S
StoryPublisher
Guest
‘‘फिर तो यकीनन ये सब उस पुलिसवाले का ही किया धरा है, वो होमीसाइल मैनियाक है।‘‘
‘‘उसे देखकर तो ऐसा नहीं लगता।‘‘ मैं विचारपूर्ण स्वर में बोला।
‘‘तुम्हे देखकर ही कहां लगता है कि तुम एक नम्बर के....।‘‘
मैंने घूर कर देखा तो उसने तुरंत बात पलट दी, ‘‘एक नम्बर के जासूस हो।‘‘
नीलम उठ खड़ी हुई।
‘‘मैं चलती हूं तुम दोनों आराम से लड़ना।‘‘
‘‘अरे नहीं प्लीज! मुझे साथ लेकर चलो। घर ना सही बाहर तक तो सही सलामत पहुंचा दो।‘‘
‘‘एक मिनट चुपकर! मैं जरा पोस्टमार्टम रिर्पोट की कॉपी बना लूं।‘‘
कहकर मैंने दोनों रिपोर्ट्स की जेरॉक्स निकालकर एक सेट अपने पास रख लिया।
इसके बाद नीलम और शीला वहां से चली गईं। उनके पीछे मैंने एक सिगरेट सुलगाया और हालात का तबसरा करने लगा। जब नया कुछ समझ में नहीं आया तो मैंने अपनी निगाहें पोस्टमार्टम रिपोर्ट पर गड़ा दीं। रिपोर्ट में एक और खास बात थी जिसका जिक्र अभी तक नहीं हुआ था - गला घोंटे जाते वक्त दोनों औरतें बेहोश थीं। उनकी बेहोशी का कारण सदमा था या उन्हें कुछ खिलाया-सुंघाया गया था इस बात का जिक्र रिपोर्ट में नहीं था।
काफी देर तक विचार करने के बाद भी मैं कातिल के बारे में कोई राय कायम नहीं कर सका। थक हार कर मैं भी ऑफिस बंद करके अपने गरीबखाने की ओर रवाना हो गया।
तीन जून 2017
सुबह के करीब दस बजे थे, जब मैं मंदिरा और सुनीता की लाश का पोस्टमार्टम करने वाले डॉक्टर की फिराक में अस्पताल पहुंचा। पार्किंग में कार खड़ी करने के बाद, सबसे पहले मैं मोर्ग में पहुंचा! जहां का अटैंडेंट बेहद भला इंसान निकला, उससे मुझे पता चला कि उस घड़ी वहां सिर्फ एक ही लाश थी, जो कि सुनीता गायकवाड़ की थी। जबकि मंदिरा चावला की डैड बॉडी रिलीज की जा चुकी थी। मैंने ले जाने वाले के बारे में दरयाफ्त किया तो पता चला डैड बॉडी मंदिरा की छोटी बहन रंजना चावला के सुपुर्द की गयी थी।
मैंने पोस्टमार्टम करने वाले डॉक्टर वी.के. सूरी के बारे में पूछा तो उसने बताया कि वे अभी नहीं आए थे। मगर जब आयेंगे तो उनका मुकाम कमरा नम्बर एक सौ तीन होगा जो कि सामने की राहदरी में पहला लेफ्ट लेते ही दाईं तरफ को था।
मैंने उसे धन्यवाद दिया और जाकर एक सौ तीन के आगे धरना दे दिया।
बारह बजे - जब मैं इंतजार करता-करता निराश हो चला था - डॉक्टर सूरी के कदम वहां पड़े। वह पैंतीस-छत्तीस साल का युवक था जो बेहद चुस्त-दुरूस्त नजर आ रहा था।
जब वो भीतर जाकर अपनी चेयर पर बैठ गया, तो मैंने उस कमरे में कदम रखा।
अपना मंतव्य बताते हुए मैंने उसे अपना विजटिंग कार्ड सौंपा, जिसपर एक नजर डालकर उसने अपनी टेबल की दराज में डाल दिया।
‘‘तुम्हारे पास पुलिस का कोई अथॉरिटी लेटर है।‘‘
‘‘जी नहीं, मगर मैं जो कुछ आपसे जानना चाहता हूं, इत्मीनान रखिए उसमें कानून की कोई धारा भंग नहीं होती।‘‘
‘‘हो सकता है ना होती हो मगर ये बात मुझे कैसे मालूम होगी, मैं ना तो कोई वकील हूं ना ही कोई पुलिस वाला।‘‘
‘‘इसका क्या ये मतलब समझूं जनाब, कि आप मुझे बाहर का रास्ता दिखा रहे हैं।‘‘
‘‘अरे नहीं भाई! इत्मीनान से बैठो, चाय कॉफी कुछ लोगे तो बोलो।‘‘
‘‘जी नहीं शुक्रिया।‘‘ मैंने कहा, प्रत्यक्षतः मैं समझ नहीं सका कि वह व्यंग कर रहा था या सचमुच ऑफर कर रहा था।
‘‘क्या जानना चाहते हो।‘‘
‘‘मंदिरा चावला और सुनीता गायकवाड़ की मौत के बारे में बताइए जिनका कल सुबह पोस्टमार्टम किया था आपने।‘‘
‘‘पोस्टमार्टम रिपोर्ट नहीं देख पाये लगता है तुम।‘‘
‘‘देख चुका हूं जनाब, दोनों की कॉपी अभी भी मेरे पास है।‘‘ कहकर मैंने दोनों रिपोर्ट उसके सामने मेज पर रख दी।
‘‘सबकुछ तो है इसमें, अलग से क्या जानना चाहते हो।‘‘
‘‘रिपोर्ट में इस बात का खास जिक्र है कि गला घोंटे जाने से पूर्व ही दोनों महिलायें बेहोश हो चुकी थीं। मेरा सवाल उसी बाबत है, क्यों बेहोश थीं वो दोनों! उन्हें कोई नशीली चीज दी गई थी या खौफ के कारण दोनों अपनी चेतना गवां बैठी थीं।‘‘
‘‘ढेरों संभावित वजहें हो सकती हैं, मसलन खौफ की अधिकता, उत्तेजना, दिमाग के किसी नाजुक हिस्से पर चोट पड़ना वगैरह-वगैरह।‘‘
‘‘जनाब आप तो मुझे उलझाए दे रहे हैं।‘‘
‘‘यही तुम्हारे सवाल का सीधा और सच्चा जवाब है। अलबत्ता अगर वो दोनों किसी चोट से बेहोश हुई थीं तो कम से कम उनके शरीर के किसी ऐसे हिस्से पर चोट का कोई निशान नहीं मिला जहां चोट पड़ने से इंसान बेहोश हो सकता हो।‘‘
‘‘क्या ऐसा हो सकता है कि चोट तो पड़ी हो मगर उसका कोई निशान पीछे ना बचा हो।‘‘
‘‘हो सकता है, मैं अभी तुम्हारी गर्दन की एक रग दबाकर तुम्हें बेहोश कर सकता हूं। मगर ऐसा कोई स्पेशलिस्ट ही कर सकता है। या वो कर सकता है जिसने इसकी जानकारी किसी स्पेशलिस्ट से हासिल की हो।‘‘
‘‘जैसे की कोई डॉक्टर।‘‘
‘‘हां जैसे की कोई डॉक्टर।‘‘
‘‘कोई पुलिसवाला!‘‘
‘‘भई तुम समझे नहीं, अभी मैं तुम्हे सिखा दूं थोड़ी प्रैक्टिस करा दूं तो ये काम तुम भी बड़ी आसानी से कर सकोगे।‘‘
‘‘समझ गया जनाब, अब जरा लाश की दुर्गती पर आइए, क्या लगता है आपको क्या कातिल सचमुच कोई विक्षिप्त व्यक्ति है।‘‘
‘‘भाई एक नजर लाश को देखकर तो मुझे भी यही लगा था कि यह किसी वहशी दरिंदे का काम है, किसी पागल का काम है। जिसने दो खूबसूरत जिस्मों को नोंच खाया था। मगर दोनों लाशों का पोस्टमार्टम करने के बाद मुझे अपना ख्याल बदलना पड़ा।‘‘
‘‘कोई खास बात नोट की थी आपने।‘‘
‘‘खास ही समझो।‘‘
‘‘जनाब इस बालक का ज्ञानवर्धन कीजिए प्लीज।‘‘
‘‘देखो पहली लाश जो कि मंदिरा चावला की थी, उसके शरीर के जख्म थे तो दूसरी लाश की तरह ही मगर वो ज्यादा गहरे नहीं थे। यूं लगता था जैसे उन्हें बहुत हिचकते हुए, घबराते हुए बनाया गया था, आई रिपीट बनाया गया था। एक-एक घाव कई-कई बार वार करके बनाये गये थे। जबकि दूसरी लाश के साथ ऐसा नहीं था, उसके शरीर पर जहां भी कातिल ने पंजा मारा था या दांत गड़ाया था, एक ही वार में मांस का लोथड़ा निकाल लिया था। पूरे जूनून के साथ वार किए गये थे उसके जिस्म पर।‘‘
मैं हैरानी से उसकी शक्ल देखने लगा।
‘‘ऊपर से पहली लाश को गिने चुने अंदाज में नोंचा गया था, जबकि दूसरी को कातिल ने बेहिसाब नोंचा था। पहली लाश के गुप्तांग को जहां तक मेरा ख्याल है तीन बार में दांतों से नोंचा गया था। जबकि दूसरी लाश के गुप्तांग को एक ही झटके में पूरी बर्बरता के साथ नोंचकर वहां से मांस का एक बड़ा टुकड़ा अलग कर दिया गया था।‘‘
‘‘क्या ये दो जुदा हत्यारों का काम हो सकता है?‘‘
‘‘मुश्किल है, दोनों लाशों पर दांतों से जो वार किये गये हैं उनके निशान लगभग एक ही जैसे हैं। यह एक ही आदमी का काम है, वैसे भी नतीजे निकालना मेरा काम नहीं है। मैंने जो देखा महसूस किया तुम्हे बता दिया, नतीजे तुम खुद निकालो।‘‘
‘‘जरूर, बस एक आखिरी सवाल का जवाब दे दीजिए।‘‘
‘‘पूछो।‘‘
‘‘क्या लाश पर दांतों से बने निशान को किसी संभावित कातिल के दांतों से मिलान करके, ये साबित किया जा सकता है कि वो अमुक व्यक्ति के दांतों से ही बने हैं।‘‘
‘‘मुश्किल है, क्योंकि लाश लगातार फूलती चली जाती है, उसी अनुपात में घावों का आकार बिगड़ता चला जाता है। ऐसी कोई पड़ताल अगर तुरंत की गई होती तो शायद कोई नतीजा सामने आ जाता, मगर वो भी सौ फीसदी ऐतबार के काबिल नहीं हो सकता था।‘‘
‘‘शुक्रिया जनाब, इस नाचीज को वक्त देने का बहुत-बहुत शुक्रिया।‘‘
उसने सिर हिलाकर मेरा शुक्रिया कबूल किया।
करीब एक बजे मैं थाने पहुंचा, पता चला नदीम खान डीसीपी ऑफिस गया हुआ था। मैंने चौहान के केस के बारे में दरयाफ्त किया तो पता चला उसे एडिशनल एसएचओ विजय तिवारी हैंडल कर रहा था।
तिवारी बेहद खुशमिजाज सख्स था।
मेरा पहले भी कुछ केसों में उससे पाला पड़ चुका था। ऊपर से उसका एसएचओ और एसीपी मुझे भाव देते थे, इसलिए तिवारी कभी मेरे साथ बेरूखी से पेश नहीं आता था। ठीक उसी तरह जैसे आप किसी बड़े आदमी के कुत्ते को लात नहीं मार सकते, भले ही वो आपकी गोद में चढ़कर सूसू ही क्यों ना कर दे।
मैं तिवारी के कमरे में पहुंचा। वो मुझे सिगरेट के सुट्टे लगाता मिला, लिहाजा फुर्सत में था।
‘‘तिवारी साहब को सादर प्रणाम।‘‘
‘‘जीते रहे भाई और यूंही पुलिस का खून पीते रहो।‘‘
‘‘क्या बात कर रहे हो मालिक, कोई खता हो गई क्या।‘‘ मैं उसके सामने एक विजिटर चेयर पर बैठता हुआ बोला।
‘‘अरे नहीं मैं तो बस यूं ही तुकबंदी कर रहा था, सिगरेट लोगे।‘‘
‘‘आपके हाथ का तो जहर भी कबूल है जनाब।‘‘
जवाब में हो-हो कर के हंसते हुए उसने सिगरेट का पैकेट और माचिस मेरी ओर बढ़ा दिया। मैंने दोनों चीजें अपने काबू में की, फिर एक सिगरेट सुलगाकर धुंआ उगलता हुआ बोला, ‘‘सुना है, चौहान वाले मामले को आप हैंडल कर रहे हैं।‘‘
‘‘ठीक सुना है भई, ये बदमजा जिम्मेदारी मुझे ही दी गयी है। अब कोई पूछे मुझसे कि अपने ही एक ऑफीसर को इंटेरोगेट कैसे करूं, जिसके साथ विस्की पी है उसे डंडे का जोर कैसे बताऊं।‘‘
‘‘तौबा थर्ड डिग्री आजमाएंगे उसपर।‘‘
‘‘आजमा तो नहीं पाऊंगा यार! मगर हमारे डीसीपी साहब तो यही चाहते हैं।‘‘
‘‘सुना है कोई पक्का सबूत हाथ लगा है उसके खिलाफ।‘‘
‘‘किससे सुना है।‘‘
‘‘खान साहब से।‘‘
‘‘अब उनसे सुना है तो ठीक ही सुना होगा।‘‘
‘‘कुछ खुलासा तो कीजिए, कौन सा तुरूप का पत्ता हाथ लगा है आपके।‘‘
‘‘मैं नहीं जानता यार! ऐसे सवाल तुम साहब से ही किया करो।‘‘
‘‘तिवारी साहब! आप तो दिल तोड़ रहे हैं।‘‘
‘‘टूटने दो भाई दिल का क्या है आज टूटेगा कल जुड़ जायेगा। वैसे भी जब बात जानकारी निकलवाने की आती है तो तुम्हारा दिल एक दिन में कई-कई बार टूटता है, फिर भी जिंदा हो, सही सलामत हो। पर मुझे साफ-साफ चेतावनी दी गयी है कि अगर मेरी तरफ से कोई भी जानकारी लीक हुई तो मुझे सस्पेंड कर दिया जाएगा। अब भैया नौकरी खोकर दोबारा कैसे मिलेगी। इसलिए इस बार तो माफ ही करो मुझको।‘‘
‘‘अच्छा कम से कम ये तो बताइए कि चौहान के अलावा भी कोई है या नहीं पुलिस की निगाहों में, या कोई ऐसा जिसपर पहले आप लोगों को शक रहा हो लेकिन बाद में उसे शक से बरी कर दिया गया हो।‘‘
‘‘ऐसा कोई नहीं है, सारे सबूत सारे गवाह चौहान के खिलाफ हैं, उसके अलावा कोई और कातिल हो ही नहीं सकता।‘‘
‘‘गवाह भी हैं!‘‘ मैं हैरानी से बोला।
‘‘श...श..श तुम तो मरवाओगे मुझे।‘‘ वो फुसफुसाते हुए बोला।
‘‘लेकिन जनाब गवाह कहां से आ गया - मैं भी उसी के लहजे में बोला - कहीं आप लोगों ने कोई तोता तो नहीं सिखा-पढ़ा दिया।‘‘
‘‘पागल हो अपने ही एक ऑफीसर के खिलाफ हम ऐसी टुच्ची हरकत करेंगे।‘‘
‘‘यानि की गवाह का वजूद सच में है।‘‘
‘‘बस करो भई, कोई और बात करनी है तो करो वरना मैं उठकर जाता हूं।‘‘
‘‘आप उठकर जाते हैं! - मैं हैरानी से बोला - मुझे जाने का हुक्म नहीं दनदनायेंगे।‘‘
‘‘नहीं भई तुम आराम से जब तक मर्जी हो यहां बैठे रह सकते हो।‘‘
‘‘मैं आपका इशारा समझ गया जनाब बस एक आखिरी सवाल का जवाब दे दीजिए प्लीज!‘‘
‘‘पूछो।‘‘
‘‘ये रंजना चावला कहां मिलेगी, अपनी बहन के फ्लैट में या फिर कहीं और..।‘‘
‘‘आया जनाब।‘‘ वो जोर से बोला और उठ खड़ा हुआ।
मैंने हकबका कर उसकी ओर देखा।
‘‘एसएचओ साहब बुला रहे हैं, तुम बैठो मैं अभी आता हूं।‘‘
मैंने सहमति में सिर हिला दिया और उसकी वापसी का इंतजार करने लगा। पूरे बीस मिनट गुजर गये मगर वो नहीं आया। तब मैं बाहर निकला। पता चला एसएचओ साहब अभी आये नहीं थे और तिवारी साहब फील्ड में गये हैं। तो यूं पीछा छुड़ाया था तिवारी ने मुझसे।
मैं मंदिरा चावला के फ्लैट पर पहुंचा। ये देखकर मुझे बहुत तसल्ली हुई कि दरवाजे पर ताला नहीं झूल रहा था। मैंने कॉल बेल पुश कर दिया। करीब दो मिनट बाद दरवाजे पर एक दरमियाने कद की युवती प्रगट हुई, जो अगर मंदिरा की बहन थी तो उसकी शक्ल मंदिरा से बिल्कुल भी नहीं मिलती थी।
‘‘जी कहिए, किससे मिलना है?‘‘
‘‘रंजना चावला से।‘‘
‘‘मैं ही हूं, बताइए।‘‘
‘‘मेरा नाम विक्रांत गोखले है मैं एक..।‘‘
‘‘भीतर आ जाइए।‘‘ वो मेरी बात काट कर बोली। और एक तरफ होकर उसने मुझे भीतर आने का रास्ता दे दिया।
मेरे पीछे उसने दरवाजा बंद किया और मुझे ड्राइंग रूम में एक सोफे पर बैठाने के बाद बोली, ‘‘आप कुछ लेंगे।‘‘
‘‘जी नहीं शुक्रिया, आप इत्मीनान से बैठ जाइए।‘‘
सहमति में सिर हिलाती हुई वो एक स्टूल खींचकर मेरे सामने बैठ गयी।
‘‘मंदिरा के साथ जो कुछ भी हुआ, यकीन जानिए उसका मुझे बहुत दुख है। आपको शायद पुलिस ने बताया होगा कि उसकी लाश मैंने ही बरामद की थी।‘‘
‘‘जी हां बताया था, लेकिन मैं आपको बाई नेम पहले से जानती हूं। मंदिरा ने जिक्र किया था आपका।‘‘
तो ये वजह थी उसकी बेतकल्लूफी की।
‘‘आप मंदिरा के काफी करीब रही होंगी नहीं।‘‘
‘‘ऐसा तो नहीं था। वो काफी रिजर्ब टाइप लड़की थी, अपने मन का डार्क सर्कल हमेशा छिपाकर रखती थी। फिर भी कभी-कभार जब मूड में होती थी तो बहुत कुछ बता डालती थी अपनी रोजमर्रा की जिंदगी के बारे में। ऐसे ही मूड में उसने एक बार मुझे बताया था कि कैसे एक आदमी उसे ब्लैकमेलर साबित करने पर उतारू था, जिससे कि बाद में आपने उसका पीछा छुड़वाया था, वो भी बिना कोई फीस लिए।‘‘
अब जनाब मैं कैसे उसे बताता कि मैंने फीस नहीं छोड़ी थी, बस मुल्तवी कर दी थी! किसी और तरीके से वसूलने की खातिर, जो कि अगर वो जिन्दा होती तो कभी ना कभी कर के रहता। भला फीस छोड़कर भूखे मरना था क्या।
‘‘आखिरी बार आपकी उससे कब बात हुई।‘‘
‘‘उसकी मौत से दो दिन पहले।‘‘
‘‘कोई खास बात बताई थी उसने।‘‘
‘‘कैसी खास बात!‘‘
‘‘कुछ भी मसलन वो किसी बात को लेकर परेशान थी या ऐसा ही कुछ और! या फिर उसकी बातों से आपने अंदाजा लगाया हो किसी परेशानी में थी।‘‘
‘‘नहीं ऐसी कोई बात नहीं थी, हमने बहुत कैजुअल बातें की थीं वो भी महज एक या डेढ़ मिनट।‘‘
‘‘उससे पहले कभी कुछ खास शेयर किया हो।‘‘
‘‘नहीं ऐसा कुछ नहीं बताया उसने जिसे खास का दर्जा दिया जा सके।‘‘
‘‘आपको पता था कि वो प्रेग्नेंट थी?‘‘
‘‘नहीं, पुलिस के बताये ही पता चला। सुनकर मैं तो भौंचक्की रह गयी, एक बारगी तो यकीन नही नहीं आया था। क्योंकि मंदिरा चाहे जैसी भी थी, मगर हल्के चरित्र की लड़की नहीं थी।‘‘
‘‘किसी राकेश चौहान का जिक्र किया हो कभी उसने।‘‘
‘‘हां किया तो था, मगर वो काफी पुरानी बात है।‘‘
‘‘किस सिलसिले में किया था?‘‘ मैं उत्सुक स्वर में बोला।
‘‘कोई एक्सीडेंट कर बैठी थी वो, जिसमें एक आदमी को गम्भीर चोटें आईं थी। बाद में अस्पताल में उसने दम तोड़ दिया था। उस वक्त मंदिरा ने ड्रिंक कर रखा था और वो बहुत ज्यादा नशे में भी थी। घटनास्थल से तो एक्सीडेंट के बाद वह फरार होने में कामयाब हो गई मगर दो दिन बाद ही पुलिस ने उसे ढूंढ निकाला था। उस रोज जो पुलिसिया उसके पास पहुंचा था वो राकेश चौहान था। बतौर मंदिरा वो उसे देखते ही फ्लैट हो गया था। और उसके जरा सा रिक्वेस्ट करते ही उसने मंदिरा को बचाने के लिए केस का रूख ही पलट कर रख दिया। इस तरह उस पुलिसिये की बदौलत मंदिरा जेल जाने से बची थी।‘‘
‘‘फिर क्या हुआ?‘‘
‘‘इसके बाद एक दो बार मैंने मंदिरा से उस बारे में बात करनी चाही तो वह यह कहकर टाल गयी कि सब सैटल हो गया था।‘‘
‘‘आगे कभी चौहान का जिक्र किया हो उसने।‘‘
‘‘नहीं कभी नहीं किया।‘‘
‘‘जरा दिमाग पर जोर डालकर बताओ कि वो एक्सीडेंट वाला वाकया कब हुआ था?‘‘
‘‘जोर डालने की जरूरत नहीं मुझे वैसे ही याद है, क्योंकि उसके अगले दिन मेरा बर्थ डे था। इस लिहाज से वो वाकया चौदह दिसम्बर की रात को घटित हुआ होगा।‘‘
‘‘उसने कभी किसी ऐसे व्यक्ति का जिक्र किया हो जिसके उसके प्रेम संबंध रहे हों, या ऐसा कोई जिक्र जिससे तुम्हे लगा हो कि शी वाज इन लव।‘‘
‘‘नहीं मुझे इसकी कोई खबर नहीं है।‘‘
‘‘तुम किसी सुनीता गायकवाड़ को जानती हो।‘‘
‘‘सिर्फ इसलिए जानती हूं क्योंकि पुलिस ने बताया था मुझे उसके बारे में।‘‘
‘‘स्टडी अभी भी सील्ड है।‘‘
‘‘हां, मुझे यहां रहना तो है नहीं, इसलिए उस बारे में मैंने पुलिस से कोई बात नहीं की।‘‘
‘‘कोई और बात जो इस सिलसिले में तुम बताना चाहो।‘‘
उसने इंकार में मुंडी हिला दिया।
‘‘तो अब मैं इजाजत चाहूंगा, वक्त देने का शुक्रिया।‘‘
‘‘जरा ठहरो, मुझे बताकर जाओ कि ये सब पूछताछ तुम किसके लिए कर रहे हो।‘‘
‘‘तुम्हारी बहन के हत्यारे को उसके कुकर्मों की सजा दिलवाने के लिए।‘‘
‘‘यूंही बिना किसी फीस के?‘‘
‘‘यही समझ लो।‘‘
‘‘कहीं दिल तो नहीं आ गया था तुम्हारा मेरी बहन पर।‘‘
‘‘था तो कुछ ऐसा ही।‘‘
‘‘तो क्या मैं ये समझूं कि उसके पेट में जो बच्चा था वो तुम्हारा था।‘‘
‘‘काश ऐसा होता, मगर अफसोस की नहीं था।‘‘
‘‘शादीशुदा हो।‘‘
‘‘नहीं।‘‘
‘‘भई बच्चों का इतना ही शौक है तो शादी कर लो।‘‘
‘‘तुम गलत समझ रही हो, शौक मुझे बच्चों का नहीं है, उसका है जो बच्चे पैदा करने के लिए किया जाता है।‘‘
उसने हैरानी से मेरी तरफ देखा।
‘‘बहरहाल तुम्हारी बहन का कातिल जल्दी ही सलाखों के पीछे अपने कुकर्मों की सजा भुगत रहा होगा, ये मेरा वादा है तुमसे।‘‘
उसने अनमने भाव से हौले से सिर हिला दिया।
बाहर आकर मैं अपनी कार में सवार हो गया। एमबी रोड पर पहुंचकर मैंने कार का रूख संगम विहार की ओर कर दिया। मेरा इरादा एक चक्कर सुनीता गायकवाड़ के फ्लैट का लगाने का था, जिसे मैंने फौरन बाद ही मुल्तवी कर दिया और खानपुर से लेफ्ट लेकर साकेत कोर्ट के सामने से गुजरते हुए अपने ऑफिस पहुंचा।
ऑफिस का शीशे वाला दरवाजा लॉक्ड था, अलबत्ता शटर नहीं गिराया गया था। मैंने घड़ी देखी, तीन बज रहे थे। ये तो उसका लंच टाइम भी नहीं था, कहां चली गई थी वो। मैंने अपनी ‘की‘ से दरवाजा खोला, रिसेप्शन पर एक नजर डाला, मगर वहां मेरे लिए कोई मैसेज नहीं छोड़ा था उसने। मैं अपने केबिन में पहुंचकर उसकी वापसी का इंतजार करने लगा।
बीस मिनट बाद।
‘‘हलो, गुड ऑफ्टर नून।‘‘
वो जैसे अंडों पर पांव रखती मेरे केबिन के दरवाजे पर नमूनदार हुई।
मैंने उसे घूर कर देखा। वो फौरन वापस जाने को मुड़ी।
‘‘कहां जा रही है कम्बख्त।‘‘
‘‘अरे तुम तो सही सलामत हो।‘‘
‘‘अब इसका क्या मतलब हुआ।‘‘
‘‘मुझे देखकर तुम्हारी आंखें यूं फैल गईं थीं कि मैंने सोचा इतनी हॉट और सैक्सी लड़की देखकर तुम्हें कोई दौरा-वौरा पड़ गया है, एम्बुलेंस बुलाने जा रही थी।‘‘
‘‘तो एम्बुलेंस को मोबाइल से कॉल किया होता।‘‘
‘‘कर तो लेती मगर एम्बुलेंस आने से पहले तुम्हें होश आ जाता तो पैसे बरबाद हो जाते।‘‘
‘‘फिर तो बाहर निकल कर स्कूटर की बजाय जरूर तू बस में सवार होती, यूं ज्यादा वक्त मिल जाता तुझे।‘‘
‘‘अरे बस किसलिए, पास में ही तो है हॉस्पिटल, पैदल चल के मुश्किल से बीस मिनट में पहुंच जाती।‘‘
‘‘और वहां जाकर हाल दुहाई मचाती कि फौरन एक एम्बुलेंस भेजी जाय, मरीज की हालत बेहद सीरियस है।‘‘
‘‘नहीं यूं तो वो लोग एम्बुलेंस को फौरन रवाना कर देते फिर मेरी इतनी मेहनत का फायदा क्या होता।‘‘
‘‘अच्छा फिर क्या करती।‘‘
‘‘मैं उनसे पूछती कि क्या वो कोई नई एम्बुलेंस खरीदने वाले हैं, जो अभी सेड्यूल में नहीं है। जवाब में अगर वो हां करते तो मैं तुम्हारे लिए बुक करा देती।‘‘
‘‘और अगर मना कर देते तो।‘‘
‘‘तो दूसरे हॉस्पिटल में ट्राई करती, तीसरे में करती, चौथे में करती...।‘‘
‘‘और मान ले अगर कहीं भी ऐसी एम्बुलेंस की हामी नहीं भरी जाती तो।‘‘
‘‘फिर तो मजबूरी थी, हमारे ऑफिस के बगल वाले हॉस्पिटल को खबर करनी पड़ती, अब मैं यूं भला तुम्हें मरते हुए कैसे देख सकती थी।‘‘
‘‘बक चुकी।‘‘
‘‘हां।‘‘
‘‘गुड! अब बता कहां गयी थी?‘‘
‘‘एक मर्द का पीछा कर रही थी।‘‘
‘‘इसे कहते हैं बगल में बच्चा और गांव में ढिंढोरा, ये जो तेरे सामने छह फीट का गबरू जवान बैठा है वो नहीं दिखाई देता तुझे़, जो आजकल गैर मर्दों का पीछा करना शुरू कर दिया।‘‘
‘‘मैं तुम्हें वैसी निगाहों से नहीं देखती।‘‘
‘‘अरे तो देखा कर ना, मैं मना करूं तब बोलना।‘‘
‘‘नहीं देख सकती।‘‘
‘‘मगर क्यों?‘‘
‘‘क्योंकि तुम्हें देखकर कभी मेरे मन में ऐसे-वैसे ख्याल नहीं आते।‘‘
‘‘इसे मैं कॉम्प्लीमेंट समझूं या बेइज्जती।‘‘
‘‘है तो ये बेइज्जती ही, मगर तुम्हें समझ में आए तब ना।‘‘
मैंने आहत भाव से उसकी ओर देखा।
‘‘प्लीज ऐसा ख्याल भी मत आने दो अपने मन में ये पाप है।‘‘
‘‘क्या पाप है।‘‘ मैं हड़बड़ा सा गया।
‘‘ये कायरों का काम है।‘‘
‘‘अरे कौन सा काम।‘‘
‘‘आत्महत्या करना।‘‘
मैं दोनों हाथों से अपना सिर पकड़ कर बैठ गया। कम्बख्त किसी दिन जरूर मुझे पागलखाने का केस बना कर छोड़ेगी।
‘‘मैं तुम्हारे लिए कॉफी मंगाती हूं, तनाव से मुक्ति मिलेगी, हीन भावना से भी बाहर निकलने में मददगार साबित होगी।‘‘
मैं चुप रहा।
‘‘तुमने कभी फरियादी दवाखाना का नाम सुना है?‘‘ इस बार वो गम्भीर लहजे में बोली।
‘‘नहीं।‘‘
‘‘मेरे ख्याल से तुम्हे एक चक्कर वहां का लगाना चाहिए।‘‘
‘‘हमारे केस के संदर्भ में?‘‘
‘‘हां तुम्हारे केस के संदर्भ में‘‘
‘‘खुलकर बता क्या कहना चाहती है।‘‘
‘‘वो लोग मरीज का नाम गुप्त रखने की गारंटी करते हैं।‘‘
‘‘ठहर जा कम्बख्त! मैं तुझे अभी बताता हूं कि मैं कितना बड़ा मर्द हूं।‘‘
इस बार सचमुच मेरा खून खौल उठा। मैंने मेज के ऊपर से ही हाथ बढ़ाकर उसका थोबड़ा पकड़ लिया और उसके होंठों पर अपने होंठ जमा दिये। वो कसमसाई खुद को अलग करने की कोशिश की मगर मैंने एक लम्बे लिप लॉक के बाद ही उसे छोड़ा।
‘‘ये क्या हरकत हुई।‘‘ वो हांफती हुई गुस्से से बोली।
‘‘शुरूआत तूने की थी।‘‘
‘‘हां मगर जब तुम्हें पता है कि अंत करना तुम्हारे वश की बात नहीं है, तो क्यों कोशिश कर के अपनी बेइज्जती करा रहे हो।‘‘
‘‘उसे देखकर तो ऐसा नहीं लगता।‘‘ मैं विचारपूर्ण स्वर में बोला।
‘‘तुम्हे देखकर ही कहां लगता है कि तुम एक नम्बर के....।‘‘
मैंने घूर कर देखा तो उसने तुरंत बात पलट दी, ‘‘एक नम्बर के जासूस हो।‘‘
नीलम उठ खड़ी हुई।
‘‘मैं चलती हूं तुम दोनों आराम से लड़ना।‘‘
‘‘अरे नहीं प्लीज! मुझे साथ लेकर चलो। घर ना सही बाहर तक तो सही सलामत पहुंचा दो।‘‘
‘‘एक मिनट चुपकर! मैं जरा पोस्टमार्टम रिर्पोट की कॉपी बना लूं।‘‘
कहकर मैंने दोनों रिपोर्ट्स की जेरॉक्स निकालकर एक सेट अपने पास रख लिया।
इसके बाद नीलम और शीला वहां से चली गईं। उनके पीछे मैंने एक सिगरेट सुलगाया और हालात का तबसरा करने लगा। जब नया कुछ समझ में नहीं आया तो मैंने अपनी निगाहें पोस्टमार्टम रिपोर्ट पर गड़ा दीं। रिपोर्ट में एक और खास बात थी जिसका जिक्र अभी तक नहीं हुआ था - गला घोंटे जाते वक्त दोनों औरतें बेहोश थीं। उनकी बेहोशी का कारण सदमा था या उन्हें कुछ खिलाया-सुंघाया गया था इस बात का जिक्र रिपोर्ट में नहीं था।
काफी देर तक विचार करने के बाद भी मैं कातिल के बारे में कोई राय कायम नहीं कर सका। थक हार कर मैं भी ऑफिस बंद करके अपने गरीबखाने की ओर रवाना हो गया।
तीन जून 2017
सुबह के करीब दस बजे थे, जब मैं मंदिरा और सुनीता की लाश का पोस्टमार्टम करने वाले डॉक्टर की फिराक में अस्पताल पहुंचा। पार्किंग में कार खड़ी करने के बाद, सबसे पहले मैं मोर्ग में पहुंचा! जहां का अटैंडेंट बेहद भला इंसान निकला, उससे मुझे पता चला कि उस घड़ी वहां सिर्फ एक ही लाश थी, जो कि सुनीता गायकवाड़ की थी। जबकि मंदिरा चावला की डैड बॉडी रिलीज की जा चुकी थी। मैंने ले जाने वाले के बारे में दरयाफ्त किया तो पता चला डैड बॉडी मंदिरा की छोटी बहन रंजना चावला के सुपुर्द की गयी थी।
मैंने पोस्टमार्टम करने वाले डॉक्टर वी.के. सूरी के बारे में पूछा तो उसने बताया कि वे अभी नहीं आए थे। मगर जब आयेंगे तो उनका मुकाम कमरा नम्बर एक सौ तीन होगा जो कि सामने की राहदरी में पहला लेफ्ट लेते ही दाईं तरफ को था।
मैंने उसे धन्यवाद दिया और जाकर एक सौ तीन के आगे धरना दे दिया।
बारह बजे - जब मैं इंतजार करता-करता निराश हो चला था - डॉक्टर सूरी के कदम वहां पड़े। वह पैंतीस-छत्तीस साल का युवक था जो बेहद चुस्त-दुरूस्त नजर आ रहा था।
जब वो भीतर जाकर अपनी चेयर पर बैठ गया, तो मैंने उस कमरे में कदम रखा।
अपना मंतव्य बताते हुए मैंने उसे अपना विजटिंग कार्ड सौंपा, जिसपर एक नजर डालकर उसने अपनी टेबल की दराज में डाल दिया।
‘‘तुम्हारे पास पुलिस का कोई अथॉरिटी लेटर है।‘‘
‘‘जी नहीं, मगर मैं जो कुछ आपसे जानना चाहता हूं, इत्मीनान रखिए उसमें कानून की कोई धारा भंग नहीं होती।‘‘
‘‘हो सकता है ना होती हो मगर ये बात मुझे कैसे मालूम होगी, मैं ना तो कोई वकील हूं ना ही कोई पुलिस वाला।‘‘
‘‘इसका क्या ये मतलब समझूं जनाब, कि आप मुझे बाहर का रास्ता दिखा रहे हैं।‘‘
‘‘अरे नहीं भाई! इत्मीनान से बैठो, चाय कॉफी कुछ लोगे तो बोलो।‘‘
‘‘जी नहीं शुक्रिया।‘‘ मैंने कहा, प्रत्यक्षतः मैं समझ नहीं सका कि वह व्यंग कर रहा था या सचमुच ऑफर कर रहा था।
‘‘क्या जानना चाहते हो।‘‘
‘‘मंदिरा चावला और सुनीता गायकवाड़ की मौत के बारे में बताइए जिनका कल सुबह पोस्टमार्टम किया था आपने।‘‘
‘‘पोस्टमार्टम रिपोर्ट नहीं देख पाये लगता है तुम।‘‘
‘‘देख चुका हूं जनाब, दोनों की कॉपी अभी भी मेरे पास है।‘‘ कहकर मैंने दोनों रिपोर्ट उसके सामने मेज पर रख दी।
‘‘सबकुछ तो है इसमें, अलग से क्या जानना चाहते हो।‘‘
‘‘रिपोर्ट में इस बात का खास जिक्र है कि गला घोंटे जाने से पूर्व ही दोनों महिलायें बेहोश हो चुकी थीं। मेरा सवाल उसी बाबत है, क्यों बेहोश थीं वो दोनों! उन्हें कोई नशीली चीज दी गई थी या खौफ के कारण दोनों अपनी चेतना गवां बैठी थीं।‘‘
‘‘ढेरों संभावित वजहें हो सकती हैं, मसलन खौफ की अधिकता, उत्तेजना, दिमाग के किसी नाजुक हिस्से पर चोट पड़ना वगैरह-वगैरह।‘‘
‘‘जनाब आप तो मुझे उलझाए दे रहे हैं।‘‘
‘‘यही तुम्हारे सवाल का सीधा और सच्चा जवाब है। अलबत्ता अगर वो दोनों किसी चोट से बेहोश हुई थीं तो कम से कम उनके शरीर के किसी ऐसे हिस्से पर चोट का कोई निशान नहीं मिला जहां चोट पड़ने से इंसान बेहोश हो सकता हो।‘‘
‘‘क्या ऐसा हो सकता है कि चोट तो पड़ी हो मगर उसका कोई निशान पीछे ना बचा हो।‘‘
‘‘हो सकता है, मैं अभी तुम्हारी गर्दन की एक रग दबाकर तुम्हें बेहोश कर सकता हूं। मगर ऐसा कोई स्पेशलिस्ट ही कर सकता है। या वो कर सकता है जिसने इसकी जानकारी किसी स्पेशलिस्ट से हासिल की हो।‘‘
‘‘जैसे की कोई डॉक्टर।‘‘
‘‘हां जैसे की कोई डॉक्टर।‘‘
‘‘कोई पुलिसवाला!‘‘
‘‘भई तुम समझे नहीं, अभी मैं तुम्हे सिखा दूं थोड़ी प्रैक्टिस करा दूं तो ये काम तुम भी बड़ी आसानी से कर सकोगे।‘‘
‘‘समझ गया जनाब, अब जरा लाश की दुर्गती पर आइए, क्या लगता है आपको क्या कातिल सचमुच कोई विक्षिप्त व्यक्ति है।‘‘
‘‘भाई एक नजर लाश को देखकर तो मुझे भी यही लगा था कि यह किसी वहशी दरिंदे का काम है, किसी पागल का काम है। जिसने दो खूबसूरत जिस्मों को नोंच खाया था। मगर दोनों लाशों का पोस्टमार्टम करने के बाद मुझे अपना ख्याल बदलना पड़ा।‘‘
‘‘कोई खास बात नोट की थी आपने।‘‘
‘‘खास ही समझो।‘‘
‘‘जनाब इस बालक का ज्ञानवर्धन कीजिए प्लीज।‘‘
‘‘देखो पहली लाश जो कि मंदिरा चावला की थी, उसके शरीर के जख्म थे तो दूसरी लाश की तरह ही मगर वो ज्यादा गहरे नहीं थे। यूं लगता था जैसे उन्हें बहुत हिचकते हुए, घबराते हुए बनाया गया था, आई रिपीट बनाया गया था। एक-एक घाव कई-कई बार वार करके बनाये गये थे। जबकि दूसरी लाश के साथ ऐसा नहीं था, उसके शरीर पर जहां भी कातिल ने पंजा मारा था या दांत गड़ाया था, एक ही वार में मांस का लोथड़ा निकाल लिया था। पूरे जूनून के साथ वार किए गये थे उसके जिस्म पर।‘‘
मैं हैरानी से उसकी शक्ल देखने लगा।
‘‘ऊपर से पहली लाश को गिने चुने अंदाज में नोंचा गया था, जबकि दूसरी को कातिल ने बेहिसाब नोंचा था। पहली लाश के गुप्तांग को जहां तक मेरा ख्याल है तीन बार में दांतों से नोंचा गया था। जबकि दूसरी लाश के गुप्तांग को एक ही झटके में पूरी बर्बरता के साथ नोंचकर वहां से मांस का एक बड़ा टुकड़ा अलग कर दिया गया था।‘‘
‘‘क्या ये दो जुदा हत्यारों का काम हो सकता है?‘‘
‘‘मुश्किल है, दोनों लाशों पर दांतों से जो वार किये गये हैं उनके निशान लगभग एक ही जैसे हैं। यह एक ही आदमी का काम है, वैसे भी नतीजे निकालना मेरा काम नहीं है। मैंने जो देखा महसूस किया तुम्हे बता दिया, नतीजे तुम खुद निकालो।‘‘
‘‘जरूर, बस एक आखिरी सवाल का जवाब दे दीजिए।‘‘
‘‘पूछो।‘‘
‘‘क्या लाश पर दांतों से बने निशान को किसी संभावित कातिल के दांतों से मिलान करके, ये साबित किया जा सकता है कि वो अमुक व्यक्ति के दांतों से ही बने हैं।‘‘
‘‘मुश्किल है, क्योंकि लाश लगातार फूलती चली जाती है, उसी अनुपात में घावों का आकार बिगड़ता चला जाता है। ऐसी कोई पड़ताल अगर तुरंत की गई होती तो शायद कोई नतीजा सामने आ जाता, मगर वो भी सौ फीसदी ऐतबार के काबिल नहीं हो सकता था।‘‘
‘‘शुक्रिया जनाब, इस नाचीज को वक्त देने का बहुत-बहुत शुक्रिया।‘‘
उसने सिर हिलाकर मेरा शुक्रिया कबूल किया।
करीब एक बजे मैं थाने पहुंचा, पता चला नदीम खान डीसीपी ऑफिस गया हुआ था। मैंने चौहान के केस के बारे में दरयाफ्त किया तो पता चला उसे एडिशनल एसएचओ विजय तिवारी हैंडल कर रहा था।
तिवारी बेहद खुशमिजाज सख्स था।
मेरा पहले भी कुछ केसों में उससे पाला पड़ चुका था। ऊपर से उसका एसएचओ और एसीपी मुझे भाव देते थे, इसलिए तिवारी कभी मेरे साथ बेरूखी से पेश नहीं आता था। ठीक उसी तरह जैसे आप किसी बड़े आदमी के कुत्ते को लात नहीं मार सकते, भले ही वो आपकी गोद में चढ़कर सूसू ही क्यों ना कर दे।
मैं तिवारी के कमरे में पहुंचा। वो मुझे सिगरेट के सुट्टे लगाता मिला, लिहाजा फुर्सत में था।
‘‘तिवारी साहब को सादर प्रणाम।‘‘
‘‘जीते रहे भाई और यूंही पुलिस का खून पीते रहो।‘‘
‘‘क्या बात कर रहे हो मालिक, कोई खता हो गई क्या।‘‘ मैं उसके सामने एक विजिटर चेयर पर बैठता हुआ बोला।
‘‘अरे नहीं मैं तो बस यूं ही तुकबंदी कर रहा था, सिगरेट लोगे।‘‘
‘‘आपके हाथ का तो जहर भी कबूल है जनाब।‘‘
जवाब में हो-हो कर के हंसते हुए उसने सिगरेट का पैकेट और माचिस मेरी ओर बढ़ा दिया। मैंने दोनों चीजें अपने काबू में की, फिर एक सिगरेट सुलगाकर धुंआ उगलता हुआ बोला, ‘‘सुना है, चौहान वाले मामले को आप हैंडल कर रहे हैं।‘‘
‘‘ठीक सुना है भई, ये बदमजा जिम्मेदारी मुझे ही दी गयी है। अब कोई पूछे मुझसे कि अपने ही एक ऑफीसर को इंटेरोगेट कैसे करूं, जिसके साथ विस्की पी है उसे डंडे का जोर कैसे बताऊं।‘‘
‘‘तौबा थर्ड डिग्री आजमाएंगे उसपर।‘‘
‘‘आजमा तो नहीं पाऊंगा यार! मगर हमारे डीसीपी साहब तो यही चाहते हैं।‘‘
‘‘सुना है कोई पक्का सबूत हाथ लगा है उसके खिलाफ।‘‘
‘‘किससे सुना है।‘‘
‘‘खान साहब से।‘‘
‘‘अब उनसे सुना है तो ठीक ही सुना होगा।‘‘
‘‘कुछ खुलासा तो कीजिए, कौन सा तुरूप का पत्ता हाथ लगा है आपके।‘‘
‘‘मैं नहीं जानता यार! ऐसे सवाल तुम साहब से ही किया करो।‘‘
‘‘तिवारी साहब! आप तो दिल तोड़ रहे हैं।‘‘
‘‘टूटने दो भाई दिल का क्या है आज टूटेगा कल जुड़ जायेगा। वैसे भी जब बात जानकारी निकलवाने की आती है तो तुम्हारा दिल एक दिन में कई-कई बार टूटता है, फिर भी जिंदा हो, सही सलामत हो। पर मुझे साफ-साफ चेतावनी दी गयी है कि अगर मेरी तरफ से कोई भी जानकारी लीक हुई तो मुझे सस्पेंड कर दिया जाएगा। अब भैया नौकरी खोकर दोबारा कैसे मिलेगी। इसलिए इस बार तो माफ ही करो मुझको।‘‘
‘‘अच्छा कम से कम ये तो बताइए कि चौहान के अलावा भी कोई है या नहीं पुलिस की निगाहों में, या कोई ऐसा जिसपर पहले आप लोगों को शक रहा हो लेकिन बाद में उसे शक से बरी कर दिया गया हो।‘‘
‘‘ऐसा कोई नहीं है, सारे सबूत सारे गवाह चौहान के खिलाफ हैं, उसके अलावा कोई और कातिल हो ही नहीं सकता।‘‘
‘‘गवाह भी हैं!‘‘ मैं हैरानी से बोला।
‘‘श...श..श तुम तो मरवाओगे मुझे।‘‘ वो फुसफुसाते हुए बोला।
‘‘लेकिन जनाब गवाह कहां से आ गया - मैं भी उसी के लहजे में बोला - कहीं आप लोगों ने कोई तोता तो नहीं सिखा-पढ़ा दिया।‘‘
‘‘पागल हो अपने ही एक ऑफीसर के खिलाफ हम ऐसी टुच्ची हरकत करेंगे।‘‘
‘‘यानि की गवाह का वजूद सच में है।‘‘
‘‘बस करो भई, कोई और बात करनी है तो करो वरना मैं उठकर जाता हूं।‘‘
‘‘आप उठकर जाते हैं! - मैं हैरानी से बोला - मुझे जाने का हुक्म नहीं दनदनायेंगे।‘‘
‘‘नहीं भई तुम आराम से जब तक मर्जी हो यहां बैठे रह सकते हो।‘‘
‘‘मैं आपका इशारा समझ गया जनाब बस एक आखिरी सवाल का जवाब दे दीजिए प्लीज!‘‘
‘‘पूछो।‘‘
‘‘ये रंजना चावला कहां मिलेगी, अपनी बहन के फ्लैट में या फिर कहीं और..।‘‘
‘‘आया जनाब।‘‘ वो जोर से बोला और उठ खड़ा हुआ।
मैंने हकबका कर उसकी ओर देखा।
‘‘एसएचओ साहब बुला रहे हैं, तुम बैठो मैं अभी आता हूं।‘‘
मैंने सहमति में सिर हिला दिया और उसकी वापसी का इंतजार करने लगा। पूरे बीस मिनट गुजर गये मगर वो नहीं आया। तब मैं बाहर निकला। पता चला एसएचओ साहब अभी आये नहीं थे और तिवारी साहब फील्ड में गये हैं। तो यूं पीछा छुड़ाया था तिवारी ने मुझसे।
मैं मंदिरा चावला के फ्लैट पर पहुंचा। ये देखकर मुझे बहुत तसल्ली हुई कि दरवाजे पर ताला नहीं झूल रहा था। मैंने कॉल बेल पुश कर दिया। करीब दो मिनट बाद दरवाजे पर एक दरमियाने कद की युवती प्रगट हुई, जो अगर मंदिरा की बहन थी तो उसकी शक्ल मंदिरा से बिल्कुल भी नहीं मिलती थी।
‘‘जी कहिए, किससे मिलना है?‘‘
‘‘रंजना चावला से।‘‘
‘‘मैं ही हूं, बताइए।‘‘
‘‘मेरा नाम विक्रांत गोखले है मैं एक..।‘‘
‘‘भीतर आ जाइए।‘‘ वो मेरी बात काट कर बोली। और एक तरफ होकर उसने मुझे भीतर आने का रास्ता दे दिया।
मेरे पीछे उसने दरवाजा बंद किया और मुझे ड्राइंग रूम में एक सोफे पर बैठाने के बाद बोली, ‘‘आप कुछ लेंगे।‘‘
‘‘जी नहीं शुक्रिया, आप इत्मीनान से बैठ जाइए।‘‘
सहमति में सिर हिलाती हुई वो एक स्टूल खींचकर मेरे सामने बैठ गयी।
‘‘मंदिरा के साथ जो कुछ भी हुआ, यकीन जानिए उसका मुझे बहुत दुख है। आपको शायद पुलिस ने बताया होगा कि उसकी लाश मैंने ही बरामद की थी।‘‘
‘‘जी हां बताया था, लेकिन मैं आपको बाई नेम पहले से जानती हूं। मंदिरा ने जिक्र किया था आपका।‘‘
तो ये वजह थी उसकी बेतकल्लूफी की।
‘‘आप मंदिरा के काफी करीब रही होंगी नहीं।‘‘
‘‘ऐसा तो नहीं था। वो काफी रिजर्ब टाइप लड़की थी, अपने मन का डार्क सर्कल हमेशा छिपाकर रखती थी। फिर भी कभी-कभार जब मूड में होती थी तो बहुत कुछ बता डालती थी अपनी रोजमर्रा की जिंदगी के बारे में। ऐसे ही मूड में उसने एक बार मुझे बताया था कि कैसे एक आदमी उसे ब्लैकमेलर साबित करने पर उतारू था, जिससे कि बाद में आपने उसका पीछा छुड़वाया था, वो भी बिना कोई फीस लिए।‘‘
अब जनाब मैं कैसे उसे बताता कि मैंने फीस नहीं छोड़ी थी, बस मुल्तवी कर दी थी! किसी और तरीके से वसूलने की खातिर, जो कि अगर वो जिन्दा होती तो कभी ना कभी कर के रहता। भला फीस छोड़कर भूखे मरना था क्या।
‘‘आखिरी बार आपकी उससे कब बात हुई।‘‘
‘‘उसकी मौत से दो दिन पहले।‘‘
‘‘कोई खास बात बताई थी उसने।‘‘
‘‘कैसी खास बात!‘‘
‘‘कुछ भी मसलन वो किसी बात को लेकर परेशान थी या ऐसा ही कुछ और! या फिर उसकी बातों से आपने अंदाजा लगाया हो किसी परेशानी में थी।‘‘
‘‘नहीं ऐसी कोई बात नहीं थी, हमने बहुत कैजुअल बातें की थीं वो भी महज एक या डेढ़ मिनट।‘‘
‘‘उससे पहले कभी कुछ खास शेयर किया हो।‘‘
‘‘नहीं ऐसा कुछ नहीं बताया उसने जिसे खास का दर्जा दिया जा सके।‘‘
‘‘आपको पता था कि वो प्रेग्नेंट थी?‘‘
‘‘नहीं, पुलिस के बताये ही पता चला। सुनकर मैं तो भौंचक्की रह गयी, एक बारगी तो यकीन नही नहीं आया था। क्योंकि मंदिरा चाहे जैसी भी थी, मगर हल्के चरित्र की लड़की नहीं थी।‘‘
‘‘किसी राकेश चौहान का जिक्र किया हो कभी उसने।‘‘
‘‘हां किया तो था, मगर वो काफी पुरानी बात है।‘‘
‘‘किस सिलसिले में किया था?‘‘ मैं उत्सुक स्वर में बोला।
‘‘कोई एक्सीडेंट कर बैठी थी वो, जिसमें एक आदमी को गम्भीर चोटें आईं थी। बाद में अस्पताल में उसने दम तोड़ दिया था। उस वक्त मंदिरा ने ड्रिंक कर रखा था और वो बहुत ज्यादा नशे में भी थी। घटनास्थल से तो एक्सीडेंट के बाद वह फरार होने में कामयाब हो गई मगर दो दिन बाद ही पुलिस ने उसे ढूंढ निकाला था। उस रोज जो पुलिसिया उसके पास पहुंचा था वो राकेश चौहान था। बतौर मंदिरा वो उसे देखते ही फ्लैट हो गया था। और उसके जरा सा रिक्वेस्ट करते ही उसने मंदिरा को बचाने के लिए केस का रूख ही पलट कर रख दिया। इस तरह उस पुलिसिये की बदौलत मंदिरा जेल जाने से बची थी।‘‘
‘‘फिर क्या हुआ?‘‘
‘‘इसके बाद एक दो बार मैंने मंदिरा से उस बारे में बात करनी चाही तो वह यह कहकर टाल गयी कि सब सैटल हो गया था।‘‘
‘‘आगे कभी चौहान का जिक्र किया हो उसने।‘‘
‘‘नहीं कभी नहीं किया।‘‘
‘‘जरा दिमाग पर जोर डालकर बताओ कि वो एक्सीडेंट वाला वाकया कब हुआ था?‘‘
‘‘जोर डालने की जरूरत नहीं मुझे वैसे ही याद है, क्योंकि उसके अगले दिन मेरा बर्थ डे था। इस लिहाज से वो वाकया चौदह दिसम्बर की रात को घटित हुआ होगा।‘‘
‘‘उसने कभी किसी ऐसे व्यक्ति का जिक्र किया हो जिसके उसके प्रेम संबंध रहे हों, या ऐसा कोई जिक्र जिससे तुम्हे लगा हो कि शी वाज इन लव।‘‘
‘‘नहीं मुझे इसकी कोई खबर नहीं है।‘‘
‘‘तुम किसी सुनीता गायकवाड़ को जानती हो।‘‘
‘‘सिर्फ इसलिए जानती हूं क्योंकि पुलिस ने बताया था मुझे उसके बारे में।‘‘
‘‘स्टडी अभी भी सील्ड है।‘‘
‘‘हां, मुझे यहां रहना तो है नहीं, इसलिए उस बारे में मैंने पुलिस से कोई बात नहीं की।‘‘
‘‘कोई और बात जो इस सिलसिले में तुम बताना चाहो।‘‘
उसने इंकार में मुंडी हिला दिया।
‘‘तो अब मैं इजाजत चाहूंगा, वक्त देने का शुक्रिया।‘‘
‘‘जरा ठहरो, मुझे बताकर जाओ कि ये सब पूछताछ तुम किसके लिए कर रहे हो।‘‘
‘‘तुम्हारी बहन के हत्यारे को उसके कुकर्मों की सजा दिलवाने के लिए।‘‘
‘‘यूंही बिना किसी फीस के?‘‘
‘‘यही समझ लो।‘‘
‘‘कहीं दिल तो नहीं आ गया था तुम्हारा मेरी बहन पर।‘‘
‘‘था तो कुछ ऐसा ही।‘‘
‘‘तो क्या मैं ये समझूं कि उसके पेट में जो बच्चा था वो तुम्हारा था।‘‘
‘‘काश ऐसा होता, मगर अफसोस की नहीं था।‘‘
‘‘शादीशुदा हो।‘‘
‘‘नहीं।‘‘
‘‘भई बच्चों का इतना ही शौक है तो शादी कर लो।‘‘
‘‘तुम गलत समझ रही हो, शौक मुझे बच्चों का नहीं है, उसका है जो बच्चे पैदा करने के लिए किया जाता है।‘‘
उसने हैरानी से मेरी तरफ देखा।
‘‘बहरहाल तुम्हारी बहन का कातिल जल्दी ही सलाखों के पीछे अपने कुकर्मों की सजा भुगत रहा होगा, ये मेरा वादा है तुमसे।‘‘
उसने अनमने भाव से हौले से सिर हिला दिया।
बाहर आकर मैं अपनी कार में सवार हो गया। एमबी रोड पर पहुंचकर मैंने कार का रूख संगम विहार की ओर कर दिया। मेरा इरादा एक चक्कर सुनीता गायकवाड़ के फ्लैट का लगाने का था, जिसे मैंने फौरन बाद ही मुल्तवी कर दिया और खानपुर से लेफ्ट लेकर साकेत कोर्ट के सामने से गुजरते हुए अपने ऑफिस पहुंचा।
ऑफिस का शीशे वाला दरवाजा लॉक्ड था, अलबत्ता शटर नहीं गिराया गया था। मैंने घड़ी देखी, तीन बज रहे थे। ये तो उसका लंच टाइम भी नहीं था, कहां चली गई थी वो। मैंने अपनी ‘की‘ से दरवाजा खोला, रिसेप्शन पर एक नजर डाला, मगर वहां मेरे लिए कोई मैसेज नहीं छोड़ा था उसने। मैं अपने केबिन में पहुंचकर उसकी वापसी का इंतजार करने लगा।
बीस मिनट बाद।
‘‘हलो, गुड ऑफ्टर नून।‘‘
वो जैसे अंडों पर पांव रखती मेरे केबिन के दरवाजे पर नमूनदार हुई।
मैंने उसे घूर कर देखा। वो फौरन वापस जाने को मुड़ी।
‘‘कहां जा रही है कम्बख्त।‘‘
‘‘अरे तुम तो सही सलामत हो।‘‘
‘‘अब इसका क्या मतलब हुआ।‘‘
‘‘मुझे देखकर तुम्हारी आंखें यूं फैल गईं थीं कि मैंने सोचा इतनी हॉट और सैक्सी लड़की देखकर तुम्हें कोई दौरा-वौरा पड़ गया है, एम्बुलेंस बुलाने जा रही थी।‘‘
‘‘तो एम्बुलेंस को मोबाइल से कॉल किया होता।‘‘
‘‘कर तो लेती मगर एम्बुलेंस आने से पहले तुम्हें होश आ जाता तो पैसे बरबाद हो जाते।‘‘
‘‘फिर तो बाहर निकल कर स्कूटर की बजाय जरूर तू बस में सवार होती, यूं ज्यादा वक्त मिल जाता तुझे।‘‘
‘‘अरे बस किसलिए, पास में ही तो है हॉस्पिटल, पैदल चल के मुश्किल से बीस मिनट में पहुंच जाती।‘‘
‘‘और वहां जाकर हाल दुहाई मचाती कि फौरन एक एम्बुलेंस भेजी जाय, मरीज की हालत बेहद सीरियस है।‘‘
‘‘नहीं यूं तो वो लोग एम्बुलेंस को फौरन रवाना कर देते फिर मेरी इतनी मेहनत का फायदा क्या होता।‘‘
‘‘अच्छा फिर क्या करती।‘‘
‘‘मैं उनसे पूछती कि क्या वो कोई नई एम्बुलेंस खरीदने वाले हैं, जो अभी सेड्यूल में नहीं है। जवाब में अगर वो हां करते तो मैं तुम्हारे लिए बुक करा देती।‘‘
‘‘और अगर मना कर देते तो।‘‘
‘‘तो दूसरे हॉस्पिटल में ट्राई करती, तीसरे में करती, चौथे में करती...।‘‘
‘‘और मान ले अगर कहीं भी ऐसी एम्बुलेंस की हामी नहीं भरी जाती तो।‘‘
‘‘फिर तो मजबूरी थी, हमारे ऑफिस के बगल वाले हॉस्पिटल को खबर करनी पड़ती, अब मैं यूं भला तुम्हें मरते हुए कैसे देख सकती थी।‘‘
‘‘बक चुकी।‘‘
‘‘हां।‘‘
‘‘गुड! अब बता कहां गयी थी?‘‘
‘‘एक मर्द का पीछा कर रही थी।‘‘
‘‘इसे कहते हैं बगल में बच्चा और गांव में ढिंढोरा, ये जो तेरे सामने छह फीट का गबरू जवान बैठा है वो नहीं दिखाई देता तुझे़, जो आजकल गैर मर्दों का पीछा करना शुरू कर दिया।‘‘
‘‘मैं तुम्हें वैसी निगाहों से नहीं देखती।‘‘
‘‘अरे तो देखा कर ना, मैं मना करूं तब बोलना।‘‘
‘‘नहीं देख सकती।‘‘
‘‘मगर क्यों?‘‘
‘‘क्योंकि तुम्हें देखकर कभी मेरे मन में ऐसे-वैसे ख्याल नहीं आते।‘‘
‘‘इसे मैं कॉम्प्लीमेंट समझूं या बेइज्जती।‘‘
‘‘है तो ये बेइज्जती ही, मगर तुम्हें समझ में आए तब ना।‘‘
मैंने आहत भाव से उसकी ओर देखा।
‘‘प्लीज ऐसा ख्याल भी मत आने दो अपने मन में ये पाप है।‘‘
‘‘क्या पाप है।‘‘ मैं हड़बड़ा सा गया।
‘‘ये कायरों का काम है।‘‘
‘‘अरे कौन सा काम।‘‘
‘‘आत्महत्या करना।‘‘
मैं दोनों हाथों से अपना सिर पकड़ कर बैठ गया। कम्बख्त किसी दिन जरूर मुझे पागलखाने का केस बना कर छोड़ेगी।
‘‘मैं तुम्हारे लिए कॉफी मंगाती हूं, तनाव से मुक्ति मिलेगी, हीन भावना से भी बाहर निकलने में मददगार साबित होगी।‘‘
मैं चुप रहा।
‘‘तुमने कभी फरियादी दवाखाना का नाम सुना है?‘‘ इस बार वो गम्भीर लहजे में बोली।
‘‘नहीं।‘‘
‘‘मेरे ख्याल से तुम्हे एक चक्कर वहां का लगाना चाहिए।‘‘
‘‘हमारे केस के संदर्भ में?‘‘
‘‘हां तुम्हारे केस के संदर्भ में‘‘
‘‘खुलकर बता क्या कहना चाहती है।‘‘
‘‘वो लोग मरीज का नाम गुप्त रखने की गारंटी करते हैं।‘‘
‘‘ठहर जा कम्बख्त! मैं तुझे अभी बताता हूं कि मैं कितना बड़ा मर्द हूं।‘‘
इस बार सचमुच मेरा खून खौल उठा। मैंने मेज के ऊपर से ही हाथ बढ़ाकर उसका थोबड़ा पकड़ लिया और उसके होंठों पर अपने होंठ जमा दिये। वो कसमसाई खुद को अलग करने की कोशिश की मगर मैंने एक लम्बे लिप लॉक के बाद ही उसे छोड़ा।
‘‘ये क्या हरकत हुई।‘‘ वो हांफती हुई गुस्से से बोली।
‘‘शुरूआत तूने की थी।‘‘
‘‘हां मगर जब तुम्हें पता है कि अंत करना तुम्हारे वश की बात नहीं है, तो क्यों कोशिश कर के अपनी बेइज्जती करा रहे हो।‘‘