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“हमारे फोन का इंतजार करना है। आगे तुम्हें क्या करना है, बता दिया जायेगा।” कह कर फोन काट दिया गया।
राहुल के चेहरे पर बेचैनी के भाव बढ़ने लगे।
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पाँच एकड़ में फैला हुआ एक शानदार फार्म हाउस, जो चारों तरफ से सीमेन्ट के बाउण्डी वाल से घिरा हुआ था। चारों ओर हरियाली फैली हुई थी। बीच में शानदार बँगला बना हुआ था। चारों तरफ सौंफ की फसल लहरा रही थी। बड़ा ही मनोरम दृश्य था, तभी फार्म हाउस के बाहर एक शानदार कार आकर रूकी। ड्राइवर ने चौकीदार से बात की। चौकीदार ने इन्टरकॉम पर बात कर लोहे का भारी गेट खोल दिया। कार तेजी से भीतर आकर पोर्च में रुक गयी। कार के अन्दर से देसाई बाहर निकला। उसने धूप का चश्मा उतारकर जेब में रख लिया और बँगले के अन्दर आया। अन्दर कमरे में स्वास्थ्य मंत्री सुन्दर लाल अवस्थी बैठे थे। उसे देखकर बोले “आओ देसाई, बैठो। मैं तुम्हारा ही इंतजार कर रहा था।”
“कहिये नेताजी, कैसे याद किया?” देसाई ने सोफे पर बैठते हुए कहा।
“क्या लोगे देसाई, ठंडा या गरम?” नेताजी बोले।
“कुछ भी पिला दो नेताजी, जो आपको पसंद हो।” देसाई ने मुस्करा कर कहा।
“तुम्हारी यही जिन्दादिली हमें पसंद है देसाई।” नेताजी बोले।
उन्होंने नौकर को आवाज लगाई, “लल्लू!, जल्दी से एक बोतल और दो गिलास का इंतजाम कर और खाने की भी व्यवस्था कर।” कहकर नेताजी ने देसाई की तरफ देखा।
“ठीक है न।”
देसाई की गर्दन सहमति में हिली।
“खान के क्या हाल चाल हैं?” पेपर वेट से खेलते हुए मंत्रीजी बोले।
“खान आजकल ज्यादा ही हवा में उड़ रहा है।” देसाई ने कहा।
“अब नहीं उड़ पाएगा, इसलिये तो तुमको यहाँ बुलाया है।” नेताजी ने दाँत भींचकर कहा।
“आपकी खान से क्या दुश्मनी हैं नेताजी?” देसाई ने पूछा।
“तुम मेरे बेटे सुमित अवस्थी को तो जानते होगे देसाई?” नेताजी बोले।
“यह भी कोई कहने की बात है नेताजी, सुमित अवस्थी को कौन नहीं जानता नेताजी। कुछ दिन पहले ही तो उसकी हत्या हो गयी थी।” गंभीर स्वर में देसाई बोला।
“अब तुम्हें राज की बात बताता हूँ देसाई। मैं ओर खान पार्टनर थे। मेरी तरफ से मेरा धन्धा सुमित संभालता था। मुझे लगता है सुमित के मर्डर के पीछे खान का हाथ है।” कठोर स्वर में नेताजी बोले। उनका चेहरा गुस्से के कारण लाल हो गया था।
“क्या कह रहे हैं आप?” देसाई चौंक कर हैरानी से बोला।
“मुझे पूरा यकीन ही नहीं, पक्का विश्वास भी है कि खान कहीं ना कहीं, सुमित के मर्डर से जुड़ा हुआ है।” विश्वास भरे स्वर में नेताजी बोले।
“यह अगर खान ने किया है, तो बहुत गलत किया है।” देसाई नेताजी के चेहरे को देख कर बोला।
“खान को इसकी कीमत चुकानी पड़ेगी देसाई।” नेताजी का स्वर अचानक क्रूर हो गया। उनके जबड़े भींच गये।
देसाई ने सहमकर नेताजी को देखा। तभी नौकर दो गिलास और एक बोतल के साथ वापस आया। ट्रे में भुने हुए काजु ओर नमकीन की प्लेट रखी हुई थी। नौकर प्लेट रख कर चला गया।
“हमारा मिशन खान को तबाह करना है।” नेताजी ने पैग बनाते हुए कहा।
“खान का कारोबार काफी फैला हुआ है और हमारे पास तो कुछ भी नहीं नेताजी।” देसाई चिन्ता भरे स्वर में बोला।
“अब तुम पर हमारा हाथ है देसाई। चिन्ता मत करो।” काजू का एक पीस मुँह में डाल कर नेताजी बोले।
“तब तो अब खान की बर्बादी के दिन शुरु हो गये।” देसाई बोला।
“खान पर दो तरफा अटैक होगा। एक तो हम उसे जीने नहीं देंगे, दूसरी तरफ पुलिस उसके पीछे कुत्ते की तरह लग जायेगी। मैंने इस बारे में कमिश्नर से भी बात कर रखी है।” गिलास टेबल पर रख कर नेताजी बोले।
“मैंने भी कुछ इंतजाम किये हैं, उसकी नैया डुबाने के लिये।” व्यंग्य से देसाई बोला।
नेताजी ने सोफे से पहलू बदला और कहा, “देसाई खान के बाद सत्ता तुम्हें ही संभालनी है।” नेताजी के चेहरे पर मुस्कान आ ठहरी।
“लेकिन सरताज तो आप ही रहेंगे।” लम्बी साँस लेता हुआ देसाई बोला।
“नाम तुम्हारा और काम हमारा। यह तो होना ही है देसाई। अवस्थी जो ठान लेता है, वह करके ही मानता है।” जहरीली मुस्कान के साथ नेताजी बोले।
“खान की बर्बादी में जो भी खर्चा आयेगा, हम उठायेंगे। रुपए-पैसे की चिन्ता ना करो। साधारण स्वर में नेताजी बोले।
“ठीक है नेताजी। अब मुझे इजाजत दीजिये। काफी देर हो गयी है।” नेताजी ने सहमति से गर्दन हिला दी।
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राहुल के चेहरे पर बेचैनी के भाव बढ़ने लगे।
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पाँच एकड़ में फैला हुआ एक शानदार फार्म हाउस, जो चारों तरफ से सीमेन्ट के बाउण्डी वाल से घिरा हुआ था। चारों ओर हरियाली फैली हुई थी। बीच में शानदार बँगला बना हुआ था। चारों तरफ सौंफ की फसल लहरा रही थी। बड़ा ही मनोरम दृश्य था, तभी फार्म हाउस के बाहर एक शानदार कार आकर रूकी। ड्राइवर ने चौकीदार से बात की। चौकीदार ने इन्टरकॉम पर बात कर लोहे का भारी गेट खोल दिया। कार तेजी से भीतर आकर पोर्च में रुक गयी। कार के अन्दर से देसाई बाहर निकला। उसने धूप का चश्मा उतारकर जेब में रख लिया और बँगले के अन्दर आया। अन्दर कमरे में स्वास्थ्य मंत्री सुन्दर लाल अवस्थी बैठे थे। उसे देखकर बोले “आओ देसाई, बैठो। मैं तुम्हारा ही इंतजार कर रहा था।”
“कहिये नेताजी, कैसे याद किया?” देसाई ने सोफे पर बैठते हुए कहा।
“क्या लोगे देसाई, ठंडा या गरम?” नेताजी बोले।
“कुछ भी पिला दो नेताजी, जो आपको पसंद हो।” देसाई ने मुस्करा कर कहा।
“तुम्हारी यही जिन्दादिली हमें पसंद है देसाई।” नेताजी बोले।
उन्होंने नौकर को आवाज लगाई, “लल्लू!, जल्दी से एक बोतल और दो गिलास का इंतजाम कर और खाने की भी व्यवस्था कर।” कहकर नेताजी ने देसाई की तरफ देखा।
“ठीक है न।”
देसाई की गर्दन सहमति में हिली।
“खान के क्या हाल चाल हैं?” पेपर वेट से खेलते हुए मंत्रीजी बोले।
“खान आजकल ज्यादा ही हवा में उड़ रहा है।” देसाई ने कहा।
“अब नहीं उड़ पाएगा, इसलिये तो तुमको यहाँ बुलाया है।” नेताजी ने दाँत भींचकर कहा।
“आपकी खान से क्या दुश्मनी हैं नेताजी?” देसाई ने पूछा।
“तुम मेरे बेटे सुमित अवस्थी को तो जानते होगे देसाई?” नेताजी बोले।
“यह भी कोई कहने की बात है नेताजी, सुमित अवस्थी को कौन नहीं जानता नेताजी। कुछ दिन पहले ही तो उसकी हत्या हो गयी थी।” गंभीर स्वर में देसाई बोला।
“अब तुम्हें राज की बात बताता हूँ देसाई। मैं ओर खान पार्टनर थे। मेरी तरफ से मेरा धन्धा सुमित संभालता था। मुझे लगता है सुमित के मर्डर के पीछे खान का हाथ है।” कठोर स्वर में नेताजी बोले। उनका चेहरा गुस्से के कारण लाल हो गया था।
“क्या कह रहे हैं आप?” देसाई चौंक कर हैरानी से बोला।
“मुझे पूरा यकीन ही नहीं, पक्का विश्वास भी है कि खान कहीं ना कहीं, सुमित के मर्डर से जुड़ा हुआ है।” विश्वास भरे स्वर में नेताजी बोले।
“यह अगर खान ने किया है, तो बहुत गलत किया है।” देसाई नेताजी के चेहरे को देख कर बोला।
“खान को इसकी कीमत चुकानी पड़ेगी देसाई।” नेताजी का स्वर अचानक क्रूर हो गया। उनके जबड़े भींच गये।
देसाई ने सहमकर नेताजी को देखा। तभी नौकर दो गिलास और एक बोतल के साथ वापस आया। ट्रे में भुने हुए काजु ओर नमकीन की प्लेट रखी हुई थी। नौकर प्लेट रख कर चला गया।
“हमारा मिशन खान को तबाह करना है।” नेताजी ने पैग बनाते हुए कहा।
“खान का कारोबार काफी फैला हुआ है और हमारे पास तो कुछ भी नहीं नेताजी।” देसाई चिन्ता भरे स्वर में बोला।
“अब तुम पर हमारा हाथ है देसाई। चिन्ता मत करो।” काजू का एक पीस मुँह में डाल कर नेताजी बोले।
“तब तो अब खान की बर्बादी के दिन शुरु हो गये।” देसाई बोला।
“खान पर दो तरफा अटैक होगा। एक तो हम उसे जीने नहीं देंगे, दूसरी तरफ पुलिस उसके पीछे कुत्ते की तरह लग जायेगी। मैंने इस बारे में कमिश्नर से भी बात कर रखी है।” गिलास टेबल पर रख कर नेताजी बोले।
“मैंने भी कुछ इंतजाम किये हैं, उसकी नैया डुबाने के लिये।” व्यंग्य से देसाई बोला।
नेताजी ने सोफे से पहलू बदला और कहा, “देसाई खान के बाद सत्ता तुम्हें ही संभालनी है।” नेताजी के चेहरे पर मुस्कान आ ठहरी।
“लेकिन सरताज तो आप ही रहेंगे।” लम्बी साँस लेता हुआ देसाई बोला।
“नाम तुम्हारा और काम हमारा। यह तो होना ही है देसाई। अवस्थी जो ठान लेता है, वह करके ही मानता है।” जहरीली मुस्कान के साथ नेताजी बोले।
“खान की बर्बादी में जो भी खर्चा आयेगा, हम उठायेंगे। रुपए-पैसे की चिन्ता ना करो। साधारण स्वर में नेताजी बोले।
“ठीक है नेताजी। अब मुझे इजाजत दीजिये। काफी देर हो गयी है।” नेताजी ने सहमति से गर्दन हिला दी।
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