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Thriller बारूद का ढेर

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सिगरेट फूंकता लाम्बा अपने दुश्मनों के बारे में बारी-बारी से ध्यान करने लगा । कुछ देर तक विचारपूर्ण मुद्रा में रहने के उपरान्त वह वहां से निकलकर आउट हाउस की ओर चला गया।

वह कोठी शहर से बाहर के क्षेत्र में बनी थी।

माणिंकी देशमुख ने उसे अपने किसी विशेष कार्य के लिए। बनवाया रहा होगा, लेकिन उस समय उसका प्रयोग पूनम कर रही थी।

उसने लाम्बा को फोन कर दिया था और लाम्बा ने पंद्रहमिनट में वहां पहुंचने को कहा था। पंद्रहमिनट हो चुके थे, वह अभी तक नहीं पहुंचा था।

पूनम को बेचैनी होने लगी थी।

वह कॉरीडोर में चहलकदमी करने लगी। उसकी नजर बार-बार अपनी रिस्टवॉच पर जा ठहरती।

पुरे तीस मिनट बाद जब रंजीत लाम्बा की कार उसे आती दिखाई पड़ी तब उसे चैन मिला।

वह अन्दर बैडरूम की ओर बढ़ गई।

वहीं से आहटें सुनकर अनुमान लगाने लगी, कार के रुकने की , दरवाजा खुलने की दरवाजा बन्द होने की और आखिर में कॉरीडोर में उभरती जूतों की ठक-ठक।

शीघ्र ही रंजीत लाम्बा उसके सम्मुख था।

उसने रूट ने का अभिनय किया।

लाम्बा ने आगे बढ़ कर उसे अपनी बाहों में भर लिया।'

'सॉरी पूनम... ट्रैफिकी जाम था , मैं क्या करता। ' उसने पूनम के गालों को चूमते हुए कहा।

मैं कब से इंतजार कर रही हूं।'

' तो क्या हुआ। आ तो गया ना।'

'जानते हो , एक मिनट की भी देर हो जाने पर मेरे दिल में कैसे-कैसे ख्याल आने लगते हैं। '

'कैसे-कैसे ?' लाम्बा ने शरारतन पूछा।

'डरने लगती हूं। सोंचती हूं कहीं तुम्हें कुछ हो तो नहीं गया।'

'एक बात बो! ?' वह पूनम के अधरों पर उंगली फिराता हुआ बोला।

'हां...बोलो।'

'बहुत बेशर्म हूं ' । आसानी से मरूंगा नहीं।

' ऐसी बातें मत करो। ' पूनम ने जल्दी से उसके होंठों पर हथेली रखते हुए कहा।

' फिर क्या करू?'

'प्यार। ' कहते हुए पूनम की पलकें शर्म से झुकती चलीन गई।

उसकी उस अदा पर लाम्बा कुर्बान हो गया। उसकी बांहों का बंधन पूनम के गिर्द कसता चला गया। यहां तक कि उसके मुख से दबी हुई कराह फूट निकली।

'उई मां...!'

उसने पूनम को अपनी बांहों से हटाकर एकदम से गोद में उठा लिया।

'हाय रे! क्या कर रहे हो ?'

'प्यार।'

'शरारत तो कोई तुमसे सीखे। '

" इसमें शरारत कहां से आ गई ?'

'जरूरी है मुझे इस तरह गोद में उठाना ?'

'हां... जरूरी है ?'

'किसलिए जरूरी है ?'

' इसलिए कि प्यार करना जरूरी है।' ' बातें खूब बना लेते हो।' ' बातें बनाना तुम्हीं ने सिखाया है। '

'हाँ ... सब-कुछ मैंने ही किया है।'

' वरना मुझे तो कुछ आता ही नहीं था। '

'बिल्कुल नहीं...तुम तो भोले-भाले नन्हे-से बच्चे हो।'

लाम्बा मुस्कराया। ' इस तरह गोद में उठाकर कहां लिए जा रहे

हो ?'

'वंहा ...। ' उसने आंखों ही आंखों से बैड की ओर संकेत किया।

लाज की लालिमा पूनम के चेहरे पर फैल

गई।

बैड पर, लाम्बा ने उसे ऊपर से ही छोड़ दिया।

वह डनलप के ग द्दे पर गिरकर थोड़ा-सा उछली फिर फैल गई। उसके संभलने से पूर्व लाम्बा उस पर गिर चुका था।

पूनम जैसी सैक्सी लड़की का- सामीप्य हासिल होने के। बाद कोई भी जवान आदमी अपनी इच्छाओं पर काबू नहीं पा सकता था।

वही हाल लाम्बा का हुआ।

यूं भी पूनम के पास आते ही उस पर दीवानगी-सी छा जाती थी।

उसके दोनों हाथ फुर्ती से चल रहे थे।

शीघ्र ही वे निर्वसन अवस्था में जब एक-दूसरे की चिकनी बांहों में समाए तो मानो पैट्रोल में चिंगारी डाल दी गई हो।

शोले एकदम ही भड़की उठे।

पूनम उत्तेजकी स्थिति में सत्कार कर उठी। उसके अधर रंजीत लाम्बा के शक्तिशाली जिस्म को यहां-वहां चूमने लगे।

लाम्बा ने उसे अपने आलिंगन में भींच लिया।

वह लाम्बा से लता के समान लिपट गई। उन क्षणों में वह लाम्बा से एक पल के लिए भी अलग नहीं होना चाहती थी । धीरे-धीरे उसकी सांसों में तेजी आने लगी।

लाम्दा की कठोरता पूर्ण उत्तेजना को यह स्पष्ट अनुभव कर रही थी।

लाम्बा ने जब उसके अधरों से अधर जोड़े तो बरबस ही वह उसके सिर के बालों में अपने हाथों की कोमल उंगलियां घुमाकर उसके सिर के बालों को सहलाने लगी।

लाम्बा के हाथ अलग हरकत कर रहे थे।

दोनों लगभग एकाकार हो गए थे।

गर्म सांसें घुलने लगीं।

सांसों की रफ्तार में निरन्तर तेजी आती जा रही थी। वह तेजी बढ़ती ही गई। बढ़ती ही गई। यहां तक कि तनाव चरम शिखर पर पहुंचकर टूट गया।

इस बात पूनम के मुख से कामुकी सीत्कार निकलते रहे थे।

लाम्बा का समूचा बोझ उस समय उसके ऊपर था।
 
उसने लाम्बा को बदन तोड़ ढंग से सहयोग किया था। इस समय लाम्बा का चेहरा उसके वक्षों के मध्य छिपा था और वह उसके सिर के बालों को धीरे-धीरे सहला रही थी।'

थोड़ी देर बाद लाम्बा ने करवट बदली।

वह पूनम के ऊपर से हट गया। __पूनम ने तुरन्त करवट बद ली और वह उसके चौड़े सीने पर फैल गई। उसकी आंखों में लाम्बा के लिए प्रशंसा ही प्रशंसा थी।

__ पहले बह प्यार से कितने ही क्षणों तक लाम्बा की आंखों में देखती रही। उसके बाद उसने लाम्बा के होंठों को चूम लिया।

'ऐसे क्या देख रही हो?' लाम्बा ने प्यार भरे अंदाज में पूछा।

'देख रही हूं कितना ढेर सारा प्यार है तुम्हारे पास ?' पूनम उसके सीने पर हाथ फेरती हुई बोली।

'प्यार है ना?'

'हां। '

'इस प्यार को भूल तो नहीं जाओगी?' ' आखिरी सांस तक याद रहेगा। ' भावु की होकर लाम्बा ने उसके अधरों पर चुम्बन अंकी गित कर दिया।

वह उसकी आंखों में देखती हुई-मुस्कराई।

'इस कोठी में क्यों बुलाया ?'

' इसलिए कि वहां का डिस्टर्बेन्स मुझे अच्छा नहीं लगा। यहां सुकून है। किसी तरह की कोई उलझन नहीं...।'

उलझन है। ' एकाएक ही चौंकता हुआ लाम्बा उसे अपने ऊपर से हटाकर उठा और फुर्ती से कपड़े पहनने लगा।

अपने दोनों होलस्टर उसने सबसे पहले अपने कब्जे में किए। उसके बाद शर्ट के बटन लगाता हुआ वह खिड़की के निकट जा पहुंचा।

पूनम घबरा गई।

हालांकि उसने किसी प्रकार की आहट नहीं सुनी थी, लेकिन वह जानती थी कि रंजती लाम्बा में बहुत दूर से खतरे को सूंघ लेने की योग्यता थी।

खतरा निश्चित ही होगा, इसे बात को वह जानती थी।

इसीलिए उसने जल्दी-जल्दी कपड़े पहन

लिए।

लम्बा खिड़की के पर्दे की ओट से बाहर झांकी रहा था।

कोठी के बाहर का दृश्य दिखाई दे रहा था उसे।

वह सावधान मुद्रा में देखता रहा।

आयरन गेट के इस पार फूलों की घनी बेल की ओट में ऐकी व्यक्ति नजर आया उसे। वह छिपकर कोठीकी और देख रहा था।

शायद उसके द्वारा आयरन गेट पार करते हुए कि सी प्रकार की आहट उत्पन्न हुई थी, उसे सुनकर ही लाम्बा को खतरे का आभास मिला था।

फूलों की बेल की ओट में छिपे व्यक्ति ने दाहिना हाथ उठा कर पीछे से किसी को आगे बढ़ने का संकेत किया। ऐसा करते समय उसके हाथ की उंगलियों में फंसा का ला रिवाल्वर दूर से ही नजरे आ गया। इसके अतिरिक्त अपने पीछे वाले को सिग्नल

देते हुए भी वह पीछे नहीं देख रहा था। उसकी नजर सामने की ओर ही लगी थी।

फिर वह अपने पीछे देखे बिना बेल की ओट से निकलकर तेजी से ड्राइव वे पर बढ़ता चला गया।

ड्राइव वे अभी पूरी तरह उसने पार नहीं किया था कि , उसके पीछे खतरनाकी प्रकार की गने संभाले चार आदमी और आते दिखाई दिए।

उन चारों ने सिर से लेकर गर्दन तक इस तरह कपड़े को लपेटा हुआ था कि उनकी सिर्फ आँखें ही चमकती हुई नजर आ रही थी।

वे आतंकवादी प्रतीत हो रहे थे।

जाहिर था उनके इरादे भी अच्छे नहीं थे।

खिड़की के पर्दे की ओट से झांकते-रंजीत लाम्बा ने फुर्ती से एक हो लस्टर के अन्दर से रिवाल्वर खींच निकाला।

उसके हाव-भाव देखते ही पूनम समझ गई कि मामला गड़बड़ है।

' क्या हुआ ? कौन है ?' वह दबे हुए स्वर में बोली।

उस समय लाम्बा के पास उसकी ओर ध्यान देने का अवसर नहीं था। वह जानता था कि पांच-पांच हथियारबंद आदमी उसे घेरने आ रहे हैं। अगर वह उनके घेरे में फंस गया तो उनकी शक्तिशाली गनों की मार से बच नहीं सकेगा।'

__ वह दबे पांव फुर्ती के साथ कमरे से बाहर निकला। बाहर निकलते ही उसने दूसरे होलस्टर से पिस्तौल निकाल ली।

अब उसके दाहिने हाथ में रिवाल्वर और बाएं हाथ में पिस्तौल थी। दोनों के सेफ्टी कैच हटाकर उसने फायर- करने की पूरी तैयारी कर ली। महज ट्रेगर दबाने भर की देर थी।

कमरे के बाहर छोटा-सा कॉरीडोर था। कॉरीडोर के बराबर में जाली वाली दीवार।

उस दीवार के उस तरफ उसे दो नकाबपोश एकदम सामने की ओर दिखाई दे गए।

उसने तुरन्त जाली में अपनी दोनों गनो को लगाकर ट्रेगर दबा दिए।

पहली गोली आगे वाले नकाबपोश के बाएं कंधे में लगी।

जब तक दूसरा कुछ समझता , तब तक उसका पेट फाड़ती दूसरी गोली उसे अपने वेग के साथ पीछे घसीटती ले गई।

तबाद तोड़ फायरिंग शुरू हो गई। लाम्बा ने बला की फुर्ती से वह जगह छोड़

दी।

तीन तरफ से जाली वाली एक ईट की दीवार पर बाहर से गोलियां बरसाई जाने लगीं।

लाम्बा पहुंचा दसरी तरफ जहां बाथरूम था। बाथरूम के अन्दर दाखिल होकर वह रोशनदान तक पहुंचने के लिए वाश-बेसिन पर चढ़ गया।

रोशनदान से उसने देखा , एक आदमी उन दो घायलों को मदद करके बाहर लिए जा रहा था , जो उसकी गोलियों के शिकार हुए थे।

शेष दो जाली वाली दीवार की तरफ गोलियां बरसाते हुए आगे बढ़ रहे थे।

लम्बा ने फुर्ती के साथ दो फायर किए।

एक गोली कारगर साबित हुई और दूसरी बेकार गई। एक आदमी और घायल हो गया।

शेष रहा वह आदमी जो बिना नकाब के था।

बौखलाकर इधर-उधर देखते हुए उसेने अंधाधुंध गोलियों चलाई। उसके बाद अपने घायल साथी को खींचता हुआ वापस लौटने लगा।

लाम्बा उसे निशाना बना लेता लेकिन अचानकी ही वाश - बेसिन उसके पैरों तले से निकल गया और वह नीचे आ गिरा।

दरअसल वाश-बेसिन का सपोर्ट उसके वजन को सहन नहीं कर सका था इस कारण वह अपनी जगह से निकल गया।

जब तक वह संभलकर बाहर निकलता तब तक दुश्मन वहां से भाग चुका थी।

उसने बाहर आकर आयरन गेट तक च क्कर लगाया।

वह पूरी तरह सावधान था।

उस सन्नाटे भरे क्षेत्र में एक रिवाल्वर और एक पिस्तौल के साथ लाम्बा किसी घायल चीते जैसी स्थिति में घूम रहा था

उसके सामने उस समय उसका जो भी दुश्मन आता , उसे वह तुरन्त ही उड़ा डालता। '

लेकिन!

उसका कोई भी दुश्मन वहां रुकने का साहस न संजो सका था।

वे सभी उस क्षेत्र को छोड़ कर गायब हो चुके

थे।

उसने आयरन गेट से बाहर निकलकर भी देखा , दूर-दूर तक कोई नजर नही आया। फिर जैसे ही वह वापस लौटा ...चौंकी पड़ा।

फुर्ती के साथ उसका पिस्तौल वाला हाथ उठा और फिर पूनम को देखकर झुकी गया।

'कौन लोग थे ?' उसकी ओर बढ़ती पूनम ने घबराए हुए स्वर में पूछा।

'जो भी थे , मेरी हत्या के इरादे से यहां आए थे।'

लाम्बा ने कठोर स्वर में कहा।

'कौन लोग हैं जो तुम्हारे पीछे हाथ धोकर पदाए हे ?'

'जो भी हैं, बहुत ज्यादा देर तक पर्दे के पीछे नहीं रह सकेंगे।'

' अजीब बात है।'

' बात सचमुच अजीब है। ' लाम्बा विचारपूर्ण स्वर में बोला- ' मैं यहा आ रहा हूं, इस बात की खबर तुम्हारे अलावा और किसे थी ?'

' किसी को भी नहीं।'

किसी को भी नहीं। ' वह चिंतित सर में बड़बड़ाया- ' फिर उन लोगों को खबर कैसे हुई ?'

'मालूम नहीं।'

उसकी आंखों में उलझन के चिन्ह गहरे हो गए।

फिर वह कुछ बोला नहीं बल्कि खामोश होकर गहन विचारों में डूबता चला गया।

' क्या हुआ ?' वापस लौटती पूनम ने उससे पूछा।

' सोच रहा हूं तुमने किसी को कुछ बताया नहीं, फिर मेरी खबर लीकी आउट कैसे हुई ?'

' मैं क्या बता सकती हूं।'

'तुमने कहां से फोन किया था ?'

' अपने कमरे से।'

'कमरे में कोई था क्या ?'

'नहीं तो। मैं अकेली थी।'

'फोन करते वक्त भी अकेली थी , फिर तो कमाल हो गया लेकिन नहीं।'

'नहीं? '

'टेलीफोन की एक्सटेंशन लाइन ? '

'वह तो है।'

'कौन सुन सकता है उस लाइन पर ?'

'कोई भी...।' पूनम उसे आश्चर्यचकित दृष्टि से निहारती हुई बोली।

' इसका मतलब खबर तुम्हारे घर से ही लीकी हुई थी। यानी मेरा दुश्मन तुम्हारे घर के अन्दर ही है।'

' मेरे घर में ?'

'हां।'
 
' इसका मतलब खबर तुम्हारे घर से ही लीकी हुई थी। यानी मेरा दुश्मन तुम्हारे घर के अन्दर ही है।'

' मेरे घर में ?'

'हां।'

'लेकिन..!'

'छोड़ो...मैं मालूम कर लूंगा।'

'कैसे ?'

'कैसे मालूम की रूगा वह अलग कहानी है। फिलहाल यहां से निकल चलो।'

' मैं तुम्हारे साथ चलूंगी।' ' और तुम्हारी गाड़ी ?' ' उसे ड्राइवर से मंगवा लूंगी।'

'नहीं पूनम , तुम अपनी गाड़ी से ही वापस लौटोगी।'

'मुझे डर लगेगा।'

'डरने की कोई बात नहीं है। तुम्हारे पीछे मैं रहूंगा।'

'नहीं।'

' बिल्कुल मत घबराओ। मैं तुम्हारे साथ साए की तरह रहूंगा। कोई भी खतरा मुझसे मिले बिना किसी भी कीमत पर तुम तक पहुंच नहीं सकेगा।'

पूनम के चेहरे पर भय के चिन्ह फैल गए।

वह अकेली कार ड्राइव करने से डर रही थी,

लेकिन लाम्बा ने उसे किसी तरह पटा लिया।

नजीततन आगे-आगे उसकी कार और उसके पीछे लाम्बा की कार चल पड़ी।

00

'सुनो कोठारी..! ' कोठारी के नेत्रों में झांकता रंजीत लाम्बा घायल सर्प की भांति फु

कारता हुओ बोला- 'मुझे मारने की दूसरी कोशिश की गई है। दूसरी कोशिश! और इस दूसरी कोशिश में भी मैं बच गया।

_' क्या कह रहे हो तुम ? तुम्हें मारने की फिर से कोशिश की गई ' कोठारी ने आश्चर्य से उसकी

ओर देखते हुए कहा।

'हां।'

'कौन था ?'

'बनो मत कोठारी। मैं अच्छी तरह जानता हूं कि यह षड़ यंत्र इसी विला के अन्दर से पनपा है। मुझे मारने की साजिश में तुम इसलिए शामिल हो, क्योंकि यहां का पत्ता भी तुम्हारी इजाजत के बिना नहीं हिलता।'

'गलत...एकदम गलत। तुम मुझ पर आरोप लगा रहे हो।

'आरोप गलत नहीं है। मैं साबित कर सकता हूं कि सब -कुछ तुम्हारा किया-धरा है। '

'की रो साबित।'

'जहां मैं अभी थोड़ी देर पहले पहुंचा था , वहां पहुंचने के लिए मुझे यहां से किसी ने फोन पर बताया था। उसका फो न यहां इस विला में तुम्हारे

अलावा एक्टेशन लाइन पर कोई अन्य सुन नहीं सकता और तुमने मेरे पीछे अपने आदमी भेज दिए। '

'झूठ है। सब झूठ है। न मैंने कोई फोन सुना और ना ही मैंने कोई आदमी भेजा।

'फिर सब-कुछ यूं ही हो गया।'

'तु म पागल हो गए हो। जब मुझे तुम्हारे खिलाफ कुछ करना ही नहीं तो फिर यह सब में क्यों करूगा?"

'अगर तुम नहीं , तो फिर कौन है जो मेरे खिलाफ ऐसा कर रहा है ?'

'अगर मुझे उसके बारे में मालूम होता तो मैं बिना देर किए तुम्हें उसका नाम बता देता।'

'जो भी है , अब आर-पार की लडाई होगी। या तो मेरा दुश्मन ही बाकी रहेगा या फिर मैं।

' इस बात को अपने दिमाग से बिल्कुल निकाल दो कि मैं तुम्हारा दुश्मन हूं या मैं कोई चाल चल रहा हूं। मैं तो तुम्हें देशमुख साहब तक खुद ही लेकर आया हूं ताकि देशमुख साहब की टीम में एक मजबूत आदमी रहे।'

रंजीत लाम्बा को लगा कि कोठारी सच कह रहा था।

वह सोचने लगा , अगर कोठारी सच्चा था तो फिर कौन था जो उसकी जान लेने की कोशिश कर रहा था।

विचारों में उलझा हुआ वह वापस लौट

आया।

उसका दिमाग काम नहीं कर रहा था।

उसने व्हि स्की की बोतल निकली और फिर आउट हाउस के उस भाग को बंद करके जिसमें वह रहता था,

पीने बैठ गया।

उसके पैग तब तक बनते रहे जब तक कि बोतल खाली नहीं हो गई।
 
गहरे नसे में उसे पूनम की याद सताने लगी।

उसने तीन बार फोन पर पूनम से संपर्की बनाना चाहा, लेकिन एक बार भी पूनम नहीं मिली। तीनों बार उसके बूढ़े नौकर ने ही फोन रिसीव किया।

अन्त में झुंझलाकर वह बाहर निकला।

कार उसने तूफानी रफ्तार से दौड़ानी आरंभ कर दी।

नशे की अधिकता मैं उसे कुछ समझ में नहीं आ रहा था, क्या करे क्या न करे?

खुली हवा लगने से नशा और बढ़ गया।

पूरे एक घंटे तक वह ड्राइविंग करता रहा।

फिर उसने एक होटल में डिनर लिया। डिनर के दरमियान उसने होटल के मैनेजर को दो-तीन बार बुलवाया । नशे में वह बार-बार वेटर की शिकायत कर रहा था।

मैनेजर समझदार आदमी था।

आए दिन इस तरह के केसिज से निपटाना उसके अभ्यास में आ चुका था। इसलिए उसने लाम्बा

की नशे में डूबी तमाम परेशानियों को भी दूर कर दिया।

घूमता-फिरता लाम्बारात बहुत देर तक आउट हाउस में वापस लौटा।

उसके लड़खड़ाते हुए कदम बता रहे थे कि वह गहरे नशे में आ चुका है।

आउट हाउस की सीढ़ियों पर उसके पांव दो बार फिसले। एक बार तो वह संभल गया, लेकिन दूसरी बार अपना संतुलन कायम न रख सका।

उसे विला के एक नौकर ने उठने में मदद दी तो उस नौकर को लाम्बा ने भद्दी गालियां देकर भगा दिया।

अपने कमरे तक वह उड़ता हुआ-सा पहुंचा और बैड पर ढेर हो गया।

तमाम दरवाजे खुले पड़े थे।

हमेशा सा वधान रहने वाला बेहद खतरनाकी हत्या रा रंजीत लाम्बा उस समय पूरी तरह असुरक्षित अवस्था में बेसुध पड़ा था।

पूरा आउट हाउस खाली था।

थोड़ी देर बाद वहां उसके खर्राटे गूंजने लगे।

रात धीरे-धीरे गहरी होती जा रही थी।

लम्बा दुनिया से बेखबर पड़ा गहरी नीं द सो रहा था। उसे नहीं मालूम था कि कहां क्या हो रहा

था।

अचानक!

टेलीफोन की घंटी बज उठी।

घंटी बजती रही और लाम्बा मुर्दो से होड़ लगाए सोता रहा। अन्त में टेलीफोन उससे हारकर खामोश हो गया!

उसके कान पर जनतका नरेंगी।

थोड़ी देर बाद टेलीफोन की घंटी ने पु न: चीखना आरंभ कर दिया। घंटी बजते-बजते जब थकी गई तो फिर खामोश हो गई।

उसके खामोश होते ही वहां मौत जैसा सन्नाटा छा गया।

तीसरी बार पुन: टेलीफोन ने शोर मचाया और पहले की अपेक्षा इसबार ज्यादा जल्दी खामोश हो गया।

रात का दूसरा प्रहर आरंभ हो चुका था।

रंजीत लाम्बा बेखबर सो रहा था , ऐसे में आउट हाउस में एक स्याहपोश साए ने कदम रखा।

स्याहपोश बिल्ली जैसी चाल के साथ बिना आहट किए आगे बढ़ रहा था। अपने चारों ओर से सावधान था वह। बार-बार उक्की नजर अपने पीछे

और दाएं-बाएं घूमजाती थी।

__आ उट हाउस के सभी दरवाजे जैसे उसके स्वागत में खुले पड़े थे।

___ अन्त में उसने लाम्बा के कमरे में प्रवेश किया।

लाम्बा के कमरे में कदम रखते ही वह अतिरिक्त सावधान हो गया। उसने बहुत धीरे-से अपने लबादे में हाथ डालकर रामपुरी चाकू निकाल लिया।

चाकू पहले से ही खुला हुआ था।

दाहिने हाथ में चाकू संभालकर वह लाम्बा के बैड के निकट जा पहुंचा।

उस समय उसने अपनी सांस भी रोकी हुई थी ताकि किसी प्रकार की आहट न हो। वह झुका। उसने करीब से लाम्बा को देखा। तत्पश्चात् उसका चाकू वाला हाथ ऊपर उठने लगा।

अभी वह रंजीत लाम्बा पर चाकू का प्रहार कर ने ही वाला था कि अचानकी ही लाम्बा की टांग चली। विद्युत गति से टांग स्याहपोश के पेट से टकराई

और वह उछलकर दूर जा गिरा।'

लाम्बा फुर्ती से उठा।

स्याहपोश भी कम फुर्तीला नहीं था। वह चटकने वाले सांप की भांति उछला।

लाम्बा ने बचाव करना चाहा मगर बचते-बचाते भी चाकू उसके कंधे में घाव कर ही

गया।

खून तेजी से बह निकला। पीड़ा के कारण उसके दांत भिंच गए।

उसे पीछे हट जाना पड़ा।

पीछे हटने के बाद उसने स्याहपोश पर नजर डाली। तब पता चुला कि आक्रमणकारी ए की आंख वाला व्यक्ति है।

उसे लगा कि वह इस स्याहपोश को पहले कहीं देख चुका है, लेकिन उस समय उसे याद नहीं

आ रहा था।

उसके पास याद की रने के लिए समय भी नहीं था। उसने फुर्ती से पीठ वाले होलस्टर से रिवाल्वर खींच निकाला।

फायर होने से पूर्व स्याहपोश खिड़की से

बाहर छलांग लगा चुका था।

उसकी फुर्ती देखने योग्य थी।

लाम्बा को उस एक आंख वाले से इस प्रकार की फुर्ती की आशा नहीं थी। वह गोली को छकाता हुआ बाहर निकल गया।

लाम्बात जी से खिडकी की दिशा में लपका।

उस ने खिडकी से बाहर झांकते ही दूसरा फायर किया, मगर स्याहपोश कहीं अधिकी फुर्ती से अंधेरे का लाभ उठाकर बिल्डिंग के बाई ओर को निकल गया।

जब तक बायीं ओर को लाम्बा पलटकर देखता तब तक स्याहपोश गायब हो चुका था ।

लाम्बा ने बाहर को दौड लगाई।

विला के गार्ड फायरों के धमाके सुनकर भागे-भागे उस तरफ को पहुंचे।

'क्या हुआ ?' लाम्बा को रिवाल्वर लिए घायल अवस्था में देखकर एक गार्ड ने उससे पूछा।

__'कोई उस तरफ गया है, जल्दी देखो। ' लाम्बा ने

पीड़ित स्वर में उसे आदेशित किया।

वह गार्ड गन संभालता हुआ तुरन्त सांकेतिकी दिशा में दौड़ गया।

शेष गार्डों को उसने अलग-अलग स्याहपोश को तलाश में भेज दिया।

इसी बीच!

कोठारी और जोजफ दौड़े-दौड़े उसके पास आपहुंचे। उसे घायल देख कोठारी ने तुरन्त डाक्टर को फोन कर दिया।'

जोजफ उसे सहारा देकर अन्दर ले आया।

चाकू का घाव हालांकि ग हरा नहीं था मगर खू न बहुत तेजी से बह रहा था।

लाम्बा के कपड़े गीले हो गए थे।

शीघ्र ही डाक्टर आ गया।

मरहम-पट्टी के बाद उसे नींद आ गई। डाक्टर ने शायद नींद वाली दवा दे दी थी। वह सो गया। उसके सोने के बाद कोठारी ने आउट हाउस में तीन गाड़ी का विशेष रूप से पहरा लगा। उसे डर था कि कहीं लाम्बा के दुश्मन पुन : उस पर अटैकी न कर दें।

रात सुकून से गुजर गई। दूसरे दिन नाश्ते पर कोठारी उसके पास

आया।

। अब कैसे हो?' उसने लाम्बा से पूछां।

'ठीकी हूं।'

'दर्द...?'

.

.

.

'मा मूली-सा है।'

'कमजोरी ?'

'कमजोरी लग रही है लेकिन कोई खास नहीं। डाक्टर ताकत का इंजेक्श न दे गया है। '

'कौन था ?'

'कौन?'

'वही जिसने तुम्हारे जैसे आदमी को घायल कर दिया। जो अकेला दास पर भारी होता हो, उसे घायल करके निकल जाना बड़ी बात है।'

' वह वक्ती तौर पर ही मेरी पकड़ से बचा हुआ है। जल्दी ही मैं उस तक पहुंच जाऊंगा।'

'या नी तुम उसे जानते हो?'

'नहीं।'

'तो फिर?'

' उम्मीद है उस तक पहुंच जाऊंगा।'

'कैसे?'

'वो तब ही बताऊंगा जब उस तक पहुंच जाऊंगा।'

' इसका मतलब है तुम्हें अपने दुश्मन का आइडिया मिल चुका है ? '

' अभी नहीं।'

' फिर ? '

' मैंने उसे कल ही दबोच लिया होता। शराब पीकर नाटकी करते हुए मैंने यह जाहिर कर दिया था कि मैं पूरी तरह असावधान हूं। तब उसने यही समझा कि मैं घोड़े बेचकर सो रहा हू जबकि हकीकतन मैं पूरे होश में था।'

' फिर चोट कैसे खा गए ? '

'वह हरामजादा कुछ ज्यादा ही फुर्तीला साबित हुआ।'

'आई सी।'

'मैंने ऐसा नहीं समझा था उसे। लेकिन कोई बात नहीं...| ' दांत पीसते लाम्बा ने होंठों ही होंठों में गाली देते हुए कहा- एक ही झटके में सारी फुर्ती

खत्म कर दूंगा।'

' उसके बारे में तुम मुझसे छिपा रहे हो लाम्बा ?'

'नहीं...छिपा नहीं रहो। अभी उसके बारे में मैंने खुद भी जानकारी हासिल करनी है। अभी मैं

स्वयं भी अज्ञान के अंधेरे में घिरा हुआ हूं।'

'ठीकी है। मुझसे तुम्हें जो भी मदद चाहिए हो , बता देना।'

'ओ० के०।'

'चलता हूं।

इतना कहकर कोठारी वहां से निकल गया।

00

किसी छापामार कमाण्डो की जैसी तैयारी करने के बाद रंजीत लाम्बा अपनी विशेष कार में बाहर निकला। सामान्य गति से कार ने विला का ड्राइव-वे पार किया और सड़की पर पहुंचने के बाद उसकी रफ्तार में अपेक्षाकृत तेजी आ गई।

सुलगी हुई सिगरेट उसके होंठों के बीच दबी थी। उसके दोनों हाथ सहज ही कार के स्टेयरिंग व्ही ल को दाएं-बाएं घुमा रहे थे।

कार कभी इस सड़की पर तो कभी उस सड़की पर दौड़ती हुई अन्त में एक ढाबे प्रकार के होटल पर जा खड़ी हुई।

कार का इंजन बंद हो गया।

अन्दर बैठे-बैठे ही उसने वहां का जायजा

लिया।

काउंटर पर एक मोटा-सा व्यक्ति दरियाई घोड़े की भांति पसरा दिखाई दिया।

मोटा उसकी कार की ओर गौर से देख रहा था। उसे कार वाले ग्राहकी से मोटा माल हाथ आता नजर आ रहा था।

थोड़ी देर बाद लाम्बा ने सिगरेट का टुकड़ा खिड़की से बाहर उछाल दिया। फिर दरवाजा खोलकर खुद भी कार से बाहर निकल आया।

उसने काली पैंट, काली शर्ट और काला ही ओवरकोट पहना हुआ था जो कि घुटनों से नीचे तक लम्बा था। उसके कॉलर खड़े थे, सिर पर फैल्ट हैट

थी।
 
रात होते हुए भी उसने फेन्ट म स्टाइल का काला चश्मा लगाया हुआ था। बह अच्छी तरह समझ रहा था कि तहमद वाला उसे गौर से देख रहा है, लेकिन उसने उसकी ओर ध्यान देने की कोई कोशिश नहीं की।

वह लापरवाही वाले अंदाज में चलता हुआ काउंटर की ओर बढ़ने लगा।

'जब बार होता हूं तू ?' काउंटर से टेकी लगाकर सड़की की ओर देखता हुआ वह सहज स्वर में तहमद वाले से बोला।

'हो...होता हूं। ' तहमद वाला गुर्राया।

___ 'नीचे सुर में वरना यहां पुलिस ही पुलिस नजर आने लगेगी और तेरा शराब का दो नम्बर का धंधा एक मिनट में ठप्प हो जाएगा।'

'पुलिस..| ' कथित ज ब बार सहम गया।

'हां...पुलिस।'

'तुम कौन हो ?' उसने संदिग्ध स्वर में पूछा।

'तेरा बाप।'

'ऐ. ..जुबान संभाले के बोल। '

लाम्बा फुर्ती से उछलकर काउंटर के पीछे जा पहुंचा और काउंटर की ओट में पिस्तौल निकालकर उसे ज ब् बार की ओर तान दिया।

'खबरदा र हरामजादे... अगर बकवास करेगा तो भेजा बाहर निकाल दूंगा! ' लाम्बा ने भद्दी-सी गाली दी।

पिस्तौल देखते ही ज ब्बार डर गया।

वह समझ रहा था कि सामने वाला कोरी धमकी नहीं दे रहा , जो कह रहा है उसे कर गुजरने में शायद उसे किसी प्रकार की देर न लगे।

तमाम तरह के मुजरिमों में उसकी आज तक की जिन्दगी गुजरी थी, लेकिन लाम्बा जैसा खतरनाकी आदमी वह पहली बार ही देख रहा था।

' की ... की ... क्या चाहिए ?' उसने कम्पित स्वर में पूछा।

"एक आंख वाला तेरा चेला।'

'एक आंख वाला. ..। ' वह असमंजस में फंसा दिखाई दिया।

' बनने की कोशिश मत कर...। ' लाम्बा ने पुन: खतरनाकी अंदाज में उसे गाली देते हुए कहा-'अगर मुझसे उड़ने की कोशिश की तो इस नन्ही-सी गन की सारी की सारी गोलियां तेरी तोंद में उतार दूंगा।'

जब्बार को अपनी सांस रुकती हुई-सी प्रतीत

हुई।

'दलपत से कोई काम है क्या ?' उसने सहमे हुए स्वर में पूछा।

' दलपत नाम है उस...का ?' लाम्बा ने गाली देते हुए कहा।

'हां।'

'कहा है वह कुत्ता ?' 'वह...। ' ज ब् बार हिचकिचाया।

' बता हरामखोर वरना अभी ट्रेगर दबाकर तेरा तरबूज फाड़ दूंगा! ' लाम्बा ने उसके फुटबाल जैसे आकार में फूले पेट से पिस्तौल की नाल सटाते हुए खतरनाकी स्वर में धमकी दी।

' वह. .वहमिल जाएगा। ' ज ब बार मुश्किल से थूकी गटकता हुआ बोला ।

'मिल जाएगा नहीं...मुझे उसका पता फौरन चाहिए।'

'देखो बाबू बात को समझने की कोशिश कैसे। अभी अगर मैं तुम्हें उसका कोई पता बता दूं

और वह तुम्हें वहां न मिले तो तुम मुझे झूठा ठहराकर मेरी गर्दन पकड़ोगे।'

'अगर तुम मुझे कोई गलत पता बताओगे तो जिन्दा नहीं बचोगे।'

' इसीलिए मुझे पहले उसका पता लगा लेने

दो।'

'कैसे पता लगाएगा?'

'किसी को भेजना पड़ेगा।'

' नहीं चलेगा।'

' तो फिर?'

'तुझे मेरे साथ चलना होगा।'

'लेकिन ढाबा ?'

'ढा बा अपने-आप चलता रहेगा। मैं पिस्तौल जेब में ले जा रहा हूं लेकिन जेब के अंदर से भी यह तेरा काम तमाम करने के लिए चल सकती है। चल उठ! ' लाम्बा हिंसकी स्वर में फुफकारा।

__ ' अरे चा कू ...इधर आके बैठ... मैं बाबू के काम से जा रहा हूं।' ज ब बार ने ढाबे में काम करते एक छोकरे को आवाज देते हुए आदेश दिया।

गल्ले में जो माल था, उसे निकालकर अंटी में खुरसा और कुर्ता उठाकर जल्दी से पहनता हुआ वह तेज कदमों से लाम्बा के साथ चलने का प्रयास करने लगा।
 
लाम्बा उस पर बराबर नजर रखे हुए था।

उसका इरादा साफ था कि ज ब बार द्वारा किसी भी प्रकार का गलत इशारा किया जाए और

अगले ही पल वह ट्रेगर दबा दे।

लेकिन जब बार ने इस प्रकार का कोई इ शारा नहीं किया। चुपचाप लाम्बा की कार के निकट जा खड़ा हुआ।

उसने सवालिया नजर से लाम्बा की ओर देखा।

' आगे बैठ ! ' उसके आशय को समझते हुए लाम्बा ने आगे वाली सीट पर बैठने का आदेश दे

दिया।

वह आगे बाली सीट पर बैठ ... गया।

उसके बराबर में बैठकर लाम्बा ने पुन: कार ड्राइव- करनी आरंभ कर दी।

'किधर...?' सड़की पर सीधे ड्रा इव करते हुए उसने ज ब बार से पूछा।

'अभी सीधे ही चलते रहो बाबू। ' ज ब्बार ने सहमे हुए स्वर में कहा- ' वक्त आने पर मैं बता दूंगा किधर चलना है।'

लाम्बा ने उसे घूरकर देखा , बोला कुछ नहीं।

कार सड़की पर दौड़ती रही।

आगे चलने पर ज ब बार उसे समय - समय पर मार्ग निर्देशन देता रहा।

घनी-सी गंदी बस्ती में पहुंचकर उसने कार रुकना दी।

'यहां रहता है दलपत ?' लाम्बा उसकी ओर देखता हुआ गुर्राया।

'यहां से पता चल जाएगा...मैं पता लगाकर आऊंज ब्बार ने शंकित स्वर में पूछा।

'नहीं। मैं तेरे साथ चलूंगा।'

'चलो।'

'पेशगी वार्निग सुन ले। तेरी तरफ से छो टी-सी भी हरकत हुई तो तुझे बख्शृंगा नहीं। अपनी परवाह नहीं मुझे, लेकिन कुछ भी होने से पहले तुझे उड़ाकर तेरा बैंड जरूर बजा दूंगा। '

धमकी सुनने के बाद जब्बार वहां से चल पड़ा।

लाम्बा उसके साथ हो लिया।

उस घनी बस्ती में जब बार एक चाल प्रकार की जगह पर पहुंचा। चाल के दूसरे मा ले की एक खोली तक पहुंचने में उसे कितने ही परिवारों के बीच से होकर गुजरना पड़ा था।

वहां के अधिकतर रहने वाले अपने-आपमें व्यस्त थे।

कुछेकी नजरें ही जब्बार की ओर उठी थी।

उसके पीछे चलते रंजीत लाम्बा को अधिकतर लोगों ने देखा था ।

खो ली के दरवाजे पर झूलते ताले को देख जब्बार परेशान हो उठा।

' ऐई झगडू. . .! ' उसने बराबर वाली खोली के दरवाजे पर बैठे बूढ़े को पुकारते हुए पूछा- ' दलपत को देखा क्या...?'

'नहीं देखा। ' बूढ़ा बेरुखे स्वर में बोला।

'क्या हुआ ?' लाम्बा ने जब्बार को घूरते हुए पूछा।

'इधर नहीं है।'

'देख जब्बार , मैं तुझे पहले ही वार्निग दे चुका हूं।'

'बाबू तुम्हें दलपत चाहिए ना ?'

'हां।'

'मिल जाएगा...आजाओ।'

लाम्बा उसके पीछे चल पड़ा। वह वापस कार में आ बैठा। उसके संकेत पर लाम्बा ने कार वहां से

आगे बढ़ा दी।

___ 'बाबू...। ' थोड़ी देर की खामोशी के बाद ज ब्बार बोला- आप दलपत को क्यों तलाश कर रहे हैं

'काम है। '

'क्या काम है?'

'तुझे क्या करना है ?' लाम्बा के माथे पर बल पड़ गए।

'यूं ही जानना चाहता था।'

'उस से मिलवा दे बाद में अपने आपे तुझे सब-कु छ मालूम हो जाएगा।'

_ 'बाबू, वह लड़का बुरा नहीं है। अगर कोई ऊंच-नीच हो गई हो तो मैं उसकी तरफ से माफी मांगता हूं। माफी दे दो उसे, आईदा वह उस गलती को नहीं दोहराएगा।'

'तू चुप कर हरामजादे और तुझसे जो कुछ कहा गया है सिर्फ वही कर!'

लम्बा ने आखें तरेरी।

जब्बार डरकर खामोश हो गया। फिर वहमूकी रहकर सिर्फ उंगली के संकेत मात्र से लाम्बा

को मार्ग बताता रहा।

कार दौड़ती रही।

00

जब कार आबादी छोड़कर बाहर के मार्ग से निकली , तब लाम्बा कुछ चौंका। लेकिन जब जब बार ने उससे कार एक कच्चे ऊबड़-खाबड़ मार्ग पर मुड़ वाई तब उससे चुपरहा नहीं गया।

'क्या वह एक आंख वाला बदमाश इस जंगल में रहता है ?' उसने शंकित स्वर में जब बार से

पूछा।

'बा बू आप चलते रहें। मैं आपको गलत जगह नहीं ले जा रहा। ' ज ब बार ने भारी स्वर में कहा।

'तू समझता है यह सही जगह है ?' 'जैसी भी जगह है , दलपत जहां पाया जाता है मैं आपको वहीं लिए बल रहा हूं।'

'अगर वह वहां नहीं मिला तो?

'वह उस जगह के अलावा और कहीं नहीं हो सकता।'

'हूं... | ' लम्बी हुंकार भरते हुए लाम्बा ने उसे घूरकर देखा।

फिर कार ऊंचे-नीचे सर्पाकार मार्ग पर धीमी गति से चलती रही।

अन्त में वहमार्ग भी समाप्त हो गया।

कार से निकलकर जब्बार पैदल चलने लगा। आगे घनी झाड़िया थी। कोई रास्ता नहीं था। लाम्बा उसका अनुसरण करता उसके पीछे चलता रहा।

फिर- घने वृक्षों के घेरे में छिपी एक ऐसी जगह आयी जहां कुछ लोग का म कर रहे थे। दो बड़े अलाव जल रहे थे। बड़े-बड़े ड्रम रखे हुए थे।

और कच्ची शराब की दुर्गन्ध से पूरा वातावरण भरा हुआ था।

एक नजर में लाम्बा ने शराब की कच्ची भट्टी को पहचान लिया।

' तो यहां बनाता है तू कच्ची शराब ?' उसने जेब से पिस्तौल निकालते हुए कहा।

'कच्ची शराब को छोड़ो बाबू ... दलपत को देखो।'

'कहां है?'

'यही कहीं होगा ..ऐ छलिया! दलपत कहां है ?' वह एक आदमी को संबोधित करता हुआ ऊंचे स्वर में बोला।

'अभी तो इधर ही थे। ' कथित छलिया बोला।

'ढूंढ के ला उसे। शहर का बाबू आया है। '

'अभी बुलाता हूं।'

इतना कहकर छलिया बड़े पत्थर की ओट में

चला गया।

लाम्बा पूरी तरह सावधान था।

एक आंख वाले दलपत की तलाश में उसकी नजरें चारों ओर घूम रही थीं, लेकिन दलपत कहीं भी नजर नहीं आ रहा था।

जब बार उसकी ओर देखे बिना निरंतर आगे की ओर बढ़ता चला जा रहा था।

लाम्बा की नजरें कभी ज ब बार की ओर घूमती तो कमी दलपत की तलाश में।

तभी!

अचानकी ही बड़े पत्थर की ओट से दलपत हाथ में गन लिए प्रकट हुआ।

'मेरी तलाश में यहां तक आ गए...चलो अच्छा हुआ। तुम्हारी सुपारी ली थी , वह काम अब पूरा हो जाएगा। मैं जिसके नाम की सुपारी लेता हूं उसे मरना तो पड़ता ही है। ' वह अपनी एक आंख से लाम्बा को घूरता हुआ बोला।।

पिस्तौल लाम्बा के हाथ में थी लेकिन हालात बदल चुके थे।
 
जब्बार ने एकाएक ही दौड़ लगा दी।

इधर वह दौड़ा , उधर दलपत काने की गन के दहाने ने आग उगली।

रंजीत लाम्बा को अपना बचाव करना मुश्किल दिखाई देने लगा। उसने बिना लक्ष्य के फायर झोंकते हुए दायीं ओर को छलांग लगा दी।

दलपत काने की गन से निकलने वाली गोली उसके कान के पास से होकर गई थी।

बाल-बाल बचा था वह।

नीचे गिरते ही वह अंधाधुंध फायर करता लुढ़कता चला गया।

गोलियों की बौछार तीन तरफ से हुई।

उसने लुढ़कना जारी रखा।

अन्तत: वह एक मोटे- ताने वाले पेड़ की ओट में जा पहुंचा।

ओट में पहुंचते ही उसने पूरी पिस्तौल दल पत काने की दिशा में खाली कर दी। पिस्तौल खाली होते ही उसने ओवरकोट की विभिन्न जेबों से दस्ती बम निकालकर फेंकने आरंभ कर दिए।

विध्वंसकी विस्फोर्ट यहां-वहां होने आरंभ हो

गए।

विस्फोट के साथ ही धूल और धुएं का बंवडर ऊपर उठता। तत्पश्चात् धुआं ही धुवां चारों ओर फैल

जाता।

वहां मौजूद व्यक्ति विस्फोटों के उस तां ते में इधर सेर उधर भागने में भी बच न सके। आधे-अधूरे विस्फोटों के लपेटे में आ ही गए।

कुछेकी ने गोलीबारी करनी चाही किन्तु शीघ्र ही उनके कदम उखड़ गए।

लाम्बा फुर्ती से अपना स्थान बदलकर दूसरी दिशा में पहुंचा। इसी बीच उसने अपनी पिस्तौल लोड

करके जेब में पहुंचा दी और फिर ओवरकोट के

अन्दर से एक विशेष गन के तीन पार्ट निकालकर जोड़ डाले।

अब एक खतरनाकी गन उसके हाथ में थी।

वह धूल और धुएं के कणों के बीच इधर-उधर भागते आदमियों को देखते हुआ बड़ा चक्कर लगाकर उसबड़े पत्थर के पीछे जा पहुंचा जिसके पीछे दलपत काने ने शरण प्राप्त की हुई थी।

दलपत काना पत्थर के ऊपर चढ़ने का प्रयत्न कर रहा था।

गन उसके हाथ में थी। पत्थर चिकना था और पिछले भाग से उस पर चढ़ना एक कठिन कार्य था।

बीच में पहुंचकर- दलपत काना फिसलने लगा।

लाम्बा ने गौर से देखा।

एक दस्ती बम निकालकर बीच मैदान की ओर उछाला।

दस्ती बम के विस्फोट के साथ ही बीच में फंसा दलपत काना घबरा गया।

उसी क्ष ण लाम्बा ने गन उसकी दिशा में करके फायर खोल दिए।

तड़तड़ाहट उत्पन्न करती गोलियां पत्थर से चिपके दलपत काने के इर्द-गिर्द टकराती चली गई।

दलपत काने के हाथ-पांव फूल गए।

ग न उसके हाथ से निकल गई और वह पत्थर

फिसलकर निचे आ गिरा। गोलियां उसे लग नहीं रही

थीं लेकिन आसपास टकरा रही थीं।

नीचे गिरकर वह किसी चोट खाए सांप की तरह अपने आपमें सिमटकर गठरी जैसी शक्ल में आ

गय।

हर गोली के टकराने पर उसका जिस्म इस प्रकार झटका खा जाता था जैसे कि घायल सांप को किसी नुकीली वस्तु से कोच दिया गया हो।

लाम्बा ने गोली चलाना बंद करके मैदान की ओर देखा।

मैदान में धुएं और मलबे के गुब्बार उड़ रहे थे। वहां काम करने वाले आदमियों का दूर-दूर तक पता नहीं था।

लाम्बा कुछ दस्ती बम और फेंकना चाहता था लेकिन वहां के हालात देख उसने, अपना वह इरादा बदल दिया।

वह दलपत काले की ओर बढ़ा ।

उसने द लपत की पसलियों में बूट की ठोकर

मारी।

वह उछलकर पत्थर से जा टकराया और कराहता हुआपलटा।

रंजीत लाम्बा को देख उसके हाथ-पांव फूल गए। वह जानता था कि लाम्बा उसे बख्शने वाला नहीं

'दलपत काने ! ' लाम्बा हिंसकी स्वर में गुर्राया।

काने ने दोनों हाथ जोड़ दिए।

वक्त बदल चुका था और बदलते वक्त के साथ उसने फुर्ती से अपने-आपको बदल डाला।

'मुझे माफ कर दो। मैं ...मैं माफी चाहता हूं। 'वह गिड़गिड़ा उठा।

'तेरा दिया हुआ जख्म अभी-भी ताजा है काने !' लाम्बा ने दांत पीसते हुए कहा।

' मैं... मैं मजबूर था।'

.

.

.

'मजबूर...।'

'हॉ...मुझ पर दबाव डाला गया था।'

' मेरा खून करने का ?'

' हां।'

' किसने-दबाव डाला था ?'

' उसबात को न पूछे आप- जामे दें।'

लाम्बा ने उसके पेट में गन का बट मारा।

उसके मुख से पीड़ा युक्त कराह निकली और वह आगे को झकी आया। अगले ही क्षण लाम्बा के घुटने के शाक्तिशाली प्रहार ने उसका जबड़ा एक

ओर को लटका दिया।

उसके दो-एक दांत भी टूट गए थे।

हांफते-कांपते उसने ढेर सारा खून थूकी दिया। बहुत बुरी हालत हो रही थी उसकी।

लाम्बा ने गन बेल्ट के हुकी में फंसाकर बाएं हाथ से दलपत काने की गर्दन थामी और एक तेज

झटके के साथ उसे विशाल चट्टानी पत्थर से चिपका दिया।

अगले ही क्षण वह दाहिने हाथ के चार-पांच चूंसे काने के पेट में उतार चुका था।
 
' बता हरामजादे! बता! ' लाम्बा फुफकारता हुआ-सा गुर्राया- 'कौन था वह पो मुझे तेरे हाथों खत्म करा देना चाहता था ? कौन था ? बता ?'

उसने ज्यों ही काने के चेहरे की ओर मुक्का ताना , काने मे तुरंत अपने कंपकंपाते हुए दोनों हाथ आगे कर दिए।

वह समर्पण की मुद्रा में था।

लाम्बा ने अपना तना हुआ हाथ रोकी लिया।

'ब ... ब ... बताता हूं...ब ताता हूं। ' दलपत का ना द्रवित स्वर में बोला।

'जल्दी !'

.

.

.

'म ... म...मुझे पीटर ने तुम्हारे नाम की सुपारी दी थी।'

'जार्ज पीटर ने ?' लाम्बा के माथे पर बल पड़ गए। उसने दांत पीसते हुए पूछा।

'हां।'

__ 'वही जार्ज पीटर न जिसकी अण्डरवर्ल्ड में तूती बोलती है ?'

'हां...वहीं।' 'तूने इतनी हिम्मत की कैसे ?' ' वह कुछ न बोला। 'तू जानता है मैं कौन हूं?

'नहीं।'

'तू सुपारी लेता है ना ?'

'हा।'

' हत्या की सुपारी ?'

' हां।'

'इस सुपारी वाले धंधे में वो कौन है जिसका नाम लिस्ट में टॉप पर आता?' 'रंजीत...।'

'सिर्फ जीत ?'

'रंजित लाम्बा।'

' उससे वाकिफ है ?'

दलपत काने ने इंकार में सिर हिलाया।

' उससे और मुझसे दोनों से नावाकिफ है। बड़ा कच्चा काम करता है तू।'

उसने नजरें झुका लीं।

'जिसके नाम की सुपारी ले , उसका पतालांगना जरूरी होता है। यूं ही सुपारी लेने वाला अक्सर चोट खा जाया करता है। खा जाता है ना?'

वह चौंका।

' जो सुपारी लेने में सबसे आगे है , जिसका नाम तू खुद ले रहा है, तूने उसी की सुपारी ले ली। '

'क्या ?'

'मुझे जानता नहीं और सुपारी ले ली। मैं ही रंजीत लाम्बा है ...रंजीत लाम्बा !'

'नहीं! ' काने के नेत्र विस्मय से फट पड़े।

'तेरे लिए मौत के अलावा कोई दूसरी सजा नहीं। ' लाम्बा ने गन की बैरल उसके सीने पर टिका दी।

वह तुरन्त लाम्बा के कदमों में गिर पड़ा। 'नहीं...। ' उसने गिड़गिड़ाते हुए याचना की

.

.

.

'मुझे माफ कर दो मेरे बाप। मेरी आंखों पर मोटी रकम की पट्टी बांध दी गई थी। उस मोटी रकम की वजह से मेरा दिमाग कुन्द हो गया था। मैं बिना

आगा-पीछा सोचे अपनी मौत को चैलेंज देने निकली पड़ा था। मुझे क्षमा करा दो.. .मुझसे गलती हो गई है।

वह लाम्बा के की दमों में नाकी रगड़ने लगा तो लाम्बा ने गन हटा ली।

'जार्ज पीटर से कहां मिला था तू ?'

'आप चलें मेरे साथ , मैं बताता हूं।'

'चल।'

दलपत काना तुरन्त उठ खड़ा हुआ। उस समय उसे अपके बहते खून की चिन्ता नहीं थी। वह

चुपचाप वहां से लाम्बा को साथ लेकर चल पड़ा।

00

दलपत काना खस्ता हालत होते हुए भी रंजीत लाम्बा को पूरी तरह सहयोग कर रहा था। उसने पहले जार्ज पीटर की तलाश में दो होटल छाने, उसके बाद तीसरी जगह के लिए चल पड़ा।

कार वह स्वयं ही ड्राइव करता था। '

लाम्बा ने महज उसके बराबर मे पिस्तौल निकालकर बैठे रहना होता था।

अभी तक उसने किसी भी प्रकार की गलत हरकत नहीं की थी।

वह तन-मन से लाम्बा की खिदमत में लगा हुआ था।

इसबार खीझकर उसने कार की रफ़्तार बढ़ा

दी थी।

'काने !' सिगरेट सुलगाता लाम्बा फुफकारा - पीटर ...पीटर है। अण्डरवर्ल्ड का पत्ता अगर उसके इशारे के बिना हिलता नहीं तो यह भी सच ही होगा कि उसका कोई एक ठिकाना नहीं। तू बेकार ही झुंझलाकर कार की रफ्तार बढ़ा रहा है।'

'माई-बाप , मैं उसको कहीं से भी खोज निकालूंगा। कही से भी। ' काना क्रोध प्रकट करता हुआ बोला।

'रफ्तार कम कर, नहीं तो गाड़ी ठोंकी देगा कहीं !'

लाम्बा की डांट सुनकर दलपत काने ने तुरन्त ही कारं की रफ्तार घटा दी।

'एक सिगरेट मिलेगी मालिको ?' कुछ देर बाद उसने डरते-डरते पूछा।

'साले मांगते भीख हैं और शौकी नवाबों के। 'बड़बड़ाते हुए लाम्बा ने सिगरेट का पैकेट निकालकर एक सिगरेट उसके हवाले कर दी।

'कुछ कहा क्या आपने ?'

कुछ नहीं...सिर्फ इतना कि मैं आपके लिए ही सिगरेट का पैकेट खरीदकर लाया था। मुझे मालूम था कि बन्दापरवर को अभी सिगरेट की तलब लगने वाली है।'

खीसें निपोरते दलपत का ने ने सिगरेट ले ली।

वह चूंकि कार ड्राइव कर रहा था , इसलिए उसकी सिगरेट सुलगाने का काम लाम्बा को ही करना पड़ा।

फिर दलपत काना ड्राइविंग के साथ-साथ सिगरेट के कश भी लगाने लगा।

कार मध्यम गति से सड़की पर दौड़ी चली जा रही थी।

कुछ देर बाद उसने कार मुख्य सड़की से हटकर कोठियों की लाइन के पीछे वाली पतुली-सी गली में मोड़ दी।

गली वीरान थी।

दिन में उसका प्रयोग होता था , रात में यदा-कदा ही कोई उस तरफ से निकलता था।

वही स्थिति उस समय भी थी।

एक अंधेरे भाग में कार रोकने के बाद काना कार से बाहर निकल आया।

कहां ले आया ?' दूसरी ओर वाले दरवाजे से बाहर निकलते लाम्बा ने उससे पूछा।

'पीटर के असली ठिकाने पर मालिको। जब बह किधर भी नहीं मिलता त ब अपने इसी ठिकाने पर मिलता है। ' दलपत काना सामने वाली दिशा में एक को ठीकी ओर उंगली उठाता हुआ बोला- ' वह जो कोठी नजर आ रही है न...बस उसी कोठी में इस वक्त वह होगा।'

'और न हुआ तो?'

' सवा ल ही नहीं उठता। वह शर्तिया वहीं होगा।'

'चल देख चलके।'

'सावधान रहना।'

'क्यों?'

' क्यों कि इधर उसके सुरक्षा गार्ड हमेशा पहरा देते रहते हैं।'

__ ' आई सी।'

'आपको पहले ही सावधान कर दिया है ताकि बाद में आप यह न कहें कि मैंने बताया नहीं। '

'ठीकी है...तू आगे-आगे चल। ' 'आप साथ नहीं चलेंगे माई-बाप ?'

'तू चल ना!' दलपत काना आगे-आगे चलने लगा।

लाम्बा उसके पीछे था।

उसने सिगरेट फेंकी दी थी और अब वह पूरी तरह से सावधान हो गया था। उसे मालूम था , जार्ज पीटर कितना खतरनाकी था।

अण्डरवर्ल्ड का एक अहम मोहरा होता था

वह।

उस तक आम आदमी की पहुंच नहीं थी।
 
दलपत काना उसे उस कोठी के पिछले भाग तक ले आया। कोठीकी पिछली बाउंड्री वॉल कम ऊंची नहीं थी। उसबाउंड्री बॉल में एक छोटा-सा

दरवाजा था।

उन दोनों ने अच्छी तरह ठोंक-बजाकर देख लिया।

कोठी में कहीं से भी दाखिल होने की कोई जगह नजर नहीं आ रही थी। अलबत्ता दूसरी तरफ से डॉ वरन कुत्तों की खौफनाकी गुर्राहट जरूर सुनाई दे गई थी।

'तू मुझे गलत रास्ते पर ले आया है।' लाम्बा विचारपूर्ण स्वर में बोला।

'क्यों? '

' इसलिए कि पहले तो यह ऊंची बाउंड्री वॉल पार नहीं होनी और अगर किसी तरह हम बाउंड्री बाल पार करके उस तरफ पहुंच भी गए तो खतरनाकी कुत्ते हमारी बोटियां नोच ले जाएंगे।'

'हां...कुत्ते तो हैं।' ' इधर से चल।'

'कहां माई-बाप?'

'चल, फिर बता ता हूं।'

दलपत काना उसके साथ वापस कार की

ओर चल पड़ा।

'तुझे सीधे रास्ते यानी मेनगेट से होकर जार्ज के पास जाना होगा।'

वह चौंका।

उसके चेहरे पर हैरत के चिन्ह गहराते चले गए। फटी-फटी आंखों से वह लाम्बा की ओर ताकने लगा।

'हां...मैं ठीकी कह रहा हूं।'

' क्या ठीकी कह रहे हैं आप मालिको? मैं मेनगेट से जाऊंगा तो लफड़ा नहीं हो जाएगा?'

'दलपत!'

'मालिकी?'

'तू सुपारी वाला हत्यारा है न ?

'अब कहां माई-बाप। काहे को बेकार ही शर्मिन्दा कर रहे हैं ?'

' अबे बात को समझ।'

'स मझाओ मालिक।' 'तू हुत्यारा है न ? किराए का हत्यारा ?'

'ठीक...।'

'तुझे मेरी हत्या का काम दिया गया था न ?'

' हां ...दिया गया था।' 'तो फिर तू यहमान ले कि तूने मेरी हत्या कर

दी।।

'माई-बाप..!'

'अब क्या है?'

'सीधे-सीधे समझाएंगे मे जल्दी समझ में आजाएगा और अगर नाकी को घुमाकर पकड़ेंगे, तब हो सकता है नाकी ही पकड़ में न जाए। '

'सब समझ में आजाएगा। देख...जैसा मैं कहता जा रहा हूं तू कुरता जा। '

' को ई गड़बड़ तो नहीं होगी ?' 'हो सकती है।

'फिर तो रहने ही दें।'

' क्यों ?' _ 'क्योंकि अगर किसी तरह की ग़ड़ बड़ हो गई तो पीटर जल्लाद आदमी है , मेरे टुकड़े-टुकड़े करवा डालेगा। अभी आप उसे जानते नहीं है। वो बहुत जालिम है।'

_ 'मैं तेरे टुकड़े यहीं...इसी वक्त कर दूंगा ! ' एकाएक ही रंजीत लाम्बा ने तेवर बदलते हुए कहा।

उसकी आँखें देखकर दलपत काना डर गया

'नंही माई-बाप-नहीं। ऐसा कुछ भी नहीं करना । आप जो भी कहेंगे, मैं करूंगा।'

' तो फिर सुन..।'

दलपत काना उरसकी , बात सुनने के लिए उसके निकट खिसकी गया।

00

जार्ज पीटर चालीस के पेटे में पहुंचा , गहरे काले रंग का छोटे कद वाला मजबूत आदमी था। जिसकी नाकी चौड़ी , होंठ मोटे और आँखें चमकीली थीं।

उस समाय वह अपने हरम में चार निर्वसुन सुन्दरियों के साथ मौज-मस्ती में डूबा हुआ था। कोई सुन्दरी उसके लिए साकी बनी थी तो कोई उसके लिए सूखे मेवे पेश कर रही थी। को ई उसके अंग-प्रत्यग को चूम रही थी तो कोई उसकी बलिष्ठ बांहों में थी।

उसके तन पर एक भी कपड़ा नहीं था।

नशे में था वह।

विशाल डबल बैड पर वहमौज-मेला लगाए हुए था। तभी अचानक!

हल्की-सी दस्तकी ने उसके खेल में विघ्न डाल दिया। उसके माथे पर बल पदाए।

'जानूं ... जानूं भाग जा। ' एकाएक ही क्रोधमें चिल्ला उठा व्ह-बास्टर्ड अभी आने को था! '

___ 'बॉस , जरूरी काम है।' बाहर से कमजोर-सा स्वर उभरा

'ईडियट , सारे जरूरी काम मैं निपटा चुका हूं फिर... फिर कौन-सा काम रह गया ?'

'बॉ स दलपत आया है।'

'कौन दलपत ?'

'बॉ स ...वही...वही दलपत काना। '

'दलपत काना?'

'हां बॉस।'

'ठीकी है...तू उससे बात कर ले । काम , कर पाया या नहीं?'

'काम पूरा करके लौटा है। ' ।

'यानी रंजीत , लाम्बा ...?' जार्ज पीटर ने आगे बढ़कर दरवाजा खोल दिया।

बाहर खडे जानूं ने तुरन्त नजरें झुका लीं। वह बिना कपड़ों-वाले अपने बॉस की तरफ कैसे देखता

भला।

'बता न क्या बोला वह ?'

'बॉस...उसने , रंजीत लाम्बा को खलास कर दिया।'

' विश्यास नहीं होता।'

'विश्वास करना ही होगा, बॉस । आप एक मिनट के लिए बाहरले हॉल तक चलें...आपको विश्वास आजाएगा।'

जार्ज पीटर ने हाथ उठाकर संकेत किया।

तुरन्त चारों सुन्दरियों उसके वस्त्र उठाकर उसकी ओर लपकी चली आई और उन्होंने फुर्ती से उसे कपड़े पहनाकरं तैयार कर दिया।

एक सुन्दरी ने उसके जूतों के तस्मे बांधकर उसे फिट किया तो दूसरी ने उसकी टाई बांध दी।

'चल! ' तैयार होकर वह जा नूं से बोला - ' चलकर देखता हूं कौन-सा जादू दिखा रहा है तू और वह का ना। चल।'

जानूं उसे साथ लेकर कॉरीडोर में बढ़ चला।

सीढ़ियों के निकट से ही गनर मिलने आरंभ हो गए।

पीटर को देख वे अतिरिक्त सावधान मुद्रा में नजर आने लगे। दो गनर सीढ़ियों के ऊपर थे और चार सीढियों से नीचे।

फिर वह बाहरले हॉल में पहुंचा।

हाल में उसे रंजीत लाम्बा की लाश के पास दलपत काना खडा दिखाई दिया।

हॉल में चारों तरफ उसके गनर मौजूद थे।

काने ... ये क्या है ?' उसने वहां पहुंचते ही सवाल किया।

'माई-बाप ... आपके दुश्मन की लाश। ' दलपत काना आदर से झुकता हुआ बोला।

'हूं... I ' पीटर ने हुंकार भरते हुए गौर से लाम्बा की लाश की ओर देखा।

लाम्बा के घुटने पेट की तरफ मुड़े हुए थे।

0

उसका सीना खून से तर था ।
 
___ ' बहुत चालाकी था। ' दलपत काना बड़बड़ाया।

'तूने तो बहुत बड़ा तीर मारे लिया काने। '

'आपका हाथ मेरे सिर पर था , इसीलिए इस काम को अंजाम दे सका।'

'नहीं. ..यह तो तूने अकेले ही किया है।'

दलपत काना मुस्करा उठा।

'तू इनाम का हकदार है।'

वह दाएं कान से लेकर बाएं कान तक मुस्कराया।

'तेरा इनाम..। ' कहने के साथ ही पीटर ने फुर्ती से पिस्तौल निकालकर उसकी और तान दी- 'तु

झे देना अब। जरूरी हो गया है।'

वह फायर करता , उस के पहले ही रंजीत लाम्बा ने गजब की तेजी दिखाते हुए फर्श से उठकर अपनी पिस्तौल -उसकी कनपटी से चिपका दी।

'खबरदार जार्ज! अगर तूने ट्रेगर दबाया तो मैं भी ट्रेगर दबा दूंगा। तेरा निशाना तो चूकी सकता है लेकिन मेरा निशाना चूकने वाला नहीं । ' वह फुफकारते हुए स्वर में बोला-'मेरे ट्रेगर दबाते ही तू इस दुनिया से कूच कर जाएगा।'

उस अचानकी होने वाली हरकत से तमाम गनर हतप्रभ रह गए।

जानूं ने रिवाल्वर निकाल लिया।

तमाम गानें रंजीत लाम्बा की ओर तन गई।

' मैं ट्रेगर दबाऊ क्या ?' लाम्बा ने धमकी भरे स्वर में कहा।

'नहीं..! ' पीटर के स्वर में कंपकंपाहट उत्पन्न हो गई।'

तुम्हारे प्यादों ने मुझे अपनी निशाना बना रखा

'ग ने फेंकी दो! ' वह अपनी पिस्तौल फेंकता हुआ बोला।

तमाम बंदूकधारी उस आदेश को सुनकर चौंके और कर्त्तव्यविमूढ़ स्थिति में उसे निहारने लगे।

'मेरा मुंह क्या देख रहे हो गने फेंकी दो। ड्राप दि गन्स इमीडिएटली !'

तुरन्त तमाम प्यादों ने अपने-अपने हथियार फेंकी दिए।

' अपने आदमियों को आदेश दे कि अपने-अपने हाथ उठाकर दीवार की तरफ मुंह कर लें।'

पीटर ने तुरन्त आ देश दिया।

सभी आद मी दीवार की तरफ मुंह करके खड़े हो गए।

'काने! ।

'मालि...?' दलपत काना लाम्बा के समीप झपटता हुआपहुंचा-हुक्म मालिक...हुक्म?'

सामने वाला कमरा देख , अगर उससे बाहर निकलने का रास्ता न हो तो इन भेड़-बकरियों को ले

जाकर उसने ये बंद कर दे ! '

दलपत काना तुरन्त सामने वाले कमरे की ओर दौड़ पड़ा।'

कमरे से निकलने का एकमात्र दरवाजा था। नतीजतन उसने लाम्बा की स्वीकृति लेनी भी जरूरी न समुझी और जार्ज पीटर के आदमियों को हांकता हुआ उस कमरे में ले जाकर बंद कर आया।

'काने !' तू अपनी मौत का इंतजाम कर रहा है बास्टर्ड ! ' पीटर दांत पीसता हुआ गुर्राया।

'नही मार्लिकी ... हुक्म का गुलाम बना हुआ हूं इस टाइम। ' दलपत काना सहमकर बोला।

'गुलाम तो मैं तुझे बाद में बनाऊंगा लेकिन हुक्म का नही।'

' मालिकी ।'

' चिड़ी का गुलाम। '

' जार्ज ! पिस्तौल ताने पीटर के सामने आता रंजीत लाम्बा बोला- 'तुझे अभ-भी उम्मीद है कि तू मेरे हाथों बच जाएगा और बाद में कुछ करने योग्य रह जाएगा?'

पीटर ने उलझनपूर्ण दृष्टि से उसकी ओर

देखा।

' इसकी तलाशी ले काने।'

दलपत काना डरे हुए अंदाज में पीटर की ओर बढ़ा। पीटर के नेत्र अंगारों की तरह दहकी रहे

थे।

'काने ! ' उसने दांत पीसे।

दलपत काना एक कदम पीछे हट गया।

' तलाशी ले ! ' लाम्बा चिल्लाया।

उसने एकदमं से पीटर के चेहरे की तरफ से दृष्टि हटाई और वह पीटर की तलाशी लेने लगा।

जार्ज पीटर उस समय बेबस था।

जिसके नाम का सिक्का अण्डरवर्ल्ड में चलता था , उसकी आ ख में रंजीत लाम्बा नामकी सुपारी वाले हत्यारे ने डंडा कर दिया था।

वह , अपनी ओर त नी उसकी पिस्तौल की वजह से बेबस था वरना अब तक तो द लपत काने जैसे अनगिनत प्यादे लाश के रूप में परिवर्तित हो चुके होते।

तलाशी में कुछ नहीं निकला।

दलपत काना तलाशी लेकर वापस लौट

आया।

पीटर उसे खा जाने वाली निगाहों से घूर रहा

था।

'जार्ज, अब तुम यह बताओगे कि तुमने मेरी हत्या के लिए काने को सुपारी दी थी ?' लाम्बा ने उसकी ओर देखते हुए सवाल किया।

'हां दी थी। ' पीटर गुर्राया।

'जहां तक मेरा अपना ख्याल है, मेरी तुम्हारी पूर्व की कोई वाकफियत नहीं है। या है ?'

नहीं है।'

'जब हमारी वाकफियत ही नहीं है तो फिर हमारी दुश्मनी भी नहीं होनी चाहिए! राइट ?'

जार्ज पीटर ने धूर्ततापूर्ण दृष्टि से उसे निहारा। वह बोला कुछ नहीं।

'मुंह से फूट वरना गोलियां मार-मारकर तेरी खोपड़ी में इतने छद कर दूंगा कि तू उन्हें गिन नहीं पाएगा।'

रंजीत लाम्बा।' पीए'ने क्रोध में दांत पोसे। वह कसमसाकर रह गया। अगर उस समय उसे बंधकी न बनाया गया होती तो वह लाम्बा को कच्चा चबा जाता।

' दांत पीसने और गुस्सा दिखाने से बात बनने वाली नहीं। बता हमारी कोई जाती दुश्मनी है क्या ?'

'नहीं।पिस्तौल अपनी आंखों के बीच निशाने पर घूमती देख पीटर अपेक्षाकृत नम्र स्वर में बोला।

'फिर तूने मेरी सुपारी का बंदब स्त क्यों किया ? क्या लगाया दलपत काने को मेरे पीछे मेरा

काम तमाम करने के लिए? बोल।'

'जरूरी नहीं कि तुम्हारे हर सवाल का जवाब दिया जाए।'

लाम्बा ने ट्रेगर दबाया।

पिस्तौल के दहाने ने आग उगली।

गोली जार्ज पीटेर के कान को हवा दे ती हुई पीछे दीवार में लगे फ्रेम के चीथड़े उड़ाती हुई दीवार से जा टकराई।

जार्ज पीटर सिहर उठा।

मौत का खौफ उसकी आंखों से झांकने

लगा।

'ये गोली निशाने पर भी लग सकती थी। इसके निशाने पर लगने से तुम्हारा काम तमाम भी हो सकता था और तुम्हारी लाश यहां पड़ी अकड़ रही भी हो सकती थी।
 

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