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आगे बढ़कर मैं खिड़की के करीब पहुंचा। सावधानी पूर्वक गर्दन बाहर निकालकर आस-पास का जायजा लिया। वो तकरीबन पांच फीट चौड़ी गली थी, जिसमें तरह-तरह के पाइपों की भरमार दिखाई दे रही थी। वैसा ही एक पाईप खिड़की के एकदम करीब से गुजर रहा था। और कोई संदिग्ध बात मुझे वहां नहीं दिखाई दी, अलबत्ता मेरी अक्ल कह रही थी कि कातिल वहीं से भीतर दाखिल हुआ था और कत्ल करने के बाद वहीं से वापिस निकल गया था।
मैं वापिस लाश के करीब पहुंचा।
‘‘खबरदार हिलना नहीं!‘‘
एक रौबदार आवाज गूंजी, साथ ही मेरी निगाह अपनी तरफ तनी हुई रिवाल्वर से होती हुई उस सख्स पर पड़ी जो खुले हुए दरवाजे पर मेरी ओर रिवाल्वर ताने खड़ा था। वो कोई तीसेक साल का, लंबे कद वाला युवक था जो इस वक्त ग्रे कलर का सूट और उससे मैच करती टाई बांधे हुए था।
‘‘चुपचाप दो उंगलियों से अपनी रिवाल्वर निकालकर फर्श पर रख दो, कोई बेजा हरकत की तो मैं तुम्हें गोली मारने में एक क्षण को भी नहीं हिचकूंगा।‘‘
‘‘ठीक है गोली चलाओ - मैं पूरी दिलेरी से बोला - जब तुम इतने बड़े अक्ल के अंधे हो कि तुम्हें दिखाई नहीं देता कि मेरे पास कोई हथियार नहीं है तो जो मन में आए करो, मैं गेट की तरफ आ रहा हूं।‘‘ कहकर मैं उसकी रिवाल्वर पर निगाह जमाये गेट की तरफ बढ़ा।
‘‘मैं कहता हूं रूक जाओ, वरना मैं सचमुच शूट कर दूंगा तुम्हें।‘‘
मैं हंसा।
‘‘ओके मैं गोली चलाने जा रहा हूं।‘‘
‘‘पहले रिवाल्वर तो सीधा करो भई वरना यूं तो तुम अपनी ही जान ले लोगे।‘‘
जवाब में उसका ध्यान सिर्फ एक क्षण को मेरी तरफ से भटककर रिवाल्वर पर गया, जो कि एकदम ठीक दिशा में तनी हुई थी। मैंने उस क्षण का पूरा फायदा उठाते हुए उसपर छलांग लगा दी। उसके रिवाल्वर वाले हाथ को जबरन लेफ्ट साइड को मोड़ते हुए मैं उसे लिए-दिए फर्श पर जा गिरा। इस प्रक्रिया में उसका सिर जोर से फर्श से टकराया और रिवाल्वर उसके हाथों से छिटक कर दूर जा गिरी।
तभी नीलम के साथ सिक्योरिटी गार्ड वहां प्रगट हुआ।
‘‘अरे क्यों मार रहे हो आप साहब को, छोड़ो इन्हें।‘‘ कहकर वो मेरी तरफ बढ़ा।
‘‘तुम जानते हो इसे।‘‘ मैं हकबकाकर बोला।
‘‘हां ये महीप साहब हैं, रोहिल्ला साहब के मैनेजर।‘‘
जवाब में मैं उसे फौरन बंधन मुक्त करता हुआ बोला, ‘‘सॉरी!‘‘
‘‘सॉरी! - वो गुस्से से बोला - सिर फोड़ दिया तुमने मेरा।‘‘
‘‘क्या करता जनाब आप भी तो जैसे मुझपर गोली चलाने को एकदम अमादा थे।‘‘
‘‘उसकी वजह थी मेरे पास, तुमने अंकुर बाबा का कत्ल किया है, ऐसे कैसे फरार हो जाने देता मैं तुम्हें।‘‘
‘‘ऐसा नहीं हो सकता साहब! - मुझसे पहले सिक्योरिटी गार्ड बोल पड़ा - जब गोली चली थी तो ये साहब और मैम साहब दोनों बाउंड्री गेट के पास थे और मैं इनके बाहर निकलने के लिए दरवाजा खोल रहा था।‘‘
‘‘अरे तो पहले बोलना था।‘‘ वो झल्लाकर बोला।
‘‘पहले कब! - गार्ड हड़बड़कर बोला - मैं आपके सामने ही तो पहुंचा हूं यहां।‘‘
जवाब में इस बार महीप शाह कुछ नहीं बोला।
मैंने फर्श पर पड़ी रिवाल्वर उठाकर मुआयना किया। नाल को नाक के पास लेजाकर सूंघा, चैम्बर खोलकर देखा, छह की छह गोलियां मौजूद थीं। अंकुर रोहिल्ला को कम से कम उस रिवाल्वर से शूट नहीं किया गया था। मैंने रिवाल्वर उसे वापिस कर दी।
इसके बाद मैंने उसके पूछने पर अपना परिचय दिया और उसे पुलिस को फोन करने की हिदायत देकर दोबारा कमरे में जा घुसा।
एक बार फिर मैं लाश के मुआयने में लग गया।
‘‘मर गया।‘‘ दरवाजे पर खड़ी नीलम हौले से बोली।
‘‘हां और मरकर खुद को बेगुनाह साबित कर गया।‘‘
‘‘माई गॉड यकीन नहीं होता, कि अभी कुछ मिनट पहले हम इस सख्स से बातें कर रहे थे, और उसे डबल मर्डर के लिए जिम्मेदार ठहरा रहे थे।‘‘
मैंने लाश की जेबें टटोल डालीं और उस मुख्तर से वक्त में उसके बेडरूम की जितनी तलाशी ले सकता था लेने में जुट गया।
‘‘पुलिस आ रही है।‘‘ दरवाजे पर खड़ी नीलम जल्दी से बोली।
‘‘क्या?‘‘
मैं हकबकाकर बाहर निकल आया। इतनी जल्दी भला पुलिस वहां कैसे पहंुच गयी। तभी मैंने तिवारी को एक सब-इंस्पेक्टर, और दो सिपाहियों के साथ सीढ़ियां चढ़ते हुए देखा। गार्ड उनके पीछे-पीछे चला आ रहा था।
उसका भला यहां क्या काम था, ये इलाका तो उनके अंडर में नहीं आता था।
सभी सीढ़ियां चढ़कर मेरे पास पहुंचे।
‘‘लाश कहां है?‘‘ तिवारी ने सीधा प्रश्न किया। मैंने चुपचाप भीतर की ओर इशारा कर दिया। उसने मेरी वहां मौजूदगी पर कोई हैरानी नहीं जताई तो मुझे समझते देर नहीं लगी कि उसका यहां आगमन अंकुर के कत्ल की वजह से नहीं बल्कि हमारी ‘मंदिर‘ वाली विजिट की वजह से हुआ था। यकीनन हवलदार ने थाने पहुंचकर या फोन पर उसे सबकुछ कह सुनाया था कि हम किस फिराक में थे।
करीब पांच मिनट बाद तिवारी कमरे से बाहर निकला और फोन पर व्यस्त हो गया। उसकी बातों से जल्दी ही यह जाहिर हो गया कि वो अपने एसएचओ खान से बात कर रहा था।
इसके बाद उसने महीप शाह और गार्ड के साथ-साथ अपने साथ आए पुलिसियों को भी नीचे हॉल में जाकर बैठने का हुक्म दनदना दिया।
‘‘अब बोलो क्या हुआ था यहां?‘‘ वो मोबाइल से फारिग होकर बोला।
जवाब में मैंने उसे बता दिया कि जिस वक्त गोली चली थी उस वक्त हम बाहर गेट के करीब थे, गार्ड इस बात का गवाह था। लिहाजा हमें नहीं मालूम कि हमारे पीठ पीछे, मुख्तर से वक्त में कातिल क्योंकर अंकुर रोहिल्ला के सिर पर जा सवार होने में कामयाब हो गया।
जवाब में वो कुछ क्षण निगाहों से मुझे तौलता रहा फिर बोला, ‘‘देखो यह इलाका हमारे थाने का नहीं है, लिहाजा यहां जो कुछ भी घटित हुआ उसकी जांच पड़ताल यहां की पुलिस करेगी। अब अगर तुम पुलिस के हाथों अपनी दुर्गति नहीं कराना चाहते तो मुझे वो तमाम बातें बताओं जो यहां तुम्हारे और मकतूल के बीच हुई थीं। हो सकता है तुम्हारे जवाब से से संतुष्ट होकर मैं इस इलाके के एसएचओ - प्रवीन शर्मा जो कि मेरा दोस्त है - उससे तुम्हारी सिफारिश कर दूं और यूं तुम पुलिस के हाथों हलकान होने से बच जाओ।‘‘
‘‘तिवारी साहब बात तो आपकी ठीक है, मैं मान भी लेता अगरचे कि आपने मुझे धमकाने की बजाया दोस्ताना लहजे में ये सवाल किया होता।‘‘
‘‘भई दोस्ताना लहजा तुम्हें पसंद कब आता है, बिना हूल दिये तुम कुछ बताते कब हो।‘‘
‘‘आप भूल गये लगते हैं कि इस बार मैं जिस सख्स की हिमायत में लगा हूं वो आपके मातहत काम करने वाला एक सब-इंस्पेक्टर है। जिसके बारे में अभी कल आप ये स्वीकार करके हटे थे कि आपने उसके साथ विस्की शेयर की थी। रही बात लोकल पुलिस के हलकान करने की तो जनाब क्या ऐसा कोई पहली बार होगा मेरे साथ!‘‘
उसने कुछ क्षण उस बात पर विचार किया।
‘‘ठीक है समझ लो मुझे तुम्हारी बात से इत्तेफाक है, मैं दिल से इस बात के लिए सॉरी बोलता हूं कि मैंने तुम्हें हूल दी! अब बताओ क्या बातें हुई थीं तुम्हारे और मकतूल के बीच।‘‘
जवाब में मैंने कनखियों से नीलम की तरफ देखा, उस एक पल में उसने आंखों के इशारे से मुझे जुबान खोलने को मना कर दिया। लिहाजा मुझे अब एक सजती सी कहानी सुनानी थी उस पुलिसिये को, ऐसी कहानी जो उसे आसानी से हजम हो जाती।
मैं वापिस लाश के करीब पहुंचा।
‘‘खबरदार हिलना नहीं!‘‘
एक रौबदार आवाज गूंजी, साथ ही मेरी निगाह अपनी तरफ तनी हुई रिवाल्वर से होती हुई उस सख्स पर पड़ी जो खुले हुए दरवाजे पर मेरी ओर रिवाल्वर ताने खड़ा था। वो कोई तीसेक साल का, लंबे कद वाला युवक था जो इस वक्त ग्रे कलर का सूट और उससे मैच करती टाई बांधे हुए था।
‘‘चुपचाप दो उंगलियों से अपनी रिवाल्वर निकालकर फर्श पर रख दो, कोई बेजा हरकत की तो मैं तुम्हें गोली मारने में एक क्षण को भी नहीं हिचकूंगा।‘‘
‘‘ठीक है गोली चलाओ - मैं पूरी दिलेरी से बोला - जब तुम इतने बड़े अक्ल के अंधे हो कि तुम्हें दिखाई नहीं देता कि मेरे पास कोई हथियार नहीं है तो जो मन में आए करो, मैं गेट की तरफ आ रहा हूं।‘‘ कहकर मैं उसकी रिवाल्वर पर निगाह जमाये गेट की तरफ बढ़ा।
‘‘मैं कहता हूं रूक जाओ, वरना मैं सचमुच शूट कर दूंगा तुम्हें।‘‘
मैं हंसा।
‘‘ओके मैं गोली चलाने जा रहा हूं।‘‘
‘‘पहले रिवाल्वर तो सीधा करो भई वरना यूं तो तुम अपनी ही जान ले लोगे।‘‘
जवाब में उसका ध्यान सिर्फ एक क्षण को मेरी तरफ से भटककर रिवाल्वर पर गया, जो कि एकदम ठीक दिशा में तनी हुई थी। मैंने उस क्षण का पूरा फायदा उठाते हुए उसपर छलांग लगा दी। उसके रिवाल्वर वाले हाथ को जबरन लेफ्ट साइड को मोड़ते हुए मैं उसे लिए-दिए फर्श पर जा गिरा। इस प्रक्रिया में उसका सिर जोर से फर्श से टकराया और रिवाल्वर उसके हाथों से छिटक कर दूर जा गिरी।
तभी नीलम के साथ सिक्योरिटी गार्ड वहां प्रगट हुआ।
‘‘अरे क्यों मार रहे हो आप साहब को, छोड़ो इन्हें।‘‘ कहकर वो मेरी तरफ बढ़ा।
‘‘तुम जानते हो इसे।‘‘ मैं हकबकाकर बोला।
‘‘हां ये महीप साहब हैं, रोहिल्ला साहब के मैनेजर।‘‘
जवाब में मैं उसे फौरन बंधन मुक्त करता हुआ बोला, ‘‘सॉरी!‘‘
‘‘सॉरी! - वो गुस्से से बोला - सिर फोड़ दिया तुमने मेरा।‘‘
‘‘क्या करता जनाब आप भी तो जैसे मुझपर गोली चलाने को एकदम अमादा थे।‘‘
‘‘उसकी वजह थी मेरे पास, तुमने अंकुर बाबा का कत्ल किया है, ऐसे कैसे फरार हो जाने देता मैं तुम्हें।‘‘
‘‘ऐसा नहीं हो सकता साहब! - मुझसे पहले सिक्योरिटी गार्ड बोल पड़ा - जब गोली चली थी तो ये साहब और मैम साहब दोनों बाउंड्री गेट के पास थे और मैं इनके बाहर निकलने के लिए दरवाजा खोल रहा था।‘‘
‘‘अरे तो पहले बोलना था।‘‘ वो झल्लाकर बोला।
‘‘पहले कब! - गार्ड हड़बड़कर बोला - मैं आपके सामने ही तो पहुंचा हूं यहां।‘‘
जवाब में इस बार महीप शाह कुछ नहीं बोला।
मैंने फर्श पर पड़ी रिवाल्वर उठाकर मुआयना किया। नाल को नाक के पास लेजाकर सूंघा, चैम्बर खोलकर देखा, छह की छह गोलियां मौजूद थीं। अंकुर रोहिल्ला को कम से कम उस रिवाल्वर से शूट नहीं किया गया था। मैंने रिवाल्वर उसे वापिस कर दी।
इसके बाद मैंने उसके पूछने पर अपना परिचय दिया और उसे पुलिस को फोन करने की हिदायत देकर दोबारा कमरे में जा घुसा।
एक बार फिर मैं लाश के मुआयने में लग गया।
‘‘मर गया।‘‘ दरवाजे पर खड़ी नीलम हौले से बोली।
‘‘हां और मरकर खुद को बेगुनाह साबित कर गया।‘‘
‘‘माई गॉड यकीन नहीं होता, कि अभी कुछ मिनट पहले हम इस सख्स से बातें कर रहे थे, और उसे डबल मर्डर के लिए जिम्मेदार ठहरा रहे थे।‘‘
मैंने लाश की जेबें टटोल डालीं और उस मुख्तर से वक्त में उसके बेडरूम की जितनी तलाशी ले सकता था लेने में जुट गया।
‘‘पुलिस आ रही है।‘‘ दरवाजे पर खड़ी नीलम जल्दी से बोली।
‘‘क्या?‘‘
मैं हकबकाकर बाहर निकल आया। इतनी जल्दी भला पुलिस वहां कैसे पहंुच गयी। तभी मैंने तिवारी को एक सब-इंस्पेक्टर, और दो सिपाहियों के साथ सीढ़ियां चढ़ते हुए देखा। गार्ड उनके पीछे-पीछे चला आ रहा था।
उसका भला यहां क्या काम था, ये इलाका तो उनके अंडर में नहीं आता था।
सभी सीढ़ियां चढ़कर मेरे पास पहुंचे।
‘‘लाश कहां है?‘‘ तिवारी ने सीधा प्रश्न किया। मैंने चुपचाप भीतर की ओर इशारा कर दिया। उसने मेरी वहां मौजूदगी पर कोई हैरानी नहीं जताई तो मुझे समझते देर नहीं लगी कि उसका यहां आगमन अंकुर के कत्ल की वजह से नहीं बल्कि हमारी ‘मंदिर‘ वाली विजिट की वजह से हुआ था। यकीनन हवलदार ने थाने पहुंचकर या फोन पर उसे सबकुछ कह सुनाया था कि हम किस फिराक में थे।
करीब पांच मिनट बाद तिवारी कमरे से बाहर निकला और फोन पर व्यस्त हो गया। उसकी बातों से जल्दी ही यह जाहिर हो गया कि वो अपने एसएचओ खान से बात कर रहा था।
इसके बाद उसने महीप शाह और गार्ड के साथ-साथ अपने साथ आए पुलिसियों को भी नीचे हॉल में जाकर बैठने का हुक्म दनदना दिया।
‘‘अब बोलो क्या हुआ था यहां?‘‘ वो मोबाइल से फारिग होकर बोला।
जवाब में मैंने उसे बता दिया कि जिस वक्त गोली चली थी उस वक्त हम बाहर गेट के करीब थे, गार्ड इस बात का गवाह था। लिहाजा हमें नहीं मालूम कि हमारे पीठ पीछे, मुख्तर से वक्त में कातिल क्योंकर अंकुर रोहिल्ला के सिर पर जा सवार होने में कामयाब हो गया।
जवाब में वो कुछ क्षण निगाहों से मुझे तौलता रहा फिर बोला, ‘‘देखो यह इलाका हमारे थाने का नहीं है, लिहाजा यहां जो कुछ भी घटित हुआ उसकी जांच पड़ताल यहां की पुलिस करेगी। अब अगर तुम पुलिस के हाथों अपनी दुर्गति नहीं कराना चाहते तो मुझे वो तमाम बातें बताओं जो यहां तुम्हारे और मकतूल के बीच हुई थीं। हो सकता है तुम्हारे जवाब से से संतुष्ट होकर मैं इस इलाके के एसएचओ - प्रवीन शर्मा जो कि मेरा दोस्त है - उससे तुम्हारी सिफारिश कर दूं और यूं तुम पुलिस के हाथों हलकान होने से बच जाओ।‘‘
‘‘तिवारी साहब बात तो आपकी ठीक है, मैं मान भी लेता अगरचे कि आपने मुझे धमकाने की बजाया दोस्ताना लहजे में ये सवाल किया होता।‘‘
‘‘भई दोस्ताना लहजा तुम्हें पसंद कब आता है, बिना हूल दिये तुम कुछ बताते कब हो।‘‘
‘‘आप भूल गये लगते हैं कि इस बार मैं जिस सख्स की हिमायत में लगा हूं वो आपके मातहत काम करने वाला एक सब-इंस्पेक्टर है। जिसके बारे में अभी कल आप ये स्वीकार करके हटे थे कि आपने उसके साथ विस्की शेयर की थी। रही बात लोकल पुलिस के हलकान करने की तो जनाब क्या ऐसा कोई पहली बार होगा मेरे साथ!‘‘
उसने कुछ क्षण उस बात पर विचार किया।
‘‘ठीक है समझ लो मुझे तुम्हारी बात से इत्तेफाक है, मैं दिल से इस बात के लिए सॉरी बोलता हूं कि मैंने तुम्हें हूल दी! अब बताओ क्या बातें हुई थीं तुम्हारे और मकतूल के बीच।‘‘
जवाब में मैंने कनखियों से नीलम की तरफ देखा, उस एक पल में उसने आंखों के इशारे से मुझे जुबान खोलने को मना कर दिया। लिहाजा मुझे अब एक सजती सी कहानी सुनानी थी उस पुलिसिये को, ऐसी कहानी जो उसे आसानी से हजम हो जाती।