, अगर वे दोनों तेरी वफादरी के इतने ही हकदार हैं तो उनमें से कोई तेरी जमानत कराने क्यों नहीं आया? कैसे यार हैं वो तेरे?”

“वो मेरे यार नहीं हैं। मैं पहले ही कह चुका हूं, मेरी उनसे मामूली वाकफियत है, मामूली दुआ-सलाम है।”

“तू मुझे येड़ा समझता है जो ऐसी बकवास कर रहा है! मैंने आम देखा है तुझे उन दोनों की सोहबत में। दर्जनों बार मैंने पास्कल के बार में तुझे उनके साथ जाम टकराते हंसी ठट्ठा करते देखा है। बोल, येड़ा समझता है मुझे! तू ही एक रोज टोनी की यह कहकर हिमायत नहीं कर रहा था कि वो भला आदमी है! जब तू उससे ठीक से वाकिफ नहीं तो तुझे क्या पता कि वो भला आदमी है या बुरा! ऐसी हिमायत आदमी उसी की करता है जिसके साथ गहरी छन रही हो।”

“मेरी निगाह में सभी भले हैं। मेरी निगाह में हर वो आदमी भला है जो मेरे साथ कोई बुराई न करे। मैं तुम्हें भला कहूं तो तुम क्या मेरे जिगरी दोस्त हो जाओगे?”

“बहस अच्छी कर लेता है। जेल में गुजरे एक ही दिन ने अक्ल की मैल उतार दी है।”

लल्लू ने उत्तर न दिया।

“तो” — अष्टेकर समापन-सा करता बोला — “तुझे नहीं मंजूर टोनी और गुलफाम के खिलाफ वादामाफ गवाह बनना?”

लल्लू परे देखने लगा।

“ठीक है।” — अष्टेकर उठ खड़ा हुआ। उसने बड़े गुस्से से मेज पर पड़ी घण्टी बजाई।

रात के खाने के दौरान एक भारी-भरकम हवलदार डंडा हिलाता मैस में आया और नट्टू रविराम के करीब ठिठका।

लल्लू ने देखा दोनों में चुपचाप कोई इशारेबाजी चली।

“इस हवलदार का नाम नरेश माने है।” — पांडी बोला — “तेरा दोस्त टोनी यहां बड़ा बाप था तो यह एक वेटर की तरह उसके आगे-पीछे फुदका करता था। टोनी बहुत रोकड़ा चढ़ाता था इसे।”

“बड़ा बाप होने की वजह से?”

“नहीं। पैसे वाला होने की वजह से। बड़ा बाप तो साला नट्टू भी है लेकिन नट्टू के आगे-पीछे यह वेटर की तरह नहीं फुदकता।”

“अभी तो बहुत घुट-घुटकर बातें कर रहा है उससे?”

“कोई तेरी ही बात होती मालूम हो रयेली है। दोनों रह-रहकर तेरे को देख रयेले हैं।”

“अपुन भी यही नोट कियेला है।”

“एक बात बता।”

“क्या?”

“जब टोनी तेरा इतना जिगरी है तो उसने तेरी जमानत क्यों नहीं भरी?”

लल्लू ने उत्तर न दिया। हकीकतन वही सवाल उसे भी साल रहा था। टोनी ने उसकी जमानत का इन्तजाम क्यों नहीं किया था? क्या वह भूल गया था कि उसने अपनी जान पर खेलकर टोनी की जान बचाई थी? माना कि वो घायल था लेकिन गुलफाम अली तो घायल नहीं था!

तभी उसकी निगाह लंगड़े नागप्पा पर पड़ी।

टोनी लंगड़े नागप्पा पर इतना मेहरबान हो सकता था तो उस पर क्यों नहीं? लंगड़े नागप्पा ने ऐसा कौन-सा बहुत ही खास अहसान चढ़ाया हुआ था टोनी पर! कहीं ऐसा तो नहीं था कि इस लंगड़े का टोनी पर कोई जोर था जिसकी वजह से टोनी बतौर रिश्‍वत उसका मुंह बन्द करने के लिए उसकी खिदमत करवा रहा हो! टोनी जेल की कई कहानियां सुनाता था लेकिन इस लंगड़े नागप्पा का तो उसने कभी जिक्र तक नहीं किया था!

जबसे लल्लू टोनी की सोहबत में आया था, तब से उस घड़ी पहली बार लल्लू का टोनी पर से विश्‍वास हिला था।

“क्या सोच रयेला है?” — पांडी ने पूछा।

“कुछ नहीं।” — लल्लू चिन्तित भाव से बोला।

तभी ड्रम की तरह लुढ़कता नट्टू उनके करीब आया। उसने बड़े प्यार से लल्लू के कन्धे पर हाथ रखा और बोला — “अपुन हवलदार से बात कियेला है। अब तू मेरे वाली बैरक में ट्रांसफर हो गयेला है।”

“वो काहे को?” — लल्लू सशंक भाव से बोला।

“टोनी माने के हाथ संदेशा भिजवायेला है कि तू उसका भीड़ू है। अपुन तेरा पूरा खयाल रखने का है इसलिए अपुन तेरे को मेरे वाली बैरक में रखना मांगता है। तेरे कू कोई एतराज?”

“मेरे कू क्या एतराज है!” — लल्लू लापरवाही से बोला — “मेरे कू तो सब बैरेक एकीच जैसी हैं।”

“अच्छा बच्चा है।” — नट्टू ने एक बार फिर उसका कन्धा थपथपाया और फिर वहां से चला गया।

लल्लू को टोनी पर और भी गुस्सा आने लगा।

जो आदमी जेल में उसके आराम से रहने का इन्तजाम करवाना सोच सकता था, उसे उसकी जमानत करवाना क्यों नहीं सूझा था?

लल्लू ने देखा, पांडी के चेहरे पर अजीब से चिन्ता और उत्कंठा के भाव थे।

“तेरे कू क्या हुआ?” — लल्लू बोला — “तू क्या सोच रयेला है?”

“बाप” — पांडी धीरे से बोला — “मेर कू बोलना नहीं चाहिए पण बोलता है।”

“क्या?”

“नट्टू को पता लग गया तो वो मेरे कू जान से मार डालेगा।”

“अरे, कुछ बोल भी तो सही!”

“नट्टू तेरे पीछे पड़ गयेला है। वो तेरा बैरेक तेरे खयाल के लिए नहीं, अपने खयाल के लिए चेंज करायेला है। तू रात को इससे खबरदार रहने का है।”

“खबरदार! काहे कू?”

“वो रात को तेरे को अपना वाइफ बनाने का कोशिश करेंगा।”

लल्लू पहले तो कुछ समझा नहीं लेकिन जब समझा तो उसका चेहरा कानों तक लाल हो गया।

“मैं साले का खून नहीं कर दूंगा!” — वह दांत भींचकर गुर्राया।

“नहीं कर सकेंगा, बाप। तू नट्टू से लड़ेंगा तो बैरेक के अक्खे कैदी नट्टू का साथ देंगे। वैसे तो तू उस राक्षस से अकेला ही नहीं लड़ पायेगा, बाप।”

लल्लू सोच में पड़ गया।

“एक बात और बोलने का है तेरे कू।”

“वो क्या?”

“इधर जो नहाने का ठिकाना है न, जिधर एक लम्बी कतार में कई टूटियां लग रयेली हैं, वहां बहुत लोग फिसल कर हाथ-पांव तुड़ेले हैं। एकाध तो भेजा फटने से खल्लास भी होयेला है।”

“क्यों? वहां के फर्श पर काई जम रयेला है?”

“नहीं। फर्श एकदम चौकस है, बाप। पण जब उधर फिसल कर किसी का हाथ-पांव, माथा फूटेला है तो बोला यही जाता है कि बेचारे का बैलेंस बिगड़ गया। या साबुन पर से फिसल गया।”

“यानी कि असल में बैलेंस बिगाड़ा जाता है!”

“अभी आयी बात समझ में। आपुन को तू राइट आदमी लगा इसलिए तेरे कू बोला।”

“यानी कि ऐसा खतरा मेरे कू भी है?”

“चौकस रहने में क्या वान्दा है, बाप! नट्टू की तेरे ऊपर खास मेहरबानी होयेला है इसीलिए तेरे कू बोला।”

“शुक्रिया। लेकिन अपुन को नहीं लगता कि...”

तभी घण्टी बजने लगी।
 
कैदी अपने-अपने स्थान से उठने लगे और एक कतार में मैस से बाहर निकलने लगे।

उस रोज सारी रात लल्लू को नींद न आई।

बत्तियां जलती रहने तक वह निश्‍चिन्त रहा लेकिन जब बत्तियां बुझा दी गईं तो वह फिक्रमन्द हो गया। हर क्षण वह अपने पर होने वाले आक्रमण की प्रतीक्षा करता रहा। आधी रात के करीब उसे नट्टू के खर्राटे भरने की आवाज भी सुनाई देने लगी तो भी उसकी पलक झपकने की हिम्मत न हुई। कभी आंख लग भी जाती तो वह यूं चौंक कर उठता आंखें खोलता था जैसे नट्टू पहले से ही उस पर सवार हो।

उसके न सोने का और इतना चौकस रहने का ही यह नतीजा निकला कि सवेरे उसने नट्टू को अपने पाजामे के नेफे में एक लोहे के पाइप का टुकड़ा घुसेड़ते देख लिया।

और थोड़ी देर बाद वे नहाने की खातिर उस तबेले जैसे ब्लॉक में पहुंचे जहां लम्बी कतारों में पानी की टूटियां लगी हुई थीं।

नट्टू उससे अगली टूटी के नीचे खड़ा था। उसने अपनी वर्दी उतार दी थी और अपनी विशाल कमर के गिर्द तौलिया लपेटे था।

लल्लू को तौलिये के भीतर पाइप का आभास नहीं मिल रहा था लेकिन उसे गारन्टी थी कि पाइप वहां था।

“चल बे, नहा।” — वह लल्लू से बोला — “नहाता क्यों नहीं?”

“नहाता हूं।”

“मेरे सामने नंगा होने से शरमाता है?”

“ऐसी कोई बात नहीं।”

“ये ले साबुन।” — नट्टू ने उसे साबुन की एक टिक्की थमाई — “बढ़िया वाला है। इधर नहीं मिलता। बाहर से आयेला है। बड़ा बाप के लिए। क्या?”

लल्लू ने साबुन ले लिया।

उसने नलका खोला, उसके नीचे खड़े होकर बदन गीला किया और साबुन मलने लगा।

“तू तौलिये समेत नहाता है?” — वह बोला।

“नहीं, बच्चे। मैं तौलिया अभी उतारता हूं। खास तेरे वास्ते।”

उसने एक झटके से तौलिया उतार फेंका।

पाइप का कोई दो फुट लम्बा टुकड़ा उसने वाकई तौलिये के भीतर छुपाया हुआ था। उसने पाइप को हाथ में थामा और उसे सिर से ऊंचा किये लल्लू की तरफ झपटा।

लल्लू ने साबुन की साबुत टिक्की खींच कर उसके मुंह पर मारी। साबुन उसकी एक आंख से टकराया। तुरन्त उसके मुंह से एक सिसकारी निकली और क्षण भर को उसकी दोनों आंखें मुंद गयीं।

लल्लू सिर नीचा बैल की तरह उसकी छाती से टकराया। नट्टू पीछे को लड़खड़ाया और उसकी पीठ पीछे दीवार से टकराई। पीठ को सहारा मिलने के बावजूद उसके पांव उखड़ गये और वह नीचे को गिरने लगा।

लल्लू ने बड़ी सहूलियत से उसके हाथ से पाइप झपट लिया। उसने नीचे को झुककर पाइप उसकी ठोड़ी के नीचे गले के पास फंसाया और पूरी शक्ति से उसे अपनी तरफ खींचने लगा। उस कार्य में सुविधा पैदा करने के लिये उसने अपना एक घुटना उसकी पीठ जमा दिया।

और नहाने वाले कैदी चुपचाप तमाशा देख रहे थे। किसी की उनके पास फटकने की हिम्मत नहीं हो रही थी।

नट्टू अब उसकी पकड़ में तड़प रहा था, छटपटा रहा था और बुरी तरह से आतंकित था।

“छ-छोड़ दे। छोड़ दे।”

“तू मुझे मारने लगा था।” — लल्लू कहरभरे स्वर में बोला।

“मेरे कू बोला गया था।” — नट्टू बड़ी कठिनाई से बोल पा रहा था। उसका चेहरा लाल से बैंगनी हो गया था और आंखें कटोरियों से बाहर उबली पड़ रही थीं।

“क्या बोला गया था? जल्दी-जल्दी बोल नहीं तो तेरी गरदन कन्धे से नीचे लटकी पड़ी होयेंगी।”

“तेरे कू खल्लास करने को बोला गया था।”

“काहे कू?”

“मालूम नहीं।”

“कौन बोला?”

“टोनी!”

“कौन टोनी?”

“टोनी फ्रांकोजा।”

“क्या बकता है?”

“माने उसी का सन्देशा लायेला था। वही तेरे को खल्लास करने को बोला। बोला तेरी जुबान बन्द करने का है। तू वो सब जानेला है जो लंगड़ा नागप्पा जानेला है। अब मेरे कू छोड़ मेरे बाप, नेई तो मेरा दम घुट जायेंगा।”

“तू झूठ बोलता है।” — लल्लू जोर से पाइप उमेठता बोला — “टोनी मेरा दोस्त है। वह जानता है मैं उसके खिलाफ जुबान खोलने वाला नहीं।”

“अपुन सच बोल रयेला है।” — वह तड़पता बोला — “मेरा विश्‍वास कर, बाप। अपुन जो कुछ किया, टोनी के कहने पर किया।”

“लंगड़ा नागप्पा क्या जानता है जो कि टोनी समझता है अपुन जानता है?”

“अपुन को नई मालूम। अपुन को इतना ही मालूम है कि लंगड़े का टोनी पर कोई जोर है। तभी टोनी उसका इतना खयाल रख रयेला है।”

लल्लू एक क्षण खामोश रहा और फिर एक बार फिर पाइप उमेठता बोला — “मैं कौन?”

“हजारे।”

“हजारे कौन?”

“बड़ा बाप।” — नट्टू उसका इशारा समझकर तुरन्त बोला।

“तू चोट कैसे खाया?”

“साबुन से फिसल कर गिरा।”

“पुलिसिया लोग आ रयेला है। मेरे कू उनके सामने यही कुछ न सुनाई दिया तो रात को अपुन अपने दांतों से तेरी छाती फाड़ के तेरा कलेजा निकाल के खायेगा। समझा?”

“समझा।”

लल्लू ने उसे छोड़ दिया।

फिर उठकर सीधा होने की कोशिश करते नट्टू की गंजी खोपड़ी पर उसने पाइप का भरपूर प्रहार किया। नट्टू की खोपड़ी खुल गयी और वह फिर धराशायी हो गया।

पुलिस वालों के करीब आने से पहले पाइप कहीं गायब हो चुका था। कैदियों के हाथों में होता पाइप कहीं का कहीं निकल गया था। बड़े बाप की ऐसी खिदमत तो कैदियों से अपेक्षित होती ही थी। आखिर लल्लू अब कोई मामूली कैदी तो नहीं था। बड़े बाप को धूल चटाने वाला नया बड़ा बाप था।

लल्लू को जेल में अभी डेढ़ दिन पूरा नहीं हुआ था कि वह वहां का बड़ा बाप बन गया था। जिन्दगी में पहली बार लल्लू को अपनी शक्ति और सामर्थ्य का अहसास हुआ था।
 
अगले रोज एंथोनी ने लल्लू की मौत की खबर सुनने के लिये जब नरेश माने को फोन किया तो यह सुनकर उसके छक्के छूट गये कि लल्लू सही-सलामत था और उसके लिये तैनात किया गया जल्लाद नट्टू रविराम उसके हाथों शहीद होने से बाल-बाल बचा था।

“ऐसा कैसे हो गया?” — एंथोनी अविश्‍वासपूर्ण स्वर में बोला।

“पता नहीं कैसा हो गया लेकिन हो गया।” — नरेश माने बोला — “और अब तो छोकरा जेल का बड़ा बाप है।”

“नहीं!”

“हां। अपुन एकदम सच बोल रयेला है।”

“विश्‍वास नहीं होता।”

“टोनी, तूने उस छोकरे को गलत समझा। वो मुंह फाड़ने वाला नहीं। वो दिन में चार बार जवाबतलबी के लिए बुलाया जाता है लेकिन वो मुंह से एक अक्खर फूट कर नहीं दियेला है।”

“हूं।”

“और टोनी, उसको यह भी मालूम हो चुका है कि उसको खल्लास करने का हुक्म नट्टू को तू दियेला था।”

“क्या!” — एंथोनी चौंक कर बोला।

“हां।”

“तेरे कू कैसे मालूम?”

“और कैदियों ने बताया। नट्टू और उस छोकरे में जो बातचीत हुई थी, वो अक्खा कम्पाउन्ड सुन रयेला था। नट्टू ने खुद बोला था कि वो तेरे कहने पर लल्लू को खल्लास करने की कोशिश कर रयेला था। कितना ही कैदी लोग नट्टू को ऐसा कहते अपने कानों से सुनेला था।”

एंथोनी के मुंह से एक भद्दी गाली निकली।

“अपुन जो सुना, वो तेरे कू बोल रयेला है। और अगर अपुन तेरी जगह होयेंगा तो उस छोकरे को खल्लास करवाने की दोबारा कोशिश नहीं करेंगा। अब कोई तेरे वास्ते यह काम करने को तैयार नहीं होयेंगा। अब तेरा छोकरा जेल का बड़ा बाप है। बड़ा बाप के खिलाफ जाना तेरे कू मालूम ही है कि कितना जिगरे का काम है। ऐसा काम करने कू हामी भरने कू...”

एंथोनी ने आगे माने की बात न सुनी। उसने रिसीवर वापिस क्रेडल पर पटक दिया।

बड़ी विकट स्थिति पैदा हो गई थी।

अगर लल्लू ने यूं आनन-फानन जेल का बड़ा बाप बन जाने का दिलगुर्दा दिखाया था तो वह बहुत खतरनाक साबित हो सकता था। अगर वाकई उसे मालूम हो चुका था कि उसकी मौत का सामान एंथोनी ने करवाया था तो उसके मन में बदले की भावना जागृत हो सकती थी और वह और भी ज्यादा खतरनाक साबित हो सकता था।

उस विकट स्थिति से निपटने का एक ही तरीका था कि लल्लू के मन में विश्‍वास पैदा किया जाता कि नट्टू ने जो कुछ कहा था, वो गलत था, झूठ था। इस बात को स्थापित करने के लिये लल्लू का विश्‍वास जीतना जरूरी था और उसका विश्‍वास जीतने की कोशिश में पहला कदम यही हो सकता था कि उसकी जेल से रिहाई का इन्तजाम करवाया जाता। जेल में लल्लू को खल्लास करवाना अगर मुमकिन नहीं था तो ऐसा जेल से बाहर किया जा सकता था।

और इस काम के लिये उसकी जमानत होना जरूरी था।

रात को लल्लू अपनी पहले वाली बैरक में पहुंच गया।

उसे पांडी का साथ पसन्द था।

आखिर पांडी की वजह से ही वह नट्टू के हाथों मरने से बचा था।

उसे अभी भी यकीन नहीं आ रहा था कि टोनी ने ही जेल में उसकी मौत का सामान किया था।

लेकिन नट्टू को झूठ बोलने की क्या जरूरत थी! जरूरत तो क्या, वो तो झूठ बोलने की स्थिति में ही नहीं था।

टोनी उसके खून का प्यासा हो सकता था, इस खयाल ने उसे इतना विचलित किया कि वह उठकर टहलने लगा।

उसने देखा बैरेक के कोने में पांडी और लंगड़ा नागप्पा बैठे सिगरेट के कश लगा रहे थे। वह उनके करीब पहुंचा तो नागप्पा ने सिगरेट उसकी तरफ बढ़ा दिया।

“क्या है?” — लल्लू ने पूछा।

“समैक!” — लंगड़ा नागप्पा होंठ चटकाता बोला।

“मैं नहीं पीता।”

“बाप” — पांड़ी बोला — “जेल में टेम काटने का है तो कोई न कोई अमल जरूरी।”

“मैं नहीं... अच्छा, ला दिखा।”

लंगड़े ने सिगरेट उसे थमा दिया।

लल्लू ने उसके दो लम्बे कश लगाये और सिगरेट वापिस नागप्पा की तरफ बढ़ाया।

“एक और।” — लंगड़ा बोला।

लल्लू ने कहना माना।

फिर सिगरेट एक बार लंगड़े और पांडी में फिरा और खत्म हो गया।

लल्लू, जिसने पहली बार स्मैक का कश लगाया था, अपना सिर बहुत हल्का महसूस करने लगा। टोनी का खयाल भी दिमाग पर छाने लगी तरंग की धुंध में घुलने लगा।

“मैं” — लल्लू लंगड़े से बोला — “तेरे भाई कू जानता था।”

“अच्छा!” — लंगड़ा बोला।

“तब मेरे कू मालूम नहीं था कि उसका कोई भाई भी था और जेल में था।”

लंगड़ा खामोश रहा।

“तेरे कू जेल में यह समैक वाला सिगरेट कैसे मिलता है?”

“टोनी से। माने की मार्फत।”

“ओह!”

“बाप” — पांडी बेहद धीमे स्वर में बोला — “नागप्पा भी बोल रयेला है कि टोनी के कहने पर नट्टू तेरे कू खल्लास करने का कोशिश कियेला था।”

“तेरे कू कैसे मालूम?” — लल्लू नागप्पा से सम्बोधित हुआ।

“मालूम हो जाता है।” — लंगड़ा लापरवाही से बोला — “अपुन की टांग लंगड़ी है लेकिन कान एकदम चौकस हैं और आंख और भी चौकस हैं।”

“फिर भी!”

“अबे लंगू” — पांडी बोला — “बता न बड़ा बाप को।”

“अपुन” — लंगड़ा एक क्षण हिचकिचाया और फिर धीरे से बोला — “माने और नट्टू का थोड़ा डायलाग सुनेला था।”

“ओह!”

“बाप, तू भला आदमी है। ऊपर से तू मेरे दुश्‍मन नट्टू को धूल चटायेला है। इ‍सलिये अपुन तेरा भला करना मांगता है। अपुन तेरे को एक लेसन देना मांगता है।”

“क्या?”

“भीतर का कोई सीक्रेट बात मालूम होये तो उसको बाहर किसी को बता कर रखने का है।”

“अपुन कुछ समझा नहीं।”

“मैं तेरे कू समझाता है। देख। अपुन है न! मामूली, कमजोर आदमी लेकिन टोनी की मार्फत अपुन की भीतर कितना खातिर होयेला है! नट्टू से भी अपुन टोनी की वजह से ही सेफ है। टोनी अपुन का कोई सगे वाला तो नहीं! वो अपुन पर ऐसा मेहरबान काहे?”

“काहे?”

“क्योंकि अपुन टोनी का एक ऐसा सीक्रेट जानेला है जो टोनी को डैमेज कर सकता है। वह सीक्रेट अपुन बाहर पहुंचाया। अपने भाई के पास। एक बार सीक्रेट बाहर हो जाने पर वो और बाहर हो सकता है। टोनी को यह बात मालूम। इसलिए वो अपुन से दबेला है और अपुन के लिए इधर इतना अच्छा इन्तजाम छोड़ के गयेला है।”

“तू टोनी का कोई सीक्रेट कैसे जानता है?”

“बाप, तू टोनी का फिरेंड है, तेरे कू एक बात नेई मालूम?”

“कौन-सी बात?”

“कि टोनी नींद में बड़बड़ायेला है।”

“ओह! तो टोनी जब इधर जेल में था तो नींद में बड़बड़ाता था! तभी वो ऐसा कुछ बोला जो तूने सुना!”

“बरोबर। न सिर्फ सुना, उसे फौरन बाहर अपने भाई के पास पहुंचाया। अपुन ऐसा न किया होता तो टोनी अपुन को खल्लास करके अपुन का मुंह बन्द कर देता।”

लल्लू सोचने लगा। कहीं लंगड़े के भाई का हस्पताल में कत्ल टोनी ने ही तो नहीं करवाया था। उसका मुंह बन्द करने के लिए। उसने पहले उस कत्ल का जिक्र करना चाहा लेकिन फिर खयाल छोड़ दिया। पता नहीं लंगड़े को अभी अपने भाई के कत्ल की खबर भी थी या नहीं।

“बाप” — लंगड़ा बोला — “अब तू अपुन की बात समझा?”

“हां।” — लल्लू अनिश्‍चित भाव से बोला — “समझा।”

“तभी तेरे कू बोला कि अगर तू किसी की कोई भीतर की बात जानेला है तो उसे बाहर पहुंचा।”

“टोनी का सीक्रेट” — लल्लू ने पूछा — “तू अपने भाई को ही बतायेला है या किसी और को भी?”

“और को भी।” — लंगड़े के चेहरे पर बड़ी धूर्ततापूर्ण मुस्कराहट आई — “और टोनी को मालूम नहीं कि ऐसा आदमी कौन है, कितना है! बाप, अगर तेरे को भी टोनी का कोई टॉप का सीक्रेट मालूम हो तो उसे बाहर किसी को बोल के रख। फिर टोनी की हिम्मत नहीं होयेंगा जेल के किसी नट्टू को बोलने का कि वो तेरे को खल्लास कराना मांगता है। बाप, तू बाहर वालों को बोल कर जो रखेगा कि अगर तेरे को जेल में कुछ हो जाये तो तेरा बाहर वाला टोनी के खिलाफ क्या करना मांगता था, किधर जाकर जुबान खोलना मांगता था!”

“मुझे अभी भी विश्‍वास नहीं कि मेरे कत्ल का सामान टोनी कियेला था।”

“ठीक है। मर्जी तेरी।”

“तू टोनी का क्या सीक्रेट जानता है? मेरे कू बता न!”

“बाप, जब तू अपने आपको टोनी का जिगरी बोलता है तो कैसे बतायेंगा! तू टोनी के खिलाफ कोई बात भला कैसे सुनेंगा!”

लल्लू ने पांडी की तरफ देखा।

पांडी ने आंखों ही आंखों में उसे एक आश्‍वासन दिया।

लल्लू खामोश हो गया।

अभी बहुत वक्त था और उसे लग रहा था कि पांडी लंगड़े की जुबान खुलवा सकता था।

जोगेश्‍वरी से वापिसी में एंथोनी कार खुद चला रहा था। उसके जख्म को अभी ड्रैसिंग की जरूरत थी, उसके जिस्म में अभी काफी कमजोरी थी लेकिन चलने-फिरने के काबिल वह हो चुका था। डॉक्टर अटल ने उसे खाने को कुछ दवाईयां और रोज ड्रैसिंग कराने की हिदायत देकर डिसचार्ज कर दिया था।

कार धारावी पहुंची।

“तेरे को खुर्शीद का घर मालूम?” — एंथोनी ने पूछा।

गुलफाम अली ने सहमति में सिर हिलाया।

“रास्ता बता।”

गुलफाम के निर्देश पर कार चलाता टोनी उस इमारत के सामने पहुंचा जिसमें खुर्शीद रहती थी।

“देख, वो घर है!” — एंथोनी बोला — “हो तो उसे इधर बुलाकर ला।”

गुलफाम सहमति में सिर हिलाता कार से बाहर निकला। थोड़ी देर बाद वह अकेला इमारत से बाहर निकला।

“क्या हुआ?” — वो कार में आकर बैठा तो एंथोनी ने पूछा।

“वो अब यहां नहीं रहती।” — गुलफाम ने बताया — “उसकी मां ने उसे पीटकर घर से निकाल दिया है।”

“तो कहां रहती है? मालूम हुआ?”

“हां, हुआ। पालवाड़ी में एक होटल है, वह उसके एक कमरे में रहती है।”

“पालवाड़ी में तो एक ही होटल है। वो चूहेदान जिसका नाम न्यू स्टार है।”

“वही।”

एंथोनी ने कार आगे बढ़ाई।

उसने कार को चाल से भी गन्दे होटल न्यू स्टार से थोड़ा आगे करके रोका। गुलफाम कार से निकला और होटल की तरफ बढ़ गया।

थोड़ी देर बाद वह खुर्शीद के साथ इमारत से बाहर निकला।

एंथोनी कार से बाहर निकल आया और अपनी घायल टांग पर बिना जोर दिए कार का सहारा लेकर खड़ा हो गया।

उसने देखा खुर्शीद एक सिलवटों से भरी सूती साड़ी पहने थी और उसके चेहरे पर मुर्दनी छाई हुई थी।

वह एंथोनी के करीब आकर ठिठकी।

“क्या है?” — वह रूखे स्वर में बोली — “तीन सौ रुपये देकर थप्पड़ मारने आयेला है?”

एंथोनी जबरन मुस्कराया।

“तू मुझे गलत समझ रही है। मैं तो इधर तेरी मदद के वास्ते आया!”

“कैसी मदद?”

“तू लल्लू को जेल से बाहर देखना चाहती है न?”

“हां।”

“लेकिन तेरे पास उसकी जमानत भरने का रोकड़ा नहीं। होता तो तू कब की उसकी जमानत भर चुकी होती। बरोबर?”

खुर्शीद ने यन्त्रचालित भाव से सहमति में सिर हिलाया।
 
“वो रोकड़ा मैं तेरे कू देंगा।”

“लल्लू तेरा भी तो दोस्त है! तू खुद ही जमानत क्यों नहीं भर देता?”

“क्योंकि पुलिस वाला लोग मेरे कू मवाली समझता है। वो मेरे से सवाल करेंगा कि मेरे पास एक लाख रुपया किधर से आया!”

“ऐसा सवाल मेरे भी तो हो सकता है?”

“अव्वल तो होयेंगा नहीं। होयेंगा तो तेरे वास्ते जवाब देना आसान होयेंगा।”

“क्यों?”

“क्योंकि तू औरत है।”

खुर्शीद ने तमक कर उसकी तरफ देखा।

“अरे, मेरा वे मतलब नहीं।” — एंथोनी जल्दी से बोला।

“तो क्या मतलब है?”

“तू बोल सकती है कि तू अपना जेवर बेचकर रोकड़ा इकट्ठा किया। अपनी मां का जेवर बेचकर रोकड़ा इकट्ठा किया। लल्लू की मां का जेवर बेचकर रोकड़ा इकट्ठा किया। क्या?”

खुर्शीद का सिर धीरे से सहमति में हिला।

“मुझे क्या करना होगा?” — फिर उसने पूछा।

“कुछ भी नहीं। तेरे कू कुछ भी नहीं करना होगा। सब काम वकील कर लेगा। तेरे कू जमानत की रकम पेश करनी होगी और कुछ कागज़ साइन करने होंगे। वकील का इन्तजाम गुलफाम कर देगा। आज शाम को नहीं तो कल सुबह तक लल्लू आजाद होयेंगा।”

खुर्शीद की उदास आंखों में उम्मीद की चमक आयी।

“तू एक घन्टे बाद कचहरी पहुंच जाना। गुलफाम रोकड़ा लेकर आ जायेगा।”

खुर्शीद ने सहमति में सिर हिलाया।

“देर न करना। कल क्रिसमस की छुट्टी है। आज कागज़ी कार्यवाही पूरी न हुई तो बात परसों पर पड़ जायेगी।”

“मैं एक घन्टे से पहले पहुंचूंगी।”

“बढ़िया। और थोड़ा हुलिया भी सुधार कर आना। इतनी खूबसूरत लड़की है तू और क्या हाल बनायेला है अपना! लल्लू तेरे कू इस हाल में देखेंगा तो क्या सोचेंगा!”

खुर्शीद सहमति में सिर हिलाती वापिस होटल की तरफ दौड़ चली।

एंथोनी और गुलफाम फिर कार में सवार हो गए।

“अब आगे तेरे कू मालूम” — एंथोनी बोला — “कि तेरे कू क्या करने का है।”

“हां” — गुलफाम लापरवाही से बोला — “मालूम।”

“छोकरी बचनी नहीं चाहिए।”

“पहले कोई बचा?”

“और अपना लल्लू भी।”

“वो भी।”

जमानत की सारी कार्यवाही पूरी होने में तीन घण्टे लगे।

गुलफाम अली कचहरी में खुर्शीद के साथ नहीं रुका था। वह जमानत की रकम खुर्शीद को सौंपकर और उसके लिये वकील मुकर्रर कर के वहां से विदा हो गया था।

अकेली खुर्शीद ही वकील के साथ कमरा-दर-कमरा भटकी थी।

“अब वो छूटेगा कब?” — खुर्शीद ने वकील से पूछा।

“आज शाम को ये कागज़ात जेल में पहुंच जायेंगे और कल सुबह उसे छोड़ दिया जाएगा। कागज़ात मैं खुद जेल में लेकर जाऊंगा। तुम चाहो तो मेरे साथ चल सकती हो।”

“नहीं, मैं पहले उसकी मां और दादी को यह खबर सुना कर आना चाहती हूं कि उनका बेटा घर लौट राह है। वो बहुत खुश होंगी। आप मेरे पर एक मेहरबानी करेंगे?”

“क्या?”

“लल्लू को — हजारे को — बोल देना कि मैं उसे लेने आऊंगी।”

“दस बजे आना। जमानत पर छूटने वाले तकरीबन उसी वक्त छोड़े जाते हैं।”

“ठीक है।”

वकील से जुदा होकर वह इमारत से बाहर निकली। सड़क पर आकर वह टैक्सी तलाश करने लगी। अगले रोज क्रिसमस थी और क्रिसमस ईव का शापिंग का ऐसा रश था कि कोई टैक्सी खाली दिखाई नहीं दे रही थी।

अष्टेकर कचहरी की इमारत से निकलकर पार्किंग में खड़ी अपनी जीप की ओर बढ़ रहा था कि उसे फुटपाथ पर टैक्सी के लिए हलकान होती खुर्शीद दिखाई दी। उसको उसकी वहां मौजूदगी की लल्लू की जमानत के अलावा कोई वजह न सूझी।

वह जीप में सवार हुआ और उसे घुमा कर फुटपाथ के करीब ले आया।

“टैक्सी नहीं मिल रही?”

खुर्शीद ने चौंककर सामने देखा तो पाया कि जीप में अष्टेकर बैठा था और उसी से सम्बोधित था।

“मिल जाएगी।” — वो भावहीन स्वर में बोली।

“इधर कैसे आयी?”

“यूं ही कुछ खरीदारी करने।”

“खरीदा दिखाई तो नहीं दे रहा कुछ!”

“कुछ पसन्द नहीं आया।”

“हजारे की आजादी भी नहीं?”

“क-क्या?”

“मैं लाख रुपये की खरीदारी की बात कर रहा था। हजारे की आजादी की।”

खुर्शीद खामोश रही।

“जमानत भर दी?”

खुर्शीद ने उत्तर न दिया।

“मैं पुलिस वाला हूं, शायद भूल गयी हो। जो बात भीतर जाकर चुटकियों में मालूम की जा सकती हो, उसे छुपाने से फायदा!”

“हां। जमानत भर दी मैंने। वो कल छूट रहा है।”

“अच्छा है। क्रिसमस है।”

“वो ईसाई नहीं है।”

“फिर भी क्या हुआ! त्यौहार का दिन तो है! ईसा मसीह की नेमत किसी पर भी बरस सकती है। पीर पैगम्बरों के आशीर्वाद सिर्फ उन्हीं के धर्म के अनुयायियों के लिए ही थोड़े ही होते हैं! मुझे खुशी है कि उसकी जमानत हो गई। अच्छा लड़का है हजारे। मूर्ख है लेकिन अच्छा है, खुशकिस्मत है।”

“खुशकिस्मत! वो कैसे?”

“उसे तुम्हारे जैसी दिलदार प्रेमिका जो हासिल है! उसकी जमानत कराने वाली। पल्ले से पूरा लाख रुपया जमा कराने वाली। रोकड़ा कहां से आया? सान्ता क्लास तो नहीं दे गया?”

“सान्ता क्लास?”

“एंथोनी फ्रांकोजा।”

खुर्शीद ने उत्तर न दिया। उसने करीब आती एक और टैक्सी को हाथ दिया लेकिन वो सर्र से उसके सामने से गुजर गयी।

“जीप में बैठो।” — अष्टेकर बोला — “धारावी ही तो जाओगी! वहीं मैं जा रहा हूं।”

खुर्शीद हिचकिचायी।

“विश्‍वास जानो, मैं यह जानने की जबरदस्ती नहीं करूंगा कि जमानत भरने के लिए लाख रुपया तुम्हारे पास कहां से आया! फिर तो ठीक है?”

“धारावी में लोग मुझे तुम्हारे साथ जीप में बैठा देखेंगे तो समझेंगे कि तुम मुझे गिरफ्तार करके ले जा रहे हो।”

अष्टेकर जोर से हंसा।

“टैक्सी के लिए हलकान होने के मुकाबले में वो छोटी असुविधा है।” — वह बोला।

खुर्शीद हिचकिचाती हुई जीप में सवार हो गयी।

अष्टेकर ने जीप आगे बढ़ायी।

“एक” — रास्ते में वह बोला — “तुम्हारी पसन्द की बात कहूं?”

“क्या?”

“लल्लू के खिलाफ कोई बहुत पुख्ता केस नहीं है। एक अंगूठे के निशान के दम पर उसे डकैती के लिए जिम्मेदार नहीं माना जा सकता। फिंगरप्रिंट्स आइडेन्टिफिकेशन के लिए एक से ज्याद फिंगरप्रिंट्स दरकार होते हैं। उसका ट्रेन में खोया पर्स और जोगलेकर नाम के आदमी की उसके खिलाफ गवाही भी निर्विवाद रूप से उसे अपराधी साबित नहीं करती। सिर्फ शक की बिना पर अदालत किसी को सजा नहीं देती। वो रिहा हो सकता है। सजा भी हुई तो बड़ी हद साल-छ: महीने की होगी। लेकिन अगर उसका हाथ घाटकोपर की बैंक डकैती में भी पाया गया तो फिर वह बहुत बुरा फंसेगा। उस डकैती में तीन आदमियों की जान गई है।”

खुर्शीद बेहद चिन्त‍ित दिखाई देने लगी।

“एक तरीके से वो फिर भी छूट सकता है।”

“वो कैसे?”

“सरकारी गवाह बन कर। उसकी गवाही की बिना पर तब मैं एंथोनी और गुलफाम को गिरफ्तार कर लूंगा। उन्हें कड़ी सजा होगी और हजारे वादामाफ गवाह होने की वजह से रिहा कर दिया जाएगा।”

“अच्छा!”

“हां। मैंने उसे बहुत समझाया है लेकिन मेरे कहे से वह सरकारी गवाह बनने को तैयार नहीं हो रहा है। अब तो वह घर आ रहा है! तुम समझाकर देखना। हो सकता है वो तुम्हारी बात मान ले।”

खुर्शीद का सिर अपने आप ही सहमति में हिला।

शाम को लल्लू को जेल‍र के कमरे में ले जाया गया जहां जेलर की जगह उसने फिर अष्टेकर को बैठा पाया।

“बैठो।” — अष्टेकर बोला।

लल्लू उसके सामने बैठा गया।

“बधाई हो।”

“किस बात की?” — लल्लू सकपकाया।

“कल घर जो जा रहा है।”

“क्या!” — लल्लू की हैरानी छुपाये न छुपी।

“तेरी जमानत हो गई है।”

“मुझे पता था।” — फिर लल्लू इतमीनान से बोला।

“क्या पता था?”

“कि टोनी मुझे जरूर छुड़वायेगा।”

“बेवकूफ, तेरी जमानत टोनी ने नहीं दी।”

“त-तो?”

“तेरी जमानत खुर्शीद ने दी है। अब तू बता कि खुर्शीद के पास तेरी जमानत भरने को लाख रुपया कहां से आया?”

“इधर-उधर से जमा किया होगा बेचारी ने।”

“रोकड़ा इधर-उधर बिखरा नहीं पड़ा रहता कि जो चाहे हाथ बढ़ाए और उठा ले।”

लल्लू खामोश रहा।

“घाटकोपर में जो बैंक लुटा है, कभी तू उसकी कैंटीन में चाय वाला छोकरा हुआ करता था। ठीक?”

लल्लू चौंका।

“उस बैंक डकैती में किसी ऐसे आदमी का हाथ साफ दिखाई देता है जोकि वहां हर हफ्ते पहुंचने वाली बख्तरबन्द गाड़ी की रूटीन को खूब समझता था। वह आदमी तू हो सकता है। तेरी रिश्‍तेदारी उस डकैती से अभी नहीं जोड़ी गई। अभी तू सिर्फ कल्याण की डकैती वाले केस में गिरफ्तार है। तू घाटकोपर के बैंक की कैंटीन में चाय वाला छोकरा हुआ करता था, यह बात अभी मेरे सिवाय किसी को नहीं मालूम। अपनी यह जानकारी में अभी घाटकोपर थाने में पहुंचा दूं तो सबसे पहला काम तो यही होगा कि तेरी जमानत रद्द हो जाएगी। फिर तू कल भी यहीं होगा, अगले महीने भी यहीं होगा और अगले साल भी यहीं होगा।”

उस बात ने लल्लू को हिला दिया।

“लेकिन हौसला रख, यह बात मैं किसी को नहीं बताऊंगा।”

“मेरे पर” — लल्लू अपने सूखे होंठों पर जुबान फेरता हुआ बोला — “इतनी मेहरबानी किसलिए?”
 
“कई वजह हैं। जैसे तेरा बाप मेरा दोस्त था। जैसे कल क्रिसमस है। जैसे मुझे खुर्शीद पर तरस आता है जो तेरे जैसे अवली के लिए अपनी जिन्दगी खराब कर रही है। और सौ बातों की एक बात यह है कि तू मेरा निशाना नहीं।”

“क्या!”

“मेरा निशाना टोनी और गुलफाम हैं। अगर तूने गोली नहीं चलाई तो तू उनके खिलाफ गवाह बन, मैं गारन्टी करता हूं कि तेरा बाल भी बांका नहीं होगा।”

“मैं पहले ही कह चुका हूं कि मुझे मुखबिरी कबूल नहीं।”

“बहुत ढीठ है तू।” — अष्टेकर असहाय भाव से गर्दन हिलाता बोला — “निरा घौंचू है तू।”

लल्लू खामोश रहा।

“अच्छा, कोई ऐसी बात ही बता जो मुखबिरी का दर्जा न रखती हो!”

“वो क्या?”

“विलियम फ्रांसिस के कत्ल के बारे में तू क्या जानता है?”

“मेरी बात पर विश्‍वास कर लोगे?” — लल्लू बड़ी संजीदगी से बोला।

“हां, हां।” — लल्लू की संजीदा आवाज से अष्टेकर प्रभावित हुए बिना न रह सका — “क्यों नहीं?”

“तो सुनो, मैं अपने उस मरे हुए बाप की, जोकि तुम्हारे कहने के मुताबिक तुम्हारा यार था, कसम खाकर कहता हूं, अपनी मां की कसम खा कर कहता हूं, खुर्शीद की कसम खाकर कहता हूं कि विलियम के कत्ल के बारे में मुझे कुछ नहीं मालूम। मैं गणपति की कसम खाकर कहता हूं कि अगर मुझे कुछ मालूम होता तो मैं जरूर बताता।”

अष्टेकर कुछ क्षण खामोश बैठा अपलक लल्लू को देखता रहा और फिर बड़ी गम्भीरता से बोला — “मुझे तेरी बात पर विश्‍वास है, बेटा।”

कई क्षण कमरे में बड़ा बोझिल सन्नाटा छाया रहा।

फिर अष्टेकर उठ खड़ा हुआ। वह मेज के पहलू से घूमकर लल्लू के करीब पहुंचा। उसने अपनी जेब से एक लिफाफा निकाल कर लल्लू को दिखाया — “ये मेरी तेरे बारे में रिर्पोट है जिसे मैं पुलिस के उस असिस्टेंट कमिश्‍नर को भेजने वाला था जिसके अन्डर घाटकोपर थाना आता है। इस पर ए.सी.पी. का पता लिखा है, डाक टिकट लगी हुई है, बस इसे बम्बे में छोड़ना भर था मैंने। इत्तफाक से यहां आती बार इसे बम्बे में छोड़ना मैं भूल गया था। यह रिपोर्ट तेरे सारे कल-पुर्जे ढीले कर सकती है। यह रिपोर्ट तेरे खिलाफ सशस्त्र डैकती और हत्या की एक नयी तफ्तीश चालू करवा सकती है।”

लल्लू के गले की घन्टी जोर से उछली। उसने व्याकुल भाव से लिफाफे की तरफ देखा। एक बार पुलिस की तवज्जो उसकी तरफ जाने की देर थी, फिर दर्जनों चश्‍मदीद गवाह उसके खिलाफ पैदा हो सकते थे। टोनी की खातिर जब वह वापिस लौटा था तो तब तो वहां भीड़ जमा हो चुकी थी। और तब तो कई लोगों ने उसे देखा हो सकता था।

“मुझे नहीं पता” — अष्टेकर बोला — “तू क्यों टोनी से इतनी वफादारी दिखा रहा है। शायद इसलिए क्योंकि तुझे मालूम है कि तेरी जमानत के लिए दरकार रकम टोनी ने भरी है। लेकिन बावजूद ऐसे गलत आदमी के लिये वफादारी दिखाने के तू बहुत खुशकिस्मत है। तेरे को खुद नहीं मालूम तू कितना खुशकिस्मत है! कल्याण की डकैती में तेरे खिलाफ कोई तगड़ा केस नहीं। कोई अच्छा वकील तेरे खिलाफ उस केस की धज्जियां उड़ाने में कामयाब हो जाएगा। तू आजाद हो जाएगा। तू मुखबिर बने बिना भी आजाद हो जाएगा। लेकिन अगर तू तब भी टोनी का ही शागिर्द बना रहा तो यह आजादी महज चार दिन की होगी। हजारे, अगर तेरे में राई रत्ती भर भी अक्ल बाकी है तो आजाद होते ही अपनी छोकरी का हाथ थामना और मुम्बई से कहीं इतनी दूर निकल जाना कि टोनी को तेरी भनक भी न लग सके। समझा?”

लल्लू ने सहमति में सिर हिलाया। उसने व्याकुल भाव से अष्टेकर के हाथ में थमे लिफाफे की तरफ देखा।

अष्टेकर ने एक गहरी सांस ली। फिर उसने लिफाफे के पहले दो, फिर चार, फिर आठ और फिर सोलह टुकड़े किए और उन्हें लल्लू की गोद में डाल दिया।

“क्रिसमस मुबारक।” — अष्टेकर बोला।

लल्लू ने जोर से थूक निगली। उसका जी चाहा वह जोर-जोर से रोने लगे। उसने कृतज्ञ भाव से इन्स्पेक्टर की तरफ देखा।

लेकिन अष्टेकर तब तक उसकी तरफ से पीठ फेर चुका था और मेज पर पड़ी घण्टी बजा रहा था।

खुर्शीद ने मक्खियों से भिनभिनाते रिसैप्शन काउन्टर पर जाकर वहां रखे टेलीफोन पर अपने लिसे आयी काल रिसीव की।

फोन गुलफाम अली का था जो बड़े बौखलाहटभरे स्वर में उसे बता रहा था कि लल्लू की जमानत में अड़ंगा आन खड़ा हुआ था।

“कैसा अड़ंगा?” — खुर्शीद ने व्याकुल स्वर में पूछा।

“पुलिस को बताने का है कि तेरे पास जमानत के लिए रोकड़ा किदर से आयेला है!”

“वो तो तुम लोगों ने कहा था न कि मैं कह सकती हूं कि जेवर बेचकर...”

“बरोबर। लेकिन तेरे कू एक सर्टिफिकेट देने का है कि रोकड़ा तेरे पास जेवर बेचकर ही आयेला है।”

“कब?”

“अब्बी का अब्बी, नेई तो कल लल्लू कैसे छूटेंगा!”

“तो मैं कैसे...”

“वो टोनी सब इस्ट्रेट कियेला है पण तेरे कू इधर आना मांगता है।”

“इधर किधर?”

“वो अपने पास्कल का बार है न...”

“ठीक है। मैं बार में आती हूं।”

“अरे, बार में नहीं आने का है।”

“तो?”

“बारे के पीछू गली है?”

“हां।”

“उदर एक बन्द फाटक है। देखा?”

“देखा। लेकिन वो फाटक तो हमेशा बन्द रहता है!”

“आज खुला होयेंगा। उसको धक्का देने का है और भीतर आ जाने का है। भीतर आने से पहले आजू-बाजू देखने का है।”

“वहां कौन होगा?”

“अपुन होयेंगा। टोनी होयेंगा।”

“लेकिन वहीं क्यों आने का है?”

“क्योंकि वो सेफ ठीया है। उधर किसी को मालूम नेई होयेंगा कि तेरे कू टोनी से कोई मतलब।”

“अजीब बात है! बार में टोनी से बात करने में क्या आफत आ जायेगी?”

“जैसा बोलता है, वैसा कर खुर्शीद बेगम, इसी में... लल्लू का भला है।”

“टाइम कितना लगेगा?”

“बड़ी हद पांच मिनट। बस तेरे को वो सर्टिफिकेट और कुछ और पेपर ही तो साइन करने का है।”

“ठीक है। आती हूं।”

“अब्बी का अब्बी।”

“हां, हां। अभी।”

उसने रिसीवर रख दिया।

ड्राइंगरूम में एक सीढ़ी पर चढ़ा एंथोनी छत को छूते क्रिसमस ट्री को सजा रहा था। फर्श पर बैठा मिकी सजावट के साजोसामान को इधर-उधर उछालने में व्यस्त था। मोनिका नीचे सीढ़ी थामे खड़ी थी।

एंथोनी को घर का वह माहौल बहुत पसन्द आ रहा था। ऐसी क्रिसमस उसकी अपनी जिन्दगी में पहले कभी नहीं आयी थी।

पता नहीं वह त्यौहार का असर था या एंथोनी की फ्लैट से एक हफ्ते की गैरहाजिरी का, लेकिन तब मोनिका भी वैसे मूड में थी जैसे में वह उसे देखना चाहता था।

वह सीढ़ी से उतरने लगा तो एकाएक उनकी घायल टांग पर ज्यादा जोर पड़ा गया। वह लड़खड़ाया और सम्भला तो उसने अपने आपको मोनिका की बांहों में पाया।

उसने कस कर एंथोनी को अपने आगोश में जकड़ लिया।

एंथोनी ने उसके होंठों पर एक चुम्बन जड़ा और फिर उसके कान में बोला — “मैरी क्रिसमस।”

“मैरी क्रिसमस।” — मोनिका बोली।

गली में घुप्पा अन्धेरा था।

खुर्शीद ने झिझकते हुए गली में कदम रखा।

जिस फाटक का टेलीफोन पर गुलफाम ने जिक्र किया था, वह उसने कई बार देखा था लेकिन उसे मालूम नहीं था कि उस फाटक के पीछे क्या था। देखने में वह गैरेज का दरवाजा लगता था।

वह फाटक के सामने पहुंची। उसने दाये-बायें निगाह दौड़ाई। कहीं कोई नहीं था। गली में मुकम्मल सन्नाटा था।

झिझकते हुए उसने हौले से दरवाजे को धक्का दिया।

दरवाजा निशब्द खुल गया।

भीतर भी गहरा अन्धेरा था।

वह कितनी ही देर आंखें फाड़-फाड़कर देखती रही तो उसने पाया कि वह गैरेज नहीं, बेसमेंट को जाता एक ढलुवां रास्ता था।

“टोनी!” — उसने आवाज लगायी — “गुलफाम!”

कोई उत्तर न मिला।

डरते झिझकते उसने आगे कदम बढ़ाया।

अजीब जगह थी। कोई रोशनी नहीं। कोई आवाज नहीं।

टोनी और गुलफाम वहां थे तो कहां थे!

ढलुवां रास्ता अभी उसने आधा ही पार किया था कि उसकी हिम्मत दगा दे गई। वह वापिस लौटने को घूमी।

तभी एक मजबूत हाथ उसके मुंह पर पड़ा। हाथ ने उसका चीखने को तत्पर मुंह दबोच लिया और उसे यूं ऊपर को उमेठा कि उसका गला तन गया।
 
वह बुरी तरह छटपटाने और हाथ पांव मारने लगी।

फिर तना हुआ गला एकाएक ढ़ीला पड़ गया।

एक क्षण के लिए उसे अपने कटे गले से भल-भल करते खून का अहसास हुआ और फिर उसका निश्‍चेष्ट शरीर आक्रमणकारी की बांहों में झूल गया।

दस बजे लल्लू जेल से बाहर निकला।

उसने चारों तरफ निगाह दौड़ायी।

खुर्शीद उसे कहीं दिखाई न दी।

उसके साथ और भी कैदी सजा मुकम्मल करके या उसकी तरह जमानत पर छूटे थे और उन्हें लेने आये अपने रिश्‍तेदारों से गले लग-लगकर मिल रहे थे। उस घड़ी वहां लल्लू ही इकलौता शख्स था जिसे कोई लेने नहीं आया हुआ था।

लेकिन खुर्शीद ने आना था — मन ही मन उसने अपने आप को तसल्ली दी — वो कहीं बस के चक्कर में अटक गई होगी। उसने न आना होता तो वो सन्देशा क्यों भिजवाती कि वो उसे लेने आएगी।

जेल के बड़े फाटक के करीब ही बस स्टैंड था।

वह बस स्टैंड पर जाकर बैठ गया।

जो भी बस वहां पहुंचती थी, वह बड़ी आशापूर्ण निगाह से उचककर उसकी तरफ देखता था लेकिन बस से उतरे मुसाफिर में जब वह खुर्शीद को नहीं पाता था तो मायूस हो जाता था।

बारह बज गए।

लल्लू अब मायूस होने की जगह आशंकित होने लगा।

क्यों नहीं आयी थी खुर्शीद! कहीं रास्ते में कोई एक्सीडेंट तो नहीं हो गया था! क्या पता वो बस की जगह टैक्सी पर आ रही हो और टैक्सी वाले ने टैक्सी कहीं मार दी हो!

खुर्शीद के किसी अनिष्ट की कल्पना से उसका दिल लरजने लगा।

अब उसे वहां खुर्शीद का इन्तजार बेमानी लगने लगा।

वह धारावी जाने वाली बस में सवार हो गया।

खार के इलाके में वो एक छोटा सा मकान था जिसके सामने अष्टेकर ने जीप रोकी। जीप से निकल‍कर उसने काल बैल बजाई और फिर दरवाजे से परे हटकर खड़ा हो गया।

उसके हाथ में एक बड़ा सा पैकेट था जिसे बेध्यानी में उलटता पलटता वह दरवाजा खुलने की प्रतीक्षा करने लगा।

उसके दिल की धड़कन एकाएक तेज हो गई थी और वह बार-बार बेचैनी से पहलू बदलने लगा था।

यह दोबारा घण्टी बजाने की सोच ही रहा था कि एकाएक दरवाजा खुला और एक महिला बाहर निकली। आयु में वह पचास के पेटे में पहुंची हुई थी लेकिन उसके जिस्म या सूरत से उम्रदराजी के कोई आसार नहीं झलकते थे।

अष्टेकर को देखकर महिला के चेहरे पर फौरन चमक आई। उसकी आंखों में ऐसा भाव झलका जैसे उसे अष्टेकर के आगमन से सख्त हैरानी हो रही हो।

“हल्लो, मार्था!” — अष्टेकर मुस्कराता बोला।

“हल्लो।” — महिला के मुंह से निकला।

“मैरी क्रिसमस।” — अष्टेकर बोला।

“मार्था!” — तभी भीतर से कोई दहाड़ा — “कौन है बाहर! फिर तेरा कोई यार आ गया तुझे मैरी क्रिसमस विश करने! डर्टी बिच, इतना ही काफी नहीं था कि खुद यारों के पास जाती थी, अब यारों को घर बुलाने लगी!”

“कौन है?” — अष्टेकर दबे स्वर में बोला।

“मेरा हसबैंड!” — मार्था अवसादपूर्ण स्वर में बोली।

“ये तेरे से ऐसी जुबान बोलता है?”

“हां।”

“हमेशा?”

“हां। जब से अपाहिज हुआ है, व्हीलचेयर के हवाले हुआ है।”

“अपाहिज! कब से?”

“शुरू से ही। शादी के एक महीने बाद से ही।”

“मार्था!” — अष्टेकर दहशतनाक स्वर में बोला — “तूने सारी जिन्दगी एक अपाहिज के साथ काटी!”

“हां।”

“और मुझे खबर तक नहीं!”

“कैसे होती! मेरे घर में पहले कभी आये हो?”

“मुझे तो पता भी नहीं था कि तुम्हारा घर कहां है! पता लगा तो इसलिए क्योंकि यह विलियम का भी घर था।”

“आज कैसे आ गये?”

“मार्था!” — मर्दाना दहाड़ फिर सुनाई दी — “यू बिच! यू डर्टी बिच! बाहर क्या कर रही है? किससे बातें कर रही है?”

“जैक!” — मार्था याचनापूर्ण स्वर में बोली — “प्लीज, बी क्वाइट।”

“ठहर जा बी क्वाइट की बच्ची!”

पीछे एक दरवाजा भड़ाक से खुला और व्हीलचेयर लुढ़काता एक आदमी बरामदे में प्रकट हुआ। वो आदमी इतना खस्ताहाल था कि हैरानी होती थी कि जिन्दा था।

“बाहर क्यों निकल आए?” — मार्था बोली — “बाहर ठण्डी हवा चल रही है। भीतर जाओ।”

“ताकि तू यहां मस्ती मार सके। साली, तू क्या समझती है कि मैं तेरी करतूतों को जानता नहीं! समझता नहीं! कमीनी, क्रिसमस पर तो अपनी बेहयाई छोड़ देती!”

“तुम्हें ठंड लग जाएगी।”

“तो क्या होगा? निमोनिया हो जाएगा। मैं मर जाऊंगा। यही तो तू चाहती है। अब यार चौखट तक आया है, फिर बैडरूम तक आयेगा और...”

मार्था उसके पास पहुंची, उसने उसकी व्हीलचेयर घुमायी और उसे वापिस भीतर धकेल कर दरवाजा बाहर से बन्द कर दिया।

वह वापिस लौटी।

भीतर उसका पति पूर्ववत् चिल्लाता रहा, गालियां बकता रहा और दरवाजा पीटता रहा।

“यह” — अष्टेकर ने कहना चाहा — “यह...”

“अभी खामोश हो जाएगा।” — मार्था बोली — “चीखने-चिल्लाने और दरवाजा पीटने के लिए भी दमखम चाहिये जोकि उसमें नहीं है।”

“ओह!”

फिर सच ही भीतर से आवाजें आनी बन्द हो गईं।

मार्था फिर अष्टेकर की तरफ घूमी।

“और क्या हाल है?” — अष्टेकर ने निरर्थक सा सवाल किया।

“और हाल भी वही है जो तुमने अभी देखा। कितनी खुशकिस्मत हूं मैं कि अपने देवता सामान पति की छत्रछाया में स्वर्ग में रह रही हूं।”

“यह अपाहिज कैसे हो गया?”

“एक्सीडेंट हो गया था।”

“ओह!”

“ज्यादा इसलिए कलपता है कि हसबैंड का रोल निभाने के काबिल नहीं रहा। औलाद पैदा करने के काबिल नहीं रहा।”

“लेकिन विलियम... विलियम...”

“वो उसकी औलाद नहीं। विलियम तुम्हारा बेटा है। तुम्हें मालूम है।”

“मैं पूछना चाहता था कि उसे... उसे मालूम है?”

“यकीनन नहीं मालूम लेकिन शक करता है कि विलियम उसकी औलाद नहीं।”

“ओह!”

“लेकिन फिर भी विलियम की मौत का अफसोस बहुत है उसे। इस घर में जो खुशहाली आयी, वो विलियम के लाए आयी। मेरे हसबैंड के नाकारा होने के बावजूद घर में चूल्हा जलता है — और आगे जलता रहेगा — तो विलियम की वजह से। और बातों से वह कितना ही नावाकिफ हो लेकिन इस एक बात से मेरा हसबैंड पूरी तरह से वाकिफ है। जिसके वो अपनी औलाद होने पर शक करता है, उसी के सदके वो रोज विस्की पीता है, रोज मुर्गा चबाता है और रोज उसी बच्चे की मां को बिच कहता है।”
 
वह एक क्षण ठिठकी और बोली — “तीस साल से मैं एक विधवा की जिन्दगी जी रही हूं। तीस साल में एक बार भी, भूलकर भी, मैंने किसी गैरमर्द का खयाल नहीं किया। तुम्हारा भी नहीं। अपने बच्चे के बाप का भी नहीं। तीस साल इस अपाहिज की सेवा करते मैंने अपनी जवानी गला दी। और यह आदमी मुझे बिच कहता है, रण्डी कहता है। तीस साल में तीस हजार बार मेरे मन में खयाल आया कि मैं अपने इस हरामजादे पति के मुंह पर दो झांपड़ रसीद करूं और यहां से चली जाऊं लेकिन मैंने ऐसा नहीं किया। विलियम की खातिर मैंने ऐसा नहीं किया। मुझे अपने बच्चे के लिए एक बाप चाहिए था, चाहे वो एक अपाहिज और नाकारा बाप ही क्यों न हो! लेकिन अब” — वह रोने लगी — “अब तो वो बच्चा ही नहीं रहा जिसके लिए मुझे बाप चाहिए था।”

“फिर भी तू इस शख्स के साथ रह रही है जो तुझे इतना जलील करता है?”

“हां।”

“क्यों?”

“क्योंकि अगर ये न हो तो जिस घर में विलियम मुझे मम्मी-मम्मी कहता फिरता था वो मुझे एक ऐसा तारीक मकबरा लगने लगेगा जिसमें उसकी दीवारों से सिर टकराने से ही मुझे कोई आवाज सुनाई दे सकेगी। यह चीखता-चिल्लाता है, मुझे गालियां देता है तो कम से कम यह घर मकबरा तो नहीं लगता! यहां जिन्दगी का अहसास तो होता है! इसकी खिदमत में मुझे कुछ करने को तो दिखाई देता है! यह भी न हो तो क्या करूं? दीवारों से माथा फोडूं? कम्पनी के लिए तनहा लोग बिल्लियों, कुत्तों, तोतों में रुचि लेते हैं। उन्हें बिल्ली के गुर्राने में, कुत्ते के भौंकने में, तोते की टांय-टांय में कम्पनी का अहसास होता है, मुझे अपने हसबैंड की गालियां और फटकार सुनने में कम्पनी का अहसास होता है।”

“तू ठीक कह रही है।” — अष्टेकर खुद अपनी तनहा जिन्दगी के बारे में सोचता बोला।

“उनत्तीस साल में यह पहला क्रिसमस का दिन है जबकि इस घर में क्रिसमस ट्री नहीं आया। क्योंकि वह ट्री मेरा बेटा लाता था। मेरा बेटा लाता था।”

वह फूट-फूटकर रोने लगी।

“मार्था!” — अष्टेकर उसका कन्धा दबाता बोला — “हौसला रख।”

“हां।” — वह सुबकती हुई बोली — “हौसला ही रखना होगा। और मैं कर भी क्या सकती हूं!” — उसने अपने रुदन पर काबू पाया और एक आह भरी — “कितना खूबसूरत था मेरा बेटा! लम्बा ऊंचा जवांमर्द। जैक भी, जो उसके अपनी औलाद होने पर शक करता था, उसकी पर्सनैलिटी की तारीफ किया करता था। कितना खूबसूरत बेटा दिया था तुमने मुझे!”

“खूबसूरती उसने तुम्हारी पायी थी। मेरे पर गया होता तो मेरे जैसा ही बद्सूरत होता।”

“तुम बद्सूरत हो?”

“यह कोई पूछने की बात है!”

“मुझे तुम दुनिया से सबसे हसीन आदमी लगते थे। तीस साल पहले तुम्हारी आंखों में मुझे जो प्यार मुहब्बत का सैलाब दिखाई दिया था, वो मैंने आज तक कभी किसी की आंखों में नहीं देखा। एक बात जानते हो?”

“क्या?”

“तुम्हारी बीवी बनने की मेरे मन में बहुत ख्वाहिश थी लेकिन उससे भी ज्यादा ख्वाहिश मेरे मन में तुम्हारे बच्चे की मां बनने की थी। अपनी पहली ख्वाहिश पर मेरा जोर नहीं चला लेकिन दूसरी मैंने जबरन पूरी कर ली। मैं तुम्हारे बच्चे की मां बन गयी। अपने पति के घर तुम्हारा बच्चा मैं अपने पेट में लेकर गई थी। कितना बड़ा धोखा था यह उस मर्द के साथ जिससे मैं शादी कर रही थी। लेकिन इसका मुझे रत्ती भर मलाल न तब था, न आज है।”

अष्टेकर खामोश रहा।

“मेरी सारी जिन्दगी की कमाई किसी हत्यारे ने लूट ली। आज मैं कंगाल हो गयी। आज क्रिसमस का त्योहार है लेकिन मेरे लिए सान्ता क्लास की झोली भी खाली है। वो भी मेरा बेटा मुझे वापिस नहीं लौटा सकता।”

उसकी आंखों से आंसुओं के धारे फिर बह निकले।

“मैं” — अष्टेकर ने उसे रोने दिया, वह धीरे से बोला — “विलियम के हत्यारे को ढ़ूंढ़कर रहूंगा। मैं जब तक उसे ढ़ूंढ़ नहीं लूंगा, चैन की सांस नहीं लूंगा। मैं अपने बेटे के कातिल को फांसी पर लटकवा कर रहूंगा।”

“उससे विलियम तो नहीं लौट आयेगा!”

“वो घर में कोई ऐसी बात करता था जिससे अन्दाजा हो सके कि कौन उसका कातिल हो सकता है?”

“नहीं। घर में वो इतना रहता कहां था! मानिका से शादी के बाद तो यहां उसका आना-जाना भी बहुत घट गया था। कभी आता था तो हमें रुपया-पैसा देने आता था या पूछने आता था कि हमें कोई तकलीफ तो नहीं थी, किसी चीज की जरूरत तो नहीं थी!”

“तेरा पति उसके सामने भी तेरे साथ यूं ही पेश आता था?”

“नहीं। विलियम में ऐसी कोई बात थी जिसकी वजह से उसके सामने मेरे पति की कोई बद्जुबानी करने की मजाल नहीं होती थी।”

“वो जानता था कि मैं... मैं...”

“नहीं।”

“उसकी बीवी उसके हत्यारे के बारे में कुछ जानती हो सकती है?”

“मैं क्या कह सकती हूं!”

“मोनिका काफी कुछ जानती हो सकती है लेकिन जुबान नहीं खोलती।”

“क्यों?”

“क्योंकि वो एंथोनी फ्रांकोजा नाम के एक गैंगस्टर के काबू में आयी हुई है। एंथोनी का उस पर ऐसा प्रभाव है कि वो इस बाबत कोई बात नहीं करना चाहती, कोई बात नहीं सुनना चाहती।”

“तो?”

“मार्था, तू एक काम कर।”

“क्या?”

“तू मोनिका को हकीकत बता दे। तू उसे बता दे कि विलियम मेरा बेटा था। तब शायद मोनिका का रवैया बदल जाये।”

“यह बात उसे तुम ही क्यों न बता देते?”

“मैं बता सकता हूं लेकिन वो मेरी बात पर विश्‍वास नहीं करेगी। वो इसे भी एक पुलिसवाले की चाल समझेगी।”

“मैं उसे यह बात कहूंगी तो वो मेरे बारे में क्या सोचेगी?”

“बहुत बुरा सोचेगी। लेकिन यह काम करना जरूरी है। एक मिशन की खातिर यह काम करना जरूरी है।”

“ठीक है। मैं मोनिका के पास जाऊंगी।” — वह एक क्षण ठिठकी, फिर उसके होंठों पर एक फीकी-सी मुस्कराहट आयी — “अपना पोता देखा?”

“देखा।” — अष्टेकर की आवाज भर्रा गयी — “और यह सोचकर बहुत फख्र महसूस किया मैंने कि वो मेरा खून है।”

“कितना खूबसूरत है! उसकी उम्र में विलियम भी बिल्कुल वैसा ही लगता था।”

“इसीलिए तो मैं और भी चाहता हूं कि तू मोनिका को हकीकत बता दे। बेटे से तो यह सुख हासिल हुआ नहीं, कम से कम पोता तो गोद में खिला लूं।”

“क्यों?” — मार्था सकपकाई — “तुम्हारे अपने बच्चे...”

“कौन से बच्चे?”

“बच्चे नहीं हुए?”

“कहां से होते? शादी किसने की?”

“क्या!” — मार्था हक्की-बक्की सी उसका मुंह देखने लगी।

“मेरे पास तो” — अष्टेकर के होंठों पर एक विषादपूर्ण मुस्कराहट आयी — “कोई बिल्ली भी नहीं, कोई कुत्ता भी नहीं, कोई तोता भी नहीं।”

“तुमने शादी नहीं बनायी?”

“नहीं।”

“क्यों?”

“क्योंकि तेरे से शादी न बनाकर मैंने बुजदिली दिखाई थी, मैं चाहता था कि मुझे उसकी सजा मिले।”

“यह तो बहुत बड़ी सजा है!”

“मेरा गुनाह भी तो बहुत बड़ा था!”
 
वह एक क्षण खामोश रही, फिर बड़े अनुरागपूर्ण स्वर में बोली — “मैंने कितना ठीक पहचाना था तुम्हें! तुम वाकई दुनिया के सबसे हसीन, सब से शानदार आदमी हो।”

“मैं” — हाथ में थमा बड़ा सा पैकेट मार्था के सामने करता हुआ बोला — “क्रिसमस का प्रेजेन्ट लाया था।”

“किस के लिए?” — मार्था बोली।

“तेरे लिए। मोनिका के लिए। मिकी के लिए। इसमें तीन पैकेट हैं। तीनों पर तीन नाम लिखे हैं।”

मार्था ने पैकेट ले लिया। उसने उसे खोलने का उपक्रम किया।

“मेरे सामने न खोल।” — अष्टेकर जल्दी से बोला।

“क्यों?”

“मुझे ऐसी खरीदारी करनी नहीं आती। मुमकिन है प्रेजेन्ट तुम्हें पसन्द न आये।”

“ऐसा कहीं हो सकता है!”

“फिर भी!”

“ठीक है। मैं मोनिका और मिकी का प्रेजेन्ट लेकर उनके पास जाऊंगी। तभी मैं उसे तुम्हारी और अपनी असलियत भी बता कर आऊंगी।”

“ठीक है। मैरी क्रिसमस।”

लल्लू घर पहुंचा तो उसकी मां और दादी उससे लिपट कर मिलीं।

“मां” — लल्लू ने पूछा — “तुझे मालूम था आज मैं घर आ रहा हूं?”

“हां।” — मां बोली — “खुर्शीद ने बताया जो था! वो आज तुझे लेने भी गई होगी! तू उसी के साथ आया है न?”

“नहीं। खुर्शीद वहां नहीं पहुंची थी।”

“कोई काम पड़ गया होगा। वर्ना वो रुकने वाली नहीं थी। बेटा, वो लड़की तो कोई देवी है। कितना कुछ किया उसने तेरे लिये! हमारे लिये! जानता है, दिन में दो बार आती थी यहां हमारा हालचाल पूछने। कहती थी जब तक लल्लू नहीं है, हम उसे ही अपना बेटा जानें।”

“अच्छा!” — लल्लू भी भावुक हुए बिना न रह सका — “ऐसा बोली वो?”

“हां। और सुन।”

“क्या।”

“तेरी दादी बोलती है, अगर तू उस लड़की के अलावा किसी और लड़की से शादी बनाकर उसे इस घर में लाया तो वह उसे झाड़ू से पीट-पीटकर घर से निकाल देगी।”

“क्या!” — लल्लू हैरानी से बोला।

“हां। और मैं भी यही बोलती हूं।”

“मां, तुझे मुसलमान बहू कबूल है?”

“तेरी मां क्या पागल है जो इसलिये इतनी देवी समान बहू कबूल न करे क्योंकि वो मुसलमान है!”

“ओह, मां।” — लल्लू बोला और फिर बच्चों की तरह अपनी मां के साथ लिपट गया।

अपने पोपले मुंह के साथ उसकी दादी मंद-मंद मुस्करा रही थी।

लल्लू खुर्शीद के घर पहुंचा।

खुर्शीद की मां उससे निहायत बद्तमीजी से पेश आई लेकिन गमीनत थी कि जब उसने लल्लू को यह बताया कि उसने खुर्शीद को घर से निकाल दिया था तो यह भी बताया कि खुर्शीद कहां हो सकती थी।

वह पालवाड़ी पहुंचा।

वहां न्यू स्टार होटल में जाकर उसने खुर्शीद के बारे में पूछा।

मालूम हुआ वो अपने कमरे में नहीं थी।

“कहां गयी?” — लल्लू के मुंह से निकला।

“मालूम नहीं।” — रिसैप्शन पर बैठे नाक कुरेदते बूढ़े ने बताया — “कल रात उसका एक फोन आया था। वह फोन सुनते ही वो यहां से चली गई थी और अभी तक नहीं लौटी।”

“कहां चली गई थी?”

“पता नहीं।”

“फोन किसका था?”

“मालूम नहीं।”

“फोन करने वाले ने अपना नाम नहीं बताया था?”

“नहीं। वो बस इतना बोला कि खुर्शीद से बात करने का था।”

“खुर्शीद ने इधर ही आकर फोन सुना होगा!”

“हां। इधर एक ही तो फोन है!”

“तुम ने बातचीत सुनी होगी!”

“कैसे सुनी होगी? जो बात हो रही थी, वो तो बाई सुन रही थी। चोंगा कान से लगा कर।”

“अरे, बाई की तरफ वाली बात तो सुनी होगी, बाप!”

“हां। पण अपुन का उधर ध्यान नहीं था।”

“कुछ तो सुना होगा!”

“हां। कुछ तो सुना था!”

“क्या?”

“वो किसी बार में जाने कू बोल रही थी। किसी बन्द फाटक का भी नाम लिया था।”

बार! बन्द फाटक! यह तो अड्डे का जिक्र था! खुर्शीद का अड्डे पर क्या काम!

“और उसने किसी टोनी का भी नाम लिया था।” — बूढ़ा बोला।

टोनी! बार! बन्द फाटक!

वह फौरन पास्कल के बार में पहुंचा।

“नहीं” — पास्कल ने बताया — “खुर्शीद इधर नहीं आयी कल। वो तो एक हफ्ते से इधर नहीं आयी।”

“टोनी! गुलफाम!” — लल्लू ने पूछा।

“वो दोनों भी एक हफ्ते से यहां नहीं आये।”

वह बार से बाहर निकलकर पिछवाड़े में पहुंचा।

पिछवाड़े का फाटक, जो हमेशा बन्द रहता था, खुला था।

वह भीतर पहुंचा।

अड्डे का हमेशा बन्द रहने वाला दरवाजा भी खुला था।

वह भीतर दाखिल हुआ।

खाली अड्डा भां-भां कर रहा था। वहां कोई कीमती साजो-सामान होना तो दूर, कोई छोटा-मोटा स्टूल, गिलास या खाली बोतल जैसा सामान तक न था।

फोन की घंटी ऐन एंथोनी के सिरहाने बजी लेकिन उसने फोन न उठाया। उसने मोनिका को आवाज दी।

“गुलफाम के अलावा किसी का भी फोन हो” — वह बोला — “कह देना मैं घर पर नहीं हूं। लल्लू का फोन हो तो कह देना तुम्हें यह भी नहीं पता कि मैं कहां गया हूं और कब लौटूंगा!”

मोनिका ने सहमति में सिर हिलाते हुए फोन उठाया। फोन लल्लू का था। उसने उसे कहा कि एक हफ्ते से उसने टोनी की सूरत नहीं देखी थी और फोन बन्द कर दिया।

शाम को चार बजे अष्टेकर धारावी के काला किला के नाम से जाने जाने वाले उस इलाके में पहुंचा जहां एक मर्सिडीज कार सड़क पर लावारिस खड़ी पायी गई थी। कार की पिछली सीट पर एक गला कटी जनाना लाश पड़ी बताई गई थी जिसकी वजह से अष्टेकर ने खुद वहां जाना जरूरी समझा था।

वह घटनास्थल पर पहुंचा तो उसने पाया कि कुछ पुलिसिए पहले से ही मर्सिडीज को घेरे खड़े थे। उनमें से अधिकतर पुलिसिये उसके थाने के नहीं थे। उनमें से एक सब-इन्स्पेक्टर को वह पहचानता था। वह घाटकोपर थाने का था।

“तुम लोग यहां कैसे?” — उसने सब-इन्स्पेक्टर से पूछा।

“मर्सिडीज की वजह से।” — सब-इन्स्पेक्टर बोला — “यह वही गाड़ी है जो पिछले हफ्ते घाटकोपर के बैंक की डकैती में इस्तेमाल की गई थी।”

“पक्की बात?”

“जी हां। गाड़ी की कई तरीकों से शिनाख्त की जा चुकी है।”

“इस पर कोई फिंगरप्रिंट्स वगैरह मिले?”

“न। साफ जाहिर होता है कि कार को यहां लाकर खड़ी करने के बाद बड़े यत्न से झाड़ पोंछ दिया गया था।”

“लाश किसकी है?”

“पता नहीं। जनाना लाश है। हमारा उससे कोई वास्ता नहीं।”

“मौत कैसे हुई?”

“गला कटने से। किसी ने उस्तुरे से बेचारी का गला रेत दिया। गला बड़ी दक्षता से एक ही बार वार करके एक कान से दूसरे कान तक काटा गया है।”

“उस्तुरे से?”

“जी हां। दूसरी बात यह है कि गला मर्सिडीज में नहीं काटा गया था। गला काटने से जो बेतहाशा खून बहता है, वो मर्सिडीज में नहीं दिखाई दे रहा। लगता है लड़की का कत्ल कहीं और किया गया था और फिर लाश को मर्सिडीज में डालकर मर्सिडीज यहां छोड़ दी गई थी।”

“हूं।”

“आप लाश को देखिए। शायद मरने वाली को आप पहचानते हों!”

अष्टेकर ने कार के भीतर झांका तो उसका मन वितृष्णा और अवसाद से भर उठा।

वह मरने वाली को शायद क्या, निश्‍चित रूप से पहचानता था। वह अभी मुश्‍किल से चौबीस घण्टे पहले उससे मिला था।

वह खुर्शीद की लाश थी।

एंथोनी शीशे के सामने खड़ा अपनी टाई ठीक कर रहा था।

अपने मां-बाप के पास खंडाला वह जब भी जाता था, पूरी सजधज के साथ जाता था।

“जाना जरूरी है?” — मोनिका ने पूछा।

“हां।” — एंथोनी बोला — “क्रिसमस वाले रोज मेरे मां-बाप को मेरे आने की पूरी उम्मीद होती है। मैं उनकी उम्मीद तोड़ना नहीं चाहता। और फिर अभी जब उनकी शादी की वर्षगांठ पर गया था तो वादा करके आया था कि क्रिसमस पर जरूर आऊंगा।”

“ओह!”

“लेकिन यह आखिरी मौका होगा जब मैं अपने मां-बाप के घर अकेला जाऊंगा। आगे से मैं जब भी वहां जाऊंगा, तेरे को और मिकी को साथ लेकर जाऊंगा।”

“अपने मां-बाप को क्या बताओगे हमारे बारे में?”

“यही कि तुम मेरी बीवी हो, मिकी मेरा बेटा है।”

“मां-बाप सवाल नहीं करेंगे?”

“तेरे बारे में?”

“मिकी के बारे।”

“नहीं करेंगे। क्योंकि वो जानते हैं कि मेरे किसी काम पर सवाल करने या उसमें दखल देने में उन्हीं का घाटा है। मेरी वजह से वो लोग राजा बने बैठे हैं और ऐश कर रहे हैं। वो अपनी ऐश को खतरे में डालना पसन्द नहीं करेंगे।”

“ओह!”

“वापिस आकर मेरे को तेरे से शादी बनाने का है।”

“इतनी जल्दी नहीं।”

“क्यों?” — एंथोनी के माथे पर बल पड़ गए।

“विलियम को मरे अभी सिर्फ तीन महीने हुए हैं। लोग क्या कहेंगे?”

लोगों के लिए एंथोनी के मुंह से एक भद्दी गाली निकली।

“शादी के लिए अभी इंतजार करना जरूरी है।” — मोनिका बोली — “इससे विलियम की मां का बहुत दिल टूटेगा। जरा सोचो, उसका जवान बेटा मर गया और उसकी विधवा ने उसकी कब्र की मिट्टी सूखने से पहले शादी कर ली, कितना गलत काम लगेगा यह!”

“बुढ़िया को कौन सी तेरी चाह या परवाह है? होती तो वह कभी तेरे से मिलने न आती? या तुझे न बुलाती?”

“वो आज शाम को आ रही है? उसने फोन पर कहा था कि वह मेरे लिए और मिकी के लिए क्रिसमस का कोई प्रेजेन्ट लेकर आ रही थी।”

“हूं। ठीक है। शादी के बारे में तो तेरी मैं खातिर बोला कि कहीं तू यह न कहे कि...”

“मैं कुछ नहीं कहती।”

“फिर ठीक है। एक बात और।”

“क्या?“

“मेरे कू ये शहर छोड़ देने का है। तेरे कू कोई एतराज?”

“एतराज क्या, यह तो बहुत अच्छी बात है! मुम्बई से दूर जाकर तो हम जब चाहें शादी कर सकते हैं!”

“बढ़िया। मैं जरा खंडाला से लौट आऊं, फिर एकाध दिन में ही मुम्बई को हमेशा के लिए छोड़ देंगे।”

“जाएंगे कहां?”

“गोवा या बंगलौर।”

“ठीक है। मुझे दोनों जगह पसन्द हैं।”

“मुझे वो पसन्द है” — एंथोनी उसे अपनी बांहों में भरता बोला — “जो तेरे कू पसन्द है।”

अष्टेकर कोलीवाड़े में लिच्छवी की चाल के सामने खड़ा था और सोच रहा था कि वो किन शब्दों में जाकर लल्लू को खुर्शीद की मौत की खबर सुनाये। वह सोच रहा था कि वह खबर सुनकर लल्लू पागल हो जाएगा या मर कर गिर पड़ेगा!

फिर वह आगे बढ़ा और भारी कदमों से चाल की सीढ़ियां चढ़ने लगा।

लल्लू की खोली का दरवाजा खुला था। भीतर लल्लू, उसकी मां, और दादी, तीनों मौजूद थे।

अष्टेकर को देखते ही लल्लू की मां के हवास उड़ गए। वह एकाएक उठी और लल्लू के सामने यूं बांहें पसार कर खड़ी हो गयी जैसे उतने से ही लल्लू का विशाल शरीर उसके पीछे छुप गया हो।

“तू फिर आ गया!” — वह आतंकित भाव से बोली — “अब क्या किया है मेरे बेटे ने? अब तो वो चुपचाप घर बैठा है! अब क्या...”

“तेरे बेटे ने कुछ नहीं किया, ताई।”

“तो फिर तू फिर क्यों आ गया है? जब उसने कुछ नहीं किया है तो फिर क्यों आ गया है उसे गिरफ्तार करने?”

“मैं उसे गिरफ्तार करने नहीं आया।”

“तो फिर क्यों आया है?”

“मैं उस से बात करने आया हूं।”

“कौन सी बात?”

“बात तेरे सुनने के काबिल नहीं। हजारे, इधर आ। मैंने तेरे से खुर्शीद की कोई बात करनी है।”

“खुर्शीद की बात!” — लल्लू सशंक स्वर में बोला।

“हां। बाहर आ।”

अपनी मां की ओट से निकलकर लल्लू बाहर गलियारे में आया।

अष्टेकर उसे बांह से पकड़कर उसकी खोली के दरवाजे से परे लाया और बोला — “खुर्शीद मर गयी, बेटा।”

“मर गयी!” — लल्लू भौंचक्का सा बोला — “कैसे मर गयी?”

“किसी ने उसका गला रेत दिया। ऐन विलियम की तरह। नागप्पा की तरह। वीरू तारदेव की तरह।”

“गला रेत दिया!” — लल्लू होंठों में बुदबुदाया। एकाएक उसकी टांगें थरथराने लगीं। उसकी पीठ दीवार से न जा लगी होती तो वह जरूर गलियारे के फर्श पर ढेर हो जाता। फिर उसकी आंखों से आंसुओं की गंगा-जमुना बह निकली। वो कातर भाव से बोला — “वो मर गयी। मेरे होते मर गयी।”

“उसे किसने मारा होगा?” — अष्टेकर ने पूछा — “तेरे को कुछ मालूम? टोनी या गुलफाम में से कोई...”

लेकिन लल्लू उसकी बात नहीं सुन रहा था। वह रोता हुआ, मुट्ठियां भींचे सीढ़ियों की तरफ लपका।

“अरे सुन, हजारे, कहां जा रहा है?”

लेकिन लल्लू कुछ नहीं सुन रहा था। उसे खुद नहीं पता था कि वो कहां जा रहा था। वह तो विक्षिप्तों की तरह जार-जार रोता नीचे सड़क पर भागा जा रहा था।

लक्ष्मीबाग के एक दारू के अड्डे पर गुलफाम अकेला बैठा दारू पी रहा था जब कि एंथोनी वहां पहुंचा।

गुलफाम ने उसे देखकर सहमति में सिर हिलाया। एंथोनी उसकी बगल में एक कुर्सी पर बैठ गया।

“लाश बरामद हो गयी है।” — एंथोनी धीरे से बोला।

“मालूम।” — गुलफाम लापरवाही से बोला — “तो क्या हुआ?”

“उलटी न पड़ जाये!”

“कैसे पड़ जायेंगी। अब तो सब सीधी ही सीधी पड़ने का है। बस एक शिकार और। उसके बाद मुंह फाड़ने को कोई मुंह नहीं बचा होयेंगा। अड्डा पहले ही खाली है। माल पहले ही ठिकाने है। और भी अच्छा हुआ कि वो छोकरा अपना हिस्सा छोड़ के गया। उसके खल्लास होने के बाद साल की छुट्टी। तू गोवा...”

“या बंगलौर।”

“कहीं भी। और अपुन हैदराबाद। क्या वान्दा है?”

“कोई वान्दा नहीं।”

“क्रिसमस मुबारक।”

“तेरे कू भी।”
 
एंथोनी उठा और बाहर आकर अपनी फियेट में सवार हो गया।

लल्लू तब तक दिशाहीन भागता चला गया जब तक कि उसकी टांगों ने जवाब न दे दिया।

जब वह रुका तो उसने अपने आपको समुद्र के किनारे खड़ा पाया।

उसने आसपास निगाह दौड़ाई तो पाया वह वो जगह थी जहां वह पहली बार खुर्शीद के साथ सैर करने निकला था तो पहुंचा था।

‘तेरे के लिए किचू, तेरे लिए’ — उसके कान में खुर्शीद की मदभरी, जज्बाती, संजीदा आवाज गूंजी — ‘पैसे के लिये नहीं। धन्धे के लिए नहीं। तेरे लिए। मेरा विश्‍वास करना।’

मुझे पूरा विश्‍वास है। — लल्लू ने जोर से कहना चाहा लेकिन आवाज उसके रुंधे कंठ में ही घुटकर रह गयी।

उसने फिर रोना चाहा लेकिन तब तक वह इतना रो चुका था कि इस बार उसके आंसू भी न निकले।

परे एक पेड़ों के झुरमुट में एक नौजवान जोड़ा एक दूसरे की बांहों में लिपटा बैठा था। उसका जी चाहा कि वह उठकर उनके पास जाए और छोकरे को बोले कि अपनी छोकरी को यूं ही सीने से लगाए रखना, उसे कभी अपने से अलग न करना वर्ना तेरी पीठ फिरते ही कोई उसका गला काट देगा।

“रानी!” — वह पूर्ववत् रुंधे कण्ठ से बोला — “मेरी रानी!”

उसे यूं लगा जैसे उसके करीब ही खुर्शीद जोर से हंसी हो।

“भेजा फिरेला है साले किचू का।”

मार्था ने एंथोनी के फ्लैट की कालबैल बजायी और दरवाजा खुलने के इन्तजार में बेचैनी से पहलू बदलने लगी।

उसके सामने इम्तहान की घड़ी थी। अपने बेटे की बीवी के सामने, अपनी बहू के सामने, उसने अपनी नौजवानी की बद्कारी को कबूल करना था। सिर्फ उसके बेटे का बाप ही उसे ऐसा करने पर मजबूर कर सकता था। उसके बेटे का बाप जो तीस साल बाद उसके पास लौटा था। वह उसका कहा नहीं टाल सकती थी। मोनिका उसे कितनी ही गिरी हुई और जलील औरत क्यों न करार देती, उसने हकीकत उसके सामने बयान करनी ही थी।

दरवाजा खुला।

मोनिका अपनी सास के गले लगकर मिली और उसे भीतर ले आयी। उसने मार्था के हाथ से वह झोला ले लिया जिसमें मार्था अष्टेकर का दिया उसका और मिकी का प्रेजेन्ट डालकर लायी थी।

ड्राइंगरूम में मिकी खेल रहा था।

मार्था ने उसे गोद में उठाकर प्यार किया।

फिर उसने मिकी को गोद से उतारा और एक कुर्सी पर बैठ गयी। मिकी फिर अपने खिलौने से खेलने लगा।

“पापा कैसे हैं?” — मोनिका ने पूछा — “तबियत ठीक है उनकी?”

“जितनी ठीक हो सकनी मुमकिन है, उतनी ठीक है। पहले से खराब नहीं है, यही गनीमत है।”

“ओह!”

“अब तू पक्का यहीं रहती है?”

“हां।” — मोनिका नर्वस भाव से बोली — “वो क्या है कि...”

“ठीक है। जो है ठीक है। औरत को मर्द का सहारा चाहिये ही होता है। फिर तू खूबसूरत है, नौजवान है, सारी जिन्दगी पड़ी है तेरे सामने। ऊपर से बच्चा भी बाप के प्यार के बिना पले, यह ठीक नहीं। जिस मर्द को तूने चुना है, जाहिर है कि वो अच्छा भी होगा। पिता का, पति का फर्ज समझने वाला। उसे निभाने वाला।”

मोनिका खामोश रही। वह समझ न पायी कि उसकी सास उसे प्रोत्साहन दे रही थी या व्यंग्य कर रही थी।

“मैं तेरे और मिकी के लिए कुछ प्रेजेन्ट लायी हूं।” — मार्था झोले की तरफ इशारा करती बोली — “कुछ अपनी तरफ से और कुछ किसी और की तरफ से।”

“और किस की तरफ से?”

“एक ऐसे शख्स की तरफ से जिसका विलियम से बहुत खास रिश्‍ता था और अब मिकी से है।”

“ऐसा शख्स कौन है? मैं जानती हूं उसे?”

“शख्स को जानती हो, रिश्‍ते को नहीं जानती हो।”

“कौन! पहेलियां मत बुझाओ ममा, कौन है वो शख्स?”

“वो शख्स विलियम का बाप है।” — मार्था बड़ी मुश्‍किल से कह पायी।

“विलियम का बाप!” — मोनिका उलझनपूर्ण स्वरमें बोली — “तुम्हारा पति! पापा!”

“नहीं, जैक नहीं। जैक म-मेरा पति है लेकिन वि-विलियम का बा-बाप नहीं।”

“विलियम का बाप नहीं!” — मोनिका ने हैरानी से फिकरा दोहराया — “ममा, ये तुम क्या पहेलियां बुझा रही हो? मेरी समझ में तो कुछ नहीं आ रहा है! जो कहना है, साफ-साफ कहो न!”

“मोनिका, जो कुछ मैं कह रही हूं, बहुत सख्त मजबूरी में कह रही हूं। किसी की जिद न होती, किसी का हुक्म न होता, तो मैं यह बात हरगिज भी अपनी जुबान पर न लाती।”

“बात क्या है?”

“बेटी, तू भी औरत है। एक औरत की मजबूर जिन्दगी को औरत ही बेहतर समझ सकती है।”

“ममा, बात तो बोलो! बात क्या है? देख नहीं रही हो मैं सस्पेंस से मरी जा रही हूं! कौन है विलियम का बाप?”

“अष्टेकर।”

“अष्टेकर! कौन अष्टेकर?”

“यशवंत अष्टेकर!”

“वो पुलिस इन्स्पेक्टर! वो अष्टेकर!” — मोनिका हक्की-बक्की सी बोली।

“हां।”

मोनिका की निगाह अपने आप ही परे खेलते मिकी की ओर उठ गई।

“तुम्हारा मतलब है वो पुलिसिया” — वह बोली — “मिकी का... मिकी का...”

“दादा है।” — मार्था गहरी सांस लेकर बोली — “तेरे पति का बाप था। मेरे बेटे का बाप था।”

“ऐसा क्योंकर हुआ?”

“यह एक लम्बी कहानी है, बेटी।”

मोनिका की आंखों के सामने अष्टेकर का सख्त, बद्नुमा चेहरा घूम गया। अब उसको सूझ रहा था कि क्यों उसके रूखे व्यवहार के बावजूद वह पुलिसिया उसके बेटे से इतने अनुराग से पेश आता था और उसकी एक मुस्कुराहट के लिए तरसता था। क्यों इतना सख्त मिजाज पुलिसिया अपने पोते की एक मुस्कुराहट की खातिर वो तौहीन तक बर्दाश्‍त कर लेता था जो मोनिका हमेशा उसकी करती रहती थी।

“बेटी” — मार्था टूटे स्वर में बोली — “अष्टेकर की जिद पर यह बात मैंने तुझे बताई है। वो कहता है कि जब तक वो विलियम के कातिल को गिरफ्तार करके उसे सजा नहीं दिलवा लेगा, चैन की सांस नहीं लेगा। बेटी, इस हकीकत को जान लेने के बाद अब तेरा फर्ज बनता है कि उसके काम में तू उसकी मदद करे।”

मोनिका खामोश बैठी अपने बेटे से और अपने से अष्टेकर के उस नए रिश्‍ते के बारे में सोचती रही।

“बेटी” — मोनिका को कोई जवाब देता न पाकर मार्था कातर भाव से बोली — “तू अष्टेकर को गलत न समझ। अपनी पुलिस की नौकरी की वजह से वह सख्त और क्रूर लगता है लेकिन असल में वह बहुत नर्मदिल, बहुत नेक, बहुत जज्बाती आदमी है। वो...”

“और कुछ कहने की जरूरत नहीं, ममा।” — मोनिका बीच में उसकी बात काट कर बड़े दृढ़ स्वर में बोली — “विलियम के हत्यारे की तलाश के मामले में अब मैं उसकी हर मुमकिन मदद करूंगी।”

मार्था की आंखों में कृतज्ञता के आंसू आ गये।

आखिर उसकी बहू ने उसे नफरत की निगाह से नहीं देखा था। उसके पाप के लिये उसे तिरस्कृत नहीं किया था।
 

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