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Thriller बारूद का ढेर

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लेकिन ऐसा महज इस वजह से नहीं हुआ , कयोंकि मैंने निशाना गलत लिया था। क्योंकि अभी मैं तुम्हें सिर्फ यह समझाना चाह रहा था कि माफिया का सबसे बड़ा डॉन भी अगर गोली के रास्ते में आएगा तो गोली उसे भी उड़ा डा लेगी। गोली पर किसी तरह का कोई फर्की पड़ने वाला नहीं। खोपड़ी किसी की भी हो , गरीब आदमी की या अमीर आदमी- की, उसके

रास्ते में आएगी तो उड़ जाएगी।'

पटिर ने गले में फंसा थू की निगला।

'अब सिर्फ इतना बता दो कि मेरे सवालों का जवा ब देना जरूरी है या नहीं?'

उसने सहमी हुई नजर से लाम्बा की ओर देखा, फिर बोला- ' पूछो।'

'तुझसे मेरी दुश्मनी नहीं फिर तूने काने को मेरे नाम की सुपारी क्यों दी?'

'मुझे किसी ने तुम्हारी हत्या का कान , सौंपों था।'

' किसने-किसने जार्ज?'

वह हिचकिचाया।

'नाम बता, उसका...नाम बता? '

'जोजफ।'

'जोजफ !' लाम्बा के नेत्र आश्चर्य से फैल गए - ' वही जोजफ न जो माणिकी देशमुख के यहां उसकी बेटी के शैडो की हैसियत से काम करता है ? '

'वही।।

'आई सी...तो यह जोजफ का काम था। ' वह बड़बड़ाया।

पीटर खामोश रहा।

'काने !' लाम्बा ने दलपत का ने से संबोधित होते हुए कहा- इसे दूसरे कमरे में बांधकर डाल दे ताकि यह किसी प्रकार का शोर न मचा सके। '

'जो हुक्म मालिक।'

आनन-फानन में दलपत का ने ने आदेश के पालन में कार्यवाही कर डाली।

जार्ज को बांध कर दूसरे कमरे में बूंद करने के बाद वह रंजीत लाम्बा के साथ कोठी से बाहर निकल

आया!

ए की बार फिर उसे कार की ड्राइविंग सीट पर बैठना पड़ा।

सब कुछ प्लान के मुताबिकी हुआ। ' लाम्बा सिगरेट सुलगाता हुआ बोला।

लेकिन माई-बाप मेरी तो मुसीबत है।

' वह किसलिए?'

' इसलिए कि पीटर कभी न कभी तो कमरे के बाहर निकलेगा ही उसके बाहर आते ही मेरे लिए मुसीबत शुरू हो जाएगी।'

'कोई मुसीब त नहीं होगी।'

'क्यों?'

' क्योंकि यह सब तो मेरा किया-धरा है। अगर उसे कोई कार्यवाही करनी होगी तो वहमेरे खिलाफ करेगा।'

' मेरे खिलाफ नहीं करेगा , इस बात की भी तो कोई गारंटी नहीं है।'

'तू मर मत ...अगर तेरे खिलाफ ऐसा-वैसा कुछ हो तो तू मुझे फोन कर सकता है। यह ले मेरा फोन नम्बर। ' लाम्बा ने विजिटिंग कार्ड निकालकर दलपत काने की ओर बढ़ा दिया।

काने ने कार्ड इस तरह संभालकर रख लिया मानो वह उसकी सुरक्षा का गारंटी कार्ड हो।

__ 'किधर चलूं मालिकी ?' कुछ देर बाद मोड़ आने पर उसने पूछा।'

__'तू जहां जाना चाहता हो वहीं चल। मैं तुझे वहां तक तो छोड़ ही सकता हूं।'

'जो आज्ञा साई।'

| पर दलपत कानाकार से उतर गया।

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__ 'हैलो...कोठारी...! ' दूसरी ओर से कोठारी की आवाज सुनने के पश्चात् रंजीत लाम्बा माउथ पीस में बोला- ' मैं लाम्बा बोल रहा हूं।'

___ 'तुम कहां हो लाम्बा ? देशमुख साहब कबसे तुम्हारी तलाश करवा रहे हैं ?' दूसरी ओर से उभरने वाले कोठारी के उत्तेजित स्वर में शिकायत के स्पष्ट भाव थे।

'कब से?'

' बहुत देर हो गई।' ' और उसब हुत देर में मैं उन्हें नहीं मिला ?'

_' हां...तुम कहीं नहीं मिले। अभी कहां से फोन कर रहे हो?'

' टेलीफोन बूथ से।'

'कौन-से टेलीफोन बूथ से?'

' मेरा पता जानने के लिए बड़े उतावले हो रहे हो कोठारी।'

.

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___ 'नहीं...मैं पता जानने को उतावला नहीं हो रहा।'

'फिर?'

' मैं चाहता हूं तुम जल्द से जल्द देशमुख साह ब के सामने हाजिर हो जाओ। देशमुख साहब को तुमसे कोई बेहद जरूरी काम कराना है।'

'माणिकी देखमुख के जरूरी काम से मैं वाकिफ हूं।'

'अच्छा !'

'हां कोठारी...मैं सब-कुछ जान चुका हूं। तुम्हारे झूठे स्टेटमेन्ट भी अब मेरे सामने नंगे हो चुके

' मेरे झूठे स्टेटमेन्ट ?'

'हां-हां , अब तुम तक मुझसे जो झूठ कहते आए कि तुम मेरी और पूनम की कहानी की खबर देशमुख को नहीं करोगे।'

'हां...वो खबर तो मैंने अभी-भी छिपाकर रखी है।'

'झूठ बकते हो।'

'नहीं रंजीत... मैं सच कह रहा हूं।'

.

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.

___ 'झूठ है...झूठ! मैं हर रहस्य की तह तक प हुंच चुका हूं।'

'कैसा रहस्य ?'

'मुझ पर हो ने वाले जानलेवा हमलों का रहस्य ।'

'मुझे ... मुझे कुछ नहीं- मालूम। ' __'लेकिन मुझे सब कुछ मालूम है। मैं जा नता हूं, पेशेवर हत्यारे दलपत को मेरे पीछे अण्डरवर्ल्ड के बादशाह जार् ज पीटर ने लगाया और पीटर को मेरी हत्या की सुपारी देने वाला है जोजफ...जोजफ , पूनम'का शैडो !'

'ओह नो...जोजफ ने किया ये सब। मैं उसे कितना समझाया था कि वह देशमुख साहब को कुछ न बता ए। मेरे सामने मुंह बन्द रखने की बात कहकर , इसका मतलब उसने सब - कुछ देशमुख साहब के

सामने उगल दिया है।'

'कोठारी तुम कुछ भी कहो...मैं अब वहां की किसी भी बात पर यकीन करने वाला नहीं।'

__ 'शायद तुम ठीकी कह रहे हो , इसी वजह से जोजफ फिलने ही आद मियों की भीड़ लेकर तुम्हारी तलाश कर रहा था और पूनम की चीख-पुकार भी सुनाई दी थी।'

___ 'पूनम... क्या हुआपूनम को ? कोठारी मुझे बताओ पूनम को क्या हुआ ?' एकाएक ही लाम्बा उत्तेजित स्वर में चिल्लाया।

___ 'मुझे ठीकी तरह नहीं मालूम , मगर ऐसा लगता है कि उसे पीछे बाले दो कमरों में रखा गया है और शायद बाहर निकलने का दरवाजा लॉक्ड है। '

___ 'कोठारी !' लाम्बा दांत पीसता हुआ गुर्राया - मैं पूनम पर होने वाला जुल्म बर्दाश्त नहीं करूंगा।

कह देना अपने आका माणिकी देखमुख से-बारूद से खेलोगे तो जल जाओगे, फिर मैं तो बारूद का वो ढेर हूं जो माणिकी देशमुख को लाखों टुकड़ों में बदल डालने में पूरी तरह सक्षम है। '

रंजीत ... रिलैक्स रंजीत। देखो..सुनो...।'

'न मुझे देखना है , न सुनना है...समझ गए तुम। तुम माणि की देशमुख के लैफ्टीनेंट हो... उसे समझा सको तो समझा देना। मैं सब-कुछ बर्दाश्त कर लूंगा लेकिन पूनम पर किसी भी तरह का जुल्म बर्दाश्त नहीं कर सकूँगा।'

'पूनम को कुछ नहीं होगा रंजीत। तुम मेरे पास आजाओ, मैं सारी-उलझनों का हल निकाल

लूंगा।'

लाम्बा हंसा।

जहरीली हंसी।

बोला-को ठारी मुझे पुड़िया देने की कोशिश म त करो। बहलाया बच्चों को जाता है । जहां मेरे लिए जाल तैया र करके रखा गया है , तुम मुझे वहां पुचकार के बुलाना चाहते ही ताकि मै उस जाल में जाकर फंस जाऊं।'

' नहीं...यह बात नहीं।'

'अब मुझे तुम्हारी किसी बात पर यकीन नहीं।' माणिकी देशमुख से कह देना कि बगावत हो चुकी है। उसने जितने वार करने थे वो कर चुका , अब मेरी बारी है।'

'नहीं रंजीत!'

__ ' उसे कहना कि अगर बचा सकता है तो वह अपने-आपको बचा ले। मौत का काला साया उसे कभी-भी अपने शिकंजे में जकड़ सकी ता है।'
 
'ऐसा मत कहो रंजीत...मैं...मै देशमुख साहब से तुम्हारी बावत बात करूंगा। मुझे विश्वास है, वो मेरी पेशकश को ठुकराएंगे नहीं।'

'नहीं कोठारी... तीर कमान से निकल चुकी- है। वह वापस तरकश में नहीं लौट सकता।'

'रंजीत , जल दीबाजी में कोई कदम न उठाओ। मैं कह रहा हूं न , मैं सब संभाल लूंगा।'

'मुझे कुछ नहीं संभालना। मुझे तो सब-कुछ बिगाड़ना है। ' इतना कहकर लाम्बा ने रिसीवर हुकी में लटकाया और सावधानी के साथ टेलीफोन बूथ से बाहर आ गया।

सड़की वीरान पड़ी थी।

उसने सिगरेट सुलगा ई , दाएं-बाएं देखा तत्पश्चात् कार का दरवाजा खोलकर अन्दर बैठ

गया।

कार स्टार्ट होकर आगे बढ़ गई।'

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बड़ा-सा हाल था वह।

हॉल के बीचों-बीच एक बहुत बड़ा झूमर छत

से लटका हुआ था। फर्श पर बिछे मखमली कार पेट पर चलते हुए कोठारी के आधे जूते उस कारपेट में धंसे जा रहे थे।

दाहिनी दीवार पर एक बड़ी-सी सीनरी लगी

थी।

इतनी बड़ी सीनरी कि उसके पीछे समूची दीवार ढकी गई थी।'

उस दीवार के आगे एक वेशकीमती मेज थी जिसकी टाप शीशे की बनी हुई थी। पाए चंदन की काली लकड़ी के थे जिन पर अच्छी-खांसी नक्काशी की गई थी।

टेबल पर लाल रंग का कॉर्डलैस टेलीफोन रखा था । पेपरवेट से दबे हुए कुछ कागज थे, नोटो

की गड्डियां थीं और एक पिस्टल थी जो कि उस कीम ती देबल के ठीकी पीछे रखी रिवाल्विंग चेयर के निकट रखी थी।

रिबाल्विग चेयर पर बैठा व्यक्ति असानी से हाथ बढ़ाकर टेबल पर रखी पिस्तौल को उठा सकता

था।

रिवाल्विंग चेयर पर एक लहीम-शहीम पचपन साला व्यक्ति बैठा था।

उसके लाल चेहरे से उसकी सेहत झलकती दिखाई दे रही थी।

वह था...माणिकी देशमुख।

तेज कदमों से चलता हुआ कोठारी टेबल के इस ओर जा ठहरा।

माणिकी देशमुख ' ने उसकी ओर नजर उठाई।

'रंजीत लाम्बा मिला? 'कोठारी को देखते ही उसने सवाल किया।

' मिला। ' कोटारी ने अपलकी उसकी ओर देखते हुए- पूछा।

___ कहां है वह ?' जैसे उसे करंट लग गया हो, इस- पैकार एक झटकी के साथ उठ खड़ा हुआ वह और उसने फुर्ती के साथ पिस्तौल उठा ली!

उसका चेहरा तमतमा उठा।

'फोन पर अमी-अभी मेरी उससे बात हुई है

' कंहा से किया था उसने फोन ?'

'यह नहीं मालूम बॉ स।'

'मालूम कर कोठारी।' 'मालूम करने की जरूरत नहीं है।'

'क्यों ?' देशमुख के माथे पर बल पड़ गए।

__' इसलिए कि वह की हीं जाने वाला नहीं। मैं उसे कहीं से भी खोज जाऊंगा , लेकिन उसने आप पर जो इल्जाम ल गाया है , मैं उसके बारे में जानना चाहता हूं, क्या वह सही है ?

'कौन-सा इल्जाम ?'

' आपने किसी को रंजीत की हताया के लिए किराए पर हासिल किया था ?'

__ 'अण्डर वर्ल्ड की जानी-मानी हस्ती जार्ज पीटर को।'

'क्यो... वह तो अपना आदमी था फिर आपने ऐसा क्यों किया?'

' मैंने उसके साथ ऐसा क्यों किया , यह तू जानता है। कोठारी। मुझे अफसोस है कि मेरा लैफ्टीनेंट होते हुए भी तूने मुझे उसके बारे में नहीं बताया। यह नहीं बताया कि वहमेरी भोली-भाली बेटी

को बहकाने में कामयाब होता जा रहा है । अरे हरा मखोर!

इस बात की जानकारी होते ही सबसे पहले तूने उसकी लाश गिरा देनी थी। फिर तू मुझे उस गद्दार के बारे में बताता। लेकिन तूने वह काम नहीं किया। तू उसबात को दबाकर रंजीत का सपोर्ट कर रहा था

और दबाव जोजफ पर डाल रहा था कि वह पूनम की बात को आगे न बढ़ाए। क्यों?'

' उसकी एक वजह थी बॉ स। '

'कौन-सी वजह ?'

' रंजीत आपके काम का आदमी है। बड़े से बड़े काम को अकेले कर गुजरने की योग्यता है उसमें। इस मामले से बात बिगड़ जाती। मैं चाहता था कि पूनम और रंजीत के बीच का रिश्ता भी खत्म हो जाए और रंजीत हमारे साथ काम भी करता रहें, जिसे कि जोजफ ने शायद इस स्वार्थ के परवश आप पर जाहिर कर दिया ताकि रंजीत का पत्ता साफ हो जाए और आप उस पैर मेहरबान होकर उसे रंजीत लाम्बा का स्थान दे दें।'

'ऐसा हो भी सकी ता है कोठारी, तू देखना...तू देखना जोजफ रंजीत का काम तमाम करके उसकी जगह ले लेगा।'

'जोजफ रंजीत लम्बा की जगह कभी नहीं ले सकेगा बॉ स। मैं अपने हर मोहरे का वजन जानता

.

'कोठारी...मैं रंजीत की लाश देखना चाहता हं।।

'मैं चाहता हूं बॉस कि इस मामले में आप ठंड़े दिमा ग से काम लें।'

' कहना क्यो चाहता है तू ?' माणिकी देशमुख के तेवर एकाऐंकी ही बदल गए।

_ 'यह कि पूनम को यहां से हटाकर पूनम की बात को खत्म किया जा सकता है। रंजीत को दोबारा काम की रने के लिए मैं तैयार कर लूंगा।'

'नही चाहिए मुझे वह हरामखोर रंजीत.. .नहीं चाहिए! ' गुस्से से चिल्ला ता हुआ वह चे यर

छोड़ कर उठ खड़ा हुआ।

' उसके खिलाफ जंग का ऐलान भी आपको भारी पड़ सकता है।'

'जोजफ उसे तिनके की तरह उड़ा डालेगा।

_ 'गलतफहमी हैं आपको। जोजफ की स्थिति मैं आपको बता दूं...जोजफ तिनका है , रंजीत तूफान। तूफान के सामने एक तिनके का जो महत्व होता है वही महत्व जोजफ का रंजीत लाम्बा के सामने है। अब तक जोजफ अनजाने में उसके खिलाफ चालें चलता रहा। उसे कुछ मालूम नहीं था। लेकिन अब वहमामले की जड़ में पहुंच चुका है। वह जोजफ , दलपत काना और जार्ज पीटर सबकी कहानी से वाकिफ हो चुका है और उसने यह भी कह दिया है कि...बगावत हो चुकी है। '

बागियों का सिर कुचल ना मैं अच्छी तरह जानता हूं।'

' इसब गावत को दूसरे ढंग से रोका जा सकता है बॉस। अभी भी वक्त हैं।'

'तू मुझे रंजीत के सामने झुकने की राय दे रहा है कोठारी ? तू चाहता है अपने टुकड़ों पर पलने वाले अपने नौकर के सामने मैं गिड़गिड़ा ऊं? नहीं ... कोठारी ... नहीं मैं कट सकता हूं झुकी नहीं सकता।'

' बॉस ... आप समझते क्यों नहीं।'

'क्या मतलब है तेरा ...क्या तू रंजीत लाम्बा के नाम से इतना ज्यादा खौफजदा है कि तू इस जंग मै मेरा साथ देने को तैयार नहीं?'

' इस जंग को मैं रोकना चाहता हूं। आपका नमकख्वार हूं। आपसे अलग होकर कहां जाऊंगा।'

__'तो फिर तैयारी कर। मैं अपनी इज्जत से खिलवाड़ करने वाले शख्स का कटा हुआ सिर अपने कदमों में देखना चाहता हूं। 'देशमुख हिंसकी स्वर में गुर्राया।

'मैं, यह कहना चाहता था...। '

'कुछ नहीं कहना चाहता था तू.. .कुछ नहीं।

अभी कोठारी वापसी के लिए मुड़ा ही था कि दौड़ती हुई पगचापों के साथ नारी चीखें वहां तक सुनाई देने लगी।

विला के किसी दूर वाले हिस्से में वो सब हो रहा था।

माणि की देशमुख के माथे पर बल पड़ गए।

उसने फुर्ती से फोन उठाकर एक बटन पुश किया, फिर माउथपीस में बोला- ' क्या हुआ...क्या बात है?'
 
'पूनम भागने की कोशिश कर रही थी डैड! 'दूसरी ओर से उसके बेटे विनायकी देशमुख का झुल्लाहट भरा स्वर उभरा- ' मैंने पकड़ लिया उसे। '

' कौन-सेर कमरे में हो ?' 'लॉन के सामने वाले कमरे में।'

' मैं आ ' रहा हूं।'

कहने के सा थ ही माणिकी देशमुख ने फोन टेबल पर रखा और तेज कदमों से बाहर की ओर चल

पड़ा। कोठारी उसके पीछे लपका।

आगे-पीछे चलते हुए दोनों उस कमरे में पहुंचे जिसमें पूनम और विनायकी थे। विनायकी ने उसके सिर के बाल मुट्ठी में जकड़ रखे थे और वह दाहिने हाथ से पूनम को बेरहमी से पीट रहा था

पूनम चीख-चिल्लाकर उस का विरोध कर रही थी। छोड़ दे इसे! ' माणिकी देशमुख ने विनायकां

को आदेश दिया।

विना यकी ने आदेश के पालन में पूनम को छोड़ दिया।

पूनम सिसकने लगी।

'क्यों भाग रही थी ?' माणिकी देशमुख ने उसके ठीक सामने पहुंचते हुए पूछा।

वह कुछ न बोली।

जवाब दे ! ' एक जन्नाटेदार थप्पड़ उसके गाल पर पड़ा।

उसका चेहरा दूसरी तरफ को उलट गया। गाल पर उंगलियों की छाप उभर आई।

पीडा से तड़प उठी वह।

अधरों के किनारे से रक्त की पतली-सी लकीर बनकर ठोढ़ी की ओर उतरती चली गई। सिसकियों के साथ रोने लगी वह।

माणिकी देशमुख ने हिकारत भरी दृष्टि से उसे

देखा।

'विनायकी !'

'यसुर डैड ? '

' इसे ऊपरले कमरे में बंद कर दे और वहां दो आदमियों का पहरा बिठा दे। '

'यस डैड।'

'ले जा इसे मेरी आंखों के सामने से। मैं इसबगैरत की सूरत भी देखना नहीं चाहता।'

'चल! ' विनायकी देशमुख पूनम को घसीटता हुआ वहां से ले गया।

कुछ पल वहां कर्त्तव्यविमूढ़ स्थिति में खड़े रहने के उपरान्त मणिकी देशमुख वापस उसी हॉल में लौट आया।

कोठारी उसके पीछे-पीछे वहां पहुंचा।

'बेबी पर जुल्म करने से क्या फायदा।' उसने अत्यंत धीमे स्वर में कहा।

'तू क्या समझता है , मैं अपनी इजत यूं ही लुट जाने दूंगा।'

' ले किन अभी तो लाम्बा ने ऐसा-वैसा कुछ किया नहीं।'

'उसके लिए तो मौत की सजा निश्चित है। अब वह ऐसा-वैसा कुछ कर भी नहीं सकेगा।'

बॉ स!'

'तू बातों में वक्त बर्बाद मत कर। मैं जल्द से जल्द उस हरामजादे रंजित लाम्बा का पता मालूम कर लेना चाहता हूं।'

'उसकी पता अब आसानी से मालूम नहीं हो सकेगा।'

' आसानी से नहीं तो मुश्किल से सही। पता मालूम कर।'

'यसब ॉस।'

'जा...दफा हो जा यहां से। मेरे पास रुककर वक्त बर्बाद मत कर।' कहने के साथ ही देशमुख लिकर कैबिनेट की ओर बढ़ गया। उसने अपने लिए पहले आधा गिलास भरा । उसके बाद पूरा गिलास भरकर एक ही सांस में पीता चला गया।

कोठारी समझ गया की अब उसके रोके वह जंग रुकने वाली नहीं।

वह बाहर निकला।

कॉरीडोर में विपरीत दिशा से आते जोजफ से उसका सामना हो गया।

जोजफ उसे देखकर चौंका।

उसने कोठारी से नजरें चुराते हुए निकलने की कोशिश की , परन्तु कोठारी ने उसका मार्ग अवरुद्ध कर दिया।

'जोजेफ...!'

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__' मेरे पास टाइम कम है। मैंने फौरन बॉ स से मिलना है।' इतना कहकर जोजफ रास्ता काटता हुआ

उसके बराबर से निकला चला गया।

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पचास के पेटे में पहुंचा मोटी आकृति वाला भूपत माणिकी देशमुख का बहुत पुराना रसोईया था ।

भूपत को अफीम की आदत थी! रसोई की तमाम खरीददारी के अधिकार उसी के पास थे और वह आए दिन की खरीददारी में से बचत करके अफीम के लिए पैसों का जुगाड़ बिठा लिया करता था। लेकिन पिछले कुछ महीनों से वह अफीम के चक्कर से निकलकर ड्रग्ज लेने लगा था।

उसी एक डोम पैडलर से वाकफियत हो गई थी।

इस तरह अब उसे अपने नशे के लिए पहले से ज्यादा बड़ी रकम दरकार थी।

नतीजतन रसोई के सामान में उसने बड़े घपले करने शुरू कर दिए थे।

आज वह तमाम झिक झिक करने के बाद भी मैनेजर से अतिरिक्त रकम हासिल न कर सका। झुंझलाई हुई स्थिति में बड़बड़ाता हुआ वह बाहर निकला। स्कूटर रिक्शा के पैसे मिले थे मगर वह पैदेल

ही बाजार की तरफ चल पड़ा।
 
उसने अपने नशे के लिए एक-एक पैसा जो बचाना था।

सामान की खरीददारी में भी वह इत ने पैसे नहीं बचा सका जिससे कि वह डोम पैड लर को भुगतान करके अपने लिए नशे की एक भी पुड़िया खरीद पाता।

डोम पैडलर उसे मिला भी मग र वह सिर्फ उससे दोबारा मिलने की बात ही कर सका। उसे नहीं मालूम शा कि कोई उसके पीछे साए की तरह लगा हुआ है और उसकी एक-एक हरकत नोट कर रहा है। उसकी हर छोटी-बड़ी बात पर ध्यान दे रहा है।

नशा किए उसे लम्बा समय हो गया था और अब वक्त पर डोज न मिल पाने की वजह से उसे अपनी आंखों मे पानी बढ़ता महसूस होने लगा था। टांगों में हल्की-सी कम्फोर्ट और जिस्म में दर्द पैदा होने लगा था।

जो उसका पीछा कर रहा था, उसने तुरन्त ही उस समय जबकि भूपत पैडलर को छोड़कर आगे बड़ा , पाउडर को रोककर संक्षिप्त वार्ता की और दस पुड़ियों का पैकेट खरीदकर जेब में डाल लिया।

भूपत खरीददारी के बाद विला में पहुंचा।

उसका पीछा करने वाला साया छह रह गया।

भूपत ने मुस्किल तमाम रसोई का काम किया। एक औरत उसकी सहायकी के रूप में काम करती थी। वह उसे ही ज्यादातर काम में लगाए रहा।

जैसे-जैसे वक्त गुजरता जा रहा था, उसकी हालत खराब होती जा रही थी। आंखों से पानी बहता तो वह उसे जल्दी से पोंछ डालता।

इसी बीच कॉफी का ऑर्डर आ गया ।

माणिक-देश मुख के मीटिंग चैम्बर में आठ कॉ फी तुरन्त पहुंचनी थीं।

उसने जल्दी-जल्दी कॉफी बनाकर मीटिंग चै म्बर में पहुंचा दी।

फिर वह लौटा ही था कि एक नौकर ने उसे आकर बताया कि उसके भतीजे का फोन है।

वह चकित हो उठा।

___ भतीजा। ' असमंजस भरे स्वर में बड़बड़ाते उसने अपने-आपसे कहा- 'लेकिन मेरा तो कोई भाई

ही नहीं, फिर भतीजा...?'

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असमंजस भरी स्थिति में चलता हुआ वह टेलीफोन तक पहुंचा।

'कौन है ?' कंपकंपाते हाथ से रिसीवर कान से लगाते उसने माउथपीस में बोला।

'आपका भतीजा हूं चचा। ' दूसरी ओर से सामान्य स्वर उभरा।

'कौन-से भतीजे भाई ?'

'वहीं भतीजा...पुड़िया बाला। आपकी जरूरत की पुड़िया , जो आप उस पैडलर से हर रोज लिया करते हैं, इस वक्त मेरे सामने रखी है। '

उसने अपने सूखे हुए होंठों पर जीभ फिराई।

'अगर कोई जरूरी काम न करे रहे हों तो बाहर आकर वह पुड़िया ले जाएं। उसकी आपको कीमत अंदा नहीं करनी पड़ेगी।

'क्यों ?'

'क्योंकि आप चचा हैं और आपके भतीजे के पास आपकी जरूरत का सामान पड़ा सडा रहा

है।'

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'तुम हो कौन ?' एकाएक की भूपत शंकित सर में बोला।

'बाहर आओगे तो अपने-आप जान जा ओगे कि मैं कौन हूं।'

'नहीं.. .यहीं बताओ?'

' लगता है आपको पुड़िया चाहिए नहीं है।' वह सोच में पड़ा रहा।'

'ठीकी है ... अब मैं उसे फेकूगा तो नहीं लेकिन हां .... किसी दूसरे ज रूरतमंद की तलाश जरूर करूंगा।'

उसके होंठों पर ताला पड़ा रहा। चचा. ..मैं फोन रखने जा रहा हूं। अलविदा।'

सुनो! ' बोलते हुए भूपत ने जोर से थूकी निगली।

'हां चचा।'

'थोड़ी देर रुको.. .मैं...मैं आता हूं।'

'ठीकी है।'

'तुम मिलोगे कहां हैं ?'

'आप बाहर निकलें तो सही , मैं आपको किसी भी वाजिब जगह पर मिल जाऊंगा !'

' मैं आ रहा लूं।' इतना कहकर भूपत ने रिसीवर क्रेडिल पर रख दिया। फिर वह किचन में

पहुंचा। उसने अपनी असिस्टेंट को आवश्यकी निर्देश दिए और फिर वहमक्खन लेने के बहाने से बाहर निकला।

दरबान ने उसे टोका भी तो उस ने मालिकी पर आरोप लगाते हुए कहा- ' क्या करू भैया, छोटी-छोटी चीजें भी मुझे ही लेने जाना होता है। अब मक्खन खत्म हो गया। अभी कोई दूसरी चीज खत्म हो जाएगी और मै तुम्हें फिर से दौड़ता हुआ नजर आने लगूंगा।'

दरबान तम्बाकू घिसता हुआ मुंह फाड़कर हंसा।

वह बाहर आकर इधर-उधर देखने के बाद दायीं ओर को चल पड़ा।

सड़की सूनी पड़ी थी-। दूर-दूर तक कोई नजर नहीं आ रहा था।

वह चलता रहा...लता रहा।

अचानका

पीछे से आने वाली एक कार के ब्रेकी ठीकी उसके बराबर में आकर चरमराए।

उसने चौंककर कार की ओर देखा। कार से एक हाथ बाहर निकला और उसने उसे कार के

अन्दर बैठ जाने का संकेत किया।

वह पहले झिझका , फिर उसने कार का दरवाजा खोला और अन्दर बैठ गया।

रंजीत लाम्बा कार की ड्राइविंग सीट पर नजर आया उसे।

वह लाम्बा को पहचानता था। आखिर विला में रहने वाले हर शख्स को नाश्ता , खाना, चाय-कॉफी वही तो बनाकर पेश करता था।

'तु म ! ' उसने चिंतित स्वर में कहा।

'हां चचा...मैं ...। तुम्हारा भतीजा। ' लाम्बा मुस्कराता हुआ बोला।

'लेकिन...।'

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'स वाल बाद में पहले ये लो। ' उसने दो पुड़ियाँ भूपत की गोद में डाल दी।

पुड़ियाँ देख भूपत की आंखों की चमकी बढ़ गई। उसने कांपते हाथों से दोनों पुड़िया संभाल लीं।

___ ' बाबूजी, आपने मुझे आउट हाउस में ही बुला लिया होता। ' वह कृतिया स्वर में बोला।

___ 'नहीं चचा...अब वहां मेरा जाना नहीं हो सकता।'

'क्यों?'

'सब बताउंगा । पहले आप यह बताएं कि पूनम किस हाल में है ?'

पूनम बिटिया की तो दुर्गत हो गई बाबूजी। '

'क्या हुआपूनम को ?' एकाएक ही लम्बा का स्वर कठोर हो गया। दांत भिंच जाने के कारण उसके जबड़ों के मसल्स उभर आए।

'पूनम बिटिया की पिटाई लगी और उसे अलग कमरे में बंद कर दिया गया है । दो आदमी हमेशा पहरे पर रहते हैं। मैं उसी पहरे के दौरान खाना देने जाता हूं।'
 
'चचा...उसे विला में किस जगह रखा गया है

भूप त ने बताया।

ठीकी हैं चचा...तुम अपनी पुड़ियों की फिक्र मत करना। मैं हर रोज तुम्हारा कोटा तुम तक पहुंचा दिया करूंगा। तुम पूनम तक सिर्फ इतनी खबर

पहुंचा देना कि वह घबराए नहीं। मैं बहुत जल्द उसे मिलूगा ।'

' पहूंचा दूंगा बाबू।'

उसके बाद लाम्बा उसे कार से उतारकर आगे बढ़ गया।

वह पुड़ियाँ जे ब में डाले वापस लौट चला। अब उसे वापस विला में पहुंचने की जल् दी थी। नशे का वक्त गुजर चुका था और वह नशे की सख्त जरूरत महसूस कर रहा था।

विला में दाखिल होते समय उसकी चाल में अतिरिक्त तेजी थी।

'क्यों भूपत... मक्खन नहीं लाए। ' पिछे से उभरने वाले दरबान के तीखे स्वर ने उसके दिल में हलचल मचा दी।

सचमुच मक्खन लेने वह न तो गया था और ना ही लेकर आया था। उस ने तो बहाना बनाया था।

उसकी हालत उस समय उस चोर जैसी थी जिसे रंगे हाथों पकड़ लिया गया हो । ' व . ..वो...वो...मक्खन मिला...मिला नहीं। हां...मैं सच कह रहा हूं। ' उसने अपनी

.

.

.

.

.

सफाई देने की कोशिश की तो उसकी जुबान-लड़खड़ा गई।

दरबान हंसा।

बोला- ' तो मैंने कब कहा कि तुम झूठ कह रहे हो । नहीं मिला होगा। मगर तुम इस तरह से अचानकी ही बौखला क्यों गए ?'

'न... न... नहीं। नहीं तो।'

'लगता है कुछ परेशान हो। आज अंटा मिला नहीं क्या ?'

'मजाक मत करो यार। ' अपने आपको संयत करते हुए उसने बात बनाई और यहां से चलता हुआपोर्टिको की ओर बढ़ता चला गया।

रंजीत लाम्बा ने देशमुख के रसोइए भूपत को माध्यम बना लिया। इग्ज की उसकी कमी लाम्बा के लिए लाभकारी सिद्ध हुई। ?'

कॉर्डलैस टेलीफोन जिस पर कि पहले से ही लाम्बा ने संपर्की बनाया हुआ था, भूपत खाने के सामान की ट्रा ली में रखकर पहरेदारों की नजरों से बचाकर पूनम के कमरे के अंदर ले गया।

' ले जाओ ये खाना ! नहीं खाना मुझे!' पूनम गला फाड़कर चिल्लाई।

'ऐसा नहीं कहते मालकिन। खाना खा लो। ' भूपत उसके करीब पहुंचकर रहस्यपूर्ण स्वर में बो

ला।'

'नहीं खाऊंगी।'

' खा ओ तो छोटी मालकिन... आज स्पेशल डिश है। 'ट्राली की और देखते हुए वह असमंजस की स्थिति में आ गई भूपत द्वारा किए जाने वाले इशारों को वह पूरी तरह सम झ नहीं पा रही थी।

'खाकर तो देखो मालकिन.. .आपका सारा गुस्सा दूर हो जाएगा । ' भूपत ने डोंगे का ढाक्कन उठाते हुए कहा।

उसने डोंगे में देखा।

डोंगे में खाने की वस्तु के स्थान पर फोन रखा था। छोटा-सा रिसीवरनु मा फोन जिसके लिए क्रेडिल की आवश्यकता नहीं होती।

फोन को देखने के-बाद शह भूपत की ओर देखने लगी।

'मालकिन , मैं पहरेदारों को देखता हूं आप बात कर लें। ' भूपत फुसफुसाहट भरे स्वर में कहता हुआ वहां से दरवाजे की ओर बढ़ गया।

अचम्भित-सी स्थिति में पूनम ने टेलीफोन रिसीवर उठाकर कान से लगा लिया।

हैल्लो...। ' सस्पेंस में भरी हुई वह अत्यत धीमे स्वर में बोली।

___'पूनम.. . पूनम तुम कैसी हो?' दूसरी ओर से लाम्बा का उत्तेजनापूर्ण स्वर उभरा।

रंजीत...ओह रंजीत...तुम कहां हो ?' उसकी तड़प उसके स्वर से झलकने लंगी।

' मैं जहां भी हूं ठीकी हूं। तुम बताओ?'

'म... मैं कैद में हूं।'

'घबराओ नहीं।'

'मुझे यहां से ले चलो रंजीत। ले चलो।'

' ले चलूंगा। मैं तुम्हें वहां उस कैद मै नहीं रहने दूंगा। यही कहने के लिए तुमसे संपर्की बनाया है। मुझे मालूम हो गया था कि तुम्हें एक कमरे में बंद किया हुआ है। मैं सिर्फ तुम्हारी स्वीकृति चाहता था।'

'मुझे यहां घुट न हो रही है। एक-एक सांस भारी पड़ रही है।'

'तुमने खाना छोड़ रखा है ?'

'कुछ अच्छा नहीं लग रहा था। तुम्हारी याद करके पड़ी रोती रहती थी।'

'मूर्खता छोड़ो। खाना खाओ। मै कभी भी तुम्हें आजाद कराने को आ सकता हूं। '

'जल्दी आना।'

' बहुत जल्दी।' ' मैं इंतजार करूंगी।'

ओ० के० ! फिर बंद कर रहा हूं।'

' अभी ठहरों।'

'क्यों?'

'एक पप्पी...। ' कहते हुए पूनम ने माउथपीस पर चुम्बन अंकित कर दिया।'

दूसरी ओर से भी चुम्बन की आवाज उभरी। उसके बाद संपर्की कट गया।

पूनम ने फोन पुन: डोंगे सें रखकर ऊपर से उसका ढक्कन बंद कर दिया।

'काका! ' उसने दरवाजे के निकट खड़े भूपत को बुलाया।

'हां मालकिन ?'

'आज मैं पेट भर खाऊंगी। तुम ने बहुत अच्छा खाना बनाया है।'

' आपका नमकी खाया है छोटी मालकिन। आपके लिए तो कुछ न कुछ करना ही था।'

'ठीकी है...तुम इसे ले जाओ। ' उसने डों गे की ओर संकेत किया।

'कोई जल्दी नहीं हैं छोटी मालकिन...आप आराम से खा , लें फिर जैसे इसे लाया हूं वैसे ही वापस भी ले जाऊंगा।'

__'नहीं, अभी ले जाओ। क्योंकि अगर दूसरी तरफ से किसी ने इसका नम्बर डायल कर दिया तो यह फौरन बजने लगेगा और पहरेदारों के कान खड़े हो जाएंगे।'

' हां...यह तो मैंने सोचा ही नहीं था।'

'जल्दी -ले जाओ।'

'जो आज्ञा छोटी मालकिन। ' कहने के साथ ही भूपत ने डोंगा उठा लिया। वह उसे लेकर इस प्रकार चलने लगा मानो खाने की कोई वस्तु उसमें लिए जा रहा हो। कमरे के दरवाजे के समीप पहुंचकर वह ठिठका। उसके दिल को धड़कनें बढ़ने लगीं

उसने कमरे के बाहर कदम रखा।

खिला दिया जाना ?' एक पहरेदार ने उसे-कठो र स्वर में पूछा।

वह घबरा गया।
 
'हाँ ... हाँ... खिला दिया। '

'बङी जल्दी खिला दिया। ' दूसरा पहरेदार बोला।

'नहीं...वो दरअसल छोटी मालकिन ने अभी शुरू किया है। मेरा मतलब...खाना शुरू करने से है वरना वो तो खा ही नहीं रही थी। '

_ 'तो फिर खिला न बैठकर , जा कहा रहा है

'खीर लेने। खीर के डोंगे की जगहमैं दूसरा डोंगा गलती से रख लाया। '

'थोड़ी खीर हमको भी टेस्ट करा ना । '

'हां-हां कराऊंगा।' की हने के साथ भी भूपत ने कदम आगे बढ़ा दिए।

अभी वह दो कदम ही चल पाया था कि डोंगे में रखा फोन बज उठा।

उसके हाथ कप गए।

डों गा , हाथों से छूटते-फूटते बचा।

दिल उसे अपने हलकी में घजूता महसूस हो ने लगा । धड़कनें हथौड़े की तरह ब जने लगीं।

डोंगा पकड़े व ह कंपकंपाती टांगों से तेजी से अग्रसर हुआ।

टेलीफोन था कि बजे चल्जा रहा था।

दोनो गार्ड चौंके।

'ऐई ठहरो! ' एक गार्ड हाथ उठाकर चिल्लाया।

भूपत को लगा जैसे कोई उसकें जिस्म से उसके प्राण खींचकर बाहर निकालने का प्रयत्न कर रहा हो।

वह अपनी जगह इस तरह का ठ होकर रह गया मानो उसका तमाम जिस्म एकाएक जादू के

जोर से पत्थर का बना दिया गया हो।'

उसकी ऊपर की सांस ऊपर और नीचे की

नीचे।

टेलीफोन अभीभी बज रहा था ।

उसकी घंटी की आवाज उसके दिमाग में भयानकी धमाकों की तरह टकरा रही थी।

दोनों गार्ड तेजी से चलते हुए उसके निकट पहुंचे। उन्हें जो शंका थी व ह सच नि कला। टेलीफोन निश्चित रूप से डों गे के अन्दर से बज रहा था।

भूपत की स्थिति रंगे हाथों पकड़े गए चोर जैसी ही थी।

पसीने-पसीने हो रहा था बह और उसके चेहरे पर राख जैसी सफेदी फैल गई थी।

तो खीर लेने जा रहा है ?' एक गार्ड अपनी गन कंधे पर रखता हुआ गुर्राया।

वह इस प्रकार खामोश खड़ा रहा जैसे उसके मुंहमें जुबान ही न हो।

खीर घंटी वाली लगती है। ' दूसरे गार्ड ने फिकरा कसा।

पहले वाले गार्ड में हाथ बढ़ा कर डोंगे का दक्कन हटा दिया। .

डोंगे के अन्दर रखा टेलीफोन साफ नजर आने लगा।

तो यह है वह खीर जिसे तुम गुपचुप-गुपचुप पका रहे थे... क्यों ?'

भूपत को ऐसा लग रहा था कि किसी तरह जमीन फट जाए और वह उसमें समां जाए। उसने बोल ने की कोशिश जरूर की मगर उसके मुंह से बोल न फूट सका।

कमरा बन्द कर और बड़े मालिकी के सामने इसे पेश कर दे वरना कोई बात अगर हो गई तो हम दोनों को सजा मिलेंगी। ' दूसरा गार्ड निर्णायकी स्वर में बोला।

'नहीं-नहीं..। ' भूपत यकायकी ही गिड़गिड़ाने लगा- ' ऐ सा गजब मत करो। मालिकी मुझे नौकरी से निकाल देंगे। मुझ पर दया करो! '

'तेरे पर दया की तो हम नौकरी से हाथ धो बैठेंगे।'

किसी को पता नहीं चलेगा। मुझे जाने दो। ' उसने आगे बढ़ना चाहा किन्तु आगे वाले गार्ड ने उसका कॉलर पीछे से थाम लिया। फिर उसके गिड़गिड़ाने का गार्ड पर कोई असर नहीं हुआ! वह

उसे माणिकी देशमुख के सामने पेश करके ही माना।

रंजीत लाम्बात माम तैयारियों के साथ अपनी कार ड्राइव करता माणिकी देशमुख की विला की ओर बढ़ता चला जा रख था।

कार की गति सामान्य थी और वह सिगरेट के कश लगाने के साथ व्हि स्की की बोतल से चूंट भी

भरता जा रहा था। कई बार उसने लम्बे-लम्बे चूंट भरे।

हल्का नशा भी हो चला था उसे।

आगे मोड़ आया। मोड़ काटने के बाद सड़की वीरान नजर आने

लगी।

अचानक।

अचानकी ही पीछे से एक कार उसकी कार को ओवरटेकी करती हुई निकली। उसकी खिड़की से एक गन की बैरल झांकी रही थी।

गन के दहाने ने आग उगलनी शुरू कर दी।

दनदना ती हुई गोलियां उसकी कार की वि न्ड स्की री न को छलनी करती चली गई । अगर वह फिरती से झुकी न गया होता तो अभी तक उसकी

लाश कार में पड़ी होती क्योंकि गोलियां उसका भेजा उड़ा देने में किसी भी प्रकार की देरी न करतीं।

उसने नीचे झुकने के साथ ही साथ ब्रेकी भी लगा दिए थे।

उसकी कार ची-चीं की ध्वनि , करती घिसटती चली गई । आक्रमणकारी कार से अभी भी फायरिंग जारी थी, जबकि वह कार आगे बढ़ती ही जा रही

थी।

उसने फुर्ती से कार -हल की , अपनी साइड का दरवाजा खोला और गन सीधी करता हुआ सड़की पर लुढ़की आया।

दूर होती आक्रमणकारी कार को लक्ष्य करके उसने भी गोलियां बरसानी आरंभ कर दी।

स्वचालित गन से गोलियों की बाड़ छूटी और आगे वाली कार के दाहिने पहिए का काम तमाम हो गया।

वह कार बुरी तरह लड़खड़ाई। उलट ही जाती , अगर उसके ड्राइवर ने अपने कुशल संचालन से बचा न लिया होता।

फिर भी संतुलन बिगड़ने से बचाने की कोशिश में का र सड़की के किनारे के खंभे से भिड़ गई।'

लाम्बा निरंतर कार को दिशा में गोलियां बरसाए जा रहा था।

कार के अन्दर से थोड़े से अन्तराल के बाद कई गनों के दहाने झांककर गोलियों का जवाब गोलियों से देने लगे। लाम्बा को अपनी कार की ओट में पोजीशन संभालनी पड़ी।

दोनों तरफ से गोलियां चलने लगीं।

दुश्मन पक्ष फ्रट पर युद्ध करने वाले सैनिकों की भांति नपी-तुली फायरिंग कर रहा था।

लम्बा को लगा कि वह पुलिस के आने पर भाग नहीं सकेगा। इसलिए उस खेल को शीघ्र ही समाप्त कर देने के लिए उसे अगला कदम उठाना पड़ा।

यूं भी उसे देशमुख की बेटी को उसके विल से निकालने की बहुत जल्दी थी।

__ वह कोहनियों के बल रेंगता हुआ कार के दरवाजे के समीप पहुंचा और फिर अंदर से उसने एक बड़ी-सी खतरनाक आकार की गन निकाल ली।

गन को लोड करके वह सड़की पर फैलता हुवा पोजीशन लेने लगा।

सामने से चलने बाली गोलियां उसकी कार की बॉडी से टकरा रही थीं।

उसने कार को लक्ष्य लेकर गन का ट्रेगर खींचा।

यूं लगा जैसे गन से प्रक्षेपास्त्र छूटा हो ।

पलकी झ पकते आग का गोला दुश्मन की कार से टकरा गया

विस्फोट !

विस्फोट हुआ और विस्फोट के साथ ही दुश्मन की कार के परखच्चे उड़ गए। कार आग के शोलों में लिपटी हुई हवा में उछलने के बाद टुकड़ों में विभक्त होती हुई नीचे आ गिरी।
 
खतर नाकी बारूदी करतब दिखाने के बाद लाम्बा ने डरावनि गन को कार के अन्दर फेंका और दूसरी मन उठाकर वह घटनास्थल की ओर दौड़ पड़ा।

वहां सड़की का दृW अत्यन्त डरावना बना हुआ था।

तीन-स्थानों पर कार के टुकड़ों में आग लगी हुई थी।

दो आदमियों की क्षत-विक्षित लाशों के टुकड़े थे और घने धुएं के बीच एक घायल व्यक्ति था जिसे अपनी अन्तिम सांसों में भयानकी पीड़ा का सामना करना पड़ रहा था।

लम्बात जी से उसके निकट पहुंचा।

उस व्यक्ति का बायां हाथ विध्वंकी बिस्फोट में कहां उड़ गया था। कुछ पता नहीं चल रहा था। पेट की चर्बी जलकर बाहर आ गई थी।

हौलनाकी दृश्य था।

' किसके आदेश से मुझे मारने आए थे? लाम्बा उसके निकट बैठता हुआ बोला।

'पीटर...पीटर के आदेश से। ' वह घायल बड़बड़ाया।

'कौन-कौन था तुम्हारे साथ ? पीटर कहा है ?

वह पीड़ा से छटपटाया।

उसने बोलने की कोशिश की मगर वह बोल न सका । ऐढ़िया रगड़ने के बाद उसने दम तोड़ दिया।

उसी समय पुलिस का कर्कश सायरन दूर से बजता हुआ सुनाई पड़ा।

लम्बा एक पल को ठिठका तत्पश्चात् उसने अपनी कार की ओर दौड़ लगा दीं। वह तेजी से कार के अंदर जा बैठा। कार का इंजन स्टार्ट था ही। उसने उसे गेयर में डालकर आगे बढ़ा दिया।

कर तोप से छूट गोले की भांति वहां से निकल भागी।

वह कार की रफ्तार निरंतर बढ़ाता चला जा रहा था।

वीरान पड़ी सड़की पर कार जेट विमान जैसी रफ्तार से भागती चली जा रही थी। बड़ी तेजी से उसने एक पतली गली की सहायता से सड़की बदल

ली।

वह दुर्घटनाग्रस्त सड़की पर पुलिस के हाथों पड़ना नहीं चा हता था।

दूसरी के बाद तीसरी सड़की और फिर वह घनी गलियों का क्षेत्र पार , कर घटनास्थल से बहुत दूर -निकल गया।

םם

लम्बा ने फोन पर भूपत से संपर्की स्थापित करने का प्रयास किया। पहली बार किसी गार्ड ने फोन रिसीव किया। दूसरी बार विनायकी देशमुख ने।

विनायकी का स्वर वह भली-भांति पहचानता था।

उसकी आवाज सुनते ही लाम्बा ने फोन डिस्कनेक्ट कर दिया। उसकी समझ में इतना नहीं आ रहा था कि जो नम्बर भूपत ने उसे दिया था , उस पर अब भूपत मिल क्यों नहीं रहा था।

तीसरी कोशिश में भी उसे नाकामयाबी ही मिली।

वह दो तरह के फैसलों में अटककर रह गया।

एक तो यह कि या तो भूपत किसी तरह फंस गया है या फिर उसने ज्यादा नशा कर लिया है, इस वजह से अंटा गाफिल हुआ वह किसी कोने में पड़ा है

चौथी कोशिश उसने नहीं की।

वह विला के पिछले भाग में पहुंचा और फिर उसने एक संकरी-सी गली में अपनी कार छिपा दी।

वह गली नहीं दो कोठियों के बीच का खाली गैप था। वहां रोशनी नहीं पहुंच पा रही थी , इस वजह से वह छोटी गली अंधेरे में डूबी थी।

गली , कोठियों की उस लाइन के अगले और पिछले भाग को जोड़ती थी।

पीछे पतली सड़की और सामने मुख्य सड़क।

कार का दरवाजा खोलकर लम्बा बाहर निकला।

उसके ओवरकाट के कॉलर खड़े थे और फैल्ट हैट चेहरे पर झुकी हुई थी। सिगरेट के कश लगाता हुआ वह चेदी सड़की की ओर निकल आया।

सड़क पर ट्रैफिकी हल्का था।

रात के अंधेरे में पैदल चलने वाले मुश्किल से ही नजर आपा रहे थे।

ज्यादातर अंधकार भरे भागों में होता हुआ वहमाणिकी देशमुख की विला के सामने से गुजरा।

आयरन गेट से ज ब उसने अन्दर झांका तो उसे पो र्टि को के समीप अच्छी-खासी हलचल नजर आई। पहली बार में वह कोई फैसला न कर सका। उसे लगा कि वहां की सुर क्षा व्यवस था अवश्य कुछ मजबूत कर दी गई है।

उस सुरक्षा व्यवस्था के होते वह विला में दाखिल होते ही पकड़ा जा सकता था।

और!

पकड़े जाने की सूरत में जो नतीजा होना था , उससे नावाकिफ नहीं था।

उसे मालूम था कि उसके पकड़े जाते ही उसे चला दी जाने वाली थी।

उसने जल्दबाजी मैं कदम उठाने से बेहतर विला का चक्कर लगाना उचित समझा। दूसरे चक्कर में उसे कुछ लोगो कारों में बैठते नजर आ वह तेज कदमों से अपनी कार की ओर बढ़ गया।

कुछ दूर जाने के बारद जब उसने मुड़कर देखा तो उसे सफेद रंग की रह रॉयस आयरन गेट से बाहर निकलती नजर आई।

उस सफेद रालस को वह अच्छी तरह पहचानता था।

वह जानता था कि उस शानदार कार में उस विला का मालिकी माणि की देशमुख ही यात्रा किया

करता था।

रॉल्स के पीछे एक एंबेसडर और एंबेसडर के पीछे एक जिप्सी थी।

वह समझ गया कि माणिकी देशमुख अपने लाव-लश्कर के साथ कहीं जा रहा है और वह यह भी समझ गया था कि वह लाव-लश्कर उसकी बजह से ही था।

देशमुख को अपनी जान का खत रा था।

तीनों कारें बाहर सड़की पर आ गई ।

लम्बा लपकता हुआ कार तक पहुंचा। उसके बाद वह बहु त सावधानी के साथ उन तीनों कारों के पीछे अपनी कार को दौड़ाने लगा।

उसने अपनी कार की सभी लाइटें ऑफ कर रखी थी । वह आगे चलने वाली कारों की लाइटों के मार्गदर्शन पर ही चल रहा था।

कारें दौड़ती रहीं।

पीछा होता रहा।

और अन्त में !

अन्त में रॉ ल स रॉ ल स , एंबेसडर और जिप्सी तीनों कारें एक विशाल इमारत के कम्पाउण्ड में दाखिल हो गई।

इमारत के आधे भाग में रोशनी थी, आधे में अंधेरा।'

लाम्बा ने अपनी कार उस इमारत से बहुत पहले ही रोकी ली।

वह कार से बहार निकलकर पैदल ही इमारत की ओर बढ़ चला। उसकी आंखेंइधर-उधर घूम रही थीं।

उसने पूरी सावधानी के साथ इमारत का चक्कर लगाया। तत्पश्चात् वह इमारत के पिछले भाग से बाउंड्री ताल पार करके कम्पाउण्ड में आ गया।

पिछले भाग में कुछ सामान और ड्रम आदि पड़े थे और वहां से ऊपर चढ़ने , वाली सीढ़ियां भी थी । किन्तु सीढ़ियों के दरवाजे पर ताला पड़ा था।

उसने दीवार के सा थ सटकर खड़े होते हुए जेब से चाबियों का गुच्छा निकाल लिया , फिर वह उस ताले को खोलने की कोशिश में जुट गया।

___आठ चाबियां बदलने के बाद नवी चौबी ने काम किया और ताला खुल गया।

कुण्डी निकालकर उसने दरवाजे को अंदर की तरफ ठेला।
 
दरवाजा हल्की चरमराहट के साथ खुल गया।

उसने ओ व रकोट के अन्द र वाली जेब से पिस्तौल निकाली और फिर वह बिना आहट किए सीढ़ियां चढ़कर ऊपर पहुंच गया।

ऊपर गलियारा था। गलियारे के बाद एक अंधेरे भरा हॉल और आगे पुराने डिजाइन की रेलिंग।

रेलिंग चरों तरफ बनी थी। बीच में एकदम समान्तर टंगा बडा-सा झूमर बता रहा था कि वह झूमर किसी बड़े हॉल की शोभा बना हुआ था।

धानी वह भाग इमारत के ग्राउंड फ्लोर पर बना हुआ एक बड़ा हॉल था ।

कुछ लोगों की बातों का हल्का -सा शोर हॉल में उ भर रहा था।

वह धीरे-धीरे दबे पांव रेलिंग के करीब आया । उसने झांककर नीचे देखा फिर तुरन्त ही पीछे हट गया ।

हॉल में कितने ही लोग थे।

उसे ओट की जरूरत थी । यूँ एकएक ही सामने आजाने से किसी की भी नजर ऊपर उठ स की ती थी।

वह दबे पांव रे लिंग के उस खम्बें की ओट में पहुंचा जिसका रेलिंग को साधने के लिए बीच में सपोर्ट दिया गया था।

नीचे झुककर उसने अपने आपको खं भे की ओट में छिपा लिया।

वहां से उसे नीचे देखने में न तो कठिनाई हो रही थी और ना ही उसके देख लिए जाने का ख तरा

था।

उसने देखा।

हॉल में लम्बी-सी टेबल पड़ी थी।

टेबल के एक सिरे पर चार लम्बे-चौड़े व्यक्ति थे। उन चारों के कंधों पर लम्बी-लम्बी स्वचालित गनेल ट की हुई थीं और सिर से लेकर गर्दन त की का हिस्सा आंखों को छोड़की र कपड़े से डंका हुआ था

देखने से ही वे बेहद खतरनाकी नजर आ रहे

थे।

टेबल के दूसरे किनारे पर था मालिकी देश मुख अफने लैफ्टीनेंट कोठारी के साथ । कोठारी के पीछे मौ जूद आदमियों में जोजफ सबसे आगे था।

बराबर में मै जूद था वि नायकी देश मुख , माणिकी देश मुख का बेटा।

एक नकाबपोश में लाल रंगा का सूटकेस खोलकर उसे माणिकी देशमुख की ओर धकेल दिया |सुटकेश नोटों की गड्डियों से भरा हुआ था ।

वह ज्यादा दूर न घिसट सका ।

टेबल के मध्य मे पहुंचकर रुकी गया।

__'बीस लाख पूरे हैं...चाहो तो गिन लो! ' एक नकाबपोश जो शायद अपनी आर्गेनाइजेशन का कोई औहदेदार था , अपनी खतरनाकी आंखों से माणिकी देशमुख को घूरता हुआ बोला।

कोठारी ने सूटकेस उठाने के लिए आगे बढ़ना चाहा , लेकिन माणिकी देशमुख ने उसे आगे न बढ़ने दिया।

'जोजफ! ' उसके स्वर में मानो जोजफ के लिए आदेश समाहित था।

जोजफ तुरन्त पीछे से आगे निकला। उसने सूटकेस उठाया और उसे ले जाकर माणिकी देशमुख के सामने रख दिया।

देशमुख ने दो-चार गाड्डियां उलट-पलटकर

देखीं।

फिर संतुष्टिपूर्ण ढंग से उसने सूटकेसब द करके विनायकी की ओर बढ़ा दिया।

काम हो जाएगा। ' उसने चारों नकाबपोशों की ओर नजरें उठाते हुए कहा।

'काम इतनी सफाई से होना चाहिए कि किसी को बाद में कुछ पता न चल सके। पुलिस उस विस्फोट के गुब् बार में कुछ भी तलाश न कर सके।' नकाबपोश उसे समझाता हुआ बोला।

' ऐसा ही होगा।'

'एक बात और।'

'कहो ?'

' आर० डी० एक्स० की मिकदार इतनी ज्यादा कर देना कि आसपास सिर्फ मलबा ही मलबा बाकी रह जाए। उस मलबे मैं लाशों के ऐसे टुकड़े होने चाहिए जिनसे किसी की शिनाख्त भी न हो सके।'

_' इसके लिए तुम्हें ज्यादा आर० डी० एक्सल सप्लाई करना होगा।'

' जितना कहोगे...हो जाएगा।'

'एक बात का ध्यान रखना , पुलिस आजकल कुछ ज्यादा ही सरगर्म है। जगह-जगह छापे पड़ रहे हैं , तलाशियां हो रही हैं। '

'हमजाते हैं। पुलिस की फिक्र मत करो, अगर पुलिस हमारे रास्ते में आई तो हम पुलिस से भी टकरा जाएंगे।'

'सवाल टकराने का नहीं, सवाल है सफाई के साथ अपना काम निकाल लेने का।'

'वैसा ही होगा।'

'रिस्की आर० डी० एक्स० को इधर से उधर पहुंचाने में है।'

'हमारा काम एकदम सटीकी होगा। जहां कहोगे...हम आर० डी० एक्स० पहुंचा देंगे। आगे उसे सैट करना तुम्हारा काम होगा।'

'कितना आर० डी० एक्स ० दे सकते हो ?'

'हम आर० डी० एक्स० का ढेर लगा सकते हैं। इतना आर० डी० एक्स० दे सकते हैं जो इस शहर के एक चौथाई हिस्से को मलबे की शक्ल में तब्दील कर सके।'

'नहीं...इतना नहीं चाहिए।'

जितनी भी जरूरत हो, बला दो। '

विनायकी ने तुरन्त माणिकी देशमुख के कान में कुछ कहा जिसके उत्तर में उसने स्वीकृति में गर्दन हिला दी।

'कोई खासबात है क्या ?'

'नहीं...कुछ नहीं । '

' तो फिर हमारा सौदा पक्का हुआ न ?' ' बिल्कुल पक्का।'

'नेता श्याम दुग्गल के जिस्म के टुकड़े भी नहीं मिलने चाहिएं।'
 
'नहीं मिलेंगे।'

' उसे विशेष सुरक्षा सुविधा हासिल है। ध्यान रखना , कहीं हल्की-सी भी चूकी न हो जाए। तुम्हारी

तरफ से की जाने वाली कोई भी छोटी से छोटी गलती तुम्हे बड़ी मुश्किल में पहुंचा देगी । '

'जानता हूं।'

'अब यह बताओ कि आ र० डी० एक्स० किस ऐड्रेस पर भेज दूं?'

माणिकी देशमुख ने एक पता बताया जिसे सुनते ही लाम्बा ने अपने दिमाग में नोट कर लिया।

' वहां कौन मिलेगा?'

' मेरा बेटा। ' माणिकी देशमुख ने विनायकी के कंधे पर हाथ रखते हुए कहा।

'ठीकी है तो सारा प्लान तय हुआ। अब हम चलते हैं। कल आर० डी० एक्स ० उस जगह पहुंच जाएगा।'

माणिकी देशमुख ने उन चारों का अभिवादन किया।

वे चारों एक कतार में हॉल से बाहर निकल

गए।

लम्बा अपने स्थान पर छिपा रहा ।

उसका दिमाग तेजी से काम कर रहा था। उसने तुरन्त ही उसब विल्डिंग से बाहर निकलने का फैसला कर लिया।

वह उन चारों खतरनाकी नकाबपोशों के पीछे जाना चाहता था , लेकिन जब तक उसने सीढियां उतरकर बाउंड्री वॉल पार की , तब तक किसी कार के इंजन का शोर उभरकर दूर होता चला गया।

वह यह भी न देख सका कि इमारत से बाहर निकलने वाली कार कौन-सी थी और उसका नम्बर

क्या था।

उसके हाथ कुछ न लग सका।

उसे मालूम था , उसब विल्डिंग में माणिकी देशमुख का हीं कारोबार चलता था।

अभी तक वे तीनों कारें जिनमें देशमुख अपने आदमियों समेत वहां पहुंचा था , अन्दर ही थीं । इसका साफ मतलब था कि माणिकी देशमुख अभी

अन्दर व्यस्त था।

उसने एक मिनट सोंचा , अग ले ही क्षण वह अपनी कार की ओर चल पड़ा।

उसके दिमाग में नई योजना जन्म ले चुकी थी।

कार में बैठते ही उसने उसे स्टार्ट करके गति दे दी। वह तूफानी रफ्तार से अपनी कार माणिकी

देशमुख की विला की ओर दौड़ा ए चला जा रहा था।

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रंजीत लाम्बा ने माणिकी देश मुख के विला में उस समय सीधा धावा बोल देना उचित अवसर माना था। उसे मालूम था , उस समय विला में माणिकी देशमुख , विनायकी देशमुख , कोठारी और जोजफ में से कोई नहीं था।

उसकी कार धड़धड़ाती हुई विला के फाटकी को उड़ाकर अन्दर दाखिल होती चली गई।

वह यूं भी पूरी तैयारी के साथ आ रहा था। उरसका प्लान थोड़ा-सा लेट हो गया। दो कुत्ते भौंकते हुए कार की ओर दौड़ने लगे।

उसने एक हाथ से स्टेरिंग संभालते हुए पिस्तौल नि का ली और फिर दो ही फायरों ने कुत्तों

का भौंकना बंद कर दिया।

लेकिन!

विला के फाटकी के उड़ने का शोर , कुत्तों का भौंकना और पीछे से दरबान द्वारा

ललकारा जाना , कुल मिलाकर इतना बड़ा शोर हो गया था कि समूचे विला में जाग ही गई थी।

गार्ड अंधाधुंध गोलियां बरसने लगे थे।

उनकी समझ में नहीं आ रहा था कि क्या हुआ था।

लाम्बा ने तेजी से धावा बोला था ।

कुत्तों को निशाना बनाने के तुरन्त बाद उसने दो दस्ती बम विला के पोर्टिको वाले क्षेत्र में फेंके।

दीवारों को थर्रा देने वाले दो विस्फोट हुए।

विला के विभिन्न भागों से गोलियां चलाई जाने लगीं। लम्बा ने गैरेज वाली दिशा में अपनी कार रोकते ही पांच-छ: धुएं के बम आसपास के क्षेत्र में उछाल दिए।

धुएं के बमों ने आनन-फानन में वहां इतना धुवां फैला दिया मानों वहां कोई बहुत बड़ी काली घटा उतर आयी हो।

बारूद की तीखी गंध वहां हर तरफ फैल चुकी थी।

लाम्बा ने कुछ इस तेजी से हमला बोला था कि विला के हर क्षेत्र में अफरा-तफरी फैल गई।

किसी की कुछ समझ में नहीं आ रहा था।

और!

उसी अफरा-तफरी का फायदा उठाता लम्बा

विला में दाखिल होकर जा पहुंचा उस

कॉरीडोर में जिसके सिरे वाले कमरे में पूनम की मौजूदगी की खबर उसके पास थी।

कॉरीडोर एकदम खाली पड़ा था।

उसे लगा उसका रास्ता साफ था।

गन संभाले वह दबे कदमों से उस तरफ बढ़ने लगा। उसके कान आसपास की आहट सुनने के लिए पूरी तरह सजग थे।

नीचे मचे हड़कम्प की वजह से शायद ऊपर का ध्यान किसी को नहीं था।

उसे लगा उसके लिए रास्ता एकदम साफ है।

वह बिना आहट किए भूपत द्वारा बताए गए कमरे तक पहुंच गया।

कमरे के दरवाजे बंद थे।

उसने इधर-उधर देखा और फिर गन की बैरल से दरवाजे को अंदर की तरफ ठेला।

दरवाजा खुलता चला गया। पूनम उसे सामने ही बैड पर नजर आ गई।

वह तेजी से पूनम की ओर बढ़ने लगा। उस क्षण उसे लगा , पूनम के चेहरे पर विचित्र-से भाव आए हो।

___ अंतिम समय में पूनम ने जोर से इंकार में सिर हिलाया।

उसी क्षण।

एकदम से नीचे गिरते हुए उसने कुलांच लगाई। उसकी गन के दहाने ने आग उगली।

पीछे से प्रकट होने वाले दोनो गार्ड गोलियां के वेग के साथ पीछे वालो दीवार से जा टकराए और दीवार पर खून के दुब बे छोड़ते हुए फर्श पर ढेर हो गए।

चीख मारती पूनम फटी-फटी आंखों से उन दोनों लाशों को देखने लगी।

'पूनम चलो! जल्दी निकलो यहां से! ' फुर्ती से कमरे के बाहर निकलता हुआ लाम्बा उत्तेजनापूर्ण स्वर में चिल्ला या।

पूनम भयभीत अवस्था में उसके पीछे भागी

दोनों एक साथ कॉरीडोर में दौड़ने लगे! बाल कनी के समीप से गुजरते हुए लम्बा ने एक स्मोकी बम हॉल में फेंकी दिया।'

हल्के ध मा के के साथ विला के अंदर धुओं ही धुआ फैलता चला गया।

विला में मौत का तक छा गया।

हर एक बौखलाया हुआ था।

लम्बा वहां ऐसा टेरर फैला चुका था जिससे उबरने का अवसर किसी को भी नहीं मिल पा रहा

था। गार्ड इधर से उधर भाग रहे थे।

पूनम ने उचित समय पर लम्बा को नया रास्ता सुझाया।

विला को स्थिति से लम्बा की इतनी अच्छी वाकफियत नहीं थी जितनी अच्छी पूनम को थी। पूनम ने उसे दायी ओर वाले हॉल से । बाहर निकाल दिया। बाहर दायीं और संकरा पैसेज था जो आगे जाकर ड्राइव-वे से जुड

जाता था।

लेकिन अचानकी ही ड्राइ व- वे दो गार्ड पहुंचे और उनकी नजर लम्बा पर पड़ गई । उस तरफ धु आ कुछ कम हो गया था।

दोनों गार्ड ने जैसे ही अपनि -अपनी गर्ने तनी, पूनम तुरन्त लाम्बा के सामने आ गई।

'खबरदार , जो किसी ने गोली चलाई। ' उसने चिल्लाकर धमकी भरे स्वर में कहा।

गार्ड कर्त्तव्यविमुढ़ स्थिति में खड़े के खड़े रह

गए।

उनकी समझ में नहीं आ रख था कि वे किस तरह से पूनम को रोकें।

पूनम के पीछे से लम्बा ने भी अपनी गन उन दोनों की ओर ता नी हुई थी। वह अपलकी दोनों गा

डों को देख रहा था।

अगर गार्ड हलाकि-सी भी हरकत करते तो वह गोली चलाने को तत्पर था ।

दोनों ओं र तनावपूर्ण स्थिति थी।

सिर्फ पूनाम थी जो बीच में दीवार बनी हुई थी।

त म लोग रास्ते से हट जाओ !' पूनम ने आह त स्वर में कहा।

' नहीं ... हम देशमुख साह व को क्या जवाब देंगे। ' उनमें से एक गार्ड बोला।

_ 'तो! तुम मुझ पर गोली चला दो फिर जवाब दे देना।'

'नहीं !'

'तो फिर यहां से हट जाओ।'

'नहीं !'

पूनम असमंजस की स्थिति में कसमसाई।
 
वहां उसे एक-एक पल भरी प्रतीत हो रहा था। वह नहीं चाहती थी कि हाथ आया वह अवसर खाली चला।

जाए। उसे विला की कैद में गुजरा वक्त किसी खतरनाकी जेल से कम नहीं लगा था। इसलिए वह नहीं चाहती थी कि उसे उसका बाप फिर से उसी जेल

जैसी कैद में पहुंचा दे।

एकाएक उसने नया कदम उठाया।

रंजीत लाम्दा के होलक्टर में फंसे रिवॉल्वर को खींचकर उसने फुर्ती के साथ अपनी कनपटी पर उसकी नाल चिपटा ली।

'खबरदार! अगर तुम लोगों ने रास्ता नहीं छोड़ा तो मैं अपने-आपको गोली मार लूंगी ! ' उसने तीखे स्वर में चेतावनी दी।

'नहीं! हम रास्ता नहीं छोड़ेंगे।'

'रास्ता नहीं छोड़ोगे तो मुसीबत में पड़ जाओगे।'

'नहीं।'

'मेरी लाश यह कहने वाली नहीं कि मुझे किसने गोली मारी। मेरी मौत पर डैडी का बौखला

जाना स्वाभाविकी होगा और बौखलाहट में वह क्या कर जाएंगे , कुछ मालूम नहीं।'

दोनों गार्ड अभी उलझन में फंसे विचार कर ही रहे थे कि पूनम के पीछे से लाम्बा ने एक और धुएं का बम फेंका।

दोनों गार्ड चिल्लाते हुए पीछे हटे।

पलकी झपकते बादलों जैसा घना धुआ वहां फैल गया।

लाम्बा पूनम को अपनी बांहों मे उठाकर तेजी से बायीं ओर की दीवार से सटता हुआ भाग निकला।

हालांकि उसे कुछ नजर नहीं आ रहा था फिर भी अच्छा जे से भाग रहा था।

गोलियां चलने लगी थीं।

लेकिन उसकी , चालाकी कारगर साबित हुई थी। अगर वह उसी लाइन में भागता तो मुमकिन था कि गोलियों का शिकार हो जाता।

फिर उसने भागते-भागते आगे के रास्ते पर दो स्मोकी बम और फेंके। उसके बाद पीछे मुड़कर हैंड ग्रेनेड की पिन दांतों से खींचकर ग्रेनेड पीछे की दिशा में उछाल दिया।

कानों के पर्दे हिला देने वाला धमाका हुआ।

स्मोकी बम के ठहरते धुएं को यकायकी ही उड़ता ग्रेनेड का धुआ किसी तूफान की तरह भड़कता नजर आया।

पीछे उभरने वाली पगचा उस विस्फोट के साथ ही खत्म हो गई।

निकट ही लम्बा की कार थी।

वह फुर्ती से कार की ओर झपटा।

तभी अचानक!

कार की ओट से एक गनर सामने आया।

उसकी गन ने आग उगली।

लम्बा नीचे गिरा। उसने नीचे गिरते हुए अपनी गन से गोलियां बरसानी चाही थीं, लेकिन वह गनर कुछ ज्यादा ही खतरनाकी साबित हुआ।

उसने गजब की फुर्ती से अपनी गन पूनम की ओर तान दी।

'खबरदार! अगर कोई हरकत की तो इसका भेजा उड़ा दंगा। ' वह लम्बा की ओर देखता हुआ गुर्राया।

'नहीं।' लाम्बा चिल्लाया।

'गन वहीं छोड़ दो और दोनों हाथ सिर पर रखकर खडे हो जाओ।'

उसने तुरन्त आ ज्ञा का पालन करते हुए गन वहीं छोड़ दी और वह अपने दोनों हाथों को सिर पर रखकर धीरे-धीरे खड़ा होने लगा।

गनर पूरी तरह सावधान था।

वह कभी पूनम की ओर देखता तो कभी लाम्बा की ओर । उसे देखने से प्रतीत हो रहा था जैसे वह दोनों से बराबर का खतरा महसूस कर रहा था।

'देखो...मुझे जाने दो। ' पूनम प्रतिरोध पूर्ण स्वर में बोली।

'नहीं! खबरदार! कोई हकरत न करना !' वह बार-बार अपनी गन पूनम और लाम्बा की ओर घुमाता हुआ जोर-से बोला।

लाम्बा ने जान-बूझकर अपने हाथ नीचे करने का प्रयास किया।

'हाथ ऊपर ही रहने चाहिएं वरना। ' गनर उत्तेजना की अधिकता में सांस रोककर दांत पीसता हुआ कुछ इस प्रकार गुर्राया कि उसके गले की तमाम

नसें फूल गई।

लम्बा ने इस प्रकार उदास होकर हाथ ऊपर उठाने शुरू किए मानो गनर की सजगता की वजह से उसका कोई होता हुआ काम होत-होते रह गया हो।

'हाथ बीच में मत रोको। सिर तक पहुंचा

दो।'

ये लो।' लाम्बा ने खीझ के साथ दोनों हाथ अपने सिर पर रख लिए।

__' हमें जाने दो...प्लीज हमें जाने दो! ' पूनम ने गनर से विनती करते हुए कहा।

'नहीं!'

'हमें रोककर तुम्हारा कोई फायदा होने वाला नहीं।'

'फायदा नुकसान देशमुख साहब जानें। मेंने अपनी ड्यूटी करनी है।'

लाम्बा देख रहा था।

गनर उस समय पूनम की बातों में उलझा हुआ था। उसके अपने हाथ सिर पर थे ही। गनर के ठीकी पीछे पीठ वाले होलस्टर में उसका रिवाल्वर मौजूद था।

उसने बहुत छोटी-सी हरकत मात्र करनी थी।

पून म से बातों में व्यस्त समय को उचित अवसर मानते हुए उसने दायां हाथ थोड़ा-सा गर्दन के पीछे किया।

कोई हरकत हो रही है , यह जानकारी गनर को भी हुई।

उसकी पुतली फिरने से भी पहले लाम्बा फुर्ती के साथ पीठ वाले होलस्टर से रिवाल्वर खींचकर फायर झोंकी चुका था।

गोली बंदूकधारी का भेजा उड़ाती हुई निकल

गई।

बह प्रतिरोध स्वरूप कुछ भी न कर सका।

उसकी लाश लहराती हुई-सी नीचे गिरने

लगी।

लम्बात जी से दौडता हुआ अपनी कार में जा घुसा।

पूनम भी दूसरी ओर वाले दरवाजे को खोलकर अन्दर दाखिल हो गई।

उसके कार में बैठने से पहले ही कार स्टार्ट हो चुकी थी।

तत्पश्चात्।

यूं लगा मानो कार को पंख लग गए हों। वह तूफानी रफ्तार से दौड़ती हुई विला का फाटकी वाला स्थान पार कर गई।

फाटकी अब अपनी जगह बाकी नहीं था। उसे लाम्बा आते समय अपनी कार की टक्कर से उडा चुका था।

00

पुलिस के चले जाने के बाद माणिकी देश मुख विला के भूमिगत भाग में कोठारी और जोजफ से मिला।

उसका चेहरा बता रहा था कि वह बहुत अधिकी क्रोध में है।

कोठारी और जोजफ दोनों समझ रहे थे कि उनकी शामत आनी है अब। जो भी

होना था उसे बर्दाश्त करने के लिए वे चुपचाप सिर

झुकाकर उसके सामने खड़े हो गए।

कुछ देर तक वह खामोश रहकर अपलकी उन दोनों को घूरता रहा और फिर तीखे स्वर में गुर्राया - ' कितने सारे आदमियों के बीच से वह हरामजादा लाम्बा मेरी बेटी को उड़ा ले गया और-ये तमाम आदमी तेरे चुने हुए हैं कोठारी। तेरे हिसाब से तूने चु नींदा आदमी मेरी फौज के लिए इकट्ठे किए थे। योग्यताओं से भरपूर थे ये लोग...हां?'

.

.

.

कोठारी को ऐसा प्रतीत हो रहा था जैसे किसी ने उसे ऊपर से ठोंककर जमीन में घुटनों तक गाड़ दिया हो।

'वो ले गया...ले गया मेरी बेटी को उड़ाकर और तेरे ये मिट्टी के शे र उसके सामने घुटने टेककर खड़े हो गए।

-

-

'मेरे चुने आदमियों की कोई गलती नहीं है साहब। ' कोठारी दबे हुए स्वर में बोला।

'फिर मेरी गलती होगी।'

'नहीं।'

'फिर?'

'आप अगर याद करें तो आपको याद आएगा कि रंजीत लाम्बा का चुनाव भी मैंने ही किया था और कहा था कि वह वाहिद शख्स इतना ज्यादा खतरनाकी है कि बीस-तीस आदमियों पर भी भारी पड़ सकता है। वह बारूद है बारूद। ऐसा बारूद जिसे छूते ही छूने वाला जलकर राख हो जाया करता है। इसीलिए मैं नहीं चाहता था कि उससे किसी तरह की दुश्मनी हो।'

'दुश्मनी मैंने की है...मैंने ?' माणिकी देशमुख क्रोध में चिल्लाया।

मैं उस मामले को सुलझा सकता था। वह समझदार आदमी है। अगर मैं उसे समझाता तो वह पूनम बेबी के रास्ते से हट जाता। '

'कोठारी तू पागल हो गया है। क्या तू नहीं जानता कि माणिकी देशमुख की बेटी की तरफ गलत इरादों से उठने वाली आंख को निकाल लिया जाता है।'

'इस दुनिया में हर किसी को बाप बनाया गया है। 'कोठारी धीमे स्वर में बड़बड़ाया।

'तूने कुछ कहा ?'

' मैं यह कह रहा हूं साहब कि रंजीत लाम्बा अब कुछ नहीं कर सकेना। अगर उसने दोबारा विला में कदम रखने की कोशिश की तो वह बच के जा नहीं सकेगा।'

'अरे बेवकूफ, अब वह विला में कदम रखेगा ही क्यों.. उसने जो करना था वह वो कर

चुका। उसने बंदूकों के साए में छिपी पूनम को बड़ी आसानी से किडनेप कर लिया। '

उसने हम लोगों की गैर मौजूदगी का फायदा उठाकर यह काम किया है। '

'उसने जैसे भी किया मूर्ख! वहमेरी बेटी को ले उड़ा है और अब हमारे सामने सिर्फ एक ही रास्ता रह गया है।'

'कौन-सा रास्ता?'

'जितनी जल्दी हो सके हम उसे तलाश कर

लें।'

' पहले उसे तलाश किया जाए या फिर नेता श्याम दुग्गल के केस पर काम शुरू किया जाए? हमें वह काम भी जल्द से जल्द पूरा करना है। '

' हां... वह काम भी...।'

' ऐसे ही कामों के लिए रंजीत लाम्बा को रखा गया था। अगर इस वक्त वह हमारे साथ होता तो हमारे लिए किसी भी तरह की उलझन न होती। वह

अकेला ही श्याम दुग्गल का काम तमाम कर डालता।

'कोठारी!'

'यसब ॉस ?'

कुछ भी हो जाए , तेरे मुंह से उसके लिए तारीफ ही निकलती है। '

'वह है ही तारीफ के काबिल। '
 

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