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Thriller फरेब

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“हमारे फोन का इंतजार करना है। आगे तुम्हें क्या करना है, बता दिया जायेगा।” कह कर फोन काट दिया गया।

राहुल के चेहरे पर बेचैनी के भाव बढ़ने लगे।

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पाँच एकड़ में फैला हुआ एक शानदार फार्म हाउस, जो चारों तरफ से सीमेन्ट के बाउण्डी वाल से घिरा हुआ था। चारों ओर हरियाली फैली हुई थी। बीच में शानदार बँगला बना हुआ था। चारों तरफ सौंफ की फसल लहरा रही थी। बड़ा ही मनोरम दृश्य था, तभी फार्म हाउस के बाहर एक शानदार कार आकर रूकी। ड्राइवर ने चौकीदार से बात की। चौकीदार ने इन्टरकॉम पर बात कर लोहे का भारी गेट खोल दिया। कार तेजी से भीतर आकर पोर्च में रुक गयी। कार के अन्दर से देसाई बाहर निकला। उसने धूप का चश्मा उतारकर जेब में रख लिया और बँगले के अन्दर आया। अन्दर कमरे में स्वास्थ्य मंत्री सुन्दर लाल अवस्थी बैठे थे। उसे देखकर बोले “आओ देसाई, बैठो। मैं तुम्हारा ही इंतजार कर रहा था।”

“कहिये नेताजी, कैसे याद किया?” देसाई ने सोफे पर बैठते हुए कहा।

“क्या लोगे देसाई, ठंडा या गरम?” नेताजी बोले।

“कुछ भी पिला दो नेताजी, जो आपको पसंद हो।” देसाई ने मुस्करा कर कहा।

“तुम्हारी यही जिन्दादिली हमें पसंद है देसाई।” नेताजी बोले।

उन्होंने नौकर को आवाज लगाई, “लल्लू!, जल्दी से एक बोतल और दो गिलास का इंतजाम कर और खाने की भी व्यवस्था कर।” कहकर नेताजी ने देसाई की तरफ देखा।

“ठीक है न।”

देसाई की गर्दन सहमति में हिली।

“खान के क्या हाल चाल हैं?” पेपर वेट से खेलते हुए मंत्रीजी बोले।

“खान आजकल ज्यादा ही हवा में उड़ रहा है।” देसाई ने कहा।

“अब नहीं उड़ पाएगा, इसलिये तो तुमको यहाँ बुलाया है।” नेताजी ने दाँत भींचकर कहा।

“आपकी खान से क्या दुश्मनी हैं नेताजी?” देसाई ने पूछा।

“तुम मेरे बेटे सुमित अवस्थी को तो जानते होगे देसाई?” नेताजी बोले।

“यह भी कोई कहने की बात है नेताजी, सुमित अवस्थी को कौन नहीं जानता नेताजी। कुछ दिन पहले ही तो उसकी हत्या हो गयी थी।” गंभीर स्वर में देसाई बोला।

“अब तुम्हें राज की बात बताता हूँ देसाई। मैं ओर खान पार्टनर थे। मेरी तरफ से मेरा धन्धा सुमित संभालता था। मुझे लगता है सुमित के मर्डर के पीछे खान का हाथ है।” कठोर स्वर में नेताजी बोले। उनका चेहरा गुस्से के कारण लाल हो गया था।

“क्या कह रहे हैं आप?” देसाई चौंक कर हैरानी से बोला।

“मुझे पूरा यकीन ही नहीं, पक्का विश्वास भी है कि खान कहीं ना कहीं, सुमित के मर्डर से जुड़ा हुआ है।” विश्वास भरे स्वर में नेताजी बोले।

“यह अगर खान ने किया है, तो बहुत गलत किया है।” देसाई नेताजी के चेहरे को देख कर बोला।

“खान को इसकी कीमत चुकानी पड़ेगी देसाई।” नेताजी का स्वर अचानक क्रूर हो गया। उनके जबड़े भींच गये।

देसाई ने सहमकर नेताजी को देखा। तभी नौकर दो गिलास और एक बोतल के साथ वापस आया। ट्रे में भुने हुए काजु ओर नमकीन की प्लेट रखी हुई थी। नौकर प्लेट रख कर चला गया।

“हमारा मिशन खान को तबाह करना है।” नेताजी ने पैग बनाते हुए कहा।

“खान का कारोबार काफी फैला हुआ है और हमारे पास तो कुछ भी नहीं नेताजी।” देसाई चिन्ता भरे स्वर में बोला।

“अब तुम पर हमारा हाथ है देसाई। चिन्ता मत करो।” काजू का एक पीस मुँह में डाल कर नेताजी बोले।

“तब तो अब खान की बर्बादी के दिन शुरु हो गये।” देसाई बोला।

“खान पर दो तरफा अटैक होगा। एक तो हम उसे जीने नहीं देंगे, दूसरी तरफ पुलिस उसके पीछे कुत्ते की तरह लग जायेगी। मैंने इस बारे में कमिश्नर से भी बात कर रखी है।” गिलास टेबल पर रख कर नेताजी बोले।

“मैंने भी कुछ इंतजाम किये हैं, उसकी नैया डुबाने के लिये।” व्यंग्य से देसाई बोला।

नेताजी ने सोफे से पहलू बदला और कहा, “देसाई खान के बाद सत्ता तुम्हें ही संभालनी है।” नेताजी के चेहरे पर मुस्कान आ ठहरी।

“लेकिन सरताज तो आप ही रहेंगे।” लम्बी साँस लेता हुआ देसाई बोला।

“नाम तुम्हारा और काम हमारा। यह तो होना ही है देसाई। अवस्थी जो ठान लेता है, वह करके ही मानता है।” जहरीली मुस्कान के साथ नेताजी बोले।

“खान की बर्बादी में जो भी खर्चा आयेगा, हम उठायेंगे। रुपए-पैसे की चिन्ता ना करो। साधारण स्वर में नेताजी बोले।

“ठीक है नेताजी। अब मुझे इजाजत दीजिये। काफी देर हो गयी है।” नेताजी ने सहमति से गर्दन हिला दी।

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दरवाजे पर आहट और किसी के बोलने की आवाज सुनकर चंद्रेश की नींद खुल गयी। उसने घड़ी की तरफ नजरें घुमाई। रात के डेढ़ बज रहे थे। हर तरफ सन्नाटा छाया हुआ था। चंद्रेश ने इसे अपना वहम समझा और करवट बदल कर लेटने का प्रयास किया।

अचानक धीमे स्वर में बात-चीत की आवाज उसके कानों में पड़ी। वह उठ खड़ा हुआ। आवाज कमरे के बाहर से आ रही थी। उसने दरवाजे को धक्का दिया। बिना आवाज किये दरवाजा खुल गया। चंद्रेश बाहर आया और दीवार के पास आकर खड़ा हो गया। बाहर की तरफ कान लगाकर आहट सुनने लगा।

बैठक में लाल रंग का बल्व जल रहा था। उसका प्रकाश बहुत कम था, फिर भी सब चीज स्पष्ट दिखायी दे रही थी। उसकी दृष्टि सोफे पर गयी। वहाँ सागर और वंशिका बाँहों में बाहें डाले बैठे थे। चंद्रेश ने व्यंग्य भरी नज़रों से दोनों को देखा और मन ही मन कह उठा, “ये है भाई-बहन का प्यार।”

उसके चेहरे पर गुस्से के भाव आ गये। वह दोनों के सामने आना चाहता था, फिर अचानक उसने विचार त्याग दिया और उनकी बातें सुनने लगा।

वंशिका आलथी-पालथी मार कर सोफे पर बैठ गयी और सागर उस की गोद में सिर रख कर लेट गया। वंशिका सागर के सिर के बालों पर अंगुली फेरने लगी।

अचानक ही सागर बोल उठा, “तुम चंद्रेश का किस्सा हमेशा के लिये खत्म क्यों नहीं कर देती?”

“सोच तो मैं भी रही हूँ।” वंशिका ने जवाब दिया।

“लेकिन मर्डर इस तरह करना है कि किसी को पता ना चले।” सागर बोला।

“अब तो पुलिस को भी यह विश्वास हो गया है कि मैं ही असली वंशिका हूँ।”

“जो भी कदम उठाना सोच समझ कर उठाना।” सागर बोला।

“लगना चाहिये कि नेचुरल मौत मरा है, नहीं तो अपनी चाल पीट जायेगी।” धीमे स्वर में वंशिका बोली।

“चिन्ता मत करो। मेरे पास ऐसा जहर है, जिसका असर ऐसा होगा कि डाक्टर को भी हार्टअटैक ही लगेगा। दो घण्टे तक आदमी पर जहर का असर नहीं होगा।”

“क्या बात है, जब वह ऑफिस चला जायेगा, तो वहाँ असर करेगा। कोई हम पर शक भी नहीं करेगा।” वंशिका ने हँसते हुए कहा।

“सागर, तुम भी ग्रेट हो।” वंशिका बोली।

“ऐसा मत कहो, कहीं उसने सुन लिया, तो बोलेगा कैसे शुभ विचार है मेरी धर्मपत्नी के।” व्यंग्य से सागर ने कहा।

“तुम चिन्ता मत करो। मैं गहरी नींद में छोड़ कर आयी हूँ।” सागर के गाल पर किस करती हुई वंशिका बोली।

“तो कल कॉफी में तुम चमत्कार दिखा देना।” सागर के होठों से निकला।

“कल का दिन उसकी जिन्दगी का आख़िरी दिन होगा और हमारे लिये आजादी का पहला दिन।” वंशिका ने खुश होकर सागर के मुँह पर किस की बरसात कर दी।

चंद्रेश ने दोनों की बात सुनी और धीरे से वापस अपने कमरे में आ गया। उसका चेहरा गुस्से से लाल हो गया। उसने सोचा ठीक हुआ जो भगवान ने सही टाइम पर आँख खुलवा दी, नहीं तो कल इनका प्लान कामयाब हो जाता। वह बिस्तर पर लेट गया। उसकी आँखों से नींद उड़ गयी। वह इनके प्लान की काट सोचने लगा। अब उसे किसी पर भी भरोसा नहीं रहा, जो कुछ करना था, उसे ही करना था।

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सुबह के साढ़े आठ बज रहे थे। चंद्रेश ने बिस्तर छोड़ा, पता नहीं कब सोचते-सोचते उसकी आँख लग गयी थी। उसकी आँखें पूरी तरह से लाल थी। ऐसा लग रहा था जैसे नींद उस पर हावी हो रही है। वह बेडरूम का दरवाजा खोल कर बाहर बैठक रूम में आया। वह भी खाली पड़ा था। बाहर गार्डन से दोनों के किसी बात पर हँसने की आवाज आ रही थी। वह गार्डन में पहुँचा। चारों तरफ धूप बिखरी हुई थी। सर्दी में धूप भली लग रही थी। दोनों के चेहरे देख कर लग नहीं रहा था कि ये वही दोनों हैं, जो रात को खतरनाक योजना बना रहे थे। चंद्रेश ने मन ही मन कहा चढ़ जा बेटा सूली पर, कुछ कर दिखाने का मौका आ गया है।

“जाग गये आप?” वंशिका ने उसे देख कर मीठे स्वर में कहा।

“क्या हो रहा है डुप्लीकेट साले साहब? रात कैसे बीती?” व्यंग्य भरी नजर सागर पर डाल कर चंद्रेश ने कहा।

“अपने ओरिजनल जीजाजी को टपकाने का प्लान बना रहे थे।” अपनी पुरानी सदाबहार टोन में सागर आ गया।

वंशिका ने चौंक कर सागर की तरफ देखा।

“तो हमारी नकली बीवी का भी हमारे बारे में यही विचार होगा?” नकली उबासी लेते हुए चंद्रेश ने कहा।

“यह क्या बकवास शुरु कर दी आप दोनों ने सुबह-सुबह?” वंशिका गुस्से में चंद्रेश और सागर की तरफ देख कर बोली।

“वाह दीदी आप भी। अभी तो हमारे जीजाजी के मन में यही विचार आ रहा होगा कि हम इन्हें टपकाने का प्लान बना रहे हैं।” व्यंग्य से सागर बोला।

“तुम दोनों बैठो मैं तुम दोनों के लिये कॉफी बना कर लाती हूँ।” वंशिका ने उठते हुए कहा।

“वाह हमारी बीवी को हमारी चिन्ता भी है।” व्यंग्य भरे स्वर में मल्होत्रा बोला।

“पत्नी अपने पति की चिन्ता ना करेगी तो क्या मेरी करेगी “ हंसते हुए सागर बोला।

“मेरी तो कुछ भी नहीं, तुम्हारी तो बहन ही है ना, या कुछ और भी है।” चंद्रेश बोला।

उसकी निगाह सागर से टकराई। सागर ने निगाह हटाने की कोशिश नहीं की।

“जीजाजी तो हमारे अन्तरयामी हैं, जो रिश्तों की भविष्यवाणी कर देते हैं।” सागर ने मुस्करा कर कहा।

“यह क्या फालतू के बहस कर रहे हैं आप लोग?” वंशिका सागर को घूरते हुए बोली।

“क्या जुगलबन्दी है भाई-बहन की?” चंद्रेश ने मुँह बिगाड़ते हुए गुस्से से कहा।

“आपको आज ऑफिस के लिये देरी नहीं हो रही।” वंशिका ने चंद्रेश की तरफ देखते हुए कहा।

“हमारी नकली बीवी को हमारी बहुत फिक्र हो रही हैं आज।” चंद्रेश के शब्दों में व्यंग्य झलका।

“आप भले मुझे अपनी बीवी न माने पर मैं तो आपको अपना पति मानती हूँ।” वंशिका मुँह बना कर बोली।

“ठीक है भाई, नकली बीवी के हाथ की कॉफी तो पी ली जाये। हम स्नान कर के आते हैं।” कहकर चंद्रेश बाथरूम में घुस गया।

उसके जाते ही वंशिका सागर पर चढ़ दौड़ी, “तुमने भाँग खा रखी है क्या?”

“क्यों, क्या हुआ?” सागर ने सवाल पूछा

“ये क्या बोल रहे थे तुम, जीजा को टपकाने का प्लान बना रहे थे।” वंशिका गुस्से में बोली।

“यार तुम समझती नहीं हो, मैं उससे मजाक नहीं कर सकता क्या? और सीरियस रहता, तो उसे हमारे प्लान की भनक भी लग जाती।” कहकर उसने वंशिका का हाथ पकड़ लिया।

“क्या कर रहे हो तुम? कोई देख लेगा तो?” वंशिका गुस्सा दिखाती हुई बोली।

सागर ने उसे देखा और कहा, “तुम्हें देख कर खुद पर काबू नहीं रख पाता ये दिल।” सीने पर हाथ रख कर सागर रोमाटिंक स्वर में बोला।

“प्लान तो वही है न, या चेन्ज कर दिया?” वंशिका उखड़े स्वर में बोली।

“कोई चेन्ज नहीं सेम टू सेम, मैं भी तैयार होकर आता हूँ।” सागर ने उठते हुए कहा।

चंद्रेश तैयार हो कर आया तो देखा कि वंशिका कॉफी के कप में कुछ गोलियाँ डाल कर हिला रही है। चंद्रेश ने छुप कर सारा दृश्य देखा, फिर गुनगुनाता हुआ गार्डन में पहुँचा। तीन कप कॉफी के तैयार थे। चंद्रेश आकर एक चेयर पर बैठ गया और वंशिका को देखने लगा।

“ऐसे क्या देख रहे हो?” वंशिका साधारण स्वर में बोली।

“खूबसूरत तो तुम हो नकली बीबीजी, लेकिन मेरी वंशिका की तरह सीधी नहीं हो।” चंद्रेश बोला।

वंशिका ने उसकी तरफ कॉफी का कप बढ़ाया।”अब असली समझो या नकली, रहना तो मेरे साथ ही है।” कॉफी का कप चंद्रेश के हाथ में देती हुई वंशिका बोली।

“शायद नकली बीवी को मालूम ना हो, मैं कॉफी में चीनी ऊपर से डाल कर पीता हूँ।”

“अभी लेकर आती हूँ।” वंशिका ने उठ कर जाते हुए कहा।

वह अपना कप उठा कर सिप करती हुई चली गयी। अब टेबल पर दो ही कप थे। एक सागर का दूसरे उसके हाथ में। उसने तुरन्त कॉफी का कप चेन्ज कर दिया। अब गोलियो वाला कप टेबल पर रखा था और उसके हाथ का कप वह धीरे-धीरे हिला रहा था। तभी वंशिका एक हाथ में चीनी की प्लेट उठा कर ले आयी।

चंद्रेश ने चीनी कप में डाल कर हिलाते हुए बोला “ऊपर से चीनी पीने का मजा ही कुछ और है।”

इतने में सागर भी तैयार होकर आ गया और एक चेयर पर बैठ गया। उसने कॉफी का मग उठाया और धीरे-धीरे सिप करने लगा। उसने वंशिका की तरफ देखा। वंशिका का सिर सहमति से हिला। दोनों का आँखों आँखों में इशारा हुआ।

“नकली साले और बीवी के साथ कॉफी पीने का मजा ही कुछ और हैं।” व्यंग्य भरे स्वर में चंद्रेश ने दोनों को देख कर कहा।

तीनों ने कॉफी पीनी शुरू कर दी।

“लगता है यह जगह तुम्हें कुछ ज्यादा ही पंसद आ गयी। टलने का नाम ही नहीं ले रहे हो।” शांत स्वर में चंद्रेश ने कहा।

“लगता है आप मुझे भगा कर ही छोड़ेंगे।” हँसते हुए सागर ने कहा।

“सागर अभी कही नहीं जायेगा।” दृढ़ स्वर में वंशिका ने कहा।

“मैं तो यह सोच कर आया था कि जल्द यहाँ से सबसे मिलकर चला जाऊँगा, पर यहाँ का माहौल देखकर लगता है अभी मेरी जरूरत यहाँ ज्यादा हैं।” गहरी सांस लेता सागर बोल पड़ा।

“याराना गहरा लगता है।” मन ही मन बुदबुदाते हुए चंद्रेश बोला।

“आप कुछ कह रहे थे।” उसकी तरफ देखते हुए वंशिका बोली।
 
सागर की निगाहें भी चंद्रेश की तरफ उठ गयी।

“नकली साले साहब, आप जोक्स अच्छा सुनाते हो। आज तो हमारी भी सुनने की इच्छा है।” चंद्रेश ने कोट टेबल पर रखते हुए कहा।

सागर ने अचरज भरी निगाहों से चंद्रेश को देखा।

“क्या हो गया आज, आपको ऑफिस नहीं जाना क्या?” वंशिका बोली।

“आज मौसम खुशनुमा है। ऑफिस जाने की इजाजत नहीं देता। हमारे नकली साले साहब के चुटकले में बहुत जान है। कल हम समझ नहीं पाए, पर आज आपका टेलेन्ट जरूर देखेंगे। सुनाइये न जोक्स।”

“यह क्या बकवास ले बैठे सवेरे-सवेरे।” वंशिका क्रोधित स्वर में बोली।

“आज हमारा चुटकला सुनाने का मूड नहीं है।” कह कर सागर ने उठना चाहा, तो चंद्रेश ने उसका हाथ पकड़ लिया।

“एक तो सुना कर जाओ हरदिल अजीज मि . सागर साहब।”

सागर ने वंशिका को देखा उसके चेहरे पर हैरत के भाव थे।

सागर पुनः कुर्सी पर धड़ाम से बैठ गया और अपनी पुरानी सदाबहार टोन में बोला, “आप भी याद रखोगे जीजाजी, किस साले से पाला पड़ा है। तो सुनिए, तङकता-भडकता हुआ जानदार चुटकला।” वंशिका के चेहरे पर खुशी के भाव ना आ सके।

“एक बार कवि सम्मेलन में एक कवि हास्य रस की अच्छी-अच्छी कविता सुना रहा था। उसने देखा सब आदमी ताली बजा रहे हैं, पर एक आदमी ताली नहीं बजा रहा। वह शांत भाव से बैठा कविता सुन रहा था। जब कवि से न रहा गया, तो वह उस आदमी के पास गया, बोला, भाई साहब, आपको प्रोग्राम में मजा नहीं आ रहा है क्या? आप ताली क्यों नहीं बजा रहे हैं? वह आदमी बोला, मजा तो खूब आ रहा है, पर ताली क्यों बजाऊँ, अमीर आदमी हूँ। ताली बजाने के लिये आदमी रखे हुए हैं। कवि चुपचाप चला गया। थोड़ी देर में कवि ने सब को हँसा-हँसा के लोट-पोट कर दिया। सब आदमी हँस रहे थे। केवल वही आदमी शांत बैठा था। कवि फिर उस के पास गया। बोला, भाई साहब, सब हँस रहे हैं। आप क्यों नहीं हंस रहे हैं? आदमी ने वापस कवि को जबाव दिया, मैं क्यों हँसूं? अमीर आदमी हूँ हँसने के लिये आदमी रखे हुए हैं। कवि अपना-सा मुँह लेकर चला गया। आठ-दस दिन बाद वही सज्जन कवि को रास्ते में मिल गये। उन के हाथ में मेंहंदी लगी हुई थी। कवि ने पूछा, यह क्या? आपकी शादी हुई है। तो वह बोला हाँ, तो क्या? कवि ने कहा आपकी नई-नई शादी हुई है और आप यहाँ घूम रहे हैं हनीमून के लिये नहीं गये क्या? तो सज्जन ने कहा, मैं क्यों जाऊँ अमीर आदमी हूँ। हनीमून पर जाने के लिये आदमी रखे हुए है। यह कहकर सागर हँसने लगा। वंशिका के चेहरे पर कोई प्रतिक्रिया नहीं दिखी। चंद्रेश के चेहरे पर मुस्कान आ कर लुप्त हो गयी।

“और चुटकले सुनना चाहोगे जीजाजी?”

“बस नकली साले साहब अब हम रेस्ट करेंगे। कोट उठा कर कन्धे पर डाल कर चंद्रेश उठ खड़ा हुआ।

“अब आप लोगों से एक ही बात कहना चाहता हूँ। डोन्ट डिस्टर्ब मी।” कहकर वह अपने कमरे में चला गया और अन्दर से सिटकनी बन्द कर दी।

“यह क्या हो गया?” सागर को कोहनी मारते हुए वंशिका बोली।

“क्या हुआ, कुछ नहीं हुआ, जो चीज ऑफिस में होती, अब वह यहाँ होगी। केवल दृश्य बदल जायेगा।” सागर बन्द दरवाजे को देखता हुआ बोला।

वंशिका के चेहरे पर चिंता के भाव फैले हुए थे। जबकि सागर के चेहरे पर सोच के भाव थे।

धीरे-धीरे वक्त बीतने लगा।

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घड़ी में साढ़े ग्यारह बज रहे थे। धूप पूरी तरह निखर गयी थी। धूप भली लग रही थी। तभी सागर के गले में कुछ होने लगा। उसने अपना गला पकड़ा और जोर-जोर से सिर हिलाने लगता। कभी पेट पकड़ता उसके चेहरे पर पीड़ा के भाव थे। तभी चंद्रेश के बैडरूम का दरवाजा खुला। चंद्रेश ने बाहर कदम रखा। स्थिति का जायजा लिया। सागर और वंशिका के चेहरों को देख कर वह सोफे पर बैठ गया। उसने सिगरेट सुलगाई और बोला, “कहानी का एक्टर, राइटर, डायरेक्टर आपके सामने अपना सिर झुकाता है।” वंशिका ने चिहुँक कर चंद्रेश को देखा। चंद्रेश ने सागर को देखा।

“लगता है ऊपर बैठा यमराज भी हमारे सागर साहब के चुटकले सुनने के लिये बेकरार है।” सागर ने घबराई दृष्टि से चंद्रेश को देखा।

चंद्रेश ने वंशिका और सागर की तरफ देखा और मजे लेते हुए कहा, “साहेबान-कदरदान, कल इस बन्दे ने भाई-बहन के प्यार को अपनी आँखों से देखा। डायलॉग कानों से सुना। वाह, क्या सीन था।”

वंशिका और सागर हैरत भरी नजरों से चंद्रेश को देखने लगे।

“कहानी वही, सीन वही, किरदार वही, बस कॉफी का कप चेन्ज हो गया था।” मुस्कराकर चंद्रेश ने कहा। सागर ने घबराई दृष्टि से चंद्रेश की तरफ देखा। वंशिका का मुँह हैरानी से खुला रह गया।

“कॉफी तब चेन्ज की, जब मैडम चीनी लेने गयी हुई थी। एक तो मीठी कॉफी, ऊपर से मैडम को दिखाने के लिये दो चम्मच ज्यादा पीनी पड़ी। कॉफी शरबत बन गयी, फिर भी मजबूरी में पीनी पड़ी। थोड़ी मीठी कॉफी पीने से जान तो बच गयी।”

चंद्रेश सोफे से उठकर चहल-कदमी करने लगा। जैसे वह किसी रियासत का राजकुमार है और गंभीर मसले पर सोच रहा है।

“यह तूने क्या किया कमीने?” सागर की आँखें बाहर आ गयी और वह छाती पकड़ कर तड़पने लगा। वंशिका उसके पास आ गयी और रोने लगी।

“ऐसा नहीं हो सकता जानू, तुम मुझे छोड़ कर नहीं जा सकते।” वंशिका जोर-जोर से रोने लगी।

“वाह, क्या सीन है। भैया जानू हो गया। दिन में भैया और रात में सैंया।” वंशिका ने उस की तरफ ध्यान नहीं दिया।

अचानक सागर वंशिका का हाथ छोड़ कर सोफे के पास फर्श पर गिर पड़ा। वंशिका बैठ कर रोने लगी।

“अब आयेगा कहानी में नया मोड़।” चंद्रेश ने जेब से सिगरेट का पैकेट निकालकर सिगरेट सुलगाते हुए कहा, “देखता हूँ नागिन, कि भाटी और निरंजन कैसे मेरी बात का यकीन नहीं करते। बन्द कर अपना यह रोने-धोने का नाटक।” चंद्रेश ने गुर्राते हुए कहा वंशिका ने गुस्से से चंद्रेश को देखा और सागर को पकड़ कर रोने लगी।

“जैसा कर्म करोगे, वैसा फल देगा भगवान।” कहता हुआ वह बैठक से बाहर गार्डन में आ गया। उसने अपनी कार निकाली और पुलिस स्टेशन की तरफ बढ़ा दी।

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शानदार आलीशान बँगले के बैठक रूम में 80 इंची एलईडी टी.वी. टंगा हुआ था, जिस पर आज तक चैनल लगा हुआ था। अयूब खान बड़े ध्यान से बैठा न्यूज देख रहा था। अचानक दो दादा किस्म के व्यक्ति भीतर आये। उनमें से कोई भी शक्ल से सभ्य नहीं दिखायी दे रहा था। उनको देखकर अयूब खान ने रिमोट से टी.वी. बन्द कर दिया।

दोनों की तरफ देख कर समान्य स्वर में बोला, “कहो क्या खबर लाये हो?” दोनों की नज़रें झुक गयी।

एक बोला, “सर हमने हर जगह तलाश किया पर रंगा और बिल्ला कही नहीं मिले।” उसके स्वर में डर के भाव थे।

“जैसी तुम दोनों की मनहूस सूरत है, वैसे ही मनहूस खबर लाये हो।” कठोर स्वर में खान बोला। उसने जहरीली नजरों से दोनों को घूरा। दोनों काँप के रह गये।

“खान साहब, वे दोनों ऐसे नहीं हैं कि बीच में काम छोड़कर गायब हो जाएँ।” दोनों में से एक ने डरते हुए कहा।

“राहुल मकरानी बड़ी कुत्ती चीज है। रंगा-बिल्ला को गायब करने में जरूर मकरानी का हाथ है। रंगा- बिल्ला ऐसे ही किसी के वश में आने वाले नहीं।” दाँत भींच कर खान बोला।

“खैर तुम लोग जाओ, तुम्हारे बस की बात नहीं। मैं देखता हूँ क्या हो सकता है?” खान बोला।

दोनों जैसे आये थे, वैसे ही चले गये। खान ने अपनी जेब से मोबाइल निकाला और राहुल मकरानी को फोन लगाने लगा। थोड़ी देर रिंगटोन बजती रही, किसी ने फोन नहीं उठाया। गुस्से में खान ने मोबाइल सोफे पर फेंका। उठ कर दाँत भींच कर बोला, “तेरे दिन पूरे हो गये मकरानी।” थोड़ी देर सोचने के बाद उसने अपनी गर्दन को सहमति से हिलाया और सोफे से मोबाइल उठा कर नम्बर मिलाने लगा।

पहली घण्टी में फोन उठा लिया गया, “खान साहब, कैसे याद किया इस खाकसार को आज।” बड़े अदब से कहा गया।

“बशीर खान, जागृति अपार्टमेंट में राहुल मकरानी नाम का बन्दा रहता है, उसे तुरन्त मेरे सामने पेश करो। आजकल ज्यादा ही हवा में उड़ रहा है।” खूंखार स्वर में खान ने कहा।

“आप कहो तो टपका दें।” बशीर खान दंरिन्दगी से बोला।

“उसकी जरूरत नहीं, जितना कहा जाये, उतना ही करो।” खान ने फोन काट दिया और चहल-कदमी करने लगा।

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आज राहुल मकरानी कुछ ज्यादा ही खुश था। उसने सुबह से किसी को अपना पीछा करते हुए नहीं देखा था। रंगा-बिल्ला तो अचानक ही गायब हो गये थे। वह सब समझ रहा था कि यह देसाई का कारनामा है। उसने बहुत दिनों बाद आजादी की सांस ली। उसे भूख का अहसास हुआ सामने शानदार होटल हिलटाउन नजर आया। उसने सोचा आज यहीं स्वादिष्ट भोजन का आनंद लिया जाये। वह जानता था कि खान चुप बैठने वाला नहीं है, जरुर कुछ न कुछ करेगा, फिर भी वह फ्री-माइंड था। उसने कार का मुंह होटल हिलटाउन की ओर मोड़ दिया।

अचानक उसके मोबाइल की रिंगटोन बजी। उसने स्क्रीन पर नम्बर देखा, तो खान का नम्बर दिखा। उसने घबराकर न तो फोन उठाया, न ही काटा। पूरी रिंग बजने के बाद फोन का बजना बन्द हो गया। होटल हिलटाउन की पार्किंग मे कार पार्क करने के बाद वह मेन गेट पर पहुँचा, तो दरबान ने जोरदार सैल्यूट किया। उसने सहमति से सिर हिलाया और भीतर जाकर एक कुर्सी पर जम गया और लंच का ऑर्डर दिया। उसकी निगाह हर तरफ घूमने लगी। एक टेबल पर जाकर उसकी नजरें ठहर गयी। टेबल पर निशा ओबरॉय बैठी थी और साथ में एक लड़का बैठा हुआ था। दोनों हँस-हँस कर बातें कर रहे थे। उसने वहीं से बैठे-बैठे निशा को फोन लगाया। निशा का मोबाइल बजा। उसने बैग से मोबाइल निकाला स्क्रीन पर राहुल का नाम देखकर वापस मोबाइल बैग में रख दिया।

राहुल मन ही मन बड़बड़ाया, “ कमीनी भाव दिखा रही है।”

उसने फिर ग्रीन बटन दबाया। दोबारा से रिंग होने लगी। निशा ने दोबारा स्क्रीन पर नम्बर देखा और फोन उठा कर बोली, “ हैलो क्या काम है?”

“कहाँ पर हो, मिल सकती हो?” राहुल ने कहा

“मैं तो घर पर हूँ। आज काम ज्यादा है। फिर मिल लेंगे कभी।” निशा ने झूठ बोलते हुए कहा।

“मैं भी तुम्हारे घर पर ही हूँ, बस नजरें उठाकर जरा पीछे देख लो।” व्यंग्य भरे स्वर में राहुल बोला।

निशा ने चिहुँक कर पीछे देखा, राहुल ने अपना हाथ हिलाया और कहर भरी निगाहों से उसे देखा। निशा सकपकाई दृष्टि से उसे देखने लगी।

सामने बैठे लड़के ने उसे देखा, फिर निशा की तरफ देख कर बोला, “कौन हैं ये सज्जन?”

“है एक कमीना, पीछे ही पड़ गया है?” निशा ने उखड़े स्वर में कहा।

“तुम कहो तो, ठीक कर दूं।” तेज स्वर में लड़के ने कहा।

राहुल अपनी कुर्सी से उठा और निशा की टेबल के पास रखी खाली कुर्सी पर बैठ गया। अपने दोनों हाथों की दोनों कोहनियाँ टेबल पर टिकाकर अपना चेहरा हथेलियों पर रखकर निशा की ओर नजरें गड़ा कर बोला।

“ऐसी भी क्या बेरूखी है जानेमन?” रोमांटिक स्वर में राहुल बोला।

“यह क्या बदतमीजी है?” गुस्से से भरे स्वर में लड़का चिल्लाया।

“आपकी तरीफ?” राहुल ने उसे घूरते हुए पूछा।

“अरे तुम दोनों आपस में मत लड़ो। मैं आपस में दोनों का परिचय करा देती हूँ।” निशा ने बीच-बचाव करते हुए कहा, “ये विमल हैं मेरे दोस्त।”’

“और यह राहुल हैं, मेरे पति के दोस्त।” निशा दोनों का परिचय कराते हुए बोली।

“पर यह कौन-सा तरीका है मुलाकात का।” विमल नाराजगी भरे स्वर में बोला।

“हमारा तरीका तो ऐसे ही है, हमारे पास अक्ल नाम की चीज ही नहीं है।” राहुल ने मुस्कराते हुए व्यंग्य भरे स्वर में कहा।

“ठीक है, तो आप लोग बैठो। मुझे इंस्पेक्टर भाटी से काम है। मैं चलता हूँ।” विमल ने गुस्से से कुर्सी छोड़ते हुए कहा।

निशा ने उसे रोकने की बहुत कोशिश की, पर वह नहीं रुका। राहुल को जैसे इन बातों से कोई मतलब नहीं था। उसने जग उठाया और गिलास में पानी डाल कर पीने लगा।

निशा ने गुस्से से राहुल को देखते हुए कहा, “तमीज तो तुम में होगी नहीं।”

“याराना काफी पुराना लगता है।” राहुल ने मजाक भरे स्वर में कहा।

“वह मेरे कॉलेज के जमाने का दोस्त है और कुछ नहीं, लेकिन तुम्हें सफाई क्यों दूँ? तुम कौन होते हो मेरे जाती मामलों में दखल देने वाले।” निशा एक सांस में तेजी से कह गयी।

“वाह, क्या तेवर हैं। झाँसी की रानी लग रही हो।” व्यंग्य भरे स्वर में राहुल मकरानी बोला।

“मैं जा रही हूँ।” गुस्से में कुर्सी छोड़ते हुए निशा ओबरॉय बोली।

“लंच करोगी?” राहुल ने पूछा?”

“आज तुमने कुछ ज्यादा ही लंच करा दिया।” यह कहकर वह चली गयी।

“लगता है आज लंच अकेले ही करना पड़ेगा।” मन ही मन बडबड़ाते हुए राहुल लंच करने लगा।

लंच करते समय उसकी नजर सब तरफ घूम रही थी, पर कोई भी संदिग्ध व्यक्ति उसे हाल में नजर नहीं आया।

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राहुल मकरानी लंच करने के बाद रेस्टोरेन्ट से बाहर निकला और अपनी कार में आ बैठा। कार स्टार्ट कर के आगे बढ़ा दी। वह बहुत खुश दिखायी दे रहा था, क्योंकि अब रंगा-बिल्ला का खौफ उसके मन से निकल चुका था।

उसके सामने एक बख्तरबन्द ट्रक चल रहा था, जिसका पिछला हिस्सा जमीन को छू रहा था। ट्रक के अन्दर से जोर-जोर से टेप चलने की आवाज आ रही थी। राहुल जोर-जोर से हार्न बजा रहा था, लेकिन ट्रक वाला अपनी ही धुन में चल रहा था। राहुल को साईड नहीं मिल रही थी। राहुल ने ट्रक वाले को मन ही मन भद्दी-सी गाली दी और कार की स्टेयरिंग घुमाने वाला ही था, कि तभी कार के दोनों तरफ से एक-एक कार आ गयी। वह कुछ सोच पाता, उससे पहले ही उसकी कार पर किसी ने पीछे से टक्कर मार दी।

अचानक राहुल के मन में विचार आया, खतरा वह कुछ और सोच पाने की स्थिति में ना रहा, क्योंकि पीछे से खतरनाक ढंग से टक्कर पर टक्कर होने लगी। एक जोरदार टक्कर से उसका शरीर सामने विंडोस्क्रीन से टकराया। राहुल के सिर से खून बहने लगा। वह जख्मी हो गया। उसकी कार टक्कर की वजह से सीधा बख्तरबन्द ट्रक के अन्दर आ गयी। धीरे-धीरे बख्तरबन्द का पिछ्ला हिस्सा जमीन से उठ कर अपनी जगह पर वापस आ गया। राहुल की कार बख्तरबन्द के अन्दर पैक हो गयी। कुछ समय शोर शराबे के बाद शान्ति छा गयी। दोनों कारें बख्तरबन्द के बाजू से होती हुई रफ्तार से आगे बढ़ गयी। माहौल फिर से समान्य हो गया। राहुल मकरानी ने अपने आपको किस्मत के हवाले छोड़ दिया। अन्दर अन्धेरा छाया हुआ था। राहुल के सिर के खून ने उसके चेहरे को रंग दिया था। बख्तरबन्द तेज गति से अपनी मंजिल पर बढ़ रहा था।

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एक घण्टा सफर करने के पश्चात राहुल को ट्रक के रुकने का एहसास हुआ। बख्तरबन्द ट्रक के अन्दर राहुल मकरानी घायल पड़ा हुआ था, लेकिन वह समझ गया था कि उसे जबरदस्त योजना के साथ घेरा गया है। उसकी आँखों के आगे खान का चेहरा घूमने लगा। वह समझ गया कि उसकी जान खतरे में फँसी पड़ी है।

अचानक बख्तरबन्द का पिछला हिस्सा खुलने लगा और जमीन से टकरा गया। राहुल मकरानी ने कार बैक की और उसे बख्तरबन्द ट्रक से नीचे उतार दी। कार के नीचे उतरते ही कार को पाँच आदमियों ने घेर लिया। वे घायल राहुल को पकड़ कर एक तरफ चल पड़े।

आगे जाने पर राहुल ने देखा, खान शानदार कुर्सी पर विराजमान उसे ही घूर रहा था। राहुल के चेहरे पर ताजा घाव के निशान बने हुए थे।

“आओ सूरमा।” खान मजाक उड़ाते हुए बोला।

“खान साहब, आपको बुलाना होता तो मुझे कह देते। मैं खुद ही आ जाता। इस तरह जलील करने की क्या जरूरत थी?” राहुल ने दयनीय स्वर में कहा।

“तू बुलाने पर आ जाता? मेरा फोन तो तू उठा नहीं रहा था। तुझे बुलाने का एकमात्र यही तरीका था।” खान गुस्से में बोला।

“मेरी खता क्या है, आपका पैसा मैं जल्द ही लौटा दूँगा।” राहुल धीमे स्वर में बोला।

“वाह! क्या तेवर हैं? तुझे तेरी हैसियत समझानी जरुरी थी। तेरी औकात खान के सामने चींटी के समान है। तू कहीं भी हो दो घंटे के अन्दर मेरे सामने घुटनों पर आ सकता है। देखी अपनी औकात?” खान दहाड़ते हुए बोला।

राहुल ने सहमी नज़रों से उसे देखा।

“रंगा-बिल्ला के गायब होने से तू समझता है, तू खान के कहर से बच जायेगा।” हिंसक निगाहों से घूरता हुआ खान बोला।

राहुल मकरानी समझ गया कि मामला रंगा-बिल्ला के गायब होने से गरमाया है।

“रंगा-बिल्ला गायब हैं?” हैरानी दिखाता हुआ राहुल बोला।

“कुत्ते, नाटक तो ऐसे कर रहा है, जैसे कुछ जानता ही नहीं, बता कहा हैं रंगा-बिल्ला?” खान गुस्से में चिल्लाया।

“क्या कह रहे हो खान साहब? रंगा-बिल्ला को मैंने गायब किया? मेरी इतनी मजाल नहीं हो सकती।”

“वह तो मैं जानता हूँ कुत्ते तेरी औकात नहीं है, मेरे सामने खड़े होने की, लेकिन बता, वह कौन-सी ताकत है, जो मुझसे टकराना चाहती है और तेरा साथ देना चाहती है?” खान कड़वे स्वर में बोला।

“मैं कुछ नहीं जानता खान साहब?” राहुल मिमियाया।

“तू कितना बड़ा कमीना है, मैं सब जानता हूँ। लगता है तेरा इलाज करना ही पड़ेगा।” उसे हिंसक निगाहों से घूरता हुआ खान बोला, “ले जाओ इस कमीने को और जमकर खातिरदारी करो। कोई कमी ना रह जाये। अगर यह वन पीस दिखा, तो तुम वन पीस नहीं दिखोगे।” खान गुस्से में बोला

राहुल भयभीत हो गया। वह थर-थर काँपने लगा। उसके चेहरे पर भय के भाव प्रकट हुए। दो आदमी आये और राहुल को घसीटते हुए ले गये। खान के चेहरे पर फैला गुस्सा धीरे-धीरे कम होने लगा और उसके चेहरे पर समान्य भाव आ गये वह कुछ सोचने लगा।

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रात के नौ बज रहे थे। नेताजी शराब का मजा ले रहे थे। अचानक उनका मोबाइल बजने लगा। उन्होंने स्क्रीन पर नम्बर देखा, तो देसाई का नाम दिखायी दिया। हरे बटन को टच करके नेताजी ने मोबाइल कान से लगाया, “क्यों डिस्टर्ब कर रहा है देसाई?” नेताजी के स्वर में लापरवाही टपक रही थी।

“जल्दी से टी. वी. चालू कीजिये नेताजी।” नेताजी के कानों में देसाई का उत्तेजित स्वर पड़ा।

“क्या आसमान टूट गया?” नेताजी अलसाए स्वर में लापरवाही से बोले।

“टी.वी. स्टार्ट कीजिये नेताजी, आपके पैरों के नीचे से जमीन खिसक जायेगी।”

“ऐसा क्या हुआ देसाई जो तू इतना डरा हुआ है?” व्यंग्य भरे स्वर में नेताजी बोले।

“प्रधान मंत्री जी राष्ट्र के नाम सम्बोधन कर रहे हैं। प्लीज पहले टी. वी. से जुड़िये, मुझसे बाद में भी बात हो सकती है।” कहकर देसाई ने फोन काट दिया।

नेताजी ने मोबाइल बन्द कर टेबल पर रखा और रिमोट उठाकर टी.वी. ऑन किया। चैनल बदल कर आजतक लगाया और देखने लगा। न्यूज चैनल आजतक की न्यूज रीडर कह रही थी, “आज भारत के इतिहास का अनोखा और महत्वपूर्ण दिन है। आज का दिन इंकलाब लायेगा। भारत के माननीय प्रधानमंत्री जी ने घोषणा की है कि आज रात के बारह बजे से पाँच सौ और एक हजार रूपए के नोट लीगल टेन्डर में नहीं रहेंगे। यानि आज रात से पाँच सौ और एक हजार के नोट बन्द हो जायेंगे। पाँच सौ एक हजार के नोट केवल बैंक, पेट्रोल पम्प और अस्पताल में ही चलेंगे।

इतना कह कर न्यूज रीडर का चेहरा गायब हो गया और चिर-परिचित प्रधानमंत्री जी का चेहरा वापस स्क्रीन पर आ गया। प्रधानमंत्री जी का रिकॉर्डिग किया बयान फिर से रिपीट होने लगा। इतना सुनना था कि नेताजी के हाथ से गिलास छूटकर जमीन पर गिर कर चकनाचूर हो गया। गिलास की शराब कालीन पर बिखर गयी। कालीन गीला हो गया। नेताजी सीना पकड़ कर सोफे पर गिर गये।

न्यूज सुन कर नेताजी को गहरा सदमा लगा। थोड़ी देर उसी अवस्था में रहे, फिर चेतना लौटने लगी। उन्होंने टेबल पर रखे जग में से पानी गिलास में डाला और पिया। थोड़े समय पश्चात उनकी चेतना जागृत हुई। उनकी हालत में थोड़ा सुधार हुआ।

नेताजी ने मोबाइल उठाया और देसाई का नम्बर लगाया। थोड़ी देर में देसाई की आवाज कानों में पड़ी, “न्यूज देखी नेताजी?”

“यह क्या हो गया देसाई? हम तो बर्बाद हो गये। ” नेताजी ने अपना माथा पकड़ कर कहा।

“अभी कुछ नहीं बिगड़ा है नेताजी। पचास दिन का समय है। अपनी सारी काली कमाई एकत्रित करके ठिकाने लगा दो।” बेचैनी भरे स्वर में देसाई ने कहा।

“ठीक है, कुछ सोचते हैं हम।” चिन्ता भरे स्वर में नेताजी ने कहा।

“मेरी सेवा की आवश्यकता हो तो बताना।”

“अवश्य, जब तेरी सेवा की जरूरत होगी, तो तुझे जरुर याद करेंगे।” कहकर नेताजी ने मोबाइल रख दिया।

नेताजी के चेहरे पर स्पष्ट तौर पर चिन्ता के भाव नजर आने लगे।

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दस गुणा दस का एक साधारण कमरा, कमरे में फर्नीचर नाम की कुछ भी चीज नहीं थी। उस कमरे में राहुल मकरानी अधमरी हालत में पड़ा हुआ था। ठंड के इस मौसम में उसके शरीर पर अन्डरवियर और बनियान ही थे। फर्श पूरी तरह ठंडा था और राहुल बेसुध पड़ा हुआ था। धीरे-धीरे उसकी चेतना लौटने लगी। उसका मुँह सूजा हुआ था। घाव में से खून रिस कर जम चुका था। ऐसा लग रहा था कि तबीयत से उसकी धुनाई की गयी हो और बेहोशी की हालत में उसे ऐसे ही पटक दिया गया हो।

अचानक उसकी आँख खुल गयी। अधखुली आँखों से उसने कमरे का निरीक्षण किया। कमरे का एकमात्र दरवाजा बाहर से बन्द था। अचानक उसे ठंड का अहसास होने लगा। बड़ी मुश्किल से वह उठा और दरवाजा खोलने की कोशिश करने लगा। लेकिन कोई फर्क न पड़ा। दरवाजा टस का मस ना हुआ, तो वह जोर-जोर से दरवाजा खटखटाने लगा। बाहर से आहट की आवाज सुनाई दी।

राहुल जोर-जोर से दरवाजा भड़भड़ाते हुए चिल्लाया, “मुझे यहाँ से बाहर निकालो।”

बाहर से दरवाजे के पास किसी के आने की आहट हुई। फिर दरवाजा खुला, राहुल घबराकर पीछे हट गया। दरवाजा खुला। दो दादा टाइप के आदमी नजर आये।

“क्या हाल हैं हीरो? होश ठिकाने आये।” एक ने व्यंग्य भरे स्वर में उससे कहा।

“प्लीज, मुझे यहाँ से बाहर निकालो।” राहुल गिड़गिड़ाया, दोनों खूंखार हँसी हँसे।

“प्लीज मुझे मेरे कपड़े दे दो।” ठंड से कांप रहा राहुल बोला, उसके दाँत बजने की आवाज साफ़ सुनाई दे रही थी।

“क्यों हिम्मत जवाब दे गयी।” व्यंग्य भरी निगाहों से देखता हुआ एक दादा उससे बोला।

एक ने उसके कपड़े अन्दर फेंके और फिर से दरवाजा बन्द कर दिया। राहुल ने अपने कपड़े उठाए और बड़ी मुश्किल से अपने शरीर पर चढ़ाये। उसका अंग-अंग दर्द से कराहने लगा। बड़ी मेहनत से उसने दर्द पर काबू पाया। कपड़े पहनने के बाद वह नीचे ठन्डे फर्श पर बैठ गया।

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खान डायनिंग टेबल पर बैठे किसी का इंतजार कर रहा था। तभी दो लोग राहुल को पकड़ कर खान के सामने लाये। राहुल अपने टुटे-फूटे शरीर से बड़ी मुश्किल से वहाँ तक आ पाया। खान ने उसे देखा और दहाड़ते हुए एक व्यक्ति को बोला, ”ये क्या हालत कर दी राहुल भाई की?”

दोनों सिर झुकाए खान की बात सुन रहे थे, ”क्या किसी को इतनी बुरी तरह मारा जाता है?” खान ने गुस्से में एक से कहा।

फिर खड़े होकर जबरदस्ती राहुल मकरानी को चेयर पर बिठाया। राहुल के चेहरे पर जबरदस्त हैरानी के भाव पैदा हुए, जो तुरन्त ही लुप्त भी हो गये। वह समझ गया, नया नाटक उसका इतंजार कर रहा है।

उसने उलझन भरी निगाहों से खान को देखा और कहा, “खान भाई, मुझसे भारी गलती हुई है। अब और जलील न करो।” उसके स्वर में दर्द भरे भाव थे।

“देख भाई, पैसे तो मैं छोडूँगा नहीं, पर एक तरीके से तू मेरी मदद कर सकता है, जिसमें तू यदि कामयाब हो गया, तो हो सकता है कि मैं अपना पैसा भूल जाऊँ।”

राहुल ने आश्चर्य से खान की और देखकर बोला, “कैसी मदद की उम्मीद करते हैं आप मेरे जैसे आदमी से।”

“डिनर करोगे?” खान ने पूछा।

राहुल की गर्दन ना में हिली, खान उसके चेहरे पर भरपूर नजर डालने के बाद बोला, “तुमने नई खबर तो सुनी नहीं होगी। कल सरकार ने एक महत्वपूर्ण निर्णय लिया है जिसके अनुसार पाँच सौ और हजार रुपए के नोट बन्द कर दिये गये हैं।”

“क्या...?” राहुल मकरानी का मुँह आश्चर्य से खुल गया और उसकी बुद्धि चलने लगी।

उसने मन ही मन सोचा, तो यह कारण है। खान की दरियादिली का, फिर भी उसने चेहरे पर दयनीय भाव बनाये रखे।

“पाँच सौ या हजार के नोट चले या बन्द हो जाये, मैं क्या कर सकता हूँ खान साहब?”

“मैं तुम्हारे ऊपर चढ़ा कर्जा माफ़ कर सकता हूँ। इसके लिये तुम्हें मेरा एक काम करना होगा।” गंभीर स्वर में खान बोला।

“क्या कह रहे हो खान भाई ऐसा संभव है?” राहुल के स्वर में उत्तेजना झलकी।

“तुमने सुन्दर लाल अवस्थी स्वास्थ्य मंत्री का नाम सुना होगा?” खान ने सिगार सुलगाते हुए कहा।

“सुन्दर लाल अवस्थी, तुम सुमित अवस्थी के फादर की बात तो नहीं कर रहे खान?” राहुल ने खान के साथ ‘साहब’ शब्द का प्रयोग नहीं किया।

“हाँ, मैं उसी सुन्दर लाल अवस्थी की बात कर रहा हूँ। मकरानी अगर तुझे अपनी जान और मेरा कर्जा चुकाना है, तो मेरा साथ देना पड़ेगा।”

“मुझे क्या करना होगा?” गहरी सांस लेता हुआ राहुल बोला।

खान का जला सिगार बुझने लगा था। उसने अपनी बात जारी रखी, “मुझे खबर मिली है कि नेता सुन्दर लाल अवस्थी अपना काला धन जो पाँच सौ और हजार के पुराने नोट की शक्ल में है, उसको ठिकाने लगाने का प्लान बना रहा है। उसने अपना काला धन, जो कि चालीस से पचास अरब के करीब है, एक जगह जमा कर लिया है।” अपने शब्दों को विराम देता खान रुका, उसने बुझा सिगार पुनः जलाने लगा।

“लेकिन इतनी तगड़ी चैकिंग में वह अपना धन कहाँ रखे हुए है और उसे कैसे चेन्ज करायेगा?” राहुल ने शांत स्वर में खान को देखते हुए कहा।

“वह नेता बहुत पहुँची हुई चीज है। उसने कई बैंक मैनेजरों को सेट कर रखा है। वे सब इंतजाम कर देंगे।” खान ने पहलू बदलते हुए कहा

“इस मामले में मैं कहाँ सेट बैठता हूँ? मुझे क्या करना होगा?” राहुल गंभीर स्वर में बोला।

“हमें उसका सारा धन लूटना है या नष्ट करना है, ताकि वह उसे चेन्ज कराके अपनी पोजीशन मजबूत न कर सके। यह रकम हमारे हाथ लगना यानि की हमारी स्थिति मजबूत होना। धन नष्ट होना यानि कि नेताजी की कमर टूट जाना। दोनों ही परिस्थिति में जीत मेरी ही होगी।” राहुल मकरानी की गर्दन समझने वाले ढंग से हिली।

“तो इसमें परेशानी क्या है?” राहुल ने कहा।

“परेशानी यह है कि उसने काला धन कहाँ रखा हैं, इसकी हमें कोई खबर नहीं। नेता बहुत सोच-समझ कर काम कर रहा है। किसी को भनक भी लगने नहीं दे रहा।” खान ने सोचते हुए कहा।

“आप मुझसे क्या चाहते हैं?”

“तू किसी भी तरह से नेता की दौलत का पता कर और उसे खत्म करने का इंतजाम कर, फिर तेरा सारा कर्जा माफ।” खान ने दरियादिली दिखाते हुए कहा।

“दौलत खत्म करने की क्या जरूरत है। ठिकाना पता लगते ही पुलिस को खबर कर दो। वह अपने आप निपट लेगी।” राहुल मकरानी साधारण स्वर में खान को देखते हुए बोला।

खान ने खड़े होकर चहल-कदमी करते हुए कहा, “तू मंत्री की पहुँच को नहीं जानता। वह कुछ भी कर सकता है। पुलिसवालों को वह अपनी जेब में रखता है। ऊपर तक के लोग उसके दरबार में हाजरी भरते हैं।”

राहुल भी उठ खड़ा हुआ, “ठीक है खान, मैं आप के साथ हूँ, लेकिन आपको वायदा करना होगा कि मेरे ऊपर अब किसी तरह का हमला नहीं होगा।”

खान ने टेढ़ी नजर से उसे देखा, “ज्यादा मत उड़, खान साहब से सीधा खान पर आ गया। अभी से तेवर बदल गये।”

राहुल ने बिना डरे खान की आँख में आँख डाल दी, “पहले के हालात दूसरे थे, अब हालात बदल गये हैं, अब हम दोस्त बन गये हैं।”

खान ने घूरकर उसे देखा, फिर हँस कर बोला, “मजे कर, मेरा काम जल्द करा दे। मेरा कोई भी आदमी तेरे आसपास नहीं फटकेगा। किसी की हिम्मत नहीं, जो तेरी तरफ नजर उठा के देखे।” खान बोला।

“तो अब मैं आजाद हूँ, जा सकता हूँ?” राहुल ने शांत स्वर में पूछा।

“जा किसने रोका है तुझे?” खान बोला।

राहुल ने दरवाजे की तरफ कदम बढ़ाये थे, कि पीछे से खान की आवाज कानों में पड़ी, “आजाद तो तू है, पर मेरे साथ फरेब का ख्याल करने की कोशिश मत करना। मेरी आँख हर पल तेरे पर है।” राहुल का सिर सहमति से हिला और वह दरवाजे से बाहर निकल गया।

उसके जाने के बाद खान के चेहरे पर कुटिल मुस्कान उभरी। उसने मन ही मन सोचा, नेता भी तबाह और उसके बाद राहुल भी तबाह। उसने जोर से आवाज लगाई, “अरे कलवा बाहर आ।”

थोड़ी देर में अन्दर से एक तगड़ा आदमी बाहर आया।

उसका पूरा चेहरा कोयले के समान काला था। उसने खान की तरफ देखा, “हुँक्म।” उसके स्वर में सख्ती के भाव थे।

खान ने उसे देखा और कहा, “अभी-अभी जो कुत्ता बाहर निकला है, उस पर नजर रखने का इंतजाम कर, इंतजाम ऐसा हो कि उसे भनक भी ना लगे। आदमी बदल-बदल कर नजर रखवा, ताकि उसे शक न हो।” कलवा की मोटी-सी गर्दन हिली। खान ने उसे जाने का इशारा किया फिर सोच में डूब गया।

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चंद्रेश मल्होत्रा की कार पुलिस स्टेशन के बाहर आकर रुकी। चंद्रेश फुर्ती से कार से बाहर निकला। तेजी से उसके कदम थाने में पड़े। भाटी, निरंजन और विमल किसी बात पर विचार कर रहे थे। तीनों की निगाहें चंद्रेश मल्होत्रा पर जा टिकी। विमल चंद्रेश को देखकर आश्चर्य से बोला, “अरे चंद्रेश, यहाँ कहाँ? बहुत दिनों बाद मिले कैसे हो?”

चंद्रेश की नजर भी विमल पर पड़ी उसे देख कर चंद्रेश आश्चर्य से बोला, “अरे विमल, तू यहाँ कैसे?”

“अभी थोड़े समय पहले ही रेलवे में लगा। यहाँ पोंस्टिग हुई है। तीन महीने से यहीं हूँ। तू तो वैसे का वैसा ही है, जरा भी नहीं बदला।” विमल चंद्रेश के गले मिलते हुए बोला।

“तीन महीने से तू यहाँ है। मुझे खबर भी नहीं की।” नाराजगी भरे स्वर में चंद्रेश ने कहा।

“मुझे तेरे बारे में मालूम नहीं था कि तू भी माउंट आबू में हैं।” कहकर विमल चंद्रेश से अलग हुआ।

“आप एक दूसरे को जानते हो?” निरंजन ने भाटी की और देख कर विमल से पूछा।

“अरे सर, हम सुखाड़िया कालेज में साथ में पढ़ते थे?” विमल ने उत्साह से कहा।

“जब यह यहाँ था, तो सुमित अवस्थी के लिये मुझे बुलाने की क्या आवश्यता थी। चंद्रेश ही बता देता सुमित अवस्थी के बारे में?” चेहरे पर मुस्कान लिये विमल बोला।

अब चौंकने की बारी भाटी की थी, “यह भी सुमित अवस्थी को जानते है? क्यों चंद्रेश, तुम भी सुमित अवस्थी को जानते हो?” भाटी ने घूर कर चंद्रेश मल्होत्रा को देखा।

“एक सुमित अवस्थी तो हमारे साथ कॉलेज में पढ़ता था। किसी मंत्री का लड़का था।” चंद्रेश ने गंभीर स्वर में कहा।

“ओहह... तो किरदार बढ़ते जा रहे हैं। कहानी कन्ट्रोल में आ रही हैं। तुम दोनों में से कौन स्टार्ट करेगा कहानी शुरु से?” भाटी ने साधारण स्वर में रुल अपने हाथ में मारते हुए कहा।

“सर कहानी फिर कभी, अभी तो जिस काम से आप के पास आया था, वह जरूरी है।” चंद्रेश ने उत्तेजित स्वर में कहा।

“अब क्या हुआ मि. चंद्रेश?” भाटी ने चंद्रेश को देख कर कहा।

“सर एक हत्या हो गयी है?” चंद्रेश जल्दी से बोला।

“क्या...?” भाटी कुर्सी से उछल पड़ा, वह उठकर खड़ा हो गया। साथ में निरंजन और विमल भी आश्चर्य से चंद्रेश का मुँह देखने लगे।

“क्या बक रहे हो? होश में हो या भांग खा कर आये हो? किसकी हत्या हो गयी?” दाँत भींच कर भाटी ने कहा।

“सर वकील साहब, यानी सागर की हत्या, मेरी नकली बीवी वंशिका ने कर दी है।”

“क्या बक रहे हो तुम?” हैरानी से निरंजन ने कहा।

“तुम्हारी बीवी सागर को क्यों मारेगी? वह तो उसका भाई है।” भाटी ने चंद्रेश को घूरते हुए कहा, “मुँह बोला भाई सर, कल मैंने उनकी लव स्टोरी देख ली थी रात में। उन्होंने मुझे मारने का प्लान बनाया था, लेकिन गलती से कॉफ़ी सागर पी गया और मर गया।” चंद्रेश ने एक ही सांस में पूरी कहानी सुना दीI

भाटी और निरंजन वापस कुर्सी पर बैठ गये और चाय पीने लगे। विमल ने आश्चर्य से भाटी को देखा और बोला, “सर आप कुछ करते क्यों नहीं?”

“बैठो विमल, चाय ठंडी हो रही है।” चंद्रेश को नजरअंदाज करता हुआ भाटी बोला।

“आप ऐसे कैसे निश्चिन्त बैठ सकते है। एक मर्डर हुआ है सर।” विमल उतावलेपन से बोला।

“तुम अभी चंद्रेश को नहीं जानते भाई। आजकल यह नयी समस्या से घिरे हैI इनकी अपनी पत्नी से ही नहीं बन रही। यह उसको पहचानते भी नहीं हैं।” भाटी ने लापरवाही से कहा।

विमल आश्चर्य से चंद्रेश को देखने लगा। निरंजन को शायद इन बातों से कोई मतलब नहीं था। वह कॉफ़ी पीने में खोया हुआ था। जैसे इससे जरुरी कोई काम नहीं।

“क्या यह सही कर रहे हैं चंद्रेश?” विमल के स्वर में अचरज के भाव थे।

“लेकिन ये सच है भाटी सर, सागर ने मेरी आँखों के सामने प्राण त्यागे है।” घबराकर चंद्रेश ने कहा।

“हमारा तुम्हारी कहानी में कोई दखल नहीं। हमें तुम्हारी फर्जी कहानी में विश्वास नहीं।” निरंजन ने गहरी सांस लेते हुए कहा।

चंद्रेश ने निरंजन को देखा। फिर याचना भरे स्वर में भाटी को देखता हुआ बोला, “सर, निरंजन सर तो मेरी बात पर विश्वास नहीं कर रहे हैं। पर आप तो एक बार मेरी बात यकीन कर लो।”

भाटी ने निरंजन को देखा, फिर विमल की ओर देखते हुए बोला, “तुम क्या चाहते हो विमल?”

“सर एक बार चंद्रेश की बात पर भरोसा कर के देख लो। मुझे यकीन है कि यह सच बोल रहा है।” विमल ने चंद्रेश की तरफदारी करते हुए कहा।

भाटी गहरी सांस लेता हुआ कुर्सी से खड़ा हुआ और निरंजन की तरफ देखता हुआ बोला, “चलो निरंजन, एक बार फिर चंद्रेश साहब की कहानी का पता लगाएं।”

निरंजन कुर्सी से उठकर चहल-कदमी करने लगा, “सर आप बेकार में कष्ट कर रहे हैं। मेरी राय मानो, तो वहाँ कुछ ना मिलेगा। एक नया ड्रामा हमारा इंतजार कर रहा होगा।” निरंजन ने लापरवाही से कहा।

“आपको क्या मैं पागल दिखता हूँ? क्या मेरा ऊपर का माला खाली हैं?” चंद्रेश ने गुस्से में निरंजन की तरफ देखते हुए कहा।

“कण्ट्रोल योर सेल्फ मिस्टर चंद्रेश।” भाटी ने कठोर निगाहों से चंद्रेश की ओर देखते हुए कहा, “यह आखिरी चांस हैं। चंद्रेश, मैंने बहुत बार तुम पर भरोसा किया, पर हर बार तुम गलत साबित हुए। इस बार भी तुम गलत साबित हुए, तो मेरी तरफ से भी तुम्हारा दरवाजा बंद हो जायेगा।” निरंजन भी उठ खड़ा हुआ।

“तुम्हारी कहानी बाद में सुनेगे विमल, पहले चंद्रेश साहब की कहानी का रुख देखें।” भाटी तेज़ी से उठता हुआ बोला।

“सर मैं भी आप के साथ चल सकता हूँ।” विमल ने चंद्रेश की तरफ देखते हुए कहा।

“तुम्हें कोई ऐतराज है?” भाटी ने पूछा। चंद्रेश की गर्दन ‘ना’ में हिली सब बाहर की तरफ निकल गये।

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कॉटेज के बाहर चंद्रेश की कार और पुलिस जीप रुकी। चंद्रेश फुर्ती से कार से निकला और जीप की तरफ बढ़ते हुए भाटी से जल्दी से बोला, ”चलिये सर।”

चारों फुर्ती से कॉटेज के अन्दर पहुँचे। बैठक रूम में सन्नाटा छाया हुआ था। भाटी और निरंजन की नज़रें आपस में टकराई। विमल भी हैरानी से कमरे को चारों तरफ से देखने लगा। भाटी ने सोफे पर बैठते हुए हर तरफ नजर घुमाई।

“कहाँ हैं लाश?” भाटी ने व्यंग्य भरे स्वर में पूछा।

“सर, मैं लाश को यही छोड़ कर गया था।’’ अविश्वास भरे स्वर में चंद्रेश मल्होत्रा बोला।

“आप लोग बैठिये। ये ड्रामा तो ऐसे ही चलेगा।” भाटी ने निरंजन ओर विमल की तरफ देखते हुए कहा।

“आपको मेरी बात मजाक लग रही है। आपको क्या लगता है कि मैं कोई नाटक कर रहा हूँ?” चंद्रेश ने गुस्से भरे स्वर में भाटी से कहा।

“नहीं-नहीं, आप क्यों मजाक करने लगे। आपके घर में तो मर्डर हुआ है, क्यों चंद्रेश बाबू। वैसे आपकी मैडम कहाँ हैं? क्योंकि मर्डर तो सागर का हुआ है। वह तो जिन्दा होगी।” भाटी मजाक उड़ाने वाले स्वर में बोला।

“ये सब क्या है चंद्रेश?” विमल आश्चर्य से बोला।

चंद्रेश ने उसकी बात की तरफ ध्यान नहीं दिया और पूरी कॉटेज का चक्कर लगाने अन्दर चला गया। वापस आया तो हताश था। धडाम से एक चेयर पर उसने अपना शरीर ढीला छोड़ दिया। कुछ पल शांति रही। शांति को भंग करते हुए भाटी ने चंद्रेश से कहा, “आप क्या साबित करना चाहते हैं मि. चंद्रेश, हम लोग बेवकूफ हैं या हमारे पास कोई दूसरा काम नहीं हैंI आप जब मर्ज़ी हो मुँह उठा कर थाने आ जाते हो।” भाटी के स्वर में धीरे-धीरे क्रोध भरने लगा।

चंद्रेश ने सबकी तरफ देखा और कहा, “सर, यकीन मानिए, सब कुछ मेरी आँखों के सामने हुआ है। सागर के मरने के बाद ही मैं आप लोगों के पास आया था।” निराशा भरे स्वर में चंद्रेश ने कहा।

अचानक निरंजन ने चुप्पी तोड़ी, “वह तो ठीक हैं मि. चंद्रेश, सबसे बड़ी बात लाश कहाँ गयी और आपकी मैडम भी दिखायी नहीं दे रही। आप तो उन दोनों को यहीं छोड़ कर गये थे ना?” साधारण स्वर में निरंजन बोला।

“इतनी जल्दी लाश ठिकाने लगाई नहीं जा सकती और वह भी एक औरत के द्वारा असंभव बात हैI” विमल ने कुछ सोचते हुए कहा

तभी बाहर से किसी वाहन के रुकने की आवाज आयी। चंद्रेश फुर्ती से बाहर की तरफ लपका, बाहर निकल कर उसने जो दृश्य देखा, तो हैरानी से भर गया। वंशिका एक ऑटो से निकली। उसके पीछे एक नौकर टाइप का आदमी निकला, जिसने बहुत सारे पार्सल उठा रखे थे, जो वंशिका के पीछे चल रहा था।

वंशिका ने चंद्रेश को देखा, “आ गये आप।”

चंद्रेश ने उसे घूरते हुए देखा। नौकर सारा सामान उठा कर ड्राइंग रूम में रख गया। वंशिका की नजर भाटी और निरंजन पर पड़ी वह आश्चर्य से बोल उठी, “अरे आप? अब क्या हुआ?”

भाटी और निरंजन की नजरें मिली। विमल आश्चर्य से वंशिका को देखने लगा वंशिका ने अपना पर्स खोला और एक सौ का पत्ता नौकर के हाथ में थमा दिया। नौकर जैसे आया था वैसे ही चला गया।

“अब क्या नया ड्रामा हो रहा है।” वंशिका गुस्से से निरंजन की तरफ देख कर बोली।

“आप लोग जब मर्जी होती है। मुँह उठा कर चले आते हैं। आप लोगों के पास दूसरा कोई काम है की नहीं?” उसने अपनी भड़ास निकालने में कोई कसर ना छोड़ी।

“माइंड योर लैंग्वेज मैडम, आप इस तरह हमें बोलने वाली होती कौन हैं? ये तो आप के आदरणीय पति महाशय है, जो हमें बार-बार यहाँ आने पर मजबूर कर देते हैंI” भाटी गुस्से मे बोला।

निरंजन को भी गुस्सा आ गया। उसने क्रोधित नज़रें वंशिका पर गड़ाई और बोला। " मैड़म आप का व्यवहार हैरान करने वाला है। आप सच्ची है, तो आप को किस बात का डर है।

" डरता कौन है? यह तो आप लोगो का बेवक्त तंग करना नाजायज है। " वंशिका गुस्से से बोली।

" इसके जिम्मेदार हम नही आप के सम्माननीय पतिदेव है। जिनको हमारा चैन से बैठना रास नही आता " निरंजन ने व्यंग्य से कहा।

“अब क्या नया तमाशा हो रहा है?” वंशिका बोली।

“आप के पति ने आप के खिलाफ रिपोर्ट लिखवाई है कि आपने अपने मुँहबोले भाई को जहर दे कर मार डाला।” निरंजन ने लम्बी सांस लेते हुए कहा।

“हे भगवान! अब यह क्या नया ड्रामा है।” वह चंद्रेश की तरफ घूमी, “अब यही बाकी रह गया था, तुम मुझे कातिल भी बनाने लगे। तुम्हारा दिमाग सही है या खराब हो गया है।” वंशिका माथे पर हाथ रख कर अफ़सोस भरे स्वर में बोली।

“बंदकर अपना यह नाटक, मैं जब यहाँ से निकला था तो सागर यहाँ मरा पड़ा था और तू टेसुए बहा रही थी। तुम लोगों ने अच्छा प्लान बनाया था। मुझे मारने का, पर गलती से कॉफ़ी सागर पी गया।” चंद्रेश ने जोर से चिल्ला कर कहा।

भाटी ने दोनों को देखा फिर चंद्रेश से कहा, “आप यहाँ से कितने बजे निकले थे, पुलिस स्टेशन की तरफ?” “बारह बजकर दस मिनट पर।” चंद्रेश ने फौरन जवाब दिया।

“आप कहाँ से आ रही हैं मैडम वंशिका जी? और आप कितने बजे यहाँ से निकली?” वंशिका की तरफ नजरें गड़ाए भाटी ने पूछा।

“दस बजे मुझे खरीददारी करनी थी। इसलिये सुबह जल्दी निकल गयी।” वंशिका ने कुछ सोचते हुए कहा।

“यह झूठ बोल रही हैं बारह बजे तक यह यहीं थी मेरे सामने।” तेज स्वर में चंद्रेश ने कहा।

भाटी ने उसकी तरफ घूरते हुए कहा, “जब आपसे सवाल पूछे जाएं, आप तभी जवाब दीजिये।”

चंद्रेश जल्दी से बोला, ”लेकिन यह झूठ बोल रही है।”

“इसका फैसला हम करेंगे कि कौन झूठ बोल रहा है और कौन सच।?” कड़े शब्दों में भाटी बोला।

“हां तो मोहतरमा दस बजे जब आप निकली, सागर साहब यहाँ थे कि नहीं?”

“मैंने ध्यान नहीं दिया।” गहरी सांस लेती हुई वंशिका ने जवाब दिया।

“वाह घर में मेहमान आया है और वह भी मुँहबोला भाई और आज आपको उसका ध्यान नहीं रहा। कल तो बहुत भाई-भाई कर रही थी। सुबह आप ने सागर को चाय या कॉफ़ी तो पिलाई ही होगी?” निरंजन ने भाटी के बोलने से पहले ही बोल दिया।

“सही सवाल निरंजन।” भाटी ने निरंजन की तरफ तारीफ़ भरी नजरों से देखा।

“मैंने कुछ समय पहले कुछ चीजो का ऑर्डर किया था, वह आ गयी थी। दुकानदार का फ़ोन आया था, इसलिये जल्दी में कुछ ध्यान नहीं रहा।” गंभीर स्वर में वंशिका बोली।

भाटी ने चहलकदमी करते हुए वंशिका की तरफ नजरें गड़ाई। वंशिका की नज़रें भाटी से टकराई। वंशिका ने नजरें हटाने का प्रयास नहीं किया। मजबूरन भाटी को नजरें हटानी पड़ी।

“चंद्रेश साहब अब आप क्या कहेंगे इस बारे में।” भाटी ने व्यंग्य भरे स्वर में चंद्रेश की तरफ देख कर कहा।

“मैं अपनी जगह सही हूँ। मैंने कुछ भी गलत नहीं कहा।” बेचैनी से चंद्रेश ने कहा।

अचानक विमल अपनी जगह से उठा और खड़े होकर बम फोड़ते हुए बोला, “साहिबान मैं भी कुछ फरमाना चाहता हूँ।”

सब की निगाह विमल से टकराई। वंशिका आश्चर्य से विमल को देखने लगी। उसे पहली बार एहसास हुआ की कमरे में कोई और भी है।

“तुम क्या कहना चाहते हो विमल?” भाटी ने आश्चर्य से विमल को देखते हुए कहा।

“सर वंशिका है कहाँ?” व्यंग्य भरी निगाह वंशिका पर डालते हुए विमल बोला।

“क्या कहना चाहते हो?” सवालिया निगाहों से भाटी ने कहा।

“सर, यह औरत कोई भी हो, पर वंशिका किसी भी हालत में नहीं हो सकती। वंशिका और हम सब साथ में पढ़ते थे। मैं अच्छी तरह जानता हूँ कि यह वंशिका नहीं है।”

“मैं काफी देर से यह सारे ड्रामे को देख रहा हूँ और वंशिका मैडम मुझे नहीं जानती, यह नहीं हो सकता।” बम फोड़ते हुए विमल बोला।

निरंजन और भाटी आश्चर्य से विमल को देखने लगे। वंशिका के चेहरे से रंग उड़ गया।

“मेरे भाई, मेरे दोस्त, तू सच कह रहा है। मेरी बात पर कोई यकीन नहीं कर रहा है कि यह औरत मेरी बीवी वंशिका नहीं है। तंग हो गया, मैं यह नाटक देखते-देखते।” चंद्रेश के स्वर में उत्साह भर गया। वह अपनी ख़ुशी नहीं छुपा पा रहा था।

“विमल, तुम जानते हो क्या कह रहे हो?” भाटी ने पूछा।

“हाँ सर, वंशिका को भूल जाऊँ, यह संभव नहीं है। हम सभी आपस में गहरे मित्र थे। चंद्रेश के खिलाफ कोई गहरी साजिश रची जा रही है।” लम्बी सांस लेते हुए विमल बोला।

“सर, अब तो आप लोगों को मेरी बात पर विश्वास हुआ कि यह औरत फरेबी है और मेरे साथ बहुत बड़ा फरेब हो रहा है।” चंद्रेश विश्वास भरे स्वर में बोला।

“मुझे तो कुछ समझ नहीं आ रहा है।” निरंजन ने उलझन भरे स्वर में कहा।

“सब समझने के लिये कहानी शुरू से जानना जरूरी है। हां, तो आप लोगों में से कौन बताना चाहेगा।” भाटी ने विमल और चंद्रेश की तरफ देख कर कहा।

विमल कुछ कहने ही जा रहा था कि चंद्रेश बोल उठा, “सर मैं आपको पूरी कहानी बताना चाहता हूँ। कैसे हम सब कॉलेज में साथ में थे। वंशिका और मेरी जान पहचान हुई कैसे? हम शादी के बंधन तक कैसे पहुचे?”

“मेरे लिये सब जानना आवश्यक हैं।” भाटी ने सोफे पर बैठते हुए चंद्रेश से कहा।

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