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वर्तमान समय
हिमाचल प्रदेश
अगली सुबह ही राज ने धर्मशाला की बस पकड़ ली। उसे पता था उसकी मंजिल वही है। आठ बजे की निकली बस दोपहर बारह बजे से कुछ पहले ही धर्मशाला पहुँच गई। वहाँ का नज़ारा मनमोहक था। दूर-दूर तक बर्फ से ढकी धौलाधार श्रृंखला दिखाई दे रहीं थी। हरे-भरे पेड़ों से परिपूर्ण उस शहर का मौसम सुहावना था।
दोपहर होने के बावजूद मंडी की अपेक्षा धर्मशाला का तापमान ठंडा था।
बस से उतरकर राज ने बस अड्डे पर ही खाना खाया फिर एक टैक्सी से उस आश्रम की तरफ चल दिया।
वह आश्रम धर्मशाला के एक छोटे-से उपनगर मैक्लॉडगंज में स्थित था जो कि एक तरह से तिब्बतियों की भारत में राजधानी मानी जाती थी। वहाँ अनेकों बौद्ध मोनेस्ट्री थी। इसके आलावा सीनो धर्म के कुछ आश्रम भी थे।
कुछ ही मिनटों में वह अपनी मंजिल यानि ओसाका आश्रम पहुँच गया।
वह एक पहाड़ी के ऊपर निर्मित था, जहां जाने वाली सड़क संकरी थी, फिर भी कार या रिक्शा द्वारा आराम से ऊपर तक पहुँचा जा सकता था।
आश्रम की इमारत लाल-पीले रंग की थी, जो कि वृत्ताकार थी और वह तीन मंजिला थी, ऊपर के माले छोटे होते जा रहे थे और सबसे ऊपर एक छोटा-सा नुकीला गुम्बद बना था।
पीछे की ओर बर्फ से ढकी धौलाधार श्रृंखला थी जिसके दर्शन से अंतर्मन में एक सुखद अहसास होता था।
राज को आश्रम में प्रवेश करते ही बेहद अच्छा लगने लगा। काफी समय बाद मन में सकारात्मक भाव आ रहे थे।
वहाँ चारों तरफ भगवे कपड़े धारण किये दुबले-पतले पहाड़ी लोग घूम रहे थे। उनके सिर पर मात्र छोटी चुटिया भर के बाल थे। जिस किसी की भी नज़र राज पर पड़ रही थी वह उसका झुककर अभिवादन कर रहे थे। शायद वहाँ नये मेहमान का सभी इसी तरह स्वागत करते थे।
आश्रमनिवासियों के आलावा वहाँ कई और आगंतुक भी थे जो कि आश्रम के दर्शन करने आए थे।
भारत के पड़ोसी सीनो देश से उपजे सीनो धर्म के कई अनुयायी भारत में भी थे और उत्तर व पूर्वोत्तर भारत के पहाड़ी क्षेत्रों में इनकी काफी तादाद थी [4] । आश्रम में घूमते हुए एक पत्थर पर लिखी इबारत पर पढ़कर राज को पता चला कि ये आश्रम धर्मगुरु ओसाका ने नौ साल पहले स्थापित किया था और इसका उद्घाटन तत्कालीन हिमाचल प्रदेश के मुख्यमंत्री द्वारा हुआ था।
आश्रम में एक हॉलनुमा पूजास्थल था जहाँ बड़े-बड़े पानी के कलशों के बीच दीप जल रहे थे। दीवारों पर सीनो भाषा के बड़े-बड़े अक्षरों में विभिन्न मन्त्र लिखे थे। अनुयायी पूजा करते हुए उन मन्त्रों का उच्चारण कर रहे थे जिनका गुंजन हॉल में व्यापक हो रहा था। राज उस परिवेश में मंत्रमुग्ध-सा हो रहा था।
यहाँ पहले ही क्यों न आया।
कुछ देर में पूजा समाप्त हुई और वह हॉल से बाहर आया। उसे याद आया कि वह यहाँ किसी उद्देश्य से आया था। पूछताछ के लिये उसके पास मफलर वाले की कोई फोटो भी नहीं थी। फिर उसे कुछ ख्याल आया और उसने फोन में आरती की फोटो निकाली।
असली उद्देश्य तो यहीं है।
उसने वह फोटो आश्रमनिवासियों को दिखानी शुरू की। कुछ लोगों ने साफ़ मना कर दिया। फिर उसने वह फोटो वहाँ उपस्थित औरतों को दिखाया। उन्होंने राज को कोई जवाब तो नहीं दिया पर अब वह उसे उपेक्षित नज़रों से देख रहीं थीं। कुछ ने सीनो भाषा में उससे कुछ कहा, जिसका मतलब तो वो नहीं समझा पर भाव से समझ गया कि वे उसे वहाँ से जाने को बोल रही हैं।
तभी वहाँ उपस्थित एक जवान लड़की उठकर उसके पास पहुंची। वह शक्ल से शहरी लग रही थी।
“किसे ढूंढ रहे हो ?” उसने राज से पूछा।
राज ने उसकी तरफ देखा। उसने भगवे रंग का कुर्ता-पायजामा पहना हुआ था। उसके मुख से साफ़ हिंदी सुनकर राज को कुछ सुकून महसूस हुआ।
“इस लड़की को ढूंढ रहा हूँ। इसका नाम आरती है।”
“तुम्हारी रिश्तेदार है ?”
राज ने हामी भरते हुए कहा – “इसके माता-पिता बेहद दुखी हैं।”
“मेरे साथ आओ।” उसने कहा और एक तरफ बढ़ गई। एक कोने में सीढ़ियाँ थीं। वह उन पर चढ़ती चली गई। ऊपर राहदारी थी जिस पर किसी छात्रावास की तरह कई कमरे नज़र आ रहे थे।
वह एक कमरे में प्रविष्ट हुई। वहाँ एक लड़की कुर्सी पर बैठी खिड़की के बाहर पर्वतों का नज़ारा देखते हुए स्वेटर बुन रही थी।
“दीपिका!” उसने उसे पुकारा।
वह पलटी। उसने लड़की को देखा और फिर स्वतः ही उसकी नज़र उसके पीछे खड़े राज पर चली गई।
राज उसे ध्यान से देखते हुए धीरे-धीरे उसके पास पहुँचा। पहले तो उसे देखकर उसे लगा कि शायद कोई धोखा हुआ है। उसने कई बार मोबाइल पर आरती की फोटो देखी और फिर उस लड़की को देखा। लड़की की शक्ल मिलती-जुलती तो लग रही थी पर फिर भी नैन-नक्श कुछ बदले हुए से थे।
वह लड़की उठ खड़ी हुई और कुछ सहमे से स्वर में बोली, “कौन हैं आप ?”
“तुम आरती हो ?”
“नहीं! मेरा नाम दीपिका है।”
“तुम मंडी की रहने वाली हो ?”
“नहीं!”
“तुम दिल्ली में नौकरी करती थीं ?”
“नहीं!”
“तुम रमन आहूजा को जानती हो ?”
“नहीं! लगता है आपको कोई ग़लतफ़हमी हुई है।”
राज ने एक बार और मोबाइल पर आरती की फोटो देखी और फिर उस लड़की पर नज़र डाली। वाकई दोनों अलग थीं। पर फिर इस लड़की को कैसे धोखा हुआ। उसने पलटकर उसे सवालिया दृष्टि से देखा और फोन दिखाया।
“एक बार को देखने पर ये बिलकुल दीपिका जैसी लग रही है। मैं भी धोखा खा गई।” वह हँसी।
“आप यहाँ कब से रह रही हैं ?” राज ने दीपिका से पूछा।
“अभी कुछ ही दिन हुए हैं।”
“किस शहर से हैं ?”
“धर्मशाला से ही हूँ। अनाथ हूँ। पहले एक अनाथाश्रम में रहती थी। कुछ समय पहले इस आश्रम के बारे में सुना और क्योंकि मैं सीनो धर्म में शुरू से विश्वास रखती थी तो यहाँ आ गई।”
राज कुछ पल वहीं खड़ा रहा। अपने अगले कदम को लेकर वो विचारता रहा। फिर अचानक बोला-
“आपको कष्ट देने के लिये सॉरी! आपकी शक्ल काफी मिलती-जुलती है आरती से। दरअसल ये लड़की मंडी से गायब है। इसके माँ-बाप बेहद परेशान हैं।”
“ओह! मैं प्रार्थना करुँगी वो आपको जल्दी मिल जाये।”
“थैंक्स!” राज ने कहा फिर वापस नीचे की तरफ चल दिया। उसके साथ आई लड़की वहीं रुक गई।
राज नीचे आ गया।
ऐसा लग रहा था कि मंजिल मिल गई पर लगता है अभी मंजिल काफी दूर है।
नीचे आकर वह वापस पूजा वाले हॉल में आ गया। एक जगह पालथी मारकर बैठकर उसने आँखें मूँद ली।
यूँ तो राज शायद ही कभी किसी मंदिर गया हो पर आज इस आश्रम में आने के बाद उसे कुछ अलग महसूस हो रहा था। उसका मन उद्वेलित था। वह मन ही मन रिंकी की आत्मा की शांति की प्रार्थना करने लगा। वह इस बात के लिये भी प्रार्थना करने लगा कि उसे अपने ऊपर लगे इल्जामों से बरी होने के लिये सही मार्गदर्शन मिले।
कुछ देर बाद उसने आँखें खोलीं। उसने हॉल की दीवार पर आलोकित हो रहे मन्त्रों की तरफ देखा। अचानक उसकी नज़र उसके सामने रखे फूलों पर गई। उसने देखा पूजा करते हुए लोगों के सामने पुजारी, पुजरिनें प्रसाद की तरह फूल रख रहे थे। उसने दूसरों का अनुसरण करते हुए फूल उठा लिये।
तभी उसने देखा फूलों के बीच एक छोटा सा नोट था। उसने पढ़ा- ‘एक घंटे बाद आश्रम के बाहर मिलो।’
राज ने हैरानी से चारों तरफ नज़र घुमाई। उसे पीछे दीपिका लोगों के सामने अपनी डलिया से फूल रखती नज़र आई। उसने राज को अनदेखा कर दिया।
राज ने मुस्कराते हुए फूल और नोट अपनी जेब में रखे और आश्रम से बाहर की तरफ चल दिया।
☐☐☐
आश्रम से बाहर कुछ दूरी पर एक पान की दुकान से सिगरेट का पैकेट हासिल करने के बाद राज यूँ ही सड़क किनारे समय व्यतीत करने लगा।
करीब एक घंटे बाद दीपिका बाहर निकलती नज़र आई। राज के पास से निकालते हुए उसने एक सरसरी नज़र उस पर डाली और आगे बढ़ गई।
राज उसके पीछे चल दिया।
कुछ दूर जाने के बाद वे उस पहाड़ी के एक कोने पर आ गये जो कि एक सनसेट पॉइंट था। फिलहाल वहाँ ज्यादा चहल-पहल नहीं थी। दीपिका खाई के किनारे रेलिंग के पास जाकर खड़ी हो गई। सामने ऊंचे-ऊंचे पर्वत थे और उनके नीचे स्लेटी रंग के बादल तैर रहे थे।
राज उसके पास आकर खड़ा हो गया और सामने देखते हुए बोला-
“तो तुम ही आरती हो ?”
उसने स्वीकृति में सिर हिलाया।
“तुम यहाँ क्या कर रही हो ?”
“मैं अब इसी आश्रम में रहती हूँ।”
“क्या तुम्हारे माँ-बाप को इस बारे में पता है।”
उसने इंकार में सिर हिलाया। उसके चेहरे पर पीड़ा के भाव उभर आये।
“पापा-मम्मी कैसे हैं ?”
“तुम्हारे पेरेंट्स हैं, बुजुर्ग हैं, तुम्हें मालूम होना चाहिये।”
“आप...कौन हैं ?”
“एक सरकारी जासूस। मैं तुम्हें तलाशते हुए अब तक तकरीबन पूरा हिमाचल घूम चुका हूँ।”
“मुझे क्यों तलाश कर रहे थे ?
“रमन आहूजा के लिये।”
उसने पलटकर राज को ध्यान से देखा। राज को उसकी खूबसूरत आँखों में दुःख के भाव दिखे।
“क्या आप भी उसकी टीम में थे ?”
“कौन-सी टीम ?”
“धीरज के मिशन की टीम।”
“नहीं! पर मुझे उसके बारे में जानना है।”
“धीरज तो मर चुका है। अब आप लोगों को और क्या चाहिये ?” वह तड़पते हुए शब्दों में बोली।
शायद इसको पता नहीं है कि आहूजा की मौत मेरे हाथों ही हुई थी। अगर पता चला तो ...
“धीरज के मिशन के बारे में पूरी जानकारी जानना देश की सुरक्षा के लिये बेहद ज़रुरी है। मुझे उम्मीद है तुम उसके बारे में जो कुछ जानती हो सच-सच मुझे बताओगी।”
“बताने की नीयत न होती तो यूँ आप से मिलने न आती।” आरती उसे गौर से देखते हुए बोली, “आप तो मुझे पहचान नहीं पाये थे। वापस ही चले जाते न ?”
हिमाचल प्रदेश
अगली सुबह ही राज ने धर्मशाला की बस पकड़ ली। उसे पता था उसकी मंजिल वही है। आठ बजे की निकली बस दोपहर बारह बजे से कुछ पहले ही धर्मशाला पहुँच गई। वहाँ का नज़ारा मनमोहक था। दूर-दूर तक बर्फ से ढकी धौलाधार श्रृंखला दिखाई दे रहीं थी। हरे-भरे पेड़ों से परिपूर्ण उस शहर का मौसम सुहावना था।
दोपहर होने के बावजूद मंडी की अपेक्षा धर्मशाला का तापमान ठंडा था।
बस से उतरकर राज ने बस अड्डे पर ही खाना खाया फिर एक टैक्सी से उस आश्रम की तरफ चल दिया।
वह आश्रम धर्मशाला के एक छोटे-से उपनगर मैक्लॉडगंज में स्थित था जो कि एक तरह से तिब्बतियों की भारत में राजधानी मानी जाती थी। वहाँ अनेकों बौद्ध मोनेस्ट्री थी। इसके आलावा सीनो धर्म के कुछ आश्रम भी थे।
कुछ ही मिनटों में वह अपनी मंजिल यानि ओसाका आश्रम पहुँच गया।
वह एक पहाड़ी के ऊपर निर्मित था, जहां जाने वाली सड़क संकरी थी, फिर भी कार या रिक्शा द्वारा आराम से ऊपर तक पहुँचा जा सकता था।
आश्रम की इमारत लाल-पीले रंग की थी, जो कि वृत्ताकार थी और वह तीन मंजिला थी, ऊपर के माले छोटे होते जा रहे थे और सबसे ऊपर एक छोटा-सा नुकीला गुम्बद बना था।
पीछे की ओर बर्फ से ढकी धौलाधार श्रृंखला थी जिसके दर्शन से अंतर्मन में एक सुखद अहसास होता था।
राज को आश्रम में प्रवेश करते ही बेहद अच्छा लगने लगा। काफी समय बाद मन में सकारात्मक भाव आ रहे थे।
वहाँ चारों तरफ भगवे कपड़े धारण किये दुबले-पतले पहाड़ी लोग घूम रहे थे। उनके सिर पर मात्र छोटी चुटिया भर के बाल थे। जिस किसी की भी नज़र राज पर पड़ रही थी वह उसका झुककर अभिवादन कर रहे थे। शायद वहाँ नये मेहमान का सभी इसी तरह स्वागत करते थे।
आश्रमनिवासियों के आलावा वहाँ कई और आगंतुक भी थे जो कि आश्रम के दर्शन करने आए थे।
भारत के पड़ोसी सीनो देश से उपजे सीनो धर्म के कई अनुयायी भारत में भी थे और उत्तर व पूर्वोत्तर भारत के पहाड़ी क्षेत्रों में इनकी काफी तादाद थी [4] । आश्रम में घूमते हुए एक पत्थर पर लिखी इबारत पर पढ़कर राज को पता चला कि ये आश्रम धर्मगुरु ओसाका ने नौ साल पहले स्थापित किया था और इसका उद्घाटन तत्कालीन हिमाचल प्रदेश के मुख्यमंत्री द्वारा हुआ था।
आश्रम में एक हॉलनुमा पूजास्थल था जहाँ बड़े-बड़े पानी के कलशों के बीच दीप जल रहे थे। दीवारों पर सीनो भाषा के बड़े-बड़े अक्षरों में विभिन्न मन्त्र लिखे थे। अनुयायी पूजा करते हुए उन मन्त्रों का उच्चारण कर रहे थे जिनका गुंजन हॉल में व्यापक हो रहा था। राज उस परिवेश में मंत्रमुग्ध-सा हो रहा था।
यहाँ पहले ही क्यों न आया।
कुछ देर में पूजा समाप्त हुई और वह हॉल से बाहर आया। उसे याद आया कि वह यहाँ किसी उद्देश्य से आया था। पूछताछ के लिये उसके पास मफलर वाले की कोई फोटो भी नहीं थी। फिर उसे कुछ ख्याल आया और उसने फोन में आरती की फोटो निकाली।
असली उद्देश्य तो यहीं है।
उसने वह फोटो आश्रमनिवासियों को दिखानी शुरू की। कुछ लोगों ने साफ़ मना कर दिया। फिर उसने वह फोटो वहाँ उपस्थित औरतों को दिखाया। उन्होंने राज को कोई जवाब तो नहीं दिया पर अब वह उसे उपेक्षित नज़रों से देख रहीं थीं। कुछ ने सीनो भाषा में उससे कुछ कहा, जिसका मतलब तो वो नहीं समझा पर भाव से समझ गया कि वे उसे वहाँ से जाने को बोल रही हैं।
तभी वहाँ उपस्थित एक जवान लड़की उठकर उसके पास पहुंची। वह शक्ल से शहरी लग रही थी।
“किसे ढूंढ रहे हो ?” उसने राज से पूछा।
राज ने उसकी तरफ देखा। उसने भगवे रंग का कुर्ता-पायजामा पहना हुआ था। उसके मुख से साफ़ हिंदी सुनकर राज को कुछ सुकून महसूस हुआ।
“इस लड़की को ढूंढ रहा हूँ। इसका नाम आरती है।”
“तुम्हारी रिश्तेदार है ?”
राज ने हामी भरते हुए कहा – “इसके माता-पिता बेहद दुखी हैं।”
“मेरे साथ आओ।” उसने कहा और एक तरफ बढ़ गई। एक कोने में सीढ़ियाँ थीं। वह उन पर चढ़ती चली गई। ऊपर राहदारी थी जिस पर किसी छात्रावास की तरह कई कमरे नज़र आ रहे थे।
वह एक कमरे में प्रविष्ट हुई। वहाँ एक लड़की कुर्सी पर बैठी खिड़की के बाहर पर्वतों का नज़ारा देखते हुए स्वेटर बुन रही थी।
“दीपिका!” उसने उसे पुकारा।
वह पलटी। उसने लड़की को देखा और फिर स्वतः ही उसकी नज़र उसके पीछे खड़े राज पर चली गई।
राज उसे ध्यान से देखते हुए धीरे-धीरे उसके पास पहुँचा। पहले तो उसे देखकर उसे लगा कि शायद कोई धोखा हुआ है। उसने कई बार मोबाइल पर आरती की फोटो देखी और फिर उस लड़की को देखा। लड़की की शक्ल मिलती-जुलती तो लग रही थी पर फिर भी नैन-नक्श कुछ बदले हुए से थे।
वह लड़की उठ खड़ी हुई और कुछ सहमे से स्वर में बोली, “कौन हैं आप ?”
“तुम आरती हो ?”
“नहीं! मेरा नाम दीपिका है।”
“तुम मंडी की रहने वाली हो ?”
“नहीं!”
“तुम दिल्ली में नौकरी करती थीं ?”
“नहीं!”
“तुम रमन आहूजा को जानती हो ?”
“नहीं! लगता है आपको कोई ग़लतफ़हमी हुई है।”
राज ने एक बार और मोबाइल पर आरती की फोटो देखी और फिर उस लड़की पर नज़र डाली। वाकई दोनों अलग थीं। पर फिर इस लड़की को कैसे धोखा हुआ। उसने पलटकर उसे सवालिया दृष्टि से देखा और फोन दिखाया।
“एक बार को देखने पर ये बिलकुल दीपिका जैसी लग रही है। मैं भी धोखा खा गई।” वह हँसी।
“आप यहाँ कब से रह रही हैं ?” राज ने दीपिका से पूछा।
“अभी कुछ ही दिन हुए हैं।”
“किस शहर से हैं ?”
“धर्मशाला से ही हूँ। अनाथ हूँ। पहले एक अनाथाश्रम में रहती थी। कुछ समय पहले इस आश्रम के बारे में सुना और क्योंकि मैं सीनो धर्म में शुरू से विश्वास रखती थी तो यहाँ आ गई।”
राज कुछ पल वहीं खड़ा रहा। अपने अगले कदम को लेकर वो विचारता रहा। फिर अचानक बोला-
“आपको कष्ट देने के लिये सॉरी! आपकी शक्ल काफी मिलती-जुलती है आरती से। दरअसल ये लड़की मंडी से गायब है। इसके माँ-बाप बेहद परेशान हैं।”
“ओह! मैं प्रार्थना करुँगी वो आपको जल्दी मिल जाये।”
“थैंक्स!” राज ने कहा फिर वापस नीचे की तरफ चल दिया। उसके साथ आई लड़की वहीं रुक गई।
राज नीचे आ गया।
ऐसा लग रहा था कि मंजिल मिल गई पर लगता है अभी मंजिल काफी दूर है।
नीचे आकर वह वापस पूजा वाले हॉल में आ गया। एक जगह पालथी मारकर बैठकर उसने आँखें मूँद ली।
यूँ तो राज शायद ही कभी किसी मंदिर गया हो पर आज इस आश्रम में आने के बाद उसे कुछ अलग महसूस हो रहा था। उसका मन उद्वेलित था। वह मन ही मन रिंकी की आत्मा की शांति की प्रार्थना करने लगा। वह इस बात के लिये भी प्रार्थना करने लगा कि उसे अपने ऊपर लगे इल्जामों से बरी होने के लिये सही मार्गदर्शन मिले।
कुछ देर बाद उसने आँखें खोलीं। उसने हॉल की दीवार पर आलोकित हो रहे मन्त्रों की तरफ देखा। अचानक उसकी नज़र उसके सामने रखे फूलों पर गई। उसने देखा पूजा करते हुए लोगों के सामने पुजारी, पुजरिनें प्रसाद की तरह फूल रख रहे थे। उसने दूसरों का अनुसरण करते हुए फूल उठा लिये।
तभी उसने देखा फूलों के बीच एक छोटा सा नोट था। उसने पढ़ा- ‘एक घंटे बाद आश्रम के बाहर मिलो।’
राज ने हैरानी से चारों तरफ नज़र घुमाई। उसे पीछे दीपिका लोगों के सामने अपनी डलिया से फूल रखती नज़र आई। उसने राज को अनदेखा कर दिया।
राज ने मुस्कराते हुए फूल और नोट अपनी जेब में रखे और आश्रम से बाहर की तरफ चल दिया।
☐☐☐
आश्रम से बाहर कुछ दूरी पर एक पान की दुकान से सिगरेट का पैकेट हासिल करने के बाद राज यूँ ही सड़क किनारे समय व्यतीत करने लगा।
करीब एक घंटे बाद दीपिका बाहर निकलती नज़र आई। राज के पास से निकालते हुए उसने एक सरसरी नज़र उस पर डाली और आगे बढ़ गई।
राज उसके पीछे चल दिया।
कुछ दूर जाने के बाद वे उस पहाड़ी के एक कोने पर आ गये जो कि एक सनसेट पॉइंट था। फिलहाल वहाँ ज्यादा चहल-पहल नहीं थी। दीपिका खाई के किनारे रेलिंग के पास जाकर खड़ी हो गई। सामने ऊंचे-ऊंचे पर्वत थे और उनके नीचे स्लेटी रंग के बादल तैर रहे थे।
राज उसके पास आकर खड़ा हो गया और सामने देखते हुए बोला-
“तो तुम ही आरती हो ?”
उसने स्वीकृति में सिर हिलाया।
“तुम यहाँ क्या कर रही हो ?”
“मैं अब इसी आश्रम में रहती हूँ।”
“क्या तुम्हारे माँ-बाप को इस बारे में पता है।”
उसने इंकार में सिर हिलाया। उसके चेहरे पर पीड़ा के भाव उभर आये।
“पापा-मम्मी कैसे हैं ?”
“तुम्हारे पेरेंट्स हैं, बुजुर्ग हैं, तुम्हें मालूम होना चाहिये।”
“आप...कौन हैं ?”
“एक सरकारी जासूस। मैं तुम्हें तलाशते हुए अब तक तकरीबन पूरा हिमाचल घूम चुका हूँ।”
“मुझे क्यों तलाश कर रहे थे ?
“रमन आहूजा के लिये।”
उसने पलटकर राज को ध्यान से देखा। राज को उसकी खूबसूरत आँखों में दुःख के भाव दिखे।
“क्या आप भी उसकी टीम में थे ?”
“कौन-सी टीम ?”
“धीरज के मिशन की टीम।”
“नहीं! पर मुझे उसके बारे में जानना है।”
“धीरज तो मर चुका है। अब आप लोगों को और क्या चाहिये ?” वह तड़पते हुए शब्दों में बोली।
शायद इसको पता नहीं है कि आहूजा की मौत मेरे हाथों ही हुई थी। अगर पता चला तो ...
“धीरज के मिशन के बारे में पूरी जानकारी जानना देश की सुरक्षा के लिये बेहद ज़रुरी है। मुझे उम्मीद है तुम उसके बारे में जो कुछ जानती हो सच-सच मुझे बताओगी।”
“बताने की नीयत न होती तो यूँ आप से मिलने न आती।” आरती उसे गौर से देखते हुए बोली, “आप तो मुझे पहचान नहीं पाये थे। वापस ही चले जाते न ?”