• Hello Friends You can Register on the Forum and by posting you can earn money too.

Thriller गहरी साजिश

  • Thread starter Thread starter StoryPublisher
  • Start date Start date
‘‘फिर तो यकीनन ये सब उस पुलिसवाले का ही किया धरा है, वो होमीसाइल मैनियाक है।‘‘

‘‘उसे देखकर तो ऐसा नहीं लगता।‘‘ मैं विचारपूर्ण स्वर में बोला।

‘‘तुम्हे देखकर ही कहां लगता है कि तुम एक नम्बर के....।‘‘

मैंने घूर कर देखा तो उसने तुरंत बात पलट दी, ‘‘एक नम्बर के जासूस हो।‘‘

नीलम उठ खड़ी हुई।

‘‘मैं चलती हूं तुम दोनों आराम से लड़ना।‘‘

‘‘अरे नहीं प्लीज! मुझे साथ लेकर चलो। घर ना सही बाहर तक तो सही सलामत पहुंचा दो।‘‘

‘‘एक मिनट चुपकर! मैं जरा पोस्टमार्टम रिर्पोट की कॉपी बना लूं।‘‘

कहकर मैंने दोनों रिपोर्ट्स की जेरॉक्स निकालकर एक सेट अपने पास रख लिया।

इसके बाद नीलम और शीला वहां से चली गईं। उनके पीछे मैंने एक सिगरेट सुलगाया और हालात का तबसरा करने लगा। जब नया कुछ समझ में नहीं आया तो मैंने अपनी निगाहें पोस्टमार्टम रिपोर्ट पर गड़ा दीं। रिपोर्ट में एक और खास बात थी जिसका जिक्र अभी तक नहीं हुआ था - गला घोंटे जाते वक्त दोनों औरतें बेहोश थीं। उनकी बेहोशी का कारण सदमा था या उन्हें कुछ खिलाया-सुंघाया गया था इस बात का जिक्र रिपोर्ट में नहीं था।

काफी देर तक विचार करने के बाद भी मैं कातिल के बारे में कोई राय कायम नहीं कर सका। थक हार कर मैं भी ऑफिस बंद करके अपने गरीबखाने की ओर रवाना हो गया।

तीन जून 2017

सुबह के करीब दस बजे थे, जब मैं मंदिरा और सुनीता की लाश का पोस्टमार्टम करने वाले डॉक्टर की फिराक में अस्पताल पहुंचा। पार्किंग में कार खड़ी करने के बाद, सबसे पहले मैं मोर्ग में पहुंचा! जहां का अटैंडेंट बेहद भला इंसान निकला, उससे मुझे पता चला कि उस घड़ी वहां सिर्फ एक ही लाश थी, जो कि सुनीता गायकवाड़ की थी। जबकि मंदिरा चावला की डैड बॉडी रिलीज की जा चुकी थी। मैंने ले जाने वाले के बारे में दरयाफ्त किया तो पता चला डैड बॉडी मंदिरा की छोटी बहन रंजना चावला के सुपुर्द की गयी थी।

मैंने पोस्टमार्टम करने वाले डॉक्टर वी.के. सूरी के बारे में पूछा तो उसने बताया कि वे अभी नहीं आए थे। मगर जब आयेंगे तो उनका मुकाम कमरा नम्बर एक सौ तीन होगा जो कि सामने की राहदरी में पहला लेफ्ट लेते ही दाईं तरफ को था।

मैंने उसे धन्यवाद दिया और जाकर एक सौ तीन के आगे धरना दे दिया।

बारह बजे - जब मैं इंतजार करता-करता निराश हो चला था - डॉक्टर सूरी के कदम वहां पड़े। वह पैंतीस-छत्तीस साल का युवक था जो बेहद चुस्त-दुरूस्त नजर आ रहा था।

जब वो भीतर जाकर अपनी चेयर पर बैठ गया, तो मैंने उस कमरे में कदम रखा।

अपना मंतव्य बताते हुए मैंने उसे अपना विजटिंग कार्ड सौंपा, जिसपर एक नजर डालकर उसने अपनी टेबल की दराज में डाल दिया।

‘‘तुम्हारे पास पुलिस का कोई अथॉरिटी लेटर है।‘‘

‘‘जी नहीं, मगर मैं जो कुछ आपसे जानना चाहता हूं, इत्मीनान रखिए उसमें कानून की कोई धारा भंग नहीं होती।‘‘

‘‘हो सकता है ना होती हो मगर ये बात मुझे कैसे मालूम होगी, मैं ना तो कोई वकील हूं ना ही कोई पुलिस वाला।‘‘

‘‘इसका क्या ये मतलब समझूं जनाब, कि आप मुझे बाहर का रास्ता दिखा रहे हैं।‘‘

‘‘अरे नहीं भाई! इत्मीनान से बैठो, चाय कॉफी कुछ लोगे तो बोलो।‘‘

‘‘जी नहीं शुक्रिया।‘‘ मैंने कहा, प्रत्यक्षतः मैं समझ नहीं सका कि वह व्यंग कर रहा था या सचमुच ऑफर कर रहा था।

‘‘क्या जानना चाहते हो।‘‘

‘‘मंदिरा चावला और सुनीता गायकवाड़ की मौत के बारे में बताइए जिनका कल सुबह पोस्टमार्टम किया था आपने।‘‘

‘‘पोस्टमार्टम रिपोर्ट नहीं देख पाये लगता है तुम।‘‘

‘‘देख चुका हूं जनाब, दोनों की कॉपी अभी भी मेरे पास है।‘‘ कहकर मैंने दोनों रिपोर्ट उसके सामने मेज पर रख दी।

‘‘सबकुछ तो है इसमें, अलग से क्या जानना चाहते हो।‘‘

‘‘रिपोर्ट में इस बात का खास जिक्र है कि गला घोंटे जाने से पूर्व ही दोनों महिलायें बेहोश हो चुकी थीं। मेरा सवाल उसी बाबत है, क्यों बेहोश थीं वो दोनों! उन्हें कोई नशीली चीज दी गई थी या खौफ के कारण दोनों अपनी चेतना गवां बैठी थीं।‘‘

‘‘ढेरों संभावित वजहें हो सकती हैं, मसलन खौफ की अधिकता, उत्तेजना, दिमाग के किसी नाजुक हिस्से पर चोट पड़ना वगैरह-वगैरह।‘‘

‘‘जनाब आप तो मुझे उलझाए दे रहे हैं।‘‘

‘‘यही तुम्हारे सवाल का सीधा और सच्चा जवाब है। अलबत्ता अगर वो दोनों किसी चोट से बेहोश हुई थीं तो कम से कम उनके शरीर के किसी ऐसे हिस्से पर चोट का कोई निशान नहीं मिला जहां चोट पड़ने से इंसान बेहोश हो सकता हो।‘‘

‘‘क्या ऐसा हो सकता है कि चोट तो पड़ी हो मगर उसका कोई निशान पीछे ना बचा हो।‘‘

‘‘हो सकता है, मैं अभी तुम्हारी गर्दन की एक रग दबाकर तुम्हें बेहोश कर सकता हूं। मगर ऐसा कोई स्पेशलिस्ट ही कर सकता है। या वो कर सकता है जिसने इसकी जानकारी किसी स्पेशलिस्ट से हासिल की हो।‘‘

‘‘जैसे की कोई डॉक्टर।‘‘

‘‘हां जैसे की कोई डॉक्टर।‘‘

‘‘कोई पुलिसवाला!‘‘

‘‘भई तुम समझे नहीं, अभी मैं तुम्हे सिखा दूं थोड़ी प्रैक्टिस करा दूं तो ये काम तुम भी बड़ी आसानी से कर सकोगे।‘‘

‘‘समझ गया जनाब, अब जरा लाश की दुर्गती पर आइए, क्या लगता है आपको क्या कातिल सचमुच कोई विक्षिप्त व्यक्ति है।‘‘

‘‘भाई एक नजर लाश को देखकर तो मुझे भी यही लगा था कि यह किसी वहशी दरिंदे का काम है, किसी पागल का काम है। जिसने दो खूबसूरत जिस्मों को नोंच खाया था। मगर दोनों लाशों का पोस्टमार्टम करने के बाद मुझे अपना ख्याल बदलना पड़ा।‘‘

‘‘कोई खास बात नोट की थी आपने।‘‘

‘‘खास ही समझो।‘‘

‘‘जनाब इस बालक का ज्ञानवर्धन कीजिए प्लीज।‘‘

‘‘देखो पहली लाश जो कि मंदिरा चावला की थी, उसके शरीर के जख्म थे तो दूसरी लाश की तरह ही मगर वो ज्यादा गहरे नहीं थे। यूं लगता था जैसे उन्हें बहुत हिचकते हुए, घबराते हुए बनाया गया था, आई रिपीट बनाया गया था। एक-एक घाव कई-कई बार वार करके बनाये गये थे। जबकि दूसरी लाश के साथ ऐसा नहीं था, उसके शरीर पर जहां भी कातिल ने पंजा मारा था या दांत गड़ाया था, एक ही वार में मांस का लोथड़ा निकाल लिया था। पूरे जूनून के साथ वार किए गये थे उसके जिस्म पर।‘‘

मैं हैरानी से उसकी शक्ल देखने लगा।

‘‘ऊपर से पहली लाश को गिने चुने अंदाज में नोंचा गया था, जबकि दूसरी को कातिल ने बेहिसाब नोंचा था। पहली लाश के गुप्तांग को जहां तक मेरा ख्याल है तीन बार में दांतों से नोंचा गया था। जबकि दूसरी लाश के गुप्तांग को एक ही झटके में पूरी बर्बरता के साथ नोंचकर वहां से मांस का एक बड़ा टुकड़ा अलग कर दिया गया था।‘‘

‘‘क्या ये दो जुदा हत्यारों का काम हो सकता है?‘‘

‘‘मुश्किल है, दोनों लाशों पर दांतों से जो वार किये गये हैं उनके निशान लगभग एक ही जैसे हैं। यह एक ही आदमी का काम है, वैसे भी नतीजे निकालना मेरा काम नहीं है। मैंने जो देखा महसूस किया तुम्हे बता दिया, नतीजे तुम खुद निकालो।‘‘

‘‘जरूर, बस एक आखिरी सवाल का जवाब दे दीजिए।‘‘

‘‘पूछो।‘‘

‘‘क्या लाश पर दांतों से बने निशान को किसी संभावित कातिल के दांतों से मिलान करके, ये साबित किया जा सकता है कि वो अमुक व्यक्ति के दांतों से ही बने हैं।‘‘

‘‘मुश्किल है, क्योंकि लाश लगातार फूलती चली जाती है, उसी अनुपात में घावों का आकार बिगड़ता चला जाता है। ऐसी कोई पड़ताल अगर तुरंत की गई होती तो शायद कोई नतीजा सामने आ जाता, मगर वो भी सौ फीसदी ऐतबार के काबिल नहीं हो सकता था।‘‘

‘‘शुक्रिया जनाब, इस नाचीज को वक्त देने का बहुत-बहुत शुक्रिया।‘‘

उसने सिर हिलाकर मेरा शुक्रिया कबूल किया।

करीब एक बजे मैं थाने पहुंचा, पता चला नदीम खान डीसीपी ऑफिस गया हुआ था। मैंने चौहान के केस के बारे में दरयाफ्त किया तो पता चला उसे एडिशनल एसएचओ विजय तिवारी हैंडल कर रहा था।

तिवारी बेहद खुशमिजाज सख्स था।

मेरा पहले भी कुछ केसों में उससे पाला पड़ चुका था। ऊपर से उसका एसएचओ और एसीपी मुझे भाव देते थे, इसलिए तिवारी कभी मेरे साथ बेरूखी से पेश नहीं आता था। ठीक उसी तरह जैसे आप किसी बड़े आदमी के कुत्ते को लात नहीं मार सकते, भले ही वो आपकी गोद में चढ़कर सूसू ही क्यों ना कर दे।

मैं तिवारी के कमरे में पहुंचा। वो मुझे सिगरेट के सुट्टे लगाता मिला, लिहाजा फुर्सत में था।

‘‘तिवारी साहब को सादर प्रणाम।‘‘

‘‘जीते रहे भाई और यूंही पुलिस का खून पीते रहो।‘‘

‘‘क्या बात कर रहे हो मालिक, कोई खता हो गई क्या।‘‘ मैं उसके सामने एक विजिटर चेयर पर बैठता हुआ बोला।

‘‘अरे नहीं मैं तो बस यूं ही तुकबंदी कर रहा था, सिगरेट लोगे।‘‘

‘‘आपके हाथ का तो जहर भी कबूल है जनाब।‘‘

जवाब में हो-हो कर के हंसते हुए उसने सिगरेट का पैकेट और माचिस मेरी ओर बढ़ा दिया। मैंने दोनों चीजें अपने काबू में की, फिर एक सिगरेट सुलगाकर धुंआ उगलता हुआ बोला, ‘‘सुना है, चौहान वाले मामले को आप हैंडल कर रहे हैं।‘‘

‘‘ठीक सुना है भई, ये बदमजा जिम्मेदारी मुझे ही दी गयी है। अब कोई पूछे मुझसे कि अपने ही एक ऑफीसर को इंटेरोगेट कैसे करूं, जिसके साथ विस्की पी है उसे डंडे का जोर कैसे बताऊं।‘‘

‘‘तौबा थर्ड डिग्री आजमाएंगे उसपर।‘‘

‘‘आजमा तो नहीं पाऊंगा यार! मगर हमारे डीसीपी साहब तो यही चाहते हैं।‘‘

‘‘सुना है कोई पक्का सबूत हाथ लगा है उसके खिलाफ।‘‘

‘‘किससे सुना है।‘‘

‘‘खान साहब से।‘‘

‘‘अब उनसे सुना है तो ठीक ही सुना होगा।‘‘

‘‘कुछ खुलासा तो कीजिए, कौन सा तुरूप का पत्ता हाथ लगा है आपके।‘‘

‘‘मैं नहीं जानता यार! ऐसे सवाल तुम साहब से ही किया करो।‘‘

‘‘तिवारी साहब! आप तो दिल तोड़ रहे हैं।‘‘

‘‘टूटने दो भाई दिल का क्या है आज टूटेगा कल जुड़ जायेगा। वैसे भी जब बात जानकारी निकलवाने की आती है तो तुम्हारा दिल एक दिन में कई-कई बार टूटता है, फिर भी जिंदा हो, सही सलामत हो। पर मुझे साफ-साफ चेतावनी दी गयी है कि अगर मेरी तरफ से कोई भी जानकारी लीक हुई तो मुझे सस्पेंड कर दिया जाएगा। अब भैया नौकरी खोकर दोबारा कैसे मिलेगी। इसलिए इस बार तो माफ ही करो मुझको।‘‘

‘‘अच्छा कम से कम ये तो बताइए कि चौहान के अलावा भी कोई है या नहीं पुलिस की निगाहों में, या कोई ऐसा जिसपर पहले आप लोगों को शक रहा हो लेकिन बाद में उसे शक से बरी कर दिया गया हो।‘‘

‘‘ऐसा कोई नहीं है, सारे सबूत सारे गवाह चौहान के खिलाफ हैं, उसके अलावा कोई और कातिल हो ही नहीं सकता।‘‘

‘‘गवाह भी हैं!‘‘ मैं हैरानी से बोला।

‘‘श...श..श तुम तो मरवाओगे मुझे।‘‘ वो फुसफुसाते हुए बोला।

‘‘लेकिन जनाब गवाह कहां से आ गया - मैं भी उसी के लहजे में बोला - कहीं आप लोगों ने कोई तोता तो नहीं सिखा-पढ़ा दिया।‘‘

‘‘पागल हो अपने ही एक ऑफीसर के खिलाफ हम ऐसी टुच्ची हरकत करेंगे।‘‘

‘‘यानि की गवाह का वजूद सच में है।‘‘

‘‘बस करो भई, कोई और बात करनी है तो करो वरना मैं उठकर जाता हूं।‘‘

‘‘आप उठकर जाते हैं! - मैं हैरानी से बोला - मुझे जाने का हुक्म नहीं दनदनायेंगे।‘‘

‘‘नहीं भई तुम आराम से जब तक मर्जी हो यहां बैठे रह सकते हो।‘‘

‘‘मैं आपका इशारा समझ गया जनाब बस एक आखिरी सवाल का जवाब दे दीजिए प्लीज!‘‘

‘‘पूछो।‘‘

‘‘ये रंजना चावला कहां मिलेगी, अपनी बहन के फ्लैट में या फिर कहीं और..।‘‘

‘‘आया जनाब।‘‘ वो जोर से बोला और उठ खड़ा हुआ।

मैंने हकबका कर उसकी ओर देखा।

‘‘एसएचओ साहब बुला रहे हैं, तुम बैठो मैं अभी आता हूं।‘‘

मैंने सहमति में सिर हिला दिया और उसकी वापसी का इंतजार करने लगा। पूरे बीस मिनट गुजर गये मगर वो नहीं आया। तब मैं बाहर निकला। पता चला एसएचओ साहब अभी आये नहीं थे और तिवारी साहब फील्ड में गये हैं। तो यूं पीछा छुड़ाया था तिवारी ने मुझसे।

मैं मंदिरा चावला के फ्लैट पर पहुंचा। ये देखकर मुझे बहुत तसल्ली हुई कि दरवाजे पर ताला नहीं झूल रहा था। मैंने कॉल बेल पुश कर दिया। करीब दो मिनट बाद दरवाजे पर एक दरमियाने कद की युवती प्रगट हुई, जो अगर मंदिरा की बहन थी तो उसकी शक्ल मंदिरा से बिल्कुल भी नहीं मिलती थी।

‘‘जी कहिए, किससे मिलना है?‘‘

‘‘रंजना चावला से।‘‘

‘‘मैं ही हूं, बताइए।‘‘

‘‘मेरा नाम विक्रांत गोखले है मैं एक..।‘‘

‘‘भीतर आ जाइए।‘‘ वो मेरी बात काट कर बोली। और एक तरफ होकर उसने मुझे भीतर आने का रास्ता दे दिया।

मेरे पीछे उसने दरवाजा बंद किया और मुझे ड्राइंग रूम में एक सोफे पर बैठाने के बाद बोली, ‘‘आप कुछ लेंगे।‘‘

‘‘जी नहीं शुक्रिया, आप इत्मीनान से बैठ जाइए।‘‘

सहमति में सिर हिलाती हुई वो एक स्टूल खींचकर मेरे सामने बैठ गयी।

‘‘मंदिरा के साथ जो कुछ भी हुआ, यकीन जानिए उसका मुझे बहुत दुख है। आपको शायद पुलिस ने बताया होगा कि उसकी लाश मैंने ही बरामद की थी।‘‘

‘‘जी हां बताया था, लेकिन मैं आपको बाई नेम पहले से जानती हूं। मंदिरा ने जिक्र किया था आपका।‘‘

तो ये वजह थी उसकी बेतकल्लूफी की।

‘‘आप मंदिरा के काफी करीब रही होंगी नहीं।‘‘

‘‘ऐसा तो नहीं था। वो काफी रिजर्ब टाइप लड़की थी, अपने मन का डार्क सर्कल हमेशा छिपाकर रखती थी। फिर भी कभी-कभार जब मूड में होती थी तो बहुत कुछ बता डालती थी अपनी रोजमर्रा की जिंदगी के बारे में। ऐसे ही मूड में उसने एक बार मुझे बताया था कि कैसे एक आदमी उसे ब्लैकमेलर साबित करने पर उतारू था, जिससे कि बाद में आपने उसका पीछा छुड़वाया था, वो भी बिना कोई फीस लिए।‘‘

अब जनाब मैं कैसे उसे बताता कि मैंने फीस नहीं छोड़ी थी, बस मुल्तवी कर दी थी! किसी और तरीके से वसूलने की खातिर, जो कि अगर वो जिन्दा होती तो कभी ना कभी कर के रहता। भला फीस छोड़कर भूखे मरना था क्या।

‘‘आखिरी बार आपकी उससे कब बात हुई।‘‘

‘‘उसकी मौत से दो दिन पहले।‘‘

‘‘कोई खास बात बताई थी उसने।‘‘

‘‘कैसी खास बात!‘‘

‘‘कुछ भी मसलन वो किसी बात को लेकर परेशान थी या ऐसा ही कुछ और! या फिर उसकी बातों से आपने अंदाजा लगाया हो किसी परेशानी में थी।‘‘

‘‘नहीं ऐसी कोई बात नहीं थी, हमने बहुत कैजुअल बातें की थीं वो भी महज एक या डेढ़ मिनट।‘‘

‘‘उससे पहले कभी कुछ खास शेयर किया हो।‘‘

‘‘नहीं ऐसा कुछ नहीं बताया उसने जिसे खास का दर्जा दिया जा सके।‘‘

‘‘आपको पता था कि वो प्रेग्नेंट थी?‘‘

‘‘नहीं, पुलिस के बताये ही पता चला। सुनकर मैं तो भौंचक्की रह गयी, एक बारगी तो यकीन नही नहीं आया था। क्योंकि मंदिरा चाहे जैसी भी थी, मगर हल्के चरित्र की लड़की नहीं थी।‘‘

‘‘किसी राकेश चौहान का जिक्र किया हो कभी उसने।‘‘

‘‘हां किया तो था, मगर वो काफी पुरानी बात है।‘‘

‘‘किस सिलसिले में किया था?‘‘ मैं उत्सुक स्वर में बोला।

‘‘कोई एक्सीडेंट कर बैठी थी वो, जिसमें एक आदमी को गम्भीर चोटें आईं थी। बाद में अस्पताल में उसने दम तोड़ दिया था। उस वक्त मंदिरा ने ड्रिंक कर रखा था और वो बहुत ज्यादा नशे में भी थी। घटनास्थल से तो एक्सीडेंट के बाद वह फरार होने में कामयाब हो गई मगर दो दिन बाद ही पुलिस ने उसे ढूंढ निकाला था। उस रोज जो पुलिसिया उसके पास पहुंचा था वो राकेश चौहान था। बतौर मंदिरा वो उसे देखते ही फ्लैट हो गया था। और उसके जरा सा रिक्वेस्ट करते ही उसने मंदिरा को बचाने के लिए केस का रूख ही पलट कर रख दिया। इस तरह उस पुलिसिये की बदौलत मंदिरा जेल जाने से बची थी।‘‘

‘‘फिर क्या हुआ?‘‘

‘‘इसके बाद एक दो बार मैंने मंदिरा से उस बारे में बात करनी चाही तो वह यह कहकर टाल गयी कि सब सैटल हो गया था।‘‘

‘‘आगे कभी चौहान का जिक्र किया हो उसने।‘‘

‘‘नहीं कभी नहीं किया।‘‘

‘‘जरा दिमाग पर जोर डालकर बताओ कि वो एक्सीडेंट वाला वाकया कब हुआ था?‘‘

‘‘जोर डालने की जरूरत नहीं मुझे वैसे ही याद है, क्योंकि उसके अगले दिन मेरा बर्थ डे था। इस लिहाज से वो वाकया चौदह दिसम्बर की रात को घटित हुआ होगा।‘‘

‘‘उसने कभी किसी ऐसे व्यक्ति का जिक्र किया हो जिसके उसके प्रेम संबंध रहे हों, या ऐसा कोई जिक्र जिससे तुम्हे लगा हो कि शी वाज इन लव।‘‘

‘‘नहीं मुझे इसकी कोई खबर नहीं है।‘‘

‘‘तुम किसी सुनीता गायकवाड़ को जानती हो।‘‘

‘‘सिर्फ इसलिए जानती हूं क्योंकि पुलिस ने बताया था मुझे उसके बारे में।‘‘

‘‘स्टडी अभी भी सील्ड है।‘‘

‘‘हां, मुझे यहां रहना तो है नहीं, इसलिए उस बारे में मैंने पुलिस से कोई बात नहीं की।‘‘

‘‘कोई और बात जो इस सिलसिले में तुम बताना चाहो।‘‘

उसने इंकार में मुंडी हिला दिया।

‘‘तो अब मैं इजाजत चाहूंगा, वक्त देने का शुक्रिया।‘‘

‘‘जरा ठहरो, मुझे बताकर जाओ कि ये सब पूछताछ तुम किसके लिए कर रहे हो।‘‘

‘‘तुम्हारी बहन के हत्यारे को उसके कुकर्मों की सजा दिलवाने के लिए।‘‘

‘‘यूंही बिना किसी फीस के?‘‘

‘‘यही समझ लो।‘‘

‘‘कहीं दिल तो नहीं आ गया था तुम्हारा मेरी बहन पर।‘‘

‘‘था तो कुछ ऐसा ही।‘‘

‘‘तो क्या मैं ये समझूं कि उसके पेट में जो बच्चा था वो तुम्हारा था।‘‘

‘‘काश ऐसा होता, मगर अफसोस की नहीं था।‘‘

‘‘शादीशुदा हो।‘‘

‘‘नहीं।‘‘

‘‘भई बच्चों का इतना ही शौक है तो शादी कर लो।‘‘

‘‘तुम गलत समझ रही हो, शौक मुझे बच्चों का नहीं है, उसका है जो बच्चे पैदा करने के लिए किया जाता है।‘‘

उसने हैरानी से मेरी तरफ देखा।

‘‘बहरहाल तुम्हारी बहन का कातिल जल्दी ही सलाखों के पीछे अपने कुकर्मों की सजा भुगत रहा होगा, ये मेरा वादा है तुमसे।‘‘

उसने अनमने भाव से हौले से सिर हिला दिया।

बाहर आकर मैं अपनी कार में सवार हो गया। एमबी रोड पर पहुंचकर मैंने कार का रूख संगम विहार की ओर कर दिया। मेरा इरादा एक चक्कर सुनीता गायकवाड़ के फ्लैट का लगाने का था, जिसे मैंने फौरन बाद ही मुल्तवी कर दिया और खानपुर से लेफ्ट लेकर साकेत कोर्ट के सामने से गुजरते हुए अपने ऑफिस पहुंचा।

ऑफिस का शीशे वाला दरवाजा लॉक्ड था, अलबत्ता शटर नहीं गिराया गया था। मैंने घड़ी देखी, तीन बज रहे थे। ये तो उसका लंच टाइम भी नहीं था, कहां चली गई थी वो। मैंने अपनी ‘की‘ से दरवाजा खोला, रिसेप्शन पर एक नजर डाला, मगर वहां मेरे लिए कोई मैसेज नहीं छोड़ा था उसने। मैं अपने केबिन में पहुंचकर उसकी वापसी का इंतजार करने लगा।

बीस मिनट बाद।

‘‘हलो, गुड ऑफ्टर नून।‘‘

वो जैसे अंडों पर पांव रखती मेरे केबिन के दरवाजे पर नमूनदार हुई।

मैंने उसे घूर कर देखा। वो फौरन वापस जाने को मुड़ी।

‘‘कहां जा रही है कम्बख्त।‘‘

‘‘अरे तुम तो सही सलामत हो।‘‘

‘‘अब इसका क्या मतलब हुआ।‘‘

‘‘मुझे देखकर तुम्हारी आंखें यूं फैल गईं थीं कि मैंने सोचा इतनी हॉट और सैक्सी लड़की देखकर तुम्हें कोई दौरा-वौरा पड़ गया है, एम्बुलेंस बुलाने जा रही थी।‘‘

‘‘तो एम्बुलेंस को मोबाइल से कॉल किया होता।‘‘

‘‘कर तो लेती मगर एम्बुलेंस आने से पहले तुम्हें होश आ जाता तो पैसे बरबाद हो जाते।‘‘

‘‘फिर तो बाहर निकल कर स्कूटर की बजाय जरूर तू बस में सवार होती, यूं ज्यादा वक्त मिल जाता तुझे।‘‘

‘‘अरे बस किसलिए, पास में ही तो है हॉस्पिटल, पैदल चल के मुश्किल से बीस मिनट में पहुंच जाती।‘‘

‘‘और वहां जाकर हाल दुहाई मचाती कि फौरन एक एम्बुलेंस भेजी जाय, मरीज की हालत बेहद सीरियस है।‘‘

‘‘नहीं यूं तो वो लोग एम्बुलेंस को फौरन रवाना कर देते फिर मेरी इतनी मेहनत का फायदा क्या होता।‘‘

‘‘अच्छा फिर क्या करती।‘‘

‘‘मैं उनसे पूछती कि क्या वो कोई नई एम्बुलेंस खरीदने वाले हैं, जो अभी सेड्यूल में नहीं है। जवाब में अगर वो हां करते तो मैं तुम्हारे लिए बुक करा देती।‘‘

‘‘और अगर मना कर देते तो।‘‘

‘‘तो दूसरे हॉस्पिटल में ट्राई करती, तीसरे में करती, चौथे में करती...।‘‘

‘‘और मान ले अगर कहीं भी ऐसी एम्बुलेंस की हामी नहीं भरी जाती तो।‘‘

‘‘फिर तो मजबूरी थी, हमारे ऑफिस के बगल वाले हॉस्पिटल को खबर करनी पड़ती, अब मैं यूं भला तुम्हें मरते हुए कैसे देख सकती थी।‘‘

‘‘बक चुकी।‘‘

‘‘हां।‘‘

‘‘गुड! अब बता कहां गयी थी?‘‘

‘‘एक मर्द का पीछा कर रही थी।‘‘

‘‘इसे कहते हैं बगल में बच्चा और गांव में ढिंढोरा, ये जो तेरे सामने छह फीट का गबरू जवान बैठा है वो नहीं दिखाई देता तुझे़, जो आजकल गैर मर्दों का पीछा करना शुरू कर दिया।‘‘

‘‘मैं तुम्हें वैसी निगाहों से नहीं देखती।‘‘

‘‘अरे तो देखा कर ना, मैं मना करूं तब बोलना।‘‘

‘‘नहीं देख सकती।‘‘

‘‘मगर क्यों?‘‘

‘‘क्योंकि तुम्हें देखकर कभी मेरे मन में ऐसे-वैसे ख्याल नहीं आते।‘‘

‘‘इसे मैं कॉम्प्लीमेंट समझूं या बेइज्जती।‘‘

‘‘है तो ये बेइज्जती ही, मगर तुम्हें समझ में आए तब ना।‘‘

मैंने आहत भाव से उसकी ओर देखा।

‘‘प्लीज ऐसा ख्याल भी मत आने दो अपने मन में ये पाप है।‘‘

‘‘क्या पाप है।‘‘ मैं हड़बड़ा सा गया।

‘‘ये कायरों का काम है।‘‘

‘‘अरे कौन सा काम।‘‘

‘‘आत्महत्या करना।‘‘

मैं दोनों हाथों से अपना सिर पकड़ कर बैठ गया। कम्बख्त किसी दिन जरूर मुझे पागलखाने का केस बना कर छोड़ेगी।

‘‘मैं तुम्हारे लिए कॉफी मंगाती हूं, तनाव से मुक्ति मिलेगी, हीन भावना से भी बाहर निकलने में मददगार साबित होगी।‘‘

मैं चुप रहा।

‘‘तुमने कभी फरियादी दवाखाना का नाम सुना है?‘‘ इस बार वो गम्भीर लहजे में बोली।

‘‘नहीं।‘‘

‘‘मेरे ख्याल से तुम्हे एक चक्कर वहां का लगाना चाहिए।‘‘

‘‘हमारे केस के संदर्भ में?‘‘

‘‘हां तुम्हारे केस के संदर्भ में‘‘

‘‘खुलकर बता क्या कहना चाहती है।‘‘

‘‘वो लोग मरीज का नाम गुप्त रखने की गारंटी करते हैं।‘‘

‘‘ठहर जा कम्बख्त! मैं तुझे अभी बताता हूं कि मैं कितना बड़ा मर्द हूं।‘‘

इस बार सचमुच मेरा खून खौल उठा। मैंने मेज के ऊपर से ही हाथ बढ़ाकर उसका थोबड़ा पकड़ लिया और उसके होंठों पर अपने होंठ जमा दिये। वो कसमसाई खुद को अलग करने की कोशिश की मगर मैंने एक लम्बे लिप लॉक के बाद ही उसे छोड़ा।

‘‘ये क्या हरकत हुई।‘‘ वो हांफती हुई गुस्से से बोली।

‘‘शुरूआत तूने की थी।‘‘

‘‘हां मगर जब तुम्हें पता है कि अंत करना तुम्हारे वश की बात नहीं है, तो क्यों कोशिश कर के अपनी बेइज्जती करा रहे हो।‘‘
 
मैंने हकबका कर उसे देखा। फिर आर-पार वाले अंदाज में मेज का घेरा काटकर उसकी ओर बढ़ा। मगर इससे पहले कि मैं उसे दबोच पाता, मेज के नीचे से सरक कर वो मेरी कुर्सी पर जा बैठी। मैं फौरन उसपर झपटा, मगर तभी किसी ने दरवाजा नॉक किया और मैं बीच में ही फ्रीज होकर रह गया। दरवाजे पर एक सूट-बूट धारी व्यक्ति खड़ा था जो अभी भी हैरान निगाहों से कभी मुझे तो कभी शीला को देख रहा था।

‘‘सॉरी बाहर रिसेप्शन पर कोई नहीं था तो मैं...।‘‘

‘‘इट्स ओके - मैं खुद को संभालता हुआ बोला - प्लीज हैव ए सीट मिस्टर..़़?‘‘

‘‘मनोज, मनोज गायकवाड़।‘‘

तो ये था मकतूला सुनीता गायकवाड़ का पति। उसकी उम्र यही कोई तीसेक साल रही होगी। सूट-बूट में वो काफी हैंडसम लग रहा था। कुछ-कुछ इमरान हासमी की तरह मगर कद उसका छह फीट के करीब था। बालों में जरूर वो खिजाब या मेंहदी लगाता था, क्योंकि उसके आगे के बाल तांबे की रंगत लिए हुए थे।

शीला चुपचाप कमरे से बाहर निकल गयी।

‘‘प्लीज बैठिए।‘‘

‘‘मैंने आप दोनों को डिस्टर्ब कर दिया।‘‘

‘‘अरे नहीं जनाब मैं तो बस उसे किसी स्टेªंजर के अटैक से बचने के तरीके सिखा रहा था। आप से बेहतर इस बात को कौन समझ सकता है जनाब कि राजधानी औरतों के लिए कितनी खतरनाक साबित हो रही है।‘‘

उसने अनमने भाव से सिर हिला दिया।

‘‘आपकी पत्नी के साथ जो कुछ भी हुआ उसका मुझे बहुत दुख है।‘‘

‘‘इट्स ओके यही जिन्दगी की सच्चाई है, कभी जीत है कभी हार है। बस दुख इस बात का है कि वो अपनी आई मौत नहीं मरी, कोई हादसा नहीं गुजरा उसके साथ। कितनी बुरी मौत दी कमीने ने उसे, जी करता है गोली मार दूं हरामजादे को - कहते वक्त उसके दिल का गम उसकी आंखों में उतर आया। उसने रूमाल निकाल कर आंखें साफ की फिर बोला - सुनीता का कत्ल तो समझ में आता है, मगर हैरानी की बात ये है कि उसने अपनी मंगेतर को भी नहीं बख्शा।‘‘

‘‘जनाब मैं कुछ समझा नहीं, किसकी बात कर रहे हैं आप?‘‘

‘‘मंदिरा चावला और नरेश चौहान की।‘‘

‘‘आपको किसने बताया कि वो दोनों शादी करने वाले थे।‘‘

‘‘बस पता है किसी तरह।‘‘

‘‘आपको जिसने भी ये जानकारी दी है गलत दी है। मंदिरा उसकी मंगेतर नहीं थी। दोनों के बीच बस हॉय हैलो भर थी।‘‘

‘‘ऐसा कैसे हो सकता है।‘‘

‘‘ऐसा ही था जनाब।‘‘

‘‘ओह माई गॉड - वो हैरान होता हुआ बोला - कहां मैं इस बात पर दिमाग खपा रहा था कि उसने अपनी मंगेतर का कत्ल क्यों किया। बहरहाल मैंने सुना है तुम कातिल को बचाने की कोशिशों में लगे हुए हो।‘‘

‘‘किससे सुना है।‘‘

‘‘कहा तो किसी ने नहीं, मगर पुलिस की बातों से मुझे ऐसा ही लगा था।‘‘

‘‘गलत लगा था जनाब, उल्टा मैं कातिल को तलाशने की कोशिश में हूं ताकि जल्द से जल्द उसे उसके अंजाम तक पहुंचाया जा सके।‘‘

‘‘ऐसा तुम ये जानते हुए कह रहे हो कि पहले ही कातिल पुलिस के चंगुल में है।‘‘

‘‘वो कातिल नहीं है।‘‘

‘‘इसका फैसला करने वाले तुम कौन होते हो।‘‘

‘‘मैं फैसला कर भी नहीं रहा जनाब, आपकी मिसेज की लाश तो मैंने नहीं देखी थी, लेकिन मंदिरा चावला की दुर्गति देखकर पहला ख्याल मेरे मन में यही आया था कि अगर कातिल किसी भी तरह मेरे हत्थे चढ़ जाय तो उसे अपने हाथों से गोली मार दूं। इसलिए आप का यह कहना कि मैं कातिल का फेवर कर रहा हूं, सरासर बेबुनियाद इल्जाम है - कहकर मैं तनिक रूका फिर आगे बोला - और आपको क्या लगता है मुल्क का निजाम मेरे इशारों पर चलता है, जो मैं कहूंगा कि कातिल चौहान नहीं है, फलाना व्यक्ति है उसे गिरफ्तार कर लो, तो वो कहेंगे यस सर! राइट अवे सर!‘‘

‘‘नहीं मगर जिस तरह से इंवेस्टिगेशन ऑफीसर ने तुम्हारे बारे में बताया उससे तो यही लगता है कि तुम कोई बड़ी तोप हो।‘‘

‘‘आपकी खामाख्याली है जनाब, पुलिस के सहालियात का मुकाबला तो दूर मैं उनकी परछाईं भी नहीं हूं। ऊपर से उन्हें अख्तियार है - बल्कि वे अपना अख्तियार समझतें हैं कि जब चाहे जिसके चाहे गले पड़ सकते हैं और हलक में हाथ डालकर अपने मतलब की जानकारी निकलवा सकते हैं। जबकि वही जानकारी हांसिल करने के लिए बंदे को मिन्नतें करनी पड़ती है। दस मिनट की मुख्तर सी बातचीत के लिए घंटों तक नाक रगड़नी पड़ती है तब जाकर सामने वाला कुछ बक के देता। कभी-कभार तो ऐसा भी होता है कि सारी ड्रिल ही बेकार चली जाती है। इसके बावजूद अगर तिवारी साहब ने मेरी तारीफ में कुछ कहा है तो उसकी वजह कुछ ऐसे केसेज हैं जो मैंने पुलिस की मदद से और अपनी कड़ी मेहनत से सॉल्ब करके दिखाए हैं, आई रिपीट पुलिस की मदद से, उसके बिना तो संभव ही नहीं था कुछ कर पाना।‘‘

‘‘ओके मैंने मान ली तुम्हारी बात कि तुम कातिल का फेवर नहीं कर रहे, बल्कि तुम्हें लगता है कि कातिल कोई और है, इसलिए तुम उसकी तलाश में लगे हो।‘‘

‘‘शुक्रिया।‘‘

‘‘क्या किसी पर शक है तुम्हे?‘‘

‘‘नहीं, अभी तक कोई ऐसा कैंडीडेट दिखाई नहीं दिया जिसपर दोनों हत्याओं का जरा भी सुबहा किया जा सके।‘‘

‘‘और अगर तुम्हारी तमाम कोशिशों के बावजूद हत्या का कोई दूसरा कैंडिडेट सामने नहीं आता है फिर तुम क्या करोगे, क्या चौहान को कातिल मान लोगे।‘‘

‘‘जनाब मैं हत्यारे को हत्यारा साबित करने निकला हूं। बाजार से सब्जी खरीदने नहीं जो आलू सिर्फ इसलिए खरीद लाऊं क्योंकि और कोई सब्जी उपलब्ध नहीं थी।‘‘

‘‘और अगर तमाम तफतीश के बाद तुम्हारी डिटेक्टिव रीजनिंग ये कहे कि दोनों हत्याओं के लिए वो पुलिसवाला ही जिम्मेदार है फिर क्या करोगे।‘‘

‘‘मैंने क्या करना है जनाब जो करना है कानून करेगा, बेशक उसका मुकाम जेल की सलाखें होंगी! ऐसे विक्षिप्त हत्यारे को भला समाज में रहने का क्या अधिकार है। अलबत्ता मुझे ताउम्र ये बात सालती रहेगी कि मैंने एक ऐसे सख्स की हिमायत की जो सरे राह गोली से उड़ा देने के काबिल था।‘‘

‘‘गुड मैं यही सुनना चाहता था तुमसे।‘‘

‘‘मतलब क्या हुआ आप की बात का।‘‘

‘‘बतौर प्राइवेट डिटेक्टिव क्या चार्ज करते हो?‘‘ वो मेरी बात काट कर पूछ बैठा।

‘‘ये तो केस की किस्म पर डिपेंड करता है, आप क्यों जानना चाहते हैं।‘‘

‘‘मैं चाहता हूं तुम सुनीता के कत्ल की इंवेस्टिगेशन मेरे लिए करो।‘‘

‘‘वो तो जनाब मैं ऐसे भी कर रहा हूं।‘‘

‘‘तुम समझे नहीं मैं चाहता हूं ऐसा सिर्फ तुम मेरे लिए करो, मुझे अपनी प्रोग्रेस रिपोर्ट देते रहो, मगर सिर्फ मुझे। ना चौहान को ना पुलिस को, ना किसी और को। फिर अगर तुम कातिल तक पहुंचने में कामयाब हो जाओ जो कि मुझे यकीन है, हो ही जाओगे तो उसके बारे में सिर्फ और सिर्फ मुझे बताओगे।‘‘

‘‘जनाब आप का इरादा कहीं वही तो नहीं जो कि मैं सोच रहा हूं।‘‘

‘‘क्या सोच रहे हो।‘‘

‘‘यही कि आप कातिल को अपने हाथों से सजा देना चाहते हैं।‘‘

मेरी बात सुनकर वो कुछ क्षण चुप रहा फिर बोला, ‘‘तुम्हें इससे कोई फर्क पड़ता है।‘‘

‘‘वो तो खैर नहीं पड़ता मगर...।‘‘

‘‘तो फिर आम खाने से मतलब रखो, अपना काम करो, अपनी फीस कमाओ।‘‘

सहबान जब बकरा खुद ही हलाल होने को मरा जा रहा था तो मैं भला कौन होता था उसे बचाने वाला। वैसे भी कोई पेइंग कस्टमर हो तो काम करने में अलग ही मजा आता है। चौहान ने हालांकि बतौर पेइंग कस्टमर खुद को पेश किया था मगर जिन हालात में वो फंसा हुआ था, उसमें उससे फीस चार्ज करते हुए मुझ सबसे बड़े बेशर्म को भी शरम आ जानी थी। रिहा होने पर वो मेरी फीस भरता तो कोई और बात थी। मगर था तो पुलिस वाला क्या पता चलता है। लिहाजा मनोज गायकवाड़ की ऑफर ठुकराना कहां की अक्लमंदी थी।

‘‘तो बताओ मुझे इस केस में क्या चार्ज करोगे।‘‘

‘‘फिफ्टी थाउजेंड एडवांस - मैं बेहिचक बोला - प्लस दो हजार रोजाना के हिसाब से तब तक जब तक की ये केस सॉल्ब नहीं हो जाता, या फिर आप मुझसे नाउम्मीद नहीं हो जाते। दोनों ही सूरतों में एडवांस की रकम वापिस नहीं होगी।‘‘

फीस के मामले में बिना कोई हुज्जत किये उसने अपने कोट की भीतरी पॉकेट से चैकबुक निकाला और सत्तर हजार रूपये भरकर बोला, ‘‘फिफ्टी एडवांस और दो हजार रोज के हिसाब से दस दिन का बीस हजार रूपये, चैक किस नाम से बनाना है?‘‘

‘‘रैपिड इंवेस्टिगेशन।‘‘

उसने चैक बनाकर मुझे सौंप दिया। मैंने इंटरकॉम पर शीला को सत्तर हजार रूपयों की रशीद बनाने को कहा जो कि वो फौरन दे गयी।

‘‘अब मैं चलता हूं।‘‘ वो उठता हुआ बोला।

‘‘जरा ठहरिये जनाब, बस पांच मिनट और।‘‘

वो वापस बैठ गया।

‘‘आप शायद महाराष्ट्रियन है, मेरा मतलब है टाइटल से ऐसा लगा मुझको।‘‘

‘‘ठीक लगा, हम अकोला के रहने वाले हैं। मैंने डी-फार्मा किया हुआ है। पांच साल पहले मुम्बई में दवाइयों की एक मल्टीनेशनल कम्पनी ज्वाइन की थी मैंने। जिसके दो साल बाद उन्होंने मेरा ट्रांसफर दिल्ली की ब्रांच में कर दिया। तब सुनीता से मेरी शादी को महज छह महीने ही हुए थे। हमने दिल्ली आकर रहना शुरू ही किया था कि कम्पनी ने दो सालों के लिए मेरा ट्रांसफर दुबई कर दिया। सबकुछ इतने आनन-फानन में हुआ कि मैं सुनीता को साथ लेकर जाने का इंतजाम नहीं कर पाया। बाद में उसने ये कहकर दुबई आने से मना कर दिया कि अकेले फ्लाईट में सफर करना उसके वश की बात नहीं थी। अगर उसने किसी तरह हिम्मत कर भी ली तो फ्लाईट में ही उसका हार्ट फेल हो जाना तय था। उसे हमेशा से उंचाई से डर लगता था, लिहाजा मैंने भी उसपर कोई बेजा दबाव डालने की कोशिश नहीं की। वहां की तनहा लाइफ में मैं दिन महीने साल गिनता रहा। अभी भी मेरे दो साल पूरे होने में तीन महीने बाकी हैं, फिर भी मैं यहां हूं, वक्त से पहले यहां हूं, मगर क्या फायदा? जिसके लिए मैं दिल्ली आने को बेकरार था वो तो रही ही नहीं इस दुनिया में।‘‘

कहते-कहते उसका गला रूंध गया, दिल का दर्द उसकी आंखों में उतर आया।

‘‘फिर तो आपको वापस दुबई लौटना पड़ेगा।‘‘

‘‘हां कुल जमा प्रंद्रह रोज की छुट्टी मिली है मुझे, वो भी वाइफ की हत्या हो जाने की वजह से, वरना तो कंपनी के रूल्स बहुत सख्त हैं। दो साल से पहले तो वे लोग मुझे वहां से हिलने तक नहीं देते।‘‘

‘‘और अगर आप वापिस लौटने से इंकार कर दें तो!‘‘

‘‘तो क्या भाई, फांसी पर तो नहीं लटका देंगे मुझे। उन हालात में कंपनी मुझसे रेजिग्नेशन मांगेगी, जिसे देने से मैं इंकार करूंगा तो ये कंपनी के मैनेजमेंट की मर्जी पर निर्भर होगा कि वे लोग मुझपर कोई मुकदमा दायर करते हैं या नहीं।‘‘

‘‘नोकरी जायेगी सो अलग।‘‘

‘‘ठीक समझे।‘‘

‘‘फोन पर बातचीत तो खूब होती होगी आप दोनों के बीच।‘‘

‘‘भाई खूब तो नहीं होती थी, मगर दिन में एक या दो बार तो कॉल कर ही लेता था मैं उसको।‘‘

‘‘पिछले दिनों कोई बदलाव नोट किया हो आपने, या फिर कुछ खास बताया हो मकतूला ने आपको। किसी से कोई झगड़ा, कोई अनबन भले ही छोटी-मोटी ही रही हो।‘‘

‘‘नहीं भाई ऐसी तो कोई बात कभी नहीं की उसने, उल्टा वो पहले से ज्यादा खुश रहने लगी थी। उसके गम्भीर स्वाभाव में एकदम से खिलंदड़पन आ गया था। कहीं से भी कुछ ऐसा नहीं लगता था कि वो किसी भी वजह से परेशान हो, या उसे कोई तकलीफ हो।‘‘

‘‘पास-पड़ोस की बातें शेयर करती थी।‘‘

‘‘नहीं, वैसे भी वो आम औरतों की अपेक्षा बहुत कम बोलती थी।‘‘

‘‘आपके होम टाउन में कोई वाद-विवाद रहा हो किसी से।‘‘

‘‘नहीं ऐसा कुछ नहीं था। देखो सुनीता की हत्या में जहां तक मैं समझता हूं इन बातों का कोई दखल नहीं था। कातिल ने उसे सिर्फ इसलिए मार डाला क्योंकि वो होमोसाइडल है। उसे इंसानी कत्ल करने और तड़पते हुए लोगों को देखने में मजा आता है। फिर जरा सोचो अगर हमारी किसी दुश्मनी या दूसरे किसी कारण से सुनीता का कत्ल हुआ होता तो मंदिरा आज जिंदा ना होती, क्योंकि उसका तो हमसे दूर-दूर तक कोई लिंक नहीं था।‘‘

‘‘ठीक कह रहे हैं आप! यकीनन इस बार किसी पागल अपराधी से पाला पड़ा है।‘‘

‘‘हां पागल ही है वो, किसी आम इंसान के वश का तो नहीं है किसी को यूं नोच खाना।‘‘

‘‘आप आज ही पहुंचे हैं।‘‘

‘‘नहीं कल शाम को ही आ गया था।‘‘

‘‘ठहरे कहां हैं?‘‘

‘‘रोज वैली होटल में! क्योंकि फ्लैट तो पुलिस ने सील किया हुआ है। वैसे उम्मीद है कल पुलिस फ्लैट की चाबी मुझे सौंप देगी, फिर आगे मेरा मुकाम वहीं होगा। और कुछ पूछना चाहते हो?‘‘

‘‘आप कुछ और बताना चाहते हैं।‘‘

‘‘नहीं।‘‘

‘‘फिर तो आमद का शुक्रिया।‘‘

शुक्रिया कबूल करता वो उठ खड़ा हुआ।

उसके जाने के बाद शीला भीतर आई।

‘‘बैठ जा।‘‘

‘‘क्या कह रहा था वो।‘‘

मैंने बताया।

‘‘दम तो है उसकी बात में।‘‘

‘‘हां कम से कम एक बात में तो दम था कि अगर यह कत्ल किसी रंजिश के चलते हुआ होता तो दोनों में से एक औरत जरूर जिंदा होती।‘‘

‘‘ठीक कह रहे हो।‘‘

‘‘देख दोनों को जोड़ने वाली एक ही कड़ी है और वो है चौहान! अभी तक इकलौता वही सख्स सामने आया था जो दोनों औरतों को जानता था। बतौर डॉक्टर खरवार जिससे मंदिरा कई बार मिलने आ चुकी थी और सुनीता तो उसकी रेग्युलर थी ही। ऐसे में अगर चौहान को जंजीर से बाहर कर दिया जाया तो दोनों कड़ियां टूट कर बिखर जाती हैं।‘‘

‘‘क्या कहना चाहते हो।‘‘

‘‘यही कि अगर कत्ल सिर्फ मंदिरा का हुआ होता और चौहान की टांग इसी तरह उसमें फंसी होती तोे मेरा सीधा शक सुनीता पर जाता, ये सोचकर कि उसे अपने आशिक की कोई और अंकशायनी मंजूर नहीं थी इसलिए उसने मंदिरा की हत्या कर दी।‘‘

‘‘और ऐसा हुआ क्यों नहीं हो सकता।‘‘

‘‘मतलब।‘‘

‘‘समझ लो सुनीता को पता चल चुका था कि जिसे वो अपने हिंडोले पर झूला झुला रही थी, उसका किसी और से भी अफेयर था। ना सिर्फ अफेयर था बल्कि वो उसके बच्चे की मां भी बनने वाली थी और कोई बड़ी बात नहीं थी कि निकट भविष्य में दोनों शादी भी कर लेते। ऐसे में वो किस कदर गर्म तवे पर गिरी पानी की बूंदों की तरह तड़पी होगी, सुलगी होगी, इसका अंदाजा तुम बखूबी लगा सकते हो। कोई बड़ी बात नहीं कि मंदिरा जैसी पटाखा को पाकर चौहान सुनीता से कन्नी काटने लगा हो। ऐसे में उसने गुस्से में आकर उसका मंदिरा को नोंचना-खसोटना और कत्ल कर देना क्या इतनी बड़ी बात होगी जो पहली कभी नहीं हुई हो।‘‘

‘‘नहीं बहुतेरे ऐसे केस देखे हैं मैंने, मगर फिर सवाल ये उठता है कि सुनीता का कत्ल किसने किया।‘‘

‘‘जाहिर है चौहान ने।‘‘

‘‘क्यों?‘‘

‘‘बदला डियर और किसलिए, मंदिरा को पाकर वो सुनीता से वैसे ही दूर हो चुका था। ऐसे में किसी भी तरह उसे ये पता चल गया कि मंदिरा की हत्या सुनीता ने की थी, तो क्या वो पागल नहीं हो उठा होगा। और उसी पागलपन में उसने अगर सुनीता की बोटियां नोंच डाली हों तो क्या बड़ी बात है।‘‘

‘‘कहानी अच्छी गढ़ी है तूने मगर इसमें एक बहुत बड़ा झोल ये है कि अगर सुनीता का कत्ल चौहान ने किया था तो उसे अपनी वर्दी पर मंदिरा और सुनीता का खून लगाने की क्या जरूरत थी। अपने ही जूतों से घटनास्थल पर निशान छोड़ने की क्या जरूरत थी। बल्कि अपने खिलाफ कोई भी सबूत छोड़ने की उसे क्या जरूरत थी।‘‘

‘‘देखो थ्यौरी मैंने बयान कर दी, अब इन छोटे मोटे प्रश्नों का जवाब खुद तलाश करो प्लीज।‘‘

‘‘जवाब नहीं तेरा।‘‘

‘‘शुक्रिया। अब यहां से चलने के बारे में क्या ख्याल है तुम्हारा।‘‘

‘‘बड़ा ही नेक ख्याल है बस एक सिगरेट पी लेने दे।‘‘

उसने सहमति में सिर हिलाया।

‘‘बहरहाल मुबारक हो, पेइंग क्लाइंट मिल गया तुम्हें।‘‘

‘‘तुझे भी मुबारक हो।‘‘

‘‘थैंक्यू।‘‘

‘‘अब फटाफट अपना रेट कार्ड निकाल ताकि मैं तेरी मुनासिब गैर मुनासिब फीस भर सकूं और तुझे पा सकूं।‘‘ मैं सिगरेट का एक गहरा कश लेता हुआ बोला।

‘‘रेट कार्ड की एक ही कॉपी थी मेरे पास, वो अभी मैंने गायकवाड़ को दे दिया, वो भी मुझे पाने का तमन्नाई है। फिर अभी-अभी उसकी बीवी मरी है वो तुमसे ज्यादा बड़ा दावेदार है। ऊपर से विदेश में रहता है, मोटी आमदनी है, ऐश कराएगा मुझे।‘‘

‘‘तू अपना रेट बता मैं अपना सबकुछ बेचकर भी चुकाऊंगा और तुझे हासिल करके रहूंगा।‘‘

‘‘सबकुछ बेचने की जरूरत नहीं पड़ेगी।‘‘

‘‘फिर तो फौरन बता।‘‘ जवाब में उसने राइटिंग पैड अपनी ओर खींच कर उसपर कुछ शब्द घसीटे और ऊपर का वरका फाड़कर मेरे सामने रख दिया।

मैंने देखा, लिखा था, ‘इंसान बन जाओ‘

मैं बस आह भर कर रह गया।

साहबान लड़कियों की एक खास आदत होती है। जब तक उन्हें लगता है कि उन्हें कोई भाव नहीं दे रहा तब तक वो सबको भाव देती हैं - अखबार वाले, दूध वाले, कैंटीन वाले, यहां तक कि गोलगप्पे वाले को भी नहीं छोड़तीं - मगर ज्योंहि उन्हें पता लगता है कि कोई उन्हें भाव देने लगा है तो बस वहीं से वो भाव देने की बजाय भाव खाना शुरू कर देती हैं।

‘‘क्या हुआ बोलती क्यों बंद हो गयी रंगीले राजा की।‘‘

‘‘मैं सोच रहा हूं।‘‘

‘‘क्या?‘‘

‘‘यही कि अगर मैं तेरे साथ जबरदस्ती करूं तो तू पुलिस में कंप्लेन करेगी या नहीं।‘‘

‘‘नहीं करूंगी, प्रॉमिश।‘‘

‘‘सच कह रही है।‘‘

‘‘लो मैंने क्या तुमसे झूठ बोला है कभी।‘‘

‘‘बोला तो नहीं है।‘‘

‘‘फिर भी मेरी जुबान पर ऐतबार नहीं हो रहा।‘‘

‘‘समझ ले हो गया।‘‘

‘‘गुड।‘‘

‘‘तुझे पता है आज क्या दिन है।‘‘

‘‘हां रविवार।‘‘

‘‘मेरा मतलब था आज के दिन स्पेशल क्या है।‘‘

‘‘क्या है?‘‘

‘‘लो तुझे तो मेरा बर्थ डे भी याद नहीं रहता।‘‘

‘‘सॉरी, हैप्पी बर्थ डे, चलो अब कोई पार्टी हो जाय।‘‘

‘‘वो तो हमेशा मेरे फ्लैट पर होती है, सारा इंतजाम कर रखा है मैंने।‘‘

‘‘फिर वहीं चलते हैं।‘‘

‘‘हां चल।‘‘

ऑफिस बंद कर हम दोनों बाहर आकर मेरी कार में सवार हो गये।

शीला भी तारा अपार्टमेंट में ही रहती थी, मगर दोनों के फ्लैट्स अलग-अलग इमारतों में थे।

करीब आधा घंटा बाद मैं उसके फ्लैट के आगे से गुजरने लगा तो उसने मुझे गाड़ी रोकने को कहा। मैंने कार रोकी तो वह नीचे उतरकर ड्राइविंग साइड में आकर बड़ी अदा से बोली, ‘‘गुड बाई मिस्टर गोखले, कल मिलेंगे।‘‘

‘‘मगर मेरा बर्थ-डे सेलिब्रेशन।‘‘

‘‘वो तो उन्नीस जुलाई को आता है हैंडसम! थैंक्स फॉर दी लिफ्ट।‘‘ कहकर उसने एक आंख दबाई, मुस्कराई, मुड़ी और कूल्हे मटकाती हुई इमारत की ओर बढ़ गयी।

मैं ठंडी आह भरकर रह गया।

चार जून 2017

सोमवार को पुलिस ने राकेश चौहान को तीस हजारी कोर्ट में रिमांड के लिए पेश किया। पुलिस की तरफ से जो सरकारी वकील अभी-अभी वहां पहुंचा था वो अड़तालिस के पेटे में पहुंचा हुआ सुरेश राजदान था, जो शक्ल से ही बेहद खुर्राट नजर आता था।

डिफेंस लॉयर के तौर पर नीलम कंवर वहां पहले से ही उपस्थित थी। राजदान ने एक नजर उसपर डाली फिर सधे कदमों से चलता हुआ उसके करीब पहुंचा।

‘‘उम्मीद नहीं थी कि ऐसे किसी केस में डिफेंस लॉयर कोई महिला होगी।‘‘ वो नीलम से बोला।

‘‘क्यों आपको औरतों से डर लगता है।‘‘

‘‘नहीं उनको हराने पर कोई वाहवाही नहीं मिलती, लोग बाग कह देते हैं औरत को हराया तो क्या हराया।‘‘

‘‘आप हराने की नहीं हारने से बचने की तरकीब ढूंढ़िये तो शायद आपकी इज्जत बच जाय वकील साहब।‘‘

‘‘हैरानी होती है कि दो औरतों की पूरी बेरहमी से, वहशियाना ढ़ंग से हत्या कर दी गयी और जिसपर उसकी हत्या का इल्जाम है उसका बचाव करने का साहस एक औरत बटोर पाई अपने भीतर।‘‘

‘‘अगर आप मुझसे डर रहे हैं तो साफ कहिए मैं आपकी खातिर केस छोड़ सकती हूं, क्योंकि मैं बुजुर्गों से हमेशा बड़े ही अदब से पेश आती हूं।‘‘

सुनकर राजदान का चेहरा कानों तक लाल हो उठा। वह अग्नेय नेत्रों से नीलम को घूरता हुआ अपनी सीट की ओर बढ़ा।

‘‘जरा ठहरिए, एक बात सुनकर जाईए मेरी।‘‘

वो ठिठका उसकी ओर घूमा और घूरकर उसे देखने लगा।

‘‘चौहान की जमानत मैं आज ही करा लूंगी, आप रोक सकें तो रोक के दिखा देना।‘‘

उसने हैरानी से नीलम को देखा, ‘‘तुम मजाक कर रही हो।‘‘
 
‘‘जी नहीं एडवांस में अगाह कर रही हूं कि आप से जो बनता हो कोशिश कर के देख लीजिएगा, रिमांड तो मिलने से रहा।‘‘

उसने गम्भीरता से सिर हिलाया फिर आगे बढ़ गया।

‘‘ऐसा कौन सा तीर है तेरे तरकस में जो उसके सामने इतना बड़ा चैलेंज उछाल दिया।‘‘

राजदान के जाते ही मैं बोल पड़ा।

‘‘सच बोलूं।‘‘

‘‘हां मगर ये मत कह देना कि तू अपने कातिल नैनों के बाण चलाएगी और जज साहब उसके शिकार होकर चौहान को पुलिस रिमांड पर देने की बजाय जमानत मंजूर कर लेंगे।‘‘

‘‘नहीं कहूंगी।‘‘

‘‘फिर क्या बात है।‘‘

‘‘कुछ भी नहीं - वो एक आंख दबाकर बड़े ही मक्काराना अंदाज में मुस्कराई - वो तो मैंने यूंही कह दिया था, अब वो यही सोचकर तड़प रहा होगा कि आखिर मेरे पास मुजरिम के फेवर में ऐसा क्या है जो मैंने यूं जोर-शोर से उसकी जमानत करा लेने का दावा कर दिया।‘‘

‘‘कमाल है यार! तू मेरी समझ से एकदम परे है।‘‘

जवाब में वह हौले से हंस दी।

तभी मजिस्टेªट ने वहां कदम रखा। सभी उठकर खड़े हो गये।

मुलजिम को मजिस्ट्रेट के सामने पेश किया गया।

कार्रवाई शुरू हुई।

‘‘क्या मुलजिम अपना गुनाह कबूल करता है?‘‘ मजिस्ट्रेट ने पूछा।

‘‘नो योर ऑनर - नीलम बोली - मुलजिम बेगुनाह है। उसे फ्रेम किया गया है। उसके खिलाफ कोई चश्मदीद गवाह नहीं है। वो दिल्ली पुलिस में सब-इंस्पेक्टर है, और उसका छह साल का सर्विस रिकार्ड एकदम बेदाग है। इन बातों के मद्देनजर केस को जमानत के काबिल समझा जाय।‘‘

तभी सरकारी वकील राजदान अपनी जगह से उठ खड़ा हुआ, योर ऑनर! - राजदान ने बेहद प्रभावशाली लहजे में बोलना शुरू किया - जमानत की बात तो बहुत दूर है, अभी प्रासीक्यूशन इतने ठोस तरीके से मुलजिम का गुनाह साबित करके दिखाएगा कि उसके दम पर माननीय अदालत चाहे तो आज ही मुलजिम का फैसला सुना सकती है।‘‘

‘‘मिस्टर पब्लिक प्रासीक्यूटर आप जानते हैं कि ये हरगिज भी संभव नहीं है, इसलिए गैरजरूरी बातों से परहेज रखें।‘‘

‘‘योर ऑनर! ये तय है कि मुजरिम ने दो निर्दोष महिलाओं की ना सिर्फ हत्या की बल्कि..।‘‘

‘‘योर ऑनर जरा गौर फरमायें वकील साहब तो खुद ही मुलजिम को मुजरिम करार दिए दे रहे हैं, जबकि ये साबित होने के मामले में दिल्ली अभी दूर है कि जो किया वो मुलजिम ने ही किया है, जो कि अदालत के सामने कटघरे में खड़ा इंसाफ का तलबगार है।‘‘ नीलम गरजती हुई बोली।

‘‘मैं वहीं पहुंच रहा हूं, अगले दस मिनटों में मैं मुलजिम का अपराध साबित कर के दिखा दूंगा।‘‘

‘‘ओके प्रोसीड।‘‘ मैजिस्ट्रेट बोला।

राजदान ने सविस्तार लाश मिलने से लेकर चौहान की गिरफ्तारी तक की कथा कह सुनाई। पोस्टमार्टम की रिपोर्ट, मैडिकल टीम की रिपोर्ट, मौकायेवारदात की तस्वीरें और बहुत सारे ताम झाम कोर्ट में पेश किये। फिर अदालत से मुलजिम को दस दिनों के रिमांड पर पुलिस को सौंपने का अनुग्रह किया।

जवाब में नीलम ने पुरजोर विरोध करते हुए कहा कि अभी तक पब्लिक प्रासीक्यूटर ने ऐसा कोई प्रमाण पेश नहीं किया जो मुलजिम के जमानत में अड़चन बन सके।

राजदान का धैर्य जवाब दे गया।

‘‘योर ऑनर मेरी समझ में नहीं आता कि वकील साहिबा को वो सबूत, सबूत क्यों नहीं नजर आते जो कि मैं अदालत में पेश कर चुका हूं।‘‘

‘‘क्योंकि आप सबूतों को पेश करते वक्त ये भूल गये कि मुलजिम पुलिस डिपार्टमेंट में ना सिर्फ एक काबिल अफसर है बल्कि अपनी दिमागी सूझ-बूझ से जाने कितने कत्ल के केस सुलझा चुका है। ऐसे में भला कैसे उससे उम्मीद की जा सकती है ना सिर्फ उसने दो औरतों की निर्ममता पूर्वक हत्या कर दी, बल्कि हत्या के बाद अपनी खून लगी वर्दी और जूतों से पीछा छुड़ाने की बजाय वो नशे में धुत्त होकर, अपने फ्लैट का दरवाजा खुला छोड़कर सो गया। यानि उसने पुलिस को निमंत्रण दिया था कि आओ मैं ही हत्यारा हूं आकर मुझे गिरफ्तार कर लो। हम ये भी भूल रहे हैं योर ऑनर कि मुलजिम शराब के नशे में नहीं था बल्कि उसे कोई ऐसा नशीला पदार्थ खिलाया गया था, जिसने उसे कई घंटों के लिए बेसुध कर के रख दिया था। ऐसे में क्योंकर संभव हुआ कि मुलजिम दो जवान औरतों की हत्या करने में कामयाब हो गया और उसके शरीर पर एक खरोच तक नहीं आई।‘‘

‘‘योर ऑनर मैडिकल एग्जामिनर की रिपोर्ट ये जरूर बताती है कि उसने किसी नशीली चीज का सेवन किया था, मगर वो नशीली चीज क्या थी और मुलजिम किस हद तक उसकी गिरफ्त में था ये तय होना अभी बाकी है।‘‘

‘‘मैं भी यही कहना चाहती हूं योर ऑनर जब तक गिरफ्तारी के वक्त की उसकी हालत की सही तजुर्बानी नहीं हो जाती तब तक के लिए मुलजिम को जमानत पर रिहा कर दिया जाय।‘‘

‘‘योर ऑनर ऐसा नहीं किया जा सकता - राजदान खींझे हुए लहजे में बोला - क्योंकि पुलिस को कुछ ऐसे प्रमाण मिले हैं जिससे जाहिर होता है, कि मुलजिम मकतूला मंदिरा चावला को ब्लैकमेल कर रहा था, उससे संबंधित पूछताछ के लिए मुलजिम का रिमांड जरूरी है।‘‘

अदालत में सन्नाटा छा गया। मैंने और नीलम ने एक साथ चौहान के चेहरे पर नजर डाली। शक की कोई गुंजायश नहीं थी। उसका चेहरा निचुड़ चुका था।

‘‘योर ऑनर! - नीलम ने खुद को संभाला - ऐसा कोई सबूत नहीं हो सकता, ये मुलजिम को रिमांड पर लेने की मिस्टर पब्लिक प्रासीक्यूटर की नई चाल है, मैं मांग करती हूं कि अगर ऐसा कोई प्रमाण है तो उसे अदालत में पेश किया जाय।‘‘

‘‘योर ऑनर मजबूरन मुझे ऐसा करना पड़ा तो जरूर करूंगा, मगर इससे मुलजिम के खिलाफ पुलिस के केस पर गहरा असर पड़ेगा। ये बात योर ऑनर बखूबी समझते हैं।‘‘

मैजिस्ट्रेट ने सहमति में सिर हिलाया। जाहिर था कि राजदान की उस बात का उसपर गहरा प्रभाव पड़ा था।

‘‘डिफेंस ने और कुछ कहना है।‘‘ उसने नीलम से सवाल किया।

‘‘जी हां योर ऑनर - वो गम्भीरता से बोली, मैजिस्ट्रेट के उस फिकरे ने उसे समझा दिया था कि चौहान को जमानत नहीं मिलने वाली, लिहाजा उसने पैंतरा बदला - योर ऑनर पुलिस कहती है कि दोनों हत्यायें मुलजिम ने कीं। हत्याओं का पैटर्न देखिए, दोनों को एक ही तरह से - बुरी तरह नोंचा-खसोटा गया था। मैडिकल एग्जामिनर और पोस्टमार्टम की रिपोर्ट बताती है कि पहले दोनों को बेहोश किया गया, फिर गला घोंटकर उनकी हत्या कर दी गयी और हत्या के बाद कातिल ने अपने नाखूनों और दातों से उनके शरीर के गोश्त नोंच लिए थे। अब मेरा सवाल ये है कि क्या पुलिस को मुलजिम के नाखूनों या दांतों की जांच में ऐसा कुछ मिला जिससे ये साबित होता हो कि उसी ने दोनों औरतों को नोंचा-खसोटा था।‘‘

‘‘योर ऑनर - राजदान मुस्कराते हुए बड़े ही सब्र से बोला - ‘‘वकील साहिबा को शायद ये नहीं पता कि अब भारत में भी दस्तानों का आविष्कार हो चुका है।‘‘

जवाब में कोर्टरूम में हंसी का फौव्वारा सा छूटा।

‘‘और पब्लिक प्रासीक्यूटर को ये नहीं पता कि अगर दस्ताने पहन कर किसी को नोंचेंगे तो दस्ताने फट जाएंगे या फिर आप नोचने बकोटने में कामयाब नहीं हो पायेंगे। उस तरह के घाव तो हरगिज नहीं बना पाएंगे जैसा कि मरने वाली दोनों औरतों की लाशों पर पाया गया था।‘‘

राजदान का चेहरा उतर सा गया।

‘‘फिर भी मैं आपकी तसल्ली के लिए ये मान लेती हूं कि मुलजिम ने जो किया दस्ताने पहन कर किया। अब बराय मेहरबानी आप मुझे ये बताइये कि दांतों में उसने क्या पहन रखा था। क्या उसके दांतों का, मुंह का कोई मैडिकल एग्जामिन कराया गया? क्या वहां से गोश्त के टुकड़े बरामद हुए?‘‘

‘‘योर ऑनर मुलजिम एक शातिर व्यक्ति है, उसने लोहे के पंजों वाले दस्ताने इस्तेमाल किये होंगे और रही बात मुंह की तो आजकल मार्केट में बहुत से ऐसे लिक्विड मौजूद हैं जिनसे कुल्ला कर लेने पर मुंह की जांच में ऐसी किसी चीज का पता नहीं चलता।‘‘

‘‘क्या पुलिस को ऐसा कोई दस्ताना या लिक्विड की शीशी मौकायेवारदात या मुलजिम के घर से मिली थी? मेरा जवाब है नहीं मिली।‘‘

‘‘उसने दोनों चीजें कहीं फेंक दी होंगी।‘‘ राजदान दबे स्वर में बोला और यहीं वो बहुत बड़ी गलती कर बैठा।

‘‘जरा गौर करें योर ऑनर! उसने दस्ताने फेंक दिये, लिक्विड की शीशी फेंक दी क्योंकि वो शातिर है तेज दिमाग है। मगर उस अक्ल के अंधे को ये नहीं दिखाई दिया कि वो एक ऐसी वर्दी पहने था, जो दो-दो इंसानों के खून से लथपथ है। ये नहीं दिखाई दिया कि उसके जूतों के तले में खून लगा हुआ है। तेज दिमाग और शातिर होने के साथ-साथ वो इतना बड़ा गावदी भी था कि उसे अपनी वर्दी की उस नेमप्लेट का भी ख्याल नहीं आया जो कि फटकर मकतूला के हाथ में रह गयी थी। योर ऑनर! साफ जाहिर हो रहा है कि थाने के एसएचओ समेत पूरा स्टॉफ मुलजिम के खिलाफ कोई साजिश रच रहा है।‘‘

‘‘योर ऑनर - अब तक चुप खड़ा चौहान अचानक बोल पड़ा - मैं विद रिक्वेस्ट कुछ कहना चाहता हूं।‘‘

मैजिस्ट्रेट ने पहले तो उसे घूर कर देखा फिर बोला - ‘‘बोलो क्या कहना है।‘‘

‘‘योर ऑनर अभी वकील साहिबा ने मेरे कलीग्स और एसएचओ साहब के बारे में जो कुछ भी कहा, वो सरासर नाजायज कहा। उनमें से हर किसी को मुझसे पूरी हमदर्दी है। सभी लोग बहुत अच्छे हैं, वे कभी मेरे साथ कुछ गलत नहीं कर सकते।‘‘

मैजिस्ट्रेट पर उसकी इस बात का गहरा प्रभाव पड़ा था, ऐसा उसकी सूरत से ही दिखाई देने लगा था।

‘‘योर ऑनर - नीलम आगे बोली - पुलिस ने इस डबल मर्डर के केस में जगह-जगह प्रोसिजर की धज्जियां उड़ाई हैं। यहां तक कि मकतूला मंदिरा चावला की लाश बरामद करने वाले प्राइवेट डिटेक्टिव विक्रांत गोखले के बारे में भी पुलिस ने कोई जांच-पड़ताल करने की कोशिश नहीं की, जो कि मौकायेवारदात पर हत्या के आस-पास के वक्त में मौजूद था।‘‘

अपना नाम सुनकर मैं हड़बड़ा सा गया। जाने किसी बात का बदला उतार रही थी कमीनी। अब कोई अल्टरनेट कातिल परोसने के लिए मेरा ही नाम मिला था।

‘‘योर ऑनर - वो आगे कह रही थी - उस प्राइवेट डिटेक्टिव के बारे में एक खास बात ये भी रही कि उसने सौ नम्बर पर कॉल करके - जैसा कि हर कोई करता है - पुलिस को वारदात की इत्तिला नहीं दी, बल्कि उसने सीधा थाने के एसएचओ नदीम खान को फोन कर के मकतूला मंदिरा चावला की हत्या की जानकारी दी थी। लाश की जो दुर्गति वहां दिखाई दे रही थी, पुलिस को चाहिए था कि वो गोखले का मैडिकल चैकअप कराती, उसके दांतों और नाखूनों को एक्सपर्ट से जांच करवाती मगर पुलिस ने ऐसा भी नहीं किया। पुलिस ने मुकेश सैनी नाम के उस इंश्योरेंश एजेंट का बयान लेने की भी कोशिश नहीं की जो मकतूला सुनीता गायकवाड़ की हत्या से कुछ देर पहले उसके फ्लैट में दाखिल होता देखा गया था, मगर वहां से बाहर जाते उसे किसी ने नहीं देखा था। साफ जाहिर हो रहा है कि पुलिस ने इस दोहरे हत्याकांड के मामले में ये सोचने तक की जहमत नहीं उठाई कि कातिल कोई और भी हो सकता है। लिहाजा माननीय अदालत से मेरी गुजारिश है कि इन तमाम बातों को ध्यान में रखते हुए, मुलजिम की जमानत मंजूर की जाय। मैं ये विश्वास दिलाती हूं कि मेरा क्लाइंट पुलिस की जांच में हर मुमकिन सहयोग के लिए उपलब्ध रहेगा। दैट्स ऑल योर ऑनर।‘‘

कहकर वो अपनी सीट पर जाकर बैठ गयी।

‘‘मिस्टर पब्लिक प्रासीक्यूटर कुछ कहना चाहते हैं?‘‘

‘‘योर ऑनर हम इन सारे सवालों का जवाब देंगे मगर उसके लिए हमें मुलजिम का रिमांड चाहिए।‘‘

मैजिस्ट्रेट ने कुछ क्षण विचार किया, फिर मुलजिम राकेश चौहान को पचास हजार की जमानत पर छोड़ने का हुक्म सुना दिया। इस शर्त के साथ कि मुलजिम पुलिस जांच में पूरा सहयोग करेगा और पुलिस की इंक्वायरी के लिए हमेशा अवेलेबल रहेगा। साथ ही कोर्ट ने इस मामले की सुनवाई के लिए सात दिन बाद की तारीख दे दी।

मैंने चैन की सांस ली। चौहान का चेहरा तो हजार वॉट के बल्ब की तरह दमकने लगा था। मानों जमानत ना मिली हो बल्कि बाइज्जत बरी कर दिया गया हो।

‘‘मुबारक हो।‘‘ मैं नीलम से बोला।

‘‘तुम्हे भी! जमानती है कोई इसके पास।‘‘

‘‘पूछता हूं।‘‘

मैंने चौहान से पूछा तो उसने कहा कि मैं ही क्यों नहीं ले लेता उसकी जमानत! उस मुसीबत से नीलम ने मुझे ये कहकर बचाया कि मेरा नाम उसने जिस तरह से कोर्ट में उछाला है। उस नजरिए से मेरा जमानती बनना ठीक नहीं होगा।

‘‘ठीक है मैं पूछता हूं किसी से अपना मोबाइल दो मुझे।‘‘

‘‘उसकी कोई जरूरत नहीं - मनोज गायकवाड़ जैसे हवा के जोर से वहां प्रगट हुआ - मैं तुम्हारा जमानती बन जाता हूं।‘‘

‘‘मगर जनाब आप!‘‘ चौहान हिचकिचाया।

‘‘डोंट वरी, वैसे तो कल ही मुझे विक्रांत ने लगभग यकीन दिला दिया था कि मेरी बीवी का कत्ल तुमने नहीं किया है। मगर आज इन वकील साहिबा की दलीलें सुनकर मेरा रहा-सहा शक भी दूर हो गया।‘‘

‘‘शुक्रिया! बहुत-बहुत शुक्रिया आपका। जमानत का तो खैर मैं किसी भी तरह इंतजाम कर लेता। मगर शकून मुझे ये सोचकर मिला कि आपका दिल मेरी तरफ से साफ हो गया है।‘‘

‘‘और मैंने भी - आवाज मेरे पीछे से आई थी, घूमकर देखा तो रंजना चावला खड़ी थी - आपको बेकसूर मान लिया है।‘‘

‘‘आप कौन?‘‘ चौहान ने उसे पूछा।

‘‘ये मंदिरा की छोटी बहन है।‘‘

‘‘ओह शुक्रिया! आप दोनों का शुक्रिया, अब तो जेल भी हो जाय तो परवाह नहीं।‘‘

‘‘मगर मुझे परवाह है - नीलम बोली - अपने मुकदमों की लिस्ट में मैं ऐसा कोई मुकदमा शामिल होने देना पसंद नहीं करूंगी जो मेरी हार का वायस बने।‘‘

उसकी बात पर हमारे बीच एक सम्मलित ठहाका गूंजा।

अब मुझे सुट्टे लगाने की तलब महसूस हो रही थी। फिलहाल मेरा वहां कोई काम भी नहीं था अतः मैं बाहर निकल आया। कार में पहुंचकर मैंने एक तरसे हुए शख्स की तरह सिगरेट के दो-तीन कश खींचे। फिर स्पीड को कंट्रोल करते हुए सामान्य रफ्तार से कश लगाने लगा।
 
चौहान के बारे में दो शक उपजाऊ बातें थीं जिनकी बाबत मैं उससे पूछताछ करना चाहता था। पहली बात डॉक्टर खरवार का ये कहना कि मंदिरा पहले भी कम से कम तीन बार चौहान के फ्लैट में जा चुकी थी और दूसरी बात वो पटाखा था जो सरकारी वकील ने कोर्ट रूम में फोड़ा था, कि चौहान मंदिरा को ब्लैकमेल कर रहा था - जिसके बाद उसका उतरा हुआ चेहरा अपनी कहानी आप बयान कर रहा था - बहरहाल अगली पेशी से पहले मेरे पास वक्त ही वक्त था, उससे सवाल-जवाब करने के लिए।

मैं कार में बैठा इंतजार करता रहा, नीलम के वापस लौटने का। वो इंतजार इतना लम्बा साबित हुआ कि मुझे बैठे-बैठे ही ऊंघ सी आने लगी फिर मेरी आंख लग गयी।

दोबारा आंख खुली तो मैंने नीलम को पैसेंजर सीट पर बैठा पाया, वो मुझे आवाज दे रही थी। मैंने घड़ी देखी, चार बजने को थे।

‘‘हो गई जमानत की कार्रवाई पूरी।‘‘

‘‘हां हो गई।‘‘

‘‘चौहान कहां है?‘‘

‘‘चला गया, मैं उससे कई सारे सवाल करना चाहती थी मगर वो ये कहकर चला गया कि कल मेरे ऑफिस आ जाएगा।‘‘

‘‘और मनोज गायकवाड़!‘‘

‘‘वो भी जा चुका है।‘‘

‘‘तो हम यहां क्या कर रहे हैं।‘‘

‘‘कुछ नहीं, अब चलकर मुझे कहीं अच्छा सा लंच कराओ।‘‘

‘‘तेरी गाड़ी!‘‘

‘‘मैंने राघव को बोल दिया है वो ले आएगा।‘‘

राघव उसका ड्राइवर कम लैग मैन था, जो उसके लिए जांच पड़ताल जैसे फुटवर्क को अंजाम देता था।

मैं कार पार्किंग से निकालकर बाहर ले आया और इंडिया गेट के सर्कल के साथ घूमते हुए उस सड़क पर डाल दिया जो के.जी. रोड को जाता था।

हमने केजी मार्ग पर एक कदरन नये बने रेस्टोरेंट में खाना खाया। रेस्टोरेंट का नाम भी क्या खूब था, ‘मेहमानवाजी‘ नाम के अनुरूप ही वहां का माहौल भी था। लंच ऑवर में वहां सबको तरह-तरह के व्यंजनों से सुशोभित थाली परोसी जाती थी, वेटर आप की थाली पर निगाह रखते थे, जैसे ही थाली की कोई चीज खतम हुई, लेकर पहुंच जाते थे, ‘सर फलाना चीज और दे दूं।‘ या ‘‘सर रोटी और दे दूं‘ वगैरह-वगैरह।

बहरहाल लंच के बाद मैं इंडिया गेट पहुंचा। वहां पार्किंग में कार खड़ी कर जब नीचे उतरने लगा तो वो पूछे बिना नहीं रह सकी, ‘‘यहां कहां जा रहे हो?‘‘

‘‘पार्क में, आज वैलेंटाइन डे है सोचा तुझे प्रपोज करने का इससे अच्छा मौका और जगह क्या होगी।‘‘

‘‘वो तो फरवरी में आता है।‘‘

‘‘वो वाला कोई और होगा, सबका वाला होगा। आज वाला सिर्फ हमारा वैलेंटाइन डे है।‘‘

‘‘सच्ची!‘‘

‘‘सच्ची!‘‘

‘‘और शीला का क्या?‘‘

‘‘उसे सुबह ही प्रपोज कर दिया था।‘‘

‘‘एक नम्बर के कमीने हो तुम।‘‘

‘‘और तू एक नम्बर की कमीनी है जो खसम के साथ होते हुए भी सौतन के बारे में सोच कर मरी जा रही है।‘‘

‘‘चलो नहीं मरती अब, मगर पहले बताया होता तो ढंग के कपड़े तो पहन के आई होती।‘‘

मैंने हैरानी से उसकी तरफ देखा, ‘‘और जो कपड़े तू इस वक्त पहने है उसे क्या बेढंगा कहते हैं।‘‘

‘‘नहीं मगर...।‘‘

‘‘अगर मगर छोड़ आ भीड़ में चलते हैं।‘‘

‘‘भीड़ में क्यों?‘‘

‘‘अरी बावली वहां जब मैं तेरे साथ कुछ करूंगा तो कोई ध्यान नहीं देगा, सब अपने में मस्त हैं।‘‘

‘‘क्या कुछ करोगे?‘‘

‘‘प्रैटिकली दिखाऊंगा न! अब चल।‘‘

कहकर मैंने कोहनी उसकी ओर बढ़ाई तो उसने बांह डाल दी और मेरे साथ सटकर चलने लगी। थोड़ा आगे बढ़ते ही मैंने कोहिनी का दबाव थोड़ा उसकी तरफ किया तो वो उसके वक्ष स्थल से टकराने लगा। मुझपर आनंद की खुमारी हावी होने लगी।

‘‘मेरे पास एक और भी है! दूसरी वाली साइड।‘‘

‘‘क्या?‘‘

‘‘वही जिसे तुम बार बार यूं टच कर रहे हो, जैसे अंजाने में हो रहा हो।‘‘

‘‘सच में दो हैं तेरे पास।‘‘

‘‘हां चाहो तो दूसरी साइड आकर देख सकते हो।‘‘

‘‘रहने दे, तू कहती है तो दो ही होंगे, अब इतनी सी बात पर झूठ थोड़े ही बोलेगी।‘‘

‘‘यकीन जताने का शुक्रिया! अब अगर तुम्हारे छिछोरेपन की लिप्सा समाप्त हो गयी हो, तो कोहनी को आराम दो बेचारी थक गई होगी।‘‘

‘‘लिप्सा तो खैर पूरी होने का सवाल ही नहीं है, मगर तू कहती है तो....।‘‘

‘‘हां मैं कहती हूं! प्लीज विहैव मिस्टर गोखले।‘‘

‘‘यस मैम, राईट अवे मैम!‘‘

मैंने एक फरमाईशी आह भरी और कोहनी वापस खींच ली।

साहबान! औरत जब लुटाने पर आती है, तो यूं लुटाती चली जाती है कि अपना सबकुछ गवां बैठती है। ना लुटाना चाहे, तो मर्द भले ही जबरदस्ती पर ही क्यों ना अमादा हो जाये, उसकेे पल्ले कुछ नहीं पड़ता - बशर्ते कि वो जेल की चार दिवारी में कैद होने को कोई उपलब्धि ना मानता हो।

‘‘ये जगह ठीक है - वो भीड़-भाड़ से थोड़ा परे ठिठकती हुई बोली - यहीं रूकते हैं।‘‘

मैंने सिर हिलाकर हामी भरी।

‘‘चलो अब अपनी स्वीट हार्ट को आई लव यू बोलो।‘‘

‘‘क्या?‘‘

‘‘मैंने कहा मुझे आई लव यू बोलो, कम सुनते हो क्या?‘‘

‘‘आई लव यू।‘‘

‘‘मजा नहीं आया।‘‘

‘‘आई लव यू माई स्वीट हार्ट।‘‘

‘‘ऊं...हूं...। थोड़ा स्टाइल से।‘‘

‘‘नीलम मेरी जान! आई लव यू।‘‘

‘‘अरे ढंग से बोलो यार! बीवी से थोड़े ही बोल रहे हो, जो महज फार्मेलिटीज पूरी कर दी और हो गया काम! मत भूलो तुम मुझे प्रपोज कर रहे हो।‘‘

‘‘नीलू मेरी जान! मेरी स्वीट हार्ट! तू सोच भी नहीं सकती कि मैं तुझे कितना चाहता हूं। मेरी तमाम खुशियां, मेेरे जिंदगी के तमाम अफसाने, बस तुझसे ही शुरू होते हैं और तुझपर ही खतम हो जाते हैं। काश की चाहत मापने का कोई पैमाना होता, और मैं तुझे दिखा पाता कि मैं तुझे कितना चाहता हूं। मेरे रोम-रोम में बस तेरी ही सूरत, तेरा ही एहसास बसा हुआ है। मेरी जिंदगी में ना तुझसे बढ़कर कुछ है, ना तेरे अलावा कुछ है। मैं खुद को दुनिया का सबसे खुशनसीब इंसान समझूंगा अगर तू... अगर तू.....।‘‘ मैं बौखला सा गया।

‘‘क्या अगर मैं......।‘‘

‘‘अगर तू...।‘‘ मैं फिर खामोश हो गया।

‘‘क्या अगर मैं.....अब कुछ बोलोगे भी।‘‘ वो उतावले स्वर में बोली।

‘‘मैं खुद की किस्मत पर रश्क करूंगा, अगर तू - मैं बड़ी हिम्मत कर के बोला - ‘‘सिर्फ एक रात के लिए मेरी बन जा।‘‘

‘‘ठहर जा कमीने, मैं अभी मनाती हूं तेरा वैलेनटाइन।‘‘ कहकर वो मुझपर झपट पड़ी, उसका हाई हील इतनी जोर से मेरे टखनों से टकराई कि मैं पीड़ा से बिलबिला उठा।

‘‘हैप्पी वैलेनटाइन डे डार्लिंग।‘‘ वो अपने होंठो को गोल करके बड़ी अदा से मुझे पुचकारती हुई बोली।

मैं दर्द पीने की कोशिश में घुटनों के बल घास पर बैठ गया, मारे दर्द के मेरी आंखें छलक आईं। अगर यूं किसी की निगाह हम पर पड़ती तो यकीनन यही समझता कि मैं उसे प्रपोज कर रहा था।

‘‘अब बच्चों की तरह रोकर मत दिखाओ।‘‘

कितनी बेमुरब्बत होती है औरत जात जहर देकर बोलती हैं मरना मत! भला ये भी कोई बात हुई।

‘‘अब उठ भी जाओ कुछ तो मर्द बनो।‘‘

मैं उठा, उठकर खड़ा हो गया मगर दर्द की अधिकता से अभी भी बिलबिला रहा था।

‘‘इतनी जोर से भी कोई मारता है क्या?‘‘ मैं यूं बोला जैसे अभी रो पड़ूंगा।

‘‘और जो तुमने किया वो क्या था, भला गर्लफ्रेंड को कोई एक रात के लिए प्रपोज करता है क्या?‘‘

साहबान! ऐन यही वो वजह है जो मुझे शादी के ख्याल से भी दूर रखती है। शादी में भला वो मजा कहां जो यूं होने वाली छेड़छाड़ और तकरार में आता है। अभी उसकी गालियां खाकर भी मैं खुशी से झूम उठा था। यूं पब्लिक प्लेस पर मार खाकर भी मुझे उसपर गुस्सा नहीं आया था। मगर जरा सोचिए अगर वो शादी के बाद यूं सरे राह मुझे गाली देती, लात मार देती तो क्या होता - होना क्या था, मेरा थप्पड़ और उसका गाल होता। फिर कोर्ट-कचहरी होती और तलाक होता। तभी तो शादी को पवित्र बंधन कहा गया है। जनाब जब मन के एहसास, उल्लास ही खत्म हो जायेंगे तो इंसान पवित्र तो बन ही जायेगा। आप बस यूं समझ लीजिए कि शादीशुदा आदमी शूगर के उस मरीज की तरह होता है, जो तरह-तरह के पकवानों को देखकर ललचा तो सकता है मगर खाने की इजाजत उसे नहीं होती। इसके बावजूद भी अगर मरीज चोरी छिपे ऐसी चीजों का स्वाद लेना शुरू कर देता है तो परिणाम क्या होता है हम सभी जानते हैं -एक ना एक दिन वो हॉस्पिटल केस बन जाता है। शादीशुदा आदमी के साथ भी ऐन यही तो होता है, बस अंदाज जरा दूजे किस्म का होता है।

और जनाब ये बंदा हॉस्पिटल केस नहीं बनना चाहता।
 
पांच जून 2017

सुबह दस बजे के करीब मैं थाने पहुंचा। नदीम खान अपने कमरे में मौजूद था। मुझे भीतर आया देखकर उसने बैठने का इशारा किया और मेज पर रखी बेल पुश कर दी।

अर्दली भीतर आया तो उसे दो कॉफी लाने का हुक्म दे दिया।

‘‘कल तुम्हारी सहेली ने तो कमाल ही कर दिया कोर्ट में! वरना तो ऐसे केसेज में जमानत के चांसेज निल होते हैं। बहुत तड़पा था राजदान, हमपर भी पूरा पूरा खफा होकर दिखाया था उसने। जैसे चौहान का रिमांड ना मिलने की वजह हम ही हों। उसे सबसे ज्यादा बुरा तो ये लगा कि उस कल की छोकरी ने उसे चैलेंज किया कि वो मुलजिम की जमानत करा लेगी और करा कर दिखा भी दिया था उसने।‘‘

‘‘खान साहब सच पूछिये तो उम्मीद तो हमें भी नहीं थी। ना मुझे ना डिफेंस लॉयर नीलम तंवर को, चैलेंज तो बस एक मजाक था जो बाद में इत्तेफाकन सच साबित हुआ था।‘‘

‘‘कुछ भी रहा हो, मगर चौहान के लिए रिर्जल्ट तो अच्छा ही रहा। अब कम से कम उसे अपनी रातें हवालात में तो नहीं गुजारनी पड़ेंगी। जानते हो अभी आधा घंटा पहले डीसीपी साहब ने खूब खबर ली हमारे एसीपी पांडेय साहब की और जैसा कि अक्सर होता है, उन्होंने डीसीपी साहब का सारा गुस्सा तिवारी पर उतार दिया, कि उसने केस को सही ढंग से हैंडल नहीं किया था।‘‘

‘‘ऐसा तो नहीं होना चाहिए था। सच पूछिए तो चौहान की जमानत में इत्तेफाक का बड़ा हाथ था ना कि उसकी जमानत इसलिए हो गई क्योंकि पुलिस का केस कमजोर था।‘‘

‘‘ठीक कह रहे हो तुम, नीलम तंवर ने आखिरी वक्त पर तुम्हारा नाम लेकर जो स्टंट खेला था उसी ने मैजिस्ट्रेट का मूड बदल कर रख दिया था।‘‘

‘‘हो सकता है मगर इसके अलावा भी एक अहम बात थी जिससे चौहान ने मैजिस्टेªट की हमदर्दी बटोरी थी।‘‘

‘‘अच्छा! वो क्या थी?‘‘

‘‘जब डिफेंस अर्टानी नीलम तंवर ने ये इल्जाम लगाया कि थाने के एसएचओ समेत पूरा स्टाफ मुलजिम को फंसाने पर तुला हुआ है, तो चौहान ने पुरजोर लहजे में इसका विरोध किया था। उसकी बात सुनकर मैजिस्ट्रेट के चेहरे पर उसके प्रति उभर आई नरमी को मैंने साफ-साफ नोट किया था। सच पूछा जाय तो उसकी जमानत में उस नर्मी का बहुत बड़ा हाथ था।‘‘

‘‘हो सकता है! बहरहाल अब वो जमानत पर रिहा है तो खुद को बचाने की खातिर कुछ हाथ पांव तो खुद भी मारेगा।‘‘

‘‘सही कह रहे हैं आप!‘‘

‘‘ये मुकेश सैनी कौन है, क्या जानते हो उसके बारे में?‘‘

‘‘कुछ नहीं, पहली बार अदालत में ही मैंने उसका नाम सुना था, इसलिए जानने का तो सवाल ही नहीं उठता। यकीनन वो नीलम तंवर की एक्स्क्लूजिव खोज होगा। मैं पता करूंगा उसकी बाबत।‘‘

‘‘मुझे मालूम है कि तुम झूठ बोल रहे हो।‘‘

‘‘अरे नहीं सच कह रहा हूं! आप से झूठ बोलकर मरना है मुझे।‘‘

जवाब में वो कुछ क्षण निगाहों से मुझे तौलता रहा फिर बोला, ‘‘पता करना।‘‘

मैंने सहमति में सिर हिला दिया।

तभी कॉफी आ गयी।

‘‘अब बोलो कैसे आए।‘‘

‘‘जनाब मौकायेवारदात पर एक नजर डालने की तमन्ना है अगर पूरी हो जाती तो...।‘‘

‘‘कौन से वाले पर।‘‘

‘‘दोनों पर।‘‘

‘‘मंदिरा चावला की लाश जब बरामद की थी तब क्या ये मानने वाली बात है कि बिना वहां का खुर्दबीनी परीक्षण किये तुमने पुलिस को काल कर दिया था।‘‘

‘‘जनाब था तो कुछ ऐसा ही मगर मैं आपसे बहस नहीं करूंगा, समझ लीजिए दूसरी नजर डालना चाहता हूं।‘‘

‘‘पुलिस को तुम निरा गावदी समझते हो, जो तुम्हे लगता है कि अभी भी वहां से ऐसा कुछ बरामद हो सकता है, जो अंधे पुलिस डिपार्टमेंट को नहीं दिखाई दिया होगा। मौकायेवारदात का सुई ढूंढने जैसी तलाशी लेने के बावजूद नहीं दिखाई दिया होगा।‘‘

‘‘अरे नहीं जनाब, मैं तो बस!‘‘

‘‘छोड़ो सफाई देने की कोई जरूरत नहीं है। वैसे भी ये अधिकार कोर्ट द्वारा डिफेंस लॉयर को दिया जा चुका है, उसी के साथ जमकर मुआयना कर लेना।‘‘

‘‘और वो वक्त कब आएगा।‘‘

‘‘जब तुम्हारी सहेली की मर्जी होगी, हमें करना ही क्या है, बस एक हवलदार भेज देंगे, जो सील तोड़कर नजारा करवा देगा।‘‘

‘‘ऐसा अभी हो सकता है।‘‘

‘‘बिल्कुल हो सकता है, क्यों नहीं हो सकता।‘‘

मैंने नीलम को कॉल लगाई तो पता चला वो थाने ही आ रही थी और दस मिनट में पहुंचने वाली थी। मैंने खान को बता दिया कि वो आ रही है।

‘‘चलो ये अच्छा हुआ तुम्हे ज्यादा इंतजार नहीं करना पड़ेगा।‘‘

‘‘सो तो है - मैंने सिगरेट का पैकेट निकाल कर उसे ऑफर किया फिर खुद एक लेकर बारी-बारी से दोनों सिगरेट सुलगा दिए - ‘‘जनाब वो ब्लैकमेलिंग वाली क्या बात थी।‘‘

जवाब देने की बजाय उसने घूर कर देखा मुझे।

‘‘कोई गलती हो गई!‘‘

‘‘तुमसे नहीं मुझसे हो गयी, तुम्हारी सिगरेट मंहगी पड़ती जान रही है।‘‘

‘‘खान साहब जवाब मत दो मगर यूं जूते तो मत मारो।‘‘

वो हंसा।

‘‘खान साहब प्लीज!‘‘

‘‘प्लीज कहते हो तो बताता हूं पर खबरदार जो तुमने किसी के आगे मुंह फाड़ा कि ये जानकारी तुम्हें मुझसे हासिल हुई है, तिवारी के आगे भी नहीं।‘‘

‘‘मेरी मजाल नहीं हो सकती।‘‘

जवाब में वो कुछ क्षणों तक मुझे घूरता रहा मानों फैसला ना कर पा रहा हो कि मुझे उस बारे में बताये या नहीं बताये। फिर उसने अपनी जुबान खोली।

‘‘वो क्या है कि मकतूला मंदिरा चावला के स्टडी रूम की तलाशी लेने पर, हाथ से लिखा हुआ एक इकबालिया बयान बरामद हुआ, जो मंदिरा की हैंडराइटिंग में ही था और सिग्नेचर भी उसी के थे, ये बात हम पहले ही सुनिश्चित कर चुके हैं। उस बयान को पढ़ने से पता चला कि चौदह दिसम्बर की रात एमबी रोड पर इग्नू वाले मोड़ से थोड़ा आगे हुए एक एक्सीडेंट में भानुचंद अग्रवाल नाम का एक व्यक्ति बुरी तरह जख्मी हो गया था। जिसने की बाद में अस्पताल में दम तोड़ दिया था। जिस कार से उसका एक्सीडेंट हुआ था वो ना सिर्फ मंदिरा की थी बल्कि उसे चला भी वही रही थी। बयान में उसने साफ लिखा था कि उस वक्त वो नशे में थी और रह-रह कर उसकी आंखें मुंदी जा रही थीं। तभी एक व्यक्ति अचानक उसकी कार के सामने आ गया जिसे बचाने की उसने यथा संभव कोशिश की किंतु वो उसे कार की चपेट में आने से नहीं बचा सकी। इस प्रयास में उसकी कार डिवाइडर से टकराती हुई आगे बढ़ी जिससे कार की ड्राईविंग साइड में बहुत बड़ा डेंट भी आ गया था। फिर बाद में वो घर पहुंची और कार को भीतर खड़ी करने के बाद बेडरूम में जाकर सो गयी।‘‘

‘‘आपने एक्सीडेंट की बाबत चैक करवाया होगा।‘‘

‘‘हां और तब हमें पता चला कि जिस दुर्घटना का जिक्र उसके बयान में था, वो सचमुच घटित हुई थी, उसकी रिपोर्ट भी हमारे थाने में ही दर्ज हुई थी! मगर उसमें कोई हताहत नहीं हुआ था। जिस भानुचंद अग्रवाल नाम के व्यक्ति को उसने टक्कर मारी थी उसे महज फर्स्ट एड के बाद अस्पताल से छुट्टी दे दी गई थी।‘‘

मैं भौंचक्का सा उसकी शक्ल देखने लगा, ‘‘क्या मतलब हुआ इसका! उस रोज उसी जगह पर दो एक्सीडेंट हुए थे।‘‘

‘‘नहीं एक्सीडेंट एक ही हुआ था, बाद में चौहान ने किसी तरह मंदिरा की कार की शिनाख्त कर ली और उसके सिर पर जा पहुंचा। पहले उसका इरादा चाहे जो रहा हो मगर मंदिरा चावला की खूबसूरती का नजारा होते ही पट्ठा फ्लैट हो गया। लिहाजा उसपर कोई चार्ज लगाने का अपना इरादा उसने बदल दिया। अब हमारा अंदाजा ये है कि उसने मकतूला को यह कहकर खूब डराया होगा कि दुर्घटना का शिकार हुए व्यक्ति की मौत हो चुकी है और अब उसका जेल जाना तय है। सुनकर मंदिरा के फरिश्ते कांप गये होंगे। उसने चौहान से मिन्नतें की होंगी कि वो उसे बचा ले, कोई रिश्वत भी ऑफर की हो तो कोई बड़ी बात नहीं थी। चौहान को जिंदगी में पहली बार रिश्वत के लालच ने सताया भी तो कैसी रिश्वत, इन कैश नहीं बल्कि इन काइंड। वो मंदिरा को पाने का तलबगार था, ना कि उससे पैसे ऐंठना चाहता था। मंदिरा के पास भी उसकी बात मान लेने के अलावा कोई चारा नहीं था। लिहाजा उसने हामी भर दी होगी। मगर तब उसे ये नहीं पता था कि एक बार शुरू हुआ यह सिलसिला उसके जी का जंजाल बनकर रह जाने वाला था। उसे चौहान के साथ रखैलों जैसी जिन्दगी जीनी पड़ सकती थी। बहरहाल चौहान ने सबसे पहले उसे विश्वास में लेकर उसका इकबालिया बयान दर्ज करवाया। फिर शुरू में उसकी रजामंदी से उसके साथ रिश्ते बनाये और बाद में उसे ब्लैकमेल करके उसके साथ जिस्मानी संबंध कायम रखा। वो अक्सर उसे अपने फ्लैट पर भी आने को मजबूर करता था। इस बात के गवाह हैं हमारे पास।‘‘

‘‘जनाब गवाह इस बात के हो सकते हैं कि वो चौहान के फ्लैट पर जाती थी, मगर इस बात का गवाह कोई कैसे हो सकता है कि वो बाकायदा उसे ब्लैकमेल कर के बुलाता था।‘‘

‘‘दोनों एक ही बात है।‘‘

‘‘है तो नहीं पर आप कहते हैं तो चलिए मान लेता हूं। अब आप मुझे ये बताइए कि अगर ऐसा था तो चौहान ने उसका कत्ल क्यों कर दिया।‘‘

‘‘क्योंकि वो उसके बच्चे की मां बनने वाली थी, और अब ब्लैकमेल का शिकार ब्लैकमेलर को धमकाने लगा था कि अगर उसने उसके साथ शादी नहीं की तो वो सबको बता देगी कि वो उसकी नाजायज औलाद की मां थी।‘‘

‘‘जनाब वो भला ऐसी धमकी क्यों देती, जबकि उसकी निगाहों में उसपर हिट एण्ड रन का केस था, जिसमें एक आदमी की मौत भी हो चुकी थी। ऐसे में चौहान का तो जो बिगड़ता वो पता नहीं कब बिगड़ता, मगर मंदिरा का जेल जाना तो तय था।‘‘

‘‘तो फिर किसी तरह उसे असलियत की खबर लग गयी होगी, कि उस दिन दुर्घटना में किसी की मौत नहीं हुई थी।‘‘

‘‘तो फिर वो ब्लैकमेलिंग के जाल से आजाद क्यों नहीं हो गयी- चौहान जो कि उसकी निगाहों में शैतान की सातवीं औलाद था - उसपर शादी के लिए दबाव डालना कहां की समझदारी थी।‘‘
 
‘‘भाई वो इरादतन शरीफ लड़की होगी, उसे ये मंजूर नहीं होगा कि जिस्मानी रिश्ते किसी से बन चुकने के बाद वो किसी दूसरे से शादी करे।‘‘

‘‘जनाब वो पढ़ी-लिखी आजाद ख्याल लड़की थी। वो इन ढकोसलों में विश्वास रखती हो ये क्या मानने वाली बात है।‘‘

‘‘तो नहीं रखती होगी, कोई और बात रही होगी, खोज निकालेंगे, मगर ये तय रहा कि चौहान उसे ब्लैकमेल कर रहा था।‘‘

‘‘कत्ल वाले रोज की अपनी बद्तर हालत के लिए चौहान ने मंदिरा को जिम्मेदार ठहराया है। अब आप ये बताइए कि मकतूला ने उसे कोई नशीली चीज क्यों खिलाई।‘‘

‘‘मामूली सा जवाब है, हैरानी है अपने शरलॉक होम्स को नहीं सूझा।‘‘

‘‘आपका मतलब ये तो नहीं कि उसने चौहान के फ्लैट में अपना इकबालिया बयान तलाशने का वक्त हासिल करने के लिए उसको कोई नशीली चीज खिला दी थी।‘‘

‘‘और क्या वजह हो सकती है।‘‘

‘‘आगे क्या हुआ? मेरा मतलब है बात मंदिरा के कत्ल तक कैसे जा पहुंची?‘‘

‘‘हुआ ये होगा कि मंदिरा के वहां से जाने के बाद किसी वक्त चौहान को होश आ गया होगा। तब उसे समझते देर नहीं लगी कि जरूर मंदिरा ने उसके ड्रिंक में कुछ मिला दिया था। ऐसे में मंदिरा का गायब मिलना अपने आप में शक उपजाऊ बात थी। फिर कमरे में एक निगाह फिराते ही वह भांप गया होगा कि वहां की तलाशी ली गयी थी। तब उसे फौरन मंदिरा के इकबालिया बयान की याद आई होगी। जिसे गायब पाकर उसके हाथ पांव फूल गये होंगे। क्योंकि उस बयान का जो हव्वा उसने मंदिरा पर कायम कर रखा था - बयान मंदिरा के हाथ लग जाने पर वो तो खत्म होता ही, उल्टा मंदिरा अपने पेट में पल रहे बच्चे का हवाला देकर उसे शादी के लिए मजबूर भी कर सकती थी। वो नहीं राजी होता तो उसपर बलात्कार का मुकदमा दर्ज करा सकती थी! आजकल तो वैसे भी इस तरह के केस खूब चलन में हैं। बहरहाल एक बात तय थी कि मंदिरा की आजादी चौहान की नौकरी और जिन्दगी दोनों के लिए ही मुफीद नहीं थी। इतनी वजह काफी है मंदिरा के कत्ल के लिए या और कुछ बताऊं।‘‘

‘‘काफी से भी ज्यादा है जनाब, आप तो चौहान पर से मेरा यकीन ही हिलाये दे रहे हैं।‘‘

‘‘इन सभी बातों के मद्देनजर सोचो तो इस बात का जवाब अपने आप ही मिल जाता है कि क्यों उतनी नोंच-खसोट के बाद भी मंदिरा के साथ बलात्कार नहीं हुआ।‘‘

‘‘क्योंकि कातिल का मकसद उसका कत्ल करना था, ना कि बलात्कार! बाकी की नोंच-खसोट कातिल ने इसलिए की होगी ताकि वो किसी वहशी दरिंदे का किया धरा लगे। मगर जनाब इसमें एक पेंच है, अगर सचमुच उसकी हत्या चौहान ने की थी तो उसके नाखुनों से या दांतों ऐसे कोई अवशेष बरामद क्यों नहीं हुए?‘‘

‘‘इसके कई जवाब मुमकिन हैं, मसलन उसने मकतूला के जिस्म पर कोई रूमाल या दूसरा कपड़ा रख कर उक्त हरकतों को अंजाम दिया हो सकता है। अब सच में तो वो कोई आदमखोर था नहीं जो दांतों से नोंच खाता उसे, और फिर पोस्टमार्टम की रिपोर्ट में इस बात का साफ उल्लेख है कि मकतूला के साथ जो कुछ भी हुआ उसे बेहोश कर के गला घोंटने के बाद किया गया। ये अपने आप में सबूत है कि मंदिरा चावला की हत्या किसी होमीसाइडल या सैक्स के भूखे भेड़िये का काम नहीं था, बल्कि किसी ने खूब सोच समझकर, प्लान करके उसकी हत्या को अंजाम दिया था।‘‘

‘‘चलिए मान ली आप की बात अब जरा ये बताइए कि दोबारा अपने फ्लैट में पहुंचकर बजाय अपनी वर्दी और जूतों से पीछा छुड़ाने के वो बिस्तर पर टांगे फैलाकर सो क्यों रहा?‘‘

‘‘क्योंकि उसके ड्रिंक में मंदिरा ने जो कुछ भी मिलाया था, उसका असर दोबारा उसपर होने लगा था। फोरेंसिक वाले ये जानने की कोशिश में लगे हुए हैं कि उसे क्या खिलाया गया था। असली बात का खुलासा तो उनकी रिपोर्ट आने के बाद ही होगा।‘‘

‘‘जनाब ये क्या मानने वाली बात है कि वो फुल यूनीफॉर्म में मंदिरा का कत्ल करके साकेत से कालकाजी अपने फ्लैट तक पहुंच गया और किसी को उसकी फटी हुई वर्दी और उसपर लगे खून के धब्बे नहीं दिखाई दिए।‘‘

‘‘हो सकता है ना दिखाई दिया हो! साकेत से कालकाजी तक का सफर उसने पैदल चलकर या पब्लिक ट्रांसपोर्ट के जरिए तो पूरा करना नहीं था। फिर राजधानी में कितने लोग होंगे जो इस तरह की कोई बात दिखाई देने पर पुलिस को इत्तिला करते होंगे, मेरा जवाब है एक भी नहीं।‘‘

वो ठीक कह रहा था।

‘‘अब जरा इस बात पर भी रोशनी डालिए कि सुनीता गायकवाड़ को उसने क्यों मारा?‘‘

जवाब में वह खुलकर मुस्कराया, ‘‘बता दूं।‘‘

‘‘हां प्लीज।‘‘

‘‘ठीक है बता देता हूं, तुम भी क्या याद करोगे कि किसी रहमदिल पुलिसिये से पाला पड़ा था।‘‘

‘‘बेशक मैं याद करना चाहता हूं।‘‘

‘‘हुआ यूं कि चौहान मंदिरा का कत्ल करने के बाद अपने फ्लैट में पहुंचा ही था कि ऊपर से सुनीता वहां आ घुसी। उसने जब उसकी वर्दी पर खून के धब्बे देखे तो उस बाबत सवाल किए बिना ना रह सकी। चौहान उस वक्त तो उसे कोई भी बहाना बनाकर टाल सकता था, मगर जानता था कि ज्योंहि मंदिरा के कत्ल की खबर आम होती, सुनीता ने बिना बताये ही सारा माजरा समझ जाना था। एक कत्ल तो वह कर ही चुका था, हिम्मत की कोई कमी उसमें नहीं थी। लिहाजा उसने सुनीता के गर्दन पर वार करके उसे बेहोश कर दिया। फिर उसे लेकर उसके फ्लैट में पहुंचा और मंदिरा वाले पैटर्न पर ही उसकी भी हत्या कर दी। ताकि बाद में पुलिस को लगता कि वो भी उसी वहशी की बर्बरता का शिकार बन गयी थी जिसने मंदिरा की हत्या की थी। सारा खेल उसने बाखूबी खेला था, वह बच भी जाता मगर ऐन वक्त पर उसकी किस्मत ने दगा दे दिया और वो सबूत मिटाने से पहले ही बेहोशी की नींद सो गया।‘‘

हर बात का जवाब था उसके पास, लिहाजा चौहान का जेल जाना तो लगभग तय था। कोई चमत्कार ही हो जाता तो अलग बात थी, वरना अगली पेशी पर उसको जेल जाने से कोई नहीं बचा सकता था।

मगर मेरे मन में अभी भी उम्मीद की एक किरण बरकरार थी। मेरा दिल हरगिज भी ये मानने को तैयार नहीं था कि ये सब किया धरा चौहान का था।

‘‘जनाब आपके सारे केस का दारोमदार इस बात पर है कि मंदिरा के पेट में पल रहा बच्चा चौहान का था, मगर इसे साबित कैसे करेंगे।‘‘

‘‘क्यों भई इतने बड़े जासूस बनते फिरते हो अब क्या तुम्हें ये बताना पड़ेगा कि डीएनए टैस्ट से ऐसी बातों का बाखूबी पता लगाया जा सकता है।‘‘

‘‘मगर उसमें तो बहुत टाईम लग जाता है।‘‘

‘‘एक बार चौहान को जेल पहुंच जाने दो, फिर हमारे पास टाईम ही टाईम होगा। यकीन जानो अगली पेशी पर उसे जेल जाने से कोई नहीं बचा सकता, तुम्हारी वो सहेली क्या नाम है उसका....।‘‘

‘‘नीलम तंवर साक्षात!‘‘ मैंने पलट कर आवाज की दिशा में देखा तो नीलम को कमरे में कदम रखते पाया।

‘‘कुछ कह रहे थे आप मेरे बारे में, प्लीज बी कंटीन्यू।‘‘

‘‘कुछ खास नहीं बस इतना कि अगली पेशी पर आप चाहे जितना जोर लगा लें चौहान को जेल जाने से नहीं बचा पायेंगी।‘‘

‘‘देखेंगे इंस्पेक्टर साहब! अभी तो उसमें छह दिन बाकी है। इतने टाईम में जाने क्या-क्या घटित हो जाता है। क्या पता तब असली कातिल खुद ही अदालत में पेश होकर अपना जुर्म स्वीकार कर ले। या फिर प्रलय आ जाए और कोई बचे ही ना इस दुनिया में।‘‘

‘‘सब होप फुल थिंकिंग्स हैं।‘‘

‘‘हो सकता है! बहरहाल मैं यहां इसलिए आई हूं ताकि आप मौकायेवारदात के मुआयने की रस्म पूरी करें।‘‘

‘‘अभी लीजिए।‘‘

कहकर उसने एक हवलदार को बुलाकर आवश्यक निर्देष दिए और उसे हमारे साथ भेज दिया। मैंने अपनी कार वहीं छोड़ दी और नीलम की कार में सवार हो गया। हवलदार पिछली सीट पर पहले ही बैठ चुका था।

सबसे पहले हम मंदिरा चावला के आवास पर पहुंचे। जैैसा की आपेक्षित था रंजना चावला वहां मौजूद थी। हवलदार ने उसे बताया कि वो क्या चाहता था तो उसने सहमति में सिर हिला दिया।

हवलदार ने आगे बढ़कर स्टडी का दरवाजा खोल दिया मगर उसने भीतर जाने की जहमत नहीं उठाई। रंजना से पानी लाने को कह वो ड्राइंगरूम में ही सोफे पर पसर गया।

मैं और नीलम स्टडी में दाखिल हुए। लाश जहां पड़ी थी वहां फर्श पर चॉक से आउट लाइन बना दी गयी थी। बाकी कमरे की सारी चीजें मुझे उसी हालत में मिली जैसा मैं मंदिरा के कत्ल वाले दिन देखकर गया था। अलबत्ता सिगरेट के टोटे और गिलास वहां नहीं थे, जरूर फोरेंसिक टीम उन चीजों को अपने साथ ले गयी थी।
 
नीलम काफी देर तक उस जगह का और वहां बिखरी पड़ी चीजों का मुआयना करती रही। फिर वह चॉक से बनी आकृति के पास उकड़ू होकर बैठ गयी। मैं कमरे की खिड़की खोलकर बाहर का मुआयना करने लगा। खिड़की पर लोहे की मजबूत ग्रिल लगी हुई थी लिहाजा लकड़ी के पल्लों के खुला होने पर भी उधर से आवाजाही मुमकिन नहीं थी। वहां से हटकर मैं कमरे की तलाशी लेने लगा। शुरूआत मैंने राइटिंग टेबल की दराजों से की, मेरी निगाहें किसी ऐसी चीज की तलाश में थीं जो मकतूला का किसी मर्द से संबंध स्थापित कर पाती। मसलन कोई डायरी, कोई फोटो, कोई मोबाइल नम्बर! क्योंकि आजकल किसी को लव लेटर लिखने का जमाना तो रहा नहीं था। वो सारे काम तो व्हाट्सएप्प, फेसबुक और ई मेल्स के जरिए पूरे किये जाने लगे हैं।

ई-मेल्स और व्हाट्सएप्प से मुझे याद आया कि पुलिस की तफ्तीश में कहीं भी मंदिरा के मोबाइल का जिक्र नहीं आया था। जब कि ऐसे मामलों में पुलिस आजकल सबसे पहले हत्प्राण के मोबाइल को ही खंगालती है, आधे राज तो मोबाइल फोन ही खोलकर रख देते हैं।

मैंने खान को फोेन लगाया।

मालूम हुआ कि लाश के पास से या कमरे से कोई मोबाइल फोन बरामद नहीं हुआ था। जो कि कोई बड़ी बात नहीं थी, जरूर मंदिरा का मोबाइल हत्यारा अपने साथ ले गया था। अलबत्ता मंदिरा की कॉल डिटेल उन्होंने निकलवा लिया था। जिसमें कोई भी ऐसा नम्बर सामने नहीं आया जिसपर कि उसने रेग्युलर बात की हो। कत्ल से पूर्व जो उसने आखिरी कॉल की थी वो मेरे मोबाइल पर की गई थी। जिसके करीब घंटा भर बाद उसका मोबाईल ऑफ हो गया था।

‘‘जरा इधर आना।‘‘ मैं कॉल से फारिग हुआ तो नीलम ने आवाज दी।

मैं उसके करीब पहुंचा, ‘‘क्या हुआ?‘‘

वो अभी भी चॉक से बनी लाइन के करीब बैठी थी।

‘‘नीचे बैठो।‘‘

मैं उसके करीब बैठ गया।

‘‘अब मेज के नीचे उस लोहे के डंडे को देखो जो मेज के दोनों हिस्सों से पुल की तरह जुड़ा हुआ है।‘‘

मैंने गौर से उधर देखा मगर कुछ समझ में नहीं आया।

‘‘दिखाई दिया कुछ?‘‘

‘‘नहीं।‘‘

‘‘ठीक है मैं हटती हूं अब ऐन मेरे पोजिशन में बैठकर देखो। इसके बाद मेज के परली तरफ जाकर उसके किनारों का मुआयना करोे।‘‘

मैंने वैसा ही किया, तब जाकर मेरी निगाह उन लाइनों पर पड़ी जो टूटती-बनती चॉक वाली आकृति तक पहुंच रही थी। साथ ही मेज के नीचे लगे लोहे के डंडे पर किसी मैटेलिक चीज के रगड़ खाने से कुछ निशान बन गये थे, जो कि सिर्फ एक खास एंगल से देखने पर ही दिखाई देता था। मैंने मेज के उस पार जाकर देखा तो किनारे पर एक जगह सूख चुके खून का धब्बा दिखाई दिया, वैसा ही एक धब्बा उस तरफ मेज के नीचे फर्श पर भी था।

‘‘क्या मतलब हुआ इसका?‘‘

‘‘यही कि कत्ल से पूर्व वो मेज के उस पार कुर्सी पर बैठी हुई थी। हत्यारा उसके पीछे पहुंचा जहां उसने मकतूला के गर्दन के किसी नाजुक हिस्से पर नपा-तुला वार किया, जिसके बारे में वो श्योर था कि मकतूला उस वार से बेहोश हो जाएगी। हुआ भी यही मकतूला बेहोश होकर आगे को गिरी तो उसका सिर मेज के किनारे से जोर से टकराया और खून निकल आया। मगर क्योंकि मेज और कुर्सी के बीच फासला ज्यादा था इसलिए उसका बेहोश जिस्म मेज से टिका नहीं रह सका और नीचे जा गिरा। फिर कातिल मेज के दूसरी तरफ पहुंचा, जहां से उसने झुककर मकतूला के बेहोश जिस्म को मेज के नीचे से बाहर खींच लिया इस कोशिश में उसकी गले की चैन इस लोहे के डंडे पर घिसटती चली गयी जिससे ये खरोंचें उभर आईं, मगर फर्श पर जो लाइन बनी दिख रही है वो यकीनन उसकी सैंडिल के हील से उभरी थी। अब तुम मुझे ये बताओ कि जब तुमने लाश देखी थी तो क्या उसके गले में कोई चैन थी, और क्या उस वक्त उसके पैरों में सैंडिल थी।‘‘

‘‘सैंडिल उसके एक पैर में मौजूद थी, दूसरी दूर पड़ी थी - मैं याद करता हुआ बोला - रही बात चैन की तो वो हमेशा एक क्रॉस गले में डालकर रखती थी कहती थी वो उसका लकी चार्म था।‘‘

‘‘लिहाजा ये निशान उस क्रॉस से बने हो सकते हैं।‘‘

‘‘हो सकता है मगर इन बातों का मतलब क्या हुआ?‘‘

‘‘देखो जो कुछ वो चौहान के साथ उसके फ्लैट में कर के आई थी, उसको ध्यान में रखते हुए सोचो, क्या ये मुमकिन था कि उसने यहां पहुंचकर मेन गेट बंद ना किया हो।‘‘

‘‘हो सकता है वो भूल गयी हो ऐसा करना या फिर उसे यकीन रहा हो कि पीछे चौहान को जो नशीली चीज वो खिलाकर आई थी उसका असर घंटों उसपर रहने वाला है। या ये भी हो सकता है कि उसे उल्टे पैर कहीं जाना हो इसलिए उसने दरवाजा बंद करने का ख्याल ही ना किया हो।‘‘

‘‘हो तो नहीं सकता सकता मगर तुम्हारी तसल्ली के लिए मान लेती हूं कि वो किसी भी वजह से दरवाजा बंद करना भूल गई। मगर इतना तो स्वीकार करोगे कि अपनी उस करतूत के बाद उसे चौहान से खतरा महसूस होने लगा होगा।‘‘

‘‘खतरा ना सही मगर उसे डर तो होगा ही कि चौहान अब बहुत बुरी तरह पेश आएगा उसके साथ।‘‘

‘‘चलो ऐसा ही सही, अब हम ये मानकर चलते हैं कि उसके पीछे-पीछे ही चौहान भी यहां पहुंच गया। दरवाजा खुला था इसलिए उसे स्टडी तक पहुंचने में कोई दिक्कत नहीं हुई! मगर ये क्या मानने वाली बात है कि चौहान यहां पहुंचकर जब मेज का घेरा काटकर उसके करीब पहुंचने की कोशिश कर रहा था, तो वो उसकी तरफ से एकदम उदासीन अपनी कुर्सी पर बैठी रही, उसे चौहान की नीयत पर शक तक नहीं हुआ।‘‘

‘‘नहीं ये मुमकिन नहीं था, चौहान का मेज के सामने कुर्सी पर बैठकर उससे बातें करना तो समझ में आ सकता है। मगर वो मेज का घेरा काटकर उसकी तरफ पहंुचने की कोशिश करता तो यकीनन मंदिरा को उसकी नीयत पर शक हो जाता। सच पूछ तो तेरा पहला कथन ही ठीक है। यहां पहुंचते ही उसने दरवाजा भीतर से बंद कर लिया होगा। फिर अगर चौहान यहां पहुंचा था तो उसका चौहान से भयभीत होना लाजमी था। ऐसे में वो दरवाजा खोलने की बजाय पुलिस को कॉल करती। अब तो इकबालिया बयान वाली चिट्ठी भी उसके हाथ लग चुकी थी, उसे किस बात का डर था। वो चिट्ठी उसके हाथ नहीं भी लगी होती तो भी चौहान कभी ये स्वीकार नहीं कर सकता था कि हिट एंड रन केस के एक मुजरिम को उसने जानबूझकर आजाद कर दिया था। ऐसे तो उसकी नौकरी ही चली जाती। कोई छोटी-मोटी सजा भी हो जाती तो कोई बड़ी बात नहीं थी। लिहाजा अगर दरवाजे पर चौहान पहुंचा होता तो उसने सीधा पुलिस को कॉल कर दिया होता। कोई अक्ल का अंधा भी होता तो यही करता।‘‘

‘‘यानि मानते हो कि जिसके लिए उसने दरवाजा खोला वो उसका कोई परिचित था।‘‘

‘‘हां और अगर अजनबी भी था तो कम से कम मंदिरा को उससे कोई खतरा महसूस नहीं हुआ होगा।‘‘

‘‘अजनबी वाली बात समझ में नहीं आती, भला वो क्यों किसी अजनबी को स्टडी तक लेकर आती। वो बड़ी हद उसे डाªइंग रूम में बैठा सकती थी।‘‘

‘‘मतलब आगंतुक जो भी था उसका जाना-पहचाना था। एक ऐसा व्यक्ति जिसके साथ उसे लम्बी गुफ्तगूं करने से परहेज नहीं था। जिसके साथ वो पूरी तरह फ्रैंडली थी।‘‘

‘‘और जो उसके पेट में पल रहे बच्चे का बाप था।‘‘

‘‘गुड तो अब हम यहां कि तलाशी ये सोचकर लेंगे कि हमें मंदिरा के पेट में पलने वाले बच्चे के बाप को तलाश करना है, ओके?‘‘

‘‘ओके मैं मेज टटोलता हूं तू बाकी चीजें देख।‘‘

उसने सहमति में सिर हिलाया। इसके बाद हम दोनों अपने अपने काम में लग गये।

लगभग आधे घंटे की मशक्कत के बाद जब मैं हार मानकर अपना तलाशी अभियान बंद करने लगा था तो मेरे हाथ एक ए-फोर साइज का पेपर लगा, जो कई तहों में मोड़कर बुकसेल्फ में एक मोटी किताब के पीछे रखा हुआ था। सच पूछिये तो उसपर निगाह गई ही इसलिए क्योंकि वह छिपाने वाले अंदाज में रखा गया था। वैसे भी वह बुक सेल्फ मंदिरा के लिए महज घर की अन्य सजावटी चीजों की तरह ही एक चीज था। वह खुद यह कहा करती थी कि उसने आज तक इस सेल्फ से एक भी किताब उठाकर नहीं पढ़ी थी, लिहाजा वहां रखा वो फोल्ड किया कागज मेरी निगाहों का मरकज बनकर रहा।

किताबें हटाने के बाद भी उसपर नजर पड़ना आसान नहीं था, मगर क्योंकि मैं वहां के इंच इंच की तलाशी ले रहा था इसलिए वो मेरी निगाहों से बच ना सका। मैंने कागज के तहों को खोलकर देखा, वह एक मैरिज सार्टिफिकेट की फोटोकॉपी थी। जिसके अनुसार मंदिरा ने सोलह महीने पूर्व अंकुर रोहिल्ला से ईस्ट ऑफ कैलाश के एक मंदिर में शादी की थी।

अंकुर रोहिल्ला को मैं जानता था। बल्कि ये कहना गलत नहीं होगा कि उसे पूरा देश जानता था। क्योंकि हाल ही में टीवी पर शुरू हुए एक नये सीरियल ‘मियां बीवी और वो‘ में वो लीड रोल में था और वो सीरियल बेहद पॉपुलर हो रहा था। अगर मंदिरा का पति वही था तो मेरे लिए हैरानी की बात थी। क्योंकि वो आजकल निशा कोठारी नामक एक उद्योगपति की बेटी के साथ अक्सर फिल्मी पार्टियों में दिखाई देता था। अखबारों और टीवी में अक्सर दोनों साथ दिखाई देते थे और इस बात की चर्चा बहुत जोरों पर थी कि जल्दी ही वे दोनों शादी करने वाले थे।

‘‘क्या है ये?‘‘ नीलम मेरे हाथ से वो फोटोकॉपी लेते हुए बोली।

‘‘मिल गया मंदिरा के बच्चे का बाप!‘‘

उसने सार्टिफिकेट पर दर्ज दोनों नाम पढ़े फिर बोली, ‘‘कौन है ये?‘‘

‘‘कुछ कुछ अंदाजा तो है मुझे, मगर फोटो क्लीयर नहीं है। ओरिजनल देखनी होगी।‘‘

‘‘अंदाजा ही बता दो।‘‘

मैंने बताया।

‘‘फिर तो ये कातिल हो सकता है, अगर सचमुच ये वही अंकुर रोहिल्ला है तो इसके पास मंदिरा के कत्ल का तगड़ा मोटिव है। और कुछ नहीं तो मैं कोर्ट में कत्ल का एक नया सस्पेक्ट परोस कर ये साबित करने की कोशिश तो कर ही सकती हूं, कि अगर चौहान कातिल हो सकता है तो ये जमूरा भी हो सकता है, बल्कि इसके पास तो उद्देश्य भी है मंदिरा के कत्ल का! वो क्योंकि निशा कोठारी जैसी धनकुबेर की बेटी से शादी करना चाहता था इसलिए उसने मंदिरा का कत्ल कर दिया। क्योंकि उसके जीते जी वो एक करोड़पति का दामाद बनने का अपना ख्वाब पूरा नहीं कर सकता था।‘‘

‘‘तुम भूल रही हो कि कत्ल सिर्फ मंदिरा का नहीं हुआ है, सुनीता का भी हुआ है, उसके कत्ल का क्या उद्देश्य है उसके पास?‘‘

‘‘है ना! इस बारे में तुम्हारी पहली थ्योरी एकदम फिट बैठती है। जरूर सुनीता ने उसे चौहान के कमरे में आते या जाते देख लिया था। वो कोई आम हस्ती तो था नहीं, लिहाजा ज्योंहि मंदिरा के कत्ल की खबर आम होती सुनीता को उसकी शक्ल याद हो आती। फिर उसका बचे रह पाना मुश्किल हो जाता, लिहाजा उसने सुनीता को भी उसी ढर्रे पर कत्ल कर दिया ताकि दोनों कत्ल किसी वहशी का किया-धरा लगे।‘‘

‘‘मगर उसने चौहान को क्यों फंसाने की कोशिश की, हो सकता है वो चौहान को जानता तक ना हो।‘‘

‘‘जरूर कत्ल वाले दिन उसने मंदिरा का पीछा किया होगा या फिर मंदिरा ने उसे खुद बताया होगा कि चौहान उसे ब्लैकमेल कर रहा था और वह उससे धोखे से अपना बयान हासिल करने वाली थी। ऐसे में कोई बड़ी बात नहीं कि मंदिरा चौहान के फ्लैट तक उसके साथ ही गई हो। जहां से उसने अपना इकबालिया बयान हांसिल किया हो, फिर वो अंकुर के साथ यहां आ गई, जहां अंकुर ने उसका कत्ल कर दिया। अब हमारे पास इस बात का भी जवाब है कि क्यों वो मंदिरा की चेयर के पीछे पहुंचने में कामयाब हुआ।‘‘

‘‘चल मान ली तेरी बात अब तू मुझे ये बता कि अगर वो मंदिरा के साथ ही कालकाजी से रवाना हो गया था तो उसके पास मंदिरा के खून से तर करने के लिए चौहान की वर्दी और जूते कहां से आए।‘‘

‘‘उसने दो फेरे लगाये होंगे, पहली बार उसने मंदिरा का कत्ल किया, फिर यहां से चौहान के कमरे में जाकर उसकी वर्दी हांसिल की और...‘‘

‘‘नहीं हो सकता। - मैं उसकी बात पूरी होने से पहले ही इंकार में सिर हिलाता हुआ बोला - जब मैं यहां पहुंचा था तो लाश देखकर मैं इस निष्कर्ष पर पहुंचा था कि कातिल बस मेरे आगे-आगे ही वहां से रवाना हुआ था, अगर मैैं दस मिनट पहले भी वहां पहुंच गया होता तो या तो मंदिरा का कत्ल हुआ ही नहीं होता या फिर वह रंगे हाथों पकड़ा जाता।‘‘

‘‘या फिर वह तुम्हें भी लाश बना जाता।‘‘

‘‘उसके चांसेज नहीं थे, जिस तरह से मंदिरा का कत्ल किया गया उससे नहीं लगता कि कातिल हथियारबंद होगा। हथियार की उसे कोई जरूरत भी नहीं थी, फिर भी अगर वो हथियारबंद निकल आता तो देख लेता मैं उसे।‘‘

‘‘फिर जरूर उसने चौहान की वर्दी पहले ही हासिल कर ली होगी।‘‘

‘‘पहले कब?‘‘

‘‘समझ लो मंदिरा जब चौहान को बेहोश करने के बाद अपना इकबालिया बयान हासिल करके नीचे पहंुची, तो उसने सारा किस्सा अंकुर को बताया, सुनने के बाद उसने मंदिरा से कहा होगा कि एक बार वो ये चेक कर के आता है कि कहीं मंदिरा द्वारा खिलाई गई नशीली चीज उस पुलिसिये की जान तो नहीं ले लेगी। मंदिरा को भला क्या ऐतराज होता, वो नीचे कार में बैठकर अंकुर की वापसी का इंतजार कर रही होगी जब वो ऊपर जाकर चौहान की वर्दी और जूते ले आया होगा।‘‘
 
‘‘तब क्या मंदिरा ने उससे सवाल नहीं किया होगा कि वो चौहान की वर्दी लेकर क्यों आया है?‘‘

‘‘किया होगा, तब उसने कोई सजता सा जवाब दे दिया होगा, और कुछ नहीं तो यही कह दिया होगा कि पहले घर चलो फिर बताता हूं। कहने का तात्पर्य ये है कि उसने किसी भी तरह मंदिरा का मुंह वक्ती तौर पर बंद कर दिया होगा।‘‘

‘‘गुड! तो अब आगे क्या इरादा है? सुनीता के फ्लैट पर चलें।‘‘

‘‘नहीं उससे पहले ईस्ट ऑफ कैलाश चलो, ताकि ये साबित हो सके कि ये अंकुर रोहिल्ला वही रोहिल्ला है जिसकी निशा कोठारी से आशनाई है।‘‘

‘‘हवलदार का क्या करें?‘‘

‘‘उसे भी साथ ले चलते हैं वह रहेगा तो काम जल्दी होगा।‘‘

‘‘वो तैयार होगा वहां साथ चलने को?‘‘

‘‘वो तुम मुझपर छोड़ दो, मैं जाकर उससे बात करती हूं तुम दो मिनट बाद बाहर आना।‘‘

मैंने सहमति में सिर हिला दिया।

मैं पूरे पांच मिनट बाद बाहर निकला।

एक बार फिर हम तीनों नीलम की कार में सवार हो गये।

ईस्ट ऑफ कैलाश पहुंचकर वो मंदिर तलाश करने में हमारा आधा घंटा बर्बाद हो गया, जहां से अंकुर और मंदिरा का मैरिज सार्टिफिकेट ईशू हुआ था। वहां हमारी मुलाकात जयराज शास्त्री से हुई - वो पैंतीस वर्षीय कृशकाय शरीर वाला नौजवान था, जो कि बेहद बातूनी निकला - ना जाने हमारे साथ आए पुलिसिए का असर था या पंडित जी थे ही बेहद मददगार! उनपर कोई रौब गालिब करने की जरूरत ही नहीं पड़ी। हमारा मंतब्य समझकर उसने एक फाईल निकाली जिसमें वहां से ईशू हुए तमाम मैरिज सार्टिफिकेट की काउंटर कॉपी उपलब्ध थी। हमारे पास मौजूद फोटोकॉपी से उसने सीरियल नम्बर और डेट देखा फिर एक जगह से फाईल खोलकर हमारे सामने रख दिया।

शक की कोई गुंजायश नहीं थी। वहां लगी दोनों तस्वीरों में से एक मंदिरा की थी और दूसरी अंकुर रोहिल्ला की। मैंने मोबाइल निकालकर उसकी एक फोटो खींची और पंडित जी को धन्यवाद देकर हम बाहर निकल आए।

वहां से हम सीधा सुनीता गायकवाड़ के फ्लैट पर पहुंचे। हवलदार ने वहां भी सील तोड़कर ताला खोल दिया, मगर यहां तो उसने फ्लैट के भीतर घुसने की भी कोशिश नहीं की।

लाश मुझे पहले ही पता था कि हॉल में पाई गयी थी। वहां भी फर्श पर चॉक से आउट लाइन बना दी गयी थी, जिससे लाश की स्थिति का अभी भी सही आभास हो रहा था। मैं एक बार पूरे फ्लैट में फिर गया। मोटे तौर पर मैंने वहां की तलाशी भी ले डाली मगर कोई काबिले जिक्र चीज बरामद नहीं हुई। सुनीता की लाश भी मंदिरा की लाश वाली स्थिति में ही पाई गयी थी! फर्श पर पीठ के बल पड़ी हुई! चौहान के जूतों के निशान यहां से भी बरामद हुए थे। यानि हर चीज को, हर एक्टीविटी को बड़ी नफासत के साथ दोहराया गया था।

मैं मकतूला के बेडरूम में पहुंचा। कमरे में एक पलंग और आलमारी के सिवाय और कुछ नहीं था। मैंने आलमारी का दरवाजा ट्राई किया तो वह खुलता चला गया। भीतर रोजमर्रा की जरूरत के लेडीज कपड़े, मेकअप के काम में लाई जाने वाली विभिन्न प्रकार की चीजें और नीचे वाली रेक में सैंडिल के डिब्बे! बस और कुछ नहीं। अगर उस आलमारी में कुछ खास था तो यकीनन वह उसके भीतर बनी तिजोरी में था जिसे बिना चाबी खोल पाना मेरे बस से बाहर था।

मैंने आलमारी बंद कर दी। फिर बेड की ओर आकर्षित हुआ। वो तकरीबन सात फुट लम्बा और छह फुट चौड़ा किंग साइज का पलंग था। जिसके भीतर बने बॉक्स में चार ढक्कन लगे हुए थे। मैंने मैट्रेस उठाकर फर्श पर डाल दिया और बॉक्स का ढक्कन खोलकर भीतर का मुआयना करने लगा। उसमें कुछ पुरानी किताबों और सर्दियों के कपड़ों के अलावा एक बड़ा सा सूटकेस रखा था। मैंने सूटकेस खोल कर देखा तो पाया कि वो मर्दाना कपड़ों से भरा पड़ा था। सूटकेस बंद करने के बाद मैंने वहां मौजूद किताबों को उलट-पलट कर देखा मगर कोई काम की जानकारी मेरे हाथ नहीं लगी। हारकर मैंने बॉक्स के ढक्कनों को बंद कर दिया और मैट्रेस को यथास्थान पहुंचाकर बाहर निकल आया। इस काम में मुझे आधा घंटा लग गया मगर हांसिल कुछ नहीं हुआ।

नीलम ने भी वहां की तलाशी अभियान में पूरे तीस मिनट जाया किए मगर कोई काबिलेजिक्र चीज बरामद नहीं हुई। फिर हम दोनों वहां से बाहर निकल आए।

‘‘अब?‘‘

‘‘अंकुर रोहिल्ला की खबर लेनी होगी, इससे पहले कि पुलिस उस तक पहुंचे मैं उससे दो चार सवाल पूछना चाहता हूं।‘‘

‘‘पुलिस को क्या सपना आना है कि...‘‘

‘‘तू हवलदार को भूल गयी लगती है, वह थाने पहुंच कर खान को रिपोर्ट करेगा तो हमारी मंदिर वाली विजिट के बारे में जरूर बतायेगा। भले ही अभी उसे नहीं मालूम कि हम किस फिराक में थे, मगर खान को जब ये बात पता चलेगी कि हमने उस मंदिर में जाकर एक ऐसा मैरिज सार्टिफिकेट देखा था, जिसके अनुसार मंदिरा चावला शादीशुदा थी, तो उसका अगला कदम क्या होगा, इस बारे में क्या तुझे बताने की जरूरत है। फिर ज्योंहि उसे मंदिरा और अंकुर रोहिल्ला की शादी की खबर लगेगी वो आनन-फानन में उसपर चढ़ दौड़ेगा और हमें उसकी हवा भी नहीं लगने देगा।‘‘

‘‘उसकी मजाल नहीं हो सकती यूं अंकुर पर हाथ डालने की, हंगामा मच जाएगा।‘‘

‘‘ऐसा तू इसलिए कह रही है क्योंकि तू खान को नहीं जानती, वो अपनी पर आ जाएगा तो किसी रौब में नहीं आने वाला, भले ही सामने वाला कितना भी बड़ा खलीफा क्यों ना हो।‘‘

‘‘फिर क्या करें?‘‘

‘‘हवलदार को टैक्सी का किराया देकर दफा कर किसी तरह।‘‘

जवाब में उसने महज दो मिनट में हवलदार से पीछा छुड़ा लिया। हम एक बार फिर उसकी कार में सवार हो गये। रास्ते में मैंने अपने दो तीन कांटेक्ट को फोन किया तो उसमें से एक ने ना सिर्फ अंकुर रोहिल्ला का पता बताया बल्कि इस बात की भी पुष्टि भी कर दी कि उस घड़ी वो अपने बंगले पर मौजूद था।
 
हम हौज खास पहुंचे। वहां पहुंचकर अंकुर का बंगला ढूंढ लेना बहुत आसान काम साबित हुआ। सिक्योरिटी गार्ड को मैंने बताया कि हम कौन थे और क्या चाहते थे, तो उसने इंटरकॉम पर भीतर किसी से बात की और उधर का जवाब सुनकर बोल दिया कि साहब घर पर नहीं थे। जिसपर की मुझ जरा भी यकीन नहीं आया। अगर अंकुर घर पर नहीं होता तो गार्ड भीतर फोन करने की बजाय हमें पहले ही बोल देता कि साहब घर पर नहीं थे।

मैंने दोबारा अपने कांटेक्ट को फोन करके अंकुर का मोबाइल नम्बर हासिल किया और उसके मोबाइल पर कॉल लगाई।

‘‘हैलो, कौन!‘‘ दूसरी ओर से पूछा गया।

‘‘मैं वो हूं जो तुम्हारी हवेली के गेट पर खड़ा हूं और तुमसे मिले बिना यहां से टलने वाला नहीं हूं।‘‘

‘‘देखो मैं नहीं जानता तुम कौन हो, फिर भी अगर मिलने को मरे जा रहे हो तो कल आ जाना।‘‘

‘‘मैं तो कल आ जाऊंगा, मगर अफसोस कल तुम यहां नहीं होगे, तुम्हें तो हवालात के फर्श पर सोने की भी आदत नहीं होगी।‘‘

‘‘क्या बकते हो?‘‘

‘‘वही जो तुम जैसे लोगों की जल्दी समझ में आ जाता है। जेल जाने वाले हो तुम! समझो तुम्हारे पापों का घड़ा भर चुका है।‘‘

‘‘मैं फोन रख रहा हूं।‘‘

‘‘ऐसी गलती हरगिज भी मत करना वरना यहां से मैं सीधा, थाने जाऊंगा और तुम्हारी बीवी की हत्या के राज पर पड़े सारे पर्दे उठा दूंगा।‘‘

‘‘क्यों कलपा रहा है भाई, मैं अनमैरिड हूं, बीवी कहां से आ गई।‘‘

‘‘अच्छा फिर तो मंदिरा चावला को भी नहीं जानते होगे तुम!‘‘

सन्नाटा छा गया।

‘‘अब क्या हुक्म है रूकूं या थाने जाऊं?‘‘

‘‘फोन गार्ड को दो।‘‘

मैंने चैन की सांस ली।

हमारी उससे मुलाकात फिल्म के सेट जैसे सजे-धजे ड्राइंगरूम में हुई। इस वक्त वो एक घिसी हुई जीन और ब्लैक कलर की स्किन टाइट टी-शर्ट पहने था जिसमें से उसके मसल्स ढके होने के बावजूद भी नुमायां हो रहे थे। बालों में उसने बीच की मांग निकाली हुई थी जो कि उसके चेहरे पर खूब फब रहा था। अलबत्ता उसकी आंखें उसके व्यक्तित्व से मैच नहीं हो रही थीं। सूरत से जहां वो किसी कुलीन खानदान का रोशन चिराग नजर आता था वहीं उसकी लाल और चढ़ी हुई आंखों से धूर्तता टपक रही थी।

हमें बैठने को कहने के बाद वो कुछ क्षणों तक वो तीखी निगाहों से हमारा मुआयना करता रहा। हमें विचलित होता ना पाकर उसने बड़े ही नर्वश भाव से एक सिगरेट सुलगाया और किसी तरसे हुए सख्स की तरह एक लम्बा कश लेने के बाद नाक से धुएं की दोनाली छोड़ता हुआ बोला, ‘‘क्या चाहते हो?‘‘

‘‘चाहत की फेहरिस्त तो बेहद लम्बी है जिन्हें पूरा करना तुम्हारेे वश की बात नहीं है, इसलिए सीधा मतलब की बात पर आता हूं।‘‘

‘‘मेरा मतलब उसी से था और जरा जल्दी करो मेरे पास फालतू बातों के लिए कोई वक्त नहीं है।‘‘

‘‘चिंता मत करो जेल में तुम्हारे पास वक्त ही वक्त होगा, बाकी बातें मैं तब कर लूंगा।‘‘

उसने एक पल को हैरानी से मेरी तरफ देखा फिर बड़े ही धैर्य से बोला, ‘‘मैं दोबारा पूछता हूं, क्या चाहते हो तुम?‘‘

‘‘सिर्फ एक सवाल का जवाब!‘‘

‘‘तो पूछते क्यों नहीं?‘‘

‘‘तुमने मंदिरा चावला का कत्ल क्यों किया?‘‘

सुनकर वो सोफे से उछल खड़ा हुआ।

‘‘दफा हो जाओ यहां से।‘‘ वो गरजता हुआ बोला।

‘‘मैं तो हो दफा हो जाऊंगा, मगर जब यही सवाल पुलिस तुमसे करेगी तो तुम्हारी मजाल नहीं होगी, उन्हें दफा करने की। उन्हें बस पता चलने की देर है कि मंदिरा चावला तुम्हारी ब्याहता बीवी थी, आगे वो दो में दो जोड़कर नतीजा छत्तीस निकालेंगे और तब तुम्हारा क्या हाल होगा ये क्या मैं तुम्हें खाका खींचकर समझाऊं, इतने नासमझ तो नहीं दिखते तुम।‘‘

जवाब में वो धम्म से सोफे पर अपना सिर पकड़ कर बैठ गया।

‘‘इस बात के ओपेन होने से तुम्हारा तो दोहरा नुकसान होगा, जेल तो जाओगे ही साथ ही निशा कोठारी जैसी करोड़पति बुलबुल से शादी करने का तुम्हारा ख्वाब महज ख्वाब बनकर रह जाएगा।‘‘

‘‘कैसे जाना?‘‘ इस बार वो बोला तो बेहद टूटा हुआ इंसान दिखाई दिया।

‘‘वैसे ही जैसे जाना जाता है, आइ एम डिटेक्टिव, रिमेम्बर!‘‘

‘‘तो तुम मुझे ब्लैकमेल करना चाहते हो, ओके अपनी कीमत बताओ।‘‘

‘‘मेरी कीमत अदा करना तो तुम्हारी सात पुश्तों के वश की बात नहीं है, अलबत्ता चंद सवालों का जवाब देकर तुम मुझसे पीछा छुड़ाने की उम्मीद कर सकते हो।‘‘

‘‘क्या जानना चाहते हो?‘‘

‘‘सबसे पहले ये स्वीकार करो कि मंदिरा तुम्हारी बीवी थी।‘‘

‘‘अभी क्या कोई कसर रह गयी स्वीकार करने में।‘‘

‘‘नहीं मगर मैं तुम्हारे मुंह से सुनना चाहता हूं।‘‘

‘‘ओके वो मेरी बीवी थी।‘‘

‘‘उसके पेट में पल रहा बच्चा तुम्हारा था।‘‘

‘‘कबूल!‘‘ वो धीरे से बोला।

‘‘फिर तुम निशा कोठारी से शादी कैसे कर सकते थे।‘‘

‘‘उस बारे में मेरी मंदिरा से पहले ही बात हो चुकी थी। वो हमारे बीच नहीं आने वाली थी। बदले में हमारे बीच एक सौदा हुआ था। समझ लो सबकुछ दोस्ताना माहौल में पहले ही सेटल हो चुका था जिसके बारे में तुम्हें बताना मैं जरूरी नहीं समझता।‘‘

‘‘मत बताओ, सिर्फ इतना बता दो कि अगर तुम दोनों के बीच सबकुछ पहले से सेटल्ड था तो बात उसकी हत्या तक क्योंकर जा पहुंची।‘‘

‘‘तुम सात जन्मों में मुझसे ये नहीं कबूलवा सकते कि मैंने मंदिरा का कत्ल किया था। क्योंकि मैंने उसका कत्ल नहीं किया। मुझे उसके कत्ल की कोई जरूरत ही नहीं थी।‘‘

‘‘जंगल में मोर नाचा किसने देखा।‘‘

‘‘क्या कहना चाहता है भाई तू।‘‘ वो कलपता हुआ बोला।

‘‘यही कि तुम्हारे और मंदिरा के बीच में अगर ऐसा कोई सेटलमेंट हुआ था, तो वो या तो मंदिरा जानती थी या तुम जानते थे। मंदिरा तो अब जवाब देने के लिए रही नहीं, ऐसे में तुम अपना गला बचाने के लिए कुछ भी कह सकते हो - बशर्ते कि ऐसा कोई सैटेलमेंट तुमने लिखित में ना करवाया हो - तुम कहो क्या हुआ था ऐसा कोई एग्रीमेंट तुम्हारे और मंदिरा के बीच।‘‘

‘‘नहीं हुआ था।‘‘

‘‘सो देयर।‘‘

‘‘मगर यह सच था।‘‘

‘‘कौन यकीन करेगा तुम्हारी बात पर! बाई दी वे मंदिरा के कत्ल वाली शाम तुम कहां थे।‘‘

‘‘यहीं अपने घर पर चाहो तो गार्ड से लेकर नौकरों तक से पूछताछ कर सकते हो।‘‘

‘‘भई वो तुम्हारे नौकर हैं तुम्हारे लिए कुछ भी कह सकते हैं।‘‘

‘‘मुझे क्या सपना आना था कि तुम यूं अचानक मेरे सिर पर आ सवार होगे, जो मैंने पहले ही सबको पट्टी पढ़ा दी।‘‘

‘‘हां सपना ही आया होगा, कत्ल के बाद तुम्हारे मन में ये खयाल जरूर आया होगा कि पुलिस को किसी ना किसी तरह तुम्हारी भनक लगकर रहेगी। लिहाजा कोई बड़ी बात नहीं कि तुमने पहले ही सबको पट्टी पढ़ा दी हो कि पूछने पर वे यही कहें कि उस रोज तुम अपने घर पर थे।‘‘

उसने बड़े ही आहत भाव से मेरी ओर देखा।

‘‘यूं भोले बलम बनकर दिखाने से तो तुम्हारी जान इस सासत से निकलने से रही। इसलिए कोई ऐसी बात करो जिससे ये साबित हो सके कि मंदिरा की हत्या में तुम्हारा कोई हाथ नहीं था।‘‘

‘‘कैसे करूं, जब तुम मेरी किसी भी बात पर यकीन करके राजी ही नहीं हो।‘‘

‘‘मंदिरा की कत्ल वाली शाम तुम उसके फ्लैट पर क्या कर रहे थे।‘‘ मैंने यूंही फट्टा मारा।

‘‘कौन कहता है।‘‘ वो इतने धीमे स्वर में बोला कि मैं हैरान रह गया।

‘‘कोई भी कहता हो, तुम इंकार करके दिखाओ।‘‘

वो हिचकिचाया।

‘‘ओह कमॉन यार, ये भी कोई छिपने वाली बात है, जिसपर तुम पर्दादारी की कोशिश कर रहे हो।‘‘

‘‘पुलिस को पता है?‘‘

‘‘क्या?‘‘

‘‘यही कि उस शाम मैं मंदिरा से मिलने गया था।‘‘

‘‘अभी तक तो नहीं पता, मगर ये तुम्हारे लिए कोई अच्छी खबर नहीं है। पुलिस का काम ही है जानकारियां इकट्ठी करना। बहुत जल्द वे लोग इस बारे में पता लगा लेंगे।‘‘

‘‘मैं उसे एकदम सही सलामत छोड़कर आया था।‘‘

‘‘पहुंचे कब थे तुम वहां?‘‘

‘‘भई एकदम कील ठोककर वक्त बता पाना तो मुमकिन नहीं है, मगर यहां से मैं पौने पांच बजे के करीब रवाना हुआ था लिहाजा बड़ी हद सवा पांच तक वहां पहुंच गया होऊंगा।‘‘

‘‘तब मंदिरा थी वहां।‘‘

‘‘नहीं, वहां पहुंचकर मैंने उसके मोबाइल पर कॉल लगाई तो उसका मोबाइल स्विच ऑफ था। फिर मैं वहीं खड़ा सिगरेट फूंकने लगा। सिगरेट खत्म होने पर मैंने दोबारा उसका मोबाइल ट्राई किया जो कि बदस्तूर स्विच ऑफ आ रहा था।‘‘

‘‘जाने से पहले उसे कॉल क्यों नहीं किया?‘‘

‘‘किया था मगर उस वक्त उसने कॉल पिक नहीं किया था।‘‘

‘‘फिर क्या किया तुमने! सिगरेट पीने के अहम काम के अलावा क्या किया?‘‘

‘‘मैंने दस मिनट और उसका इंतजार किया, फिर वापिस लौटने ही लगा था कि मुझे उसकी कार वहां पहुंचती दिखाई दे गयी।‘‘

‘‘तब वो अकेली थी।‘‘

‘‘हां।‘‘

‘‘उसके हाव-भाव में कोई बदलाव नोट किया हो तुमने।‘‘

‘‘ऐसा कुछ नहीं था, अलबत्ता भीतर पहुंचकर मुझे ऐसा जरूर महसूस हुआ जैसे वो मुझे जल्द से जल्द वहां से चलता कर देना चाहती हो। बार-बार सिर दर्द का बहाना और उसका ये कहना कि वो दो-तीन घंटे की नींद लेना चाहती है! मेरे लिए इशारा था कि मैं जल्दी से वहां से दफा हो जाऊं।‘‘

‘‘क्या मतलब हुआ इसका? क्या वहां कोई पहुंचने वाला था जिससे वो तुम्हारा आमना-सामना नहीं होने देना चाहती थी।‘‘

‘‘लगा तो मुझे कुछ ऐसा ही था।‘‘

‘‘तुम गये क्यों थे वहां?‘‘

‘‘मेरा डायरेक्टर ‘मियां बीवी और वो‘ की हीरोइन को री-प्लेस करना चाहता था। तब मैंने उसे मंदिरा का नाम सुझाया था। मगर मोबाइल पर उससे कांटेक्ट नहीं हो पाया था इसलिए मैं वो गुड न्यूज देने उसके फ्लैट पर पहुंचा था।‘‘

‘‘ये तो बड़ा ब्रेक था उसके लिए।‘‘

‘‘था तो, मगर....क्या करें उसकी किस्मत में ही नहीं था।

‘‘मंदिरा से शादी की नौबत क्योंकर आ गई।‘‘

‘‘पता नहीं, सबकुछ बस यूंही होता चला गया। सच पूछो तो मैं आज तक हैरान हूं कि हम दोनों ने शादी कैसे कर ली। अलबत्ता एक मुख्तर सी वजह ये रही हो सकती है कि उन दिनों हम दोनों ही स्ट्रगल के दौर से गुजर रहे थे। जान-पहचान बनी तो जल्दी ही हम डेट करने लगे। और फिर एक दिन यूंही बातों ही बातों में शादी का फैसला कर लिया। उन दिनों वो मेरे से बेहतर हालत में थी। उसके पास छोटे-छोटे ही सही मगर काम तो था, जबकि मैं पूरी तरह बेरोजगार था। मुझे ये स्वीकार करने में जरा भी हिचक नहीं कि महीनों तक उसने मेरा पूरा-पूरा खर्चा उठाया था, यहां तक कि मैं सिगरेट और विस्की भी उसकी कमाई की पीता था।‘‘
 
‘‘फिर तो बड़े ही एहसान फरामोश निकले तुम, जो ऐसी बीवी से नाता तोड़कर दूसरी का ख्वाब देखने लगे।‘‘

‘‘ये गलत है - वो पुरजोर लहजे में बोला - मेरी तरफ निशा का झुकाव मेरे से पहले मंदिरा ने महसूस किया था। उसी ने मुझे ये सुझाया कि बेहतर भविष्य के लिए हमें अलग हो जाना चाहिए। निशा कोठारी से शादी की सूरत में हम दोनों की जिंदगी संवर जाने वाली थी - ये बात मैंने उसे नहीं बल्कि उसने मुझे सुझाई थी।‘‘

‘‘हैरानी है, भला एक औरत अपने पति की दूसरी बीवी कैसे बर्दाश्त कर सकती है।‘‘

‘‘ऐसा तुम इसलिए कह रहे हो क्योंकि तुम मंदिरा से वाकिफ नहीं थे। वो बेहद बोल्ड और प्रोफेशनल लड़की थी। उसकी महत्वाकांक्षाएं बहुत प्रबल थीं। जिन्हें पूरा करने का एक रास्ता जब उसे निशा से मेरी शादी के रूप में दिखाई दिया तो उसने इस मौके का भरपूर फायदा उठाने का मन बना लिया।‘‘

‘‘लिहाजा अगर भविष्य में तुम निशा से शादी कर लेते हो तो उस शादी के पीछे कोई प्यार मोहब्बत वाला जज्बा ना होकर सिर्फ और सिर्फ दौलत की चाह होगी।‘‘

‘‘सच्चाई तो यही है।‘‘

‘‘और अब मंदिरा के कत्ल की सूरत में तुम्हारी ऐश में हिस्सा बंटाने वाला भी नहीं रहा, तुम्हारी तो लॉटरी लग गई समझो। ऊपर से मंदिरा अगर जिंदा रहती तो हर वक्त तुम्हारे जहन में यह खतरा बना रहता कि कहीं वो सबकुछ भूलकर दोबारा तुम्हे पाने की जिद ना कर बैठे, आखिर तलाक तो हुआ नहीं था तुम दोनों के बीच।‘‘

‘‘वो ऐसा नहीं करने वाली थी।‘‘

‘‘जवाब में मैं फिर ये कहूंगा कि जंगल में मोर नाचा किसने देखा।‘‘

‘‘देखो या तो तुम मेरी बात का यकीन करो या फिर यहां से चलते फिरते नजर आओ। बहुत बर्दाश्त कर लिया मैंने तुम्हें, बेशक तुम जाकर पुलिस का सबकुछ बता दो। वैसे भी अब निशा से मेरी शादी सपने जैसा ही लग रही है। उसके बाप को पता चलने की देर है कि मैं पहले से शादीशुदा हूं, वह तुरंत अपनी बेटी को मुझसे दूर हो जाने का हुक्म जारी कर देगा। और निशा कितनी भी पढ़ी-लिखी और मार्डन क्यों ना हो हकीकत यही है कि वो अपने बाप की हुक्मअदूली का साहस नहीं कर सकती। फिर जब अंत-पंत सबकुछ खत्म हो ही जाना है तो मैं तुम्हारी जी हजूरी क्यों करूं, अब तुम लोग जा सकते हो।‘‘

‘‘अभी लो, बस एक आखिरी सवाल का जवाब और दे दो।‘‘

‘‘वो भी पूछो।‘‘

‘‘अगर मंदिरा चावला का कत्ल तुमने नहीं किया, तो किसी ऐसे कैंडिडेट का नाम लो जिसने उसकी मौत का सामान किया हो सकता है।‘‘

‘‘है तो एक ऐसा व्यक्ति, मगर उसका नाम मैं नहीं जानता।‘‘

‘‘फिर क्या बात बनी?‘‘

‘‘लेकिन वो सख्स कातिल हो सकता है।‘‘

‘‘ऐसा तुम कैसे कह सकते हो।‘‘

‘‘उसे मैंने मंदिरा के फ्लैट में दाखिल होते अपनी आंखों से देखा था। मेरा उससे आमना-सामना भी हुआ था। मेरे खयाल से वही उस दिन मंदिरा का सीक्रेट विजिटर था, जिसकी वजह से वो जल्द से जल्द मुझे वहां से चलता कर देना चाहती थी।‘‘

‘‘तुम्हारा उससे आमना-सामना कब हुआ था?‘‘

‘‘उसी वक्त! यूं समझ लो कि मैं मंदिरा के फ्लैट से निकल रहा था और वो दाखिल हो रहा था। तभी मैंने एक झलक देखी थी उसकी।‘‘

‘‘देखने में कैसा था वो?‘‘

‘‘खूब लंबा चौड़ा व्यक्ति था, क्लीन सेव्ड था और उसके आगे के बाल तांबे की रंगत लिए हुए थे।‘‘

तंाबे की रंगत लिए हुए बाल! तत्काल मेरा ध्यान मनोज गायकवाड़ की तरफ चला गया।

‘‘कुछ और जो उसकी निशानदेही में मददगार साबित हो सके।‘‘

‘‘नहीं, मैं उसके बारे में कुछ नहीं बता सकता, क्योंकि मैंने उसपर बस एक उड़ती सी निगाह ही डाली थी। अलबत्ता वो मेरे सामने आ जाए तो मैं उसे जरूर पहचान लूंगा।‘‘

‘‘कोई और जिसपर तुम्हे शक हो या मंदिरा ने कभी ऐसा जिक्र किया हो कि फलाना व्यक्ति से उसको खतरा था।‘‘

‘‘तुम्हारे सवाल करने पर ही मुझे याद आ रहा है कि एक बार मंदिरा ने किसी का जिक्र करते हुए कहा था कि वो सख्स भविष्य में उसे ब्लैकमेल करने की कोशिश कर सकता है, मगर अफसोस की उसका नाम भी मैं नहीं जानता।‘‘

‘‘क्या कहने तुम्हारे!‘‘

‘‘वो ऐसी ही थी, उसका दिल होता था तो कुछ भी बता देती थी वरना तो सामने वाला सिर पटककर मर जाये मगर क्या मजाल जो वो अपनी जुबान खोल दे। लिहाजा लाख पूछने पर भी मंदिरा ने मुझे उस सख्स के बारे में सिवाय इसके कुछ नहीं बताया था कि वो कोई पुलिसवाला था। क्यों थी उसे ऐसी आशंका, ऐसा क्या कर दिया था उसने! इस बारे में भी वो कुछ बताकर राजी नहीं थी। मैंने जानने की बहुत कोशिश की मगर उसने तो जैसे अपनी जुबान ही सी ली थी।‘‘

‘‘ब्लैकमेल करने की कोई वजह भी तो रही होगी।‘‘

‘‘नहीं जानता, बाई गॉड नहीं जानता।‘‘

‘‘तुम नरेश चौहान को तो जानते ही होगे।‘‘

‘‘कौन नरेश चौहान, मैं इस नाम के किसी सख्स को नहीं जानता।‘‘

‘‘बावजूद इसके कि तुम मंदिरा के कत्ल से पहले, उसकेे साथ नरेश चौहान के फ्लैट में गये थे।‘‘

‘‘दफा हो जाओ।‘‘ इस बार वो फुंफकारता सा बोला।

‘‘कम से कम यही कह दो कि नहीं गये थे।‘‘

‘‘गो टू हैल।‘‘ कहकर वो उठा और पैर पटकता हुआ सीढ़ियां चढ़ता चला गया। पहली मंजिल पर पहुंचकर वो हमारी आंखों से ओझल हो गया। पीछे मुड़कर उसने देखने की कोशिश तक नहीं की, कि हम वहां से ‘हैल‘ के लिए दफा हो रहे थे या नहीं।

‘‘अब क्या कहती है?‘‘

उसके जाते ही मैं नीलम से बोला।

‘‘इसके बारे में कुछ कह पाना मुहाल है। बातों से तो इनोसेंट जान पड़ता है, पर जरा उसका धंधा देखो, एक्टर है वो, क्या पता अभी तक वो हमें महज अपनी एक्टिंग का कमाल दिखाता रहा हो।‘‘

‘‘लिहाजा यहां तक आना बेकार गया।‘‘

‘‘ऐसा तो खैर नहीं है। कम से कम चौहान के हक में तो यह बहुत अच्छा हुआ। अब हमें मालूम है कि मंदिरा शादीशुदा थी और उसके पेट में पल रहा बच्चा अंकुर रोहिल्ला का था। हमें ये भी मालूम है कि उस रोज कम से कम एक सख्स और था जो ऐन कत्ल से पहले मकतूला के फ्लैट में दाखिल होता देखा गया था। ये दोनों बातें कोर्ट में उठाते ही चौहान के खिलाफ पुलिस का केस मुंह के बल जा गिरेगा। रही-सही कसर ये बात पूरी कर देगी कि कत्ल के आस-पास के वक्त में ये खुद भी मंदिरा के फ्लैट पर मौजूद था।‘‘

‘‘उस बात से तो वो फौरन मुकर जायेगा।‘‘

‘‘उसकी मजाल नहीं हो सकती, जिस तरह से वो फट्टा तुमने उसपर फेंककर मारा था, उससे उसे पूरा यकीन हो गया था कि यकीनन किसी ने उसे मंदिरा के फ्लैट में घुसते या निकलते देख लिया था। लिहाजा बाद में उस बात से मुकरकर वो अपनी हालत आ बैल मुझे मार वाली हरगिज भी नहीं बनाना चाहेगा।‘‘

‘‘देखते हैं, पहले उसकी गवाही की नौबत तो आए।‘‘

‘‘चौहान की बाबत ब्लैकमेल वाला इशारा हमें यहां दूसरी बार मिला है। क्या लगता है तुम्हें, क्या सचमुच वो मंदिरा को ब्लैकमेल कर रहा था।‘‘

‘‘इस बाबत उससे सीधा सवाल करें तो कैसा रहेगा।‘‘

‘‘बहुत अच्छा रहेगा, उसके फ्लैट पर चलते हैं।‘‘

‘‘ठीक है।‘‘

हम दोनों उठकर वहां से बाहर निकल आये।

हमें आता देखकर सिक्योरिटी गार्ड गेट खोलने के लिए अपने केबिन से बाहर निकल आया। वो गेट के पास पहुंचा और उसका कुंडा सरकाने लगा। उस वक्त हम दोनों गेट से करीब दस फ्लांग की दूरी पर थे।

‘‘धांय!‘‘ की जोरदार आवाज गूंजी। मैं हड़बड़ाया, कदम जैसे फ्रीज होकर रह गये। आवाज कोठी के भीतर से आई थी यह समझने में मुझे मुश्किल से एक सैकेंड लगा होगा। मैं पूरी रफ्तार से कोठी की ओर भागा। ड्राइंगरूम खाली पड़ा था। मैं गोली की रफ्तार से सीढ़ियां चढ़कर उस कमरे के सामने पहुंचा जहां पहुंचकर अंकुर रोहिल्ला हमें दिखाई देना बंद हो गया था।

कमरे का दरवाजा बंद था मगर वो चौखट से लगा हुआ नहीं था। मैंने हाथ में रूमाल लपेटकर दरवाजे को भीतर की ओर धकेला तो वो खुलता चला गया। दरवाजे से करीब चार फीट की दूरी पर अंकुर रोहिल्ला पेट के बल फर्श पर पड़ा हुआ था। उसकी खोपड़ी के पृष्ठ भाग से भल-भल करके खून निकल रहा था। उसका दाहिना हाथ दरवाजे की ओर फैला हुआ था। उसके जिंदा बचे होने की कोई उम्मीद मुझे नहीं थी फिर भी मैंने झुककर सावधानी पूर्वक उसकी नब्ज टटोली। बेशक वो मर चुका था। उसके पैरों की तरफ पिछली दीवार में एक बड़ी सी खिड़की थी। जो कि उस वक्त खुली पड़ी थी। खिड़की के पल्ले शीशे के थे और चौखट में कोई ग्रिल नहीं लगी थी।
 

Similar threads

S
Replies
14
Views
15
StoryPublisher
S
S
Replies
61
Views
62
StoryPublisher
S
S
Replies
74
Views
75
StoryPublisher
S
S
Replies
108
Views
109
StoryPublisher
S
Back
Top