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Thriller फरेब

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चंद्रेश बात करते करते शून्य में खो गया। उसने अतीत में छलांग लगाई।

मौसम खुशनुमा था। आकाश पर बादल छाये हुए थे। हल्की-हल्की बूंदा-बांदी हो रही थी। मिट्टी की सुगंध लुभावनी लग रही थी। हल्की-हल्की हवा ठंड का अहसास करा रही थी। कॉलेज परिसर में आज और दिनों के मुकाबले अधिक शांति ही छाई हुई थी। कॉलेज की विशाल और आलीशान इमारत किसी राजा-महाराजा के महल का अहसास कराती थी। कॉलेज के परिसर में एक शानदार बगीचा था, जहाँ हर तरह के फूल उसकी शोभा बढ़ा रहे थे।

बगीचे में हर तरफ ग्रुप में लडके ओर लड़कियां बैठे बातें कर रहे थे। हल्की बूंदा-बांदी से उन पर कोई फर्क नहीं पड़ रहा था। सब मौसम का मज़ा ले रहे थे।

तभी कॉलेज परिसर में एक कार आकर रुकी। कार की सुन्दरता ने कई लोगों का ध्यान अपनी ओर आकर्षित किया। कार का दरवाजा खुला चंद्रेश मल्होत्रा का खूबसूरत चेहरा नजर आया। उसने काले रंग की गोल गले की टी-शर्ट ओर काली ही जीन्स की पेंट पहनी थी। रेड चीफ के काले जूते उसके पैरों की शोभा बढ़ा रहे थे। उसके सुन्दर चेहरे पर काले रंग का धूप का चश्मा लगा हुआ था, जो उसकी ख़ूबसूरती को और बढ़ा रहा था। गोरे शरीर पर काला रंग यू फब रहा था, जैसे अंगूठी में नगीना।

कई लडकियों की नजर चंद्रेश मल्होत्रा पर टिकी। कईयों के दिलों से हाय निकली, पर चंद्रेश इन सब से बेखबर अपनी ही धुन में चल रहा था। वह सब का हाल जानता था, पर जीना इसी का नाम हैं। कई लडकियों ने उस पर लाइन मारने की कोशिश की, पर उसने किसी को घास नहीं डाली। उसका मानना था कि आज तक कॉलेज में ऐसी लड़की नहीं आयी, जिसे कि दिल दिया जा सके। लड़कियां उसे घमंडी और अकडू समझती थी।

पैसे की चंद्रेश के पास कोई कमी नहीं थी। उसका जीवन शान से चल रहा था। वह पूरे राजसी ढंग से जीता था। जो चीज़ उसे पसंद आ गयी, वह किसी भी कीमत पर खरीदना उसका शौक था। अचानक बूंदा-बांदी ने रफ़्तार पकड़ ली। चंद्रेश, जो लापरवाही से कॉलेज की तरफ कदम बढ़ा रहा था, अचानक उसकी चाल में तेज़ी आ गयी। उसने भाग कर इमारत में प्रवेश किया, तब तक बारिश तेज़ी से गिरने लगी।

थोड़ी ही देर में बगीचा खाली हो गया। लोग इमारत की तरफ भागने लगे। हर तरफ पानी ही पानी दिखने लगा। बारिश की वजह से मौसम ठंडा हो गया। चंद्रेश को चाय की तलब लगी। उसने चश्मा उतारा और उसे अपनी टी-शर्ट पर टांगा और कैंटीन में प्रवेश कर गया। सब तरफ टेबल भरे थे। हँसी मजाक और शोर गुल से कैंटीन का वातावरण गर्म था।

चंद्रेश की निगाहें सब तरफ घूमने लगी। एक कुर्सी पर मोटा नंबर का चश्मा लगाए एक लड़का बहुत ही गुमसुम अन्दाज में बैठा था। जैसे किसी बहुत ही गहरी सोच में डूबा हो। चंद्रेश के चेहरे पर हल्की मुस्कान आ गयी और उसके कदम उसी टेबल की तरफ चल पड़े।

उसके पास पहुँच कर चंद्रेश ने जोर से उसकी पीठ पर हाथ मारा और बोला, “क्या हाल हैं मेरे हीरो।” लड़का अचानक से चौंक पड़ा।

“आ गया मेरी जान का दुश्मन।” वह होठों होठों में बड़बड़ाया।

“जो भी बोल रहा है, ऊँचा बोल, मुझे कम सुनाई देता है।” चंद्रेश ने व्यंग्य से कहा।

“अरे मेरे बाप, मेरी क्या मज़ाल, जो तेरे बारे में कहूँ।” बलवन्त मुँह बिगाड़ कर बोला।

“और देवदास, सुना यह क्या शक्ल बना रखी है? लगता है आज फिर प्यार में धोखा मिला मेरे मजनूँ को।” चंद्रेश के स्वर में मुस्कान थी।

“आप तो कॉलेज के हीरो हैंI आपको क्या फर्क पड़ता है, कि मेरे साथ क्या हो रहा है।” दुखी स्वर में बलवन्त बोला।

“अच्छा मजनूँ, छोड़ बेकार की बात, चल कॉफ़ी मंगा, ठण्ड लग रही है।” बलवन्त ने सहमति से सिर हिलाया और कॉफ़ी का ऑर्डर दे दिया।

अचानक कैंटीन में चहल-पहल बढ़ गयी। चार-पांच लड़कों की टोली अचानक अन्दर आ गयी और टेबल पर पड़ी वस्तुओं से छेड़खानी करने लगी।

एक लड़का भाग कर उनके पास पहुँचा, “आपके लिये क्या लाऊँ सुमित सर?”

“पांच कोक तुरंत हाज़िर की जाये।” रौब से सुमित बोला।

लड़का जैसे आया था, वैसे ही चला गया।

“आ गये मुफ्तखोर।” कैंटीन का मालिक मन ही मन बड़बड़ाया।

पर ऊपरी तौर पर वह खुश दिखायी दे रहा था। नौकर ने उसका आर्डर तीव्र गति से सर्व किया। कोक की चुस्की लगाते समय उसकी नज़रें हर तरफ घूम रही थी। उनके सामने वाली टेबल के पास तीन लड़कियां आपस में घुट-घुट कर बातें कर रही थी। उनको देख कर सुमित अवस्थी के होंठ सीटी बजाने के अंदाज में गोल हो गये। चारों साथियों की नजरें सुमित अवस्थी की तरफ गयी। उसकी निगाह का पीछा करते हुए उन सबकी निगाहें लड़कियों से टकराई। वह सब मन ही मन मुस्कुराने लगे। सुमित अवस्थी उठ कर खड़ा हुआ। अपने बालों पर हाथ फेरते हुए वह लड़कियों की टेबल की तरफ बढ़ा।

बलवन्त की नजरें सुमित अवस्थी से टकराई, उसने चंद्रेश को कोहनी मारते हुए कहा, “नयी लवस्टोरी शुरू होने जा रही है। ड्रामा शुरू होने वाला है।”

चंद्रेश की नजरें भी सुमित अवस्थी से टकराई। उसको देख कर चंद्रेश के होंठ सिकुड़े। उसने दाँत भींच कर कहा, “कॉलेज में गुंडागर्दी ज्यादा ही बढ़ गयी है। लगता है सबक सिखाना पड़ेगा।”

“क्या मैं यहाँ बैठ सकता हूँ?” सुमित अवस्थी ने सिर झुका कर कहा।

तीनों लड़कियों की बातें रुक गयी। एक लड़की उसकी तरफ व्यंग्य भरी नजरों से देख कर बोली, “किस खुशी में बैठना चाहते हो?”

“जाने दे निशा, हम चलते हैं।” एक सहेली ने घबराकर कहा।

सुमित अवस्थी ने बिना कुछ कहे कुर्सी पीछे खिंची और बैठ गया। दोनों कोहनी टेबल पर टिकाई। उसका पूरा ध्यान निशा की तरफ था। “क्या मैं आपका नाम जान सकता हूँ।” अपने शब्दों में प्यार घोलता हुआ सुमित बोला।

“क्यों घर में बहन की कमी है क्या?” निशा ने तुनक कर जवाब दिया।

दोनों सहेली डर के मारे कुर्सी से खड़ी हो गयी और निशा से बोली, “चलो निशा, क्लास स्टार्ट होने वाली हैI” निशा कुर्सी पर जमी रही। उसका उठने का कोई प्रोग्राम नहीं दिख रहा था।

“बहन तो घर में है, पर प्रेमिका नहीं है।” सुमित अवस्थी अपनी बायीं आँख दबा कर अश्लीलता से हँसा। उसने निशा का हाथ पकड़ा ही था कि निशा का दूसरा हाथ तेज गति से घूमा और सुमित अवस्थी के गाल से टकराया।

एक जोरदार आवाज कैंटीन में गूंजी। सबका ध्यान सुमित की तरफ चला गया। सुमित के गाल पर थप्पड़ के निशान साफ़ दिखायी दे रहे थे। कैंटीन में सब सांस रोके उस दृश्य को देख रहे थे।

सुमित का चेहरा अपमान से लाल हो गया। वह जोरदार ढंग से उठ खड़ा हुआ खूंखार ढंग से निशा की तरफ बढ़ा, “लगता है चींटी के पर निकल आये हैं।” गुस्से में वह भयानक लगने लगा।

निशा के चेहरे पर किसी तरह का भाव नहीं था। उसकी दोनों सहेलियाँ यह दृश्य देख कर वहाँ से नौ दो ग्यारह हो गयी थी।

“साली भाव खाती है। मुझे जानती नहीं, अब देखता हूँ तुझे बचाने कौन-सा सूरमा आता है?” यह कहकर उसने निशा को दबोच लिया और उसके होठों पर किस करने की कोशिश करने लगा। निशा अपने आपको छुड़ाने का प्रयास करने लगी।

इतने में पीछे से किसी ने सुमित अवस्थी की पीठ पर हाथ रख कर थपथपाया, “किसकी मौत आयी है?” घूमकर सुमित अवस्थी बोला।

पीछे से सिर झुकाकर चंद्रेश मल्होत्रा बोला, “बंदा आपको सलाम करता है और इस कन्या को छोड़ने की विनती करता है।” चंद्रेश ने हाथ जोड़कर मीठे स्वर में कहा।

“क्या तेरी बहन लगती है?” सुमित के स्वर में दरिंदगी उभरी।

“बहन तो आपकी लगती है सरकार। हम तो ठहरे वैरागी। सांसारिक मोह माया से दूर हैं हम।” व्यंग्य भरे स्वर में चंद्रेश ने कहा।

निशा हैरानी से चंद्रेश को देख रही थी। उसकी चंद्रेश में दिलचस्पी बढ़ गयी। तभी कैंटीन का मालिक माहौल देखकर बीच में आ गया और विनती भरे स्वर में सुमित से बोला, “भाईजी जाने दो, कैंटीन में झगडा मत करो।”

सुमित ने एक हाथ से उसको धक्का दिया। कैंटीन मालिक घबराकर कोने में दुबक गया।

सुमित खतरनाक ढंग से चंद्रेश की तरफ बढ़ा। चंद्रेश ने मुस्करा कर उसका स्वागत किया। सुमित ने जोरदार घूँसा चंद्रेश के चेहरे पर मारना चाहा, जिसे बीच में ही चंद्रेश ने रोक लिया और जोरदार घूँसा सुमित के पेट पर मारा। सुमित का सारा शरीर दर्द से ऐंठ गया। इतने में सुमित के चमचे आकर सुमित के पास खड़े हो गये। एक ने अपनी जेब से चाकू निकाला।

चंद्रेश मुस्कुराया, “ओह, तो कुत्ते के साथ पिल्ले भी आये हैं।” जहरीली मुस्कान उसके चेहरे पर उभरी।

चारों ने उसे सब तरफ से घेर लिया था। चंद्रेश मल्होत्रा ब्लैक बेल्टधारी था। उसका पूरा शरीर अकड़ गया और वह जूडो-कराटे के दाँव-पेंच अपनाने के लिये तैयार हो गया। दस मिनट के बाद चारों धूल चाट रहे थे। सुमित अवस्थी घायल पड़ा था। इस झड़प में चंद्रेश भी मामूली रूप से घायल हो गया था। हाथ से खून बह रहा था। उसने उसकी तरफ ध्यान नहीं दिया। कैंटीन के मालिक को आवाज लगाई। वह सहमा-सहमा उसके पास आया।

“कितना नुकसान हुआ कैंटीन का?” उसने शराफत से पूछा।

“जाने दो साहब, मैं मैनेज कर लूँगा।” मालिक डरते –डरते बोला।

“क्यों मैनेज करोगे? मुझे अभी हिसाब बताओ। मैं उधारी पर भरोसा नहीं करता।”

मालिक हिसाब लगा कर बोला, “बाईस सौ के करीब नुकसान हो गया होगा अंदाजा से।”

चंद्रेश ने अपने बटुए से पांच सौ के सात नोट निकाल कर मालिक को पकड़ा दिये।” बाकी के रूपए से इनकी दवा दारू करा देना।” सुमित की तरफ देख कर चंद्रेश बोला।

सुमित टूटी-फूटी हालत में पड़ा था, “वक्त आने दे बेटा, मैं इसका बदला जरुर लूँगा।” मन ही मन सुमित बुदबुदाया।

बलवंत को साथ लेकर चंद्रेश कैंटीन से बाहर निकल गया। थोड़ी देर में माहौल सामान्य हो गया, लेकिन निशा के मन में हलचल हो रही थी।

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चंद्रेश मल्होत्रा कॉलेज की लाइब्रेरी में पहुँचा। हर तरफ शांत माहौल था। आज उसका पीरियड खाली था, तो टाइम पास करने के उद्देश्य से लाइब्रेरी आ पहुँचा और मुंशी प्रेमचंद की गोदान लेकर एक टेबल पर जम गया। आज उसका एक-दो घंटे यहीं गुजारने का मूड था। उसने बुक खोली ओर उसमें डूब गया।

अभी बीस से पच्चीस मिनट ही हुए थे कि निशा अपनी सहेलियों के साथ लाइब्रेरी पहुँचीI उसकी निगाह हर तरफ घूमने लगीI एक कोने की कुर्सी पर उसे चंद्रेश बैठा हुआ दिखायी दिया, जो पूरे ध्यान से किताब पढ़ रहा था। निशा ने अपनी सहेलियों से कुछ कहा, जिसे सुनकर उसकी सहेलियां मुस्कुरा उठीं और दूसरी टेबल की तरफ बढ़ गयी। निशा उन्हें जाते हुए देखती रही। फिर उसके कदम वहाँ बढ़ गये, जहाँ चंद्रेश मल्होत्रा ‘गोदान’ नाम की उपन्यास में खोया हुआ था। उसके पास पहुँच कर निशा ठिठकी चंद्रेश को निशा के आने का भान तक नहीं हुआ। निशा ने जान कर खांसने की एक्टिंग की। चंद्रेश का ध्यान भंग हुआ। उसने निशा की तरफ देखा। निशा की आँखों में चंचलता का भाव था, “क्या मैं यहाँ बैठ सकती हूँ?”

और वह जवाब सुने बिना कुर्सी खिसका कर बैठ गयी। चंद्रेश ने उसको अनदेखा किया और अपनी किताब में डूबा रहा।

“अजीब बेवकूफ है।” निशा बड़बड़ाई।

“आप ने मुझसे कुछ कहा?” चंद्रेश ने पुस्तक बंद कर उसकी ओर देखते हुए कहा।

“उस दिन आप चले गये और मैं आपका धन्यवाद भी नहीं अदा कर पायी।” निशा ने अपने शब्दों में प्यार उड़ेलते हुए कहा।

“नेवर माइंड।” चंद्रेश ने रुखा-सा जवाब दिया।

“मेरा नाम निशा कोठारी है।” निशा ने अपना हाथ उसकी तरफ बढ़ाते हुए कहा।

चंद्रेश ने अपनी कुर्सी छोड़ते हुए उसके हाथ को नज़रअंदाज करते हुए कहा, “मुझे चंद्रेश कहते हैंI सॉरी मुझे कुछ काम याद आ गया।”

यह कह कर चंद्रेश ने लाइब्रेरी से बाहर कदम बढ़ा दिये। निशा ने ठंडी सांस ली और कुर्सी छोड़ कर अपनी सहेलियों के पास आ गयी।

“क्या हाल हैं हमारी लैला के?” एक सहेली ने कटाक्ष करते हुए पूछा।

दूसरी सहेली मुस्कुरा कर बोली, “दिल हार गयी बेचारी।”

निशा ने गुस्से भरी नज़रों से सबको देखा और बोली, “खडूस है, बेवकूफ कुछ समझता ही नहीं।”

“चंद्रेश मल्होत्रा ने आज तक कॉलेज में किसी लड़की को घास नहीं डाली।” एक सहेली बोली।

“देखती हूँ कब तक बचता है।” निशा मुँह बना कर बोली।

“निशा, अगर तूने उसे पटा लिया, तो में तेरी गुलामी करुँगी।” उपासना नाम की सहेली बोली।

“गुलामी क्या शर्त लगा, अगर सप्ताह-भर में मैंने उसे अपने आगे-पीछे ना घुमाया, तो मेरा नाम भी निशा कोठारी नहीं।” निशा गर्व से बोली।

“हार जायेगी।” उपासना ने कहा।

“हिम्मत है तो लगा दो-दो हज़ार रुपए की शर्त।” निशा उपासना को जोश दिलाते हुए बोली।

“ठीक है, अगर तूने उसे सप्ताह-भर के अन्दर अपना आशिक बना लिया, तो मैं तुझे दो हज़ार रुपए और साथ में पार्टी भी दूंगी।” यह कह कर उसने अपना हाथ आगे बढ़ाया। तुरंत ही निशा ने उसका हाथ पकड़ लिया।

“डन, एक सप्ताह के बाद तू पार्टी के लिये तैयार रहना।” निशा उत्साह से बोली।

“लेकिन अगर एक सप्ताह के अन्दर तू उसे अपना आशिक ना बना पायी, तो सजा के तौर पर हम जो कहेंगे, तुझे मानना होगा।” निशा ने सहमति से अपना सिर हिलाया और सोचने की मुद्रा में प्लान बनाने लगी।

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चंद्रेश आज सोच में डूबा हुआ कार चला रहा था। आज उसका मन कुछ उदास था। कुछ भी काम करने की उसकी इच्छा नहीं हो रही थी। कार अपनी फुल स्पीड में मंजिल कॉलेज की तरफ बढ़ रही थी। अचानक उसका पैर ब्रेक पर पड़ा। सामने से कोई अचानक कार के आगे आ गया था। अचानक ब्रेक लगने से कार जाम हो गयी। तेज ब्रेक लगने की वजह से आसपास से गुजर रहे लोगों की नजरें इस कार पर पड़ गयी और लोग दौड़कर कार के पास आ गये। भीड़ बढ़ने लगी। लोग कारवाले को बुरा-भला कहने लगे।

भीड़ से आवाज आनी शुरू हो गयी, “लोग सवेरे-सवेरे पी कर चलाते हैं।” एक चिल्लाया

“इन अमीरों ने गरीबों को कीड़ा-मकोड़ा समझ रखा है।” लोग कार को घेर कर ऐसे खड़े हो गये, कि जैसे ही दरवाजा खुले, तो लोग अपना हाथ साफ कर सकें।

चंद्रेश के चेहरे पर घबराहट छाई हुई थी। उसने जान-बूझकर दरवाजा नहीं खोला। भीड़ आक्रोश में थी। तभी जो लड़की कार के आगे गिरी थी, वह धीरे से उठ खड़ी हुई और भीड़ को समझाने लगी, “गलती इनकी नहीं, मेरी थी। मैं ही सोच में डूबी हुई सड़क पार कर रही थी। गलती से कार के सामने आ गयी।”

लोग, जो यह सोच रहे थे कि चलो आज तो हाथ साफ़ करने का मौका मिला, वह बड़बड़ाए, “भलाई का तो जमाना ही नहीं रह गया।”

धीरे-धीरे सब अपने काम में लग गये। सड़क खाली हो गयी। भीड़ छंटने लगी। थोड़ी देर में माहौल सामान्य हो गया। लड़की उठी और अपने रास्ते चल दी।

चंद्रेश का ध्यान भंग हुआ। उसने ठन्डी और गहरी सांस ली। चारों तरफ नजर उठा कर उसने उस लड़की को देखा। वह कही नहीं दिखायी दी। वह जिस तरह आयी थी, उसी तरह गायब भी हो गयी। चंद्रेश ने गहरी सांस लेते हुए कार आगे बढ़ाई।

उसकी सोच से वह लड़की जाने का नाम नहीं ले रही थी।

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चंद्रेश ने कार पार्किंग में जाकर रोकी। देखा आज कॉलेज में काफी भीड़-भाड़ थीI उसने कार लॉक की। सामने से उसे विमल नजर आया। उसे देख कर चंद्रेश मुस्कराया। विमल भी उसको देखकर मुस्करा कर बोला, “क्या बात है हीरो, आज तो कुछ ज्यादा ही जम रहे हो।”

“ऐसी कोई बात नहीं है यार विमल, पर आज कॉलेज में बहुत चहल-पहल दिख रही है, क्या कोई फंक्शन है?”

“हाँ यार, कॉलेज का तो फंक्शन ही कहेंगे।”

“क्यों ऐसा क्या होने वाला है आज?”

“कॉलेज में इलेक्शन की तैयारी चल रही है। हमारे सुमित अवस्थी जी, अध्यक्ष पद के लिये खड़े हो रहे हैं।” मुँह बना कर विमल ने कहा।

“क्या? इस कॉलेज में कोई ढंग का उम्मीदवार नहीं है, जो गुंडे-बदमाश इलेक्शन लड़ रहे हैं।”

“यार तू सुमित अवस्थी को नहीं जानता। उसका बाप इस राज्य का एक मंत्री है। उसकी पहुँच ऊपर तक हैI लगता है ये चुनाव सुमित के अलावा कोई दूसरा नहीं जीत सकता।” उसकी आवाज में विश्वास के भाव थे।

चंद्रेश ने कहा, “चल यार हम गार्डन में चल कर बात करते हैं। आज मन उदास है और तूने ये बुरी खबर और सुना दी। दोनों के कदम गार्डन की तरफ बढ़ने लगे।

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गार्डन चारों तरफ से भरा हुआ था। हरी-हरी घास मन को लुभा रही थी। दोनों वहीं घास पर बैठ गये। विमल चंद्रेश की तरफ देख कर बोला, “यार तू इतना हैण्डसम है कि लड़कियां तुझ पर मरती हैं और एक तू है कि किसी पर ध्यान ही नहीं देता।”

“कुछ दूसरी बात कर यार, लड़कियों की बात कर के क्यों बोर कर रहा है?” चंद्रेश सामान्य स्वर में बोला।

“क्या यार प्यार-मोहब्बत के बारे में तू निरा मूर्ख है।” विमल ने हंसते हुए कहा।

अचानक चंद्रेश की नजरें जो चारों तरफ घूम रही थी, एक जगह जाकर स्थिर हो गयी।

उसे आश्चर्य हुआ। विमल ने भी उसकी निगाहों का पीछा करते हुए देखा, तो सामने एक बहुत ही सुंदर लड़की दिखायी दे रही थी। उसका रंग-रूप ऐसा था कि मक्खन में किसी ने चुटकी भर सिंदूर मिला दिया हो। वह सादगी की प्रतिमूर्ति लग रही थी। उसके चेहरे पर किसी तरह का मेंकअप नहीं था। बस माथे पर एक छोटी-सी काली बिंदी लगा रखी थी, जो उसके रूप को और निखार रही थी। उसने सादे ढंग के कपडे पहने हुए थे, जो उसकी सादगी को और भी बढ़ा रहे थे। ऐसे लगता था, जैसे वह मध्यमवर्गीय परिवार से ताल्लुक रखती हो। उसको देख कर विमल के होंठ सिकुड़े और धीमी-धीमी आवाज में सीटी बजने लगी। चंद्रेश की नज़रें उसके खूबसूरत चेहरे पर थी, जो गंभीरता की प्रतिमूर्ति बने हुए थे। ऐसा लग रहा था, जैसे उसे आस-पास होने वाली घटना का कोई भान न हो। वह किताबों में खोई हुई थी।

विमल की सीटी की आवाज सुनकर चंद्रेश अपनी सोच से बाहर निकला, “तू बैठ, मैं अभी आता हूँ।” कह कर चंद्रेश उठ गया और उसने लड़की की तरफ अपने कदम बढ़ाये। विमल मन ही मन बड़बड़ाया, “लगता है अपना हीरो बोल्ड हो गया।” वह गहरी सांस छोड़ते हुए घास पर ही लम्बा हो गया और आँखें मूंद कर लेट गया।

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चंद्रेश लड़की के सम्मुख पहुँचा। शांत भाव से उसको देखने लगा। अचानक लड़की की नजरें बुक से हटी। चंद्रेश को सामने देखकर वह हिचकिचा कर खड़ी हो गयी।

“आप का बहुत-बहुत धन्यवाद जो आपने आज मुझे पिटने से बचा लिया, वर्ना पब्लिक तो मेरा कचूमर ही निकाल देती।” चंद्रेश ने मीठे स्वर में कहा।

“आपकी गलती नहीं थी। मैं ही अपने धुन में चल रही थी। मुझे रास्ते का ध्यान नहीं रहा।” लड़की ने शरमा कर नजरें झुका कर कहा।

चंद्रेश को ऐसा लगा, जैसे उसके कानों में मधुर घंटी बजी हो। उसका दिल जोर से धड़कने लगा। उसके मुँह से बड़ी मुश्किल से शब्द निकल रहे थे, “क्या मैं आपका नाम जान सकता हूँ?” चंद्रेश ने पूछा।

“वंशिका।” लड़की के मुँह से एकमात्र शब्द निकला।

“एक्सीडेंट के बाद आप तो बिना बताये गायब हो गयी थीं। मैंने बहुत देर तक देखा आपको, लेकिन आप कही नहीं दिखीं।”

“जी, मुझे ज्यादा चोट नहीं लगी थी, इसलिये चली आयी। अच्छा नमस्ते, मेरा लेक्चर शुरू होने वाला हैI” कह कर वंशिका ने अपनी पुस्तकों को संभाला और कॉलेज की इमारत की तरफ बढ़ गयी।

चंद्रेश पागलों की तरह उसे जाता हुआ देखता रहा। फिर गहरी सांस लेकर विमल की ओर चल दिया। विमल आँख बंद कर अधलेटा था। चंद्रेश ने उसे उठाया।

“आ गये मजनू, मामला नहीं जमा।” व्यंग्य से विमल बोला।

ठंडी सांस लेता लेता हुआ चंद्रेश उसके पास बैठ गया।

“यार चंद्रेश, तू इलेक्शन में अध्यक्ष पद के लिये खड़ा हो जा।” विमल के स्वर में उत्तेजना थी।

“सठिया गये हो क्या? मैं और इलेक्शन? अपन तो ऐसे ही सही हैं।” चंद्रेश ने उबासी लेते हुए कहा।

तभी दूर से निशा आती दिखायी दी। लाल टॉप और ब्लैक जीन्स में वह क़यामत लग रही थी। उसके बाल खुले हुए थे। उसकी लटें उसके चेहरे को चूम रही थी। उसका मेंकअप ऐसा था कि देखने वाला देखता ही रह जाये। उर्वसी का अवतार लग रही थी। विमल की आँखें और होंठ खुले के खुले के खुले रह गये।

“क्या मैं यहाँ बैठ सकती हूँ?” उसने चंद्रेश से पूछा।

“हां-हां, यहाँ क्यों, आप तो मेरी गोद में भी बैठ सकती हो।” विमल धीरे से बोला।

“क्या बोला आपने?” निशा ने गुस्से से विमल से कहा।

विमल हड़बड़ा कर दूसरी तरफ देखने लगा।

चंद्रेश ने उठते हुए कहा, “हमारे कैंटीन जाने का टाइम हो गया है। आप यहाँ शौक से बैठिये।”

निशा के चेहरे पर गुस्से के भाव उभरे।

“मुझमें क्या कांटे लगे हैं जो तुम मुझसे दूर भागते हो? पल दो पल प्यार की बात भी नहीं करते।” मुँह फुला कर निशा ने कहा।

“आप मुझसे पल दो पल प्यार की बात कर लीजिये, ये तो निरा मूर्ख है।” विमल ने मौके का फायदा उठाते हुए कहा।

“अपनी शक्ल आईने में देखी है?” निशा क्रोध से बोली।

“अब तो लगता है, चाय से ही काम चलाना पड़ेगा। कहाँ नसीब में एक भी नहीं और लोगों के नसीब में दो-दो मिल जाती हैं।” वह चंद्रेश को देख कर व्यंगात्मक स्वर में बोला।

“तुम कुछ कहते क्यों नहीं?” निशा चंद्रेश से बोली।

“अबकी बार इलेक्शन में वोट मुझे ही देना” चंद्रेश मासूम स्वर में बोला।

“क्या?” निशा आश्चर्य से बोली।

“तुमने कुछ बोलने के लिये कहा, सो मैंने बोल दिया।” चंद्रेश शांत भाव से मुस्कुरा कर बोला।

“तुमसे तो बात करना ही बेकार है।” निशा पैर पटकती हुई वहाँ से रवाना हो गयी।

चंद्रेश और विमल के चेहरे पर मुस्कान दौड़ पड़ी। दोनों उठे और कैंटीन की तरफ बढ़ गये।

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शानदार फार्म हाउस था। यहाँ सुमित अवस्थी अपने चंद दोस्तों के साथ उपस्थित था। दोपहर का समय था। हर तरफ धूप निखरी हुई थी। फार्म हाउस में चारों तरफ हरियाली फैली हुई थी। शांत वातावरण में कभी-कभी पक्षियों की चहकने की आवाज वातावरण को और भी अच्छा बना रही थी। फार्म हाउस के बीच में एक शानदार बंगला बना हुआ था। बंगले के शानदार कमरे में पार्टी का दौर शुरू हो रहा था। खाने-पीने का वहाँ पूरा प्रबंध था।

अचानक सुमित अवस्थी अपना गिलास उठा कर बोला, “दोस्तो, यह पार्टी मैंने आप लोगों को इसलिये दी है कि आप लोग इलेक्शन में मेरा साथ दो। मुझे यह इलेक्शन हर हालत में जीतना है। चाहे जितना पैसा खर्च हो, चिंता ना करो। सुमित अवस्थी क्या चीज़ है, यह लोग जान जायेंगे। भले ही किसी भी संगठन ने मुझे टिकट नहीं दिया, पर मैं निर्दलीय ही इलेक्शन जीत सकता हूँ।”

अचानक वह रुका। उसने घूँट भरा और सबकी तरफ देखा। ज्यादा पीने से उसकी आँखें लाल हो गयी थी और जुबान लडखड़ाने लगी थी।

“यार सुमित, इलेक्शन में तेरे जैसा दमदार प्रत्याशी कोई है ही नहीं। भले ही दोनों पार्टियों ने तुझे टिकट नहीं दिया, लेकिन तू ही जीतेगा, यह हम सब जानते हैं।” एक ने उसे चढ़ा कर कहा।

“हां भाई, माहौल अपने पक्ष में ही है। हम पैसा पानी की तरह बहा देंगे। भले ही वोट प्यार से, डरा के, धमका के लेना पड़े, लेंगे।” एक चमचे ने लेटे-लेटे ही कहा।

“वैसे मुझे उम्मीद नहीं है कि कोई सुमित अवस्थी के सामने खड़ा हो पाएगा। दोनों संगठन ने जो भी उम्मीदवार खड़े किये हैं, उनकी इतनी औकात नहीं की, मेरे सामने खड़े रह पायें।” सुमित अवस्थी का स्वर घमंड से भरा हुआ था।

“आज इसी खुशी में जश्न मनाओ यारों, कल से कॉलेज में कैंपेन शुरू करना है।” सब ने जोरदार ढंग से सुमित का समर्थन किया।

वहाँ का वातावरण कानफाडू संगीत और हँसी ठिठोली में भर गया। फार्म हाउस की शान्ति पल भर में भंग हो गयी।

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बायोलॉजी की क्लास चल रही थी। आगे वाली शीट पर वंशिका शांत बैठी थी और ध्यान से लेक्चर सुन रही थी। सबसे लास्ट वाली कुर्सी पर चंद्रेश मल्होत्रा बैठा था। वह आर्ट का स्टूडेंट था, लेकिन वंशिका के चक्कर में बायोलॉजी की क्लास में जाकर बैठ गया था। उसका सारा ध्यान वंशिका अरोड़ा की तरफ था। वह उसी को देख रहा था।

वंशिका की बगल वाली सीट पर निशा कोठारी बैठी हुई थी। उसका पूरा ध्यान चंद्रेश की तरफ था। निशा ने चंद्रेश की निगाहों का पीछा किया, तो उसके होंठ गोल हो गये। वह समझ गयी, चंद्रेश वंशिका के चक्कर में बायो की क्लास ले रहा है। उसके चेहरे पर नफरत के भाव उभरे। वंशिका की तरफ देख कर मन ही मन बोली, इसकी आशिकी का अंत करना ही पड़ेगा।

लेक्चरर ने कुछ कहना ही चाहा था कि निशा कोठारी अपनी कुर्सी से खड़ी हो गयी, “सर मैं एक बात पूछना चाहती हूँ?” उसने प्रश्नवाचक निगाहों से लेक्चरर की तरफ देख कर कहा।

सब का ध्यान निशा की तरफ चला गया। वंशिका ने भी पीछे मुड कर देखा। चंद्रेश को उसके शब्दों से कोई फर्क नहीं पड़ा, जैसे उसका वहाँ होने वाली घटना से कोई सम्बन्ध ही नहीं था। वह केवल वंशिका को ही देखे जा रहा था।

“क्या कहना चाहती हो?” लेक्चरर बोला।

“सर बायो की क्लास में आर्ट के स्टूडेंट का क्या काम है?” निशा ने रहस्यमयी स्वर में कहा।

“कौन है यहाँ आर्ट का स्टूडेंट?” क्रोधित स्वर में लेक्चरर बोला।

“यह चंद्रेश मल्होत्रा?” निशा ने एक ऊँगली उठाते हुए चंद्रेश की तरफ इशारा किया।

पूरी क्लास की नजरें चंद्रेश की तरफ टिक गयी, कमरे में शान्ति छा गयी। लोग प्रश्नवाचक नज़रों से चंद्रेश की तरफ देखने लगे। वंशिका ने चौंक कर चंद्रेश की तरफ देखा।

निशा ने खड़े ही खड़े प्रश्न किया, “क्यों मि. चंद्रेश, आप तो आर्ट के स्टूडेंट हो, यहाँ बायो की क्लास में क्या कर रहे हो।?” उसकी नज़रों में व्यंग्य भरा हुआ था।

चंद्रेश हड़बड़ा कर उठा। भरी क्लास में उसका ऐसा अपमान होगा, उसने सोचा भी नहीं था।

“ग़लतफ़हमी के कारण क्लास में आ गया। चालू क्लास को बीच में डिस्टर्ब करना उचित नहीं समझा।” अपनी किताबें समेटते हुए चंद्रेश ने कहा।

“आइंदा ऐसी गलती फिर न हो।” लेक्चरर ने चेतावनी देते हुए कहा।

चंद्रेश उठ कर बाहर चला गया। निशा चंद्रेश के अपमान पर मन ही मन खुश थी और खुद को शाबाशी देने लगी। वाह ! क्या खूब पटखनी दी है। क्लास पहले की तरह वापस शुरू हो गयी, लेकिन अब उस लेक्चर में पहले जैसा दम नहीं था।

वंशिका के दिलोदिमाग में भी चंद्रेश मल्होत्रा ही लहरा रहा था।

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चंद्रेश वहाँ से निकल कर सीधे कैंटीन में गया और एक टेबल-कुर्सी पर जम गया। उसने अपना पूरा शरीर ढीला छोड़ दिया। आज के जैसा अपमान उसका पूरे जीवन में कभी नहीं हुआ था। उसने सोचा, वंशिका उसके बारे में जाने क्या सोचेगी? अचानक उसका दिमाग अस्थिर हो गया।

उसने कॉफ़ी का ऑर्डर दिया और आँख बंद करके दिमाग को पूरी तरह से फ्री कर दिया। रिलेक्स होने वाले अंदाज में उसका शरीर चेयर पर पड़ा था। अचानक कॉफ़ी रखने की आवाज सुन कर उसकी आँख खुल गयी तो वह चौंक कर सीधा बैठ गया। सामने वाली चेयर पर वंशिका बैठी उसे घूर रही थी। उसका पूरा शरीर तन गया।

“अकेले-अकेले कॉफ़ी पीने का इरादा है।” वंशिका नरम स्वर में बोली।

चंद्रेश ने आश्चर्य से वंशिका को देखा, फिर वेटर को आवाज देकर एक कप कॉफ़ी का आर्डर और दे दिया। जब तक दूसरी कॉफ़ी नहीं आयी, दोनों के मध्य शान्ति छायी रही। चंद्रेश का पूरा ध्यान वंशिका की तरफ ही था। आज से पहले उसे कोई इतना सुन्दर नहीं दिखा था। उसके सीने में मीठा-मीठा अहसास होने लगा। यह प्यार की पहली सीढी थी। उसे यूँ एकटक देखते पाकर वंशिका की नज़रें शर्म से झुक गयी।

“ऐसे क्या देख रहे हो आप?” शर्माते हुए वंशिका बोली।

“खुदा के करिश्मे को देख रहा हूँ।” चंद्रेश ने अपने शब्दों में प्यार भरते हुए कहा।

“बायो की क्लास में आर्ट के स्टूडेंट को आज पहली बार देखा।” उसके स्वर में प्यारा-सा अहसास था। वह मन ही मन मुस्कुरा रही थी।

चंद्रेश ने उसके लाल होते हुए चेहरे को देखा, तो उसके दिल में ख़ुशी के लड्डू फूटने लगे, “आशिक लोग तो बायो की क्लास क्या, आसमान से तारे तोड़ सकते हैं।” अपने स्वर में जहाँ भर का प्यार भरते हुए चंद्रेश बोला।

इनके मध्य यह प्यार भरी बातें हो रही थी और दूर टेबल पर बैठी निशा अपनी सखियों के साथ बैठी इन्हें ही देख रही थी। उसकी आँखों से गुस्से की चिंगारी निकल रही थी।

एक सहेली ने निशा के क्रोधित होते हुए चेहरे को देखा और व्यंग्य भरे स्वर में बोली, “निशाजी, एक सप्ताह का टाईम खत्म हो गया है। आप शर्त हार चुकी हैं।”

वहाँ बैठी उपासना के चेहरे पर परिहास वाली मुस्कान उभरी, “हमारे दो हज़ार और पार्टी कब मिल रही है?”

निशा ने पर्स से दो हजाए रूपए निकाल कर टेबल पर रखे और झटके से कुर्सी छोड़ कर उठ खड़ी हुई। उसका चेहरा गुस्से में धधक रहा था। उसने भस्म कर देने वाली नज़रों से चंद्रेश और वंशिका को देखा और वहाँ से बाहर निकल गयी।

उसका बाहर निकलना ही था कि कैंटीन में सुमित अवस्थी ने अपने चार दोस्तों के साथ प्रवेश किया और ताली बजा कर सबका ध्यान अपनी ओर आकर्षित किया। वह एक मंजे हुए नेता की तरह बोला, “भाइयो और मेरी बहनो, जैसाकि आप सब जानते हैं कॉलेज में इलेक्शन नज़दीक है और कॉलेज की बेहतरी के लिये हर बार की तरह इस बार भी मैं इलेक्शन लड़ रहा हूँ। आप सब से उम्मीद है कि आप अपना कीमती वोट मुझे ही देंगे, ताकि कॉलेज के रुके हुए अच्छे काम पूरे हो सकें, क्योंकि कॉलेज इलेक्शन में मुझसे बेहतर उम्मीदवार कोई नहीं है।”

यह बोल कर वह कुछ क्षण रुका और फिर अपने शब्दों में नाटकीयता भरते हुए बोला, “इस ख़ुशी में आज का कैंटीन का बिल मेरी तरफ से। आप सबकी जो भी इच्छा हो खाएं-पीएं, बिल सुमित अवस्थी देगा।”

एक चमचा बोला, “तो हो जाये, सुमित की जीत की ख़ुशी में तालियाँ।” कैंटीन में तालियों का शोर गूँज उठा।

सुमित कैंटीन के मालिक की तरफ गया, “आज किसी से बिल न लेना। आज सभी का बिल मैं दूँगा।”

कैंटीन मालिक संकोच से भरे स्वर में बोला, “ सुमित भाई, बारह हजार के पहले का बिल भी पेंडिंग हैंI” सुमित ने हंसते हुए अपनी जेब से पांच सौ के नोट की गडडी निकाली और मालिक की तरफ उछाल दी, “अगला-पिछला सब पूरा कर दो।” कैंटीन के मालिक का चेहरा ख़ुशी से खिल गया।

उसने फ़ौरन गड्डी को गायब कर दिया और खींसे निपोरते हुए लड़के को आवाज लगाई, “अरे बाबू, सुमित भाई को अच्छे से कॉफ़ी पिला।”

सुमित मुस्कराते हुए बोला, “नहीं रहने दो अभी, कैम्पेन करनी है।” यह कहकर वह अपने दोस्तों के साथ बाहर निकल गया।

कैंटीन का मालिक भगवान को दुआ देते हुए मन में बड़बड़ाया, “यह इलेक्शन हर महीना-पंद्रह दिन में आये, तो मजा आ जाये। शैतान को भी संत बना देता है यह इलेक्शन।”

चंद्रेश और वंशिका के प्यार भरे शब्दों में सुमित के आने से रूकावट आ गयी थी। सुमित के जाने के बाद उनके बात-चीत का टॉपिक बदल गया, “तुमको क्या लगता है सुमित इलेक्शन जीतेगा?” वंशिका ने गंभीरता से पूछा।

“लगता तो है क्योंकि कोई ढंग का उम्मीदवार है भी नहीं।”

“आप क्यों नहीं खड़े हो जाते?”

“मुझ से ये नेतागिरी नहीं होगी। मैं आजाद पंछी हूँ।”

“लेकिन सुमित के जीतते ही कॉलेज में गुंडागर्दी का माहौल कायम हो जायेगा।”

“तो मैं क्या कर सकता हूँ? कॉलेज के माहौल सुधारने का क्या मैंने ठेका ले रखा है?”

“लेकिन अगर कुछ गलत हो, तो उसे सुधारने की जिम्मेवारी हमारी भी तो होगी। यूँ हम जिम्मेदारी से भाग नहीं सकते।”

“अगर आपके दिल में मेरे लिये थोड़ी सी भी जगह है तो आप यह इलेक्शन में जरुर भाग लें।” यह कह कर वंशिका ने अपना पर्स उठाया और कैंटीन से बाहर निकल गयी।

चंद्रेश विचारों में खो गया। उसका ध्यान तब भंग हुआ, जब विमल उसके पास आकर बैठ गया।

विमल लम्बी सांस छोड़ते हुए बोला, “ क्या बात है गंभीर बैठे हो? क्या सोच रहे हो?”

चंद्रेश ने उठते हुए कहा, “चल रास्ते में बात करते हैं।”

दोनों उठ गये और बाहर की तरफ बढ़ गये। चलते-चलते चंद्रेश बोला, “यार विमल, मैं सोच रहा हूँ कि इस बार इलेक्शन लड़ के देखा जाये। क्या विचार है तेरा?” उसके स्वर में किसी तरह का भाव नहीं था।

विमल ने चौंकते हुए चंद्रेश के चेहरे को देखा, जिसमें गंभीरता भरी हुई थी। उसे कहीं से भी नहीं लगा कि वह मजाक कर रहा है।

“सच कह रहे हो? मजाक तो नहीं कर रहे हो?” विमल ने उत्साह भरे स्वर में पूछा।

“हाँ यार, कॉलेज में फैली अव्यवस्था भी दूर हो जायेगी और वंशिका भी फेवर में है।”

“अच्छा तो ये बात है। वंशिका मैडम भी फेवर में हैं। कल तक तो भाई साहब इलेक्शन के नाम से ही नाक भौं सिकोड़ते थे और आज भाभीजी आयी नहीं कि...।” विमल थोड़ा मजाकिया मूड में बोला।

“देख यार विमल, मैं इस बार सीरीयसली बोल रहा हूँ। तेरा क्या विचार है इस बारे में?

“यह तो बहुत अच्छी बात है। मैं कल ही तुम्हारा नामांकन भरता हूँ।” कह कर विमल मुस्कुराया।

“यह ठीक रहेगा।” भावहीन स्वर में चंद्रेश ने जवाब दिया।

“लगता है आशिकी जोरो पर है।” हँसते हुए विमल ने कहा।

“नहीं यार, मैं वंशिका से सच्चा प्यार करता हूँ अब शादी होगी, तो वंशिका से या फिर जीवन भर कुंवारा रहूँगा।” शांत भाव से मुस्कुरा कर चंद्रेश बोला।

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अगले रोज कॉलेज का माहौल खुशनुमा था। कॉलेज में खबर उड़ चुकी थी कि इस बार सुमित का मुकाबला चंद्रेश करने जा रहा था। चंद्रेश भी किसी भी तरह सुमित के मुकाबले में कमजोर नहीं था। चंद्रेश भी कॉलेज में लोकप्रिय था। और वैसे भी लडकियों की तो वह जान था ही जिस-जिस को मालूम पड़ता वह चंद्रेश को बधाईयाँ देने लग जाते।

वंशिका ने सुना चंद्रेश इलेक्शन में खड़ा हो रहा है तो वह ख़ुशी से चंद्रेश से मिली, “तुमने मेरी बात का मान रख लिया।” मीठे स्वर में वंशिका बोली।

“प्यार करने वालों के जज्बात की कद्र की जाती है।” चंद्रेश ने मुस्करा कर कहा।

वंशिका की नज़रें झुक गयी।

“अब प्यार को छोड़कर इलेक्शन जीतने पर ध्यान दो।” वंशिका ने नकली क्रोध दर्शाते हुए कहा।

“जब तुम्हारा प्यार साथ है तो इलेक्शन तो जीतना ही है।” चंद्रेश वंशिका को बाहों में लेकर बोला।

वंशिका छिटककर दूर हो गयी।

“सब देख रहे हैं। तुममें शर्म नाम की चीज न रही।” वंशिका नकली गुस्सा दिखाते हुए बोली।

चंद्रेश खिलखिला कर हँस पड़ा, “आओ चलो, तुम्हें घुमाने ले चलता हूँ।”

“पहले अपने इलेक्शन पर ध्यान दो। बाकी सब बातें बाद में करना।” भरे स्वर में वंशिका बोली।

यह नजारा दूर से निशा कोठारी देख रही थी। उसका चेहरा गुस्से से भरा हुआ था, “मैं भी देखती हूँ चंद्रेश मल्होत्रा कि तुम इलेक्शन कैसे जीतते हो।” वह दाँत पीसते हुए मन ही मन बड़बड़ाई।

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कॉलेज में माहौल गम्भीर था। सुमित अपने दस-ग्यारह लड़कों के ग्रुप के साथ बैठ कर मीटिंग कर रहा था। ग्रुप में गंभीरता छाई हुई थी।

एक लड़के ने गंभीरता को भंग करते हुए कहा, “भाइयो अब स्थिति गंभीर है। चंद्रेश मल्होत्रा के खड़े होने से एक मजबूत कैंडिडेट और बढ़ गया। अब हमारी टक्कर सीधे चंद्रेश से होगी।”

“क्या यार, तुम लोगों ने चंद्रेश को हौवा बना कर रखा हैं।” उखड़े स्वर में सुमित बोला।

“चंद्रेश को तुम हल्का मत लो सुमित। चंद्रेश की लोकप्रियता किसी भी लिहाज में तुमसे कम नहीं हैं।” एक लड़के ने चिंता भरी नज़रों से सबको देख कर कहा।

“चाहे जैसे भी हो, इलेक्शन तो हम ही जीतेंगे।” कठोर स्वर में सुमित ने कहा।

अचानक सुमित अवस्थी की आँखें सिकुड़ गयी। वह उलझन भरी नजरों से सामने देख रहा था। सामने बल खाती निशा आ रही थी। जीन्स की पैन्ट पहने, ऊपर काला टॉप पहने वह जम रही थी। उसके सिर के खुले बाल उसकी सुन्दरता बढ़ा रहे थे। उसकी सुंदर लटें, उसके सुंदर मुखड़े को चूम रही थी। उसने मुस्करा कर सबको देखा, “हाय दोस्तो, कैसे हो।” प्यार भरे स्वर में बोली।

सुमित उसके रंग रूप में खोया था। उसकी कोमल आवाज सुनकर सुमित ख्यालो से बाहर निकला।

“क्या में यहाँ बैठ सकती हूँ।” निशा बोली।

“हां-हां, क्यों नहीं।” सुमित खुशी से झूम उठा।

निशा ने अपना पर्स जमीन पर रखा और वही घास पर बैठ गयी। सबकी नज़रें निशा की तरफ ही थी। सब उसके बेबाक अंदाज से दंग थे। सुमित तो उसका बेबाक अंदाज पहले भी देख चुका था।

“इलेक्शन की तैयारी कैसी चल रही है?” उसने मुस्करा कर पूछा।

“ठीक चल रही है।” सुमित बोला।

“अबकी बार तुम्हारे सामने मजबूत उम्मीदवार खड़ा है। तैयारी भी मजबूत होनी चाहिये।”

“तुम हमारे साथ हो, तो हम यह इलेक्शन जरुर जीतेंगे।” विश्वास के साथ सुमित बोला।

“कोई भी जीते-हारे, पर मैं चाहती हूँ चंद्रेश मल्होत्रा यह इलेक्शन नहीं जीते।” कड़वे स्वर में निशा बोली।

“क्या कोई दुश्मनी है आपकी?” सुमित ने सवालिया निगाहों से देखते हुए पूछा।

“यह मेरा पर्सनल मामला है। इसमें तुम्हें कुछ लेना-देना नहीं होना चाहिये। मैं तुम्हारा साथ दूँगी।” तीखे स्वर में निशा बोली।

“ये तो हमारे लिये बहुत ही अच्छी खबर है। तुम्हारा साथ होने से हम आधा चुनाव जीत गये।” मुस्कुराते हुए सुमित बोला।

“ठीक है फिलहाल मैं चलती हूँ। कल से कैम्पेन की तैयारी शुरू करो।” निशा उठने जा रही थी।

“उस दिन के लिये मैं शर्मिंदा हूँ और तुम से माफ़ी मांगता हूँ।” अपने शब्दों में अफ़सोस जाहिर करता सुमित अवस्थी बोला।

“नेवर माइंड। मैं उस बात को भूल चुकी हूँ। अब हम साथ हैं। हमारा दुश्मन एक है, जिसे हमें हर हालात में हराना है।” यह कहकर निशा उठ गयी अपना पर्स संभाला और चली गयी।

उसके जाने के पांच मिनट तक शांति छाई रही, फिर अचानक सुमित बोला, “यह तो बम फोड़ कर चली गयी।”

“कहीं कोई साजिश तो नहीं।” एक दोस्त बोला।

“लग तो नहीं रहा, जो होगा देखेंगे। फ़िलहाल इसका हमारे फेवर में आना अच्छी बात है।” सुमित बोला।

कुछ समय तक वहाँ इलेक्शन की चर्चा होती रही, फिर सब उठ कर अपनी-अपनी जगह चले गये।

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सुमित अवस्थी अपने शानदार आलीशान महल में पहुँचा। उसके कमरे में विलासिता के सारे सामान उपलब्ध थे। तभी एक नौकर आया, “आपको बड़े साहब याद कर रहे हैं छोटे मालिक।”

“ठीक हैI तुम चलो, मैं आता हूँ।” सुमित ने कहा।

आज तक उसके पिता सुन्दर लाल अवस्थी ने उसे कभी इस तरह नहीं बुलाया था, “लगता है कोई जरूरी बात है, नहीं तो डैडी मुझे कभी नहीं बुलाते।” वह मन ही मन बड़बड़ाया।

सब काम से निपट कर वह नीचे अपने डैडी वाले रूम में पहुँचा। उसने दरवाजा खटखटाया, “दरवाजा खुला है बरखुरदार, अन्दर आ जाओ।” भीतर से डैडी की भारी आवाज आयी।

सुमित ने दरवाजा खोलकर अन्दर प्रवेश किया। सामने सोफे पर उसके पिताजी बैठे हुए थे। उनके सिर पर नेता वाली टोपी फब रही थी। सामने टेबल पर ब्लैक डॉग की बोतल रखी थी। एक गिलास आधा भरा हुआ था। सामने प्लेट में भुने काजू और नमकीन रखे हुए थे। सुमित उनके सामने आकर खड़ा हो गया। उसकी अपने पिताजी के सामने बोलने की हिम्मत नहीं होती थी।

“बैठो, खड़े क्यों हो?” सोफे की तरफ इशारा करते हुए सुन्दर लाल अवस्थी बोले।

सुमित सिकुड़ कर एक कुर्सी पर बैठ गया। उसकी नज़रें अपने पिताजी को देख रही थी। उन्होंने लाल-लाल आँखों से सुमित को घूरा। अधिक पीने के कारण उनकी आवाज लडखड़ा रही थी।

“कुछ लोगे?” पिताजी बोले।

नकारात्मक अवस्था में सुमित ने सिर हिलाकर मना कर दिया।

“तुम्हारे कॉलेज में इलेक्शन हैं, क्या स्थिति है तुम्हारी कॉलेज में?” भारी स्वर गूंजा।

“जी, अच्छी स्थिति है, 80% जीतने की उम्मीद है।” सुमित दबे स्वर में बोला।

“80% क्यों 100% क्यों नहीं? अभी भी तुम्हारे स्वर में विश्वास के भाव नहीं दिख रहे हैं।” नेताजी कठोर स्वर में बोले।

“जी, जीतने की पूरी संभावना थी, एक उम्मीदवार के खड़े होने से थोड़ी परेशानी आ गयी है।” सुमित बोला।

“हम तुम्हें हर हालत में जीतता हुआ देखना चाहते हैं। इसके लिये कुछ भी करो, पैसों की चिंता मत करो। तुम हमारी इकलौती संतान हो। तुम्हें हमारी विरासत संभालनी है। इसकी शुरुआत कॉलेज इलेक्शन से ही होनी चाहिये।” गिलास से घूँट भरते हुए नेताजी बोले।

“जी, मेरी पूरी कोशिश होगी जीतने की।” विश्वास भरे स्वर में सुमित बोला।

“कोशिश नहीं नतीजा, परिणाम अपने पक्ष में होना चाहिये। मैं तुम्हें अध्यक्ष बनते हुए देखना चाहता हूँ। चाहे जो भी हो अब तुम जा सकते हो।”

“जी डैडी, ऐसा ही होगा।” सोफे से उठता हुआ सुमित बोला और कमरे का दरवाजा बंद कर बाहर आ गया।

उसका पूरा शरीर पसीने से नहाया हुआ था। अपने बाप के सामने बोलने की उसकी हिम्मत नहीं होती थी। उसने गहरी सांस ली और अपने कमरे की तरफ बढ़ गया।

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कॉलेज में माहौल उत्सव की तरह था। हर तरफ चहल-पहल थी। हर पार्टी अपनी पूरी कोशिश कर रही थी कि इलेक्शन जीते। चंद्रेश मल्होत्रा और सुमित अवस्थी दोनों जी-जान से मेहनत कर रहे थे। पता ही नहीं चल रहा था कि माहौल किस के पक्ष में है?

सुमित अवस्थी ने पैसों की गंगा बहाई हुई थी। उसके साथियों के मज़े थे। कई बार माहौल में उत्तेजना फैल जाती थी, जिससे झगडा होनी की संभावना रहती। इसलिये कॉलेज प्रशासन की तरफ से सुरक्षा का पूरा प्रबन्ध किया गया था, जो किसी भी हालात से निपटने में सक्षम था।

निशा कोठारी के मन में चंद्रेश और वंशिका के लिये मन ही मन गहरी नफरत थी। वह दिखावे के तौर पर चंद्रेश के साथ थी, पर अंदर ही अंदर चंद्रेश का वोट बैंक तोड़ रही थी। चंद्रेश इस बात से बेखबर था, लेकिन सुमित अवस्थी यह बात जानता था। वह मन ही मन खुश था। सारे पत्ते उसके फेवर में थे, लेकिन वह यह नहीं जानता था कि कॉलेज के स्टूडेंट उसकी गुंडागर्दी से तंग हो गये थे। वह बदलाव चाहते थे। इलेक्शन में क्या होगा, यह तो भविष्य के गर्भ में छिपा हुआ था।

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सारी तैयारी पूर्ण हो चुकी थी। कल इलेक्शन था। सभी ने कैंपेन बंद कर दिया था। सब रिलैक्स थे। मुख्य टक्कर सुमित और चंद्रेश के बीच ही था। विमल और वंशिका ने चंद्रेश का पूरा साथ दिया। निशा दिखावे के तौर पर चंद्रेश के साथ थी, पर उसका पूरा समर्थन सुमित के साथ था।

वंशिका, विमल और चंद्रेश बगीचे में बैठे हुए इलेक्शन के मुद्दे पर बात कर रहे थे।

विमल चंद्रेश की ओर देखकर कहा, “तुम्हें क्या लगता है?”

“माहौल तो अपने फेवर में ही है, लेकिन आगे के बारे में कौन कह सकता है?” चंद्रेश ने बेचैनी से कहा।

“हिम्मत हारने से काम नहीं चलेगा चंद्रेश, यह टाइम रिलैक्स का नहीं है, कुछ कर दिखाने का है।” वंशिका शांत स्वर में बोली।

विमल ने वंशिका की ओर देखते हुए कहा, “तुमने और निशा ने सारी लडकियों को कनविन्स कर लिया है ना, कहीं कोई कमी तो नहीं रह गयी?”

वंशिका ने सिर हिलाते हुए कहा, “हमारी फिक्र मत करो, तुम अपना ध्यान दो।”

“बस, अब खेल एक रात का है।” चंद्रेश शांत स्वर में बोला।

“एक रात में ही बाजी पलट जाती है चंद्रेश जी।” विमल शांत भाव से मुस्कुराया।

“अब जो भी हो मुझे परवाह नहीं है।” चंद्रेश मुस्कुरा कर बोला उठा।

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दूसरी तरफ सुमित अवस्थी अपने फार्म हाउस पर अपने दोस्तों से कह रहा था, “भाइयो, सारी तैयारियाँ पूरी हो चुकी हैं। आज शाम अधिक से अधिक लोगों को फार्म हाउस लाना है और इलेक्शन से पहले उन्हें छोड़ना नहीं है। खिला-पिला कर उन्हें मदहोश कर दो। उन्हें होश तब ही आना चाहिये, जब उन्हें वोट डालना हो। उसकी निगाहें वहाँ पर बैठे सब के चेहरों पर टिक गयी।

“कोई प्रश्न पूछना चाहता है?” सभी ने नकारात्मक ढंग से सिर हिलाया।

“तो ठीक है, आज यह फॉर्म हाउस कल मेहमानों के लिये खाली रहेगा। मैंने जीप का इंतजाम कर दिया है। आप सब लोग वोटर लाने का प्रबंध करो। मैंने खाने-पीने का प्रबंध कर दिया है।” सुमित ने कहा।

सब लोग उठ कर अपने- अपने काम में लग गये।

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चंद्रेश के मोबाइल पर बेल होने लगी। उसने स्क्रीन पर नंबर देखा, हरा बटन दबा कर फ़ोन उठाया, तो दूसरी तरफ से उत्तेजित स्वर सुनाई दिया, “चंद्रेश, मैं बल्लू बोल रहा हूँ।”

“क्या हुआ बलवन्त? इतना क्यों घबरा रहा है? माहौल बिगड़ता जा रहा है चंद्रेश, सुमित के लोग स्टूडेंटस को जबरदस्ती कहीं ले जा रहे हैं।”

“क्या कह रहे हो?” चंद्रेश चौंकता हुआ बोला।

“ऐसे कैसे संभव है। यह नामुमकिन है।” वह आश्चर्य से बोला।

“भाई यह इलेक्शन है, यहाँ कुछ भी नामुमकिन नहीं है, सब जायज है। सुमित इस मामले में पुराना खिलाड़ी है। जल्दी कुछ ना किया, तो बना-बनाया खेल बिगड़ जायेगा।” जल्दबाजी में बल्लू बोला।

“ठीक है, मैं कुछ करता हूँ। मैं आ रहा हूँ।”

“नहीं, तुम जहाँ हो, वहाँ ठीक हो। तुम्हारा बाहर निकलना ठीक नहीं। सुमित का भरोसा नहीं, वह कुछ भी कर सकता है।”

“यार इस तरह डरने से काम नहीं चलेगा। मैं वहाँ आकर कुछ करता हूँ।”

“तुम जहाँ हो, वहाँ से बाहर मत निकलो। तुम्हारे साथ विमल है, उसे भेज दो। हम दोनों सब संभाल लेंगे।” बल्लू ने विश्वास भरे स्वर में कहा।

“ठीक है, मैं विमल को भेजता हूँ।” कह कर चंद्रेश ने फ़ोन काट दिया।

चंद्रेश ने विमल को आवाज लगाई। विमल चाय पी रहा था। वह कप संभाले बाहर की तरफ आया, “क्या हो गया? क्यों चिंतित हो?” चाय का घूँट भर कर विमल बोला।

“यार विमल, सुमित के आदमी सब स्टूडेंट्स को गायब कर रहे हैं। अभी बल्लू का फ़ोन आया था। मैंने आने के लिये बोला, तो मुझे मना कर रहा है। कह रहा है कि तुम मत आओ खतरा है। विमल को भेज दो।”

“ठीक तो कह रहा है। सुमित अवस्थी का कोई भरोसा नहीं। वह इलेक्शन जीतने के लिये किसी भी हद तक जा सकता है। तुम पर आक्रमण कर सकता है। तुम्हें गायब भी कर सकता है। तुम्हारा यहाँ रहना ही ठीक है। मैं जाकर स्थिति संभालता हूँ।” चाय का कप रखकर विमल बाहर निकल गया।

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सुमित का फार्म हाउस स्टुडेंट्स से पूरा भरा पड़ा था। लोगों के लेटने, बैठने का पूरा बन्दोबस्त था। बाहर चालीस से पचास पलंग बिछे थे। फार्म हाउस के कमरों के अन्दर भी गद्दों का प्रबंध किया गया था। चारों तरफ शराब और सिगरेट की बहार थी। बाहर एक तरफ भगोने में चिकन पक रहा था। स्टूडेंट्स के खाने- पीने का विशेष ध्यान रखा जा रहा था। जिसको जो चाहिये, तुरंत ही हाज़िर कर दिया जाता। यूँ लग रहा था जैसे कि बारात ठहरी हो। कुछ लोग बेसुध होकर बेहोश हो गये थे। जो लुढ़क जाता, उसे उसके कमरे में पहुँचा दिया जाता। मुफ्त की दारु स्टुडेंट्स यूँ पी रहे थे, जैसे कि दुबारा मिलेगी नहीं।

सुमित अवस्थी के कहने पर गेट पर पहरा बढ़ा दिया था, ताकि कोई अन्दर से बाहर न जा सके और बाहर से अंदर न आ सके।

तभी एक सफेद कलर की सैंट्रो फार्म हाउस के बाहर आकर रुकी जिसे सुमित अवस्थी ड्राईव कर रहा था। उसके बगल में एक सफेद कुर्ता पजामा पहने उसका दोस्त बैठा था जिस के माथे पर चन्दन का टीका था ऐसा लगता था जैसे वो किसी पार्टी का लीडर हो।

सुमित अवस्थी ने फार्म हाउस के बाहर पहुँच कर होर्न बजाया।

दरबान ने फुर्ती से लोहे के विशाल गेट को खोल दिया। कार तीव्र गति से अन्दर आयी। शानदार वेश-भूषा के साथ सुमित अवस्थी बाहर निकला। उसने हर तरफ निरीक्षण किया। फिर संतुष्ट होने के अंदाज में उसकी गर्दन हिली।

उसने एक चेले से फुसफुसाया, “कोई कमी नहीं होनी चाहिये। कोई भी स्टूड़ेन्टस यहाँ से बाहर नहीं निकलना चाहिये। इन लोगों को तब तक पिलाओ, जब तक ये बेसुध नहीं हो जाते। कोई होश में नहीं होना चाहिये।” चेले की गर्दन सहमति से हिली।

फिर उसने मोबाइल निकाला और नंबर पंच कर फोन कान से लगाया, दूसरी तरफ रिंग जाने की आवाज सुनाई दी। फिर एक भारी भरकम आवाज उसके कानों में पड़ी, “क्या हाल हैं?” यह सुन्दर लाल अवस्थी की रोबदार आवाज थी।

“पापा, यहाँ की स्थिति पूरी काबू में है। सारे हालात अपने पक्ष में लग रहे हैं। मुझे लग रहा है कल इलेक्शन में नतीजा हमारे पक्ष में ही होगा।” सुमित अवस्थी निश्चिन्त स्वर में बोला।

“मैं कुछ नहीं जानता। मैं कल केवल एक ही शब्द सुनना चाहता हूँ- फतह। वह कैसे होगी तुम्हारा सिरदर्द है? याद रखना नाकामयाब व्यक्ति मुझे पसंद नहीं।” यह कहकर सुन्दर लाल अवस्थी ने फ़ोन काट दिया।

सुमित ने गहरी सांस ली और कार की तरफ कदम बढ़ाये। वह पूरी तरह निश्चिंत था।

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आज कॉलेज का सबसे ख़ास दिन था। चारों तरफ माहौल उत्साह से भरा हुआ था। सुबह खुशनुमा थी। कॉलेज प्रशासन की तरफ से इलेक्शन की पूरी तैयारी की गयी थी। लडकियों और लड़कों के अलग-अलग बूथ बनाये गये थे। हर प्रत्याशी का एक-एक मेम्बर रूम के अन्दर था, जहाँ वोटिंग की प्रक्रिया हो रही थी।

सिक्योरिटी का पक्का इंतजाम था। कॉलेज में स्टूडेंट के अलावा बाहरी व्यक्ति के प्रवेश पर प्रतिबंध था। गेट पर ही हवलदार खड़े थे, जो आई कार्ड देखकर ही अन्दर जाने दे रहे थे। विमल, निशा, वंशिका और चंद्रेश बाहर खड़े माहौल का निरीक्षण कर रहे थे। वोटिंग प्रक्रिया शुरू हो गयी थी। एक-एक करके स्टुडेंट्स वोट डालकर जा रहे थे। नौ बजे से वोटिंग शुरू हो गयी थी, और अभी बारह बज रहे थे। चंद्रेश का चेहरा चिंता से भरा हुआ था, “यार चार घंटे हो गये, लेकिन अभी केवल सौ से डेढ़ सौ वोट ही पड़े हैं। टोटल वोटर सात सौ के करीब हैं। बाकी सब कहाँ गये? वोट डालने क्यों नहीं आये?” चिंतित स्वर में चंद्रेश ने विमल को देखते हुए कहा

“मैं भी यही सोच रहा हूँ। तीन बजे तक वोटिंग ख़त्म हो जायेगी। पांच बजे परिणाम निकल आयेंगे। अब स्टूडेंट वोट नहीं डालेंगे, तो कब डालेंगे?” विमल का स्वर भी चिंता से भरा हुआ था।

तभी उनके पास आकर वंशिका बोली, “अभी 182 वोट पड़ चुके हैं, जिसमें अधिकतर वोट लडकियों के ही पड़े हैं। यह हमारे लिये फेवर वाली बात है कि निशा और मैंने सभी लड़कियों को सन्देश दिया था, तो वोट हमारे हक में ही पड़े हैं।”

चंद्रेश ने सिर हिलाते हुए कहा, “यही सही भी है। यदि अभी नहीं वोट पड़ते, तो भी इस हिसाब से हमारी जीत पक्की ही है।” चंद्रेश के चेहरे पर मुस्कान आ गयी।

“तेल देखो और तेल की धार देखो। मुझे तो तूफान आने से पहले की शान्ति दिखायी दे रही है।” विमल के स्वर में चिंता के भाव थे।

धीरे-धीरे वक़्त बीतने लगा। इन लोगों के चेहरे पर मुस्कान आ गयी। विमल अचानक बोला, “लेकिन एक बात समझ में नहीं आयी। इतने जरूरी मौके पर सुमित अवस्थी कहाँ गायब हो गया।”

“हार के डर से छिप गया होगा।” व्यंग्य से वंशिका बोली।

“वह छिपने वालों में नहीं है।” विमल के स्वर में विश्वास के भाव थे।

घड़ी की सुई ने एक बजाया ही था, कि कॉलेज के गेट के सामने दस से बारह जीप आकर रुकी, जिसमें स्टूडेंटस भरे पड़े थे। आगे सुमित अवस्थी कार से उतरा और गर्व के साथ गेट के अन्दर आया। उसके अन्दर आने के साथ स्टूडेंटस का सैलाब उमड़ पड़ा। सिक्योरिटी वालों को संभालना भारी पड़ने लगा।

ढ़ाई बजे तक ६३० वोट पड़ चुके थे। चंद्रेश, विमल और वंशिका के चेहरे उतर गये थे और उन्हें अपनी हार साफ़ दिख रही थी। उन सब के चेहरे पर मुर्दानगी सी छा गयी थी।

दूसरी तरफ सुमित अवस्थी के चेहरे पर गर्वीली मुस्कान थी, जैसे कि वह इलेक्शन जीत गया हो। उसके चेले-चपाटे मिठाइयाँ और गुलाल लेकर जीत की खुशी में जुलूस निकालने के लिये तैयार थे। सुमित अवस्थी हर किसी से हँस कर बात कर रहा था।

विमल चंद्रेश के पास आया, “यार एक रात में सुमित गेम खेल गया। मुझे नहीं लगता कि परिणाम अब हमारे पक्ष में होगा।” दुखी मन से विमल बोला।

“हां यार मुझे भी लगता है, अब यहाँ से चलना चाहिये और वंशिका तुम भी यहाँ से निकल जाओ। बाज़ी पलट चुकी है। अब यहाँ रहना अपनी बेइज्जती कराना ही है।” चंद्रेश ने विमल की ओर देखते हुए कहा।

“तुम वंशिका को घर छोड़ दो। मैं भी थोड़ी देर में घर निकल जाऊँगा।” वंशिका ने उदासी भरे स्वर में सहमति से सिर हिलाया।

तीन बजे वोटिंग प्रक्रिया ख़त्म हो गयी। दो घंटे बाद रिजल्ट आने वाला था। चंद्रेश के साथी हार मान कर घर चले गये थे और सुमित अवस्थी अपनी जीत की जश्न की तैयारी कर रहा था।

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पांच बज रहे थे। कॉलेज गेट के बाहर भीड़ बढ़ती जा रही थी। सुमित के समर्थको में उत्साह का वातावरण था। चंद्रेश की तरफ से केवल बल्लू और विमल थे, जो उत्सुकता के नाते खड़े थे, कि कहीं से बाजी पलट जाये। पांच बज कर दस मिनट हो रहे थे, जब प्रिंसिपल महोदय अपने चार साथी प्रोफेसरों के साथ गेट के अंदर बने मंच पर पहुँचे ओर माइक हाथ में लेकर बोले, “प्रिय छात्र-छात्राओ, आप बड़ी बेचैनी से जिस रिजल्ट का इंतजार कर रहे हैं, वह मेरे पास है।”

यह कह कर प्रिंसिपल थोड़ी देर के लिये रुके। उनकी नज़रें हर तरफ घूमने लगी। उनकी आवाज लाउड स्पीकर में गूंज रही थी। शुरुआत हुई सचिव और उपाध्यक्ष को लेकर इनके नाम की घोषणा हो चुकी थी। कइयों के चेहरे पर उदासी और कइयों के चेहरे पर ख़ुशी दिखायी दी। प्रिंसिपल ने अपनी आवाज को विराम देते हुए कहा, “अब अध्यक्ष पद के लिये कुल 700 वोट में से 670 वोट पड़े जिनमें से 30 वोट निष्क्रिय रहे, बचे 640 वोट में चंद्रेश मल्होत्रा 320 वोट और 200 वोट मिले सुमित अवस्थी को बाकी 120 मिले अन्य उम्मीदवारों को। इस प्रकार चंद्रेश मल्होत्रा अपने निकटतम प्रतिद्वंदी सुमित अवस्थी से 120 वोटो से जीत गये हैं। मैं आप सबको शांति व्यवस्था बनाये रखने के लिये धन्यवाद देता हूँ।”

यह कह कर प्रिंसिपल महोदय ने माइक साथी प्रोफेसर को दे दिया और वह अंदर चले गये। माइक पर प्रोफेसर की आवाज गूंज रही थी। हम सभी विजयी उम्मीदवारों के उज्ज्वल भविष्य की कामना करते हैं और उम्मीद करते हैं कि उनके कार्यकाल में कॉलेज नई ऊँचाईयों को छुएगा।” यह घोषणा करते ही सभी प्रोफेसर अंदर चले गये।

माहौल में गंभीरता आ गयी। गेट पर खड़ी भीड़ में चुप्पी छा गयी। लोगों को विश्वास नहीं हुआ। विमल और उसके साथी खुश हो गये। विमल ने फ़ोन पर चंद्रेश को जीत की बधाई दी और तुरंत कॉलेज आने को कहा। चंद्रेश ख़ुशी सहन नहीं कर पा रहा था। उसने तुरंत वंशिका को अपनी जीत के बारे में बताया और कॉलेज आने को कहा।

दूसरी तरफ सुमित अवस्थी चुनाव परिणाम सुनने के बाद बौखला गया और जोर-जोर से चिल्लाने लगा। “यह धोखेबाजी है, नतीजा सही नहीं है, मेरे खिलाफ साज़िश रची गयी है।” उसकी हालत देखकर उसके साथी उसे कार में बैठा कर जबरदस्ती बाहर ले गये। भीड़ धीरे-धीरे छँट गयी।

अब वहाँ केवल चंद्रेश मल्होत्रा के समर्थक ही रह गये। थोड़ी देर में चंद्रेश अपनी कार से वहाँ पहुँचा। लोगों ने उसे फूल माला और गुलाल से लाल कर दिया। स्टुडेंट्स नाच-गा रहे थे। वंशिका भी इस उत्सव में शामिल हो गयी।

चंद्रेश के हाथ में माइक आया, “दोस्तो, मैं आप लोगों का शुक्रिया अदा करता हूँ कि आपने मुझे इस योग्य समझा। मैं वादा करता हूँ कि कॉलेज को आगे ले जाने के लिये मैं पूर्ण योगदान दूँगा। आपकी सारी समस्याएं मेरी समस्याएं हैं, उन्हें दूर करना मेरा पहला काम है।” यह कहकर चंद्रेश ने माइक वापस दे दिया।

उसके बाद पूरे शहर में चंद्रेश मल्होत्रा का विजय जुलुस निकला। जिसने भी जुलुस देखा, उसने उसे याद किया खूब गुलाल उड़े। मिठाइयाँ बंटी इसी खुशी में चंद्रेश ने सबको अपनी तरफ से पार्टी देने की घोषणा की।

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