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चेंग का कहना जारी था।
“उसी ने मेरे लिए मुश्किल पैदा की। उस कमबख्त ने आश्रम के कैम्पस में एक हत्या कर दी जिस कारण पुलिस कि चहल पहल वहां बढ़ गयी। फिर उस पाकिस्तानी जासूस की हत्या हो गयी और दिल्ली से दो घाघ जासूस पहुँच गए और वहां अनावश्यक दौड़ भाग और जांच शुरू हो गयी।”
“दिल्ली से दो ही जासूस पहुंचे हैं या फिर और भी हैं?”
“हो सकता है कि और हों। पर नज़र के सामने तो दो ही है। डर ये है की कहीं उन पाकिस्तानियों के चक्कर में मैं भी न लपेटा जाऊं। सिकंदर के फेर में मै बाल बाल बचा था।”
“वैसे सिकंदर अभी कहाँ है?”
“उसे कन्हैय्या ने सब कुछ उगलवाने के बाद छोड़ दिया था।”
“छोड़ दिया? अगर वो सच में भारतीय जासूस था तो फिर एक पाकिस्तानी जासूस को पकड़ने के बाद छोड़ देने कि बात गले से नहीं उतरी।”
“हो सकता है कि उसके पीछे अपने आदमी लगा दिए हों। या फिर कोई चिप वगैरह उसके शरीर में फिट कर दिया गया हो।”
“ये खबर पक्की है न कि उस इंडियन जासूस का सम्बन्ध इस आश्रम से ही था जो चीन में रहा था?”
“सौ फीसदी। दो दिन पहले भी उसी आई पी एड्रेस से मेल भेजा गया है और उसका लोकेशन निश्चित तौर पर इसी आश्रम से भेजा गया है और इंडियन करेंसी के हिसाब से पचास करोड़ रूपये किसी क्रिप्टोकर्रेंसी खाते से उसके स्विस खाते में ट्रान्सफर किये गए हैं। अब कोई बेमतलब का तो इतने पैसे बर्बाद नहीं करेगा। उस पर से उन दोनों मेहमानों के यहाँ आने कि खबर से ये बात और पक्की हो चुकी है कि यहाँ के लोगों का तिब्बत के मामले में खास दखल है।”
“पर सवाल ये है कि कुछ लोग इस आश्रम का तिब्बत में देशविरोधी गतिविधि के लिए इस्तेमाल कर रहे हैं या फिर पूरा आश्रम ही इस गतिविधि में संलग्न है?”
“मेरे हिसाब से ऐसा हो ही नहीं सकता कि आश्रम प्रमुख की जानकारी के बिना ऐसा हो रहा हो।” मीमी ने टोका, “खासकर करमापा वाले मामले में मीटिंग फिक्स होने के बाद मुझे तो पूरा विश्वास है कि ये सारा कराया धराया उसी का है। जहाँ एक ओर धरमशाला में ये लोग सी टी ए की सरकार चला रहे हैं वहीं जो काम वे लोग खुलकर नहीं कर सकते उसके लिए सारा कार्यक्रम यहाँ से चलाया जा रहा है।”
“पर कमाल तो ये है कि मैंने आश्रम के सारे कंप्यूटर को खंघाल डाला पर किसी कंप्यूटर में ऐसा कोई इनफार्मेशन नहीं मिला जो हमारे ज़रुरत से मतलब रखता हो या जिसका आई पी एड्रेस हमारे काम का हो।”
“हो सकता है कि कोई सिस्टम आपसे छुपा रह गया हो।”
“हो सकता है। इसलिए तो तुम लोगों को बुलाया गया है। ये बात हम लोगों के हक में है कि मीटिंग का स्थल आश्रम न होकर बारासाहब कि हवेली में रखा गया है जिसे हाल ही में आश्रम ट्रस्ट ने खरीद लिया है। ऐसे मौके पर हम आश्रम की तलाशी का काम आराम से कर सकते हैं। लोकल पुलिस के साथ साथ एस पी भी अपने टीम के साथ हवेली में ही होगा। एस पी वैसे तो अश्रम्वालों से चिढ़ता है पर ऊपर से प्रेशर के कारण अपनी ड्यूटी में कोताही नहीं बरतेगा। हमें विशेष खतरा जासूसों कि टीम के साथ साथ सुधीर से भी हो सकता है।”
“ये सुधीर कौन हुआ?”
“सुधीर गुप्ता यहाँ का एस आई है पर जिस तरह से वो इस केस के पिछे पड़ा है वो भी हमारे लिए खतरनाक हो सकता है। रही बात ए एस आई की तो वो अपना आदमी है। पहले वो सिकंदर के लिए काम कर रहा था, अब हमारे टुकड़ों पर पल रहा है। इतना पैसा उसे दे चुका हूँ कि वो हमारे लिए कुछ भी कर सकता है।”
“बढियां। सुधीर को ट्राई नहीं किया?”
“नहीं। वो अलग किस्म का जीव है। वैसे तो वो भी आश्रम का भक्त है पर अपने ईमान की कीमत पर नहीं। उसका प्रोफाइल पता कर चुका हूँ।”
“इस काम का शोर्ट कट तरीका और भी है।” मीमी बोली।
“क्या?”
“आश्रम के खास लोगों को पकड़ मंगाते हैं और गर्दन पकड़कर सब कुछ उगलवा लेते हैं।”
“क्या बात है। तुम पर बलिहारी। इतने इंटेलिजेंट जवाब कि तुमसे उम्मीद नहीं थी।”
मीमी हंसी।
“तो हमारी कार्यसूची में सबसे प्रमुख है आश्रम को खंघालना। सारे ख़ास लोगों का प्रोफाइल पता करना।”
“और ये सब काम हमें चुपचाप करना है। हाँ अगर सारे इन्फोरमेशन मिल जाते हैं तो सारे आश्रम में ४-५ बमब्लास्ट को पूरी तरह मटियामेट कर चल देंगे।” चेंग ने आराम से कहा।
“वैसे सबसे बड़े खतरे के बारे में तो तुमने हम लोगों को बताया हीं नहीं।” मीमी ने कहा।
“वो क्या?”
“आश्रम में अल्फांसे भी मौजूद है।”
चेंग लेई हकबकाया।
“इस बारे में तुम्हें कैसे मालूम?”
“भूल गए कि मैं कल इस शहर में पहुंची हूँ। इतना समय काफी था आश्रम की रेकी के लिए। ये तो आश्चर्य कि बात ही होगी कि तुम दोनों एक दूसरे से टकराए नहीं होंगे।”
“ऐसा ही हुआ है। ये तो बेहतर है कि वो मुझे पहचानता नहीं है। पर तुम्हें तो वो पहचानता है। हमें कोशिश करनी है की हम दोनों उसकी लाइन को क्रॉस नहीं करें। केस ख़त्म होने के बाद उसके साथ जो करना है कर दिया जायेगा, उसका स्वर खूंखार हो उठा।”
“खैर वो बाद की बात है। पहले ये बताओ अभी क्या करना है?”
“सबसे पहले दोनों जासूसों को यहाँ से बाहर करना होगा।”
“उसकी चिंता मत करो। हम लोग ऐसी स्थिति पैदा कर देंगे की उन्हें खुद ही ये शहर छोड़कर जाना होगा।” शेरिंग ने विश्वास से कहा।
“और सुधीर की मैं ऐसी हालत कर दूँगी की वो सारा इन्वेस्टीगेशन भूल जायेगा।”
“ये तुम लोग सोचो। मैं चलता हूँ। बहुत सारे काम बाकी हैं अभी। अगर चाहो तो पाकिस्तानी जासूसों से मदद ले सकते हो। कम से कम तीन तो मेरे संपर्क में हैं।”
थोड़ी देर मीटिंग और चलने के बात बर्खास्त हो गयी थी।
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जून ३०, सुबह १२ बजे
डीजीपी का चांदीपुर में देखा जाना एक बड़ी खबर हो सकती थी पर अगले सप्ताह चीन के विदेश मंत्री की होने वाली यात्रा के मद्देनज़र ये एक ज़रूरी घटना थी। एक बड़ी मीटिंग बुलाई गयी थी जिसमें जिले के सभी महत्वपूर्ण अधिकारी शामिल थे। मीटिंग के बाद जब एस पी गौतम को कहा गया कि डी जी पी अकेले में उनसे मुलाक़ात करना चाहते हैं तो उसे अंदाज़ा नहीं था कि उसे विदेश मंत्री की यात्रा से इतर किसी और बात के लिए बुलाया गया है।
“तुम्हारे एस आई सुधीर के खिलाफ बहुत सारी शिकायतें हैं। “
“मैं समझा नहीं सर। सुधीर तो हमारे विभाग का सबसे जहीन ऑफिसर में से एक है। पिछले केस में तो खुद आपने भी उसकी तारीफ़ की थी।”
“मुझे याद है। पर लगता है कि ज्यादा तारीफ़ से उसका दीमाग ख़राब हो गया है। मैंने तुमसे पहले भी कहा था कि आश्रम वाले मामले में एहतियात से काम लिया जाये। पर आजकल तुम्हारा एस आई हर जगह जेम्स बांड बना फिर रहा है। बेहतर होगा कि उसे इस केस से हटाने का आर्डर जारी कर दो।”
“सॉरी सर, पर वो डिपार्टमेंट के लिए काम कर रहा है मेरे लिए नहीं। वो मेरा एस आई नहीं है। और फिर उसनें ऐसा क्या कर दिया?”
“अपने पोस्ट से ज्यादा आगे बढ़कर काम कर रहा है। आश्रम से जुड़े हर किसी का पीछा करता फिर रहा है। दो दिन पहले आश्रम वाले महंत जी का पीछा करते करते काठमांडू पहुँच गया। सुनने में आया है उसने महंत जी को धमकी भी दी है।”
“कहाँ से आपने ऐसा सुना सर?”
“डोंट ट्राई तो ओवरस्मार्ट सचदेवा।”
“आई ऍम नॉट ओवरस्मार्ट बट स्मार्ट एनफ टू नो फ्रॉम वेयर यू आर टॉकिंग। यहाँ पहुँचने पर सबसे पहले उस महंत और को मिलने का टाइम दिया था। क्या ये दो कौड़ी के आश्रमवाले हम पुलिस ऑफिसर से ज्यादा इम्पोर्टेन्ट हो गए? एक लड़का इमानदारी से केस को सोल्व करने के लिए जान प्राण लगा दे रहा है और हमारे डिपार्टमेंट के लोग ही उसकी टांग खींचने में लगे हैं। आखिर क्या खास बात है इस आश्रमवालों में कि एक छोटे से मर्डर केस को हमें इन्वेस्टिगेट नहीं करने दिया जा रहा है? इतनी ऊपर तक पहुँच है इन आश्रमवालों की? क्या हम जानते नहीं कैसे कैसे जरायमपेशा लोग यहाँ आकर छुप कर रहते हैं? वो पाकिस्तानी जासूस एक साल से यहाँ छुपकर रह रहा था और हम लोगों को पता भी नहीं चला। केवल यहीं नहीं किसी भी आश्रम को छान लो २-४ घुसपैठिये ज़रूर मिल जायेंगे। पर हमारे नेता लोग शह देते रहते हैं ऐसे लोगों को और हम लोग ऐसे लोगों के तलवे चाटते रहते हैं।” अपनी बात पूरी करते करते एस पी हांफने लगा था।
“तुम इमोशनल हो रहे हो सचदेवा।”
“सही कहा आपने सर। पर एमोशन के बिना आदमी की हैसियत क्या है सर।”
“मैं तुम्हरी मनः स्थिति समझ रहा हूँ। मैं भी सुधीर के कैलिबर का कायल हूँ। वो तीन चार इने गिने एस आई में से है जिसकी मैं सच में सहायता करना चाहता हूँ, उसे आगे बढ़ते देखना चाहता हूँ। पर इस मामले में ऊपर से मंत्रियों का प्रेशर कुछ ऐसा है कि मैं फिलहाल कुछ नहीं कर सकता। अगर सुधीर को रोका नहीं गया तो हो सकता है कि उसका ट्रान्सफर चौबीस घंटे के अन्दर ऐसे डिपार्टमेंट में कर दिया जाये जहाँ वो बस लोगों को परेड करता फिरे। और ऐसा तुम भी नहीं चाहोगे।”
“ठीक है, मैं देखता हूँ।” एस पी ने भी मानों हथियार डाल दिए थे।
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“तो इसमें टेंशन कि क्या बात है सरस्वती जी। किसी न किसी को तो आना ही था अब चीनी विदेश मंत्री ही सही।”
“तुम मामले कीई गंभीरता नहीं समझ रहे हो अल्फांसे। जिस काम के लिए तुम्हें २ महीने से यहाँ रखा गया था वो दिन बस आने ही वाला है। जहाँ तक हमारी सेटिंग थी उस हिसाब से दोनों मेहमानों के दिल्ली से चीनी राजदूत का आना तय था जैसा कि तुम्हें मैंने बताया भी था। यहाँ तक कि अगर चीन से कोई बड़ा ऑफिसर भी आता तो उसे किडनैप करना तुम्हारे लिए आसान होता। उसकी अनुपस्थिति में ये मीटिंग आचार्य जी के अध्यक्षता में आराम से हो सकती थी।”
“तुम्हारा मामला तुम ही समझो। अगर दोनों तिब्बतियों को मीटिंग ही करनी थी तो दुनिया के किसी भी हिस्से में कर सकते थे। दुनिया में ऐसी कई जगहें हैं जहाँ इन्हें चीन के विरोध का सामना भी नहीं करना पड़ता। या फिर कहीं ऐसा तो नहीं ........।”
अल्फांसे बोलते बोलते चौंका।
सरस्वती मुस्कुराई।
“अब तुम ठीक समझे। दरअसल ये मीटिंग एक तरह से चीन खुद करवा रहा है। शोर्ट कट में कहें तो चीन चाहता है कि सी टी ए करमापा ओग्येन को अपना उत्तराधिकारी घोषित कर दें। जबकि दलाई लामा ऐसा नहीं चाहते। चीन ये मीटिंग धरमशाला में करवाना चाहता था। पर सी टी ए ने इससे इनकार कर दिया क्योंकि ऐसा होने से उस पर मीटिंग को प्रभावित करने का आरोप लगता। उसका कहना था कि अगर ये मीटिंग न्यूट्रल जगह पर हो तो बेहतर होगा। ये संजोग ही था कि मीटिंग का स्थल चांदीपुर में फिक्स हो गया।”
“और फिर संजोग से तुम्हारी मुझसे मुलाक़ात हो गयी और संजोग से मैं यहाँ आने को तैयार हो गया। बेवकूफ मत बनाओ।”
सरस्वती हंसी। “तुम्हें कौन बेवकूफ बना सकता है अल्फांसे। बस यूँ ही कोशिश कर रही थी। सच बात ये है कि बड़ी मेहनत से मैंने ये मीटिंग का लोकेशन धरमशाला से यहाँ फिक्स किया है। और कुछ?”
“बस कुछ बातें अभी भी समझ में नहीं आया। जैसे की ये सारा चक्कर तुम्हारा चलाया हुआ है या आचार्य जी का या फिर किसी और का? और दूसरी बात, तुम्हारे तिब्बत से इतनी मोहब्बत का कारण क्या है?”
“वक़्त आने पर सब कुछ समझ में आ जायेगा। फिलहाल तुम्हें ये सोचना है कि ऐसा क्या किया जाये कि ये चीनी मंत्री यहाँ नहीं पहुंचे। या पहुंचे भी तो मीटिंग का हिस्सा नहीं बने। और बने भी तो जैसा हम चाहते हैं वैसे स्टेटमेंट जारी करे।”
“सोचना हमारा काम है देवी जी। आखिर इस काम की मैं एडवांस फीस ले चुका हूँ। और अल्फांसे जिस काम के पैसे लेता है उसे पूरा करके ही छोड़ता है।”
“तो मैं निश्चिंत रहूँ?”
“बिलकुल। अब अगर चीनी राष्ट्रपति भी पूरी सेना लेकर पहुँच जाये तो भी अल्फांसे उसे अपने क़दमों पर झुककर रहेगा।”
सरस्वती अब कुछ आश्वस्त नज़र आ रही थी। अल्फांसे को इस समय अपने दोस्त विजय कि याद आ रही थी। अगर वो साथ होता तो उसका काम आसन हो जाता। चीनी मंत्री के साथ साथ उसे चेंग पर भी ध्यान देना था। चेंग अकेला ही दस के बराबर था और उम्मीद थी कि वो इस बड़े मिशन पर अकेला नहीं होगा।
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सुधीर हर पल सावधान था। इस वक़्त वो रजनी से मिलकर आ रहा था। रजनी के मामले में उसे पूरा विश्वास था कि सारा कराया धराया महंत का ही था और उस आनंद ने ही उस पर हमला किया था। इस मामले में वो आचार्य जी से भी कई बार मिलने कि कोशिश कर चुका था पर ऐसा नहीं हो पाया था। जैसी खबर उसे मिल रही थी उसके अनुसार आचार्य जी इन दिनों किसी से भी नहीं मिल रहे थे। आज तो सुबह से दो बार उसने आश्रम में प्रवेश कि कोशिश की थी पर उसे सख्ती से यह कहकर मना कर दिया गया था कि आश्रम में कुछ अंदरूनी काम चल रहा है और उसे अन्दर जाने कि इजाज़त नहीं है।
यानी महंत जी की उसने जिस तरह छीछालेदर की थी उसने असर दिखा दिया था। एस पी गौतम ने भी उसे डी जी पी से हुई बातचीत का ब्यौरा दे दिया था। मतलब उसे अब मामले से दूर रहना था। अपने मोटरसाइकल को उसने अपने घर कि तरफ मोड़ दिया।
थोड़ी देर के लिए वो अपने सोचों में यूँ डूब गया था की सामने से आते ट्रक के बारे में उसे देर से मालूम हुआ जो अपना ट्रैक छोड़कर उसके तरफ तेजी से बढ़ी चली आ रही थी।
अब उसके पास सोचने को बहुत कम वक़्त था। बायीं तरफ खेत था पर रोड का लेवल उससे ५-६ फीट ऊँचा था। पर ट्रक से बचने के लिए कोई और रास्ता नहीं था।
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डी जी पी के मोबाइल पर एस पी का नंबर उभरा। उसकी आवाज सुनकर डी जी पी महोदय समझ गए कि वो कितने खतरनाक मूड में है।
“सर जी। सुधीर के एक्सीडेंट को खबर आपको मिल ही गयी होगी। वो जिन्दगी और मौत के बीच झूल रहा है। अगर वो मर गया तो मैं सारे आश्रम को आग लगा दूंगा।”
डी जी पी के कुछ कहने से पहले हीं एस पी ने फोन काट दिया।
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हमेशा की त्तरह शरवन पुरे मार्किट का चक्कर लगाकर घर लौटा। आज किसी ने उसे उधार में दारू नहीं दिया था। इस वक़्त शरवन घर में अकेला था। पिछले बार उस लम्बे बाल वाले आदमी ने छोटे काम के लिए पूरे दस हज़ार सौंपे थे। अब सारे पैसे ख़त्म हो चुके थे। हमेशा की तरह पैसे नहीं होने पर वो सेवाराम के कमरे से पैसे निकल लेता था।
आज पहली बार उसका कमरा लॉक था।
“आज ऐसी क्या बात हो गयी ये कंगाल भी कमरे बंद रखने लगा।” शरवन बुदबुदाया।
‘पर ताले तो शरीफ लोगों से बचने के लिए होते हैं हमारे जैसे लोगों से बचने के लिए नहीं।’ कुछ ही देर में उसने ताला खोल लिया था। कमरे में प्रवेश कर सीधे वो दरवाजे के साइड में पड़े टेबल के तरफ लपका। टेबल के दराज में हमेशा कुछ न कुछ पैसे पड़े रहते थे।
दराज़ में पड़े १०० रुपये के नोट कि तरफ ख़ुशी ख़ुशी उसने हाथ बढाया। तभी उसे ऐसा लगा कि कोई उसे देख रहा है। या ये उसका भरम था? उसने कमरे में चारो तरफ नज़र घुमाई। उसकी नज़र आख़िरकार टेबल पर रखी हुई गुडिया पर पड़ी। दृष्टि उसी पर टिकी रह गयी। ऐसा लगा कि वो उसे आँखें तरेर रही हो। आम गुड़ियों की तरह इसने फ्रॉक नहीं बल्कि साड़ी पहन रखी थी।
गुडिया रखी थी या खड़ी थी वो तय न कर पाया। उसे ऐसा लगा कि ये कोई हाड़ मॉस की जीव हो। ये सेवाराम को गुड़ियों का शौक़ कबसे हो गया?
अनायास ही उसने गुडिया कि तरफ हाथ बढाया।
गुडिया सज्जन मालूम होती थी। उसका छोटा सा हाथ भी शरवन की तरफ बढ़ने लगा।
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“उसी ने मेरे लिए मुश्किल पैदा की। उस कमबख्त ने आश्रम के कैम्पस में एक हत्या कर दी जिस कारण पुलिस कि चहल पहल वहां बढ़ गयी। फिर उस पाकिस्तानी जासूस की हत्या हो गयी और दिल्ली से दो घाघ जासूस पहुँच गए और वहां अनावश्यक दौड़ भाग और जांच शुरू हो गयी।”
“दिल्ली से दो ही जासूस पहुंचे हैं या फिर और भी हैं?”
“हो सकता है कि और हों। पर नज़र के सामने तो दो ही है। डर ये है की कहीं उन पाकिस्तानियों के चक्कर में मैं भी न लपेटा जाऊं। सिकंदर के फेर में मै बाल बाल बचा था।”
“वैसे सिकंदर अभी कहाँ है?”
“उसे कन्हैय्या ने सब कुछ उगलवाने के बाद छोड़ दिया था।”
“छोड़ दिया? अगर वो सच में भारतीय जासूस था तो फिर एक पाकिस्तानी जासूस को पकड़ने के बाद छोड़ देने कि बात गले से नहीं उतरी।”
“हो सकता है कि उसके पीछे अपने आदमी लगा दिए हों। या फिर कोई चिप वगैरह उसके शरीर में फिट कर दिया गया हो।”
“ये खबर पक्की है न कि उस इंडियन जासूस का सम्बन्ध इस आश्रम से ही था जो चीन में रहा था?”
“सौ फीसदी। दो दिन पहले भी उसी आई पी एड्रेस से मेल भेजा गया है और उसका लोकेशन निश्चित तौर पर इसी आश्रम से भेजा गया है और इंडियन करेंसी के हिसाब से पचास करोड़ रूपये किसी क्रिप्टोकर्रेंसी खाते से उसके स्विस खाते में ट्रान्सफर किये गए हैं। अब कोई बेमतलब का तो इतने पैसे बर्बाद नहीं करेगा। उस पर से उन दोनों मेहमानों के यहाँ आने कि खबर से ये बात और पक्की हो चुकी है कि यहाँ के लोगों का तिब्बत के मामले में खास दखल है।”
“पर सवाल ये है कि कुछ लोग इस आश्रम का तिब्बत में देशविरोधी गतिविधि के लिए इस्तेमाल कर रहे हैं या फिर पूरा आश्रम ही इस गतिविधि में संलग्न है?”
“मेरे हिसाब से ऐसा हो ही नहीं सकता कि आश्रम प्रमुख की जानकारी के बिना ऐसा हो रहा हो।” मीमी ने टोका, “खासकर करमापा वाले मामले में मीटिंग फिक्स होने के बाद मुझे तो पूरा विश्वास है कि ये सारा कराया धराया उसी का है। जहाँ एक ओर धरमशाला में ये लोग सी टी ए की सरकार चला रहे हैं वहीं जो काम वे लोग खुलकर नहीं कर सकते उसके लिए सारा कार्यक्रम यहाँ से चलाया जा रहा है।”
“पर कमाल तो ये है कि मैंने आश्रम के सारे कंप्यूटर को खंघाल डाला पर किसी कंप्यूटर में ऐसा कोई इनफार्मेशन नहीं मिला जो हमारे ज़रुरत से मतलब रखता हो या जिसका आई पी एड्रेस हमारे काम का हो।”
“हो सकता है कि कोई सिस्टम आपसे छुपा रह गया हो।”
“हो सकता है। इसलिए तो तुम लोगों को बुलाया गया है। ये बात हम लोगों के हक में है कि मीटिंग का स्थल आश्रम न होकर बारासाहब कि हवेली में रखा गया है जिसे हाल ही में आश्रम ट्रस्ट ने खरीद लिया है। ऐसे मौके पर हम आश्रम की तलाशी का काम आराम से कर सकते हैं। लोकल पुलिस के साथ साथ एस पी भी अपने टीम के साथ हवेली में ही होगा। एस पी वैसे तो अश्रम्वालों से चिढ़ता है पर ऊपर से प्रेशर के कारण अपनी ड्यूटी में कोताही नहीं बरतेगा। हमें विशेष खतरा जासूसों कि टीम के साथ साथ सुधीर से भी हो सकता है।”
“ये सुधीर कौन हुआ?”
“सुधीर गुप्ता यहाँ का एस आई है पर जिस तरह से वो इस केस के पिछे पड़ा है वो भी हमारे लिए खतरनाक हो सकता है। रही बात ए एस आई की तो वो अपना आदमी है। पहले वो सिकंदर के लिए काम कर रहा था, अब हमारे टुकड़ों पर पल रहा है। इतना पैसा उसे दे चुका हूँ कि वो हमारे लिए कुछ भी कर सकता है।”
“बढियां। सुधीर को ट्राई नहीं किया?”
“नहीं। वो अलग किस्म का जीव है। वैसे तो वो भी आश्रम का भक्त है पर अपने ईमान की कीमत पर नहीं। उसका प्रोफाइल पता कर चुका हूँ।”
“इस काम का शोर्ट कट तरीका और भी है।” मीमी बोली।
“क्या?”
“आश्रम के खास लोगों को पकड़ मंगाते हैं और गर्दन पकड़कर सब कुछ उगलवा लेते हैं।”
“क्या बात है। तुम पर बलिहारी। इतने इंटेलिजेंट जवाब कि तुमसे उम्मीद नहीं थी।”
मीमी हंसी।
“तो हमारी कार्यसूची में सबसे प्रमुख है आश्रम को खंघालना। सारे ख़ास लोगों का प्रोफाइल पता करना।”
“और ये सब काम हमें चुपचाप करना है। हाँ अगर सारे इन्फोरमेशन मिल जाते हैं तो सारे आश्रम में ४-५ बमब्लास्ट को पूरी तरह मटियामेट कर चल देंगे।” चेंग ने आराम से कहा।
“वैसे सबसे बड़े खतरे के बारे में तो तुमने हम लोगों को बताया हीं नहीं।” मीमी ने कहा।
“वो क्या?”
“आश्रम में अल्फांसे भी मौजूद है।”
चेंग लेई हकबकाया।
“इस बारे में तुम्हें कैसे मालूम?”
“भूल गए कि मैं कल इस शहर में पहुंची हूँ। इतना समय काफी था आश्रम की रेकी के लिए। ये तो आश्चर्य कि बात ही होगी कि तुम दोनों एक दूसरे से टकराए नहीं होंगे।”
“ऐसा ही हुआ है। ये तो बेहतर है कि वो मुझे पहचानता नहीं है। पर तुम्हें तो वो पहचानता है। हमें कोशिश करनी है की हम दोनों उसकी लाइन को क्रॉस नहीं करें। केस ख़त्म होने के बाद उसके साथ जो करना है कर दिया जायेगा, उसका स्वर खूंखार हो उठा।”
“खैर वो बाद की बात है। पहले ये बताओ अभी क्या करना है?”
“सबसे पहले दोनों जासूसों को यहाँ से बाहर करना होगा।”
“उसकी चिंता मत करो। हम लोग ऐसी स्थिति पैदा कर देंगे की उन्हें खुद ही ये शहर छोड़कर जाना होगा।” शेरिंग ने विश्वास से कहा।
“और सुधीर की मैं ऐसी हालत कर दूँगी की वो सारा इन्वेस्टीगेशन भूल जायेगा।”
“ये तुम लोग सोचो। मैं चलता हूँ। बहुत सारे काम बाकी हैं अभी। अगर चाहो तो पाकिस्तानी जासूसों से मदद ले सकते हो। कम से कम तीन तो मेरे संपर्क में हैं।”
थोड़ी देर मीटिंग और चलने के बात बर्खास्त हो गयी थी।
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जून ३०, सुबह १२ बजे
डीजीपी का चांदीपुर में देखा जाना एक बड़ी खबर हो सकती थी पर अगले सप्ताह चीन के विदेश मंत्री की होने वाली यात्रा के मद्देनज़र ये एक ज़रूरी घटना थी। एक बड़ी मीटिंग बुलाई गयी थी जिसमें जिले के सभी महत्वपूर्ण अधिकारी शामिल थे। मीटिंग के बाद जब एस पी गौतम को कहा गया कि डी जी पी अकेले में उनसे मुलाक़ात करना चाहते हैं तो उसे अंदाज़ा नहीं था कि उसे विदेश मंत्री की यात्रा से इतर किसी और बात के लिए बुलाया गया है।
“तुम्हारे एस आई सुधीर के खिलाफ बहुत सारी शिकायतें हैं। “
“मैं समझा नहीं सर। सुधीर तो हमारे विभाग का सबसे जहीन ऑफिसर में से एक है। पिछले केस में तो खुद आपने भी उसकी तारीफ़ की थी।”
“मुझे याद है। पर लगता है कि ज्यादा तारीफ़ से उसका दीमाग ख़राब हो गया है। मैंने तुमसे पहले भी कहा था कि आश्रम वाले मामले में एहतियात से काम लिया जाये। पर आजकल तुम्हारा एस आई हर जगह जेम्स बांड बना फिर रहा है। बेहतर होगा कि उसे इस केस से हटाने का आर्डर जारी कर दो।”
“सॉरी सर, पर वो डिपार्टमेंट के लिए काम कर रहा है मेरे लिए नहीं। वो मेरा एस आई नहीं है। और फिर उसनें ऐसा क्या कर दिया?”
“अपने पोस्ट से ज्यादा आगे बढ़कर काम कर रहा है। आश्रम से जुड़े हर किसी का पीछा करता फिर रहा है। दो दिन पहले आश्रम वाले महंत जी का पीछा करते करते काठमांडू पहुँच गया। सुनने में आया है उसने महंत जी को धमकी भी दी है।”
“कहाँ से आपने ऐसा सुना सर?”
“डोंट ट्राई तो ओवरस्मार्ट सचदेवा।”
“आई ऍम नॉट ओवरस्मार्ट बट स्मार्ट एनफ टू नो फ्रॉम वेयर यू आर टॉकिंग। यहाँ पहुँचने पर सबसे पहले उस महंत और को मिलने का टाइम दिया था। क्या ये दो कौड़ी के आश्रमवाले हम पुलिस ऑफिसर से ज्यादा इम्पोर्टेन्ट हो गए? एक लड़का इमानदारी से केस को सोल्व करने के लिए जान प्राण लगा दे रहा है और हमारे डिपार्टमेंट के लोग ही उसकी टांग खींचने में लगे हैं। आखिर क्या खास बात है इस आश्रमवालों में कि एक छोटे से मर्डर केस को हमें इन्वेस्टिगेट नहीं करने दिया जा रहा है? इतनी ऊपर तक पहुँच है इन आश्रमवालों की? क्या हम जानते नहीं कैसे कैसे जरायमपेशा लोग यहाँ आकर छुप कर रहते हैं? वो पाकिस्तानी जासूस एक साल से यहाँ छुपकर रह रहा था और हम लोगों को पता भी नहीं चला। केवल यहीं नहीं किसी भी आश्रम को छान लो २-४ घुसपैठिये ज़रूर मिल जायेंगे। पर हमारे नेता लोग शह देते रहते हैं ऐसे लोगों को और हम लोग ऐसे लोगों के तलवे चाटते रहते हैं।” अपनी बात पूरी करते करते एस पी हांफने लगा था।
“तुम इमोशनल हो रहे हो सचदेवा।”
“सही कहा आपने सर। पर एमोशन के बिना आदमी की हैसियत क्या है सर।”
“मैं तुम्हरी मनः स्थिति समझ रहा हूँ। मैं भी सुधीर के कैलिबर का कायल हूँ। वो तीन चार इने गिने एस आई में से है जिसकी मैं सच में सहायता करना चाहता हूँ, उसे आगे बढ़ते देखना चाहता हूँ। पर इस मामले में ऊपर से मंत्रियों का प्रेशर कुछ ऐसा है कि मैं फिलहाल कुछ नहीं कर सकता। अगर सुधीर को रोका नहीं गया तो हो सकता है कि उसका ट्रान्सफर चौबीस घंटे के अन्दर ऐसे डिपार्टमेंट में कर दिया जाये जहाँ वो बस लोगों को परेड करता फिरे। और ऐसा तुम भी नहीं चाहोगे।”
“ठीक है, मैं देखता हूँ।” एस पी ने भी मानों हथियार डाल दिए थे।
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“तो इसमें टेंशन कि क्या बात है सरस्वती जी। किसी न किसी को तो आना ही था अब चीनी विदेश मंत्री ही सही।”
“तुम मामले कीई गंभीरता नहीं समझ रहे हो अल्फांसे। जिस काम के लिए तुम्हें २ महीने से यहाँ रखा गया था वो दिन बस आने ही वाला है। जहाँ तक हमारी सेटिंग थी उस हिसाब से दोनों मेहमानों के दिल्ली से चीनी राजदूत का आना तय था जैसा कि तुम्हें मैंने बताया भी था। यहाँ तक कि अगर चीन से कोई बड़ा ऑफिसर भी आता तो उसे किडनैप करना तुम्हारे लिए आसान होता। उसकी अनुपस्थिति में ये मीटिंग आचार्य जी के अध्यक्षता में आराम से हो सकती थी।”
“तुम्हारा मामला तुम ही समझो। अगर दोनों तिब्बतियों को मीटिंग ही करनी थी तो दुनिया के किसी भी हिस्से में कर सकते थे। दुनिया में ऐसी कई जगहें हैं जहाँ इन्हें चीन के विरोध का सामना भी नहीं करना पड़ता। या फिर कहीं ऐसा तो नहीं ........।”
अल्फांसे बोलते बोलते चौंका।
सरस्वती मुस्कुराई।
“अब तुम ठीक समझे। दरअसल ये मीटिंग एक तरह से चीन खुद करवा रहा है। शोर्ट कट में कहें तो चीन चाहता है कि सी टी ए करमापा ओग्येन को अपना उत्तराधिकारी घोषित कर दें। जबकि दलाई लामा ऐसा नहीं चाहते। चीन ये मीटिंग धरमशाला में करवाना चाहता था। पर सी टी ए ने इससे इनकार कर दिया क्योंकि ऐसा होने से उस पर मीटिंग को प्रभावित करने का आरोप लगता। उसका कहना था कि अगर ये मीटिंग न्यूट्रल जगह पर हो तो बेहतर होगा। ये संजोग ही था कि मीटिंग का स्थल चांदीपुर में फिक्स हो गया।”
“और फिर संजोग से तुम्हारी मुझसे मुलाक़ात हो गयी और संजोग से मैं यहाँ आने को तैयार हो गया। बेवकूफ मत बनाओ।”
सरस्वती हंसी। “तुम्हें कौन बेवकूफ बना सकता है अल्फांसे। बस यूँ ही कोशिश कर रही थी। सच बात ये है कि बड़ी मेहनत से मैंने ये मीटिंग का लोकेशन धरमशाला से यहाँ फिक्स किया है। और कुछ?”
“बस कुछ बातें अभी भी समझ में नहीं आया। जैसे की ये सारा चक्कर तुम्हारा चलाया हुआ है या आचार्य जी का या फिर किसी और का? और दूसरी बात, तुम्हारे तिब्बत से इतनी मोहब्बत का कारण क्या है?”
“वक़्त आने पर सब कुछ समझ में आ जायेगा। फिलहाल तुम्हें ये सोचना है कि ऐसा क्या किया जाये कि ये चीनी मंत्री यहाँ नहीं पहुंचे। या पहुंचे भी तो मीटिंग का हिस्सा नहीं बने। और बने भी तो जैसा हम चाहते हैं वैसे स्टेटमेंट जारी करे।”
“सोचना हमारा काम है देवी जी। आखिर इस काम की मैं एडवांस फीस ले चुका हूँ। और अल्फांसे जिस काम के पैसे लेता है उसे पूरा करके ही छोड़ता है।”
“तो मैं निश्चिंत रहूँ?”
“बिलकुल। अब अगर चीनी राष्ट्रपति भी पूरी सेना लेकर पहुँच जाये तो भी अल्फांसे उसे अपने क़दमों पर झुककर रहेगा।”
सरस्वती अब कुछ आश्वस्त नज़र आ रही थी। अल्फांसे को इस समय अपने दोस्त विजय कि याद आ रही थी। अगर वो साथ होता तो उसका काम आसन हो जाता। चीनी मंत्री के साथ साथ उसे चेंग पर भी ध्यान देना था। चेंग अकेला ही दस के बराबर था और उम्मीद थी कि वो इस बड़े मिशन पर अकेला नहीं होगा।
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सुधीर हर पल सावधान था। इस वक़्त वो रजनी से मिलकर आ रहा था। रजनी के मामले में उसे पूरा विश्वास था कि सारा कराया धराया महंत का ही था और उस आनंद ने ही उस पर हमला किया था। इस मामले में वो आचार्य जी से भी कई बार मिलने कि कोशिश कर चुका था पर ऐसा नहीं हो पाया था। जैसी खबर उसे मिल रही थी उसके अनुसार आचार्य जी इन दिनों किसी से भी नहीं मिल रहे थे। आज तो सुबह से दो बार उसने आश्रम में प्रवेश कि कोशिश की थी पर उसे सख्ती से यह कहकर मना कर दिया गया था कि आश्रम में कुछ अंदरूनी काम चल रहा है और उसे अन्दर जाने कि इजाज़त नहीं है।
यानी महंत जी की उसने जिस तरह छीछालेदर की थी उसने असर दिखा दिया था। एस पी गौतम ने भी उसे डी जी पी से हुई बातचीत का ब्यौरा दे दिया था। मतलब उसे अब मामले से दूर रहना था। अपने मोटरसाइकल को उसने अपने घर कि तरफ मोड़ दिया।
थोड़ी देर के लिए वो अपने सोचों में यूँ डूब गया था की सामने से आते ट्रक के बारे में उसे देर से मालूम हुआ जो अपना ट्रैक छोड़कर उसके तरफ तेजी से बढ़ी चली आ रही थी।
अब उसके पास सोचने को बहुत कम वक़्त था। बायीं तरफ खेत था पर रोड का लेवल उससे ५-६ फीट ऊँचा था। पर ट्रक से बचने के लिए कोई और रास्ता नहीं था।
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डी जी पी के मोबाइल पर एस पी का नंबर उभरा। उसकी आवाज सुनकर डी जी पी महोदय समझ गए कि वो कितने खतरनाक मूड में है।
“सर जी। सुधीर के एक्सीडेंट को खबर आपको मिल ही गयी होगी। वो जिन्दगी और मौत के बीच झूल रहा है। अगर वो मर गया तो मैं सारे आश्रम को आग लगा दूंगा।”
डी जी पी के कुछ कहने से पहले हीं एस पी ने फोन काट दिया।
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हमेशा की त्तरह शरवन पुरे मार्किट का चक्कर लगाकर घर लौटा। आज किसी ने उसे उधार में दारू नहीं दिया था। इस वक़्त शरवन घर में अकेला था। पिछले बार उस लम्बे बाल वाले आदमी ने छोटे काम के लिए पूरे दस हज़ार सौंपे थे। अब सारे पैसे ख़त्म हो चुके थे। हमेशा की तरह पैसे नहीं होने पर वो सेवाराम के कमरे से पैसे निकल लेता था।
आज पहली बार उसका कमरा लॉक था।
“आज ऐसी क्या बात हो गयी ये कंगाल भी कमरे बंद रखने लगा।” शरवन बुदबुदाया।
‘पर ताले तो शरीफ लोगों से बचने के लिए होते हैं हमारे जैसे लोगों से बचने के लिए नहीं।’ कुछ ही देर में उसने ताला खोल लिया था। कमरे में प्रवेश कर सीधे वो दरवाजे के साइड में पड़े टेबल के तरफ लपका। टेबल के दराज में हमेशा कुछ न कुछ पैसे पड़े रहते थे।
दराज़ में पड़े १०० रुपये के नोट कि तरफ ख़ुशी ख़ुशी उसने हाथ बढाया। तभी उसे ऐसा लगा कि कोई उसे देख रहा है। या ये उसका भरम था? उसने कमरे में चारो तरफ नज़र घुमाई। उसकी नज़र आख़िरकार टेबल पर रखी हुई गुडिया पर पड़ी। दृष्टि उसी पर टिकी रह गयी। ऐसा लगा कि वो उसे आँखें तरेर रही हो। आम गुड़ियों की तरह इसने फ्रॉक नहीं बल्कि साड़ी पहन रखी थी।
गुडिया रखी थी या खड़ी थी वो तय न कर पाया। उसे ऐसा लगा कि ये कोई हाड़ मॉस की जीव हो। ये सेवाराम को गुड़ियों का शौक़ कबसे हो गया?
अनायास ही उसने गुडिया कि तरफ हाथ बढाया।
गुडिया सज्जन मालूम होती थी। उसका छोटा सा हाथ भी शरवन की तरफ बढ़ने लगा।
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