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चंद्रेश बात करते करते शून्य में खो गया। उसने अतीत में छलांग लगाई।
मौसम खुशनुमा था। आकाश पर बादल छाये हुए थे। हल्की-हल्की बूंदा-बांदी हो रही थी। मिट्टी की सुगंध लुभावनी लग रही थी। हल्की-हल्की हवा ठंड का अहसास करा रही थी। कॉलेज परिसर में आज और दिनों के मुकाबले अधिक शांति ही छाई हुई थी। कॉलेज की विशाल और आलीशान इमारत किसी राजा-महाराजा के महल का अहसास कराती थी। कॉलेज के परिसर में एक शानदार बगीचा था, जहाँ हर तरह के फूल उसकी शोभा बढ़ा रहे थे।
बगीचे में हर तरफ ग्रुप में लडके ओर लड़कियां बैठे बातें कर रहे थे। हल्की बूंदा-बांदी से उन पर कोई फर्क नहीं पड़ रहा था। सब मौसम का मज़ा ले रहे थे।
तभी कॉलेज परिसर में एक कार आकर रुकी। कार की सुन्दरता ने कई लोगों का ध्यान अपनी ओर आकर्षित किया। कार का दरवाजा खुला चंद्रेश मल्होत्रा का खूबसूरत चेहरा नजर आया। उसने काले रंग की गोल गले की टी-शर्ट ओर काली ही जीन्स की पेंट पहनी थी। रेड चीफ के काले जूते उसके पैरों की शोभा बढ़ा रहे थे। उसके सुन्दर चेहरे पर काले रंग का धूप का चश्मा लगा हुआ था, जो उसकी ख़ूबसूरती को और बढ़ा रहा था। गोरे शरीर पर काला रंग यू फब रहा था, जैसे अंगूठी में नगीना।
कई लडकियों की नजर चंद्रेश मल्होत्रा पर टिकी। कईयों के दिलों से हाय निकली, पर चंद्रेश इन सब से बेखबर अपनी ही धुन में चल रहा था। वह सब का हाल जानता था, पर जीना इसी का नाम हैं। कई लडकियों ने उस पर लाइन मारने की कोशिश की, पर उसने किसी को घास नहीं डाली। उसका मानना था कि आज तक कॉलेज में ऐसी लड़की नहीं आयी, जिसे कि दिल दिया जा सके। लड़कियां उसे घमंडी और अकडू समझती थी।
पैसे की चंद्रेश के पास कोई कमी नहीं थी। उसका जीवन शान से चल रहा था। वह पूरे राजसी ढंग से जीता था। जो चीज़ उसे पसंद आ गयी, वह किसी भी कीमत पर खरीदना उसका शौक था। अचानक बूंदा-बांदी ने रफ़्तार पकड़ ली। चंद्रेश, जो लापरवाही से कॉलेज की तरफ कदम बढ़ा रहा था, अचानक उसकी चाल में तेज़ी आ गयी। उसने भाग कर इमारत में प्रवेश किया, तब तक बारिश तेज़ी से गिरने लगी।
थोड़ी ही देर में बगीचा खाली हो गया। लोग इमारत की तरफ भागने लगे। हर तरफ पानी ही पानी दिखने लगा। बारिश की वजह से मौसम ठंडा हो गया। चंद्रेश को चाय की तलब लगी। उसने चश्मा उतारा और उसे अपनी टी-शर्ट पर टांगा और कैंटीन में प्रवेश कर गया। सब तरफ टेबल भरे थे। हँसी मजाक और शोर गुल से कैंटीन का वातावरण गर्म था।
चंद्रेश की निगाहें सब तरफ घूमने लगी। एक कुर्सी पर मोटा नंबर का चश्मा लगाए एक लड़का बहुत ही गुमसुम अन्दाज में बैठा था। जैसे किसी बहुत ही गहरी सोच में डूबा हो। चंद्रेश के चेहरे पर हल्की मुस्कान आ गयी और उसके कदम उसी टेबल की तरफ चल पड़े।
उसके पास पहुँच कर चंद्रेश ने जोर से उसकी पीठ पर हाथ मारा और बोला, “क्या हाल हैं मेरे हीरो।” लड़का अचानक से चौंक पड़ा।
“आ गया मेरी जान का दुश्मन।” वह होठों होठों में बड़बड़ाया।
“जो भी बोल रहा है, ऊँचा बोल, मुझे कम सुनाई देता है।” चंद्रेश ने व्यंग्य से कहा।
“अरे मेरे बाप, मेरी क्या मज़ाल, जो तेरे बारे में कहूँ।” बलवन्त मुँह बिगाड़ कर बोला।
“और देवदास, सुना यह क्या शक्ल बना रखी है? लगता है आज फिर प्यार में धोखा मिला मेरे मजनूँ को।” चंद्रेश के स्वर में मुस्कान थी।
“आप तो कॉलेज के हीरो हैंI आपको क्या फर्क पड़ता है, कि मेरे साथ क्या हो रहा है।” दुखी स्वर में बलवन्त बोला।
“अच्छा मजनूँ, छोड़ बेकार की बात, चल कॉफ़ी मंगा, ठण्ड लग रही है।” बलवन्त ने सहमति से सिर हिलाया और कॉफ़ी का ऑर्डर दे दिया।
अचानक कैंटीन में चहल-पहल बढ़ गयी। चार-पांच लड़कों की टोली अचानक अन्दर आ गयी और टेबल पर पड़ी वस्तुओं से छेड़खानी करने लगी।
एक लड़का भाग कर उनके पास पहुँचा, “आपके लिये क्या लाऊँ सुमित सर?”
“पांच कोक तुरंत हाज़िर की जाये।” रौब से सुमित बोला।
लड़का जैसे आया था, वैसे ही चला गया।
“आ गये मुफ्तखोर।” कैंटीन का मालिक मन ही मन बड़बड़ाया।
पर ऊपरी तौर पर वह खुश दिखायी दे रहा था। नौकर ने उसका आर्डर तीव्र गति से सर्व किया। कोक की चुस्की लगाते समय उसकी नज़रें हर तरफ घूम रही थी। उनके सामने वाली टेबल के पास तीन लड़कियां आपस में घुट-घुट कर बातें कर रही थी। उनको देख कर सुमित अवस्थी के होंठ सीटी बजाने के अंदाज में गोल हो गये। चारों साथियों की नजरें सुमित अवस्थी की तरफ गयी। उसकी निगाह का पीछा करते हुए उन सबकी निगाहें लड़कियों से टकराई। वह सब मन ही मन मुस्कुराने लगे। सुमित अवस्थी उठ कर खड़ा हुआ। अपने बालों पर हाथ फेरते हुए वह लड़कियों की टेबल की तरफ बढ़ा।
बलवन्त की नजरें सुमित अवस्थी से टकराई, उसने चंद्रेश को कोहनी मारते हुए कहा, “नयी लवस्टोरी शुरू होने जा रही है। ड्रामा शुरू होने वाला है।”
चंद्रेश की नजरें भी सुमित अवस्थी से टकराई। उसको देख कर चंद्रेश के होंठ सिकुड़े। उसने दाँत भींच कर कहा, “कॉलेज में गुंडागर्दी ज्यादा ही बढ़ गयी है। लगता है सबक सिखाना पड़ेगा।”
“क्या मैं यहाँ बैठ सकता हूँ?” सुमित अवस्थी ने सिर झुका कर कहा।
तीनों लड़कियों की बातें रुक गयी। एक लड़की उसकी तरफ व्यंग्य भरी नजरों से देख कर बोली, “किस खुशी में बैठना चाहते हो?”
“जाने दे निशा, हम चलते हैं।” एक सहेली ने घबराकर कहा।
सुमित अवस्थी ने बिना कुछ कहे कुर्सी पीछे खिंची और बैठ गया। दोनों कोहनी टेबल पर टिकाई। उसका पूरा ध्यान निशा की तरफ था। “क्या मैं आपका नाम जान सकता हूँ।” अपने शब्दों में प्यार घोलता हुआ सुमित बोला।
“क्यों घर में बहन की कमी है क्या?” निशा ने तुनक कर जवाब दिया।
दोनों सहेली डर के मारे कुर्सी से खड़ी हो गयी और निशा से बोली, “चलो निशा, क्लास स्टार्ट होने वाली हैI” निशा कुर्सी पर जमी रही। उसका उठने का कोई प्रोग्राम नहीं दिख रहा था।
“बहन तो घर में है, पर प्रेमिका नहीं है।” सुमित अवस्थी अपनी बायीं आँख दबा कर अश्लीलता से हँसा। उसने निशा का हाथ पकड़ा ही था कि निशा का दूसरा हाथ तेज गति से घूमा और सुमित अवस्थी के गाल से टकराया।
एक जोरदार आवाज कैंटीन में गूंजी। सबका ध्यान सुमित की तरफ चला गया। सुमित के गाल पर थप्पड़ के निशान साफ़ दिखायी दे रहे थे। कैंटीन में सब सांस रोके उस दृश्य को देख रहे थे।
सुमित का चेहरा अपमान से लाल हो गया। वह जोरदार ढंग से उठ खड़ा हुआ खूंखार ढंग से निशा की तरफ बढ़ा, “लगता है चींटी के पर निकल आये हैं।” गुस्से में वह भयानक लगने लगा।
निशा के चेहरे पर किसी तरह का भाव नहीं था। उसकी दोनों सहेलियाँ यह दृश्य देख कर वहाँ से नौ दो ग्यारह हो गयी थी।
“साली भाव खाती है। मुझे जानती नहीं, अब देखता हूँ तुझे बचाने कौन-सा सूरमा आता है?” यह कहकर उसने निशा को दबोच लिया और उसके होठों पर किस करने की कोशिश करने लगा। निशा अपने आपको छुड़ाने का प्रयास करने लगी।
इतने में पीछे से किसी ने सुमित अवस्थी की पीठ पर हाथ रख कर थपथपाया, “किसकी मौत आयी है?” घूमकर सुमित अवस्थी बोला।
पीछे से सिर झुकाकर चंद्रेश मल्होत्रा बोला, “बंदा आपको सलाम करता है और इस कन्या को छोड़ने की विनती करता है।” चंद्रेश ने हाथ जोड़कर मीठे स्वर में कहा।
“क्या तेरी बहन लगती है?” सुमित के स्वर में दरिंदगी उभरी।
“बहन तो आपकी लगती है सरकार। हम तो ठहरे वैरागी। सांसारिक मोह माया से दूर हैं हम।” व्यंग्य भरे स्वर में चंद्रेश ने कहा।
निशा हैरानी से चंद्रेश को देख रही थी। उसकी चंद्रेश में दिलचस्पी बढ़ गयी। तभी कैंटीन का मालिक माहौल देखकर बीच में आ गया और विनती भरे स्वर में सुमित से बोला, “भाईजी जाने दो, कैंटीन में झगडा मत करो।”
सुमित ने एक हाथ से उसको धक्का दिया। कैंटीन मालिक घबराकर कोने में दुबक गया।
सुमित खतरनाक ढंग से चंद्रेश की तरफ बढ़ा। चंद्रेश ने मुस्करा कर उसका स्वागत किया। सुमित ने जोरदार घूँसा चंद्रेश के चेहरे पर मारना चाहा, जिसे बीच में ही चंद्रेश ने रोक लिया और जोरदार घूँसा सुमित के पेट पर मारा। सुमित का सारा शरीर दर्द से ऐंठ गया। इतने में सुमित के चमचे आकर सुमित के पास खड़े हो गये। एक ने अपनी जेब से चाकू निकाला।
चंद्रेश मुस्कुराया, “ओह, तो कुत्ते के साथ पिल्ले भी आये हैं।” जहरीली मुस्कान उसके चेहरे पर उभरी।
चारों ने उसे सब तरफ से घेर लिया था। चंद्रेश मल्होत्रा ब्लैक बेल्टधारी था। उसका पूरा शरीर अकड़ गया और वह जूडो-कराटे के दाँव-पेंच अपनाने के लिये तैयार हो गया। दस मिनट के बाद चारों धूल चाट रहे थे। सुमित अवस्थी घायल पड़ा था। इस झड़प में चंद्रेश भी मामूली रूप से घायल हो गया था। हाथ से खून बह रहा था। उसने उसकी तरफ ध्यान नहीं दिया। कैंटीन के मालिक को आवाज लगाई। वह सहमा-सहमा उसके पास आया।
“कितना नुकसान हुआ कैंटीन का?” उसने शराफत से पूछा।
“जाने दो साहब, मैं मैनेज कर लूँगा।” मालिक डरते –डरते बोला।
“क्यों मैनेज करोगे? मुझे अभी हिसाब बताओ। मैं उधारी पर भरोसा नहीं करता।”
मालिक हिसाब लगा कर बोला, “बाईस सौ के करीब नुकसान हो गया होगा अंदाजा से।”
चंद्रेश ने अपने बटुए से पांच सौ के सात नोट निकाल कर मालिक को पकड़ा दिये।” बाकी के रूपए से इनकी दवा दारू करा देना।” सुमित की तरफ देख कर चंद्रेश बोला।
सुमित टूटी-फूटी हालत में पड़ा था, “वक्त आने दे बेटा, मैं इसका बदला जरुर लूँगा।” मन ही मन सुमित बुदबुदाया।
बलवंत को साथ लेकर चंद्रेश कैंटीन से बाहर निकल गया। थोड़ी देर में माहौल सामान्य हो गया, लेकिन निशा के मन में हलचल हो रही थी।
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मौसम खुशनुमा था। आकाश पर बादल छाये हुए थे। हल्की-हल्की बूंदा-बांदी हो रही थी। मिट्टी की सुगंध लुभावनी लग रही थी। हल्की-हल्की हवा ठंड का अहसास करा रही थी। कॉलेज परिसर में आज और दिनों के मुकाबले अधिक शांति ही छाई हुई थी। कॉलेज की विशाल और आलीशान इमारत किसी राजा-महाराजा के महल का अहसास कराती थी। कॉलेज के परिसर में एक शानदार बगीचा था, जहाँ हर तरह के फूल उसकी शोभा बढ़ा रहे थे।
बगीचे में हर तरफ ग्रुप में लडके ओर लड़कियां बैठे बातें कर रहे थे। हल्की बूंदा-बांदी से उन पर कोई फर्क नहीं पड़ रहा था। सब मौसम का मज़ा ले रहे थे।
तभी कॉलेज परिसर में एक कार आकर रुकी। कार की सुन्दरता ने कई लोगों का ध्यान अपनी ओर आकर्षित किया। कार का दरवाजा खुला चंद्रेश मल्होत्रा का खूबसूरत चेहरा नजर आया। उसने काले रंग की गोल गले की टी-शर्ट ओर काली ही जीन्स की पेंट पहनी थी। रेड चीफ के काले जूते उसके पैरों की शोभा बढ़ा रहे थे। उसके सुन्दर चेहरे पर काले रंग का धूप का चश्मा लगा हुआ था, जो उसकी ख़ूबसूरती को और बढ़ा रहा था। गोरे शरीर पर काला रंग यू फब रहा था, जैसे अंगूठी में नगीना।
कई लडकियों की नजर चंद्रेश मल्होत्रा पर टिकी। कईयों के दिलों से हाय निकली, पर चंद्रेश इन सब से बेखबर अपनी ही धुन में चल रहा था। वह सब का हाल जानता था, पर जीना इसी का नाम हैं। कई लडकियों ने उस पर लाइन मारने की कोशिश की, पर उसने किसी को घास नहीं डाली। उसका मानना था कि आज तक कॉलेज में ऐसी लड़की नहीं आयी, जिसे कि दिल दिया जा सके। लड़कियां उसे घमंडी और अकडू समझती थी।
पैसे की चंद्रेश के पास कोई कमी नहीं थी। उसका जीवन शान से चल रहा था। वह पूरे राजसी ढंग से जीता था। जो चीज़ उसे पसंद आ गयी, वह किसी भी कीमत पर खरीदना उसका शौक था। अचानक बूंदा-बांदी ने रफ़्तार पकड़ ली। चंद्रेश, जो लापरवाही से कॉलेज की तरफ कदम बढ़ा रहा था, अचानक उसकी चाल में तेज़ी आ गयी। उसने भाग कर इमारत में प्रवेश किया, तब तक बारिश तेज़ी से गिरने लगी।
थोड़ी ही देर में बगीचा खाली हो गया। लोग इमारत की तरफ भागने लगे। हर तरफ पानी ही पानी दिखने लगा। बारिश की वजह से मौसम ठंडा हो गया। चंद्रेश को चाय की तलब लगी। उसने चश्मा उतारा और उसे अपनी टी-शर्ट पर टांगा और कैंटीन में प्रवेश कर गया। सब तरफ टेबल भरे थे। हँसी मजाक और शोर गुल से कैंटीन का वातावरण गर्म था।
चंद्रेश की निगाहें सब तरफ घूमने लगी। एक कुर्सी पर मोटा नंबर का चश्मा लगाए एक लड़का बहुत ही गुमसुम अन्दाज में बैठा था। जैसे किसी बहुत ही गहरी सोच में डूबा हो। चंद्रेश के चेहरे पर हल्की मुस्कान आ गयी और उसके कदम उसी टेबल की तरफ चल पड़े।
उसके पास पहुँच कर चंद्रेश ने जोर से उसकी पीठ पर हाथ मारा और बोला, “क्या हाल हैं मेरे हीरो।” लड़का अचानक से चौंक पड़ा।
“आ गया मेरी जान का दुश्मन।” वह होठों होठों में बड़बड़ाया।
“जो भी बोल रहा है, ऊँचा बोल, मुझे कम सुनाई देता है।” चंद्रेश ने व्यंग्य से कहा।
“अरे मेरे बाप, मेरी क्या मज़ाल, जो तेरे बारे में कहूँ।” बलवन्त मुँह बिगाड़ कर बोला।
“और देवदास, सुना यह क्या शक्ल बना रखी है? लगता है आज फिर प्यार में धोखा मिला मेरे मजनूँ को।” चंद्रेश के स्वर में मुस्कान थी।
“आप तो कॉलेज के हीरो हैंI आपको क्या फर्क पड़ता है, कि मेरे साथ क्या हो रहा है।” दुखी स्वर में बलवन्त बोला।
“अच्छा मजनूँ, छोड़ बेकार की बात, चल कॉफ़ी मंगा, ठण्ड लग रही है।” बलवन्त ने सहमति से सिर हिलाया और कॉफ़ी का ऑर्डर दे दिया।
अचानक कैंटीन में चहल-पहल बढ़ गयी। चार-पांच लड़कों की टोली अचानक अन्दर आ गयी और टेबल पर पड़ी वस्तुओं से छेड़खानी करने लगी।
एक लड़का भाग कर उनके पास पहुँचा, “आपके लिये क्या लाऊँ सुमित सर?”
“पांच कोक तुरंत हाज़िर की जाये।” रौब से सुमित बोला।
लड़का जैसे आया था, वैसे ही चला गया।
“आ गये मुफ्तखोर।” कैंटीन का मालिक मन ही मन बड़बड़ाया।
पर ऊपरी तौर पर वह खुश दिखायी दे रहा था। नौकर ने उसका आर्डर तीव्र गति से सर्व किया। कोक की चुस्की लगाते समय उसकी नज़रें हर तरफ घूम रही थी। उनके सामने वाली टेबल के पास तीन लड़कियां आपस में घुट-घुट कर बातें कर रही थी। उनको देख कर सुमित अवस्थी के होंठ सीटी बजाने के अंदाज में गोल हो गये। चारों साथियों की नजरें सुमित अवस्थी की तरफ गयी। उसकी निगाह का पीछा करते हुए उन सबकी निगाहें लड़कियों से टकराई। वह सब मन ही मन मुस्कुराने लगे। सुमित अवस्थी उठ कर खड़ा हुआ। अपने बालों पर हाथ फेरते हुए वह लड़कियों की टेबल की तरफ बढ़ा।
बलवन्त की नजरें सुमित अवस्थी से टकराई, उसने चंद्रेश को कोहनी मारते हुए कहा, “नयी लवस्टोरी शुरू होने जा रही है। ड्रामा शुरू होने वाला है।”
चंद्रेश की नजरें भी सुमित अवस्थी से टकराई। उसको देख कर चंद्रेश के होंठ सिकुड़े। उसने दाँत भींच कर कहा, “कॉलेज में गुंडागर्दी ज्यादा ही बढ़ गयी है। लगता है सबक सिखाना पड़ेगा।”
“क्या मैं यहाँ बैठ सकता हूँ?” सुमित अवस्थी ने सिर झुका कर कहा।
तीनों लड़कियों की बातें रुक गयी। एक लड़की उसकी तरफ व्यंग्य भरी नजरों से देख कर बोली, “किस खुशी में बैठना चाहते हो?”
“जाने दे निशा, हम चलते हैं।” एक सहेली ने घबराकर कहा।
सुमित अवस्थी ने बिना कुछ कहे कुर्सी पीछे खिंची और बैठ गया। दोनों कोहनी टेबल पर टिकाई। उसका पूरा ध्यान निशा की तरफ था। “क्या मैं आपका नाम जान सकता हूँ।” अपने शब्दों में प्यार घोलता हुआ सुमित बोला।
“क्यों घर में बहन की कमी है क्या?” निशा ने तुनक कर जवाब दिया।
दोनों सहेली डर के मारे कुर्सी से खड़ी हो गयी और निशा से बोली, “चलो निशा, क्लास स्टार्ट होने वाली हैI” निशा कुर्सी पर जमी रही। उसका उठने का कोई प्रोग्राम नहीं दिख रहा था।
“बहन तो घर में है, पर प्रेमिका नहीं है।” सुमित अवस्थी अपनी बायीं आँख दबा कर अश्लीलता से हँसा। उसने निशा का हाथ पकड़ा ही था कि निशा का दूसरा हाथ तेज गति से घूमा और सुमित अवस्थी के गाल से टकराया।
एक जोरदार आवाज कैंटीन में गूंजी। सबका ध्यान सुमित की तरफ चला गया। सुमित के गाल पर थप्पड़ के निशान साफ़ दिखायी दे रहे थे। कैंटीन में सब सांस रोके उस दृश्य को देख रहे थे।
सुमित का चेहरा अपमान से लाल हो गया। वह जोरदार ढंग से उठ खड़ा हुआ खूंखार ढंग से निशा की तरफ बढ़ा, “लगता है चींटी के पर निकल आये हैं।” गुस्से में वह भयानक लगने लगा।
निशा के चेहरे पर किसी तरह का भाव नहीं था। उसकी दोनों सहेलियाँ यह दृश्य देख कर वहाँ से नौ दो ग्यारह हो गयी थी।
“साली भाव खाती है। मुझे जानती नहीं, अब देखता हूँ तुझे बचाने कौन-सा सूरमा आता है?” यह कहकर उसने निशा को दबोच लिया और उसके होठों पर किस करने की कोशिश करने लगा। निशा अपने आपको छुड़ाने का प्रयास करने लगी।
इतने में पीछे से किसी ने सुमित अवस्थी की पीठ पर हाथ रख कर थपथपाया, “किसकी मौत आयी है?” घूमकर सुमित अवस्थी बोला।
पीछे से सिर झुकाकर चंद्रेश मल्होत्रा बोला, “बंदा आपको सलाम करता है और इस कन्या को छोड़ने की विनती करता है।” चंद्रेश ने हाथ जोड़कर मीठे स्वर में कहा।
“क्या तेरी बहन लगती है?” सुमित के स्वर में दरिंदगी उभरी।
“बहन तो आपकी लगती है सरकार। हम तो ठहरे वैरागी। सांसारिक मोह माया से दूर हैं हम।” व्यंग्य भरे स्वर में चंद्रेश ने कहा।
निशा हैरानी से चंद्रेश को देख रही थी। उसकी चंद्रेश में दिलचस्पी बढ़ गयी। तभी कैंटीन का मालिक माहौल देखकर बीच में आ गया और विनती भरे स्वर में सुमित से बोला, “भाईजी जाने दो, कैंटीन में झगडा मत करो।”
सुमित ने एक हाथ से उसको धक्का दिया। कैंटीन मालिक घबराकर कोने में दुबक गया।
सुमित खतरनाक ढंग से चंद्रेश की तरफ बढ़ा। चंद्रेश ने मुस्करा कर उसका स्वागत किया। सुमित ने जोरदार घूँसा चंद्रेश के चेहरे पर मारना चाहा, जिसे बीच में ही चंद्रेश ने रोक लिया और जोरदार घूँसा सुमित के पेट पर मारा। सुमित का सारा शरीर दर्द से ऐंठ गया। इतने में सुमित के चमचे आकर सुमित के पास खड़े हो गये। एक ने अपनी जेब से चाकू निकाला।
चंद्रेश मुस्कुराया, “ओह, तो कुत्ते के साथ पिल्ले भी आये हैं।” जहरीली मुस्कान उसके चेहरे पर उभरी।
चारों ने उसे सब तरफ से घेर लिया था। चंद्रेश मल्होत्रा ब्लैक बेल्टधारी था। उसका पूरा शरीर अकड़ गया और वह जूडो-कराटे के दाँव-पेंच अपनाने के लिये तैयार हो गया। दस मिनट के बाद चारों धूल चाट रहे थे। सुमित अवस्थी घायल पड़ा था। इस झड़प में चंद्रेश भी मामूली रूप से घायल हो गया था। हाथ से खून बह रहा था। उसने उसकी तरफ ध्यान नहीं दिया। कैंटीन के मालिक को आवाज लगाई। वह सहमा-सहमा उसके पास आया।
“कितना नुकसान हुआ कैंटीन का?” उसने शराफत से पूछा।
“जाने दो साहब, मैं मैनेज कर लूँगा।” मालिक डरते –डरते बोला।
“क्यों मैनेज करोगे? मुझे अभी हिसाब बताओ। मैं उधारी पर भरोसा नहीं करता।”
मालिक हिसाब लगा कर बोला, “बाईस सौ के करीब नुकसान हो गया होगा अंदाजा से।”
चंद्रेश ने अपने बटुए से पांच सौ के सात नोट निकाल कर मालिक को पकड़ा दिये।” बाकी के रूपए से इनकी दवा दारू करा देना।” सुमित की तरफ देख कर चंद्रेश बोला।
सुमित टूटी-फूटी हालत में पड़ा था, “वक्त आने दे बेटा, मैं इसका बदला जरुर लूँगा।” मन ही मन सुमित बुदबुदाया।
बलवंत को साथ लेकर चंद्रेश कैंटीन से बाहर निकल गया। थोड़ी देर में माहौल सामान्य हो गया, लेकिन निशा के मन में हलचल हो रही थी।
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