मैं महरौली पहुंचा ।
मालूम पड़ा कि वहां सुलतान बार से हर कोई वाकिफ था । लिहाजा बड़े आराम से, बिना भटके मैं वहां पहुंचा ।
डिप्टी ने उसे दारू का अड्डा बताया था और अड्डे की जो कल्पना मेरे मन में थी, वो वैसा बिल्कुल न निकला, वो अच्छा खासा मिडल क्लास बार निकला ।
मेरे वहां आने के पीछे मकसद बस इतना था कि मैं उस जगह से वाकिफ होना चाहता था जहां कि फरार केयरटेकर विष्णु कसाना का आना जाना था ।
बार पर जा कर मैंने बारमैन से अली सुलतान के बारे में पूछा तो मालूम पड़ा कि बारमैन ही अली सुलतान था ।
“मेरा नाम राज शर्मा है” - मैं बोला - “मैं इमरान डिप्टी का दोस्त हूं ।”
“डिप्टी तो आज आया नहीं !” - बारमैन बोला ।
“मुझे दिखाई दे रहा है । आप तो मालिक हो न यहां के ?”
“हूं तो सही अल्लाह के फजल से ।”
“बारमैन भी ?”
“नहीं, भई । आज हूं मजबूरन । और कल था । रैगुलर बारमैन एकाएक छुट्टी कर गया । इसलिये ।”
“ओह ! डिप्टी ने बोला था वो यहां नहीं होगा तो उसका कोई शागिर्द यहां होगा !”
“मुझे इस बाबत कोई खबर नहीं ।”
“ऐसा कोई शख्स यहां नहीं है ?”
“मालूम नहीं । है तो मैं उसकी सूरत से वाकिफ नहीं ।”
“डिप्टी से तो वाकिफ हो न !”
“हां । बाखुबी ।”
“विष्णु कसाना से ?”
उसने संदिग्ध भाव से मेरी तरफ देखा ।
“ऐसे न देखो, यार । ये सोच के लिहाज करो और जवाब दो कि मैं डिप्टी का दोस्त हूं ।”
“डिप्टी का दोस्त तो खैर मेरे सिर माथे है, भले ही कोई हो, लेकिन आप पूछ क्यों रहे हैं विष्णु कसाना की बाबत ?”
“मैं डिटेक्टिव हूं ।'
“क्या !”
“प्राइवेट ।” - मैंने अपना एक विजिटिंग कार्ड निकाल कर उसके सामने काउंटर पर रखा - “कल छतरपुर में तोशनीवाल फार्म पर जो कत्ल हुआ था, उस पर काम कर रहा हूं ।”
“ओह ! विष्णु कसाना वहीं तो...वहीं तो...”
“केयरटेकर था । पुलिस को उस पर कातिल होने का शक है और उन्हें उसकी तलाश है ।”
“तलाश है ? ”
“क्योंकि कत्ल के बाद से गायब है ।”
“कमाल है !”
“क्या कमाल है ?”
“कल रात तो वो यहां था !”
“अच्छा !”
“हां, लेट नाइट में यहां आया था ।”
“यानी उसे जानते पहचानते थे ?”
“नहीं । न जानता था, न पहचानता था । उसने खुद बताया था कि उसका नाम विष्णु कसाना था ।”
“लेट नाइट में आया बोला ! कितना लेट ?”
“बारह बजने को थे ।”
हौसला काबिलेतारीफ था पट्ठे का - मैंने मन ही मन सोचा - महरौली थाने से निकला तो वहां पहुंच गया !
“वो यहां अक्सर आता था ।” - प्रत्यक्षत: मैं बोला ।
“आता होगा ! मैं हर ग्राहक से जान पहचान भला कैसे बना सकता हूं ! हर किसी पर निगाह भला कैसे रख सकता हूं ! खास तौर से लेट नाइट में जबकि यहां बेतहाशा भीड़ होती है ।”
“लेकिन उसकी बात जुदा थी ! उसने खुद अपने आपको जनवाया ?”
“यही बात थी ।”
“वजह ?”
“डिप्टी के लिये मैसेज छोड़ना चाहता था ।”
“क्या ?”
वो खामोश रहा ।
“उसका हुलिया बयान कर सकते हो ?”
उसने किया ।
भूल की कोई गुंजायश नहीं थी । वो केयरटेकर विष्णु कसाना का ही हुलिया बयान कर रहा था ।
“छोड़ा मैसेज ?” - मैंने पूछा ।
“हां ।” - वो बोला ।
“क्या ?”
वो फिर हिचकिचाया ।
“जनाब, डिप्टी हम दोनों का फ्रेंड है, आपको दोस्ती का सदका है ।”
“डिप्टी के लिये मैसेज था” - वो बोला - “कि वो उसे घाट पर मिलेगा ।”
“घाट पर मिलेगा !” - मैं सकपकाया - “कौन से घाट पर मिलेगा ?”
उसने अनभिज्ञता से कंधे उचकाये ।
“घाट तो” - फिर बोला - “दरिया किनारे ही होते हैं ।”
“होते हैं । जमना पर भी हैं । लेकिन रात को मुलाकात के लिये मौजूं ठिकाना तो नहीं होते !”
“अब मैं क्या बोलूं ।”
“बहरहाल उसने कहा था, डिप्टी के लिये मैसेज छोड़ा था, कि वो उसे घाट पर मिलेगा ?”
“हां ।”
“शुक्रिया, सुलतान भाई ।”
“कोई ड्रिंक पेश करूं ?”
“नहीं । जल्दी में हूं । कभी फुरसत में आऊं तो करना ।”
उसने सहमति में सिर हिलाया ।
मैं वहां से बाहर निकला । मैं अभी अपनी कार से दूर ही था कि मोबाइल की घंटी बजी ।
लाइन पर इंस्पेक्टर यादव था ।
मैंने काल रिसीव की ।
“कहां पर है ?” - यादव ने पूछा ।
मैंने बताया ।
“वहां क्या कर रहा है ?”
“इल्युमिनेटिड कुतुब मीनार नहीं देखा था, वही देखने आया ।”
“बकवास न कर ।”
“रिजक कमाने के लिये धक्के खाने इधर आया ।”
“वो तो तू खुशी से खा । पार्टी का बोल जिसकी बाबत कहता था नौ से पहले फिर बात करेंगे ?”
“यादव साहब, हम अलग अलग ही पहुंच पायेंगे ।”
“क्यों ?”
“मुझे कपड़े बदलने के लिये, सूट बूट पहनने के लिये, पार्टी के मेहमान वाली सजधज बनाने के लिये घर जाना होगा ।”
“फिर क्या बात है ! हैडक्वार्टर से मुझे ले के जाना ।”
“मैं भगवानदास रोड नहीं, जीके वन जाऊंगा ।”
“ओह ! मुझे तो भूल ही जाता है कि तेरे दो दो घर हैं । ठीक है फिर । वहीं मिलते हैं ।”
“वर्दी में आओगे ?”
“तू क्या चाहता है ?”
“मैं तो यही चाहता हूं कि सिविलियन लिबास में आओ ।”
“ठीक है । चाहत पूरी होगी तेरी ।”
“कैसे होगी ? घर तो तुम्हारा गुड़गांव में है !”
“देखना ।”
Chapter 4
मैं वसंत कुंज पहुंचा ।
कालबैल के जवाब में तोशनीवाल की कोठी का मेनडोर खुला तो मुझे चौखट पर देवीलाल दिखाई दिया ।
उसने सप्रयास मेरा अभिवादन किया ।
“तो” - मैं बोला - “नौकरी बच गयी ?”
उसने खीसें निपोरी और सादर मेरे लिये रास्ता छोड़ा ।
“साहब बहुत दयावान हैं ।” - फिर बोला ।
“अच्छा !”
“दूसरे, उन्हें यकीन आ गया था कि मेरा वारदात में कोई हाथ नहीं था । बिटिया की लाश देखकर भी मैं खामोश रहा, ये मेरी खता बराबर थी लेकिन उन्होंने बख्श दी थी ।”
“नतीजतन यहीं हो ?”
“जी हां ।”
“हो और रहोगे ?”
“ऐसा ही है, सर ।”
“फिर तो मुबारक !”
“शुक्रिया, सर । लेकिन, सर...”
“क्या है ?”
“इस घड़ी आप यहां !”
“कोई ऐतराज ?”
“ऐतराज नहीं, सर, हैरानी है ।”
“क्यों भला ?”
“कुछ मेहमान आये हुए हैं । उनमें आप...प्राइवेट डिटेक्टिव...”
“तो ? कोई अंदेशा है तुम्हें मेरी वजह से ?”
“न - हीं ।”
“तो फिर ?”
“जी डरता है ।”
“खामखाह !”
“लगता है कुछ होने वाला है ।”
“अभी और भी ! मालिक की बेटी का कत्ल हो गया, इतना काफी नहीं !”
“वो यहां तो न हुआ !”
“ओह ! तुम्हारा मतलब है यहां, इस कोठी में, आज रात कुछ होने वाला है !”
वो खामोश रहा ।
“क्या ?”
उसने खामोशी से, बेचैनी से, पहलू बदला ।
“पता नहीं ।” - फिर कठिन स्वर में बोला - “वो मैडम यहां है । मालकिन की मौजूदगी में, बिटिया के शाम को हुए अंतिम सरकार की रु में, नहीं...नहीं होना चाहिये था ।”
“देवीलाल, बड़े लोगों की बातें हैं, बड़े लोगों के बड़े मशगले हैं, तुम क्यों हलकान होते हो ?”
जवाब में उसका मुंह खुला, बंद हुआ ।
“कहां है ?” - मैं बोला ।
“कौन ?” - वो हड़बड़ाया ।
“भई, जिसका अभी जिक्र कर रहे थे । अंजना । अंजना रांका ! या” - मैंने घूरकर उसे देखा - “किसी और नाम से वाकिफ हो उससे ?”
“वो...वो” - उसने जल्दी से हाल के भीतर की ओर संकेत किया - “उधर है ।”
मैंने निर्देशित दिशा की ओर निगाह दौड़ाई तो मुझे कोई आधा दर्जन मर्दों से घिरी खड़ी, उनकी तारीफी निगाहों का मरकज बनी, अंजना रांका दिखाई दी जो यूं सबसे हंस हंस कर बात कर रही थी जैसे बारात में आयी थी ।
कोई मरे चाहे जीये, सुथरी घोल बताशा पीये ।
फिर मुझे सूट बूट में सजा इंस्पेक्टर यादव दिखाई दिया । उसके हाथ में कोई ड्रिंक था जिसकी तरफ उसकी कोई तवज्जो नहीं जान पड़ती थी, उसकी मुकम्मल तवज्जो उस घड़ी अंजना की तरफ थी ।
मैंने आगे कदम बढ़ाया, ठिठका, फिर देवीलाल की तरफ देखा ।
देवीलाल ने जवाबी, प्रश्नसूचक निगाह से मुझे देखा ।
“कुत्ता नहीं दिखाई दे रहा ।” - मैं बोला ।
“प्रिंस !”
“यहां और भी कुत्ते हैं ?”
“वो एक ही है, बस । सॉरी ।”
“कहां है ?”
“मेहमानों की वजह से अपने कमरे में बंद है ।”
“कुत्ते का अपना कमरा है ?”
“जी हां । पिछवाड़े में जहां सरवेंट्स क्वाटर्स हैं, वहां ।”
“टीवी भी होगा उसके कमरे में !”
“जी !”
“कुछ नहीं ।”
मैं आगे बढ़ा और उस हुजूम के करीब पहुंचा जिसने अंजना रांका को घेरा हुआ था ।
अंजना ने सिर उठा कर मेरी तरफ देखा । उसके माथे पर बल पड़े ।
मैं नुमायशी तौर पर मुस्कराया और बोला - “तुझे तो वादायदीदार हमसे करना था, ये क्या किया कि जहां को उम्मीदवार किया ।”
“क्या !” - वो अचकचाई ।
“हल्लो, माई डियर !”
उसके एडमायरर्स मेरी तरफ घूमे, सबकी निगाह मेरे पर टिकी ।
“आई एम नाट युअर डियर ।” - अंजना भुनभुनाई ।
“यू आर” - मैं इत्मीनान से बोला - “अनटिल एण्ड अनलैस प्रूवन अदरवाइज ।”
“जैसे प्रूव होने में कोई कसर रह गयी है ! पिछली रात का वाकया मैं भूल नहीं गयी !”
उस घड़ी हम दोनों में चलता डायलॉग उसको घेरे खड़े मर्दों की समझ में नहीं आ रहा था, सबके चेहरे पर असमंजस के - किसी किसी के चेहरे पर मेरी दखलअंदाजी की वजह से अप्रसनता के - भाव थे ।
“वो मजाक की बात थी ।” - मैं बोला ।
“नहीं थी मजाक की बात ।” - वो गुस्से से बोली ।
“अरे, रात गयी, बात गयी ।”
“ऐग्जैक्टली ! नाओ गुड रिडेंस ।”
“क्या ?”
“अक्लमंद को इशारा ।”
“माई डियर...”
“फिर !”
“...मैं इशारे नहीं समझता ।”
“गो टेक ए वाक । इट्स गुड फार यूअर हैल्थ ।”
“ठीक है, चलो ।”
“क्या !”
“भई, वाक के लिये ! खूब गुजरेगी जो वाक करेंगे हैल्थ फ्रीक दो ।”
“देखो, मैं नहीं जानती यहां क्यों हो...”
“तुम्हारे वाली ही वजह । मेहमान हूं ।”
“मुझे इस बात की खबर होती तो या तुम यहां न होते या मैं यहां न होती ।”
“हनी, इतनी नाराजगी अच्छी नहीं होती । बीपी हाई हो जाता है ।”
“मिस्टर शर्मा, ट्राई टु एक्ट लाइक ए जंटलमैन । मैं जानती हूं ये बहुत मुश्किल काम है तुम्हारे वास्ते । फिर भी...करो कोशिश ।”
“बहुत ऊंचा उड़ रही हो...”
“मैं...मैं मिस्टर तोशनीवाल से बात करती हूं ।”
“करो, बाखुशी करो । लेकिन एक बात सुन लो, काम आयेगी । मैं मिस्टर तोशनीवाल का मेहमान नहीं हूं ।”
“क्या ! गेट क्रैशर हो...”
“मैं मिसेज तोशनीवाल का मेहमान हूं । समझा सकती हो तो जा के मैडम को समझाओ कि मेरी यहां मौजूदगी तुम्हारे वजूद को खतरा है ।”
“मैं...मैं जाती हूं ।”
“खातिर जमा रखो, मैं ही जाता हूं, वर्ना...”
बाकी के शब्द मेरे मुंह में ही घुट कर रहे गये ।
उसी घड़ी अनहोनी जैसा कुछ मुझे वहां दिखाई दिया था ।
हाल के परले कोने में शानदार डिनर सूट पहने फिल्मी स्टार जैसी एक हसीना से बात करता, चहचहाता, मस्ती मारता इमरान डिप्टी खड़ा था ।
मेरा दिमाग भन्ना गया ।
कैसे था वो वहां ! उसका वहां क्या काम था ! उस जैसी हैसियत का शख्स कैसे उस सुपर क्लास हाउसहोल्ड में पहुंच बना पाया ! मुअज्जिज मेहमान तो उस जैसा शख्स हो नहीं सकता था - होता तो किसका होता - वो शर्तिया गेट क्रैशर था लेकिन ये करतब वो कैसे कर पाया, तफतीश का मुद्दा था ।
मैं उसकी तरफ बढ़ा ।
मैं आधे रास्ते में था जबकि हमारी निगाह मिली । तत्काल उसकी तर्जनी उंगली बड़े अर्थपूर्ण ढंग से उसके होंठों पर पड़ी और उसकी आंखों में याचना का भाव आया ।
मैं ठिठक गया । मैंने सहमति में सिर हिलाया ।
डिप्टी ने आंखों आंखों में कृतज्ञताज्ञापन किया ।
‘कोई बात नहीं’ - मैं होंठों में बुदबुदाया - ‘अभी बहुत टाइम है ।'
मैंने रास्ता बदला और इंस्पेक्टर यादव के पास पहुंचा ।
“कब आये ?” - मैंने पूछा ।
“ज्यादा देर नहीं हुई ।” - वो बोला - “तुम्हारे आने से थोड़ी देर पहले ही ।”
“क्या पी रहे हो ?”
“आरेंज जूस ।”
“अच्छा !”
“विस्की के तड़के के साथ ।”
“ओह ! सर्व हुई ?”
“नहीं । उधर सैल्फ सर्विस बार है ।”
“आई सी । आता हूं ।”
मैंने बार पर जा कर अपने लिये ड्रिंक तैयार किया और उसके साथ यादव के पास वापिस लौटा ।
“चियर्स बोलना मुनासिब होगा !” - मैं बोला ।
“क्यों नहीं होगा ?” - यादव बोला - “जब चियर्स का इंतजाम मुनासिब है, मेहमान मुनासिब हैं तो चियर्स ने भैंस खोल ली किसी की ?”
“ठीक । फिर तो चियर्स !”
“चियर्स !”
“इसलिये भी क्योंकि मुझे तो याद नहीं कि पहले कभी ऐसी नौबत आयी हो !”
“हर काम की कभी तो पहल होनी ही होती है ।”
“लाख रुपये की बात कही ।”
फिर मैंने उसके सूट पर निगाह दौड़ाई ।
“कैसे किया ?”
“आफिस में सादे कपड़ों में ही बैठता हूं । वर्दी वहां टांग के रखता हूं । तभी पहनता हूं जब वारदात की तफतीश के लिये फील्ड में जाना हो या किसी आला अफसर की हाजिरी भरनी हो ।”
“ठीक ! घर का मालिक नहीं दिखाई दे रहा !”
“क्योंकि घर में नहीं है ।”
“क्या !”
“कहीं अटक गया है । दस मिनट पहले कहीं से फोन आया था कि लेट हो जायेगा ।”
यानी साली खामखाह हूल दे रही थी कि मिस्टर तोशनीवाल से बात करती थी ।
“तुम्हारे आने से पहले” - यादव कह रहा था - “मैंने बीवी को सबको - खास तौर से उस फैंसी औरत को उस फुलझड़ी को - बताते सुना था कि साहब को एकाएक कोई काम पड़ गया था, यहां पहुंचने में लेट हो जाने वाले थे ।”
“बीवी भी तो नहीं दिखाई दे रही !”
“हसबैंड की बाबत वो घोषणा करने के बाद ऊपर गयी थी । कहती थी एकाएक तबीयत खराब हो गयी थी ।”
“बहाना ?”
“ऐसा ही लग रहा था ।”
“अब ऊपर अपने बैडरूम में है ?”
“हां । उस धमकी वाली चिट्ठी की वजह से मैंने अपना एक आदमी उसके बैडरूम की निगरानी पर लगाया हुआ है ।”
“बावर्दी ?”
“नहीं ।”
“गुड । लिहाजा कोई चोरी छुपे उसके सिर पर नहीं पहुंच सकता !”
“नहीं पहुंच सकता । और खुद वो भी...मेरे आदमी की जानकारी में आये बिना न वो बाहर कदम रख पायेगी, न कोई भीतर जा पायेगा ।”
“बढ़िया ।”
“शर्मा, तेरी बातों में आ कर मैंने हामी तो भर दी यहां हाजिरी भरने की लेकिन मुझे लगता नहीं यहां से कुछ हाथ आने वाला है ।”
“विस्की कौन सी है ?”
“जानी वाकर ग्रीन लेबल ।”
“फिर भी कहते हो कुछ हाथ नहीं आने वाला, जबकि कुछ हाथ आ भी चुका है ।”
“मजाक मत कर ।”
“सारी ! विष्णु कसाना की बोलो । कोई अतापता मिला उसका ?”
उसने इंकार में सिर हिलाया ।
“यादव साहब, तुम्हारे किसी काम आने के जज्बे ने मुझे भी प्राम्प्ट किया था कि मैं उसकी कोई खोजखबर निकालने की कोशिश करूं ?”
“निकली ?”
“निकली तो नहीं लेकिन एक हिंट हाथ लगा जिसका मतलब समझ में न आया ।”
“फिर क्या फायदा हुआ ?”
“अभी नहीं हुआ न ! आगे शायद हो !”
“हिंट क्या ?”
मैंने उसे ‘डिप्टी के लिये मैसेज’ की बाबत बताया ।
“वो डिप्टी को घाट पर मिलेगा ।” - यादव ने मैसेज दोहराया - “क्या मतलब हुआ इसका ?”
“अभी तक तो कोई मतलब पल्ले नहीं पड़ा ।”
“कौन से घाट पर मिलेगा ?”
मैंने अनभिज्ञता से कंधे उचकाये ।
“एकाएक उस तिजोरीतोड़ की टांग हर जगह फंसी क्यों दिखाई देने लगी है ?”
“हमें क्या !”
“मुझे है । साला यहां भी मौजूद है । सजधज ऐसी कि फिल्म स्टार जान पड़ता है ।”
“कद्र है उसे अपनी । अपनी अच्छी पर्सनैलिटी को, अच्छी शक्ल सूरत को कैश करता है ।”
“लेकिन है क्यों यहां ?”
“मेजबान से मालूम करेंगे ।”
“उसी से क्यों नहीं ! साले इतने बुरे दिन आ गये मेरे कि एक सजायाफ्ता मुजरिम मेरे साथ इस नामुराद पार्टी में शरीक है !”
“डेमोक्रेसी है ।”
“मां का सिर है । बुला उसे यहां ।”
“अब जाने भी दो । यादव साहब, हम सच में पार्टी में शरीक होने नहीं आये । हमारा मिशन जुदा है ।”
“वो मिशन भी तो डाउटफुल है ।”
“अब छोड़ो भी । कोई और बात करो ।”
“और क्या बात ?”
“पक्का है कि कातिल केयरटेकर है ?”
“अरे, इस सिलसिले में खुद ही तो उसकी बाबत इतना हो हल्ला मचाया, अब कच्चा पक्का क्या कर रहा है ?”
“जवाब दो ।”
“तो सुन जवाब । वो प्राइम मर्डर सस्पेक्ट है क्योंकि गायब है । वैसे उस रेशमी कपड़े की धज्जी की वजह से ये फुलझड़ी भी शक के दायरे में आती है और मौकायवारदात से बरामद हुए पर्स की वजह से मकतूला की मां भी शक के दायरे में आती है । मां की तो दूसरे कत्ल में भी हाजिरी है ।”
“लेकिन तीसरे कत्ल में - डियर पार्क में हुए शिल्पी तायल के कत्ल में - दोनों की कोई हाजिरी नहीं । केयरटेकर की भी ।”
“अभी क्या पता !”
“धमकी वाली चिट्ठी को खातिर में लाओ तो सब किया धरा हमारे मेजबान के भूतपूर्व पार्टनर सुजित त्रेहन का होना चाहिये ।”
“वही केयरटेकर विष्णु कसाना निकला तो हो जायेगा न अपने आप !”
“तीनों वारदात आपस में रिलेटिड हैं ?”
“होनी तो चाहिये । क्योंकि सबका धुरा तोशनीवाल है ! पहली मकतूला उसकी बेटी थी, दूसरी उसकी नेपाल से वाकिफ थी, तीसरी उसकी प्राइवेट सेक्रेट्री थी ।”
“मर्डर में वैरायटी बहुत है !”
“क्या मतलब ?”
“पहला गन से हुआ, दूसरा फांसी जैसे फंदे से हुआ, तीसरा गला रेतने से हुआ ! फिर भी कातिल कोई एक !”
वो सकपकाया ।
“कहीं तीन कत्ल तीन जुदा कातिलों के कारनामे तो नहीं ?”
“मुझे उम्मीद नहीं । असल में हालात ही ऐसे बने होंगे कि हर कत्ल जुदा तरीके से वाकया हुआ । सुरभि के कत्ल को खुदकुशी जताना था इसलिये गन का इस्तेमाल हुआ । सपना टाहिलियानी के कत्ल में पर्दे की रेशमी डोरी कातिल के हाथ में आयी इसलिये वो कत्ल गला घोंटा जाने से हुआ । शिल्पा तायल के कत्ल के वक्त कोई तीखी धार वाला औजार हैण्डी था । इसलिये उस लड़की का गला रेता गया ।”
“ठीक ! लेकिन सपना टाहिलियानी के लैटरबाक्स से बरामद रुक्के से - जिस पर दर्ज था ‘अगला नम्बर दीक्षा भटनागर का’ - तो कुछ न जुड़ा क्योंकि वो तो कहती है कि वो न तोशनीवाल परिवार में किसी को जानती है और न मकतूलाओं में से किसी को जानती है !”
“अभी तफ्तीश शुरुआती दौर में है, अभी किसी जुबानी जमाखर्च की बिना पर किसी बात को खारिज नहीं किया जा सकता । अभी...”
वो खामोश हो गया, उसकी निगाह दरवाजे की तरफ उठ गयी ।
मैंने उसकी निगाह अनुसरण किया ।
शिव मंगल तोशनीवाल हाल में कदम रख रहा था ।
मेरी निगाह अंजना रांका वाले ग्रुप की ओर भटकी तो मैंने उसे वहां से गायब पाया । मैंने तत्काल चारों ओर निगाह दौड़ाई तो मैंने अंजना को हाल के पिछवाड़े का एक दरवाजा खोलकर उसके पीछे गायब होते पाया ?
क्या माजरा था ?
मेजबान आया तो खास मेहमान चल दिया ।
कहां चल दिया ?
मैंने अपना गिलास खाली करके एक करीबी टेबल पर रखा और घूम कर उस दिशा में बढ़ा जिधर जा कर अंजना निगाह से ओझल हुई थी । मैं उस दरवाजे पर पहुंचा, एक क्षण को ठिठका फिर उसे खोलने के लिये उसका हैंडल थामा तो हैंडल मेरे हाथ में पहले ही घूम गया और दरवाजा भीतर की तरफ खुलने लगा ।
हड़बड़ा कर मैंने हाथ वापिस खींच लिया ।
एक लिपी पुती, जड़ाऊ, भारी भरकम अधेड़ महिला चौखट पर प्रकट हुई ।
“क्या है ?” - मुझे घूरती सी वो सर्द लहजे में वोली - “क्या चाहिये ?”
“कुछ नहीं ।” - मैं तनिक बौखलाया सा बोला - “कुछ नहीं, मैडम । मैं ...मैं यूं ही भटक गया था ।”
“कहीं और भटको, भई । ये लेडीज वाशरूम है ।”
“ओह ! सॉरी ! सारी !”
“अब रास्ता तो छोड़ो !”
साली ने ठेला गुजारना था ।
चाह कर भी मैं वैसा कुछ बोल न सका । मैं एक बाजू हटा ।
नाक की फुंगी आसमान की तरफ उठाये वो मेरे करीब से गुजरी ।
दरवाजा उसने अपने पीछे फौरन बंद कर दिया था इसलिये मैं भीतर नहीं झांक पाया था ।
बहरहाल अंजना कहीं चली नहीं गयी थी, लेडीज टायलेट में थी ।
तभी वेटर जैसी सफेद पोशाक में हाउसहोल्ड का एक नौजवान वेटर मेरे करीब से गुजरा । तत्काल मैंने उसे टोका ।
वो ठिठका, उसने अदब से मेरी तरफ देखा ।
“क्या नाम है तुम्हारा ?” - मैंने पूछा ।
“माधव सर ।”
“मुझे जानते हो ?”
“पहचानता हूं ।”
“कौन हूं मैं ?"
“गैस्ट हैं ।”
“और डिटेक्टिव हूं ।”
उसके नेत्र फैले ।
“तुमने मेरे कहे एक काम करना है । कोई ऐतराज ?”
उसके चेहरे पर अनिश्चय के भाव आये ।
मैंने घूर कर उसे देखा ।
“यस, सर ।” - तत्काल वो बौखलाये लहजे से बोला ।
“क्या यस सर !”
“आप जो काम कहेंगे, वो मैंने करना है ।”
“मुस्तैदी से ! बिना कोताही के !”
“जी हां ।”
“अंजना रांका मैडम को पहचानते हो ?”
“जी हां ।”
“खूब अच्छी तरह से ?”
“जी हां ।”
“मालूम है वो यहां आयी हुई है ?”
“जी हां ।”
“गुड । इस वक्त वो भीतर टायलेट में हैं ।” - मैंने बंद दरवाजे की तरफ संकेत किया - “जब तक मैडम भीतर हैं, तुमने इस दरवाजे पर से हिलना नहीं है । वो बाहर कदम रखें तो तुमने फौरन मुझे खबर करनी है । समझ गये ?”
“जी हां ।”
“शाबाश !”
मैं वापिस लौटा ।
“... मुझे आप लोगों से पहले यहां होना चाहिये था” - हाल में तोशनीवाल मेहमानों से मुखातिब था - “लेकिन अफसोस है ऐसा न हो सका, ऐन मौके पर एक खास काम गले पड़ गया, चाह कर भी जिसे मैं टाल न सका ।”
जवाब में कई नैवर माइंड, इट्स आल राइट हाल में गूंजी ।
“भई, साहब को ड्रिंक सर्व करो ।” - फिर कोई बोला ।
“अभी । अभी ।” - तल्काल तोशनीवाल बोला - “इन ए मिनट । लैट मी सैटल फर्स्ट ।”
ड्रिंक की मनुहार तत्काल बंद हुई ।
“मैडम कहां हैं ?” - उसने देवीलाल से पूछा ।
“ऊपर अपने कमरे में हैं ।” - देवीलाल अदब से बोला ।
“वहां क्या कर रही हैं ? उन्हें नीचे होना चाहिये था !”
“नीचे ही थीं । लेकिन..”
“क्या लेकिन ?”
“चली गयीं ।”
“अरे क्यों ?”
“कहती थीं एकाएक तबियत खराब हो गयी थी ।”
“बड़ा अच्छा मौका ढूंढ़ा तबीयत खराब करने का ! मेहमानों का तो खयाल करना था ! मेरी गैरहाजिरी में तो मेहमानों का खयाल करना था । ऐसा भी क्या कि...”
तभी एक तीखी, जनाना चीख वातावरण में गूंजी ।
फिर गोली चलने की आवाज !
माहौल में दहशतनाक सन्नाटा छाया ।
मुझे साफ जान पड़ा कि दोनों आवाजें ऊपर से आयी थीं ।
मैं सीढ़ियों की तरफ लपका ।
यादव वहां पहले ही पहुंच चुका था - आखिर प्रशिक्षणप्राप्त पुलिस अधिकारी था - मुझे उसके दायें हाथ में गन की झलक दिखाई दी ।
देवीलाल मेरे पीछे दौड़ा चला का रहा था ।
बाकी सब सकते की हालत में मुंह बाये आवाजों की दिशा में सिर उठाये खड़े थे ।
आगे पीछे हम तीनों ऊपर पहुंचे ।
मैंने श्यामली के बैडरूम के दरवाजे को धक्का दे कर खोला ।
बैडरूम खाली था !
“बाथरूम !” - देवीलाल सस्पेंसभरे स्वर में बोला ।
हम कमरा लांघ कर अटैच्ड बाथ के दरवाजे पर पहुंचे । दरवाजा खुला था और वो भीतर मरी पड़ी थी ।
खून से लथपथ श्यामली तोशनीवाल की लाश बाथरूम के फर्श पर एक पहलू के बल पड़ी थी ।
यादव ने झुक कर लाश का मुआयना किया ।
“खत्म ?” - मैं धीरे से बोला ।
यादव ने सहमति में सिर हिलाया ।
मैं घूमा और लम्बे डग भरता दीदे फाड़े चौखट पर खड़े देवीलाल के करीब पहुंचा ।
“मैडम का कल हो गया है ।” - मैं बोला - “जा के साहब को खबर कर ।”
देवीलाल उलटे पांव वापिस दौड़ चला ।
मैं लाश के पास वापिस पहुंचा ।
गोली कनपटी में लगी थी और यूं बने सुराख में से खून तब भी बह रहा था । मैंने नोट किया उसका दायां हाथ जिस्म से बाहर को फैला हुआ था और उसकी मुट्ठी बंधी हुई थी । मेरे देखते देखते यादव ने मुट्ठी को जबरन खोला तो एक कागज का पुर्जा नमूदार हुआ ।
कागज का पुर्जा ।
टाइपशुदा ।
जैसा पहले दो बार बरामद हो चुका था ।
यादव ने पुर्जे को खोल कर सीधा किया तो मैंने भी उस पर निगाह दौड़ाई ।
उस पर दर्ज था:
अगला और आखिरी नम्बर दगाबाज यार शिव मंगल तोशनीवाल का फिर बेईमानी, धोखाधड़ी का हिसाब चुकता
“बीच में एक नग रह गया ।” - मैं दबे स्वर में बोला ।
“लडका !”- यादव बोला ।
“हां । इस रुक्के ने तो अगला और आखिरी नम्बर तोशनीवाल का लगा दिया ! शिशिर याद न आया !”
“क्या पता क्या माजरा है !”
तभी मेरी निगाह लाश से कदरन परे, बाथटब की जड़ में गुच्छा गुच्छा होकर बाल बने पड़े एक कागज पर पड़ी । मैंने आगे बढ़कर उसे उठाया और उसे खोल कर सीधा किया । वो एक लैटरहैड साइज का कागज था और उस पर भी एक इबारत दर्ज थी जो कि काफी लम्बी थी और खत की सूरत में थी ।
लिखा था:
सुजित,
सुरभि तुम्हारी अपनी बेटी थी ? शिशिर, जो कि सुरभि का जुड़वां है, तुम्हारा अपना बेटा है । दोनों तुम्हारे... गायब हो जाने के बाद पैदा हुए थे । मुझ्रे तरह से यकीन दिलाया गया था कि तुम मर चुके थे । तुम्हारी ‘मौत’ के वक्त तक मुझे मालूम नहीं था की मैं उम्मीद से थी, कि मेरी कोख में तुम्हारा बीज पनप रहा था । तुम्हारे और शिव के बीच क्या था, मुझे कतई कुछ नहीं मालूम था । बाइस साल पहले नेपाल में हमें पीछे कैम्प में छोड़ कर एक्सकर्शन ट्रिप पर शिव के साथ निकले और वापिस न लौटे । लौट कर शिव ने मुझे बताया कि तुम एक घातक हादसे का शिकार हो गये थे । मैं गम खा कर रह गयी, क्योंकि शिव की बात पर शक करने की कोई वजह ही नहीं थी । फिर जैसे एक युग गुजर गया जबकि तुम्हारी चिट्ठी आयी और हकीकत की खबर लगी, उस हकीकत की खबर लगी, इतने सालों में जिसकी शिव ने मुझे भनक न लगने दी । मैं तुम्हारे बच्चों की परवरिश में ही लगी रही । मुझे कभी शक न हुआ कि कहीं दाल में कुछ काला था । फिर बदले की आग में जलते तुम अपनी ही औलाद के दुश्मन बन गये - भले ही तुम असलियत से नहीं वाकिफ थे लेकिन इस हकीकत को फिर भी नहीं झुठलाया सकता कि एक बाप ने अपनी बेटी के खून से हाथ रेंज । और अभी और खून करने को आमादा हो । मैं तुम्हें ये चिट्ठी इसलिये लिख रही हूं कि तुम्हारी धमकी के तहत अगर मेरा पहले ही खून हो चूका हो तो इस चिट्ठी के जरिये तुम्हें असलियत की वाकफियत हो सके और फिर शायद शिशिर की जान बच जाये जो कि तुम्हारा अपना खून है । तुम्हें खुदा का वास्ता है शिशिर की जान बख्श देना क्योंकि वो तुम्हारा बेटा है, तुम उसके बाप हो । मेरे इस दुनिया से चले जाने के बाद तुम्हारे लिए कुछ बाकी बचा होगा तो वो तुम्हारा बेटा शिशिर ही होगा । उसको खत्म करोगे तो अपने ही वजुद का एक अहम हिस्सा खत्म करोगे ।
सुजित, अब तक जो किया के किया, अब ये जुल्म न करना ।
श्यामली
चिट्ठी कंप्यूटर जनरेटिड थी, उस पर सिर्फ हस्ताक्षर हाथ से किये गये थे ।