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Thriller बहुरुपिया शिकारी

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“कातिल को ये बात नहीं मालूम होगी । किसी वजह से उसे अंदेशा है कि आपने इत्तफाकन कुछ न कुछ देखा था । आप उसकी करतूत की या उसकी या दोनों की गवाह थीं ।”

“मैं ही क्यों ? और भी तो लोग रहते हैं आसपास ?”

“आपका दौलतखाना इत्तफाक से मौकायवारदात के ऐन सामने है और आप ही की खिड़कियों का रुख उधर है । यहां से वो जगह साफ दिखाई देती है जहां कि लाश पड़ी पायी गयी थी ।”

“वो... वो मुझे मार डालेगा क्योंकि समझता है कि मैंने कत् ... मैंने कुछ देखा था ?”

“हां । इसी वजह से एसआई साहब यहां हैं ।”

“इस वजह से नहीं ।” - तत्काल रावत बोला - “इस वजह से कि सिद्धार्थ एन्क्लेव वाली मकतूला के लैटरबाक्स से एक रुक्का निकला था जिस पर लिखा था - अगला नम्बर दीक्षा भटनागर का ।”

“इसके सिर पर मंडराते खतरे की उस वजह के अलावा अब ये एक नयी वजह पैदा हो गयी हुई हो सकती है ।''

“शर्मा, ये बड़ी दूर की कौड़ी है कि जिस पर कातिल का पहले से निशाना था, वही उसकी लेटेस्ट करतूत की चश्मदीद भी निकल आयी !”

“दूर की है या पास की है, है बराबर ।”

रावत के चेहरे पर विश्वास के भाव न आये ।

“मेरे पास एक स्कीम है जो उसको एक्सपोज कर सकती है ।”

“क्या ?”

“लेकिन उस पर मैडम की एक्टिव हैल्प के बिना अमल कर पाना मुमकिन नहीं ।” - मैं दीक्षा की तरफ घूमा - “मैडम, आप चाहें तो मेरी मदद कर सकती हैं ।”

“तुम्हारी ?” - उसकी भवें उठी ।

“पुलिस की ।”

“कैसे ?”

“मेरे से... हमारे से, पुलिस से... सहयोग करके ।”

“क्या करना होगा ?”

“कातिल के लिये बेट बनना होगा ।”

“ओह, नो ।”

“आपका बाल भी बांका नहीं होगा । हम दो जने गारंटी करते हैं ।”

“नो ।”

“ये न भूलिये कि जैसे मैं यहां पहुंचा, वैसे कातिल पहुंचा होता तो आपका क्या अंजाम... हो भी चुका होता ।”

“वो तो ठीक है लेकिन...”

“आप इस हकीकत से नावाकिफ नहीं होंगी कि आपकी सलामती इसी बात में है कि कातिल जल्द-अज-जल्द पकड़ा जाये । जितनी देर उसकी गिरफ्तारी में लगेगी, उतनी ही देर आपकी जान सूली पर टंगी रहेगी । नहीं !”

“हं- हां ।”

“ये बात समझती हैं न आप ?”

“हां ।”

“तो फिर कहना मानिये ।”

“क्या करूं ? क्या करना होगा ?”

“आपको सामने डियर पार्क में मौकायवारदात पर अकेले जाना होगा ।”

“अकेले !”

“खाली लगेगा ऐसा कि अकेले । असल में हम दोनों पूरी मुस्तैदी से आपके साथ होंगे ।”

“हूं । वहां जाकर मैं क्या करूंगी ?”

“आप जाहिर करेंगी कि आपको किसी चीज की तलाश है ।”

“उससे होगा क्या ?”

“अपनी रुक्के पर दर्ज धमकी पर खरा उतरने के लिये कातिल अगर आप पर घात लगाये है तो वो आसपास ही कहीं होगा । वो आपको पार्क में अकेला देखेगा तो इसे अपने लिये सुनहरा मौका समझेगा और फिर आपके करीब पहुंचेगा । ऐसा करेगा तो वो हमारी निगाहों से छुपा नहीं रहेगा । थाम लिया जायेगा ।”

“पहले ही उसने मेरा काम कर दिया तो ?”

“वो नौबत आने से बहुत पहले थाम लिया जायेगा ।”

“अच्छा !”

“हां ।”

“ठीक है । मुझे मंजूर है ।”

“खतरनाक काम है ।” - रावत बोला ।

“अब मुझे परवाह नहीं ।”

“पंगा पड़ सकता है ।”

“देखा जायेगा । अब मैंने हां बोल दी है तो मुझे डराओ नहीं ।”

रावत कुछ क्षण अनिश्चित भाव से उसे देखता रहा, फिर मेरे से मुखातिब हुआ - “तुम हो किस फिराक में ?”

“किसी नतीजे की ही फिराक में हूं” - मैं बोला - “जो कि सामने आयेगा ।”

“आयेगा ?”

“हो सकता है न भी आये ।”

“इंस्पेक्टर साहब को खबर करनी होगी । इजाजत लेनी होगी ।”

“सर्दियों के दिन हैं, अंधेरा होना शुरू हो भी गया है, बिल्कुल ही हो गया तो तजुर्बा नाकाम हो जायेगा । अंधेरे की वजह से रिस्क भी बहुत बढ़ जायेगा । इसलिये वक्त की जरूरत ये है कि हम टाइम जाया न करें, फौरन चल दें ।”

“मैं सब लॉक करती हूं ।” - दीक्षा निर्णायक भाव से बोली ।

हम मेरी कार पर डियर पार्क की बाउंड्री पर पहुंचे ।

“आपको” - मैं दीक्षा से सम्बोधित हुआ - “मालूम है न कि लाश कहां पड़ी पायी गयी थी ?”

“हां ।” - वो बोली - “एसआई साहब ने बताया था ।”

“आप यहां उतर जाइये । हम कार पर परली तरफ से पहुंचते हैं । पांच मिनट यहां रुकियेगा, फिर पार्क में दाखिल हो जाइयेगा ।”

“यहां ! अकेले !”

“चलती सड़क है । यहां आपको कोई खतरा नहीं । कोई खतरा होगा तो मौकायवारदात के करीब होगा । वहां हम सब सम्भाल लेंगे ।”

उसने हिचकिचाते हुए सहमति में सिर हिलाया और फिर कार से बाहर निकल गयी ।

तत्काल मैंने कार को उस दिशा में दौड़ाया जिधर से कि मैं वहां पहुंचा था ।

पार्क के उधर के गेट से हम भीतर दाखिल हुए और खामोशी से, सावधानी से पिकनिक हट्स की ओर बढ़े ।

रास्ते में रावत ने गन निकाल कर अपने हाथ में ले ली ।

“गुड !” - मैं बोला - “अब तुम उस कॉटेज के करीब की झाड़ियों के पीछे चले जाओ, मैं जा कर मैडम की चौकसी करता हूं ।”

“ठीक है ।” - रावत बोला ।

परे परे से चलता, झाड़ियों की ओट लेता मैं उससे पहले आगे बढ़ गया । जब सुझे उधर से हरसुख मार्ग दिखाई देना शुरू हो गया तो मैं ठिठका । मैंने एक पेड़ की ओट ले ली और प्रतीक्षा करने लगा ।

फिर नीमअंधेरे में मुझे दीक्षा पार्क में दाखिल होती दिखाई दी । वो मेरे करीब से गुजरी तो मैंने उसे आगे बढ़ जाने दिया फिर उसके और अपने बीच कोई बीस गज का फासला रख कर मैं भी उधर बढ़ा ।

रोशनी घटती जा रही थी और बड़ी हद पांच मिनट में रात की शुरुआत हो जाने वाली थी ।

वो मौकायवारदात की तरफ बढ़ रही थी ।
 
कुछ ही क्षण बाद वो मौकायवारदात के करीब थी और मेरे और झाड़ियों में छुपे रावत के बीच में थी ।

वहां झाड़ियां और भी थीं और कोई उनमें सें किसी के भी पीछे छुपा हो सकता था । मैं किधर भी कैसी भी हलचल के लिये सजग था, चाकचौबंद था ।

वो मौकायवारदात के करीब पहुंच गयी और सिर झुकाये यूं धीरे धीरे चलने लगी जैसे जमीन पर किसी खोई चीज को लोकेट करने की कोशिश कर रही हो ।

एकाएक गोली चली ।

मेरे छक्के छूट गये ।

फिर ये जान कर मुझे राहत महसूस हुई कि फायर उन झाड़ियों की तरफ से हुआ था जिनके पीछे रावत छुपा था ।

दो फायर और हुए ।

तीनों फायर लगभग एक साथ हुए थे ।

मैंने दीक्षा को धराशायी होते देखा ।

वो मुंह के बल जमीन पर गिरी थी और उसके जिस्म में कोई हरकत नहीं थी ।

हे भगवान ! ये क्या पंगा लिया मैंने !

मैं बगूले की तरह आगे दौड़ा ।

लेकिन झाड़ियों में से निकल कर रावत मेरे से पहले दीक्षा के करीब पहुंच चुका था ।

करीब पहुंच कर मैंने व्याकुल निगाह इधर उधर दौड़ाई तो एक हट की एक दीवार में कोई चार इंच के फासले पर मुझे दो गोलियां धंसी दिखाई दीं ।

गोलियां तीन चली थीं ।

जरूर एक दीक्षा को जा लगी थी ।

मैं घूमकर उसकी तरफ लपका तो पाया कि रावत उसे सहारा दे कर उठा रहा था और वो अपने पैरों पर खड़ी हो रही थी ।

“क्या हुआ ?” - करीब पहुंच कर मैंने व्यग्र भाव से पूछा ।

“ठोकर खा कर गिरी ।” - वो हांफती सी बोली ।

“ओह !” - मैंने चैन की सांस ली, फिर मैं रावत की तरफ घूमा - “तुमने कितनी गोलियां चलाई थी ?”

“दो ।”

“वजह क्या थी ?”

“मुझे इसके पीछे एक साया दिखाई दिया था ।”

“मुझे तो नहीं दिखाई दिया था !”

“पक्की बात ?”

“हां ।”

“मैंने नाहक गोलियां दाग दीं ।”

“कनफ्यूजन में । बढ़ते अंधेरे में परछाइयों के खेल ने कनफ्यूज किया ।”

“मैंने इसके पीछे सूखी पत्तियों की सरसराहट भी सुनी थी !”

“हो सकता है कोई जानवर हो ।”

“अच्छा !” - वो आश्वासनहीन स्वर में बोला ।

मैंने कुछ क्षण उसके मिजाज पर विचार किया ।

“जरा उधर चलो ।” - फिर बोला ।

“उधर किधर ?”

“अरे, चलो तो । मालूम पड़ता है ।”

“ठीक है । चलो ।”

“मैडम, आप भी । आपका पीछे अकेले ठहरना ठीक नहीं ।”

हम उस हट की ओर बढ़े जिसकी दीवार में मैंने वो गोलियां धंसी देखी थीं । मैंने उस जगह की ओर रावत का ध्यान आकर्षित किया ।

“ओह !” - वो बोला - “तो मेरी चलाई दोनों गोलियां यहां टकराईं ।”

“निकालो ।”

“क्या ?”

“अरे, गोलियां, और क्या !”

“काहे को ?”

“लो ! पूछते हो काहे को ! कैसे पुलिस वाले हो !”

“कैसे निकालूं ? गहरी धंसी हैं ।”

“इतनी गहरी नहीं धंसी । जब दिखाई दे रही हैं तो गहरी कहां हुईं !”

“हूं ।”

उसने अपनी जेबें टटोली और एक में से एक नेल कटर बरामद किया । उसके रेती वाले हिस्से को उसने कटर से बाहर निकाला और फिर उसकी सहायता से दोनों गोलियों को दीवार में से निकाला । उसने उनको अपनी हथेली पर रख कर उनका मुआयना किया तो तत्काल उसके चेहरे पर हैरानी के भाव आये ।”

“ये दोनों मुख्तलिफ गोलियां है ।” - वो उत्तेजित स्वर में बोला - “इनमें से एक गोली अड़तीस कैलीबर की है जो कि मेरी गन है । दूसरी बत्तीस कैलीबर की है । अरे, शर्मा, मेरा कोई वहम नहीं था, मुझे कोई कनफ्यूजन नहीं हुआ था, यहां कोई था जिसके पास बत्तीस कैलीबर की गन थी और उसने उससे ये एक गोली चलाई थी ।”

“जिससे” - मैं धीरे से बोला - “मैडम, इसलिये बच गयीं क्योंकि ऐन वक्त पर ठोकर खा कर गिरीं ।”

दीक्षा के शरीर ने जोर से झुरझुरी ली ।

“आप बाल बाल बची हैं” - रावत बोला - “इस सयाने की सयानी स्कीम ने समझो कि आपका काम तो बस कर ही डाला था ।”

दीक्षा का शरीर फिर कांपा ।

“सारी !” - मेरे मुंह से निकला ।

“वो तो तुम हो” - रावत बोला - “लेकिन अब क्या करें ?”

“इसे घर पहुंचाते हैं ।”

“मैं नहीं जाऊंगी ।” - वो एकाएक बोल पड़ी - “मुझे नहीं पता यहां क्या हुआ ? मुझे नहीं पता यहां मेरे पीछे कोई था या नहीं था । लेकिन फायरिंग ने मेरे होश उड़ा दिये हैं । मैं घर नहीं जाऊंगी ।”

“तो उन्हीं फ्रेंड्स के पास चली जाओ जिनके साथ पिछली रात थी ।”

“नहीं ।”

“होटल ।” - रावत बोला - “करीब ग्रीन पार्क में ही एक होटल है ।”

“वहां इसलिये नहीं” - वो बोली - “क्योंकि करीब है । जब तक ये विष्णु कसाना उर्फ सुजित त्रेहन पकड़ा नहीं जाता मैं घर से कही दूर छुप कर रहना चाहती हूं ।”

कनाट प्लेस में कोजी कार्नर के ऊपर ही एक छोटा सा - पंद्रह कमरों वाला - होटल था, कोजी कार्नर का मालिक ही जिसका मालिक था इसलिये कोजी कार्नर जैसी ही शिनाख्त मेरी वहां भी थी । होटल का नाम कोजी इन था ।

मैंने वो होटल तजवीज किया तो दीक्षा ने तनिक हिचकिचाते हुए हामी भर दी ।

“ठीक है ।” - रावत बोला - “मुझे भी सूट करता है ।”

“तुम्हें सूट करता है !” - मैं सकपकाया - “क्या मतलब ?”

“तुम भूल रहे हो मैं इसकी निगरानी पर तैनात हूं ।”

“ओह !”

“मेरी ड्यूटी खत्म या खारिज नहीं हो गयी है ।”

“तुम इसके साथ इसके रूम में...”

“अरे, रूम में नहीं, होटल में ।”

“ठीक ! ठीक !”

“चलो अब ।”

“मैं नहीं ।”

“क्या मतलब ?”

“मुझे इधर करीब ही कुछ काम है, कनाट प्लेस जाने लौटने में टाइम जाया होगा ।”

“मेरे पास कोई सवारी नहीं है ।”

“टैक्सी करना, भई ।”

“भाड़ा कौन भरेगा ?”

“मैं भरूंगी ।” - दीक्षा बोली ।

“और होटल का खर्चा पानी ! रूम रैंट वगैरह !”

“वो भी मैं भरूंगी ।”

“फिर क्या बात है ! घर से कोई सामान वगैरह लेना होगा !”

“नहीं । मैं फिलहाल वहां कदम नहीं रखना चाहती । सामान के नाम पर जो मुझे चाहिये होगा, वो मैं नया खरीद लूंगी ।”

“यानी यहीं से कनाट प्लेस का रुख करें ?”

“हां । गेट पर ही टैक्सी स्टैण्ड है ।”

गेट तक मैं उनके साथ चला । वो दोनों टैक्सी में सवार हो कर वहां से रुखसत हुए तो मैं अपनी कार में जा सवार हुआ ।

मैंने कलाई घड़ी पर निगाह डाली ।

छ: बजने को थे ।

लिहाजा अभी कांटैक्ट होने की गुंजायश थी ।

मैंने डायरेक्ट्री इंक्यायरी से माथुर ग्रुप आफ इंडस्ट्रीज का फोन नम्बर मालूम किया और उस पर काल लगाई ।

तत्काल उत्तर मिला ।

“माथुर ग्रुप आफ इंडस्ट्रीज । मे आई हैल्प यू ।”

“यस, प्लीज ।” - मैं बोला - “आई वांट टु स्पीक विद मिस्टर सूरज भान माथुर ।”

“मे आई नो हू इज स्पीकिंग ?”

“राज शर्मा ।”

“फ्रॉम ?”

“दि होल बिलो माई नोज ।”

“फर्म का नाम बताइये, मिस्टर शर्मा ।”

“यूनीवर्सल इनवैस्टिगेशंस, नेहरू प्लेस ।”

“क्या बनाती है ?”

“मिस्टर माथुर से बात कर पाने के लिये इतने सवाल जरूरी है ?”

“जरूरी है ।”

“तो मिस्टर माथुर से सम्बंधित किसी ऐसे शख्स से बात कराइये जिससे बात करने के लिये इतनी पूछताछ जरूरी न हो ।”

“आई विल पुट यू ट मिस्टर माथुर्स प्राइवेट सैक्रेट्री ।”

“यस, प्लीज डू दैट ।”

कुछ क्षण बाद मुझे एक ज्यादा मधुर, ज्यादा चपल स्त्री स्वर सुनाई दिया ।

“सीएमडीज आफिस । मे आई हेल्प यू ?”

“मेरा नाम राज शर्मा है । प्राइवेट डिटेक्टिव हूं । एक बार तुम्हारे साहब के बुलावे पर मैं तुम्हारे आफिस भी आया था । मैंने आवाज पहचानी है, तब तुम्हीं ने मुझे माथुर ग्रुप आफ इंडस्ट्रीज के कार्पोरेट आफिस में पहुंचने को कहा था क्योंकि चेयरमैन एण्ड मैनेजिंग डायरेक्टर मिस्टर सूरजभान माथुर मेरे से बात करना चाहते थे । याद आया कुछ ।”

“आया । क्या चाहते हैं, मिस्टर शर्मा ?”

“मिस्टर माथुर से बात करना चाहता हूं ।”

“किस सिलसिले में ?”

“सिलसिला पर्सनल है, उन्हीं को बताऊंगा ।”

“लेकिन...”

“एक बात याद रखना । वो सिलसिला भी पर्सनल था जिसकी वजह से मिस्टर माथुर की पर्सनल रिक्वेस्ट पर - आई रिपीट, रिक्वेस्ट पर - मैंने उनकी हाजिरी भरी थी । जब तुमने बोला था कि मिस्टर माथुर मेरे से मिलना चाहते थे तो मैंने सवाल नहीं किया था कि क्यों मिलना चाहते थे । आई बात समझ में ?”

“मिस्टर माथुर आफिस में नहीं हैं ।”

“तो इतने सवाल किसलिये?”

“रूटीन है ।”

“उनका मोबाइल नम्बर मिल सकता है ?”

“नहीं ।”

“खुद उनको खबर कर सकती हो कि राज शर्मा पांच मिनट के लिए मिलना चाहता है ?”

उसने उस बात पर विचार किया ।

“पांच मिनट बाद फोन कीजिये ।” - फिर बोली ।

“मैं होल्ड करता हूं ।”

“पांच मिनट वाद फोन कीजिये ।”

“ये खामखाह की धौंसपट्टी है । तुम्हारा एम्प्लायर सीमेंट किंग है तो तुम आटोमैटिकली सीमेंट क्वीन नहीं हो गयी हो...” लाइन कट गयी ।

मैंने एक सिग्रेट सुलगा लिया और उसके कश लगाते पांच मिनट गुजारे ।

फिर मैंने वापिस काल लगाई । पहले को तरह बाजरिया आपरेटर मेरी साहब की प्राइवेट सैक्रेट्री साहिबा से बात हुई ।

“मिस्टर माथुर जिमखाना क्लब में हैं ।” - वो बोली - “पंद्रह मिनट में वहां पहुंच सकते हैं ?”

“पहुंच सकता हूं ।”

“गुड ।”

लाइन कट गयी ।

***
 
मैं जिमखाना क्लब पहुंचा । सौ साल पुरानी वो दिल्ली के टॉप बॉस की क्लब थी जहां किसी मेरे

जैसे आम आदमी की समाई नहीं थी । मैंने सुना था वहां की मेम्बरशिप के लिये पैंतीस साल की वेटिंग लिस्ट थी । यानी कि कोई जवानी में मेम्बरशिप अप्लाई करता तो बुढ़ापे में मेम्बर बन पाता ।

मैंने रिसेप्शन पर मिस्टर माथुर का नाम लिया तो एक अंग्रेज के राज की यादगार वर्दीधारी आर्डरली मुझे भीतर सूरजभान माथुर के पास छोड़ कर आया ।

वो वहां बैठा चाय पी रहा था । वो शख्स सीमेंट किंग कहलाता था लेकिन देखने में रेत का भुरभुरा बोरा था । सीमेंट वाली या किंग वाली कोई बात उसके व्यक्तित्व में कहीं थी तो दो उसकी हीरे की कनी जैसी कठोर आंखों में थी ।

“मिस्टर शर्मा ?” - वो स्वभागवत रौबदार स्वर में बोला ।

“दि सेम, सर ।” - उसका सादर अभिवादन करता मैं बोला ।

“दि फेमस प्राइवेट डिटेक्टिव ।”

“मैं बहुत मामूली आदमी हूं सर । लेकिन आप जैसे बड़े लोग कभी कभार सोहबत का मौका देते हैं तो चार लोग मुझे भी जान जाते हैं - जैसे लक्कड़ के साथ लोहा भी तर जाता हैं ।”

“हूं । बैठो ।”

“थैंक्यू, सर ।”

“चाय पियोगे ?”

मेरी निगाह स्वयंमेव ही परे बार की ओर उठ गयी ।

“सात बजे खुलता है ।” - वो बोला - “अभी टाइम है ।”

मैं खिसयाया सा हंसा ।

“चाय, जाने दीजिये सर ।” - फिर बोला - “मैं आपका कम से कम वक्त लेना चाहता हूं ।”

“जब यहां बुला ही लिया तो अब क्या फर्क पड़ता है ! बोलो, क्या चाहते हो ?”

“सर, दिल्ली शहर के एक आप जैसे ही मकबूल शख्स की बाबत आप जैसे ही बिजनेस टाइकून की बाबत बात करना चाहता हूं ।”

“कौन हुआ वो ?”

“शिव मंगल तोशनीवाल !”

“तोशनीवाल इंटरप्राइजेज !”

“वही ।”

“जिसका भीकाजी कामा प्लेस में ही बिजनेस आफिस है ? जो यूं समझो कि हमारा नेक्स्ट डोर नेबर है ?”

“वही, सर । आप वाकिफ हैं ?”

“हां, भई । फेडरेशन आप इंडियन चैम्बर आफ कामर्स एण्ड इंडस्ट्रीज का आनरेबल मेम्बर है, अक्सर मुलाकात होती है ।”

“फिर तो यूं कहिये कि बाखुबी वाकिफ हैं !”

“यही समझ लो । क्या जानना चाहते हो तोशनीवाल के बारे में ?”

“आप क्या जानते हैं ?”

“बल्कि ये बोलो कि क्यों जानना चाहते हो ।”

“सर, आपको उनकी बेटी के मर्डर की खबर होगी !”

“लगी तो है !”

“मैं उस केस पर काम कर रहा हूं ।”

“तोशनीवाल के कहने पर ?”

“उनकी मिसेज श्यामली तोशनीवाल के कहने पर । मैडम ने बतौर पीडी मुझे रिटेन किया है इसलिये साहब को मैं खुल के बात करने को तैयार नहीं कर पा रहा हूं । कुछ बातो में काफी सीक्रेटिव हैं वो ।”

“किन बातों में ? बताओ कोई एक बात ।”

“अपनी गुजश्ता जिंदगी का खुल कर जिक्र नहीं करते ।”

“हूं । सुना है तोशनीवाल का पुराना, सालों पुराना, पार्टनर ही कब्र से मुर्दे की तरह उठ कर खड़ा हो गया है और उसी ने उसकी बेटी का कत्ल किया है !”

“फिलहाल ऐसा ही जान पड़ता है । आपसे कभी अपने पास्ट की बाबत कोई बात की हो ?”

“भई, ड्रिंकिंग मैन है । ड्रिंक्स शेयर करते कभी कभार ऐसी बातें निकल आतीं हैं जो कि कोई आम हालात में नहीं करना चाहता । मसलन उसी के बताये हमें मालूम है कि उसकी फाइनांशल फार्चून कोल माइनिंग ने बनाई थी । उसका उस दौर का पार्टनर - शायद उदित त्रेहन नाम था...”

“सुजित त्रेहन ।”

“हां, वही । वो उस वक्त के कोयला मंत्री का करीबी था जिससे ताल्लुकात का फायदा - यूं कहो कि नाजायज फायदा - उठाकर छत्तीसगढ़ के भटगांव के कोल रिच इलाके में कौड़ियों के मोल खदानें हासिल करने में कामयाब हो गया था । उन खदानों ने पार्टनर्स की जिंदगी संवार दी थी । इतना पैसा कमाया था कि नेपाल तक अपना कई तरह का व्यपार फैला लिया था । फिर पार्टनर की एक हादसे में मौत हो गयी थी, तब तक खदानें कोयले से खाली हो चुकी थीं, लिहाजा उधर से अपना कारोबार समेट कर दिल्ली आ गया था । पता नहीं कहना चाहिये या नहीं लेकिन ये भी सुना है कि पार्टनर की मौत हादसे से नहीं हुई थी, टोटल बिजनेस खुद कब्जा लेने के लिये उसने पार्टनर का कत्ल करा दिया था ।”

“ये भी तोशनीवाल साहब ने खुद बोला ?”

“नहीं । उसकी सैक्रेट्री शिल्पी तायल ने बोला जो कि हमारी सैकेट्री की फ्रेंड है । दोनों अक्सर इकट्ठे लंच करती हैं । तोशनीवाल मालूम पड़ा है कि औरतों का रसिया है, हमारी सैक्रेट्री कहती है कि उसका अपनी सैक्रेट्री से भी अफेयर था । इसी वजह से किसी अनगार्डिड मूमेंट में उसे अपनी जीवन गाथा सुना बैठा होगा ।”

लगता था उसे सेक्रेट्री शिल्पी तायल के कत्ल की खबर अभी नहीं लगी थी ।

“सेक्रेट्री से था अफेयर ?”

“बहुत बड़ी बात है ? अनहोनी बात है ?”

“ऐसा तो नहीं लेकिन...”

“आम बात है ये । मर्द की नीयत खराब होनी चाहिये, बस । ऊपर से सुना है बला की खुबसूरत है !”

“कभी मिले आप ?”

“नहीं, भई । मेरा किसी के स्टाफ से क्या लेना देना !”

“ठीक ।”

“एक और भी बात है जो अफेयर की तरफ इशारा करती है !”

“वो क्या ?”

“हमारी सेक्रेट्री कहती है उसे कुछ नहीं आता - जो थोड़ा बहुत कुछ आता है वो भी एम्प्लॉयमेंट में सीखी - इनएफीशेंट है, इतने बड़े बिजनेस टाइकून की पीएस की जॉब के लिये अनफिट है ।”

“यानी अफेयर की वजह से जॉब है !”

“ए वर्ड टू दि वाइज ।”

“कमाल है !”

“एक काबिलेजिक्र बात और भी है जो हमें बाजरिया अपनी सैक्रेट्री मालूम हुई है ।”

“क्या बात ?”

“उसकी सैक्रेट्री की मां भी तोशनीवाल की मुलाजिम थी ।”

“दिल्ली में ?”

“नेपाल में । इस लिहाज से हो सकता है पार्टनर का कत्ल हुआ था, इस बात की खबर बेटी को मां से लगी हो ! ये भी हो सकता है कि मां की किसी तरीके से कत्ल में शिरकत रही हो, वो तोशनीवाल की राजदां हो और तोशनीवाल पर प्रेशर बनाये रखने के लिये, होल्ड बनाये रखने के इरादे से मां ने वो इतना खुफिया, इतना खतरनाक राज बेटी को ट्रांसफर कर दिया हो !”

“कब ?”

“कब क्या मतलब ?”

“कत्ल की बात बाइस साल पुरानी है । तब तो सैक्रेट्री बच्ची रही होगी ! मां ने बच्ची से इतनी गम्भीर बात शेयर की !”

माथुर ने उस बात पर विचार किया ।

“भई” - फिर बोला - “ये तो मुमकिन नहीं जान पड़ता ! बात की भी होगी तो बच्ची की समझ में क्या खाक आया होगा !”

“ऐग्जैक्टली । दूसरे, अफेयर वाली बात भी हज्म होने लायक नहीं लगता ।“

“क्यों भला ?”

“मां से वाकिफ शख का, मां के हमउम्र शख्स का बेटी से अफेयर..” मैं जानबूझ कर खामोश हो गया ।

“घोर कलयुग है, भई, जो न हो जाये थोड़ा है ।”

मेरे ही खयालात दोहरा रहा था ।

“मां अब कहां है ?”

“पता नहीं । वैसे ये मुझे पता है कि शिल्पी चितरंजन पार्क में अकेली रहती है, हो सकता है मां मर चुकी हो ।”

“स्वाभाविक मौत ?”

“और कैसे ?”

“हूं । सर, ये बात ज्यादा मुमकिन लगती है कि मां ने बेटी को - किसी लेटर स्टेज पर, न कि उसके बचपन में - कुछ बताया, न कि ये कि तोशनीवाल साहब ने नशे में अपनी सैक्रेट्री के आगे मुंह फाड़ा ।”

“माई डियर, यु कैन टेक युअर पिक ।”

“पार्टनर अगर जिंदा निकल आया तो उसने बेटी का कत्ल क्यों किया ? तोशनीवाल साहब का कत्ल क्यों न किया जिन्होंने कि उसके साथ दगाबाजी की थी ?”

“तुम बताओ, भई, जासूस तुम हो !”

मैं खामोश रहा ।
 
“दो दशक के बाद अगर पार्टनर जिंदा निकल आया तो ये तो करिश्मा ही हुआ ! तोशनीवाल के लिये तो ये डिजास्ट्रेस खबर होगी ! जिस दिमागी हालत में तोशनीवाल इस बात की वजह से होगा - जमा, बेटी के कत्ल की वजह से होगा - उसको देखते हमें तो कोई हैरानी नहीं होगी अगरचे कि पार्टनर एकाएक तोशनीवाल के सामने आ खड़ा हो तो दहशत से ही उसका दिल न बैठ जाये । जब अपने ही मन में चोर बैठा हो, गिल्ट कम्पलैक्स हावी हो, तो दहशत की कोई हद मुकर्रर नहीं रहती । हमसे पूछो तो ऐसे माइंड सैट वाला आदमी तो खुदकुशी भी कर सकता है ।”

“सही फरमाया आपने । सर, अब उसके पास्ट को भूल कर इन जनरल बताइये कि तोशनीवाल साहब की आप की क्या रीडिंग है ?”

उसने उस बात पर विचार किया ।

“भई” - फिर बोला - “कुछ अनउजुअल तो है उसके किरदार में । आम हालात में बहुत सीक्रेटिव लगता लेकिन कुछ खास हालात में जुबान पर काबू खो बैठता है । बहुत व्यावहारिक है और बहुत सावधान रहने का आदी है । फिक्की में उसके सावधान स्वभाव के बारे में कई जोक मशहूर हैं ।”

“मसलन कोई बताइये ।”

“नब्बे दिन की गारंटी के बिना केला नहीं खरीदता ।”

मेरी बरबस हंसी छूटी ।

“दो कंडोम इस्तेमाल करता है, कहीं एक फट न जाये ।”

“तौबा !”

“इतना खबरदार मिजाज है कि बीवी को उसके बैडरूम में कदम रखने से पहले मैटल डिटेक्टर से गुजरना पड़ता है ।”

“दाता !”

“इतना एटीकेट वाला है कि किसी के जनाजे में जाना हो तो ब्लैक लेबल पीता है ।”

“सर, अब बस कीजिये ।”

वो हंसा ।

“अपने छोटे कद काठ की वजह से कोई इनफीरियारिटी काम्प्लेक्स नहीं फील करते ?”

“जरा भी नहीं । फिर भी उस बाबत कोई हिंट देने ही लगे तो नेपोलियन की मिसाल देता है, चार्ली चैपलिन की मिसाल देता है ।”

“क्या कहने !”

“अरे, भई, पिंट साइज होने का तोशनीवाल को कोई कम्पलैक्स होता तो करंट फ्लेम उससे बालिश्त भर लम्बी होती !”

“फ्लेम ।”

“गर्लफ्रेंड । हलकी जुबान इस्तेमाल करें तो माशूक ।”

“वो कौन हुई !”

“अंजना रांका नाम है ।”

“आप उसे भी जानते हे !”

“वही जनवाता है । हम उसे यहां ड्रिंक्स के लिये इनवाइट करें तो उसे साथ ले आता है ।”

“इंट्रोड्यूस कराया ?”

“हां, भई, कराना ही था ।”

“क्या बोला, उसके बारे में ? साफ बोला कि शो गर्ल थी ?”

“नहीं, भई ।”

“तो क्या बोला ?”

“ईवेंट मैनेजर थी । फ्रालिक्स आर्गेनाइजर थी ।”

“क्या कहने !”

“लेकिन थी वही जो न बोला ।”

“सर मुझे जाती तौर पर मालूम है कि वो पूसा रोड पर स्थित वुडलैंड क्लब में शो गर्ल है ।”

“यही होगी लेकिन जब तोशनीवाल जैसे बड़ी हैसियत वाले, बड़े रसूख वाले शख्स ने उसके साथ दिल लगाया तो कोई तो पर्दादारी जरूरी थी न ! और नहीं तो अपनी बराबरी वाले साहबान से !”

“कोई छुपने वाली बात तो ये नहीं !”

“आई एग्री विद यू लेकिन जिन लोगों के बीच तोशनीवाल का विचरना है, उनमें कौन ऐसा तहजीब से कोरा शख्स होगा जो उसका मुंह पकड़ेगा ?”

“सही फरमाया आपने । कचरे को रेशम की चादर में ढ़कने से बदबू तो नहीं छुप जाती !”

“बहुत स्ट्रांग वर्ड्स हैं, हम तो नहीं इस्तेमाल कर सकते । बाई दि वे, तुमने कहा तुम्हें जाती तौर पर मालूम है कि वो वुडलैंड क्लब में शो गर्ल है । कैसे मालूम है जाती तौर पर ?”

“सर, वुडलैंड क्लब कोई बुरी जगह नहीं ।”

“कहीं ये तो नहीं कहना चाहते कि वहां आते जाते रहते हो !”

“है तो ऐसा ही कुछ !”

“क्लब की वजह से या उसकी वजह से ?”

“सर, में आई स्पीक फ्रीली ?”

“यस,प्लीज ।”

“दोनों वजह से ।”

“शादीशुदा हो ?”

“था ।”

“मतलब ?”

“विधुर हूं ।”

“अरे ! इस उम्र में !”

“लम्बी कहानी है । बोर करेगी आपको ।”

“शाम का हमारा ये वक्त रिलैक्स करने का होता है । हम बोर नहीं होना चाहते ।”

मैं खामोश रहा ।

“कहीं तुम भी तो उसकी फिराक में नहीं हो !”

“सिर्फ उसकी नहीं ।”

“क्या मतलब ?”

“समझिये, सर ।”

“कहीं ये तो नहीं कहना चाहते कि हर खूबसूरत नौजवान लड़की की फिराक में रहते हो !”

“है तो ऐसा ही कुछ कुछ । लेकिन क्या करूं ! मेरा मिजाज लड़कपन से आशिकाना है ।”

उसने हैरानी से मेरी तरफ देखा ।

मैं निर्दोष भाव से मुस्कराया ।

“लिहाजा जनरल प्रैक्टीशनर हो !”

“यही समझ लीजिये ।”

“स्पैशलिस्ट बनो, भई । फायदे में रहोगे ।”

“मैं सोचूंगा इस बाबत ।”

“बहरहाल तोशनीवाल की करंट फ्लेम की बाबत तुम सब जानते हो ।”

“सब तो नहीं जानता । अलबत्ता तमन्नाई हूं सब जानने का ।”

“वजह ?”

“जिस केस पर काम कर रहा हूं उसको हल करने में मदद होगी ।”

“वाकिफ हो इस अंजना रांका से ।”

मैं हिचकिचाया ।

“जब खुद मानते हो कि उसकी फिराक में हो, अभी कहा कि वुडलैंड क्लब उसकी वजह से जाते हो तो वाकफियत हो ही गयी होगी !”

“सर, टु बी आनेस्ट,है तो ऐसा ही ।”

“फिर तो जानते ही होगे जो जानने लायक है उसकी बाबत !”

“बस, जानने लायक ही जानता हूं । बस, इतना जानता हूं कि एक साल से वो वुडलैंड क्लब में है और छ: महीने से मैं उस पर लाइन मारने की प्रैक्टिस कर रहा हूं ।”

“कोई कामयाबी हासिल हुई ?”

“हुई तो सही, सर ।”

“क्या किया ?”

“आपको बोलते शर्म आती है ।”

“क्या किया ?”

“खीर में चम्मच मारा ।”

“लेकिन खा न सके ।”

“चख तो सका बराबर ।”

“हा हा । तोशनीवाल सुनेगा तो दुश्मन हो जायेगा तुम्हारा ।”

“हो जायेंगे तो हो जायेंगे । लेकिन साथ ही उन्हें एक सबक भी तो हासिल होगा !”

“क्या ?”

“हुस्न वाले किसी के यार नहीं होते हैं । यार हो भी गये तो ये वफादार नहीं होते हैं ।”

“वैरी वैल सैड । तो उस लड़की में हालिया जो जानने लायक है, वो जानते हो लेकिन पहले का, उसके दिल्ली में सैटल होने से पहले का, कुछ नहीं जानते हो ?”

“यही बात है, सर ।”

“जब वाकिफ हो तो उसी से पूछा होता !”

“नही बताती । टाल देती है ।”

“हूं ।”

कुछ क्षण खामोशी रही ।

“भई - आखिर बोला - “इस मामले में हम तुम्हारी मदद कर तो सकते हैं ।”

“तो कीजिये न, सर ।” - मैं व्यग्र भाव से बोला - “मेहरबानी होगी ।”

“करें मेहरबानी ?”

“सर, प्लीज ।”

“यहां एक फैलो मेम्बर है, अहसान रजा नाम है, रंगीले राजा हैं, तफरीह की नयी नयी जगह, एंटरटेनमेंट के नये नये ठिकाने, ट्राई करने का उन्हें शौक है । किंगडम आफ ड्रीम्स से पहले गुड़गांव में एक दूसरा रोड शो था जो घुंघरू - दि नौटंकी किंगडम कहलाता था । कभी नाम सुना ?”

मैंने इंकार में सिर हिलाया ।
 
“तीन साल पहले शुरू हुआ था लेकिन किंगडम आफ ड्रीम्स शुरू होने पर उसका वजूद खतरे में पड़ गया था, नतीजतन दो साल पहले किंगडम आफ ड्रीम्स में उसका विलय हो गया था । जब घुंघरू का वजूद था तब अहसान राजा अक्सर वहां जाता था ।”

“तो ?”

“तोशनीवाल जब पहली बार उस अंजना रांका के साथ यहां आया था तो ड्रिंक्स में रजा भी हमारे साथ शरीक था । उन दोनों के रुखसत हो जाने के बाद रजा ने बड़े राजदाराना अंदाज से हमें बताया था कि वो उस लड़की को बहुत पहले से जानता पहचानता था...”

“अंजना रांका को ?”

“भई, उसी की बात हो रही है न !”

“सारी !”

“राजा ने फौरन उसे घुंघरू की नौटंकी डांसर के तौर पर पहचाना था ।”

“ओह !”

“तब जान थामस नाम का एक शख्स घुंघरू का मैनेजर होता था जिसने घुंघरू के किंगडम आफ ड्रीम्स में मर्जर के बाद वो नौकरी छोड़ दी थी और - रजा ने ही मुझे बताया था - अब वो ‘अब्बा’ में मैनेजर था । ‘अब्बा’ डिफेंस कालोनी में एक ...”

“मैं उस जगह से वाकिफ हूं ।”

मेरे से बेहतर कौन वाकिफ होता है !

“गुड ! अगर तुम इस थामस से मिलो तो उस लड़की की बाबत तुम्हें काफी, फर्स्ट हैंड जानकारी हासिल हो सकती है ।”

“राय का शुक्रिया, सर ।”

“और बोलो !”

“और कुछ नहीं । आपके सहयोग का शुक्रिया अपने रिलेक्सेशन के वक्त मेरे जैसे मामूली आदमी को मुंह लगाने का और भी शुक्रिया ।”

उसने मुस्कराकर शुक्रिया कबूल किया ।

“अब मैं” - मैं उठ खड़ा हुआ - “इजाजत चाहूंगा ।”

“बार खुलने का टाइम” - वो अर्थपूर्ण स्वर में बोला - “बस, हुआ ही समझो ।”

“सर, आई विल हैव दैट आनर सम अदर टाइम ।”

“ओके ।”

***

मैं डिफेंस कालोनी पहुंचा ।

‘अब्बा’ से मैं बाखूबी वाकिफ था ।

उसका मौजूदा सोल प्रोप्राइटर जान पी एलैग्जेंडर नाम का गैंगस्टर था और उसके सौजन्य से मैं हमेशा हमेशा वहां का मुअज्जिज मेहमान था ।

यानि एवरीथिंग आन दि हाउस फार राज शर्मा, दि लक्की भाई ।

अब्बा थ्री-इन-वन - डिस्को, कैब्रे जायंट, नाइट क्लब - जगह थी कभी जिसकी स्टार अट्रैक्शन और फिफ्टी पर्सेंट की पार्टनर सिल्विया ग्रेको थी जो कि मशहूर बैली डांसर थी । दूसरा पार्टनर नरेंद्र कुमार नाम का एक सम्पन्न स्टाक ब्रोकर था लेकिन हालात ने कुछ ऐसी करवट बदली थी कि नरेंद्र कुमार कैनेडा माइग्रेट कर गया था और सिल्विया ग्रेको अपनी मर्जी से अब्बा से अलग हो गयी थी ।

थामस वहां मैनेजर था - जो कि अच्छा संयोग था - और मेरी बाबत जान पी एलैग्जेंडर की उसे खास हिदायत थी ।

मैंने अब्बा में कदम रखा ।

मैं बहुत अरसे बाद वहां आया था लेकिन भीतर मैंने हमेशा जैसी ही रौनक पायी ।

मेरे पर निगाह पड़ते ही काले सूट में सजा धजा थामस मेरे करीब पहुंचा ।

“वैलकम !” - वो मुस्कराता, सिर नवाता बोला ।

“थैंक्यू ।”

“वैलकम ड्रिंक !”

“आई डोट माइंड ।”

“दि यूजुअल ऑर यू हैव शिफ्टिड टु सम अदर ब्रांड ?”

“दि यूजुअल । लेकिन यहां नहीं ।”

थामस की भवें उठी ।

“किसी ऐसी जगह जहां थोड़ी देर के लिये तुम्हारे मेरे सिवाय कोई न हो !”

उसकी भवें और उठी ।

“पांच मिनट तुमसे बात करनी है । खास । पर्सनल ।”

“ओह !”

वो मुझे एक छोटे से आफिस में ले आया जहां का दरवाजा बंद होते ही बाहर हाल का शोर वहां पहुंचना बंद हो गया और जहां हम दोनों आमने सामने बैठे ।

वहीं मुझे जानीवाकर ब्लैकलेबल का जाम सर्व हुआ ।

मैंने विस्की की एक चुस्की मारी और एक सिग्रेट सुलगा लिया ।

थामस मेरे सामने बैठा बड़े सब्र से मेरे बोलने की प्रतीक्षा करता रहा ।

“घुंघरू” - मैं सुसंयत, अर्थपूर्ण स्वर में बोला - “दि नौटंकी किंगडम । अंजना रांका । आलसो नोन ऐज मोहना सावंत । कुछ याद आया ?”

उसने तत्काल उत्तर न दिया ।

“एलैग्जेंडर की मुलाजमत में आने से पहले तुम वहां मैनेजर हुआ करते थे ।”

“कैसे जाना ?”

“दैट्स नाट इंपोर्टेंट । कैसे तो जाना ही ! थामस, असल बात पर आओ तो हम दोनों का टाइम बचेगा ।”

“असल बात ?”

“वो लड़की । क्या जानते हो उसके बारे में ? वो वहां नौटंकी डांसर थी । पहले तो यही बोलो कि नौटंकी डांसर का क्या मतलब था ?”

“कोई खास मतलब नहीं था । जगह का नाम क्योंकि नौटंकी किंगडम था इसलिये नौटंकी डांसर कहलाती थी वर्ना कैब्रे डांसर ही थी ।”

“और ? उसकी तब की जाती जिंदगी से ताल्लुक रखती कोई खास बात बताओ ।”

“है तो सही ऐसी एक बात, जो कि एक बड़े स्कैण्डल की शक्ल अख्तियार करने से बाल बाल बची थी ।”

“क्या ?”

“तब उसका एक फैलो मेल डांसर से अफेयर था । जगताप खेरा नाम था । उन्हीं दिनों वो एक बड़े, दौलतमंद आदमी को भा गयी जिसने कि वहां अक्सर आना शुरू कर दिया था ।”

“वो कौन हुआ ?”

“था कोई रंगीला राजा ।”

“नाम याद तो है न ! या भूल गया ?”

“याद तो है !”

“क्या ?”

वो हिचकिचाया ।

“कहीं तोशनीवाल तो नहीं !”

उसने हैरानी से मेरी तरफ देखा ।

“यानी कि वही था ? शिव मंगल तोशनीवाल ! बड़ा बिजनेस टाइकून !”

उसने सहमति में सिर हिलाया ।

ये मेरे लिये नया रहस्योद्घाटन था कि तोशनीवाल का अंजना रांका से अफेयर हालिया नहीं था, काफी पुराना था, तब से चला आ रहा था जब कि वो गुडगांव में डांसर थी ।

“वो तोशनीवाल को भा गयी थी” - मैं बोला - “बस यही बात थी जो बड़े स्कैण्डल की शक्ल अख्तियार करने से बची थी ?”

“नहीं ।”

“तो क्या हुआ था ?”

वो फिर हिचकिचाया ।

“थामस, प्लीज । मेरे को जल्दी है, मैंने फिक्स्ड टाइम में कहीं और पहुंचना है ।”

“उस मेल डांसर का काम हो गया था ।” - वो बोला ।

“क्या मतलब ?”

“समझो ।”

“क्या समझूं ? कहीं तमाम तो नहीं हो गया था ?”

“यही हुआ था । एक रोज अपने घर में मरा पड़ा पाया गया था । कोई जहरीली चीज खा ली थी जिसकी कि शिनाख्त नहीं हो सकी थी । तब काफी खुसर पुसर हुई थी तो बात खुली थी कि वो प्रेम तिकोन का मामला था, कत्ल का केस था, और तिकोन का तीसरा कोण तोशनीवाल था । लेकिन पुलिस की इतने बड़े आदमी पर हाथ डालने की मजाल नहीं हुई थी । तोशनीवाल का बाई नेम जिक्र तक नहीं आया था । खाली यही कहा जाता रहा था कि उसमें एक बड़े, रसूख वाले शख्स का कोई दखल हो सकता था । लिहाजा केस को खुदकुशी करार दे कर क्लोज कर दिया गया था ।”

“खुदकुशी को स्वाभाविक मौत नहीं माना जाता इसलिये पोस्टमार्टम जरूरी होता है । पोस्टमार्टम में तो उस जहरीली चीज की शिनाख्त हुई होगी जिससे कि उसकी जान गयी थी !”

“हुई होगी । मेरे को उस बाबत कोई जानकारी नहीं । बस, इतनी खबर लगी थी कि जहर से मरा था । जहर की किस्म क्या थी, उसकी शिनाख्त क्या हुई थी, ये मुझे नहीं मालूम ।”

“वहां उसका नाम मोहना सावंत था ?”

“मोहना सावंत उसका असली नाम था, अंजना रांका उसका स्टेज नेम था । ऐसे प्रोफेशन में अक्सर लड़कियां नाम बदल कर ही उतरती हैं ताकि घरवालों को, वाकिफकारों को उनकी शिनाख्त न हो सके । कहने का मतलब ये है कि पब्लिक के लिये वहां भी उसका नाम अंजना रांका ही था ।”

“कहां से थी ?”

“मुम्बई से ।”

“कितना अरसा वहां काम किया था ?”

“नौ-दस महीने ।”

“फिर मर्जर के वाद किंगडम आफ ड्रीम्स में पहुंच गयी थी ?”

“पहुंच तो गयी थी लेकिन टिक नहीं पायी थी ।”

“वजह ?”

“जैसे रिवीलिंग, एक्सप्लिसिट कैब्रे की वो स्पैशलिस्ट थी, वहां उसकी कोई गुंजायश नहीं थी ।”

“लिहाजा नौटंकी में वल्गैरिटी पर, एक्सपोजर पर जोर था ?”

“काफी ।”

“नौटंकी में और भी तो डांसर होगी ?”

“थी । उन्होंने नये फारमेट में खुद को एडजस्ट कर लिया था, अंजना रांका नहीं कर पायी थी ।”

“इसलिये दिल्ली आ गयी !”

“मुझे इस बाबत कोई खबर नहीं ।”

“दिल्ली में है । तकरीबन दो साल से । तकरीबन एक साल से वुडलैंड क्लब में । जो कि पूसा रोड पर है । मालूम ?”

“नाम सुना है ।”

“कभी गये नहीं ?”

“नहीं, कभी नहीं । यहीं से फुरसत नहीं मिलती ।”

“ठीक । मिजाज की कैसी थी ?”

“गर्म । टेम्परामेंटल । वहां तो किसी न किसी से कोई न कोई पंगा उसका खड़ा ही रहता था ।”

“वजह ?”

“फ्रस्ट्रेटिड थी । आसमान छूना चाहती थी, क्योंकि खुद को ओवरएस्टिमेट करती थी, जब कि जमीन पर भी पांव अभी मजबूती से नहीं टिके हुए थे ।”

“अतिमहत्वाकांक्षी थी !”

“यही बोला मैंने ।”

“मिस्टर मनीबैग्स से यारी महत्वाकांक्षा की पूर्ति का जरिया थी ?”

“हो सकता है ।”

“एक्सप्रेस ट्रेन मिल गयी तो छकड़े को दरकिनार कर दिया ?”

“क्या बड़ी बात है ! हाई गोल अचीव करने की खातिर रूथलैस तो होना ही पड़ता है !”

“अगर उस फैलो डांसर ने - जगताप खेरा ने - खुदकुशी न की हो, उसका कत्ल हुआ हो तो क्या कत्ल मे उस लड़की का हाथ हो सकता था ?”

“कुछ भी हो सकता था ।”

“तोशनीवाल बीच में न गया होता तो उस यारी का, अंजना और जगताप के अफेयर का क्या अंजाम होता ?”

“मुश्किल सवाल है ।”

“कोशिश करो जवाब देने की ।”

“भई, तोशनीवाल न आता तो उस जैसा कोई और आ जाता ।”

“लिहाजा गोल्ड डिगर थी ।”

“यू सैड इट ।”

“फिर फैलो डांसर से अफेयर किस लिये ?”

“भई, नहीं होगा अफेयर । लगता होगा अफेयर, असल में जगताप खेरा सहूलियत होगा । उम्रदराज शख्स से यारी का और मकसद होता है, नौजवान से यारी का और मकसद होता है ।”

जैसे पिछली रात मैं वक्ती सहूलियत था ।

“गोल्ड डिगिंग कितनी भी अहम हो, जिंसी जरूरत दरकिनार तो नहीं कर दी जाती न !”

लाख रुपये की बात कही थी थामस ने ।

तो ये वजह थी जो मुर्गाबी खुद मेरे सिर पर आ बैठी थी !

गुजरी रात मैं समझ रहा था कि मैं उसे यूज कर रहा था जबकि असल में वो मुझे यूज कर रही थी । जब मैं उसके साथ सैक्स कर रहा था, तब वो नावल तो नहीं पढ़ रही थी, टीवी तो नहीं देख रही थी, जमहाईयां तो नहीं लेती रही थी !

“ठीक !” - मैं बोला - “कोई और बात ?”

उसने इंकार में गर्दन हिलायी ।

मैंने विस्की का गिलास खाली किया और उठ खड़ा हुआ ।

“इसका बिल...” - मैंने कहना चाहा ।

“अरे, क्या गजब करते हो ! मेरी नौकरी छुड़ाओगे क्या ! बॉस की स्टैंडिंग इंस्ट्रक्शंस है कि फार मिस्टर शर्मा, ऐवरीथिंग हेयर इज आन दि हाउस ।”

“मैं देर बाद आया न इसलिये सोचा कि शायद हालात में कोई तब्दीली आयी हो ।”

“कोई तब्दीली नहीं । नो चेंज । बासिज आर्डर स्टैण्ड्स ।”

“इन दैट केस आई विल हैव अनदर ।”

“वैलकम ।”

***
 
मैं महरौली पहुंचा ।

मालूम पड़ा कि वहां सुलतान बार से हर कोई वाकिफ था । लिहाजा बड़े आराम से, बिना भटके मैं वहां पहुंचा ।

डिप्टी ने उसे दारू का अड्डा बताया था और अड्डे की जो कल्पना मेरे मन में थी, वो वैसा बिल्कुल न निकला, वो अच्छा खासा मिडल क्लास बार निकला ।

मेरे वहां आने के पीछे मकसद बस इतना था कि मैं उस जगह से वाकिफ होना चाहता था जहां कि फरार केयरटेकर विष्णु कसाना का आना जाना था ।

बार पर जा कर मैंने बारमैन से अली सुलतान के बारे में पूछा तो मालूम पड़ा कि बारमैन ही अली सुलतान था ।

“मेरा नाम राज शर्मा है” - मैं बोला - “मैं इमरान डिप्टी का दोस्त हूं ।”

“डिप्टी तो आज आया नहीं !” - बारमैन बोला ।

“मुझे दिखाई दे रहा है । आप तो मालिक हो न यहां के ?”

“हूं तो सही अल्लाह के फजल से ।”

“बारमैन भी ?”

“नहीं, भई । आज हूं मजबूरन । और कल था । रैगुलर बारमैन एकाएक छुट्टी कर गया । इसलिये ।”

“ओह ! डिप्टी ने बोला था वो यहां नहीं होगा तो उसका कोई शागिर्द यहां होगा !”

“मुझे इस बाबत कोई खबर नहीं ।”

“ऐसा कोई शख्स यहां नहीं है ?”

“मालूम नहीं । है तो मैं उसकी सूरत से वाकिफ नहीं ।”

“डिप्टी से तो वाकिफ हो न !”

“हां । बाखुबी ।”

“विष्णु कसाना से ?”

उसने संदिग्ध भाव से मेरी तरफ देखा ।

“ऐसे न देखो, यार । ये सोच के लिहाज करो और जवाब दो कि मैं डिप्टी का दोस्त हूं ।”

“डिप्टी का दोस्त तो खैर मेरे सिर माथे है, भले ही कोई हो, लेकिन आप पूछ क्यों रहे हैं विष्णु कसाना की बाबत ?”

“मैं डिटेक्टिव हूं ।'

“क्या !”

“प्राइवेट ।” - मैंने अपना एक विजिटिंग कार्ड निकाल कर उसके सामने काउंटर पर रखा - “कल छतरपुर में तोशनीवाल फार्म पर जो कत्ल हुआ था, उस पर काम कर रहा हूं ।”

“ओह ! विष्णु कसाना वहीं तो...वहीं तो...”

“केयरटेकर था । पुलिस को उस पर कातिल होने का शक है और उन्हें उसकी तलाश है ।”

“तलाश है ? ”

“क्योंकि कत्ल के बाद से गायब है ।”

“कमाल है !”

“क्या कमाल है ?”

“कल रात तो वो यहां था !”

“अच्छा !”

“हां, लेट नाइट में यहां आया था ।”

“यानी उसे जानते पहचानते थे ?”

“नहीं । न जानता था, न पहचानता था । उसने खुद बताया था कि उसका नाम विष्णु कसाना था ।”

“लेट नाइट में आया बोला ! कितना लेट ?”

“बारह बजने को थे ।”

हौसला काबिलेतारीफ था पट्ठे का - मैंने मन ही मन सोचा - महरौली थाने से निकला तो वहां पहुंच गया !

“वो यहां अक्सर आता था ।” - प्रत्यक्षत: मैं बोला ।

“आता होगा ! मैं हर ग्राहक से जान पहचान भला कैसे बना सकता हूं ! हर किसी पर निगाह भला कैसे रख सकता हूं ! खास तौर से लेट नाइट में जबकि यहां बेतहाशा भीड़ होती है ।”

“लेकिन उसकी बात जुदा थी ! उसने खुद अपने आपको जनवाया ?”

“यही बात थी ।”

“वजह ?”

“डिप्टी के लिये मैसेज छोड़ना चाहता था ।”

“क्या ?”

वो खामोश रहा ।

“उसका हुलिया बयान कर सकते हो ?”

उसने किया ।

भूल की कोई गुंजायश नहीं थी । वो केयरटेकर विष्णु कसाना का ही हुलिया बयान कर रहा था ।

“छोड़ा मैसेज ?” - मैंने पूछा ।

“हां ।” - वो बोला ।

“क्या ?”

वो फिर हिचकिचाया ।

“जनाब, डिप्टी हम दोनों का फ्रेंड है, आपको दोस्ती का सदका है ।”

“डिप्टी के लिये मैसेज था” - वो बोला - “कि वो उसे घाट पर मिलेगा ।”

“घाट पर मिलेगा !” - मैं सकपकाया - “कौन से घाट पर मिलेगा ?”

उसने अनभिज्ञता से कंधे उचकाये ।

“घाट तो” - फिर बोला - “दरिया किनारे ही होते हैं ।”

“होते हैं । जमना पर भी हैं । लेकिन रात को मुलाकात के लिये मौजूं ठिकाना तो नहीं होते !”

“अब मैं क्या बोलूं ।”

“बहरहाल उसने कहा था, डिप्टी के लिये मैसेज छोड़ा था, कि वो उसे घाट पर मिलेगा ?”

“हां ।”

“शुक्रिया, सुलतान भाई ।”

“कोई ड्रिंक पेश करूं ?”

“नहीं । जल्दी में हूं । कभी फुरसत में आऊं तो करना ।”

उसने सहमति में सिर हिलाया ।

मैं वहां से बाहर निकला । मैं अभी अपनी कार से दूर ही था कि मोबाइल की घंटी बजी ।

लाइन पर इंस्पेक्टर यादव था ।

मैंने काल रिसीव की ।

“कहां पर है ?” - यादव ने पूछा ।

मैंने बताया ।

“वहां क्या कर रहा है ?”

“इल्युमिनेटिड कुतुब मीनार नहीं देखा था, वही देखने आया ।”

“बकवास न कर ।”

“रिजक कमाने के लिये धक्के खाने इधर आया ।”

“वो तो तू खुशी से खा । पार्टी का बोल जिसकी बाबत कहता था नौ से पहले फिर बात करेंगे ?”

“यादव साहब, हम अलग अलग ही पहुंच पायेंगे ।”

“क्यों ?”

“मुझे कपड़े बदलने के लिये, सूट बूट पहनने के लिये, पार्टी के मेहमान वाली सजधज बनाने के लिये घर जाना होगा ।”

“फिर क्या बात है ! हैडक्वार्टर से मुझे ले के जाना ।”

“मैं भगवानदास रोड नहीं, जीके वन जाऊंगा ।”

“ओह ! मुझे तो भूल ही जाता है कि तेरे दो दो घर हैं । ठीक है फिर । वहीं मिलते हैं ।”

“वर्दी में आओगे ?”

“तू क्या चाहता है ?”

“मैं तो यही चाहता हूं कि सिविलियन लिबास में आओ ।”

“ठीक है । चाहत पूरी होगी तेरी ।”

“कैसे होगी ? घर तो तुम्हारा गुड़गांव में है !”

“देखना ।”

Chapter 4

मैं वसंत कुंज पहुंचा ।

कालबैल के जवाब में तोशनीवाल की कोठी का मेनडोर खुला तो मुझे चौखट पर देवीलाल दिखाई दिया ।

उसने सप्रयास मेरा अभिवादन किया ।

“तो” - मैं बोला - “नौकरी बच गयी ?”

उसने खीसें निपोरी और सादर मेरे लिये रास्ता छोड़ा ।

“साहब बहुत दयावान हैं ।” - फिर बोला ।

“अच्छा !”

“दूसरे, उन्हें यकीन आ गया था कि मेरा वारदात में कोई हाथ नहीं था । बिटिया की लाश देखकर भी मैं खामोश रहा, ये मेरी खता बराबर थी लेकिन उन्होंने बख्श दी थी ।”

“नतीजतन यहीं हो ?”

“जी हां ।”

“हो और रहोगे ?”

“ऐसा ही है, सर ।”

“फिर तो मुबारक !”

“शुक्रिया, सर । लेकिन, सर...”

“क्या है ?”

“इस घड़ी आप यहां !”

“कोई ऐतराज ?”

“ऐतराज नहीं, सर, हैरानी है ।”

“क्यों भला ?”

“कुछ मेहमान आये हुए हैं । उनमें आप...प्राइवेट डिटेक्टिव...”

“तो ? कोई अंदेशा है तुम्हें मेरी वजह से ?”

“न - हीं ।”

“तो फिर ?”

“जी डरता है ।”

“खामखाह !”

“लगता है कुछ होने वाला है ।”

“अभी और भी ! मालिक की बेटी का कत्ल हो गया, इतना काफी नहीं !”

“वो यहां तो न हुआ !”

“ओह ! तुम्हारा मतलब है यहां, इस कोठी में, आज रात कुछ होने वाला है !”

वो खामोश रहा ।

“क्या ?”

उसने खामोशी से, बेचैनी से, पहलू बदला ।

“पता नहीं ।” - फिर कठिन स्वर में बोला - “वो मैडम यहां है । मालकिन की मौजूदगी में, बिटिया के शाम को हुए अंतिम सरकार की रु में, नहीं...नहीं होना चाहिये था ।”

“देवीलाल, बड़े लोगों की बातें हैं, बड़े लोगों के बड़े मशगले हैं, तुम क्यों हलकान होते हो ?”

जवाब में उसका मुंह खुला, बंद हुआ ।

“कहां है ?” - मैं बोला ।

“कौन ?” - वो हड़बड़ाया ।

“भई, जिसका अभी जिक्र कर रहे थे । अंजना । अंजना रांका ! या” - मैंने घूरकर उसे देखा - “किसी और नाम से वाकिफ हो उससे ?”

“वो...वो” - उसने जल्दी से हाल के भीतर की ओर संकेत किया - “उधर है ।”

मैंने निर्देशित दिशा की ओर निगाह दौड़ाई तो मुझे कोई आधा दर्जन मर्दों से घिरी खड़ी, उनकी तारीफी निगाहों का मरकज बनी, अंजना रांका दिखाई दी जो यूं सबसे हंस हंस कर बात कर रही थी जैसे बारात में आयी थी ।

कोई मरे चाहे जीये, सुथरी घोल बताशा पीये ।

फिर मुझे सूट बूट में सजा इंस्पेक्टर यादव दिखाई दिया । उसके हाथ में कोई ड्रिंक था जिसकी तरफ उसकी कोई तवज्जो नहीं जान पड़ती थी, उसकी मुकम्मल तवज्जो उस घड़ी अंजना की तरफ थी ।

मैंने आगे कदम बढ़ाया, ठिठका, फिर देवीलाल की तरफ देखा ।

देवीलाल ने जवाबी, प्रश्नसूचक निगाह से मुझे देखा ।

“कुत्ता नहीं दिखाई दे रहा ।” - मैं बोला ।

“प्रिंस !”

“यहां और भी कुत्ते हैं ?”

“वो एक ही है, बस । सॉरी ।”

“कहां है ?”

“मेहमानों की वजह से अपने कमरे में बंद है ।”

“कुत्ते का अपना कमरा है ?”

“जी हां । पिछवाड़े में जहां सरवेंट्स क्वाटर्स हैं, वहां ।”

“टीवी भी होगा उसके कमरे में !”

“जी !”

“कुछ नहीं ।”

मैं आगे बढ़ा और उस हुजूम के करीब पहुंचा जिसने अंजना रांका को घेरा हुआ था ।

अंजना ने सिर उठा कर मेरी तरफ देखा । उसके माथे पर बल पड़े ।

मैं नुमायशी तौर पर मुस्कराया और बोला - “तुझे तो वादायदीदार हमसे करना था, ये क्या किया कि जहां को उम्मीदवार किया ।”

“क्या !” - वो अचकचाई ।

“हल्लो, माई डियर !”

उसके एडमायरर्स मेरी तरफ घूमे, सबकी निगाह मेरे पर टिकी ।

“आई एम नाट युअर डियर ।” - अंजना भुनभुनाई ।

“यू आर” - मैं इत्मीनान से बोला - “अनटिल एण्ड अनलैस प्रूवन अदरवाइज ।”

“जैसे प्रूव होने में कोई कसर रह गयी है ! पिछली रात का वाकया मैं भूल नहीं गयी !”

उस घड़ी हम दोनों में चलता डायलॉग उसको घेरे खड़े मर्दों की समझ में नहीं आ रहा था, सबके चेहरे पर असमंजस के - किसी किसी के चेहरे पर मेरी दखलअंदाजी की वजह से अप्रसनता के - भाव थे ।

“वो मजाक की बात थी ।” - मैं बोला ।

“नहीं थी मजाक की बात ।” - वो गुस्से से बोली ।

“अरे, रात गयी, बात गयी ।”

“ऐग्जैक्टली ! नाओ गुड रिडेंस ।”

“क्या ?”

“अक्लमंद को इशारा ।”

“माई डियर...”

“फिर !”

“...मैं इशारे नहीं समझता ।”

“गो टेक ए वाक । इट्स गुड फार यूअर हैल्थ ।”

“ठीक है, चलो ।”

“क्या !”

“भई, वाक के लिये ! खूब गुजरेगी जो वाक करेंगे हैल्थ फ्रीक दो ।”

“देखो, मैं नहीं जानती यहां क्यों हो...”

“तुम्हारे वाली ही वजह । मेहमान हूं ।”

“मुझे इस बात की खबर होती तो या तुम यहां न होते या मैं यहां न होती ।”

“हनी, इतनी नाराजगी अच्छी नहीं होती । बीपी हाई हो जाता है ।”

“मिस्टर शर्मा, ट्राई टु एक्ट लाइक ए जंटलमैन । मैं जानती हूं ये बहुत मुश्किल काम है तुम्हारे वास्ते । फिर भी...करो कोशिश ।”

“बहुत ऊंचा उड़ रही हो...”

“मैं...मैं मिस्टर तोशनीवाल से बात करती हूं ।”

“करो, बाखुशी करो । लेकिन एक बात सुन लो, काम आयेगी । मैं मिस्टर तोशनीवाल का मेहमान नहीं हूं ।”

“क्या ! गेट क्रैशर हो...”

“मैं मिसेज तोशनीवाल का मेहमान हूं । समझा सकती हो तो जा के मैडम को समझाओ कि मेरी यहां मौजूदगी तुम्हारे वजूद को खतरा है ।”

“मैं...मैं जाती हूं ।”

“खातिर जमा रखो, मैं ही जाता हूं, वर्ना...”

बाकी के शब्द मेरे मुंह में ही घुट कर रहे गये ।

उसी घड़ी अनहोनी जैसा कुछ मुझे वहां दिखाई दिया था ।

हाल के परले कोने में शानदार डिनर सूट पहने फिल्मी स्टार जैसी एक हसीना से बात करता, चहचहाता, मस्ती मारता इमरान डिप्टी खड़ा था ।

मेरा दिमाग भन्ना गया ।

कैसे था वो वहां ! उसका वहां क्या काम था ! उस जैसी हैसियत का शख्स कैसे उस सुपर क्लास हाउसहोल्ड में पहुंच बना पाया ! मुअज्जिज मेहमान तो उस जैसा शख्स हो नहीं सकता था - होता तो किसका होता - वो शर्तिया गेट क्रैशर था लेकिन ये करतब वो कैसे कर पाया, तफतीश का मुद्दा था ।

मैं उसकी तरफ बढ़ा ।

मैं आधे रास्ते में था जबकि हमारी निगाह मिली । तत्काल उसकी तर्जनी उंगली बड़े अर्थपूर्ण ढंग से उसके होंठों पर पड़ी और उसकी आंखों में याचना का भाव आया ।

मैं ठिठक गया । मैंने सहमति में सिर हिलाया ।

डिप्टी ने आंखों आंखों में कृतज्ञताज्ञापन किया ।

‘कोई बात नहीं’ - मैं होंठों में बुदबुदाया - ‘अभी बहुत टाइम है ।'

मैंने रास्ता बदला और इंस्पेक्टर यादव के पास पहुंचा ।

“कब आये ?” - मैंने पूछा ।

“ज्यादा देर नहीं हुई ।” - वो बोला - “तुम्हारे आने से थोड़ी देर पहले ही ।”

“क्या पी रहे हो ?”

“आरेंज जूस ।”

“अच्छा !”

“विस्की के तड़के के साथ ।”

“ओह ! सर्व हुई ?”

“नहीं । उधर सैल्फ सर्विस बार है ।”

“आई सी । आता हूं ।”

मैंने बार पर जा कर अपने लिये ड्रिंक तैयार किया और उसके साथ यादव के पास वापिस लौटा ।

“चियर्स बोलना मुनासिब होगा !” - मैं बोला ।

“क्यों नहीं होगा ?” - यादव बोला - “जब चियर्स का इंतजाम मुनासिब है, मेहमान मुनासिब हैं तो चियर्स ने भैंस खोल ली किसी की ?”

“ठीक । फिर तो चियर्स !”

“चियर्स !”

“इसलिये भी क्योंकि मुझे तो याद नहीं कि पहले कभी ऐसी नौबत आयी हो !”

“हर काम की कभी तो पहल होनी ही होती है ।”

“लाख रुपये की बात कही ।”

फिर मैंने उसके सूट पर निगाह दौड़ाई ।

“कैसे किया ?”

“आफिस में सादे कपड़ों में ही बैठता हूं । वर्दी वहां टांग के रखता हूं । तभी पहनता हूं जब वारदात की तफतीश के लिये फील्ड में जाना हो या किसी आला अफसर की हाजिरी भरनी हो ।”

“ठीक ! घर का मालिक नहीं दिखाई दे रहा !”

“क्योंकि घर में नहीं है ।”

“क्या !”

“कहीं अटक गया है । दस मिनट पहले कहीं से फोन आया था कि लेट हो जायेगा ।”

यानी साली खामखाह हूल दे रही थी कि मिस्टर तोशनीवाल से बात करती थी ।

“तुम्हारे आने से पहले” - यादव कह रहा था - “मैंने बीवी को सबको - खास तौर से उस फैंसी औरत को उस फुलझड़ी को - बताते सुना था कि साहब को एकाएक कोई काम पड़ गया था, यहां पहुंचने में लेट हो जाने वाले थे ।”

“बीवी भी तो नहीं दिखाई दे रही !”

“हसबैंड की बाबत वो घोषणा करने के बाद ऊपर गयी थी । कहती थी एकाएक तबीयत खराब हो गयी थी ।”

“बहाना ?”

“ऐसा ही लग रहा था ।”

“अब ऊपर अपने बैडरूम में है ?”

“हां । उस धमकी वाली चिट्ठी की वजह से मैंने अपना एक आदमी उसके बैडरूम की निगरानी पर लगाया हुआ है ।”

“बावर्दी ?”

“नहीं ।”

“गुड । लिहाजा कोई चोरी छुपे उसके सिर पर नहीं पहुंच सकता !”

“नहीं पहुंच सकता । और खुद वो भी...मेरे आदमी की जानकारी में आये बिना न वो बाहर कदम रख पायेगी, न कोई भीतर जा पायेगा ।”

“बढ़िया ।”

“शर्मा, तेरी बातों में आ कर मैंने हामी तो भर दी यहां हाजिरी भरने की लेकिन मुझे लगता नहीं यहां से कुछ हाथ आने वाला है ।”

“विस्की कौन सी है ?”

“जानी वाकर ग्रीन लेबल ।”

“फिर भी कहते हो कुछ हाथ नहीं आने वाला, जबकि कुछ हाथ आ भी चुका है ।”

“मजाक मत कर ।”

“सारी ! विष्णु कसाना की बोलो । कोई अतापता मिला उसका ?”

उसने इंकार में सिर हिलाया ।

“यादव साहब, तुम्हारे किसी काम आने के जज्बे ने मुझे भी प्राम्प्ट किया था कि मैं उसकी कोई खोजखबर निकालने की कोशिश करूं ?”

“निकली ?”

“निकली तो नहीं लेकिन एक हिंट हाथ लगा जिसका मतलब समझ में न आया ।”

“फिर क्या फायदा हुआ ?”

“अभी नहीं हुआ न ! आगे शायद हो !”

“हिंट क्या ?”

मैंने उसे ‘डिप्टी के लिये मैसेज’ की बाबत बताया ।

“वो डिप्टी को घाट पर मिलेगा ।” - यादव ने मैसेज दोहराया - “क्या मतलब हुआ इसका ?”

“अभी तक तो कोई मतलब पल्ले नहीं पड़ा ।”

“कौन से घाट पर मिलेगा ?”

मैंने अनभिज्ञता से कंधे उचकाये ।

“एकाएक उस तिजोरीतोड़ की टांग हर जगह फंसी क्यों दिखाई देने लगी है ?”

“हमें क्या !”

“मुझे है । साला यहां भी मौजूद है । सजधज ऐसी कि फिल्म स्टार जान पड़ता है ।”

“कद्र है उसे अपनी । अपनी अच्छी पर्सनैलिटी को, अच्छी शक्ल सूरत को कैश करता है ।”

“लेकिन है क्यों यहां ?”

“मेजबान से मालूम करेंगे ।”

“उसी से क्यों नहीं ! साले इतने बुरे दिन आ गये मेरे कि एक सजायाफ्ता मुजरिम मेरे साथ इस नामुराद पार्टी में शरीक है !”

“डेमोक्रेसी है ।”

“मां का सिर है । बुला उसे यहां ।”

“अब जाने भी दो । यादव साहब, हम सच में पार्टी में शरीक होने नहीं आये । हमारा मिशन जुदा है ।”

“वो मिशन भी तो डाउटफुल है ।”

“अब छोड़ो भी । कोई और बात करो ।”

“और क्या बात ?”

“पक्का है कि कातिल केयरटेकर है ?”

“अरे, इस सिलसिले में खुद ही तो उसकी बाबत इतना हो हल्ला मचाया, अब कच्चा पक्का क्या कर रहा है ?”

“जवाब दो ।”

“तो सुन जवाब । वो प्राइम मर्डर सस्पेक्ट है क्योंकि गायब है । वैसे उस रेशमी कपड़े की धज्जी की वजह से ये फुलझड़ी भी शक के दायरे में आती है और मौकायवारदात से बरामद हुए पर्स की वजह से मकतूला की मां भी शक के दायरे में आती है । मां की तो दूसरे कत्ल में भी हाजिरी है ।”

“लेकिन तीसरे कत्ल में - डियर पार्क में हुए शिल्पी तायल के कत्ल में - दोनों की कोई हाजिरी नहीं । केयरटेकर की भी ।”

“अभी क्या पता !”

“धमकी वाली चिट्ठी को खातिर में लाओ तो सब किया धरा हमारे मेजबान के भूतपूर्व पार्टनर सुजित त्रेहन का होना चाहिये ।”

“वही केयरटेकर विष्णु कसाना निकला तो हो जायेगा न अपने आप !”

“तीनों वारदात आपस में रिलेटिड हैं ?”

“होनी तो चाहिये । क्योंकि सबका धुरा तोशनीवाल है ! पहली मकतूला उसकी बेटी थी, दूसरी उसकी नेपाल से वाकिफ थी, तीसरी उसकी प्राइवेट सेक्रेट्री थी ।”

“मर्डर में वैरायटी बहुत है !”

“क्या मतलब ?”

“पहला गन से हुआ, दूसरा फांसी जैसे फंदे से हुआ, तीसरा गला रेतने से हुआ ! फिर भी कातिल कोई एक !”

वो सकपकाया ।

“कहीं तीन कत्ल तीन जुदा कातिलों के कारनामे तो नहीं ?”

“मुझे उम्मीद नहीं । असल में हालात ही ऐसे बने होंगे कि हर कत्ल जुदा तरीके से वाकया हुआ । सुरभि के कत्ल को खुदकुशी जताना था इसलिये गन का इस्तेमाल हुआ । सपना टाहिलियानी के कत्ल में पर्दे की रेशमी डोरी कातिल के हाथ में आयी इसलिये वो कत्ल गला घोंटा जाने से हुआ । शिल्पा तायल के कत्ल के वक्त कोई तीखी धार वाला औजार हैण्डी था । इसलिये उस लड़की का गला रेता गया ।”

“ठीक ! लेकिन सपना टाहिलियानी के लैटरबाक्स से बरामद रुक्के से - जिस पर दर्ज था ‘अगला नम्बर दीक्षा भटनागर का’ - तो कुछ न जुड़ा क्योंकि वो तो कहती है कि वो न तोशनीवाल परिवार में किसी को जानती है और न मकतूलाओं में से किसी को जानती है !”

“अभी तफ्तीश शुरुआती दौर में है, अभी किसी जुबानी जमाखर्च की बिना पर किसी बात को खारिज नहीं किया जा सकता । अभी...”

वो खामोश हो गया, उसकी निगाह दरवाजे की तरफ उठ गयी ।

मैंने उसकी निगाह अनुसरण किया ।

शिव मंगल तोशनीवाल हाल में कदम रख रहा था ।

मेरी निगाह अंजना रांका वाले ग्रुप की ओर भटकी तो मैंने उसे वहां से गायब पाया । मैंने तत्काल चारों ओर निगाह दौड़ाई तो मैंने अंजना को हाल के पिछवाड़े का एक दरवाजा खोलकर उसके पीछे गायब होते पाया ?

क्या माजरा था ?

मेजबान आया तो खास मेहमान चल दिया ।

कहां चल दिया ?

मैंने अपना गिलास खाली करके एक करीबी टेबल पर रखा और घूम कर उस दिशा में बढ़ा जिधर जा कर अंजना निगाह से ओझल हुई थी । मैं उस दरवाजे पर पहुंचा, एक क्षण को ठिठका फिर उसे खोलने के लिये उसका हैंडल थामा तो हैंडल मेरे हाथ में पहले ही घूम गया और दरवाजा भीतर की तरफ खुलने लगा ।

हड़बड़ा कर मैंने हाथ वापिस खींच लिया ।

एक लिपी पुती, जड़ाऊ, भारी भरकम अधेड़ महिला चौखट पर प्रकट हुई ।

“क्या है ?” - मुझे घूरती सी वो सर्द लहजे में वोली - “क्या चाहिये ?”

“कुछ नहीं ।” - मैं तनिक बौखलाया सा बोला - “कुछ नहीं, मैडम । मैं ...मैं यूं ही भटक गया था ।”

“कहीं और भटको, भई । ये लेडीज वाशरूम है ।”

“ओह ! सॉरी ! सारी !”

“अब रास्ता तो छोड़ो !”

साली ने ठेला गुजारना था ।

चाह कर भी मैं वैसा कुछ बोल न सका । मैं एक बाजू हटा ।

नाक की फुंगी आसमान की तरफ उठाये वो मेरे करीब से गुजरी ।

दरवाजा उसने अपने पीछे फौरन बंद कर दिया था इसलिये मैं भीतर नहीं झांक पाया था ।

बहरहाल अंजना कहीं चली नहीं गयी थी, लेडीज टायलेट में थी ।

तभी वेटर जैसी सफेद पोशाक में हाउसहोल्ड का एक नौजवान वेटर मेरे करीब से गुजरा । तत्काल मैंने उसे टोका ।

वो ठिठका, उसने अदब से मेरी तरफ देखा ।

“क्या नाम है तुम्हारा ?” - मैंने पूछा ।

“माधव सर ।”

“मुझे जानते हो ?”

“पहचानता हूं ।”

“कौन हूं मैं ?"

“गैस्ट हैं ।”

“और डिटेक्टिव हूं ।”

उसके नेत्र फैले ।

“तुमने मेरे कहे एक काम करना है । कोई ऐतराज ?”

उसके चेहरे पर अनिश्चय के भाव आये ।

मैंने घूर कर उसे देखा ।

“यस, सर ।” - तत्काल वो बौखलाये लहजे से बोला ।

“क्या यस सर !”

“आप जो काम कहेंगे, वो मैंने करना है ।”

“मुस्तैदी से ! बिना कोताही के !”

“जी हां ।”

“अंजना रांका मैडम को पहचानते हो ?”

“जी हां ।”

“खूब अच्छी तरह से ?”

“जी हां ।”

“मालूम है वो यहां आयी हुई है ?”

“जी हां ।”

“गुड । इस वक्त वो भीतर टायलेट में हैं ।” - मैंने बंद दरवाजे की तरफ संकेत किया - “जब तक मैडम भीतर हैं, तुमने इस दरवाजे पर से हिलना नहीं है । वो बाहर कदम रखें तो तुमने फौरन मुझे खबर करनी है । समझ गये ?”

“जी हां ।”

“शाबाश !”

मैं वापिस लौटा ।

“... मुझे आप लोगों से पहले यहां होना चाहिये था” - हाल में तोशनीवाल मेहमानों से मुखातिब था - “लेकिन अफसोस है ऐसा न हो सका, ऐन मौके पर एक खास काम गले पड़ गया, चाह कर भी जिसे मैं टाल न सका ।”

जवाब में कई नैवर माइंड, इट्स आल राइट हाल में गूंजी ।

“भई, साहब को ड्रिंक सर्व करो ।” - फिर कोई बोला ।

“अभी । अभी ।” - तल्काल तोशनीवाल बोला - “इन ए मिनट । लैट मी सैटल फर्स्ट ।”

ड्रिंक की मनुहार तत्काल बंद हुई ।

“मैडम कहां हैं ?” - उसने देवीलाल से पूछा ।

“ऊपर अपने कमरे में हैं ।” - देवीलाल अदब से बोला ।

“वहां क्या कर रही हैं ? उन्हें नीचे होना चाहिये था !”

“नीचे ही थीं । लेकिन..”

“क्या लेकिन ?”

“चली गयीं ।”

“अरे क्यों ?”

“कहती थीं एकाएक तबियत खराब हो गयी थी ।”

“बड़ा अच्छा मौका ढूंढ़ा तबीयत खराब करने का ! मेहमानों का तो खयाल करना था ! मेरी गैरहाजिरी में तो मेहमानों का खयाल करना था । ऐसा भी क्या कि...”

तभी एक तीखी, जनाना चीख वातावरण में गूंजी ।

फिर गोली चलने की आवाज !

माहौल में दहशतनाक सन्नाटा छाया ।

मुझे साफ जान पड़ा कि दोनों आवाजें ऊपर से आयी थीं ।

मैं सीढ़ियों की तरफ लपका ।

यादव वहां पहले ही पहुंच चुका था - आखिर प्रशिक्षणप्राप्त पुलिस अधिकारी था - मुझे उसके दायें हाथ में गन की झलक दिखाई दी ।

देवीलाल मेरे पीछे दौड़ा चला का रहा था ।

बाकी सब सकते की हालत में मुंह बाये आवाजों की दिशा में सिर उठाये खड़े थे ।

आगे पीछे हम तीनों ऊपर पहुंचे ।

मैंने श्यामली के बैडरूम के दरवाजे को धक्का दे कर खोला ।

बैडरूम खाली था !

“बाथरूम !” - देवीलाल सस्पेंसभरे स्वर में बोला ।

हम कमरा लांघ कर अटैच्ड बाथ के दरवाजे पर पहुंचे । दरवाजा खुला था और वो भीतर मरी पड़ी थी ।

खून से लथपथ श्यामली तोशनीवाल की लाश बाथरूम के फर्श पर एक पहलू के बल पड़ी थी ।

यादव ने झुक कर लाश का मुआयना किया ।

“खत्म ?” - मैं धीरे से बोला ।

यादव ने सहमति में सिर हिलाया ।

मैं घूमा और लम्बे डग भरता दीदे फाड़े चौखट पर खड़े देवीलाल के करीब पहुंचा ।

“मैडम का कल हो गया है ।” - मैं बोला - “जा के साहब को खबर कर ।”

देवीलाल उलटे पांव वापिस दौड़ चला ।

मैं लाश के पास वापिस पहुंचा ।

गोली कनपटी में लगी थी और यूं बने सुराख में से खून तब भी बह रहा था । मैंने नोट किया उसका दायां हाथ जिस्म से बाहर को फैला हुआ था और उसकी मुट्ठी बंधी हुई थी । मेरे देखते देखते यादव ने मुट्ठी को जबरन खोला तो एक कागज का पुर्जा नमूदार हुआ ।

कागज का पुर्जा ।

टाइपशुदा ।

जैसा पहले दो बार बरामद हो चुका था ।

यादव ने पुर्जे को खोल कर सीधा किया तो मैंने भी उस पर निगाह दौड़ाई ।

उस पर दर्ज था:

अगला और आखिरी नम्बर दगाबाज यार शिव मंगल तोशनीवाल का फिर बेईमानी, धोखाधड़ी का हिसाब चुकता

“बीच में एक नग रह गया ।” - मैं दबे स्वर में बोला ।

“लडका !”- यादव बोला ।

“हां । इस रुक्के ने तो अगला और आखिरी नम्बर तोशनीवाल का लगा दिया ! शिशिर याद न आया !”

“क्या पता क्या माजरा है !”

तभी मेरी निगाह लाश से कदरन परे, बाथटब की जड़ में गुच्छा गुच्छा होकर बाल बने पड़े एक कागज पर पड़ी । मैंने आगे बढ़कर उसे उठाया और उसे खोल कर सीधा किया । वो एक लैटरहैड साइज का कागज था और उस पर भी एक इबारत दर्ज थी जो कि काफी लम्बी थी और खत की सूरत में थी ।

लिखा था:

सुजित,

सुरभि तुम्हारी अपनी बेटी थी ? शिशिर, जो कि सुरभि का जुड़वां है, तुम्हारा अपना बेटा है । दोनों तुम्हारे... गायब हो जाने के बाद पैदा हुए थे । मुझ्रे तरह से यकीन दिलाया गया था कि तुम मर चुके थे । तुम्हारी ‘मौत’ के वक्त तक मुझे मालूम नहीं था की मैं उम्मीद से थी, कि मेरी कोख में तुम्हारा बीज पनप रहा था । तुम्हारे और शिव के बीच क्या था, मुझे कतई कुछ नहीं मालूम था । बाइस साल पहले नेपाल में हमें पीछे कैम्प में छोड़ कर एक्सकर्शन ट्रिप पर शिव के साथ निकले और वापिस न लौटे । लौट कर शिव ने मुझे बताया कि तुम एक घातक हादसे का शिकार हो गये थे । मैं गम खा कर रह गयी, क्योंकि शिव की बात पर शक करने की कोई वजह ही नहीं थी । फिर जैसे एक युग गुजर गया जबकि तुम्हारी चिट्ठी आयी और हकीकत की खबर लगी, उस हकीकत की खबर लगी, इतने सालों में जिसकी शिव ने मुझे भनक न लगने दी । मैं तुम्हारे बच्चों की परवरिश में ही लगी रही । मुझे कभी शक न हुआ कि कहीं दाल में कुछ काला था । फिर बदले की आग में जलते तुम अपनी ही औलाद के दुश्मन बन गये - भले ही तुम असलियत से नहीं वाकिफ थे लेकिन इस हकीकत को फिर भी नहीं झुठलाया सकता कि एक बाप ने अपनी बेटी के खून से हाथ रेंज । और अभी और खून करने को आमादा हो । मैं तुम्हें ये चिट्ठी इसलिये लिख रही हूं कि तुम्हारी धमकी के तहत अगर मेरा पहले ही खून हो चूका हो तो इस चिट्ठी के जरिये तुम्हें असलियत की वाकफियत हो सके और फिर शायद शिशिर की जान बच जाये जो कि तुम्हारा अपना खून है । तुम्हें खुदा का वास्ता है शिशिर की जान बख्श देना क्योंकि वो तुम्हारा बेटा है, तुम उसके बाप हो । मेरे इस दुनिया से चले जाने के बाद तुम्हारे लिए कुछ बाकी बचा होगा तो वो तुम्हारा बेटा शिशिर ही होगा । उसको खत्म करोगे तो अपने ही वजुद का एक अहम हिस्सा खत्म करोगे ।

सुजित, अब तक जो किया के किया, अब ये जुल्म न करना ।

श्यामली

चिट्ठी कंप्यूटर जनरेटिड थी, उस पर सिर्फ हस्ताक्षर हाथ से किये गये थे ।
 
“अब समझे ?” - यादव बोला ।

“क्या ?” - मैं सकपकाया सा बोला ।

“लड़के का नम्बर क्यों न लगा ! बीच का एक नग क्यों रह गया !”

“बाप ने बख्श दिया !”

“चिट्ठी में यही दर्ज है ।”

“कातिल ने ये चिट्ठी पढ़ी होगी !”

“वो तो इसकी कंडीशन से ही जाहिर है । पड़ी और फिर बॉल बना के फेंक दी । लिखने वाली तो ऐसा करने से रही ।”

“चिट्ठी लिख कर हटी ही होगी कि वो आ गया !”

“मुमकिन है ।”

“यहां कहीं कंप्यूटर या प्रिंटर तो है नहीं !”

“तो क्या हुआ ! ये माडर्न हाउसहोल्ड की आम आइटम है, घर में कहीं तो जरूर होंगे !”

“ठीक ! तुम्हारा यहां की निगाहबीनी करता आदमी...”

तभी बगले की तरह तोशनीवाल और शिशिर वहां दाखिल हुए ।

लड़के ने एक निगाह लाश पर डाली तो उसकी आंखें त्योरा गयी और वो बेहोश हो कर बाथरूम की चौखट पर ढ़ेर हो गया ।

पीछे पीछे वापिस वहां पहुंचे देवीलाल ने उसे सम्भाला और ले जा कर बैड पर लिटाया ।

“ये” - तोशनीवाल नेत्र फैलाये बोला - “ये...”

साला ओवरएक्टिंग कर रहा था ।

“हां, वही ।” - मै बोला - “वही । वही हुआ जो आपको दिख रहा है ।”

उसने जोर से थूक निगली ।

“बाहर ।” - यादव ने आदेश दिया ।

हम बाहर निकले तो उसने पीछे बाथरूम का दरवाजा बंद कर दिया ।

नीचे मौजूद तकरीबन लोग बाहर बैडरूम में जमा थे । यादव के हुक्म पर सबको - शिशिर को भी जिसे देवीलाल तब तक होश में ले आया हुआ था - वहां से बाहर निकलना पड़ा ।

यादव ने अपना मोबाइल निकाला और उस पर महकमे को वारदात की खवर करने में मशगूल हो गया ।

वो फोन से फारिग हुआ तो मैं बोला - “दूसरा हाथ न दिखा ।”

“क्या ?” - माथे पर बल डालता यादव बोला - “किसका ?”

“लाश का । दूसरा हाथ । मेरे खयाल से पहलू के नीचे दबा हुआ था ।”

“तो ?”

“क्या पता उसमें भी कुछ हो !”

उसने संदिग्ध भाव से मेरी तरफ देखा ।

“देखने में क्या हर्ज है ?”

हिचकिचाते हुए उसने सहमति में सिर हिलाया ।

हम वापिस बाथरूम में पहुंचे ।

यादव ने झुक कर लाश के बायें हाथ को लाश के नीचे से खींच कर निकाला तो पाया उसमें एक सफेद रूमाल जकड़ा हुआ था जिसका थोड़ा सा हिस्सा ही बाहर दिखाई दे रहा था ।

“औरतें सफेद रूमाल कम ही इस्तेमाल करती हैं ।” - मैं धीरे से बोला - “ये तो खास तौर से गुलाबी, चारों तरफ झालर लगा रूमाल इस्तेमाल करती थी, तुम्हें मालूम ही है ।”

मुझे न लगा कि उसने मेरी बात की तरफ कोई खास तवज्जो दी थी ।

उसने उसे मुट्ठी की पकड़ से आजाद किया तो पाया कि वो रूमाल नहीं था, मर्दाना रूमाल का आधा फटा हिस्सा था । फटे हिस्से के कोने में एम्ब्रायडरी से ‘एस टी’ कढा हुआ था ।

“पता करो ।” - मैं फुसफुसाया ।

“सलाह न दे ।” - यादव झुंझला कर बोला - “मेरे को मालूम है क्या करना है ।”

“सारी !”

हम बैडरूम से बाहर निकले ।

सब लोग अभी गलियारे में ही थे । मैंने देखा अब शिशिर भी चाक चौबंद दिखाई दे रहा था ।

यादव ने फटा रुमाल तोशनीवाल के सामने किया ।

“आपका है ?” - उसने सख्ती से पूछा ।

“नहीं ।” - वो तत्काल बोला ।

“इतनी जल्दी जवाब न दीजिये । जो दिखाया जा रहा है, उसे ठीक से देख तो लीजिये ।”

“मेरा नहीं है ।” - फिर वही जवाब मिला ।

यादव ने रूमाल लड़के को दिखाया ।

“तुम्हारा है ?” - उसने पूछा ।

जवाब देने की जगह वो अजीव निगाह से यादव को देखने लगा ।

“जवाब दो, भई !”

जवाब देने की जगह उसके चेहरे पर बड़े वहशियाना भाव आये, उसने यूं दांत निकाले जैसे हंस रहा हो ।

“क्या हुआ इसे ?” - मैं होंठों में बुदबुदाया ।

“खेल खत्म !” - फिर वो दांत किटकिटता सा बोला ।

“कौन सा खेल खत्म ?” - यादव के माथे पर बल पड़े ।

“तुम्ही हो विलेन ! लेकिन अब तुम्हारे चेहरे पर से नकाब उठ गया है ! अब मुझे मालूम है सब किया धरा तुम्हारा है । तुम कहते हो तुम पुलिस वाले हो !”

“हूं न ! मैं ...”

“नहीं हो !”

“नहीं हूं ! अरे, मैं इंस्पेक्टर देवेंद्र यादव, दिल्ली पुलिस ...”

“आलसो नोन ऐज सुजित त्रेहन ।”

“क्या !”

“तुम बहुरूपिये हो । लेकिन अब तुम्हारा बहुरूप नहीं चलने का । सुजित त्रेहन ! अब तुम मारोगे नहीं, मरोगे ! और मैं... मैं तुम्हें मारूंगा । जो खूनी खेल तुमने शुरू किया, खत्म उसे मैं करूंगा ।”

उसने उसे सहारा दिये करीब खड़े देवीलाल को परे धक्का दिया और यादव पर झपटा ।

यादव के चेहरे पर बड़े सख्त भाव आये, उसके जबड़े भिंचे और उसने हाथ बढ़ा कर उसे परे ही रोक लिया । यादव हट्टा कट्टा, लम्बा चौड़ा, छ: फूटा हरियाणवी कड़ियल जवान था । उसके फैले हुए एक हाथ की पकड़ में ही लड़का यूं छटपटाया कि बेबस जान पड़ने लगा । वो अपनी तरफ से घूंसा चलाता था तो वो दूर से यादव की नाक की हवा दे कर ही रह जाता था, टांग चलाता था तो वो यादव के करीब भी नहीं पहुंच पाती थी ।

“बाज आ जा !” - यादव हिंसक भाव से बोला - “फोड़ दूंगा नहीं तो !”

“छोड़ो !”- वो बड़ी मुश्किल से बोला पाया - “छोड़ो !'

“पुलिस आफिसर पर हाथ डालता है ! गिरफ्तार कर लूंगा । तीन सौ सात में अन्दर कर दूंगा । जमानत नहीं होने पायेगी ।”

मैं उम्मीद कर रहा था कि पिता अपनी बड़े आदमी वाली फूं फां झाड़ेगा लेकिन पता नहीं क्या बात थी कि वो बुत सुना खामोश खड़ा तमाम नजारा कर रहा था ।

“छोड़ दो ।” - मैं धीरे से बोला ।

“इसको सबक सिखाना जरूरी है । हवालात में...”

“यहीं सीख जायेगा । मां की वीभत्स मौत का इसके दिमाग पर असर हो गया है । इसे टेम्पररी इनसैनिटी का केस समझो । लिहाज करो ।”

“नहीं, नहीं” - एकाएक तोशनीवाल बोला - “पुलिसिया दादागिरी दिखाने दो इसे । साइज में अपने से आधे लड़के पर ताकत आजमाने दो इसे । बहुत बहादुर है । बहादुरी दिखाने दो ।”

यादव के चेहरे ने कई रंग बदले, लड़के पर से उसकी पकड़ स्वयंमेव ढ़ीली पड़ने लगी ।

“ये बहुत ज्ञानी है” - तोशनीवाल कह रहा था - “सारी दफायें जानता है, सारे कायदे कानून जानता है, ये भी जानता है कि जमानत नहीं हो पाएगी । कुछ नहीं जानता तो ये नहीं जानता कि मेरी इजाजत के बिना मेरे घर में मौजूद है । नहीं जानता कि इनट्रूडर, गेट क्रैशर, पुलिस वाला भी नहीं हो सकता ।”

“वाट नानसेंस !” - यादव भड़का - “मैं गेट क्रैशर हूं !”

“तो और क्या हो ? मैंने कब बुलाया तुम्हें यहां ?”

यादव ने खा जाने वाली निगाहों से मेरी तरफ देखा ।

“हम मैडम के मेहमान हैं” - मैं धीरे से बोला - “उनके बुलाये यहां आये थे ।”

“कहलवाओ मैडम से ।” - तोशनीवाल बोला ।

“कैसे कहलवायें ! वो तो... आप जानते है कि...”

“तुम भी जानते हो । इसलिये समझते हो कुछ भी कह सकते हो, कोई भी दावा कर सकते हो ।”

“आप नाजायज बातें कर रहे हैं । ठीक नहीं कर रहे आप । जो हुआ, आपके सामने हुआ और जो होने जा रहा था, उससे आप नावाकिफ नहीं । इंस्पेक्टर साहब खुद को डिफेंड न करते या कर पाने में सक्षम न होते, तो आपका ये भड़का हुआ बालक न जाने क्या कहर ढ़ाता ! आपका सुपुत्र अभी बड़ी फौजदारी कर सकता था लेकिन आपने उसे रोकने की कोई कोशिश न की, आप मूकदर्शक बने खड़े रहे, अपने शेर पुत्तर की शूरवीरता का नजारा देखने का इंतजार करते रहे । इतनी अशोभनीय हरकत थी आपकी, आपके साहबजादे की, फिर भी शिकायत आपको है । बात आपकी नालेज में है या नहीं है, हम मेहमान हैं इस हाउसहोल्ड के, आपकी मकतूला बीवी - भगवान उनकी आत्मा को शांति दे - के बुलाये यहां हैं, मेहमान की इज्जत नहीं कर सकते तो बेईज्जती तो न कीजिये ।”

तोशनीवाल का मुंह खुला, बंद हुआ ।

“कल आपकी बेटी का कत्ल हुआ, आज ऐन आपकी नाक के नीचे आपकी बीवी का कल हुआ, इस वक्त क्या प्रायर्टी है आपकी ? इंस्पेक्टर साहब की क्लास लेना, इनको इनकी जात औकात बताना, अपने बहादुर बेटे की बलायें लेना या घर के कर्ता की तरह - जिम्मेदार कर्ता की तरह - मौजूदा, ट्रैजिक माहौल के मुताबिक बिहेव करना !”

“भाषण देने की जरूरत नहीं ।” - तोशनीवाल गुस्से से बोला - “मेरे लड़के के साथ जो बद्सलूकी हुई, उसे मैं नजरअंदाज नहीं कर सकता ।”

“लेकिन लड़के ने जो बद्सलूकी की, जो कहर ढ़ाने का तमन्नाई वो दिखाई देता था, उसे आप नजरअंदाज कर सकते हैं ।”

“मैं तुमसे बहस नहीं करना चाहता ।”

“हम खुद आपसे बहस नहीं करना चाहते ।” - यादव तब अपने पुलिसिया रंग में आया - “मैं खाली दो बातों की तरफ आपकी तवज्जो दिलाना चाहता हूं । एक, यहां एक कत्ल की वारदात वाकया हुई है और कत्ल मेरी टैरीटेरी है - मेरी, देवेंद्र यादव, इंस्पेक्टर स्पैशल स्क्वाड, दिल्ली पुलिस की - वो दिल्ली स्टेट में, कहीं भी हो । लिहाजा जब तक मेरी तफ्तीश मुकम्मल न हो जाए मौकायवारदात मेरे कब्जे में है और यहां मौजूद हर कोई - आप भी, आपका सुपुत्र भी - मर्डर सस्पैक्ट है । इसलिए खैरियत चाहते हैं तो पुलिस की कार्यवाही में दखलअंदाज होने की कोशिश न करें ।”

“दूसरी बात ?” - तोशनीवाल धीरज जताता बोला ।

“इस लड़के ने एक पुलिस अफसर पर झपटने की, उस पर कातिलाना हमला करने की कोशिश की, ये गिरफ्तार है और रहेगा जब तक चार्ज लगा कर इसे कोर्ट में पेश नहीं किया जाता । तब और अब आपसे जो हथेली लगाई जाती हो लगा लीजिये । अपनी बड़े आदमी वाली हैसियत में जो ... के घोड़े खोले जाते हों, खोल लीजिये, आपने इसे गिरफ्तारी से बचा लिया तो मैं अपनी मूंछ मुंडवा लूंगा ।”

सन्नाटा छा गया ।

जिसे शिशिर के एकाएक रो पड़ने की आवाज ने तोड़ा ।

“अंकल” - वो रूंधे कंठ से बोला - “एक्सक्यूज मी ।”

“नो ! यू कैन नाट बी एक्सक्यूजड ।”

“अंकल, आई एम सॉरी ।”

“आई डोंट वांट युअर सॉरी । आई वांट युअर फादर्स सॉरी । अपने बाप को कहो माफी मांगे जिसने तुम्हारी वाहियात, गैरजिम्मेदार हरकत पर खामोश रह कर तुम्हें शै दी ।”

“मैं” - तोषनीवाल दबे स्वर में बोला - “सदमे की हालत में था । मेरी बीवी ...”

“अभी जब इतने बड़े बड़े बोल बोले, हमें गेट क्रैशर करार दिया, इतने मेहमानों के सामने हमारी इज्जत दो कौड़ी की न छोड़ी, तब सदमे की हालत में नहीं थे ?”

उसके मुंह से बोल न फूटा ।

“अभी भी सदमे की हालत में हैं, इसलिए सॉरी नहीं बोल सकते ।”

“आ - आई एम स - सॉरी !”

यादव ने खा जाने वाली निगाहों से शिशिर की तरफ देखा ।

शिशिर का सिर तत्काल इतना झुका कि ठोड़ी छाती से जा लगी ।

“मुझे सॉरी कबूल है ।” - यादव बोला ।

मैंने चैन की सांस ली ।

“अब एक बीरीव्ड हसबैंड के तौर पर नहीं तो एक जिम्मेदार शहरी के तौर पर इस कत्ल की तफ्तीश में मदद कीजिये ।”

“क्या करूं ?”

“ये चिट्ठी देखिये..”

तभी नीचे से कई कदमों की आहट ऊपर पहुंची ।

यादव खामोश हो गया । श्यामली की चिट्ठी उसने तह करके वापिस जेब में रख ली ।

पुलिस का दलबल वहां पहुंचा ।

“सब लोग नीचे हाल में तशरीफ ले जायें ।” - यादव ने आदेश दिया - “और वहीं रहें । कोई चल देने की कोशिश न करे ।”

सब आगे पीछे सीढ़ियां उतरते चले गये ।

यादव अपने आदमियों के साथ भीतर बैडरूम में चला गया ।

पांच मिनट बाद वो वापिस लौटा । मुझे इशारा करता वो सीढ़ियां उतरने लगा । मैं उसके पीछे हो लिया । हम नीचे हाल में पहुंचे ।

नीचे मुझे कई मेहमानों के हाथ में विस्की के गिलास दिखाई दिये ।

घर में डबल मातम हुआ था । सब मेजबान के हितचिंतक थे, मेजबान का गम सबका गम था । अब गम तो गलत करना हुआ न !

इसलिये विस्की ।

मेहमानों में मुझे इमरान डिप्टी न दिखाई दिया ।

पहले ऊपर गलियारे में भी वो मुझे नहीं दिखाई दिया था लेकिन तब मैंने समझा था कि सारे मेहमान ऊपर नहीं आये थे इसलिये बाकी के साथ वो नीचे था । अब लगता था कि नये कत्ल से फैली अफरातफरी में वो वहां से खिसक गया था ।

अंजना रांका भी वहां नहीं थी ।

मेरी निगाह स्वयंमेव ही परे बंद दरवाजे की तरफ उठी जहां माधव नाम का सर्वेंट अभी भी मौजूद था ।

औरतों के बनाव शृंगार का कोई ओर छोर नहीं था । हालात कोई भी हो फर्स्ट प्रायर्टी मर्केंडाइज की डैकोरेशन थी, पर्फेक्ट प्रेजेंटेशन थी । इसीलिये पट्ठी अभी तक भीतर थी और मकतूला की चीख की आवाज शायद उस तक नहीं पहुंची थी ।

यादव तोशनीवाल के पास पहुंचा ।

तोशनीवाल सिर को हाथों में थामे एक सोफाचेयर पर बैठा था । यादव को आया जान कर वो उठ कर खड़ा हुआ । यादव ने उसे बैठे रहने को न बोला ।
 
“ये चिट्ठी देखिये ।” - उसने फिर चिट्ठी उसे दिखाई - “बाथरूम में गोला बनी लुढ़की पड़ी मिली । देखिये, पढ़िये, गौर से मुआयना कीजिये ।”

तोशनीवाल ने चिट्ठी थामी और फिर हुक्म के मुताबिक सब कुछ किया ।

“इबारत कहती है” - यादव बोला - “कि ये आपकी बीवी ने लिखी । आप क्या कहते हैं ?”

“मैं जुदा क्या कह सकता हूं !” - चिट्ठी वापिस सौंपता तोशनीवाल बोला - “वही कहता हूं जो प्रत्यक्ष है ।”

“क्या प्रत्यक्ष है ?”

“ये चिट्ठी श्यामली ने लिखी है ।”

“कम्प्यूटर पर ?”

“ऐसा ही जान पड़ता है ।”

“जान पड़ता है ?”

“ऐसा ही है ।”

“यहां कम्प्यूटर है ?”

“हां ।”

“प्रिंटर ?”

“वो भी ।”

“कहां ?”

“मेरी स्टडी में । सुरभि के रूम में । शिशिर के रूम में ।”

“मैडम के रूम में नहीं ?”

“नहीं ।”

“कोई खास वजह ?”

“खास वजह क्या होनी है ! अपनी अपनी पसंद है । वो नहीं जरूरत महसूस करती थी ।”

“आज तो की ! ये चिट्ठी लिखने के लिये ।”

“भई, तीन सैट हैं घर में कम्प्यूटर प्रिंटर के । जरूरत कहीं भी पूरी की जा सकती थी । कोई पाबंदी तो नहीं लागू होती थी उस पर मेरा या शिशिर का या सुरभि का इक्विपमेंट इस्तेमाल करने के सिलसिले में !”

“सिग्नेचर्स के बारे में क्या कहते हैं ? ये आपकी बीवी का हैण्डराइटिंग है ?”

“हां ।”

“पक्की बात ?”

“हां ।”

यादव ने अपलक उसे देखा ।

तोशनीवाल उससे निगाह मिलाये न रह सका, वो जेब से रूमाल निकाल कर नर्वस भाव से अपना मुंह माथा पोंछने लगा ।

मुझे रूमाल वैसा न लगा जैसे का एक टुकड़ा मकतूला की मुट्ठी में दबा पाया गया था । मैंने नोट किया कि उस घड़ी यादव की तवज्जो भी रूमाल की तरफ थी ।

फिर उसने रूमाल का कटा हुआ टुकड़ा पेश किया ।

“ये क्या है ?” - तोशनीवाल बोला ।

“आपको मालूम है । ऊपर गलियारे में ये पहले आपको दिखाया जा चुका है ।”

“फिर क्यों दिखा रहे हो ?”

“मर्दाना रूमाल से फट कर अलग हुआ ये टुकड़ा आपकी बीवी की मुट्ठी में जकड़ा पाया गया था ।”

“ओह !”

“ये आपका नहीं है ?”

“नहीं है । पहले भी बोला ।”

“पहले एक बात की तरफ आपकी तवज्जो नहीं दिलाई जा सकी थी, अब दीजिये तवज्जो । इस पर इनीशियल्स की सूरत में आपका नाम कढ़ा है ।”

“कातिल का नाम है ।”

“क्या फरमाया ?”

“सुजित त्रेहन का नाम कढ़ा है । आपकी तवज्जो में शायद आया नहीं कि जो मेरे नाम के इनीशियल्स हैं, वही उस कम्बख्त के नाम के भी हैं ।”

“हूं ।” - यादव ने लम्बी हूंकार भरी, फिर चिट्ठी और रूमाल के टुकड़े को वापिस जेब के हवाले किया ।

मैं सोचने लगा ।

कैसा इत्तफाक था कि केस के सारे प्रमुख पात्रों के नाम के एक ही प्रथमाक्षर थे - एस टी ।

शिव मंगल तोशनीवाल, श्यामली तोशनीवाल, शिशिर तोशनीवाल, सुजित त्रेहन - सब एस टी ।

“मेरी पत्नी का कातिल सुजित त्रेहन है ।” - तोशनीवाल भय और गम मिश्रित लहजे में कह रहा था - “रूमाल के उस टुकड़े के जरिये वो वारदात पर अपनी छाप छोड़ कर गया है, अपनी घिनौनी करतूत को मोहरबंद करके गया है । और आपको क्या चाहिये ! केस तो आपका हल हो भी चुका ! कातिल के बारे में अब कोई मिस्ट्री बाकी नहीं । उसने बाकायदा धमकी जारी करके डंके की चोट कत्ल किये लेकिन आप लोग उसे पकड़ न पाये । आप लोग बतौर कातिल पहले श्यामली पर मेहरबान होते रहे और वो मर कर हाथ से निकल गयी तो उसी मेहरबानी से मुझे नवाजने लगे । श्यामली कातिल होती तो क्या उसका कत्ल हुआ होता ! अब मेरी बेगुनाही पर भी आप को तभी यकीन आयेगा जबकि मेरा भी कत्ल करने में मेरा वो कमीना किसी जमाने का पार्टनर कामयाब हो जायेगा । मैं दिल्ली पुलिस की मुस्तैदी और चौकसी के आगे नतमस्तक हूं । इतने मेहमानों के बीच - जिनमें एक पुलिस इंस्पेक्टर भी शामिल - वो आया और कत्ल करके चला गया और इतना फूं फां वाले इंस्पेक्टर साहब के, अभी बाकायदा आग का गोला बन कर जलवाअफरोज हुए इंस्पेक्टर साहब के, कान पर जूं न रेंगी ।”

“आप मुझे शर्मिंदा कर रहे हैं...”

“मेरे करने से क्या होता है ! आप हो तो नहीं रहे ! गॉड ! अब वो कहता है अगला और आखिरी नम्बर मेरा है । अब मेरी गति, मेरी जानबख्शी तो इसी बात में है कि आप मुझे जेल में डाल दें । या वो वहां भी अपना काम कर जायेगा ? ऐन पुलिस की नाक के नीचे ? गॉड ! गॉड ! !”

“जनाब, अभी ये साबित होना बाकी है” - यादव तल्खी से बोला - “कि कोई बाहर से आया और वारदात करके चला गया ।”

“क्या मतलब ?”

“हो सकता है कातिल यहीं मौजूद रहा हो और अभी भी यहीं हो !”

“सुजित त्रेहन यहां ! अभी भी यहां ! किसी मेहमान के बहुरूप में ! दिस इज शियर नानसेंस ।”

“अभी आपका छोकरा मुझे त्रेहन साबित करने पर नहीं तुला था ! उसे मुझ में त्रेहन नहीं दिखाई दे रहा था ! नहीं कहा था उसने कि मैं बहुरुपिया था, त्रेहन का बहुरूप धारण किये था !”

“वो.. .वो उसकी नादानी थी जिसकी वो...माफी मांग चुका है ।”

“फिर भी, जनाब, कई बार वही बात मुमकिन निकलती है जो नामुमकिन जान पड़ती है ।”

“बड़ी अच्छी न्यूज है ये मेरे लिये । फिर तो मैं कहीं टिक के बैठता हूं और अपनी बारी का - अपनी मौत का इंतजार करता हूं ।”

“आपको कुछ नहीं होगा ।”

“खोखली तसल्ली है । अभी तक जिस किसी को भी कुछ होना उसने घोषित किया, उसे वो कुछ हुआ या नहीं हुआ ? अभी मेरे बारे में उसकी घोषणा - फाइनल वर्डिक्ट - है या नहीं है ? उसने अगला और आखिरी नम्बर मेरा लगाया या नहीं लगाया ?”

यादव खामोश रहा ।

“वो हर बार अपनी धमकी पर खरा उतरा । हर बार वो वक्त रहते बोला कि आगे वो क्या करने जा रहा था, पुलिस ने क्या कर लिया ? इस बड़े नाम वाले पीडी ने क्या कर लिया ?”

“उसकी नयी वार्निंग” - मैं बोला - “आपकी वाबत वार्निंग उसका ब्लफ भी हो सकती है ।”

“क्या बोला ?”

“आपकी बेटी के बाद अगला नम्बर उसने आपकी पत्नी का लगाना था लेकिन कत्ल सपना टाहिलियानी का हुआ । फिर शिल्पी तायल का हुआ । शिल्पी तायल के कत्ल के बाद कत्ल का मार्क्ड कैण्डीडेट दीक्षा भटनागर थी लेकिन कत्ल आपकी पत्नी का हुआ । इससे क्या साबित होता है ?”

“क्या.. .क्या साबित होता है ?”

“यही कि कत्ल का उसका कोई फिक्स्ड एजेंडा नहीं है । वो घोषित कुछ भी करे लेकिन हकीकतन हम नहीं जानते, कोई नही जानता कि उसका अगला वार कहां होगा !”

“ये मेरे लिये कोई तसल्ली नहीं है ।”

“आप पर वाच रखी जायेगी ।” - यादव बोला - “आपके साथ सशस्त्र पुलिस एस्कार्ट तैनात किया जायेगा - जैसे दीक्षा भटनागर के लिये तैनात किया गया है - और ये इंतजाम तब तक जारी रहेगा जब तक कि कातिल गिरफ्तार नहीं हो जाता ।”

“दैट्स वैरी गुड । मैं दिल्ली पुलिस को थैंक्यू बोलता हूं और साथ ही सवाल करता हूं कि ये इंतजाम उन्हें श्यामली के लिये करना क्यों न सूझा ?”

“सूझा तो बराबर । लेकिन...”

वो खामोश हो गया, उसने असहाय भाव से कंधे उचकाये ।

“क्या लेकिन ? सूझा तो क्या किया ?”

उसने उत्तर न दिया । उत्तर देना अपनी नाकामी, अपने आदमी की कोताही कबूल करना होता ।

“एक नग यहां से गायब है ।” - मैं दबे स्वर में यादव से बोला ।

“दो ।” - यादव भी वैसे ही बोला ।

“डिप्टी की कोई अहमियत नहीं । वो खिसक भी गया तो कोई बात नहीं, उसे फिर थामा जा सकता है । जमा वो कातिल नहीं हो सकता ।”

“तो किसकी अहमियत है ?”.

“अंजना रांका की । है नहीं तो हो सकती है ।”

“है कहां वो ? क्या वो भी खिसक गयी ?”

“नहीं । थोड़ी देर पहले वो लेडीज टायलेट में गयी थी । अभी भी वहीं होगी ।”

“तुम्हें क्या मालूम ?”

मैंनै उसे माधव के बारे में बताया ।”

“ओह ।” - वो बोला ।

“मैं पता करता हूं ।”

मैं हाल के पिछवाड़े की तरफ बढ़ा तो यादव भी हिचकिचाता हुआ मेरे साथ हो लिया । हम लेडीज टायलेट के बंद दरवाजे पर पहुंचे ।

“अंजना मैडम बाहर आयीं ?” - मैंने माधव से पूछा ।

“नहीं, सर ।”

“अभी भी भीतर ही हैं ?”

“सर, पहले थीं तो अभी भी हैं ।”

“ठीक । और कोई आया गया ?”

उसने इंकार में सिर हिलाया ।

“औरत है” - यादव की तरफ देखता मैं बड़बड़ाया - “हसीन औरत है, फिर भी इतना टाइम तो टायलेट में नहीं लगना चाहिए !”

यादव ने सहमति में सिर हिलाया, फिर उसके चेहरे पर दृढ़ता के भाव आये । वो आगे बढ़ा और एक झटके से उसने टायलेट का दरवाजा खोला और भीतर दाखिल हुआ ।

हिचकिचाते हुए मैंने भी उसके पीछे भीतर कदम रखा ।

भीतर कोई नहीं था ।

मैं फौरन बाहर लौटा और माधव से मुखातिब हुआ ।

“मेरे जाने के बाद से यहीं था ?” - मैं सख्ती से बोला ।

“हां, सर ।” - उसने हड़बड़ाहट में जवाव दिया ।

“हर घड़ी ? एक सैकण्ड के लिये भी यहां से नहीं हिला था ?”

वो निगाह चुराने लगा ।

मैंने उसे बांह पकड़ कर झिंझोड़ा ।

“बस, जरा सी देर के लिये गया था ।” - वो भयभीत भाव से बोला ।

“क्यों गया था ? कहां गया था ?”

“देवीलाल को बोलने गया था कि मेरे को यहां तैनात किया गया था ।”

“ईडियट ! भैंस चोरी हो जाने के बाद भी तबेले की निगरानी करने वाला अहमक ! अब जा के ढूंण्ढ उसे ।”

“सर, म - मैं...मैं कहां से ढूंण्ढूं ?”

“यहां से तो दफा हो !”

भारी कदमों से चलता वो वहां से टला ।

मैं वापिस भीतर दाखिल हुआ ।

टायलेट की परली दीवार में एक धुंधले शीशों वाली खिड़की थी जो उस घड़ी खुली थी और जिसके सामने यादव खड़ा था ।

मैं उसके करीब पहुंचा ।

“ये खिड़की खुली थी ?” - मैंने पूछा ।

“नहीं ।” - यादव बोला - “मैंने खोली । भीतर से बंद नहीं थी, कोई चिटकनी वगैरह नहीं लगी हुई थी, बस धक्का दिया कि खुल गयी । देख ही रहे हो कि बाहर को खुलती है ।”
 
“वो इधर से खिसकी ?”

“बहुत मुमकिन है । लेडीज टायलेट की खिड़की है, भीतर से मजबूती से बंद मिलनी चाहिये थी ।”

“वो इधर से निकल गयी, इसलिये पीछे खिड़की को भीतर से चिटकनी नहीं थी ?”

“अरे, उसकी छोड़ो । मैं कुछ और सोच रहा हूं ।”

“क्या ?”

“ये खिड़की ऊपर श्यामली के बैडरूम के ऐन नीचे है । इसकी बगल से ड्रेनेज का पाइप गुजरता है । कातिल उस पाइप के सहारे ऊपर श्यामली के बैडरूम तक चढ़ गया हो सकता है ।”

“अच्छा !”

“हां ।”

“फिर वाच पर लगे तुम्हारे आदमी से तो कोई कोताही न हुई !”

“हां । कोई कोताही हुई तो मेरे से हुई । मैंने ही न सोचा कि कातिल अपनी पहुंच बनाने के लिये कोई आल्टरनेट रास्ता अख्तियार कर सकता था ।”

मैं खामोश रहा ।

“बहरहाल उस दौरान अंजना राका यहां थी । उसको उसकी कोई आहट मिली हो सकती है । उत्सुकतावश उसने खिड़की खोल कर बाहर झांका हो सकता है । शर्मा, पाइप पर चढ़ते कातिल को अगर उसकी खबर लग गयी थी तो सोचो क्या हुआ होगा !...हे भगवान ! अभी कितने कत्ल और मेरे पल्ले पड़ेंगे ?”

“कत्ल ! फिर !”

“और क्या ! गवाह कौन छोड़ता है !”

तत्काल अंजना की - या उसकी लाश की - तलाश शुरू हुई ।

वो वहीं लेडीज टायलेट में ही एक लैवेटरी स्टाल के बंद दरवाजे के भीतर की तरफ लटकती पाई गयी । रस्सी का फंदा उसके गले में था और उसका दूसरा सिरा ऊपर चौखट में ठुकी एक कील के साथ बंधा हुआ

था । वो दरवाजे के साथ यूं लटकी हुई थी कि उसके पैरों के अंगूठे फर्श छू रहे थे । तत्काल रस्सी खोली गयी और उसे बाहर फर्श पर लिटाया गया ।

यादव ने उसकी नाक के नीचे उंगली लगाई ।

मैंने सस्पेंस में उसकी तरफ देखा ।

उसने निराश भाव से इंकार में गर्दन हिलाई ।

फिर उसने उसकी नब्ज पर हाथ रखा, शाहरग टटोली ।

“है !” - तत्काल वो उत्तेजित भाव से बोला - “अभी है । अबे, रामबल, सांस दे । सांस दे ।

उसके करीब खड़ा हवलदार - रामबल - जरूर आर्टिफिशियल रेस्पीरेशन की प्रक्रिया से वाकिफ था । तत्काल वो नीचे बैठा और उसकी छाती पर दोनों हाथ टिका कर दबाव डालता, हटाता उसकी धौंकनी चलाने की कोशिश करने लगा ।

उसके तत्काल प्राण निकलने से जरूर इसीलिये रह गये थे कि लैवेटरी में लटकाने को जगह कम थी । रस्सी खिंचने पर पांव के अंगूठे फर्श को जा लगे थे और गर्दन के गिर्द लिपटी रस्सी पर जिस्म का पूरा भार नहीं पड़ पाया था ।

उस दौरान बाहर दरवाजे पर लोग जमा होने लगे थे ।

“कोई भीतर न आये ।” - यादव ने चेतावनी जारी की ।

सब नेत्र फैलाये, पहलू बदलते, दरवाजे के बाहर ही ठिठके खड़े रहे ।

“वही कार्यप्रणाली है ।” - यादव के करीब जा कर मैं धीरे से बोला - “जो पहले सिद्धार्थ एन्क्लेव वाले केस में इस्तेमाल हो चुकी है ।”

यादव ने सहमति में सिर हिलाया ।

कोई दस मिनट में उसके चेहरे की रंगत लौटने लगी और सांस व्यवस्थित होने लगी ।

खाली हसीन ही नहीं, खुशकिस्मत भी बला की थी । और दो तीन मिनट लटकी रहती तो लाश ही फंदे से उतारी जाती ।

तब उसे उठा कर बाहर लाया गया और एक सोफे पर लिटाया गया ।वहां उसके मुंह पर पानी के छींटे मारे गये और हलक में ब्रांडी टपकाई गयी ।

और दस मिनट बाद वो उठ कर बैठ गयी ।

यादव की जान में जान आयी ।

“कैसा महसूस हो रहा है ?” - उसने सहानुभूतिपूर्ण स्वर में सवाल किया ।

उसने सहमति में सिर हिला कर तसदीक की कि अच्छा महसूस हो रहा था ।

“बोल सकती हो ? बात कर सकती हो ?”

“हं - हां ।”

“क्या हुआ था ?”

जवाब देने से पहले उसके शरीर ने जोर की झुरझुरी ली, उसकी व्याकुल आंखें अपनी कटोरियों में फिरीं फिर कराह की तरह उसके मुंह से निकला - “म - मैंने...मैंने उसे...द - देखा था ।”

“किसे ? किसे देखा था ?”

“क - कातिल को ।”

“कौन था वो ?”

“व - वही था ।”

“कौन ?”

“टे - टेढ़ी बांह वाला ।”

“कहां देखा था ? क्या कर रहा था ?”

“खि - खिड़की के ब - बाहर देखा था । क - कमंद डाल कर ऊ..ऊपर चढ़ रहा था ।”

तो यादव का खयाल गलत था कि वो ड्रेन पाइप के जरिये ऊपर श्यामली के बैडरूम की खिड़की तक चढ़ा था ।

“पता कैसे लगा था ?”

“खिड़की के धुंधले शीशे पर पर - परछाईं पड़ी थी । म - मैंने खिड़की खोल कर बाहर झांका था तो...वो मु - मुझे रस्सी के सहारे ऊ - ऊपर चढ़ता दि - दिखाई दिया था । उसकी टेढ़ी, दूसरी से छोटी बांह मुझे साफ दिखाई दी थी ।”

“फिर ?”

“फिर उसे म - मेरी खबर लग गयी थी । ऊपर चढ़ते उसने फौरन नीचे छलांग लगा दी । फिर ख - खिड़की की चौखट पर चढ़ आया, फिर...फिर मेरे पर ह - हमला कर दिया...”

वो हाथों में मुंह छुपा कर सुबकने लगी ।

“ईजी ! ईजी !” - मैने उसकी पीठ थपथपाई - “ईजी डज इट ।”

उस माहौल में भी मैंने उसकी पीठ थपथपाई ही नहीं, थपथपाने के बहाने सहलाई, सहलाने के बहाने टटोली ।

पीठ और और भी जो कुछ तब हाथ में आया ।

“मैं बेहोश हो गयी ।” - वो फिर बोली - “होश आया तो ट...टायलेट के फर्श पर पड़ी थी...क - कोई मेरी छाती दबा रहा था...”

“नकली सांस देने के लिये ।” - यादव जल्दी से बोला ।

“मु - मुझे क्या हुआ था ?”

यादव ने बताया ।

“हे भगवान ! हे भगवान ! उसने मुझे फांसी देने की कोशिश की !”

“उसकी कोशिश कामयाब होने में कोई कसर भी नहीं रही थी । बाई दि वे, शर्मा की वजह से बची हो ।”

उसने हैरानी से मेरी तरफ देखा ।

मैं मुस्कराया ।

“थैं - थैंक्यू ।” - वो बोली ।

“नैवर माइंड ।” - मैं बोला - “लेकिन देख लिये जाने के बावजूद कातिल अपने मकसद में कामयाब हो गया ।”

“क - क्या ! क्या मतलब ?”

“श्यामली । मिसेज तोशनीवाल । खत्म ।”

“ओ, माई गॉड ! ओ, माई गुड गॉड !”

कई क्षण वो खामोश रही ।

“एक तरह से” - फिर धीरे से बोली - “मैं भी मैडम की मौत के लिये जिम्मेदार हूं ।”

“तुम जिम्मेदार हो ! कैसे ?”

“तोशनीवाल साहब वक्ती तौर पर फैमिली के साथ किसी नामालूम जगह मूव कर जाना चाहते थे, मैंने ही उन्हें यकीन दिलाया था कि मैडम ने तुम्हें एंगेज किया था तो तुम किसी को कुछ नहीं होने दोगे । लेकिन...”

“मेरे पास कोई जादू की छड़ी तो नहीं जो..”

“आई अंडरस्टैण्ड ।”

“नो, यू डोंट अंडरस्टैण्ड । डिटेक्टिव डिटेक्ट करता है - बल्कि करने की कोशिश करता है जिसमें कभी वो कामयाब होता है, कभी नहीं होता । जादूगर गिली गिली करके अपनी जादू की छड़ी घुमाता है तो अपने करतब में हर बार कामयाब होता है । ये फर्क है डिटेक्टिव होने में और जादूगर होने में ।”

“आई एम सारी । लेकिन मैंने यही समझा था कि तुम मोटी फीस लेते हो तो फीस का सिला देते हो । रिजल्ट्स की गारंटी करते हो ।”

“क्या करता हूं ? कातिल को खुद गोली मार देता हूं ?”

“मेरी बात समझने की कोशिश करो ।”

“समझने लायक बात समझी जाती है । जो तुम कह रही हो, वो समझने लायक नहीं है । तुम मुझे एक नालायक, इनएफीशेंट पीडी करार देने की कोशिश कर रही हो...”

“आई डिडंट मीन टु हर्ट युअर फीलिंग्स ।”

“बट यू डिड...”

“बस करो ।” - यादव दखलअंदाज हुआ - “ये न भूलो ये जिंदा बच गयी है इसलिये अब कातिल के खिलाफ विटनेस है । और इसलिये कातिल से इसकी जान को अभी भी खतरा है ।”

अंजना के शरीर ने प्रत्यक्ष, जोर की झुरझुरी ली ।

“मेरा अब यहां कोई काम नहीं ।” - मैं बोला - “मैं चलता हूं ।”

“ओह, नो ।” - तत्काल अंजना व्याकुल भाव से बोली ।

“क्या ओह नो ?”

“मुझे अकेली छोड़ के न जाओ ।”

मैंने हैरानी से उसकी तरफ देखा ।

“अकेली नहीं हो यहां तुम ।” - फिर बोला ।

“यहां न ! मैं हमेशा ही तो यहां बनी नहीं रह सकती ! मुझे प्रोटेक्शन की जरूरत है ।”

“है तो पुलिस मुहैया करायेगी न ! मैं करा कर सकता हूं ? मैं तो नालायक पीडी हूं जो अपने क्लायंट की हिफाजत न कर सका ।”

“तुम खामखाह खफा हो रहे हो । मेरा ऐसा कोई मतलब नहीं था ।”

“मेरा है । सी यू बेबी ।”

मैं वहां से हट कर सीढ़ियों की तरफ बढा ।

तत्काल तोशनीवाल मेरे करीब पहुंचा । उसने व्यग्र भाव से बांह पकड़ कर मुझे हिलाया ।

“सब ठीक है ।” - बांह छुड़ाता मैं बोला - “शी इज सेफ । शी विल लिव ।”

उसने चैन की लम्बी सांस ली ।

बीवी की लाश के सिरहाने भी उसे माशूक की फिक्र सता रही थी ।

“मैं सीढ़ियां चढ़ कर ऊपर मौकायवारदात पर पहुंचा । मैं सीधा एक खिड़की पर पहुंचा, बारीकी से मैंने खिडकी का और उससे बाहर के प्रोजैक्शन का मुआयना किया ।

कोई संदेहजनक बात मुझे न दिखाई ।

मैं दूसरी खिड़की पर पहुंचा ।

वहां भी वही हाल था ।
 
अभी एक खिड़की वहां और थी । उसके बाहर के प्रोजैक्शन पर खुरचे जाने के अपनी कहानी खुद कहने वाले निशान मौजूद थे । साफ लगता था कमंद का हुक वहां टकराया था, वहां अटका था । रस्सी पर चढ़ते वक्त शरीर का भार पड़ने से हुक वहां से न हटता लेकिन ढ़ीली रस्सी को नीचे से झटका देने से हुक वहां से अलग हो जाता और फिर पता ही न चलता कि कमंद डाल कर कोई उधर से ऊपर आया गया था ।

मैं वापिस नीचे पहुंचा ।

यादव ने प्रश्नसूचक निगाह से मेरी तरफ देखा । मैंने उसे एक ओर ले जा के ऊपर की अपनी खोज के बारे में बताया ।

“हूं ।” - वो बोला - “तुम्हारी जानकारी के लिये वो रस्सी बरामद हो गयी है जो कमंद लगाने के काम में लायी गयी थी ।”

“अच्छा ! कहां मिली ?”

“मकतूला मिसेज तोशनीवाल के बैडरूम की एक खिड़की के ऐन नीचे घास में पड़ी मिली । शर्मा, वो रस्सी कोई आम रस्सी नहीं है, वो वैसी रस्सी निकली है जिसे पर्वतारोही इस्तेमाल करते हैं । जो कि फिर पार्टनर की तरफ इशारा है ।”

“आई सी । वो रस्सी कहां है ?”

“अभी वहीं पड़ी है । जाती बार उठा लेंगे ?”

“मैं देखूं जरा ?”

“तू क्या देखेगा ?”

“यही कि पर्वतारोहियों के इस्तेमाल में आने वाली रस्सी कैसी होती है !”

“शर्मा, बाज आ जा ।”

मैं हंसा, फिर बोला - “देखने दो । प्लीज ।”

“ठीक है, देख ।”

मैं लेडीज वाशरूम में दाखिल हुआ और धुंधले शीशों वाली खिड़की फांद कर बाहर लान में पहुंचा ।

यादव ने ऐसी कोई कोशिश न की, वो खिड़की पर ही खड़ा रहा ।

मैं दीवार के करीब पहुंचा और वहां मैंने घास में रोल की सूरत में पड़ी मोटी रस्सी काबू में की । रस्सी के एक सिरे पर रबड़ चढा लोहे का मजबूत हुक था और उसकी सारी लम्बाई में एक एक फुट के फासले पर गांठें थी । मैंने रस्सी को फैलाया, उसकी हुक से कोई दो फुट दूर थामा और उसे ऊपर बीच की खिड़की के नीचे प्रोजैक्शन की ओर उछाला । हुक वहां कहीं टकराया और वेग से यूं नीचे आकर गिरा कि मेरा सिर उसकी चपेट में आने से बाल बाल बचा ।

मैंने कमंद की तरह हुक को फिर उछाला ।

फिर....

फिर...

फिर उछाला ।

छठी कोशिश में हुक प्रोजैक्शन पर अटका । मैंने रस्सी को खींच कर सुनिश्चित किया कि वो मजबूती से अपनी जगह पर टिका हुआ था और फिर रस्सी के साथ लटक कर ऊपर चढ़ने की कोशिश की । रस्सी की पहली ही गांठ अभी मेरे पैरों की पकड़ में आयी थी कि हुक प्रोजैक्शन पर से अलग हो गया और फिर मेरा सिर उसकी चपेट में आने से बाल बाल बचा ।

“ये ट्रेनिंग से होने वाले काम होते हैं” - यादव खिड़की पर से बोला - “खड़े पैर नहीं आ जाते । तू तो पलक झपकते पर्वतारोही बनने की कोशिश कर रहा है ।”

मैं खिसियाया सा हंसा ।

“अब इससे पहले कि हुक से तेरा सिर फूटे, वापिस आ जा ।”

मैंने रस्सी को यथास्थान घास पर डाला और खिड़की पर लौटा ।

यादव ने हाथ का सहारा दे कर वापिस भीतर पहुंचने में मेरी मदद की ।

हम वापिस हाल में लौटे ।

“अब इसका” - मैंने अंजना रांका की तरफ इशारा किया - “क्या होगा ?”

“क्या होगा !” - यादव बोला - “कुछ नहीं होगा । ये अब बिल्कुल ठीक ठीक है । अभी चली जायेगी ।”

“खुद ही ?”

“मैंने लिफ्ट ऑफर की थी, एस्कार्ट आफर किया था, बोली जरूरत नहीं । दिलेरी दिखाई पट्ठी ने ।”

“है तो सही जरूरत । जब ये कातिल के खिलाफ गवाह है...”

“हम शार्टहैण्डिड है । गवाह की प्रोटेक्शन की कोई मांग नहीं है तो हम प्रोटेक्शन को नजरअंदाज कर सकते हैं ।”

“कमाल है !”

फिर मैंने अंजना को वहां से रुखसत होते देखा ।

उस घड़ी तोशनीवाल पता नहीं कहां था ।

“ऊपर चलो ।” - यादव बोला - “और दिखाओ मुझे वो खिड़की जिसके बाहर कमंद लगी होने के टैलटेल साइन तुम कहते हो तुमने देखे ।”

मैंने सहमति में सिर हिलाया ।

मैं उसके साथ वापिस ऊपर मकतूला के कमरे में पहुंचा ।

यादव ने गौर से खिड़की का मुआयना किया और फिर पुलिसियों के साथ वहां पहुंचे हुए फोटोग्राफर को प्रोजैक्शन की तसवीरें निकालने का हुक्म दिया ।

फिर वो बाकी टीम से मुखातिब हुआ ।

“कत्ल का क्लियरकट केस है ।” - लोकल थाने से आया सब-इंस्पेक्टर बोला - “जोर जबरदस्ती, धींगामुश्ती के कोई निशानात नहीं पाये गये है । मकतूला की उंगलियों के नाखून भीतर की तरफ से बिल्कुल साफ मिले हैं जिससे साबित होता है कि किसी नोच खसोट की नौबत नहीं आयी थी । यानी कि कातिल के - जो कोई भी वो है - जिस्म पर खरोंचों के कोई निशान नहीं मिलने वाले । जो शलवार सूट वो पहने है उसकी शर्ट एक जगह से थोड़ी मसकी हुई है लेकिन उसकी वजह बिल्कुल जरूरी नहीं है कि कोई धरपकड़ रही हो, कोई छीनाझपटी रही हो ।”

“हूं ।”

आगे जानकारी में आया कि वहां से जो फिंगरप्रिंट्स उठाये गये थे, वो या फैमिली मेम्बर्स के थे या सवेंट्स के थे । कोई अंजाना, अनचीन्हा फिंगरप्रिंट वहां से बरामद नहीं हुआ था ।

मर्डर वैपन वहां से बरामद नहीं हुआ था अलबत्ता बैलेस्टिक्स एक्सपर्ट का मोटा अंदाजा था कि मर्डर वैपन बत्तीस कैलीबर का गन था ।

फिर बत्तीस कैलीबर की गन की हाजिरी ।

मेरी तवज्जो बाथरूम के करीब के एक बंद दरवाजे की तरफ गयी ।

“वो दरवाजा कैसा है ?” - मैं उत्सुक भाव से बोला ।

“वार्डरोब का होगा ।” - यादव लापरवाही से बोला ।

“वार्डरोब तो उधर है !” - मैंने विपरीत दिशा की दीवार की ओर संकेत किया ।

“ये क्लोजेट होगा ।”

“होगा ?”

उसने घूर कर मुझे देखा, फिर दरवाजे के करीब पहुंचा । उसने दरवाजा ट्राई किया तो दरवाजे को मजबूती से बंद पाया ।

देवीलाल को वहां तलब किया गया ।

“ये दरवाजा कैसा है ?” - यादव ने पूछा ।

“ये, सर, अगले और इस कमरे के बीच का दरवाजा है ।” - देवीलाल सविनय बोला ।

“कम्यूनिकेटिंग डोर !” - मैं बोला ।

“वही । लेकिन उस काम नहीं आता जो आपने इसे बोला ।”

“मतलब ? “

“दो साल से लाक्ड है । जब से वो मैडम... अंजना रांका ... साहब की...”

वो खामोश हो गया ।

“खोलना हो तो कैसे खुलेगा ?”

“चाबी उधर, उस मेज के.. .दीवार के साथ लगी राइटिंग टेबल के दराज में है ।”

मैंने यादव की तरफ देखा ।

यादव ने सहमति में सिर हिलाया, फिर हुक्म दिया - “निकाल के ला ।”

देवीलाल चाबी ले के आया तो उसी को दरवाजा खोलने को बोला गया ।

दरवाजे के पार भी एक वैसा ही, उसी साइज का बैडरूम निकला जो, मालूम हुआ कि शिव मंगल तोशनीवाल का था ।

पुलिस ने उस जगह को भी भरपूर टटोला ।

कुछ हाथ न आया ।

बीच के दरवाजे से सब वापिस लौटे और उसे पूर्ववत् लॉक कर दिया गया और चाबी यथास्थान पहुंचा दी गयी ।

“लड़के का बैडरूम कहां है ?” - मैंने पूछा ।

“लड़का !” - देवीलाल बोला ।

“एक ही तो है यहां !”

“आप शिशिर की बात कर रहे है ?”

“नहीं, शाहरुख की बात कर रहा हूं ।”

“वो. ..वो बाहर, गलियारे के पार है ।”

“दिखा ।”

उसने आदेश का पालन किया ।

शिशिर के कमरे की भी पड़ताल हुई ।

कमरा ऐन वैसा निकला जैसा कि किसी संपन्न नौजवान का होना अपेक्षित था । कुछ जुदा था तो ये था कि लड़का पढ़ने का शौकीन जान पड़ता था - जबकि नौजवानों में पढने का रिवाज तो जैसे खत्म ही होता जा रहा था - एक दीवार में बहुत बड़ा बुक शैल्फ था जो किताबों से ठसाठस भरा हुआ था । मैंने करीब जा कर टाइटल्स का मुआयना शुरू किया तो पाया कि वहां एक भारी भरकम ग्रंथ विष विज्ञान पर भी था । गौरतलब बात ये थी कि उसमें जहां आरसेनिक और स्ट्रिकनिन जैसे घातक विषों का जिक्र था, वहां पन्ना मुड़ा हुआ था और तहरीर की कई लाइनें पेंसिल से रेखांकित थी ।

किसी ने - लड़के ने ही, और किसने - उन घातक विषों का गहन अध्ययन किया जान पड़ता था ।

क्यों ?

मर्डर्स में और वैरायटी पैदा करने के लिये ।

तो क्या आइन्दा कत्ल जहर से होने वाला था !

मैंने किताब को यथास्थान रखा और यादव की तरफ तवज्जो दी ।

परे वार्डरोब के करीब खड़ा वो ट्विड के एक वैसे कोट का मुआयना कर रहा था जिसकी कोहनियों पर मैचिंग चमड़ा मढ़ा होता है ।

मैं उसके करीब पहुंचा ।

“कोई खास बात ?” - मैं वोला ।

“है तो सही ?” - जवाब मिला ।

“क्या ?”

उसने कोट की पीठ मेरी तरफ घुमाई और उसे नीचे से थामा ।

“ये देखो” - फिर बोला - “खून लगा जान पड़ता है ।”

“कुछ लाल सा है ।” - मैं सावधान स्वर में बोला ।

“खून है ।”

“वो रेव पार्टी में था । कैचप के बारे में क्या खयाल है ?”

“खून है ।”

“ऐसी पाटियों में काफी अराजकता होती है, कोई बोतल वोतल फूटी होगी, कोई हाथ वाथ काट बैठा होगा !”

“लड़के की हिमायत कर रहे हो ?”

“नहीं । जो और सम्भावनायें हैं, उनको हाइलाइट कर रहा हूं ।”

“मैं ये कोट कब्जे में ले रहा हूं । लैब में पता लगेगा कि ये टोमेटो कैचप है या खून ! खून है तो किस ग्रुप का !”

उसने कोट एक सिपाही के हवाले किया ।

फिर तलाशी मुकम्मल की ।

जिसमें कुछ हाथ न आया ।

“लड़का घर में है ?” - यादव देवीलाल से सम्बोधित हुआ ।

“खबरदार” - मैंने चेताया - “जो फिर पूछा कौन लड़का !”

देवीलाल ने सहमी शक्ल बनाई और जल्दी से सहमति में सिर हिलाया ।

“बुला के ला ।” - यादव ने हुक्म दिया ।

देवीलाल ने आदेश का पालन किया ।

शिशिर वहां पहुंचा ।

“आप लोग” – आते ही वो भड़का - “मेरे कमरे में क्या कर रहे हैं ?”

यादव की शक्ल से न लगा कि उसने उस ऐतराज की तरफ तवज्जो तक दी थी ।

“मैं कहता हूं आप लोग ...”

“शट अप !” - यादव बिना गुस्सा जताये शांति से बोला ।

लड़के ने जोर से थूक निगली ।

यादव ने सिपाही के हाथ से कोट वापिस ले कर उसके सामने किया ।

“तुम्हारा है ?” - उसने पूछा ।

“हां ।”

“लास्ट टाइम कब पहना था ?”

“अभी कल ही पहना था ।”

“गुड़गांव में जिस पाटी में शामिल थे, उसमें ये कोट पहन के गये थे ?”

“हां ।”

“इसको खून कैसे लगा ?”

“खून !”

यादव ने कोट की पीठ का बाटम का हिस्सा उसके सामने किया ।

“अच्छा, ये !”

“हां, ये ।”

“आप समझ रहे हो ये ममी के जिस्म से बहा खून है ! मुझे ममी का कातिल.. .”

“जवाब, दो भई ।”

“पार्टी में एक लड़का हाथ में थमा गिलास तोड़ बैठा था । बहुत खून बहा था । जहां खून बहा था वहां बेध्यानी में मैं बैठ गया था । तभी कोट को ये खून लगा होगा !”

“होगा ?”

“मुझे इस बाबत कुछ नहीं मालूम था । मालूम होता तो आते ही कोट देवीलाल के हवाले करता या कोट को खुद साफ करता या ड्राई क्लीनिंग के लिये भेजता, इसे वार्डरोब में न टांगता ।”

“हूं । वो लड़का, जिसका हाथ कटा था तुम्हारा वाकिफ था ?”

“हां ।”

“फ्रेंड था ?”

“हां ।”

“नाम बोलो ।”

उसने बोला ।

“मोबाइल नम्बर बोलो ।”

उसने वो भी बोला ।

यादव ने अपना मोबाइल निकाल कर उस नम्बर पर काल लगाई ।

दो मिनट वो फोन पर मसरूफ रहा ।

फिर उसने फोन जेब के हवाले किया और लड़के की तरफ घूमा - “तुम्हारा दोस्त तुम्हारी कहानी की तसदीक कर रहा है ।”

“थैंक गॉड ।” - शिशिर बोला ।

“पहले से सिखा पढ़ा कर तो नहीं रखा हुआ था ?”

“पहले से ?”

“हां ।”

“मुझे पहले से ऐसी किसी जरूरत का अहसास होता तो आसान काम न करता ।”
 
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