• Hello Friends You can Register on the Forum and by posting you can earn money too.

Thriller गहरी साजिश

  • Thread starter Thread starter StoryPublisher
  • Start date Start date
मैंने किया, बगैर लाग-लपेट के तमाम घटनाक्रम ज्यों का त्यों बयान कर दिया, सिवाय दो बातों के! पहली ये कि चौहान के वहां पहुंचने की बात मैं गोल कर गया। बावजूद इसके कि मेरा दिमाग बार-बार मुझे चेता रहा था कि पुलिस से चौहान की आमद छिपाकर मैं गलती कर रहा था। दूसरी बात वो तीन नाम थे, जिन्हें मकतूला ने फोन करके उनकी आवाज को कातिल की आवाज से मैच करने की कोशिश की थी और यूं अपनी जान गवां बैठी थी। कातिल उन तीनों में से भी कोई हो सकता था। लिहाजा चौथे सख्स का नाम न मालूम होने के बावजूद मैं अपनी इंवेस्टिगेशन आगे बढ़ा सकता था।

पुलिस की रूटीन कार्रवाई चलती रही और मैं ड्राइंगरूम में बैठा सिगरेट फूंकता रहा। क्यों? क्योंकि मुझे वहां से जाने की इजाजत नहीं थी। क्योंकि पुलिस कार्रवाई में दखलंदाज होने की इजाजत नहीं थी। फिर तकरीबन एक घंटा बाद मैं पुलिस पार्टी के साथ थाने पहुंचा जहां तफ्शील से मेरा बयान दर्ज करके मुझे छुट्टी दे दी गई।

साहबान पुलिस के बारे में कोई गलतफहमी ना पालें। मैं इतनी आसानी से आजाद कर दिया गया तो इसका मतलब ये हरगिज नहीं था कि आजकल हमारी पुलिस अपनी चिरपरिचित - लोगों को बेवजह हलकान करने वाला - अंदाज से बाज आ गई थी। अगर मेरे साथ वे लोग उस तरह पेश नहीं आते थे तो इसकी अहम वजह थी - उनका एसएचओ और एसीपी मुझे भाव देते थे, क्यों देते थे यह जांच का मुद्दा था।

थाने से निकलकर मैं सीधा मुकेश सैनी के फ्लैट पर पहुंचा। कालबेल के जवाब में उसने दरवाजा खोला, फिर जैसे ही उसकी निगाह मुझपर पड़ी उसने बुरा सा मुुंह बनाया। ना कोई हाय हैलो, ना उसने मुझे भीतर आने को कहा! उल्टा दरवाजे पर यूं डटकर खड़ा हो गया मानों मुझे भीतर ना आने देने के लिए दृढ़प्रतिज्ञ हो।

‘‘लिहाजा मुझे अपना परिचय फिर से देना पड़ेगा।‘‘ प्रत्यक्षतः मैं बोला।

‘‘कोई जरूरत नहीं, मैं तुम्हें भूला नहीं हूं - वो बेरूखी से बोला - तुम वही सख्स हो जिसने कल अंकुर रोहिल्ला के बंगले पर मेरी खिंचाई करवाई थी।‘‘

‘‘तौबा! मैं भला ऐसा क्यों करता?‘‘

‘‘करते नहीं किया! कल तुम्हारी वजह से ही मेरी वहां उतनी फजीहत हुई थी।‘‘

‘‘क्या बात है भई अभी तो शाम भी नहीं ढली है, फिर भी घूंट लगाये बैठे हो।‘‘

‘‘बको मत! मैंने ड्रिंक नहीं किया है।‘‘

‘‘फिर इतना बेगानापन क्यों दिखा रहे हो।‘‘

‘‘तुम्हे मालूम है, क्यों दिखा रहा हूं। कल अगर तुमने ये कह दिया होता कि तुम मुझे जानते थे तो वो पुलिसवाला मुझे परेशान नहीं करता।‘‘

‘‘और क्या कहा था मैंने।‘‘

‘‘कहा तो वही था मगर कहने का अंदाज ऐसा था, जैसे जबरन वो शब्द तुम्हारे मुंह से निकले हों।‘‘

‘‘तुम शायद ये भूल रहे हो कि वहां ताजा-ताजा एक कत्ल होकर हटा था। यही क्या कम था जो मैंने उन्हें ये नहीं बता दिया कि तुम वो मुकेश सैनी हो जो सुनीता के कत्ल से पहले उसके फ्लैट में घुसते देखे गये थे।‘‘

‘‘तो बोल देते, वो क्या मुझे फांसी चढ़ा देते।‘‘

‘‘फांसी तो नहीं चढ़ा देते लेकिन इतनी आसानी से तो तुम्हें वहां से जाने भी नहीं देते। तुम ऐन कत्ल के वक्त मौकायेवारदात पर मौजूद थे, ऐसे में कोई बड़ी बात नहीं होती अगर पुलिस तुम्हें पूछताछ के लिए हिरासत में लेती और हवालात में बंद करके भूल जाती।‘‘

‘‘उनके बाप का राज है!‘‘

‘‘है तो कुछ ऐसा ही, मगर उस बाबत मैं तुमसे बहश नहीं करूंगा।‘‘

‘‘क्या चाहते हो?‘‘

‘‘यू दरवाजे पर खड़े होकर तो कुछ नहीं चाहता, अगर भीतर आने दो तो कुछ बात बने।‘‘

‘‘और ना आने दूं तो!‘‘

‘‘तो ये कि मैं पुलिस को ना सिर्फ सुनीता के फ्लैट में तुम्हारी विजिट के बारे में बता दूंगा, बल्कि उन्हें ये भी बताऊंगा कि तुम मंदिरा चावला को पहले से जानते थे। लिहाजा तुम वो दूसरे सख्श होगे जो मंदिरा चावला और सुनीता गायकवाड़ दोनों को जानता था! देख लेना उसके बाद पुलिस की नजरे-इनायत तुमपर होकर रहेगी। तब यूं दरवाजे पर खड़ा करके उनका इंटरव्यू लेकर दिखाना तुम!‘‘

‘‘कौन कहता है कि मैं मंदिरा चावला को जानता था।‘‘

‘‘साथ ही मैं उन्हें ये भी बताऊंगा कि - मैं उसके सवाल को नजरअंदाज करके बोला - तुम वो इकलौते सख्श थे, जिसे रंजना चावला ने फोन करके ये बताया था कि मंदिरा का मोबाइल उसके हाथ लग गया था, जिसमें कातिल की आवाज रिकार्ड थी।‘‘

‘‘इसका क्या मतलब हुआ, अब क्या मुझे फोन करने के लिए लोगों को तुम्हारी इजाजत लेनी पड़ेगी!‘‘

‘‘नहीं मगर वो इकलौती बात पुलिस को ये सोचने पर मजबूर कर देगी कि कहीं कातिल तुम तो नहीं हो।‘‘

‘‘ऐसी क्या खास बात है उस फोन काल में?‘‘

‘‘मालूम तो होना चाहिए तुम्हे, आखिर इतने बड़े मास्टर माइंड ठहरे तुम! फिर भी अगर मेरे मुंह से सुनने को बेताब हो तो सुनो - ज्योंही तुम्हें पता लगा कि मंदिरा का मोबाइल बरामद हो गया है, जिसमें कातिल की आवाज रिकार्ड है - तुम्हारे होश फाख्ता हो गये। तुम जानते थे देर सबेर उस आवाज का मिलान तुम्हारी आवाज से जरूर किया जायेगा, जो कि यकीनन पहचान ली जायेगी। लिहाजा आनन-फानन में तुमने उसके कत्ल का फैसला कर डाला - आखिरकार तीन कत्ल तुम पहले ही कर चुके थे, लिहाजा हौसले की कोई कमी तो थी नहीं तुम्हारे भीतर। मोटरसाइकिल पर सवार होकर उसकी स्टडी के ऐन पीछे वाली गली तक पहुंचे। आगे पैदल ही गली में दाखिल होकर उस खिड़की तक पहुंचे जो कि गली में खुलती थी। तुम्हारा इरादा खिड़की के जरिए वहां का माहौल भांपना था। मगर जब तुम वहां पहंुचे तो इत्तेफाकन उसी वक्त रंजना भी स्टडी में पहुंच गई। जो कि तुम्हारे लिए सहूलियत वाली बात साबित हुई। वहां तुमने ना सिर्फ रंजना को गोली मार दी बल्कि एक गोली वहां चार्जिंग पर लगे मोबाइल पर भी चला दी, बिना ये जाने कि वो मोबाइल मंदिरा वाला मोबाइल था भी या नहीं।‘‘

‘‘क्या बकते हो, रंजना चावला का कत्ल हो गया?‘‘ उसने बुरी तरह चौंककर दिखाया। अगर ये उसका अभिनय था तो कमाल का अभिनय था।

‘‘क्यों भई खुद की निगाह में गोली किसी और को मारी थी क्या जो यूं चौंककर दिखा रहे हो जैसे तुम्हें कुछ पता ही नहीं।‘‘

‘‘मैं भला उसका कत्ल क्यों करूंगा।‘‘

‘‘बताया तो था, मोबाइल की रिकार्डिंग की वजह से, क्योंकि तब तक वो रिकार्डिंग सिर्फ रंजना ने ही सुनी थी। यही नहीं तुमसे बात करने के बाद बतौर कातिल वो तुम्हारी शिनाख्त कर चुकी थी।‘‘

‘‘अच्छा तो मैं तुम्हें इतना बड़ा गावदी लगता हूं कि मैंने बगैर मोबाइल की शिनाख्त किए गोली मारकर उसे तोड़ दिया। जबकि वो मोबाइल मंदिरा की बजाय रंजना का भी हो सकता था, किसी और का भी हो सकता था। यहां तक कि तुम्हारा भी हो सकता था - जिसकी बैटरी लो होने पर तुमने रंजना को चार्जिंग पर लगाने के लिए दिया हो सकता था। बावजूद इन सारी बातों के मैंने रंजना को गोली मारी, मोबाईल को तोड़ा और वहां से चलता बना! क्या कहने तुम्हारे।‘‘

उसकी बात सुनकर मेरे दिमाग में जैसे कोई घंटी सी बजी, उसे कैसे मालूम था कि रंजना के कत्ल के वक्त मैं वहां मौजूद था। सिर्फ एक ही सूरत में मालूम हो सकता था जब कि कत्ल के वक्त वो खुद भी वहां मौजूद रहा हो। मगर अपना रोशन खयाल मैंने उसपर जाहिर करने की फिलहाल कोई कोशिश नहीं की।

‘‘अब चुप क्यों हो गये। बोलती क्यों बंद हो गई तुम्हारी। या फिर तुम्हारी इन तमाम बातों का मतलब मैं ये लगाऊं कि तुम मुझे कत्ल के केस में लपेटने के लिए मरे जा रहे हो।‘‘

‘‘नहीं वो काम मेरे अख्तियार में नहीं है - कहकर मैं तनिक रूका फिर यहां भी वही चाल चली जो अंकुर रोहिल्ला बंगले पर चलकर कामयाब हो चुका था - मैं तो सिर्फ इतना जानना चाहता हूं कि ऐन कत्ल के वक्त में तुम वहां क्यों मंडरा रहे थे।‘‘

‘‘कौन कहता है?‘‘ वो दिलेरी से बोला।

‘‘सीसीटीवी की वो फुटेज कहती है जो गली के ऐन सामने सड़क के परली तरफ एक सिक्स टेन स्टोर में लगा हुआ है।‘‘

‘‘गुड! - वो संतुष्टि भरे लहजे में बोला - अगर सचमुच वहां कोई सीसीटीवी लगा हुआ है, तो समझ लो मुझे डरने की कोई जरूरत नहीं है।‘‘

सुनकर मैं केवल एक क्षण को सकपकाया, फिर खुद को संभालकर बोला, ‘‘गये क्यों थे तुम वहां?‘‘

‘‘था कोई निजी काम जिसके बारे में तुम्हें बताना मैं जरूरी नहीं समझता।‘‘

‘‘तो तुम्हें रंजना के कत्ल की पहले से खबर थी।‘‘

‘‘नहीं थी, बाई गॉड नहीं थी। लेकिन कत्ल के आस-पास के वक्त में मैं उस इलाके में मौजूद जरूर था।‘‘

‘‘तुम्हें क्या पता कि उसका कत्ल कब हुआ था।‘‘

‘‘नहीं पता।‘‘

‘‘फिर तुमने ये क्यों कहा कि तुम कत्ल के आस-पास के वक्त में वहां मौजूद थे।‘‘

‘‘भई तुम्ही ने तो कहा था कि वहां किसी सीसीटी फुटेज में तुमने मुझे देखा था।‘‘

‘‘हां मगर मैंने तुम्हें कत्ल का वक्त तो बताया ही नहीं था।‘‘

‘‘तो नहीं बताया होगा यार! - वो झुंझलाकर बोला - अब यहां से चलते फिरते नजर आओ, मुझे बहुत सारे काम निपटाने हैं।‘‘

कहकर उसने दरवाजा बंद करने की कोशिश की मगर मैं पहले ही दरवाजे में अपनी टांग अड़ा चुका था, ‘‘कल तक तो तुम्हारे पास वक्त का कोई तोड़ा नहीं था, आज क्या हो गया।‘‘

‘‘कुछ नहीं हुआ मेरे बाप!‘‘

कहकर वो दरवाजा खुला छोड,़ भीतर जाकर सोफे पर सिर पकड़कर बैठ गया। मगर मैंने भीतर दाखिल होने की कोई कोशिश नहीं की।

‘‘कम से कम इतना तो बता दो कि अगली बारी किसकी है।‘‘

जवाब में उसने एक बार सिर उठाकर आहत भाव से मेरी ओर देखा फिर दोबारा सिर थाम कर बैठ गया।

कोई बात तो यकीनन थी, जिसे वो छिपाने की कोशिश कर रहा था। और उस कोशिश में ना सिर्फ खुद कंफ्यूज हो रहा था बल्कि मुझे भी उलझाये दे रहा था।

आज का उसका व्यवहार मेरी समझ से एकदम परे था।

वहां और रूकने का कोई मतलब नहीं बनता था। मैं वापिस सीढ़ियां उतरने लगा।

‘‘सुनो!‘‘ - पीछे से उसकी आवाज आई - एक मिनट मेरी बात सुनकर जाओ, शायद तुम्हारे किसी काम आ जाए।‘‘

मैंने पलटकर उसकी ओर देखा, फिर सहमति में सिर हिलाता हुआ उसके फ्लैट में दाखिल हुआ, ‘‘क्या कहना चाहते हो।‘‘

‘‘देखो मैं मंदिरा चावला को नहीं जानता था।‘‘

‘‘उसके मोबाइल में तुम्हारा नंबर कॉल रिकार्ड में पड़ा हुआ था, रंजना ने वो नंबर डॉयल करके ही तुमसे बात की थी। वरना तुम खुद बताओ रंजना के पास तुम्हारा नंबर कहां से आता।‘‘

‘‘मैं नहीं जानता, कसम खाकर कहता हूं, नहीं जानता। उसका हाई सोशाइटी के लोगों में शुमार था। मेरी भला उस तक पहुंच क्योंकर मुमकिन हो सकती थी।‘‘

‘‘फिर भी तुम्हारा नंबर उसके मोबाइल में था।‘‘

‘‘हां मगर वो मेरे नाम से सेव नहीं था, लिहाजा कोई बड़ी बात नहीं थी कि वो गलती से किसी और का नंबर डॉयल करते वक्त एक अंक आगे पीछे मिला बैठी हो, जो कि इत्तेफाकन मेरा नंबर बन गया हो, तुम बोला क्या ऐसा हुआ नहीं हो सकता।‘‘

‘‘यूं तो हुआ हो सकता है।‘‘ मुझे स्वीकार करना पड़ा।

‘‘गुड अब सुनो मैं आज वहां क्यों गया था।‘‘

‘‘क्यों गये थे?‘‘
 
‘‘मैंने ओलेक्स और क्विकर पर बतौर इंश्योरेंश एजेंट अपना विज्ञापन डाला हुआ है, जिसमें मेरा मोबाइल नंबर भी है। उस मोबाइल नंबर को देखकर किसी विपिन आहुजा ने मुझे फोन करके कहा कि वो कोई पॉलिशी कराना चाहता है, अगर मेरे पास टाईम हो तो मैं उससे आकर मिल लूं। जवाब में मैंने उसका नाम पता नोट किया और साकेत पहुंचा। मैं उसके बताये पते पर पहुंचने ही लगा था कि वहां मेरी नजर कार से उतरते तुमपर पड़ी - जो कि मेरी निगाहों में कोई बड़ी बात नहीं होती अगरचे कि कल मैं अंकुर रोहिल्ला के बंगले पर झमेले में ना फंस गया होता - तुम्हें वहां पहुंचा देखकर मेरे मन में कुछ खटक सा गया।‘‘

‘‘फिर क्या किया तुमने।‘‘

‘‘तब मैं बगैर रूके आगे बढ़ गया और कुछ दूर जाकर मैंने उस नंबर पर फोन किया जो कि किसी लैंडलाइन का था। यूं फोन करने पर मुझे पता चला कि वो नंबर ना सिर्फ किसी पीसीओ का था बल्कि वो कालकाजी के इलाके में लगा हुआ था। सुनकर मेरी क्या हालत हुई होगी इसका अंदाजा तुम खुद लगा सकते हो। मैं बिना एक पल की देरी किए वहां से वापिस लौट पड़ा। वापसी में जब मैं दोबारा उस मकान के सामने से गुजरा तो मुझे रांग साइड से आकर तभी वहां खड़ी होती एक बाइक दिखाई दी, जिसपर मेरी नजर पड़ी ही सिर्फ इसलिए क्योंकि वो रांग साइड से आ रहा था।‘‘

‘‘इसमें क्या खास बात है, ऐसा तो लोग बाग आम कर बैठते हैं। कभी जल्दी के चक्कर में तो कभी शार्टकट के चक्कर में।‘‘

‘‘खास बात ये है कि बाईक सवार ने उस मकान के सामने रूककर गौर से तुम्हारी कार देख रहा था।‘‘

‘‘कोई नई बात नहीं है! वो नये मॉडल की कार है, जिसे उत्सुकता वश लोग बाग देखने लग जाते हैं।‘‘

‘‘हां मगर वो कोई आम देखने वाला नहीं था। वो अंकुर रोहिल्ला का मैनेजर महीप शाह था।‘‘

‘‘क्या कह रहे हो।‘‘ मैं चौंक सा गया।

‘‘पूछ कर देखना उससे मुकर जाय तो बेशक मुझे बुला लेना।‘‘

‘‘आगे क्या किया उसने।‘‘

‘‘मालूम नहीं, तब वो कोई ऐसी बात तो थी नहीं जिसके मैं पीछे पड़ता, लिहाजा मैं वहां से चलता बना।‘‘

‘‘बाइक कौन सी थी?‘‘

‘‘बजाज पल्सर, दो सौ बीस सीसी, ब्लैक कलर की। नंबर मुझे ध्यान नहीं है।‘‘

‘‘और कुछ!‘‘

‘‘नहीं, बस इतना ही बताना था तुम्हे।‘‘

‘‘ठीक है, शुक्रिया।‘‘

वहां से बाहर निकलकर मैंने चौहान का फोन लगाया।

‘‘कहां हो?‘‘

‘‘हूं कहीं, तू अपनी बोल!‘‘

‘‘मंदिरा के फ्लैट के आस-पास कहीं मिलो मुझे, फुल वर्दी में, क्या समझे।‘‘

‘‘समझ गया, आधे घंटे में मैं वहां पहुुंच जाऊंगा, इंतजार मत करवाना। तू जानता है यूं सड़क पर खुले में घूमना मेरे लिए मुसीबत बन सकता है।‘‘

‘‘तुम चाहो तो मैं तुम्हें लेने आ जाऊं!‘‘

‘‘नहीं, यूं तो मैं पकड़ा गया तो तू भी खामखाह लपेटे में आ जायेगा। मैं पहुंच जाऊंगा ठीक आधे घंटे में।‘‘

‘‘ठीक है, मगर सावधान रहना, वहां तुम्हारे महकमे का कोई आदमी हो सकता है जो तुम्हें जानता-पहचानता होगा।‘‘

‘‘उंगली पकड़कर चलना मत सिखा यार!‘‘

वो झुंझलाकर बोला और कॉल डिस्कनैक्ट कर दिया।

आखिर पुलिस वाला था, हेकड़ी इतनी जल्दी स्वभाव से कैसे गायब हो सकती थी। यही वजह थी कि वो मुझसे यूं पेश आ रहा था जैसे वहां पहुंचकर मुझपर कोई एहसान कर रहा हो।

बहरहाल मैं बीस मिनट बाद ही उस इलाके में जा खड़ा हुआ। और मंदिरा चावला के फ्लैट से थोड़ा पहले कार साइड में लगाकर खड़ी कर दी। कार से बाहर निकलने की मैंने कोई कोशिश नहीं की। वक्तगुजारी के लिए मैंने एक सिगरेट सुलगा लिया और आस-पास के माहौल का जायजा लेने लगा।

कम से कम उस घड़ी वहां किसी पुलिस वाले के दर्शन मुझे नहीं हुए। वैसे भी मैं जिस अहम काम को अंजाम देना चाहता था उसमें गैरकानूनी जैसा कुछ नहीं था। पुलिस की चिंता मुझे सिर्फ चौहान की वजह से थी, जिसकी वहां मौजूदगी उसके लिए प्रॉब्लम बन सकती थी।

ठीक दस मिनट बाद, पैसेंजर साइड का दरवाजा खोलकर वो मेरे बगल में आ बैठा।

‘‘करना क्या है?‘‘

मैंने बताया।

‘‘हूं!‘‘ - उसने एक लंबी हुंकार भरी फिर बोला - ‘‘दुकान से खिड़की की दूरी बहुत ज्यादा है, मुझे नहीं लगता कि सीसीटीवी फुटेज में कुछ साफ-साफ दिखाई देगा।‘‘

‘‘हो सकता है ना दिखाई दे, मगर वहां हमें कोई नई बात दिखाई दे सकती है, जिसकी तरफ इस वक्त हमारा ध्यान नहीं जा रहा है।‘‘

‘‘ठीक है चल!‘‘

जवाब में मैंने कार आगे बढ़ा दी, यूं जब हम मंदिरा के फ्लैट के सामने से गुजरे तो वहां मंडराते रजनीश अग्रवाल की सूरत की एक झलक मुझे दिखाई दी।

देखकर मैं हैरान रह गया।

‘‘ये कौन है?‘‘ चौहान के मुंह से निकला।

जवाब में जब मैंने उसे रजनीश अग्रवाल और उसकी पिता की मौत की बाबत बताया तो वो हैरानी से मेरी शक्ल देखने लगा।

‘‘ये मकतूला के फ्लैट के बाहर क्या कर रहा है।‘‘

‘‘क्या पता?‘‘

‘‘तू गाड़ी वापिस घुमा मैं थामता हूं इस छोेकरे को।‘‘

‘‘थामना तो उसे पड़ेगा ही मगर इस वक्त ज्यादा जरूरी वो काम है जिसके लिए हम यहां पहुंचे हुए हैं।‘‘

वो खामोश रह गया।

अगले तेराहे से यू-टर्न लेकर मैं सिक्स टेन स्टोर के सामने पहुंचा। फिर हम दोनों कार से निकलकर स्टोर में दाखिल हो गये।

अब आगे की बागदौड़ चौहान ने संभालनी थी। वो काउंटर पर बैठे लड़के के पास पहुंचा।

‘‘नाम बोलो अपना!‘‘

सुनकर लड़का तनिक हड़बड़ाया।

‘‘क्या हो गया सर?‘‘

‘‘कुछ नहीं रूटीन इंक्वायरी है।‘‘ कहकर उसने एक अपनी जेब से एक छोटी सी डायरी और पैन निकाल लिया।

‘‘जी सरताज आलम!‘‘

‘‘कब से काम कर रहे हो यहां।‘‘

‘‘करीब एक साल से।‘‘

‘‘सामने वाले फ्लैट में आज एक लड़की की हत्या कर दी गई मालूम है।‘‘

‘‘जी मालूम है।‘‘

‘‘क्या जानते हो उस बारे में।‘‘

‘‘कुछ नहीं जानता साहब, मुझे तो पुलिस के वहां पहुंचने के बाद ही पता चला कि वहां कोई वारदात हो गयी है।‘‘

‘‘कोई संदिग्ध एक्टिविटीज देखी हो।‘‘

‘‘नहीं साहब! आप देख ही रहे हैं हमारे स्टोर से उस बंगले का सामने का पोशर्न दिखाई नहीं देता।‘‘

‘‘गली तो दिखाई देती है।‘‘

‘‘जी हां!‘‘

‘‘वहां कुछ ऐसा देखा हो जो तुम्हे अजीब लगा हो।‘‘

‘‘नहीं देखा साहब!‘‘

‘‘ठीक है मुझे पिछले तीन घंटों की सीसीटीवी फुटेज दिखाओ। इतना तो कर ही सकते हो।‘‘

‘‘जी कर सकता हूं!‘‘ कहकर उसने अपने सामने मौजूद एलईडी का फेस हमारी तरफ कर दिया और रिकार्डिंग को पीछे लेजाकर प्ले कर दिया।‘‘

मैं क्योंकि चार बजे रंजना से मिलने पहुंचा था इसलिए मैंने रिकार्डिंग को थोड़ा और आगे ले जाकर पौने चार से प्ले कर दिया। इसके बाद हम दोनों सांस रोके सीसीटीवी फुटेज पर निगाह टिकाये रहे। फुटेज कुछ खास क्लीयर नहीं थी, खासतौर से गली के भीतर का दृश्य तो एकदम धुंधला नजर आ रहा था।

उस वक्त रिकार्डिंग चार बजकर तीन मिनट का समय दिखा रही थी जब अचानक ही एक बाइक गली के मुहाने पर जा खड़ी हुई। मोटरसाइकिल सवार ने नीचे उतरने के बाद भी हैल्मेट उतारने की कोई कोशिश नहीं की। वैसे अगर वो हैल्मेट उतार भी देता तो इस फुटेज में उसे पहचान पाना आसान काम नहीं होता। यहां तक की जूम करने के बाद भी हम उसकी मोटरसाइकिल का नंबर तक नहीं देख पाये।

मोटरसाइकिल से उतरकर वो गली में दाखिल हो गया। उसने व्हाइट या क्रीम कलर की शर्ट पहन रखी थी। ये वैसी ही शर्ट थी जैसा आज मैंने गायकवाड़ को पहने देखा था जब वो रजनीश अग्रवाल से मिलने गया था। कद-काठी भी गायकवाड़ से मिलती-जुलती ही थी। अलबत्ता रिकार्डिंग क्लीयर ना होने के कारण यह बात मैं दो टूक ढंग से नहीं कह सकता था।

उस घड़ी पहली बार मैंने गायकवाड़ का तबोस्सुर कातिल के रूप में किया। पहली बार मैं ये सोचने को मजबूर हुआ कि कहीं सब किया धरा गायकवाड़ का तो नहीं? मगर कैसे, कैसे संभव था कि दुबई में बैठे-बैठे वो अपनी बीवी और मंदिरा को मौत के घाट उतार देता। कहीं उसकी दुबई से आमद में कोई झोल तो नहीं था। कैसे हो सकता था।
 
बहरहाल बाइक से उतरकर वो गली में काफी भीतर तक गया! उतना ही जितनी दूरी पर वो खिड़की थी जहां से गोली चलाई गई थी। फिर यूं लगा जैसे उसने खिड़की पर किसी ठोस चीज से वार किया हो। यकीनन उसने खिड़की का कांच तोड़ा था। फिर हमें उसके हाथ में थमी रिवाल्वर का एहसास हुआ। जिसके लगभग तुरंत बाद वो तेज कदमों से अपनी मोटरसाइकिल के पास पहुंचा और अगले ही पल मोटरसाइकिल ये जा वो जा हो गयी।

आगे की रिकार्डिंग में कोई खास बात नहीं दिखाई दी, तो हमनें रिवर्स कर के फुटेज को फिर, फिर और फिर देखा, इसके बाद स्टोर से बाहर निकल आए।

मैं अपनी कार फौरन उस इलाके से निकाल ले गया, और एमबी रोड पर पहुंचकर इग्नू की ओर जाने वाले रास्ते पर तनिक आगे जाकर कार रोकी फिर चौहान से मुखातिब हुआ, ‘‘क्या कहते हो, कोई घंटी बजी दिमाग में।‘‘

‘‘ना! मुझे नहीं लगता कि कभी मेरा पाला उस सख्स से पड़ा है, वरना बावजूद पुअर रिकार्डिंग क्वालिटी के उसके कद-काठी से तो कोई अंदाजा लगा ही लेता।‘‘

‘‘अब मैं तुम्हें एक नाम सुझाता हूं, विचार करना।‘‘

‘‘ठीक है।‘‘

‘‘मनोज गायकवाड़!‘‘

‘‘गोखले तेरा दिमाग तो नहीं हिल गया है। या तो तू ये कबूल कर कि सुनीता-मंदिरा का कातिल और अंकुर-रंजना का कातिल दो जुदा व्यक्ति हैं वरना गायकवाड़ का ख्याल अपने दिमाग से निकाल दे। दुबई में बैठा कोई सख्स दिल्ली में भला किसी वारदात को अंजाम कैसे दे सकता है।‘‘

‘‘भाई भी दुबई में बैठकर मुंबई में फसाद करवा देता है।‘‘

‘‘तेरा मतलब है उसने शुरूआती दोनों हत्यायें किसी और से करवाई हो सकती हैं।‘‘

‘‘क्या ऐसा नहीं हो सकता।‘‘

‘‘तो फिर बाकी के कत्ल उसने खुद क्यों किये, और फिर ये मत भूल की यूं अगर उसने किसी के जरिए कत्ल करवाये होते तो उसकी गिनती सुनीता गायकवाड़ के कत्ल से आगे नहीं बढ़ती। जबकि पहला कत्ल मंदिरा का हुआ था ना कि सुनीता का।‘‘

वो ठीक कह रहा था, यूं तो कत्ल का ये सिलसिला आगे बढ़ना ही नहीं चाहिए था। क्या मुसीबत थी, मामला सुलझने की बजाय परत दर परत उलझता ही चला जा रहा था।

‘‘रजनीश अग्रवाल के बारे में क्या कहते हो, क्या फुटेज में दिखाई दे रहा व्यक्ति वो हो सकता है।‘‘

‘‘भई उस छोकरे की मैंने अभी बस एक झलक ही देखी थी मगर मोटे तौर पर गायकवाड़ और रजनीश की कद-काठी तकरीबन एक जैसी ही है। लिहाजा अगर वो गायकवाड़़ हो सकता है तो रजनीश भी हो सकता है और कोई काला चोर भी हो सकता है। देखो तो कम्बख्तों को इतना बड़ा स्टोर खोल कर बैठे हैं और सीसीटीवी ऐसा लगा रखा है जो डेढ़ सौ मीटर की पिक्चर भी सही ढंग से नहीं ले सकती।‘‘

उसकी झुंझलाहट पर मेरी हंसी छूट गई।

‘‘मैंने कोई जोक मारा!‘‘

‘‘उससे कम भी क्या था! जब काम नहीं होना होता है तो यूंही सौ अड़ंगे आते हैं! वरना तो आज ये केस सॉल्व हो ही गया था।‘‘

‘‘ठीक कहता है तू, मेरी किस्मत ही खराब है स्साली।‘‘

वैसे इस सीसीटीवी फुटेज से एक बड़ा फायदा तो तुम्हे होगा ही।‘‘

‘‘वो क्या?‘‘

‘‘तुम्हारा डिपार्टमेंट कम से कम रंजना के कत्ल के लिए तुम्हें जिम्मेदार नहीं ठहरायेगा।‘‘

‘‘गलत सोच रहा है तू, उल्टा होगा ये कि सीसीटी की फुटेज देखने से पहले ही उनके दिमाग में बतौर कातिल मेरा अक्स होगा लिहाजा उसमें दिखाई दे रहा कातिल उन्हें मुझसे मिलता-जुलता ही लगेगा। ऊपर से कातिल की हाइट देख, मुझे नहीं लगता कि वो मेरे से छोटा या बड़ा होगा।‘‘

‘‘मैंने सुना है कुछ ऐसी तकनीक भी होती है जिसके जरिए इस तरह की पुअर क्वालिटी वाली वीडियो को देखने-पहचानने लायक बना दिया जाता है।‘‘

‘‘होती है मगर उसमें कोई चमत्कार नहीं हो जाता, बस उन्नीस-बीस या बड़ी हद अठारह-बीस का अंतर पैदा किया जा सकता है, जिससे मौजूदा वीडियो में हत्यारा पहचाना जा सकेगा, इसकी मुझे कतई कोई उम्मीद नहीं है।‘‘

‘‘लिहाजा इतनी मशक्कत बेकार गई।‘‘

‘‘नहीं पूरी तरह बेकार तो नहीं गई, अब कम से कम हमें कातिल के कद-काठी का कोई अंदाजा तो हो ही गया है।‘‘

‘‘वो तो पहले से ही था।‘‘

‘‘तो समझ ले अब गारंटी हो गयी है। गोखले तू उस लड़के को, क्या नाम बताया था, हां रजनीश अग्रवाल को टटोल! जब से तूने उसके बाप की मौत वाली बात बताई है, मुझे वो कुछ खटकने सा लगा है।‘‘

‘‘वो काम अकेले मेरे बस का नहीं है, दोबारा मैंने उसके पीछे पड़ने की कोशिश की तो कोई बड़ी बात नहीं कि वो मुझे अपने घर में ही ना घुसने दे।‘‘

‘‘फिर कैसे बात बनेगी।‘‘

‘‘तुम्हें साथ चलना पड़ेगा।‘‘

‘‘चल!‘‘

‘‘कहां?‘‘

‘‘उसके घर और कहां?‘‘

‘‘क्या पता वो अभी घर ना पहुंचा हो।‘‘

‘‘देखने में क्या हर्ज है।‘‘

‘‘मेरे पास उसका मोबाइल नंबर है।‘‘

‘‘वो तू अपने पास रख संभालकर, अभी उसके घर चल।‘‘

हम दोनों देवली मोड़ रजनीश के घर पहुंचे, पता चला वो घर पर नहीं था।

‘‘अब!‘‘

‘‘वेट एंड वाच! स्साला कभी तो लौटेगा।‘‘

‘‘तुम तो एकदम फौजदारी के मूड में जान पड़ते हो।‘‘

‘‘और क्या करूं, जान सासत में जो फंसी हुई है।‘‘

जवाब में मैंने कुछ क्षण के लिए खामोशी अख्तियार कर ली।

‘‘एक बात कहूं!‘‘

‘‘चार कह रोका किसने है।‘‘

‘‘इसकी क्या गारंटी की गायकवाड़ सुनीता के कत्ल के बाद ही दुबई से वापिस लौटा था।‘‘

‘‘गारंटी है, क्योंकि पुलिस ने उसके मोबाइल पर नहीं बल्कि उसके दफ्तर की लैंडलाइन पर उससे बात की थी।‘‘

‘‘और यूं किया गया फोन सीधा गायकवाड़ ने ही रिसीव किया था नहीं।‘‘

‘‘तुझे खूब पता है कि ऐसा हुआ नहीं हो सकता, वो एक मल्टीनेशल कंपनी है। कॉल जरूर बोर्ड पर गई होगी जहां से ऑपरेटर ने वो कॉल आगे गायकवाड़ को ट्रांसफर कर दी होगी।‘‘

‘‘जिसके बारे में पुलिस ने जरूर दरयाफ्त किया होगा कि यूं ट्रांसफर की गई कॉल उसके दफ्तर के इंटरकॉम पर ही की गई थी ना कि उसके मोबाइल पर।‘‘

‘‘उसकी कोई जरूरत नहीं थी, इसलिए पहेलियां बुझाने की बजाय साफ-साफ बता कि कहना क्या चाहता है।‘‘

‘‘सुनो और समझने की कोशिश करो। आज टैक्नोलॉजी इतनी आगे पहुंच गई है कि किसी की कॉल को होल्ड कराकर किसी दूसरे के मोबाइल नंबर पर ट्रांसफर कर देना कोई बड़ी बात नहीं है, इतना तो तुम मानोगे ही।‘‘

‘‘मान लिया आगे बढ़!‘‘

‘‘फर्ज करो गायकवाड़ अपनी बीवी की हत्या वाले रोज या उससे एक रोज पहले दुबई से दिल्ली पहुंच चुका था। पीठ पीछे वो अपने ऑफिस के ऑपरेटर से ऐसी सेटिंग करके आया था कि अगर उसकी कोई कॉल आये तो उसे सीधा उसके मोबाइल पर ट्रांसफर कर दिया जाय, या क्या पता उसके ऑफिस में ऐसा कोई सिस्टम हो कि यूं आई किसी कॉल को सीधा वांछित व्यक्ति के मोबाइल पर ही ट्रांसफर कर दिया जाता हो! ऐसे में जब पुलिस ने उसे कॉल किया तो ऑपरेटर ने वो कॉल सीधा उसके मोबाइल पर ट्रांसफर कर दी। अब पुलिस की नॉलेज में तो उसने वो कॉल दुबई के अपने ऑफिस में रिसीव की थी, जबकि हकीकतन उसने वो कॉल दिल्ली में खड़े होकर रिसीव की थी। ऐसे में तुम्हारे महकमे को भला असलियत कैसे पता चल सकती थी। वो भी उस सूरत में जब बतौर कातिल तुम पहले से उनकी मुट्ठी में थे।‘‘
 
मेरी बात सुनकर वो भौंचक्का सा मेरी शक्ल देखने लगा।

‘‘क्या हुआ?‘‘

‘‘तुझे मालूम है तू कितनी फसादी बात कह रहा है।‘‘

‘‘वही सही मगर हुआ तो हो सकता है ऐसा।‘‘

‘‘अगर ऐसा हुआ होगा तो उसका पता तो अभी भी चल सकता है, महज उसका पासपोर्ट देखकर ये जाना जा सकता है कि उसने दुबई से दिल्ली की फ्लाईट कब पकड़ी थी। हम इस बाबत सीधा उससे सवाल कर सकते हैं, उसे पासपोर्ट दिखाने की मांग कर सकते हैं।‘‘

‘‘और मान लो अगर वह इंकार दे तो!‘‘

‘‘तो क्या, वो अपने आप में शक उपजाऊ बात होगी, फिर कान को घुमाकर पकड़ेंगे। एयरपोर्ट से पता करेंगे कि वो दुबई से कब लौटा था, आखिर फ्लाईट्स, खासतौर से इंटरनेशनल फ्लाईट्स का सारा डाटा महफूज रखा जाता है।‘‘

‘‘तुम ऐसी कोई पड़ताल करवा सकते हो।‘‘

‘‘मेरी मौजूदा स्थिति को देखते हुए तो मुश्किल लगता है, फिर भी उम्मीद है कि किसी ना किसी के जरिए मैं वांछित जानकारी हांसिल कर लूंगा! लेकिन वो सब वक्तखाऊं काम होगा। पहले हम गायकवाड़ को ही ट्राई करते हैं। क्या पता वो पासपोर्ट दिखा ही दे और उससे ये साबित हो जाय कि वो कत्ल वाले दिन दुबई में ही था।‘‘

‘‘तुम्हारी बात अपनी जगह ठीक है मगर फर्ज करो अगर वो गुनहगार है, तो क्या फौरन समझ नहीं जाएगा कि हम किस फिराक में थे। फिर वो यूं गायब होगा कि हमें ढूंढे नहीं मिलेगा।‘‘

‘‘फिर क्या करें!‘‘

‘‘तुम अपने ढंग से कोशिश करते रहो, मैं खान साहब को इस बाबत विश्वास में लेने की कोशिश करता हूं। अगर वो मान गये तो गायकवाड़ की मजबूरी होगी कि वो अपना पासपोर्ट पेश करे, तब उसका टाल-मटौल वाला रवैया नहीं चलने वाला।‘‘

‘‘इस मामले में एसएचओ साहब तुम्हारी नहीं सुनने वाले। फिर जरा सोच के देख गोखले, अगर तेरी बात झूठी पड़ गयी तो तेरी कितनी किरकिरी होगी। कितना भाव देते हैं वो और एसीपी साहब तुझे! ऐसा होने की सूरत में कल को तुझे थाने से कोई मदद हासिल नहीं होने वाली। ना, मैं तुझे ऐसी सलाह नहीं देने वाला।‘‘

‘‘तुम उसकी टेंशन छोड़ो मैं कोई ना कोई रास्ता निकाल लूंगा, जिससे अगर गायकवाड़ पाक-साफ साबित भी हो जाय तो मुझपर कोई हर्फ नहीं आए! वो पहुंच रहा है।‘‘

‘‘क्या?‘‘

‘‘रजनीश अपने घर के सामने पहुंच गया।‘‘

‘‘चल!‘‘ वो अपने साइड का दरवाजा खोलता हुआ बोला।

‘‘थोड़ा ठहरो! वे बेहद जल्दीबाजी में लग रहा है, क्या पता उल्टे पांव वापिस लौटे।‘‘

‘‘ना लौटा तो!‘‘

‘‘तो क्या, मिलना तो हमें उससे है ही।‘‘

उसने सहमति में सिर हिला दिया।

अगले दस मिनट यूंही गुजर गये।

‘‘मुझे तो अब वो बाहर आता नहीं दिखता।‘‘

‘‘ठीक है चलो।‘‘

हम दोनों कार से निकल कर सड़क पार करने लगे। यूं अभी हम बीच में ही थे कि तभी एक बैग कंधे पर टांगे रजनीश सीढ़ियों के दरवाजे से बाहर निकला। इसी दौरान सीधी उसकी निगाह सड़क पार कर रहे हम दोनों पर एक साथ पड़ी। जवाब उसने एक बड़ी ही अप्रत्याशित हरकत की, वो बैग फेंककर तेजी से एमबी रोड की विपरीत दिशा में भाग खड़ा हुआ।

एकदम से मेरी समझ में नहीं आया कि क्या हो गया था। मगर तब तक चौहान ने उसके पीछे दौड़ लगा दी थी।

‘‘गोखले कार लेकर आ, जल्दी कर।‘‘ वो दौड़ता हुआ चिल्लाकर बोला।

चौहान की तेज आवाज सुनकर मेरी तंद्रा भंग हुई। मैं फौरन कार की ओर लपका। कार का मुंह उसी दिशा में था इसलिए मुझे उनके करीब पहुंचने में ज्यादा वक्त नहीं लगा। करीब दो सौ मीटर दौड़ पाया था रजनीश जब अचानक चौहान ने चीते की तरह छलांग लगाकर उसे काबू में कर लिया। रजनीश ने उसके चंगुल से निकलने के लिए हाथ-पांव चलाए तो चौहान ने कसकर एक थप्पड़ उसकी कनपटी पर जड़ दिया। उसके बाद रजनीश अग्रवाल यूं शांत पड़ गया जैसे उसमें विरोध करने की शक्ति ही ना बची हो।

मैंने उन दोनों के बगल में कार रोकी तो चौहान ने उसे पिछली सीट पर धकेला और खुद भी उसके साथ सवार हो गया। मैंने तत्काल कार आगे बढ़ा दी।

‘‘अगर अपनी कोई हड्डी-वड्डी नहीं तुड़वाना चाहता तो चैन से बैठना! समझ गया?‘‘

रजनीश ने सिर हिलाकर हामी भरी, वो अभी भी अपनी कनपटी सहला रहा था।

इस दौरान चौहान ने अपनी रिवाल्वर निकाल कर हाथ में ले ली, ‘‘जानता है ये क्या है?‘‘

‘‘रिवाल्वर है।‘‘ वो मरे स्वर में बोला।

‘‘आगे किसी ब्रेकर पर, रेड लाइट पर, किसी मोड़ पर या फिर ट्रैफिक की वजह से ये कार धीमी हो सकती है, रूक सकती है! तू चाहे तो अपनी ओर का दरवाजा खोलकर भागने की कोशिश कर सकता है, मुझे तेरा एनकाउंटर करने में बहुत खुशी होगी, समझ गया।‘‘

‘‘समझ गया, मैं ऐसी कोई कोशिश नहीं करूंगा।‘‘

‘‘गुड! अब बता हमें देखकर भागा क्यों था?‘‘

‘‘मैं डर गया था मुझे लगा तुम मुझे गिरफ्तार करने आ रहे हो। पीछे घर में भी पता लगा था कि पुलिस मुझे ढूंढती हुई वहां पहुंची थी।‘‘

‘‘लिहाजा फरार होने जा रहा था।‘‘

उसने जवाब नहीं दिया। बस चुपचाप सिर झुका लिया।

‘‘क्यों फरार हो रहा था, क्या किया था तूने, क्यों तूं पुलिस से खौफ खा रहा है।‘‘

उसके मुंह से बोल नहीं फूटा।

जवाब में चौहान का हाथ फिर चला, ‘‘बहन....चो... मैं तुझसे कुछ पूछ रहा हूं, तेरी समझ में नहीं आ रहा।‘‘

‘‘मैंने कुछ नहीं किया।‘‘ वो लगभग रोता हुआ बोला।

‘‘क्यों सुनीता गायकवाड़ का कत्ल नहीं किया तूने?‘‘

‘‘कौन सुनीता गायकवाड़?‘‘

जवाब में चौहान फिर उसपर पिल पड़ा, ‘‘कमीने मैं तुझसे क्विज नहीं कर रहा, साफ-साफ जवाब दे वरना इस कार से तू जिंदा बाहर नहीं निकल पायेगा।‘‘

वो बात चौहान ने ऐसे कहरबरपे लहजे में कही थी कि सुनकर मेरा कलेजा दहल गया, रजनीश अग्रवाल की तो बात ही क्या थी।

‘‘मैं सच कहता हूं साहब! - वो मिमियाता हुआ बोला - मैं किसी सुनीता गायकवाड़ को नहीं जानता।‘‘

‘‘अभी दिन में तू जिस औरत के खसम से मिलकर हटा है, उसकी बीवी को तू नहीं जानता।‘‘

‘‘आप मनोज गायकवाड़ की बात कर रहे हो?‘‘

‘‘चल तेरी याद्दाश्त तो लौटी।‘‘

अब तक मैं खानपुर की रेड लाइट पर पहुंच चुका था, ‘‘आगे किधर चलूं।‘‘

‘‘तुगलकाबाद के खंडहरों में ले चल, वहीं निपटाता हूं स्साले को।‘‘

फिर वही खतरनाक लहजा!

‘‘साहब मैं बता तो रहा हूं सबकुछ!‘‘

‘‘सबकुछ कहां बता रहा है स्साले... मादर...चो... अभी तो तू हर बात से मुकर कर दिखा रहा है।‘‘

‘‘मैं सच कह रहा हूं, मैं उसकी बीवी को नहीं जानता, उससे भी आज पहली बार मिला था मैं।‘‘

‘‘क्यों मिला था।‘‘

‘‘वो...वो... क्या है कि उसे एक रिवाल्वर चाहिए थी।‘‘

‘‘तो तू इलीगल आर्म्स भी बेचता है।‘‘

‘‘मैं नहीं बेचता, मेरा एक जानने वाला है।‘‘

‘‘कौन नाम बोल उसका!‘‘

‘‘जीतेंद्र सिंह नाम है, हम सब उसे जीते कहते हैं।‘‘

‘‘देवली में ही रहता है वो।‘‘

‘‘नहीं! - इस बार जवाब मैंने दिया - ओखला फेज वन के इलाके में तेखंड नाम का एक गांव है, वहीं एक बिल्डिंग के दूसरे फ्लोर पर रहता है।‘‘

जवाब में दोनों ने चौंककर मेरी तरफ देखा, चौहान केवल एक क्षण को हकबकाया फिर उस बात को कैश करता हुआ बोला, ‘‘देखा हर बात की खबर रखते हैं हम लोग, इसलिए तेरा कुछ छिपाना सिवाय तेरी दुर्गति कराने के और कोई फायदा तुझे नहीं पहुंचाने वाला। अब कबूल कर कि वो तेखंड में ही रहता है।‘‘

‘‘वहीं रहता है।‘‘

‘‘तू हथियार मुहैया करा सकता है, इसकी खबर गायकवाड़ को कैसे लगी?‘‘

‘‘वो कहता था उसके किसी फ्रैंड ने उसे मेरा नाम बताया था।‘‘

‘‘फ्रैंड का नाम बोल!‘‘

‘‘उसने नहीं बताया! - फिर वो जल्दी से बोला - सच कहता हूं साहब उसने नाम नहीं बताया था उसका।‘‘

‘‘स्साले यूं किसी को परखे बिना कहीं इस तरह के धंधे होते हैं, बेवकूफ समझ रखा है मुझे।‘‘

‘‘उसने साबित किया था कि वो अभी कुछ दिनों पहले ही दुबई से लौटा था, लिहाजा वो कोई पुलिस का भेदिया या पुलिसवाला कैसे हो सकता था!‘‘

‘‘कैसे साबित किया था?‘‘

‘‘उसने अपना पासपोर्ट दिखाया था मुझे।‘‘

‘‘तारीख देखी थी तूने!‘‘ चौहान उत्सुक स्वर में बोला।

‘‘नहीं, पासपोर्ट में देखना क्या था, जब ये मेरी समझ में नहीं आया तो उसे उलटने-पलटने के बाद मैंने उसका पासपोर्ट वापिस कर दिया।‘‘

‘‘फिर भी तू कहता है कि उसने तेरी तसल्ली कराई थी।‘‘

‘‘मैंने सोचा जब वो इतने कांफिडेंस से पासपोर्ट दिखा रहा था तो सही बोल रहा होगा। उसे क्या खबर थी कि मुझे पासपोर्ट देखकर कुछ समझ में नहीं आने वाला था।‘‘

‘‘बस यही वजह थी उसे जीते का पता बताने की!‘‘

‘‘नहीं बात इतनी होती तो मैं उस सौदे से इंकार कर देता। मगर जब उसने पचास हजार की रिवाल्वर का एक लाख देना कबूल किया तो मैं लालच में आ गया।‘‘

‘‘कमीशन कितनी बटोरी।‘‘

‘‘पचास के ऊपर कस्टमर जितना भी देता है वो मेरी कमीशन होती है।‘‘

‘‘लिहाजा एक ही झटके में तूने पचास हजार कमा लिए।‘‘

उसने सिर झुका लिया।

‘‘गायकवाड़ ने रिवाल्वर खरीदने की वजह क्या बयान की।‘‘

‘‘वो बोलता था उसकी जान को खतरा था।‘‘

‘‘मंदिरा को क्यों मारा?‘‘
 
‘‘साहब मैं सच कहता हूं!‘‘ - वो गिड़गिड़ाता हुआ बोला - ‘‘मैंने जीवन में कभी मक्खी तक नहीं मारी है किसी इंसान का कत्ल तो दूर की बात है।‘‘

‘‘कोई बात नहीं, सुन मैं बताता हूं कि तूने मंदिरा चावला का कत्ल क्यों किया। दरअसल किसी तरीके से तुझे पता चल गया कि दिसम्बर में तेरे बाप को उसी ने अपनी कार से ठोकर मारी थी। फिर बाद में जब किसी दूसरी वजह से तेरे बाप की मौत हो गयी तो तू कूद कर इस नतीजे पर पहुंच गया कि हो ना हो उस एक्सीडेंट की वजह से ही तेरे सिर से बाप का साया छिन गया था। बस बदले की भावना से प्रेरित होकर तूने उसका कत्ल कर दिया, उसी सिलसिले में तूने सुनीता और अंकुर को भी मौत के घाट उतार दिया।‘‘

‘‘मैंने किसी का कत्ल नहीं किया साहब यकीन करो।‘‘

‘‘और आज दिन में - चौहान उसकी बात को अनसुना करके बोला - रंजना चावला का कत्ल भी तूने ही किया था, तू नहीं बच सकता। मैं तुझे जिंदा छोड़ना अफोर्ड नहीं कर सकता, वरना आगे जाने तू कितने लोगों के खून से अपने हाथ रंगेगा।‘‘

‘‘साहब प्लीज! गरीबमार मत करो, मैंने किसी के खून से अपने हाथ नहीं रंगे, मैं सच कह रहा हूं।‘‘

‘‘आज शाम को तू मंदिरा चावला के फ्लैट पर नहीं गया था।‘‘

‘‘गया था साहब! मगर तब मुझे ये नहीं मालूम था कि उसका कत्ल हो चुका है।‘‘

‘‘गया क्यों था?‘‘

‘‘गायकवाड़ के जाने के करीब दो घंटे बाद मेरे पास एक अंजान लैंडलाइन नंबर से कॉल आई थी। फोनकर्ता ने कहा था कि वो मंदिरा चावला का वकील बोल रहा है। जिसकी कि आज वसीयत पढ़ी जानी थी। अपनी वसीयत में वो कुछ संपत्ति मेेरे पिता के नाम छोड़ गई है। साथ ही एक लेटर भी जिसमें उसने स्वीकार किया है कि मेरा पिता उसी की कार से टकराकर घायल हुए थे, जिसका कि उसे बेहद अफसोस था। इसीलिए वो अपनी वसीयत में उनका जिक्र कर गयी थी। उस वकील ने मुझे ये भी बताया कि मंदिरा चावला की वसीयत के मुताबिक मेरे पिता को एक लाख रूपये मिलने थे, जो कि उनकी मौत की सूरत में अब मुझे सौंपे जा सकते थे।‘‘

‘‘कहानी मत सुना!‘‘ चौहान ने आंखे तरेरीं।

‘‘मैं सच कह रहा हूं साहब!‘‘

‘‘नंबर दिखा, जिससे तुझे कॉल की गई थी!‘‘

जवाब में उसने मोबाइल में देखकर वो नंबर चौहान को नोट करवा दिया।

‘‘तो, उसने तुझसे कहा था कि वो मकतूला का वकील बोल रहा है! उसने कहा और तूने मान लिया, स्साले उल्लू समझ रखा है पुलिस को।‘‘

‘‘साहब यकीन करो उसने यही कहा था! तब ये बात मुझे भी अजीब लगी थी। मगर मैंने वहां पहुंचने में कोई नुकसान नहीं समझा, इसलिए हामी भर दी। तब उसने मुझे ठीक चार बजे वहां पहुंचने को कहकर काल डिस्कनैक्ट कर दिया था।‘‘

‘‘चल मान ली तेरी बात! तो अब तक की तेरी कहानी का मतलब ये निकलता है कि उस फोन कॉल की वजह से तू ठीक चार बजे मकतूला के फ्लैट पर पहुंचा था।‘‘

‘‘नहीं पहुंचा!‘‘

‘‘क्यों?‘‘

‘‘मेरी बदकिस्मती समझ लो साहब! तीन बजे के करीब जब मैं अपने घर से निकला तो मेरी मोटरसाइकिल पंचर हो गयी। पंचर बनवाते-बनवाते साढ़े तीन हो गये। आगे खानपुर की रेड लाइट पर पुलिस ने बैरीकैड लगा रखा था, जहां वे लोग सभी दोपहिया वाहनों को चैक कर रहे थे। इत्तेफाक से मैं बाइक के पेपर घर भूल गया था। मैंने बड़ी मुश्किल से उन लोगों को इस बात के लिए तैयार किया कि मैं घर से पेपर लाकर दिखा देता हूं। फिर मैं अपने घर वापिस लौटा और दोबारा पेपर्स के साथ खानपुर पहुंचा तो पता चला कि बैरीकेडिंग हटा दी गयी थी। मेरी मोटरसाइकिल वहीं खड़ी थी मगर लॉक थी। मैंने वहां एक ट्रैफिक के सिपाही से दरयाफ्त किया तो उसने मुझे थाने जाने को कह दिया। मरता क्या न करता मैं थाने पहुंचा जहां करीब डेढ़ घंटे के इंतजार के बाद मुझे मेरी बाइक की चाबी सौंप दी गयी। यूं साढ़े छह बजे मैं अपनी मोटरसाइकिल पर दोबारा सवार हो पाया। सात बजे से कुछ पहले जब वकील के बताये पते पर पहुंचा तो वहां उल्लू बोल रहे थे। मैं कुछ देर इधर-उधर ताक-झांक करता रहा फिर पास के एक दुकानदार से दरयाफ्त किया तो पता चला कि वहां कुछ घंटों पहले ही एक कत्ल हो गया था। सुनकर मेरे होश फाख्ता हो गये। वहां से वापिस लौटकर मैं मिष्ठान रेस्टोरेंट पहुंचा, जहां दिन में मेरी गायकवाड़ साहब से मुलाकात हुई थी। वहां मैंने एक मसाला डोसा खाया, फिर अपने घर को हो लिया। घर पहुंचकर मुझे पता लगा कि पुलिस मुझे ढूंढती हुई वहां आई थी। सुनकर मेरे हाथ-पांव फूल गये लिहाजा मैं जल्दी-जल्दी एक बैग पैक करके, कुछ दिन किसी दोस्त के यहां बिताने की मंशा से घर से बाहर निकला। आगे क्या हुआ आप जानते ही हो। आप चाहो तो मेरी तमाम एक्टीविटी चेक करवा सकते हो।‘‘

‘‘हम पहुंचने वाले हैं किस तरफ से अंदर घुसना है?‘‘ मैंने चौहान से सवाल किया।

‘‘साहब प्लीज मुझे छोड़ दो, मैंने कुछ नहीं किया, बेशक मुझे रिवाल्वर वाले मामले में अंदर कर दो मगर जान बख्स दो। गरीबमार मत करो प्लीज!‘‘ कहकर उसने चौहान के पांव पकड़ लिये।

‘‘सीधा होकर बैठ!‘‘

‘‘साहब छोड़ दो ना प्लीज!‘‘ वो पुनः गिड़गिड़ाया।

‘‘बोला न सीधा होकर बैठ।‘‘

इस बार चौहान ने उसे घुड़की दी तो वो सीधा होकर बैठ गया। मगर उसकी आंखों से याचना के भाव नहीं गये।

‘‘अब मेरी बात ध्यान से सुन!‘‘

‘‘जी साहब!‘‘ - वो दोनों हाथ जोड़कर बोला, उस वक्त उसका शरीर रह रहकर कांप उठता मुझे साफ दिखाई दिया।

‘‘समझ ले फिलहाल हमने तेरी बात पर यकीन कर लिया। हम तुझे आजाद कर रहे हैं, मगर! तुझपर मुतवातर वॉच रखी जायेगी, आइंदा अगर तूने हथियारों के खरीद-फरोख्त में हाथ डाला तो तेरी खैर नहीं समझ गया!‘‘

‘‘जी साहब जी!‘‘

‘‘घर जाकर किसी नौकरी की तलाश में जुट जा! वैसे भी तूने कई दुकानें किराए पर उठा रखीं हैं इसलिए मैं नहीं समझता कि तुझे पैसों की कोई तंगी होगी। फिर भी अगर पैसे कम पड़ते दिखें तो किसी होटल में बर्तन धो लेना, जूते पॉलिश कर लेना, मगर! दोबारा तूने इस धंधे में कदम नहीं रखना है। शुक्र मना कि इस वक्त हम लोग कत्ल के केस में उलझे हुए हैं, इसलिए तुझपर कोई चार्ज नहीं लगा रहे, इसका फायदा उठा और आइंदा चैन की जिंदगी बसर कर, समझ गया!‘‘

‘‘समझ गया साहब!‘‘

‘‘यहां से जाते ही भूल तो नहीं जाएगा।‘‘

‘‘हरगिज नहीं भूलूंगा।‘‘

‘‘कार रोक भई।‘‘

मैंने सड़क के किनारे ले जाकर कार रोक दी।

‘‘अभी हमारे यहां से जाते ही तू शेर हो जाएगा! - इस बार चौहान बड़े सब्र के साथ बोला - हो सकता है तेरे मन में ये खयाल आए कि तुझे जीते को फोन करके सावधान कर देना चाहिए कि पुलिस उस तक पहुंच सकती है....।‘‘

‘‘नहीं करूंगा साहब, प्रॉमिश।‘‘ वो जल्दी से बोला।

‘‘करना, मैं मना नहीं कर रहा। मगर! तब करना जब तू अपनी जिंदगी से आजिज आ चुका हो! - जा अब दफा हो जा यहां से।‘‘

‘‘शुक्रिया साहब! - वो कार से उतरता हुआ बोला - आप दोनों का बहुत-बहुत शुक्रिया।‘‘

उसके जाने के बाद चौहान भी कार से बाहर निकला और मेरे बगल में आकर बैठ गया, ‘‘क्या कहता है?‘‘

‘‘किसी ने लड़के को रंजना के कत्ल में फिट करने की पूरी कोशिश की थी, वो तो उसकी किस्मत - जिसे वो खराब बताता है - बहुत अच्छी निकली, वरना पुलिस के फेर में पड़कर रहना था उसने। आगे तुम्हारे महकमे को पता लगता कि वो गैरकानूनी हथियारों की दलाली करता है, तो उसके बाद तो उसकी एक नहीं सुनी जाती। लिहाजा उसकी जमकर मिट्टी पलीद् होना लगभग तय था।‘‘

‘‘ठीक कहता है तू, ला एक सिगरेट पिला।‘‘

मैंने सिगरेट का पैकेट और लाइटर उसे थमा दिया।

वो कुछ क्षण खामोशी से सिगरेट के कस लगाता रहा फिर बोला, ‘‘जानता है इस वक्त मैं क्या सोच रहा हूं।‘‘

‘‘यही कि क्या गायकवाड़ ने वो रिवाल्वर रंजना चावला को मौत के घाट उतारने के लिए खरीदा हो सकता है।‘‘

‘‘कमाल का अंदाजा है तेरा गोखले! मैं ऐन यही बात सोच रहा था। अब तू मुझे उस लड़के के पास लेकर चल जिसने गायकवाड़ को रिवाल्वर बेची थी। मगर ठहर! इससे पहले तू ये बता कि उसकी खबर तेरे को क्योंकर हुई?‘‘

जवाब मैं मैंने गायकवाड़ का पीछा करते हुए वहां तक पहुंचने वाली बात उसे बता दी।

‘‘गुड, अब मुझे यकीन आ गया कि तू हाथ पर हाथ धर के नहीं बैठा हुआ है। चल पहले उस जमूरे से निपटते हैं, आगे की बाद में सोचेंगे।‘‘

‘‘तुम उसे गिरफ्तार करवाना चाहते हो!‘‘ मैं हैरानी से बोला।

‘‘पागल हुआ है, इस वक्त हमारी प्राथमिकता कातिल तक पहुंचना है या उसे गिरफ्तार कराना है! उसे गिरफ्तार कराने के चक्कर में पड़कर क्या मुझे अपनी फजीहत करानी है। मैं तो बस उससे ये जानना चाहता हूं कि उसने किस तरह की रिवाल्वर गायकवाड़ को बेची थी। आगे तूने ये पता करना है कि क्या रंजना को उसी किस्म की रिवाल्वर से गोली मारी गयी थी। अगर हां तो ये अपने आप में इशारा होगा कि रंजना का कत्ल गायकवाड़ ने किया है। ....और अगर रंजना का कत्ल उसने किया है तो बाकी के कत्ल भी उसी ने किये होंगे।‘‘
 
हम तेखंड गांव पहुंचे। मैंने कार को एकदम इमारत के पहलू से सटाकर खड़ा किया फिर मैं और चौहान कार से बाहर निकलकर दूसरी मंजिल पर स्थित उस फ्लैट के सामने पहुंचे, जिसके भीतर मैंने गायकवाड़ को दाखिल होते देखा था।

चौहान ने दरवाजे पर दस्तक दी और बड़े ही दोस्ताना लहजे में बोला, ‘‘जीते ओ जीते, अरे सो गया क्या यार!‘‘

‘‘नहीं रूक अभी खोलता हूं।‘‘ भीतर से कहा गया। फिर दरवाजा खुला, खोलने वाला वही युवक था जिसे मैं पहले भी फासले से देख चुका था। एक बावर्दी पुलिसिये पर नजर पड़ते ही उसने दरवाजा बंद करने की कोशिश की मगर चौहान ने उसे कामयाब नहीं होने दिया। उसने वहीं खड़े-खड़े एक जोरदार लात उसे जमाई तो वो चार फीट भीतर कमरे में जा गिरा।

हम दोनों कमरे में दाखिल हुए।

वो तकरीबन बारह बाई बारह का कमरा था जिसमें हर तरफ अस्त-व्यस्तता का बोल बाला था। कहीं कपड़े पड़े हुए थे तो कहीं जूठे बर्तन! अभी मैं कमरे का मुआयना कर ही रहा था कि चौहान ने बिना कुछ पूछे, बिना कुछ कहे, लड़के को रूई की तरह धुन कर रख दिया। अपने मतलब की जानकारी निकलवाने का यही वो फेवरेट तरीका था, जिसमें हर पुलिसिए को महारत हासिल थी।

‘‘मेरी बात ध्यान से सुन! - उसे जमकर ठोकने के बाद चौहान कहर भरे स्वर में बोला - मुझे मालूम है तू कौन सा धंधा करता है। मगर इत्मीनान रख हमें उससे कुछ लेना देना नहीं है, इसलिए चैन से बैठ जा! समझ गया?‘‘

उसने रोते हुए मंुडी हिलाकर हामी भरी और सीधा होकर बैठ गया।

‘‘अब मैं तुझसे एक सवाल करने जा रहा हूं, जिसका जवाब बहुत आसान है। सही जवाब देगा तो हम अभी दफा हो जायेंगे और तेरे बारे सबकुछ भूल जायेंगे। घुमाने की कोशिश की तो आगे तेरा मुकाम कहां होगा ये तू मेरे से बेहतर समझता है।‘‘

‘‘साहब आप पूछो तो सही क्या जानना चाहते हो?‘‘ वह सहमे से स्वर में बोला।

‘‘आज दिन में तूने मनोज गायकवाड़ नाम के आदमी को एक रिवाल्वर बेची थी! हां और ना में जवाब दे।‘‘

‘‘बेची थी साहब!‘‘

‘‘कैसी रिवाल्वर थी वो!‘‘

‘‘वो ‘निडर‘ रिवाल्वर थी साहब!‘‘

‘‘पहले तो कभी नहीं सुना ये नाम!‘‘

‘‘मार्केट में नई नई आई है साहब! अभी पिछले साल ही तो लांच हुई थी, इसलिए हो सकता है आपने नाम ना सुना हो। वो आठ राउंड फायर करने वाली प्वाइंट बाइस कैलीबर की इंडियन रिवाल्वर है, जो सात मीटर तक मार कर सकती है। कानूनी तरीके से खरीदने जायेंगे तो लगभग पैंतीस हजार की आती है। आकार में बहुत छोटी होती है, एक सौ चालिस एमएम की। वजन एक पाव के करीब होता है, आप इसे जनाना हथियार भी कह सकते हैं।‘‘

‘‘तूने लोडेड पिस्तौल बेची थी?‘‘

‘‘जी!‘‘

‘‘क्या लगता है तुझे, गायकवाड़ को पिस्तौल की समझ थी, वो उसे हैंडल करना जानता था।‘‘

‘‘उसकी बातों से तो मुझे यही लगा था साहब! क्योंकि जब मैंने उससे कहा कि मैं उसे ऑपरेट करना सिखा देता हूं तो वो रिवाल्वर जेब में रखता हुआ बोला कि उसे मालूम था।‘‘

‘‘ठीक है, अगर तेरा जवाब सच्चा है तो समझ ले तेरी जानबख्शी हो गयी।‘‘

‘‘शुक्रिया साहब जी।‘‘

जवाब में जब हम वापिस लौटने को हुए तो वो जल्दी से बोल पड़ा, ‘‘साहब कोई खर्चा पानी?‘‘

चौहान ने तुरंत पलटकर उसे खा जाने वाली नजरों से घूरा, ‘‘खर्चा पानी तू अपनी गां..... में डाल ले बहन...चो!‘‘

कहकर वो बाहर निकल गया।

हम दोनों एक बार फिर मेरी कार में सवार हो गये।

‘‘आगे क्या इरादा है?‘‘ मैं कार स्टार्ट करता हुआ बोला।

‘‘आगे जो करना है वो सिर्फ और सिर्फ तुझे करना है! खान साहब या तिवारी साहब से ये जानने की कोशिश कर की मकतूला को किस किस्म रिवाल्वर से सूट किया गया था। सच पूछ तो अब मुझे तेरी ही बात सच होती जान पड़ती है। ये सब किया धरा गायकवाड़ का ही दिखाई देता है। बस ये साबित हो जाय कि वो कत्ल वाले रोज दिल्ली में था तो समझ ले उसका खेल खत्म हो गया।‘‘

‘‘खान साहब के पास तुम मेरे साथ क्यों नहीं चलते।‘‘

‘‘भेजा फिर गया है तेरा! मान ले अगर हमारी तमाम आशंकाओं के खिलाफ गायकवाड़ निर्दोष साबित हो जाता है, तो फिर आगे मेरा मुकाम कहां होगा, क्या ये बात तुझे समझाने की जरूरत है।‘‘

‘‘हां है! - मैं जिद भरे स्वर में बोला - यूं भागे-भागे कब तक फिरोगे तुम! एक ना एक दिन तो तुम्हे सामने आना ही होगा। या तुम्हारा महकमा खुद तुम्हें ढूंढ निकालेगा। तब तुम्हारी ज्यादा फजीहत होगी। जबकि आज अगर तुम खुद थाने में पेश हो गये तो कुछ तो लिहाज करेंगे ही वो लोग तुम्हारा।‘‘

उसने उस बात पर गंभीरता से विचार करना शुरू किया।

साहबान! चौहान के साथ क्या बीतती इस वक्त मुझे उसकी चिंता नहीं थी। चिंता तो मुझे अपनी थी। यूं अगर कोई मुझे उसके साथ देख लेता तो क्या मैं और क्या मेरा पीडी का धंधा! पलभर में सबकुछ चौपट हो जाना था। फिर मुझे सिक्स टेन स्टोर के कैशियर की भी चिंता थी। जहां बाद में किसी वक्त पुलिस पहुंचती - जो कि पहुंचनी ही थी - तो वो बताये बिना कैसे रहता कि पहले भी एक सब-इंस्पेक्टर और उसका साथी वहां की वीडियो फुटेज देखकर जा चुके थे। फिर जब पुलिस स्टोर के भीतर की फुटेज देखती तो मुझे पहचानने में क्या उन्हें वक्त लगना था। इसके बाद पुलिस की जो गाज आपके खादिम पर गिरती! उसके जिक्र मात्र से ही मेरा दिल हिले जा रहा था। लिहाजा मेरी गति इसी बात में थी कि चौहान फौरन खुद को पुलिस के हवाले कर देता।

‘‘क्या सोचा तुमने!‘‘ मैंने उसकी ओर देखे बिना प्रश्न किया।

‘‘मैं कोई फैसला नहीं कर पा रहा हूं! - वो विचारपूर्ण ढंग से बोला - क्योंकि गायकवाड़ के बेकसूर साबित होने की सूरत में मेरा जेल जाना तय है।‘‘

‘‘तुम्हे मेरी काबीलियत पर शक कब से होने लगा।‘‘

‘‘शक तो खैर मुझे नहीं है, मगर अपनी काबीलियत के दमपर जब तक तू कातिल को तलाशने में कामयाब होगा तब तक के लिए को मुझे अपनी फजीहत करानी ही पड़ेगी।‘‘

उस वक्त हम एक ऐसी सड़क से गुजर रहे थे, जहां सड़क के दोनों तरफ साप्ताहिक बाजार लगा हुआ था। इधर-उधर भटकती मेरी निगाह एक ऐसी दुकान पर पड़ी जहां ढेरों सूटकेस रखे हुए थे! जिनपर निगाह पड़ते ही जैसे मेरे जहन में कोई घंटी सी बजी।

‘‘हे भगवान!‘‘ मेरे मुंह से खुद बा खुद निकल गया।

चौहान ने चौंककर मेरी ओर देखा, ‘‘क्या हुआ?‘‘

‘‘कातिल का पता चल गया।‘‘

‘‘क्या?‘‘

‘‘मैं हैरान हूं कि इतनी बड़ी बात को मैं नजरअंाज कैसे कर गया।‘‘

‘‘अब कुछ बोलेगा भी या हैरान ही होता रहेगा।‘‘

‘‘गायकवाड़ ही कातिल है, उसके अलावा कोई हो ही नहीं सकता।‘‘

‘‘और इसका सपना तुझे अभी-अभी आया है नहीं।‘‘

‘‘हां बाजार में रखे सूटकेसों को देखकर।‘‘

‘‘गोखले क्यों तपा रहा है मुझे।‘‘

मैं हंसा।

जवाब में इस बार उसने मुझे कसकर घूरा।

‘‘समझो इस बात की गारंटी हो गयी कि गायकवाड़ अपनी बीवी के कत्ल से पहले ना सिर्फ दिल्ली में था बल्कि वो अपने फ्लैट में भी गया था।‘‘

‘‘प्लीज एक्सप्लेन।‘‘

‘‘देखो सुनीता के कत्ल के बाद उसके फ्लैट को पुलिस ने सील कर दिया था। वो सील उस रोज तोड़ी गई जब पुलिस ने तुम्हारी वकील नीलम तंवर को घटनास्थल का मुआयना कराने के लिए अपने एक हवलदार के साथ गायकवाड़ के फ्लैट पर भेजा था। हवलदार ने सील हमारी आंखों के सामने तोड़ी थी। उसके बाद हम भीतर दाखिल हुए और वहां की तलाशी लेने में जुट गये। उस दौरान जब मैंने बेडरूम में रखे बक्से वाले पलंग का ढक्कन हटाकर देखा तो भीतर मुझे एक नया-नकोर सूटकेस रखा दिखाई दिया। जिसके भीतर मर्दाना कपड़ों के अलावा सेविंग का सामान तथा अंडर गारमेंट तक रखे दिखाई दिये जो कि बेशक गायकवाड़ के थे। तब मुझे उसकी अहमियत समझ में नहीं आई मगर आज बाजार में रखे सूटकेसों को देखकर, जब मुझे उस सूटकेस का ख्याल आया तो दिमाग की बत्ती जल उठी।‘‘

‘‘मैं अभी भी नहीं समझा कि तू कहना क्या चाहता है।‘‘

‘‘सिर्फ इतना कि अगर गायकवाड़ फ्लैट सील किये जाने के अगले दिन दिल्ली पहुंचा था तो उसका सूटकेस सील्ड फ्लैट के भीतर कैसे पहुंच गया।‘‘

‘‘क्या पता वो कोई पुराना सूटकेस रहा हो जिसमें उसकी चीजें संभालकर सुनीता ने पलंग के भीतर रख दी हों।‘‘

‘‘चौहान साहब वो एकदम नया-नकोर सूटकेस था। अगर वो दो साल पहले खरीदा गया होता तो उसमें वो चमक नहीं होती जो उस सूटकेस पर मौजूद थी। ऊपर से कपड़ों को अगर दो साल तक बंद करके रख दिया जाय तो उसमें से जो मुश्क निकलने लगती है वो मुझे उस सूटकेस से आती महसूस नहीं हुई थी।‘‘

‘‘ठीक है थाने चल! अब जो होगा देखा जायेगा। मगर उससे पहले पता कर कि खान साहब वहां हैं या नहीं।‘‘

मैंने चैन की मीलों लंबी सांस खींची।

खान को फोन करने पर पता चला कि उस वक्त वो थाने में मौजूद था। मैंने उसे कोई खास जानकारी देने का हवाला देकर थाने में ही रूके रहने की इल्तिजा की तो उसने झट हामी भर दी।

आधे घंटे में हम थाने पहुंच गये।

वहां जब हम कार से निकलकर भीतर की ओर बढ़े तो जिसकी भी नजर चौहान पर पड़ी उसका मुंह खुला का खुला रह गया। उसके कलीग्स यूं हकबका कर उसकी ओर देखने लगे जैसे वो कोई अजूबा हो।

हम दोनों सीधा खान के कमरे में पहुंचे। चौहान पर निगाह पड़ते ही वो उछल सा पड़ा। उसकी जगह कोई और होता तो निश्चय ही सबसे पहले उसकी गिरफ्तारी का हुक्म दनदनाता, फिर कोई सवाल करता। मगर वो बेहद सुलझा हुआ पुलिस वाला था, पल भर में ही वो यूं शांत दिखने लगा जैसे चौहान के वहां आगमन में कोई खास बात थी ही नहीं।

हम दोनों उसका अभिवादन करके उसके सामने विजिटर चेयर पर बैठ गये।

‘‘कैसा है चौहान!‘‘

‘‘ठीक हूं जनाब!‘‘

‘‘गुड! कोई नई बात हो गयी दिखती है, नहीं।‘‘

‘‘जी जनाब, है तो कुछ ऐसा ही।‘‘

‘‘मैं तिवारी को यहां बुला लूं! तुझे कोई ऐतराज तो नहीं!‘‘

‘‘जी बेशक बुला लीजिए।‘‘
 
जवाब में उसने तिवारी के मोबाइल पर फोन किया और फौरन वहां पहुंचने को कह दिया। फिर उसने इंटरकॉम पर ड्यूटी रूम में फोन किया और बोला, ‘‘सतीश तुझे मालूम है कि इस वक्त मेरे कमरे में कौन है! सारे स्टॉफ को समझा दे कि अगर ये बात लीक हुई तो किसी की खैर नहीं।‘‘

कहकर उसने रिसीवर रख दिया फिर चौहान से मुखातिब हुआ, ‘‘अब बताओ क्या चाहते हो।‘‘

ठीक तभी एडिशनल एसएचओ तिवारी वहां हाजिर हुआ, चौहान पर निगाह पड़ते ही वो हकबका सा गया, मगर कुछ बोला नहीं और खान के इशारे पर हमारे बगल में एक चेयर खींचकर बैठ गया।

‘‘अब बोल क्या चाहता है।‘‘

‘‘सबसे पहले तो उस रिवाल्वर के बारे में बताइए जिससे रंजना चावला की हत्या की गई थी।‘‘

जवाब में खान ने तिवारी की ओर देखा तो वो बोल पड़ा, ‘‘रिवाल्वर अभी बरामद नहीं हुई है मगर हमारे टैक्निशियन का कहना है कि उसे प्वाइंट बाइस कैलिबर की क्लोज रेंज वाली एकदम नई किस्म की रिवाल्वर से गोली मारी गयी थी। वो कोई ऐसी रिवाल्वर थी जो अभी ज्यादा प्रचलन में नहीं आई है, क्या तो भला सा नाम बताया था उसने....!‘‘

‘‘निडर!‘‘ चौहान उत्सुक स्वर में बोला।

‘‘हां निडर! लेकिन तुझे उस बारे में कैसे पता?‘‘

जवाब में चौहान ने मेरी तरफ देखा! तो मैंने गायकवाड़ पर शक की सारी कहानी सिलसिलेवार ढंग से सुनानी शुरू कर दी। जैसे-जैसे मैं कथा करता गया खान और तिवारी की हैरानगी बढ़ती चली गयी। आखिरकार सूटकेस का जिक्र करके मैंने अपनी बात खत्म की।

‘‘कमाल है! - खान हैरान होता हुआ बोला - इतना बड़ा खलीफा लगता तो नहीं है वो, जो यूं पुलिस की आंखों में धूल झोंककर सिलसिलेवार वारदातों को अंजाम देता चला जाय।‘‘

‘‘जनाब चेक करने में क्या हर्ज है, अगर हमारी बात झूठी पड़े तो मैं बैठा तो हूं आपके सामने गिरफ्तार होने को।‘‘

‘‘तू सठिया गया है चौहान! सुना नहीं अभी फोन पर मैंने क्या कहा। लिहाजा इस वक्त तो तुझे कोई हाथ भी नहीं लगायेगा! तू जब इतने विश्वास के साथ यहां पहुंचा है तो उस विश्वास की लाज तो मुझे रखनी ही पड़ेगी।‘‘

सुनकर चौहान की आवाज भर्रा सी गयी, ‘‘शुक्रिया जनाब!‘‘

‘‘तिवारी तुमने सुना गोखले ने अभी क्या कहा - खान बोला - अब तुम बताओ कि तुम्हे क्या लगता है।‘‘

‘‘जनाब अगर इसने कोई कहानी नहीं सुनाई है - जो कि मुझे यकीन है कि नहीं सुनाई होगी - तो गायकवाड़ हो तो सकता है कातिल!‘‘

‘‘ऐसे में अब हमें क्या करना चाहिए।‘‘

‘‘रात को उठा लेते हैं, देखते हैं क्या कहता है।‘‘

‘‘वो तो हम करेंगे ही मगर उसपर हाथ डालने से पहले मैं कम से कम इतना पक्का कर लेना चाहता हूं कि कत्ल वाले रोज वो यकीनन दिल्ली में ही था। अगर वो बात गलत साबित होती है तो फिर उसे परेशान करने का हमें कोई हक नहीं पहुंचता। अब तुम मुझे ये बताओ कि साहब लोगों को इंवॉल्व किये बिना कोई रास्ता है, फौरन इस जानकारी को हासिल करने का।‘‘

‘‘पांच मिनट दीजिए।‘‘ कहकर तिवारी मोबाइल कोई नंबर डॉयल किया और बातों में मसरूफ हो गया। उसकी बातों के अंदाज से जाहिर हो रहा था कि वो अपने किसी बेहद करीबी दोस्त से बातें कर रहा था।

फिर उसने कॉल डिस्कनैक्ट कर दी और खान से मुखातिब हुआ, ‘‘अभी पता चल जायेगा, थोड़ा इंतजार कीजिए।‘‘

आगे पांच मिनट पूरी खामोशी में गुजरे। फिर तिवारी के मोबाइल की घंटी बजी। हम सब ने एक साथ उसपर निगाहें टिका दीें। उसने मुश्किल से तीस सेकेंड बात की होगी मगर वो तीस सेकेंड हमें उस वक्त घंटों में तब्दील होते महसूस हुए।

आखिरकार उसने मोबाइल से किनारा किया और हर्षित स्वर में बोला, ‘‘चौहान तेरी तो समझ ले लॉटरी लग गई! वो कत्ल वाले रोज एक जून को ही दिल्ली पहुंच गया था। जबकि हमारे रिकार्ड के मुताबिक वो दो तारीख को यहां पहुंचा था।‘‘

सुनकर हम सभी ने चैन की सांस ली।

‘‘एक छोटी सी शंका और है मेरे मन में! - खान बोला - इसकी क्या गारंटी कि एक तारीख को दुबई से दिल्ली पहुंचा मनोज गायकवाड़ कोई और सख्स नहीं था, इत्तेफाकन जिसका नाम मनोज गायकवाड़ रहा हो।‘‘

‘‘कोई गारंटी नहीं, मगर इस बात की गारंटी है कि दो जून को कोई मनोज गायकवाड़ दुबई से दिल्ली नहीं पहुंचा था।‘‘

‘‘गुड! उठा लो कमीने को, साथ ही उसके फ्लैट की तलाशी भी लो, क्या पता उसने रिवाल्वर को अभी तक ठिकाने ना लगाया हो।‘‘

‘‘अभी?‘‘

‘‘हां अभी, मगर पूरी खामोशी से, कम से कम आज की रात मैं उसकी खबर मीडिया को नहीं लगने देना चाहता।‘‘

‘‘नहीं लगेगी।‘‘ तिवारी हर्षित स्वर में बोला। साफ जाहिर हो रहा था कि चौहान के साथ सस्पेक्ट की तरह बिहैव करना उसे पसंद नहीं आ रहा था। वो उठकर कमरे से बाहर निकल गया।

‘‘गोखले! - उसके पीठ पीछे खान बोला - यू आर ग्रेट।‘‘

‘‘शुक्रिया, शुक्रिया खान साहब।‘‘

‘‘और चौहान! मेरी तरफ से तू आजाद है, चाहे तो घर जाकर लंबी तानकर सो जा! अगर अंकुर रोहिल्ला के मर्डर के सिलसिले में कोई वहां पहुंचे तो बेशक मेरे से बात करा देना। अगर गायकवाड़ का बयान सुनकर जाना चाहता है तो अपने कमरे में जाकर बैठ! क्योंकि अभी मुझे बहुत से जरूरी काम निपटाने पड़ेंगे। गोखले को भी साथ लेता जा, बहुत भाग-दौड़ कर ली इसने तेरे केस में।‘‘

‘‘जी जनाब!‘‘ वो बोला और उठकर खड़ा हो गया। फिर हम दोनों उसके कमरे में जाकर बैठ गये और सिगरेट का धुंआ उड़ाने लगे।
 
रात नौ बजे के करीब कई पुलिसियों से घिरा गायकवाड़ थाने लाया गया। जहां सबसे पहले उसे एसएचओ के कमरे में ले जाया गया। तब तक एसीपी त्रिलोक नाथ पांडेय भी वहां पहुंच चुका था। खबर मिलते ही मैं और चौहान भी वहां जा पहुंचे। एसीपी के इशारे पर मैं एक कुर्सी पर जा बैठा जबकि चौहान दीवार से पीठ टिका कर खड़ा हो गया।

वहां पहुंचते ही गायकवाड़ बिफर पड़ा, वो सीधा एसीपी से मुखातिब हुआ, ‘‘क्या मैं जान सकता हूं, कि यूं मुझे थाने पकड़ मंगवाने का क्या मतलब हुआ?‘‘

‘‘अभी पता चल जायेगा जनाब, पहले आप आराम से बैठ जाइए।‘‘ एसीपी बहुत धैर्य से बोला, साथ ही उसने तिवारी को छोड़कर वहां मौजूद बाकी पुलिस वालों को बाहर जाने को कह दिया।

अंगारों पर लोटता गायकवाड़ एक कुर्सी पर जम गया।

‘‘गुड! अब मैं आपसे एक मामूली सा प्रश्न पूछने जा रहा हूं, जिसका आपने सीधा और सच्चा जवाब देकर ये साबित करके दिखाना है कि आप एक नेक शहरी हैं और कानून व्यवस्था की कद्र करते हैं।‘‘

‘‘पूछिये।‘‘

‘‘आप दुबई से वापिस कब लौटे थे?‘‘

उस एक सवाल ने गायकवाड़ की हालत खराब करके रख दी। उसके चेहरे पर हवाइयां उड़ती सबने देखी, प्रत्यक्षतः वो बड़ी दिलेरी से बोला, ‘‘क्या मतलब हुआ इस सवाल का?‘‘

‘‘मतलब छोड़िये जनाब! मैंने आपसे एक सीधा सा प्रश्न किया है जिसके जवाब में आपने हमें बस एक तारीख बतानी है।‘‘

‘‘और अगर मैं इस सवाल का जवाब देने से इंकार कर दूं तो!‘‘

‘‘तो ये कि हमें आपका पासपोर्ट देखना पड़ेगा, आप अगर उसे दिखाने से भी इंकार करेंगे तो हम अपने तरीके से इस बात का पता लगा लेंगे। मगर उसमें वक्त लगेगा और उस दौरान हमें मजबूरन आपको हवालात में रखना होगा, जो की आपके लिए सहूलियत वाली बात तो हरगिज भी साबित नहीं होने वाली।‘‘

जवाब में गायकवाड़ ने सिर झुका लिया, उससे जवाब देते नहीं बन पड़ा।

‘‘जनाब मैं आपके जवाब का इंतजार कर रहा हूं, या तो जवाब दीजिए या फिर इंकार कीजिए, प्लीज!‘‘

‘‘एक जून को।‘‘ वो इतना धीरे बोला कि बड़ी मुश्किल से वो बात मेरे कानों तक पहुंच सकी।

‘‘फिर आपने ये क्यों जाहिर किया कि आप दो तारीख को अपनी पत्नी की मौत की खबर सुनकर दिल्ली आए थे।‘‘

‘‘मैंने ऐसा कुछ जाहिर नहीं किया, मुझसे पुलिस ने कभी ये सवाल नहीं किया कि मैं दिल्ली कब लौटा था।‘‘

‘‘चलिए मैंने आपकी बात मान ली, कि आपसे पुलिस ने इस बाबत सवाल नहीं किया इसलिए उसकी जवाबदारी आप पर लागू नहीं होती। अब बराय मेहरबानी आप हमें ये बताइए कि आपने अपनी बीवी का, मंदिरा चावला का, अंकुर रोहिल्ला का और मंदिरा की बहन रंजना चावला का कत्ल क्यों किया।‘‘

‘‘मैंने किसी का कत्ल नहीं किया! - वो आवेश भरे लहजे में बोला - इसलिए तुम लोग कितनी भी कोशिश क्यों ना कर लो, मुझसे कत्ल की बाबत कुछ नहीं कबूलवा सकते।‘‘

ठीक तभी तिवारी उठकर एसीपी के पास पहुंचा और उसके कान में कुछ कहने के बाद अपनी सीट पर वापिस लौट गया।

‘‘जनाब ये पुलिस स्टेशन है, आपकी जानकारी के लिए बता दूं कि यहां बड़े से बड़ा अपराधी भी रटंत तोता बन जाता है, आपकी तो बिसात ही क्या है! बावजूद इसके मैं एक बार फिर आपकी बात मान लेता हूं कि आपने किसी का कत्ल नहीं किया। अब बराय मेहरबानी आप हमें ये बताइए कि आपके फ्लैट से जो रिवाल्वर बरामद हुई है, उसका आपके पास क्या जवाब है।‘‘

‘‘वो मैंने अपनी सुरक्षा के लिए आज दिन में ही खरीदी थी, जिस तरह से कत्ल दर कत्ल होते जा रहे हैं, उस लिहाज से मुझे यह डर सता रहा था कि कहीं कातिल का अगला शिकार मैं ना बन जाऊं।‘‘

‘‘हाल-फिलहाल उस रिवाल्वर का कोई इस्तेमाल किया था।‘‘

‘‘नहीं बिल्कुल नहीं।‘‘

‘‘ऐसा तो नहीं है जनाब, क्योंकि हमारे बैलेस्टिक एक्स्पर्ट का मुआयना ये कहता है कि हाल ही में उस रिवाल्वर से दो गोलियां चलाई गई थीं, यूं उसके चेम्बर में दो खाली कारतूस भी पाये गये हैं, उस बाबत आप क्या कहेंगे।‘‘

‘‘सिर्फ इतना कि आप सभी लोग मिलकर मेरे खिलाफ कोई साजिश रच रहे हैं। अपने एक सब-इंस्पेक्टर को बचाने की खातिर पुलिस मुझे बलि का बकरा बनाने पर तुली है।‘‘

‘‘वही सही, मगर सवाल ये है कि जो रिवाल्वर आपके अधिकार में थी उसमें से पुलिस भला दो गोलियां कैसे चला सकती थी।‘‘

‘‘वो सब मैं नहीं जानता, मगर है ये तुम्हारे महकमें की ही करतूत! और कोई ऐसा कर ही नहीं सकता। जरूर तुम लोगों ने मेरे फ्लैट से रिवाल्वर बरामद होने के बाद उससे गोली चलाई होगी, ताकि बाद में ये कह सको कि वो दोनों गोलियां मैंने चलाई थीं।‘‘

एसीपी ने एक फरमाईशी आह भरी फिर बोला, ‘‘तो आप कसम खाये बैठे हैं अपनी दुर्गत कराने की।‘‘

‘‘और आप कसम खाये बैठे हैं मुझे कत्ल के केस में फंसाने की।‘‘

तभी एक व्यक्ति कमरे में दाखिल हुआ, वो सीधा एसीपी पांडे के करीब पहुंचा और उसका अभिवादन कर के बोला, ‘‘स्टडी की दीवार में धंसी पाई गई गोली, उसी रिवाल्वर से चलाई गयी थी जो कि इन साहब के घर से बरामद हुई है। अलबत्ता मकतूला के सिर में मारी गई गोली अभी तक हमें हासिल नहीं हुई है, क्योंकि लाश का पोस्टमार्टम नहीं हो पाया है। लेकिन उसकी जांच के बावजूद मेरा ये दावा है कि दोनों गोलियां इसी रिवाल्वर से चलाई गई थीं। इसके दस्ते पर भी सिर्फ और सिर्फ इन्हीं साहब के उंगलियों के निशान मिले हैं।‘‘

कहकर वो कमरे से बाहर निकल गया।
 
‘‘अब क्या कहते हैं आप! - एसीपी ने फिर से गायकवाड़ से सवाल किया - रंजना चावला का कत्ल तो चार बजे के करीब हुआ था। जबकि पुलिस ने अभी मुश्किल से एक घंटा पहले आपके घर से आपकी रिवाल्वर बरामद की है। ऐसे में आपको फंसाने के लिए हमने उस रिवाल्वर से रंजना पर गोली कब चला दी। क्या जवाब है आपके पास इस बात का।‘‘

‘‘वही जो पहले था, ये सब तुम लोगों की चाल है।‘‘

‘‘आप दुबई से यूं अचानक दिल्ली क्यों लौटे थे।‘‘

‘‘वो मेरा निजी मामला है जिसकी बाबत जवाब देना मैं जरूरी नहीं समझता।‘‘

उसकी बात पर तिलमिलाता हुआ तिवारी उठकर गायकवाड़ के पास पहुंचा और एक जोरदार थप्पड़ उसकी गाल पर जमाता हुआ कहर भरे स्वर में बोला, ‘‘स्साले जानता नहीं किससे बात कर रहा है, ये टाल-मटौल वाला रवैया छोड़ वरना तेरी एक भी हड्डी सलामत नहीं बचेगी।‘‘

थप्पड़ इतना तेज पड़ा था कि गायकवाड़ कुर्सी समेत घूम सा गया।

‘‘तिवारी! - एसीपी गरजता हुआ बोला - बिहैव योर सैल्फ!‘‘

‘‘मगर जनाब!‘‘

‘‘शटअप!‘‘ एसीपी जोर से चीखा। जवाब में तिवारी ने यूं सकपका कर दिखाया जैसे एसीपी के चीखने से उसकी पतलून गीली हो गई हो। हकीकत तो ये थी कि पुलिस अपनी फेमश नौटंकी शुरू कर चुकी थी।

‘‘मेरे सवाल का जवाब दीजिए प्लीज!‘‘

‘‘मुझे किसी ने फोन करके बताया था कि मेरी बीवी का किसी के साथ अफेयर था! - गायकवाड़ फट पड़ा - जिसपर वो शादी के लिए दबाव बना रही थी। जबकि उसका आशिक उससे पीछा छुड़ाने की खातिर उसके कत्ल के मंसूबे बांध रहा था।‘‘

‘‘किसने बताया!‘‘

‘‘मालूम नहीं उसने अपना नाम नहीं बताया था।‘‘

‘‘उसने कहा और आपने यकीन कर लिया, वो भी इस तरह कि दुबई से भाग कर दिल्ली पहुंच गये, ये क्या भला कोई मानने वाली बात थी।‘‘

‘‘उसपर मुझे पहले से शक था, क्योंकि जब भी मैं उसे दुबई अपने पास बुलाने की कोशिश करता वो कोई ना कोई बहाना बनाकर टाल देती थी। इसलिए मैं उस फोन कॉल्स को नजरअंदाज नहीं कर सका।‘‘

‘‘ओके होता है ऐसा, अब आप ये बताइये कि एक जून को दिल्ली अपने फ्लैट पर पहुंचकर आपने क्या किया।‘‘

‘‘कुछ नहीं, कुछ करने को बचा ही नहीं था, मैं जिस वक्त अपने फ्लैट पर पहुंचा सुनीता की हत्या हो चुकी थी। उसकी लाश देखकर जो पहला ख्याल मेरे जहन में आया वो ये था कि मुझे फौरन वहां से भाग जाना चाहिए वरना पुलिस मुझपर ही उसकी हत्या का शक करेगी। लिहाजा उल्टे पांव मैं वापिस लौट गया और जाकर एक होटल में बुक हो गया।‘‘

‘‘उससे पहले आपने कम से कम एक काम को और अंजाम दिया था - इस बार खान बोला - आपने अपने पास मौजूद सूटकेस को पलंग के भीतर बने बॉक्स में छिपा दिया था।‘‘

‘‘हां मैंने ऐसा ही किया था, क्योंकि तब मैं बुरी तरह डर गया था मुझे लगा इतने बड़े सूटकेस के साथ अगर मैं बिल्डंग से बाहर निकला, तो किसी ना किसी की निगाह मुझपर पड़कर रहनी थी।‘‘

‘‘आप मंदिरा चावला को जानते थे।‘‘

‘‘नहीं।‘‘

‘‘उसका कत्ल क्यों किया आपने?‘‘

‘‘अरे जब मैं उसे जानता नहीं था तो!‘‘

‘‘चटाख!‘‘ तिवारी का हाथ फिर चला और इस बार गायकवाड़ कुर्सी समेत फर्श पर जा गिरा, ‘‘स्साले झूठ बोलना बंद कर वरना!‘‘

‘‘तिवारी! - एसीपी सख्त लहजे में बोला - सस्सपेंड नहीं होना चाहते तो इसी वक्त कमरे से बाहर निकल जाओ!‘‘

‘‘लेकिन जनाब ये झूठ पर झूठ...!‘‘

‘‘आई से गेट आउट!‘‘ एसीपी पहले से अधिक सख्ती के साथ बोला। जवाब में तिवारी तुरंत कमरे से बाहर निकल गया।

फिर एसीपी ने खुद गायकवाड़ को उठकर दोबारा कुर्सी पर बैठने में मदद की।

‘‘अंकुर को क्यों मारा आपने!‘‘

‘‘मैंने किसी को नहीं मारा - वो लगभग रो देने वाले अंदाज में बोला - आप लोग मेरा यकीन क्यों नहीं करते।‘‘

‘‘रंजना की हत्या क्यों की आपने।‘‘

‘‘मैंने किसी की हत्या नहीं की है और कितनी बार कहूं ये बात!‘‘

‘‘बीवी को तो खैर आपने उसकी बेवफाई की सजा दी थी, मगर मंदिरा चावला ने आपका क्या बिगाड़ा था - खान बोला - क्या उसने आपको सुनीता की हत्या करते देख लिया था या कोई और बात थी।‘‘

‘‘मैंने कुछ नहीं किया, भगवान के लिए मेरा यकीन करो।‘‘

‘‘रंजना चावला की हत्या करने आप जिस मोटरसाइकिल पर सवार होकर पहुंचे थे वो किसकी थी।‘‘

‘‘मुझे मोटरसाइकिल चलानी नहीं आती।‘‘

‘‘रंजना ने जिस वक्त आपको ये बताया कि उसे मंदिरा का मोबाइल मिल गया है, जिसमें कातिल की आवाज रिकार्ड थी, उस वक्त आप कहां थे।‘‘

‘‘मैं अपने फ्लैट पर था।‘‘

जवाब में मेरे कान खड़े हो गये और गायकवाड़ के कातिल होने के प्रति रहा-सहा शक भी दूर हो गया।

‘‘तेखंड गांव से जब आपने रिवाल्वर खरीदी थी, उस वक्त तक रंजना की कॉल आ चुकी थी या उसके बाद आई थी।‘‘

‘‘बाद में आई थी।‘‘

‘‘उसके फ्लैट पर आपने जानबूझकर उसके मोबाइल को निशाना बनाया था या ऐसा इत्तेफाकन हो गया था।‘‘

गायकवाड़ ने कसकर अपने होंठ भींच लिये।

‘‘जवाब दीजिए जनाब इस तरह चुप रहने से आपका कोई भला नहीं होने वाला।‘‘

ठीक तभी तिवारी कमरे में वापिस लौट आया। उसके साथ-साथ दो सब-इंस्पेक्टर भी कमरे में घुस आये थे।

‘‘अच्छा ये बताइए कि अंकुर रोहिल्ला का कत्ल करने के लिए आप उसके बंगले में कैसे दाखिल हुए थे। क्योंकि मेन गेट से तो आपने एंट्री नहीं मारी थी।‘‘

गायकवाड़ चुप!

‘‘जिस रिवाल्वर से आपने अंकुर रोहिल्ला का कत्ल किया था वो अब कहां है?‘‘

गायकवाड़ चुप!

‘‘मंदिरा चावला को कैसे जानते थे आप!‘‘

सवाल रिपीट होने शुरू हो चुके थे।

‘‘मैं मांग करता हूं कि मुझे एक वकील का इंतजाम करने दिया जाय! अब मैं जो कुछ भी कहूंगा अपने वकील के सामने कहूंगा।‘‘

जवाब मेें वहां मौजूद तमाम पुलिसिए जोर से हंस पड़े, मुस्कान तो एसीपी के होंठों पर भी उभरी थी, जिसे उसने फौरन छिपा लिया।

‘‘लगता है हॉलीवुड की मूवी कुछ ज्यादा ही देख ली है तूने! भूल गया कि ये इंडिया है! - आखिरकार तिवारी बोल पड़ा - अगले पांच-छह दिनों तक तो हम तेरी गिरफ्तारी की हवा भी नहीं लगने देंगे किसी को! वकील करने देना तो दूर की बात है।‘‘

‘‘मैं तुम सब की शिकायत करूंगा, देख लेना तुम लोग‘‘ - गायकवाड़ रोआंसे स्वर में बोला - मुझे बेवजह हलकान करने का खामियाजा तो तुम लोगों को भुगतना ही पड़ेगा।‘‘

‘‘स्साले पहले तू अपनी खैर मना, आगे की तेरी तमाम जिंदगी जेल में कटने वाली है, फिर बुढ़ापे में बाहर आने के बाद तुझसे जो बन पड़ता हो बिगाड़ लेना हमारा।‘‘

जवाब में गायकवाड़ केवल कसमसा कर रह गया।
 
‘‘अब बता मंदिरा का कत्ल क्यों किया तूने।‘‘

‘‘इसलिए किया, क्योंकि मुझपर कत्ल करने का दौरा पड़ता है - इस बार गायकवाड़ लगभग चीखता हुआ बोला - मैंने ही मारा है अपनी बीवी को, मंदिरा का कत्ल भी मैंने ही किया है, अंकुर और रंजना को भी मैंने ही गोली मारी थी। तुम सबको भी मैं जिंदा नहीं छोड़ने वाला। जो बिगाड़ सकते हो बिगाड़ लो मेरा। क्या करोगे ज्यादा से ज्यादा मुझे हवालात में बंद करके मुझपर थर्ड डिग्री आजमाओगे! तो आजमाते क्यों नहीं। उसके अलावा तुम लोगों को आता ही क्या है।‘‘ कहकर इस बार वो हौले से सिसक उठा।

मगर उसके प्रलाप का असर वहां किसी पर नहीं पड़ा, ऐसी नौटंकियां उनके लिए रोजमर्रा की बात थी।

‘‘क्यों किया, अपनी बीवी के अलावा बाकी लोगों का कत्ल क्यों किया आपनेे?‘‘ एसीपी पूर्ववत् धैर्य के साथ बोला।

‘‘अब मैं एक शब्द भी नहीं बोलने वाला, जो बोलूंगा कोर्ट में बोलूंगा। तुमने अभी तोता रटंत बनाने की बात कही थी! अब मैं खुद तुम्हें चायलेंज करता हूं कि अगर बना सको तो बना लो।‘‘

कहकर उसने अपने होंठ सख्ती से भींच लिए।

‘‘हमारे पास बहुत वक्त है गायकवाड़ साहब! अभी आपने हमारी खातिरदारी देखी कहां है! देखते हैं आपमें जुल्म सहने की ताकत ज्यादा है या पुलिस में जुल्म करने की ताकत ज्यादा है।‘‘ - कहकर तिवारी ने एसीपी की तरफ देखा फिर बोला - ‘‘क्या करना है साहब इसका।‘‘

‘‘कितने साल से हो पुलिस की नौकरी में।‘‘

‘‘जी पांच साल होने को हैं।‘‘

‘‘फिर भी तुम्हे ये बताने की जरूरत है कि क्या करना है। कुछ भी करो! मगर कल सुबह दस बजे जब मैं यहां आऊं, तो मुझे इन साहब की जुबान खुली हुई मिलनी चाहिए।‘‘

एसीपी का बदला हुआ लहजा सुनकर गायकवाड़ के चेहरे पर हवाइयां उड़ने लगीं। उसकी सूरत से साफ जाहिर हो रहा था कि अब वो किसी भी वक्त अपना किया-धरा बयान कर देने वाला था। वैसे भी वो कोई आदी मुजरिम तो था नहीं, लिहाजा उसका टूट जाना महज वक्त की बात थी।

तिवारी ने वहां खड़े पुलिसियों को इशारा किया तो वे लोग गायकवाड़ को लगभग घसीटते हुए वहां से लेकर बाहर निकल गये।

‘‘आज की रात उसे कोई बड़ा ट्रीटमेंट देने की जरूरत नहीं है तिवारी जी - एसीपी बोला - सभ्य आदमी है, मुझे उम्मीद है रात भर हवालात में रहेगा तो वैसा ही टूट जायेगा। नहीं टूटा तो कल की कल देखेंगे।‘‘

‘‘जी जनाब!‘‘ तिवारी तत्पर स्वर में बोला।

‘‘गोखले! - एसीपी मुझसे मुखातिब हुआ - वैसे तो हम तुझे बाहर का आदमी समझते ही नहीं हैं, फिर भी इतना जरूर कहूंगा, कि इसकी गिरफ्तारी की बाबत अभी खामोश रहना।‘‘

मैंने सहमति में सिर हिला दिया।

उसके बाद वो मीटिंग वहीं समाप्त हो गयी।

सात जून 2017

मोबाइल की निरंतर बजती घंटी ने मुझे सोते से जगाया। मैंने वॉल क्लाक पर निगाह डाली तो पाया आठ बजने को थे। मैं अलसाया सा उठकर बैठ गया।

मोबाइल पर तिवारी का नंबर फ्लैश हो रहा था। मैंने तत्काल काल अटैंड की।

‘‘तिवारी साहब प्रणाम!‘‘

‘‘जीते रहो भई, लगता है अभी तक सो रहे हो।‘‘

‘‘जी था तो कुछ ऐसा ही।‘‘

‘‘मजे हैं भई तुम्हारे, यहां तो चार घंटे की नींद भी मयस्सर नहीं हुई।‘‘

‘‘जनाब सब कुशल-मंगल तो है।‘‘

‘‘अभी तक तो है ही, आगे देखते हैं।‘‘

‘‘आपके मुजरिम ने कुछ बककर दिया या नहीं।‘‘

‘‘ऐसे भला कौन बककर देता है गोखले, ढंग से इंटेरोगेट तो करने ही नहीं दिया साहब ने, वरना मैं तो कल रात एसीपी साहब के सामने ही उसका गुनाह कबूल करवा लेता।‘‘

‘‘कसर ही क्या रह गई थी!‘‘

‘‘ठीक कहते हो, थोड़ा ट्रीटमेंट और मिला होता तो कल रात ही सारा मामला साफ हो गया होता।‘‘

‘‘मगर यूं लिए गये बयान की क्या अहमियत होती जनाब, वो कोर्ट में पहुंचकर मुकर जाता तो! आखिर ऐसा आम होता रहता है।‘‘

‘‘भई हम उसके बयान के आधार पर कोई सबूत भी तो इकट्ठा करते, यूंही थोड़े उसे जज के सामने ले जाकर खड़ा कर देते। अभी भी कम से कम रंजना के कत्ल वाले मामले में तो हमारे पास उसके खिलाफ सबूत है ही।‘‘

‘‘हां सो तो है।‘‘

‘‘वो तुमसे मिलना चाहता है, कहता है उसने जो बताना है वो सिर्फ और सिर्फ तुमको बतायेगा, वरना भले ही हम उसकी हड्डी-पसली एक कर दें वो जुबान नहीं खोलेगा।‘‘

‘‘ऐसे भला कोई जुबान बंद रख सकता है।‘‘

‘‘नहीं रख सकता, मगर ये बात उसे कौन समझाये। फिर एसीपी साहब ने कहा है कि - घी सीधी उंगली से निकलता हो तो उंगली टेढ़ी करने वाला बेवकूफों की श्रेणी में गिना जाता है - फिर गोखले तो अपना आदमी है, मुजरिम उसे कुछ बताये या हमें बताये, एक ही बात है।‘‘

‘‘जनाब एक घंटे में पेश जाऊंगा मैं आपके हूजूर में, कोई और हुक्म हो तो बताइए।‘‘

‘‘हुक्म नहीं है भई इल्तिजा है दिल्ली पुलिस की तुमसे, एक घंटे में ना सही दस बजे तक तो पहुंच ही जाना।‘‘

‘‘आपका हुक्म सिर आंखों पर जनाब।‘‘

जवाब में उसने कॉल डिस्कनैक्ट कर दी।

सच कहता हूं साहबान! पुलिसवालों की मीठी-मीठी जुबान सुनकर मेरे अंदर कुछ होने सा लगता है। बजाय रिक्वेस्ट करने के अगर उसने सीधा हुक्म दनदना दिया होता कि मुझे फौरन थाने पहुंचना है, तो वो बात मेरे लिए ज्यादा सहज होती। उसका मैं अब तक आदी हो चुका था। बहरहाल जाना तो था ही, पता नहीं गायकवाड़ अब नया क्या कहना चाहता था। ऐसा क्या था जो वो पुलिस की बजाय सिर्फ और सिर्फ आपके खादिम को बताना चाहता था।
 

Similar threads

S
Replies
14
Views
15
StoryPublisher
S
S
Replies
61
Views
62
StoryPublisher
S
S
Replies
74
Views
75
StoryPublisher
S
S
Replies
108
Views
109
StoryPublisher
S
Back
Top