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Thriller गहरी साजिश

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आगे बढ़कर मैं खिड़की के करीब पहुंचा। सावधानी पूर्वक गर्दन बाहर निकालकर आस-पास का जायजा लिया। वो तकरीबन पांच फीट चौड़ी गली थी, जिसमें तरह-तरह के पाइपों की भरमार दिखाई दे रही थी। वैसा ही एक पाईप खिड़की के एकदम करीब से गुजर रहा था। और कोई संदिग्ध बात मुझे वहां नहीं दिखाई दी, अलबत्ता मेरी अक्ल कह रही थी कि कातिल वहीं से भीतर दाखिल हुआ था और कत्ल करने के बाद वहीं से वापिस निकल गया था।

मैं वापिस लाश के करीब पहुंचा।

‘‘खबरदार हिलना नहीं!‘‘

एक रौबदार आवाज गूंजी, साथ ही मेरी निगाह अपनी तरफ तनी हुई रिवाल्वर से होती हुई उस सख्स पर पड़ी जो खुले हुए दरवाजे पर मेरी ओर रिवाल्वर ताने खड़ा था। वो कोई तीसेक साल का, लंबे कद वाला युवक था जो इस वक्त ग्रे कलर का सूट और उससे मैच करती टाई बांधे हुए था।

‘‘चुपचाप दो उंगलियों से अपनी रिवाल्वर निकालकर फर्श पर रख दो, कोई बेजा हरकत की तो मैं तुम्हें गोली मारने में एक क्षण को भी नहीं हिचकूंगा।‘‘

‘‘ठीक है गोली चलाओ - मैं पूरी दिलेरी से बोला - जब तुम इतने बड़े अक्ल के अंधे हो कि तुम्हें दिखाई नहीं देता कि मेरे पास कोई हथियार नहीं है तो जो मन में आए करो, मैं गेट की तरफ आ रहा हूं।‘‘ कहकर मैं उसकी रिवाल्वर पर निगाह जमाये गेट की तरफ बढ़ा।

‘‘मैं कहता हूं रूक जाओ, वरना मैं सचमुच शूट कर दूंगा तुम्हें।‘‘

मैं हंसा।

‘‘ओके मैं गोली चलाने जा रहा हूं।‘‘

‘‘पहले रिवाल्वर तो सीधा करो भई वरना यूं तो तुम अपनी ही जान ले लोगे।‘‘

जवाब में उसका ध्यान सिर्फ एक क्षण को मेरी तरफ से भटककर रिवाल्वर पर गया, जो कि एकदम ठीक दिशा में तनी हुई थी। मैंने उस क्षण का पूरा फायदा उठाते हुए उसपर छलांग लगा दी। उसके रिवाल्वर वाले हाथ को जबरन लेफ्ट साइड को मोड़ते हुए मैं उसे लिए-दिए फर्श पर जा गिरा। इस प्रक्रिया में उसका सिर जोर से फर्श से टकराया और रिवाल्वर उसके हाथों से छिटक कर दूर जा गिरी।

तभी नीलम के साथ सिक्योरिटी गार्ड वहां प्रगट हुआ।

‘‘अरे क्यों मार रहे हो आप साहब को, छोड़ो इन्हें।‘‘ कहकर वो मेरी तरफ बढ़ा।

‘‘तुम जानते हो इसे।‘‘ मैं हकबकाकर बोला।

‘‘हां ये महीप साहब हैं, रोहिल्ला साहब के मैनेजर।‘‘

जवाब में मैं उसे फौरन बंधन मुक्त करता हुआ बोला, ‘‘सॉरी!‘‘

‘‘सॉरी! - वो गुस्से से बोला - सिर फोड़ दिया तुमने मेरा।‘‘

‘‘क्या करता जनाब आप भी तो जैसे मुझपर गोली चलाने को एकदम अमादा थे।‘‘

‘‘उसकी वजह थी मेरे पास, तुमने अंकुर बाबा का कत्ल किया है, ऐसे कैसे फरार हो जाने देता मैं तुम्हें।‘‘

‘‘ऐसा नहीं हो सकता साहब! - मुझसे पहले सिक्योरिटी गार्ड बोल पड़ा - जब गोली चली थी तो ये साहब और मैम साहब दोनों बाउंड्री गेट के पास थे और मैं इनके बाहर निकलने के लिए दरवाजा खोल रहा था।‘‘

‘‘अरे तो पहले बोलना था।‘‘ वो झल्लाकर बोला।

‘‘पहले कब! - गार्ड हड़बड़कर बोला - मैं आपके सामने ही तो पहुंचा हूं यहां।‘‘

जवाब में इस बार महीप शाह कुछ नहीं बोला।

मैंने फर्श पर पड़ी रिवाल्वर उठाकर मुआयना किया। नाल को नाक के पास लेजाकर सूंघा, चैम्बर खोलकर देखा, छह की छह गोलियां मौजूद थीं। अंकुर रोहिल्ला को कम से कम उस रिवाल्वर से शूट नहीं किया गया था। मैंने रिवाल्वर उसे वापिस कर दी।

इसके बाद मैंने उसके पूछने पर अपना परिचय दिया और उसे पुलिस को फोन करने की हिदायत देकर दोबारा कमरे में जा घुसा।

एक बार फिर मैं लाश के मुआयने में लग गया।

‘‘मर गया।‘‘ दरवाजे पर खड़ी नीलम हौले से बोली।

‘‘हां और मरकर खुद को बेगुनाह साबित कर गया।‘‘

‘‘माई गॉड यकीन नहीं होता, कि अभी कुछ मिनट पहले हम इस सख्स से बातें कर रहे थे, और उसे डबल मर्डर के लिए जिम्मेदार ठहरा रहे थे।‘‘

मैंने लाश की जेबें टटोल डालीं और उस मुख्तर से वक्त में उसके बेडरूम की जितनी तलाशी ले सकता था लेने में जुट गया।

‘‘पुलिस आ रही है।‘‘ दरवाजे पर खड़ी नीलम जल्दी से बोली।

‘‘क्या?‘‘

मैं हकबकाकर बाहर निकल आया। इतनी जल्दी भला पुलिस वहां कैसे पहंुच गयी। तभी मैंने तिवारी को एक सब-इंस्पेक्टर, और दो सिपाहियों के साथ सीढ़ियां चढ़ते हुए देखा। गार्ड उनके पीछे-पीछे चला आ रहा था।

उसका भला यहां क्या काम था, ये इलाका तो उनके अंडर में नहीं आता था।

सभी सीढ़ियां चढ़कर मेरे पास पहुंचे।

‘‘लाश कहां है?‘‘ तिवारी ने सीधा प्रश्न किया। मैंने चुपचाप भीतर की ओर इशारा कर दिया। उसने मेरी वहां मौजूदगी पर कोई हैरानी नहीं जताई तो मुझे समझते देर नहीं लगी कि उसका यहां आगमन अंकुर के कत्ल की वजह से नहीं बल्कि हमारी ‘मंदिर‘ वाली विजिट की वजह से हुआ था। यकीनन हवलदार ने थाने पहुंचकर या फोन पर उसे सबकुछ कह सुनाया था कि हम किस फिराक में थे।

करीब पांच मिनट बाद तिवारी कमरे से बाहर निकला और फोन पर व्यस्त हो गया। उसकी बातों से जल्दी ही यह जाहिर हो गया कि वो अपने एसएचओ खान से बात कर रहा था।

इसके बाद उसने महीप शाह और गार्ड के साथ-साथ अपने साथ आए पुलिसियों को भी नीचे हॉल में जाकर बैठने का हुक्म दनदना दिया।

‘‘अब बोलो क्या हुआ था यहां?‘‘ वो मोबाइल से फारिग होकर बोला।

जवाब में मैंने उसे बता दिया कि जिस वक्त गोली चली थी उस वक्त हम बाहर गेट के करीब थे, गार्ड इस बात का गवाह था। लिहाजा हमें नहीं मालूम कि हमारे पीठ पीछे, मुख्तर से वक्त में कातिल क्योंकर अंकुर रोहिल्ला के सिर पर जा सवार होने में कामयाब हो गया।

जवाब में वो कुछ क्षण निगाहों से मुझे तौलता रहा फिर बोला, ‘‘देखो यह इलाका हमारे थाने का नहीं है, लिहाजा यहां जो कुछ भी घटित हुआ उसकी जांच पड़ताल यहां की पुलिस करेगी। अब अगर तुम पुलिस के हाथों अपनी दुर्गति नहीं कराना चाहते तो मुझे वो तमाम बातें बताओं जो यहां तुम्हारे और मकतूल के बीच हुई थीं। हो सकता है तुम्हारे जवाब से से संतुष्ट होकर मैं इस इलाके के एसएचओ - प्रवीन शर्मा जो कि मेरा दोस्त है - उससे तुम्हारी सिफारिश कर दूं और यूं तुम पुलिस के हाथों हलकान होने से बच जाओ।‘‘

‘‘तिवारी साहब बात तो आपकी ठीक है, मैं मान भी लेता अगरचे कि आपने मुझे धमकाने की बजाया दोस्ताना लहजे में ये सवाल किया होता।‘‘

‘‘भई दोस्ताना लहजा तुम्हें पसंद कब आता है, बिना हूल दिये तुम कुछ बताते कब हो।‘‘

‘‘आप भूल गये लगते हैं कि इस बार मैं जिस सख्स की हिमायत में लगा हूं वो आपके मातहत काम करने वाला एक सब-इंस्पेक्टर है। जिसके बारे में अभी कल आप ये स्वीकार करके हटे थे कि आपने उसके साथ विस्की शेयर की थी। रही बात लोकल पुलिस के हलकान करने की तो जनाब क्या ऐसा कोई पहली बार होगा मेरे साथ!‘‘

उसने कुछ क्षण उस बात पर विचार किया।

‘‘ठीक है समझ लो मुझे तुम्हारी बात से इत्तेफाक है, मैं दिल से इस बात के लिए सॉरी बोलता हूं कि मैंने तुम्हें हूल दी! अब बताओ क्या बातें हुई थीं तुम्हारे और मकतूल के बीच।‘‘

जवाब में मैंने कनखियों से नीलम की तरफ देखा, उस एक पल में उसने आंखों के इशारे से मुझे जुबान खोलने को मना कर दिया। लिहाजा मुझे अब एक सजती सी कहानी सुनानी थी उस पुलिसिये को, ऐसी कहानी जो उसे आसानी से हजम हो जाती।
 
सबसे पहली बात मैंने उसे यही बताई कि अंकुर रोहिल्ला और मंदिरा चावला पति-पत्नि थे। जबकि मैं जानता था ये बात उसे पहले से मालूम थी, तभी वो इस घड़ी यहां मौजूद था। इसके बाद मैंने उसे उन हालात के बारे में बताया कि क्योंकर दोनों ने शादी की थी। इससे ज्यादा मैंने उसे और कुछ बककर नहीं दिया। उसने घुमा फिराकर ढेरों सवाल किये मगर मैंने उसके पल्ले कुछ नहीं डाला। अलबत्ता मैं ये सोचकर हैरान हो रहा था कि नीलम ने उसे कुछ बताने से मना क्यों किया, जबकि जरा सी तफ्तीश से वे तमाम बातें पुलिस को वैसे भी पता चल जाने वाली थीं।

अभी उसके सवाल-जवाब चल ही रहे थे कि तभी एक सिपाही, मुकेश सैनी को गर्दन के पीछे कालर से थामें हुए हॉल में दाखिल होता दिखाई दिया। वो नजारा देखकर तिवारी के साथ-साथ मैं और नीलम भी नीचे हॉल में जा पहुंचे। उस घड़ी मुकेश सैनी को वहां देखकर मैं हैरान हुए बिना नहीं रह सका।

‘‘कौन है ये?‘‘ तिवारी ने पूछा।

‘‘पता नहीं कौन है साहब, मुझे देखकर भागने की कोशिश कर रहा था तो मैंने इसे दौड़ाकर थाम लिया और यहां ले आया।‘‘

‘‘तलाशी लो इसकी।‘‘

तिवारी बोला तो सिपाही ने मुकेश सैनी को ऊपर से लेकर नीचे तक टटोल डाला। कोई काबिले जिक्र चीज बरामद नहीं हुई।

‘‘नाम क्या है तुम्हारा।‘‘

‘‘मुकेश सैनी - कहकर उसने एक बार मेरी तरफ देखा फिर जल्दी से बोला - ये प्राइवेट डिटेक्टिव मुझे जानता है।‘‘

सुनकर तत्काल तिवारी ने मेरी तरफ देखा।

‘‘सिर्फ इतना जानता हूं कि ये चौहान वाली इमारत में सेकेंड फ्लोर पर अठारह नंबर के फ्लैट में रहता है।‘‘

‘‘यहां क्यों आये थे।‘‘ तिवारी ने सैनी से पूछा।

‘‘किसी अंकुर रोहिल्ला के मैनेजर महीप शाह ने मुझे फोन करके यहां बुलाया था। वो कोई बड़ा बीमा करवाना चाहता था।‘‘

‘‘झूठ बोलता है ये! - महीप शाह गुस्से से बोला - मैंने आज से पहले इसकी शक्ल भी नहीं देखी थी, और फिर बीमा कराने के लिए क्या ये फटीचर ही बचा था।‘‘

‘‘आप एक मिनट चुप कीजिए - तिवारी बोला फिर वो सैनी से मुखातिब हुआ - तुम अंकुर रोहिल्ला के मैनेजर को पहले से जानते थे।‘‘

‘‘नहीं! मगर उसने फोन पर मेरे दोस्त नितिन यादव का हवाला देते हुए बताया था कि उसे मेरा नंबर नितिन यादव ने दिया था जो कि उसका भी दोस्त था।‘‘

‘‘तुमने नितिन से दरयाफ्त तो जरूर किया होगा इस बाबत।‘‘

‘‘नहीं, मैंने नहीं किया - वो कलपता हुआ बोला - क्यों करता साहब! बैठे बिठाए मुझे एक पॉलिशी मिल रही थी तो मैं क्यों बेवजह के सवाल करता फिरता।‘‘

‘‘तुम्हारे पास नितिन यादव का नंबर तो जरूर होगा।‘‘

‘‘हां वो तो है।‘‘

‘‘ठीक है उसे फोन कर के इस बाबत सवाल करो, देखो वो क्या जवाब देता है और मोबाइल को हैंड्स-फ्री मोड पर लगाकर बात करो उससे।‘‘

उसने किया, जो जवाब मिला उसका अंदाजा हम सभी को पहले से ही था। नितिन यादव ने साफ कहा कि वो किसी महीप शाह को नहीं जानता, लिहाजा उसका नाम रिकमेंड करने का तो सवाल ही नहीं उठता।

सुनकर सैनी का पहले से लटका हुआ चेहरा और ज्यादा लटक गया।

‘‘काल तुम्हारे मोबाइल पर की गई थी।‘‘

‘‘जी हां, वो भी किसी लैंडलाइन नंबर से।‘‘

‘‘ठीक है उस नंबर पर फोन लगाओ और पता करो कि वो कहां लगा हुआ है - कहकर तिवारी ने आगे जोड़ा - स्पीकर ऑन कर के।‘‘

मरता क्या न करता! उसने हिदायत के मुताबिक फोन लगाया। पता चला वो किसी पीसीओ का नंबर था जो कि सफदरजंग इंक्लेव इलाके में किसी स्टेशनरी शॉप पर लगा हुआ था।

मैंने सैनी के मोबाइल में देखकर वो नंबर नोट कर लिया। मुझे पूरी उम्मीद थी कि तिवारी ऐतराज करेगा मगर उसने उस बात पर कोई ध्यान नहीं दिया।

‘‘ठीक है! - तिवारी बड़े ही सब्र से बोला - समझो मैंने तुम्हारी तमाम बातों पर यकीन कर लिया। अब तुम मेरे आखिरी सवाल का जवाब दो - जब तुम यहां तक आ ही गये थे तो पुलिस को देखकर भागे क्यों।‘‘

‘‘मैं डर गया था। बंगले का गेट खुला हुआ था। कोई गार्ड नहीं, सिक्योरिटी का कोई इंतजाम नहीं! फिर गेट से भीतर दाखिल होते ही मुझे यहां की फिजा कुछ भारी सी लगने लगी थी। आगे जब मेरी निगाह कंपाउंड में खड़ी पुलिस कार पड़ी - जहां दो पुलिसकर्मी तनकर खड़े थे - तो फोन काल की बाबत मेरा विश्वास डगमगाने लगा। अचानक मुझे यूं लगने लगा जैसे मैं किसी जाल में फंसने जा रहा हूं। लिहाजा दो कदम भीतर बढ़ते ही मैं वापिस जाने के लिए पलट गया। मैं फौरन वहां से बाहर निकल जाना चाहता था। तभी इन्होंने मुझे रूकने का हुक्म दनदना दिया। सुनकर मेरा रहा-सहा धैर्य भी जवाब दे गया और मैं भाग खड़ा हुआ, अब आप लोग बताइए - यहां क्या घटित हो गया था।‘‘

‘‘तुम जा सकते हो।‘‘

‘‘जी क्या कहा आपने।‘‘

‘‘मैंने कहा तुम जा सकते हो, कम सुनते हो क्या?‘‘

‘‘जी नहीं, शुक्रिया।‘‘ कहकर वो यूं तेजी से वहां से बाहर की ओर बढ़ा जैसे डर हो कि जरा भी देरी होने पर पुलिस अपना इरादा बदल देगी।

‘‘लिहाजा तिवारी साहब का दिल आजकल दरिया होता जा रहा है, नहीं।‘‘ सैनी के पीठ पीछे मैं बोला।

जवाब में वो हौले से हंसा और उठकर टहलने वाले अंदाज में गेट की ओर बढ़ा, मैं तत्काल उसके पीछे हो लिया, जबकि बाकी लोग पूर्ववत अपनी जगह पर बैठे रहे।

सैनी जब हॉल से बाहर निकल गया तो तिवारी ने अपने मोबाइल से किसी को फोन लगाया, ‘‘अभी एक लड़का यहां से बाहर निकलेगा, साये की तरह उसके पीछे लग जाओ और फरदर इंस्ट्रक्शन मिलने तक बदस्तूर लगे रहो।‘‘

मैंने हैरानी से उसकी ओर देखा, जवाब में उसने बड़े ही शैतानी अंदाज में मुस्कराकर दिखाया।

तो ये चाल चली थी उस पुलिसिए ने।

मुकेश सैनी वहां से निकला ही था कि लोकल पुलिस पहुंच गई और घटनास्थल की बागदौड़ उन्होंने अपने हाथ ले ली। तिवारी ने अपने वादे पर खरा उतरकर दिखाया। उसने हाय-हैलो के बाद एसएचओ को एक तरफ लेजाकर कुछ गुफ्तगूं की, जिसके बाद प्रवीण शर्मा ने मुझसे चंद रूटीन के सवाल किए। फिर मुझे थाने पहुंचकर बयान दर्ज करवाने की हिदायत देकर वहां से जाने की आजादी दे दी। जाते वक्त मुझे चेतावनी दी गई कि अंकुर रोहिल्ला के कत्ल की बाबत मुझे अपनी जुबान बंद रखनी है, मेरी वजह से वो बात किसी भी सूरत में लीक नहीं होनी चाहिए।

उसकी वजह थी। अंकुर रोहिल्ला सेलिब्रिटी था, उसके कत्ल की बात आम होते ही हंगामा मच जाना था। लिहाजा ऐसे लोगों के साथ जब कोई वारदात हो जाती है तो पुलिस की हरचंद कोशिश यही होती है कि बात थाने से बाहर नहीं पहुंचने पाये। ये जुदा बात है कि पुलिस की ऐसी कोशिश आज तक मैंने कामयाब होते नहीं देखी थी। या तो मीडिया की सूंघ बहुत तीखी थी या पुलिस महकमें में उनके भेदिए इतने ज्यादा थे कि चंद घंटों में ही ऐसी वारदातों का लाइव टेलिकॉस्ट शुरू हो जाता था।

वहां से निकलने से पहले मैं महीप शाह से मिला और ये कहकर उसका मोबाइल नंबर ले लिया कि मैं बहुत जल्द उससे दोबारा मिलने वाला था। जवाब में वोे हां ना कुछ कहने की बजाय घूमकर सीढ़ियों की ओर बढ़ गया।

बाहर निकलकर हम नीलम की कार में सवार हो गये।

मैंने एक सिगरेट सुलगाकर गहरा कस लिया फिर घूरकर उसको देखा।

‘‘क्या हुआ?‘‘

‘‘क्यों.....?‘‘

‘‘क्या, क्यों?‘‘

‘‘जो बात अपनी तफ्तीश के जरिए उन्हें वैसे भी पता लग जाने वाली थी वो बताकर उनपर एहसान करने से तूने मुझे मना क्यों किया?‘‘

‘‘चौहान की खातिर! मैं नहीं चाहती थी सरकारी वकील तक फौरन ये बात पहुंचती कि मंदिरा के पेट में पल रहा बच्चा मकतूल का था। ये बात उन्हें पता लगते-लगते लगेगी। उससे पहले तो वे सिर्फ अटकलें लगा सकते हैं। जबकि मैं कील ठोककर ये बात अदालत में उठाऊंगी कि मकतूल मंदिरा के बच्चे का बाप था और कत्ल के आस-पास के वक्त में वह उसके फ्लैट पर मौजूद था।‘‘

‘‘क्या फायदा, वो जिंदा होता तो और बात थी, अब तो उसका भी कत्ल हो गया, ऐसा में भला कौन मानेगा कि अंकुर ने मंदिरा की हत्या की थी।‘‘

‘‘ना सही मगर यह बात पुलिस की तफ्तीश पर सवालिया निशान तो लगा ही देगी। साथ ही किसी तीसरे व्यक्ति के कातिल होने की तरफ भी मजबूत इशारा करेगी। लिहाजा चौहान से उनका ध्यान भटकना शुरू हो जायेगा। जबकि अगर ये बात अभी पुलिस को पता लग जाती तो उनका वकील इसका कोई तोड़ निकालने में जी-जान लगा देता और कामयाब होकर दिखाता।‘‘

‘‘चौहान!‘‘

‘‘कहां है।‘‘ उसने अपने दायें-बायें निगाह दौड़ाई।

‘‘मेरा मतलब है चौहान कहां होगा इस वक्त?‘‘

‘‘मुझे क्या पता, शायद अपने फ्लैट पर हो।‘‘

‘‘और मान ले अगर अंकुर रोहिल्ला के कत्ल के वक्त की कोई एलीबाई वो पेश नहीं कर सका तो?‘‘

‘‘क्या तो! यार तुम तो मुझे डराये दे रहे हो।‘‘

‘‘मेरी खुद की हालत भी तेरे से जुदा नहीं है।‘‘

कहकर मैंने मोबाइल निकाल कर चौहान का नंबर डॉयल किया। घंटी बदस्तूर जाती रही मगर उसने कॉल अटैंड नहीं की। मैंने फिर, फिर और फिर ट्राई किया मगर दूसरी ओर से कॉल अटैंड नहीं की गई।

‘‘क्या हुआ?‘‘

‘‘कॉल पिक नहीं कर रहा।‘‘

‘‘अब क्या करें?‘‘

‘‘उसके फ्लैट तक चलते हैं, अगर वो वहां हुआ तो ठीक, वरना भांड़ में जाय।‘‘

उसनेे सहमति में सिर हिलाया और कालकाजी की ओर ड्राईव करने लगी।

अब तक रात घिर आई थी। सड़क पर ट्रैफिक इतना अधिक था कि नरेश चौहान के फ्लैट तक पहुंचने में हमारा पूरा एक घंटा बर्बाद हो गया।

जैसी कि मुझे आशंका थी, उसके फ्लैट को ताला लगा हुआ मिला। पड़ोसी से पूछने पर पता चला कि सुनीता गायकवाड़ की हत्या वाले दिन के बाद से ही किसी ने उसे वहां आते-जाते नहीं देखा था। जो कि मेरे लिए हैरानी की बात थी। कम से कम कल तो वो अपने फ्लैट पर जरूर लौटा होगा।

‘‘कहीं फरार तो नहीं हो गया।‘‘ नीलम ने आशंका व्यक्त की।

‘‘उम्मीद तो नहीं है आखिर पुलिसवाला है, बेल जम्प करने का मतलब भला उससे अधिक कौन समझता होगा।‘‘

‘‘क्या पता उसका हमारे ऊपर से यकीन हिल गया हो और उसे लगने लगा हो कि उसका जेल जाना महज वक्त की बात है। ऐसे में घबड़ाकर बेल जंप कर जाना क्या बड़ी बात होगी।‘‘
 
‘‘हद करती है यार - मैं झुंझला उठा - उसके फोन ना अटैंड करने और फ्लैट पर ना होने की सैकड़ों वजहें हो सकती हैं। मत भूल कि वो एक पुलिसवाला है, हो सकता है इस वक्त वो खुद को मौजूदा दुश्वारी से निकालने के लिए कातिल की तलाश में कहीं भटकता फिर रहा हो। फिर अगली पेशी से पहले उसके पास वक्त ही वक्त है, अगर उसे बेल जंप करनी होगी तो आखिरी वक्त में करेगा ना कि अभी से भाग खड़ा होगा।‘‘

इससे पहले कि मैं और कुछ कहता, मुझे सुनीता गायकवाड़ के फ्लैट का दरवाजा खुलता दिखाई दिया। फिर दरवाजे से बाहर निकलते मनोज गायकवाड़ पर मेरी निगाह टिक सी गई। मेरे जहन में एक बार फिर अंकुर रोहिल्ला की बात गूंज उठी, जो उसने मंदिरा के सीक्रेट विजिटर के बारे में बयान की थी - खूब लंबा चौड़ा व्यक्ति था, क्लीन सेव्ड था और उसके आगे के बाल तांबे की रंगत लिए हुए थे - गायकवाड़ भी खूब लंबा-चौड़ा था, उसके आगे के बाल भी तांबे की रंगत के थे। मैंने नीलम की ओर देखा तो उसने हौले से सिर हिलाकर ये साबित कर दिया कि वो भी इस वक्त वही सोच रही थी।

‘‘क्या हुआ?‘‘ गायकवाड़ हमारे करीब पहुंचकर बोला।

‘‘हम यहां चौहान से मिलने आए थे मगर.....।‘‘

‘‘ओह!‘‘

‘‘आपको कोई खबर है उसकी।‘‘

‘‘अभी कुछ घंटों पहले ही पुलिस ने मुझे फ्लैट की चाबी सौंपी थी, लिहाजा अगर वो यहां आकर चला गया हो तो मुझे उसकी खबर नहीं। मेरे आने के बाद तो वह नहीं आया इसका मैं जामिन हूं। अलबत्ता कल शाम को वो होटल में मुझसे मिलने आया था।‘‘

‘‘कोई खास वजह थी ...।‘‘

‘‘जमानत के पचास हजार रूपये मुझे लौटाने आया था। तब मुश्किल से वो पांच मिनट वहां ठहरा था।‘‘

‘‘ओह!‘‘

‘‘कोई खास बात हो गयी?‘‘

‘‘नहीं ऐसा तो कुछ नहीं है, बस वकील साहिबा को उससे कुछ जरूरी बातें करने थीं। बहरहाल हम चलते हैं, हमारे पीठ पीछे अगर वो यहां लौटे तो उसे खबर कर दीजिएगा कि हमसे फौरन संपर्क करे।‘‘

जवाब में उसने मुंडी हिलाकर हामी भर दी।

हम दोनों एक बार फिर कार में सवार हो गये।

‘‘क्या कहते हो?‘‘ वो कार स्टार्ट करती हुई बोली।

‘‘अगर वो कत्ल के वक्त दुबई में नहीं होता तो बेशक मैं बतौर कातिल उसके नाम पर विचार कर रहा होता। मगर मौजूदा हालात में उसका कातिल होना असंभव बात है।‘‘

‘‘वैसे कत्ल का मोटिव तो बहुत तगड़ा है उसके पास, चौहान को फंसाने की बात भी समझ में आती है। बस मंदिरा की हत्या उसका किया-धरा नहीं हो सकता।‘‘

‘‘ठीक कहती है तू, इस केस में सबसे बड़ी समस्या यही है कि चौहान के अलावा अभी तक ऐसा कोई कैंडिडेट सामने नहीं आया जिसके पास मंदिरा और सुनीता दोनों के कत्ल की पर्याप्त वजह दिखाई देती हो। अंकुर रोहिल्ला के कत्ल को फिलहाल मैं इससे दूर रख रहा हूं क्योंकि हालात साफ जाहिर करते हैं कि उसका कत्ल सिर्फ इसलिए किया गया क्योंकि वो कातिल को पहचानता था।‘‘

‘‘फिर तो कातिल वो सीक्रेट विजिटर ही हुआ जिसे मकतूल ने मंदिरा के फ्लैट में दाखिल होते देखा था।‘‘

‘‘होे सकता है।‘‘

वो वार्तालाप वहीं समाप्त हो गया।

रास्ते में एक जगह रूककर हमने डिनर लिया, फिर वहां से रोहिल्ला के कत्ल की बाबत अपना बयान दर्ज करवाने हम थाने पहुंचे। वहां मेरा और नीलम का विस्तृत बयान लिया गया। उस काम से फारिग होते-होते हमें रात के ग्यारह बज गये। फिर नीलम मुझे मेरी कार के पास ड्रॉप करके वापिस लौट गयी।

छह जून 2017

कॉल बेल की निरंतर बजती घंटी ने मुझे सोते से जगाया। वॉल क्लॉक पर निगाह गई तो पाया कि छह बजने को थे। मन ही मन आगंतुक को गालियों से नवाजता मैं उठकर दरवाजे तक पहुंचा।

तमाम उम्मीदों से परे उस वक्त दरवाजे पर मुझे चौहान खड़ा दिखाई दिया। मैं हकबका कर उसकी शक्ल देखने लगा। क्या करता उसकी हालत ही कुछ ऐसी थी! बाल बिखरे हुए थे, आंखें सूजी हुई थीं। सिर पर रूमाल बंधा हुआ था, कपड़े मैले-कुचैले हो रहे थे। आधी शर्ट पैंट के अंदर थी तो आधी बाहर।

उसकी हालत देखते ही मेरा सारा गुस्सा हवा हो गया।

‘‘अब यूंही घूरते रहोगे या अंदर भी आने दोगे।‘‘

मैंने बिना कुछ कहे एक तरफ होकर उसे रास्ता दे दिया। बैठक में पहुंचकर वो एक सोफे पर पसर गया।

‘‘गोखले मैं जानता हूं तू यहां अकेले रहता है, लेकिन बड़ी मेहरबानी होगी अगर एक कप कॉफी या चाय पिला दे, प्लीज।‘‘

उसकी दीन-हीन आवाज सुनकर मैं बिना जवाब दिये किचन की ओर बढ़ गया। चाय का पानी स्टोव पर चढ़ाकर पहले मैंने अपनी दशा सुधारी फिर चाय बनाकर बैठक में आ गया।

‘‘क्या हुआ?‘‘ मैं सवाल करने से खुद को रोक नहीं पाया।

‘‘किसने कहा कि कुछ हुआ है?‘‘

‘‘इस वक्त का तुम्हारा हुलिया और थोबड़ा देखकर किसी और के कुछ कहने की जरूरत ही कहां रह जाती है। अब बताओ क्या हुआ था?‘‘

जवाब में उसने एक लम्बी सांस खींची फिर कप से चाय की चुस्की लेने के बाद बोला, ‘‘बहुत भयानक बात हो गयी गोखले।‘‘

‘‘वो तो तुम्हारे चेहरे पर ही लिखा है, मगर हुआ क्या?‘‘

‘‘कल मैं अंकुर रोहिल्ला के बंगले पर गया था।‘‘ उसने मानो बम सा फोड़ा। सुनकर मुझे कई मिनट लग गये उस शॉक जैसी स्थिति से उबरने में।

‘‘कब गये थे?‘‘

‘‘तुम्हारे वहां पहुंचने से करीब पांच मिनट पहले।‘‘

‘‘खबर क्योंकर लगी तुम्हे उसकी?‘‘

‘‘कल शाम को मैं खान साहब के बुलावे पर थाने गया हुआ था। उसी दौरान किसी महकमे के आदमी ने फोन पर उन्हें इत्तिला दी कि मंदिरा चावला किसी अंकुर रोहिल्ला की ब्याहता थी। सुनकर मेरे कान खड़े हो गये। मंदिरा के जरिए ना सिर्फ मैं अंकुर रोहिल्ला के नाम से वाकिफ था बल्कि एक बार मिल भी चुका था। मैं फौरन वहां से उठ खड़ा हुआ और नाक की सीध में अंकुर की कोठी पर जा पहुंचा। मेरे पास वक्त बहुत कम था, किसी भी वक्त खान साहब को पता लग सकता था कि वो अंकुर रोहिल्ला कौन था, जबकि मैं उनसे पहले अंकुर से कुछ सवाल-जवाब कर लेना चाहता था।‘‘

‘‘वो तैयार हो गया तुमसे मिलने को।‘‘

‘‘हां फौरन।‘‘

‘‘मगर हमारे सामने तो वो किसी नरेश चौहान का नाम सुना होने से भी इंकार कर रहा था।‘‘

‘‘उसकी वजह थी, दरअसल उस वक्त मैं उसके साथ पूछताछ कर रहा था, जब कोई फोन पर उसके गले पड़ने लगा। उसने कहा कि वो पांच मिनट में आगंतुक को दफा करके मुझसे बात करेगा। तब तक मैं ऊपर किसी कमरे में चला जाऊं। मैंने सहमति में सिर हिलाया और उसे हिदायत दे दी कि मेरे वहां आगमन के बारे में वो किसी को ना बताए। इसके बाद मैं पहली मंजिल के एक कमरे में जाकर बैठ गया।‘‘

‘‘कौन से कमरे में?‘‘

‘‘उसके बेडरूम से नेक्स्ट डोर।‘‘

‘‘फिर क्या हुआ?‘‘

‘‘आगंतुक जो कि अब मुझे पता है कि तुम और नीलम कंवर थी, के साथ उसका वार्तालाप बहुत लंबा खिंचता चला गया। फिर मैंने ऊपर को आती धम्म-धम्म कदमों की आवाज सुनी तो मुझे लगा अंकुर वापिस लौटा है। मगर दो मिनट बीत जाने के बाद भी जब वो उस कमरे में नहीं पहुंचा तो मैंने बाहर निकलने का फैसला कर लिया। यूं अभी मैं उठकर खड़ा ही हुआ था कि गोली चलने की आवाज पूरे बंगले में गूंज गई। मैं तेजी से बाहर निकला और सीढ़ियों की ओर लपका। इस कोशिश में जब मैं अंकुर के बेडरूम के आगे से गुजरा तो मुझे दरवाजा खुला हुआ महसूस हुआ, जिसे मैंने और खोलकर देखा तो वहां मुझे अंकुर की लाश दिखाई दी। मैं फौरन कमरे में दाखिल हो गया, पीछे एक बड़ी सी खिड़की थी जो उस घड़ी खुली पड़ी थी। मैं लपककर उसके पास पहुंचा और बाहर झांककर देखा, तो गली के मुहाने पर पहुंचते एक व्यक्ति की पीठ की झलक मुझे मिली। वो कातिल हो सकता था। मेरे पास इतना वक्त नहीं था कि मैं मेन गेट से बाहर निकलता और कोठी का घेरा काटकर वहां तक पहुंचता, लिहाजा मैं आनन-फानन में रेन वाटर पाईप के सहारे चार-पांच फीट नीचे खिसका फिर गली में कूद गया।‘‘

‘‘फिर क्या हुआ?‘‘

‘‘अब तक वो गली का मोड़ काटकर मेरी आंखों से ओझल हो चुका था! मैंने पांव जमीन से टकराते ही गली से बाहर की ओर दौड़ लगा दी। तीस सेकेंड से भी कम समय में मैं गली पार कर गया। मगर बाहर पहुंचने पर वो व्यक्ति मुझे दूर-दूर तक कहीं दिखाई नहीं दिया। फिर मैंने उसकी तलाश में आस-पास की गलियों में झांकना शुरू किया। फिर वैसी ही एक गली में मुझे एक व्यक्ति दीवार की ओर मुंह करके लघुशंका में व्यस्त दिखाई दिया! कहना मुहाल था कि ये वही व्यक्ति था मगर फिर भी मैं अपनी शंका का निवारण कर लेना चाहता था।‘‘

‘‘तब तक शाम घिर आई थी, फिर गली में तो और भी अंधेरा छाया हुआ था। मैं दबे कदमों से उसके ऐन पीछे पहुंच गया, उसके कानों पर जूं तक नहीं रेंगी, मगर यहीं मैं मात खा गया। उस वक्त मैं उसे अपने चंगुल में लेने की सोच ही रहा था कि अचानक उसका एक हाथ हवा में वृत सा बनाता घूमा जिसमें उसने कोई भारी चीज थाम रखी थी। वो भारी चीज सीधा मेरी कनपटी से टकराई, मेरी आंखों के सामने अनार से फूटने लगे फिर मेरी चेतना लुप्त हो गई।‘‘

‘‘उस दौरान तुमने उसकी शक्ल तो जरूर देखी होगी।‘‘

‘‘नहीं, वार करने के लिए वो मेरी ओर घूमा जरूर था मगर उसने अपना सिर बहुत ही असंभावित मुद्रा में नीचे को झुका रखा था, ऊपर से वहां अंधेरा ज्यादा था इसलिए मैं उसकी शक्ल नहीं देख पाया, सच पूछ तो उसके कद-काठ का अंदाजा लगा पाना भी मुश्किल है। अगर कोई अंदाजा था भी तो समझ ले तुरंत बाद लगी कनपटी की चोट की वजह से मैं भूल गया।‘‘

‘‘फिर क्या हुआ?‘‘

‘‘रात किसी वक्त मुझे होश आया, मैंने उठने की कोशिश की तो फिर गिर पड़ा। कनपटी से खून अभी भी रिस रहा था। मैंने उसपर कसकर रूमाल बांधा और थोड़ा आराम की चाह में दीवार की टेक लेकर बैठ गया। कुछ ही देर में या तो मुझे नींद आ गई या मैं फिर से बेहोश हो गया था। क्योंकि दोबारा जब मेरी आंख खुली तो सुबह हो चुकी थी। वहां से उठकर मैं गली के बाहर पहुंचा और एक ऑटो में बैठकर सीधा यहां पहुंच गया। शुक्र था कमीने ने बटुए को हाथ नहीं लगाया था।‘‘

कहकर उसने सिर से रूमाल खोलकर मुझे कनपटी की चोट दिखाई। मेरे मुंह से सिसकारी सी निकल गयी। बहुत गहरा और बड़ा घाव दिखाई दे रहा था उसकी कनपटी पर। उसके बावजूद वो सही सलामत जिंदा खड़ा था तो ये कम हैरानी की बात नहीं थी।

‘‘तुम्हारा मोबाइल कहां है?‘‘

‘‘पता नहीं, या तो कातिल उसे अपने साथ ले गया या फिर वो अंकुर के कमरे से खिड़की के रास्ते नीचे उतरते वक्त वहीं गिर गया होगा।‘‘

‘‘दूसरी बात की ही संभावना ज्यादा दिखाई देती है। अगर कातिल तुम्हारा मोबाइल ले जाता तो साथ में उसने बटुए पर भी हाथ साफ कर देना था। लिहाजा तुम्हारा मोबाइल खिड़की से उतरते वक्त ही गिरा होगा और अगर ऐसा हुआ है तो भगवान ही बचाएं अब तुम्हें। अब तक तो वो पुलिस के हाथ लग भी चुका होगा। ऊपर से रेन वाटर पाइप पर तुम्हारी उंगलियों के निशान! हे भगवान! पक्का मरोगे तुम। रही-सही कसर अंकुर के सिक्योरिटी गार्ड का बयान पूरा कर देगा कि कत्ल के आस-पास के वक्त में बंगले में आने वाला एक ऐसा मेहमान भी था जिसको उसने बंगले में दाखिल होते तो देखा था, मगर जो बंगले से बाहर नहीं निकला था।‘‘

‘‘यार तू तो मुझे डराये दे रहा है।‘‘

‘‘मत डरो क्योंकि अब डरने से तुम्हारा कोई अला-भला नहीं होने वाला।‘‘

‘‘ओ माई गॉड - उसने एक लंबी आह भरी - ‘‘ये किस जंजाल में फंस गया मैं।‘‘

मैंने कुछ कहने की बजाय सिगरेट का पैकेट निकालकर दो सिगरेट सुलगाये और एक उसे थमाकर कस लगाने लगा।

स्थिति अचानक ही विकट हो उठी थी। चौहान की बातें सुनने के बाद मुझे लगभग यकीन आ चुका था कि अब तक पुलिस को उसकी मौकायेवारदात पर उपस्थिति की खबर लग चुकी होगी। कोई बड़ी बात नहीं थी अगर पुलिस चौहान की तलाश में उसके फ्लैट का फेरा लगा भी चुकी हो। साथ ही उन तमाम संभावित स्थानों पर भी पुलिस का फेरा लगा हो सकता था जहां उसके होने की उम्मीद होती। उसका गायब होना उनकी निगाहों में अच्छी बात नहीं होती। इसका मतलब पुलिस ये लगा सकती थी कि अंकुर रोहिल्ला का कत्ल करने के बाद वो फरार हो गया था। लिहाजा पुलिस के कदम किसी भी वक्त मेरे फ्लैट तक पहुंच सकते थे। अगर अभी तक नहीं पहुंचे थे तो जरूर इसकी वजह ये थी कि उन्होंने इस बारे में चौहान के थाने वालों से सहायता लेने की कोशिश नहीं की थी। ऐसे में चौहान का यूं मेरे फ्लैट पर पाया जाना उसके साथ-साथ मेरी भी भारी फजीहत करा सकता था। लिहाजा ये बेहद जरूरी था कि मैं जल्द से जल्द उसे अपने फ्लैट से दफा कर दूं। कुछ इस तरह कि उसे बुरा भी ना लगता और मेरा काम भी हो जाता। मगर कैसे?

‘‘अब कुछ कहेगा भी या यूंही बुत की तरह बैठा रहेगा।‘‘

‘‘क्या कहूं - मैं सिगरेट का आखिरी कस लगाकर उसे एक्स्ट्रे में मसलता हुआ बोला - जो कुछ भी तुम खुद के साथ घटित हुआ बताते हो उसके मद्देनजर तो तुम्हें फौरन से पेश्तर पुलिस के सामने पेश हो जाना चाहिए, पुलिसिए हो इतना तो खुद भी समझ सकते हो।‘‘

‘‘पागल हुआ है, अपने थाने की बात होती तो शायद मैं ऐसा कर भी गुजरता मगर मामला दूसरे थाने का है। वे लोग फौरन मुझे हवालात में ठूंस देंगे। कोई मेरी बात पर यकीन नहीं करने वाला भैया। अब मेरी कोई गति है तो वो इस बात में है कि असली कातिल पकड़ा जाय!‘‘

‘‘मगर तुम जमानत पर रिहा हो...।‘‘

‘‘कोई फर्क नहीं पड़ता क्योंकि इस बार मुझे अंकुर रोहिल्ला के कत्ल के सिलसिले में नये सिरे से गिरफ्तार किया जायेगा। लिहाजा बेल फौरन कैंसिल हो जाएगी और आगे बेल मिलने की भी कोई संभावना बाकी नहीं बचेगी।‘‘

‘‘तुम तिवारी से बात क्यों नहीं करते, उसकी एसएचओ प्रवीण शर्मा से गहरी यारी लगती है। कल उसी के कहने पर उसने मुझे बड़ी आसानी से मौकायेवारदात से रूख्सत कर दिया था।‘‘

‘‘गोखले तू समझता नहीं है, यह मामला गंभीर है। मुझपर अब ट्रिपल मर्डर का चार्ज लगेगा, ऐसे में कोई मेरी मदद नहीं करने वाला।‘‘

‘‘फिर तो तुम्हारा मेरे फ्लैट पर बने रहना भी खतरनाक है। किसी भी वक्त तुम्हारे महकमे को ये ख्याल आ सकता है कि तुम मेरे यहां छिपे हो सकते हो! तुम्हें तो यहां से फौरन खिसक जाना चाहिए।‘‘
 
‘‘ठीक कहता है तू, मगर सवाल ये है कि यूं खिसक कर कहां जाऊं मैं। बेल जंप करने की हिम्मत मुझमें नहीं है, लेकिन ये बात भी अपनी जगह कायम है कि इस बार पुलिस शर्तिया मेरा रिमांड हासिल करने में कामयाब हो जायेगी। सरकारी वकील चीख-चीख कर कहेगा कि अगर पिछली बार ही मुझे पुलिस रिमांड पर भेज दिया गया होता तो आज अंकुर रोहिल्ला जिंदा होता, जज को उसकी बात से पूरा-पूरा इत्तेफाक होगा।‘‘

‘‘फिर क्या करोगे।‘‘

‘‘सोचूंगा मैं इस बाबत, अभी तो तेरी बात से ही इत्तेफाक जाहिर कर रहा हूं कि मेरा यहां बने रहना खतरनाक साबित हो सकता है।‘‘

वो उठ कर खड़ा हो गया।

‘‘अंकुर से क्या बातें हुई थीं तुम्हारी?‘‘ मैं जल्दी से बोला।

‘‘कुछ भी नहीं, अभी मैंने बातचीत शुरू ही की थी कि तुम्हारा फोन आ गया और फिर वो नीचे चला गया था।‘‘

‘‘आगे तुमसे संपर्क कैसे होगा।‘‘

‘‘मैं फोन करूंगा तुझे, एक मोबाइल और नये नंबर का इंतजाम भी करना पड़ेगा।‘‘

‘‘कैसे करोगे।‘‘

‘‘तू छोड़ उस बात को, वो मेरी प्राब्लम है, शाम तक मैं तुझे नया नंबर दे दूंगा। बस तूू अपना सारा ध्यान उस कमीने को ढूंढने में लगा दे, जिसकी वजह से मेरी ये दुर्गत हो रही है।‘‘

‘‘तुम मंदिरा को ब्लैकमेल कर रहे थे।‘‘

‘‘नहीं, चाहे तो कसम उठवा ले!‘‘

‘‘मगर कल कोर्ट में...।‘‘

‘‘उसकी वजह थी, ज्योंहि सरकारी वकील ने ब्लैकमेल वाली बात उठाई, मुझे मंदिरा का इकबालिया बयान याद हो आया जो कि मैंने उससे थोड़े फेर बदल के साथ लिखवाया था। तू ये समझ कि वो बयान मैंने महज उसपर ये रौब गालिब करने के लिए लिखवाया था कि उसे एहसास रहे कि मैं उसे कितनी बड़ी मुसीबत से बचा रहा था। सच पूछ तो उसके किसी जायज-नाजायज इस्तेमाल के बारे में मुझे कभी खयाल तक नहीं आया था। वो तो वैसे ही मेरी इतनी एहसानमंद हुई कि खुलकर अपनी नवाजिशें मुझपर लुटाने लगी थी।‘‘

‘‘लिहाजा तुम दोनों के बीच जिस्मानी ताल्लुकात थे।‘‘

‘‘हां थे, मगर यूं हमारी बस तीन मुलाकातें हुई थीं, बाकी तो बस फोन पर हल्लो हाऊ आर यू तक ही सीमित था।‘‘

‘‘ऐसी सभी मुलाकातें तुम्हारे फ्लैट पर ही हुई थीं या...।‘‘

‘‘नहीं वहां वो सिर्फ एक बार आई थी, दोबारा उसका फेरा कत्ल वाले रोज ही लगा था! मैं उसे सुनीता की निगाहों में आने देना अफोर्ड नहीं कर सकता था - कहकर वो तनिक रूका फिर बोला - और कुछ पूछना है तुझे?‘‘

‘‘एक आखिरी सवाल और!‘‘

‘‘वो भी पूछ!‘‘

‘‘कहीं ऐसा तो नहीं है कि मंदिरा ने जिस व्यक्ति को अपनी कार से ठोकर मारी थी वही.....।‘‘

‘‘गोखले तेरा दिमाग सठिया तो नहीं गया है। यूं भला लोग बाग कत्ल करने पर उतारू हो जाते हैं। ये क्या कोई मानने वाली बात है कि उसने मंदिरा का कत्ल सिर्फ इसलिए कर दिया क्योंकि उसकी कार से उसे ठोकर लग गई थी। और मुझे फंसाने का सामान इसलिए किया क्योंकि मैंने मंदिरा के खिलाफ कोई एक्शन नहीं लिया था। अगर थोड़ी देर के लिए तेरी बात मान भी ली जाय तो सुनीता और अंकुर रोहिल्ला के कत्ल की क्या वजह थी उसके पास।‘‘

वो ठीक कह रहा था। मगर मैं जाने क्यों उस बात को अपने जहन से निकाल नहीं पा रहा था।

‘‘चलता हूं।‘‘ कहकर वो मेरे किसी नये सवाल की प्रतीक्षा किये बिना तेजी से बाहर निकल गया।

उसके पीठ पीछे नित्यकर्मों से फारिग हो मैंने नाश्ता किया और अपना फ्लैट छोड़ दिया।

नीचे पहुंचकर मैं अपनी नई नकोर बलेनो में सवार हो गया। साहबान अभी कल की ही बात थी जब मैं दिल्ली की सड़कों पर अपनी मोटरसाइकिल से घूमा करता था। या जरूरत पड़ने पर नीलम से कार उधार मांग लेता था। कई बार कार लेने की बाबत विचार कर चुका था मगर उतना बड़ा खर्चा पालने की हिम्मत नहीं हो रही थी।

पिछले दिनों सीतापुर में जूही मानसिंह वाले केस में मैंने और शीला ने जो जानमारी की थी, यह कार उसी का प्रतिफल था। हालंाकि हम उससे बिना कोई फीस चार्ज किए वापिस दिल्ली लौट आये थे मगर वो लड़की हमारी जानमारी को भूली नहीं थी। करीब सप्ताह भर बाद मैंने अपने ऑफिस के पते पर उसका भेजा एक लिफाफा रिसीव किया जिसमें दस लाख का बैंक ड्रॉफ्ट इस रिक्वेस्ट के साथ भेजा गया था कि मैं उसे लौटाने की कोशिश हरगिज ना करूं। ये जुदा बात थी कि अगर उसने रिक्वेस्ट ना भी की होती तो मैंने उसका ड्रॉफ्ट हरगिज भी लौटाना नहीं था। लिहाजा मैंने कार खरीदी नहीं थी बल्कि वो मुझे गिफ्ट में हांसिल हुई थी।

कार पार्किंग से निकाल कर मैंने सड़क पर डाल दिया। अब मेरा इरादा पुलिस डिपार्टमेंट से अंकुर रोहिल्ला के मर्डर के बारे जानकारी हासिल करने का था। जिसके जरिए मुझे चौहान की मौजूदा स्थिति के बारे में पता लग सकता था। मगर वहां मुझे अपनी दाल गलती नजर नहीं आ रही थी। मैं उस बाबत तिवारी की हैल्प लेने की सोच सकता था मगर फिर भी मुझे अपना काम होता नजर नहीं आ रहा था। तब मुझे उस कागज का ख्याल आया जिसपर नरेश चौहान ने अपने खैरख्वाह लोगों के नाम और ओहदे लिखकर मुझै सौंपा था।

मैंने कार साइड में लगाकर उस लिस्ट पर एक नजर डाली। उसमें कम से कम एक नाम ऐसा था जिससे मैं चौहान के जरिए ही पहले भी मिल चुका था। वो नाम था एसीपी हरजीत सिंह का जो उन दिनों कहां बैठता था, मुझे नहीं पता था।

मैंने उसे फोन लगाया।

तीन बार बेल जाते ही दूसरी तरफ से कॉल अटैंड कर ली गयी।

‘‘नमस्कार जनाब।‘‘ मैं स्वर में मिश्री घोलता हुआ बोला।

‘‘नमस्कार!‘‘ - वो तनिक अनमने स्वर में बोला - ‘‘कौन।‘‘

‘‘विक्रांत गोखले! प्राइवेट डिटेक्टिव! पहचाना जनाब?‘‘

‘‘पहचान लिया भई, कैसे हो?‘‘

‘‘एकदम बढ़ियां।‘‘ मैंने चैन की सांस ली।

‘‘क्या चाहते हो?‘‘

‘‘जनाब चौहान ने बड़ी उम्मीद के साथ आपका नंबर...।‘‘

‘‘ठीक उम्मीद की है उसने! - वो मेरी बात काटकर बोला - क्या चाहते हो।‘‘

‘‘आपको उसके हालात की खबर तो होगी।‘‘

‘‘है आगे बोलो।‘‘

‘‘हौज खास थाने में कोई ऐसा व्यक्ति जो कल हुए एक सेलिब्रिटी के कत्ल की बाबत मुझे सबकुछ बता सके।‘‘

‘‘होल्ड करो।‘‘

मैं इंतजार करने लगा। इस दौरान कुछ ऐसी आवाजें सुनाई देती रहीं जिससे मुझे अंदाजा हो आया कि उस वक्त वो हौजखास थाने में ही किसी से बात कर रहा था।

‘‘सब इंस्पेक्टर राजबीर से मिलो वो तुम्हारा काम कर देगा।‘‘

‘‘शुक्रिया जनाब।‘‘

‘‘एक बात और!‘‘

‘‘जी बताइए।‘‘

‘‘चौहान के मामले में कैसी भी सहायता चाहिए हो, दिन या रात की परवाह किए बगैर मुझे फोन करना।‘‘ कहकर उसने कॉल डिस्कनैक्ट कर दी।

मैं हौजखास पहुंचा। सब-इंस्पेक्टर राजबीर बेहद मिलनसार साबित हुआ या फिर यह एसीपी की कॉल का जहूरा था! बात जो भी रही हो वो मुझसे बड़े ही प्रेम भाव से मिला।

‘‘कोई खातिर-वातिर करूं मैं तुम्हारी।‘‘ वो बोला।

‘‘अगर तुम्हारा इशारा किसी पुलिसिया खातिरदारी की तरफ न हो तो बस सिगरेट सुलगाने की इजाजत दे दो।‘‘

‘‘खाली सुलगाने से काम चल जायेगा तुम्हारा?‘‘

वो हंसता हुआ बोला, मैंने उसकी हंसी में पूरा-पूरा साथ दिया और जेब से सिगरेट का पैकेट निकालकर उसे ऑफर करने के बाद बारी-बारी से दोनों सिगरेट सुलगा दिया।

‘‘अब बोलो क्या चाहते हो।‘‘

‘‘अंकुर रोहिल्ला के कत्ल से संबंधित जो कुछ भी तुम बता सको।‘‘

‘‘जितना तुम अपने बयान में दर्ज करा चुके हो, उससे आगे की सुनो - कहकर उसने सिगरेट का एक गहरा कस लिया फिर आगे बोला - हमें शक है कि कातिल हमारे ही महकमें का एक आदमी है जो कि...।‘‘

‘‘नरेश चौहान!‘‘ - मैं बोला।

‘‘कैसे जानते हो भई! - वो हकबका कर बोला - ये बात तो अभी हमारे स्टॉफ तक को नहीं पता।‘‘

‘‘वो एक लंबी कहानी है जो तुम्हारा वक्त जाया करेगी, इसलिए उससे आगे बढ़ो प्लीज।‘‘

‘‘तुम्हारी मर्जी! हां तो मैं कह रहा था कि हमें शक है कि हीरो का कत्ल चौहान ने किया है। वो बाकायदा अंकुर की इजाजत से उसके बंगले में दाखिल हुआ था मगर सिक्योरिटी गार्ड ने उसे बंगले के बाहर जाते नहीं देखा। ना कत्ल से पहले ना ही कत्ल के बाद। मकतूल के बेडरूम की खिड़की खुली पड़ी थी। उस खिड़की के ऐन बगल से एक रैन वाटर पाइप गुजरता है। जिसपर से चौहान की उंगलियों के ताजा निशान बरामद हुए हैं। साथ ही गली में उसका मोबाइल फोन भी पड़ा हुआ मिला। इन बातों का सामूहिक निष्कर्ष ये निकलता है कि वो बंगले में मेन गेट से दाखिल हुआ मकतूल ने उसे अपने बेडरूम में रिसीव किया। क्यों किया ये अभी जांच का मुद्दा है। वो मकतूल से गुफ्तगूं कर ही रहा था कि उसी दौरान तुम लोग वहां पहुंच गये। मकतूल उठकर नीचे पहुंचा, उसने तुम्हें ड्राइंगरूम में रिसीव किया। फिर तुम दोनों से फारिग होकर वो जब ऊपर बेडरूम में पहुंचा तो वहां चौहान ने उसे गोली मार दी और खिड़की के रास्ते गली में पहुंचकर वहां से फरार हो गया।‘‘

‘‘जिस रेन वाटर पाइप पर उसकी उंगलियों के निशान मिलने की बात तुम बताकर हटे हो, उसपर क्या किसी और की उंगलियों के निशान नहीं मिले पुलिस को।‘‘

जवाब देने से पहले वो तनिक हिचकिचाया। फिर बोला, ‘‘भई बात बहुत अंदरूनी है इसलिए किसी के आगे मुंह मत फाड़ना, फाड़ना तो कम से कम मेरा नाम मत लेना।‘‘

‘‘नहीं लूंगा ऑनेस्ट।‘‘

‘‘किसी और की उंगलियों के निशान तो हमें नहीं मिले मगर पाईप की जांच-पड़ताल करने वाले हमारे एक्स्पर्ट का कहना है कि उसपर किसी मोटे कपड़े के रगड़ के ताजा निशान थे।‘‘

‘‘मोटा कपड़ा, लाइक दस्ताना।‘‘

वो एक बार फिर हकबकाया, ‘‘क्या कहना चाहते हो भई।‘‘

‘‘सिर्फ इतना कि कातिल दस्ताने पहने हुए था।‘‘

‘‘फिर उसकी उंगलियों के निशान क्यों पाये गये उस पाइप पर।‘‘

‘‘नहीं पाये गये, उंगलियों के निशान तो चौहान के पाये गये थे जो कि गोली की आवाज सुनकर दौड़कर मकतूल के बेडरूम में पहुंचा था। वह पुलिस वाला था, लिहाजा पीछे की खिड़की खुली देखकर उसे माजरा समझते देर नहीं लगी। वो लपककर खिड़की के पास पहुंचा, फिर जब उसने झांककर बाहर देखा तो उसे गली में भागे जा रहे कातिल की एक झलक मिली। तब उसके पास इतना वक्त नहीं था कि वो मेन गेट से निकलकर गली तक पहुंच पाता लिहाजा वो फौरन रेन वाटर पाईप पकड़ कर गली में उतर गया। इसी दौरान उसका मोबाइल उसकी जेब से निकलकर गली में गिर गया।‘‘

‘‘तुम कोई मर्डर मिस्ट्री लिखने वाले लेखक तो नहीं हो।‘‘

‘‘नहीं।‘‘

‘‘तो फिर लिखना शुरू कर दो बहुत जल्द पॉपुलर हो जाओगे।‘‘

मैं हंसा।

‘‘फिर अगर एक पल के लिए तुम्हारी बात मान भी ली जाय तो सवाल ये उठता है कि चौहान गायब क्यों है, क्यों वो हमें ढूंढे नहीं मिल रहा।‘‘

‘‘क्योंकि वो जानता है कि कोई उसकी बात का यकीन नहीं करेगा।‘‘

‘‘तुम उससे मिले हो।‘‘ वो संदिग्ध भाव से बोला।

‘‘नहीं।‘‘

‘‘अभी मुझे तुम्हारा हर जवाब मंजूर है, क्योंकि तुम्हें एसीपी साहब ने भेजा है। इस हिदायत के साथ कि तुम्हें हर वो जानकारी मुहैया कराई जाय जिसके कि तुम तलबगार हो, इसलिए इस वक्त तो तुम्हारे सौ खून भी मेरी तरफ से माफ हैं।‘‘

‘‘शुक्रिया, मगर सवाल उससे मिलने या ना मिलने का नहीं है। तुम जरा उसकी स्थिति पर गौर फरमाओ, पहले से ही उसपर डबल मर्डर का केस चल रहा है ऐसे में अगर वो चीख-चीखकर भी कहे कि उसका अंकुर रोहिल्ला के मर्डर से कोई लेना-देना नहीं है तो कौन उसकी बात का यकीन करेगा।‘‘

उसने सहमति में सिर हिलाया।

‘‘फिर उसके पास वजह क्या थी रोहिल्ला का कत्ल करने की।‘‘

‘‘वजह तो थी भाई और बहुत तगड़ी वजह थी।‘‘

‘‘क्या?‘‘

‘‘या तो अंकुर ने उसे मंदिरा चावला का कत्ल करते देख लिया था। या फिर कत्ल के आस-पास के वक्त में उसने चौहान को उसके फ्लैट के इर्द-गिर्द मंडराता देखा होगा। एक अलग वजह ये भी हो सकती है कि मंदिरा ने खुद उसे बताया हो कि चौहान उससे मिलने आने वाला था। क्योंकि उसके थाने वालों ने एक ऐसे व्यक्ति को ढूंढ निकाला है जिसका बयान है कि उसने मंदिरा के फ्लैट पर पुलिस के पहुंचने से करीब बीस मिनट पहले वहां एक कार खड़ी देखी थी, इत्तेफाकन उसे कार का नंबर याद रह गया। बाद में पता चला वो कार अंकुर रोहिल्ला की थी। इसके अलावा एक और बात है जो चौहान की नीयत की चुगली करती है और वो ये कि कल साकेती के एसएचओ को जब ये खबर मिली कि अंकुर रोहिल्ला मंदिरा चावला का पति था, तब चौहान वहीं बैठा हुआ था। मगर इस खबर को सुनकर वो वहां से बेहद आनन-फानन में वहां से निकल गया था।‘‘
 
‘‘अगर अंकुर को चौहान पर शक था या उसने चौहान को मंदिरा का कत्ल करते देख लिया था, तो उसने ये बात पुलिस को बताई क्यों नहीं?‘‘

‘‘क्योंकि उसकी ढोल में भी तो पोल था। वो जानता था कि जब वो इस जानकारी को पुलिस से शेयर करेगा तो पुलिस उसकी खुद की भी जांच-पड़ताल करने से बाज नहीं आएगी। ऐसे में मंदिरा से उसकी शादी की बात राज नहीं रह पाती, नतीजा ये होता कि एक करोड़पति की बेटी से ब्याह का उसका ख्वाब छिन्न-भिन्न हो जाना था। भला सा नाम है उसका...देखो याद नहीं आ रहा।‘‘

‘‘निशा कोठारी।‘‘

‘‘हां यही नाम है उसका, तुम तो यार बहुत कुछ जानते हो इस केस के बारे में। क्या चीज हो भाई तुम!‘‘

‘‘सिर्फ एक अदना सा प्राइवेट डिटेक्टिव हूं जो पुलिस के आगे किसी गिनती में नहीं आता।‘‘

‘‘ओह याद आया, तिवारी जी ने जिक्र तो किया था तुम्हारा, बस मेरे ही ध्यान से उतर गया था। ....और कुछ पूछना चाहते हो?‘‘

‘‘पोस्टमार्टम हो गया?‘‘

‘‘आज शाम तक हो जाएगा, मगर हमारे मैडिकल एक्स्पर्ट का कहना है कि उसमें कोई नई चौंकाने वाली बात सामने नहीं आने वाली। उसकी मौत सिर के पृष्ठ भाग में गोली लगने से हुई थी इस बात में कोई दो राय हो ही नहीं सकती।‘‘

‘‘गोली के बारे में कुछ पता चला।‘‘

‘‘हां हमारे बैलेस्टिक एक्स्पर्ट का कहना है कि उसे पच्चीस कैलीबर की रिवाल्वर से गोली मारी गयी थी।‘‘

‘‘वो तो बहुत क्लोज रेंज वाली गन होती है।‘‘

‘‘हां मगर कमरे में खड़े होकर किसी को गोली मारने के लिए बड़ी रेंज की गन की क्या जरूरत पड़ने वाली थी।‘‘

‘‘निशाने के बारे में क्या कहते हो, उसे ताककर सिर पर गोली मारी गई थी या इत्तेफाकन गोली खोपड़ी में जा घुसी थी।‘‘

‘‘इस बारे में कुछ कह पाना मुहाल है, हमारा अंदाजा ये कहता है कि जब कातिल ने उसपर रिवाल्वर तानी तो वो अपनी जान बचाने के लिए दरवाजे की ओर भागा! ठीक तभी कातिल ने गोली चला दी जो कि सीधा उसकी खोपड़ी में जा घुसी और उसकी तत्तकाल मृत्यु हो गयी। ऐसे में कातिल के निशाने के बारे में कोई अंदाजा लगा पाना मुश्किल काम है। ऊपर से कातिल और मकतूल के बीच फासला बहुत कम था ऐसे में कोई अनाड़ी भी उसकी खोपड़ी में गोली मार सकता था।‘‘

‘‘गोली के एंगल के बारे में बैलिक एस्पर्ट की क्या राय है?‘‘

‘‘वो कहता है कि तकरीबन एक सौ साठ डिग्री का कोण बनाती हुई गोली मकतूल की खोपड़ी में दाखिल हुई थी। लिहाजा उसे गोली मारने वाला छह फीट के आस-पास के कद का व्यक्ति रहा होगा और चौहान की हाइट भी तकरीबन इतनी ही बताई जाती है। कातिल की हाइट का अंदाजा इस बात पर निर्भर है कि मरने वाला छह फीट से उभरते कद का युवक था। लिहाजा उसकी खोपड़ी में गोली मारने के लिए कातिल को अपना हाथ कंधे से बहुत मामूली सा ऊपर को उठाना पड़ा होगा। आगे टैक्निकल टीम की पड़ताल भी यह कहती है कि जिस एंगल से गोली मकतूल की खोपड़ी में दाखिल हुई थी, उस हिसाब से हाथ को बहुत मामूली सा तिरछा किया गया था। जबकि अगर कोई कम हाइट वाला व्यक्ति गोली चलाता तो उसे मकतूल की खोपड़ी में गोली मारने के लिए हाथ को ज्यादा उठाना पड़ता। उस सूरत में गोली का एंगल चेंज हो जाता और वो एक सौ तीस-चालिस के एंगल से उसकी खोपड़ी में घुसी होती।‘‘

‘‘और मान लो अगर कातिल छह की जगह सात फीट का होता तो?‘‘

‘‘तो जहां तक मेरा खयाल है, गोली एकदम सीधी मकतूल की खोपड़ी में पेश्वस्त हुई होती और यूं जो गोली का एंगल बनता वो एक सौ अस्सी डिग्री का होता।‘‘

‘‘इसकी क्या गारंटी की कातिल ने पुलिस का ध्यान भटकाने के लिए थोड़ा झुककर या फिर किसी ऊंची चीज पर चढ़कर मकतूल को गोली नहीं मारी थी। उस स्थिति मेेें भी यह जानकारी भ्रामक साबित होनी थी।‘‘

‘‘कोई गारंटी नहीं मगर हालात का तबसरा ये कहता है कि ऐसा हुआ नहीं हो सकता। क्योंकि मकतूल उसके हाथ में पिस्तौल देखते ही दरवाजे की ओर भागा होगा। ऐसे में क्या ये मानने वाली बात है कि पहले कातिल ने तुम्हारे बताये ढंग से पोजीशन चेंज की फिर मकतूल को गोली मारी! मेरा जवाब है नहीं। उसके पास इतना समय ही नहीं था, तब तक तो मकतूल दरवाजे से बाहर निकलकर दरवाजा बंद कर लेता। गोली तो उसे छह फिटे चौहान ने ही मारी है भाई, तुम चाहे कितना भी जोर लगा लो इस हकीकत को नहीं बदल सकते।‘‘

‘‘जैसे वो अकेला है इस दुनिया छह फीट का।‘‘

‘‘ना सही मगर जब पहले से उसकी इंवाल्वमेंट दिखाई दे रही है केस में, तो उसे नजरअंदाज कैसे किया जा सकता है। देखो कितनी बातें उसके खिलाफ जाती हैं - वो घटनास्थल पर मौजूद था, रैन वाटर पाइप पर उसकी उंगलियों के निशान मौजूद पाये गये, पीछे की गली में उसका मोबाइल पड़ा हुआ पाया गया। वो बंगले में मेन गेट से दाखिल हुआ था मगर निकासी के लिए उसने खिड़की का रास्ता चुना था। उसपर पहले से दोहरी हत्या का चार्ज लगा हुआ है और सबसे बड़ी बात ये कि वो फरार है। अब कोई चमत्कार ही हो जाय तो अलग बात है वरना चौहान तो गया काम से।‘‘

‘‘लिहाजा उसका पुलिसवाला होना उसके किसी काम नहीं आने वाला।‘‘

‘‘ऐसा ही समझ लो! अब मरने वाला कोई गरीब-गुरबा, मोरी का कीड़ा तो था नहीं, जिसकी मौत पर पुलिस पर्दादारी करके चौहान को बचाने की कोशिश करे। फिर जब उसका ऐसा कोई लिहाज उसके थाने वालों ने नहीं किया तो हम क्यों करने लगे।‘‘

‘‘ये बात भी ठीक है - मैं बड़े ही विचारपूर्ण ढंग से बोला - बहरहाल वक्त देने के लिए तुम्हारा बहुत-बहुत शुक्रिया।‘‘

मैं उठ खड़ा हुआ और उससे हाथ मिलाकर बाहर निकल आया।

मेरे जहन में अचानक ही एक बार फिर से वो कार दुर्घटना कौंध गई जिसमें मंदिरा ने एक व्यक्ति को अपनी कार से टक्कर मार दी थी। क्या उस बात में कोई भेद हो सकता था! कैसे हो सकता था, खान ने साफ-साफ तो बताया थी वो व्यक्ति बहुत मामूली रूप से घायल हुआ था जिसे बाद में मलहम पट्टी कराकर छुट्टी दे दी गई थी। फिर क्योंकर मैं उस बात को अपने जहन से निकाल नहीं पा रहा था। आखिरकार मैंने उस व्यक्ति से मिलने का फैसला किया और कार में सवार होकर खान को फोन लगाया।

‘‘कहां भटक रहा है अपना जासूस!‘‘ खान का विनोदपूर्ण स्वर सुनाई दिया।

‘‘एक ही तो काम है जनाब आजकल मेरे पास, उसी सिलसिले में धक्के खा रहा हूं।‘‘

‘‘बेकार की कोशिश में लगे हो, कुछ हांसिल नहीं होने वाला।‘‘

‘‘देखेंगे जनाब।‘‘

‘‘फोन कैसे किया?‘‘

‘‘एक छोटी सी इल्तिजा थी अगर कबूल हो जाती तो!‘‘

‘‘क्या चाहते हो?‘‘

‘‘मंदिरा ने अपनी कार से जिस सख्स को टक्कर मारी थी उसका नाम पता तो पुलिस के रिकार्ड में होगा।‘‘

‘‘होल्ड करो!‘‘

फिर लाइन पर खामोशी छा गई, कुछ मिनट यूंही गुजरे फिर खान का स्वर सुनाई दिया, ‘‘एक सौ बीस देवली मोड़, नाम है भानुचंद अग्रवाल! उसके बेटे का मोबाइल नंबर नोट करो!‘‘ कहकर उसने एक नंबर मुझे नोट करवा दिया।

‘‘शुक्रिया जनाब!‘‘ मैंने कहा, मगर मेरा शुक्रिया सुने बिना वो कॉल डिस्कनैक्ट कर चुका था।

एक सौ बीस देवली मोड़ एक चार मंजिला इमारत का पता निकला जिसके निचले पोर्शन में कई दुकानें बनी हुई थीं। उन्हीं में से एक दुकानदार से जब मैंने भानुचंद अग्रवाल का पता पूछा तो उसने साइड में बने एक दरवाजे की ओर इशारा कर दिया। दरवाजे के पीछे ऊपर को जाती सीढ़ियां थीं। मैं पहली मंजिल पर पहुंचा, वहां एक ही दरवाजा था जिसके बाहर लगी घंटी का स्विच मैंने पुश कर दिया और इंतजार करने लगा।

करीब दो मिनट बाद दरवाजा खुला! खुले दरवाजे पर एक उम्रदराज महिला प्रगट हुई।

‘‘किससे मिलना है?‘‘ वो ऊपर से नीचे तक मेरा मुआयना करती हुई बोली।

‘‘जी भानुचंद जी से मिलना है।‘‘ जवाब में उसने बड़ी अजीब निगाहों से मेरी तरफ देखा फिर भीतर की ओर मुंह करके तनिक उच्च स्वर में बोली, ‘‘रजनीश देख तो जरा, कोई पापा को पूछ रहा है।‘‘

कहकर वो भीतर चली गई।

उसके पीठ फेरते ही दरवाजे पर एक कसरती बदन का युवक प्रगट हुआ, ‘‘जी कहिए।‘‘

‘‘मुझे भानुचंद जी से मिलना था, अगर वो घर पर...।‘‘

‘‘पापा का इंतकाल हो चुका है।‘‘ वो मेरी बात काटकर बोला।

मैं हकबका सा गया, ‘‘कब! कब हुआ ये?‘‘

‘‘जनवरी में! - वो बोला - तुम उनसे क्यों मिलना चाहते थे और तुम हो कौन?‘‘

जवाब मेें मैंने उसे अपना परिचय दिया, फिर मतलब की बात पर आता हुआ बोला, ‘‘उनकी मौत में कहीं उस हादसे का तो कोई हाथ नहीं था जो दिसम्बर में उनके साथ घटित हुआ था।‘‘

जवाब में उसने घूर कर मुझे देखा फिर मुझे विचलित होता ना पाकर बोला, ‘‘भीतर आ जाओ।‘‘

उसने मुझे ड्राइंगरूम में ले जाकर बैठाया फिर बोला, ‘‘क्या जानते हो तुम उस एक्सीडेंट के बारे में।‘‘

‘‘सबकुछ जानता हूं, मगर पहले तुम मेरे सवाल का जवाब दो, क्या उनकी मौत में उस एक्सीडेंट का कोई दखल था।‘‘

‘‘कैसे हो सकता है, एक्सीडेंट दिसंबर में हुआ था और उनकी मौत जनवरी में हुई थी! ऊपर से एक्सीडेंट के बाद डाक्टर्स ने उनकी मलहम-पट्टी करके छुट्टी दे दी थी। किसी अंदरूनी चोट की बात तक सामने नहीं आई थी। अब तुम बताओ क्या जानते हो उस बारे में।‘‘

‘‘जिस कार से उनका एक्सीडेंट हुआ था उसे एक मॉडल चला रही थी। जिसका कहना था कि उसने भानुचंद जी को बचाने की कोशिश में अपनी कार डिवाइडर पर चढ़ा दी थी मगर फिर भी उन्हें कार की चपेट में आने से नहीं बचा सकी थी।‘‘

‘‘अगर उसकी गलती नहीं थी तो वो भाग क्यों खड़ी हुई, उसने घायल को अस्पताल पहुंचाने जैसी इंसानियत क्यों नहीं दिखाई।‘‘

‘‘क्योंकि वो अचानक पेश आये उस हादसे से डर गई थी, ऐसा अमूनन कर बैठते हैं लोग-बाग। तुम ये मत समझो मेरे भाई की मैं उसकी कोई हिमायत कर रहा हूं, मगर सच्चाई यही है कि अक्सर लोग-बाग ऐसे हादसों के घटित होने के बाद वहां से फरार हो जाने में ही अपना कल्याण समझते हैं।‘‘

‘‘है कौन वो, तुम नाम लो उसका! - वो बिफरता हुआ बोला - कमीनी का गला ना घोंट दूं तो कहना।‘‘

‘‘कोई फायदा नहीं, अब तुम उसका कुछ नहीं बिगाड़ सकते।‘‘

‘‘तुम नाम तो लो उसका फिर देखना...।‘‘

‘‘मंदिरा चावला, कुछ याद आया!‘‘

‘‘पता बोलो उसका, मैं आज ही मिलता...! - कहता-कहता वो एकदम से खामोश हो गया - ये वही मंदिरा तो नहीं है जिसका पिछले दिनों कत्ल हो गया था।‘‘

‘‘ठीक समझे।‘‘

‘‘लिहाजा अपने किये की सजा उसे खुद बा खुद मिल गयी।‘‘

‘‘खुद तो नहीं मिली अलबत्ता किसी ने दे दी!‘‘

‘‘किसने?‘‘

‘‘जांच का विषय है, पुलिस लगी पड़ी है कातिल को ढूंढने में।‘‘

‘‘मिल जाय तो मुझे बताना, प्लीज!‘‘

‘‘तुम क्या करोगे।‘‘

‘‘उसे बचाने के लिए बड़े से बड़ा वकील करूंगा।‘‘

मैं हंसा।

‘‘मैं सच कह रहा हूं, तुम मुझे इंफॉर्म करके तो देखना।‘‘

‘‘मैं पूरी करूंगा तुम्हारी मुराद, पहले उसे गिरफ्तार तो हो लेने दो, बहरहाल वक्त देने का शुक्रिया।‘‘ मैं उठकर खड़ा हो गया।

वो दरवाजे तक मुझे छोड़न आया।

‘‘एक बात अभी तक मेरी समझे में नहीं आई कि तुम यहां क्या करने आये थे। मुझे उस मॉडल के कत्ल की जानकारी देने तो आये नहीं होगे।‘‘

‘‘सोचना! समझ जाओगे।‘‘ कहकर मैंने अपना एक विजटिंग कार्ड उसे थमाया और सीढ़ियां उतरने लगा। उस दौरान एक ही सवाल मेरे जहन में दस्तक दे रहा था, क्या वो सख्श कातिल हो सकता था?

जवाब में चौहान की कही बात याद हो आई कि वो मंदिरा का कातिल हो सकता था, चौहान को उसने फंसाया हो सकता था मगर सुनीता गायकवाड़ और अंकुर रोहिल्ला का कत्ल भला वो क्यों करेगा?‘‘

फिर मैंने खुद ही जवाब दे डाला, अगर वो कातिल था तो सुनीता और अंकुर दोनों की हत्या उसने इसलिए की थी क्योंकि सुनीता ने उसे चौहान के फ्लैट में घुसते देख लिया था और अंकुर उसे मंदिरा के सीक्रेट विजिटर के तौर पर पहचानता था। अंकुर रोहिल्ला फेमश चेहरा था, लड़के ने उसे एक नजर देखकर ही पहचान लिया होगा कि वो कौन था। फिर बाद में उसकी रिहायश के बारे में जान लेना क्या बड़ी बात थी। वो तो गूगल पर सर्च मारते ही सामने आ जाना था।
 
संभावनाओं की कोई कमी नहीं थी। होने को तो ये भी हो सकता है कि सीक्रेट विजिटर के वहां से दफा होते ही रोहिल्ला फिर से उसके फ्लैट में दाखिल हुआ हो जहां उसका सामना मंदिरा की लाश से हुआ हो। या फिर उसने खुद ही उसे लाश बनाने का सामान किया हो। ऐसे में बात घूम फिर कर फिर वहीं पहुंच जाती थी कि अगर ऐसा था तो फिर अंकुर रोहिल्ला का कत्ल किसने किया। फिर सौ बातों की एक बात ये थी कि उस रोज मैं भी तो मंदिरा का सीक्रेट विजिटर ही था जिसे उसने पांच से छह बजे के बीच अपने फ्लैट पर इनवाइट किया था, क्योंकि वो कोई जरूरी बात मुझसे डिसकस करना चाहती थी।

अंकुर रोहिल्ला अगर यूं कत्ल ना कर दिया जाता तो शायद आगे वो इस बारे में कुछ बक के देता। मुझे ना सही पुलिस को तो बताता ही! लिहाजा मगजमारी के लिए बहुत सारी बातें थीं, मगर उनमें से कोई ऐसी बात नहीं थी जो मेरे भटकाव को सही रास्ता दिखा पाती।

पीछे जो मैं रजनीश अग्रवाल से इतनी कथा करके आया था वो यूं ही नहीं कर आया था। अगर वो इनोसेंट था तो बात ही खत्म थी, इसके विपरीत अगर इस ट्रिपल मर्डर में उसका हाथ था तो कोई ना कोई हिल-डुल तो होनी ही थी, हमेशा होती है।

अब मुझे उसकी निगाहबीनी का कोई इंतजाम करना था। वो काम मैं खुद भी कर सकता था, लेकिन मुसीबत ये थी कि वो एक नजर मुझपर पड़ते ही समझ जाता कि मैं किस फिराक में था! जो कि मैं हरगिज भी नहीं चाहता था। मुझे किसी दूसरे सख्स को उस काम पर लगाना बेहद जरूरी लगने लगा था। यूं किसी के आने तक उस काम को खुद अंजाम देना मेरी मजबूरी थी। मैंने अपनी कार तनिक आगे लेजाकर एक कचरा घर के आगे खड़ी की और वापिस लौटा।

रजनीश के घर के ऐन सामने सड़क की दूसरी तरफ एक छोटा सा रेस्टोरेंट था जिसमें मैं जा बैठा। रेस्टोरेंट का सामने का भाग दरवाजे सहित शीशे का था लिहाजा वहां बैठकर बड़ी आसानी से किसी आये गये पर निगाह रखी जा सकती थी।

मैंने सैंडविच के साथ एक कोल्ड्रिंक का आर्डर दिया और मोबाइल निकालकर शीला को फोन लगाया।

‘‘हाय हैंडसम!‘‘ एक बेल जाते ही मुझे उसका चहकता हुआ स्वर सुनाई दिया।

‘‘हाय सैक्सी!‘‘ मैं उसी के से स्वर में बोला।

‘‘क्या कर रहे हो?‘‘

‘‘सांस लेने के अलावा एक ही तो अहम काम होता है मेरे पास!‘‘

‘‘ऐसा भी भला क्या काम हो सकता है।‘‘

‘‘तुझे याद करना! ये क्या कम अहम काम है।‘‘

‘‘ओह माई गॉड! लेकिन मेरी कोई आंख-वांख तो फड़की ही नहीं।‘‘

‘‘जरूर तेरी आंखों में ही कोई नुक्श होगा। वरना मैंने तो तुझे पूरे मोबाइल से याद किया था।‘‘

‘‘वो क्या बला होता है?‘‘

‘‘भई जैसे लोग पूरे दिल से याद करते हैं वैसे ही मैंने तुझे पूरे मोबाइल से याद किया है। हाईटेक जमाना है कुछ तो नयापन होना ही चाहिए नहीं!‘‘

‘‘सो तो है, अब अगर मुझपर लाइन मारने के अहम काम को तुम अंजाम दे चुके हो तो मतलब की बात पर आ जाओ।‘‘

‘‘और अभी तक मैं क्या कर रहा था?‘‘

‘‘मुझे ये बताने की कोशिश कर रहे थे कि तुम कितने बड़े छिनले हो!‘‘

‘‘तेरा मतलब मैं कितना बड़ा डिटेक्टिव हूं?‘‘

‘‘नहीं मेरा वही मतलब था कि तुम कितने बड़े छिनले हो।‘‘

‘‘जरूर अंग्रेजी में इसी को हैंडसम कहते होंगे नहीं!‘‘

‘‘बिल्कुल नहीं, जैसे किसी कैरेक्टरलेस औरत को छिनाल कहते हैं वैसे ही कैरेक्टरलेस मर्द को छिनला कहते हैं।‘‘

‘‘पहले कभी सुना तो नहीं ये शब्द!‘‘

‘‘सुनोगे कैसे एकदम न्यू बॉर्न है, अभी-अभी तो मैंने इसका इजाद किया है।‘‘

‘‘तो मैं कैरेक्टरलेस हूं।‘‘

‘‘हो तो सही मगर तुम्हारी समझ में आता कहां है।‘‘

‘‘पहले नहीं बता सकती थी।‘‘

‘‘उससे क्या होता?‘‘

‘‘अरे जैसे मैं अपने क्लाइंट को बताता हूं कि मैं कितना बड़ा तीसमार खां हूं, वैसे ही उन्हें ये भी बताता कि मैं कितना बड़ा छिनला हूं। क्या पता सुनकर क्लाइंट कोई रौब खा जाता और यूं रौब गालिब होने पर वो मेरी मुंहमांगी फीस भर जाता।‘‘

‘‘आगे से ध्यान रखना, क्या पता यूं कोई क्लाइंट तुम्हारा जिक्र घर में अपनी बीवी से कर बैठे जिसे तुम्हारा जिगोलो वाला रूप ज्यादा पसंद आ जाय।‘‘

‘‘जिगोलो से तेरा मतलब गबरू-जवान से है?‘‘

‘‘नहीं जिगोलो का मतलब होता है पुरूष वेश्या, ऐन कॉलगर्ल का उलट समझ लो, अंतर सिर्फ इतना होता है कि जिगोलो को औरतें हायर करती हैं, ऐश करती हैं और उनकी फीस भरती हैं।‘‘

‘‘तू मजाक कर रही है।‘‘

‘‘नहीं अलबत्ता तुम जरूर जान बूझकर अंजान बनने की कोशिश कर रहे हो, भला ये मानने वाली बात है कि तुम्हें जिगोलो के बारे में नहीं पता।‘‘

‘‘सच में नहीं पता, क्या जानती है तू इस बारे में।‘‘

‘‘कभी शाम घिरने पर इंडियागेट चले जाओ या किसी पॉश इलाके में स्थित बाजारों में चले जाओ, वहां जो भी हैंडसम सा, सजा-धजा युवक तुम्हें अपना कसरती बदन चमकाता हुआ बेवजह खड़ा दिखाई दे समझो वो जिगोलो हो सकता है। कभी ना कभी पड़ी तो होगी ही ऐसे लड़कों पर तुम्हारी निगाह!‘‘

‘‘सैकड़ों बार पड़ी है, मगर ऐसे युवकों को देखकर मैं आज तक यही समझता आया हूं कि वे सब के सब अपनी गर्लफ्रैंड के इंतजार में खड़े होते हैं।‘‘

‘‘कुछ उस लिए भी खड़े हो सकते हैं मगर सब नहीं, तुम अगर घंटा भर भी ऐसे लड़कों पर निगाह रखो तो पाओगे कि वे किसी ना किसी आंटी टाइप औरत के साथ उसकी कार में बैठकर वहां से चलते बनेंगे। उन्हें देखकर ही तुम समझ जाओगे कि वे ब्वायफ्रैंड-गर्लफ्रैंड या मियां-बीवी नहीं हो सकते।‘‘

‘‘जरूर तूने हायर किया होगा कभी किसी जिगोलो को।‘‘

‘‘एक मैगजीन में पढ़कर जाना! और तुम इत्मिनान रखो जिस दिन मेरा किसी जिगोलो को हायर करने का मन हुआ, उस दिन सबसे पहला मौका मैं तुम्हे दूंगी।‘‘

‘‘सच कह रही है।‘‘

ठीक तभी मुझे रजनीश अग्रवाल अपने घर से बाहर निकलता दिखाई दिया, शीला ने मेरी बात के जवाब में क्या कहा मैंने उसपर कान नहीं धरा और बिल पे करके रेस्टोरेंट से बाहर निकल आया।

रजनीश मुझे पैदल ही महरौली बदरपुर रोड की ओर जाता दिखाई दिया। मेरी कार विपरीत दिशा में खड़ी थी, वैसे भी उस घड़ी कार में बैठकर उसका पीछा कर पाना संभव नहीं था। मैं पैदल ही एक निश्चित दूरी बनाकर उसके पीछे-पीछे चल पड़ा। यूं अगर वो एक बार भी पलटकर देख लेता तो मुझपर उसकी निगाह पड़ जानी थी। मुझे इस वक्त खुद पर बहुत गुस्सा आ रहा था, क्यों एक अहमतरीन काम को अंजाम देने की सोचने के बाद मैं गप्पे लड़ाने बैठ गया।

मैंने शीला को फोन वहां बुलाने के लिए किया था। कोई बड़ी बात नहीं थी अगर वो अब तक वहां पहुंच भी चुकी होती। वो अभी भी लाइन पर थी, मैंने उसे होल्ड करा रखा था। आगे एमबी रोड पर पहुंचकर रजनीश अग्रवाल का जो रूख बनता उसके अनुसार मैं उसे कहीं पहुंचने को कह सकता था।

एमबी रोड पर पहुंचकर उसने किसी वाहन में सवार होने की कोशिश नहीं की बल्कि पैदल ही खानपुर की तरफ आगे बढ़ने लगा। मैं बदस्तूर उसके पीछे लगा रहा।

यूं करीब चार सौ मीटर आगे बढ़ने के बाद वो सड़क किनारे बने एक रेस्टोरेंट में दाखिल हो गया। मैंने बोर्ड से रेस्टोरेंट का नाम पढ़ा लिखा था, ‘मिष्ठान रेस्टोरेंट‘

उसके पीछे रेस्टोरेंट में कदम रखने से कहीं अच्छा था कि मैं उसके बाहर निकलने का वेट करता। मगर अब एक नई संभावना मेरे जहन में सिर उठा रही थी - क्या पता वहां कोई उससे मिलने आने वाला हो, या वो मुलाकाती पहले से ही रेस्टोरेंट के भीतर बैठा हुआ हो। अब शीला को वहां बुलाना निहायत जरूरी लगने लगा। मैंने उसे लोकेशन समझाई और फौरन वहां पहुंचने को कह दिया। फिर खुद सड़क के किनारे एक पनवाड़ी की दुकान की ओट में खड़े होकर एक सिगरेट सुलगाया और रेस्टोरेंट में हर आने-जाने वाले पर निगाह रखने लगा।
 
करीब पंद्रह मिनट में एक्टिवा पर सवार होकर शीला वहां पहुंच गयी। उसने दिल्ली शहर की हजारों युवतियों की तरह दुपट्टे से यूं अपना चेहरा ढका हुआ था, कि मुझे बस उसकी आंखें ही दिखाई दे रही थीं। वहां पहुंचकर उसने चेहरे को दुपट्टे की कैद से आजाद करना चाहा तो जाने किस भावना के वशीभूत होकर मैंने उसे ऐसा करने से रोक दिया। फिर उसे रजनीश अग्रवाल का हुलिया समझाकर भीतर भेज दिया। और खुद उसकी स्कूटी पर सवार होकर रेस्टोरेंट से तनिक परे होकर खड़ा हो गया।

दो मिनट बाद उसकी कॉल आई।

‘‘मिला वो!‘‘

‘‘हां झट पहचान गई, पहले ही बता दिया होता कि रेस्टोरेंट में जो सबसे हैंडसम युवक होगा वही रजनीश अग्रवाल होगा।‘‘

‘‘कमीनी पराये मर्द की तारीफ करेगी तो दोजख में भी जगह नहीं मिलेगी।‘‘

‘‘ना मिले मैं तो बस उसके दिल में जगह पाना चाहती हूं।‘‘

‘‘बकवास बंद कर, और ध्यान से मेरी बात सुन, अब तूने लगातार उसपर निगाह रखनी है।‘‘

‘‘निगाह क्या है बॉस, मैं तो अपना बाकी सबकुछ भी उसपर रख दूंगी, तुम देखना बाहर निकलते ही कहेगा मजा आ गया शीलू डार्लिंग!‘‘

‘‘शीलू! डार्लिंग!‘‘

‘‘प्यार में अक्सर लोग ऐसे ही तो बुलाते हैं।‘‘

‘‘हो भी गया।‘‘

‘‘हां शायद इसी को फर्स्ट साइट लव कहते हैं।‘‘

‘‘बकवास बंद कर और अब मेरी बात ध्यान से सुन! अगर रेस्टोरेंट में उससे कोई मिलने आता है तो उसपर निगाह रखना और बाहर निकलते ही मुझे इशारे से समझा देना। आगे तूने रजनीश अग्रवाल का साये की तरह पीछा करना है। उसका घर यहीं देवली में है। अगर रेस्टोरेंट से निकलकर वो उधर का रूख करता है तो तेरा काम खत्म, तब तेरी एक्टिवा मेरे हवाले और मैं दूसरे जमूरे के पीछे लग लूंगा। कार रजनीश के घर से सौ मीटर आगे एक कूड़ेदान के पास खड़ी है तुझे आसानी से दिखाई दे जाएगी और उसकी दूसरी चाबी तो तेरे पास है ही। लिहाजा उसके घर जाने की सूरत में तुझे वापिस लौट जाना है, समझ गयी।‘‘

‘‘वो तो मैं समझ गई लेकिन!‘‘

‘‘अभी भी लेकिन!‘‘

‘‘तुम सुनो तो, उसका मुलाकाती यहां पहुंचा हुआ है।‘‘

‘‘और ये बात तू अब मुझे बता रही है।‘‘

‘‘तुम मुझे बोलने कहां देते हो।‘‘

‘‘मैं तुझे नहीं बोलने देता! और इतनी जो कथा कर के हटी है वो क्या था।‘‘

‘‘देखो तुम फिर शुरू हो गये।‘‘

‘‘ठीक है ठीक है, अब बक क्या कहना चाहती है।‘‘

‘‘मुलाकाती तुम्हें पहचानता हो सकता है।‘‘

‘‘खामखाह!‘‘

‘‘सॉरी मेरा मतलब है वो तुम्हें पहचानता है।‘‘

‘‘है कौन तू जानती है उसे।‘‘

‘‘हां।‘‘

‘‘हे भवगान! - मेरे मुंह से ना चाहते हुए भी आह निकल गयी - क्यों किस्तों में बयान कर रही है, साफ-साफ क्यों नहीं बताती कि कौन है।‘‘

‘‘तुम बोलने कहां देते हो बार-बार तो टोक देते हो बीच में।‘‘

‘‘शीला की बच्ची मैं तेरा गला घोंट दूंगा।‘‘

‘‘ऊषा!‘‘

‘‘क्या ऊषा?‘‘

‘‘ऊषा की बच्ची!‘‘

‘‘क्या?‘‘ मैं तनिक अचकचा सा गया।

‘‘करेक्शन कर रही हूं, मेरी मां का नाम ऊषा था, ऊषा वर्मा, लिहाजा शीला की बच्ची नहीं ऊषा की बच्ची कहो। मैं अभी अनमैरिड हूं ये बात तुम्हें कितनी बार बतानी पड़ेगी। खामखाह रज्जी ने सुन लिया तो भाव देना बंद कर देगा, ये सोचकर कि मेरी कोई बच्ची भी है।‘‘

‘‘अब ये रज्जी कौन है?‘‘

‘‘रजनीश! बताया तो था कि प्यार में अक्सर लोगे नामों के साथ हेर-फेर कर देते हैं।‘‘

मेरा दिल हुआ अपने बाल नोंचने शुरू कर दूं। मगर यूं सरे राह ऐसा करना अपना तमाशा बनाने जैसा था, इसलिए मैंने कदरन ज्यादा बहादुरी वाला काम किया और कॉल डिस्कनैक्ट कर दी।

फौरन बाद मोबाइल बाइब्रेट होने लगा। फोन उसी का ही था।

‘‘रजनीश अग्रवाल का मुलाकाती मनोज गायकवाड़ है!‘‘

सुनकर मैं जैसे उछल ही पड़ा, ‘‘क्या बकती है, तूने ठीक से पहचाना तो है उसे।‘‘

‘‘ठीक से पहचानना क्या होता है मैं नहीं जानती, मगर है वो मनोज गायकवाड़ ही, दोनों सिर जोड़े गुफ्तगूं में मशरूफ हैं।‘‘

‘‘क्या मतलब हुआ इसका, मनोज गायकवाड़ की रजनीश अग्रवाल से जुगलबंदी भला क्योंकर मुमकिन हो सकती है। बतौर उसके मुंबई से वो सीधा दिल्ली आया और इसके बाद दुबई चला गया था। जहां से वो अभी कुछ दिनों पहले ही लौटा है, ऐसे में अग्रवाल से भला उसका क्या याराना हो सकता है।‘‘

‘‘जरूर दोनों गे होंगे।‘‘

जवाब में मैंने एक बार फिर कॉल डिस्कनैक्ट कर दी। वरना वो अभी आगे जाने क्या वाही-तबाही बकने लग जाती। अब लगभग मुझे यकीन आ गया कि दोनों में से किसी का भी पीछा करने से कुछ हासिल नहीं होने वाला था। निश्चय ही दोनों वहां से अपने-अपने घर लौट जाने वाले थे।

पांच मिनट बाद फिर शीला की कॉल आई, ‘‘दोनों बाहर आ रहे हैं, क्या करना है?‘‘

‘‘लाइन पर रह कॉल डिस्कनैक्ट मत करना।‘‘ कहकर मैंने ब्लूटूथ इयरफोन निकालकर कानों पर चढ़ाया, मोबाइल जेब के हवाले किया और एक दुकान की ओट में होकर रेस्टोरेंट पर निगाह टिका दी।

दोनों एक साथ दरवाजे से बाहर निकले फिर रजनीश उससे हाथ मिलाकर पैदल ही देवली की ओर लौटने लगा, जिधर की मैं खड़ा था। मैं समझ गया कि उसका अगला पड़ाव उसका घर ही होना था।

‘‘स्कूटर के पास पहुंच!‘‘ मैंने शीला से कहा।

दस सेकेंड में वो रेस्टोरेंट से बाहर निकली, गायकवाड़ अभी भी वहीं खड़ा था। मगर उसपर दृष्टिपात किये बगैर वो सीधा अपनी एक्टिवा को तलाशती मेरी ओर बढ़ी। इस दौरान गायकवाड़ अपने मोबाइल से खेलता रहा। हकीकतन वो अपने लिए कैब बुक कर रहा था जिसका पता मुझे तब चला जब एक ओला की कैब जो कि स्विफ्ट डिजायर थी, वहां आन खड़ी हुई।

‘‘स्कूटर तू चला मैं पीछे बैठूंगा, यूं अगर गायकवाड़ ने पीछे मुड़कर देखा भी तो मुझपर शायद ही उसकी निगाह पड़े।‘‘

‘‘ठीक है, पर खबरदार जो तुमने मुझसे चिपककर बैठने की कोशिश की!‘‘

‘‘नहीं चिपकूंगा, तू जल्दी कर वरना वो निगाहों से ओझल हो जायेगा।‘‘

‘‘जरूर उसका ड्राइवर तुम्हारे डर से कार को हवा में उड़ा ले जायेगा, नहीं!‘‘

‘‘अब चलेगी भी!‘‘

‘‘अभी लो बस एक बात और क्लीयर कर दो।‘‘

‘‘वो भी बोल!‘‘ मैं कलपता हुआ बोला, टैक्सी अब तक काफी आगे जा चुकी थी।

‘‘तुम बिना हैल्मेट के हो, चलान कटेगा तो कौन भरेगा।‘‘

‘‘मैं भरूंगा, मगर भगवान के लिए अभी कोई ऐसी नौबत मत आने देना प्लीज! वरना वो हमारे हाथ से निकल जायेगा।‘‘

जवाब में उसने यूं झटके से स्कूटर आगे बढ़ाया कि मैं पीछे गिरता-गिरता बचा। ये उसकी ड्राइविंग का ही कमाल था जो हैवी ट्रैफिक में भी मुश्किल से दो मिनट में वो गायकवाड़ की कैब के पीछे पहुंच गयी।

आगे खानपुर के सिग्नल से यू-टर्न लेकर टैक्सी वापिस बदरपुर की दिशा में दौड़ने लगी। शीला बदस्तूर टैक्सी के पीछे लगी रही। मैं शीला के पीछे कुछ यूं बैठा हुआ था, कि अगर गायकवाड़ पीछे घूमकर देख भी लेता तो उसे मेरी सूरत हरगिज नहीं दिखाई देती।

एमबी रोड पर दौड़ती टैक्सी ने ओखला मोड़ से लैफ्ट टर्न लिया और इएसआई हॉस्पीटल क्रॉस कर के राइट टर्न लेकर तेहखंड गांव में दाखिल हुई और प्रायमरी स्कूल के सामने जाकर खड़ी हो गयी।

गायकवाड़ टैक्सी से नीचे उतर कर एक गली में दाखिल हुआ और थोड़ा आगे जाते ही दाएं मुड़कर हमारी निगाहों से ओझल हो गया। मैंने शीला को टकोहा तो उसने तत्काल स्कूटर को गली के मुहाने पर ले जाकर खड़ा कर दिया जहां से वो हमारी निगाहों से ओझल हो गया था। वो हमें एक चार मंजिला इमारत में घुसता दिखाई दिया। आगे उसका मुकाम कहां था ये जानने का कोई तरीका मैं सोच ही रहा था, कि तभी गायकवाड़ ने खुद हमारी मुश्किल आसान कर दी। वो दूसरी मंजिल पर एक दरवाजे के सामने खड़ा दिखाई दिया। हमारे देखते ही देखते दरवाजा खुला, यूं खुले दरवाजे पर एक मरियल सा नौजवान प्रगट हुआ। गायकवाड़ ने कुछ क्षण उससे बातचीत की फिर नौजवान ने उसे कमरे के भीतर बुला लिया और दरवाजा बंद हो गया।

हम इंतजार करने लगे।
 
पांच मिनट बाद दोबारा दरवाजा खुला और वो बाहर निकला। फिर कुछ क्षणों बाद वो इमारत से बाहर निकला तो हम एक दुकान की ओट में हो गये। इस बार जब गायकवाड़ हमारे सामने से गुजरा तो मुझे उसके चेहरे पर गहन उत्कंठा के भाव दिखाई दिये। एक दूसरी जो अहम बात मैंने नोट की वो ये थी कि उसके कोट का एक हिस्सा नीचे को खिंचा हुआ था और उधर की जेब फूली हुई थी, जिसमें यकीनन कोई वजनी चीज थी। वो चीज कुछ भी हो सकती थी मगर मेरा मन कह रहा था उस घड़ी गायकवाड़ की कोट के जेब में कोई हथियार मौजूद था। जो उसने अभी-अभी हासिल किया था। क्योंकि रेस्टोरेंट के बाहर जब मैंने उसे देखा था तो उसकी जेब फूली और खिंची हुई नहीं थी।

यानि गायकवाड़ को हथियार उस युवक ने मुहैया कराया था जिससे कि वो अभी-अभी मिलकर आ रहा था। मगर ये बात मेरी समझ से परे थी कि उसे अचानक हथियार की क्या जरूरत पड़ गई थी। क्या अचानक ही उसे अपनी जान की फिक्र हो आई थी। या ऐसा उसने कातिल से बदला लेने के लिए एडवांस में इंतजाम किया था। उस रोज ऑफिस में उसकी बातों से लगा तो मुझे कुछ ऐसा ही था जैसे वो अपनी बीवी की हत्या का बदला खुद लेने पर उतारू था। मगर लाख रूपये का सवाल ये था कि उसे कैसे मालूम था कि उसकी हथियार की जरूरत कहां से पूरी हो सकती थी। क्या हथियार मुहैया कराने में रजनीश अग्रवाल का कोई हाथ था!

क्या माजरा था?

बहरहाल स्कूल के पास पहुंचकर वो इंतजार करती कैब में दोबारा सवार हो गया। हम एक बार फिर उसके पीछे लग गये। इस बार वो टैक्सी में सवार हुआ तो सीधा अपने फ्लैट वाली इमारत के सामने पहुंचकर ही नीचे उतरा।

लिहाजा हमें उसका पीछा छोड़ना पड़ा। वहां से हम देवली मोड़ पहुंचे जहां कार मैंने शीला के हवाले करने की कोशिश की तो उसने मना कर दिया और स्कूटर लेकर ऑफिस के लिए रवाना हो गयी।

उसके पीछे-पीछे मैं भी साकेत पहुंचा। अपने ऑफिस वाली इमारत के नीचे पहुंचकर मैं अपनी कार पार्क करने ही लगा था कि मेरा मोबाइल बज उठा।

मैंने कॉल अटैंड की।

तमाम आशाओं के विपरीत फोन रंजना चावला का निकला।

‘‘विक्रांत मुझे मंदिरा का मोबाइल मिल गया है!‘‘ वो बेहद उत्तेजित लहजे में बोली।

‘‘कहां था?‘‘ मैं हैरान होता हुआ बोला।

‘‘स्टडी में उसकी चेयर का निचला हिस्सा कुछ यूं फटा हुआ है कि वहां एक पॉकेट सा बन गया है, उसी में रखा हुआ था। आज मैं यूंही बेमकसद उस चेयर पर जा बैठी और उसकी दराजें खोल-खोलकर उसमें रखी चीजों का मुआयना कर रही थी जब इत्तेफाकन मेरा हाथ चेयर के नीचे चला गया वहां मुझे कुछ फूला हुआ महसूस हुआ। मैंने चेयर से नीचे उतर कर देखा तो पाया कि वहां फटे हुए हिस्से में मोबाइल रखा हुआ था जो कि उस घड़ी ऑफ था। मैंने उसे ऑन करने की कोशिश की तो नहीं हुआ। मगर जब मैंने मोबाइल को चार्जर पर लगाया तो वो ऑन हो गया। अब तुम बताओ मुझे मोबाइल पुलिस को सौंपना चाहिए या नहीं?‘‘

‘‘फौरन से पेश्तर तुम्हें ये काम करना चाहिए था, बल्कि सबसे पहले पुलिस को ही फोन करना चाहिए था! मगर अब जबकि तुमने मुझे फोन कर ही दिया है तो थोड़ा इंतजार करो। मैं अभी वहां पहुंचता हुआ इसके बाद जो करना जरूरी होगा करेंगे।‘‘

‘‘ओके आ जाओ।‘‘ कहकर उसने कॉल डिस्कनैक्ट कर दिया।

साहबान! हर बात पर शक करने की इतनी बुरी लत लग चुकी है, कि अब मुझे इस बात पर शक होने लगा कि क्यों उसने मोबाइल को लेकर इतनी कथा करी थी! वो भी सफाई देने वाले अंदाज में, मानों मोबाइल बरामद कर उसने कोई बड़ा गुनाह कर दिया हो। वो सीधा-सीधा कह सकती थी कि उसे मंदिरा का मोबाइल मिल गया था।

कहीं ऐसा तो नहीं मोबाइल पहले ही उसके हाथ लग गया हो और वो बता आज रही हो। जो मोबाईल पुलिस को वहां की भरपूर तलाशी लेने के बाद भी नहीं मिला था, वो यूं आसानी उसके हाथ लग गया भला ये कोई मानने वाली बात थी।

मैंने एक बार फिर अपनी कार सड़क पर डाल दी।

मंदिरा के फ्लैट तक पहुंचने में मुझे चार बज गये! रंजना को मैंने बेसब्री से अपना इंतजार करते पाया। उसके चेहरे पर गहन उत्कंठा के भाव थे और होशेहवास उड़े हुए जान पड़ते थे। जो महज मोबाइल की बरामदगी के कारण हुआ नहीं हो सकता था।

‘‘क्या हुआ? - मैं हड़बड़ाता हुआ बोला - तुम इतनी डरी हुई क्यों हो?‘‘

‘‘विक्रांत! - कहकर वो एकदम से मुझसे लिपट गई - थैंक्स गॉड तुम आ गये, मुझे तो बहुत डर लग रहा है।‘‘

‘‘क्या हुआ?‘‘ मैं उसकी पीठ टटोलता हुआ बोला, जी हां टटोलता हुआ ना कि सहलाता हुआ जो कि सांत्वना देने के लिए जरूरी होता है। मगर उसपर कोई नोटिस लेने की बजाय वो और कसकर मुझसे लिपट गयी। किस फिराक में थी वो? किस बात से डर रही थी! मैंने उसे अपने सामने से खिसका कर बगल में दबोचा और दरवाजा लुढ़काता हुआ ड्राइंग रूम में पहुंचा। वहां मैं बेहतर ढंग से उसका डर दूर कर सकता था।

मैं उसे बगल में दबाये हुए ही एक सोफे पर पसर गया। उसने मुझसे अलग होने की कोशिश नहीं की बल्कि बदस्तूर मुझसे लिपटी रही और मैं तसल्ली देने वाले अंदाज में उसके अरमानों को हवा देने की कोशिश करता रहा। कुछ क्षण तो उसकी तरफ से भी पॉजीटिव रिस्पांस मिला, फिर जैसे अचानक ही उसका डर दूर हो गया। वो छिटक कर मुझसे अलग हो गई! मैं जन्नत की शैर करने के सपने देखता जैसे दोजख में जा गिरा।

‘‘विक्रांत मुझे लगता है मैं कातिल को पहचान गई हूं।‘‘

‘‘अच्छा कौन है कातिल?‘‘

‘‘मेरा मतलब है मैं उसकी आवाज दोबारा सुनूं तो पहचान जाऊंगी।‘‘

‘‘पहले उसकी आवाज सुनी है तुमने?‘‘

‘‘हां! मंदिरा के फोन में उसकी आवाज रिकार्ड है, वो चौहान के बारे में उससे बातें कर रहा था। किसी बात को लेकर वो मंदिरा को समझाने की कोशिश कर रहा था कि चौहान उससे बुरी तरह पेश आ सकता है इसलिए उसे चौहान से सावधान रहना चाहिए। फिर कुछ अजीबो गरीब आवाजें आनी शुरू हो गईं। इसके बाद सन्नाटा छा गया। फिर थोड़ा फारवर्ड करने पर कुछ लोगों के बातें करने की आवाजें रिकार्ड हैं, जिनके बारे में मेरा अंदाजा है कि वो मंदिरा के कत्ल के बाद यहां पहुंचे पुलिसवालों की आवाजें हैं। आगे भी वैसी ही रिकार्डिंग हैं।‘‘

‘‘तुमने किसी को - मेरे अलावा किसी को - मोबाइल की बरामदगी के बारे में बताया था।‘‘

‘‘हां, कुछ लोगों को फोन करके मैंने ये अंदाजा लगाने की कोशिश की थी कि उनमें से किसकी आवाज कातिल की आवाज से मैच करती है।‘‘

‘‘यूं कितने लोगों को फोन कर चुकी हो तुम!‘‘

‘‘कुल जमा चार लोग जिनमें मनोज गायकवाड़, महीप शाह, मुकेश सैनी और ....!‘‘

‘‘तुम महीप शाह और मुकेश सैनी को कैसे जानती हो?‘‘

‘‘मैं नहीं जानती, मगर मंदिरा के मोबाइल की काल डिटेल्स बताती है कि उसने कत्ल वाले रोज इन दोनों को फोन किया था। लिहाजा मैंने ट्राई करने में कोई हर्ज नहीं समझा।‘‘

‘‘कोई नतीजा निकला?‘‘

‘‘कहना मुहाल है, वो आवाज उनमें से किसी की हो भी सकती है और नहीं भी हो सकती। सच पूछो तो मुझे उन चारों की ही आवाज कातिल की आवाज से मिलती-जुलती महसूस हुई थी।‘‘

‘‘क्या कहने तुम्हारे ऑब्जरवेशन के, कमाल का अंदाजा लगाया है तुमने!‘‘

बावजूद मेरे तंज कसने के वो हंस पड़ी।

‘‘तुमने उनमें से किसी को बता तो नहीं दिया कि तुम किस फिराक में थी।‘‘

‘‘बताया था, सबको बता दिया था।‘‘

‘‘लिहाजा जान देने को मरी जा रही हो, नहीं?‘‘

उसने जवाब नहीं दिया।

‘‘मोबाइल कहां है?‘‘

‘‘स्टडी में चार्ज हो रहा है, रूको मैं लेकर आती हूं।‘‘ कहकर वो जाने को उठ खड़ी हुई।

मैंने उसका हाथ पकड़ लिया, ‘‘तुम डरी हुई क्यों हो?‘‘

‘‘अब नहीं हूं पहले ये सोचकर दम निकला जा रहा थी कि कहीं कातिल उन चारों में से कोई एक हुआ तो यकीनन वो मेरी जान के पीछे पड़ जायेगा।‘‘

‘‘बस यही बात थी!‘‘

‘‘हां!‘‘

मैंने उसका हाथ छोड़ दिया।

वो स्टडी की ओर बढ़ी तो अचानक मुझे खयाल आया कि उसने चौथे सख्स का नाम तो बताया ही नहीं।

‘‘चौथा फोन तुमने किसको किया था?‘‘ मैं तनिक उच्च स्वर में बोला।

‘‘अभी बताती हूं।‘‘ कहती हुई वो स्टडी में घुस गई।

उसकी बातों पर मुझे रत्ती भर भी यकीन नहीं हुआ था। मुझे लगा डरने की तो वो बस नौटंकी कर रही थी, असल बात यकीनन कुछ और थी, जो कि उसको कांफीडेंस में लेकर उगलवाना जरूरी था। उसके लिए वक्त दरकरार था। ... और जैसा की आप देख ही रहे हैं - कम से कम वक्त का मेरा पास आजकल कोई तोड़ा नहीं था, क्योंकि आगे बढ़ने के तमाम रास्ते बंद थे।

मैं उसका इंतजार करने लगा।

और फिर वही हो गया, जिसके होने की कम से कम उस घड़ी मुझे कतई कोई उम्मीद नहीं थी।
 
‘‘धांय!‘‘ की जानी-पहचानी आवाज गूंजी। मैं सोफे से उछलकर स्टडी की ओर लपका। स्टडी का दरवाजा आधा खुला हुआ था। मगर भीतर घुसना खतरनाक साबित हो सकता था। अगर वो गोली रंजना पर चलाई गई थी तो कातिल यकीनन अभी भी भीतर था। ऐसे में एक और गोली आपके खादिम पर दाग देना उसके लिए क्या बड़ी बात होती। ठीक तभी दूसरी गोली चलने की आवाज गूंज उठी। मेरी लाइसेंसी रिवाल्वर इस वक्त मेरी कार में पड़ी थी लिहाजा मेरे किसी काम की नहीं थी। मैंने अगल-बगल निगाह दौड़ाई, पास में ही लोहे के स्टैंड पर पीतल का एक भारी फूलदान रखा था। मैंने उसमें से फूल निकालकर बाहर फेंका और फूलदान को हाथ में तौलता हुआ दीवार से चिपक कर खड़ा हो गया।

स्टडी से बाहर निकलने का और कोई रास्ता नहीं था, ये बात मैं अपने पहले फेरे सी ही जानता था। लिहाजा दरवाजे से बाहर आना उसकी मजबूरी थी! जहां मैं उसके स्वागत के लिए तैयार खड़ा था।

दो मिनट यूंही गुजर गये, इस दौरान भीतर से किसी हलचल का आभास मुझे नहीं मिला। तभी मेरे दिमाग में भीतर मेज के पीछे की खिड़की का अक्स उभरा। उसपर ग्रिल लगी थी उसमें से भीतर दाखिल होना या बाहर निकलना दोनों असंभव काम थे। मगर गोली तो भीतर दाखिल हुए बिना भी चलाई जा सकती थी। ये ख्याल दिमाग में आते ही मेरा इस बात से यकीन हिलने लगा कि कातिल अभी भी भीतर था।

मैंने हिम्मत करके सावधानी पूर्वक स्टडी का दरवाजा पूरा खोल दिया। मेज के पीछे की खिड़की का टूटा हुआ कांच अपनी कहानी आप बयान कर रहा था। फिर भी मैं पूरी सावधानी बरतता हुआ स्टडी में दाखिल हुआ। बुक सेल्फ के पास फर्श पर पीठ के बल रंजना की लाश पड़ी थी। सिर के नीचे का फर्श खून से रंगा हुआ था। गोली निश्चय ही उसके सिर के पृष्ठ भाग में मारी गयी थी। पहली बार शायद कातिल का निशाना चूक गया था, क्योंकि एक गोली मुझे सामने की दीवार में घुसी हुई दूर से ही दिखाई दे रही थी। मगर जल्दी ही मुझे अपना ख्याल बदलना पड़ा। कातिल का निशाना नहीं चूका था, उसने पहली गोली में ही रंजना को ढेर कर दिया था। दूसरी गोली उसने यकीनन वहां स्टूल पर रखे मोबाइल पर चलाई थी जिसके टुकड़े करती हुई गोली सामने दीवार में जा घुसी थी, मोबाइल के अवशेष और हवा में स्विच बोर्ड के साथ झूलता चार्जर अपनी कहानी खुद बयान कर रहे थे।

मैंने झुककर मंदिरा की नब्ज टटोली! जैसा की दूर से ही दिखाई दे रहा था। वो मर चुकी थी। बड़ी मुश्किल से मैंने लाश को पलटकर - गोली कहां मारी गई थी - देखने की हसरत को अपने सीने में दफ्न किया और दरवाजा लुढ़काकर पहले स्टडी से फिर फ्लैट से बाहर निकल आया।

एक लंबा घेरा काटकर मैं स्टडी की खिड़की के नीचे पहुंचा! वहां का बारीक मुआयना करने पर मुझे लगभग यकीन आ गया कि कातिल कोई छह फुटा व्यक्ति ही था, क्योंकि खिड़की का निचला हिस्सा फर्श के लेबल से ढाई फीट ऊंचाई पर था। जबकि कमरे के फर्श का लेबल गली के लेबल से तकरीबन ढाई फीट ऊंचा था। यानि कुल जमा पांच फीट की ऊंचाई से भीतर झांकते हुए निशाना लगाना था, लिहाजा कातिल किसी भी हाल में पौने छह या छह फीट से कम नहीं हो सकता था। दूसरी अहम बात ये थी कि कातिल का निशाना परफैक्ट था, वरना वहां से स्टूल पर रखे मोबाइल को निशाना बनाना आसान काम नहीं था।

किसी अनाड़ी ने गोली चलाई होती तो कोई बड़ी बात नहीं थी कि गोली स्टूल से टकराती और मोबाइल फर्श पर जा गिरता। वापिस लौटते वक्त वक्त मेरी निगाह गली के मुहाने के पास कच्ची मिट्टी पर बने पहियों के निशान पर गई जो कि वहां मिट्टी गीली होने की वजह से बहुत गहरे जान पड़ते थे। वो निशान किसी दोपहिया वाहन के पहियों से बने थे।

लिहाजा कातिल वहां तक मोटरसाइकिल से आया हो सकता था। गली के मुहाने पर सड़क के दूसरी ओर मुझे एक ‘सिक्स टेन‘ स्टोर दिखाई दिया, जहां सीसीटीवी कैमरा होना आम बात थी। मुझे यकीन था वहां से कातिल के बारे में कोई ना कोई क्लू हासिल होकर रहना था।

मैं फ्लैट के सामने वापिस लौटा।

अभी मैं भीतर दाखिल होने ही लगा था कि मुझे वहां हलचल का आभास हुआ, मुझे लगा भीतर कोई है, कौन?

इस बार मैं खुद को पछताने का कोई मौका नहीं देना चाहता था। लिहाजा लपककर अपनी कार तक गया और रिवाल्वर निकालकर पतलून की बैल्ट में खोंसने के बाद वापिस लौटा। अब मैं किसी भी अवांछनीय स्थिति से दो-चार होने को तैयार था।

पूरी सावधानी बरतता हुआ मैं भीतर दाखिल हुआ, उस दौरान मेरी रिवाल्वर बेल्ट से निकलकर मेरे हाथ में आ चुकी थी। ड्राइंगरूम क्लीयर था। मुझे लगा वहां जो भी था इस वक्त स्टडी में था। मैं स्टडी के अधखुले दरवाजे की ओर रिवाल्वर ताने आगे बढ़ा! तभी स्टडी का दरवाजा खुला और वो बाहर निकलता दिखाई दिया।

‘‘खबरदार, हिले तो गोली चला दूंगा।‘‘

‘‘पागल हो गया है गोखले।‘‘

आवाज के साथ-साथ मुझे चौहान की सूरत दिखाई दी। मैंने एक लंबी सांस ली फिर रिवाल्वर वापिस बैल्ट में खोंस ली और हैरान निगाहों से उसे देखने लगा।

‘‘क्या हुआ?‘‘

‘‘तुम बताओ! जेल जाने के लिए एकदम मरे जा रहे हो नहीं।‘‘

‘‘बकवास मत कर यार! अब मुझे क्या सपना आना था कि इसका कत्ल हो जाने वाला है, जो मैं यहां आने से परहेज बरतता। मैं तो बस इससे कुछ जनरल बातें करना चाहता था। ये सोचकर कि क्या पता पहले कुछ बताना भूल गई हो! फिर तू बार-बार ये क्यों भूल जाता है कि मेरी जान शूली पर चढ़ी हुई है, कैसे मैं चैन से बैठा रह सकता हूं।‘‘

वो बोले जा रहा था जबकि मुझे उसका कहा एक शब्द भी उस वक्त समझ में नहीं आ रहा था। मेरे जहन में तो बस दो ही बातें गूंज रही थीं - कद छह फीट, निशाना परफैक्ट! सच पूछिए साहबान! तो इस वक्त चौहान से मेरा विश्वास पूरी तरह हिला जा रहा था। उसकी बेगुनाही का पूरी तरह यकीन तो मुझे पहले भी नहीं था, मगर आज तो जैसे बचा-खुचा भी खत्म होने के कागार पर था। इस वक्त उसकी वहां मौजूदगी अपने आप में शक उपजाऊ बात थी। अगर कत्ल उसने किया था तो कत्ल के बाद उसकी यहां मौजूदगी का सिर्फ एक ही मतलब निकलता था - वह अंदाजा लगाना चाहता था कि कहीं उसकी तमाम सावधानियों के बावजूद मुझे उसपर कोई शक तो नहीं हो गया था, या रंजना ने कोई ऐसी बात तो मुझे नहीं बता दी थी जिससे उसपर बतौर कातिल कोई उंगली उठती हो। ऊपर से उसने अपनी शर्ट पैंट से बाहर निकाल रखी थी। ऐसा लापरवाह तो वह कभी नहीं था, लिहाजा उसकी पतलून में कोई हथियार - अलायकत्ल, जिससे कि उसने रंजना को गोली मारी थी - मौजूद हो सकता था।

क्या मुझे उस बाबत चौहान से प्रश्न करना चाहिए? मेरे दिल ने कहा नहीं, मगर दिमाग ने कहा हां जरूर करना चाहिए, इस तरह कम से कम उसकी स्थिति कुछ तो साफ होती।

मैंने अपनी रिवाल्वर निकालकर दोबारा उसपर तान दी।

‘‘क..क्या...! क्या कर रहा है तू होश में तो है।‘‘

‘‘हिलना नहीं प्लीज!‘‘

‘‘वो तो चल मैं नहीं हिलता मगर हुआ क्या तेरे को।‘‘

‘‘तुम्हारे पास हथियार है?‘‘

‘‘हां है, तो!‘‘

‘‘निकालकर सेंट्रल टेबल पर रखो प्लीज!‘‘

‘‘ओह अब समझा! - कहकर वो जोर से ठठाकर हंस पड़ा फिर उसने अपनी रिवाल्वर निकालकर सामने टेबल पर रखते हुए कहा - गोखले किसी को तो बख्स दिया कर।‘‘
 
मैं बिना कुछ कहे टेबल के करीब पहुंचा और रिवाल्वर उठाने के लिए जेब से रूमाल निकालने लगा। बस यहीं मैं गच्चा खा गया, उसने टेबल के नीचे से अपनी लात चलाई मैं मुंह के बल ऐन उसकी रिवाल्वर के सामने टेबल पर गिरा, इस दौरान मेरी अपनी रिवाल्वर मेरे हाथ से निकल गई जबकि वो अपनी रिवाल्वर मुझपर तान चुका था।

‘‘क्या कहता है चला दूं गोली।‘‘ वो कहर भरे स्वर में बोला।

‘‘मैंने क्या बिगाड़ा है तुम्हारा?‘‘

‘‘कुछ नहीं मगर रिवाल्वर तानने से पहले ये क्यों भूल गया कि पुलिसवाला हूं। ट्रेनिंग दी जाती है हमें इन चीजों की। कैसे तूने सोच लिया कि यूं आसानी से मुझपर काबू पा लेगा। हैरानी होती है ये सोचकर कि तू मुझे अपना दोस्त तसलीम करता है, ये दोस्तों वाली हरकत थी। दोस्त वो होता है जो कहे कि कोई बात नहीं चौहान! तूने कत्ल कर भी दिए तो क्या मैं तुझे बचा के दिखाऊंगा, और एक तू है कि मुझपर ही शक कर रहा है। उस इंसान पर जिसने अपनी जिंदगी का दारोमदार तेरे कंधों पर डाल रखा है।‘‘

कहने के बाद उसने चुपचाप अपनी रिवाल्वर मुझे थमा दी। बेशक उसने मुझे शर्मिंदा करने की भरपूर कोशिश की थी, पर ऐसी कोशिश क्या किसी ने पहली बार की थी। महा बेशरमों की तरह मैंने उसके हाथों से रिवाल्वर लेकर उसका मुआयना किया, सूंघ कर देखा! कम से कम हाल-फिलहाल में तो उससे गोली नहीं चलाई गई थी, इसकी मुझे गारंटी थी।

मैंने रिवाल्वर उसे वापिस लौटा दी। फिर अपनी रिवाल्वर फर्श से उठाकर मैंने दोबारा पतलून में खोंस ली।

‘‘अब क्या कहता है।‘‘

‘‘सॉरी! मुझे सोचना चाहिए था कि अगर रंजना का कत्ल तुमने किया होता तो अब तक उस रिवाल्वर को ठिकाने लगा चुके होते।‘‘

उसने असहाय भाव से मेरी ओर देखा फिर बोला, ‘‘तू बाज नहीं आ सकता।‘‘

‘‘क्या करूं मेरा धंधा ही ऐसा है, ऐसी चीजों को मैं नजरअंदाज नहीं कर सकता। अब तुम यहां से खिसको तो मैं पुलिस को कॉल लगाऊं।‘‘

‘‘तू उन्हें मेरे बारे में बताएगा।‘‘

‘‘नहीं, ऐन कत्ल के वक्त तुम्हारी यहां मौजूदगी का ढिंढोरा पीटना तो बिना कुछ कहे तुम्हे कातिल करार देने जैसा होगा।‘‘

‘‘गुड मेरा मोबाइल नंबर नोट कर।‘‘

कहकर उसने मुझे एक नंबर नोट करवा दिया।

‘‘वर्दी का जुगाड़ कर सकते हो!‘‘

‘‘कर सकता हूं आगे बोल!‘‘

‘‘शाम को मुझे तुम्हारी जरूरत पड़ेगी।‘‘

‘‘फोन करना।‘‘

कहकर वो बाहर निकल गया।

उसके पीठ फेरते ही मैंने खान को फोन करके वहां हुई वारदात की सूचना दे दी। इसके बाद एक सोफे पर पसरकर सिगरेट के सुट्टे लगाते हुए पुलिस का इंतजार करने लगा। उस दौरान एक बात मेरे जहन में बार-बार दस्तक देती रही कि कातिल को कैसे पता चला कि मंदिरा का मोबाइल रंजना के हाथ लग गया है और अगर लग भी गया है तो उसमें कोई ऐसी बात थी जो उसे फंसवा सकती थी। इसका तो एक ही मतलब निकलता था और वो ये कि कातिल उन चार लोगों में से कोई एक था, जिन्हें रंजना ने फोन करके मोबाइल और उसमें मौजूद रिकार्डिंग के बारे में बताया था। साफ जाहिर हो रहा था कि रंजना का कत्ल उस मोबाइल की वजह से ही हुआ था। कातिल को यूं आनन-फानन में उसकी खबर लग जाना भी ये साबित करता था कि अपनी चारों काल्स में से एक वो यकीनन कातिल को कर बैठी थी।

कौन था हत्यारा - महीप शाह, मुकेश सैनी, मनोज गायकवाड़ या फिर वो चौथा सख्स जिसका नाम बता पाने से पहले ही उसका कत्ल कर दिया गया था।

क्या वो चौथा सख्स चौहान हो सकता था?

यकीनन हो सकता था! पर अगर सचमुच ऐसा हुआ था तो मुझे इस केस में जानमारी करने की जरूरत ही क्या थी।

फिर जैसे मैंने खुद ही अपने सवाल का जवाब दे डाला - जरूरत तो थी, आखिर अपने पैड क्लाइंट मनोज गायकवाड़ को मुझे कातिल का नाम जो बताना था।

मुझे एक बार फिर अपने आप पर गुस्सा आने लगा। क्यों मैं चौथे सख्स का नाम सुनने से पहले ही उससे सवाल-जवाब करने लगा था।

काश कि मैंने उसे चारों नाम लेने दिये होते! उस स्थिति में जांच का दायरा चार लोगों के बीच सिमट कर रह गया होता। जिसमें से कातिल को शार्ट आउट कर लेना क्या बड़ी बात होती।

यकीनन मैं सांप निकलने के बाद लकीर को पीट रहा था।

बीस मिनट बाद एडिशनल एसएचओ तिवारी अपने दल-बल के साथ वहां हाजिर हुआ।

‘‘लाश कहां है?‘‘ वो मेरे करीब आते हुए बोला।

‘‘वहीं जहां से बड़ी बहन की लाश बरामद हुई थी।‘‘

जवाब में बिना कुछ कहे वो सीधा स्टडी में जा घुसा। लाश और घटनास्थल का मुआयना करने में उसने पूरे बीस मिनट जाया किए फिर बाहर आकर मेरे बगल में सोफे पर पसर गया।

‘‘सिगरेट होगी तुम्हारे पास।‘‘

जवाब में मैंने बिना कुछ कहे सिगरेट का पैकेट और लाइटर उसे थमा दिया। उसने एक सिगरेट निकालकर सुलगाया और पैकेट मुझे वापिस करता हुआ बोला, ‘‘कैसे कर लेते हो इतना सबकुछ!‘‘

मैं हंसा।

‘‘सच कहता हूं मैंने तुम्हारे जैसा फसादी आदमी नहीं देखा। जहां जाते हो वहीं किसी ना किसी का कत्ल करवा देते हो! बड़ी बहन से मिलने आये उसका कत्ल हो गया, अंकुर रोहिल्ला से मिलने गये तो वो बेचारा भी जान से गया और अब रंजना चावला, कम से कम उसे तो बख्स दिया होता।‘‘

‘‘तुम तो ऐसे कह रहे हो तिवारी साहब जैसे इस हत्याकांड के लिए मैं ही जिम्मेदार हूं।‘‘

‘‘नहीं मैं ऐसा नहीं कह रहा, क्योंकि मुझे यकीन है कि इन हत्याओं के पीछे कम से कम तुम्हारा हाथ नहीं है। लेकिन मैं ये सोचकर हैरान जरूर हूं कि ऐसा इत्तेफाक बार-बार तुम्हारे ही साथ क्यों हो रहा है।‘‘

‘‘सिर्फ इसलिए क्योंकि सिर्फ मैं ही इस केस में मारा-मारा फिर रहा हूं, कातिल को बेनकाब करने के लिए दृढ़प्रतिज्ञ जो हूं।‘‘

‘‘और हम क्या कर रहे हैं भई, हम क्या हाथ पर हाथ धरकर बैठे हुए हैं? पुलिस को क्या कोई परवाह नहीं कि कातिल छुट्टा घूम रहा है।‘‘

‘‘है! ना होने का कोई मतलब ही नहीं है, मगर तुम लोग रूटीन फॉलो करते हो, एक साथ कई केसेज पर काम कर रहे होते हो! जबकि मैं एक बार में सिर्फ एक ही केस के पीछे भागता हूं इसलिए कभी-कभार इत्तेफाकन पुलिस से दो कदम आगे निकल जाता हूं। ऊपर से इस केस में तुम लोग चौहान को मुजरिम मानकर सिर्फ और सिर्फ उसके पीछे लगे हुए हो। उसे कोर्ट में निर्विवाद रूप से हत्यारा साबित करने के लिए सबूत इकट्ठे करने में जुटे हो, जबकि मैं उसे बेगुनाह मानकर असली हत्यारे की तलाश में दिन रात एक किये हूं।‘‘

‘‘ऐसी कोशिश का क्या फायदा गोखले जिसका कुछ हासिल ना निकले।‘‘

‘‘ना सही मगर इस डर से मैं कोशिश करना तो बंद नहीं कर सकता, आखिर मुझे अपनी फीस को भी तो जस्टीफाई करके दिखाना है।‘‘

‘‘चौहान ने फीस भरी है तुम्हारी।‘‘

‘‘नहीं, उसने नहीं।‘‘

‘‘फिर किसने?‘‘

मैं खामोश रहा।

‘‘छोड़ो मुझे उस बात से कोई लेना देना नहीं - कहकर उसने सिगरेट का एक कस लगाया फिर आगे बोला - अब बिना कुछ छिपाये-दबाये, सारा किस्सा बयान कर डालो।‘‘
 

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