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Thriller मिशन

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रात का स्याह अंधेरा अब शनैः-शनैः क्षीण होता जा रहा था। पूरब की दिशा में आसमान धीरे-धीरे हल्का नीला रंग ले रहा था। ठंड अभी भी काफी थी।

राज और आरती मैक्लोइड गंज से अब कुछ ही दूर थे।

आरती व्यग्रता के साथ आगे बढ़ रही थी जबकि राज ठंड में ठिठुरते हुए उसके पीछे था।

“धीरे चलो यार, यहाँ ठंड से हालत खराब है।”

“एक बार शहर पहुँच जायें। फिर तुम्हें गर्मागर्म चाय पिलाऊंगी। पर फिलहाल जितना तेज चल सकते हो चलते चलो। उन लोगों का कोई भरोसा नहीं।”

“ऐसा क्यों लग रहा है–तुम उसे जानती हो।”

“तुम प्लीज़ अपना जासूसी दिमाग ज़रा कम चलाओ।”

“कुछ तो बात करते चलो। कम से कम ठंड से तो ध्यान हटेगा। सच बताओ –कौन था वो पिद्दी पहलवान ?”

आरती हंस दी।

“हम दोनों की जान लेने को तैयार था वो। दुबारा मिलेगा तब बताऊंगा उसे। जेल की हवा न खिलाई...”

तभी एक शोला चमका।

दोनों फुर्ती के साथ झुक गए।

“फायरिंग! वो भी साइलेंसर के साथ!” राज पीछे मुड़कर देखते हुए बोला।

“लगता है वो लोग आ गए।” आरती भयभीत होते हुए बोली।

“पर कैसे ? अभी तक तो कोई पीछे आता नहीं दिख रहा था।” राज ने अपना पिस्टल निकाल लिया। दोनों एक पेड़ की ओट में हो गये। राज झांकते हुए निशाना लेने की कोशिश करने लगा। अंधेरे में कुछ भी दिखाई नहीं दे रहा था।

“हमें आगे बढ़ते रहना चाहिये।” आरती ने कहा, “वरना फंस जायेंगे।”

राज ने उसका सुझाव स्वीकारा। दोनों मुख्य रास्ते के किनारे पेड़ों के बीच होते हुए आगे बढ़ने लगे।

तभी राज चिहुंक उठा।

“तुम ठीक तो हो ?” आरती ने पूछा।

“हां चलो... चलो...” राज लड़खड़ाते हुए बोला और अचानक ही उसका सिर चकराने लगा और वह गिर पड़ा।

“अमन... अमन...” आरती ने उसे टटोला तो उसे उसकी पीठ पर चिपचिपापन महसूस हुआ। उसने अपना हाथ चाँद की रोशनी में देखा–वह खून से सना हुआ था।

☐☐☐
 
वर्तमान समय

नई दिल्ली

ज़ाहिद और सुरेश पुरानी दिल्ली के दरयागंज पुलिस स्टेशन पहुँचे। वहाँ मौजूद एसएचओ जगजीत पंत को अपना परिचय देने के बाद सुरेश बोला-

“एसएचओ साहब! हमें कुछ साल पहले दर्ज एक मर्डर के बारे में जानना है।”

“ज़रूर जनाब! केस के बारे में कुछ बताइए। मैं फ़ाइल निकलवाता हूँ।”

“शमशेर सिंह नामक एक आदमी को उसके घर में जिन्दा जलाकर मार दिया गया था। केस आज से करीब पांच साल पहले का होगा।”

“तब तो मैं इस जगह पोस्टेड भी नहीं था, पर फ़ाइल तो मिल ही जायेगी।”

एसएचओ पंत ने एक कर्मचारी को बुलाकर निर्देश दिया। फ़ाइल ढूंढने में करीब आधा घंटा लग गया।

फ़ाइल के आते ही वे उसका अध्ययन करने लगे। पता चला कि शमशेर सिंह को रात के वक़्त उसके घर के अन्दर किसी ने जला दिया था। अपराधी आज तक पकड़ा नहीं गया। पर इस बात की पुष्टि हुई थी कि वहाँ दो आदमी आये थे और उन्होंने पेट्रोल का प्रयोग कर उसे जलाया था।

पढ़ते हुए सुरेश सोच में पड़ गया। “पेट्रोल से जलाया...आखिर क्यों ?”

“सुनकर तो दुश्मनी का केस लग रहा है। इतनी बेदर्दी से तो कोई दुश्मनी निकालने के लिये ही मार सकता है।” पंत ने सुझाव दिया।

“आहूजा के पिता को भी जलाकर मारा गया था।” सुरेश ज़ाहिद की तरफ देखते हुए बोला।

“शमशेर सिंह!” ज़ाहिद ने फोन निकला और गूगल में सर्च करने लगा। कुछ देर बाद वो बोला, “तुमने एकदम सही पकड़ा। उसके ऊपर कई साल पहले एक आईएएस अफसर को जलाकर मारने का केस चला था, जिसमे हाईकोर्ट से उसे क्लीन चिट मिल गई थी।”

“यानि आहूजा ने अपने पिता की मौत का बदला लिया।”

“ऐसा ही लग रहा है।” ज़ाहिद बोला।

“मैं उसका घर देखना चाहता हूँ।” सुरेश बोला।

“लेकिन, अभी पांच साल बाद वहाँ क्या मिलेगा ?” पंत ने कहा।

“कभी-कभी सबूत के अलावा भी कुछ ऐसी बातें पता चल जाती हैं जिनसे कुछ रहस्य सुलझाये जा सकते हैं।”

“चलो फिर चला जाये।” कहकर ज़ाहिद उठा। “इस फ़ाइल की एक कॉपी निकलवा दीजिये।”

कुछ देर में वे दोनों पंत और एक कांस्टेबल के साथ कबूतर मार्केट पहुँचे, जहाँ शमशेर सिंह का घर हुआ करता था।

मार्केट में जगह-जगह मुर्गे, बकरे, खरगोश, और न जाने कौन-कौन से किस्म के जानवर और पक्षी बिक रहे थे।

शमशेर सिंह का घर दुकानों के ऊपर एक दो कमरे की जगह थी जहाँ अभी एक कसाई अपने परिवार के साथ रह रहा था। पुलिस को देखकर कसाई और उसका परिवार डर गया पर फिर पंत ने उन्हें समझाया कि वे किस वजह से वहाँ आये थे। सुनकर वह भी स्तब्ध रह गया क्योंकि उसे भी पांच साल पहले हुए उस हादसे के बारे में कोई जानकारी नहीं थी।

वे लोग कमरे में जा खड़े हुए जो कि वहीं बेडरूम था जहाँ शमशेर सिंह की मौत हुई थी।

सुरेश और ज़ाहिद चारों तरफ ध्यान से देखने लगे। कमरे से निकलकर वह छोटी-सी बालकनी में पहुँचे। बालकनी बगल वाले घर से जुड़ी हुई थी दोनों के बीच बस एक छोटी-सी रेलिंग थी।

“रिपोर्ट के हिसाब से शमशेर सिंह बालकनी का दरवाजा खोलकर सो रहा था और क़ातिल बालकनी के ज़रिये पहुँचे थे।”

“बगल वाला घर किसका है ?”

“सालों से खाली पड़ा है। मालिक ने अभी तक जगह बेची नहीं और न ही रिनोवेट करने के बारे में विचार किया।”

“यानि अन्दर आना कोई बड़ी बात नहीं थी।” ज़ाहिद बोला।

“शमशेर करता क्या था ?” सुरेश ने पूछा।

पंत फ़ाइल देखकर बोला, “वह इसी मार्केट में पालतू पक्षी बेचता था।”

“क़त्ल की प्लानिंग के लिये क़ातिल ने ज़रूर उसके घर और दुकान विज़िट की होगी। वो अकेला काम करता था या उसके साथ कोई और था ?”

“इस तरह के काम में कोई न कोई साथ तो होगा ही।” ज़ाहिद बोला।

पंत बोला, “इसमे ललित नाम के किसी बन्दे का बयान है। वह उसके बिजनस में साथी था। उसका एड्रेस दिया है। यहीं पास का है।”

“बढ़िया!” सुरेश बोला, “ उससे मिलने चलते हैं।”

वहाँ से वे लोग ललित के एड्रेस पर पहुँचे। वहाँ पता चला वह किसी और जगह शिफ्ट हो चुका था। उसके नये पते पर पहुँचकर पता चला कि वह फ़िलहाल मार्केट में ही काम पर निकला था।

उसकी दुकान पर पहुँचकर उन्हें ललित मिला। वहाँ कई पिंजरे थे जिसमे तरह-तरह के खरगोश कैद थे।

ललित चालीस के लपेटे में पहुँचा एक नाटा-सा आदमी था। उसकी दाढ़ी बढ़ी थी। उसने एक बनियान और पेंट पहन रखी थी।

“तो तुम खरगोश बेचते हो।” पंत पिंजरों को देखते हुए बोला।

“जी! कई सालों से बेच रहा हूँ। कोई गलती हो गई मालिक ?” पुलिस को देखकर वह घबरा गया था।

“घबराओ नहीं!” सुरेश बोला, “तुम पहले शमशेर के साथ काम करते थे ?”

शमशेर का नाम सुनकर उसके चेहरे पर कई रंग बदले। “सालों पुरानी याद दिला दी साहब आपने। जी हाँ! हम दोनों साथ में काम करते थे, इसी मार्केट में। पर शमशेर...”

“इन्हें देखो...” सुरेश ने अपने फोन पर कई फोटो दिखाई। वे निक और आहूजा की असली और रज़ा मालिक के भेष में थीं।

वह सर खुजाने लगा।

“ध्यान से देखो, आराम से देखो। ये पांच साल पहले तुम्हारी दुकान पर ज़रूर आये होंगे। शायद अकेले या साथ में, किसी और रूप में, हो सकता है अच्छे कपड़े न पहने हों।” सुरेश ने उसे फोन पकड़ा दिया।

वह फोटो बदल-बदल कर बार-बार देखने लगा।

“शमशेर की हत्या से शायद कुछ ही दिन पहले आये होंगे।” ज़ाहिद बोला।

उसने आहूजा की रज़ा मलिक के भेष वाली फोटो दिखाते हुए कहा- “मुझे लग रहा है ये आदमी आया था दो दिन पहले। इसने एक खरगोश खरीदा था और सवाल बहुत पूछ रहा था इसलिये मुझे अभी तक याद है। कुछ नहीं तो इसने आधा घंटा बिताया था मेरे और शमशेर के साथ दुकान पर।”

“बहुत बढ़िया!” कहते हुए सुरेश की नज़रें ज़ाहिद से मिलीं।

वे दोनों समझ सकते थे कि आहूजा के खिलाफ ये पहला पुख्ता सबूत था।

उन्होंने एसएचओ को उसे थाने ले जाकर उसका लिखित बयान लेने को कहा और फिर वहाँ से निपटने के बाद उन्होंने अभय को फोन किया।

“बोलो सुरेश!”

“सर हमें आहूजा के खिलाफ एक मर्डर का सबूत मिला है।”

पूरी बात सुनने के बाद अभय बोला, “लीड तो अच्छा है, पर अभी भी वो क़ातिल साबित नहीं हुआ है।”

“अग्री! पर सर...”

“साथ ही इंटरपोल को उसके आतंकवादी होने के सबूत चाहिये, क़ातिल होने से कुछ ख़ास फर्क नहीं पड़ने वाला। बट गुड जॉब एनीवे...उसके आईएसआई में शामिल होने के पुख्ता सबूत मिलना भी कुछ काम आ सकता है।”

“हमारा एक मोल उसकी जानकारी निकाल रहा है।”

“पर सबूत क्या देगा ? कुछ फोटो, रिकार्डिंग, ये सब अब उसके मरने के बाद निकालना मुश्किल है। पर अगर ऐसा कुछ मिल सके तो ये हमारे लिये कामयाबी होगी।”

“सर इस तरह तो सोहनगढ़ माइंस में उसकी प्रेज़ेंस खुद ही बड़ा सबूत है। आखिर इंटरपोल की जानकारी के बगैर वह किस कैपेसिटी में वहाँ मौजूद था ? आखिर वह वहाँ आतंकवादियों के साथी के तौर पर मौजूद था।”

“ये दलील तो पहले भी दी जा चुकी है पर बात फिर वहीं आकर रुक जाती है न कि उसे मारने के लिये हमारे पास क्या वजह थी और उस वजह का सबूत क्या था ? इसलिये अगर उसके आईएसआई में भर्ती होने का सबूत भी मिल सके तो अच्छा रहेगा।”

“जी सर! कोशिश कर रहे हैं।”

“और क्या चल रहा है ? धर्मशाला कब जाने वाले हो ?”

“यहाँ कुछ काम बने फिर वहाँ जाने ...”

“मेरे ख्याल से अभी जहाँ का लीड मिल रहा है उधर आगे बढ़ना चाहिये। इस मर्डर पर पुलिस को काम सँभालने दो और आईएसआई में अपने मोल को काम करने दो, सबूत जुटाने दो, तुम लोग धर्मशाला में आगे बढ़ो।”

“ओके सर! कोमजुम लोल्लेन का क्या रहा ?”

“उस तरफ चार लोगों की एक टीम काम कर रही है। कुछ ब्रेकथ्रू मिलते ही तुम दोनों को इत्तला करते हैं।”

“ओके सर!”

☐☐☐
 
रात्रि का समय था। हिंद महासागर में गज़ब का तूफ़ान आया हुआ था। रह-रहकर बिजली कड़क रही थी। निरंतर बारिश हो रही थी। लहरें कई-कई फिट ऊँची उठ रही थी।

ऐसे मौसम में वाकई वह स्टीमर काबिले तारीफ था जो कि किसी तरह उन लहरों में भी पलटने और डूबने से बचाये हुए था। शायद ये उसके चालक की कुशाग्रता थी। लहरों के उठने से पहले ही उन्हें भांपकर वह स्टीमर को नेविगेट कर रहा था।

अचानक स्टीमर की लाईट में उसे समुद्र में कुछ चमका। वह एक स्लेटी रंग की धातु से बनी कोई चीज़ थी।

उसने स्टीमर को उसकी ओर किया।

पास आने पर उसे उस चीज़ का बेहतर दीदार मिला।

वह उसे पहचान गया। वह प्लेन का फ्युसिलाज था।

वह केबिन के अंदर गया और जब कुछ देर बाद बाहर आया तो उसके शरीर पर स्कूबा डाइविंग की पोशाक थी। उसने बाहर ही एक कोने में रखी वह जैकेट पहन ली जिस पर गैस सिलेंडर लगे हुए थे। फिर उसने मास्क धारण किया और नाक की जगह मुंह से सांस खींचने लगा।

उसके बाद वह स्टीमर पर लगी सीढ़ियों से समुद्र में उतर गया।

अथाह काले पानी के अंदर वह उतरता चला गया। उसके मास्क के ऊपर लगी लाईट उसे पानी के अंदर देखने में सहायक अवश्य थी पर फिर भी रात के इस अँधेरे में कुछ भी देख पाना काफी कठिन था।

कुछ और फिट नीचे उतरने के बाद उसे मछलियाँ नज़र आईं जो इस आगंतुक को देखकर कुछ भयभीत थीं।

कुछ देर प्रयास करते रहने के बाद भी उसे कुछ खास नज़र नहीं आया तो वह सतह की तरफ अग्रसर हुआ।

ऊपर आने के बाद उसने देखा वह बोट से कुछ दूर आ गया था।

उसने समुद्र की सतह पर दूर-दूर तक देखने का प्रयास किया। फिर एक तरफ उसे कुछ चमका। कुछ तैर रहा था। वह उस तरफ बढ़ गया।

कुछ देर तैरने के बाद वह वहाँ पहुँचा।

उस वस्तु के नज़दीक पहुँचने के बाद वह हैरान रह गया। वह पानी में तैरती एक लाश थी। उसने ध्यान दिया उसके बाल लंबे थे–वह एक बच्ची थी, उसने लाइफ जैकेट पहनी हुई थी इसलिये वह डूबी नहीं थी।

उसने उसका चेहरा अपनी तरफ पलटाया।

उसका चेहरा देखते ही वह सकते में आ गया।

“फ़लक! नहीं! नहीं! मेरी बच्ची! क्या...क्या हो गया तुझे....” वह उसके गाल थपथपाने लगा.

“कुछ नहीं होने दूंगा तुझे मेरी जान!” वह उसे खींचते हुए बोट की तरफ तैरने लगा।

कुछ देर बाद वह उसे लेकर बोट पर पहुँच गया।

बुरी तरह हाँफते हुए उसने उसका शरीर बोट पर लेटा दिया। उसका पूरा शरीर एकदम सफ़ेद पड़ा था– मानो पूरा खून जम चुका हो।

पर वो उसे ज़िंदा करने पर आमादा था। वह उसकी छाती पर हाथों से स्पंदन करने लगा। लड़की के शरीर में काफी पानी भरा था जो उसके मुंह से निकलने लगा।

“उठ जा...मेरी जान! फ़लक! मेरी बच्ची! देख–तेरे डैडी ने तुझे ढूंढ लिया। उठ जा, बच्ची!”

तभी पीछे से उसके कंधे को किसी ने थपथपाया।

“वो मर चुकी है। हौसला रखो मेरे भाई!”

“ऐसे कैसे मर सकती है वो ? अभी तो उसने ज़िंदगी ढंग से जी भी नहीं। कुछ नहीं होगा उसे। देखना ये अभी उठ बैठेगी।” वह उसी तरह निरंतर उसकी छाती पर स्पंदन करते हुए बोला।

“क्या कह रहे हो ? क्या हुआ है तुम्हें ?” वह उसे झकझोरते हुए बोला।
 
वर्तमान समय

हिमाचल प्रदेश

अचानक ही ज़ाहिद ने चौंककर आँखें खोलीं।

वह प्लेन की सीट पर था। सुरेश उसकी तरफ चिंतित मुद्रा में देख रहा था। उसका हाथ उसके कंधे पर था।

ज़ाहिद ने दो पल उसकी तरफ अचरज से देखा फिर अपने चेहरे पर हाथ फेरा।

“तुम ठीक हो ?” सुरेश ने पूछा।

ज़ाहिद ने हामी भरी।

सुरेश समझ सकता था आजकल ज़ाहिद के मन में क्या चल रहा है। किस तरह के स्वप्न उसे व्याकुल कर रहे हैं।

दोनों इस वक्त प्लेन में थे और वे कुछ ही देर में धर्मशाला पहुँचने वाले थे।

मैक्लॉडगंज में धर्मगुरु सुज़ुकी का आश्रम था।

ज़ाहिद ने दिल्ली से ही आश्रम में फोन करके वहाँ आने की इच्छा व्यक्त कर दी थी। उसे वहाँ से सकारात्मक उत्तर मिला।

उनके साथ विशाल भदौरिया नामक इंटरप्रेटर भी था जो कि सीनो भाषा में दक्ष था।

धर्मशाला के एयरपोर्ट पर लैंड करने के बाद टैक्सी करके वे लोग सीधे आश्रम पहुँचे। आश्रम के अंदर उन्हें कुछ देर इंतजार करने को कहा गया। आश्रम में चारों तरफ भगवे कपड़े पहने शिष्य और पुजारी दिखाई दे रहे थे। पूरा आश्रम लकड़ी से बना हुआ लग रहा था। वहाँ एक मनमोहक सुगंध व्यापक थी और माहौल में मन शांत करने का प्रभाव था।

आखिरकर सुज़ुकी के कमरे का दरवाजा खुला और वे लोग अंदर आ गए। उनके सामने ज़मीन पर बिछी चटाई पर बैठा एक सत्तर साल का सीनो मूल का वृद्ध बैठा था। उसके चेहरे पर बेहद मनमोहक भाव थे। होठों पर विद्यमान बरबस मुस्कान से वह एक प्रसन्नचित्त इंसान प्रतीत हो रहा था।

उसके सामने लकड़ी की एक चौखट थी जिस पर कोई बड़ी-सी किताब खुली थी। उसने उन तीनों को अपने सामने बिछे कालीन पर बैठने का इशारा किया और उनके साथ आए शिष्यों को वापस जाने का निर्देश दिया।

“हमें मिलने का समय देने के लिये आपका शुक्रिया।” सुरेश बोला तो विशाल ने अपनी जॉब शुरू कर दी। उसने सीनो में उसका अनुवाद कर के गुरु सुज़ुकी को बताया। सुज़ुकी ने भी प्रत्युत्तर में उनसे मिलने की खुशी उजागर की।

“हम इंडियन एयरलाइंस के एक लापता विमान की खोजबीन में लगे हैं। हमारी जानकारी के मुताबिक आप और आप के चार शिष्य ने भी इस फ्लाइट में बुकिंग कराई हुई थी पर अंत समय में आपने वह फ्लाइट बोर्ड नहीं की। हम उस बारे में जानना चाहते हैं।”

सुज़ुकी ने पूछा, “आप लोग कब की बात कर रहे हैं ? कहां से कहां की फ्लाइट थी ?”

“करीब छह साल पहले अलीगढ़ से क़तर की फ्लाइट।”

“ओह! याद आया। हम उस वक्त अलीगढ़ में थे और वहाँ से मुंबई जाने वाले थे।” सुज़ुकी ने बताया।

“हां! ये फ्लाइट अलीगढ़ से मुंबई और फिर मुंबई से क़तर जाने वाली थी। आप की बुकिंग मुंबई तक का था। सही कहा आपने।” सुरेश बोला।

“मुझे याद है। अंतिम समय में हमारा प्लान चेंज हो गया था।”

“आप लोग मुंबई किस सिलसिले में जा रहे थे ?”

“एक सभा थी। सीनो और भारत के संबंधों पर। उसमे हमें आमंत्रित किया गया था।”

“फिर आप लोग क्यों नहीं गए ?”

“कुछ कारणों से हमें आश्रम वापस आना पड़ा। हमारे मुख्य पुजारी की तबीयत काफी बिगड़ गई थी।”

“कौन हैं वो ? क्या हम जान सकते हैं ? क्या वह अभी भी आश्रम में हैं ?”

“नहीं! उस वाकये के करीब एक महीने बाद ही उनकी मृत्यु हो गई थी।”

“ये तो बहुत बुरा हुआ। कोई बीमारी थी उन्हें ?”

“एक तरह से यह समझ लीजिए कि धरती पर उनका समय पूरा हो गया था और परम परमेश्वर ने उन्हें बुला लिया।” सुज़ुकी ने संजीदगी के साथ जवाब दिया।

“क्या उम्र थी उनकी ?”

“85 साल!”

“ओके!” सुरेश चुप हुआ तो ज़ाहिद ने पूछा-

“आप भारत में कब से हैं ?”

“करीब दस साल हो गये।”

“सीनो में आप क्या करते थे ?”

“वहाँ भी हम धर्मगुरु थे और हमारा आश्रम था। हम अपने धर्म का प्रचार करते थे। लेकिन सीनो सरकार को हमारे विचार पसंद नहीं आते थे। हमारी उनके साथ तल्खी इस स्तर तक पहुँच गई थी कि वे हमें मृत्युदंड देना चाहते थे इसलिये हमें भारत में शरण लेनी पड़ी। भारत एक महान देश है। हर तरह के धर्म का सम्मान करता है लेकिन हमारे देश सीनो में ऐसा नहीं है।”

“क्या आपको बाद में पता चला था कि उस प्लेन का हाईजैक हो गया या फिर लापता हो गया और आज तक उस विमान के बारे में कुछ पता नहीं चला ?” सुरेश ने पूछा।

“हां! हमें यह समाचार मिला था। उसके बाद हमने आश्रम में विशेष पूजा आयोजित की थी–विमान के वापस मिलने और पैसेंजर्स की सकुशल वापसी के लिये।”

“काश कि आप की पूजा भगवान ने सुनी होती।” सुरेश ने गहरी सांस छोड़ते हुए कहा।

“परमेश्वर की मर्जी के आगे तो किसी की नहीं चलती। आप लोग नेक काम कर रहे हैं। शायद कुछ बड़ी वजह होगी कि आपको यह काम मिला और अब उस विमान के खोने का रहस्य खुलेगा तो जरूर उससे मानवता का भला होगा।”

“हमारी कोशिश तो यही है।” ज़ाहिद बोला, “वैसे आपके आश्रम में और कौन पुजारी हैं ? हम कुछ और लोगों से बात करना चाहते हैं। आपके साथ जो चार शिष्य उस विमान में बैठने वाले थे उनसे भी बात करना चाहते हैं। आशा करते हैं वह चारों अभी भी आश्रम में ही होंगे।”

“हां वह चारों यहीं पर हैं। आपको उन चारों से या आश्रम में किसी से भी बात करने के लिये पूरी छूट है। आप बिल्कुल न हिचकें। चाहे तो आश्रम में ही कुछ दिन बिता सकते हैं। आपको यहाँ रहकर अच्छा लगेगा। हो सकता है परम परमेश्वर आपका मार्गदर्शन करें। मुझे आपके साथ बैठकर पूजा करने में भी खुशी होगी।”

“आपके विचार काफी महान है।” ज़ाहिद बोला, “पहले हम उन चार से मिल लेते हैं।”

सुज़ुकी ने हामी भरी और फिर एक घंटी बजाई कुछ ही देर में एक शिष्य अंदर आ गया। सुज़ुकी ने उसे अपनी भाषा में निर्देश दिया फिर कहा, “ये आपको उन चारों से मिलवाने ले जाएगा। उसके अलावा भी अगर आप किसी से बात करना चाहें तो यह आपकी मदद करेगा। कोई भी परेशानी हो तो आप मुझे आकर बता सकते हैं।”

“आपका बहुत-बहुत शुक्रिया!” ज़ाहिद ने कहा फिर वे तीनों उठ खड़े हुए और कृतज्ञता के साथ सुज़ुकी का सिर झुकाकर अभिवादन कर के उस शिष्य के साथ उस कमरे से बाहर निकल आए।

कुछ ही देर में आश्रम के आंगन में वे उन चार शिष्यों के साथ बैठे थे। आश्रम के बाकी लोग उन्हें ध्यान से देख रहे थे। पर उस लंबे शिष्य के इशारे पर वे लोग वहाँ से चले गये।

उन लोगों ने उन चारों शिष्यों से कुछ सवाल पूछे पर उन्हें ऐसी कोई नई बात पता न चली जो सुज़ुकी ने पहले ही न बता दी हो।

फिर ज़ाहिद और सुरेश ने किसी पुजारी से मिलने की इच्छा जाहिर की। उन्हें एक पुजारी से मिलवाया गया । उसका नाम योहामा था। वह एक कम कद का वृद्ध था। उसकी लंबी सी नुकीली सफ़ेद दाढ़ी थी और पतली-पतली मूंछें थीं।

“क्या आप मुख्य पुजारी को जानते थे जिनकी मृत्यु कुछ समय पहले हुई ?” सुरेश ने पूछा ।

“हां! बिल्कुल जानता था उनका नाम लिआंग था। वे एक महान इंसान थे। मैंने उनसे काफी कुछ सीखा था।”

“तो आपको याद होगा जिस दिन गुरु सुज़ुकी और उनके चार शिष्य फ्लाइट से मुंबई जाने वाले थे, क्या उस दिन अचानक ही लिआंग को कुछ हुआ था ?”

“उस दौरान उनकी तबीयत काफी खराब चल रही थी। हम सभी जानते थे वे किसी भी पल परम परमेश्वर की ओर कूच कर जाएंगे। गुरु सुज़ुकी को शायद अंदेशा था कि कुछ अनिष्ट होने वाला है इसलिये वह वापस आ गए।”

“यानि वापस आने से पहले भी लिआंग की तबीयत खराब थी ?”

“हां उनकी तबीयत काफी समय से खराब चल रही थी।”

“क्या कोई डॉक्टर उन्हें देख रहा था ?”

“हमारे वैध ही देख रहे थे। अंग्रेजी दवाएं और इलाज हमारे यहाँ कोई लेता नहीं।”

“तो क्या उस दिन अचानक कुछ हुआ था ? दिल का दौरा या बेहोशी या कुछ और... ?”

“वे लगातार बिस्तर पर ही थे। बहुत ही कमजोर हो गए थे। उठ भी नहीं पा रहे थे।”

“आप शायद समझ नहीं रहे।” सुरेश हाथों का प्रयोग करते हुए अपनी बात समझाने का प्रयास कर रहा था क्योंकि उसे लग रहा था हिंदी से सीनो भाषा में सही मैसेज शायद पहुँच नहीं पा रहा था। “मैं यह जानना चाहता हूँ कि उस दिन अचानक ही उनकी तबीयत को क्या हुआ कि सुज़ुकी अपना सारा प्लान कैंसिल करके दौड़े-दौड़े वापस आ गये ?”

विशाल ने सवाल को उपयुक्त तरह से सीनो में प्रस्तुत करने की पुरजोर कोशिश की।

योहामा ने न में सिर हिलाया। विशाल बोला, “यह कह रहे हैं इनको नहीं पता।”

“वह तो मुझे भी दिख रहा है।” सुरेश खीजते हुए बोला, “पर इसका मतलब क्या हम ये समझें कि उनकी सेहत पर अचानक से कोई प्रभाव नहीं पड़ा था। उनकी तबीयत पहले भी खराब थी और बाद में भी खराब थी। यहाँ कोई ऐसा डॉक्टर भी था नहीं जो ठीक से बता सके कि उनकी डाइग्नोसिस या सिम्पटम्स क्या थे।”

“मुझे सीनो की प्राचीन चिकित्सा पद्धति के बारे में थोड़ी बहुत जानकारी है। यकीन मानिये वह इतनी पिछड़ी भी नहीं जितनी प्रतीत हो रही है।” विशाल बोला।

“इनके वैध को बुला लेते हैं।” ज़ाहिद ने सुझाव दिया– “कनफर्म हो जाएगा।”

फिर एक शिष्य को वैध को बुलाने के लिये भेज दिया गया। कुछ देर में वैध वहाँ पहुँच गया। अब योहामा और वैध दोनों सामने थे।

सुरेश ने पूछा, “आप गुरु लिआंग को देख रहे थे। ऐसा उनको क्या हुआ था कि गुरु सुज़ुकी को अपनी ट्रिप कैंसिल करके वापस आना पड़ा ?”

“उनकी तबीयत बेहद खराब हो रही थी। स्वस्थ्य निरंतर गिर रहा था...”

“पर यह तो गुरु सुज़ुकी को जाने से पहले भी पता होगा न।” सुरेश कुछ तेज आवाज में बोला।

सुरेश की तेज आवाज़ ने आश्रम के बाकी लोगों को अपनी तरफ आकर्षित किया। एक शिष्य गुस्से से उसे देखने लगा। विशाल ने सुरेश को शांत रहने का इशारा किया।

सुरेश होठों पर जबरन मुस्कान लाते हुए बोला, “मैं बस यह जानना चाहता हूँ कि किन परिस्थितियों ने गुरु सुज़ुकी को आनन-फानन वापस आने के लिये बाधित कर दिया। जहां तक मेरी समझ में आ रहा है गुरु लिआंग को अचानक ही कुछ नहीं हुआ था। काफी समय से उनकी तबीयत खराब थी और निरंतर खराब हो रही थी मैं ठीक समझ रहा हूँ न ?”

वैद्य ने स्वीकृति में सिर हिलाया और कहा–

“आप शायद समझ नहीं पा रहे हैं। हम लोग कभी-कभी अनिष्ट को भांप लेते हैं। आप इसे टेलीपैथी समझ सकते हैं। गुरु सुज़ुकी को जरूर अहसास हुआ होगा कि कुछ गड़बड़ होने वाली है इसलिये अपनी ट्रिप कैंसिल कर के वे वापस आ गए। ऐसा अक्सर होता है कि हमारे किसी प्रियजन के साथ कुछ बुरा घट जाता है और आपको बिना किसी के बताये ही इसका आभास हो जाता है।”

“मैं मानता हूँ ऐसा होता है।” सुरेश बोला, “पर उस वक्त से पहले भी वे बीमार ही थे और उस घटना के एक महीने बाद गुरु लिआंग की मौत हुई। यानि इमरजेंसी जैसा कुछ नहीं था।”

“वे मरणासन्न थे।” वैध बोला, “तबीयत ऊपर-नीचे होती ही रहती है। ऐसे में कब क्या होगा कुछ नहीं कह सकते। इसी धर्म संकट की वजह से गुरु सुज़ुकी वापस आ गए थे।”

“मैं अब समझ गया।” सुरेश बोला, “आप सभी का शुक्रिया।”

उसके बाद वे लोग सुज़ुकी के कमरे में वापस पहुँचे।

ज़ाहिद बोला, “हम लोग अभी कुछ दिन धर्मशाला में ही हैं। अगर जरूरत पड़ी तो आपसे दोबारा मिलने आएंगे। आशा करते हैं आपको हमारी इस मुलाकात से ज्यादा कष्ट नहीं हुआ होगा।”

“मेरे दोस्त...” सुज़ुकी खड़े होकर बोला, “आप जैसे महान लोगों के यहाँ आने से हमें कभी कष्ट नहीं हो सकता। आप लोग नेक और देशभक्त हैं– यह आपके हाव-भाव से ही मुझे पता चल रहा है। आप जब चाहे यहाँ आ सकते हैं। मैं तो अभी भी बोलता हूँ आप आश्रम में ही कुछ दिन बिताइए–आपको अच्छा लगेगा।”

“आपके इस आमंत्रण के लिये शुक्रिया। पर कुछ वजह है जिसके कारण हमें धर्मशाला में ही रहना पड़ेगा। धन्यवाद!” ज़ाहिद ने कृतज्ञ भाव से कहा।

“बहुत-बहुत धन्यवाद!” सुरेश बोला।

उनका अभिवादन करके वे वहाँ से निकले।

☐☐☐
 
ज़ाहिद और सुरेश धर्मशाला में स्थित सरकारी गेस्ट हाउस में रुके थे।

अभी वे लोग खाना खाने बैठे ही थे कि सुरेश को एक फोन आया और फोन पर बात करने के बाद वह ज़ाहिद से मुखातिब हुआ।

“क्या हुआ ?” ज़ाहिद ने पूछा।

“एक ब्रेकथ्रू मिला है।”

“क्या ?” ज़ाहिद ने उत्साहित होते हुए पूछा।

“कंचन याद है न ?”

“वह पायलट विक्रम की गर्लफ्रेंड ?”

“हां! वही! उसे किसी ने विदेश से कॉन्टेक्ट किया है।”

“किसने ?”

“लगता तो उसका बॉयफ्रेंड विक्रम ही है। कंचन का फोन विजिल पर रखने का फायदा हुआ। आज ही उसे मोंटेनीग्रो से एक फोन आया।”

“ओह! तो विक्रम मोंटेनीग्रो में छिपा बैठा है ?”

“लगता तो ऐसा ही है।” सुरेश बोला, “पर अब यह पता चल गया है कि वह जिंदा है तो अब बस उसे पकड़ने की देर है।”

“पर दूसरे देश से किसी भगोड़े को वापस बुलाने के लिये तो लंबी प्रक्रिया हो जाती है।”

“वो बात भी ठीक है।” सुरेश बोला, “अगर ऑफिशियल रास्ते से जायेंगे तो बहुत समय लगेगा। उनका प्लान अब यह है कि उसने फोन करके कंचन को मोंटेनीग्रो आने को कहा है। वह वहाँ पर टूरिस्ट विजा पर जाएगी और यह महाशय वहाँ उससे शादी करके उसे वहाँ का सिटीजन बना लेंगे। ऐसा पूरा प्लान बनाया हुआ है। यह कंचन भी बेहद चालाक निकली। मेरे ख्याल से वह तब से उसके टच में होगा और अब कुछ सालों के अंतराल के बाद उसे लग रहा होगा कि अब मामला ठंडा हो गया–अब पर्सनल लाइफ पर ध्यान दिया जाये।”

“यानि यह तो साफ है कि विमान गायब होने में पायलट की मिलीभगत थी।” ज़ाहिद अपनी ठोड़ी सहलाते हुए बोला।

“अगर ये विक्रम ही है तो हाँ। लेकिन अजय का क्या रोल था, यह जानना अभी भी बाकी है।”

“वह भी मिला ही होगा। उसमें क्या शक है ?” ज़ाहिद पूरे आत्मविश्वास के साथ बोला।

“नहीं! जरूरी नहीं! प्लेन हाईजैक करने के लिये एक पायलट का मिला होना भी काफी है। विक्रम को मिला लिया होगा बाद में भले ही अजय को बेहोश या मार के एक तरफ डाल दिया हो और विक्रम से प्लेन गायब करवा लिया होगा।”

“जो भी हो लेकिन तुम समझ रहे हो न...” ज़ाहिद की आँखों में अनोखी चमक थी। “इसका मतलब प्लेन कहीं न कहीं सकुशल लैंड हुआ है। तभी उसमे बैठा पायलट विक्रम अभी तक जिंदा है। इसका मतलब... इसका मतलब...”

“मेरे भाई! मुझे पूरा यकीन है।” सुरेश मुस्कराकर बोला।

ज़ाहिद के चेहरे पर आई प्रसन्नचित मुस्कान हर रोज़ नहीं दिखाई देती थी। वह बोला–

“अब हमें आगे क्या करना है ? मेरे ख्याल से विक्रम को जल्द से जल्द पकड़ना होगा। उससे काफी कुछ पता चल सकता है।”

“तुम ठीक कह रहे हो। पर यह काम बहुत ध्यान से करना होगा। ऑफिशियल तरीके से बहुत लंबा समय लगेगा क्योंकि अब तक तो वह वहाँ का सिटीजन बन गया होगा। हाईजैकिंग के लिये उसे जरूर बड़ी रकम मिली होगी जिसके सहारे उसने एक नये देश में नये नाम से एक नयी जिंदगी शुरू की होगी। मेरे ख्याल से इसके लिये हम में से किसी को मोंटेनीग्रो जाना चाहिये।”

“तो फिर मैं जाता हूँ।” ज़ाहिद तत्परता के साथ बोला, “मुझे लगता है यह काम मैं बखूबी कर पाऊंगा।”

“देखो भाई– मोंटेनीग्रो एक क्रिश्चन कंट्री है और मैं भी क्रिश्चन हूँ। मुझे वहाँ ज्यादा दिक्कत नहीं आने वाली। मैं अपने असली पासपोर्ट पर भी आराम से जा सकता हूँ। पर तुम्हारे लिये इस मिशन में काफी रिस्ट्रिक्शन हो सकती हैं। मैंने कुछ गलत कहा हो तो माफ करना।”

“नहीं यार, तुम प्रैक्टिकल बात कर रहे हो उसमें कुछ गलत नहीं है, लेकिन मैं जाना चाहता हूँ।”

“भारत में भी मोर्चा संभालना जरूरी है और फिलहाल सुज़ुकी पर भी नज़र रखने के लिये कोई चाहिए। अब ये काम हम दोनों में से किसी एक को करना ही है तो अच्छा होगा मैं आसानी से मोंटेनीग्रो जाकर काम कर सकता हूँ तो मैं चला जाता हूँ यहाँ का काम तुम संभाल लो।”

कुछ देर इसी तरह विचार-विमर्श करके यही सहमति बनी कि सुरेश मोंटेनीग्रो जाएगा और ज़ाहिद फिलहाल भारत में ही रुकेगा। चीफ़ अभय से भी बात हो गई और वह इसके लिये सहमत था।

☐☐☐
 
“तुम यहाँ क्या कर रहे हो ?”

राज उसकी दिलकश आवाज तुरंत पहचान गया। उसने धीरे-धीरे आंखें खोलीं तो उसे अपने सामने पाया।

“रिंकी!”

“हाँ! मैं ही हूँ। इतनी जल्दी कैसे भूल पाओगे।”

“तुम यहाँ क्या कर रही हो ?” राज ने चारों तरफ देखा। वह एक हॉस्पिटल में था। बगल में नर्स और एक डॉक्टर भी थे। दूसरी तरफ भगवे कपड़ों में एक सीनो गुरु खड़ा था।

“यह सवाल मैंने तुमसे किया है। पहले तुम जवाब दो तुम यहाँ क्या करने आये हो ?”

“कुछ सवालों के जवाब ढूंढता हुआ यहाँ पहुँचा था।”

“अभी तो तुम्हें कई और सवालों के जवाब खोजने हैं, राज। अभी तुम्हें बहुत से इम्पोर्टेंट काम करने हैं। किसी पर भी आसानी से विश्वास मत करना। ये साजिश बहुत बड़ी है, इसमें ऐसे लोग भी शामिल हो सकते हैं जिनकी तुम कल्पना भी नहीं कर सकते।”

राज ने स्वीकृति में सिर हिलाया। वह उसे निहारने लगा। उसने रिंकी के चेहरे की तरफ हाथ बढ़ाया। उसके गाल को छुआ। रिंकी ने उसका हाथ चूम लिया।

“तुम कैसी हो ? मैं तुम्हें बहुत मिस करता हूँ। तुम्हारे बिना जीना बहुत मुश्किल है।”

रिंकी मुस्कुराई। मुस्कुराते हुए वह एकदम छोटी बच्ची लगने लगी। राज उसे देख कर भाव-विभोर हो गया।

“तुम भी मुझे बहुत याद आते हो पर मैं कोशिश करती हूँ तुम्हें कम याद करूँ। याद करती रहूंगी तो फिर तुम्हारा जीना मुश्किल हो जायेगा इसलिये अब अकेले रहने की आदत डाल ली है। देखो राज–एक दिन तो हम दोनों का मिलना तय है पर अभी नहीं। तुम्हें अभी देश के लिये बहुत कुछ करना है।”

“लेकिन तुम्हारे बिछड़ने का गम वक्त के साथ कम ही नहीं होता बल्कि बढ़ता ही जा रहा है। कितना भी मन को मनाता हूँ मानता ही नहीं।”

“मुझे दिल से प्यार जो करते हो तुम। हम हर जन्म के साथी हैं इसलिये मेरे बिछड़ने का गम मत करो। हमें आगे कई-कई जन्मों में साथ रहना है। एक दूसरे के प्रति जो प्रेम है उसकी वजह से हमें अपना कर्म खराब नहीं करना है। तुम्हारा जो कर्म है उसे पूरा करो।”

“बहुत प्रवचन देने लगी हो।”

“हां! आजकल यहाँ सत्संग में ड्यूटी लगी हुई है।”

राज हंस दिया।

“अब तुम अपनी ड्यूटी पर जाओ। बहुत मजाक हो गया।”

अचानक राज जोर-जोर से हांफने लगा।

“क्या हो रहा है... यह क्या हो रहा है रिंकी ?”

“कुछ नहीं! सब ठीक हो जाएगा।”

उसे रिंकी धीरे-धीरे किसी प्रतिबिम्ब में बदलकर हवा में तेजी-से उड़ रहे चक्रवात में सम्मलित होती हुई नज़र आई।

और फिर अचानक राज उठ कर बैठ गया।

वह बुरी तरह से हांफ रहा था। उसने कंधे पर किसी का हाथ महसूस किया।

“तुम ठीक तो हो ?”

वह आरती थी। वहाँ एक डॉक्टर और नर्स भी मौजूद थे। वह लोग एक हॉस्पिटल के कमरे में थे।

“क्या हुआ था ? मैं कहां पर हूँ ?” राज बेचैन स्वर में बोला।

“तुम अब एकदम ठीक हो और अभी हॉस्पिटल में हो। गोली पीठ पर लगी थी।”

डॉक्टर बोला, “जख्म गहरा है पर आपके वाइटल ऑर्गन्स बच गये। गोली थोड़ा भी इधर-उधर होती तो भारी गड़बड़ हो सकती थी। हम ने पुलिस को इत्तला कर दी है। अभी आप आराम करो। वे लोग बाद में आप का बयान ले लेंगे।”

“मैं पुलिस को बयान दे सकता हूँ। उनका पकड़ा जाना ज़रुरी है।” राज व्यग्र स्वर में बोला।

“तुम फिक्र मत करो। मैंने पुलिस को पहले ही सब कुछ बता दिया है।” आरती बोली।

“अब आप आराम कीजिए।” कहकर डॉक्टर चला गया।

राज ने पूछा, “तुमने पुलिस को मेरे बारे में क्या बताया ?”

“मैंने यहीं कहा कि तुम हमारे आश्रम में रहते हो–ओसाका गुरु के एक शिष्य।”

“अच्छा! क्या कोई पकड़ा गया ?” राज ने पूछा।

“नहीं! उस वक्त वे लोग मेरे पीछे आ रहे थे। तुम्हारे जख्मी होने के बाद मैंने तुम्हें वहीं पर छोड़ा और दौड़ कर शहर की तरफ पहुंची। कुछ ही दूरी पर मुझे गश्ती पुलिस मिल गई जिनकी सहायता से मैंने तुम्हें हॉस्पिटल पहुंचाया।”

“थैंक यू!”

“तुम थैंक्स मत बोलो। तुमने मेरी जान बचाई और फिर मेरी वजह से ही तुम इस मुसीबत में पड़ गये।”

“पर आखिर वजह क्या है जो ये तुम्हारे पीछे पड़े हैं, क्या ये आहूजा के दुश्मन...”

“अभी तुम आराम करो। ज्यादा मत बोलो।”

फिर नर्स ने राज को एक इंजेक्शन दिया।

“अब मैं चलती हूँ।” आरती ने हल्के से राज का हाथ दबाया और वहाँ से रुख्सत हुई।

राज की आँखों के सामने आरती का आईसीयू से बाहर निकलता हुआ अक्स धुंधलाता चला गया।

☐☐☐
 
दूसरे दिन सुरेश मोंटेनेग्रो का वीज़ा निकलवाने के लिये दिल्ली चला गया।

ज़ाहिद सुबह से ही सुज़ुकी के फोन नंबर की सारी हिस्ट्री खोलकर जांच पड़ताल में लगा हुआ था। आखिरकार दोपहर तक उसे कुछ आगे बढ़ने लायक जानकारी हासिल हुई।

वह एक बार फिर विशाल के साथ सुज़ुकी के आश्रम पहुँचा।

इस बार सुज़ुकी से मिलने के लिये ज्यादा कठिनाई नहीं हुई। उस के कमरे में पहुँचकर सब से पहले ज़ाहिद ने उसे दुबारा कष्ट देने के लिये माफी मांगी।

“इसमें कष्ट की कोई बात नहीं है।” सुज़ुकी ने कहा।

“मैं एक बार फिर आपसे उस वक़्त की बात करना चाहता हूँ जब वह विमान गायब हुआ जिसमें आप और आपके शिष्य बैठने वाले थे।”

सुज़ुकी ने मुस्कराते हुए सिर को हल्की सी जुम्बिश दी।

“उस वक़्त आपको कुछ फोन कॉल्स आए थे। आपके आश्रम के एक नंबर से कई बार और एक और दिल्ली से किसी मोबाइल फोन से।”

“हाँ काफी फोन आये थे उस वक़्त। हम दिल्ली से आये थे। वहाँ हमारे शिष्य हैं। फिर मुम्बई से भी जहां हम जा रहे थे।”

“दिल्ली में आपके किसी शिष्य का नाम निक था ?”

सुज़ुकी सोच में पड़ गया।

ज़ाहिद ने फोन निकाला और उसमें निक का फोटो निकालकर सुज़ुकी को दिखाया।

सुज़ुकी ने इनकार में सिर हिलाया।

“फ्लाइट 301 की बोर्डिंग से मात्र दस मिनट पहले आपको किसी का फोन आया था और आपकी बात सिर्फ दस सेकंड हुई थी।”

“शायद हुई थी पर मुझे याद नहीं कि क्या बात हुई थी।” सुज़ुकी ने विशाल की मदद से कहा।

“आपको याद करना होगा क्योंकि यह आदमी हमारे लिये वांटेड है इसलिये आप पता करके बताइए इसका आपके साथ क्या कनेक्शन रहा है।” ज़ाहिद जोर देते हुए बोला और फिर उसने अपना पैर दूसरे पैर पर इत्मीनान से चढ़ा लिया जैसे कि जवाब लेने के लिये उसके पास पूरा समय था।

“मुझे उसका नंबर और फोटो भेज दो। मैं पता करके बताता हूँ।” सुज़ुकी ने कुछ सोचने के बाद कहा।

“ठीक है! तो मैं इस मामले के बारे में पूछताछ करने के लिये कल दोबारा आता हूँ। अब इजाजत दीजिए। आप को कष्ट देने के लिये एक बार फिर से क्षमा।” ज़ाहिद खड़े होते हुए बोला। सुज़ुकी ने मुस्कुराते हुए अपने सिर को हल्की-सी जुंबिश दी।

☐☐☐

राज को होश आ चुका था अब वह पहले से बेहतर महसूस कर रहा था। उसने पुलिस को बयान दिया कि वह अपनी आश्रम की दोस्त आरती के साथ त्रिउंड घूमने गया था और वहाँ कुछ लड़कों ने उसके साथ छेड़छाड़ करने की कोशिश की। वे लोग वहाँ से सकुशल निकल गए पर वापसी के दौरान उन पर फायरिंग हुई। राज ने अपनी एक नकली आई डी की बदौलत खुद का नाम अमन शर्मा बताया जो कुछ समय से ओसाका के आश्रम में रह रहा था। पुलिस ने बयान लिया और कहा कि कुछ दिन में वे कुछ सस्पेक्ट ढूंढकर शिनाख्त के लिये उन्हें थाने बुलाएंगे। राज और आरती ने सहमति जताई।

हॉस्पिटल से डिस्चार्ज के बाद राज किसी होटल में रुकना चाहता था पर आरती के आग्रह पर वह ओसाका के आश्रम में आ गया।

ओसाका के आश्रम के पीछे बर्फीले पर्वतों का खूबसूरत नजारा था जिसका दीदार अंतर्मन में एक सुखद अहसास दिला रहा था।

आश्रम में प्रवेश करते हुए राज को बेहद अच्छा लगा। वहाँ का माहौल ही कुछ ऐसा था।

चारों तरफ लाल कपड़े धारण किये शिष्य घूम रहे थे जिनके सिर पर मात्र छोटी चुटिया भर के बाल थे। सभी उसका झुककर अभिवादन कर रहे थे। शायद नये मेहमान का सभी इसी तरह स्वागत करते थे।

वे लोग सीधे गुरु ओसाका के कमरे के बाहर रुके।

कुछ देर में द्वारपाल ने अंदर जाने की अनुमति दी।

अंदर उन्हें ओसाका के दर्शन हुए।

सत्तर वर्षीय, सपाट व कांतिमय चेहरा, छोटी आंखें, सिर पर एक भी बाल नहीं। माथा बेहद चौड़ा था, इतना कि चेहरे का आँखों से नीचे का हिस्सा माथे से छोटा लगता था।

राज को देखते ही वो उठा और फिर झुककर अभिवादन करने के बाद उसने राज को गले लगाया। फिर साफ हिंदी में बोला-

“आपका आश्रम में स्वागत है। आपने एक मोतिरी की रक्षा की–आप हमारे लिये ईश्वर के अवतार समान है।”

“आश्रम की शिष्या मोतिरी कहलाती हैं और शिष्य मोतिर।” आरती ने राज को बताया।

राज मुस्कराया। उसने हाथ जोड़े।

“मैंने ऐसा कोई महान काम नहीं किया है, गुरु जी। आप मुझे यहाँ रहने के लिये जगह दे रहे हैं, ये मेरे ऊपर अहसान है।”

उसने राज के हाथ थाम लिये।

“ऐसा मत कहिये। ईश्वर के अवतार का यहाँ रुकना हम सभी पर अहसान है। आप यहाँ जितना अधिक समय व्यतीत करेंगे उतना ही अधिक हम पुण्य कमाएंगे। इसे अपना ही घर समझिए...”

“ज़रूर।”

उसके बाद आरती राज को एक छोटे किन्तु आरामदायक कमरे में ले गई।

“तुम यहाँ आराम करो। मैं कुछ देर में वैध जी को भेजती हूँ। उनकी दवा और यहाँ की आबो हवा से देखना तुम बहुत जल्दी ठीक हो जाओगे।”

राज मुस्कराया। “चलो तुम्हारी मदद करने का ये फायदा तो मिला।”

आरती भी मुस्करा दी। फिर वह चली गई।

राज ने अपना बैग एक कोने में रख दिया। कमरे में ज़मीन ओर दरी बिछी हुई थी और एक कोने में गद्दा लगा था। अलमारियों में अधिकतर धार्मिक किताबें थी। सामने एक और दरवाजा था, जिसे खोलकर राज निकला तो राहदारी आ गई जिसके आगे रेलिंग थी। रेलिंग के सामने पहाड़ी नज़ारा था। राज ने झांककर देखा रेलिंग के नीचे कुछ दूरी पर पहाड़ खत्म हो रहा था और उसके आगे गहरी खाई थी।

राज रेलिंग के सहारे खड़ा होकर काफी देर उन नज़ारों में सम्मोहन-सी अवस्था में खोया रहा।

☐☐☐
 
वर्तमान समय

अलीगढ़

अभय कुमार इस वक़्त सीक्रेट सर्विस के अलीगढ़ ऑफिस में मौजूद अपने केबिन में बैठा लैपटॉप पर किसी रिपोर्ट को पढ़ने में मशरूफ था।

तभी सीबीआई दिल्ली से राज निकेतन का फोन आया।

“हेलो राज!” उसने जवाब दिया।

“अभय, हाउ आर यू डूइंग ?”

“गुड! हाउ आर यू ?”

“नॉट टू बैड!”

“और बताओ कैसे याद किया ?”

“भाई, कमिंग स्ट्रेट टू द प्वाइंट - अच्छी न्यूज़ नहीं है।”

अभय शांति से सुन रहा था। उसके चेहरे पर ऐसे भाव थे जैसे उसे पहले से ही किसी बुरी खबर के मिलने का अंदेशा था।

“लियोन ने अगले हफ्ते मंडे मॉर्निंग तक रमन आहूजा के खिलाफ पुख्ता सबूतों के साथ इन्वेस्टिगेशन रिपोर्ट मांगी है।”

अभय ने कैलेंडर की तरफ देखा।

आज मंगलवार है। यानि आज का दिन मिला कर सिर्फ छह दिन।

“सेटिस्फेक्ट्री रिपोर्ट न मिलने पर वे एक टीम भारत भेजेंगे, इन्वेस्टिगेशन और पूछताछ के लिये और उन्हें राज हिरासत में चाहिये होगा।”

अभय का चेहरा एकदम सपाट था।

“यू विद मी, अभय ?

“यस! मुझे उम्मीद है मंडे तक रिपोर्ट बन जायेगी।”

“अब सबकुछ तुम्हारे ऊपर निर्भर है। हमसे जो भी मदद चाहिये हो बेझिझक बोलना।”

“श्योर, थैंक्स राज!” कहकर अभय ने फोन रखा। कुछ क्षण सोचने के बाद उसने ज़ाहिद का नम्बर मिलाया।

☐☐☐

वर्तमान समय

हिमाचल प्रदेश

शाम के चार बजने में कुछ ही मिनट शेष थे।

सुज़ुकी के आश्रम के मुख्य द्वार की रक्षा करते हुए भगवे वस्त्र पहने दो शिष्य खड़े थे जो कि आते-जाते हर इंसान पर नज़र रखे हुए थे।

वह पहाड़ी लड़का जिसने आरती और राज पर हमला किया था आश्रम के द्वार की दिशा में तेजी-से चलते हुए आ रहा था।

जैसे ही वह द्वार पर पहुँचा, दोनों शिष्यों ने उसका रास्ता रोक लिया। वह रुका नहीं उसने दोनों को बाजू से पकड़ा और घुमाकर झटका दिया। दोनों एक तरफ जा गिरे।

वह अन्दर प्रविष्ट हो गया।

दोनों संभलकर उठे। उनके चेहरे पर आश्चर्य था। फिर आवेश में चीखते हुए दोनों उसके पीछे लपके।

इससे पहले कि वह उसे छू भी पाते, वह हवा में फिरकनी की तरह घूमा और उसकी किक दोनों के सीने पर लगी। दोनों एक बार फिर धरती चूम गए। इस बार के प्रहार ने दोनों को करारी चोट दी थी, वह दुबारा उठने में असमर्थ थे।

आश्रम के अन्दर कई लोगों ने ये नज़ारा देख लिया था और चार शिष्य उसकी ओर दौड़े।

उसने अपने हाथ सांप के फन की तरह फैलाये और फिर एक चक्रवात की तरह घूमते हुए उसने सभी पर अपने हाथों और लातों की बौछार कर दी।

वह रुक नहीं रहा था, तेजी से आगे बढ़ता जा रहा था।

वह आश्रम के एक बड़े से कमरे के द्वार पर पहुँच गया। उसने दोनों हाथों से उसके विशाल दरवाजे धकेलकर खोल दिए।

अन्दर ज़मीन पर धर्मगुरु सुज़ुकी व दो और वरिष्ठ पुजारी मौजूद थे। एक रक्षक था जो लड़के को देखते ही क्रोधित होते हुए उसकी तरफ बढ़ा।

वह हवा में उछला तो उसे देख रक्षक भी हवा में उछला। दोनों ने किक घुमाई जो आपस में भिड़ीं और फिर दोनों ज़मीन पर आ खड़े हुए।

फिर वह चक्रवात की तरह घुमा। पर रक्षक उससे न सिर्फ बचा बल्कि ज़मीन पर झुककर उसने उसके पैरों पर ठोकर जड़ दी। वह गिर गया। रक्षक उस पर टूट पड़ा। उसने उसकी गर्दन अपनी भुजाओं में जकड़ लीं। पर वह सख्तजान था, उसने हाथों से रक्षक की जांघ पकड़ी और फिर उसे पलटकर गिरा दिया।

इससे पहले कि रक्षक उठता उसने उस पर लातों की बौछार चला दी।

“रुक जाओ!” अचानक सुज़ुकी चीखा।

वह एकदम से रुक गया। सुज़ुकी उसकी तरफ बढ़ा।

उसने नज़रें झुका लीं।

“क्या चाहते हो तुम ?”

वह कुछ बोला नहीं। हाथ जोड़ते हुए वह उसके सामने घुटनों के बल बैठ गया।

सुज़ुकी सोच भरी मुद्रा में उसे देखने लगा।

☐☐☐
 
शाम को राज के कमरे पर आरती वैध के साथ पहुंची। वैध ने राज को शर्ट उतारने को कहा और फिर उसके घाव पर किसी किस्म की जड़ी-बूटी का लेप लगा दिया। साथ ही उसने एक कटोरी में कुछ दवाएं घोलकर काढ़े जैसा अर्क तैयार किया। कुछ देर बाद-

“अब लेप सूख गया है। तुम अपनी शर्ट पहन लो।” वैद्य ने मुस्कुराते हुए कहा। वह छोटे कद का लंबी दाढ़ी और पतली मूंछों वाला खुशमिजाज व्यक्ति प्रतीत हो रहा था। वह बोला-

“काफी कसरती बदन है तुम्हारा। बंदूक की गोली भी अच्छा झेल गये। कोई और होता तो इस वक्त अपने पांव पर खड़ा नहीं होता।”

“शायद मैं भी खड़ा नहीं होता। वह तो मेरी खुशकिस्मती थी कि दीपिका उस वक्त मेरे साथ थी।” राज ने प्रशंसा भरी नजरों से आरती को देखा। आरती के गुलाबी होठों पर बरबस मुस्कान आ गई।

“दीपिका तो हमारे आश्रम की सर्वश्रेष्ठ मोतिरी है। इसकी जितनी प्रशंसा की जाए कम है। प्रभु की वंदना, समाज सेवा, अच्छे कर्म, अच्छी संस्कृति, क्या कहूं इसके बारे में। साक्षात देवी है, देवी!”

“अब आप कुछ ज्यादा ही प्रशंसा कर रहे हैं।” आरती झेंपते हुए बोली।

“अब तुम ही बताओ–क्या मैंने कुछ गलत कहा ?” वो आंखें फैलाकर राज से बोला।

“नहीं! आपने बिल्कुल सच कहा है।”

वैध हो-हो करके हँसने लगा।

“अच्छा! सुनो यंग मैन! यह काढ़ा बनाया है। इसे हर रोज मैं तुम्हें शाम को बनाकर दूंगा। इसके नियमित सेवन से एक-दो सप्ताह में तुम्हारे सभी घाव भर जायेंगे और कमजोरी भी जाती रहेगी।”

“कमजोरी तो वैसे अभी भी कोई खास नहीं लग रही।”

“वह तो तुम्हारी सेहत अच्छी है इसलिये पर अभी अगर तुम दौड़-भाग करोगे तब तुम्हें कमजोरी पता चलेगी...और सुनो– धूम्रपान मदिरापान भूलकर भी मत करना।”

“पर मैं...”

“छुपाने की कोई जरूरत नहीं है। तुम्हारे होठों और आँखों दोनों से ये बातें साफ पता चलती हैं।”

“ठीक है, गुरु जी! जैसी आपकी आज्ञा।” राज हाथ जोड़कर बोला।

“अब मैं चलता हूँ।”

“प्रणाम!”

“प्रणाम!”

वैध ने उठकर मुस्कराते हुए राज का कंधा थपथपाया फिर अपना झोला लेकर वहाँ से चला गया।

आरती बोली, “दवा पी लो। फिर थोड़ी देर में खाना खाने चलेंगे।”

“ठीक है!” कहकर राज ने दवा का कटोरा उठाया और एक सांस में पी गया। निहायत ही कड़वे स्वाद से उसने जीभ निकालते हुए मुंह बनाया। आरती खिलखिला उठी।

कुछ मिनटों बाद राज को लगा कि वाकई वैध ने सही कहा था। दवा के असर से अब उसे अपने शरीर में स्फूर्ति का अहसास होने लगा था।

“आओ चलें... थोड़ा खुली हवा में घूमेंगे। तुम्हें आश्रम भी दिखा देती हूँ।”

आरती कमरे से बाहर निकली। उसने इस वक्त लाल रंग के भगवे वस्त्र पहने हुए थे और सिर ढक रखा था। राज उसे ध्यान से देखते हुए बाहर निकला।

फिर वे लोग आश्रम के आंगन में पहुँच गए–जहां कई शिष्य इधर-उधर बैठे थे। हर कोई अपने रोजमर्रा के कार्यों में व्यस्त दिखाई दे रहा था। कोई मसाला कूट रहा था तो कोई सूखे हुए कपड़े उतार रहा था। राज को ऐसा लग रहा था जैसे वह किसी बहुत बड़ी जॉइंट फैमिली के घर आ गया हो।

“तुम्हें कभी भी बोरियत महसूस हो तो कोई भी काम बेझिझक पकड़ लेना।” आरती मुस्कुरा कर बोली।

“जरूर! मुझे खुशी होगी। खाली बैठना तो मुझे बिल्कुल पसंद नहीं।”

“आश्रम के ग्राउंड फ्लोर पर सभी मोतिर यानि मेल रहते हैं और आश्रम की लड़कियां और औरतें यानी कि मोतिरी फर्स्ट फ्लोर पर रहती हैं। पूजास्थल, गुरुओं का निवास, मीटिंग हॉल आदि सब ग्राउंड फ्लोर पर ही हैं।”

“कुल कितने लोग रहते होंगे यहाँ ?”

“करीब एक सौ बीस-तीस।”

“और यह सभी लोग सीनो देश से आए थे ?”

“नहीं! सीनो देश से गुरु ओसाका व तीन गुरु, जिनमें से एक की मृत्यु हो गई, यह वैध और तीन-चार लोग और आये थे। दस साल पहले जब सीनो की गवर्नमेंट ने इन सब को मृत्युदंड दिया था तब ये सभी भाग कर भारत आ गए थे और भारत ने उन्हें यहाँ आश्रय दिया था। उसके बाद धीरे-धीरे इन्होंने आश्रम की शुरुआत की और इनके धार्मिक अनुयाई जो कि भारत में भी मौजूद थे इनसे जुड़ते गये। कुछ अनुयायी जो कि पूरी तरह से ईश्वर को समर्पित हो गये और अब संसारी मोह-माया छोड़ कर सारा जीवन ईश्वर की आराधना में बिताना चाहते हैं वह आश्रम में ही रहने लगे हैं।”

“कमाल है! मैं तो ऐसा सोच भी नहीं सकता।”

आरती ने उसकी तरफ इस तरह देखा जैसे किसी नादान बच्चे को देख रही हो।

“हर कोई तुम्हारी तरह स्ट्राँग नहीं होता। उनके पास जीवन में बुरे वक्त को अकेले झेलने की काबिलियत नहीं होती।”

“तो क्या तुम कहना चाहती हो–कमजोरी हमें ईश्वर की आराधना करने के लिये मजबूर कर देती है ? सिर्फ यही एक कारण है जिसकी वजह से इतने सारे लोग यहाँ मौजूद हैं ? क्योंकि उन्होंने सामाजिक जीवन में कुछ स्ट्रगल किये और उनसे हार कर यहाँ आ गए ?”

“नहीं! इस तरह का निष्कर्ष निकालना तो सिरे से गलत होगा। पर किसी बिलीफ की तरफ मुखातिर होने के पीछे कोई न कोई वजह जरूर चाहिये होती है। वह जीवन में किसी के खोने का असीमित दुःख, कोई स्ट्रगल या कोई महत्त्वाकांक्षा भी हो सकती है जो कि अपना सबकुछ झोंक देने के बाद भी पूरी नहीं हो पा रही हो। कई बार ऐसा होता है न कि हम किसी चीज के लिये अपना सब कुछ दांव पर लगा देते हैं फिर भी वह हमें हासिल नहीं होती। तब हम किस्मत पर सारा कसूर डाल देते हैं। पर ऐसे में ही किसी अज्ञात शक्ति की मदद अगर हमें मिलती है तो न जाने कैसे उन सपनों को साकार करने के लिये फिर से हिम्मत मिल जाती है, जीवन के दुखों से उभरने की ताकत हासिल हो जाती है।”

“कितना वक्त हुआ तुम्हें इस आश्रम में रहते हुए ?”

“तुम तो जानते ही हो कि मैं इससे पहले दिल्ली में थी, नौकरी कर रही थी। तो यहाँ रहते हुए ज्यादा समय नहीं हुआ पर मैं गुरु ओसाका की बहुत सालों से अनुयाई हूँ और अक्सर उनसे गाइडेंस लेने आश्रम आती थी। सिर्फ मैं ही नहीं हिमाचल और देश के बाकी भागों में भी आपको बहुत से लोग मिलेंगे जो गुरु ओसाका को मानते हैं और सीनो धर्म के अनुयायी हैं।”

बातें करते करते डिनर का समय हो गया और देखते ही देखते आंगन में चटाइयाँ बिछ गई और खाने के पत्तल लग गये। वहाँ किसी गाँव की दावत जैसा माहौल हो गया। सब लोग बैच में बैठने लगे और दस-दस मिनट में खाना खाकर उठने लगे। मोतिर और मोतिरी मिलजुल के खाना खा रहे थे, बातें कर रहे थे, किसी पर कोई रोक-टोक नहीं थी, फिर भी सब के कार्यकलाप में एक तरह का अनुशासन दिखाई दे रहा था। आरती और राज भी खाने बैठ गए। खाना शुद्ध-सात्विक-सा था पर फिर भी बेहद लजीज था।

“काफी दिनों से घर से बाहर निकला हूँ।” राज बोला, “आज जाकर लग रहा है कि घर का खाना नसीब हुआ।”

आरती मुस्कुरा दी।

“आश्रम में ही रह जाओ। हमेशा ऐसा खाना मिलता रहेगा।”

“लगता है तुमने पूरा जीवन आश्रम में ही बिताने का निर्णय ले लिया है।”

“इसमें कोई शक नहीं।” आरती बोली, “मुझे पहले से ही पता था ऐसा कुछ आगे चलकर होगा, इतनी जल्दी होगा यह तो नहीं पता था पर शायद किस्मत में यही लिखा था इसीलिए मेरे जीवन में कुछ ऐसी घटनाएं घटी जिन्होंने मुझे आज यहाँ पहुँचा दिया और मुझे इस बात की बहुत खुशी है। तुम यकीन नहीं करोगे कि कुछ महीने पहले जिन बुरी परिस्थितियों ने मुझे डिस्टर्ब कर दिया था, जिनके कारण मैंने जीने की आस खो दी थी, आज उन्हें याद करके भी मुझे कोई परेशानी महसूस नहीं होती।”

राज चुपचाप खाना खाता रहा।

कैसे उन लोगों की जानकारी आरती से निकाली जाये जिन्होंने इसकी आईडेंटिटी खत्म करके यहाँ तक पहुँचने में मदद की।

खाने के बाद दोनों टहलते हुए आश्रम के प्रांगण में आ गए। बाहर खुशनुमा ठंडी हवाएं चल रही थी, चाँद आसमान में जगमगा रहा था जिसकी रोशनी में बर्फ से ढकी पहाड़ियां चमक रही थी।

“आरती!” राज बोला।

आरती ने पहाड़ों की तरफ देखते हुए सिर्फ ‘हूँ’ कहा।

“मैं तुमसे सब साफ-साफ बोलूंगा। दिल की बात कहूँगा। मैं अपनी सीक्रेट सर्विस की नौकरी से बेहद प्यार करता हूँ। मैं अपने देश से बेहद प्यार करता हूँ। मैं एक देशभक्त जासूस हूँ और अपने देश और इस नौकरी के लिये मैं कुछ भी कर सकता हूँ। इस वक्त मेरे ऊपर जो आरोप लगे हैं वह सिर्फ एक ही दशा में हट सकते हैं– मैं आहूजा के खिलाफ कुछ सबूत निकाल सकूं, आहूजा और चौधरी के बीच जो प्लान रचा गया था उसकी जानकारी हासिल कर सकूँ। इसके बाद ही मेरे माथे पर लगा कलंक हट सकेगा।”

“तुम क्यों मेरे जख्मों को बार-बार छेड़ते हो ?” आरती उदास स्वर में बोली।

“मैं ऐसा हरगिज़ भी नहीं चाहता आरती। पर तुम्हें कैसा लगता अगर तुम मेरी जगह होती ? अगर तुम जंग में लड़ी वह सैनिक होती जिसने दुश्मनों को खत्म किया पर घर वापसी पर तुम्हें हीरो बनाने की जगह दुश्मनों को मारने की वजह पूछी जाती ? उनके खिलाफ सबूत मांगे जाते, हीरो की जगह विलेन बना दिया जाता ? तुम्हारे ऊपर क्या गुजरती– तुम बताओ ?”

आरती राज की तरह पलटी। वह ध्यानपूर्वक राज को देखने लगी। मानो उसका चेहरा देख कर उसके मन को पढ़ने की कोशिश कर रही हो।

“मेरी हालत इस वक्त उसी सैनिक की तरह है। मैं इस तरह नहीं जी सकता। मैं अपने माथे पर कलंक लेकर वापस नहीं जा सकता।”

आरती के चेहरे पर करुणा भरे भाव आ गए।

“ राज मैं समझ सकती हूँ कि शायद धीरज गलत राह पर चला गया था, भटक गया था। यह बात भी सच है कि अगर मुझे पहले ही उसके यह इरादे पता होते तो मैं उससे नफरत करने लगती। पर मुझे उसके प्लान के बारे में कभी पता नहीं था। मुझे नहीं पता था उसकी किन लोगों के साथ साथ-गाँठ है। मुझे जब उसने कॉन्टेक्ट किया और सुरक्षित जगह पर जाने को बोला तब मेरी नज़र में वह एक इंटरपोल एजेंट ही था इसलिये मेरी समझ में मेरी मदद करने वाले भी कानून के रक्षक थे।”

“यही तुमने गलती कर दी।” राज बोला, “कानून के रक्षक आखिर तुम्हारी मदद इस तरह क्यों करते ? तुम्हारी मौत का स्वांग क्यों रचाते ? क्या तुमने ऐसा कभी देखा है किसी की जान का खतरा होता है तो उसे मृत घोषित कर दिया जाये ?”

आरती चुप रही, फिर सोचते हुए बोली, “मैं इतना नहीं सोच सकती। मुझे नहीं पता जासूस व सीक्रेट एजेंट्स किस तरह काम करते हैं। मैं उस पर भरोसा करती थी उसने मुझे जैसा करने को कहा मैं करती चली गई।”

“आरती! अभी वक्त है। तुम अहसानफरामोशी की बातें भूल जाओ। जिन लोगों ने तुम्हारी मौत का नाटक किया वह चौधरी के पार्टनर थे जो कि सिर्फ आहूजा की बदले की भावना का इस्तेमाल करके अपना उल्लू सीधा करना चाहते थे। मुझे उन लोगों तक पहुँचने दो ताकि मैं यह साबित कर सकूं कि देश को नुकसान पहुंचाने का प्लान किसी और का था रमन आहूजा का नहीं।”

“क्या तुम मुझे बातों में उलझा कर अपना उल्लू सीधा करना चाहते हो ?” आरती उसे तीखी नजरों से देखते हुए बोली।

“हां! मैं अपना उल्लू सीधा करना चाहता हूँ। पर जो तर्क मैं दे रहा हूँ वही सच है। अगर तुम इसका काट दे सको तो दो। अगर तुम मुझे यह समझा सको कि अपने ही देश पर न्यूक्लियर मिसाइल गिराना सही भी हो सकता है तो मैं मान लूंगा कि मैं गलत हूँ और मैं अभी इसी वक्त यहाँ से चला जाऊंगा।”

“तुम चाहते तो जोर-जबरदस्ती से भी मुझसे यह जानकारी निकलवा सकते हो आखिर तुम ऐसा क्यों नहीं कर रहे ?”

“तुम एक सीधी-साधी लड़की हो। शुरू में मुझे तुम पर शक जरूर था पर अब मैं समझ चुका हूँ कि तुम्हारे और आहूजा जैसे लोगों को इमोशनल करके कैसे लोग अपना चक्रव्यूह रचते हैं। मैंने यह आज नहीं बहुत से मिशन में देखा है। आतंकवाद में क्या होता है ? दंगों में क्या होता है ? लोगों को इमोशनली ब्लैकमेल करके, भड़काकर खून की नदियाँ बहा दी जाती हैं जिस के सहारे कुछ धूर्त लोग अपने मंसूबे पूरे करते हैं।”

आरती उसे देखती रही। वह गहरी सोच में थी। राज के चेहरे पर चाँद की रोशनी पड़ रही थी। उसकी आँखों में छिपे भाव वह साफ देख सकती थी।

आरती ने निर्णय लिया और कहा- “चलो, तुम्हारे कमरे में चलते हैं। यहाँ बात करना ठीक नहीं।”

☐☐☐
 
राज अपने कमरे में पहुँचा। आरती ने कहा था कि वह कुछ देर बाद वहाँ आयेगी।

राज बैठा-बैठा बोर होने लगा तो उसने कमरे में रखी एक किताब उठा ली और उसे पढ़ने लगा।

करीब चालीस मिनट बाद दरवाजे पर दस्तक हुई। राज ने दरवाजा खोला। आरती अंदर आ गई और उसने दरवाजा अंदर से बंद कर लिया और फिर तेजी से कमरे के दूसरी तरफ पहुँचकर राहदारी में खुलने वाला दरवाजा और खिड़की भी बंद कर लिये। फिर ज़मीन पर चटाई बिछाते हुए बोली, “आओ, यहाँ बैठो।”

राज चटाई पर ठीक उसके सामने बैठ गया।

आरती ने अपना फोन निकाला और फिर एक फोटो दिखाते हुए बोली, “यह निक है।”

राज उसे देखने लगा। वह मोटा-तगड़ा, कम ऊंचाई वाला पहाड़ी युवक था।

“अरे, यह तो वही है।” राज उसे पहचानते हुए बोला।

“हां! यह वही है जिसने त्रिउंड में मुझ पर हमला किया था और फिर तुम्हारी इसके साथ हाथापाई हुई थी।”

“तुम इसे पहले से पहचानती थीं ? इसका फोटो तुम्हारे पास कैसे आया ?”

“पेशेंस रखो। सब बताने ही जा रही हूँ। इसका नाम निक है और यह फिलहाल गुप्त रूप से एक दूसरे धर्मगुरु के आश्रम में शिफ्ट कर रहा है।”

“कौन धर्मगुरु ?”

“सुज़ुकी!”

“अब यह कौन है ?”

“यह भी ओसाका की तरह सीनो से भागा एक धर्मगुरु है।”

“अरे, कमाल है।” राज हाथ नचाकर बोला, “उस दौर में कितने धर्मगुरु भागे थे ?”

आरती हंस दी। “बहुत से भागे थे। शायद वह दौर ही बगावत का था जब सीनो में नई गवर्नमेंट बनी थी और फिर पुरानी गवर्नमेंट जो कि इन सभी धर्मगुरु को सपोर्ट करती थी वह पावर में न रही। रातों रात गुप्त रूप से नई गवर्नमेंट की कैबिनेट ने इन सभी को अरेस्ट करके मृत्युदंड देने का फैसला लिया था। खैर, राज़ राज़ न रहा और कुछ गुरुओं तक ये बात पहुँच गई और उसी रात यह सभी धर्मगुरु वहाँ से भाग निकले। कुछ पकड़े गये और कुछ जो लकी थे वह भारत पहुँच गए। यह तो हुई उनके बारे में संक्षिप्त जानकारी तुम्हें ज्यादा चाहिए हो तो गूगल कर लेना, सब मिल जाएगा।”

“ऐसा था तो गूगल से ढूंढकर लिंक ही दे देतीं।”

“दे तो देती पर अब आगे जो जानकारी देने जा रही हूँ वह गूगल पर नहीं मिलेगी।” आरती आंख दबाते हुए बोली। राज हंस दिया।

“तो सुज़ुकी उनमें से एक गुरु है और निक उनका शिष्य है। दरअसल यह दोनों सीनो के जासूस हैं।”

“क्या बात कर रही हो ?” राज चौंकते हुए बोला, “पर अगर सुज़ुकी सीनो से भाग कर आया था तो फिर वह उनके लिये जासूसी क्यों करेगा ?”

“क्योंकि वह आज से बहुत साल पहले आया था। उसके बाद से वहाँ की गवर्नमेंट में बहुत बदलाव हुए हैं। वह पूरी तरह से धर्मगुरुओं के सपोर्ट में तो नहीं है, पर वहाँ का वर्तमान प्राइम मिनिस्टर किसी वजह से सुज़ुकी को सपोर्ट करता है।”

“वो क्यों ?”

“अब मुझे ये नहीं पता कि कैसे और क्यों पर सुज़ुकी उसी के इशारों पर भारत में जासूसी कर रहा है और खलीली ने जो प्लान बनाया था वह सुज़ुकी के सहयोग से बनाया था।”

इस बार तो राज वाकई चौंककर उठ खड़ा हुआ।

“तुम क्या बोल रही हो? और...और तुम्हें यह सब जानकारी कहां से मिली?”

“तुम सोचो–कहां से मिली होगी ?” आरती भेद भरी मुस्कान के साथ बोली।

“तुम्हें आहूजा ने बताया ?”

उसने सहमति में सिर हिलाया।

“यानि आहूजा को यह सब पता था।”

“बिल्कुल पता होगा। आखिर वह शुरू से इस मिशन में शामिल था। सोहनगढ़ माइंस में रह रहा था।”

“इसका मतलब रमन आहूजा तुमसे हरेक चीज नहीं छिपाता था।”

“नहीं! काफी कुछ बता देता था। उसने सिर्फ अपने इरादे मुझसे छुपाए और उसी वजह से मुझे सबसे ज्यादा आघात लगा। एक तरह से ये मेरे लिये अच्छा हुआ। अगर मेरी स्मृति में वह एक अच्छा इंसान ही रहता तो उसकी मौत का मुझे हमेशा गम रहता... पर अब उसके मिशन के बारे में तुमने जो बताया... वो जानकर...” कहकर आरती चुप हो गई। उसका गला भर आया।

“मैं समझ सकता हूँ।” राज बोला, “तो फिर निक की तुम्हारी दुश्मनी की क्या वजह है ?”

“सिंपल सी बात है। रमन आहूजा ने उनके साथ धोखा किया। खलीली के प्लान यानि कि सुज़ुकी व सीनो के प्लान को विफल करा दिया इसलिये वह उनका दुश्मन बन गया। धीरज तो वहीं मर गया। जिंदा रहता तो ये लोग उसे छोड़ते नहीं। धीरज को पहले ही पता था कि आगे ऐसा होना ही है इसलिये उसने मेरी सेफ्टी प्लान की हुई थी क्योंकि उसे पता था उसके मिशन का खुलासा होने के बाद वे लोग धीरज और उसके शुभचिंतकों के पीछे पड़ने वाले थे।”

“पर उन्हें मालूम कैसे पड़ा तुम्हारे बारे में ?”

“मुझे नहीं पता। आखिर धीरज को वह लोग कंट्रोल कर रहे थे। उनके पास कोई न कोई मेकैनिज्म होगा उसके ऊपर नज़र रखने का और उन्होंने मेरे बारे में जान लिया होगा।”

“...और अब...” राज बोला, “यहाँ पर निक ने तुम पर हमला किया। इसका मतलब तुम्हारी मौत का नाटक भी किसी काम नहीं आया। उन्हें पता है कि तुम जिंदा हो।”

“हाँ!” आरती हारे हुए स्वर में बोली, “इतना कुछ करने के बाद भी न जाने उन्हें कैसे पता चल गया।”

राज के चेहरे पर रोमांच से भरे भाव थे।

“वाह! यानि... यह तो कमाल है। यहाँ भारत में एक ही शहर में दो खेमे बन गये हैं–एक भारत के खिलाफ काम कर रहा है और दूसरा भारत के अनुयाई हैं।”

“हाँ! तुम ऐसा कह सकते हो। गुरु ओसाका को भारत का शुभचिंतक माना जा सकता है।”

“कमाल है!” राज के मुंह से निकला।

“अब मैं तुम्हें वो बात बताती हूँ जो तुम मुझ से बार-बार पूछ चुके हो। वे लोग जिन्होंने मेरी मदद की– उनमे से एक का नाम था पार्श्वनाथ, जिसने तुरंत मुझे दिल्ली से निकलने के लिये आगाह किया। न कोई फोन न मैसेज, वह सीधे आकर मुझसे मिला और उसने मुझे दिल्ली से निकलवा दिया। दूसरे दिन ही मुझे उसकी मौत की खबर मिली थी। वह किसी रेलवे ट्रैक के नीचे आ गया था। न्यूज़ में उसे सुसाइड बताया गया पर मैं जानती हूँ यह काम सुज़ुकी और निक के लोगों का था। दूसरा इंसान था– निरंजन, उसने मेरी मौत का स्वांग रचने में पूरी मदद की थी। वह कहां रहता है, मैंने कभी नहीं पूछा पर उसका फोटो मेरे पास है। वह मैं तुम्हें दिखा देती हूँ।” कहकर आरती ने मोबाइल में एक और फोटो दिखाया। राज ने ब्लूटूथ की मदद से वह फोटो अपने मोबाइल में ले लिया।

कुछ पल राज उसका फोटो देखता और सोचता रहा। आरती घुटनों पर ठोड़ी टिकाकर उसे देखती रही। फिर राज बोला, “मुझे एक बात समझाओ– सब कुछ जानते हुए तुम भागकर उन्हीं की तरफ क्यों आईं ?”

“मतलब ?”

“जब तुम्हें पता था सुज़ुकी यहीं धर्मशाला में रहता है तो तुम इसी तरफ भागकर क्यों आई ?” कहते हुए राज ने उसकी तरफ देखा फिर अचानक चुटकी बजाते हुए उठ खड़ा हुआ। “लगता है– मैं समझ गया।”

“तुम्हारे जैसा इंसान तो समझ ही जाएगा, मिस्टर जासूस।” आरती मुस्कुराई।

“तुम अपनी आईडेंटिटी बदलकर यहाँ आकर निक और सुज़ुकी को मजा चखाना चाहती थी।” राज चुटकी बजाकर बोला।

“मैं इतनी ताकतवर नहीं।”

“पर तुम चाहती तो होगी ही और भले ही ‘तुम’ ताकतवर न हो पर आहूजा के सहयोगी तो होंगे।”

आरती ने स्वीकृति में गर्दन हिलाई।

“पर कैसे ?”

“मुझे नहीं पता वो क्या कर रहे हैं, कैसे कर रहे हैं। पर जिस दिन सुज़ुकी और निक बर्बाद होंगे मुझे सब से ज्यादा ख़ुशी होगी और यहाँ रहकर मैं अपनी आँखों से उनका पतन देख सकूंगी।” कहकर आरती उठ खड़ी हुई। “रात काफी हो गई है। अब मैं चलती हूँ।”

“ठीक है!”

कमरे के दरवाजे की तरफ बढ़ते हुए आरती अचानक रुकी और पलटकर बोली, “अब तुम सोचो और यह बताओ आगे क्या करना चाहते हो ? मैं तुम्हारा साथ दूँगी।”

“हाँ! अब वही सोचना है। तुमने जो जानकारी दी है– वह वाकई विस्फोटक है।”

“जिन परिस्थितियों से मैं गुजरी हूँ, उसके बाद किसी पर भी आसानी से विश्वास नहीं कर सकती इसलिये अभी तक तुम्हें पूरा सच नहीं बता पा रही थी।”

“आई कैन अंडरस्टैंड!”

आरती के खूबसूरत चेहरे पर एक मोहक मुस्कान आ गई।

“एक बात बताओ- ये रिंकी कौन है ?”

राज ने चौंककर उसे देखा, फिर संयमित होते हुए पूछा, “कौन ?”

“रिंकी! जिसका नाम तुम बेहोशी के वक़्त हॉस्पिटल में ले रहे थे।”
 

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