• Hello Friends You can Register on the Forum and by posting you can earn money too.

Thriller राक्षस अलफाँसें सीरीज़

S

StoryPublisher

Guest
Thriller राक्षस अलफाँसें सीरीज़

वो २५ जून की रात थी|

कितने ही अमावस की रात उसकी जिंदगी का हिस्सा बन चुके थे पर आज जब वो अपने दफ्तर से निकला था तो उसे एहसास न था कि आज की रात उसकी जिंदगी की सबसे भयावह रात बन जाने वाली थी| जब वह अपने दफ्तर से जहाँ वह चपरासी के पद पर कार्यरत था रात नौ बजे निकला तो उसे उसके दोस्तों ने घेर लिया था और दोस्तों के साथ खाते पीते दो घंटे से ऊपर हो गए थे और अब रात के लगभग साढ़े ग्यारह होने को थे| ऑफिस के पास ही एक छोटा सा ढाबा था जहाँ उसने दोस्तों के आग्रह पर दो तीन पैग भी चढ़ा लिए थे जिसकी उसे आदत नहीं थी| ऑफिस से घर की दूरी लगभग बारह किलोमीटर की थी जिसे वह साइकिल से तय करता था|

सेवाराम एक साधारण शक्ल ओ सूरत और इकहरे बदन का चौबीस वर्षीय युवक था और उसमें कोई ऐसी खास बात न थी कि वो किसी के विशेष आकर्षण का केंद्र बने या कम से कम उसका ऐसा ही सोचना था| अपने ही ख्यालों में गुम वह धरमशाला मोड़ तक पहुँच चूका था जहाँ से उसके घर की दूरी महज तीन किलोमीटर रह जानी थी और फिलहाल वह जागरण आश्रम नाम के विशाल भवन के पिछली सड़क से गुज़र रहा था जब आश्रम के भीतर से आते तीव्र मंत्रोच्चार ने उसे साइकिल में ब्रेक लगाने पर मजबूर कर दिया| आश्रम के पिछले हिस्से में एक विशाल पार्क था जो शाम सात बजे ही बंद हो जाया करता था| पार्क में अन्दर आने के लिए सामने वाले फाटक से तो रास्ता था ही, साथ ही इस पिछली तरफ भी एक फाटक था जो ऊँची ऊँची किलेनुमा दीवारों से घिरा था जिसे शाम सात बजे अन्दर की तरफ से बंद कर दिया जाता था| बंद करने का काम केयरटेक मंगल का था जो आश्रम का ही सेवादार था जिसके रहने का कमरा इस पार्क के पिछली तरफ बना था| पार्क के बीचो-बीच एक ऊँचा चबूतरा था जिसपर शिव जी की एक आदमकद मूर्ति थी जिसके दर्शन किये बिना सेवाराम ऑफिस की ओर प्रस्थान नहीं करता था| शाम सात बजे तक बंद हो जाने वाला फाटक आज पूरी तरह खुला था और शिव जी की विशाल मूर्ति पर सामने जलती रौशनी दृष्टिगोचर हो रही थी| पिछले तीन वर्षों में पहली बार उसने ये पिछला फाटक जो धर्मशाला दरवाजा के नाम से जाना जाता था को रात के वक़्त उसने खुला देखा था| साइकिल को वहीँ साइड में खड़ी कर वो भीतर प्रविष्ट हो गया|

...............

वो कोई भैरवी प्रतीत हो रही थी जो हवनकुंड के सामने पद्मासन लगाये बठी थी| सफ़ेद सा, गले में रुद्राक्ष की चंद मालाएं, माथे पर नासिका तक पहुँचता हुआ सुर्ख सिन्दूर| युवती के लम्बे बाल खुले हुए थे और हलके हवा के झोंके के सहारे कभी कभी वो भी झूम उठते थे| सामने जलती हुए हवनकुंड में आग की लपटें बहती हुई हवाओं के सहारे झूम रही थी| युवती को मानों आसपास के वातावरण की कोई चिंता न थी या शायद वह निश्चिन्त थी कि कोई इस माहौल में कदम रखने की जुर्रत न करेगा|

उसके मुख से मध्यम स्वर में मन्त्रों की मानों श्रंखला बह रही थी जिसे पहचानने में सेवाराम असमर्थ था|

शायद उसे फाटक के खुले होने का एहसास न था जिससे होकर जाने किस अज्ञात भावना से वशीभूत होकर सेवाराम वही पास की झाड़ियों में छुपा युवती को निहार रहा था|

भैरवी के विषय में उसने सुन रखा था| इस इलाके में किसी भैरवी की कहानी कुछ महीनों से प्रचलित थी और कुछ लोगों ने शमशान में कुछ अजीब सी क्रियाएं करते देख रखा था।

क्या ये वही भैरवी थी?

सेवाराम अपने मोबाइल में सबकुछ रिकॉर्ड करता जा रहा था! पार्क में लगे पास में एक दो लैंप उसके रिकॉर्डिंग में सहायक थे।

कल उसके पास भी सबको कहने को कुछ स्पेशल होगा! रोमांचक! अद्भुत!

पर अभी असली रोमांच तो बाकी ही था!

सामने एक और शख्स का प्रवेश हुआ जिसे देखकर बमुश्किल सेवाराम ने अपनी चीख निकलने से रोका था।

आने वाले दिनों में भी उसके मानस पटल पर वो आकृति उभर उभर कर डराती रही थी!

ध्यान मोबाइल के स्क्रीन पर रहने के कारण वो तय नहीं कर सका था कि वो आकृति किधर से प्रकट हुई थी!

दायें से या बायें से!

या फिर हवनकुंड से एकाएक तीव्र गति से निकलते धुएं से!

लगभग सारा चबूतरा एकाएक धुएं से भर उठा था!

धुआं जब छटा तो सामने वो खड़ा था जिसकी लम्बाई साढ़े छः फुट से का प्रतीत नहीं हो रही थी।

दोनों बाँहों में सोने के से प्रतीत होते कड़े थे।

शरीर पर एक लंगोट के सिवा वस्त्र के नाम पर कुछ और नहीं था।

रंग काला था। सुर्ख काला, मानों सारे बदन पर स्याही पोत दी गयी हो!

चहरे पर कड़क मूंछें! सर पर चमचमाता हुआ दो सींगों वाला मुकुट।

कुल मिलाकर सेवाराम को कुछ ऐसा प्रतीत हुआ मानों रामलीला में पार्ट करनेवाला कोई राक्षस हो!

या धार्मिक सीरियल का कोई राक्षसी अवतार!

ये उसकी हिम्मत ही थी कि उसने कांपते हाथों से मोबाइल पकड़कर रिकॉर्डिंग करना जारी रखा। अंतर बस इतना था की अब उसकी दृष्टि मोबाइल के स्क्रीन पर न होकर सीधे मंच पर थी।

हाँ, वो मंच ही तो था जिसपर ये दो कलाकार मौजूद थे, बीच में हवनकुंड, दाईं और वो युवती और बाईं और वो राक्षस!

हाँ वो राक्षस ही तो था! कम से कम इंसान तो नहीं था।

पर उस युवती पर मानों कोई विशेष प्रभाव नहीं पड़ा था!

“तू यहाँ भी आ गया।” वो मानों गुर्राई।

“तू कहीं भी चली जा मुझे वहां पायेगीI तुझे मैं यूँ पथभ्रष्ट होने नहीं दे सकताI” राक्षस के मुंह से आवाज निकली मानों एक साथ कई भेडिये गुर्रा उठे हों!

“तेरा शुभचिंतक हूँ मैंI”

“मैं कई बार कह चुकी हूँ तुझसे कि मेरी चिंता करने की तुझे कोई आवश्यकता नहीं। हमारे रास्ते अलग हो चुके हैं।”

“मूर्खा! जिस रास्ते पर तू चल चुकी है वहां तुझे भटकन के सिवाय कुछ न मिलेगा चाहे तू जीवन भर इन मन्त्रों का पाठ करती रहे। भटका रहा है तुझे ये तेरा गुरु। बर्षों से जानता हूँ तेरे इस गुरु को। आश्रम में नाम पर पैसे कमाने का धंधा बना रखा है इसने। एक न एक दिन इसके सारे ढकोसले को दुनिया के सामने ला कर रख दूंगा।”

भैरवी हंसी, “ढकोसला तो तूने मचा रखा है भैरव। मेरे गुरु के सामने तेरी हीनता ही तुझे तकलीफ पहुंचती है इसलिए बार बार पहुँच जाता है मुझे खोजते खोजते।”

“किसी भ्रम में मत रह लड़की। किसी में इतनी हिम्मत नहीं कि मुझे तकलीफ पहुंचा सके। जानता हूँ तुझमे गुण था, कि एक सफल तंत्रिका बन सके पर उस कमबख्त ने तुझे अपने धंधे में फंसा लिया। आजा मेरे साथ, तेरे सारे भूलों को माफ़ कर दूंगा मैं।”

“चला जा यहाँ से, तेरी नग्न साधना में मेरी कोई रूचि नहीं वर्ना एक ही झटके में सारी दुनिया के आगे तुझे नंगा कर दूंगी। तू और तेरा पागल वृष्टि खाने वाला गुरु...।”

राक्षस को भड़काने के लिए इतने शब्द ज़रुरत से ज्यादा थे। हवनकुंड को एक ही झटके में लांघता हुआ युवती पर छलांग लगा चुका था।

पर युवती भी सावधान थी। उसे राक्षस से कुछ ऐसी ही उम्मीद थी। फुर्ती से खुद को बचाते हुए पास में पड़ी कटार सामने कर चुकी थी।

कटार राक्षस के दाएं पैर को चीरते हुए निकली। राक्षस को इस प्रहार की उम्मीद नहीं थी। वो लहराते हुए गिर पड़ा। युवती को अंदाज़ा था कि अगर राक्षस संभल गया तो फिर वो उसे नहीं छोड़ेगा! उसने फुर्ती से भागना चाहा।

पर राक्षस बहुत ज़ल्दी संभल चुका था। एक झटके में राक्षस दोनों हाथों से युवती को अपने सर से ऊपर उठा चुका था।

“ये ले तेरी साधना और तू, दोनों जा हवनकुंड में।” कहते हुए उसने युवती को हवनकुंड में फ़ेंक दिया।

तेज़ अग्नि और साथ में प्रस्तर का बना हवनकुंड!

…………………………………

सब्र अपनी सारी सीमाए पार कर चुकी थी।

वो भी सेवाराम जैसा साधारण सा इंसान!

सेवाराम बहुत कुछ बर्दाश्त कर चुका था। हलक से तेज़ चीख निकलने से वो खुद को अब रोक नहीं सका।

जाने क्या गति हुई उस वनिता की।

पर अब सेवाराम को अपनी चिंता थी।

राक्षस के सामने वो मानों अनावृत हो चुका था!

राक्षस अब ऊँचे चबूतरे से उतर चुका था और उस निरीह युवक को निहार रहा था जिसका नाम सेवाराम था।

आंखें थी या दो जलती हुई चट्टानें!

उस के सामने वो खुद को बौना महसूस कर रहा था।

कब वो पलटकर भागा कब उसने फाटक को पार किया और कब वो अपने घर पहुंचा, बाद में पूछे जाने पर भी उसे कुछ ध्यान नहीं था।

क्या उस राक्षस ने उसका पीछा किया था?

उस राक्षस से बचकर कैसे निकल गया?

कई सारे सवाल थे जिसका उत्तर वो देने में असमर्थ था। दो दिनों तक वो बुखार में तपता रहा था।

हाँ अगर उसके पास वो रिकॉर्डिंग नहीं रहती तो उसके बात पर कोई विश्वास नहीं करने वाला था। अगले दिन सुबह उसकी हालत ऐसी नहीं थी कि वो किसी से इसका ज़िक्र कर सके न ही वो कोई जिम्मेदार शहरी था। पर उसके रूम में साथ रहने वाले साथी जगन ने एक जिम्मेदार शहरी का फ़र्ज़ निभाया।

सुबह-सुबह मोबाइल रिकॉर्डिंग के साथ दोनों पुलिस के सामने हाजरी बजा रहे थे।

जून २६ प्रातः

ऐसा नहीं था कि अल्फांसे जुर्म की दुनिया से ऊब चुका था या पिछले गुनाहों के डर ने उसे यहाँ छुपने पर मजबूर कर दिया था। किस माई के लाल में ऐसा दम था जो उसे छुपने पर मजबूर कर सके!

जुर्म की दुनिया में उसका बड़ा नाम था। छोटे-बड़े राजा प्रजा तक उसके असामी रह चुके थे। पर काम वो अपने उसूल पर करता था। एक जगह ठहरना उसके उसूलों में नहीं था।

पर सच्चाई यही थी कि यहाँ आये उसे तीन महीने से ऊपर हो चुके थे और यहाँ का माहौल उसे रास आने लगा था।

कौन यकीन करता कि नेपाल की सीमा से कुछ दूर भारत की चौहद्दी में स्थित चांदीपुर नामक कसबे में स्थित जागरण आश्रम के साधना कक्ष में श्रधालुओं के मध्य प्रतिदिन सुबह-सुबह ध्यान करता शख्स अंतर्राष्ट्रीय शातिर अल्फांसे है।

अब तक वह चैन से अपना समय यहाँ बीता रहा था और कोई ऐसी बात नहीं हुई थी कि उसके राज़ के खुलने का शक पैदा कर सके।

पर आज सुबह ...

आश्रम का दैनिक क्रियाकलाप सुबह ६ बजे शुरू होता था और अल्फांसे का सुबह ५ बजे। सुबह ५ बजे उठकर टहलते हुए पिछले हिस्से में मौजूद पार्क के अंदरूनी दरवाजे तक पहुँचता जहाँ पार्क की रखवाली करने वाले केयरटेकर के क्वार्टर तक पहुँचता और उसके साथ चाय पीकर अन्दर पार्क का एक चक्कर लगता और साढ़े पांच बजते-बजते साधना कक्ष तक पहुँच जाता। आश्रम में रहने वाले हर किसी को वहाँ पहुंचना तय होता था सिवाय चंद सिक्यूरिटी गार्ड्स के।

पर आज चाय पीने की नौबत नहीं आयी।

अन्दर केयरटेकर की क्षत-विक्षत नंग धडंग लाश पड़ी थी!

मानों किसी जानवर ने उसे भंभोर डाला हो! जगह जगह से चमड़े नुचे पड़े थे।

बहुत दिनों बाद अल्फांसे का वास्ता किसी लाश से पड़ा था।

और ये उसके लिए अच्छा संकेत नहीं था। पुनः उसका वास्ता पुलिस से पड़ने वाला था जो वह बिलकुल नहीं चाहता था।

पर यह तो शुरुआत भर थी। एक और लाश पार्क में पुलिस का इंतज़ार कर रही थी।

--------
 
करीब नौ बजे एक पुलिस जिप्सी आश्रम के मुख्य द्वार के सामने रुकी। लोकल थाने से पुलिस टीम पहले ही दल बदल के साथ पहुँचकर खाना पूर्ति में लग चुकी थी। कुछ पत्रकार पहले ही वहां पहुच चुके थे और लोकल टीवी चैनल आरोही की टीम पहले ही वहां पहुँच कर दरवाजे पर जमी थी पर किसी को अब तक अन्दर जाने नहीं दिया गया था। आश्रम के रहनुमाओं में लोकल एम एल ए भी शामिल था और उसका भी शुमार आचार्य जी के भक्तों में किया जाता था। आचार्य जी जिसका पूरा नाम ब्रह्मदेव आचार्य बताया जाता था पर आश्रम वासियों के लिए वे आचार्य जी ही थे। ज़ाहिर है, आश्रम वासियों के लिए उनका दर्ज़ा भगवान के आसपास ही था। जीप से उतरने वाला शख्स कोई पैंतालीस साल का था। पुलिस में उसका दर्ज़ा एस पी का था और उसे उसके आकाओं द्वारा इस हिदायत के साथ भेजा गया था की वो थोडा नरमी से काम ले।

जिसकी एस पी गौतम सचदेवा को आदत नहीं थी! उसे जैसी खबर मिली थी उसके मुताबिक पहली लाश साढ़े पांच बजे बरामद हो चुकी थी जबकि पुलिस को सात बजे खबर की गयी।

दूसरी लाश मिलने के बाद।

जबकि एस आई आश्रम का पहचान वाला था।

उसे बाबाओं से सख्त चिढ थी। कोई और मौका होता तो वो दो-चार को को अन्दर कर चुका होता। पर पिछले दो घंटे में ऊपर से तीन-तीन बार फ़ोन आ चुके थे।

अन्दर उसे ए एस आई दिवाकर बारी-बारी से दोनों लाशों तक ले गया।

पहली लाश आश्रम के केयरटेकर दयाल सिंह की थी जिसे अल्फांसे ने बरामद किया था।

दूसरी लाश एक अधेड़ स्त्री की थी जो आश्रम के पिछले हिस्से में चबूतरे के नीचे पायी गयी थी।

दोनों लाश देखने के बाद उसने लाश को भेजने का आदेश दे दिया।

.............

“लाश किसने बरामद की।”

“आश्रम का ही एक श्रद्धालू है, नाम उसका...।”

“मुझसे किताबी भाषा में बात मत करो।”

“सॉरी सर। यही रहने वाला एक बंदा है। नाम तो नरेन्द्र बताता है पर शक्ल से आधा अँगरेज़ मालूम होता है। केयरटेकर की लाश उसी ने बरामद की। उसी ने सिक्यूरिटी गार्ड्स को इकठ्ठा किया जिनमें से एक ने पहली बार उस औरत की लाश को देखा।”

साहब अच्छे मूड में मालूम होता था वर्ना अभी तक उसने एस आई सुधीर सिन्हा की बंद बजा दी होती। आदतन।

सुधीर ने यहाँ पहुंचकर होमवर्क अच्छी तरह कर लिया था। आश्रम के चीफ सिक्यूरिटी ऑफिसर से दोस्ताना सम्बन्ध होने के कारण यहाँ होने वाले छोटे-बड़े आयोजनों में वो आता ही रहता था जिस कारण उसे यहाँ के बारे में अच्छी जानकारी थी।

“जी बाहर के लोगों का यहाँ आना सुबह नौ बजे शुरू होता है और शाम की आरती के बाद सात बजे आगे और पीछे के दोनों फाटक बाहर के लोगों के लिए बंद कर दिए जाते हैं। दिन में कुछ अतिरिक्त गार्ड्स भी रहते है पर शाम में फाटक बंद होने के पहले वो भी बाहर चले जाते हैं।”

“तो चाभी रात में गार्ड के पास ही रहती है?”

“नो सर। आगे और पीछे दोनों फाटक के गार्ड्स अलग अलग हैं जो उसे लॉक करने के बाद चाभी महंत जी को सौंप देते हैं। महंत जी वो चाभी अपने डिप्टी आनंद को सौंप देते हैं या अपने पास रखते हैं।”

“अब ये महंत जी कौन हैं?”

“इनका दर्ज़ा यहाँ चीफ सिक्यूरिटी ऑफिसर का है। यहाँ आने जाने वाले सभी लोगों का रिकॉर्ड इन्हीं के पास रहता है। जो भी यहाँ आता है उसकी बाकायदा मुख्य दरवाजे जिसे यहाँ के भाषा में श्री प्रभु द्वार भी कहते हैं के पास स्थित कमरे में अस्थाई आई डी कार्ड बनाने का इंतज़ाम है।”

“एक आश्रम के लिए इतना इंतज़ाम!”

“इतना ही नहीं जिन्हें यहाँ लम्बे समय तक के लिए रहना होता है उनकी तो आधार कार्ड, पासपोर्ट की भी जांच होती है। चूँकि यहाँ विदेशी लोग भी आते रहते हैं इसलिए यहाँ जांच प्रक्रिया में कोताही नहीं बरती जाती।”

“मुख्य दरवाजे की डुप्लीकेट चाभी...।”

“मैंने महंत जी से दरयाफ्त किया था। उनके अनुसार दोनों फाटक की एक और चाभी है जो आचार्य जी के पास रहती है। तीसरी चाभी की कोई गुंजाइश नहीं क्योंकि इसके ताले और चाभी में चिप फिट किया गया है और बनाने वाली कंपनी ने इसकी गारंटी दी है। अगर ताले या चाभी से थोड़ी भी छेड़ छाड की जाती है तो इससे लिंक्ड मोबाइल में मेसेज ट्रान्सफर हो जायेगा।”

“हूँ। तो इसका मतलब ये है कि दरवाजा महंत या आचार्य जी ने खोला होगा। या फिर ये भी हो सकता है कि दरवाजा शाम के वक़्त लॉक ही नहीं किया गया!”

“जी सर। सेवाराम ने भी इसकी तस्कीद की है की रात के वक़्त दरवाजा खुला पाया।” गुप्ता परेशानी भरे स्वर में बोला, “और फिर सुबह होने से पहले किसी ने दरवाजा लॉक कर दिया।”

“या फिर तुम्हारे आचार्य जी या महंत जी ने।”

“आचार्य जी और महंत जी इस आश्रम के संस्थापक हैं। वो ऐसा क्यों करेंगे?” एस आई थोडा आवेश में बोला।

“देख रहा हूँ कि तुम इन दोनों के प्रति पूर्वाग्रह से ग्रस्त हो। अच्छा ये बताओ कि यहाँ और कितने लोग रहते हैं।”

“महंत जी के अनुसार कुल ६१ लोग। आचार्य जी, महंत जी, आचार्य जी के दो सेवादार, चार रसोई में काम करने वाले, २ गेट की परसहित ६ परमानेंट केयरटेकर और स्थाई और अस्थाई रूप से रहने वाले ४७ लोग। इनमे से ३० लोग स्थाई रूप से यहाँ रहते हैं जो आचार्य जी के परमानेंट चेले हैं। और १७ वे गेस्ट हैं जो अस्थाई रूप से यहाँ हैं। इन्हीं १७ में से एक नरेन्द्र भी है। रही बात सरस्वती जी की, तो उनका दर्ज़ा आश्रम में नंबर दो बताया जाता है, वो तीन दिन से आश्रम में नहीं है। एक और शख्स है आनंद जो महंत का डिप्टी है ।”

“कहाँ गयी है वो?”

“एक फंक्शन के सिलसिले में दिल्ली में है। दरअसल आचार्य जी की ओर से सारे फंक्शन वही अटेंड करती है। आचार्य जी शायद ही किसी फंक्शन को अटेंड करते हैं।”

“कभी कभी आचार्य जी गहरे ध्यान में उतारते हैं तो घंटो होश में नहीं आते। उस अवस्था में सरस्वती जी ही आश्रम सम्बन्धी निर्णय लेती हैं। आश्रम के साधना कक्ष के पिछले हिस्से में उनके गुरुदेव की समाधी है। वो ही उनके ध्यान करने की जगह है।” एस आई पूरे भाव में डूबकर आचार्य कथा बांचता जा रहा था।

एस पी ने सर हिलाया। एस आई के होमवर्क से वो संतुष्ट मालूम होता था। आश्रम में बहुत सारे सीमेंट के बेंच बने थे और उन्हीं में से एक पर एस पी बैठा हुआ एस आई से इनफार्मेशन ग्रहण कर रहा था। एस आई को बैठने कहने की उसने कोई जहमत नहीं उठाई थी। जहाँ वो बैठा था उसके पीछे छोटा सा पार्क था और फिर उसके पीछे बेंचों की दूसरी लाइन थी। उसी में से एक पर २०-२२ वर्ष का एक युवक ध्यान की मुद्रा में बैठा था जो इस आश्रम के रहने वालों के लिए आम बात थी। ये अलग बात थी की वो कोई आश्रमवासी नहीं था और यहाँ बैठने का उसका एकमात्र उद्देश्य उन दोनों की बातचीत सुनना था और इतनी दूर बैठने के बाद भी एक एक शब्द उसके कानों में पड़ रहा था।

“और ये बाकी १७ लोग कौन होते हैं?” एस पी ने अगला प्रश्न दागा। स्वभानुसार अगला कदम उठाने से पहले वो सारी इनफार्मेशन कलेक्ट कर लेना चाहता था।

“ये लोग सामान्यतया स्वास्थ्य लाभ या योग वगैरह के उद्देश्य से यहाँ रह रहे हैं। ये लोग दूर दूर से यहाँ आकर रह रहे हैं। इनमें से भी तकरीबन ८ लोग विदेशी पासपोर्ट होल्डर हैं।”

“बेवकूफ लोग। पता नहीं इतनी दूर से क्या चुतियापा सिखने आते हैं। अच्छा धंधा बना रखा है इन बाबाओं ने।” एस पी बुदबुदाया।

एस आई कसमसाया। आचार्य जी का वो भक्त तो नहीं था और उसे उनकी महानता पर कोई संदेह नहीं था।

“और वो ३० चेले?”

“वो ३० लोग आश्रम के बाकी काम भी सँभालते हैं। उन्ही में से एक आनंद भी है जिसके जिम्मे ऑफिसियल लिखा-पढ़ी वाला काम है।”

“आचार्य जी ने कई लोगों की जिंदगी बदलने में मदद की है। रोज़ सैकड़ों लोगों के कदम पड़ते हैं यहाँ। उत्सव के दौरान हजारों की भीड़ होती है।” एस आई बुदबुदाया।

“अगर ऐसे ख्याल है तुम्हारे यहाँ के बारे में तो कर ली तुमने इन्वेस्टीगेशन।” एस पी गुर्राते हुए खड़ा हो गया था। “एक रात में दो क़त्ल हो चुके हैं यहाँ और ज़ाहिर हैं इसमें किसी अंदरवाले का ही हाथ है। एक एक शख्स यहाँ का शक के घेरे में है। अभी तक उस औरत की शिनाख्त करने में भी तुम असफल रहे हो। अगर भक्त बनकर खोजबीन करोगे तो कुछ पल्ले नहीं पड़ेगा। अगर सेवाराम वाला विडियो हमारे सामने नहीं आता तो हम लोग बहुत कुछ अँधेरे में रह जाते।”

“जी।” गुप्ता बात आगे बढाकर अपने सीनियर को नाखुश नहीं करना चाहता था।

सचदेवा मुस्कुराया। वो जानता था की आदमी कितना भी बुद्धिमान क्यों न हो जब मामला पर्सनल धर्मगुरु का हो वहां तर्क कोई मायने नहीं रखते। ऐसे लोगों को समझाना उसके क्या किसी के भी बस की बात नहीं थी।

“खैर गुप्ता, I am very much satisfied with your homework. बहुत अच्छी जानकारी इकठ्ठा की है तुमने बहुत कम समय में। I really appreciate your effort.”

गुप्ता के लिए ये राहत की बात थी कि वो अपने सीनियर को संतुष्ट करने में सफल रहा था।

“जी सर, सेवाराम के रिकॉर्डिंग की हमने पार्क में लगे इकलौते एक्टिव सी सी टीवी फूटेज से मैच भी खाते हैं।”

“पार्क में सी सी टीवी कैमरे भी लगे थे?” एस पी चौंका।

“पार्क के चारों कोने में चार सीसी टीवी कैमरे लगे हैं पर वारदात के वक़्त केवल आश्रम के तरफ वाला एक कैमरा ही काम कर रहा था और पॉवर कट के कारण केवल दो टेम्पररी लाइट ही काम कर रहे थे। फिर भी कैमरे में जो कल रात के थोड़े बहुत दृश्य उभरे है वो सेवाराम के मोबाइल के रिकार्डिंग की तस्कीद करते हैं।”

“और इस बारे में क्या कहना है तुम्हारे इस महंत जी का, कि लाश बरामद होने के दो घंटे बाद पुलिस को खबर की गयी? ताकि घटनास्थल पर छेड़छाड़ की जा सके?”

“आश्रम में दो ही जगह लैंड लाइन है और इन लोगों के मुताबिक़ उनमे टेम्पररी खराबी थी।”

“क्यों मोबाइल से कॉल करने में क्या मुश्किल थी?”

“आश्रम में मोबाइल की इजाज़त नहीं है सर।” गुप्ता ने संक्षिप्त उत्तर दिया।”

“क्या!” एस पी चौंका।

“यही नहीं, आश्रम में जैमर भी लगे हैं ताकि कोई छुपाकर भी मोबाइल का इस्तेमाल नहीं कर सके।”

एस पी ने अपना मोबाइल निकाल कर देखा। सच में उसके मोबाइल का टावर गायब था।

“आचार्य जी का कहना है कि मोबाइल टावर से निकलने वाली किरणे मष्तिष्क पर प्रतिकूल प्रभाव डालती है।”

एस पी हंसा।

“फिर यहाँ के लोग जिंदा कैसे रह लेते हैं।”

गुप्ता कुछ सख्त जवाब देना चाहता था पर कुछ सोंचकर वह चुप रह गया। आखिर उसके सामने उसका बॉस मौजूद था।

“तो फिर आचार्य जी हम लोगों को कब दर्शन देंगें?”

“क्यों?”

“क्यों से क्या मतलब है तुम्हारा?” एस पी भड़का, “दोनों हत्या उन्हीं के छत्र छाया में हुई है। तो बिना उनसे पूछताछ के कैसे काम चलेगा?”

“मैं पता करता हूँ। अगर महंतजी से बात करना चाहे तो...”

“अगर ज़रुरत होगी तो बताऊंगा। अभी ये तस्कीद करना बाकी है की वो औरत कौन थी और उस नकाबपोश के वेश में कौन था?” कुछ ठहरकर एस पी बोला।

“नकाबपोश? कौन नकाबपोश?”

“तुम्हें क्या लगता है कि वो हत्यारा जिसे सेवाराम नकाबपोश राक्षस कहता है अपने असली वेश में था? ऐसे चेहरे वाले लोग पहले किस्से कहानियों में होते थे और अब सीरियल में पाए जाते हैं। मुझे यकीन है की इसमें अन्दर के लोग ही इन्वोल्व है। इस नरेन्द्र से मेरे मिलने का इंतज़ाम करो।”

“ओके सर। मैं अभी दिवाकर को भेजता हूँ उसे लाने को।” गुप्ता समझ गया था की ज़रूर उसके बॉस के दिमाग में कुछ चल रहा था। बातचीत समाप्त हो गयी।

उधर बैठे हुए लड़के ने झटके से मुस्कुराते हुए आंखें खोल ली। “वाह बेट्टा! बैठे बैठे इतनी सारी इनफार्मेशन मिल गयी। बोहनी तो अच्छी हुई है। उम्मीद है बिना मेहनत के इसी तरह काम चलता रहेगा। अब चलूँ इस महंत बाबू से मिलने।”

------------------
 
“आनंद!”

“कहिये मैडमजी। उम्मीद है आपका दिल्ली का प्रवास अच्छा रहा होगा।”

“क्या रिपोर्ट है?”

“किस बात की?”

“अब ये भी बताना पड़ेगा?” सरस्वती ने कहा।

आनंद मुस्कुराया। वह अपने ऑफिस के कमरे में अपने कंप्यूटर के सामने आराम से बैठा था। उसके सामने एक नहीं बल्कि तीन-तीन विशाल मॉनिटर मौजूद थे। सामने वाले स्क्रीन पर सरस्वती का चेहरा मौजूद था जिससे वह बातचीत कर रहा था। बाकी दोनों स्क्रीन पर आश्रम के विभिन्न हिस्सों के दृश्य उभर रहे थे।

“अगर आप बतायेंगी नहीं मैडमजी तो आनंद ये कैसे बताएगा कि उसे बताना क्या है।” आनंद सहज भाव से बोला।

सरस्वती का पारा गर्म होने लगा। आश्रम में पहली बार ऐसी स्थिति उत्पन्न हुई थी और वह वहां से दूर थी। अभी उसकी फ्लाइट एक घंटे बाद थी। वह हैरान थी कि महंतजी और आनंद के होते ऐसा कैसे हो गया। फिर भी दोनों पर उसे पूरा विश्वास था।

और फिर आनंद! एक वही था जो उसे पल पल की खबर दे सकता था। खुद को संयत करते हुए अपने लैपटॉप की स्क्रीन पर नज़र गड़ाए बोली,

“दयाल की लाश मिलने के बाद क्या-क्या हुआ? एक एक बात तफसील से मुझे बताओ।”

आनंद टेपरिकॉर्डर की भांति शुरू हो गया।

“सुबह पांच बजकर पंद्रह मिनट पर नरेन्द्र दयाल के कमरे तक पहुंचा। कमरे का दरवाजा खुला था और अन्दर दयाल की लाश पड़ी थी। बाहर निकलकर चिल्लाते हुए उसने आश्रम के लोगों को इकठ्ठा किया। दस मिनट के अन्दर वहां आश्रम के अधिकतर लोग वहां जमा हो चुके थे।”

‘और महंतजी?”

“खबर मिलते ही वो भी वहां पहुँच गए थे।”

“मतलब साढ़े पांच बजे तक वहां सभी मौजूद थे?”

“बस दो लोगों को छोड़कर। मैं वहां छह बजे पहुंचा था जबकि आपके गुरुदेव सात बजे वहां पहुंचे।”

“तब तक दूसरी लाश का पता भी चल चुका था?”

“उसकी खबर तो पांच बजकर पैंतीस मिनट पर ही लग चुकी थी। राठी की नज़र सबसे पहले उस औरत की लाश पर पड़ी थी।”

“दोनों बॉडी की जो फोटो तुमने भेजी थी उसे मैंने देखा था। शायद बहुत यातना दी गयी थी दयाल को।”

“ऐसा कहा जा सकता है।”

“ठीक है। और पुलिस कितने बजे पहुंची?”

“सात बजकर बीस मिनट पर। गुरुदेव के आदेश के बाद ही महंतजी ने पुलिस को खबर किया।”

“और वो सेवाराम?”

“वो पुलिस के पुलिस स्टेशन से निकलने के पहले ही करीब सवा छह बजे वहां पहुंचकर अपने रिकॉर्डिंग और रामकहानी सुना चुका था।”

“वो रिकॉर्डिंग देखी थी मैंने। पर एक बात मेरे समझ में नहीं आयी। सेवाराम वाली रिकॉर्डिंग तुम तक कैसे पहुंची।”

“आनंद का काम करने का अपना तरीका है मैडमजी।” आनंद ने मुस्कुराते हुए कहा।

“अच्छा ये चाभी का क्या किस्सा है। धर्मशाला गेट खुला कैसे रह गया।”

“इस बारे में कुछ कहना मेरे लिए संभव नहीं है मैडम जी। रात नौ बजे महंत जी ने चाभी मेरे हवाले की थी। तब से चाभी मेरे पास ही थी।”

“तो फिर क्या हुआ रात में?”

“अनुमान लगाना आप लोगों का काम है मैडम जी।”

“हूँ। अच्छा आनंद क्या तुम वहां के सीसीटीवी फुटेज की लाइव स्ट्रीमिंग मुझे फॉरवर्ड कर सकते हो।”

“बिलकुल नहीं मैडमजी। ये आश्रम के प्रोटोकाल के खिलाफ है। यहाँ के सीसीटीवी फुटेज को ऑनलाइन नहीं किया जा सकता।”

“इमरजेंसी में नियम बदले जा सकते हैं आनंद। और फिर तुम्हारे पास तो नेट कनेक्शन मौजूद है हीं। मुझे लगता है कि आश्रम पर बहुत बड़ा खतरा मंडरा रहा है।”

“फिर भी नहीं मैडमजी। और मेरे पास का नेट कनेक्शन प्रोटोकॉल के अन्दर आता है।”

“और अगर मैं आदेश दूं तो?”

“तो भी नहीं मैडमजी। किसी कीमत पर भी नहीं।” आनंद ने सहज स्वर में कहा।

“लगता है तुम्हें अपनी नौकरी प्यारी नहीं आनंद बेटे।” सरस्वती गुर्राई।

“मुझे अपनी नौकरी प्यारी है इसलिए ऐसा कह रहा हूँ।”

“ठीक है आनंद बेटे। वहां पहुंचकर तुम्हारी खबर लेती हूँ।”

“ओके मैडमजी। आपका इंतज़ार रहेगा।” आनंद का स्वर अभी भी सहज था।

सरस्वती ने लैपटॉप ऑफ कर दिया। उसके होंठो पर मुस्कराहट थी। वह जानती थी कि आनंद सही था। आश्रम के प्रोटोकाल के हिसाब से आश्रम में इन्टरनेट या मोबाइल सेवा पर पूर्णतया बैन था।

बस आनंद इसका अपवाद था। आश्रम के लिए इतना महत्वपूर्ण था वह।

------------------------

पार्क में बहुत सारे बेंच लगे थे। कहीं कहीं पर लकड़ी के गोल मेज भी लगे थे और उसके चारों तरफ लकड़ी की ही कुर्सियां पड़ी थी। अपने सामने पड़े एक कुर्सी पर एस पी ने नरेन्द्र को बैठने का संकेत किया। दुसरी और एस पी पहले से ही बैठा था।

नरेन्द्र उर्फ़ अल्फांसे इस वक़्त आश्रम के परंपरागत नीले ड्रेस में न होकर एक साधारण सा सफ़ेद कुरता पजामा पहने था। एस पी भी अपनी वर्दी में न होकर सिविल ड्रेस में ही आश्रम आया था।

“देखो नरेन्द्र”, अपने स्वर को मुलायम रखने की कोशिश करता हुआ बोला, मैं यहाँ का एस पी होता हूँ। गुप्ता ने तो तुमसे पूछताछ कर ही ली होगी और तुमने उसका जवाब दे ही दिया होगा। अगर कुछ और बताना चाहते हो तो बता सकते हो।”

जाने क्यों अल्फांसे को शुरू में ही ये आदमी पसंद नहीं आया था। सुबह से ही लोगों को जवाब देते देते वो तंग आ चुका था। अगर वो एक आश्रमवासी के रोल में नहीं होता तो कब का वो इन लोगों को खट्टा मीठा बता चुका होता। वो अल्फांसे था जिसके नाम से ही बड़े बड़े लोगों के पैंट गीले हो जाया करते थे। पर अपना मिशन पूरा हो जाने तक वो अपने आप पर कण्ट्रोल रखना चाहता था।

प्रत्यक्षतः वो बोला- “मुझसे जितना हो सकता था मैंने बता दिया है साहब।”

“हूँ। तुम्हारा असली नाम यही है?”

“अगर असली नाम बता दिया तो यहीं बैठे बैठे बेहोश हो जायेगा ये।”

“असली नकली जो है यही नाम है साहब।”

“दरअसल मुझे पूरा यकीन है कि इस आश्रम में रहने वाले ज़्यादातर लोग कोई कांड करके यहाँ आये होंगे और नकली पासपोर्ट बनाकर यहाँ रह रहे होंगे। इसलिए ऐसा पूछा। वरना कौन घरबार छोड़कर रहता है ऐसे।”

‘औरों का तो पता नहीं पर मैं तो बिल्कुल ऐसा ही हूँ।’ अल्फांसे मुस्कुराया।

“केयरटेकर से रोज़ मिलना जुलना था तुम्हारा। क्या क्या बातें होती थी उससे?”

“बस यूँ ही अपना दुःख सुख बांटा करता था।”

“रिकॉर्डिंग देखी होगी तुमने?”

“बहुत सारी रिकॉर्डिंग देखी है मैंने अपनी लाइफ में, कौन सी रिकॉर्डिंग की बात कर रहे है आप?” अब अल्फांसे भी थोडा मज़ा लेना चाहता था।

एस पी ने घूर कर उसे देखा। ओवर स्मार्ट बनने की कोशिश कर रहा है ये। लगता है किसी पुलिसिये से पाला नहीं पड़ा है अब तक!

बेचारे को क्या मालूम था कि जिंदगी भर उसका पाला ऐसे ही लोगों से पड़ता रहा है।

“मैं उस रिकॉर्डिंग की बात कर रहा हूँ जो गुप्ता ने तुम्हें दिखाया होगा।”

“ओह वो रिकॉर्डिंग! अल्फांसे यूँ बोला मानों कोई पुरानी बात अभी अभी याद आयी हो।” हाँ देखा था न।

“क्या ख्याल है उस रिकॉर्डिंग के बारे में?”

“क्या बताऊँ साहब दिमाग के सारे के सारे तार हिल गए। ऐसे भी कोई किसी को मारता है क्या भला। वो भी एक स्त्री को। अच्छा हुआ की मैं वहां नहीं था वरना...।”

“अगर तुम वहां होते तो क्या कर लेते?” एसपी को इस नौजवान के तेवर पसंद नहीं आ रहे थे।

“उस भैंसे को उठाकर किसी नाले में फ़ेंक देता।” अल्फांसे आराम से बोला। सच्चाई तो ये थी कि रिकॉर्डिंग में जिस तरह उसने दानव को उस स्त्री को उठाकर पटकते हुए देखा था वो अचंभित रह गया था। स्त्री को तो उसने ऐसे उठाये था मानों फूलों से भरी टोकरी को उठा रहा हो। असीम शक्ति का मालिक रहा होगा वो। वह सोच रहा था कि कहीं वो दानव उसके पल्ले पड़ गया तो किस तरह उसका मुकाबला करेगा।

“एस पी ने अभी भी अपना धैर्य बनाये रखा था,” उस हत्यारे को ध्यान से देखा तुमने?

“नहीं साहब। उसे देखने का मौका कहाँ मिला!”

“मेरा मतलब रिकॉर्डिंग से है। ये देखो।” अपना मोबाइल अल्फांसे की तरफ बढ़ाते हुए बोला, ये उस हत्यारे का क्लोज अप है।

“ये उस समय के क्लोज अप का स्क्रीन शॉट है जब हत्यारे ने सेवाराम की तरफ देखा था।”

अल्फांसे ने ध्यान से देखा। वो दानव इस तस्वीर में काफी साफ़ नज़र आ रहा था।

“क्या ख्याल है इस तस्वीर के बारे में।”

“अच्छा स्क्रीन शॉट है।”

“अब इस फोटो को सामने रखते हुए आश्रम में रहने वाले सभी लोगों की तस्वीर एक एक कर दिमाग में लाओ और फिर सोचो की अगर उन लोगों को अगर इस हत्यारे की तरह नकाब पहना दिया जाये तो सबसे ज्यादा मैच किससे करेगा!”

“किसी से नहीं!” इसकी लम्बाई छः फूट से थोडा कम नहीं और आश्रम में इस लम्बाई और डीलडोल का कोई और शख्स नहीं..। “कहते कहते अल्फांसे को समझ में आने लगा था कि ये एस पी किस और जाना चाहता है।” अब वो संभल गया था।

“अब अपनी सूरत और डीलडौल से ज़रा इसका मिलान करो। उम्मीद है अपनी सूरत से तो तुम अनजान नहीं होंगे। लम्बाई तो माशाल्लाह ६ फुट से क्या कम होगी। क्या कहते हो इस बारे में?”

“मुझे कुछ कहने की ज़रूरत ही क्या है? बहुत अच्छा बोल रहे हो। और फिर आपकी लम्बाई भी छ: फुट से क्या कम होगी।” अलफांसे लापरवाही से बोला।

एस पी हड़बड़ाया। सामने वाला शख्स अलग ही तेवर का मालूम होता था।

लगता है गुप्ता ने तेरी अच्छी तरह से क्लास नहीं ली है बेटे। मैं इस इलाके का एस पी होता हूँ।

“तेरे बोलने से तो कौड़ी के गुंडे डर जाते होंगे मैं नहीं डरने वाला।” अल्फांसे के स्वर में कड़वाहट आ गयी थी।

“तरीके से बात कर लौंडे। अगर मैं चाहूं तो एक मिनट में शक की बिना पर तुझे अन्दर कर सकता हूँ। IPC के इतने धारे लगाऊंगा की बिना किसी जुर्म के भी तू जिंदगी भर जेल में सड़ता रहेगा। तू किसी एस आई से नहीं यहाँ के एस पी से बात कर रहा है।” एस पी ताव खा गया था उसके करियर में शायद ही किसी ने इस अंदाज़ में बात की थी।

“वही तो मैं सोच रहा हूँ की तुझे किस भडवे ने एस पी बना दिया।” अल्फांसे खड़ा हो चुका था।

बात लिमिट के बहार हो चुकी थी। एस पी खड़ा होते हुए उस पर झपटा।

एस पी ने उसका कॉलर पकड़कर झटका देते हुए एक तरफ पटकने की कोशिश की थी। पर अगले ही पल क्या हुआ वो एस पी समझ नहीं पाया। अल्फांसे ने अपने बदन को इस अंदाज़ में झटका दिया कि एस पी अगले ही पल उछलते हुए लगभग पांच फीट दूर जा गिरा था।

अल्फांसे लगभग टहलते हुए बेफिक्र अंदाज़ में उसके पास पहुंचा और उसे उठाते हुए खड़ा किया, दोनों हाथों से उसके कपडे ठीक किये और मुस्कुराते हुए कहा- “मेरा नाम नरेन्द्र नहीं है। अगर असली नाम कह दिया न तो यही पखाना उतर आएगा। मुझसे जितना दूर रहो अच्छा है।” वो अंतररास्ट्रीय शातिर पलटकर दूर निकल गया था।

जाने उसकी आवाज में क्या था कि एस पी डर गया था। बहुत देर तक वो यूँ ही खड़ा रहा। कही उसे बेईज्ज़त होते किसी ने देख तो नहीं लिया था?

फिर वह बुदबुदाया,

“अभी मैं सावधान नहीं था इसलिए तेरी चल गयी। अगर तेरे हाथ पैर नहीं तोड़े तो फिर मैं यहाँ का एस पी नहीं।

........................................
 
“पायं लागू महंत बाबु।” कहते हुए लड़का लगभग कमरे में अकेले बैठे शख्स के पैरों पर लगभग गिर ही पड़ा।

महंत जी का ऑफिस आश्रम के मुख्य फाटक में प्रवेश के बाद दाईं ओर स्थित था और हर आने वाले को इस कमरे के दरवाजे में प्रविष्ट होना होता था जो बाकायदा काफी चौड़ा था और जिसमे चेकिंग अलार्म का सिस्टम लगा होता था ठीक एअरपोर्ट में लगे चेकिंग गेट की तरह। यहाँ पर एक गार्ड की तैनाती रहती थी और हर आने वाले शख्स का इसमें प्रवेश करना ज़रूरी होता था। प्रवेश के बाद दाईं और एक दरवाजा था जिससे स्टाफ के लिए अन्दर जाने का रास्ता था। दरवाजे के बाद दाईं ओर ही तीन खिड़की थी जो काउंटर का काम करता था और जिसमें फोटो खींचकर अस्थाई पीले रंग का कार्ड बनाने की व्यवस्था थी जिसे लेकर भक्तजन अन्दर प्रवेश कर सकते थे। ये कार्ड उसी दिन के लिए वैध होते थे। जो यहाँ अन्दर आश्रम में कमरा बुक करना चाहते थे उसके लिए महंत जी से मिलना अनिवार्य था जो खास लाल कार्ड इशू करते थे। इसके लिए बाकायदा प्रवेश दरवाजे पर ही वेकंसी की पोजीशन एक स्क्रीन पर मेंशन रहती थी। इसकी व्यवस्था ऑनलाइन भी थी और इस कारण वेकंसी लगभग हमेशा नील ही रहती थी। ऑनलाइन बुकिंग करने वालों को भी महंत जी से लाल कार्ड प्राप्त करना होता था जिसकी फीस क्रेडिट कार्ड के द्वारा ही होती थी। जिनके पास लाल कार्ड रहता था वे उस दिखाकर दरवाजे के सामने लगे बेरिअर के नीचे से प्रवेश कर सकते थे।

ये भी इतना आसान नहीं था फाटक पर खड़ा गार्ड उसे वही पर लगे मशीन में ऊपर बने स्लॉट में उसे डालता था और कार्ड परली तरफ से निकल जाता था। इस तरह उसकी इंट्री हो जाती थी!

बहार निकलने के लिए कार्ड को एक दुसरे मशीन में डालना होता था जो दोनों फाटक के पास मौजूद थी। पिछला फाटक केवल निकास के लिए ही प्रयुक्त होता था।

महंत जी से मिलने के लिए रिसेप्शनिस्ट से परमिशन लेना जरूरी होता था जो अन्दर से कन्फर्मेशन मिलने पर ही किसी को अन्दर जाने देती थी। पर युवक अपने मोबाइल में व्यस्त रिसेप्शनिस्ट से नज़र बचाकर अन्दर पहुँच गया था और इसके लिए वो खुद को दाद दे रहा था।

कमरे के मध्य में एक विशाल टेबल था जिसके पीछे एक एग्जीक्यूटिव चेअर थी और सामने तीन चेअर लगी थी। पर आज वो कमरे के एक कोने में लगे सोफे पर बैठे थे। महंत जी के नाम से जाना जाने वाला शख्स झक्कास सफ़ेद रंग का कुरता पहना था और निचे लाल रंग की धोती थी जो कुछ अटपटा मालूम होता था। कद कोई छः इंच और इकहरे बदन का स्वामी। उम्र पचास के आसपास चेहरे पर उदासी सी छाई थी जो शायद कल रात के घटनाक्रम का परिणाम थी।

महंत जी ने नज़र उठाकर सामने खड़े युवक को देखा। लम्बाई में वो लगभग उसके बराबर ही था पर उम्र में कोई २० से ज्यादा का मालूम नहीं होता था। शरीर पर एक गंजीनुमा टीशर्ट और नीचे एक पतलून। घुंघराले बाल ललाट पर बिखरे थे।

“हुलिया तो आपने देख लिया, नाम कन्हैया है वो भी बिना राधा के।” युवक ने अपना परिचय दिया। एकाएक सामने देखकर भी महंत जी को नहीं चौंकता देख कन्हैया को थोड़ी मायूसी ज़रूर हुई थी।

“बैठिये कन्हैया जी।”

युवक जिसका नाम कन्हैया था दुसरे सोफे पर बैठ गया।

“कहिये मुझसे आपको क्या सहायता चाहिए?”

“कुछ जानकारी चाहिए।”

“हूँ।”

“पहली यह कि रिसेप्शनिस्ट ने मुझे रोका क्यूँ नहीं?”

“उसे आपके बारे में ऐसा निर्देश था। पुलिस टीम के साथ आपको भी प्रवेश करने का आदेश दे दिया गया था।” महंत जी ने संक्षिप्त उत्तर दिया।

कन्हैय्या ने सर हिलाया। कम नहीं है ये! उसे लगा था कि छोरी मोबाइल में बिजी है।

“बेसिक जानकारी तो आपको एस पी और एस आई के बातचीत से मिल गयी होगी। और कुछ जानकारी चाहिए तो आप पूछ सकते हैं।”

इस बार अपने हैरत को कन्हैया छुपा नहीं पाया। बुड्ढा तो टू मच है!

“आप तो सर्वज्ञ हैं चाचा!”

“मुझे भी कुछ ऐसा ही भ्रम था कल रात तक।”

“कोई गल नहीं, गिरते हैं शहसवार ही मैदान में।”

महंत जी ने मुस्कुराने की कोशिश की।

“वैसे कुछ अंदाज़ा तो बना होगा कल के बारे में।”

“अभी कुछ कहना मुश्किल है।”

“वैसे हत्यारा आया किधर से होगा?”

“दो ही दरवाजे हैं जो हमारे आश्रम को बहार से कनेक्ट करता है। प्रभुद्वार और धरमशाला द्वार। वो भी शाम सात बजे बंद कर दिए जाते हैं।”

“और चाभी आनंद को सौंप दी जाती है।”

“हमेशा नहीं। जब मुझे बाहर जाना होता है या फिर मैं बीमार वगैरह होता हूँ तो चाभी आनंद को सौंप देता हूँ। कल चाभी मेरे पास हीं थी।”

“वैसे ये आनंद भाईजान हैं कैसे आदमी? कहीं उसी ने तो कोई गड़बड़ नहीं की?”

“इसकी कोई सम्भावना नहीं है। वो ऐसा नहीं कर सकता।”

“क्यों नहीं कर सकता? हाथ नहीं है उसके?”

“उससे मिलने के बाद आप समझ जायेंगे।”

“ओह।”

“तो चाभी आपके पास हीं थी?”

“हाँ, अभी भी चाभी मेरे पास है। केयरटेकर को सौंपने की नौबत नहीं आयी।”

“देख सकता हूँ चाभी?”

महंत जी ने कोई हुज्ज़त नहीं की। चाभी कमरे में मौजूद एक दराज से निकालकर कन्हैय्या के हवाले की।

“ये एक आम चाभी से अलग छः इंच लम्बी बेलनाकार चाभी थी जो आगे से नुकीली थी और साइज़ के हिसाब से ज्यादा वजनदार था। देखने में साधारण सा पीतल का कोई स्क्रू ड्राईवर लगता था।”

“हूं, ये तो साधारण सा स्क्रू ड्राईवर है,” कन्हैय्या ने चाभी का मुआएना करते हुए कहा, “इससे तो ताला क्या ताले का कोई स्क्रू भी नहीं खुलेगा।”

“यही चाभी है सर।” महंत जी ने मुस्कुराते हुए कहा।

“लगी शर्त?”

“आपका मतलब मैं समझा। चलिए आपको मै इसका इस्तेमाल दिखा देता हूँ।”

“बढ़िया। साथ ही आनंद से भी मिला देना।”

महंत जी ने उसे घूरकर देखा। कन्हैय्या दूसरी और देख रहा था। महंत जी अभी तक समझ नहीं पा रहे थे की इस आदमी को इतना महत्व देकर क्यों भेजा गया है। वो कन्हैय्या को लेकर आनंद के निवास की ओर बढ़ चले।

--------------
 
दोनों आनंद से मिलकर पिछले फाटक की तरफ बढ़ रहे थे।

“तो आनंद आपके शक के घेरे में नहीं है न?” महंत जी ने मुस्कुराते हुए पूछा।

“नहीं जी बिलकुल नहीं। वो तो मासूम बच्चे की तरह है। वो तो बिना आदेश के मक्खी भी नहीं मार सकता जी। वैसे और क्या क्या काम करते हैं आनंद साहब?”

“बस यूँ समझ लीजिये कि उसके यहाँ होने से मेरे सारे काम आसान हो जाते हैं।”

--------------

दिल्ली से चांदीपुर न जाकर उसे पटना आना पड़ा था।

सरस्वती बिहार सरकार के प्रधान सचिव के विशेष निमंत्रण पर पटना में थी। दरअसल ये निमंत्रण न होकर आदेश हीं था और उसे आनन फानन तलब कर लिया गया था। तय समय साढ़े नौ बजे पर वो उसके दफ्तर पहुँच चुकी थी और इस समय प्रधान सचिव के सामने मौजूद थी।

सामान्य दिनों में प्रधान सचिव राजीव वर्मा ११ बजे से पहले दफ्तर पहुँचने की गलती नहीं करता था आज ९ बजे से हीं दफ्तर में मौजूद था। उसने पुनः घडी पर नज़र डाली। आज २९ तारीख थी यानि अभी ७ दिन शेष थे। जाहिर है कि ये दस दिन उसके लिए सामान्य नहीं रहने वाला था। बोधगया में दो विशिष्ट मेहमानों के आने कि सूचना उसे पहले हीं मिल चुकी थी। पर जो खबर उसे कल रात मिली उसने उसे खास तौर पर चौंकाया था। वो समझने में असमर्थ था कि चांदीपुर का एक छोटा सा आश्रम इतना महत्वपूर्ण क्यों बन गया था।

“जाने माजरा क्या हैं?” वो बुदबुदाया।

“जी?” सरस्वती बोली।

“मेरा मतलब है कि इतने आनन फानन में आपको बुलाने के लिए माफ़ी चाहता हूँ।” राजीव वर्मा ने संयम से कहा।

“जी शुक्रिया। आप तो अपनी ड्यूटी निभा रहे हैं।”

“आपकी लिखी हुई किताब पढ़ी ‘a brief history of religion in exile’

“थैंक्स।”

“लगता है तिब्बत से बहुत गहरा प्यार है आपको।”

“हर उस आदमी को होना चाहिए जिसे स्वतंत्रता से प्यार है।”

“इस मुहब्बत कि कोई खास वजह तो नहीं?”

“मोहब्बत कि कोई वजह नहीं होती सर। मोहब्बत पहले होती है वजह बाद में पैदा हो जाती है।”

“कहीं यही वजह तो नहीं कि तिब्बत से जुड़े दो खास लोगों को आपकी ओर से निमंत्रण दिया गया है।”

“हम लोग किसी को निमंत्रण नहीं देते। वैसे आमंत्रण सभी के लिए है। और अगर कोई आना चाहे तो उसके लिए हमारे आश्रम के दरवाजे खुले होते है।”

“चाहे उससे हमारे सरकार के लिए संकट पैदा हो जाये।”

“हमारा आश्रम इतना बड़ा नहीं कि वहाँ किसी के आने से सियासी संकट पैदा हो। अगर ऐसी स्थिति आती भी है तो आप उन्हें आने से रोक सकते हैं।”

“यह तो सरकार निर्णय लेगी कि किसे आना है या नहीं।”

“सी टी ए यानि सेंट्रल तिबेतन एडमिनिस्ट्रेशन से जुड़े हर शख्स के मूवमेंट पर सरकार की नज़र होती है। और अगर मामला करमापा से जुड़ा हो तो मामला ख़ास हो हीं जाता है। चीन करमापा से सम्बन्ध रखने वाले हर मामले पर अपनी नज़र रखता है। ऐसी स्थिति में दो दो शमरपाओं का एक साथ यहाँ आना चीन के साथ संबंधों में खलबली पैदा कर सकता है।”

“पर सर”, सरस्वती मुस्कुराई। “पिछले शमरपा कि मृत्यु के बाद अभी तक किसी नए शमरपा कि घोषना नहीं हुई है। बस ये उम्मीद बनी हुई है कि इन दोनों में से हीं कोई बन सकता है।”

“पर अगर इन दोनों में से मिलकर अगर किसी एक करमापा के पक्ष में घोषणा कर दी तो मामला गंभीर हो सकता है। पिछले शरमापा ओग्येंन के पक्ष में नहीं थे। ऐसी उम्मीद इसलिए व्यक्त कि जा रही है क्योंकि पिछले सप्ताह दोनों कलिम्पोंग में थे।”

“और कलिम्पोंग में उग्येन त्रिनले के प्रतिद्वंदी का निवास भी है।” सरस्वती बोलकर चुप हो गयी। प्रधान सचिव ने काफी जानकारी इकट्ठी कि थी।

“देखिये मैडम। इस डिपार्टमेंट में आये हुए मुझे केवल तीन महीने हुए हैं। यहाँ से पहले मैं सेंटर में विदेश मंत्रालय में अतिरिक्त सचिव था। चीन के सम्बन्ध में मुझे विस्त्तृत जानकारी है। उग्येन त्रिनले के दो प्रतिद्वन्धी और भी हैं जिन्हें करमापा कि उपाधि मिली हुई है पर बाकी दोनों के मुकाबले उग्येन महाशय कि फैन फौलोविंग बहुत ज्यादा है। चीन कि रूचि भी इन्हीं में है। वो भी चीन से थोड़ी हमदर्दी रखते हैं। दलाई लामा के जाने के बाद चीन उग्येन महोदय को हीं सी टी ए के प्रमुख के रूप में प्रोजेक्ट करेगा। ऐसी स्थिति में दोनों शमरपा का एक साथ मिलना चीन के लिए तिब्बत मामले में। बहुत बड़े सेटबैक का कारण हो सकता है।”

“पर दोनों शमरपा में से एक तो उग्येन के समर्थक बताये जाते हैं।”

“कहा तो ऐसा हीं जाता है। पर उग्येन महाशय एक वर्ष से भारत से दूर अमेरिका में हैं। उस पर से उनकी ओर से कुछ ऐसे स्टेटमेंट जारी किये गए हैं जिससे लगता है कि उनकी रूचि सी टी ए में नहीं है। चीन तो ज़रूर उनके संपर्क में होगा।”

“हूँ। पर इस मामले में हम लोग यानी जागरण आश्रम क्या कर सकता है?”

“बस इतना कि उन दोनों के तरफ से ऐसा स्टेटमेंट जारी नहीं किया जाये जिससे चीन के साथ अनावश्यक तनाव पैदा हो।”

“ऐसा बिहार सरकार का चाहना है?”

“नहीं मैडम। ऐसे मामलों में राज्य सरकार का क्या दखल हो सकता है? मैसेज तो दिल्ली से आया है हम बस फॉरवर्ड कर रहे हैं।”

“पर केंद्र सरकार ऐसी उम्मीद क्यों कर रही है? अगर किसी गड़बड़ी की आशंका है तो वो दोनों मेहमानों को बिहार में प्रवेश से रोक सकती हैं।”

“अब ऐसा करना मुमकिन नहीं। अगर ऐसा करते हैं तो पब्लिक में गलत सन्देश जायेगा कि भारत चीन से डरता है। विशेषकर ऐसी स्थिति में जब चीन कि तरफ से अधिकारिक सन्देश आया है कि उसके विदेश मंत्री जो संजोगवश सपरिवार उस समय भारत कि प्राइवेट यात्रा पर रहेंगे, दोनों शमरपाओं के साथ भारत के महान गुरु ब्रह्मदेव आचार्य के साथ मीटिंग का आनंद लेंगे ताकि चीन के साथ भारत के सम्बन्ध प्रगाढ़ हो।”

सरस्वती सन्न रह गयी।

कुछ देर बाद वो बोली।

“पर विदेश मंत्री के एक छोटे से शहर में आने से सुरक्षा का मसला हो सकता है।”

“वो अपने साथ रेगुलर ८ लोगों के विशेष सुरक्षा दल के साथ पहुंचेगा। साथ में पत्रकारों का विशेष दल तो रहेगा हीं। छुपे रूप में कुछ जासूस वगैरह भी हो सकते हैं।”

“और हमारे लोग?”

“हमारे भी जवान होंगे। और आपको यहाँ बुला भेजने का एक कारण ये भी था कि आपके आश्रम के गिने चुने लोग हीं वहां मौजूद रहेंगे। जिन्हें आप वहां रखना चाहती है उनके डिटेल्स कल तक हमें भेज दें। कुछ दिन पहले हुई घटना का प्रभाव इस मीटिंग पर नहीं पड़ना चाहिए।”

सरस्वती का दिमाग तेजी से दौड़ रहा था। अल्फांसे का काम अब ज्यादा मुश्किल होने वाला था।

“और अगली बात, जहाँ पर ये मीटिंग्स होने वाली है उस जगह के डिटेल्स हमें दे दें। उसकी अभी से रेकी करवानी होगी ताकि सुरक्षा का कोई मसला पैदा न हो। अगर आपको कुछ और डिटेल जानना हो तो अभी पूछ सकती हैं या फिर बाद में मुझे मेरे पर्सनल नंबर पर कॉल कर सकती हैं।”

“एक बात और, चीनी विदेश मंत्री अकेले पहुंचेंगे या फिर परिवार के साथ?”

“अकेले ही। परिवार को वे दिल्ली में ही छोड़कर यहाँ के लिए निकलेंगे। इन फैक्ट वो दिल्ली पहुँच भी चुके हैं।”

सरस्वती के लिए मामला अब इतना आसान नहीं रहा था।

‘ये चपटे नाक वाली लड़की जाने क्या चाहती है!’ उसके जाने के बाद वर्माजी बुदबुदाये।

.........................
 
वो एक छोटा सा लोहे का दरवाजा था जिससे होकर पार्क में प्रवेश किया जाता था। जिन्हें आश्रम के क्रियाकलापों में रूचि नहीं थी वो यहीं अपना वक़्त गुज़रते थे। शहर में कोई और तरीके का पार्क नहीं होने के कारण स्थानीय लोग भी यहाँ आना पसंद करते थे और ये ओग आश्रम के मुख्या हिस्से को बाईपास कर सीधे पार्क की तरफ बढ़ जाते थे। पार्क में प्रवेश के लिए हाल ही में ५० रूपये का टिकट लगा दिया गया था जिससे वहां आवाजाही कुछ कम हुई थी। इसके प्रवेशद्वार के दाएँ ओर केयरटेकर का कमरा था जिसमें बाथरूम और किचन अटैच्ड थे और वहीँ पर एक टिकट काउंटर बना दिया गया था।

दोनों लाश को उठाकर पोस्टमार्टम के लिए भेज दिया गया था। यहाँ से धरमशाला फाटक तक पहुँचने में तकरीबन पांच मिनट का वक़्त लगता था। अन्दर अभी भी ४-५ पुलिस तैनात थे साथ ही चबूतरे के पास जो कल रात अद्भुत घटनाक्रम का गवाह बना था, एस पी और एस आई खड़े थे और एक शख्स से पूछताछ कर रहे थे।

दोनों उसी चबूतरे की और बढ़ चले।

शिष्टाचार के आदान प्रदान के बाद महंत जी ने कहा- “इन्हें दिल्ली से स्वास्थय मंत्री जी के रिकमेन्डेशन पर भेजा गया है।”

“क्यों? इसमें स्वास्थ्य मंत्रालय का क्या काम?” एस पी ने घूरा।

“दरअसल जिनकी हत्या हुई है वो स्वास्थय मंत्री जी की कजन होती हैं।”

कन्हैय्या को छोड़ सभी लोग चौंके। पास में खड़ा शख्स जो यकीनन अल्फांसे था विशेष रूप से चौंका था। तो मामला राजनितिक भी होता जा रहा था। एक और व्यक्ति पर उसका ध्यान बार-बार जा रहा था जो कुछ लगभग एक महीने पहले ही आश्रम में आया था जिसका परिचय सभी आश्रम वासी के सामने आचार्य जी ने तिब्बती स्कॉलर ताशी के रूप में कराया था। वो तिब्बत से आकर धर्मशाला के तिब्बती सेटलमेंट में करीब छः महीने रहा था और इसके बाद दलाई लामा का पत्र लेकर यहाँ आया था और भारतीय ध्यान पद्धति सीखना चाहता था। वो एक खुशमिजाज़ शख्स था और कुछ ही दिनों में अपने व्यवहार और तिब्बत के जादुई किस्सों से सबका मन मोह लिया था। अब भी वो पास में ही तीन युवा सन्यासियों को तिब्बती गुरु मिलारेपा की कहानी सुनाने में व्यस्त था।

“इस तरह मिलारेपा ने अपने चाचा से बदला ले लिया। सोचो एक नन्ही सी जान कितना अकेला पर बड़ा जादूगर!”

“एक युवा सन्यासी जिसकी उम्र २५ वर्ष रही होगी ने अविश्वास से कहा- “अरे नहीं, कोई तूफ़ान कैसे पैदा कर सकता है?”

“नहीं सच! हमारी किताबों में लिखा है। उसने यूँ हाथ हिलाया और हर तरफ आंधी तूफ़ान! उसके चाचा का मकान उड़ा ले आया!” फिर आंखें सिकोड़ कर कहा, “दुष्ट था उसका चाचा दुष्ट।”

“पर चच्चा बदला लेना तो बुरी बात है न? ये तो बैड मैनर्स है।”

“सही कहा बेटा इसलिए तो बाद में उसे अफ़सोस हुआ।” एक अनजानी आवाज को सुनकर ताशी ने सर उठाकर देखा तो कन्हैया को सामने खड़ा पाया।

“कौन हो बेटा तुम्हें यहाँ पहले तो नहीं देखा।”

“ऐसा नहीं कहो चाचा, इतनी बार हम लोग मिल चुके हैं। पिछली बार जब हम धर्मशाला गए थे तो बहुत सारी कहानियां सुनी थी आपसे। आप तो भूल ही गए।”

“ताशी के माथे पर बल पड़ गए? वो याद करने की कोशिश करने लगा।”

“युवा सन्यासी अभी भी उसकी कहानियों में उलझा था। आपको जादूगरी आती है ताशी?”

पर ताशी अभी भी याद करने की कोशिश में लगा था और कन्हैय्या आगे बढ़ चुका था। उधर एस पी सचदेवा महंत जी पर भड़क रहा था कि मरने वाली की बाबत उससे हकीक़त क्यों छुपाई गयी और महंत जी उसे बताने में लगे थे की लोकल एस पी महोदय जो भारत के स्वास्थय राज्य मंत्री भी होते थे और उनके विशेष अनुरोध पर खबर को अनावश्यक तूल देने से बचाया जा रहा था।

उधर आश्रम के दोनों फाटकों पर पत्रकारों और टीवी चैनल्स वालों के साथ-साथ स्थानीय वासियों की भीड़ बढती जा रही थी। और पिछले दरवाजे से कोलाहाल का स्वर आसानी से सुना जा सकता था जिधर कन्हैय्या और महंत जी के साथ साथ एस पी महोदय भी बढ़ते जा रहे थे। आधे घंटे में ये खबर सबसे बड़ी खबर बननी थी क्योंकि एक टीवी चैनल के हाथ सेवाराम वाला विडियो लग गया था और वो उसे टेलीकास्ट करने को तैयार थे।

“चलो ताशी बाहर से चाय पीकर आते हैं।” बर्मन नामक एक व्यक्ति जो ताशी का हम उम्र प्रतीत होता था, बोला। ताशी को अकसर बर्मन के साथ ही देखा जाता था।

-------------
 
“उधर महंत जी चाभी से ताले को बंद करने की असफल कोशिश में लगे थे। माथे पर पसीने की बूँद उभर आयी थी। यकीनन ये मौसम का असर नहीं था।

कुछ देर बाद कन्हैय्या धीरे से महंत जी के कान में फुसफुसाया, “मैंने कहा था न चच्चा, इस चाभी से दरवाजा खुल बंद नहीं होने वाला।”

महंत जी ने पलटकर कन्हैय्या को देखा।

“क्या हुआ महंत जी?” एस पी ने पूछा। “चाभी काम नहीं कर रही?”

“कुछ नहीं एस पी साहब।” जवाब कन्हैय्या ने दिया, “महंत जी बेध्यानी में गलत चाभी लेकर चले आये हैं।” चलिए महंत जी असली चाभी लेकर आते हैं।”

“असली चाभी मेरे पास है।” कन्हैय्या ने महंत जी के कान में बम सा फोड़ा।

यही वो वक़्त था जब ऐसा महसूस हुआ मानों धरती हिल रही हो। कन्हैय्या अपने पैरों के नीचे के कम्पन को महसूस कर सकता था।

“ये क्या हो रहा है चच्चा? इसने तो हमें हिलाकर रख दिया।”

“ये आचार्य जी का बुलावा है। चलिए साधना कक्ष की तरफ चलते हैं।”

कन्हैय्या और एस पी गौतम के समझ में कुछ नहीं आया था फिर भी वो महंत जी के पीछे पीछे चल पड़े।

कुछ ही देर में सभी साधना कक्ष के सामने थे।

वो आनंद का कमरा था और वो हमेशा की तरह कंप्यूटर पर नज़र गडाए बैठा था।

कंप्यूटर के स्क्रीन पर शहर का नक्शा नज़र आ रहा था और कुछ बिंदु उस पर उभर रहे थे।

तो इस तरह यह विडियो मोबाइल नंबर आठ पर ट्रान्सफर हो गया। वो खुद से ही बात कर रहा था।

पहला सेवाराम

दूसरा शरवन

तीसरा सुधीर गुप्ता

चौथा महंत रामदास

पांचवां महामहिम ब्रह्मदेव आचार्य

छठा ताशी

सातवाँ गौतम सचदेवा

आठवां राधा

नौवा कन्हैय्या

दसवा दिवाकर।

हुंह इतने साधारण क्वालिटी के विडियो के लिए इतने मोबाइल को क्यों गन्दा किया जा रहा है!

सबके मोबाइल से इसे डिलीट कर देता हूँ। मज़ा आएगा!

आनंद के एक क्लिक से सारे मोबाइल से वो विडियो डिलीट हो चुका था!

आनंद ने ताली बजाई।

तभी पीछे दरवाजे पर खटका हुआ।

“आइये महंत चाचा।” आनंद बिना देखे ही बोला।

“सारे सीसीटीवी कैमरे सही काम कर रहे हैं न?”

“जी।”

“और रात में जो कैमरे काम नहीं कर रहे थे?”

“उन्हें भी सही कर दिया गया है।”

“कुछ पता चला कि वो कैसे ख़राब हुए थे?”

“जी वो दयाल का हीं काम था।”

“मेरा भी ऐसा हीं ख्याल था। और मोबाइल जैमर सही काम कर रहा है न। उससे तो छेड़-छाड़ नहीं की गयी?”

“वह संभव नहीं है।”

--------------

वो एक विशाल कक्ष था जिसमे बायीं ओर ज़मीन से लगभग तीन फीट ऊँचा एक मंच था और उसके सामने दो सौ के करीब आसन बिछे थे। लगभग ४०-४५ लोग आसन पर पद्मासन में बैठ चुके थे। सभी के शरीर पर नील रंग का चोगानुमा लिबास था जो कमरे में अजीब सी आभा प्रस्तुत कर रहा था। मौजूद लोगों में सात महिलाएं भी थी पर उनके वस्त्र बाकी लोगों जैसा ही थे। शायद ये इस आश्रम का ड्रेस कोड था। कमरे में हल्का सा प्रकाश था। प्रवेश द्वार पर एक सन्यासी मौजूद था जिसने द्वितीय पंक्ति में खाली कुछ आसन की ओर इशारा किया। एस आई गुप्ता को भय था की एस पी कहीं कोई बखेड़ा न करे पर वो भी बिना कोई हुज्ज़त किये एक आसन पर बैठ गया। शायद केंद्रीय मंत्री के इन्वोल्वेमेंट का प्रभाव उस पर पड़ा था।

कम से कम गुप्ता को ऐसा ही लगा था।

मंच पर आचार्य जी विराजमान थे और उनकी दायीं जंघा के नीचे एक पखावज नुमा एक वाद्य यन्त्र था जो लम्बाई में कुछ ज्यादा ही था। आचार्य जी के लम्बे हाथ आराम से उसके दोनों छोरों पर पहुँच रहे थे और हथेलियों की थाप पूरे लय के साथ पखावज के दोनों छोरों पर पड़ रही थी, जो कमरे में विचित्र सा कम्पन प्रस्तुत कर रही थी।

अल्फांसे अगली पंक्ति में बैठा था और उसे ऐसा लग रहा था मानों थाप सीधे शरीर पर पड़ रहा हो!

मस्तिष्क पर, हाथ पर पैरों पर और सबसे विशेष कर अपने नाभि केंद्र पर!

उसे ऐसा लग रहा था मानों नाभि सक्रिय होकर उसके शरीर से बाहर निकल जाना चाहता हो।

रीढ़ की हड्डी बिना किसी प्रयास के बिलकुल सीधी अवस्था में मनों अकड़ गयी हो।

फिर उसे ऐसा लगा मानों सारा तनाव उसके शरीर से बहार निकल रहा हो।

उधर कन्हैय्या का पूरा ध्यान मंच पर बैठे आचार्य जी पर था।

वो किसी साधू टाइप के व्यक्ति का शरीर न होकर एक सुदृढ़ योगी का शरीर था। क़द छह फुट से थोडा भी कम नहीं रहा होगा, गेंहुआ रंग और चेहरे पर अमित आभा से दमक रहा था मानों शरीर के अन्दर प्रकाश यन्त्र फिट कर दिया गया हो। शरीर का उपरी भाग आवरण रहित था, बस कमर से नीचे का भाग श्वेत धोती से यूँ ढका था मानों वो भी शरीर का ही अंग हो। चेहरा क्लीन शेव्ड था पर सर पर लम्बे श्वेत बाल लहरा रहे थे।

मंच पर एक और व्यक्ति मौजूद था जो पीछे एक कोने में बैठा था और सारे कोलाहल से अनजान प्रतीत होता था।

हाल में मौजूद शायद हीं कोई वाद्य यन्त्र के आकाशीय प्रभाव प्रभाव से स्वयं को बचा सका था। लगभग २० मिनट बाद जब आचार्य जी ने अपने हाथों को आराम दिया तो अधिकांश लोगों के आँखों में आंसू थे। कुछ बिलख बिलख कर रो रहे थे और कुछ यूँ स्थिर बैठे थे मानों किसी और लोक में पहुँच गए हों। अल्फांसे जैसे व्यक्ति भी आज आचार्य जी के सम्मोहन से बच नहीं सका था।

कन्हैय्या की दृष्टि ताशी पर घूमी जो अपने आसन पर ही गिरा पड़ा था और बेहोशी की अवस्था में प्रतीत हो रहा था। केवल एस पी सचदेवा पर ही मानों कोई असर नहीं पड़ा था। अपने दोनों हाथ पीछे अडाए आराम से पीछे झुका था।

सबसे अनोखी अवस्था महंत जी की थी जो आचार्य जी के चरणों में गिरा पड़ा था और बिलख बिलख कर रो रहा था।

“उठिए महंत जी, आचार्य जी ने भी उसे उसके सर्वमान्य नाम से ही संबोधित किया था, “स्वयं को दोष देना उतना ही बड़ा अपराध है जितना किसी और को।” आचार्य जी के आवाज में अजीब सी शांति थी, “भुवन मोहिनी एक सिध्द योगिनी थी। उसका चला जाना स्वयं उसके लिए एक महान क्षति है। वो साधना के पथ पर बहुत आगे बढ़ चुकी थी और अगर मृत्यु ने अपना ग्रास नहीं बनाया होता तो इस जन्म में ही वो मृत्यु पर विजय प्राप्त कर लेती।” आचार्य जी सुंसयत स्वर में कहे जा रहे थे।

“तो क्या वो हमारी परंपरा से ही आती थी गुरुदेव?”

“जो साधना के पथ पर होते हैं वो किसी पंथ से बंधे नहीं होते। हाँ ये सही है की पिछले छह महीने से वो हमारे मार्गदर्शन में थी।”

अल्फान्से के लिए ये नयी खबर थी। पिछले महीनों में यहाँ का हर शख्स उसकी नज़र में था पर ये युवती एक बार भी उसकी नज़र से नहीं गुज़री थी।

“वो कौन सी साधना कर रही थी गुरुदेव?” एक शिष्य ने टोका।

“इसके बारे में हम बाद में बात करेंगे। अभी हम एक जिम्मेदार व्यक्ति की तरह एस पी महोदय को वक़्त देना चाहेंगे। ये एक हत्या का केस भी है। साथ ही हमारे एक प्यारे साथी की भी हत्या हुई है। हम चाहेंगे कि दोषी व्यक्ति को सजा मिले।”

“मुझे तो यह किसी राक्षस का कृत्य लगता है गुरुदेव।” गुप्ता बोला, “एक सामान्य व्यक्ति के लिए यह संभव नहीं हो सकता है। मरने के बाद भी उसे नहीं छोड़ा हत्यारे ने। दुर्गति कर दी उसके शरीर की।”

“आत्मोद्धार के लिए कर्म करने वाला मनुष्य कभी दुर्गति को प्राप्त नहीं करता, ऐसा कृष्ण ने कहा है गीता में। बेहोशी में किया गया हर कृत्य गलत होता है। और जो हो चुका है उस पर मंथन करना व्यर्थ की समय बर्बादी है।”

“सभी लोग अपने अपने ध्यान साधना में लग जाएँ। साथ ही सभी लोगों से अनुरोध है कि जहाँ जहाँ आवश्यकता हो पुलिस से पूर्ण सहयोग करें।” कहते हुए आचार्य जी खड़े हो गए थे।

“एस पी महोदय और कन्हैय्या जी आप दोनों हमारे साथ आयें। भुवन मोहिनी के विषय में आप जो भी जानना चाहते हैं मुझसे जान सकते हैं। और आश्रम के विषय में जो भी जानना है उसकी जानकारी नरेन्द्र जी आपको दे देंगे।”

आचार्य जी जाने के लिए मंच से नीचे उतर आये थे फिर पलटे और अपने शिष्यों के मध्य एक पर उनकी निगाह स्थिर हो गयी, पुनः संबोधित हुए।

“आज के कोलहल भरी सुबह में एक बात हम भूल ही गए थे। विगत कुछ दिनों से हम प्रयास कर रहे थे की हमारे मध्य एक योग की शिक्षिका हो। राधा जी एक प्रशिक्षित योग शिक्षिका हैं और अपनी पिछली नौकरी को छोड़कर हमारे आश्रम में आ गयी हैं। प्रतिदिन प्रातः और शाम में सभी आश्रम वासियों को योग का प्रशिक्षण देंगी। संभव है कि मुझे भी इनसे कुछ नया सिखने का अवसर मिलेगा।” आचार्य जी दोनों के साथ बाहार निकल गए।

बाहर निकलने से पहले कन्हैय्या जानबूझकर ताशी के पास से गुज़रा और बुदबुदाया- “ताशी, याद आया कुछ?” कहते हुए वो तेज़ी से बढ़ गया।

साधना कक्ष ने निकालकर अधिकांश लोगों ने आहार कक्ष का रुख किया था।

पर महंत जी के कदम अपने कक्ष की और बढ़ रहे थे। अभी बहुत सारा काम बाकी था। भोजन तो बाद में भी किया जा सकता था।

-----------------
 
“उधर महंत जी चाभी से ताले को बंद करने की असफल कोशिश में लगे थे। माथे पर पसीने की बूँद उभर आयी थी। यकीनन ये मौसम का असर नहीं था।

कुछ देर बाद कन्हैय्या धीरे से महंत जी के कान में फुसफुसाया, “मैंने कहा था न चच्चा, इस चाभी से दरवाजा खुल बंद नहीं होने वाला।”

महंत जी ने पलटकर कन्हैय्या को देखा।

“क्या हुआ महंत जी?” एस पी ने पूछा। “चाभी काम नहीं कर रही?”

“कुछ नहीं एस पी साहब।” जवाब कन्हैय्या ने दिया, “महंत जी बेध्यानी में गलत चाभी लेकर चले आये हैं।” चलिए महंत जी असली चाभी लेकर आते हैं।”

“असली चाभी मेरे पास है।” कन्हैय्या ने महंत जी के कान में बम सा फोड़ा।

यही वो वक़्त था जब ऐसा महसूस हुआ मानों धरती हिल रही हो। कन्हैय्या अपने पैरों के नीचे के कम्पन को महसूस कर सकता था।

“ये क्या हो रहा है चच्चा? इसने तो हमें हिलाकर रख दिया।”

“ये आचार्य जी का बुलावा है। चलिए साधना कक्ष की तरफ चलते हैं।”

कन्हैय्या और एस पी गौतम के समझ में कुछ नहीं आया था फिर भी वो महंत जी के पीछे पीछे चल पड़े।

कुछ ही देर में सभी साधना कक्ष के सामने थे।

वो आनंद का कमरा था और वो हमेशा की तरह कंप्यूटर पर नज़र गडाए बैठा था।

कंप्यूटर के स्क्रीन पर शहर का नक्शा नज़र आ रहा था और कुछ बिंदु उस पर उभर रहे थे।

तो इस तरह यह विडियो मोबाइल नंबर आठ पर ट्रान्सफर हो गया। वो खुद से ही बात कर रहा था।

पहला सेवाराम

दूसरा शरवन

तीसरा सुधीर गुप्ता

चौथा महंत रामदास

पांचवां महामहिम ब्रह्मदेव आचार्य

छठा ताशी

सातवाँ गौतम सचदेवा

आठवां राधा

नौवा कन्हैय्या

दसवा दिवाकर।

हुंह इतने साधारण क्वालिटी के विडियो के लिए इतने मोबाइल को क्यों गन्दा किया जा रहा है!

सबके मोबाइल से इसे डिलीट कर देता हूँ। मज़ा आएगा!

आनंद के एक क्लिक से सारे मोबाइल से वो विडियो डिलीट हो चुका था!

आनंद ने ताली बजाई।

तभी पीछे दरवाजे पर खटका हुआ।

“आइये महंत चाचा।” आनंद बिना देखे ही बोला।

“सारे सीसीटीवी कैमरे सही काम कर रहे हैं न?”

“जी।”

“और रात में जो कैमरे काम नहीं कर रहे थे?”

“उन्हें भी सही कर दिया गया है।”

“कुछ पता चला कि वो कैसे ख़राब हुए थे?”

“जी वो दयाल का हीं काम था।”

“मेरा भी ऐसा हीं ख्याल था। और मोबाइल जैमर सही काम कर रहा है न। उससे तो छेड़-छाड़ नहीं की गयी?”

“वह संभव नहीं है।”

--------------

वो एक विशाल कक्ष था जिसमे बायीं ओर ज़मीन से लगभग तीन फीट ऊँचा एक मंच था और उसके सामने दो सौ के करीब आसन बिछे थे। लगभग ४०-४५ लोग आसन पर पद्मासन में बैठ चुके थे। सभी के शरीर पर नील रंग का चोगानुमा लिबास था जो कमरे में अजीब सी आभा प्रस्तुत कर रहा था। मौजूद लोगों में सात महिलाएं भी थी पर उनके वस्त्र बाकी लोगों जैसा ही थे। शायद ये इस आश्रम का ड्रेस कोड था। कमरे में हल्का सा प्रकाश था। प्रवेश द्वार पर एक सन्यासी मौजूद था जिसने द्वितीय पंक्ति में खाली कुछ आसन की ओर इशारा किया। एस आई गुप्ता को भय था की एस पी कहीं कोई बखेड़ा न करे पर वो भी बिना कोई हुज्ज़त किये एक आसन पर बैठ गया। शायद केंद्रीय मंत्री के इन्वोल्वेमेंट का प्रभाव उस पर पड़ा था।

कम से कम गुप्ता को ऐसा ही लगा था।

मंच पर आचार्य जी विराजमान थे और उनकी दायीं जंघा के नीचे एक पखावज नुमा एक वाद्य यन्त्र था जो लम्बाई में कुछ ज्यादा ही था। आचार्य जी के लम्बे हाथ आराम से उसके दोनों छोरों पर पहुँच रहे थे और हथेलियों की थाप पूरे लय के साथ पखावज के दोनों छोरों पर पड़ रही थी, जो कमरे में विचित्र सा कम्पन प्रस्तुत कर रही थी।

अल्फांसे अगली पंक्ति में बैठा था और उसे ऐसा लग रहा था मानों थाप सीधे शरीर पर पड़ रहा हो!

मस्तिष्क पर, हाथ पर पैरों पर और सबसे विशेष कर अपने नाभि केंद्र पर!

उसे ऐसा लग रहा था मानों नाभि सक्रिय होकर उसके शरीर से बाहर निकल जाना चाहता हो।

रीढ़ की हड्डी बिना किसी प्रयास के बिलकुल सीधी अवस्था में मनों अकड़ गयी हो।

फिर उसे ऐसा लगा मानों सारा तनाव उसके शरीर से बहार निकल रहा हो।

उधर कन्हैय्या का पूरा ध्यान मंच पर बैठे आचार्य जी पर था।

वो किसी साधू टाइप के व्यक्ति का शरीर न होकर एक सुदृढ़ योगी का शरीर था। क़द छह फुट से थोडा भी कम नहीं रहा होगा, गेंहुआ रंग और चेहरे पर अमित आभा से दमक रहा था मानों शरीर के अन्दर प्रकाश यन्त्र फिट कर दिया गया हो। शरीर का उपरी भाग आवरण रहित था, बस कमर से नीचे का भाग श्वेत धोती से यूँ ढका था मानों वो भी शरीर का ही अंग हो। चेहरा क्लीन शेव्ड था पर सर पर लम्बे श्वेत बाल लहरा रहे थे।

मंच पर एक और व्यक्ति मौजूद था जो पीछे एक कोने में बैठा था और सारे कोलाहल से अनजान प्रतीत होता था।

हाल में मौजूद शायद हीं कोई वाद्य यन्त्र के आकाशीय प्रभाव प्रभाव से स्वयं को बचा सका था। लगभग २० मिनट बाद जब आचार्य जी ने अपने हाथों को आराम दिया तो अधिकांश लोगों के आँखों में आंसू थे। कुछ बिलख बिलख कर रो रहे थे और कुछ यूँ स्थिर बैठे थे मानों किसी और लोक में पहुँच गए हों। अल्फांसे जैसे व्यक्ति भी आज आचार्य जी के सम्मोहन से बच नहीं सका था।

कन्हैय्या की दृष्टि ताशी पर घूमी जो अपने आसन पर ही गिरा पड़ा था और बेहोशी की अवस्था में प्रतीत हो रहा था। केवल एस पी सचदेवा पर ही मानों कोई असर नहीं पड़ा था। अपने दोनों हाथ पीछे अडाए आराम से पीछे झुका था।

सबसे अनोखी अवस्था महंत जी की थी जो आचार्य जी के चरणों में गिरा पड़ा था और बिलख बिलख कर रो रहा था।

“उठिए महंत जी, आचार्य जी ने भी उसे उसके सर्वमान्य नाम से ही संबोधित किया था, “स्वयं को दोष देना उतना ही बड़ा अपराध है जितना किसी और को।” आचार्य जी के आवाज में अजीब सी शांति थी, “भुवन मोहिनी एक सिध्द योगिनी थी। उसका चला जाना स्वयं उसके लिए एक महान क्षति है। वो साधना के पथ पर बहुत आगे बढ़ चुकी थी और अगर मृत्यु ने अपना ग्रास नहीं बनाया होता तो इस जन्म में ही वो मृत्यु पर विजय प्राप्त कर लेती।” आचार्य जी सुंसयत स्वर में कहे जा रहे थे।

“तो क्या वो हमारी परंपरा से ही आती थी गुरुदेव?”

“जो साधना के पथ पर होते हैं वो किसी पंथ से बंधे नहीं होते। हाँ ये सही है की पिछले छह महीने से वो हमारे मार्गदर्शन में थी।”

अल्फान्से के लिए ये नयी खबर थी। पिछले महीनों में यहाँ का हर शख्स उसकी नज़र में था पर ये युवती एक बार भी उसकी नज़र से नहीं गुज़री थी।

“वो कौन सी साधना कर रही थी गुरुदेव?” एक शिष्य ने टोका।

“इसके बारे में हम बाद में बात करेंगे। अभी हम एक जिम्मेदार व्यक्ति की तरह एस पी महोदय को वक़्त देना चाहेंगे। ये एक हत्या का केस भी है। साथ ही हमारे एक प्यारे साथी की भी हत्या हुई है। हम चाहेंगे कि दोषी व्यक्ति को सजा मिले।”

“मुझे तो यह किसी राक्षस का कृत्य लगता है गुरुदेव।” गुप्ता बोला, “एक सामान्य व्यक्ति के लिए यह संभव नहीं हो सकता है। मरने के बाद भी उसे नहीं छोड़ा हत्यारे ने। दुर्गति कर दी उसके शरीर की।”

“आत्मोद्धार के लिए कर्म करने वाला मनुष्य कभी दुर्गति को प्राप्त नहीं करता, ऐसा कृष्ण ने कहा है गीता में। बेहोशी में किया गया हर कृत्य गलत होता है। और जो हो चुका है उस पर मंथन करना व्यर्थ की समय बर्बादी है।”

“सभी लोग अपने अपने ध्यान साधना में लग जाएँ। साथ ही सभी लोगों से अनुरोध है कि जहाँ जहाँ आवश्यकता हो पुलिस से पूर्ण सहयोग करें।” कहते हुए आचार्य जी खड़े हो गए थे।

“एस पी महोदय और कन्हैय्या जी आप दोनों हमारे साथ आयें। भुवन मोहिनी के विषय में आप जो भी जानना चाहते हैं मुझसे जान सकते हैं। और आश्रम के विषय में जो भी जानना है उसकी जानकारी नरेन्द्र जी आपको दे देंगे।”

आचार्य जी जाने के लिए मंच से नीचे उतर आये थे फिर पलटे और अपने शिष्यों के मध्य एक पर उनकी निगाह स्थिर हो गयी, पुनः संबोधित हुए।

“आज के कोलहल भरी सुबह में एक बात हम भूल ही गए थे। विगत कुछ दिनों से हम प्रयास कर रहे थे की हमारे मध्य एक योग की शिक्षिका हो। राधा जी एक प्रशिक्षित योग शिक्षिका हैं और अपनी पिछली नौकरी को छोड़कर हमारे आश्रम में आ गयी हैं। प्रतिदिन प्रातः और शाम में सभी आश्रम वासियों को योग का प्रशिक्षण देंगी। संभव है कि मुझे भी इनसे कुछ नया सिखने का अवसर मिलेगा।” आचार्य जी दोनों के साथ बाहार निकल गए।

बाहर निकलने से पहले कन्हैय्या जानबूझकर ताशी के पास से गुज़रा और बुदबुदाया- “ताशी, याद आया कुछ?” कहते हुए वो तेज़ी से बढ़ गया।

साधना कक्ष ने निकालकर अधिकांश लोगों ने आहार कक्ष का रुख किया था।

पर महंत जी के कदम अपने कक्ष की और बढ़ रहे थे। अभी बहुत सारा काम बाकी था। भोजन तो बाद में भी किया जा सकता था।

-----------------
 
उधर लोकल टीवी चैनल वाले परेशान थे। सेवाराम और उसके साथी के मोबाइल से रिकॉर्डिंग पुलिस ने पहले ही डिलीट कर दिया था ताकि वो किसी और को इसे ट्रान्सफर न कर सकें पर शरवन ने अपने दूसरे मोबाइल में उसे ट्रान्सफर कर रख लिया था। सेवाराम के साथी शरवन से पूरे दस हज़ार देकर रिकॉर्डिंग हासिल किया था उन्होंने। पर अब रिकार्डिंग गायब हो चुकी थी। पुनः रिकार्डिंग हासिल करने दौड़े पर रिकार्डिंग दोस्त के पास नहीं थी।

रिकॉर्डिंग तो अब सेवाराम के पास भी नहीं थी।

जिन्होंने रिकॉर्डिंग नहीं देखा था वो मानने को तैयार नहीं होने वाले थे कि सच में ऐसी कोई रिकॉर्डिंग थी भी।

कुछ देर में एस पी और एस आई भी अपना सर धुनने वाले थे इस बाबत।

ऐसी ही हालत बाकियों की भी होने वाली थी।

----------------

एस पी गौतम सचदेवा खुश नहीं था। ऐसा पहली बार उसके साथ हो रहा था जब एक एस पी के तौर पर वो खुलकर काम नहीं कर पा रहा था। शुरू में ही सीधे प्रदेश के डी जी पी सुबह सुबह ही उसे फ़ोन पर कह चुके थे की मामले को जितनी ज़ल्दी हो सके रफा-दफा करना है वरना मामला गंभीर रूप ले सकता है क्योंकि इसमें पब्लिक की धार्मिक भावना आहात हो सकती है।

फिर उस नरेन्द्र से मुठभेड़, ये वो घटना थी जिसे वो याद नहीं करना चाहता था।

“उस पर से ये छोकरा कन्हैय्या जिसे लोग मेरे साथ बराबरी का भाव दे रहे हैं। कमबख्त का टेटुआ दबा दूं तो मुंह से खून की जगह दूध निकल आये।”

मौका मिलने पर सबको देख लूँगा मैं।

और सबसे बढ़कर उसे आचार्य जी के नाम से जाने जाने वाले शख्स से चिढ हो रही थी। और अभी उसे उसी की सेवा में प्रस्तुत होना था।

---------------------

अल्फांसे अपने अभूतपूर्व अनुभव से बहुत कुछ बाहर निकल आया था।

अपने उद्देश्य की पूर्ति के लिए उसे ज़ल्द से ज़ल्द कुछ करना होगा वरना ये आश्रम उसे सच का सन्यासी बनाकर छोड़ेगा। अब तक आश्रम का जुगराफिया पूरी तरह उसके दिमाग में आ गया था और अपने प्लान के मुताबिक एक महीने के अन्दर उसे अपनी मंजिल पा लेनी थी। आचार्य जी तो काफी हद तक उससे खुश थे और आश्रम के क्रियाकलापों के बारे में उससे सलाह लेना भी शुरू कर दिया था। केवल तीन शख्स यहाँ ऐसे थे जो उसके संदेह के घेरे में आते थे। एक तो वो ताशी था जो उससे आंख मिलाने से भी कतराता था जिसके पास जाते ही वो दूर छिटक जाता था। पता नहीं वो उससे क्यों भय खाता था। दुसरे शख्स अर्जुन देव थे जिसे उसने आज तक आचार्य जी के अलावे और किसी से बात करते नहीं देखा था। आचार्य जी भी उसे विशेष इज्ज़त देते थे और हर कार्यक्रम के दौरान उसे मंच पर ही बैठते थे। यह फैसिलिटी पाने वाला वह आश्रम का इकलौता शख्स था।

तीसरा शख्स आनंद था जो अपने घर से शायद ही कभी बाहर निकलता था। केवल एक बार महंत जी ही उसे लेकर उसके घर गए थे जहा आनंद को उसने कंप्यूटर टेबल पर व्यस्त पाया था। पहली नज़र में वो उसे एक पढ़ाकू सा नौजवान लगा था जिसके चेहरे पर एक मोटा गिलास का चश्मा चढ़ा था और केवल एक बार उसने नज़र उठाकर उसे देखा था। अल्फांसे को कुछ ऐसा महसूस हुआ था मानों वो किसी एक्सरे से गुज़र रहा हो। महंत जी के मुताबिक वो आचार्य जी का सबसे बड़ा भक्त था और वो उस पर आंख मूंदकर विश्वास करते थे।

और हमलोगों को उपदेश देते हैं कि किसी पर भी आंख मूंदकर विशवास मत करो।

क्योंकि विश्वास अँधा होता है!

--------------------

परेशान तो महंत जी भी थे। ऐसा पहली बार हुआ था जब आचार्य जी ने उनके जाने बिना कोई क़दम उठाया था। हत्प्रान युवती का नाम भुवन मोहिनी था और आचार्य जी उसे करीब तीन महीने से जानते थे।

तो क्या आचार्य जी का उसके प्रति विश्वास कम हो गया था?

आश्रम तो लगभग १८ वर्ष पुराना हो चला था जब स्वामी जयंत देव ने इस आश्रम की स्थापना की थी। आज भी उनकी आदमकद प्रस्तर प्रतिमा साधना कक्ष के पास उनके समाधी स्थल में मौजूद थी। जहाँ तक उसे ज्ञात था आचार्य जी का यहाँ पदार्पण स्वामी जयंत देव के स्वर्गारोहण के एक वर्ष पूर्व हुआ था और अपने जीवनकाल में ही उन्होंने अपना उत्तराधिकारी चुन लिया था। पहले जो एक छोटा सा आश्रम था वो अब एक विशाल क्षेत्र में परिणत हो चुका था और इसका श्रेय आचार्य जी को ही जाता था।

जयंत देव के समय के अभी ५-६ शिष्य ही बचे थे और इनमें सबसे पुराने शिष्य में अर्जुन का नाम आता था। सच्चाई तो ये थी अर्जुन और जयंत देव ने मिलकर इस आश्रम की स्थापना की थी। और कुछ पुराने शिष्यों के अनुसार अर्जुन देव आचार्य जी के अति प्रगतिवादी सोच से खुश नहीं थे पर आश्रम को टूटने से बचने के लिए अक्सर चुप ही रहते थे।

खुद उसे आश्रम में आये चार वर्ष हो चुका था और उसे आश्रम में नियुक्त करने वाले खुद आचार्य जी ही थे।

उसके साक्षात्कार के समय खुद अर्जुन देव भी मौजूद थे और नियुक्ति के समय इन्होंने एक ही बात कही थी।

“एक बात का ध्यान हमेशा रखना, तुम्हारी सेवा आश्रम के लिए है न की किसी व्यक्ति विशेष के लिए। चाहे वो व्यक्ति स्वयं ब्रह्मदेव ही क्यों न हो। अगर कभी तुम्हें आश्रम और आचार्य में से एक को चुनना हो तो आश्रम को ही चुनना। इस आश्रम से मानवता को बहुत सारी अपेक्षाएं हैं। लोग आते जाते रहेंगे पर आश्रम हमेशा बना रहेगा। इस आश्रम पर परम गुरु शिव का सीधा आशीर्वाद है।”

वह अर्जुन देव की बात मानने के लिए बाध्य नहीं था पर उसने जयंत देव की बात को हमेशा सर्वोपरि रखा था।

आज भी वो वही करेगा जो आश्रम के लिए सही है।

और उसके आने के कुछ महीने बाद ही सरस्वती का आगमन हुआ था। उसकी बौद्धिक प्रतिभा अद्भुत थी। वाणी में तो सचमुच सरस्वती का वास था। आश्रम की ओर से टीवी डिबेट में हिस्सा लेने वही जाती थी। बाकी सभी प्रतिभागी के छक्के छुड़ाने में सिद्धहस्त थी। आश्रम के बारे में यदा कदा कुछ अन्यथा छपता तो उसे जवाब देने के लिए सरस्वती देवी थी। अगर आश्रम की व्यवस्था और सुरक्षा के लिए वह उत्तरदायी था तो यहाँ की कार्यकारिणी अध्यक्षा सरस्वती थी। और आज आश्रम के माथे पर जब कलंक का टिका लगा था तो वो यहाँ नहीं थी।

आश्रम के हर सदस्य पर उसकी पैनी दृष्टि रहती थी। भुवन मोहिनी के बारे में उसे दो दिन पहले ही पता चला था वो भी आचार्य जी से नहीं वरन सरस्वती देवी से।

अब उसे राधा जी पर दृष्टि रखनी थी।

राधा, आश्रम की नयी योग शिक्षिका। उसके सारे पेपर्स को वो पहले ही वेरीफाई कर चुका था।

उम्र ३४ वर्ष। पर लगती २८ वर्ष से ज्यादा की नहीं थी।

“आचार्य जी के व्यक्ति को परखने की योग्यता पर उसे ज़रा भी शक नहीं था।”

पर अब वो अपने काम में कोई कसर बाकी नहीं रखना चाहता था।

मुलाकाती कक्ष में कन्हैय्या और एस पी पहुँच चुके होंगे। मुलाकाती कक्ष आचार्य जी के आवास का ही हिस्सा था। वहां की बातचीत को वह भी सुनना चाहता था। अपने ब्लूटूथ इयरफ़ोन को मोबाइल से कनेक्ट कर कानों में फिट कर लिया। आचार्य जी के कक्ष में यह नया इंतज़ाम आज ही किया था।

----------------

उसके कक्ष से कुछ ही दूर आनंद इस मौके को कैसे छोड़ सकता था।

“वाह महंत जी। आपने तो महामहिम को भी नहीं छोड़ा।”

“ये बातचीत मैं भी सुनूंगा। मज़ा आएगा।”

-----------------

“आपके आश्रम की एक चीज़ हमे पसंद आयी।” एस पी बोला।

“क्या?”

“आपके आश्रम का ये पेय।”

उसने अपने सामने एक बड़े गिलास में रखे पेय की और इशारा किया।

आचार्य जी मुस्कुराये।

उसने कमरे में ही दरवाजे पर मौजूद अपने सेवक को इशारा किया। कुछ ही देर में पुनः दोनों अतिथि के सामने एक एक गिलास पेय सर्व कर दिया गया था।

“इसका नाम हमने सोहनी रखा है। वैसे तो इसमें जड़ी बूटियों का ही प्रयोग किया गया है पर स्वाद का विशेष ध्यान रखा गया है।”

“एक बात है आचार्य जी। रात में इतना बड़ा घटनाक्रम हो जाने के बाद भी आप पर इसका कोई विशेष असर नहीं हुआ है। आप बिलकुल ही तरोताजा दिखाई दे रहे हैं।” कन्हैय्या ने मुस्कुराते हुए कहा।

“शायद आचार्य जी मोह माया से परे है।” एस पी के स्वर में व्यंग्य था।

“दरअसल कोई घटना मुझे लम्बे समय तक नहीं बांधती।” एस पी के शब्दों को आचार्य जी ने अन्यथा नहीं लिया था, “चलिए मैं सीधे असली विषय पर आता हूँ। मेरे उम्र का अधिकांश भाग यात्रा करते हुए ही बीता है। भारत नेपाल, श्रीलंका, तिब्बत का शायद ही कोई भाग मेरे क़दमों से अछूता रहा हो। ऐसे ही एक यात्रा के दौरान दस वर्ष पहले मैं असम की यात्रा पर था जहाँ पहली बार भुवन मोहिनी से मुलाक़ात हुई थी। कामरूप कामाख्या शुरू से ही तंत्र का गढ़ रहा है और तंत्र मंत्र की चाहत रखने वालों के आकर्षण का केंद्र है। दूर दूर से यहाँ तंत्र में सिद्धि की इच्छा रखने वाले लोग आते हैं। मान्यता यहाँ तक है कि तंत्र में सिद्धि के लिए कम से कम एक बार यहाँ आकर किसी मनुष्य की बलि देना आवश्यक है वरना सिद्धि प्राप्त नहीं होती। वैसे तो वो वहां के एक राज परिवार से ताल्लुक रखती थी पर कम उम्र में ही वो एक तांत्रिक की भैरवी बन चुकी थी।”

“तांत्रिक और भैरवी?” एस पी सचदेवा को भी शायद बातचीत में रस आने लगा था।

“हाँ कुछ ऐसा ही। दरअसल इश्वर प्राप्ति के अनेक मार्गों में ये भी एक मार्ग मानते हैं लोग पर उचित गुरु के आभाव में मॉस मदिरा तक ही सिमित रह जाते है लोग बाग।”

“और भैरवी की क्या भूमिका होती है इसमें?”

“भैरवी ही वो धुरी है जिसके चारों ओर तांत्रिक की साधना घुमती है। कापालिक लोग माँ काली की साधना करते हैं और अपनी साधना के दौरान इंसानी बलि देने से भी परहेज नहीं करते। पर इस साधना के लिए एक ऐसी लड़की की आवश्यकता होती है जिसने किसी के साथ सम्भोग न किया होया हो या फिर मानसिक रूप से अत्यधिक पवित्र हो।”

“उस तांत्रिक को जिसने कम उम्र में ही बहुत सारी सिद्धियाँ हासिल कर ली थी और उच्च स्तरीय साधना के लिए एक भैरवी की आवश्यकता थी। कामाख्या में ही उसने मोहिनी को देखा जब वो नवरात्र के दौरान साधना करते हुए देखा तो उसने मान लिया कि उसकी तलाश पूरी हो गयी थी। एक ब्रह्मचारी के रूप में वो उसे मिला और धीरे धीरे उसे अपने प्रेम जाल में फांसना शुरू कर दिया। देखने में तो वो कापालिक मासूम था ही उम्र भी उसकी ज्यादा नहीं थी। जब मोहिनी पूरी तरह उसके वश में हो गयी तो धीरे धीरे उसे तंत्र के जाल में लाना शुरू कर दिया। अब दोनों ने दुसरे शहर के शमशान में ही रहना शुरू कर दिया। तांत्रिक ने अब अपनी तंत्र साधना शुरू कर दी। शराब और मुर्गे का मांस खाकर रात रात भर न जाने क्या क्या साधना करता और कुछ समय में मोहिनी भी उसी साधना में रम गयी। शुरू में वो एक उच्च स्तरीय तांत्रिक की सहयोगिनी बन कर खुद को धन्य मानती और वो कई अनोखी क्रियाकलापों की गवाह बनी। आसपास के गाँव वाले अपनी समस्या लेकर उनके पास आते और तांत्रिक चुटकियों में उनकी समस्या सुलझा देता।

पर धीरे धीरे तांत्रिक अपनी असली साधना का रंग दिखने लगा। साधना के वक़्त वो मोहिनी को पूर्ण नग्न कर तरह तरह की विभूतियों से उसका श्रृंगार करता और फिर उसे मृत शरीर पर पद्मासन में बैठना पड़ता। हद तो तब हो गयी जब पहली बार उसने नरबली दी तो मोहिनी को उस तांत्रिक का असली रंग समझ में आने लगा। दिन के वक़्त वो कोई और ही पुरुष होता और अपने कृत्यों के लिए उससे छमा मांगता और रात होते ही वो एक क्रूर तांत्रिक में बदल जाता। जब तीसरे अमावस की रात उसने तीसरी नर बलि दी तो मोहिनी का मन उससे पूरी तरह उचाट हो चुका था। वो अब उससे बचने का रास्ता तलाश करने लगी। कापालिक में बहुत सारी शक्तियां आ चुकी थी और शारीरिक रूप से वो असीम बलशाली हो चुका था। मोहिनी ने पास के गाँव वालों से सहायता लेनी चाही। ८-१० गाँव वालों ने उस पर काबू करना चाहा पर उसने अकेले सबको मारपीट कर भगा दिया। दोबारा किसी गाँव वालों ने उस पर हाथ उठाने की जहमत नहीं की।

भैरवी जान चुकी थी कि उसकी मंशा कुल २१ नरबली देने की है। वो इस घृणित व्यक्ति से छुटकारा चाहती थी। गिनती उन्नीस तक पहुँच चुकी थी। बीसवां शिकार संजोगवश उसका सहोदर भाई निकल गया। इसकी जानकारी तांत्रिक को नहीं थी। किस्मत ने मोहिनी की मदद की। तांत्रिक अपने शिकार को पूरी तरह बेहोश नहीं कर पाया था या शायद मोहिनी ने कुछ ऐसा किया था कि उसके भाई ने केवल बेहोशी का नाटक किया था। तांत्रिक जब तक संभलता तब तक किसी तरह आँखों में मिर्ची वगैरह डालकर किसी तरह उस पर काबू कर लिया था। अधमरे तांत्रिक को झोंपड़ी में डालकर उसमे चारों तरफ से आग लगा दी भाई बहन ने और दोनों वहां से फरार हो गए।

बाद में वहां पुलिस पहुँच गयी थी और अधजले अवस्था में उस तांत्रिक को बरामद किया था। सुना था कि वो तांत्रिक पागल हो गया था।”

“और आपके अनुसार वो तांत्रिक ही हत्यारा है?” अच्छी कहानी है।

कन्हैय्या तन्मयता से सबकुछ सुनता जा रहा था। एक बार भी उसने टोकने की कोशिश नहीं की थी।

“मैं जनता था कि आप लोगों को इस घटनाक्रम पर आसानी से विश्वास नहीं होगा। ये घटना कामख्या के विष्णु पुर गाँव की है। पुलिस रिकॉर्ड में भी सारी घटनाएं दर्ज होंगी। आप अपने श्रोतों से कन्फर्म कर सकते हैं।”

“वो तो मैं करूँगा ही। वैसे इस घटना में आप कहाँ से फिट होते हैं और उस घटना से कल रात की घटना का क्या सम्बन्ध? और वो भुवन मोहिनी आपके पास कैसे पहुंची?”

“अगर सम्बन्ध न होता तो मैं इतनी पुरानी बात आपको क्यों सुनाता। जिस वक़्त की ये घटना है उस समय ही हम लोग यानि मैं और मेरे गुरूजी उस गाँव में उपस्थित थे। उसके भाई ने अपनी बहन को गाँव वापस ले जाने की बहुत कोशिश की पर वह तैयार नहीं हुई। उसका भाई मेरे गुरूजी से पुराना परिचित था और दोनों भाई बहन हमारे संग हो लिए और मोहिनी के इच्छानुसार उसे ऋषिकेश के आश्रम में छोड़ आये। हमारे गुरूजी ने उसे संन्यास धर्मे में दीक्षित किया और हम लोग वापस लौट आये।”

“और बर्षो बाद वो आपके पास पहुँच गयी!” कन्हैय्या ने बात पूरी की।

“ऐसा ही हुआ। हमारे किसी शिष्य की मार्फ़त उसे हमारे और इस आश्रम के बारे में ज्ञात हुआ और लगभग तीन महीने पहले यहाँ पहुंची। इस दौरान वो काफी बदल चुकी थी फिर भी हम दोनों ने एक दूसरे को पहचानने में कोई गलती नहीं की। वो अध्यात्मिक पथ पर बहुत आगे बढ़ चुकी थी और बस उसे शांत माहौल की तलाश थी। वो उसे यहाँ प्राप्त हुआ। मैंने उसके रहने का इन्तेजाम कल्कि नदी के तट पर एक कुटिया में करा दिया जो यहाँ से करीब १० किलोमीटर दूर है।”

“पर अपनी मृत्यु से कोई कितना भाग सकता हैं। जाने कैसे वो तांत्रिक, वो राक्षस यहाँ कैसे पहुँच गया और पुनः पुरानी दुनिया में उसे ले जाना चाहता था। उसने मुझे बताया तो मैंने उसके रहने का इंतज़ाम कोई और इंतज़ाम होने तक इसी आश्रम में करा दिया।”

“भूल किया आपने। आपको पहले उसे लेकर पुलिस के पास जाना चाहिए था। अगर आपके जैसे जिम्मेदार लोग पुलिस पर यकीन नहीं करेंगे तो बाकी लोग क्या करेंगे।”

“मैं ऐसा ही चाहता था। पर उसका कहना था की वो एक विशेष अनुष्ठान कर रही थी और तीन दिन बाद ही खुलकर सामने आना चाहती थी। इसके लिए वह एकांत में पूर्णाहुति हेतु हवन करना चाहती थी।”

“पर, इस बार कन्हैय्या ने टोका, महंत जी के अनुसार भुवन मोहिनी को उसने आश्रम में कहीं नहीं देखा था। आश्रम में भी उसके नाम का कोई रिकॉर्ड नहीं है।”

“मेरे अनुरोध पर केयरटेकर ने उसे अपने कमरे में रखा था।”

“ओह।” पर जब सब कुछ इतने गुप्त तरीके से हो रहा था तो उस राक्षस को खबर कैसे हुई। क्या ये इंगित नहीं करता की कोई अन्दर का आदमी उनसे मिला हुआ है?”

“ज़रूरी नहीं। दिन भर में कितने लोग आते जाते है। हो सकता है कि राक्षस भेष बदलकर यहाँ पहुँच गया हो और मोहिनी को किसी तरह उसने यहाँ देख लिया हो।”

“कुछ और पूछना हो तो पूछ सकते हैं।”

“प्रश्न तो बहुत सारे हैं आचार्य जी।” एस पी अपने सीट पर पीछे की ओर झुक गया था, “अब बहुत सारी बातें मेरी समझ में आने लगी हैं। फिर भी बहुत सारे प्रश्नों का जवाब हमारे पास अभी भी नहीं है। मसलन अगर पिछले फाटक की चाभी आपके आनंद या महंत के पास थी तो फिर दरवाजा क्यों और किसके लिए खुला? अगर आपके कहे मुताबिक रात में कापालिक रात में अन्दर आया था तो ज़रूर केयरटेकर ने उसे सेफ पैसेज दिया होगा या फिर किसी अंदर वाले ने इसके लिए सहायता की होगी।”

“और आपके मुताबिक वो अन्दर वाला कौन हो सकता है? किस पर शक है आपको?”

“शक नहीं मुझे यकीन है कि ये काम नरेन्द्र को छोड़कर किसी का नहीं हो सकता।” एस पी के स्वर में दृढ़ता झलक रही थी।

“आपकी कहानी को सुनने के बाद सारा किस्सा शीशे की तरह साफ़ हो गया है। जैसा की मुझे अपने एस आई से ज्ञात हुआ है की नरेन्द्र का उस केयरटेकर से रोज़ का मिलना था। आपकी मोहिनी तीन दिन से उस केयरटेकर के घर में रह रही थी। किसी तरह से आपके उस कापालिक से नरेन्द्र का मिलना हो गया होगा। केयरटेकर से किसी तरह नरेन्द्र ने चाभी हासिल कर ली होगी और मौका देखकर पिछला दरवाजा खोल दिया होगा।” कहानी ख़त्म। “बस एक बार इस नरेन्द्र की गर्दन मेरे हाथ में दे दो सारी कहानी खुद ही खुद बक देगा।” एस पी के स्वर में पुलिसिया तेवर झलकने लगा था। वैसे उससे बेहतर और कौन जनता था की नरेन्द्र अकेले उसके बस की चीज़ नहीं था।

कन्हैय्या मुस्कुराया, “क्या बचकानी थ्योरी है आपकी एस पी साहब। अगर ये मौका नरेन्द्र को हासिल था तो आश्रम के कई और शख्स को भी हासिल था। केयरटेकर कोई मंत्री प्रधानमंत्री नहीं था की उससे मिलने के लिए किसी को मुश्किल होती।”

“इन्वेस्टीगेशन में अभी तुम बच्चे हो कन्हैय्या। मुझे डेली इस तरह के लोगों से सामना करना पड़ता है। प्लेन या उस नरेन्द्र को हत्यारे जैसे कपडे पहनाकर देखो। रत्ती भर भी फरक निकल आये तो कहना।”

“मेकअप से तो लोग जैसे तैसे लोगों को भी अमिताभ बच्चन बनाकर खड़ा कर देते हैं बड़े भाई। और हमारे पूज्य आचार्य जी ने तो अभी अभी बताया कि ये हत्यारा किसी पुराने ज़माने का तांत्रिक है।”

“इस बात का प्रूफ होना बाकी है अभी।”

“कोई मुश्किल नहीं है एस पी साहब,” आचार्य जी ने टोका- “एक फ़ोन कॉल पर आप अभी कामख्या से तस्कीद कर सकते हैं। उस वक़्त समाचार पत्र और लोकल टीवी चैनल्स और पत्रिकाओं में भी काफी कुछ छपा था उस बारे में। सरस्वती जी भी आती ही होंगी। उन्हें मैंने कह दिया था पुराने फुटेज का इंतज़ाम कर लेते आने को। वो सब देखने के बाद आपको कोई शुबहा नहीं रह जायेगा कि पुराने ज़माने का एक तांत्रिक ही हत्यारा है और उसके भेष में कोई दूसरा आदमी नहीं।”

“एक बात और, मुझे बताया गया था कि मोहिनी देवी एम पी महोदय की कजन हैं। ये बात किस तरफ जाती है?”

“इस बात की मुझे भी कोई जानकारी नहीं थी। आज जब दिल्ली से मिनिस्टर का फ़ोन आया तो मुझे ये बात पता चली। मिनिस्टर साहब का पुश्तैनी घर असम में है। हो सकता है की कुछ दूर की रिश्तेदारी रही हो।

“रिश्तेदारी अगर इतने दूर की थी तो फिर मंत्रीजी इतना अधिक इंटरेस्ट क्यों लेने लगे कि आनन फानन एक सरकारी जासूस को यहाँ भेज दिया!”

“इस प्रश्न का उत्तर मैं देना चाहूँगा गौतम साहब।” कन्हैय्या की आवाज में तबदीली आ गयी थी, “अब सही प्रश्न किया है आपने। दरअसल भुवन मोहिनी जी के हत्या के इन्वेस्टीगेशन से मेरा कोई ताल्लुक नहीं। मेरे आश्रम में पहुँचने से पहले हीं दोनों हत्याएं हो चुकी थी। दरअसल अगले महीने यहाँ कुछ विदेशी मेहमान पहुँचने वाले हैं। इसी बीच ऐसी कुछ खबर मिली कि यहाँ पर कुछ विदेशी जासूस सक्रिय हैं जो कुछ गड़बड़ कर सकते हैं। बस यही खोजबीन मुझे यहाँ आश्रम में केयरटेकर दयाल तक ले आई।”

एस पी आश्चर्य के भंवर में तैर रहा था। आचार्य जी भी चौंके।

“ऐसी क्या खास बात थी उस केयरटेकर में?”

“वो पाकिस्तानी जासूस था। पता नहीं किस उद्देश्य से वो यहाँ छुपकर रह रहा था। दो दिन पहले ही हमें अपने सूत्रों से पता चला कि ये किसी विशेष वारदात को अंजाम देने के फिराक में है।”

“अगर वो यहाँ था तो ज़ाहिर है उसके और भी साथी रहे होंगे।”

“सही कहा आपने सचदेवा साहब”, कन्हैय्या की गंभीर आवाज में कोई और ही शख्स प्रतीत हो रहा था, “यहाँ दयाल को धर पकड़ने के बाद कुछ और सुराग मिलने की उम्मीद थी। पर जाने कैसे उसके आकाओं को खबर लग गयी और उसकी हत्या कर दी गयी।”

“मतलब भुवन मोहिनी की हत्या की जांच से आपका कोई सम्बन्ध नहीं?“

“हो सकता है अगर दोनों हत्याएं एक दुसरे से सम्बंधित हो।”

इस बार आचार्य जी ने टोका- “कन्हैय्या जी उस इंटेलिजेंस डिपार्टमेंट से ताल्लुक रखते हैं जिनका काम हमारे पडोसी देशों में भारत विरोधी गतिविधियों पर नज़र रखना है। दो दिन पहले होम मिनिस्ट्री से हमारे पास कॉल आया और केयरटेकर दयाल के बारे में दरयाफ्त किया गया। एक जिम्मेदार भारतीय के रूप में मैंने सहयोग के लिए हामी भर दी।”

“पर ये भी तो हो सकता है कि जिसने मोहिनी की हत्या कि है उसी ने अपने गवाह मिटने के लिए दयाल की हत्या कर दी हो।”

“हो सकता है पर इसकी संभावना बहुत कम है। जैसा की हम जानते हैं कि मोहिनी जी की हत्या रात ११:५० के करीब हुई है। पर दयाल की हत्या लगभग सुबह ३:३० के आस पास हुई है। अगर उस राक्षस को अपने गवाह मिटाने होते तो वह पहली हत्या करने के बाद इतना इंतज़ार नहीं करता।”

“ऐसा आप कैसे कह सकते हैं? अभी तो पोस्टमार्टम रिपोर्ट आना बाकी है।”

“अगर आँखें खुली रखी जाए तो बिना पोस्टमार्टम के भी हम लोग बहुत कुछ जान सकते हैं।”

“हूँ, एक बात और, क्या मैं आपका आई डी कार्ड देख सकता हूँ?”

“बिलकुल सचदेवा साहब”, कहते हुए अपने पॉकेट से अपना कार्ड निकालकर एस पी की तरफ बढ़ा दिया।

वो गृह मंत्रालय की तरफ से जारी किया गया कार्ड था। शक की कोई गुंजाइश नहीं थी।

“ओके सर।” कार्ड वापस करते हुए एस पी ने सम्मान जनक स्वर में कहा, “फिर भी आपसे अनुरोध है की नरेन्द्र पर आप विशेष ध्यान रखेंगे। उसने खुद मेरे सामने कबूला है कि नरेन्द्र उसका असली नाम नहीं है।”

“जी शुक्रिया। जब तक हमें अपनी मंजिल नहीं मिल जाती एक एक शख्स हमारे शक के घेरे में है। उम्मीद है की आपका सहयोग हमें मिलता रहेगा। बस आचार्य जी से एक सवाल पूछना था, क्या किसी तंत्र मंत्र से हम विशेष शक्तियों के मालिक बन सकते हैं?”

आचार्य जी मुस्कुराये, “फिलहाल तो मैं प्रमाण देने की स्थिति में नहीं हूँ, पर मेरा उत्तर हाँ में है।”

“एक और प्रश्न, यहाँ मैंने किसी के पास मोबाइल नहीं देखा। क्या यहाँ मोबाइल प्रतिबंधित है?”

“सही फ़रमाया आपने। मैं लोगों के तार उसके अंतर्मन से जोड़ना चाहता हूँ न की बाहरी दुनिया से।”

“और अगर कोई छुपाकर मोबाइल यहाँ ले आया तो?”

“अव्वल तो लोग ऐसा नहीं करते। बाकी काम मोबाइल जैमर कर देता है। वैसे अगर किसी को ज़रूरत पड़ी तो उसके लिए यहाँ लैंड लाइन मौजूद हैं।”

“बड़े कठोर व्यक्ति हैं आप।”

आचार्य जी ने संछिप्त उत्तर दिया- “गुरु हूँ न।”

अब एस पी को ध्यान आया कि इतनी देर से उसका मोबाइल शांत क्यूं पड़ा है।

इसके साथ ही वार्तालाप का अंत हो गया।

उधर महंत जी ने भी एअरपिस कानों से निकाल कर रख दिया। बहुत सारी नयी बातें मालूम हुई थी उसे।

उधर अपने कमरे में मौजूद आनंद ने भी ताली बजाई।

------------------------
 
“तुम्हें क्या लगता है बर्मन, ये सब किसका काम है? तुम तो सालों से इस इस आश्रम से जुड़े रहे हो।”

“सही कहा तुमने। मैं तो उस समय से आचार्य जी के साथ हूँ जब ये आश्रम बना भी नहीं था। उनके साथ देश विदेश घुमा हूँ। कैलाश मानसरोवर तक जा चुका हूँ उनके साथ। किसी साधारण इंसान के साथ ऐसी घटनाएं घटती तो बुरा हाल होता उसका। पर उनके ऊपर कोई असर मालूम होता उनका।”

ताशी की भंवे सिकुड़ी, “तो साधारण लोग तो उन्हीं पर शक कर रहे होंगे।”

“रात भर मैं उनके आस पास ही था। सुबह खबर जब मेरे पास पहुंची तो मैंने ही उन्हें बताया। कुछ देर आँखें बंद रही उनकी फिर धीरे से कहा, बेचारी भुवन मोहिनी, “वैसे तुम बताओ, कैसे इंसान लगते हैं हमारे आचार्य जी।”

‘वही जानने की कोशिश कर रहा हूँ दो महीने से।’ ताशी सोच रहा था।

“मैं जब धर्मशाला के तिब्बत सेटलमेंट में था तभी पहली बार उनके बारे में सुना था।”

“मैं जब पहली बार उनसे मिला था तो उन्होंने ठीक वही भाषा बोलने लगे जो मेरे गाँव में बोली जाती है।”

“उनको समझ पाना बहुत मुश्किल है। मुझसे तो वो बंगाली में भी बात कर लेते हैं। वैसे ताशी भाई, तुम भी तो हिंदी भाषा कमाल की बोल लेते हो।”

ताशी ने शर्माने की एक्टिंग की। इसलिए तो उसे इस मिशन पर भेजा गया था।

“मैं तो पहले भी कई बार इंडिया आया हूँ। यहाँ रहकर हिंदी सीखी है मैंने। I love Indian culture।”

“सुनकर अच्छा लगा। पर पता नहीं क्यों लोग हम दोनों के देशों में दुश्मनी लगाते रहते हैं।”

“वो सब राजनीतिज्ञों की बातें है। ज्ञान की कोई सीमा नहीं। हमारे यहाँ तो लोग तुम्हारी फिल्मों के दीवाने हैं। तुमने हीं तो बताया था की तुम भी चाइनीज़ मार्शल आर्ट जानते हो। बस मुझे भी थोडा सिखा दो।”

“ताशी पुनः शरमाया।”

“बस यूँ हीं थोडा-थोडा। कोशिश करूँगा मैं। चलो कल सुबह से कोशिश करता हूँ।”

“बढियाँ।”

वैसे भी ताशी बर्मन के ज्यादा निकट आना चाहता था। क्योंकि बर्मन आचार्य जी के ज्यादा निकट था। बर्मन इस आचार्य तक पहुँचने का माध्यम बन सकता था।

एक और शख्स जो उसके लिए सबसे ज्यादा मददगार हो सकता था वो आनंद था। सारे ऑनलाइन रिकार्ड्स उसी के पास थे। उसे तो वो अभी तक नजदीक से देख भी नहीं पाया था। इतने छोटे से आश्रम में न जाने क्या-क्या राज छुपे थे।

और फिर चपटे नाक वाली लड़की सरस्वती! सिकंदर के माध्यम से उस तक वह लगभग पहुँच हीं चूका था।

जून २६ संध्या

शाम ने रात की तरफ कदम बढ़ा दिए थे। आज आश्रम के दरवाजे आगंतुकों के लिए बंद ही रहे थे। पार्क में दो पुलिस की तैनाती कर दी गयी थी। कन्हैय्या ने असली चाभी महंत जी को सौंप दी थी और महंत जी अभी भी समझ नहीं पा रहे थे कि चाभी का फेर बदल कैसे हुआ और चाभी कन्हैय्या के पास पहुंची कैसे। दोनों तरफ के फाटक बंद कर दिए गए थे। आश्रम में ही कन्हैय्या के रहने की व्यवस्था कर दी गयी थी।

आचार्य जी ने अपने घर जो आश्रम के ही एक छोर पर बना था को छोड़ साधना कक्ष के पीछे बने गुरु जयंत देव के समाधी कक्ष में ही रात अकेले बिताने का निश्चय किया था।

पूरे आश्रम की तलाशी ली गयी थी और आश्रम वासियों को छोड़कर किसी भी बाहरी आदमी के होने का सुराग नहीं मिला था। दस बजे तक सभी आश्रमवासी अपने अपने कमरे में पहुँच गए थे और सबको विशेष हिदायत दी गयी थी की रात में कोई बाहर निकलने की कोशिश न करे।

सबसे अंत में अपने कमरे में जाने वालों में सरस्वती थी। चांदीपुर पहुँचते पहुँचते शाम हो गयी थी। उसके लिए आज का दिन सबसे ज्यादा भाग दौड़ वाला रहा था। इस बार प्रेस को जवाब देने में उसके पसीने छूट गए थे। बहुत दिनों बाद प्रेस को आश्रम के विरोध में कहने का अच्छा मौका मिल गया था और चैनल वालों ने ये प्रसारित करना शुरू कर दिया था की दोनों हत्याएं आश्रम में चलने वाले तांत्रिक क्रियाओं का परिणाम थी।

सरस्वती देवी ने इन्टरनेट से डाउनलोड कर सबूत के तौर पर पुराने पेपर के कतरन के साथ साथ कुछ मैगजीन्स भी प्रस्तुत किये थे। एक निष्पक्ष चैनल ने कामख्या के थाने से आनन फानन फाइल बरामद कर अपने टीवी चैनल पर दिखाया था जिससे आश्रम के पक्ष को बल मिला था। अंत में चैनल वालों ने इस बात पर ही मोहर लगा दी थी की केयरटेकर की गलती से फाटक खुला रह गया था और “राक्षस” पुराने रंजिश की खातिर बदला लेने के लिए पार्क में पहुँच गया था और क्रोध में भुवन मोहिनी की हत्या कर दी थी। सेवाराम के रिकॉर्डिंग का ज़िक्र भी बार बार आया था पर कोई भी रिकॉर्डिंग उपलब्ध नहीं होने के कारण बात आइ गयी हो गयी थी।

रिकॉर्डिंग के लिए सबसे ज्यादा गुस्से में एस पी था और उसे पूरा शक था कि सारा किया धरा कन्हैय्या का ही था जो सबसे ज्यादा देर तक वो ही उसके साथ रहा था।

आश्चर्य तो कन्हैय्या को भी था की रिकॉर्डिंग कहा चली गयी पर इस बाबत वो सोचकर अपना समय ख़राब नहीं करना चाहता था।

सरस्वती देवी ने आचार्य जी से सलाह मशवरा कर आश्रम को बाहर के लोगों के लिए तीन दिनों के लिए बंद कर दिया था। महंत जी भी इसी के पक्ष में थे।

सबसे अंत में सरस्वती देवी ने अपने कमरे का रुख किया जो उपरी मंजिल पर स्थित था। दरअसल उसका फ्लैट दूसरी मंजिल पर था और इस फ्लोर पर एक ही फ्लैट था और बाकी हिस्से खुला छत था। आश्रम के स्थायी निवासियों के लिए कमरे पीछे की ओर बने थे और उस तरफ जाने के लिए एक बड़े लोहे के गेट से होकर गुज़ारना पड़ता था जिसे लॉक तो नहीं किया जाता था पर लोग बाग़ उधर नहीं ही जाते थे। स्थाई लोगों में कुल २० लोगों के आलावा आश्रम के स्थाई कर्मचारी भी होते थे जो इस हिस्से में रहते थे। इन सभी के हिस्से में वन बेडरूम सेट टाइप का क्वार्टर था केवल महंत जी और सरस्वती देवी का क्वार्टर थोडा बड़ा था। आचार्य जी का क्वार्टर भी इसी हिस्से में था पर क्वार्टर का एक हिस्सा दूसरी तरफ यानी कॉलोनी के बाहर भी खुलता था। हर दिन शाम कमरे में प्रवेश करने पर वो ऐसा ज़रूर करती थी।

अस्थाई रूप से रहने वालों के लिए इसी किस्म के क्वार्टर बाहरी हिस्से में बने थे। कमरे की सजावट में विशेष ध्यान दिया गया था।

कमरे में आकर सरस्वती देवी ने सबसे पहले कमरा लॉक किया और पूरे क्वार्टर को चेक किया।

सभी कुछ चाक चौबंद था।

जो खेल वो खेल रही थी उसके लिए उसका पूरी तरह सावधान रहना ज़रूरी था।

वो एक छोटा सा ड्राइंग रूम था जिसमें सोफे वगैरह के साथ साथ एक कोने में कंप्यूटर टेबल और चेयर भी लगा था। मेहमानों को रिसीव करने के लिए यही कमरा प्रयुक्त होता था। ड्राइंग रूम से ही अन्दर के बेडरूम के लिए एक पैसेज था और उसी पैसेज में दाईं ओर बाथरूम अटैच्ड था। दूसरा बाथरूम अन्दर वाले बेडरूम से अटैच्ड था। दोनों बाथरूम के मध्य करीब चार फुट का स्पेस था जो बाथरूम की चौड़ाई के कारण लगभग 4X6 के आकार के कमरे का रूप धारण कर लेता था। कमरे में प्रवेश के लिए बेडरूम वाले बाथरूम की दीवार का ही प्रयोग करती थी हमारी सरस्वती देवी।

अब वो कमरे में बंद हो चुकी थी कमरे में एक विशाल स्क्रीन वाला कंप्यूटर मौजूद था साथ ही बहुत सारे साजों सामान मौजूद थे। एक दक्ष कंप्यूटर ऑपरेटर की तरह उसने अपना सीट संभाल ली थी। उसके बैठते ही डिस्प्ले एक्टिवेट हो चुका था। बड़ी ही मेहनत से उसने इस सिस्टम को डेवलप किया था। इस सिस्टम को ओपन करना उसे और एक और शख्स को छोड़कर किसी और के बस की बात नहीं थी। स्क्रीन के सामने आते ही उसका कम्पलीट फेस डीटेकटिंग सिस्टम एक्टिव हो जाता था और उसके खोपड़ी और आँख की बनावट को रीड करके ही एक्टिवेट होता था। किसी भी और तरीके से इसे ऑन करना संभव नहीं था। सिस्टम के ऑन रहने के बाद भी उसे पूरी तरह यूज़ भी वो ही कर सकती थी।

तो यह था उसका फुल प्रूफ सिस्टम जिसका नाम उसने खोपड़ी रखा था। एक आश्रम प्रमुख के पी ए के पास ऐसी ‘खोपड़ी’ का होना तफ्तीश का विषय हो सकता था अगर लोगों को इसके बारे में पता चल जाता।

अव्वल तो ऐसी नौबत नहीं आयी थी।

और इस कंप्यूटर को IP ट्रैक करना भी किसी के लिए मुमकिन नहीं था।

अभी स्क्रीन पर उसके सामने आश्रम में मौजूद लोगों के प्राइवेट ईमेल पर रिसीव हुए थे या उनके द्वारा भेजे गए थे। आश्रम में लोग अपने मोबाइल का तो इस्तेमाल नहीं कर सकते थे पर आश्रम के बाहर ये सुविधा मौजूद थी। कुछ मेल दुसरे भाषा में भेजे या प्राप्त किये गए थे।

आश्रम में रहने के लिए ईमेल का होना ज़रूरी था। आज पहली बार उसके ध्यान में आया कि केवल दो लोग ऐसे थे जिनका ईमेल अकाउंट शक पैदा करता था।

पहला शख्स ताशी था।

उसका ईमेल अकाउंट केवल छः मास पुराना था यानि जब उसने इंडिया में प्रवेश किया था। सारे मेल इंडिया में उसके द्वारा बनाये गए नए दोस्तों द्वारा ही भेजे गए थे।

ताशी रोज़ आश्रम के बाहर मौजूद साइबर कैफ़े में एक दो घंटा गुज़रता था।

तो क्या ताशी अपने अतीत को छुपाकर रखना चाहता था?

पता लगाना होगा, सरस्वती ने निश्चय किया।

आश्रम में ऐसे लोगों का आना लगा रहता था जो कहीं क्राइम करके आते थे और अपनी पहचान छुपाकर यहाँ रहना पसंद करते थे।

ऐसे लोगों के अतीत को ट्रेस करना और इसके बदले में उन लोगों से कुछ सुविधा शुल्क वसूल करना, कभी कभी ये सुविधा शुल्क करोड़ो में होता था। क्या ताशी के साथ भी ऐसा किया जा सकता था?

दूसरा शख्स नरेन्द्र था जिसका ईमेल अकाउंट अभी तक ब्लैंक था। उसको अच्छी तरह वो तौल चुकी थी।

सब कुछ सावधानी से करना होगा...।

अब सरस्वती ने अपने एकाउंट्स टटोलने शुरू किये। ये एकाउंट्स उसके अपने नाम से न होकर ‘खोपड़ी’ के नाम से था।

वो अपने ‘कस्टमर’ को रेडकॉइन के फॉर्म में जमा करने का निर्देश देती थी जो बीसवीं सदी का सबसे सेफ इन्वेस्टमेंट था। पिछले छह महीने में इस अकाउंट में जमा धनराशी छह गुना होकर सत्तर करोड़ के ऊपर हो चुकी थी।

“सत्तर करोड़ की खोपड़ी।” बुदबुदाते हुए मुस्कुराई।

अब उसने कल के कार्यक्रम पर नज़र दौड़ाई।

कोई ख़ास इंगेजमेंट नहीं था, सिवाय एक के।

सुबह नौ बजे उसे सिकंदर से मिलना होगा।

सिकंदर, जिसके नाम से ही उसके सारे बदन में झुरझुरी सी दौड़ रही थी। एक ही बार तरीके से उससे सामना हुआ था।

अनजाने में किससे पंगा ले लिया था उसने।

कमबख्त ने उसे बोलने का मौका ही नहीं दिया था। पता नहीं कैसे जान गया था वो की छह महीने पहले उसे ब्लैकमेल करने वाली वो हीं है। कमबख्त ने उसका पर्सनल मोबाइल नंबर भी निकलवा लिया था।

एक दिन पहले किस तरह पिलपिला रहा था वो। एक झटके से उसने पचास लाख फिर मेरे अकाउंट में ट्रान्सफर कर दिए। काम छोटा सा था।

उसके भाई को एक दिन के लिए कहीं छुपा कर रखना था।

उसका भाई यानी केयरटेकर दयाल।

जो मैं चाह कर भी नहीं कर सकती थी। मैं तो दिल्ली से आज ही लौटी थी।

और फिर आज शाम! फ़ोन पर उसकी आवाज शीशे की तरह उसके कान में उतर गयी थी।

“तेरे कारण मरा है मेरा भाई। तू चाहती तो बचा सकती थी उसे। एक करोड़ दिए हैं मैंने तुझे। कल सुबह दो करोड़ लेकर श्मशान के पास बारासाहब के बंगले में चली आना। नहीं तो कल १२ बजे तक मैं तेरे गुरु के सामने रहूँगा।”

दो करोड़!

कहने को तो वो करोड़ों की मालकिन थी पर दो करोड़ कैश चाह कर भी इकट्ठे नहीं कर सकती थी।

दयाल की रक्षा का वादा किया था उसने। या यूँ कहा जाये तो बेहतर होगा कि उसने उससे वादा ले लिया था। वही दयाल जो केयरटेकर के भेष में यहाँ काम कर रहा था। वही दयाल जिसकी बेदर्दी से हत्या कर दी गयी थी।

दयाल की सेफ्टी के एवज में सिकंदर पचास लाख रुपये ‘खोपड़ी’ में कुर्बान कर चुका था।

इतनी आसानी से वो अपने पैसे और दयाल को भूलने वाला नहीं था वो।

------------------

“ए मरद।”

“कहो औरत।”

“ई कहाँ ले आये हमको।”

“अरे बहुत बढियां ढाबा है ये। यहाँ का मसाला नान बहुत फेमस है।”

“पर हमको ई जगह जरिक्को पसंद नहीं आ रहा है। देखिये साइड में लोग बईठ के दारू पी रहे हैं।”

“तो का हुआ, हम भी पी लेंगे थोड़ा-मोड़ा।”

“अरे नहीं नहीं, आपको तो हम पीने ही नहीं देंगे। एकदम से नशा हो जाता है आपको।”

“ई देखो कर दी न बुरबक जैसी बात। अगर नशा नहीं होगा तो पैसा कहे खरचेंगे दारू पर। कहिये भैय्या ठीक कहे न”, मरद अब पास बैठे व्यक्ति को संबोधित हुआ बोला।

रात के ग्यारह बज चुके थे। शहर के बाहर हाईवे पर स्थित यह ढाबा रोज की तरह देर रात तक खुला रहता था। ग्राहक के नाम पर बस तीन लोग पहले से पुरानी सी कुर्सियों पर बैठे थे। बाद में पहुँचने वाले दोनों एक मोटर साइकिल पर पहुंचे थे और कपड़ों से ही किसी सुदूर गाँव के वासी प्रतीत हो रहे थे। लड़के ने चटक मटक शर्ट और औरत ने एक सूती साडी पहन रखी थी, पल्लू माथे पर था। दोनों २४-२५ से ज्यादा के प्रतीत नहीं हो रहे थे।

जिस व्यक्ति को बाद में पहुँचने वाले पुरुष ने संबोधित किया था वो भी बातचीत में शामिल हो गया।

“ये बात तो सही कहे हो। अगर नशा नहीं होगा तो हम लोग का बुरबक है”, कहकर जोर से हंस पड़ा। “ई लों भैय्या, एक पेग हमारी तरफ से, कहते हुए एक गिलास में पेग बना कर बढ़ा दिया।

पीने वालों में दोस्ती बनने में देर नहीं लगती।

कुछ ही देर में अपनापन छा गया था उन लोगों में।

दूसरे युवक ने लड़खड़ाते हुए स्वर में कहा जिसे यकीनन नशा हो गया था, “एक ब बात कहूँ भैय्या, इतनी रात में औरत जात क क को लेकर बाहर निकलना ठीक नहीं जा... ज़माना ख़राब है।”

“ई बात तो आपने सही कही भैय्या, पर हमर मरद हमारा बात सुनते कहाँ हैं?”

“चुप बे कुतिया।” कहते हुए मरद ने औरत के पीठ पे एक धौल जामा दिया, “मर्दों के बीच में ‘औरत’ को ज्यादा नहीं बोलना चाहिए।”

औरत खिसियाते हुए चुप हो गयी।

पीते पीते मरद का हाथ एकाएक थम गया, “अरे यहाँ तो शराब बंदी है न? कहीं पुलिस ने धर लिया तो?”

“अरे नहीं जनाब, यहाँ सबको अपना अपना खुद धरना पड़ता है,” कहते हुए उस तीसरे युवक ने आंख मारी और ठहाका मार कर हंस पड़ा।

“अरे चिंता नहीं कीजिये, ये खुद यहाँ के ए एस आई हैं।”

मरद घबराते हुए खड़ा हो गया, माफ़ कीजियेगा हुज़ूर, पहचाने नहीं थे, “कहते हुए हाथ जोड़कर आधा झुक गया था।”

अपनी इज्ज़त पर ए एस आई फूल कर कुप्पा हो गया था, “अरे नहीं अभी हम ऑफ ड्यूटी हैं।”

“हाँ भैय्या, टेंशन नहीं लीजिये। सर जी एकदम सोना आदमी हैं सोना। आज दिन भर आश्रम में ड्यूटी बजाये हैं अभी जाकर फुरसत मिला है तब यहाँ आये हैं।”

“का करे हमारे एस पी साहब हमारे बिना कहीं जाते हीं नहीं हैं। चांदीपुर में कदम रखे की सबसे पहले हम ही को याद करते हैं।”

“आदमी सलीका का हो तो लोग काहे नहीं याद रखेंगे जी, देखिये दरोगा बाबू को इतना बड़ा ऑफिसर होक भी हम जैसन लोगों से भी कितना प्रेम से बात करते हैं, “औरत ने बात जोड़ी।”

ए एस आई निहाल हो गया, “आपकी मेहरारू तो पढ़ी लिखी मालूम होती है जी।”

“एकदम सही पहचाने। दसवीं पास है, बस मेट्रिक पास नहीं कर पाई। वैसे हुआ का था कल रात में? सुना कि कोई राछस घुस गया था आश्रम में?”

“है जी, आजकल के ज़माने में राछस कहाँ से आएगा?” औरत ने बुद्धिमानी दिखाई।

“नहीं जी, एकदम राछस था राछस”, उस युवक का नशा फिर हिरण हो गया था।

“सुनी सुनी बात पे कहे यकीन करते हैं?”

“का कहते हैं मरदे, यहीं तो हैं सेवाराम बाबू जिन्होंने खुद देखा था अपनी आँखों से।”

“ई देखिये, अरे सही कहे आप ही का तो फोटो बार बार टीवी में दिखा रहा था बार बार।”

“और आप…क्या नाम बताये अपना?”

“जी हमको शरवन कहते है। हम ही तो इस सेवा को खिंच के यहाँ लाये हैं। इ तो डर के मारे घर से निकलने को तैयार ही नहीं था।”

“तो आप भी यहीं चांदीपुर में रहते हैं शरवन जी?”

“नहीं भैय्या। हम तो थोडा दूर शहर की तरफ रहते हैं। कल बड़े दिन के बाद अपने सेवा से मुलाक़ात हुई। आज सेवा का हाल पूछने चला आया।”

“पर आपको इतना देर से ऑफिस से लौटने का कौन ज़रूरत रहा सेवाराम जी। ज़माना ख़राब है न। कहीं उ राछस आप पर हमला कर देता तो?”

“सेवाराम का दिल बाग़ बाग़ हो गया। कितनी प्यारी है इसकी बीवी। काश उसे भी इतनी प्यारी बीवी मिल जाये!”

“अरे हम तो खुद ही ज़ल्दी लौट जाते हैं डेली। उ तो दोस्त लोगन बैठा लिए इसलिए लेट हो गया। नहीं तो हमको पीने उने का कोई शौक़ नहीं है।”

“सब मर्दन का एक ही हाल है। हमारे मर्द भी दोस्त लोगन के चक्कर में रेगुलरली बैठ जाते हैं और फिर अनाप शनाप हरक़त करते हैं।”

“पर हम रोज़ रोज़ वाले में से नहीं हैं। वरना ऑफिस से हम तो सीधे घर आते हैं। और कल दूसरी बार ऐसा हुआ। इसके पहले भी एक बार दोस्त यार लोग बैठा लिए थे और रास्ते में ही तबियत ख़राब हो गया था। उस दिन ऐसा तबियत बिगड़ा की क़सम खा लिए थे की अब ऑफिस से सीधा घर आयेंगे। पर कल तो यार लोग एकदम पैर पकड़ लिए थे कि आज बैठना ही पड़ेगा। बस थोडा मजबूर हो गए उनकी विनती पर।”

“ऐसा कहीं होता है भैय्या!” मरद बोला, “ज़रूर किसी ने उनसे बाज़ी लगाया होगा की सेवा भैय्या को पिला के दिखा दे तो जाने।”

“कहीं आपके इ दोस्त शरवन ही तो ऐसा नहीं कर दिए सेवाराम जी”, औरत बोली।

“अरे ये हमारा दोस्त शरवन बड़ा मजाकिया है। अरे शरवन कहीं ये तेरी शरारत तो नहीं थी?”

शरवन हतप्रभ हो गया। ये बातचीत किस दिशा में जा रही थी।

---------------
 

Similar threads

S
Replies
65
Views
66
StoryPublisher
S
S
Replies
42
Views
43
StoryPublisher
S
S
Replies
25
Views
26
StoryPublisher
S
S
Replies
53
Views
54
StoryPublisher
S
Back
Top