शाम को राज के कमरे पर आरती वैध के साथ पहुंची। वैध ने राज को शर्ट उतारने को कहा और फिर उसके घाव पर किसी किस्म की जड़ी-बूटी का लेप लगा दिया। साथ ही उसने एक कटोरी में कुछ दवाएं घोलकर काढ़े जैसा अर्क तैयार किया। कुछ देर बाद-
“अब लेप सूख गया है। तुम अपनी शर्ट पहन लो।” वैद्य ने मुस्कुराते हुए कहा। वह छोटे कद का लंबी दाढ़ी और पतली मूंछों वाला खुशमिजाज व्यक्ति प्रतीत हो रहा था। वह बोला-
“काफी कसरती बदन है तुम्हारा। बंदूक की गोली भी अच्छा झेल गये। कोई और होता तो इस वक्त अपने पांव पर खड़ा नहीं होता।”
“शायद मैं भी खड़ा नहीं होता। वह तो मेरी खुशकिस्मती थी कि दीपिका उस वक्त मेरे साथ थी।” राज ने प्रशंसा भरी नजरों से आरती को देखा। आरती के गुलाबी होठों पर बरबस मुस्कान आ गई।
“दीपिका तो हमारे आश्रम की सर्वश्रेष्ठ मोतिरी है। इसकी जितनी प्रशंसा की जाए कम है। प्रभु की वंदना, समाज सेवा, अच्छे कर्म, अच्छी संस्कृति, क्या कहूं इसके बारे में। साक्षात देवी है, देवी!”
“अब आप कुछ ज्यादा ही प्रशंसा कर रहे हैं।” आरती झेंपते हुए बोली।
“अब तुम ही बताओ–क्या मैंने कुछ गलत कहा ?” वो आंखें फैलाकर राज से बोला।
“नहीं! आपने बिल्कुल सच कहा है।”
वैध हो-हो करके हँसने लगा।
“अच्छा! सुनो यंग मैन! यह काढ़ा बनाया है। इसे हर रोज मैं तुम्हें शाम को बनाकर दूंगा। इसके नियमित सेवन से एक-दो सप्ताह में तुम्हारे सभी घाव भर जायेंगे और कमजोरी भी जाती रहेगी।”
“कमजोरी तो वैसे अभी भी कोई खास नहीं लग रही।”
“वह तो तुम्हारी सेहत अच्छी है इसलिये पर अभी अगर तुम दौड़-भाग करोगे तब तुम्हें कमजोरी पता चलेगी...और सुनो– धूम्रपान मदिरापान भूलकर भी मत करना।”
“पर मैं...”
“छुपाने की कोई जरूरत नहीं है। तुम्हारे होठों और आँखों दोनों से ये बातें साफ पता चलती हैं।”
“ठीक है, गुरु जी! जैसी आपकी आज्ञा।” राज हाथ जोड़कर बोला।
“अब मैं चलता हूँ।”
“प्रणाम!”
“प्रणाम!”
वैध ने उठकर मुस्कराते हुए राज का कंधा थपथपाया फिर अपना झोला लेकर वहाँ से चला गया।
आरती बोली, “दवा पी लो। फिर थोड़ी देर में खाना खाने चलेंगे।”
“ठीक है!” कहकर राज ने दवा का कटोरा उठाया और एक सांस में पी गया। निहायत ही कड़वे स्वाद से उसने जीभ निकालते हुए मुंह बनाया। आरती खिलखिला उठी।
कुछ मिनटों बाद राज को लगा कि वाकई वैध ने सही कहा था। दवा के असर से अब उसे अपने शरीर में स्फूर्ति का अहसास होने लगा था।
“आओ चलें... थोड़ा खुली हवा में घूमेंगे। तुम्हें आश्रम भी दिखा देती हूँ।”
आरती कमरे से बाहर निकली। उसने इस वक्त लाल रंग के भगवे वस्त्र पहने हुए थे और सिर ढक रखा था। राज उसे ध्यान से देखते हुए बाहर निकला।
फिर वे लोग आश्रम के आंगन में पहुँच गए–जहां कई शिष्य इधर-उधर बैठे थे। हर कोई अपने रोजमर्रा के कार्यों में व्यस्त दिखाई दे रहा था। कोई मसाला कूट रहा था तो कोई सूखे हुए कपड़े उतार रहा था। राज को ऐसा लग रहा था जैसे वह किसी बहुत बड़ी जॉइंट फैमिली के घर आ गया हो।
“तुम्हें कभी भी बोरियत महसूस हो तो कोई भी काम बेझिझक पकड़ लेना।” आरती मुस्कुरा कर बोली।
“जरूर! मुझे खुशी होगी। खाली बैठना तो मुझे बिल्कुल पसंद नहीं।”
“आश्रम के ग्राउंड फ्लोर पर सभी मोतिर यानि मेल रहते हैं और आश्रम की लड़कियां और औरतें यानी कि मोतिरी फर्स्ट फ्लोर पर रहती हैं। पूजास्थल, गुरुओं का निवास, मीटिंग हॉल आदि सब ग्राउंड फ्लोर पर ही हैं।”
“कुल कितने लोग रहते होंगे यहाँ ?”
“करीब एक सौ बीस-तीस।”
“और यह सभी लोग सीनो देश से आए थे ?”
“नहीं! सीनो देश से गुरु ओसाका व तीन गुरु, जिनमें से एक की मृत्यु हो गई, यह वैध और तीन-चार लोग और आये थे। दस साल पहले जब सीनो की गवर्नमेंट ने इन सब को मृत्युदंड दिया था तब ये सभी भाग कर भारत आ गए थे और भारत ने उन्हें यहाँ आश्रय दिया था। उसके बाद धीरे-धीरे इन्होंने आश्रम की शुरुआत की और इनके धार्मिक अनुयाई जो कि भारत में भी मौजूद थे इनसे जुड़ते गये। कुछ अनुयायी जो कि पूरी तरह से ईश्वर को समर्पित हो गये और अब संसारी मोह-माया छोड़ कर सारा जीवन ईश्वर की आराधना में बिताना चाहते हैं वह आश्रम में ही रहने लगे हैं।”
“कमाल है! मैं तो ऐसा सोच भी नहीं सकता।”
आरती ने उसकी तरफ इस तरह देखा जैसे किसी नादान बच्चे को देख रही हो।
“हर कोई तुम्हारी तरह स्ट्राँग नहीं होता। उनके पास जीवन में बुरे वक्त को अकेले झेलने की काबिलियत नहीं होती।”
“तो क्या तुम कहना चाहती हो–कमजोरी हमें ईश्वर की आराधना करने के लिये मजबूर कर देती है ? सिर्फ यही एक कारण है जिसकी वजह से इतने सारे लोग यहाँ मौजूद हैं ? क्योंकि उन्होंने सामाजिक जीवन में कुछ स्ट्रगल किये और उनसे हार कर यहाँ आ गए ?”
“नहीं! इस तरह का निष्कर्ष निकालना तो सिरे से गलत होगा। पर किसी बिलीफ की तरफ मुखातिर होने के पीछे कोई न कोई वजह जरूर चाहिये होती है। वह जीवन में किसी के खोने का असीमित दुःख, कोई स्ट्रगल या कोई महत्त्वाकांक्षा भी हो सकती है जो कि अपना सबकुछ झोंक देने के बाद भी पूरी नहीं हो पा रही हो। कई बार ऐसा होता है न कि हम किसी चीज के लिये अपना सब कुछ दांव पर लगा देते हैं फिर भी वह हमें हासिल नहीं होती। तब हम किस्मत पर सारा कसूर डाल देते हैं। पर ऐसे में ही किसी अज्ञात शक्ति की मदद अगर हमें मिलती है तो न जाने कैसे उन सपनों को साकार करने के लिये फिर से हिम्मत मिल जाती है, जीवन के दुखों से उभरने की ताकत हासिल हो जाती है।”
“कितना वक्त हुआ तुम्हें इस आश्रम में रहते हुए ?”
“तुम तो जानते ही हो कि मैं इससे पहले दिल्ली में थी, नौकरी कर रही थी। तो यहाँ रहते हुए ज्यादा समय नहीं हुआ पर मैं गुरु ओसाका की बहुत सालों से अनुयाई हूँ और अक्सर उनसे गाइडेंस लेने आश्रम आती थी। सिर्फ मैं ही नहीं हिमाचल और देश के बाकी भागों में भी आपको बहुत से लोग मिलेंगे जो गुरु ओसाका को मानते हैं और सीनो धर्म के अनुयायी हैं।”
बातें करते करते डिनर का समय हो गया और देखते ही देखते आंगन में चटाइयाँ बिछ गई और खाने के पत्तल लग गये। वहाँ किसी गाँव की दावत जैसा माहौल हो गया। सब लोग बैच में बैठने लगे और दस-दस मिनट में खाना खाकर उठने लगे। मोतिर और मोतिरी मिलजुल के खाना खा रहे थे, बातें कर रहे थे, किसी पर कोई रोक-टोक नहीं थी, फिर भी सब के कार्यकलाप में एक तरह का अनुशासन दिखाई दे रहा था। आरती और राज भी खाने बैठ गए। खाना शुद्ध-सात्विक-सा था पर फिर भी बेहद लजीज था।
“काफी दिनों से घर से बाहर निकला हूँ।” राज बोला, “आज जाकर लग रहा है कि घर का खाना नसीब हुआ।”
आरती मुस्कुरा दी।
“आश्रम में ही रह जाओ। हमेशा ऐसा खाना मिलता रहेगा।”
“लगता है तुमने पूरा जीवन आश्रम में ही बिताने का निर्णय ले लिया है।”
“इसमें कोई शक नहीं।” आरती बोली, “मुझे पहले से ही पता था ऐसा कुछ आगे चलकर होगा, इतनी जल्दी होगा यह तो नहीं पता था पर शायद किस्मत में यही लिखा था इसीलिए मेरे जीवन में कुछ ऐसी घटनाएं घटी जिन्होंने मुझे आज यहाँ पहुँचा दिया और मुझे इस बात की बहुत खुशी है। तुम यकीन नहीं करोगे कि कुछ महीने पहले जिन बुरी परिस्थितियों ने मुझे डिस्टर्ब कर दिया था, जिनके कारण मैंने जीने की आस खो दी थी, आज उन्हें याद करके भी मुझे कोई परेशानी महसूस नहीं होती।”
राज चुपचाप खाना खाता रहा।
कैसे उन लोगों की जानकारी आरती से निकाली जाये जिन्होंने इसकी आईडेंटिटी खत्म करके यहाँ तक पहुँचने में मदद की।
खाने के बाद दोनों टहलते हुए आश्रम के प्रांगण में आ गए। बाहर खुशनुमा ठंडी हवाएं चल रही थी, चाँद आसमान में जगमगा रहा था जिसकी रोशनी में बर्फ से ढकी पहाड़ियां चमक रही थी।
“आरती!” राज बोला।
आरती ने पहाड़ों की तरफ देखते हुए सिर्फ ‘हूँ’ कहा।
“मैं तुमसे सब साफ-साफ बोलूंगा। दिल की बात कहूँगा। मैं अपनी सीक्रेट सर्विस की नौकरी से बेहद प्यार करता हूँ। मैं अपने देश से बेहद प्यार करता हूँ। मैं एक देशभक्त जासूस हूँ और अपने देश और इस नौकरी के लिये मैं कुछ भी कर सकता हूँ। इस वक्त मेरे ऊपर जो आरोप लगे हैं वह सिर्फ एक ही दशा में हट सकते हैं– मैं आहूजा के खिलाफ कुछ सबूत निकाल सकूं, आहूजा और चौधरी के बीच जो प्लान रचा गया था उसकी जानकारी हासिल कर सकूँ। इसके बाद ही मेरे माथे पर लगा कलंक हट सकेगा।”
“तुम क्यों मेरे जख्मों को बार-बार छेड़ते हो ?” आरती उदास स्वर में बोली।
“मैं ऐसा हरगिज़ भी नहीं चाहता आरती। पर तुम्हें कैसा लगता अगर तुम मेरी जगह होती ? अगर तुम जंग में लड़ी वह सैनिक होती जिसने दुश्मनों को खत्म किया पर घर वापसी पर तुम्हें हीरो बनाने की जगह दुश्मनों को मारने की वजह पूछी जाती ? उनके खिलाफ सबूत मांगे जाते, हीरो की जगह विलेन बना दिया जाता ? तुम्हारे ऊपर क्या गुजरती– तुम बताओ ?”
आरती राज की तरह पलटी। वह ध्यानपूर्वक राज को देखने लगी। मानो उसका चेहरा देख कर उसके मन को पढ़ने की कोशिश कर रही हो।
“मेरी हालत इस वक्त उसी सैनिक की तरह है। मैं इस तरह नहीं जी सकता। मैं अपने माथे पर कलंक लेकर वापस नहीं जा सकता।”
आरती के चेहरे पर करुणा भरे भाव आ गए।
“ राज मैं समझ सकती हूँ कि शायद धीरज गलत राह पर चला गया था, भटक गया था। यह बात भी सच है कि अगर मुझे पहले ही उसके यह इरादे पता होते तो मैं उससे नफरत करने लगती। पर मुझे उसके प्लान के बारे में कभी पता नहीं था। मुझे नहीं पता था उसकी किन लोगों के साथ साथ-गाँठ है। मुझे जब उसने कॉन्टेक्ट किया और सुरक्षित जगह पर जाने को बोला तब मेरी नज़र में वह एक इंटरपोल एजेंट ही था इसलिये मेरी समझ में मेरी मदद करने वाले भी कानून के रक्षक थे।”
“यही तुमने गलती कर दी।” राज बोला, “कानून के रक्षक आखिर तुम्हारी मदद इस तरह क्यों करते ? तुम्हारी मौत का स्वांग क्यों रचाते ? क्या तुमने ऐसा कभी देखा है किसी की जान का खतरा होता है तो उसे मृत घोषित कर दिया जाये ?”
आरती चुप रही, फिर सोचते हुए बोली, “मैं इतना नहीं सोच सकती। मुझे नहीं पता जासूस व सीक्रेट एजेंट्स किस तरह काम करते हैं। मैं उस पर भरोसा करती थी उसने मुझे जैसा करने को कहा मैं करती चली गई।”
“आरती! अभी वक्त है। तुम अहसानफरामोशी की बातें भूल जाओ। जिन लोगों ने तुम्हारी मौत का नाटक किया वह चौधरी के पार्टनर थे जो कि सिर्फ आहूजा की बदले की भावना का इस्तेमाल करके अपना उल्लू सीधा करना चाहते थे। मुझे उन लोगों तक पहुँचने दो ताकि मैं यह साबित कर सकूं कि देश को नुकसान पहुंचाने का प्लान किसी और का था रमन आहूजा का नहीं।”
“क्या तुम मुझे बातों में उलझा कर अपना उल्लू सीधा करना चाहते हो ?” आरती उसे तीखी नजरों से देखते हुए बोली।
“हां! मैं अपना उल्लू सीधा करना चाहता हूँ। पर जो तर्क मैं दे रहा हूँ वही सच है। अगर तुम इसका काट दे सको तो दो। अगर तुम मुझे यह समझा सको कि अपने ही देश पर न्यूक्लियर मिसाइल गिराना सही भी हो सकता है तो मैं मान लूंगा कि मैं गलत हूँ और मैं अभी इसी वक्त यहाँ से चला जाऊंगा।”
“तुम चाहते तो जोर-जबरदस्ती से भी मुझसे यह जानकारी निकलवा सकते हो आखिर तुम ऐसा क्यों नहीं कर रहे ?”
“तुम एक सीधी-साधी लड़की हो। शुरू में मुझे तुम पर शक जरूर था पर अब मैं समझ चुका हूँ कि तुम्हारे और आहूजा जैसे लोगों को इमोशनल करके कैसे लोग अपना चक्रव्यूह रचते हैं। मैंने यह आज नहीं बहुत से मिशन में देखा है। आतंकवाद में क्या होता है ? दंगों में क्या होता है ? लोगों को इमोशनली ब्लैकमेल करके, भड़काकर खून की नदियाँ बहा दी जाती हैं जिस के सहारे कुछ धूर्त लोग अपने मंसूबे पूरे करते हैं।”
आरती उसे देखती रही। वह गहरी सोच में थी। राज के चेहरे पर चाँद की रोशनी पड़ रही थी। उसकी आँखों में छिपे भाव वह साफ देख सकती थी।
आरती ने निर्णय लिया और कहा- “चलो, तुम्हारे कमरे में चलते हैं। यहाँ बात करना ठीक नहीं।”
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