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Thriller मिशन

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वर्तमान समय

हिमाचल प्रदेश

अगली सुबह ही राज ने धर्मशाला की बस पकड़ ली। उसे पता था उसकी मंजिल वही है। आठ बजे की निकली बस दोपहर बारह बजे से कुछ पहले ही धर्मशाला पहुँच गई। वहाँ का नज़ारा मनमोहक था। दूर-दूर तक बर्फ से ढकी धौलाधार श्रृंखला दिखाई दे रहीं थी। हरे-भरे पेड़ों से परिपूर्ण उस शहर का मौसम सुहावना था।

दोपहर होने के बावजूद मंडी की अपेक्षा धर्मशाला का तापमान ठंडा था।

बस से उतरकर राज ने बस अड्डे पर ही खाना खाया फिर एक टैक्सी से उस आश्रम की तरफ चल दिया।

वह आश्रम धर्मशाला के एक छोटे-से उपनगर मैक्लॉडगंज में स्थित था जो कि एक तरह से तिब्बतियों की भारत में राजधानी मानी जाती थी। वहाँ अनेकों बौद्ध मोनेस्ट्री थी। इसके आलावा सीनो धर्म के कुछ आश्रम भी थे।

कुछ ही मिनटों में वह अपनी मंजिल यानि ओसाका आश्रम पहुँच गया।

वह एक पहाड़ी के ऊपर निर्मित था, जहां जाने वाली सड़क संकरी थी, फिर भी कार या रिक्शा द्वारा आराम से ऊपर तक पहुँचा जा सकता था।

आश्रम की इमारत लाल-पीले रंग की थी, जो कि वृत्ताकार थी और वह तीन मंजिला थी, ऊपर के माले छोटे होते जा रहे थे और सबसे ऊपर एक छोटा-सा नुकीला गुम्बद बना था।

पीछे की ओर बर्फ से ढकी धौलाधार श्रृंखला थी जिसके दर्शन से अंतर्मन में एक सुखद अहसास होता था।

राज को आश्रम में प्रवेश करते ही बेहद अच्छा लगने लगा। काफी समय बाद मन में सकारात्मक भाव आ रहे थे।

वहाँ चारों तरफ भगवे कपड़े धारण किये दुबले-पतले पहाड़ी लोग घूम रहे थे। उनके सिर पर मात्र छोटी चुटिया भर के बाल थे। जिस किसी की भी नज़र राज पर पड़ रही थी वह उसका झुककर अभिवादन कर रहे थे। शायद वहाँ नये मेहमान का सभी इसी तरह स्वागत करते थे।

आश्रमनिवासियों के आलावा वहाँ कई और आगंतुक भी थे जो कि आश्रम के दर्शन करने आए थे।

भारत के पड़ोसी सीनो देश से उपजे सीनो धर्म के कई अनुयायी भारत में भी थे और उत्तर व पूर्वोत्तर भारत के पहाड़ी क्षेत्रों में इनकी काफी तादाद थी [4] । आश्रम में घूमते हुए एक पत्थर पर लिखी इबारत पर पढ़कर राज को पता चला कि ये आश्रम धर्मगुरु ओसाका ने नौ साल पहले स्थापित किया था और इसका उद्घाटन तत्कालीन हिमाचल प्रदेश के मुख्यमंत्री द्वारा हुआ था।

आश्रम में एक हॉलनुमा पूजास्थल था जहाँ बड़े-बड़े पानी के कलशों के बीच दीप जल रहे थे। दीवारों पर सीनो भाषा के बड़े-बड़े अक्षरों में विभिन्न मन्त्र लिखे थे। अनुयायी पूजा करते हुए उन मन्त्रों का उच्चारण कर रहे थे जिनका गुंजन हॉल में व्यापक हो रहा था। राज उस परिवेश में मंत्रमुग्ध-सा हो रहा था।

यहाँ पहले ही क्यों न आया।

कुछ देर में पूजा समाप्त हुई और वह हॉल से बाहर आया। उसे याद आया कि वह यहाँ किसी उद्देश्य से आया था। पूछताछ के लिये उसके पास मफलर वाले की कोई फोटो भी नहीं थी। फिर उसे कुछ ख्याल आया और उसने फोन में आरती की फोटो निकाली।

असली उद्देश्य तो यहीं है।

उसने वह फोटो आश्रमनिवासियों को दिखानी शुरू की। कुछ लोगों ने साफ़ मना कर दिया। फिर उसने वह फोटो वहाँ उपस्थित औरतों को दिखाया। उन्होंने राज को कोई जवाब तो नहीं दिया पर अब वह उसे उपेक्षित नज़रों से देख रहीं थीं। कुछ ने सीनो भाषा में उससे कुछ कहा, जिसका मतलब तो वो नहीं समझा पर भाव से समझ गया कि वे उसे वहाँ से जाने को बोल रही हैं।

तभी वहाँ उपस्थित एक जवान लड़की उठकर उसके पास पहुंची। वह शक्ल से शहरी लग रही थी।

“किसे ढूंढ रहे हो ?” उसने राज से पूछा।

राज ने उसकी तरफ देखा। उसने भगवे रंग का कुर्ता-पायजामा पहना हुआ था। उसके मुख से साफ़ हिंदी सुनकर राज को कुछ सुकून महसूस हुआ।

“इस लड़की को ढूंढ रहा हूँ। इसका नाम आरती है।”

“तुम्हारी रिश्तेदार है ?”

राज ने हामी भरते हुए कहा – “इसके माता-पिता बेहद दुखी हैं।”

“मेरे साथ आओ।” उसने कहा और एक तरफ बढ़ गई। एक कोने में सीढ़ियाँ थीं। वह उन पर चढ़ती चली गई। ऊपर राहदारी थी जिस पर किसी छात्रावास की तरह कई कमरे नज़र आ रहे थे।

वह एक कमरे में प्रविष्ट हुई। वहाँ एक लड़की कुर्सी पर बैठी खिड़की के बाहर पर्वतों का नज़ारा देखते हुए स्वेटर बुन रही थी।

“दीपिका!” उसने उसे पुकारा।

वह पलटी। उसने लड़की को देखा और फिर स्वतः ही उसकी नज़र उसके पीछे खड़े राज पर चली गई।

राज उसे ध्यान से देखते हुए धीरे-धीरे उसके पास पहुँचा। पहले तो उसे देखकर उसे लगा कि शायद कोई धोखा हुआ है। उसने कई बार मोबाइल पर आरती की फोटो देखी और फिर उस लड़की को देखा। लड़की की शक्ल मिलती-जुलती तो लग रही थी पर फिर भी नैन-नक्श कुछ बदले हुए से थे।

वह लड़की उठ खड़ी हुई और कुछ सहमे से स्वर में बोली, “कौन हैं आप ?”

“तुम आरती हो ?”

“नहीं! मेरा नाम दीपिका है।”

“तुम मंडी की रहने वाली हो ?”

“नहीं!”

“तुम दिल्ली में नौकरी करती थीं ?”

“नहीं!”

“तुम रमन आहूजा को जानती हो ?”

“नहीं! लगता है आपको कोई ग़लतफ़हमी हुई है।”

राज ने एक बार और मोबाइल पर आरती की फोटो देखी और फिर उस लड़की पर नज़र डाली। वाकई दोनों अलग थीं। पर फिर इस लड़की को कैसे धोखा हुआ। उसने पलटकर उसे सवालिया दृष्टि से देखा और फोन दिखाया।

“एक बार को देखने पर ये बिलकुल दीपिका जैसी लग रही है। मैं भी धोखा खा गई।” वह हँसी।

“आप यहाँ कब से रह रही हैं ?” राज ने दीपिका से पूछा।

“अभी कुछ ही दिन हुए हैं।”

“किस शहर से हैं ?”

“धर्मशाला से ही हूँ। अनाथ हूँ। पहले एक अनाथाश्रम में रहती थी। कुछ समय पहले इस आश्रम के बारे में सुना और क्योंकि मैं सीनो धर्म में शुरू से विश्वास रखती थी तो यहाँ आ गई।”

राज कुछ पल वहीं खड़ा रहा। अपने अगले कदम को लेकर वो विचारता रहा। फिर अचानक बोला-

“आपको कष्ट देने के लिये सॉरी! आपकी शक्ल काफी मिलती-जुलती है आरती से। दरअसल ये लड़की मंडी से गायब है। इसके माँ-बाप बेहद परेशान हैं।”

“ओह! मैं प्रार्थना करुँगी वो आपको जल्दी मिल जाये।”

“थैंक्स!” राज ने कहा फिर वापस नीचे की तरफ चल दिया। उसके साथ आई लड़की वहीं रुक गई।

राज नीचे आ गया।

ऐसा लग रहा था कि मंजिल मिल गई पर लगता है अभी मंजिल काफी दूर है।

नीचे आकर वह वापस पूजा वाले हॉल में आ गया। एक जगह पालथी मारकर बैठकर उसने आँखें मूँद ली।

यूँ तो राज शायद ही कभी किसी मंदिर गया हो पर आज इस आश्रम में आने के बाद उसे कुछ अलग महसूस हो रहा था। उसका मन उद्वेलित था। वह मन ही मन रिंकी की आत्मा की शांति की प्रार्थना करने लगा। वह इस बात के लिये भी प्रार्थना करने लगा कि उसे अपने ऊपर लगे इल्जामों से बरी होने के लिये सही मार्गदर्शन मिले।

कुछ देर बाद उसने आँखें खोलीं। उसने हॉल की दीवार पर आलोकित हो रहे मन्त्रों की तरफ देखा। अचानक उसकी नज़र उसके सामने रखे फूलों पर गई। उसने देखा पूजा करते हुए लोगों के सामने पुजारी, पुजरिनें प्रसाद की तरह फूल रख रहे थे। उसने दूसरों का अनुसरण करते हुए फूल उठा लिये।

तभी उसने देखा फूलों के बीच एक छोटा सा नोट था। उसने पढ़ा- ‘एक घंटे बाद आश्रम के बाहर मिलो।’

राज ने हैरानी से चारों तरफ नज़र घुमाई। उसे पीछे दीपिका लोगों के सामने अपनी डलिया से फूल रखती नज़र आई। उसने राज को अनदेखा कर दिया।

राज ने मुस्कराते हुए फूल और नोट अपनी जेब में रखे और आश्रम से बाहर की तरफ चल दिया।

☐☐☐

आश्रम से बाहर कुछ दूरी पर एक पान की दुकान से सिगरेट का पैकेट हासिल करने के बाद राज यूँ ही सड़क किनारे समय व्यतीत करने लगा।

करीब एक घंटे बाद दीपिका बाहर निकलती नज़र आई। राज के पास से निकालते हुए उसने एक सरसरी नज़र उस पर डाली और आगे बढ़ गई।

राज उसके पीछे चल दिया।

कुछ दूर जाने के बाद वे उस पहाड़ी के एक कोने पर आ गये जो कि एक सनसेट पॉइंट था। फिलहाल वहाँ ज्यादा चहल-पहल नहीं थी। दीपिका खाई के किनारे रेलिंग के पास जाकर खड़ी हो गई। सामने ऊंचे-ऊंचे पर्वत थे और उनके नीचे स्लेटी रंग के बादल तैर रहे थे।

राज उसके पास आकर खड़ा हो गया और सामने देखते हुए बोला-

“तो तुम ही आरती हो ?”

उसने स्वीकृति में सिर हिलाया।

“तुम यहाँ क्या कर रही हो ?”

“मैं अब इसी आश्रम में रहती हूँ।”

“क्या तुम्हारे माँ-बाप को इस बारे में पता है।”

उसने इंकार में सिर हिलाया। उसके चेहरे पर पीड़ा के भाव उभर आये।

“पापा-मम्मी कैसे हैं ?”

“तुम्हारे पेरेंट्स हैं, बुजुर्ग हैं, तुम्हें मालूम होना चाहिये।”

“आप...कौन हैं ?”

“एक सरकारी जासूस। मैं तुम्हें तलाशते हुए अब तक तकरीबन पूरा हिमाचल घूम चुका हूँ।”

“मुझे क्यों तलाश कर रहे थे ?

“रमन आहूजा के लिये।”

उसने पलटकर राज को ध्यान से देखा। राज को उसकी खूबसूरत आँखों में दुःख के भाव दिखे।

“क्या आप भी उसकी टीम में थे ?”

“कौन-सी टीम ?”

“धीरज के मिशन की टीम।”

“नहीं! पर मुझे उसके बारे में जानना है।”

“धीरज तो मर चुका है। अब आप लोगों को और क्या चाहिये ?” वह तड़पते हुए शब्दों में बोली।

शायद इसको पता नहीं है कि आहूजा की मौत मेरे हाथों ही हुई थी। अगर पता चला तो ...

“धीरज के मिशन के बारे में पूरी जानकारी जानना देश की सुरक्षा के लिये बेहद ज़रुरी है। मुझे उम्मीद है तुम उसके बारे में जो कुछ जानती हो सच-सच मुझे बताओगी।”

“बताने की नीयत न होती तो यूँ आप से मिलने न आती।” आरती उसे गौर से देखते हुए बोली, “आप तो मुझे पहचान नहीं पाये थे। वापस ही चले जाते न ?”
 
राज चुप रहा। आरती पलटकर नीचे वादियों की तरफ देखने लगी और बोली, “इन गहरी वादियों की तरह ही गहरे रहस्य थे उस शख्स के जिससे मैंने प्यार किया था। कभी सोचती हूँ अगर वह मेरी ज़िंदगी में न आया होता तो आज मेरी ज़िंदगी कितनी अलग होती। खैर, शायद भगवान को ये मंजूर नहीं था कि मैं एक साधारण ज़िंदगी जियूं।

“मैं दिल्ली में एक आईटी कंपनी में नौकरी कर रही थी। वहीं रमन आहूजा यूके में हमारा क्लाइंट था। अक्सर काम के लिये मेरी उससे बातें होती थी। धीरे-धीरे हम लोग दोस्त बन गये और फिर दोस्ती कब लगाव में बदल गई, पता नहीं चला। मुझे यह बिल्कुल भी नहीं पता था कि धीरज मल्टीनेशनल कंपनी में काम करने के अलावा एक इंटरपोल एजेंट भी था। हालाँकि उसने मुझे अपनी फैमिली के बारे में सब सच-सच बता दिया था। उसके फादर की कैसे करप्शन के हाथों बलि चढ़ी और फिर उसकी मां ने दूसरी शादी की और यूके शिफ्ट हो गई। इस तरह हम दोनों के बीच लॉन्ग डिस्टेंस रिलेशन बन गया। आज से करीब पाँच साल पहले उसने मुझे बताया कि वह इंडिया आने वाला है। मेरी खुशी का ठिकाना नहीं रहा क्योंकि अब हम पहली बार फेस टू फेस मिलने वाले थे। वो इण्डिया आ गया और क्लाइंट विजिट के बाद हम दोनों कंपनी के बाहर मिले। दिल्ली में सात दिन साथ घूमे-फिरे।

“हम दोनों के बीच प्यार का इजहार हो गया। फिर उसने मुझे बताया कि असलियत में वह एक इंटरपोल एजेंट था। यह मल्टीनेशनल की नौकरी तो सिर्फ दिखावा था और इस वक्त वह एक मिशन पर भारत आया था और सीबीआई में उसके लिये एक ऑफिस उपलब्ध था। कुछ ही दिन में वह एमएनसी की नौकरी छोड़कर पूरा समय मिशन को देने वाला था।

“मैं हैरान रह गई। पर मैं खुश थी कि धीरज एक बहुत अच्छा काम कर रहा था। मेरे लिये उसके प्रति प्रेम और सम्मान दोनों बढ़ गए। क्योंकि वह अब दिल्ली में ही था हम अक्सर मिलते रहते थे। मैंने कई बार उसे अपने साथ मंडी चलकर मेरे परिवार वालों से मिलने के लिये कहा पर वह टालता रहा। उसके मिशन का काम बहुत ज्यादा था और उसके मुताबिक वह छुट्टी अफोर्ड नहीं कर सकता था। आज सोचती हूँ तो लगता है कि वो महज मुझे टाल रहा था। शायद मिशन पूरा होने तक वह किसी सीरियस रिलेशन में नहीं बंधना चाहता था।

“मैंने उससे मिलना कम कर दिया, वह भी कहीं मशरूफ था। फिर एक दिन उसने मिलने का आग्रह किया। उसका कहना था कि मिलना बेहद ज़रुरी है क्योंकि उसके बाद वह काफी समय तक मिल नहीं सकेगा। उस रात हम मिले और उसने बताया कि वह अंडरग्राउंड होकर काम करने वाला है और इस बीच उसका किसी से कोई संपर्क नहीं हो सकेगा। इस काम में कुछ साल लग सकते थे। उस रात मैं उससे लिपटकर बहुत रोई थी। ऐसा लग रहा था अब मैं धीरज से कभी नहीं मिल सकूंगी और...और देखो मेरा सोचना कितना सही था। वाकई उस रात के बाद मैं उससे कभी नहीं मिल सकी...”

कहते हुए आरती फफक-फफककर रोने लगी। उसकी कहानी सुनकर राज का दिल भी पसीज आया।

आखिर क्या ज़रूरत थी आहूजा को किसी लड़की की ज़िंदगी बर्बाद करने की जबकि वह जानता था कि जिस राह पर वह चल रहा है वहाँ कुछ भी हो सकता है ।

“किसी जंग पर गये फौजी की बीवी की तरह मैंने दो साल उसका इंतजार किया। फिर एक दिन अचानक उसका व्हाट्सअप्प कॉल आया। मैं बेहद खुश हुई। मुझे लगा धीरज वापस आने वाला है पर उसने मुझे कहा कि उसका मिशन अब बेहद क्रिटिकल मोड़ पर आ पहुँचा है, आगे कुछ भी हो सकता है। अगर उसे कुछ हो गया तो मैं तैयार रहूँ क्योंकि उसके बाद मैं भी सेफ नहीं रहूंगी पर उस दशा में मुझे मदद मिलेगी।”

“फिर क्या हुआ ?” रहस्य से रोमांचित होते हुए राज ने पूछा।

“उसके बाद मुझे समाचार मिला कि वह नहीं रहा। मिशन के दौरान उसकी डेथ हो गई।” उसकी आँखों से आंसुओं का सैलाब बहता ही जा रहा था।

“आरती! आई एम सॉरी फॉर योर लॉस पर आहूजा भटक गया था। बदले की भावना के चलते उसने गलत राह पकड़ ली थी। उसने मिशन पर बेहद अच्छा काम किया था पर उसने जो अपने ही देश से बदला लेने की प्लानिंग की हुई थी वहीं उसे महँगी पड़ गई।”

“जिस धीरज को मैं जानती थी वो एक कर्मनिष्ठ और सच्चा इंसान था। मैंने उससे प्रेम किया था। मैं उसे अच्छी तरह से जानती थी।”

“आरती! मैं तुम्हें कोई प्रवचन नहीं देना चाहता पर धीरज और मेरे जैसे जासूसों की अच्छी-खासी ट्रेनिंग होती है। हम लोग अपने मोटिव कभी आम इंसान पर ज़ाहिर नहीं होने देते। धीरज भी एक जासूस था और तुम जानती थी कैसे वह दिखावे के लिये मल्टीनेशनल कंपनी में काम कर रहा था। क्या उसकी असलियत कोई और जानता था ? वह तुम से प्रेम कर बैठा तो उसने खुद के बारे में तुम्हें काफी कुछ बताया पर क्या उसने अपने मिशन के बारे में तुम्हें कभी बताया ? नहीं न ? एक जासूस ये बातें आम इंसान के साथ शेयर नहीं करता और अपने असली मिशन के बारे में तो वो वैसे भी तुम से कभी सच नहीं बोलता क्योंकि उसके बारे में जानकर तुम उस से नफरत करने लगती।”

“क्या था उसका असली मिशन ?” वह रहस्य में फंसे हुए स्वर में बोली।

“वह अपने ही देश यानि भारत के अंदर न्यूक्लियर मिसाइल गिराकर क्रांति लाना चाहता था।”

“ऐसा नहीं हो सकता।”

“पर ऐसा ही हुआ है।”

“मैं नहीं मान सकती। तुम तो ऐसे बोल रहे हो जैसे वो कोई टेररिस्ट था। और...और मैंने भी न्यूज़ फोलो की है। मैं जानती हूँ ये न्यूक्लियर हमले का मिशन तो ISIK का था।”

राज ने न में सिर हिलाया। “वो सच है। पर रमन आहूजा का मिशन भी यहीं था।”

“तुम चाहते क्या हो ?” वह रोष भरे स्वर में बोली, “तुम झूठ बोल रहे हो न ? यहीं तुम जासूसों का काम होता है न। अभी तुम्हीं ने बोला था न... धीरज के खिलाफ मेरे मन में नफरत पैदा कर के मुझसे क्या हासिल करना चाहते हो ? मैं तो वैसे भी तुम्हें सब सच बता रही हूँ।”

“मैं तुम्हें किसी ग़लतफ़हमी में नहीं रखना चाहता। तुम जानती ही हो कि उसके पिता के साथ क्या हुआ था। उसी का बदला वह पूरे देश से ले रहा था।”

आरती अवाक सी राज को देखती रही। उसके चेहरे पर आश्चर्य और अविश्वास के मिश्रित भाव थे।

“मैं जानता हूँ आहूजा के साथी ही तुम्हें अब तक प्रोटेक्ट करते आये होंगे इसलिये तुम्हें सच नहीं पता...”

“मुझे नहीं पता! मुझे नहीं पता!” आरती झुंझला उठी – “पर मुझे यह जरूर पता है कि उसके ऊपर क्या बीती थी। उसका बचपन कैसा था। वह कैसा इंसान था। तुम नहीं जानते पर वो एक बेहद सेंसिटिव इंसान था...और कैसे न होता ? जब एक छोटे मासूम बच्चे को अपने पिता की दर्दनाक मौत के बारे में पता चलता है... क्या तुम समझ सकते हो उसके मन पर क्या असर होता है ? हो सकता है उन कारणों से उसकी थिंकिंग बदल गई हो।”

“हो सकता है, पर इससे देश पर हमला करने की कोशिश तो जस्टिफाई नहीं की जा सकती।”

अचानक ही उसके चेहरे के भाव बदले।

“तुम ज़रूर जानते हो।” वह राज के नजदीक आ गई और बोली, “तुम्हें पता है उसकी मौत किन हालातों में हुई। तुम्हें ज़रूर पता है उसे किसने मारा... ब...बताओ मुझे!”

“तुम ये जानकर क्या करोगी ?”

“पता नहीं! पर मुझे हक है ये जानने का।”

“वह हमारे देश के सुरक्षाबल में से एक...एक एनएसजी के हाथों मारा गया था।” राज उसकी आँखों में झांकते हुए बोला।

आरती के चेहरे पर भावुकता छाई हुई थी। बड़ी मुश्किल से उसके मुंह से शब्द निकले – “क्या...क्या उसे बिना मारे रोका नहीं जा सकता था ? शायद उसे कभी सही काउंसलिंग नहीं मिली। शायद साइकेट्रिक हेल्प मिलने के बाद वो सही हो जाता...”

राज नज़रें चुराते हुए बोला, “जिन हालातों में देश की सुरक्षा दांव पर लगी हो और एक पल में फैसला करना हो, सुरक्षाबल इसी तरह से फैसले करती है। जैसे कि जंग के मैदान में आर्मी वाला दुश्मन को देखते ही गोली चला देता है। उनके पास सोचने का समय नहीं होता। अपने देश को तबाही से बचाने के लिये अगर किसी ने ये कदम उठाया तो ये सही कदम था। जब न्यूक्लियर हमला होता है तो उसके परिणाम लोग कई सालों, कई पीढ़ियों तक भुगतते हैं। क्या तुम नहीं जानती जापान में क्या हुआ था ?”

आरती चुपचाप सुनती रही।

“तो फिर आहूजा की मौत के बाद तुमने क्या किया ?” राज ने पूछा।

“न्यूज़ मिलने के दो दिन बाद ही मुझे कुछ लोगों ने अप्रोच किया और फिर पूरा प्लान बनाया गया। शायद आहूजा को पहले ही ये अंदेशा हो गया था कि दुश्मनों को पता चल सकता है कि उसका मेरे साथ सम्बन्ध है इसलिये उसने मुझे बचाने का पूरा इंतजाम कर रखा था। फिर प्लान यही बना कि मैं दिल्ली से तुरंत अपने घर चली जाऊं और फिर वहाँ मेरी मौत का नाटक करके हमेशा के लिये मुझे गायब कर दिया जायेगा।”

“पर तुम्हारे परिवार वालों पर जो बीत रही है क्या तुम जानती हो ?”

“मैं जानती हूँ। उन्हें पता है – मैं जिंदा हूँ।”

“क्या ?” राज ने चौंककर उसकी तरफ देखा।

“हां! यह सच है।”

“फिर तो मानना पड़ेगा तुम्हारे पेरेंट्स को। काफी अच्छी एक्टिंग करते हैं।”

“दरअसल उनकी एक्टिंग नेचुरल इसलिये भी हुई क्योंकि जब मैं गायब हुई तो वाकई उनको यही खबर मिली थी कि मैं मर गई। पर उसके कुछ दिन बाद मैं उनसे गुप्त रूप से मिली और मैंने सब बता दिया।”

“ओह!”

“तो अब तुम्हारा क्या प्लान है ? यहाँ कब तक रहोगी ?”

“मैं यहाँ किसी प्लान के तहत नहीं रह रही हूँ। मेरी मौत के नाटक के बाद आहूजा के साथियों ने मुझे नई ज़िंदगी शुरू करने के कई आइडिये दिये थे। पर मैं सीनो धर्म को पहले से मानती थी। मेरे साथ जो हुआ उसने मुझे धर्म की तरफ और भी समर्पित कर दिया। उन्होंने मुझे मेकअप के सहारे शक्ल बदलना सिखाया और नया नाम और नई आइडेंटिटी दिलवाई इसीलिये तुम मुझे पहचान नहीं सके थे।”

“तो उसके बाद से तुम पर किसी ने कभी कोई हमला नहीं किया ?”

“नहीं!”

“तो इसीलिये जब तुम दिल्ली से चलीं थी तो पहले धर्मशाला आई थीं और उसके बाद मंडी गईं।”

“तुम्हें कैसे पता चला ?” उसने चौंककर पूछा।

“तुम भूल गई हो मैं एक सीक्रेट सर्विस का एजेंट हूँ। इस तरह के सीक्रेट पता करना मेरा जॉब है। तो उस वक्त धर्मशाला आने की क्या वजह थी ?”

“धीरज के दोस्तों को पता था कि दुश्मन मुझे गायब पाकर दिल्ली से ढूंढते हुए सीधे मंडी ही पहुंचेंगे, इसलिये दिल्ली से सीधे धर्मशाला आकर ही सारी प्लानिंग की गई।”

“अच्छा!

“तो यहाँ किसके साथ रुकी थीं ? कौन थे वे लोग ?”

“उससे तुम्हें क्या मतलब ? मैं उन लोगों के बारे में कुछ नहीं जानती।”

“चेहरे तो पहचानती ही होगी।”

“मैं जितना जानती थी तुम्हें सब बता दिया अब तुम और क्या चाहते हो ? जिन लोगों ने मेरी मदद की मैं उनके खिलाफ नहीं जा सकती।”

“अब तुम जान चुकी हो कि रमन आहूजा गलत राह पर था तो उसके साथी भी गलत राह पर हो सकते हैं। तुम्हें कैसे पता जो तुम्हें खोजते हुए आने वाले थे वो देश के दुश्मन थे ? वो मेरे जैसे जासूस भी हो सकते हैं जो देश का हित चाहते हैं।”

आरती के चेहरे पर असमंजस के भाव आ गये।

“तुम एक सीधी-सादी लड़की हो। तुम्हें जो बोला गया–तुमने सच समझ लिया। अच्छा ये तो बताओ- मैं तो यहाँ से लौटकर जा रहा था फिर तुम खुद आगे बढ़कर मुझसे क्यों मिलीं ? मुझे अपनी असलियत क्यों बताई ?”

“तुमने मेरे पापा-मम्मी का ज़िक्र किया था इसलिये मुझे चिंता हो गई थी और मुझे लगा शायद तुम भी आहूजा के दोस्तों में से एक हो।”

“देखो...” राज मुस्कराया – “कितनी आसानी से तुमने मुझ पर भरोसा कर लिया। अगर मैं तुम्हारा नुक्सान करने की नीयत से आया होता तो... ?”

आरती ने शंकित निगाह उस पर डाली। “पर तुम ऐसे लगते तो नहीं...”

“यही तो बात है। आप किसी की शक्ल से उसकी इंटेंशन नहीं बता सकते। खैर, लकिली मैं तुम्हारे लिये अच्छा ही निकला और अगर सब ठीक रहा तो तुम्हें इस तरह की गुमनाम ज़िंदगी नहीं बितानी पड़ेगी।”

“और बदले में तुम उनके बारे में जानना चाहते हो जिन्होंने बुरे वक्त में मेरी मदद की ? तुम चाहते हो मैं उन लोगों की जानकारी तुम्हें दे दूँ जिन्होंने मेरी जान बचाई ? तुम क्या मुझे इस हद तक खुदगर्ज समझते हो ? तुम चाहे मेरे साथ कुछ कर लो उन लोगों के बारे में तुम्हें कुछ नहीं बताऊंगी।”

“तुम्हें क्या लगता है–सोहनगढ़ माइंस में जो हुआ उसका परिणाम सिर्फ तुम भुगत रही हो ? बहुतों ने अपनों को खोया है। एक कर्तव्यनिष्ठ कमिश्नर हुआ करता था उसे उसकी बेटी ने अपनी आँखों के सामने ज़िंदा जलकर मरते हुए देखा था। एक भाई-बहन प्रतिशोध की आग में जल रहे थे, पर दोनों ने अलग तरीका चुना, एक ने कानून के साथ और दूसरे ने कानून को हाथ में लेकर...”

“तुम किसकी बात कर रहे हो ?”

“आहूजा के मिशन में उसका एक पार्टनर था- समीर चौधरी उर्फ नूर मोहम्मद! वो असल में एक इंडस्ट्रियलिस्ट था पर गुप्त रूप से आहूजा के साथ मिशन पर लगा था। उसकी बहन एक जासूस थी। जब उसे पता चला कि उसका भाई एक आतंकवादी बन चुका है और उसे रोकना नामुमकिन हो गया तो उसे खुद अपने हाथों से उसकी जान लेनी पड़ी। इस अपराधबोध के चलते वह खुद भी जीवित न रह सकी और उसने मेरी आँखों के सामने अपनी कनपटी में गोली मार ली।”

आरती उसे देखती रही।

“तुम उस वक्त वहीं थे ?” उसने पूछा।

“हा...हाँ!” राज को अचानक लगा कि उसे शीशे में उतारने के चक्कर में वह कुछ ज्यादा ही बोल गया।

“धीरज कैसे मरा था ?”

राज चुप रहा।

“प्लीज़ मुझे बताओ- मैं जानना चाहती हूँ।”

“मैंने तुम्हें बताया तो था एक एनएसजी...”

“मतलब...उसे कहाँ गोली लगी थी ? क्या वह दर्द से तड़पा था...क्या... ?”

“क्यों तुम अपने गम को बढ़ाना चाहती हो ?”

“प्लीज़! मेरे लिये ये जानना ज़रूरी है।”

“वो न्यूक्लियर मिसाइल चलाने जा रहा था, तब एनएसजी ने उसे चेतावनी दी। पर फिर भी वह नहीं रुका तो उस पर फायरिंग कर दी। गोली ठीक उसके सर में लगी थी। वह तुरंत ही मर गया था।”

आरती ने आँखें बंद कर लीं। उन में से आँसू टपक पड़े। कुछ पल बाद खुद को संयमित करते हुए वह बोली-

“मैं मानती हूँ हिंसा में कुछ नहीं रखा है। मेरे साथ जो हुआ सो हुआ पर अब मैं शांतिपूर्वक अपना जीवन बिताना चाहती हूँ। तुम अब लौट जाओ। आहूजा के बारे में यहाँ तुम्हें इससे ज्यादा कुछ और पता नहीं चलने वाला। मैं तुम्हारी तरह जासूस न सही पर लोगों की पहचान मुझे भी है। जिन लोगों ने मेरी मदद की वह शांतिप्रिय लोग हैं...”

“शांतिप्रिय! वो लाश किसकी थी ?”

“कौन सी ?”

“जिसे तुम्हारी बता कर केस बनाया गया था।”

“उससे क्या फर्क पड़ता है ?”

“फर्क ही नहीं पड़ता! वाह! अभी तो तुम हिंसा के खिलाफ थीं और वो लोग शांतिप्रिय हैं ? किसी की जान लेकर यह स्वांग रचाया गया और कुछ फर्क ही नहीं पड़ता!”

“तुम्हें क्या लग रहा है – किसी का मर्डर किया गया था ? अरे वो लाश हॉस्पिटल से अरेंज की गई थी, एक गुमशुदा लड़की मरी हुई मिली थी।”

“तुम्हें क्या पता ? तुमने खुद थोड़ी न अरेंज की होगी।”
 
“नहीं! पर मुझे पता है। तुम चाहो तो मंडी के हॉस्पिटल जाकर पता कर लेना। लाश अरेंज करना आसान नहीं था पर जब अरेंज हो गई–उसके बाद प्लान बनाया गया। ऐसा नहीं था कि कहीं से रेंडम लड़की पकड़ ली और उसे मारकर मेरी जगह डाल दिया गया। यह लोग दरिंदे नहीं है।”

“निर्दोष लोगों को इस तरह मरने का नाटक कर के अपनी आइडेंटिटी खत्म नहीं करनी पड़ती।”

“तुम समझ नहीं रहे हो।”

“समझ तुम नहीं रहीं। वो लोग शायद नहीं चाहते कि तुम सरकार के हाथ लगो। उन्हें डर होगा कि तुम से आहूजा की कोई इन्फोर्मेशन लीक हो सकती है।”

“अगर ऐसा होता तो वो मुझे वाकई मार ही नहीं देते ?”

“तर्क अच्छा है! पर मैं जानता हूँ आहूजा की दुश्मनी भारत के आम नागरिकों से नहीं बल्कि सरकार से थी। शायद उसके साथियों की धारणा भी कुछ ऐसी थी। आहूजा को तो नहीं बचाया जा सका पर अगर तुमने मदद की तो इन लोगों को ज़िंदा पकड़कर सही रास्ते पर लाया जा सकता है।”

आरती के चेहरे पर ऐसे भाव आये जैसे अब राज की बात उसे समझ आने लगी हो।

“अगर तुम वाकई मानती हो कि धीरज और उसके साथी अच्छे लोग हैं तो उनके बारे में ज्यादा से ज्यादा जानकारी मुझे दो ताकि उन्हें आतंकवादी की उपाधि न मिले बल्कि उन्हें सिर्फ गुमराह नवयुवक माना जाये।”

आरती बेचैनी से इधर-उधर देखने लगी।

“मैं जब तक तुम्हारे इन रहनुमाओं से मिल नहीं लेता तब तक विश्वास नहीं कर सकता की वह देश के रक्षक है या भक्षक।”

“मैं तुम्हें उनसे नहीं मिला सकती।”

“तुम्हें मुझे किसी से मिलवाने की जरूरत नहीं। वह लोग जहाँ मिल सकते हैं वो लोकेशन और उनके कॉन्टेक्ट नंबर मुझे दे दो।”

“मेरे पास कोई जानकारी नहीं है। वे लोग खुद मुझसे मिलते थे और कॉन्टेक्ट करते थे। फोन का कभी इस्तेमाल नहीं किया।”

“परसों उन में से कोई मिलने आया था यहाँ ?” पूछते हुए राज ने उसे मफलर वाले का हुलिया बताया।

“हाँ! आया था।”

“क्या नाम है उसका ?”

“मैं उसे रघु नाम से जानती हूँ।”

“क्यों मिलने आया था ?”

“उसने मुझे सतर्क रहने के लिये कहा था। उसका कहना था कि कोई मुझे मंडी में ढूंढ...” कहते हुए आरती अचानक ही रुक गई।

राज मुस्कराया और फिर बोला, “अब समझी न ? एक जासूस, देश के रक्षक से सतर्क रहने के लिये कह रहे थे वो। अगर उनकी नीयत अच्छी थी तो ऐसा क्यों करते वो ?”

“हो सकता है वो तुम्हारी असलियत न जानते हों। बस ये देख रहे हों कि कोई मुझे ढूंढ रहा है।”

राज ने उसे प्रशंसात्मक भाव से देखते हुए कहा- “मानना पड़ेगा। तुम उनके बारे में गलत सोचने के लिये तैयार ही नहीं।”

“जिन्होंने हमेशा मदद की हो उन पर इतनी आसानी से भरोसा कैसे टूटेगा ?”

“वेलिड पॉइंट! पर उन्होंने मुझ पर जानलेवा हमला किया था।”

“तुम उन्हें अगली बार अपनी असलियत बता देना, शायद वो सहयोग करें।” अचानक वो चारों तरफ बढ़ती भीड़ देखकर कुछ उद्वेलित हो गई। शाम होते ही लोग घूमने-फिरने उस तरफ आने लगे थे। “अब मैं चलती हूँ। बहुत देर हो गई है।”

तेजी से पलटते हुए वो लड़खड़ा गई। राज ने लपककर उसे गिरने से बचाया।

“थै...थैंक्स!” वो उसकी आँखों में देखते हुए कुछ शरमाते हुए बोली।

“थैंक्स तो मैं तुम्हें करना चाहता हूँ। तुमने कैसे भी सही पर मुझ पर विश्वास करके इतना कुछ बताया।”

“तुम्हारा नाम क्या है ?”

“अमन शर्मा!” राज बोला।

“अमन! मैं तुम्हारी मदद ज़रूर करुँगी पर प्लीज़...मैं अब अपने जीवन में कोई नये ट्विस्ट नहीं चाहती।”

“चिंता मत करो। सब सही हो जायेगा। अगली बार जब उन में से किसी से मुलाकात होने वाली हो तो क्या तुम मुझे बताओगी ?”

वह हिचकी।

“अगर वाकई शांति चाहती हो तो ये ज़रुरी है।”

उसने सहमित में सिर हिलाया।

“मुझे इस नंबर पर कॉल करना” राज ने कागज़ पर उसे एक नया मोबाइल नंबर लिखकर दिया, जो उसने हाल ही में हासिल किया था। “कॉल न लगे तो मैसेज छोड़ देना। आशा करता हूँ तुम्हारे पास...”

“फोन है!”

“ओके! बाय!” राज ने उससे विदा ली और फिर दोनों सनसेट पॉइंट से अलग-अलग दिशाओं में बढ़ गए। सूरज धीरे-धीरे पहाड़ों की ओट में छिपने को अग्रसर था।

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वर्तमान समय

नई दिल्ली

सुरेश और ज़ाहिद सीक्रेट सर्विस की दिल्ली ब्रांच के गेस्ट हाउस में अपने कमरे में शाम बिता रहे थे जब सुरेश को इल्यास का फोन आया।

“बोलो इल्यास!”

“सर रज़ा मलिक के बारे में कुछ-कुछ पता चला है। उसे दिल्ली में ही रिक्रूट किया गया था। उससे पहले वह पुरानी दिल्ली में उठाईगिरी, चोरी-चकारी किया करता था। फिर उसने दो मर्डर किये, जिससे आईएसआई काफी इम्प्रेस हुआ और फिर उसे रिक्रूट किया गया।”

“वो कहाँ रहता था ?”

“काफी समय पुरानी दिल्ली में ही रहा था।”

“एड्रेस मिलेगा ?”

“कोशिश करता हूँ।”

“उसको अच्छे से जानने वाला कोई और पता चले तो भी बताना।”

“जी ज़रूर।”

फोन रखकर सुरेश बोला, “उम्मीद है जल्दी उसके बारे में कुछ सबूत मिल जाये।”

ज़ाहिद ने सहमति में सर हिलाया। इस वक़्त उसने लैपटॉप पर एक लिस्ट खोल रखी थी।

“क्या देख रहे हो ?”

“फ्लाइट 301 की पैसिंजर लिस्ट। इन सभी पैसिंजर्स के बारे में जानना जरूरी है क्योंकि इन्हीं में से कोई पैसिंजर इस हाईजैकिंग या विमान गायब होने की वजह हो सकता है। अब वो कोई एक पैसिंजर है या अनेक यह पता लगाने वाली बात है।”

सुरेश भी लिस्ट देखने लगा।

“तुम ठीक कह रहे हो। तो जो जांच पहले हुई थी उसकी रिपोर्ट क्या कहती है ?”

“उस रिपोर्ट में सभी पैसिंजर्स के बारे में लिखा हुआ था। कोई भी ऐसा वीआईपी नहीं था जिसकी वजह से पूरा प्लेन हाईजैक कर लिया जाये। ज्यादातर आम नागरिक थे, कुछ बिजनेसमैन, तीन पॉलीटिशियंस के रिश्तेदार, इत्यादि। पर इनमें से कोई भी ऐसा अहम इंसान नहीं था जिसकी वजह से कोई इतना बड़ा अभियान रचे।”

“पॉलीटिशियन के रिश्तेदार! क्या तुमने देखा कौन से पॉलीटिशियन थे ?”

“हां! मैंने देखा था। अलग-अलग पॉलीटिशियन थे। कोई बहुत बड़ा नहीं था। सब स्टेट लेवल तक के पॉलीटिशियन थे। दो पैसिंजर्स अलग-अलग नेताओं के बेटे थे और एक की बीवी थी। तीनों ही पॉलीटिशियंस या उनके इन तीन रिश्तेदारों का आपस में दूर-दूर तक कोई रिश्ता नहीं था।”

“वैसे भी कोई फिरौती नहीं मांगी गई थी।” सुरेश सोच में डूबता हुआ बोला।

“हाँ। वहीं तो। पर अब मेरा ध्यान उन पाँच लोगों पर है जिन पर इस रिपोर्ट में खास तवज्जो नहीं दी गई। ऐसे पाँच लोग जो यह फ्लाइट बोर्ड करने वाले थे पर उन्होंने बोर्ड नहीं की। उनका रिजर्वेशन था फिर भी उन्होंने फ्लाइट बोर्ड नहीं की। मेरा ध्यान उन पर है।”

“हो सकता है आखिरी मौके पर प्लान चेंज हो गया हो। ऐसा अक्सर होता ही है। फिर लोग फ्लाइट कैंसिल भी नहीं करते क्योंकि पैसा तो उनका पूरा जाता है।”

“तुम्हारी बात ठीक है। पर मुमकिन है कोई दूसरी वजह हो ?”

सुरेश ने ज़ाहिद की तरफ देखा और सहमति में सिर हिलाया।

“हैं कौन यह पांच लोग ?” सुरेश ने पूछा।

“सुज़ुकी नामक धर्मगुरु और उसके चार शिष्य।”

“सुज़ुकी! सीनो देश का वह धर्मगुरु जो सीनो देश से भागा हुआ है और भारत ने उसे शरण दी हुई है ?”

“हाँ। वहीं।”

“उनके अलावा कोई और भी ऐसा पैसिंजर था जिसने फ्लाइट बोर्ड नहीं की ?”

“नहीं! यहीं पाँच दिखाई दे रहे हैं।” ज़ाहिद ने कहा।

सुरेश स्क्रीन को घूरते हुए बोला, “इन्हें किस तरह कॉन्टेक्ट किया जा सकता है ?”

“मुझे नहीं लगता उसके लिये कोई विशेष प्रोटोकॉल है। आखिर वह रेफ्यूजी हैं कोई वीआईपी नहीं। हम लोग अपने मिशन के अंतर्गत आराम से उनसे मिल सकते हैं।”

“ज्यादा दूर भी नहीं है।” सुरेश बोला, “हिमाचल में ही है न इन का आश्रम ?”

“हाँ! धर्मशाला! चलना है मिलने ?”

“चलते हैं। पर ये लोग तो सीनो भाषा बोलते हैं। एक इंटरप्रेटर भी साथ ले जाना पड़ेगा।”

“उसकी व्यवस्था चीफ करा देंगे।”

“बढ़िया! फिर दो-तीन दिन में निकलते हैं।” सुरेश उठते हुए बोला, “तब तक यहाँ जो काम फैलाया है उसे निपटा लेते हैं। कोमजुम लोल्लेन, निक, रज़ा मालिक – इन तीनों के सिरे देखने हैं कहाँ जाकर मिलते हैं।”

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वर्तमान समय से सात साल पहले- सन 2012

अज्ञात जगह, एनसीआर

कमरे में सिगरेट का धुआं मौजूद था।

रमन आहूजा अपने दो साथियों के साथ उस कमरे में मौजूद था। उनमे से एक लैपटॉप के सामने बैठा था। दूसरा कमर पर हाथ रखकर खड़ा था। वह छोटे कद का छोटी-छोटी आँखों वाला बलिष्ठ पहाड़ी था।

सिगरेट का कश लेकर धुंआ छोड़ते हुए आहूजा बोला, “क्या हुआ निक? तुम परेशान क्यों हो?”

“क्या तुमने मेरे प्लान के बारे में सोचा?”

“सोचा! पर वो प्लान हमारा नहीं। किसी और का है। मिशन अंतर्द्वंद्व किसी और की टर्म्स पर नहीं चल सकता।”

“कौन तुम्हें टर्म्स बता रहा है?”

“अल्टीमेटली तो प्लान किसी और का है तो टर्म्स भी उसी की चलेंगी।”

“प्लान हमें उनके साथ मिलकर बनाना है।”

“उनका उद्देश्य क्या है?”

“वहीं जो हमारा है। देश को करप्शन से मुक्त करना।”

“सिर्फ कहने से क्या होता है? हम ऐसे कैसे उन पर विश्वास कर लें? आई मीन- प्लेन हाइजैकिंग कोई मजाक नहीं है और इसके पीछे उनका असली उद्देश्य कुछ और भी हो सकता है।”

“क्या तुम्हें मुझ पर विश्वास नहीं?”

“ये बेतुका सवाल है।”

“जिस तरह तुम्हें मुझ पर विश्वास है उसी तरह मुझे भी उन पर है। मैं जानता हूँ वे कोई टेररिस्ट या माफिया नहीं। मैं तुम्हारी उनसे मीटिंग कराता हूँ तुम...”

आहूजा ने उसे टोका- “वो बाद में करेंगे पहले बताओ उद्देश्य क्या है?

“इस प्लेन के ज़रिये दो करप्ट लोगों को ब्लैकमेल किया जायेगा उससे हजारों करोड़ की जो धनराशि मिलेगी उसे वापस गवर्नमेंट को पहुँचाया जायेगा – सोचो ये बात जब आम पब्लिक तक पहुंचेगी तो हर कोई जानेगा कि मिशन अंतर्द्वंद्व वाले क्या कर सकते हैं, हमें मास सपोर्ट मिलेगा।”

“उसका हम क्या करेंगे? हमें इलेक्शन थोड़ी न लड़ना है।”

“पर तुम ही कहते हो न कि मिशन के बारे में ज्यादा से ज्यादा लोगों को पता चलना चाहिये।”

“हाँ!...पर प्लेन में कितने बेक़सूर लोग होंगे। उनकी जान को खतरे में डालना ठीक नहीं।”

“कुछ बड़ा करने के लिये थोड़ा तो रिस्क लेना होगा। और अभी प्लान बनना है। वो हमारे ही ऊपर है कि ऐसा प्लान बनायें कि किसी पैसिंजर को नुक्सान न हो।”

“प्लेन ही क्यों? उन लोगों को सीधे किडनैप क्यों न कर लिया जाये?”

“वो एक वीवीआईपी से जुड़े लोग हैं, उन्हें खास सिक्योरिटी हासिल है। देश में रहकर उन पर हाथ डालना मुश्किल है। अगर सफल हो भी गये तो सबकुछ होने के बाद कहाँ भागेंगे। इसलिये प्लेन द्वारा देश के बाहर ले जाकर ये डीलिंग आसन होगी। खैर वो सब उनका हेडेक है– हमें कहीं नहीं जाना होगा।”

आहूजा ने सिगरेट का फ़िल्टर ऐशट्रे में कुचला। वह सोच में डूबा था।

निक आहूजा का बचपन का दोस्त था। दोनों के घर अगल-बगल हुआ करते थे। करीब दो महीने पहले आहूजा को यूँ ही लगा कि उसके हाल-चाल पता किये जांए क्योंकि भारत छोड़ने के बाद से वह उसके कॉन्टेक्ट में नहीं था। आहूजा को पता चला कि वह धर्मशाला में किसी धर्मगुरु के आश्रम में रह रहा था। वह निक से मिलने पहुँचा। निक उसे देखकर चौंका फिर उसके गले लग गया। आहूजा ने उसे आश्रम में रहने का कारण पूछा। निक ने बताया कि उसे पुलिस ने ड्रग्स बेचने के झूठे इलज़ाम में फंसा दिया था और तीन साल जेल की सजा काटने के बाद वह डिप्रेशन से जूझता धर्मगुरु सुज़ुकी के आश्रम में आ गया था।

आहूजा उसे आश्रम से बाहर लाया। उसने उस पुलिस वाले के बारे में उसे पूछा और फिर मिशन अंतर्द्वंद्व के अंतर्गत पहले आहूजा ने उस सब इंस्पेक्टर के बारे में बैकग्राउंड चैक किया- पता चला कि वह एक करप्ट अफसर था।

ये पहला मौका था जब आहूजा ने किसी वर्दीधारी पर हाथ डाला था, पर काम निर्विध्न हुआ। उसे किडनैप किया गया, उसे टॉर्चर करके उसके सारे काले धंधे पता किये गये और फिर उसकी लाश उसकी काली करतूतों के सबूत सहित पुलिस थाने के बाहर डाल दी गई।

पुलिस ने बहुत हाथ-पाँव मारे पर हमेशा की तरह मिशन अंतर्द्वंद्व ने कोई सबूत नहीं छोड़ा था। सब इंस्पेक्टर के सताए हुए लोगों की लिस्ट भी काफी लंबी थी इसलिये किसी ने निक पर शक भी नहीं किया।

उसके बाद आश्रम छोड़कर निक आहूजा के साथ दिल्ली आ गया और मिशन अंतर्द्वंद्व में उसका अहम साथी बन गया।

“अगर हमें वाकई देश में कुछ बदलाव लाना है तो इसी तरह से कुछ बड़ा करना होगा।” निक बोला, “तभी कुछ होगा। अरबों की आबादी में यूं कब तक हम एक-एक करप्ट इंसान को ढूँढेंगे और सजा देंगे?”

आहूजा चुपचाप शून्य में घूरता रहा। लैपटॉप में मशगूल उसके साथी ने काफी देर बाद नज़रें उठाई और बोला, “मुझे निक की बात सही लग रही है।”

आहूजा ने सहमति में सिर हिलाया। “ठीक है! उनके साथ मीटिंग फिक्स करो।”

निक ने उत्साह से उसकी तरफ देखा फिर अपने मोबाइल की तरफ हाथ बढ़ाया।

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वर्तमान समय

हिमाचल प्रदेश

पिछली शाम जब राज ने खुद ही आरती को गिराया और फिर संभाला, तब उसने उसकी गर्दन पर एक बेहद सूक्ष्म जीपीएस डिवाइस चिपका दिया था। ऐसा डिवाइस जो खाल पर तुरंत चिपक जाता था। वह इतना चपटा था कि उसे छूने पर भी किसी को आभास न हो। वह किसी तिल की तरह आरती की गर्दन पर चिपका हुआ था और लगातार उसकी लोकेशन राज तक पहुँचा रहा था।

सुबह आठ बजे जब राज होटल में नाश्ता कर रहा था उसे आरती की लोकेशन आश्रम से बाहर निकलती हुई नज़र आई।

फटाफट नाश्ता निपटाकर वह उठा और अपने फोन में नज़र रखते हुए बाहर निकला। उसने एक ऑटो रिक्शा किया और आश्रम की तरफ चल दिया। आरती की लोकेशन आश्रम की पहाड़ी से नीचे उतरती हुई दिखाई दे रही थी तो राज पहाड़ी पर नहीं गया बल्कि उसने रिक्शा वाले को कुछ मिनट नीचे ही रुकने को कहा। कुछ ही देर में एक रिक्शा वहाँ से निकला। लोकेशन के हिसाब से राज को समझ आ गया कि वह उसी में थी, साथ ही उसे उसकी हल्की-सी झलक भी दिखाई दे गई थी। अब वह उसके पीछे लग गया।

कुछ दूर जाने के बाद आरती रिक्शा से उतर गई और पैदल ही एक कच्चे रास्ते पर चलने लगी।

राज ने रिक्शे का बिल भुगतान किया और नीचे उतरा।

उस वक्त काफी ठंडा थी। स्वेटर और जैकेट पहने होने के बाद भी राज को ठिठुरन महसूस होने लगी थी।

आरती निरंतर चले जा रही थी। चलते-चलते काफी समय बीत गया। राज उचित दूरी बनाकर छिपते-छिपाते उसके पीछे था। वे अब शहर से काफी बाहर आ गए थे। राज ने रुककर देखा दूर-दूर तक बर्फ से ढके पहाड़ नज़र आ रहे थे जिन के आंचल में वह खड़ा था। वाकई स्वर्ग से कम नहीं थी यह जगह।

फोन में देखते हुए राज का माथा ठनका। ऐसा लग रहा था–आरती त्रिउंड की तरफ जा रही है। राज ने जल्दी से गूगल में देखा–त्रिउंड ट्रैकिंग के लिये मशहूर जगह थी।

इस वक्त अचानक अकेले ट्रैकिंग पर जाने का क्या मतलब ? त्रिउंड में कोई आरती का कोई जानने वाला रहता हो ऐसा भी मुमकिन नहीं क्योंकि वहाँ आबादी तो बस्ती नहीं। फिर सुबह-सुबह उस तरफ जाने का क्या मतलब ?

तभी रास्ते में एक दुकान नज़र आई। राज वहाँ पहुँचा और फिर उसने दुकानदार से पूछा, “क्या यह रास्ता त्रिउंड की तरफ जाता है ?”

“हां जी सर! बिल्कुल जाता है। आप ट्रैकिंग पर जा रहे हैं ? चार घंटे लगते हैं। शाम को जल्दी निकल लेना वहाँ से अँधेरा हो गया तो थोड़ी दिक्कत हो सकती है। अरे...आपके पास तो ट्रैकिंग का कुछ सामान भी नहीं है।”

“अरे भाई! हुआ यह कि मेरी गर्लफ्रेंड और मैं दोनों साथ में जाने वाले थे पर मैं आलस कर रहा था, सोये जा रहा था तो वह रूठ कर अकेले ही निकल गई। इधर से ही निकली होगी तो शायद तुमने देखा भी होगा।” कहकर राज ने मोबाइल में आरती की फोटो दिखाई।

“अरे हां!” वह बोला, “यह मैडम तो अभी इधर निकली थीं पर उनके पास तो सारा सामान था। अच्छे-खासे कपड़े पहने थे। पीठ पर बैग भी था।”

“हां! वो पूरी तैयारी के साथ निकली है पर पता नहीं मेरे लिये कुछ सामान रखा भी है कि नहीं।”

“अरे! मैं आपकी मदद करता हूँ न।” दुकानदार बोला, “यह दुकान और किसलिये खोली है मैंने–आप जैसे टूरिस्ट के लिये ही तो खोली है। सब कुछ किराए पर उपलब्ध है। आपको ट्रैकिंग शूज लगेंगे और आपका इस जैकेट से काम नहीं चलेगा। मेरे पास फर वाली गरम जैकेट है, वो ले लीजिए। बैग आपके पास है नहीं। चलिए बैग वैसे में किराए पर नहीं देता। पर एक मेरा पड़ा है वहीं ले जाइए। इसमें इंस्टेंट नूडल्स के कुछ पैकेट हैं। थरमस में आपको चाय और गर्म पानी रख कर देता हूँ।”

“वाह भाई! सारा इंतजाम है तुम्हारे पास तो।”

“यही तो काम है हमारा, सर!”

“चलो फिर फटाफट दे दो सब। मैं निकलता हूँ। कहीं मेरी गर्लफ्रेंड ज्यादा ही आगे न निकल जाए।” कहकर राज ने जेब से बटुआ निकाला।

उसे पेमेंट कर के राज ने फटाफट जूते बदले, जैकेट बदला, बैग लिया और त्रिउंड की तरफ चल दिया।

आरती निरंतर आगे बढ़ रही थी। राज उसकी दिशा में चलता रहा। करीब आधा घंटा चलने के बाद उसे कई और सैलानी आगे बढ़ते नज़र आये, कुछेक उसे अपने पीछे आते भी नज़र आ रहे थे। कुछ के बैग बड़े-बड़े थे जिनमे शायद स्लीपिंग बैग या टेंट था, उनका शायद रात वही गुज़ारने का इरादा था।

अगर मुझे भी किसी वजह से रात वहीं बितानी पड़ी तो ? टेंट वगैरह कुछ भी नहीं है, ठंड में कुल्फी जम जायेगी। खैर, देखा जायेगा।

कुछ देर में राज ट्रेक पर काफी आगे निकल आया। पथरीले रास्ते पर शुरू में चलने में जितना उत्साह हो रहा था अभी वह दुर्गम लगने लगा था। थकान जल्दी हो रही थी। सांस भी तेज चल रही थी। राज धीरे-धीरे आगे बढ़ रहा था। अब नीचे हरी-भरी घटी और ऊपर बर्फीले पहाड़ों का नज़ारा बेहद लाजवाब दिख रहा था।

उसे काफी दूर एक लड़की अकेले आगे बढ़ती नज़र आई। उसे लगा वहीं आरती होगी। उसने भूरे रंग की जैकेट पहनी थी और काले रंग की पैंट, पैरों में ट्रैकिंग शूज़ और सिर पर फर वाली गोल टोपी। कल उसने उसे भगवे वस्त्रों में देखा था। इस रूप में उसे पहचानना मुश्किल होता पर राज समझ सकता था कि इस ट्रैक पर अकेली लड़की आरती के अलावा कोई और हो ये मुश्किल था।

राज आगे बढ़ता रहा। आरती निरंतर उसकी नज़र में थी। बीच-बीच में घुमावदार पहाड़ी रास्ते के चलते वह गायब भी हो जाती थी पर कुछ देर बाद फिर दिखाई देने लगती थी। पर अंतिम आधे घंटे में वह काफी तेजी से आगे बढ़ी और दिखाई देना बंद हो गई। वजह ये भी थी कि थकने के कारण राज की गति मंद पड़ गई थी।

हाँ भाई! तुम तो पहाड़ी घोड़ी हो, दौड़ती जाओगी। अपना तो तेल निकला जा रहा है।

एक जगह सुस्ताते, पानी पीते हुए राज ने मोबाइल स्क्रीन पर नज़र डाली। आरती की लोकेशन एक जगह पर स्थिर हो गई थी।

लगता है त्रिउंड पहुँच गई। दस-पंद्रह मिनट में मैं भी पहुँच जाऊंगा।

आखिरकार राज त्रिउंड पहुँचा।

पहुँचते ही वह वहाँ के खूबसूरत नज़ारों में एक पल को आरती को भूल ही गया। बर्फ से ढके पहाड़ एकदम सामने दिखाई दे रहे थे। चारों तरफ सर्द हवाएं चल रही थी। ठंड बहुत ज्यादा थी। जिस पहाड़ी पर वह खड़ा था वहाँ कई चट्टानें नज़र आ रहीं थीं।

वहाँ छह-सात टेंट लगे हुए थे। एक कोने में छपरे वाली दुकान या रेस्टोरेंट-सा कुछ दिखाई दे रहा था। राज का ध्यान आरती की लोकेशन ढूंढने पर गया। चलते हुए वह उसकी लोकेशन पर पहुँच गया पर आरती कहीं नज़र नहीं आई। वह अब पहाड़ के छोर पर खड़ा था, जिसके आगे हजारों फुट गहरी खाई थी।

उसकी लोकेशन दस मीटर इधर-उधर हो सकती है, पर उससे ज्यादा नहीं। किधर चली गई!

राज ये सोचते हुए वापस आया कि शायद लोकेशन में कुछ गड़बड़ है। वह उस रेस्टोरेंट की तरफ आया। वहाँ दस-पन्द्रह लोग थे, फैमिली वाले भी थे, पर अकेली लड़की कोई नहीं दिख रही थी। भूख जबरदस्त लग रही थी। इसलिये राज ने वहाँ ब्रेड ऑमलेट का ऑर्डर दे दिया। पेपर प्लेट पर परसा हुआ ऑर्डर मिलने पर उसे खाते-खाते वह बाहर घूमने लगा। वह सभी टेंटस् पर नज़र डाल रहा था। अभी दिन का वक्त था तो कोई टेंट बंद भी नहीं था, इसलिये उसे आरती के वहाँ होने की पुष्टि करने में कोई दिक्कत नहीं हो रही थी।

घूमते हुए उसे एक दूर कोने में पेड़ों के झुरमुट में एक लड़का और लड़की के होने की झलक मिली। लड़की वेश-भूषा से आरती-सी लगी।

राज पेड़ों के पीछे छिपता-छिपाता उस तरफ बढ़ा।

लड़का-लड़की पेड़ के पीछे क्या कर रहे थे इसका अंदाज़ा राज को अब लगने लगा था।

क्यों नहीं! आखिर...रोमांटिक जगह है। पर आहूजा की मौत को अभी कुछ महीने भी नहीं हुए और आरती...

राज इस बार सहज भाव से चलते हुए उनके पास से निकला। लड़का-लड़की को उसका आभास हुआ तो उन्होंने चोर नज़र उस पर डाली। बस उतना राज के लिये लड़की की शिनाख्त करने के लिये काफी था। वह आगे बढ़ गया। वह लड़की आरती नहीं थी।

चक्कर क्या है ?

राज ने फिर से ट्रैकिंग एप में आरती की लोकेशन देखी। वह अभी-भी पहाड़ी के अंत की तरफ ही दिखा रही थी और एक जगह पर ही स्थिर थी।

ज़मीन के अंदर घुस गई क्या!

राज वापस पहाड़ी के छोर की तरफ बढ़ गया।

वहाँ पहुँचकर वह नीचे झाँकने लगा। वह इतना आगे आ गया कि नीचे गिरने का भी खतरा होने लगा।

उधर कोई भी नहीं था। अब एक ही सम्भावना थी कि लोकेशन बताने वाला डिवाइस या तो आरती की नज़र में आ गया और उसने निकाल दिया या फिर वह खुद ही निकल गया, अत्यधिक पसीना निकलने से ऐसा हो सकता था।
 
राज को फिर एक ही तरीका सूझा उसने अपने फ़ोन में आरती की फोटो निकाली और फिर वहाँ मौजूद विभिन्न सैलानियों को दिखाकर पूछने लगा।

एक जोड़े को फोटो दिखाते हुए वह बोला, “ये मेरी गर्लफ्रेंड है, आगे –आगे निकल आई थी पर अब यहाँ कहीं दिखाई नहीं दे रही।”

“कहीं ट्रैकिंग करते हुए और आगे तो नहीं निकल गई ?” लड़के ने सुझाया।

“और आगे ? किधर ?”

“स्नो पॉइंट कैफे होते हुए काफी लोग लहेश केव्स या इन्द्रहर पास तक जाते हैं।”

“अब ये किधर है ?”

लड़के ने इशारा करते हुए कहा, “उस तरफ से चलते-चले जाइए। डेढ़ घंटे में स्नो पॉइंट कैफे पहुँच जायेंगे।”

ओ तेरी! डेढ़ घंटे की ट्रैकिंग और...

उनका शुक्रिया अदाकार राज ट्रेक की तरफ अग्रसर हुआ।

उसने रुककर एक लम्बी सांस लेते हुए सामने दिखाई दे रहे पथरीले रास्ते पर नज़र डाली जो सीधे पर्वतों में जाता हुआ प्रतीत हो रहा था।

चल बेटा राज! जोर लगा के...

राज अपनी अगली मंजिल की तरफ चल पड़ा। जीपीएस डिवाइस बंद होने के चलते उसे अब ये भी नहीं पता था कि उसका इस तरफ जाना किसी काम आने वला भी है कि नहीं।

कुछ आगे चलकर उसे एक विदेशी अपने बड़े से बैग को पीठ पर लादे धीरे-धीरे आगे बढ़ता नज़र आया।

राज ने उसे मुस्कान दी तो उसने पलटकर उसे हाय बोला। राज उसके साथ चलने लगा और बातों-बातों में उसे पता चला कि वह युक्रेन से आया था और उसका नाम येगोर था। अकेले ट्रेक पर चलने से ये अनुभव काफी अच्छा रहा क्योंकि इससे मन लगा रहा और ट्रेक के सफ़र की थकान का भी पता नहीं चला और वक़्त आसानी से गुज़र गया।

डेढ़ घंटे में वे स्नो लाइन कैफे पहुँच गए।

जैसे-जैसे वो आगे बढ़ते जा रहे थे नज़ारे और भी सुखद होते जा रहे थे। वहाँ वे तीन बर्फीली चोटियाँ देख सकते थे जो थी तो अभी भी काफी दूर पर लगता था जैसे एकदम सामने ही हों। दूसरी तरफ नीचे हरी-भरी वादियाँ और उसमे बस्ती दिखाई दे रही थीं। आसमान में बदल थे और कुछ बदल आस-पास पहाड़ी पर भी मंडराते नज़र आ रहे थे।

उसने येगोर के साथ मिलकर एक टेंट किराए पर ले लिया फिर दोनों तिरपाल से ढके उस कैफे में बैठकर नूडल्स और चाय पर इधर-उधर की बातें करने लगे।

उस सुखद अहसास में कुछ पल तो राज भूल ही गया कि वह यहाँ किस उद्देश्य से आया था।

राज ने येगोरे से पूछा, “अकेले ही इतनी दूर घूमने कैसे आ गये ?”

येगोर ने अपनी टूट-फूटी अंग्रेजी में जवाब दिया–“मुझे अकेले घूमना पसंद है और घुमक्कड़ी की आदत इतनी ज्यादा है कि गर्लफ्रेंड हमेशा साथ नहीं दे पाती। तुम बताओ–तुम यहाँ अकेले कैसे घूम रहे हो ?”

“मुझे एक लड़की की तलाश है।”

“क्या बात है।” येगोर पूरी बत्तीसी दिखाते हुए मुस्कराया फिर उसने चाय का कप राज के कप से किसी जाम की तरह टकराते हुए कहा- “चियर्स! किसी ख़ास लड़की की या...”

“हे तो एक ख़ास लड़की, खुद में बहुत से रहस्य छिपाये रहती है। पहाड़ों की ही रहने वाली है। मेरे ख्याल से इसी तरफ घूमते हुए आई है।”

“और तुम उसका पीछा कर रहे हो ? स्टाकर कहीं के...” वह हंसा।

“दरअसल बात वो नहीं है। मैं उसके लिये अजनबी नहीं हूँ, उससे मिला हूँ, उससे बातें भी की है। उसके पीछे आने की वजह ये है कि मुझे लगता है वो खतरे में है। मैं उसे इधर आने से तो नहीं रोक सकता था पर उसका ख्याल रखने से मुझे कौन रोकेगा ?”

“इंट्रेस्टिंग! काफी रहस्यमई पसंद है तुम्हारी। लगता है उसकी ये बात तुम्हें एड्रिनालीन रश देती है।”

“शायद!” राज ने मुस्कराते हुए चाय की चुस्की ली और उसे ख़त्म करते हुए उठा। “अब मैं उसको ढूंढने निकलता हूँ। त्रिउंड से वो नज़रों से गायब है।”

“मेरे पास बाइनाकुलर्स हैं, ले जाओ, काम आएंगे।”

“बढ़िया!”

“पर ज्यादा दूर न चले जाना, कुछ ही देर में अँधेरा होने वाला है।”

“अभी एक घंटा और है सनसेट में।”

दोनों कैफे से बाहर निकले। टेंट में आकर येगोर ने उसे बाइनाकुलर्स दिए। राज ने अपना बैग वहीं रख दिया, पिस्टल पहले ही उसकी जैकेट के अन्दर छिपा था। बाइनाकुलर्स उसने अपने गले में डाले और चलने को तैयार हो गया।

“गुड लक!” येगोर बोला, “मैं तुम्हारा यहीं इंतजार करूँगा। बॉन फायर का इंतजाम करता हूँ, डिनर काफी इंट्रेस्टिंग होने वाला है।”

“ज़रूर!” कहकर राज ने उससे विदा ली और आगे बढ़ गया। उसके जाते ही येगोर ने अपना फोन लिया और युक्रेनियन भाषा में कुछ बोलते हुए खुद का वीडियो बनाने लगा।

राज ने देखा–वहाँ करीब आठ-दस टेंट लगे थे। राज टहलते हुए टेंट में रुके लोगों पर नज़र डालने लगा।

ऐसा भी हो सकता है कि आरती अपने किसी सीक्रेट लवर से यहाँ मिलने आई हो। क्या पता वह सीक्रेट लवर उन्हीं लोगों में से कोई हो जो आहूजा की मौत के बाद से उसकी मदद करते आ रहे हैं। पर अगर ऐसा है तो आहूजा से उसके रिश्ते की कितनी अहमियत थी ? क्या ये वाकई वहीं आरती है जो आहूजा की गर्लफ्रेंड थी, कहीं वो वाकई मर तो नहीं गई। जो लाश मंडी में मिली थी वो असली आरती हो सकती है। क्या पता जो कहानी इस आरती ने सुनाई है वो नकली हो ?

राज सोचता जा रहा था और बर्फीली पहाड़ियों की दिशा में आगे बढ़ता जा रहा था। जैसे-जैसे वह आगे बढ़ता गया–चारों तरफ पथरीली चट्टानों का समागम दिखाई देता गया।

कुछ दूर चलने के बाद उसे एक पहाड़ी नदी दिखाई दी। राज ने जूते उतारे और उसे पार करने लगा। पानी एकदम बर्फीला था क्योंकि वह पास के ग्लेशियर से अभी-अभी पिघल कर निकला था।

नदी पार करते ही उसे दूर चट्टानों में एक सफ़ेद कपड़ा चमका। राज का ध्यान उसकी तरफ आकर्षित हुआ और वह सीधे रास्ते पर जाने की बजाये गीली चट्टानों पर चढ़ते हुए उस तरफ चल दिया। पास आने पर वह एक इंसानी आकृति प्रतीत होने लगी। ऐसा लग रहा था–कोई लेटा हुआ है।

कुछ ही पलों में राज उसके पास पहुँचा। उसने देखा–वह पहाड़ी नवयुवक था जिसके सफ़ेद कपड़ों में लाल रंग का समावेश था। वह रंग जो कि उसके रक्त से उभरा था।

राज उसके पास खड़ा उसे ध्यान से देख रहा था। उसकी आँखें खुली थीं। उसने राज को देखा तो कुछ बोलने की कोशिश करने लगा। राज नीचे झुका।

“पा...नी!” वह क्षीण स्वर में बोला।

राज ने अपने कंधे से बोतल निकाली और उसके मुख में पानी की कुछ बूँदें डालीं।

उसके चेहरे पर कुछ संतुष्टि के भाव आये।

“ये सब...कैसे हुआ ?”

वह राज को निरंतर देखता रहा। राज ये समझने की कोशिश कर रहा था कि वह कुछ बताना नहीं चाहता या फिर उसमे कुछ भी बोलने का सामर्थ्य नहीं बचा था।

अचानक उसकी आँखें शून्य में स्थिर हो गईं।

राज ने उसकी नब्ज़ टटोली। वह रुक चुकी थी।

वह उठकर खड़ा हुआ और उसने घूमकर चारों तरफ देखा। दूर-दूर तक कोई भी नज़र नहीं आया। उस वीरानी जगह बस नदी की ‘कल-कल’ आवाज आ रही थी और बीच-बीच में पक्षियों की, जो अब शाम होने का आभास होते ही अपने-अपने बसेरे की तरफ कूच कर रहे थे।

इसका जख्म देखकर लगता है किसी धारदार हथियार से हमला किया गया है। जख्म ताज़ा है, हमलावर ज्यादा दूर नहीं होना चाहिये।

वह चट्टानों के बीच आगे बढ़ने लगा।
 
तभी सामने की तरफ उसे कुछ चट्टानों के बीच कुछ हिलता-डुलता दिखाई दिया। चट्टानों के नीचे अँधेरा था इसलिये राज ये तो अंदाज़ा नहीं लगा सका कि वहाँ क्या था पर हिलने-डुलने के तरीके से किसी व्यक्ति के होने की सम्भावना लगी।

एक कोने में राज को नीचे उतरती एक ढलान नज़र आई। वह उस तरफ बढ़ गया।

कुछ देर में वह उन चट्टानों तक पहुँचा। काले रंग के विशालकाय पत्थरों के नीचे संकरा-सा रास्ता था जो कि अंदर गुफा के होने का आभास दे रहा था।

वह झुककर गुफा में दाखिल हुआ। अंदर काफी अँधेरा था और बाहर के मुकाबले ज्यादा ठंड थी। वह कुछ पल एक जगह बैठा रहा। जब उसकी आँखें अँधेरे में देखने में अभ्यस्त हो गईं तब उसने चारों तरफ नज़र घुमाई। एक कोने में उसे कोई ज़मीन पर लेटा नज़र आया। ऐसा लग रहा था कोई सो रहा है। राज ने उसका चेहरा अपनी तरफ पलटाया- वह आरती थी। उसने उसका चेहरा थपथपाया पर उसने कोई प्रतिक्रिया नहीं दी। शायद वह बेहोश थी।

अचानक किसी ने पीछे से राज को दबोच लिया।

हमलावर की पकड़ बेहद मजबूत थी। उसने अपने हाथ राज की बाँहों के नीचे से निकालकर उसकी गर्दन पर शिकंजा बनाकर कस दिया। राज को अपनी गर्दन चटकती सी महसूस होने लगी। उसे ऐसा लग रहा था कि अगर उसने जरा-सी भी ढील दी तो वह उसकी गर्दन तोड़ देगा। असीम ताकत का मलिक था वह हमलावर। करो या मरो की स्थिति में पहुँचते राज ने हमलावर का बाजू दोनों हाथों से पकड़ा और फिर पूरी ताकत लगा कर उसे अपने सामने पटकने के अंदाज में घुमाया। हमलावर उछला पर गिरा नहीं। वह राज के सामने आ खड़ा हुआ और सर्द नज़रों से उसे देखने लगा। राज भी ध्यानपूर्वक उसका जायजा लेने लगा।

वह सिर्फ पाँच फिट तीन इंच लंबा परन्तु मजबूत जिस्म का एक टिपिकल पहाड़ी युवक प्रतीत हो रहा था। उसने सिर पर कैप पहन रखी थी, जिसने उसके कान ढक रखे थे और जिस्म पर काली जैकेट थी। उसका गोरा चेहरा क्लीन शेव्ड था और आँखें छोटी-छोटी थीं।

“क्या कहानी है भाई तुम्हारी ?” राज ने पूछा। उसने कोई जवाब नहीं दिया और बिना चेतावनी के तेजी से राज की तरफ किक चलाने लगा। राज पीछे हट गया। उसके लड़ने का तौर तरीका देखकर साफ़ पता चल रहा था कि वह मार्शल आर्ट में निपुण था।

चलो–सीक्रेट सर्विस में मिली मार्शल आर्ट की ट्रेनिंग आज कुछ काम आयेगी।

राज ने सांप के फन की भांति अपने हाथ फैलाए और अपनी तरफ बढ़ते उसके पैरों के प्रहारों को हाथों पर रोक लिया। जैसे ही लड़के ने राज पर हाथ घुमाया उसने एक हाथ से उसका हाथ रोका और फुर्ती के साथ दूसरे से उसके चेहरे पर दनादन घूंसे बरसा दिये। पाँच-छह जबरदस्त घूंसे पड़ने के बाद भी लड़के के हाव-भाव देखकर लगा नहीं कि उसे कोई हानि पहुंची हो। उसने पलटकर राज पर किक मार दी। राज पीछे जा गिरा।

राज फुर्ती के साथ उठा और फिर से अटैकिंग मुद्रा में आ गया।

लड़का अब पहले से ज्यादा सतर्क दिख रहा था। शायद राज को देख कर उसने अपेक्षा नहीं की थी कि वह इस कदर लड़ाई में निपुण होगा। उसने अपनी जैकेट उतार कर एक तरफ फेंक दी। अंदर उसने एक स्किनटाइट फुलशर्ट पहन रखी थी जिसमे उसकी मांसल भुजाएं उजागर हो रही थी। राज ने उसे ध्यान से देखा। कुछ और नहीं तो जिस्मानी ताकत में राज को वह खुद से दुगुना लग रहा था।

इस बार वह अचानक ही खुले सांड की तरह तेजी से राज की तरफ दौड़ा। राज ने एक तरफ हटने का निर्णय लिया पर लड़का भी पूरी तरह से सावधान था। उसके हटते ही वह उसकी तरफ घूमा और हवा में उछलकर उसने राज की पीठ पर जोरदार किक जड़ दी। राज सामने जा गिरा। बड़ी मुश्किल से उसने अपने मुंह को चट्टानों से भिड़ने से बचाया।

“बहुत हो गया भाई।” अचानक ही राज के हाथ में पिस्टल चमका जिसे उसने लेटे-लेटे ही उसकी तरफ तान दिया था।

राज उस वक्त अवाक रह गया जब उस लड़के ने पिस्टल की परवाह किये बगैर उस पर हमला कर दिया। राज ने फायर किया पर वह एन मौके पर बिजली की गति से नीचे झुका और कूदते हुए राज की छाती पर आ गिरा। उसने राज का हाथ दबोच लिया इसमें कोई शक नहीं था कि वह बेहद ताकतवर था। एक बार जो उसने राज का हाथ पकड़ा राज को अहसास हुआ कि उसे छुड़ाना नामुमकिन है।

पिस्टल राज के हाथ से निकल गया और उसे उसने कोहनी से एक तरफ सरका दिया और फिर राज की छाती पर सवार होते हुए उसका गला दबाने लगा। राज ने हाथ बढ़ाने की कोशिश की तो उसने घुटनों के बल उसके दोनों हाथ दबा दिये। राज को ऐसा लग रहा था जैसे हाथी का बच्चा उसके सीने पर सवार हो गया हो। वह हिल भी नहीं पा रहा था और जिस ताकत से वह उसका गला दबा रहा था उसे अपनी साँसें उखड़ती हुई महसूस होने लगीं। उसका चेहरा पूरी तरह से लाल हो गया था।

अचानक लड़के के सिर पर पीछे से वार हुआ।

वह बेहोश होकर राज के ऊपर गिर गया। राज ने देखा– आरती हाथ में पत्थर लिये खड़ी थी। राज ने लड़के को अपने ऊपर से धकेला और बैठकर अपनी धौंकनी-सी चल रही साँसों को संयमित करने लगा।

“अच्छा हुआ तुमने गोली चलाई।” आरती बोली, “वरना मैं बेहोश ही पड़ी रहती और अब तक तुम मर चुके होते।”

“यह है कौन ? और तुम इससे मिलने यहाँ क्यों आई थी ?”

“पहले तुम बताओ–तुम यहाँ क्या कर रहे हो ? तुम मेरा पीछा करते हुए यहाँ आये थे ?”

राज ने जवाब नहीं दिया।

“क्यों तुम बेवजह मुझ पर शक कर रहे हो। मैं जितना जानती थी– सब तुम्हें बता चुकी हूँ।”

“अब तुम इतनी रहस्यमई जगह अकेले घूमो-फिरोगी तो जानने की कोशिश तो करनी ही होगी।”

“तुम खुद आकर मुझसे पूछ लेते कि मैं कहाँ जा रही हूँ तो भी मैं बता देती।”

“चलो गलती हो गई मुझसे। पर इसी बहाने मैं तुम्हारे काम तो आया।”

“मानती हूँ, थैंक्स!”

“वो सब छोड़ो, ये बताओ आखिर ये है कौन और क्या चाहता था तुमसे ?”

“न जाने यह कौन है। मुझे लग रहा है कि मुझे यहाँ धोखा से बुलाया गया है। आश्रम वाले समाज सेवा करते हैं न। हमारे आश्रम में सुबह एक सेवाकर्ता का फोन आया कि यहाँ कुछ ट्राइबल औरतों को मदद की ज़रूरत है। मुझे भेज दिया गया। ऐसे कामों के लिये मैं हमेशा खुशी-खुशी आगे रहती हूँ। जब मैं यहाँ पहुंची तो इसने मुझ पर हमला कर दिया। मैं बेहोश हो गई। मैं नहीं जानती यह कौन है और क्या चाहता है।”
 
आरती बोलती रही और राज उस युवक की तलाशी लेता रहा। उसकी जेब में कुछ रुपयों और एक बैंक एटीएम के सिवा और कुछ नहीं मिला। राज ने उसके एटीएम की एक फोटो ले ली फिर उसके चेहरे की फोटो भी खींच ली। उसे किसी हथियार के मिलने की उम्मीद थी पर ऐसा कुछ उसके पास से मिला नहीं। उसे उम्मीद थी कि बाहर मृत युवक का क़ातिल यहीं रहा होगा पर ऐसा कोई सबूत दिखा नहीं। उसके हाथों पर भी कोई खून के निशान नहीं थे, खैर वो तो पानी से साफ़ भी किये जा सकते थे। उसने टॉर्च जलाकर गुफा में तलाशी ली, वहाँ कोई और विशेष वस्तु दिखाई नहीं दी।

“इस इलाके में ट्राइबल औरतें तो क्या किसी कुत्ते के दिखने की भी उम्मीद कम है।”

“तुम शायद पहाड़ी कुत्तों को नहीं जानते। दरअसल कुछ और आगे जाने के बाद नीचे एक बस्ती है। ये मेरे लिये कोई नई जगह नहीं है।”

“आरती! जो भी हो सच-सच बता दो। तुम्हारी ये कहानी पूरी तरह से गप्प लग रही है।”

“ऐसा है तो यहाँ से वापस जाने के बाद तुम आश्रम जाकर पूछ लेना मैं कहाँ और किसलिये गई थी।” वह क्रोधित स्वर में बोली।

“ओके-ओके! आई बिलीव यू! पर कोई इस तरह से तुम पर साजिश कर के हमला क्यों करेगा ?”

“मैं क्या बोलूं ? हो सकता है ये धीरज के दुश्मनों में से एक रहा हो। वैसे भी आजकल लड़कियों के लिये कोई जगह सेफ नहीं है।”

“मुझे नहीं लगता यह कोई ऐसा-वैसा काम करने के लिये यहाँ आया था। यह एक अच्छा-ख़ासा ट्रेंड मार्शल आर्ट योद्धा है।”

“मुझे नहीं पता। मैं तो यहाँ आकर फंस गई और मेरे चक्कर में तुम भी बाल-बाल बचे हो। तुम्हारी मदद के लिये थैंक्स पर अब मैं तुरंत यहाँ से निकलकर वापस आश्रम जाना चाहती हूँ।”

“अरे, इसको ऐसे ही यहाँ छोड़ दें ? इसकी कोई कंप्लेंट नहीं करोगी ?”

“अभी इस जगह तो हमें पुलिस मिलने से रही, न ही मोबाइल की रेंज मिलेगी। लौटते वक्त जब रास्ते में सिग्नल मिलेगा पुलिस को फोन कर देंगे।”

“पुलिस तो यहाँ कल तक आ पायेगी, तब तक तो यह भाग जायेगा।”

“मुझे नहीं पता। इसको लादकर मैं तो नहीं ले जा सकती। तुम में इतनी ताकत हो तो तुम करो।”

कहकर आरती उठी और अपने जूते, बैग वगैरह उठाकर तैयार हो गई और गुफा से बाहर निकलने लगी। राज उसे देखता रहा।

आरती के जाने के बाद राज उस लड़के को होश में लाने की कोशिश करने लगा। एक बार को तो उस पत्थर, जिसे आरती ने उसके सिर पर मारा था, का साइज़ देखकर उसे लगा कि उसे कोई गंभीर चोट आ गई है।

राज चट्टानों की गुफा से बाहर निकला। आरती एक तरफ चलती चली जा रही थी।

“रुको! कहाँ जा रही हो ?” वह चिल्लाया।

“वापस जा रही हूँ।”

“अकेले ?”

“आई भी तो अकेले ही थी।”

“तब दिन था, अभी रात होने वाली है।”

“क्या फर्क पड़ता है ?”

“रुको...” कहकर राज उसके पास पहुँचा फिर बोला, “देखो ये जो कोई भी है, इस फसाद के पीछे के रहस्य सुलझाने में बहुत काम आने वाला है।”

“पर मुझे अब उसके आस-पास रुकने में डर लग रहा है।”

“मैं हूँ तो यहाँ।”

आरती ने उसे घूरते हुए कहा, “देखा मैंने उसके सामने तुम कितनी देर टिक पाये थे।”

राज ने सिर खुजाते हुए इधर-उधर देखा फिर बोला, “आइडिया! उसके हाथ-पैर बाँध देता हूँ...”

“ठीक है! तुम ऐसा ही करो, पर मुझे यहाँ रुकने के लिये मत कहो।”

“ठीक है! तुम स्नो पॉइंट कैफे पहुँचकर मेरा इंतजार करो। वहाँ मेरा एक दोस्त है – येगोर, युक्रेन से है। मैंने उसके साथ एक टेंट किराए पर लिया है। मेरा सामान उसी के पास है। तुम वहाँ रुक सकती हो।”

“तुम मुझे एक विदेशी लड़के के साथ रुकने की सलाह दे रहे हो ?” आरती ने उसे हैरानी से देखा।

“अरे, कुछ देर के लिये, फिर मैं पहुँच जाऊँगा, तब तुम्हारे लिये कुछ और इंतजाम कर लेंगे।”

“मैं अपनी देख-रेख खुद करने के काबिल हूँ।”

“बिलकुल हो! पर फिलहाल खतरा चारों तरफ है। यहाँ आते वक़्त मुझे एक लाश भी मिली थी। यहीं पास में...”

“ओह माई गॉड!” आरती मुंह पर हाथ रखकर बोली, “उसे ज़रूर इसी ने...हमें उसकी मदद करनी चाहिये।”

“वो मर चुका है।”

आरती का चेहरा पीला पड़ गया था। “वो एक हत्यारा है! पर... आखिर क्यों ये लोग इतना खून-खराबा...”

“वहीं तो मैं भी जानने की कोशिश कर रहा हूँ इसलिये कह रहा हूँ–तुम खतरे में हो। बेस्ट तो यहीं होगा–कुछ देर मेरे साथ रुको, मेरे पास पिस्टल है, इस बार वो कोई गड़बड़ नहीं...”

“तो क्या तुम उसे मार दोगे ?”

“ज़रूरत पड़ी तो हाथ-पैर पर गोली मार दूंगा। खैर, उसकी नौबत आनी नहीं चाहिए। मैं उसके हाथ-पाँव बाँध दूंगा।”

आरती ने दो पल सोचने में गंवाये फिर स्वीकृति में सर हिलाते हुए बोली, “ठीक है! चलो–”

दोनों वापस गुफा की तरफ चल दिये।

वातावरण में शाम के सूरज की लालिमा छाने लगी थी। भूरी-काली चट्टानों पर नारंगी रंग बिखर गया था।

दोनों गुफा में पहुँचे। राज ने टॉर्च जला ली। उसने उसकी रोशनी गुफा में घुमाई तो उसे खाली पाया। उसने तुरंत दूसरे हाथ में पिस्टल थाम लिया और सतर्कता से चारों तरफ देखने लगा। आरती सहमते हुए उसके पीछे छिप गई।

“वो होश में आ गया...” वह फुसफुसाई।

“बाहर होगा। चलो...” कहकर राज बाहर की तरफ मुड़ गया।

दोनों बाहर आ गये। राज ने टॉर्च की रोशनी बंद की।

“लगता है चट्टानों के पीछे कहीं छिप गया है। मैं देख कर आता हूँ।”

“मत जाओ...”

“अरे, मेरे पास पिस्टल है और वो निहत्था है।”

“तुम्हें क्या पता ?”

“वैसे उसने तुम पर हमला कहाँ किया था ?”

“रास्ते में...पीछे से...मेरा गला पकड़ लिया था, मेरा दम घुटने लगा और फिर मैं बेहोश हो गई।”

“ओके! मेरे पीछे-पीछे चलो...” कहकर राज चट्टानों के ऊपर चढ़ने लगा। आरती उसके पीछे थी। चट्टानों के ऊपर आकर, इधर-उधर तांक-झाँक करने के बाद भी उन्हें कोई नज़र नहीं आया।

“होगा तो यहीं कहीं! इतनी जल्दी यहाँ से भाग नहीं सकता।”

“पर कहाँ तक उसे इन चट्टानों में ढूंढोंगे ? अँधेरा हो रहा है। मुश्किलें और बढ़ने वाली हैं। मेरे ख्याल से हमें अब यहाँ से निकल जाना चाहिये।”

राज ने जैसे कुछ सुना नहीं, वह और आगे बढ़ते हुए इधर-उधर देखता रहा। दस मिनट बाद जब सूरज की लालिमा आसमान में सिर्फ पश्चिम दिशा में बाकि रह गई, आरती राज का हाथ खींचते हुए बोली, “अब चलो, कल सुबह ढूंढना उसे।”

कल तक तो उसके पैरों की धूल भी यहाँ नहीं मिलेगी।
 
राज बेमन से वापस चलने के लिये मुड़ा। वह पूरी तरह से सतर्क था और चारों तरफ देखते हुए आरती के साथ वापसी के पथ पर चल दिया।

करीब एक घंटे में वे स्नो पॉइंट कैफे वापस पहुँचे। तब तक घुप्प अँधेरा विधमान हो चुका था। राज की टॉर्च रास्ते में बहुत काम आई।

वे दोनों टेंट्स के पास पहुँचे। एक टेंट के पास आग जलाते हुए उन्हें येगोर दिखाई दिया।

“अमन! माई मैन! सही वक़्त पर वापस आये।” फिर उसकी नज़र आरती पर गई। वह चौंक गया। फिर राज को प्रसंशात्मक भाव से देखते हुए बोला, “वैल डन! आई...मीन! सक्सेस ?”

राज ने मुस्कराते हुए हामी भरी।

राज ने आरती से हिंदी में कहा- “ये समझता है तुम मेरी गर्लफ्रेंड हो।”

“ओह! समझने दो, मेरी बला से...” वह आग के पास बैठ गई, वह ठण्ड से काँप रही थी। फिर उसने मुस्कराकर येगोर की तरफ देखा और कहा- “हेल्लो!”

“हाय! ये तो बहुत ख़ुशी की बात है कि आप दोनों मिल गये।”

“राइट!” फिर आरती ने उसकी तरफ ध्यान नहीं दिया।

येगोर ने राज के पास आकर उसका कंधा थपथपाया।

“यू आर ए लकी मैन! शी इज़ वैरी प्रिटी!”

“आई नो!”

“लेट्स सेलेब्रेट। लेट्स हेव अ ड्रिंक!”

“ड्रिंक तो हम वैसे भी लेने वाले थे।”

येगोर हंसा। “डैम! यू आर राइट!”

फिर येगोर ने व्हिस्की की एक बोतल निकाली और दो ड्रिंक बनाये। उसने आरती से भी पूछा पर उसने शालीनता के साथ मना कर दिया। राज कैफे से आरती के लिये जूस ले आया। साथ ही उसे एक टेंट और लगाने को बोल दिया।

येगोर के पास बार्बिक्यु करने का सामान भी था। उसने चिकन निकाला उस पर पैकेट में रखा गीला मसाला लगाया और आग पर भूनने लगा।

“पूरी तैयारी के साथ निकले थे ?” राज बोला।

“घूमने निकलो और अगर खाने-पीने का मजा न ले पाओ तो बेकार है। है न ?”

“राइट!”

पहली ड्रिंक के बाद येगोर बोला, “तो तुम दोनों...आई मीन! बहुत सुन्दर जोड़ी है। कब मिले थे ?”

“बस तीन दिन हुए हैं।” राज बोला, “बस समझो अपना रिलेशन स्टेटस है–जस्ट मेट!”

“तुमने प्रपोज़ नहीं किया ?”

“अभी तो सिर्फ दोस्ती हुई है।”

“मेरी मानो इन चीज़ों में देरी नहीं करनी चाहिये।”

“पुराने खिलाड़ी मालूम पड़ते हो।” कहकर राज हंसा, येगोर भी ठहाका लगाकर हंस दिया।

आरती सिर्फ मुस्करा दी। बीच-बीच में वह राज को गुस्से से देख रही थी।

इस तरह खाने-पीने के साथ बातों का दौर देर तक चलता रहा। आरती का टेंट लग चुका था और उसने बारह बजे उन दोनों को गुड नाइट किया और सोने चली गई।

उसके जाने के बाद येगोर आँख मारकर बोला, “दोस्त, अब अगर तुम भी जाना चाहो तो जा सकते हो। मेरे लिये मत रुकना।”

राज हंसा। “भाई, मैं तुम्हारे टेंट में ही सोने वाला हूँ।”

उसने नशे में लहराते हुए आश्चर्य से राज को देखा। “रियली ?”

“भाई! ये इण्डिया है। अभी लड़की को किस करने की स्टेज भी नहीं आई है।”

“ओह...आई मीन देट्स क्यूट! संस्कारी होना अच्छी बात है। चियर्स टू दैट!”

दोनों के गिलास भिड़े।

एक घंटे बाद उन दोनों ने भी सोने का मन बना लिया।

राज सोया ज़रूर पर उसने चार बजे का अलार्म लगा लिया था। उसे अंदेशा था कि देर रात कुछ गड़बड़ हो सकती है।

☐☐☐
 
चार बजे राज के मोबाइल में अलार्म बजा। उसकी नींद खुली और उसने फ़ौरन उसे बंद कर दिया। उसने येगोर पर नज़र डाली। वह गहरी नींद में था। अलार्म के शोर का उस पर कोई फर्क नहीं पड़ा था।

वह उठकर बैठ गया। आँखें नींद से बेझिल हो रहीं थीं। उसने पानी लिया और मुंह पर कुछ बूँदें छिड़क लीं।

फिर उसने टेंट के अन्दर बनी ज़िप वाली खिड़की की ज़िप खोली और बाहर देखा। बाहर गहन सन्नाटा था, कोई भी दिखाई नहीं दे रहा था।

वह टेंट से बाहर निकला। उसने आरती के टेंट की तरफ नज़र डाली। सब सामान्य दिख रहा था। वह टेंट के पास पहुँचा और उसका पर्दा हटाकर अन्दर झाँका। वह चौंक गया क्योंकि आरती अन्दर मौजूद नहीं थी।

कहाँ गई!

राज की नज़रें चारों तरफ घूमने लगी।

इस तरह कोई टेंट में आकर उसे बिना शोर-शराबे के उठाकर तो नहीं ले जा सकता।

तभी उसे दौड़ने की आवाज़ आई। राज ने मुड़कर उस तरफ देखा। कुछ दूरी पर चट्टानों की तरफ से वो आवाज़ आई थी। उस तरफ कैम्प की रोशनी नहीं पहुँच रही थी और आज रात आसमान में चाँद भी न जाने कहाँ छिपा हुआ था।

राज पिस्टल हाथ में लेकर झुकते हुए उस तरफ दबे पाँव बढ़ा।

चट्टान के पास पहुँचकर उसे आरती लेटी दिखाई दी।

राज ने आँखों से उससे सवाल किया।

आरती के चेहरे पर खौफ था। उसने उसे झुकने का इशारा किया। राज झुका फिर उसके पास ही ज़मीन पर लेट गया।

“क्या हुआ ?”

“वह आस-पास ही है।”

“वो चीनी यहाँ भी आ गया ?”

“हाँ! मुझे तो डर की वजह से नींद ही नहीं आ रही थी। मैंने बीच में खिड़की से बाहर नज़र डाली तो वो उस कोने में...” वह कैम्प के दूसरे कोने की तरफ इशारा करते हुए बोली, “वहाँ खड़ा था।”

“अरे, तो तुम्हें शोर मचा देना था, मुझे जगा देना था। यहाँ क्या कर रही हो ?”

“मैं...मैं वापस जा रही थी।”

“व्हाट!”

“और क्या! तुम्हें तो कोई सुध-बुध है नहीं। मजे से पार्टी कर रहे थे। मुझे तो अपनी जान बचानी थी न।”

“मैडम! मैं पूरी तरह सतर्क था इसलिये अभी उठकर यहाँ पहुँचा हूँ।”

वह शांत रही और बेचैनी से कैंप की तरफ देखने लगी।

“वो है कहाँ ?” राज ने पूछा।

“उसके बाद दिखा नहीं। मैं इस तरफ से धीरे-धीरे निकलकर वापस पहुँच जाऊँगी।”

“मानना पड़ेगा तुम्हें। ऐसी अँधेरी रात में तुम्हें इस कैम्प की जगह सुनसान रास्ते पर चार-पांच घंटे पैदल चलकर जाना ज्यादा सेफ लग रहा है।”

“जिस कैम्प के आस-पास कोई मेरा क़त्ल करने के लिये घूम रहा हो उससे तो सेफ ही है।”

“और मैंने क्या चूड़ियाँ पहनी हैं ?”

“तुम तो दूसरे के टेंट में सो रहे हो। मैं तो अकेली ही हूँ न।”

राज अविश्वास के साथ बोला, “क्या! यानि ये भी मेरी गलती है ? तुम मेरे साथ सोना चाहती थीं तो पहले क्यों नहीं बोला ?”

“बकवास मत करो। मैं तुम्हारे साथ नहीं...” कहते हुए उसे हंसी आ गई।

“तुम हंस रही हो।” राज फुसफुसाया– “आई डोंट बिलीव इट!”

“पता नहीं! शायद स्ट्रेस की वजह से...”

“मेरी मानो...टेंट में जाओ। मैं बाहर पहरा देता हूँ। येगोर को भी जगा दूंगा। अरे यहाँ बहुत लोग हैं। वो इधर हमला करने की हिम्मत नहीं करेगा।”

“हमें उसके बारे में कुछ नहीं पता। उसके और साथी भी हो सकते हैं। उनके पास न जाने कैसे हथियार हों...हमें क्या पता। उससे अच्छा निकल जाते हैं। सुबह तक आश्रम पहुँच जायेंगे। यहाँ ऐसा कोई काम भी नहीं कर रहे जो बहुत ज़रूरी हो।”

“सो तो रहे थे न...”

“तुम सोओ जाकर, मैं जाती हूँ।”

तभी उन्हें एक साया आरती के टेंट की तरफ बढ़ता हुआ नज़र आया।

दोनों उसे घूरते रह गये। उसने उसके टेंट का दरवाज़ा खोल दिया।

“देख लो उसकी हिम्मत।” आरती बोली।

राज ने उसका निशाना लिया।

“क्या कर रहे हो ?”

“उसके पैर पर एक गोली मार देता हूँ।”

“अरे वहाँ इतने सारे लोग हैं, किसी और को लग गई तो ?”

“तुम मुझे समझती क्या हो ?” राज ने उसे घूरा। “मुझे मेरे निशाने पर भरोसा है।”

“तुमने पी हुई है और नींद में हो...”

“क्या बकवास...” कहते हुए राज ने टेंट की तरफ देखा। अब वह वहाँ दिखाई नहीं दे रहा था।

“तुम उससे निपटो...मैं जा रही हूँ।” आरती झुके-झुके आगे बढ़ी।

“वो तुम्हारे पीछे आ गया तो ?”

“तुम हो न यहाँ...उसे मार देना।”

“वाह!”

आरती बिना कुछ कहे आगे बढ़ती चली गई। कुछ पल राज सोचता रहा फिर वह भी उसकी तरफ चल दिया।

टेंट के क्षेत्र से कुछ आगे दूर के बाद–

“ये बेवकूफी है।” राज आरती के पीछे-पीछे चलते हुए बोला।

“ऐसी सुनसान जगह पर मरने से अच्छा है।”

“उसका मुकाबला किया जा सकता है।”

“तुम कर सकते हो तो रुक जाओ।”

“तुम्हें इतनी दूर अकेले कैसे जाने दूँ ? कुछ हो गया तो ?”

आरती कुछ नहीं बोली। वह तेजी-से आगे बढ़ती गई।

टेंट की तरफ-

येगोर नींद से उठा। उसने देखा–बगल में राज नहीं था। वह रेंगते हुए बाहर आया। उसने आरती के टेंट में झाँका। वह भी खाली था। वह तेजी-से वापस अपने टेंट में आया, फिर उसने अपने बैग को तेजी-से खोला और फिर उसमे छिपा एक पिस्टल निकालकर अपनी जेब में डाला और बैग लेकर उठ खड़ा हुआ। फिर वह तेजी-से टेंट से बाहर निकला।

राज और आरती धर्मशाला की ओर वापस जाते रास्ते पर चलते चले जा रहे थे। दोनों के बीच कोई बात नहीं हो रही थी। रात अन्धेरी थी पर अब आँखें अँधेरे में देखने के लिये अभ्यस्त हो गईं थीं।

राज को अब लगा कि वापस जाना उतना भी मुश्किल नहीं है जितना लग रहा था। लौटने में चढ़ने की जगह उतरना था जो कि चढ़ने से आसान था और अँधेरा भी इतना नहीं था कि बहुत ज्यादा परेशानी आये। हालाँकि ठंड ज़रूर ज्यादा थी।

उसे अब लगने लगा कि आरती का फैसला सही है पर उसके पीछे आने के अपने फैसले पर उसे संदेह ज़रूर था।

उस चीनी को पकड़ने का एक और मौका हो सकता था। वैसे है वो बेहद खतरनाक और अगर उसके साथी भी हुए तो ये काम और मुश्किल होने वाला था।

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