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सिगरेट फूंकता लाम्बा अपने दुश्मनों के बारे में बारी-बारी से ध्यान करने लगा । कुछ देर तक विचारपूर्ण मुद्रा में रहने के उपरान्त वह वहां से निकलकर आउट हाउस की ओर चला गया।
वह कोठी शहर से बाहर के क्षेत्र में बनी थी।
माणिंकी देशमुख ने उसे अपने किसी विशेष कार्य के लिए। बनवाया रहा होगा, लेकिन उस समय उसका प्रयोग पूनम कर रही थी।
उसने लाम्बा को फोन कर दिया था और लाम्बा ने पंद्रहमिनट में वहां पहुंचने को कहा था। पंद्रहमिनट हो चुके थे, वह अभी तक नहीं पहुंचा था।
पूनम को बेचैनी होने लगी थी।
वह कॉरीडोर में चहलकदमी करने लगी। उसकी नजर बार-बार अपनी रिस्टवॉच पर जा ठहरती।
पुरे तीस मिनट बाद जब रंजीत लाम्बा की कार उसे आती दिखाई पड़ी तब उसे चैन मिला।
वह अन्दर बैडरूम की ओर बढ़ गई।
वहीं से आहटें सुनकर अनुमान लगाने लगी, कार के रुकने की , दरवाजा खुलने की दरवाजा बन्द होने की और आखिर में कॉरीडोर में उभरती जूतों की ठक-ठक।
शीघ्र ही रंजीत लाम्बा उसके सम्मुख था।
उसने रूट ने का अभिनय किया।
लाम्बा ने आगे बढ़ कर उसे अपनी बाहों में भर लिया।'
'सॉरी पूनम... ट्रैफिकी जाम था , मैं क्या करता। ' उसने पूनम के गालों को चूमते हुए कहा।
मैं कब से इंतजार कर रही हूं।'
' तो क्या हुआ। आ तो गया ना।'
'जानते हो , एक मिनट की भी देर हो जाने पर मेरे दिल में कैसे-कैसे ख्याल आने लगते हैं। '
'कैसे-कैसे ?' लाम्बा ने शरारतन पूछा।
'डरने लगती हूं। सोंचती हूं कहीं तुम्हें कुछ हो तो नहीं गया।'
'एक बात बो! ?' वह पूनम के अधरों पर उंगली फिराता हुआ बोला।
'हां...बोलो।'
'बहुत बेशर्म हूं ' । आसानी से मरूंगा नहीं।
' ऐसी बातें मत करो। ' पूनम ने जल्दी से उसके होंठों पर हथेली रखते हुए कहा।
' फिर क्या करू?'
'प्यार। ' कहते हुए पूनम की पलकें शर्म से झुकती चलीन गई।
उसकी उस अदा पर लाम्बा कुर्बान हो गया। उसकी बांहों का बंधन पूनम के गिर्द कसता चला गया। यहां तक कि उसके मुख से दबी हुई कराह फूट निकली।
'उई मां...!'
उसने पूनम को अपनी बांहों से हटाकर एकदम से गोद में उठा लिया।
'हाय रे! क्या कर रहे हो ?'
'प्यार।'
'शरारत तो कोई तुमसे सीखे। '
" इसमें शरारत कहां से आ गई ?'
'जरूरी है मुझे इस तरह गोद में उठाना ?'
'हां... जरूरी है ?'
'किसलिए जरूरी है ?'
' इसलिए कि प्यार करना जरूरी है।' ' बातें खूब बना लेते हो।' ' बातें बनाना तुम्हीं ने सिखाया है। '
'हाँ ... सब-कुछ मैंने ही किया है।'
' वरना मुझे तो कुछ आता ही नहीं था। '
'बिल्कुल नहीं...तुम तो भोले-भाले नन्हे-से बच्चे हो।'
लाम्बा मुस्कराया। ' इस तरह गोद में उठाकर कहां लिए जा रहे
हो ?'
'वंहा ...। ' उसने आंखों ही आंखों से बैड की ओर संकेत किया।
लाज की लालिमा पूनम के चेहरे पर फैल
गई।
बैड पर, लाम्बा ने उसे ऊपर से ही छोड़ दिया।
वह डनलप के ग द्दे पर गिरकर थोड़ा-सा उछली फिर फैल गई। उसके संभलने से पूर्व लाम्बा उस पर गिर चुका था।
पूनम जैसी सैक्सी लड़की का- सामीप्य हासिल होने के। बाद कोई भी जवान आदमी अपनी इच्छाओं पर काबू नहीं पा सकता था।
वही हाल लाम्बा का हुआ।
यूं भी पूनम के पास आते ही उस पर दीवानगी-सी छा जाती थी।
उसके दोनों हाथ फुर्ती से चल रहे थे।
शीघ्र ही वे निर्वसन अवस्था में जब एक-दूसरे की चिकनी बांहों में समाए तो मानो पैट्रोल में चिंगारी डाल दी गई हो।
शोले एकदम ही भड़की उठे।
पूनम उत्तेजकी स्थिति में सत्कार कर उठी। उसके अधर रंजीत लाम्बा के शक्तिशाली जिस्म को यहां-वहां चूमने लगे।
लाम्बा ने उसे अपने आलिंगन में भींच लिया।
वह लाम्बा से लता के समान लिपट गई। उन क्षणों में वह लाम्बा से एक पल के लिए भी अलग नहीं होना चाहती थी । धीरे-धीरे उसकी सांसों में तेजी आने लगी।
लाम्दा की कठोरता पूर्ण उत्तेजना को यह स्पष्ट अनुभव कर रही थी।
लाम्बा ने जब उसके अधरों से अधर जोड़े तो बरबस ही वह उसके सिर के बालों में अपने हाथों की कोमल उंगलियां घुमाकर उसके सिर के बालों को सहलाने लगी।
लाम्बा के हाथ अलग हरकत कर रहे थे।
दोनों लगभग एकाकार हो गए थे।
गर्म सांसें घुलने लगीं।
सांसों की रफ्तार में निरन्तर तेजी आती जा रही थी। वह तेजी बढ़ती ही गई। बढ़ती ही गई। यहां तक कि तनाव चरम शिखर पर पहुंचकर टूट गया।
इस बात पूनम के मुख से कामुकी सीत्कार निकलते रहे थे।
लाम्बा का समूचा बोझ उस समय उसके ऊपर था।
वह कोठी शहर से बाहर के क्षेत्र में बनी थी।
माणिंकी देशमुख ने उसे अपने किसी विशेष कार्य के लिए। बनवाया रहा होगा, लेकिन उस समय उसका प्रयोग पूनम कर रही थी।
उसने लाम्बा को फोन कर दिया था और लाम्बा ने पंद्रहमिनट में वहां पहुंचने को कहा था। पंद्रहमिनट हो चुके थे, वह अभी तक नहीं पहुंचा था।
पूनम को बेचैनी होने लगी थी।
वह कॉरीडोर में चहलकदमी करने लगी। उसकी नजर बार-बार अपनी रिस्टवॉच पर जा ठहरती।
पुरे तीस मिनट बाद जब रंजीत लाम्बा की कार उसे आती दिखाई पड़ी तब उसे चैन मिला।
वह अन्दर बैडरूम की ओर बढ़ गई।
वहीं से आहटें सुनकर अनुमान लगाने लगी, कार के रुकने की , दरवाजा खुलने की दरवाजा बन्द होने की और आखिर में कॉरीडोर में उभरती जूतों की ठक-ठक।
शीघ्र ही रंजीत लाम्बा उसके सम्मुख था।
उसने रूट ने का अभिनय किया।
लाम्बा ने आगे बढ़ कर उसे अपनी बाहों में भर लिया।'
'सॉरी पूनम... ट्रैफिकी जाम था , मैं क्या करता। ' उसने पूनम के गालों को चूमते हुए कहा।
मैं कब से इंतजार कर रही हूं।'
' तो क्या हुआ। आ तो गया ना।'
'जानते हो , एक मिनट की भी देर हो जाने पर मेरे दिल में कैसे-कैसे ख्याल आने लगते हैं। '
'कैसे-कैसे ?' लाम्बा ने शरारतन पूछा।
'डरने लगती हूं। सोंचती हूं कहीं तुम्हें कुछ हो तो नहीं गया।'
'एक बात बो! ?' वह पूनम के अधरों पर उंगली फिराता हुआ बोला।
'हां...बोलो।'
'बहुत बेशर्म हूं ' । आसानी से मरूंगा नहीं।
' ऐसी बातें मत करो। ' पूनम ने जल्दी से उसके होंठों पर हथेली रखते हुए कहा।
' फिर क्या करू?'
'प्यार। ' कहते हुए पूनम की पलकें शर्म से झुकती चलीन गई।
उसकी उस अदा पर लाम्बा कुर्बान हो गया। उसकी बांहों का बंधन पूनम के गिर्द कसता चला गया। यहां तक कि उसके मुख से दबी हुई कराह फूट निकली।
'उई मां...!'
उसने पूनम को अपनी बांहों से हटाकर एकदम से गोद में उठा लिया।
'हाय रे! क्या कर रहे हो ?'
'प्यार।'
'शरारत तो कोई तुमसे सीखे। '
" इसमें शरारत कहां से आ गई ?'
'जरूरी है मुझे इस तरह गोद में उठाना ?'
'हां... जरूरी है ?'
'किसलिए जरूरी है ?'
' इसलिए कि प्यार करना जरूरी है।' ' बातें खूब बना लेते हो।' ' बातें बनाना तुम्हीं ने सिखाया है। '
'हाँ ... सब-कुछ मैंने ही किया है।'
' वरना मुझे तो कुछ आता ही नहीं था। '
'बिल्कुल नहीं...तुम तो भोले-भाले नन्हे-से बच्चे हो।'
लाम्बा मुस्कराया। ' इस तरह गोद में उठाकर कहां लिए जा रहे
हो ?'
'वंहा ...। ' उसने आंखों ही आंखों से बैड की ओर संकेत किया।
लाज की लालिमा पूनम के चेहरे पर फैल
गई।
बैड पर, लाम्बा ने उसे ऊपर से ही छोड़ दिया।
वह डनलप के ग द्दे पर गिरकर थोड़ा-सा उछली फिर फैल गई। उसके संभलने से पूर्व लाम्बा उस पर गिर चुका था।
पूनम जैसी सैक्सी लड़की का- सामीप्य हासिल होने के। बाद कोई भी जवान आदमी अपनी इच्छाओं पर काबू नहीं पा सकता था।
वही हाल लाम्बा का हुआ।
यूं भी पूनम के पास आते ही उस पर दीवानगी-सी छा जाती थी।
उसके दोनों हाथ फुर्ती से चल रहे थे।
शीघ्र ही वे निर्वसन अवस्था में जब एक-दूसरे की चिकनी बांहों में समाए तो मानो पैट्रोल में चिंगारी डाल दी गई हो।
शोले एकदम ही भड़की उठे।
पूनम उत्तेजकी स्थिति में सत्कार कर उठी। उसके अधर रंजीत लाम्बा के शक्तिशाली जिस्म को यहां-वहां चूमने लगे।
लाम्बा ने उसे अपने आलिंगन में भींच लिया।
वह लाम्बा से लता के समान लिपट गई। उन क्षणों में वह लाम्बा से एक पल के लिए भी अलग नहीं होना चाहती थी । धीरे-धीरे उसकी सांसों में तेजी आने लगी।
लाम्दा की कठोरता पूर्ण उत्तेजना को यह स्पष्ट अनुभव कर रही थी।
लाम्बा ने जब उसके अधरों से अधर जोड़े तो बरबस ही वह उसके सिर के बालों में अपने हाथों की कोमल उंगलियां घुमाकर उसके सिर के बालों को सहलाने लगी।
लाम्बा के हाथ अलग हरकत कर रहे थे।
दोनों लगभग एकाकार हो गए थे।
गर्म सांसें घुलने लगीं।
सांसों की रफ्तार में निरन्तर तेजी आती जा रही थी। वह तेजी बढ़ती ही गई। बढ़ती ही गई। यहां तक कि तनाव चरम शिखर पर पहुंचकर टूट गया।
इस बात पूनम के मुख से कामुकी सीत्कार निकलते रहे थे।
लाम्बा का समूचा बोझ उस समय उसके ऊपर था।